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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

वो यूँ ही मेरे ऊपर बैठी हिल रही थी। मेरी आँखें भारी हो चली थी। मैं सोना नहीं चाहता था। मैं तो उसके साथ पूरी रात प्यार करना चाहता था पर अपने आप पर जैसे मेरा काबू नहीं रहा। पलकें ऐसे भारी हो गई थी जैसे मैं कब से सोया नहीं था और आज की रात मुझे अपनी जिंदगी में पहली बार सुकून हासिल हुआ था।

अपनी गाण्ड ऊपर नीचे हिलती वो झुक कर मेरे ऊपर लेट गई। उसकी छातियां मेरे सीने से आकर दब गई। उसके होंठ मेरे कान के पास आए और वो बहुत धीरे से बोली।

फकत एक तेरी याद में सनम, । ना सफर के रहे, ना वतन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।

और उसकी आवाज सुनते ही एक अजीब सी ठंडक और बेचैनी जैसे एक साथ मेरे दिल में उतर गई। पता नहीं मैं बेहोश हो गया या नींद के आगोश में चला गया पर उसके बाद कुछ याद नहीं रहा। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो वो जा चुकी थी। मैं खामोशी से उठा तो मन अजीब तरह से भारी था।

समझ में नहीं आ रहा था की ये इसलिए था की मैं अपनी बीवी को धोखा देते हुए एक अजनबी लड़की के साथ सोया था जो एक पाप था या इसलिए की वो लड़की अब मेरे साथ नहीं थी और मैं उसको फिर से देखना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।

सिर्फ ये एहसास के वो अब मेरे पास नहीं है जैसे मेरी जान निकल रही थी। पहाड़ों में अब भी अजीब सा

सन्नाटा था।

बाहर सूरज अब भी नहीं निकला था। चारों तरफ बदल फैले हुए थे। मैंने उठकर अपने कपड़े पहने और बाहर आकर फिर अंदाजे से उस जगह की तरफ चल दिया जहाँ मैंने उसको पहली बार देखा था। ना कुछ खाया, ना मुँह धोया, बस दीवानों की तरह उठा और उसकी तलाश में चल पड़ा।

वो घर जहाँ की उसने बताया था की वो रहती थी अब भी वहीं था। मेरी जान में जान आई। घर के बाहर पहुँच कर मैंने कुण्डा खटखटाया। एक बुड्ढी औरत ने दरवाजा खोला। हाथ में एक इंडा जिसके सहारे वो झुक कर चल रही थी। दूसरे हाथ में एक माला जिसका वो जाप कर रही थी।

“कहिए?” उसने मुझसे पूछा

मैंने उसको बताया के मैं एक लड़की को ढूँढ़ रहा था। हुलिया बताया और तब मुझे एहसास हुआ की मैंने कल रात उसका नाम तक नहीं पूछा था।

मेरी बेटी आशिया?” बुड्ढी औरत बोली।

मैंने बताया की मैं नाम नहीं जानता पर फिर से लड़की का हुलिया बताया।

हाँ.. मेरी बेटी आशिया। एक साल पहले आते तो शायद मिल लेते...”

-

मैं मतलब नहीं समझा।

उसको मरे तो एक साल हो गया...”

मैं फिर भी मतलब नहीं समझा और हैरानी से उस औरत को देखने लगा। उसने मुझे वहीं एक पेड़ की तरफ इशारा किया और दरवाजा मेरे मुँह पर बंद कर दिया। मैं किसी बेवकूफ की तरफ चलता उस पेड़ तक पहुँचा। पेड़ के नीचे एक कबर बनी हुई थी। एक पत्थर पर हिन्दी और उर्दू में लिखा था- “आशिया...”

और नाम के नीचे लिखी थी वो शायरी जो उसने कल

फकत एक तेरी याद में सनम, ना सफर के रहे, ना वतटन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।

मौत की तारीख आज से ठीक एक साल पहले की लिखी हुई थी।

जब मैं वापिस गेस्ट हाउस पहुँचा तो बाहर मुझे केयरटेकर मिला। मैंने उसको उस लड़की के बारे में बताया जो कल मेरे साथ आई थी।

कौन सी लड़की साहब?” वो हैरत से मेरी तरफ देखता बोला- “आप तो अकेले आए थे...”

मैंने उसको बताया की वो लड़की जिससे मैं बात कर रहा था।

मैं तो समझा था की आप वो हनुमान जी से बात कर रहे हैं..." उसने मेरे काटेज के थोड़ा आगे बनी एक हनुमान जी की मूर्ति की तरफ इशारा किया। वो फिर बोला- “आप कल अकेले आए थे साहब...”

हवा में एक अजीब सी खामोशी थी जैसे कहीं कोई मर गया हो और सारे पेड़, सारी वादियां, सारे पहाड़ उसका मातम कर रहे हों। मेरी आँखें भर गई और कलेजा मुँह को आ गया। मैं रोना चाहता था। दहाड़े मार मार कर रोना चाहता था।

मैं उसको हासिल करना चाहता था। फिर उसको प्यार करना चाहता था। मैं उसके साथ होना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।

उसको तो मरे एक साल हो गया...” बुढिया की आवाज़ मेरे कानों में गूंज रही थी।

आप कल अकेले आए थे साहब..” केयरटेकर की आवाज दिमाग में घंटियां बजा रही थी।

मेरा दिल ऐसे उदास था जैसे मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल किया की छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पड़े, अपने कपड़े फाड़ दें, इस पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दूं।अपनी जान दे दूं

और मदहोशी के से आलम में मेरे कदम पहाड़ के कोने की तरफ चल पड़े, खाई की तरफ।

***** समाप्त *****

***** *****

 
27 सिलसिला



कहते हैं के दो चीजें इंसान चाहे जितनी कोशिश करे, कभी छुपा नहीं सकता। पहली चीज है कूड़ा, कचड़ा, टट्टी, और दूसरी चीज होती है झूठ। और वजह दोनों के पीछे एक ही है, दोनों चीजें बदबू मारती हैं। कोई भी इस बदबू को ज्यादा वक्त तक छुपाकर नहीं रख सकता और अगर ऐसा करने की कोशिश करे, तो वो बदबू एक लंबे अरसे तक खुद ही सूंघनी पड़ती है। इंसान एक झूठ बोलता है, फिर उसे छुपाने के लिए दूसरा झूठ, फिर तीसरा और झूठ बोलने का ऐसा सिलसिला शुरू हो जाता है जिससे निजात सिर्फ सच बोलकर ही पाई जा सकती है, पर कभी कभी ऐसा करने के लिए भी बहुत देर हो चुकी होती है।

एक ऐसा ही खेल किश्मत ने मेरे साथ भी खेला। 10 साल पहले एक मनहूस रात को मैंने एक गलती की और सबकी नजर से उसको छुपा तो लिया पर फिर मेरी अपनी करतूत मेरे सामने इस तरीके से आ खड़ी हुई की मैं चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता था। उस रात की मेरी गलती ने एक ऐसा अटूट सिलसिला शुरू कर दिया था जिसे मैं लाख कोशिशों के बाद भी रोक नहीं पा रहा था।

क्या करूँ, क्या ना करूं, सर पकड़े आँखें बंद किए बैठा यही सोच रहा था की दीवार पर टंगी पुराने जमाने की घड़ी ने ग्यारह बजाए और घंटे की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी।

वक्त हो चुका है...” मैंने दिल ही दिल में सोचा।

इतने ध्यान से क्या सोच रहे हो..” उसकी मीठी सुरीली आवाज़ मेरे कान में पड़ी।

सर उठाकर मैंने अपनी आँखें खोली और उसकी तरफ देखा। वो मेरे सामने बैठी मुश्कुरा रही थी।

“सर में दर्द है... दबा दें... अपने उसी फिकर करने वाले अंदाज में प्यार से पूछा।

मैंने मुश्कुराते हुए इनकार में गर्दन हिला दी।

हम दोनों मेरे मनाली के पास ही एक छोटे से हिल स्टेशन में बने घर में बैठे थे। ये बंगलो मैंने 12 साल पहले खरीदा था और अक्सर यहाँ आता रहता था। आसमान में चाँद पूरे नूर पर था और हम दोनों बड़ी सी बाल्कनी में लगी हुई डिनर टेबल पर बैठे थे।

“खाना ठंडा हो रहा है जान...” उसने प्लेट मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा- “खा लो... खीर फिर से ठंडी हो गई है, मैं गरम कर लाऊँ?”

नहीं रहने दो...” मैंने कहा- “मुझे ठंडी ही पसंद है...”

खीर, दिल ही दिल में मैं सोच रहा था, हमेशा की तरह।

पिछले 10 साल में वक़्त ने उसको जरा भी नहीं बदला था। वो आज भी वैसी थी। लंबे घने काले बाल, तीखे नैन नक्श, गोरा रंग, भारी भारी छातियां, लंबा कद। आज भी किसी 20-22 साल की लड़की की तरह प्यार लफ्ज़ में कितना भरोसा रखती थी। वो सब कुछ थी जो एक मर्द को चाहिए होता है पर पता नहीं मुझे उससे ज्यादा और

क्या चाहिए था। मैंने एक हाथ से अपने कोट की पाकेट चेक की। उम्मीद के मुताबिक ही मेरी। 45 रिवाल्वर मेरी जेब में थी, लोडेड।

खाना खतम करके उसने प्लेट्स हटाई और अंदर किचन में रखकर आ गई। आते आते उसने म्यूजिक सिस्टम पर एक स्लो रोमँटिक धुन लगा दी और वाल्यूम इतना कर दिया की हमें बाहर तक आवाज आए।

कम डान्स विद मी..." आते हुए उसने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।

बट वी जस्ट आते..” मैंने मुश्कुरा कर जवाब दिया।

सो... कम ओन...” मेरा हाथ पकड़कर उसने खींचा। मैं जानता था की वो ऐसा करेगी इसलिए उसकी कोशिश करने से पहले ही उठकर खड़ा हो गया।

“हैव यू रियली, लव्ड आ वुमन...” ब्रयान आडम्स की आवाज आ रही थी और हम दोनों के जिश्म एक दूसरे से सटे हुए, बहुत करीब, धीरे-धीरे म्यूजिक के साथ हिल रहे थे। उसके दोनों हाथ मेरे कंधे पर थे और मेरे उसकी कमर पर। मेरे कंधे पर रखे उसके चेहरे की साँस की गर्मी में अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था, और हर साँस के साथ ऊपर नीचे होती उसकी छातियों को अपने सीने पर महसूस कर रहा था। घर के अंदर घड़ी ने। 12:00 बजाए। मैं जानता था की अब वो क्या कहेगी।

लेट्स गो टू द बेडरूम। मेक लोव तो में। आई वॉट तो सेलेब्रेट और आनिवर्सरी विद यू इनसाइड में...” कहते हुए वो हल्की सी ऊपर को उठी और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए।

कुछ पल बाद हम दोनों बेडरूम में खड़े एक दूसरे से लिपटे हुए थे।

“तुम्हारे बाल सफेद हो रहे हैं.” धीरे से उसने मेरे कान में कहा- “जवानी में बुड्ढे हो रहे हो। आई होप की बेड पर अब भी परफार्म कर सकते हो...” कहकर वो धीरे से हँसी, वही प्यारी सी हँसी की आवाज।

एक मर्द को और क्या चाहिए हो सकता है जो इसमें नहीं, मैंने दिल ही दिल में सोचा।

हव यू रियली लव्ड आ वुमन..” ब्रयान आडम्स के गाने की आवाज फिर आई और मैं सोचने पर मजबूर हो गया के डिड आई रियली लव हर।

उसने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दो। शी लाइक्ड द स्ट्रॉग प्ले आफ माइ मसल्स।

लव , जान...” उसने धीरे से मेरे कान में कहा। जैसे की वो जानती हो की मैं क्या सुनना चाह रहा हूँ। यही वो लाइन थी जो उसने मुझसे 10 साल पहले कही थी और उसके बाद हर साल कहती आ रही थी पर मैं क्यों कभी उसको प्यार ना कर सका, ये मुझे कभी समझ नहीं आया।

 
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और बेड पर गिरा दिया। शी सैट देयर स्माइलिंग उप ऐट मी। शी वाज ब्यूटीफुल, एलिगेंट, ग्रेसफुल, गेंतल, काइंड और हाट, आल अट द सेम टाइम, एवेरिथिंग आई कुड वॉट इन आ वाइफ।

तो इसके अलावा और क्या चाहिए मुझे..” मैंने दिल ही दिल में सोचा और मेरा ध्यान कोट की जेब में रखी रिवाल्वर पर गया। मैंने अपना कोट उतारकर एक तरफ रखा और अपनी जिप नीचे की। मेरा खड़ा हुआ लण्ड

फौरन ही बाहर आ गया।

वो मेरा इशारा अच्छी तरह समझती थी। आखिर ये पहली बार तो नहीं था की हम एक दूसरे से प्यार कर रहे थे। मुश्कुराती हुई वो उठकर अपने घुटनों पर बैठ गई, अदा से अपनी जुल्फों को लहराते हुए एक तरफ किया

और मेरे लण्ड को अपने हाथ में पकड़ा।

उम्म.. हाँ..." मेरे मुँह से निकल पड़ा। उसके हाथ कितने ठंडे थे। एक नजर मैंने एसी के टेंपरेचर पर डाली।

यू आर सो हार्ड..” उसने कहा, और मुश्कुराते हुए मेरा लण्ड अपने मुँह में ले लिया। हर टंग रेस्ड अराउंड द थिक टिप आफ माइ लण्ड अंटिल शी वाज लिटरली ड्रिलिंग।।

वो कभी दूसरी लड़कियों की तरह आराम से नहीं चूसती थी, सीधा लण्ड मुँह में लेते ही ऐसे चूसने लगती थी की मुझे लगता था की उसके मुँह में ही छूट जाऊँगा। आनंद की एक अजीब सी लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। मेरा लण्ड बेइन्तहा गरम हो चुका था और उसकी ठंडी गीली जीभ का टच एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर रहा था। खड़े खड़े मेरे पैर काँपने लगे और वो इशारा समझ गई। वो लण्ड और भी तेजी से चूसने लगी। कभी मुँह में लेती तो कभी अपने होंठ लण्ड पर फिराने लगती।

और देन हर फिंगर्स रीच्ड आउट और फाउंड माइ बाल्स। शी लाइट्ली केरेस्ड देम, फोंदलिंग देम और प्लेयिंग विद देम और इसने जैसे मेरे दिल-ओ-दिमाग में एक जादू सा पैदा कर दिया। जिस तरह से मेरा लण्ड उसके मुँह में झटके खा रहा था, उससे मुझे पूरा यकीन था की वो भी समझ चुकी थी की मुझे कितना मजा आ रहा था। मैंने अपने दोनों हाथों से उसके सर को पकड़ा और अपने पेट की तरफ खींची लिया। मेरा पूरा लण्ड उसके मुँह में गले तक उतर गया।

शी गैस्प्ड, फीलिंग द ब्लंट टिप आफ माइ काक बाउन्स आफ द रूफ आफ हर माउथ। शी स्वॉलोड हाई और देन माइ प्रिंक रेस्ड पास्ट हर टान्सिल्स।

मेरा खड़ा लण्ड उसके गले के अंदर तक उतर चुका था। एक पल के लिए उसने पीछे हटने की कोशिश की, शायद उसका दम घुटने लगा था, पर फिर वो धीरे से शांत हो गई और लण्ड के निचले हिस्से पर अपनी जीभ फिराने लगीं।

कुछ पल बाद वो पीछे को हुई और लण्ड मुँह से निकालकर लंबी लंबी साँस लेने लगी। देन शी टेन्स्ड हर जासऔर दांतो से मेरे लण्ड पर काटा। जिसमें मुझे तकलीफ होनी चाहिए थी उसमें भी मुझे मजा ही आया। आई गोंड... और शी इमीडीयेली सक्ड इट बक इन हर माउथ- “निकलने वाला है मेरा। बस करो, बस नहीं तो मुँह में ही निकल जाएगा। प्लीज...”

उसने लण्ड मुँह से निकाला और पीछे को होकर बैठ गई। मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ना चाहा पर वो तेजी के साथ पीछे होते हुए आराम से लेट गई और मेरी तरफ देखकर मुश्कुराने लगी। मैंने अपनी पैंट के बटन खोले और उसको उतार कर पूरी तरह नंगा हो गया। मुझे देखते हुए उसने भी अपने गाउन के स्ट्रैप्स अपने शोल्डर्स से खिसकाये और लेटे लेटे ही गाउन सरका कर अपने घुटनों से नीचे कर दिया। हमेशा की तरह वो नीचे से नंगी थी। गाउन के नीचे कुछ भी नहीं था।

फक मी नाउ...” उसने अपनी बाहें मेरी तरफ फैलाई- “लोव मी, चोदो मुझे...”

वो अच्छी तरह जानती थी की मुझे बिस्तर पर इस तरह की बातें कितना उत्तेजित करती थी और वो इनका इस्तेमाल करना भी बखूबी जानती थी। बिस्तर पर चढ़ता हुआ मैं उसके करीब पहुँचा। उसने अपनी टांगे धीरे से फैलाई और हवा में ऊपर को उठा ली।

मेरी चूत को तुम्हारे लण्ड का इंतेजार है। आ जाओ। चोदो मुझे..”

ये मेरे लिए बहुत से कहीं ज्यादा था। मेरा लण्ड पूरे जोश में आ गया और मैं फौरन उसकी टाँगों के बीच आ गया। लण्ड हाथ से पकड़कर उसकी चूत पर रखा।

गेट इन... इन वन शाट..” उसने नीचे से अपनी गाण्ड ऊपर को उठाई।

मैंने जोर से धक्का मारा और मेरा लण्ड उसकी गीली चूत में अंदर तक धंस गया।

आआअह्ह...” वो चिल्लाई- “भर दो मुझे। पूरी को भर दो..” लण्ड उसकी चूत में अंदर तक घुसाकर मैं उसके ऊपर झुका और उसके होंठ को चूमा पर उसने मेरे बाल पकड़ते हुए मेरे सर को नीचे अपनी छातियों की तरफ धकेल दिया।

सक देम..” किसी शेरनी की तरफ वो चिल्लाई- “चूसो इन्हें, काटो, मसलो। सक द लाइफ आउट आफ देम..”

मैंने उसका निपल अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। मेरे बालों को पकड़े वो जैसे अपनी पूरी छाती मेरे मुँह में घुसाने की कोशिश कर रही थी।

आआअहहह..” वो चिल्लाई और नीचे से अपनी गाण्ड हिलाते हुए लण्ड अंदर बाहर करने की कोशिश करने लगी चोदो मुझे जान... जी भरके चोदो... आज आनिवर्सरी पर बोलो क्या चाहिए तुम्हें?”

मैं जानता था की अब वो क्या कहने वाली थी।

“बोलो क्या करना चाहते हो? मैं सब करूंगी आज की रात। तुम मेरी गाण्ड मारना चाहते हो ना... आई विल गिव यू माइ गाण्ड। टेल मी वाट एल्स डू यू वांट लवर..”

मैं दिल ही दिल में मुश्कुरा उठा। वो हमेशा यही कहती थी पर ऐसा करने की नौबत आई नहीं थी।

फक मीऽऽऽ...” मैंने हल्के से लण्ड बाहर खींचा तो वो फिर चिल्लाई।

 
तभी बाहर लगी घड़ी में एक बजा।

लेट्स काउंट थे शाट्स...” वो फौरन बोली- “लेट्स सी इफ यू आर केपबल आफ 10,000 शाट्स इन माइ चूत। बोलो है दम...”

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मैंने उसकी तरफ देखा और उसकी दोनों छातियों को पकड़कर नीचे से धक्के लगाने लगा। वो मेरे हर धक्के को गिन रही थी। एक... दो...

उस पूरी रात मैं उसको जानवरों की तरह चोदता रहा और वो ही हमेशा की तरह बिस्तर पर लगातार मेरा उस पर रात में की जानवरों की तरह चोदता रहा मुकाबला करती रही। थक कर हम दोनों बिस्तर पर लुढ़क गये और वो मेरी बाहों में आराम से लेट गई।

“कुछ सुनाऊं.” धीरे से वो मेरे कानों में बोली। मतलब मैं समझता था। उसकी तरफ देखकर मुश्कुराया और उसके होंठ चूम लिए।

सुनाओ...” मैंने कहा और वो एक गाजल सुनने लगी।

यूँ ना मिल हमसे, खफा हो जैसे, साथ चल, मौज-ए-सबा हो जैसे। लोग यूँ देखकर हँस देते हैं, तूने मुझे भुला दिया हो जैसे, इश्क़ को शर्क की हद तक ना बढ़ा, यूँ ना मिल हमसे, खुदा हो जैसे।। मौत आई भी तो इस नाज के साथ, मुझपे कोई एहसान किया हो जैसे। हिचकियां रात भर आती रही, तुमने मुझे याद किया हो जैसे। जिंदगी गुजर रही है इस तरह, बिना जुर्म कोई सजा हो जैसे। बाहर घड़ी 5 बजा रही थी।

"यू वान्ट सी द सनराइज...” मैंने उससे पूछा तो किसी छोटी बच्ची की तरह उसने फौरन हाँ में सर हिला दिया।

कम..” कहकर मैं बिस्तर से उठा और वो भी मेरे पीछे पीछे ही उठ गई।

तैयार होकर हम दोनों घर से निकले और थोड़ी देर चल कर एक पहाड़ के आखिरी छोर पर पहुँचे। मेरा घर जहाँ बना हुआ था वहाँ दूर दूर तक कोई और घर नहीं था। बस सुनसान सड़क के किनारे एक पहाड़ के ऊपर बना छोटा सा काटेज।

उसका हाथ पकड़े मैं पहाड़ के किनारे पर आकर खड़ा हो गया। हम दोनों के आगे अब एक गहरी खाई थी पर उसकी तरफ ना ध्यान उसका था, ना मेरा। सामने आसमान पर चाँद अब भी पूरा था और हल्की हल्की सूरज

की लाली भी फैलनी शुरू हो गई थी। ये एक ऐसा नजारा था जब आसमान पर रात का चाँद और सुबह का सूरज, दोनों एक साथ देखे जा सकते थे।

वो मुश्कुराते हुए पूरी दुनिया से बेखबर सामने आसमान की ओर देख रही थी। मैं दो कदम पीछे को हुआ और अपनी जेब पर हाथ रखा। रिवाल्वर अब भी मौजूद थी। मैंने जेब में हाथ डाला और रिवाल्वर बाहर निकली।।

वक़्त हो चुका है...” आसमान में उगते सूरज की तरफ देखते हुए मैंने सोचा।

“सारी जान... एक नजर उसपर डालते हुए मैं जोर से बोला।

वो मेरी तरफ पलटी।

मेरी उंगली ने रिवाल्वर का लीवर खींचा।

हवा में गोली की आवाज गूंजी।

रिवाल्वर से निकली गोली उसके माथे पर लगी और उसका खूबसूरत चेहरा बिगड़ गया। पीछे को झटका खाते हुए वो लड़खड़ाई और खाई में जा गिरी।









कुछ देर तक वहीं खड़ा मैं लंबी साँस लेकर अपने आपको शांत करता रहा। जब धड़कन काबू में आ गई तो मैंने आगे बढ़कर खाई में झाँका। नीचे पत्थर तो नजर आ रहे थे पर उसकी लाश का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं था। वो तो जैसे गिरते हुए कहीं हवा में ही गायब हो गई थी। मैंने अपने हाथ की तरफ देखा। रिवाल्वर भी मेरे हाथ से गायब हो चुकी थी।

मौत आई भी तो इस नाज के साथ, मुझपे कोई एहसान किया हो जैसे..."

मुझे उसके कहे बोल याद आए और मैं पलट कर वापिस काटेज की तरफ चल पड़ा जहाँ पहुँचकर मुझे हर चीज फिर वैसे ही करनी थी जैसे की वो 10 साल पहले उस रात थी जब मैंने उसका खून किया था।

पर क्या सच में मैं उसे मार पाया था... वो हर साल इसी रात फिर जाने कहाँ से लौट आती थी, जाने कैसे लौट आती थी और ये रात ठीक उसी तरह चलती थी जैसे की 10 साल पहले चली थी।

वो खाना बनती थी, हम खाते थे, एक दूसरे को प्यार करते थे, सनराइज देखने आते थे और मैं हर सुबह उसका खून करता था। हर साल इसी रात वो जैसे अपनी मौत की कहानी दोहराने फिर चली आती थी। एक ऐसा सिलसिला जो खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। एक ऐसी गलती जो की तो मैंने 10 साल पहले थी पर अब हर साल करनी पड़ रही थी।

ज़िंदगी गुजर रही है इस तरह बिना जुर्म कोई सजा हो जैसे..."

***** समाप्त *****

 
28 सुबह की सैर

चड्डा, मिस्टर परमजीत सिंह चड्डा, शार्ट में पमी।

मिस्टर चड्डा कई बातों में 'टिपिकल' की डेफिनेशन पे खरे उतरते थे।

एक टिपिकल पंजाबी की तरह हँसमुख, हमेशा दाँत दिखाते हए। भले अकेशन कोई हो, चड्डा जी के बचे हुए 28 हमेशा डिसप्ले पर रहते थे।

एक टिपिकल हिन्दुस्तानी की तरह देश की हालत से परेशान पर सिर्फ बातों में।

एक टिपिकल मिड्ल एज्ड आदमी की तरह अपनी ढलती हुई उमर को लेकर फिकरमंद।

एक टिपिकल शहरी की तरह रोज सुबह पार्क के 10 चक्कर।

और एक टिपिकल मर्द की तरह थोड़े से ठरकी।

हेलो जी, गुड मार्निग। की हाल चाल...”

उमर तकरीबन 40-45 साल, 6 फूट एक इंच, जैसा की इनिशियल पोलिस रिपोर्ट में लिखा जाएगा, और तन्दृस्त शरीर। उनको देखकर ही लगता था की उमर के आगे वो धीरे-धीरे घुटने टेक रहे थे वरना अपने टाइम में बहुत ही जबरदस्त जवान रहे होंगे। सुबह-सुबह पार्क में हल्के हल्के जागिंग करते थे तो लंबे चौड़े इंसान को आता देखकर सब एक तरफ हो जाते थे।

लंबी मजबूत बाहें, चौड़ी छाती, कमर पर जमा होती हल्की हल्की चर्बी, मजबूत टांगे और दाढ़ी में छुपा रौबदार चेहरा।

उस दिन भी वो रोजाना की तरह सुबह 6:00 बजे पार्क के अपने 10 चक्कर पूरे कर रहे थे जो करने में उनके अट आन आवरेज तकरीबन एक घंटा लग जाता था। मिस्टर चड्डा दौड़ते हुए पार्क में बने हुए पथ पर आगे बढ़ रहे थे और उनके सामने से ट्रैक पहने एक औरत दौड़ती हुई आ रही थी।

उमर तकरीबन 35 साल, पसीने में नहाया चेहरा, नीचे झुकी नजरें, लंबे काले बाल। वो एक कुछ बड़े ही अजीब से अंदाज में धीरे-धीरे जोग कर रही थी।

होंठ आधे खुले हुए जैसे कोई बात हो जो बस लब तक आकर रुक गई हो, एक सफेद कलर की टी-शर्ट जिस पर सामने की ओर एक टाइगर छपा हुआ था। गोल छातियां जो ज्यादा बड़ी नहीं पर इतनी थी की उसकी दौड़ के साथ साथ टी-शर्ट में हिलती हुई नुमाया हो रही थी।

ये थी मिसेज शर्मा जिन्हें सबसे ज्यादा फिकर अपने कूल्हों पर जम रही चर्बी से थी। बाकी के शरीर के हिसाब से वो ठीक ठाक थी पर पिछले एक साल से उनके कूल्हों का साइज बढ़ना शुरू हो गया था। उनके पति को ये बहुत अच्छा लगता था और रात को वो अक्सर बिस्तर पर इस बात पर कोमेंट भी देता था पर मिसेज शर्मा को ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। उनकी सारी ट्राउजर्स छोटी पड़ने लगी थी और टाइट कपड़ों में उनके । कूल्हों का शेप कुछ अजीब से अंदाज में उभरने लग गया था। मिसेज शर्मा की एक और आदत थी। वो हमेशा दौड़ते हुए नीचे जमीन की ओर ही देखती थी।

नजर झुकाए हुए वो रोजाना आधा घंटा धीरे-धीरे पार्क के चक्कर लगाया करती थी। नीचे जमीन जिस पर पार्क में लगे जाने कितने तरह के अलग अलग भाँति के फूल के पौधों से गिरे हुए फूल, कुछ सूखे पत्ते और और भी ना जाने क्या क्या गिरा रहता था।

मिसेज शर्मा शहर के सबसे बड़े कालेज में एक प्रोफोसर थी। उनके कालेज में एक नयी लैब का निर्माण कार्य चल रहा था जिसका इंचारज उनको बनाया गया था। कालेज, लैब, पति, कूल्हे, कल रात का सेक्स जिसमें उनके कूल्हों के प्रति आकर्षित उनका पति पहली बार बैक-डोर एंट्री मारना चाहता था, उनका 8 साल का बेटा और ऐसे ही ना जाने और कितने ख्यालों में डूबी वो धीरे-धीरे आगे बढ़ ही रही थी की अचानक उस जोर की आवाज से चौंक उठी।

नमस्कार जी, गुड मार्निग। क्या हाल हैं जी... चंगा सब...”

इन अचानक से कहे गये शब्दों ने उनका ध्यान थोड़ा और वो एक पल के लिए बौखला गई। सामने से आ रहे लंबे चौड़े इंसान को देखा और मुश्कुरा कर बोली- “गुड मार्निग...”

पर तब तक वो आलरेडी उनकी बगल से गुजर चुका था और उनके गुड मार्निग की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने एक बार फिर अपने बिखर चुके विचारों को समेटा और फिर से सोचती हुई आगे की ओर बढ़ चली। पार्क में कुछ लोग अकेले ही दौड़ते थे और कुछ जोड़ो में, और कुछ 3 या उससे ज्यादा के ग्रुप में। कुछ अथलीट्स होते थे, कुछ कालेज और स्कूल के लड़के लड़कियां, कुछ मिल एज्ड पर सबसे ज्यादा संख्या होती थी 50 के आस-पास या पार हो चुके लोगों की। और इन सब लोगों से ही, सफेद टी-शर्ट और नीले रंग के ट्रैक पहने, पैरों में महंगे आदिदास के जूते, और कान में लगे एअर फोन्स जो काले होने की वजह से दाढ़ी और बालों में तकरीबन छिप ही जाते थे, मिस्टर चड्डा गुड मार्निग बोलते थे। भले उनको जवाब सुनाई दे या ना दे, भले कोई उनकी बात का जवाब दे या ना दे पर ये उनका हास्बे मामूल था।

सामने से जो भी आता था, गुड मार्निग लेकर जाता था।

“गुड मार्निग जी, क्या हाल चाल..” अपने पूरे 28 पूरी तरह से डिसप्ले पर लगाते हुए।

“गुड मार्निग जी, क्या हाल चाल..” एक भारी और ठहरी आवाज जो उनके लंबे चौड़े शरीर से मेल खाती थी। अब सामने से आके बोले तो ठीक पर मिस्टर चड्डा की, जाने अंजाने में, ये आदत बन गई थी की वो अक्सर दौड़ते हुए पीछे से लोगों के काफी करीब जाते थे, भले कोई भी हो, एक औरत, लड़की, कोई बुड्ढा आदमी, अलग। अलग तरह के बुड्ढे, 50 साल वाले, 60 साल वाले, 70 साल वाले, कम्यूनिटी वाले, या कभी कभी कोई जवान लड़का जो या तो अपनी जवानी के दिन में इनस्पायर होकर बाडी वगैरह बनाने की कोशिश कर रहा था, या फिर करना चाहता था या यहाँ पार्क में भी किसी लड़की के चक्कर में आया था। इन सबके पीछे से अक्सर चड्डा जी कानों में एअर फोन लगाए पीछे से दौड़ते आते थे और एक ऊँची भारी आवाज में गुड मार्निग जो शायद इसलिए ऊँची होती थी की वो गाने सुन रहे थे थे और उनको अपनी आवाज नहीं आती थी जिसकी वजह से तकरीबन चिल्लाकर ही बोल पड़ते थे।

“गुड मार्निग जी, चंगा सब..” और एक झटके से अकेले वाक कर रहे मिस्टर मल्होत्रा अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आए।

“गुड मार्निग जी, की हाल चाल..” इस आवाज के साथ ही सुनयना जो अपने बायफ्रेंड से धीमी आवाज में बात कर रही थी चौंक पड़ी। और मिसेज ठाकुर जो अपनी बढ़ती उमर के साथ अपने पति की बढ़ती हुई माँगो को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

उनका शरीर अब मोटा हो चला था, उमर ढालने लगी थी और सेक्स में उनकी रूचि कम होने लगी थी पर उनके पति को अब भी हर रात सेक्स चाहिए था जिस बात से उनको काफी परेशानी होने लगी थी। कभी कभी तो वो रात में उनको जगाकर सेक्स की माँग करता था और फिर अक्सर, जैसा की कल रात भी हुआ, उन दोनों में झगड़ा हो जाता था।

एक तरफ उनको ये परेशानी की अपने पति की माँगो को कैसा पूरा करें और दूसरी तरफ ये डर की ना पूरा किया तो वो कहीं किसी और औरत के पास ना चला जाए।

गुड मार्निग जी, क्या हाल हैं?”

कहाँ तो एक तरफ उनके अपने ख्याल जिनमें डूबी वो पार्क के चक्कर काट रही थी। एक ऐसा रास्ता निकालने का सोच रही थी जिससे की उनको भी तकलीफ ना हो और पति देव भी मान जाएं की तभी सामने से भाग कर आते हुए उस लंबे चौड़े हाथी जैसे इंसान ने उनका ध्यान भंग किया।

गुड मार्निग के जवाब में वो मुश्कुरा कर थोड़ा सा बगल हो गई जिससे की वो भागते हुए उनकी बगल से निकल जाए लेकिन उसके गुड मार्निग ने उन्हें सोच में डाल दिया था और वो दिल ही दिल में कहीं ये उम्मीद कर रही थी की ये कोई ऐसा ना हो जिसे वो जानती थी या कोई उन्हें जानता हो क्योंकी वो इस वक्त बात करने के मूड में बिल्कुल भी नहीं थी।

और ऐसा नहीं था की चड्डा जी को किसी ने नोटिस नहीं किया था। सुबह-सुबह पार्क में एक ऐसी भी आती थी जो ज्यादातर वक़्त सिर्फ बैठी रहती थी और जब चड्डा साहब दौड़ते हुए आते थे तो उठकर चलने लगती थी। ये थी मिसेज गुलाम।

गुड मार्निग जी, क्या हाल चाल?” कहते हुए जब मिस्टर चड्डा उनके बगल से गुजरते तो मिसेज गुलाम मुश्कुरा कर जवाब देती पर नजर चड़ा साहब की टाँगों के बीच की तरफ ही होती और दिल में सिर्फ एक ही ख्याल होता- “ये खुद इतना लंबा तगड़ा है तो इसका वो कितना लंबा होगा?”

 
वो पार्क में आती ही सिर्फ मिस्टर चड्डा के कारण थी। जब वो दौड़ते हुए उनके बगल से गुजरते तो वो उनके जिश्म का एहसास करती। हवा के हल्के से झोके को अपनी छाती पर महसूस करती। मर्दाना पसीने की स्मेल को अपने जेहन में भरती और यही सोचती- “ये खुद इतना लंबा तगड़ा है तो इसका वो कितना लंबा होगा..." और जब भी वो “गुड मार्निग आती तो मिसेज गुलाम हमेशा मुश्कुरा कर जवाब देती की वो ठीक हैं जैसे की उस । पूछने वाले को सच में उनकी फिकर है और वो सच में उनका हाल जानना चाहता था। पर वो जवाब देती थी इस उमीद के साथ की शायद बात का सिलसिला आगे चल निकले।

कैसी बेवकूफ हूँ मैं.." और फिर परेशान होकर वो खुद से ही सोचती।

वो सुबह भी हर सुबह जैसी ही थी। पार्क में कोई टहल रहा था, कोई दौड़ रहा था, तो कोई बैठा बातें कर रहा था। पार्क के बीच बने एक छोटे से पार्क में कुछ इक्स शोर कर रही थी, पंख हिलाकर पानी के छींटे उड़ा रही थी पर शायद उनका शोर किसी को बुरा नहीं लगता था और काई तो ऐसे भी थे शायद जो सुबह-सुबह इस तरह के शोर को सुनने ही पार्क में आते थे जो उन्हें अपनी शहरी जिंदगी के बाकी के दिन में सुनने को नहीं मिलता था। और इन सबके बीच वो 6 फूट एक इंचा का लंबा चौड़ा इंसान दौड़ता चला आ रहा है। कानों में एअर फोन्स और जेब में एक सोनी एमपी-3 प्लेयर, पर किसी तरह का कोई आईडी कार्ड या मोबाइल नहीं जैसा की इनिशियल पोलीस रिपोर्ट में लिखा जाएगा। उसने सफेद रंग की एक प्लेन टी-शर्ट पहन रखी है जो एक अजीब बात है। सुबह-सुबह पार्क में दौड़ रहा है जहाँ काफी धूल होती है, मिट्टी होती है, दौड़ते हुए पसीना आता है जिससे सफेद रंग जल्दी मैला पड़ता है तो शायद उसे कोई और रंग पहनना चाहिए। पर नहीं, उसने एक प्लैइन सफेद टी-शर्ट डाली हुई है और नीचे नीले रंग के ट्रैक। पैरों में महंगे आदीदास के जूते।।

मिस्टर चड्डा दौड़ते हुए मिस्टर भैरव के नजदीन पहुँचे। मिस्टर भैरव जो यूनिवर्सिटी के जियोलोजी डिपार्टमेंट में काम करते थे, एक काफी बुड्ढ़े आदमी जिनको इस उमर में भी फिट रहने का काफी ख्याल था। सुबह की धूप इतनी तेज नहीं थी फिर भी उनकी आँखों पर महंगे एवियेटर ग्लासेस। भागते हुए मिस्टर भैरव हाँफ रहे थे और चाह कर भी उतना तेज नहीं भाग पा रहे थे जितना की वो चाहते थे। और पार्क में मौजूद हर इंसान की तरह वो

भी अपनी सोच के एक सिलसिले में खोए हुए थे। बेटी का तलाक, बीवी का दिल का आपरेशान, डिपार्टमेंट के बजेट कट्स, अगले हफ्ते की मीटिंग जिसके लिए उन्हें तैय्यरी करनी है।

गुड मार्निग जी, की हाल चाल?”

और एक झटके से मिस्टर भैरव अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आए। उस अचानक किए गये सवाल ने, उस अचानक आई आवाज ने उन्हें इस कदर बौखला दिया की वो बेचारे एक पल के लिए लड़खड़ा गये, इस तरह जैसे की उस लंबे चौड़े इंसान ने उनके रास्ते में अपनी टाँग अदा दी हो। बेचारे... वो भी कभी जवान थे। हमेशा 65 के नहीं थे हमेशा इतने पतले नहीं थे, हमेशा छाती इस तरह दबी हुई नहीं थी पर ये सब अब है। अपनी साँस संभालते हुए उन्होंने नजर उठाकर सवाल करने वाले की तरफ देखा।

क्या वो इस इंसान को जानते हैं? क्या वो उन्हें जानता था? कोई यूनिवर्सिटी से है क्या? पर इससे पहले की वो देख पाते, गुड मार्निग के साथ किए गये सवाल का जवाब दे पाते, वो लंबा चौड़ा भागता हुआ इंसान उनके साइड से गुजर गया। उनके जवाब का इंतेजार किए बिना। एक नजर उनको देखे बिना।

और हमेशा की तरह उस वक़्त भी मिस्टर चड्डा गाने सुनते हुए अपनी धुन में दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे। पार्क में बने उस छोटे से पक्के रास्ते पर उन्हें अपने सामने हल्की चाल से चलता हुआ वो एक अकेला ही आदमी नजर आ रहा था। आज वो थोड़ा जल्दी आ गये थे और पार्क में अभी लोग आने शुरू ही नहीं हुए थे। बस इक्का दुक्का कोई आदमा अभी नजर आ रहा था पर वो जानते थे की अगले 15-20 मिनट में लोग आने शुरू हो

जाएंगे और पार्क भर जाएगा।

अपने सामने चल रहे उस आदमी को ओवरटेक करने के लिए चड्डा जी ने अपनी स्पीड थोड़ी बढ़ाई। वो कोई 25 के आस पास रहा होगा। कद में काफी छोटा था, मुश्किल से 5 फूट और 3 या 4 इंच। एक काले रंग की टाइट। जीन्स और नीले रंग की बाडी फिट टी-शर्ट में उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था की वो पार्क में जागिंग करने आया है।

ऐसे टाइट कपड़ों में भी कोई जागिंग करने आता है भला...”

वो अपनी ही धुन में धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहा था। उसको देखकर यही लगता था की वो जागिंग करने या सेहत बनाए या वजन घटाने के इरादे से नहीं बल्कि सुबह-सुबह ठंडी हवा खाने के इरादे से ही पार्क में आया है। खामोशी से भागते हुए मिस्टर चड्डा उसके पीछे पहुँचे।

उसके बाल धीरे-धीरे उड़ने शुरू हो गये थे। हैरत की बात है की आजकल इतनी कम उमर में ही हम लोग उन चीजों का शिकार हो जाते हैं जो कभी बुढ़ापे की निशानी होती थी जैसे बाल सफेद होना, बाल गिरना, दाँत गिरने लग जाना, पेट निकल आना।

पर मिस्टर चड्डा के साथ ऐसा नहीं था। वो फिट थे। ना बाल सफेद हुए थे, ना झड़ने शुरू हुए थे और ना ही उनको दाँत में कोई तकलीफ थे। और जैसे ही थोड़ी चब शरीर पर चढ़ती, वो कम करने की कोशिश में जुट जाते।

“गुड मार्निग जी, क्या हाल चाल?”

वो अपनी ही सोच में कहीं गुम था के पीछे से आई आवाज ना उसको एकदम बौखला दिया। एक पल के लिए उसे ऐसा लगा जैसे उसके दिल की धड़कन रुक गई हो। वो अपने ख्यालों की दुनिया में खोया हुआ था, आज क्या करना था उस बारे में सोच रहा था की पीछे से आई उस भारी और ठहरी हुई आवाज ने उसे अंदर तक हिलाकर रख दिया।

बौखलाकर उसने चिढ़ते हुए सवाल करने वाले की तरफ देखा पर वो लंबा चौड़ा आदमी उसके जवाब का इंतेजार किए बिना उसकी बगल से होता आगे निकल गया।

मिस्टर चडा को आजकल के पंजाबी गाने बिल्कुल पसंद नहीं आते थे। उनका कहना था की इन गानों में। पंजाबी तो है पर पंजाब की खुश्बू नहीं है। वो तो आज भी पुराने पंजाबी गाने या रफी और किशोर दा को ही सुनते थे।

रफी साहब जैसा कोई हुआ ही नहीं आज तक और किशोर दा का तो क्या कहना...” वो अक्सर कहा करते थे।

तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं माँगी थी, इयरफोन्स में रफी साहब की मधुर आवाज गूंज रही थी की अचानक चड्डा साहब को ऐसा लगा जैसे उनकी कमर पर किसी ने जलता हुआ तेजाब डाल दिया हो। एक तेज जलन पीठ में उठी जो जल्दी ही कमर से होती उनकी छाती तक जा पहुँची। किसी ने जैसे सीधा उनके दिल में एक जलता हुआ सरिया डालकर घुसा दिया हो। 5 सेकेंड के अंदर अंदर उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे किसी ने उनके शरीर के

अंदर आग लगा दी हो और वो अंदर से जल रहे हों।

इससे पहले की वो कुछ समझ पाते, कुछ सोच पाते, कुछ कर पाते, उनके घुटने जवाब दे गये और वो लड़खड़ा कर गिर पड़े। अपने दिल की धड़कन जैसे अचानक उन्हें खुद ही सुनाई देने लग गई थी जो धीरे-धीरे धीमी पड़ रही थी। उन्हें नीचे गिरे हुए ऊपर पेड़ नजर आ रहे थे जो धीरे-धीरे गायब से हो रहे थे। नजर के आगे काले धब्बे से बन रहे थे। उन्हें अब तक समझ नहीं आया था की क्या हुआ। आग जैसे अब पूरे शरीर में फैल रही थी और पलकें भारी हो चली थी। हाथ में पिस्टल उठाए वो लड़का उस जमीन पर गिरे लंबे चौड़े इंसान के करीब पहुँचा।

बहनचोद..." वो जोर से चिल्लाया- “गाण्ड फाड़ दी साले। मुझे अभी हार्ट अटक आ जाता तो... साला यहाँ गाण्ड का गाजियाबाद बना हुआ है टेन्शन और तू हाल पूछने निकला है... ऐसे हैं मेरे हाल और ऐसी है मेरी चाल। अब तू बता साले, तेरे कैसे हाल हैं...”

मिस्टर चड़ा के लिए अब आँखें खुली रखना असंभव हो चला था। धीरे से उनकी पलकें बंद हो गई। दिल में उठ रही जलन अब धीरे-धीरे कम हो रही थी।

****** समाप्त *****

*****
 
29 हाफिज खुदा

और फिर एक दिन जैसे किसी ने कह दिया “लाइट्स आउट..”

और हर तरफ एक अंधेरा सा छा गया। एक ऐसा अंधेरा जिसका कोई आखिर ना था। सारी कायनात रोशनी से निकलकर एक काले बादल में सिमट गई, एक अंधा कुआँ बन गई। एक ऐसी गहरी सुरंग जिसके छोर पर कोई रोशनी नहीं थी।

रात और दिन का फरक सिमट कर सिर्फ शोर में सीमित हो गया था। जब शोर था तो दिन था, जब सन्नाटा था तो रात थी। जब आवाज थी तो महफिल थी, जब खामोशी थी तो तन्हाई थी।

जिंदगी भी एक अजीब से है, अपने आप में एक अजूबा और उससे भी बड़ी अजीब चीज है इस जिंदगी के पहलू जो हर जगह अलग होते हैं, हर पल अलग होते हैं। कभी कभी कोशिश के बाद भी नहीं बदलते और कभी इस कदर बदलते हैं की कदम मिला पाना मुश्किल हो जाता है। कभी जिंदगी हर पहलू को अपने साथ रखती है और कभी कभी जिंदगी को पहलू के साथ होना पड़ता है।

एक जानवर की जिंदगी के शायद दो ही पहलू होते हैं। पेट भरकर खाना और मौसम आने पर प्रजनन करना, अपने किश्म को आगे बढ़ाना। तो सवाल ये है की इंसान को जानवर क्यों कहा जाता है... इंसान की जिंदगी में सिर्फ ये दो पहलू कहाँ होते हैं...

पैदा होते हैं तो पता ही नहीं होता की क्या हो रहा है.. जब होश आता है तो जिंदगी की भाग दौड़ शुरू हो जाती है। एक ऐसी दौड़ जो हर पल, हर दिन एक नया पहलू दिखाती है और फिर आखिरी पहलू मौत का होता है। वो

भी इसी दौड़ का एक हिस्सा था और मकसद भी उसका भी वही था जो हर भागने वाले का होता है, दौड़ जीतना। सबसे आगे निकल जाना। पहला नंबर लेकर सबको पीछे छोड़ देना। वहाँ जाकर खड़े होना जहाँ सब उसे इज्ज़त भरी नजर से देखें, जहाँ वो अपनी हर जरूरत को चुटकी में पूरा कर सके। जहाँ उसे जेब में हाथ डालते हुए ये ना सोचना पड़े की कितने पैसे बचे हैं, जहाँ उसे मेनू काई देखकर सबसे सस्ती डिश ना ढूँढ़नी पड़े, जहाँ उसे चीज खरीदने से पहले प्राइस टैग ना देखना पड़े। कुछ लेने के लिए पसंद ही एक शर्त हो और कीमत अपना वजूद खो दे।

और कुछ वक्त पहले तक वो इस दौड़ में आगे ही तो चल रहा था। स्कूल में टापर, हर सब्जेक्ट में सबसे बेहतर, स्पोर्ट्स में अव्वल। ज़िंदगी का सिर्फ एक ही मकसद था। अपने आपको गरीबी की गलियों से निकालकर अमीरी के मोहल्ले तक पहुँचाना। और इस मकसद को हासिल करने के लिए वो सब कुछ कुरबान करने को तैयार था, और किया भी था।

जब बचपन में बच्चे खेलने के लिए बहाना ढूँढ़ते हैं, किताबों से बचकर निकलते हैं, उस उमर में उसकी दुनिया स्कूल बैग के अंदर थी। हर टीचर का वो पसंदीदा स्टूडेंट था क्योंकी वो कभी स्कूल से छुट्टी नहीं लेता था, कोई पीरियड बंक नहीं करता था। कालेज में वो हर लड़के लड़की का आइडल था। हर कोई यही समझता था की सबसे ब्राइट फ्यूचर उसी का होने वाला था।

किसी को क्या खबर थी की उसके फ्यूचर की ब्राइटनेस सिर्फ कालेज की दीवारों तक ही सीमित हो गई थी।

फाइनल एअर पास आउट करने के कुछ दिन बाद ही एक दिन जब वो अपनी बाइक पर घर से निकला तो सीधा हास्पिटल के बिस्तर पर आकर गिरा। उसके बड़े भाई ने बताया की वो दो हफ्ते से कोमा में रहा था। सर पर बहुत गहरी चोट थी जिसकी वजह से वो बेहोशी से बाहर नहीं आ पा रहा था और जब आया तो दुनिया अंधेरी हो चुकी थी। आँख खुली तो सही पर कुछ दिखाई नहीं दिया। और जिंदगी के ड्रामा डाइरेक्टर ने कह दिया

लाइट्स आउट...”
 
भगवान में उसका बहुत गहरा विश्वास था। मंदिर से मस्जिद तक, चर्च से गुरुद्वारे तक, हर जगह वो माथा टिकाकर आया था। लंगर में सेवा में हमेशा हाथ बथाता, मंदिर में एक दिन सफाई का जिम्मा उसके सर था, मस्जिद में हर फ्राइडे नमाज की लाइन में खड़ा हो जाता और सनडे को चर्च। ये उसका शेड्यूल था जो कभी मिस नहीं होता था।

और उसे यकीन भी था की भगवान उसकी मेहनत का सिला उसे दे रहा था। मौका भगवान उसे देता था और अपनी मेहनत से उस मौके को नतीजे में वो बदल लेता था। पर अब सब बदल गया था। भगवान में जो कभी विश्वास था वो अब सिर्फ शिकायत में बदल कर रह गया था।

जब कभी तन्हा होता तो यही सोचता की आखिर उसने किसी का क्या बिगाड़ा था जो उसे ये सजा मिली। कहाँ गलती हुई जिसका जुर्माना उसे अपनी आँखों की रोशनी से भरना पड़ा। कल तक जो कभी दूसरों का सहारा बनता था, आज क्यों उसे बाथरूम तक जाने के लिए भी किसी का हाथ पकड़ना पड़ता था। और अकेले में वो रोया भी बहुत। कभी अपनी किश्मत पर तो कभी भगवान की ना-इंसाफी पर। शिकायत भी बहुत थी। कभी खुद से, कभी जिंदगी से और कभी ऊपरवाले से पर बदला कुछ भी नहीं थक हार कर एक बार उसे फिर जिंदगी से समझौता करना पड़ा पर इस बार उस समझौते में भगवान जैसे शब्द को उसने हटा दिया था।

अगर अब जिंदगी भर बिना कुछ देखे उसे खुद ही लड़ना था तो काहे का भगवान। उसके खुदा को ही खुदा हाफिज कह दिया था।

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अरे यू रेडी...” बड़े भाई की आवाज से उसका ध्यान टूटा।

इज इट मटर ओर दो आई हव आन आप्शन...” उसने सवाल का जवाब सवाल से ही दिया।

कम, लेट्स गो..." बड़े भाई ने उसकी बात का जवाब दिए बिना उसका हाथ थामकर उसे खड़ा किया और हाथ में एक छड़ी थमा दी।

न्यू वन...” उसने छड़ी के हैंडल से अंदाजा लगता हुआ कहा।

य, इट्स आ बिट लांगर दैन द ओल्डर वन। शुड बी एबल टु गेट यू आ लिट्ल मोरे क्लियरेन्स ओन युवर पार्ट..”

इट्स फन्नी...” उसने हँसते हुए कहा।

वाट इस...”

“नथिंग, नेवर माइंड। चलिए..”

भाई के हाथ का सहारा लेकर वो आगे बढ़ा और अपने फ्लैट से बाहर निकला। पिछले दो महीनों से उसका ज्यादातर वक़्त यही अंदाजा लगाते हुए निकला था की घर की कौन सी चीज कहाँ थी। पहले जो वो हर चीज यूँ ही बेध्यानी से फेंक दिया करता था, अब ध्यान से अंदाजे के साथ रखनी पड़ती थी और उस जगह को याद रखना पड़ता था ताकि अगली बार आसानी से मिल जाए।
 
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