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वो यूँ ही मेरे ऊपर बैठी हिल रही थी। मेरी आँखें भारी हो चली थी। मैं सोना नहीं चाहता था। मैं तो उसके साथ पूरी रात प्यार करना चाहता था पर अपने आप पर जैसे मेरा काबू नहीं रहा। पलकें ऐसे भारी हो गई थी जैसे मैं कब से सोया नहीं था और आज की रात मुझे अपनी जिंदगी में पहली बार सुकून हासिल हुआ था।
अपनी गाण्ड ऊपर नीचे हिलती वो झुक कर मेरे ऊपर लेट गई। उसकी छातियां मेरे सीने से आकर दब गई। उसके होंठ मेरे कान के पास आए और वो बहुत धीरे से बोली।
फकत एक तेरी याद में सनम, । ना सफर के रहे, ना वतन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।
और उसकी आवाज सुनते ही एक अजीब सी ठंडक और बेचैनी जैसे एक साथ मेरे दिल में उतर गई। पता नहीं मैं बेहोश हो गया या नींद के आगोश में चला गया पर उसके बाद कुछ याद नहीं रहा। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो वो जा चुकी थी। मैं खामोशी से उठा तो मन अजीब तरह से भारी था।
समझ में नहीं आ रहा था की ये इसलिए था की मैं अपनी बीवी को धोखा देते हुए एक अजनबी लड़की के साथ सोया था जो एक पाप था या इसलिए की वो लड़की अब मेरे साथ नहीं थी और मैं उसको फिर से देखना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।
सिर्फ ये एहसास के वो अब मेरे पास नहीं है जैसे मेरी जान निकल रही थी। पहाड़ों में अब भी अजीब सा
सन्नाटा था।
बाहर सूरज अब भी नहीं निकला था। चारों तरफ बदल फैले हुए थे। मैंने उठकर अपने कपड़े पहने और बाहर आकर फिर अंदाजे से उस जगह की तरफ चल दिया जहाँ मैंने उसको पहली बार देखा था। ना कुछ खाया, ना मुँह धोया, बस दीवानों की तरह उठा और उसकी तलाश में चल पड़ा।
वो घर जहाँ की उसने बताया था की वो रहती थी अब भी वहीं था। मेरी जान में जान आई। घर के बाहर पहुँच कर मैंने कुण्डा खटखटाया। एक बुड्ढी औरत ने दरवाजा खोला। हाथ में एक इंडा जिसके सहारे वो झुक कर चल रही थी। दूसरे हाथ में एक माला जिसका वो जाप कर रही थी।
“कहिए?” उसने मुझसे पूछा
मैंने उसको बताया के मैं एक लड़की को ढूँढ़ रहा था। हुलिया बताया और तब मुझे एहसास हुआ की मैंने कल रात उसका नाम तक नहीं पूछा था।
मेरी बेटी आशिया?” बुड्ढी औरत बोली।
मैंने बताया की मैं नाम नहीं जानता पर फिर से लड़की का हुलिया बताया।
हाँ.. मेरी बेटी आशिया। एक साल पहले आते तो शायद मिल लेते...”
-
मैं मतलब नहीं समझा।
उसको मरे तो एक साल हो गया...”
मैं फिर भी मतलब नहीं समझा और हैरानी से उस औरत को देखने लगा। उसने मुझे वहीं एक पेड़ की तरफ इशारा किया और दरवाजा मेरे मुँह पर बंद कर दिया। मैं किसी बेवकूफ की तरफ चलता उस पेड़ तक पहुँचा। पेड़ के नीचे एक कबर बनी हुई थी। एक पत्थर पर हिन्दी और उर्दू में लिखा था- “आशिया...”
और नाम के नीचे लिखी थी वो शायरी जो उसने कल
फकत एक तेरी याद में सनम, ना सफर के रहे, ना वतटन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।
मौत की तारीख आज से ठीक एक साल पहले की लिखी हुई थी।
जब मैं वापिस गेस्ट हाउस पहुँचा तो बाहर मुझे केयरटेकर मिला। मैंने उसको उस लड़की के बारे में बताया जो कल मेरे साथ आई थी।
कौन सी लड़की साहब?” वो हैरत से मेरी तरफ देखता बोला- “आप तो अकेले आए थे...”
मैंने उसको बताया की वो लड़की जिससे मैं बात कर रहा था।
मैं तो समझा था की आप वो हनुमान जी से बात कर रहे हैं..." उसने मेरे काटेज के थोड़ा आगे बनी एक हनुमान जी की मूर्ति की तरफ इशारा किया। वो फिर बोला- “आप कल अकेले आए थे साहब...”
हवा में एक अजीब सी खामोशी थी जैसे कहीं कोई मर गया हो और सारे पेड़, सारी वादियां, सारे पहाड़ उसका मातम कर रहे हों। मेरी आँखें भर गई और कलेजा मुँह को आ गया। मैं रोना चाहता था। दहाड़े मार मार कर रोना चाहता था।
मैं उसको हासिल करना चाहता था। फिर उसको प्यार करना चाहता था। मैं उसके साथ होना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।
उसको तो मरे एक साल हो गया...” बुढिया की आवाज़ मेरे कानों में गूंज रही थी।
आप कल अकेले आए थे साहब..” केयरटेकर की आवाज दिमाग में घंटियां बजा रही थी।
मेरा दिल ऐसे उदास था जैसे मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल किया की छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पड़े, अपने कपड़े फाड़ दें, इस पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दूं।अपनी जान दे दूं
और मदहोशी के से आलम में मेरे कदम पहाड़ के कोने की तरफ चल पड़े, खाई की तरफ।
***** समाप्त *****
***** *****
अपनी गाण्ड ऊपर नीचे हिलती वो झुक कर मेरे ऊपर लेट गई। उसकी छातियां मेरे सीने से आकर दब गई। उसके होंठ मेरे कान के पास आए और वो बहुत धीरे से बोली।
फकत एक तेरी याद में सनम, । ना सफर के रहे, ना वतन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।
और उसकी आवाज सुनते ही एक अजीब सी ठंडक और बेचैनी जैसे एक साथ मेरे दिल में उतर गई। पता नहीं मैं बेहोश हो गया या नींद के आगोश में चला गया पर उसके बाद कुछ याद नहीं रहा। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो वो जा चुकी थी। मैं खामोशी से उठा तो मन अजीब तरह से भारी था।
समझ में नहीं आ रहा था की ये इसलिए था की मैं अपनी बीवी को धोखा देते हुए एक अजनबी लड़की के साथ सोया था जो एक पाप था या इसलिए की वो लड़की अब मेरे साथ नहीं थी और मैं उसको फिर से देखना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।
सिर्फ ये एहसास के वो अब मेरे पास नहीं है जैसे मेरी जान निकल रही थी। पहाड़ों में अब भी अजीब सा
सन्नाटा था।
बाहर सूरज अब भी नहीं निकला था। चारों तरफ बदल फैले हुए थे। मैंने उठकर अपने कपड़े पहने और बाहर आकर फिर अंदाजे से उस जगह की तरफ चल दिया जहाँ मैंने उसको पहली बार देखा था। ना कुछ खाया, ना मुँह धोया, बस दीवानों की तरह उठा और उसकी तलाश में चल पड़ा।
वो घर जहाँ की उसने बताया था की वो रहती थी अब भी वहीं था। मेरी जान में जान आई। घर के बाहर पहुँच कर मैंने कुण्डा खटखटाया। एक बुड्ढी औरत ने दरवाजा खोला। हाथ में एक इंडा जिसके सहारे वो झुक कर चल रही थी। दूसरे हाथ में एक माला जिसका वो जाप कर रही थी।
“कहिए?” उसने मुझसे पूछा
मैंने उसको बताया के मैं एक लड़की को ढूँढ़ रहा था। हुलिया बताया और तब मुझे एहसास हुआ की मैंने कल रात उसका नाम तक नहीं पूछा था।
मेरी बेटी आशिया?” बुड्ढी औरत बोली।
मैंने बताया की मैं नाम नहीं जानता पर फिर से लड़की का हुलिया बताया।
हाँ.. मेरी बेटी आशिया। एक साल पहले आते तो शायद मिल लेते...”
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मैं मतलब नहीं समझा।
उसको मरे तो एक साल हो गया...”
मैं फिर भी मतलब नहीं समझा और हैरानी से उस औरत को देखने लगा। उसने मुझे वहीं एक पेड़ की तरफ इशारा किया और दरवाजा मेरे मुँह पर बंद कर दिया। मैं किसी बेवकूफ की तरफ चलता उस पेड़ तक पहुँचा। पेड़ के नीचे एक कबर बनी हुई थी। एक पत्थर पर हिन्दी और उर्दू में लिखा था- “आशिया...”
और नाम के नीचे लिखी थी वो शायरी जो उसने कल
फकत एक तेरी याद में सनम, ना सफर के रहे, ना वतटन के रहे, बिखरी लाश के इस कदर टुकड़े हैं, ना कफन के रहे, ना दफन के रहे।
मौत की तारीख आज से ठीक एक साल पहले की लिखी हुई थी।
जब मैं वापिस गेस्ट हाउस पहुँचा तो बाहर मुझे केयरटेकर मिला। मैंने उसको उस लड़की के बारे में बताया जो कल मेरे साथ आई थी।
कौन सी लड़की साहब?” वो हैरत से मेरी तरफ देखता बोला- “आप तो अकेले आए थे...”
मैंने उसको बताया की वो लड़की जिससे मैं बात कर रहा था।
मैं तो समझा था की आप वो हनुमान जी से बात कर रहे हैं..." उसने मेरे काटेज के थोड़ा आगे बनी एक हनुमान जी की मूर्ति की तरफ इशारा किया। वो फिर बोला- “आप कल अकेले आए थे साहब...”
हवा में एक अजीब सी खामोशी थी जैसे कहीं कोई मर गया हो और सारे पेड़, सारी वादियां, सारे पहाड़ उसका मातम कर रहे हों। मेरी आँखें भर गई और कलेजा मुँह को आ गया। मैं रोना चाहता था। दहाड़े मार मार कर रोना चाहता था।
मैं उसको हासिल करना चाहता था। फिर उसको प्यार करना चाहता था। मैं उसके साथ होना चाहता था। फिर वही पाप करना चाहता था।
उसको तो मरे एक साल हो गया...” बुढिया की आवाज़ मेरे कानों में गूंज रही थी।
आप कल अकेले आए थे साहब..” केयरटेकर की आवाज दिमाग में घंटियां बजा रही थी।
मेरा दिल ऐसे उदास था जैसे मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल किया की छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पड़े, अपने कपड़े फाड़ दें, इस पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दूं।अपनी जान दे दूं
और मदहोशी के से आलम में मेरे कदम पहाड़ के कोने की तरफ चल पड़े, खाई की तरफ।
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