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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

उसकी बात सुनकर मिसेज भट्टी थोड़ा नजदीक होकर बैठ गई।

हाउ ओल्ड इस योर सोन... 20 साल?”

*22 साल आक्च्युयली...” आशा ने मुश्कुराते हुए कहा।

कुछ सिखाया की नहीं उसको अब तक?”

आशा चौंक पड़ी।

ओह कम ओन...” उसके चेहरे को देख मिसेज भट्टी ने कहा- “सारी जिंदगी एक ही लण्ड लेकर गुजारेगी क्या? अगर बाहर का नहीं मंजूर तो अपने बेटे का ट्राई कर ले...”

“यू आर जोकिंग, राइट...” नशे में होने के बाद भी आशा का दिमाग ये बात सुनकर घूमने लगा था।

वाइ... इट्स नाट लाइक ही इज एनी डिफरेंट। दे आर आल गाइस। थोड़ी देर के लिए बिस्तर पर एक मर्द समझ ले और फिर बिस्तर से उठके माँ बन जा। हाउ टफ इस तट... टेल मी, हव यू नेवर काट योर सोन टेकिंग आ पीक अट युवर ब्रेस्ट्स आर अट युवर आस.."

मिसेज भट्टी ने पूछा तो आशा का दिमाग सोच में पड़ गया। उसको कई बार ये महसूस हुआ था की सिद्धार्थ उसके जिश्म को घूरता है पर फिर अपना वहम समझ कर उसने बात भुला दी।

लेट मी टेल यू समथिंग...” कहते हुए मिसेज भट्टी ने बोलना शुरू किया और फिर अगले आधे घंटे तक, जब तक की सिद्धार्थ आ नहीं गया, वो आशा के दिमाग में यही गोबर भरती रही की उसका अपने बेटे से जिस्मानी रिश्ता बनाना कोई गलत बात नहीं थी, की अगर आशा को घर के बाहर किसी से अफेयर में बदनामी का डर है। तो घर में मौजूद अपने बेटे से बना ले। घर की बात घर में ही रहेगी।

शराब और ड्रग्स दोनों का नशा आशा के दिमाग पर सावर था। जिस बात पर वो शायद और किसी दिन मिसेज भट्टी को थप्पड़ मार देती, उस बात पर वो उस रात सीरियस्ली सोच रही थी।

एक काम कर..." मिसेज भट्टी ने आगे बढ़कर आशा के ब्लाउज के बटन खोलते हुए कहा था- “इनको थोड़ा दिखा... अगर तेरा बेटा बार बार यहीं देख रहा है, तो समझ जा की वो भी यही चाहता है...”

जब वो रात के दो बजे पार्टी से कार में सिद्धार्थ के साथ निकली तो उसके दिमाग में तब भी मिसेज भट्टी की बातें चल रही थी। उसने एक नजर अपने गिरेबान की तरफ डाली तो मुश्कुरा उठी। ब्लाउज के सारे बटन्स खुले हुए थे, सिर्फ एक नीचे का बटन बंद था। उसकी छोटी छोटी छातियां 70% दिखाई दे रही थी। साइज छोटा होने की वजह से वो अक्सर ब्रा नहीं पहनती थी और आज रात भी नहीं पहन रखा था।

“इफ ही इस लुकिंग अट युवर ब्रेस्ट्स स्वीटी, तो समझ जा की तेरा बेटा भी वही चाहता है जो तू चाहती है...” मिसेज भट्टी की आवाज अब भी उसके कानों में गूंज रही थी।

आशा ने मुश्कुराते हुए एक नजर सिद्धार्थ पर डाली जो उसके दिमाग में चल रही बातों से बेखबर कार चला रहा था। उसको देखकर अचानक आशा के दिमाग में एक आइडिया आया। अपने साड़ी के पल्लू के नीचे हाथ डालकर उसने अपने ब्लाउज का आखिरी बटन भी खोल दिया। अब पल्लू के नीचे उसकी छातियां पूरी तरह नंगी थी। उसने ऐसा दिखाया जैसे की वो बहुत नशे में है और बेखबर सो रही है। कार की खिड़की का शीशा नीचे था और बाहर ठंडी हवा चल रही थी।

आशा ने अपने हाथ थोड़े से फैलाकर साइड में गिरा दिए जिससे पल्लू को कोई सहारा ना मिले। जो उसने सोचा था वही हुआ। खिड़की से आती हवा से पल्लू फौरन सरक कर नीचे जा गिरा। “हम्म्म्म..” ठीक उसी वक़्त उसने मुँह से ऐसी आवाज निकली जैसे नींद में बड़बड़ा रही हो।

उसकी आवाज सुनकर सिद्धार्थ ने सड़क से नजर हटाकर अपनी माँ की तरफ देखा और फिर देखता रह गया। आशा पीछे को सर टिकाए सोने का नाटक कर रही थी। पल्लू सरक कर नीचे गिरा पड़ा था और ब्लाउज पूरी तरह खुला हुआ। उसकी दोनों छातियां खुली हुई सिद्धार्थ के सामने थी। उसने फौरन गाड़ी को ब्रेक लगाए और किनारे लेकर रोकी। जिस जगह वो दोनों उस वक़्त थे वो इलाका रात को सुनसान ही रहता था। रात को ट्रक्स के सिवा वहाँ से कोई नहीं गुजरता था।

आँखें बंद किए हुए भी आशा को एहसास हो गया था की गाड़ी रुकी है और सिद्धार्थ सरक कर उसके नजदीक आया है।

मोम..” आवाज आशा के कानों में पड़ी तो उसने जवाब नहीं दिया। अपनी आँखें बंद ही रखी।

सिद्धार्थ ने उसके बाद दो-तीन बार उसको पुकारा पर आशा ने जवाब नहीं दिया। साड़ी का पल्लू अभी भी सरका हुआ था और हिसाब से सिद्धार्थ को सबसे पहले वो उठाकर सही करना था पर ऐसा हुआ नहीं। उसने आशा का

कंधा हिलाकर उसको जगाने की कोशिश की पर जब वो उठी नहीं तो उसने भी अपना हाथ पीछे खींच लिया। आशा के कानों में गाड़ी के शीशे ऊपर होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया। कोई दो-तीन मिनट तक वो यूं ही आँखें बंद किए पड़ी रही पर कुछ भी हुआ नहीं। ना तो गाड़ी आगे बढ़ी, ना सिद्धार्थ ने उसको जगाने की कोशिश की और ना ही उसके कपड़े ठीक किए।

 
आशा ने धीरे से अपनी आँखें हल्की सी खोलकर सिद्धार्थ की तरफ देखा और जो नजर आया, वो देखकर उसका पूरा शरीर काँप उठा।

सिद्धार्थ नजर जमाए अपनी माँ के खुले पड़े जिश्म को घूर रहा था। उसका एक हाथ तेजी के साथ ऊपर नीचे हो रहा था। गाड़ी में अंधेरा होने के कारण आशा को कुछ नजर तो नहीं आया पर वो जानती थी की वो क्या कर रहा है। कार के काले शीशे ऊपर हो चुके थे, पर आशा की तरफ की खिड़की का शीशा हल्का सा नीचा था जिससे आती रोशनी उसके नंगे जिश्म पर पड़ रही थी। वो उसकी छातियां देखते हुए अपना लण्ड हिलाने में इतना मगन था की उसे एहसास तक नहीं हुआ जब आशा ने अपनी पूरी आँखें खोल दी और गर्दन घुमाकर उसकी तरफ देखने लगी।

लाइक वाट यू सी...” वो अचानक बोल पड़ी।

तो सिद्धार्थ इस तरह उछला जैसे हार्ट अटक आ गया हो।

यू नीड आ हैंड विद तट.” आशा ने मुश्कुराते हुए पूछा। कहीं दिमाग के एक कोने में बार बार ये आवाज गूंज रही थी की रुक जा, क्या कर रही है, पर उस वक़्त उस आवाज से कहीं ज्यादा असरदार उसके दिमाग पर सवर नशा था।

सारी मोम..” कहता हुआ सिद्धार्थ अपना लण्ड फिर पैंट के अंदर करने लगा।

वाइ... वाट आर यू सारी फार... इट्स ओके... लेट मोम हेल्प यू...” कहते हुए आशा आगे को सरकी और फौरन सिद्धार्थ का लण्ड पकड़ लिया। रात का वक़्त और कार में काले शीशे होने की वजह से कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था पर वो जानती थी की उसके हाथ में क्या था और उसको क्या करना था।

“पागल हो गई है क्या? रुक जा..” दिमाग में फिर आवाज पूँजी पर नशे में कहीं दब कर रह गई।

मोम...” सिद्धार्थ की फिर आवाज आई

ओहह...” आशा ने इशारा किया और उसके लण्ड को धीरे से सहलाया। 22 साल के उस लड़के पर क्या गुजर रही होगी जो अपनी माँ को देखकर हिलाते हुए पकड़ा गया हो, ये वो अच्छी तरह जानती थी।

रिलैक्स...” आशा ने कहा पर सिद्धार्थ अब भी साफ तौर पर शाक में था। लण्ड को थोड़ा सहलाया तो वो पूरे जोर पर आ गया और आशा के हाथ में फूलने लगा।

कभी पति के सिवा कोई और लण्ड भी चखकर देख..” उसको पार्टी में मौजूद दूसरी औरतों की बातें याद आई। वो अक्सर यही कहकर उसका मजाक उड़ाया करती थी।

तू तो कुछ बोल मत। सारी जिंदगी एक ही बल्ला पकड़ा है और बड़ी खिलाड़ी समझती है अपने आपको..”

एक दूसरी औरत का ताना उसको याद आया। एक पल के लिए वो रुकी और फिर नीचे झुक कर लण्ड अपने मुँह में भर लिया।

माँन्न..” सिद्धार्थ की आवाज आई।

एक तरफ तो आशा के दिल में एक गर्व जैसा एहसास उठा की आज उसने भी एक और लण्ड चख ही लिया पर दूसरी ही तरफ फिर कहीं से आवाज उठी की ये पाप है। एक बार फिर वो आवाज नशे में दब गई।

आशा का एक्सपर्ट मुँह अपने बेटे के लण्ड पर ऊपर नीचे होने लगा। वो दोनों अब भी फ्रंट सीट्स पर बैठे थे। सिद्धार्थ कमर टिकाए बैठा था और दोनों हाथों से अपनी माँ का सर पकड़ रखा था। आशा पेस्सेंगर सीट पर बैठी सरक कर अपने बेटे के नजदीक हो गई थी और आधी उसकी गोद में झुकी हुई थी।

अपनी चूत के साथ तू ऐसा कैसे कर सकती है... सारी जिंदगी सिर्फ एक लण्ड कम ओन... योर कंट डिजर्स बेटर दैन दैट...”

एक एक करके उसको पार्टी की औरतों की बातें याद आ रही थी और उकसा रही थी।

तू तो रहने ही दे। सारी जिंदगी एक लण्ड से चुदी है, तुझे क्या पता की लंबा लण्ड कैसा होता है, मोटा कैसा होता है, छोटा लण्ड किसे कहते हैं। वाट डू यू नो अबौट साइजेस?”

जिस दिन तेरी चूत एक लण्ड भी और नाप ले ना, तब आके बात करियो..."

आशा लण्ड चूस रही थी और दिमाग में सारी बातें एक एक करके आ रही थी। मुँह में लण्ड उसके अपने बेटे का था, ये तो वो कब की भूल चुकी थी। जो एक आवाज दिमाग में उठ रही थी, उसको ऐसा करने से रोक रही थी, वो भी अब बंद हो चुकी थी।

ओह्ह.. मोम...” अचानक सिद्धार्थ ने उसका सर कसके पकड़ लिया और अपनी गाण्ड हिलाने लगा। आशा अनुभवी थी, जानती थी की क्या होने वाला है?

ओहह... रिलैक्स...” उसने लण्ड फौरन अपने मुँह से निकाल दिया और सीधी होकर बैठ गई। अंधेरे में दोनों के चेहरे एक दूसरे को नजर नहीं आ रहे थे इसलिए कह पाना मुश्किल था की सिद्धार्थ के चहेरे पर क्या एक्सप्रेशन्स थे।

और आशा को इस वक़्त एक्सप्रेशन्स से कोई लेना देना था भी नहीं। उसको एक लण्ड और नापना था ताकि पार्टी में औरतों के साथ वो भी बराबर की बहस कर सके। वो अपनी सीट पर एक पल के लिए आराम से बैठी, हाथ नीचे लेजाकर अपनी साड़ी ऊपर उठाई, पैंटी पकड़कर नीचे खींची और उतारकर सामने डैशबोर्ड पर रख दी।

 
अगले ही पल वो फिर सिद्धार्थ की तरफ झुकी और सीट के साइड में लगे लीवर को खींचकर ड्राइवर सीट को । पूरा पीछे तक खींच दिया। अब वो तकरीबन आधा लेटा हुआ था और आशा के लिए काफी जगह बन चुकी थी। उसने अपनी साड़ी फिर ऊपर को उठाई और सरक कर सिद्धार्थ के ऊपर चढ़कर बैठ गई। वो दोनों एक ही सीट पर थे इसलिए जगह कम थी जिसकी वजह से वो तकरीबन उसके ऊपर लेटी ही हुई थी। दोनों टांगे उसने सिद्धार्थ की कमर के दोनों तरफ कर रही थी और एक घुटने में कुछ चुभ रहा था उस चीज की परवाह आशा को उस वक़्त बिल्कुल नहीं थी।

उसने अपनी गाण्ड थोड़ी सी ऊपर उठाई। बीच से एक हाथ में सिद्धार्थ का लण्ड पकड़ा, अपनी चूत पर लगाया और हल्के हल्के नीचे हो गई।

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ओह मोम..” सिद्धार्थ लगभग चिल्ला पड़ा।

आशा के पूरे जिम में जैसे संतुष्टि की लहर सी दौड़ पड़ी। ये लहर इस बात की थी की वो चुद रही थी या इस बात की की उसके पास भी बाकी औरतों के साथ शेयर करने को कुछ था, ये कह पाना खुद उसके लिए भी मुश्किल था। “घोर पाप...” फिर उसके दिमाग में कहीं एक आवाज उठी और एक बार फिर पूँज कर कहीं खो गई। लण्ड जब जड़ तक चूत के अंदर धंस गया तो वो नीचे को झुकी और अपनी एक छाती सिद्धार्थ के मुँह में घुसा दी।

सक इट...” उसने कहा और अपनी गाण्ड ऊपर उठाकर लण्ड को चूत से हल्का सा बाहर निकाला और फिर अंदर ले लिया।

सिद्धार्थ नया लौंडा था, पहली बार किसी औरत के साथ था, इतनी देर से अपने आपको रोक रखा था, पहले खुद लण्ड हिलाया, फिर आशा ने हिलाया, फिर हूसा, ये सब उसके लिए पहली बार में बहुत ज्यादा था। आशा के पहले ही धक्के ने काम कर दिया और उसका वीर्य अपनी आशा की चूत को भरने लगा। वो नीचे लेटा लंबी और गहरी साँस भरने लगा। आशा को एक पल के लिए इतना गुस्सा आया की उसके बाल नोच ले और थप्पड़ मार दे पर फिर उसको याद आया की ये उसका बेटा था, पहली बार था।

कुछ सिखाया की नहीं अपने बेटे को?” मिसेज भट्टी की आवाज उसके दिमाग में गूंजी।

कोई बात नहीं..” वो धीरे से सिद्धार्थ के कान में बोली- “मैं सिखा दूंगी...”

उसके बाद घर पहुँचने तक उन दोनों ने आपस में कोई बात नहीं की। जब घर खोलकर वो अंदर आए और सिद्धार्थ सर झुकाए अपने कमरे में जाने लगा।

आशा ने पीछे से उसे आवाज दी- “यू वान्ट टु डु इट अगेन?”

सिद्धार्थ ने पलट कर उसकी तरफ देखा। मुँह से वो कुछ बोला नहीं पर उसकी आँखों में हाँ आशा को साफ दिखाई दे रही थी। उस रात नशे की हालत में वो अपने ही बेटे के साथ उसी के बिस्तर पर रात भर चुदती रही। कितनी बार, ये उसको याद नहीं था।

सुबह 6:00 बजे जब सिद्धार्थ थक कर सो गया तो वो भी उठकर अपने बेडरूम में पहुँच गई। दिल दो हिस्सो में बटा हुआ था। एक हिस्सा खुश था की उसने भी आज अपनी बाकी सार दोस्तों की तरह एक लण्ड और चख लिया था और दूसरा हिस्सा उसे कोस रहा था की उसने अपने बेटे के साथ ही।

अगले दिन सनई था और वो देर तक पी सोती रही। जब दोपहर को उसकी आँख खुली तो नशा उतार चुका था और जमीर फिर जाग उठा था। एक एक करके याद आ रहा था की पिछली रात क्या हआ था। वो शाम तक अपने कमरे में ही घुसी रही और रोती रही। बाहर किस मुंह से निकले और कैसे अपने बेटे का सामना करे, ये समझ में नहीं आ रहा था।

जब शाम हो गई तो मजबूरन उसे बाहर आना पड़ा। अगले कुछ दिन तक वो और सिद्धार्थ दोनों एक दूसरे से नजर चुराते रहे। उसने कई बार सोचा की अपने बेटे से बात करे पर शरमिंदगी के एहसास ने ऐसा करने नहीं दिया।

बस दिल ही दिल में भगवान से ये दुआ करती रही की कुछ दिन ऐसे ही गुजर जाएं और सिद्धार्थ भी इस बात को भूल जाए। भूल जाए की उस रात उन दोनों ने क्या पाप किया था और फिर एक बार आशा का घर वैसा ही हो जाए जैसा की पहले था।

पर उसकी हर दुआ उस दिन गलत हो गई जब सिद्धार्थ उसको अकेला पाकर उसके कमरे में आया और बोला

मोम, कैन वी डु इट अगेन...”

आशा ने अपनी तरफ से हर कोशिश की सिद्धार्थ को समझने की पर वो अपनी जिद पर अड़ा रहा। बार बार यही कहता रहा की वो आशा से प्यार करता है, और उस एक रात ने उन दोनों के बीच सब बदल दिया था। हफ़्तों तक जब भी वो अकेली होती, सिद्धार्थ आ जाता और उसे कन्विन्स करने की कोशिश करने लगता और

वो पलटकर उसको समझने की कोशिश करने लगती के ये गलत था।

इट वास नाट रांग दैट नाइट। इट वास नाट रांग वेन यू युवरसेल्फ डिड इट दैट नाइट, देन वाइ इस इट सो रांग नाउ... आल आफ आ सडन..."

वो उसे समझाती रही की उस रात वो नशे में थी पर वो माना नहीं। जिंदगी फिर एक बार आगे चलने लगी पर सिद्धार्थ का पागलपन कम होने के बजाय बढ़ता ही रहा।

 
मोंम मैं पागल हो जाऊगा। अजीब अजीब ख्याल आते हैं मुझे। हर वक्त आपके बारे में ही सोचता रहता हूँ... आई कॅट ईवन लुक अट यू नाउ मोम। जब भी आपको देखता हूँ, आपको नंगी ही इमेजिन करता हूँ.. आई कीप । गेटिंग आ हाई ओन जस्ट बाइ थिंकिंग ओन आफ यू... मोम प्लीज...

अच्छा बस एक बार और करने दो... मेरा दिमाग खराब हो रहा है। दिल करता है की मर जाऊं...”

अगर मैं आपको हासिल नहीं कर सका तो जिंदा नहीं रह पाऊँगा। आई कांट लिव विदाउट यू आस माइ लवर नाउ... मैं हमेशा आपके बारे में सोचता था और उस रात आपने भी साबित कर दिया था की यू लोव में मोरे दैन आ सन..."

ऐसी कई बातें उनके बीच अक्सर होती रहती। दोनों जब भी बात करते, सिर्फ इस बारे में ही करते। जब और किसी बात ने काम नहीं किया तो आशा ने एक बार फिर बेशर्म बनकर सिद्धार्थ को यहाँ तक कह दिया था की वो खुद उसके लिए एक लड़की ढूँढ़ देगी या अपनी किसी दोस्त से चक्कर चलवा देगी जो सिर्फ नये नये लड़कों के साथ सोना चाहती हैं। वो उनमें से जिसे भी चाहे, आशा उसकी बात उस औरत से खुद करा देगी।

पर सिद्धार्थ नहीं माना।

इफ इट हैस टू बी समवन, इट हैस तो बे यू मोम। आई लव यू। आई कॅट इमेजिन माइसेल्फ फक्किंग समवन एल्स..”

और एक दिन आशा ने परेशान होकर सिद्धार्थ को थप्पड़ तक मार दिया और घर से निकल गई। वो इन बातों से परेशान आ चुकी थी इसलिए कुछ दिन के लिए इन सबसे दूर होने का सोचकर इस होटल में आ रुकी थी। कहकर आई थी की आफिस के काम से शहर के बाहर जा रही है पर वो उसी शहर में इस होटल में कमरा लेकर कुछ दिन के लिए आ ठहरी थी। और फिर उसने शाम को सिद्धार्थ को फोन किया समझाने के लिए तो उसने फिर वही बात उठा दी। आशा ने सोचा था की कुछ दिन वो दूर रहेगी तो शायद सिद्धार्थ को अकेले सोचने का वक़्त मिले और वो अपना ख्याल बदल दे पर हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। उसका पागलपन और बढ़ गया था, इस हद तक की वो आत्महत्या करने पर उतर आया था।

रात में गाड़ी तेजी से भागती वो अपने घर तक पहुँची। लाइट्स आफ थी और घर अंधेरे में डूबा हुआ था। उसने दिल ही दिल में भगवान का नाम लेते हुए गाड़ी पार्क की, बाहर निकली और लगभग दौड़ती हुई दरवाजा खोलकर घर में दाखिल हुई।

सिद्धार्थ...” उसने आवाज लगाई और उसके कमरे की तरफ बढ़ी।

जवाब में कुछ नहीं हुआ। ना ही सिद्धार्थ आया, ना उसके पति और ना ही कोई आहट हुई। दिल ही दिल में । अपने आपको कोसती के ये उसी की करनी का नतीजा है, वो सिद्धार्थ के कमरे तक पहुँची। तभी उसके पीछे से दरवाजा खुलने की आवाज आई।

आशा ने पलटकर देखा। उसके अपने कमरे का दरवाजा खुला और अंधेरे में कोई बाहर निकला। उसके बेडरूम में भी अंधेरा था इसलिए बाहर आने वाले की शकल दिखाई नहीं दे रही थी।

किशोर, इस दैट यू...” उसने अपने पति का नाम लेकर पुकारा।

पर वो गलत थी। वो साया दो कदम और आगे बढ़ा और उसका चेहरा थोड़ा सा दिखाई दिया। कमरे से बाहर आने वाला खुद सिद्धार्थ था। आशा की जान में जान आई।

ओह बेटा... बैंक गाइ यू आर ओके..” कहती हुई वो उसकी तरफ बढ़ी पर फिर एकदम रुक गई। हु

उसके हाथ में एक बड़ा सा चाकू था और वो पूरा का पूरा खून में सना हुआ था- “आई टुक केयर आफ इट मोम...” वो मुश्कुराते हुए बोला- “मेरे और आपके बीच जो प्राब्लम थी वो मैंने हटा दी। अब कोई नहीं आ सकता हमारे बीच। अब आपको किसी चीज की फिकर करने की जरूरत नहीं..”

और तब पहली बार आशा को सूझा की सिद्धार्थ क्या कहना चाह रहा था जब उसने ये कहा था की वो कुछ कर बैठेगा।

धड़कते दिल के साथ वो अपने कमरे में दाखिल हुई और लाइट ओन की। बेड पर उसके पति किशोर की लाश पड़ी थी, खून में सनी हुई।

अब कोई नहीं है हमारे बीच माँ..." पीछे से सिद्धार्थ की आवाज आई- “आई टुक केयर आफ इट। इट्स जस्ट यू aaanddd मां ना..."

***** समाप्त *****

 
26 सफेद लिबास



रास्ता भूल गये हैं क्या साहब?” आवाज सुनकर मैं पलटा।

वो एक छोटे से कद की लड़की थी, मुश्किल से 5 फुट, रंग सावला और आम सी शकल सूरत। देखने में उसमें कोई भी खास बात नहीं थी जो एक लड़के को पसंद आए। उसने एक सफेद रंग की सलवार कमीज पहन रखी थीं।

मुझे अपनी तरफ ऐसे देखते पाया तो हँस पड़ी।

“मैं यहीं रहती हैं, वो वहाँ पर मेरा घर है...” हाथ से उसने पहाड़ के ढलान पर बने एक घर की तरफ इशारा किया *अक्सर शहर से लोग आते हैं और यहाँ रास्ता भूल जाया करते हैं। गेस्ट हाउस जाना है ना आपने?”

हाँ... पर यहाँ सब रास्ते एक जैसे ही लग रहे हैं। समझ में ही नहीं आता की कौन से पहाड़ पर चढ़े और किससे नीचे उतर जाऊ?” मैंने भी हँसी में उसका साथ देते हुए कहा।

मैं देल्ही से सरकारी काम से आया था। पेशे से मैं एक फोटोग्राफर हूँ और कई दिन से अफवाह सुनने में आ रही थी की यहाँ जंगल में एक 10 फुट का कोबरा देखा गया है। इतना बड़ा कोबरा हो सकता है इस बात पर यकीन करना ही जरा मुश्किल था पर जब बार बार कई लोगों ने ऐसा कहा तो मगजीन वालों ने मुझे यहाँ भेज दिया। था की मैं आकर पता करूं और अगर ऐसा साँप है तो उसकी तस्वीरें निकालँ।।

उत्तरकाशी तक मेरी ट्रिप काफी आसान रही। देल्ही से मैं अपनी गाड़ी में आया था जो मैंने उत्तरकाशी छोड़ दी थी क्योंकी वहां से उस गाव तक जहाँ साँप देखा गया था, का रास्ता पैदल था। कोई सड़क नहीं थी, बस एक ट्रैक थी जिसपर पैदल ही चलना था। मुझे बताया गया था की वहाँ पर एक सरकारी गेस्ट हाउस भी है क्योंकी कुछ सरकारी आफिसर्स वहाँ अक्सर छुट्टियां मानने आया करते थे।

मैं गाव पहुँचा तो गाव के नाम पर बस 10-15 घर ही दिखाई दिए और वो भी इतनी दूर दूर की एक घर से दूसरे घर तक जाने का मतलब एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ना। ऐसे में मैं गेस्ट हाउस ढूँढता फिर ही रहा था की मुझे वो लड़की मिल गई। यूँ तो उसमें कोई भी खास बात नहीं थी पर फिर भी कुछ ऐसा था जो फौरन उसकी तरफ आकर्षित करता था।

उसके सफेद रंग के कपड़े गंदे थे, बाल उलझे हए, और देखकर लगता था की वो शायद कई दिन से नहाई भी नहीं थी।

आइए मैं आपको गेस्ट हाउस तक छोड़ दें..."

और तब मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखा। नीले रंग की बेहद खूबसूरत आँखें। ऐसी की इंसान एक पल आँखों में आँखें डालकर देख ले तो बस वहीं खोकर रह जाए। वो मेरे आगे आगे चल पड़ी। शाम ढल रही थी और दूर हिमालय के पहाड़ों पर सूरज की लाली फैल रही थी।

चारों तरफ पहाड़, नीचे वादियों में उतरे बदल, आसमान में हल्की लाली, लगता था की अगर जन्नत कहीं है तो बस यहीं हैं।

ये है गेस्ट हाउस...” कुछ दूर तक उसके पीछे चलने के बाद वो मुझे एक पुराने बड़े से बंगलो तक ले आई।

बैंक यू..” कहकर मैंने अपना पर्स निकाला और उसे कुछ पैसे देने चाहे। वो देखने में ही काफी गरीब सी लग रही थी और मुझे लगा की वो शायद कुछ पैसों के लिए मुझे रास्ता दिखा रही थी। मेरे हाथ में पैसे देखकर उसको शायद बुरा लगा।

मैंने ये पैसे के लिए नहीं किया था..." और वो खूबसूरत नीली सी आँखें उदास हो गई। ऐसा लगा जैसे मेरे चारों तरफ की पूरी कायनत उदास हो गई थी।

आई आम सारी...” मैंने फौरन पैसे वापिस अपनी जेब में रखे- “मुझे लगा था के...”

कोई बात नहीं... उसने मुश्कुरा कर मेरी बात काट दी।

मैं गेस्ट हाउस में दाखिल हुआ। मैंने अंदर खड़ा देख ही रहा था की वहाँ का बुद्धा केयरटेकर एक कमरे से बाहर निकला।

 
मेहरा साहब..” उसने मुझे देखकर सवालिया अंदाज में मेरा नाम पुकारा।

जी हाँ..” मैंने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया- “आपसे फोन पर बात हुई थी."

[

जी बिल्कुल...” उसने मेरा हाथ गरम जोशी से मिलाया- “मैंने आपका कमरा तैयार कर रखा है...”

उसने मेरे हाथ से मेरा बैग लिया और एक गेस्ट हाउस से बाहर आकर एक गार्डेन की तरफ चल पड़ा। वो लड़की भी हम दोनों के साथ साथ हमारे पीछे चल पड़ी।

तुमने घर नहीं जाना...” मैंने उसको आते देखा तो पूछा।

उसने इनकार में गर्दन हिला दी।

“मुझसे कुछ कहा साहब...” केयरटेकर ने आगे चलते चलते मुझसे पूछा।

नहीं इनसे बात कर रहा था...” मैंने लड़की की तरफ इशारा किया।

हम तीनों चलते हुए गार्डन के बीच बने एक काटेज तक पहुँचे। मुझे लगा था की एक पुराना सा गेस्टहाउस और एक पुराना सा रूम होगा। और जो सामने आया वो उम्मीद से कहीं ज्यादा था। गेस्ट हाउस से अलग बना एक छोटा सा काटेज जो पहाड़ के एकदम किनारे पर था। दूसरी तरफ एक गहरी वादी और सामने डूबता हुआ सूरज।

कोबरा मिले या ना मिले...” मैं दिल ही दिल में सोचा- “पर मैं यहाँ बार बार आता रहूँगा..."

आप आराम करिए साहब...” केयरटेकर ने मेरे काटेज का दरवाजा खोला और समान अंदर रखते हुए कहा- “वैसे तो यहाँ हर चीज का इंतेजाम है, बाकी और कुछ चाहिए हो तो मुझे बताईएगा...” कहकर उसने हाथ जोड़े और वापिस गेस्ट हाउस की तरफ चला गया।

पर वो लड़की वहीं खड़ी रही।

मैं काटेज के अंदर आया तो वो भी मेरे साथ साथ ही अंदर आ गई।

क्या हुआ?” मैंने उसको यूँ अंदर आते देखा तो पूछा।

जवाब में उसने सिर्फ काटेज का दरवाजा बंद कर दिया और पलटकर मेरी तरफ देखा। इससे पहले की मैं कुछ और समझ पता, उसने अपने गले से दुपट्टा निकलकर एक तरफ फेंक दिया।

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“ओहो हो हो..” मैं उसकी इस हरकत पर एकदम घबरा कर पीछे को हट गया- “क्या कर रही हो?”

तभी मुझे केयरटेकर की दो मिनट पहले कही बात याद आई की यूँ तो यहाँ सब इंतेजाम है, पर कुछ और चाहिए हो तो मैं उसको बता दें।

देखो अपना दुपट्टा प्लीज उठा लो। मेरी इस तरह की कोई जरूरत नहीं है। अगर तुम पैसो के लिए ये सब कर रही हो तो वो मैं तुम्हें ऐसे ही दे दूंगा..."

वो मेरे सामने एक सफेद रंग की कमीज में बिना दुपट्टे के खड़ी थी। कमीज के पीछे से सफेद ब्रा की स्ट्रेप्स नजर आ रही थी। जैसे ही मैंने फिर पैसे की बात की, उसकी वो नीली आँखें फिर से उदास हो चली।

“आपको लगता है ये मैं पैसे के लिए कर रही हूँ... किस तरह की लड़की समझ रहे हैं आप मुझे...” कहते हुए उसकी आँखों में पानी भर आया।

मेरा दिल अचानक ऐसे उदास हुआ जैसे मेरा जाने क्या खो गया हो, दिल किया के छाती पीटकर, दहाड़े मारकर रो पड़ें, अपने कपड़े फाड़ दें, इस पहाड़ से कूद कर अपनी जान दे दें।\

नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..” मैंने फौरन बात संभालते हुए कहा- “मुझे समझ नहीं आया के तुम ऐसा क्यों कर रही हो। मेरा मतलब...”

मैं कह ही रहा था की वो धीरे-धीरे चलती मेरे नजदीक आ गई। “ओहह..” कहते हुए उसने अपनी उंगली मेरे होंठों पर रख दी- “यूं कहिए की ये मैं सिर्फ इसलिए कर रही हैं क्योंकी आप पसंद हैं मुझे.."

बाहर हल्का हल्का अंधेरा हो चला था। कमरे के अंदर भी कोई लाइट नहीं थी। उस हल्के अंधेरे में मैंने एक नजर उसपर डाली तो मुझे एहसास हुआ के वो गंदी सी दिखने वाली लड़की असल में कितनी सुंदर थी। वो दुनिया की।

सबसे सुंदर लड़की थी।

 
मैंने बेकरार होकर अपने होंठ आगे किए और उसके होंठों पर रख दिए। उन होंठों की नर्माहट जैसे मेरे होंठों से होती मेरे जिश्म के रोम रोम में उतर गई। हम दोनों दीवाना-सार एक दूसरे को चूम रहे थे। वो कभी मेरे चेहरे को सहलाती तो कभी मेरे बालों में उंगलियां फिराती। कद में मुझसे काफी छोटी होने के कारण उसको शायद मुझे चूमने के लिए अपने पंजों पर उटना पड़ रहा था और मुझको काफी नीचे झुकना पड़ रहा था। अपने हाथों से मैंने उसकी कमर को पकड़ रखा था और उसको ऊपर की तरफ उठा रहा था। और तब मुझे एहसास हुआ की उसको चूमते चूमते अब मैं पूरी तरह सीधा खड़ा था।

उसका चेहरा अब बिल्कुल मेरे चेहरे के सामने था और उसकी बाहें मेरे गले में थी। मैंने हैरत में एक नजर उसके पैरों की तरफ डाली तो पता चला की मैंने उसको कमर से पकड़कर ऊपर को उठा लिया था और उसके पाँव हवा में झूल रहे थे।

वो किसी फूल की तरह हल्की थी। मुझे एहसास ही नहीं हो रहा था की मैंने एक जवान लड़की को यूँ अपने हाथों के बल हवा में पकड़ रखा है। जरा भी थकान नहीं। अगर वो उस वक्त ना बोलती तो पता नहीं मैं कब तक उसको यूँ ही हवा में उठाए चूमता रहता।

“बिस्तर...” उसने मुझे चूमते चूमते अपने होंठ पल भर के लिए अलग किए और उखड़ती साँसों के बीच बोली।

इशारा समझ कर मैं फौरन उसको यूँ उठाए उठाए रूम के एक वन में बने बेड तक लाया और उसको नीचे लेटाकर खुद उसके ऊपर आ गया।

मैं इससे पहले भी कई बार कई अलग अलग लड़कियों के साथ बिस्तर पर जा चुका था इसलिए अंजान खिलाड़ी तो नहीं था। जानता था की क्या करना है पर उस वक़्त जैसे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था। जितना मजा मुझे उस वक्त उसको चूमने में आ रहा था उतना तो कभी किसी लड़की को चोदकर भी नहीं आया

था।

एक मिनट...” मैं एक पल के लिए अलग होता हुआ बोला- “किस हद तक तुम्हारे लिए ठीक है...”

आखिर वो एक छोटे से गाव की लड़की थी। पहली बार में सब कुछ शायद उसको ठीक ना लगे।

मैं पूरी तरह से आपकी हूँ..” उसने हल्की सी आवाज में कहा और फिर मुझे अपने ऊपर खींच लिया। कमरे में अब पूरी तरह अंधेरा था। बस हम दोनों के चूमने की आवाज, कपड़ों की सरसराहट और भारी साँसों के अलावा और कोई आवाज नहीं थी।

पहाड़ों में शाम ढाल जाने के बाद एक अजीब सा सन्नाटा फैल जाता है। दूर दूर तक सिर्फ हवा और किसी जानवर के चिल्लाने की आवाज को छोड़कर और कुछ सुनाई नहीं पड़ता। कुछ को ये सन्नाटा बड़ा आरामदेह लगता है और कुछ को ये सन्नाटा रुलाने की ताकत भी रखता है। उस वक्त भी यही आलम था। बाहर पूरी तरह अजीब सी खामोशी थी। जैसे पूरी कायनत खामोश खड़ी हम दोनों के मिलन की गवाह बन रही हो। दिल की धड़कन इस तरह तेज हो चली थी की मुझे लग रहा था की कहीं कोई शोर ना सुन ले। मेरा दिमाग कुंद पड़ चुका था।

आगे बढ़ने का ख्याल भी मेरे दिमाग में नहीं आ रहा था। उसपर चढ़ा बस उसको चूमे जा रहा था। तभी उसने मेरा एक हाथ पकड़ा और अपने गले से हटाते हुए धीरे से नीचे लाई और अपनी एक छाती पर रख दिया। एक बड़ा सा नरम गुदाज अंग मेरी हथेली में आ गया।

इतने बड़े.” ये पहला ख्याल था जो मेरे दिमाग में आया था। उसको पहली बार देखकर ये अंदाजा हो ही नहीं सकता था की उसकी छातियां इतनी बड़ी बड़ी हैं।

बड़ी पसंद है ना आपको..” उसने धीरे से मेरी कान में कहा।

और ये सच भी था। अपनी लाइफ में कई ऐसी लड़कियां जो मुझपर फिदा थी उनको मैंने इसलिए रिजेक्ट किया था क्योंकी उनकी छातियां बड़ी बड़ी नहीं थी। मेरे हिसाब से एक औरत की सबसे पहली पहचान थी उसकी छातियां और अगर वो ही औरत होने की गवाही ना दें तो फिर क्या फायदा?

“हाँ...” मैंने हाँफती हुई आवाज में कहा और अपने हाथ में आए उस बड़े से अंग को धीरे-धीरे दबाने लगा। तब भी मेरे दिमाग में ये नहीं आया की दूसरी छाती भी पकड़ हूँ और वो जैसे मेरा दिमाग पढ़ रही थी। उसने मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ा और अपनी दूसरी छाती पर रख दिया।

“जोर जोर से दबाओ। मसल डालो..."

और मेरे लिए शायद इतना इशारा ही काफी था। मैंने उसकी छातियों को जानवर की तरह मसलना शुरू कर दिया और उसके गले पर बेतहाशा चूमने लगा। कोई और लड़की होती तो शायद इस तरह छाती दबाए जाने पर दर्द से बिलबिला पड़ती पर उसने यूं तक नहीं करी।

जब उसने देखा की मैं बस उसकी गले पर चूम रहा हूँ तो उसने मेरा सर पकड़ा और अपनी छातियों की तरफ धकेला। दबाए जाने के कारण दोनों छातियों का काफी हिस्सा कमीज के ऊपर से बाहर को निकल रहा था और मेरे होंठ सीधा वहीं जाकर रुके। मैंने नीचे से छातियों को ऊपर की ओर दबाया ताकि वो और कमीज के बाहरआएं और उनके ऊपर अपने होंठ और अपनी जीभ फिराने लगा।

उसको इस बात का एहसास हो चुका था की मैं दबा-दबाकर उसकी कमीज के गले से उसकी छातियां जितनी हो सकें बाहर निकालना चाह रहा हूँ।

चाहिए?” उसने पूछा

“हाँ..” मैंने चौंकते हुए कहा।

“ये चाहिए?”

कमरे में पूरा अंधेरा था और मैं उसको बिल्कुल देख नहीं सकता था, बस उसके जिश्म को महसूस कर सकता था। पर फिर भी उसके पूछने के अंदाज से मैं समझ गया की वो अपनी छातियों की बात कर रही थी। इससे पहले की मैं कोई जवाब देता, उसने मुझे पीछे को धकेला और उठकर बैठ गई। उसके जिश्म की सरसराहट से मैं समझ गया था की वो अपनी कमीज उतार रही थी।

जब उसने फिर मेरे हाथ पकड़कर अपनी छातियों पर रखे तो इस बार मेरे हाथ को उसके नंगेपन का एहसास हुआ। उसने अपनी ब्रा भी उतार दी थी।

किस रूप में चाहोगे मुझे?” उसने पूछा।

 
मुझे सवाल समझ नहीं आया और इस बार भी उसने शायद मेरा दिमाग पढ़ लिया। इससे पहले के मैं उससे मतलब पूछता वो खुद ही बोल पड़ी।

किसे चोदना चाहोगे आज... जो चाहो मैं वही बनने को तैयार हूँ..”

मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा था।

कहो तो तुम्हारी पड़ोसन, तुम्हारे दोस्त की बीवी, एक अंजान लड़की..”

मुझे अब उसकी बात समझ आ रही थी। शहर में हम इसे रोल-प्लेयिंग कहते थे।

कहो तो मैं एक रंडी बन जाऊं?” वो बोले जा रही थी।

या कोई गंदी ख्वाहिश है तुम्हारी। अपनी माँ, या बहन, या भाभी को चोदने की ख्वाहिश?”

मैंने फौरन उसकी बात काटी- “मेरी बीवी...” पता नहीं कहा से मेरे दिमाग में ये ख्याल आया और इसके आगे मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी।

मेरे साथ आपकी पहली रात है पतिदेव। आपकी बीवी पूरी तरह आपकी है। जैसे चाहिए मजा लीजिए..” कहते । हुए उसने मेरी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिए। मेरा दिमाग अब भी जैसे काम नहीं कर रहा था। जो कर रही थी, बस वो कर रही थी। लग रहा था जैसे वो मर्द हो और मैं औरत। धीरे-धीरे उसने मेरे सारे कपड़े उतार दिए और उस अंधेरे में उसकी बाहों में मैं पूरी तरह से नंगा हो गया।

काफी बड़ा है..” उसके हाथ मेरे लण्ड पर थे। वो उसको सहला रही थी।

इस बार जब उसने मुझे अपने ऊपर खींचा तो मैं सीधा उसकी टाँगों के बीच आया। उसने अब भी सलवार पहन रखी थी पर मेरा पूरी तरह से खड़ा हो चुका लण्ड सलवार के ऊपर से ही जैसे उसकी चूत के अंदर घुसता जा रहा था। एक हाथ से वो अब भी कभी मेरे लण्ड को सहलाती, तो कभी मेरे टट्टों को।

ओह...” मेरे लण्ड का दबाव चूत पर पड़ते ही वो कराही- “चाहिए?”

फिर वही सवाल।

“बोलो ना... चाहिए... मुझे तो चाहिए...”

फिर से एक बार वो उठकर बैठी, अंधेरे में फिर कपड़ों के सरसरने की आवाज। मैं ज...नता था की वो सलवार उतार रही है।

आ जाओ... चोदो मुझे...” उस वक़्त उसके मुँह से वो गंदे माने जाने वाले शब्द भी कितने मीठे लग रहे थे।

उसने मुझे अपने ऊपर खींच लिया। मैं फिर उसकी टाँगों के बीच था। मेरे अंदाजा सही निकला था। उसने अपनी सलवार उतार दी थी और अब नीचे से पूरी नंगी थी। मेरा लण्ड सीधा उसकी नंगी, भीगी और तपती हुई चूत पर

आ पड़ा।

मैं ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे ये मेरा पहली बार हो। अपनी कमर हिलाकर मैं उसकी चूत में लण्ड घुसने की कोशिश करने लगा।

“रुको मेरे सरताज...” वो ऐसे बोली जैसे सही में मेरी बीवी हो- “पहले अपनी बीवी को अपने पति का लण्ड चूसने नहीं दोगे...।

किसी बच्चे की तरह मैं उसकी बात मानता हुआ बिस्तर पर सीधा लेट गया। वो घुटनों के बल उठकर बिस्तर पर बैठ गई। अंधेरे में मुझे वो बिल्कुल नजर नहीं आ रही थी। बल्कि नीचे जमीन पर पड़े उसके सफेद कपड़ों के सिवाय कुछ भी नहीं दिख रहा था।

मेरे लण्ड पर मुझे कुछ गीला गीला सा महसूस हुआ और मैं समझ गया की ये उसकी जीभ थी। वो मेरा लण्ड चाट रही थी। कभी लण्ड पर जीभ फिरती, तो कभी टट्टो पर। उसके एक हाथ ने जड़ से मेरा लण्ड पकड़ रखा था और धीरे-धीरे हिला रही थी। और फिर मुझे वो एहसास हुवा जो कभी किसी लड़की को चोदते हुए नहीं हुआ था। उसने जब मेरा लण्ड अपने मुँह में लिया तो वो मजा दिया जो किसी लड़की की चूत में भी नहीं आया था। बड़ी देर तक वो यूँ ही मेरा लण्ड चूसती रही। कभी चूसती, कभी चाटने लगी तो कभी बस यूँ ही बैठी हुई हाथ से हिलाती।

बस..” मैंने बड़ी मुश्किल से कहा- “मेरा निकल जाएगा...”

वो फौरन समझ गई। अंधेरे में वो हिली, उसका जिम मुझे अपने ऊपर आते हुए महसूस हुआ और मेरा लण्ड एक बेहद गरम, बेहद टाइट और बेहद गीली जगह में समा गया।

चोदो अपनी बीवी को... जैसे चाहो चोदो.. लिटाकर चोदो, झुका कर चोदो, कुतिया बनाकर चोदो...”

वो और भी जाने क्या क्या बोले जा रही थी और मेरे ऊपर बैठी अपनी गाण्ड हिलाती लण्ड चूत में अंदर बाहर कर रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था की ये कोई सपना है या हकीकत। पर जो कुछ भी था, मेरी जिंदगी का सबसे हसीन पल था।

 
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