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Badla बदला compleet

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गतान्क से आगे...

रोमा ने अभी तक पूरा एस्टेट नही देखा था & इसके लिए देविका ने तय किया था

कि शनिवार को वो उसे प्रसून के साथ एस्टेट घुमाने ले जाएगी लेकिन उसका

इरादा बस बेटे-बहू को ले जाने का नही था उस शख्स को भी साथ ले जाने को था

जिसने उसके दिल मे जगह बना ली थी-इंदर.रात उसके नाम से चूत मे उंगली करने

के बाद देविका नेउसके बारे मे सोचा तो पाया था कि इंदर कोई ग़ज़ब का हसीन

नौजवान नही था मगर कोई बदशक्ल इंसान भी नही था & उसका जिस्म भी गाथा हुआ

था.देविका की सोई हस्रतो को उसकी शराफ़त ने जगा दिया था & उसे लगने लगा

था की शिवा के दिए ज़ख़्मो पे इंदर ही मरहम लगाएगा.

"इंदर.ज़रा मेरे कॅबिन मे आना.",इनर्ट्र्कोम से उसने उसे बुलाया.

"यस मॅ'म.",इंदर उसके कॅबिन मे दाखिल हुआ.

"इंदर,इस शनिवार मैं प्रसून & रोमा को एस्टेट दिखाने ले जा रही हू.मैं

चाहती हू की तुम भी हमारे साथ आओ."

"पर..-"

"पर-वर कुच्छ नही.तुम्हे कही जाना है?"

"नही."

"कोई काम है?"

"नही,मगर..-"

तो फिर 3 बजे के बाद घर मे ही बैठे रहोगे."

"जी."

"तो उस से अच्छा है हमारे साथ चलो."

"मॅ'म."

"इंदर,ऑर्डर नही दे रही गुज़ारिश कर रही हू,प्लीज़.",1 पल को देविका के

चेहरे पे उसके दिल के असली भाव आ गये थे जिन्हे इंदर की पैनी निगाहो ने

पढ़ लिया था.

"मॅ'म,आप तो शर्मिंदा कर रही हैं.मैं ज़रूर चलूँगा."

"थॅंक्स,इंदर."

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"रोमा..ये बिस्कट भी रख लो & ये फ्रूटी भी..ये वाली बॉटल तुम्हारी है &

ये मेरी.",ओपन टॉप जीप की पिच्छली सीट पे बैठ रही रोमा को प्रसून अपना

समान पकड़ा रहा था.जीप बंगल के अहाते मे खड़ी थी.

"और मेरी फ्रूटी प्रसून?",इंदर ने प्रसून को छेड़ा.सब तैय्यार होके आ गये

थे मगर देविका अभी तक नही आई थी.

"वो भी है,इंदर भाय्या.आपकी इस आइस-बॉक्स मे है & आपके लिए चिप्स भी लाया

हू.",प्रसून की मासूम बातो से रोमा & इंदर हंस पड़े.पूरे परिवार मे ये

अकेला था जिस से चाह के भी इंदर नफ़रत नही कर पाया था मगर इसके बावजूद

उसके मन मे ज़रा भी शुबहा नही था की जब वक़्त आएगा तो वो प्रसून को मोहरा

बनाने मे ज़रा भी नही हिचकिचाएगा.

"सॉरी,मेरी वजह से सबको इंतेज़ार करना पड़ा ना.",बंगल से बाहर निकलती

कमीज़ के आस्तीन के बटन लगाती देविका को देख इंदर का मुँह खुला का खुला

रह गया.उसने देविका को हमेशा सारी मे देखा था.आज उसने क्रीम कलर की कसी

शर्ट & बलुए रंग की कसी पॅंट जिन्हे राइडिंग ब्रीचास कहा जाता है पहनी

थी.ये ब्रीचास घुड़सवारी के वक्त पहनी जाती हैं.उन ब्रीचास के उपर से

उसने भूरे रंग के चमड़े के बेहतरीन घुटनो तक के राइडिंग बूट्स पहने थे.

इस कसे लिबास मे देविका के बदन के सभी कटाव सॉफ झलक रहे थे.उसकी चाल मे 1

कुद्रती लोच था जिस से उसकी कमर क़ातिलाना अंदाज़ मे मटकती थी.इस वक़्त

जब वो तेज़ी से चलते हुए इंदर के पास आई & फिर जीप की अगली सीट पे बैठी

तो इंदर उसकी कसी गंद की दिल ही दिल मे तारीफ किए बिना नही रह सका.

"इंदर."

"जी."

"बुरा ना मानो तो आज तुम ही जीप चलाओ."

"ज़रूर मॅ'म.इसमे बुरा मानने की क्या बात है!",इंदर सीट पे बैठ गया &

स्टियरिंग संभाल ली.जीप तेज़ी से बंगल के ड्राइववे से निकल एस्टेट के

खेतो की ओर निकल पड़ी.देविका & इंदर आगे बैठे थे & रोमा & प्रसून

पीछे.देविका & प्रसून रोमा को हर जगह के बारे मे बता रहे थे.

सब्ज़ियो के खेतो के पास से गुज़रते हुए वाहा काम कर रहे आदमियो ने उन्हे

सलाम किया & उनमे से 1 ने प्रसून को ताज़े खीरे पकड़ाए.सभी लोग

ताज़े,रसीले खीरो के ज़ायके का मज़ा उठाते हुए आगे बढ़ गये.एस्टेट के

छ्होटे से जंगल के रास्ते पे दौड़ती जीप अब वाहा की सबसे खूबसूरत जगह की

ओर बढ़ रही थी.

रास्ता थोड़ा उबड़-खाबड़ था & झटका लगता तो देविका की बाँह इंदर से च्छू

जाती.देविका को बहुत अच्छा लग रहा था & उसका दिल कर रहा था की ये असर्त

कभी ख़त्म ही ना हो मगर ये तो नामुमकिन बात थी & कोई 10 मिनिट बाद वो लोग

उसी झील के पास पहुँच गये जहा कुच्छ दिन पहले प्रसून की शादी के वक़्त

इंदर ने कामिनी & वीरेन को 1 दूसरे को चूमते देखा था.

झील पे पहुँचते ही प्रसून जीप से उतर के पानी की तरफ भागा,उसके पीछे-2

उसकी बीवी भी गयी,"अब देखना ये पानी पे पत्थर तराएएगा.",देविका अपने बेटे

को छपते पत्थर ढूंढते देख मुस्कुराइ.

"ये तो बड़ा मज़ेदार खेल है.मैं भी जाता हू.",इंदर ड्राइविंग सीट से उतरा

& उन दोनो के पास पहुँच गया.तीनो पानी पे चपते पत्थर फेंक के ये देखने

लगे की किसका पत्थर देर तक पानी पे उच्छलता है.देविका जीप से उतर उसके

बॉनेट पे बैठ गयी.इंदर ने अपनी कमीज़ की आस्तीने मोड़ ली थी & उसके

मज़बूत बाज़ू सॉफ दिख रहे थे.देविका के दिल मे कसक सी उठी....आख़िर कितना

इंतेज़ार करना पड़ेगा उसे उन बाजुओ मे क़ैद होने के लिए!

इंदर के करीब आने के ख़याल ने उसे फिर से उसके बेवफा आशिक़ की याद दिला

दी & उसके चेहरे पे उदासी की परच्छाई आ गयी..कही वो इंदर के करीब आके

वोही ग़लती तो नही दोहराएगी?....शिवा भी उसका दीवाना था & इतना उसे यकीन

था की उसने शुरू मे उसे सच्चे दिल से चाहा था मगर ना जाने कब वो चाहत

पैसो के आगे फीकी पड़ गयी....कही इंदर भी उसे आगे जाके धोखा तो नही

देगा?....लेकिन इंदर को तो उसका ख़याल ही नही है..शिवा उसकी खूबसूरती का

कायल था,ये बात देविका को उसके इश्क़ के इज़हार के पहले से पता थी,उसने

कयि बार उसे खुद को देखते पाया था मगर इंदर के लिए वो बस उसकी मालकिन थी

& कुच्छ नही....इस बार तो बात उल्टी थी,वो इंदर के करीब आना चाहती

थी....वैसे भी उसे इंदर से इश्क़ नही हुआ था....वो उसकी ईमानदारी &

अच्छाई की कायल थी मगर इश्क़...नही!

इश्क़,प्यार किताबी बाते होती हैं & वही अच्छी लगती हैं.ये बात तो वो

ज़िंदगी मे बहुत पहले समझ चुकी थी.अभी भी इंदर उसे अच्छा लगा था मगर उसके

दिल से ज़्यादा उसके बदन को उस गथिले नौजवान की ज़रूरत थी.उसे नही पता था

की कल क्या होने वाला है..हो सकता है इंदर जैसा आज है वैसा ही कल भी रहे

& हो सकता है वो बदल जाए जैसे शिवा बदला था....मगर वो ये ख़तरा उठाने को

तैय्यार थी.इंदर के करीब उसे जाना ही था आगे क्या होगा वो संभाल

लेगी..इतनी बेवकूफ़ नही थी वो की बार-2 1 ही ग़लती करे.इस बार वो अपने

आशिक़ पे आँख मूंद के भरोसा नही करेगी मगर पहले वो उसका आशिक़ बने तो!

तीनो वापस आ रहे थे,"अब कहा चलना है,मॅ'म?"

"अब टीले पे चलते हैं,इंदर भाय्या.",देयका के बोलने से पहले ही प्रसून बोल उठा.

"हां,वही चलते है नही तो अंधेरा हो जाएगा.",चारो 1 बार फिर जीप मे बैठ

गये & 1 बार फिर देविका की बाँह इंदर की बाँह से च्छू उसे मस्त करने

लगी.एस्टेट मे जो सबसे ऊँची जगह थी उसे ही टीला कहते थे.उसके उपर जाने का

रास्ता सुरेन जी ने ही बनवाया था.वाहा कुच्छ नही था बस कुच्छ पेड़ो के

सिवा मगर वाहा से पूरी एस्टेट दिखती थी & वो नज़ारा बड़ा ही दिलकश होता

था.जब प्रसून छ्होटा था तो सुरेन जी बीवी & बेटे को अक्सर वाहा पिक्निक

मनाने ले जाते थे.

1 बार प्रसून साथ गये नौकर के साथ टीले से नीचे उतर आस-पास के पौधो से

फूल इकठ्ठा करने लगा था.उस रोज़ देविका ने स्कर्ट पहनी थी & कुछ ज़्यादा

ही खूबसूरत लग रही थी.प्रसून के जाते ही सुरेन जी को मौका मिल गया &

उन्होने अपनी हसीन बीवी को गोद मे उठाया & पेड़ो के झुर्मुट के बीच ले

जाके उसे चोद दिया था.देविका को आज भी वो दोपहर याद थी.जीप टीले के उपर

खड़ी थी & उसके बेटे-बहू जीप से नीचे उतर के वाहा से एस्टेट को देख रहे

थे.

देविका पति के साथ बिताए हसीन लम्हो की याद मे खोई जीप की पिच्छली सीट पे

आ गयी थी & खड़ी हो जीप की रेल पकड़ के बेटे-बहू को देख रही थी.उस रोज़

सुरेन जी कुछ ज़्यादा ही जोश मे थे & देविका भी उनके लंड से 2-3 बार झाड़

गयी थी.उन मस्त पॅलो की याद ने देविका के जिस्म मे आग लगा दी & उसने

बेचैन हो अपनी भारी जंघे आपस मे हल्के से रगडी & अपना ध्यान हटाने के लिए

बेटे-बहू के पास जाने की गरज से जीप से उतरने को घूमी & वाहा बैठे इंदर

के घुटनो से टकरा के गिरने लगी.

उसे पता ही नही चला था की इंदर कब आके बैठ गया था.इंदर ने उसे गिरने से

रोका & अपनी बाहो मे संभाला & वो संभालते हुए उसकी गोद मे गिर गयी.इंदर

की बाई बाँह उसकी कमर के गिर्द थी & दाई उसकी बाई बाँह पे.दोनो के चेहरे

1 दूसरे के बिल्कुल करीब थे & दोनो 1 दूसरे की सांसो को महसूस कर रहे

थे.इंदर की नज़रे देविका के चेहरे से नीचे हुई & उसकी शर्ट के गले मे से

झलक रहे उसके क्लीवेज पे गयी & फिर वापस उसके चेहरे पे जिसपे देविका के

जिस्म की प्यास सॉफ दिख रही थी.देविका को अपनी गंद के नीचे दबा इंदर का

कुलबुलाता लंड महसूस हो रहा था....कितना करीब था उसका लंड उसकी प्यासी

चूत के..अफ!देविका को आज यकीन हो गया था की इंदर का लंड बहुत बड़ा

है.उसका दिल बेताब हो उठा था उस लंड से खेलने के लिए मगर अभी उसका वक़्त

नही था.
 
इंदर के सीने पे & जीप की आगे की सीट पे हाथ रख वो उठी & जीप से उतर

गयी.शाम ढाल चुकी थी & सूरज अब डूबने ही वाला था.उस नारंगी सूरज की रोशनी

मे एस्टेट का नज़ारा और भी दिलकश लग रहा था.नीचे के खेतो से लौटते किसान

& मज़दूर दिख रहे थे.दूर बुंगला भी दिख रहा था & बाकी इमारतें भी मगर जो

नही दिख रहा था वो था क्वॉर्टर्स से बंगले को जाने के रास्ते के किनारे

पर झाड़ियो से कुच्छ दूरी पे पेड़ो के झुर्मुट के बीच कुच्छ ढूनदता हुआ 1

आदमी.

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बहुत अच्छा हुआ की उनलोगो ने उस शख्स को नही देखा.देविका को पता नही था

की कुच्छ ही दिन बाद उसकी ज़िंदगी मे बहुत बड़ा तूफान आने वाला है & उस

तूफान से लड़ने का माद्दा जिस शख्स मे था वो अगर आज पकड़ा जाता तो फिर

देविका को कोई भी नही बचा सकता था.

वो पेड़ो के बीच कुछ ढूनदता हुआ शख्स शिवा था.अपनी महबूबा की बेरूख़ी से

दुखी हो वो एस्टेट से चला गया था मगर उसकी फ़िक्र & इंदर से बदला लेने की

चाह उसे फिर से यहा ले आई थी.वो एस्टेट के चप्पे-2 से वाकिफ़ था & सबकी

नज़र बचाके घुसना उसके बाए हाथ का खेल था.इंदर के बारे मे सोचते हुए उसे

सुरेन जी के मौत के अगले रोज़ का वाक़या याद आया था जब इंदर ने वाहा

कुच्छ फेंका था.उसने दूसरे ही दिन आके ढूँढा था मगर कुच्छ नही मिला था

लेकिन उसने 1 आख़िरी कोशिश करने की सोची थी.पता नही क्यू उसे बार-2 ऐसा

लग रहा था कि वो चीज़ 1 बहुत अहम सुराग थी इंदर के खिलाफ & आज उसे ज़रूर

मिलेगी.

उसका दिमाग़ कहता था की ये बेवकूफी थी,इतने दीनो पहले फेंकी गयी चीज़ आज

मिलने से रही मगर उसका दिल कहता था की उसे वो चीज़ ज़रूर मिलेगी & बस

अपने दिल की आवाज़ को सुनता वो वाहा जुटा था.

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घोड़ो के स्टड फार्म के अहाते मे जली आग के पास बैठे चारो बाते कर रहे

थे.पूरी एस्टेट का चक्कर लगाके जब 8 बजे वो वाहा पहुँचे तो प्रसून ने

ज़िद की यहा आग जलाके पिक्निक मनाई जाए जैसे उसके पापा करते थे & रात को

भी यही फार्म पे रुका जाए.सुरेन जी कभी अमेरिका गये थे & वाहा के टेक्सस

राज्य मे कोई स्टड फार्म देखा था.उन्होने अपना फार्म बिल्कुल उसी अमेरिकन

फार्म की नकल मे बनाया था.घोड़ो के अस्तबल से थोड़ा हट के लकड़ी की

दोमंज़िला इमारत थी जिसमे वाहा काम करने वालो के कमरे थे.कभी-कभार वो यहा

आराम के कुच्छ पल बिताने आ जाया करते थे.आज प्रसून की फरमाइश पे सब वही

रुक गये थे.

स्टड फार्म की उपरी मंज़िल पे 2 कमरे खाली थे,वाहा के केर्टेकर ने 1 कमरा

प्रसून & रोमा के लिए & दूसरा देविका के लिए ठीक कर दिया था.निचली मंज़िल

पे 1 कमरा खाली था जो उसने इंदर के लिए ठीक कर दिया था.इंदर तो वाहा

रुकना नही चाह रहा था या यू कहा जाए की ना रुकना चाहने का नाटक कर रहा था

मगर सभी के इसरार के आगे उसे झुकना ही पड़ा.देविका ने फार्म से 1 लड़के

को बंगले पर भेज दिया था जहा उसकी नौकरानी ने सभी के लिए रात के कपड़े

भेज दिए थे.

काफ़ी देर तक चारो बाते करते रहे.काई दिन बाद देविका को भी इतना हल्का

महसूस हो रहा था.10 बजे के बाद प्रसून जमहाई लेने लगा तो देविका ने उसे &

रोमा को सोने जाने के लिए कहा मगर वो इंदर के साथ वही बैठी बाते करती

रही,"इंदर,1 पर्सनल सवाल पुच्छू तो बुरा तो नही मनोगे?"

"पर्सनल सवाल?"

"हां."

"पुछिये.अब बॉस की बात का बुरा मान के मुझे नौकरी ख़तरे मे थोड़े डालनी

है!",दोनो हंस पड़े.

"तुमने अभी तक शादी क्यू नही की?"

"कभी मौका ही नही मिला."

"ऐसा कैसे हो सकता है?"

"आप तो जानती ही हैं की मैं अनाथ हू तो कोई मा-बाप तो थे नही जोकि ये काम

करवाते & मैं.",इंदर फीकी सी हँसी हंसा,"..मैं अपने पैरो पे खड़ा होने के

चक्कर मे लगा रहा.उस जद्दोजहद मे मुझे कभी ये ख़याल ही नही आया की शादी

भी करनी है & मॅ'म..",उसने देविका की आँखो मे देखा,"..अब तो ज़रूरत महसूस

भी नही होती.मुझे अकेलापन रास आने लगा है शायद."

"ये वेहम है तुम्हारा.फ़िक्र मत करो जब कोई लड़की मिलेगी तो ज़रूरत भी

महसूस होगी & अकेलापन भी बेकार लगेगा.",देविका उठ के खड़ी हो गयी,"अब

चलती हू.गुड नाइट,इंदर."

"मॅ'म..",स्टड फार्म का केर्टेकर उसके कमरे मे खड़ा था,"..और किसी चीज़

की ज़रूरत नही है ना आपको?"

"नही.तुम कहा सोयोगे?"

"मैं तो अस्तबल के उपर वाले कमरो मे से किसी 1 मे.2-4 और वर्कर्स भी वही सोते हैं."

"ठीक है.मॅनेजर साहब के कमरे मे सब ज़रूरत का समान रख दिया ना?"

"जी,मॅ'म.बस मच्छरदानी नही रखी है क्यूकी 2 ही थी सो 1 आपको & 1 भैया को दी है."

"अच्छा.",केर्टेकर के जाते ही देविका ने बती बुझाई & मच्छरदानी उठा अपने

बिस्तर मे घुस गयी.थोड़ी ही देर मे रात का सन्नाटा च्छा गया.अस्तबल की

तरफ से भी कोई आवाज़ नही आ रही थी & बाकी कमरो से भी नही.नीचे इंदर जगा

होगा ये देविका को मालूम था.स्टड फार्म पे इस वक़्त मच्छरो का हमला होता

था & वो किसी भी क्रीम या रिपेलेंट से नही भागते थे.घोड़ो को उनसे बचाने

के लिए 1 रिपेलेंट इस्तेमाल होता था मगर उसकी बदबू ऐसी थी की इंसान उसे

इस्तेमाल नही कर पाते थे & मच्छरदानी के अलावा कोई और उपाय नही था उन खून

के प्यासे कीड़ो से बचने का.

देविका जानती थी की इंदर का उन मच्छरो ने काट-2 के बुरा हाला कर दिया

होगा.वो अपने बिस्तर से उतरी & उसके कमरे की ओर बढ़ गयी.उसने बिल्कुल ठीक

सोचा था इंदर अपने बिस्तर पे बैठा मच्छर मार रहा था,"परेशान हो गये ना?"

देविका की आवाज़ सुन वो चौंक पड़ा & दरवाज़े मे खड़ी देविका को देख वो सब

भूल गया देविका ने आज पूरे बाजुओ की काली नाइटी पहनी थी जोकि उसके सीने

पे बिल्कुल कसी थी & उसके नीचे से ढीली थी.नाइटी का गला थोड़ा बड़ा था &

देविका की बड़ी चूचियो का हिस्सा उस से झलक रहा था.

"हा..हां..बहुत मच्छर हैं."

"हूँ.",देविका मुस्कुराइ,"..मेरे साथ आओ.",इंदर उसके पीछे-2 चल

पड़ा.देविका उसे अपने कमरे मे ले आई.

"यहा सो जाओ."

"जी..मगर आप."

"मैं भी यही सोयूँगी.",देविका का दिल बहुत ज़ोर से धड़क रहा था.

"मॅ'म..ये कैसे हो सकता है?",इंदर घबराया हुआ लग रहा था.

"इंदर,बिस्तर बहुत बड़ा है & मच्छरदानी 1 ही है.अब अगर सोना चाहते हो तो

रास्ता 1 ही है की तुम & मैं ये बिस्तर शेर कर लें."

"नही,मॅ'म.मैं ऐसा नही कर सकता.ये ठीक नही लगता."

"इंदर,तुम किस बात से घबरा रहे हो?तुम्हे मुझपे भरोसा नही ये खुद पे?"

"मॅ'म..समझने की कोशिश कीजिए.बात वो नही है.लोग.."

"अच्छा.लोग!तुम उसकी फ़िक्र मत करो.कोई कुच्छ नही बोलेगा.चलो सोयो अब

मुझे भी नींद आ रही है.",इंदर ने काफ़ी नाटक कर लिया था & अब वो बेमन सा

बिस्तर मे घुस गया.दूसरी तरफ से देविका भी बत्ती बुझा के बिस्तर पे आ

गयी.इंदर उसकी तरफ पीठ करके लेटा था देविका का दिल तो कर रहा था की वो

उसे घुमा उसके उपर टूट पड़े मगर उसने अपने जज़्बातो पे काबू रखा.इंदर

जानता था की बस 1 हाथ बढ़ने की देर है,देविका अपनी टाँगे खोल उसका

इस्तेक्बाल करेगी मगर नही वो ऐसा कुच्छ नही करेगा.

तभी दूसरे कमरे से रोमा की चीख सुनाई दी & दोनो उठ बैठे,"ये क्या था?!"

इंदर बिस्तर से उतरने ही वाला था की अगली आवाज़ से दोनो को सारा माजरा

समझ आ गया,"आहह...आईयईए..आराम से प्रसून....ऊहह..इतना अंदर

नही...हाईईइ....!",देविका के गाल शर्म से लाल हो गये,उसकी बहू उसके बेटे

से चुद रही थी.उसकी हिम्मत नही हुई की वो इंदर की ओर देखे & वो लेट गयी.

रोमा की मस्ती भरी आहो ने इंदर के आज़म को भी हिला दिया था.उसका दिल तो

किया की देविका को बाहो मे भर उसके हलक से भी ऐसी ही आवाज़ा निकलवाए मगर

तभी उसके दिमाग़ ने उसे हिदायत दी..अगर उस कमरे से आवाज़ इस कमरे तक आ

सकती है तो इस कमरे से उस कमरे क्यू नही जा सकती!

उसने अपने दिल पे काबू रखा & लेट गया.प्रसून अपनी बीवी की चूत मे उंगली

घुसा रहा था & उसी के ज़्यादा अंदर जाने से वो कराह उठी थी.रोमा बिस्तर

पे पड़ी उसके लंड को हिला रही थी.पहले प्रसून को अजीब लगता था की वो उसका

लंड पकड़ती है मगर अब उसे इंतेज़ार रहता था की कब रोमा अपने मुलायम हाथो

मे उसके लंड को हिलाए,"ऊव्व....!",रोमा कमर उचकती झाड़ रही थी.प्रसून को

बहुत अच्छा लगता जब उसकी बीवी ऐसी हरकत करती.उस वक़्त उसके चेहरे पे जो

दर्द जैसे भाव आते थे वो उसे अजीब लगते मगर इसके बाद वो उसे बहुत प्यार

करती थी.

अभी भी कुच्छ ऐसा ही हुआ था,रोमा ने उसे अपने उपर खिच लिया & उसे बेतहाशा

चूमने लगी,"..ओह्ह..मी डार्लिंग...प्रसून..आइ लव यू...!"

ये सारी आवाज़े दूसरे कमरे मे सोई देविका & इंदर के कानो मे भी पड़ रही

थी.देविका इंदर की ओर मुँह कर बाई करवट पे सोई थी जबकि इंदर बिल्कुल सीधा

लेटा था.देविका की नाइटी मे 1 स्लिट था & इस वक़्त जब उसका पूरा ध्यान

अपनी बहू की मस्तानी आहो पे था उसे ये होश ही ना रहा की उसकी स्लिट जोकि

जाँघ तक आती थी,उसमे से उसकी दाई जाँघ & गोरी टांग पूरी नुमाया हो रही

है.

कमरे मे अंधेरा था & देविका को लगा की इंदर सो गया है....कुच्छ ज़्यादा

ही शरीफ था वो तो!देविका को लगा की अब उसे ही कुच्छ करना पड़ेगा.उसने

नींद मे होने का नाटक कर अपना दाया हाथ इंदर की बाई बाँह पे रख दिया.उसे

लगा की अब वो ज़रूर कुच्छ करेगा.

"ओवव.....हां....और..अंदर..प्रसून..पूरा

घुसाओ...ऊहह.....डार्लिंगगगगगग...हाऐईयईईईईई..!",सॉफ ज़ाहिर था की प्रसून

अब अपना लंड रोमा की चूत मे घुसा रहा था.इंदर का हाल बुरा था मगर उसने

अपने बदले को याद किया & अपने जज़्बातो को संभालते हुए करवट ली.ऐसा करने

से देविका का हाथ उसकी बाँह से हट गयी.

देविका को बहुत बुरा लगा..कोई लड़की भी नही थी इसकी ज़िंदगी मे फिर ये

क्यू भाग रहा था उस से?..कही गे तो नही?देविका को हँसी आ गयी.दूसरे कमरे

मे प्रसून बीवी के उपर सवार उसकी चुदाई मे लगा ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा

था.रोमा के मज़े की तो कोई सीमा ही नही थी!

"आहह....!",लंबी आह से देविका को पता चल गया की रोमा झाड़ चुकी है.उसने

नाइटी की स्लिट को & उपर कर उसमे अपना हाथ घुसाया & अपनी उंगली से अपनी

चूत को शांत करने लगी.थोड़ी देर की खामोशी के बाद 1 बार फिर उसकी बहू की

मस्तानी आहे उसे परेशान करने लगी थी.उसकी उंगली तेज़ी से चूत मे घूम रही

थी.वो इंदर का ख़याल कर अपनी चूत मार रही थी & इस सब से बेपरवाह इंदर

उसकी ओर पीठ किए सो रहा था.

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क्रमशः.............................
 
बदला पार्ट--35

गतान्क से आगे...

Roma ne abhi tak pura estate nahi dekha tha & iske liye devika ne tay

kiya tha ki shanivar ko vo use Prasun ke sath estate ghumane le jayegi

lekin uska irada bas bete-bahu ko le jane ka nahi tha us shakhs ko bhi

sath le jane ko tha jisne uske dil me jagah bana li thi-Inder.raat

uske naam se chut me ungli karne ke baad devika ne suke bare me socha

to paya tha ki inder koi gazab ka hasin naujawan nahi tha magar koi

badshakl insan bhi nahi tha & uska jism bhi gatha hua tha.devika ki

soyi hasrato ko uski sharafat ne jaga diya tha & use lagne laga tha ki

shiva ke diye zakhmo pe inder hi marham lagayega.

"inder.zara mere cabin me aana.",inetrcom se usne use bulaya.

"yes ma'am.",inder uske cabin me dakhil hua.

"inder,is shanivar main prasun & roma ko estate dikhane le ja rahi

hu.main chahti hu ki tum bhi humare sath aao."

"par..-"

"par-var kuchh nahi.tumhe kahi jana hai?"

"nahi."

"koi kaam hai?"

"nahi,magar..-"

to fir 3 baje ke baad ghar me hi baithe rahoge."

"ji."

"to us se achha hai huamre sath chalo."

"ma'am."

"inder,order nahi de rahi guzarish kar rahi hu,please.",1 pal ko

devika ke chehre pe uske dil ke asli bhav aa gaye the jinhe inder ki

paini nigaho ne padh liya tha.

"ma'am,aap to sharminda kar rahi hain.main zarur chalunga."

"thanx,inder."

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"roma..ye biscuit bhi rakh lo & ye Frooti bhi..ye vali bottle tumhari

hai & ye meri.",open top jeep ki pichhli seat pe baith rahi roma ko

prasun apna saman pakda raha tha.jeep bungle ke ahate me khadi thi.

"aur meri Frooti prasun?",inder ne prasun ko chheda.sab taiyyar hoke

aa gaye the magar devika abhi tak nahi aayi thi.

"vo bhi hai,inder bhaiyya.aapki is ice-box me hai & aapke liye chips

bhi laya hu.",prasun ki masum baato se roma & inder hans pade.pure

parivar me ye akela tha jis se chah ke bhi inder nafrat nahi kar paya

tha magar iske bavjood uske man me zara bhi shubaha nahi tha ki jab

waqt ayega to vo prasun ko mohra banane me zara bhi nahi

hichkichayega.

"sorry,meri vajah se sabko intezar karna pada na.",bungle se bahar

nikalti kamiz ke aastin ke button lagati devika ko dekh Inder ka munh

khula ka khula reh gaya.usne devika ko humesha sari me dekha tha.aaj

usne cream color ki kasi shirt & balue rang ki kasi pant jinhe riding

breeches kaha jata hai pehni thi.ye breeches ghudsawari ke wat pehni

jati hain.un breeches ke upar se usne bhure rang ke chamde ke

behtareen ghutno tak ke riding boots pehne the.

is kase libas me devika ke badan ke sabhi katav saaf jhalak rahe

the.uski chal me 1 kudrati loch tah jis se uski kamar qatilana andaz

me matakti thi.is waqt jab vo tezi se chalte hue inder ke paas aayi &

fir jeep ki agli seat pe baithi to inder uski kasi gand ki dil hi dil

me tareef kiye bina nahi reh saka.

"inder."

"ji."

"bura na mano to aaj tum hi jeep chalao."

"zarur ma'am.isme bura maanane ki kya baat hai!",inder seat pe baith

gaya & steering sambhal li.jeep tezi se bungle ke driveway se nikal

estate ke kheto ki or nikal padi.devika & inder aage baithe the & roma

& prasun peechhe.devika & prasun roma ko har jagah ke bare me bata

rahe the.

sabziyo ke kheto ke paas se guzarte hue vaha kaam kar rahe aadmiyo ne

unhe salam kiya & unme se 1 ne prasun ko taze kheere pakdaye.sabhi log

taze,rasile kheero ke zayke ka maza uthate hue aage badh gaye.estate

ke chhote se jungle ke raste pe daudti jeep ab vaha ki sabse khubsurat

jagah ki or badh rahi thi.

rasta thoda ubad-khabad tha & jhatka lagta to devika ki banh inder se

chhu jati.devika ko bahut achha lag raha tha & uska dil kar raha tha

ki ye asrta kabhi khatm hi na ho magar ye to namumkin baat thi & koi

10 minute baad vo log usi jhil ke paas pahunch gaye jaha kuchh din

pehle prasun ki shadi ke waqt inder ne kamini & viren ko 1 dusre ko

chumte dekha tha.

Jhil pe pahunchte hi Prasun jeep se utar ke pani ki taraf bhaga,uske

peechhe-2 uski biwi bhi gayi,"ab dekhna ye pani pe patthar

taraiyega.",Devika apne bete ko chapte patthar dhondate dekh

muskurayi.

"ye to bada mazedar khel hai.main bhi jata hu.",Inder driving seat se

utara & un dono ke paas pahunch gaya.teeno pani pe chapte patthar fenk

ke ye dekhne lage ki kiska patthar der tak pani pe uchhalta hai.devika

jeep se utar uske bonnet pe baith gayi.inder ne apni kamiz ki aasteene

mod li thi & uske mazbut bazu saaf dikh rahe the.devika ke dil me

kasak si uthi....aakhir kitna intezar karna padega use un bazuo me

qaid hone ke liye!

inder ke karib aane ke khayal ne use fir se uske bewafa aashiq ki yaad

dila di & uske chehre pe udasi ki parchhayi aa gayi..kahi vo inder ke

karib aake vohi galti to nahi dohrayegi?....shiva bhi uska deewana tha

& itna use yakin tha ki usne shuru me use sachhe dil se chaha tha

magar na jane kab vo chahat paiso ke aage phiki pad gayi....kahi inder

bhi use aage jake dhokha to nahi dega?....lekin inder ko to uska

khayal hi nahi hai..shiva uski khubsurti ka kayal tha,ye baat devika

ko uske ishq ke izhar ke pehle se pata thi,usne kayi baar use khud ko

dekhte paya tha magar inder ke liye vo bas uski malkin thi & kuchh

nahi....is baar to baat ulti thi,vo inder ke karib aana chahti

thi....vaise bhi use inder se ishq nahi hua tha....vo uski imandari &

achhai ki kayal thi magar ishq...nahi!

ishq,pyar kitabi baate hoti hain & vahi achhi lagti hain.ye baat to vo

zindagi me bahut pehle samajh chuki thi.abhi bhi inder use achha laga

tha magar uske dil se zyada uske badan ko us gathile naujawan ki

zarurat thi.use nahi pata tha ki kal kya hone wala hai..ho sakta hai

inder jaisa aaj hai vaisa hi kal bhi rahe & ho sakta hai vo badal jaye

jaise shiva badla tha....magar vo ye khatra uthane ko taiyyar

thi.inder ke karib use jana hi tha aage kya hoga vo sambhal legi..itni

bevkuf nahi thi vo ki baar-2 1 hi galti kare.is baar vo apne ashiq pe

aankh mund ke bharosa nahi karegi magar pehle vo uska aashiq bane to!

teeno vapas aa rahe the,"ab kaha chalna hai,ma'am?"

"ab teele pe chalte hain,inder bhaiyya.",deika ke bolne se pehle hi

prasun bol utha.

"haan,vahi chalte hai nahi to andhera ho jayega.",charo 1 baar fir

jeep me baith gaye & 1 bar fir devika ki banh inder ki banh se chhu

use mast karne lagi.estate me jo sabse oonchi jagah thi use hi teela

kehte the.uske uapr jane ka rasta Suren ji ne hi banwaya tha.vaha

kuchh nahi tha bas kuchh pedo ke siwa magar vaha se puri estate dikhti

thi & vo nazara bada hi dilksah hota tha.jab prasun chhota tha to

suren ji biwi & bete ko aksar vaha picnic manane le jate the.

1 baar prasun sath gaye naukar ke sath teele se neeche utar aas-paas

ke paudho se phool ikatha karne laga tha.us roz devika ne skirt pehni

thi & kuch zyada hi khubsurat lag rahi thi.prasun ke jate hi suren ji

ko mauka mil gaya & unhone apni haseen biwi ko god me uthaya & pedo ke

jhurmut ke beech le jake use chod diya tha.devika ko aaj bhi vo

dopahar yaad thi.jeep teele ke upar khadi thi & uske bete-bahu jeep se

neeche utar ke vaha se estate ko dekh rahe the.

devika pati ke sath bitaye hasin lamho ki yaad me khoyi jeep ki

pichhli seat pe aa gayi thi & khadi ho jeep ki rail pakad ke bete-bahu

ko dekh rahi thi.us roz suren ji kuch zyada hi josh me the & devika

bhi unke lund se 2-3 baar jhad gayi thi.un mast palo ki yaad ne devika

ke jism me aag laga di & usne bechain ho apni bhari janghe aapas me

halke se ragdi & apna dhyan hatane ke liye bete-bahu ke paas jane ki

garaj se jeep se utarne ko ghumi & vaha baithe inder ke ghutno se

takra ke girne lagi.

use pata hi nahi chala tha ki inder kab aake baith gaya tha.inder ne

use girne se roka & apni baaho me sambhala & vo sambhalte hue uski god

me gir gayi.inder ki bayi banh uski kamar ke gird thi & dayi uski bayi

banh pe.dono ke chehre 1 dusre ke bilkul karib the & dono 1 dusre ki

sanso ko mehsus kar rahe the.inder ki nazre devika ke chehre se neeche

hui & uski shirt ke gale me se jhalak rahe uske cleavage pe gayi & fir

vapas uske chehre pe jispe devika ke jism ki pyas saaf dikh rahi

thi.devika ko apni gand ke neeche daba inder ka kulbulata lund mehsus

ho raha tha....kitna karib tha uska lund uski pyasi chut

ke..uff!devika ko aaj yakin ho gaya tha ki inder ka lund bahut bada

hai.uska dil betab ho utha tha us lund se khelne ke liye magar abhi

uska waqt nahi tha.

inder ke seene pe & jeep ki aage ki seat pe hath rakh vo uthi & jeep

se utar gayi.sham dhal chuki thi & suraj ab dubne hi wala tha.us

narangi suraj ki roshni me estate ka nazara aur bhi dilkash lag raha

tha.neeche ke khetos e lautate kisan & mazdoor dikh rahe the.door

bungla bhi dikh raha tha & baki imaraten bhi magar jo nahi dikh raha

tha vo tha quarters se bungle ko jane ke raste ke kinare badni jhadiyo

se kuchh duri pe pedo ke jhurmut ke beech kuchh dhoondata hua 1 aadmi.

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bahut achha hua ki unlogo ne us shakhs ko nahi dekha.devika ko pata

nahi tha ki kuchh hi din baad uski zindagi me bahut bada toofan aane

wala hai & us toofan se ladne ka madda jis shakhs me tha vo agar aaj

pakda jata to fir devika ko koi bhi nahi bacha sakta tha.

vo pedo ke beech kuch dhoondata hua shakhs shiva tha.apni mehbooba ki

berukhi se dukhi ho vo estate se chala gaya tha magar uski fikr &

inder se badla lene ki chah use fir se yaha le aayi thi.vo estate ke

chappe-2 se wakif tha & sabki nazar bachake ghusna uske baye hath ka

khel tha.inder ke bare me sochte hue use suren ji ke maut ke agle roz

ka vakya yaad aaya tha jab inder ne vaha kuchh fenka tha.usne dusre hi

din aake dhonda tha magar kuchh nahi mila tha lekin usne 1 aakhiri

koshish karne ki sochi thi.pata nahi kyu use baar-2 aisa lag raha tha

ki vo chiz 1 bahut aham surag thi inder ke khilaf & aaj use zarur

milegi.

uska dimagh kehta tha ki ye bevkufi thi,itne dino pehle fenki gayi

chiz aaj milne se rahi magar uska dil kehta tha ki use vo chiz zarur

milegi & bas apne dil ki aavaz ko sunta vo vaha juta tha.

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ghodo ke stud farm ke ahate me jali aag ke paas baithe charo batten

kar rahe the.puri estate ka chakkar lagake jab 8 baje vo vaha pahunche

to prasun ne zid ki yaha aag jalake picnic manayi jaye jaise uske papa

karte the & raat ko bhi yahi farm pe ruka jaye.suren ji kabhi America

gaye the & vaha ke Texas rajya me koi stud farm dekha tha.unhone apna

farm bilkul usi american farm ki nakal me banaya tha.ghodo ke astabal

se thoda hat ke lakdi ki domanzila imarat thi jisme vaha kaam karne

valo ke kamre the.kabhi-kabhar vo yaha aram ke kuchh pal bitane aa

jaya krte the.aaj prasun ki farmasih pe sab vahi ruk gaye the.

stud farm ki upari manzil pe 2 kamre khali the,vaha ke caretaker ne 1

kamra Prasun & Roma ke liye & dusra devika ke liye thik kar diya

tha.nichli manzil pe 1 kamra khali tha jo usne inder ke liye thik kar

diya tha.inder to vaha rukna nahi chah raha tha ya yu kaha jaye ki na

rukna chahne ka natak kar raha tha magar sabhi ke israr ke aage use

jhukna hi pada.devika ne farm se 1 ladke ko bungle bhej diya tha jaha

uski naukrani ne sabhi ke liye raat ke kapde bhej diye the.

kafi der tak charo baate karte rahe.kayi din baad devika ko bhi itna

halka mehsus ho raha tha.10 baje ke baad prasun jamhai lene laga to

devika ne use & roma ko sone jane ke liye kaha magar vo inder ke sath

vahi baithi baate karti rahi,"inder,1 personal sawal puchhu to bura to

nahi manoge?"

"personal sawal?"

"haan."

"puchhiye.ab boss ki baat ka bura maan ke mujhe naukri khatre me thode

dalni hai!",dono hans pade.

"tumne abhi tak shadi kyu nahi ki?"

"kabhi mauka hi nahi mila."

"aisa kaise ho sakta hai?"

"aap to janti hi hain ki main anath hu to koi maa-baap to the nahi

joki ye kaam karwate & main.",inder fiki si hansi hansa,"..main apnme

pairo pe khada hone ke chakkar me laga raha.us jaddojahad me mujhe

kabhi ye khayal hi nahi aaya ki shadi bhi karni hai & ma'am..",usne

devika ki aankho me dekha,"..ab to zarurat mehsus bhi nahi hoti.mujhe

akelapan raas aane laga hai shayad."

"ye vaham hai tumhara.fikr mat karo jab koi ladki milegi to zarurat

bhi mehsus hogi & akelapan bhi bekar lagega.",devika uth ke khadi ho

gayi,"ab chalti hu.good night,inder."

"ma'am..",stud farm ka caretaker uske kamre me khada tha,"..aur kisi

chiz ki zarurat nahi hai na aapko?"

"nahi.tum kaha soyoge?"

"main to astabal ke upar vale kamro me se kisi 1 me.2-4 aur workers

bhi vahi sote hain."

"thik hai.manager sahab ke kamre me sab zarurat ka saman rakh diya na?"

"ji,ma'am.bas machhardani nahi rakhi hai kyuki 2 hi thi so 1 aapko & 1

bhaiya ko di hai."

"achha.",caretaker ke jaet hi devika ne bati bujhayi & machhardani

utha apne bistar me ghus gayi.thodi hi der me raat ka sannata chha

gaya.astabal ki taraf se bhi koi aavaz nahi aa rahi thi & baki kamro

se bhi nahi.neeche inder jaga hoga ye devika ko malum tha.stud farm pe

is waqt machharo ka humla hota tha & vo kisi bhi cream ya repellent se

nahi bhagte the.ghodo ko unse bachane ke liye 1 repellent istemal hota

tha magar uski badbu aisi thi ki insan use istemal nahi kar pate the &

machhardani ke alawa koi aur upay nahi tha un khoon ke pyase keedo se

bachne ka.

devika janti thi ki inder ka un machharo ne kaat-2 ke bura hala kar

diya hoga.vo apne bistar se utari & uske kamre ki or badh gayi.usne

bilkul thik socha tha inder apne bistar pe baitha machhar maar raha

tha,"pareshan ho gaye na?"

devika ki aavaz sun vo chaunk pada & darwaze me khadi devika ko dekh

vo sab bhul gaya.devika ne aaj pure bazuo ki kali nighty pehni thi

joki uske seene pe bilkul kasi thi & uske neeche se dhili thi.nighty

ka gala thoda bada tha & devika ki badi chhatiyo ka hissa us se jhalak

raha tha.

"ha..haan..bahut amchhar hain."

"hun.",devika muskurayi,"..mere sath aao.",inder uske peechhe-2 chal

pada.devika use apne kamre me le aayi.

"yaha so jao."

"ji..magar aap."

"main bhi yahi soyungi.",devika ka dil bahut zor se dhadak raha tha.

"ma'am..ye kaise ho sakta hai?",inder ghabraya hua lag raha tha.

"inder,bistar bahut bada hai & machhardani 1 hi hai.ab agar sona

chahte ho to rasta 1 hi hai ki tum & main ye bistar share kar len."

"nahi,ma'am.main aisa nahi kar sakta.ye thik nahi lagta."

"inder,tum kis baat se ghabra rahe ho?tumhe mujhpe bharosa nahi ye khud pe?"

"ma'am..samajhne ki koshish kijiye.baat vo nahi hai.log.."

"achha.log!tum uski fikr mat karo.koi kuchh nahi bolega.chalo soyo ab

mujhe bhi nind aa rahi hai.",inder ne kafi natak kar liya tha & ab vo

beman sa bistar me ghus gaya.dusri taraf se devika bhi batti bujha ke

bistar pe aa gayi.inder uski taraf pith karke leta tha.devika dil to

kar raha tha ki vo use ghuma uske uapr tut pade magar usne apne

jazbato pe kabu rakha.inder janta tha ki bas 1 hath badhane ki der

hai,devika apni tange khol uska istekbal karegi magar nahi vo aisa

kuchh nahi karega.

tabhi dusre kamre se roma ki chikh sunai di & dono uth baithe,"ye kya tha?!"

inder bistar se utarne hi wala tha ki agli aavaz se dono ko sara majra

samajh aa gaya,"aahhh...aaiyyeee..aaram se prasun....oohhhh..itna

andar nahi...haiiii....!",devika ke gaal sharm se laal ho gaye,uski

bahu uske bete se chud rahi thi.uski himmat nahi hui ki vo inder ki or

dekhe & vo let gayi.

roma ki masti bhari aaho ne inder ke azm ko bhi hila diya tha.uska dil

to kiya ki devika ko baaho me bhar uske halak se bhi aisi hi aavaza

nikalwaye magar tabhi uske dimagh ne use hidayat di..agar us kamre se

aavaz is kamre tak aa sakti hai to is kamre se us kamre kyu nahi ja

sakti!

usne apne dil pe kabu rakha & let gaya.prasun apni biwi ki chut me

ungli ghusa raha tha & usi ke zyada andar jane se vo karah uthi

thi.roma bistar pe padi uske lund ko hila rahi thi.pehle prasun ko

ajib lagta tha ki vo uska lund pakadti hai magar ab use intezar rehta

tha ki kab roma apne mulayam hatho me uske lund ko

hilati,"ooww....!",kroma kamar uchkati jhad rahi thi.prasun ko bahut

achha lagta jab uski biwi aisi harkat karti.us waqt uske chehre pe jo

dard jaise bhav aate the vo use ajib lagte magar iske baad vo use

bahut pyar karti thi.

Abhi bhi kuchh aisa hi hua tha,Roma ne use apne upar khicnh liya & use

betahasha chumne lagi,"..ohh..my darling...prasun..i love you...!"

ye sari aavaze dusre kamre me soye Devika & Inder ke kano me bhi pad

rahi thi.devika inder ki or munh kar bayi karwat pe soyi thi jabki

iner bilkul seedha leta tha.devika ki nighty me 1 slit tha & is waqt

jab uska pura dhyan apni bahu ki mastani aaho pe tha use ye hosh hi na

raha ki uski slit joki jangh tak aati thi,usme se uski dayi jangh &

gori tang puri numaya ho rahi hai.

kamre me andhera tha & devika ko laga ki inder so gaya hai....kuchh

zyada hi sharif tha vo to!devika ko laga ki ab use hi kuchh karna

padega.usne nind me hone ka natak kar apna daya hath inder ki bayi

banh pe rakh diya.use laga ki ab vo zarur kuchh karega.

"oww.....haan....aur..andar..prasun..pura

ghusao...oohhhhhhh.....darlingggggg...haaaiiiiiiii..!",saaf zahir tha

ki prasun ab apna lund roma ki chut me ghusa raha tha.inder ka haal

bura tha magar usne apnme badle ko yad kiya & apne jazbato ko

sambhalte hue karwat li.aisa karne se devika ka hath uski banh se hat

gayi.

devika ko bahut bura laga..koi ladki bhi nahi thi iski zindagi me fir

ye kyu bhag raha tha us se?..kahi gay to nahi?devika ko hansi aa

gayi.dusre kamre me prasun biwi ke upar sawa uski chudai me laga

tabadtod dhakke laga raha tha.roma ke maze ki to koi seema hi nahi

thi!

"aahhhhhhh....!",lambi aah se devika ko pata chal gaya ki roma jhad

chuki hai.usne nighty ki slit ko & upar kar usme apna hath ghusaya &

apni ungli se apni chut ko shant karne lagi.thodi der ki khamoshi ke

baad 1 baar fir uski bahu ki mastani aahe use pareshan karne lagi

thi.uski ungli tezi se chut me ghum rahi thi.vo inder ka khayal kar

apni chut maar rahi thi & is sab se beparwah inder uski or pith kiye

so raha tha.

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kramashah.........
 
गतान्क से आगे...

सवेरे देविका की नींद खुली तो उसने देखा की वो बिस्तर पे अकेली है.उसने

सोचा तो उसे ख़याल आया की रात वो कब सोई उसे याद ही नही था.वो उठी तो

उसने देखा की उसकी नाइटी की स्लिट उसकी कमर तक उठी थी & उसकी दाई टांग &

जाँघ कमर तक नुमाया थी.ये सोच के इंदर ने उसे ऐसे देखा होगा शर्म & खुशी

की मिली-जुली लहर उसके दिल मे दौड़ गयी.

वो कपड़े बदल बाहर आई,अब घर वापस जाने का वक़्त हो गया था.शुरू मे इंदर &

वो 1 दूसरे से नज़रे नही मिला पा रहे थे मगर थोड़ी देर बाद दोनो सहज हो

गये थे & साथ-2 बंगल पे लौट गये.

"मॅ'म,कल हमे पंचमहल जाना है.आपको याद है ना?"

"हां,इंदर.11 बजे तक चलेंगे."

"ओके,मॅ'म.",देविका बंगल के अंदर आई & कल के कपड़े धोने के लिए नौकरानी

को देने लगी.इंदर के लिए उसने प्रसून का ही नाइटसूट मंगवा दिया था & बॅग

से निकाल नौकरानी को देते हुए उसका ध्यान सूट के पाजामे पे गया जिसके

सामने 1 बड़ा सा धब्बा बना हुआ था.देविका ने धब्बे को गौर से देखा & फिर

उसे सब समझ आ गया..तो जनाब गे नही हैं!..& रात रोमा की आहो ने उनका हाल

भी बुरा कर दिया था.उसकी तरह इंदर ने भी अपने हाथ से काम चलाया था....तो

उसने उसे क्यू नही पुकारा?..वो भी तो उसी के जैसे तड़प रही थी....क्या

अच्छी नही लगती मैं उसको?..देविका नौकरानी के जाने के बाद बाथरूम मे खड़ी

अपने नंगे जिस्म को शीशे मे निहार रही थी..ऐसा तो नही था..कल जीप मे जब

उसकी गोद मे गिरी थी उस वक़्त उसकी आँखो मे उसने अपने हुस्न की तारीफ &

उसके जिस्म की करीबी से पैदा हुई बेताबी सॉफ देखी थी....उसकी शराफ़त की

कायल हो गयी वो....उस वक़्त जब दुनिया का कोई भी मर्द बड़ी आसानी से

कमज़ोर हो जाता & उसे अपनी बाहो मे खींच लेता उस वक़्त भी इंदर ने अपनी

मर्यादा नही भूली थी.अब देविका को उसके करीब जाने का ख़याल और भी महफूज़

लगने लगा.

"ओह..इंदर..थोड़े तो बदमाश बनो!!",देविका बत्टूब मे बैठ गयी.इन ख़यालो से

उसका जिस्म फिर से दुखने लगा था.उसने बाया हाथ उसके सीने पे उसकी बाई

चूची को सहलाने लगा मानो दिल को समझा रहा हो & दाया उसकी चूत के दाने

पे.1 बार फिर देविका इंदर को सोच अपने जिस्म से खेलने लगी.

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सब्ज़ियो से लदे ट्रक मे मज़दूर के कपड़े पहने शिवा एस्टेट से बाहर जा

रहा था.रात वो चोरी से बंगल मे घुसा था,उसका इरादा था बस 1 बार अपनी

जान,अपनी महबूबा किए हसीन चेहरे का दीदार करने का मगर वो वाहा नही थी.उसे

मलाल था इस बात का मगर 1 बात की खुशी भी थी.उसका दिल उसके दिमाग़ से जीत

गया था.उसने अपने कुर्ते की जेब टटोली,वो चीज़ जो इंदर ने फेंकी थी उसने

ढूंड निकाली थी.वो नारंगी रंग की डिबिया जिसका रंग & जिसकी लिखावट बारिश

& धूप सहते-2 थोड़ा धुंधले पड़ गये थे मगर जिनके अंदर की दवा हैरत्नगेज़

रूप से अभी भी महफूज़ थी.शिवा की समझ मे इंदर की चाल आ गयी थी & अब उसका

इंदर से बदले का इरादा और भी पुख़्ता हो गया था.

"मॅ'म,बहुत देर हो गयी है.मुझे नही लगता इतनी रात गये एस्टेट वापस लौटना

सेफ होगा.रास्ता लंबा & सुनसान है.",पंचमहल मे अपने कस्टमर्स से मीटिंग

करते हुए कब रात के 11 बज गये इंदर & देविका को पता भी नही चला.जब इंदर

ने अपनी घड़ी पे नज़र डाली तब उसे होश आया.

"तुम्हारी बात तो ठीक है,इंदर."

"तो आज रात किसी होटेल मे कमरे ले लेते हैं.कल सवेरे-2 निकल

पड़ेंगे.",इंदर ने देविका के लिए वार का दरवाज़ा खोला.

"होटेल की क्या ज़रूरत है,हमारा बुंगला है यहा.वही चलो.",इंदर ड्राइविंग

सीट पे बैठ गया था & चाभी इग्निशन मे डाल रहा था.

"ठीक है.रास्ता बताइए."

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"वीरेन,मुझे शिवा की 1 तस्वीर & कुच्छ डीटेल्स चाहिए होंगे जैसे उसने

एस्टेट कब जाय्न की थी,उसके पहले कहा था वग़ैरह-2.",रेस्टोरेंट मे बैठी

कामिनी ने वाहा की स्पेशल बिरयानी का 1 नीवाला चम्चे से अपने मुँह के

हवाले किया.

"हूँ..बिरयानी लाजवाब है!",वीरेन ने जैसे उसकी बात सुनी ही नही थी.

"वीरेन!",कामिनी ने अपना चमचा नीचे रखा & वीरेन की ओर गुस्से से देखा.

"सुन लिया बाबा!",वीरेन ने जल्दी से नीवाला निगला,"..मगर इसके लिए तो

देविका से बात करनी पड़ेगी.1 काम करते हैं,इस वीकेंड एस्टेट चलते

हैं.रोमा भी बार-2 फोन करती रहती है की वाहा जाके प्रसून को कुच्छ

पैंटिंग सिखाऊँ."

"ठीक है.",कामिनी के चेहरे पे अभी भी हल्के गुस्से की झलक थी.

"क्या जान!",वीरेन ने अपना चमचा नीचे रख मेज़ पे रखे कामिनी के हाथ पे

अपना हाथ रखा,"..पहले तो इतनी बढ़िया बिरयानी खिलाने ले आती हो & उसके

ज़ायके मे जब डूब जाता हू तो काम की बात छेड़ देती हो.अब तुम्हारी बात

ठीक से नही सुनी इसके लिए मुझसे क्यू इस बिरयानी से खफा हो ना!मत खाओ

इसे!",वीरेन की बात पे कामिनी को हँसी आ गयी & रहा-सहा गुस्सा भी काफूर

हो गया.

"मैं बस इतना कह रही हू,वीरेन की प्लीज़ होशियार रहो.जब तक शिवा हमे नही

मिल जाता समझो ख़तरा बना हुआ है.",कितनी ग़लत थी कामिनी!उस बेचारी को

क्या पता था की शिवा सहाय परिवार का बुरा नही चाहता था बल्कि उस से

ज़्यादा बड़ा परिवार का शुभचिंतक तो शायद कोई था ही नही.

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क्रमशः.................
 
बदला पार्ट--36

गतान्क से आगे...

savere devika ki nind khuli to usne dekha ki vo bistar pe akeli

hai.usne socha to use khayal aaya ki raat vo kab soyi use yaad hi nahi

tha.vo uthi to usne dekha ki uski nighty ki slit uski kamar tak uthi

thi & uski dayi tang & jangh kamar tak numaya thi.ye soch ke inder ne

use aise dekha hoga sharm & khushi ki mili-juli lehar uske dil me daud

gayi.

vo kapde badal bahar aayi,ab ghar vapas jane ka waqt ho gaya tha.shuru

me inder & vo 1 dusre se nazre nahi mila pa rahe the magar thodi der

baad dono sahaj ho gaye the & sath-2 bungle pe laut gaye.

"ma'am,kal hume Panchmahal jana hai.aapko yaad hai na?"

"haan,inder.11 baje tak chalenge."

"ok,ma'am.",devika bungle ke andar aayi & kal ke kapde dhone ke liye

naukrani ko dene lagi.inder ke liye usne Prasun ka hi nightsuit mangwa

diya tha & bag se nikal naukrani ko dete hue uska dhyan suit ke pajame

pe gaya jiske samne 1 bada sa dhabba bana hua tha.devika ne dhabbe ko

gaur se dekha & fir use sab samajh aa gaya..to janab gay nahi hain!..&

raat Roma ki aaho ne unka haal bhi bura kar diya tha.uski tarah inder

ne bhi apne hath se kaam chalaya tha....to usne use kyu nahi

pukara?..vo bhi to usi ke jaise tadap rahi thi....kya achhi nahi lagti

main usko?..devika naukarani ke jane ke baad bathroom me khadi apne

nange jism ko sheeshe me nihar rahi thi..aisa to nahi tha..kal jeep me

jab uski god me giri thi us waqt uski aankho me usne apne husn ki

tarif & uske jism ki karibi se paida hui betabi saaf dekhi thi....uski

sharafat ki kayal ho gayi vo....us waqt jab duniya ka koi bhi mard

badi asani se kamzor ho jata & use apni baaho me khinch leta us waqt

bhi inder ne apni maryada nahi bhuli thi.ab devika ko uske karib jane

ka khayal aur bhi mehfuz lagne laga.

"oh..inder..thode to badmash bano!!",devika bathtub me baith gayi.in

khayalo se uska jism fir se dukhne laga tha.usne baya hath uske seene

pe uski bayi choochi ko sehlane laga mano dil ko samjha raha ho & daya

uski chut ke dane pe.1 baar fir devika inder ko soch apne jism se

khelne lagi.

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sabziyo se lade truck me mazdoor ke kapde pehne shiva estate se bahar

ja raha tha.raat vo chori se bungle me ghusa tha,uska irada tha bas 1

baar apni jaan,apni mehbooba kie haseen chehre ka deedar karne ka

magar vo vaha nahi thi.use malal tha is baat ka magar 1 baat ki khushi

bhi thi.uska dil uske dimagh se jeet gaya tha.usne apne kurte ki jeb

tatoli,vo chiz jo inder ne fenki thi usne dhoond nikali thi.vo narangi

rang ki dibiya jiska rang & jiski likhawat barish & dhoop sehte-2

thoda dhundhle pad gaye the magar jinek andar ki dawa hairatnagez roop

se abhi bhi mehfuz thi.shiva ki samajh me inder ki chaal aa gayi thi &

ab uska inder se badle ka irada aur bhi pukhta ho gaya tha.

"Ma'am,bahut der ho gayi hai.mujhe nahi lagta itni raat gaye estate

vapas lautna safe hoga.rasta lamba & sunsan hai.",Panchmahal me apne

customers se meeting karte hue kab raat ke 11 baj gaye Inder & Devika

ko pata bhi nahi chala.jab inder ne apni ghadi pe nazar dali tab use

hosh aya.

"tumhari baat to thik hai,inder."

"to aaj raat kisi hotel me kamre le lete hain.kal savere-2 nikal

padenge.",inder ne devika ke liye var ka darwaza khola.

"hotel ki kya zarurat hai,humara bungla hai yaha.vahi chalo.",inder

driving seat pe baith gaya tha & chabhi ignition me daal raha tha.

"thik hai.rasta bataiye."

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"Viren,mujhe Shiva ki 1 tasvir & kuchh details chahiye honge jaise

usne estate kab join ki thi,uske pehle kaha tha

vagairah-2.",restaurant me baithi Kamini ne vaha ki special biryani ka

1 nivala chamche se apne munh ke havale kiya.

"hun..biryani lajawab hai!",viren ne jaise uski baat suni hi nahi thi.

"viren!",kamini ne apna chamcha neeche rakha & viren ki or gusse se dekha.

"sun liya baba!",viren ne jaldi se nivala nigla,"..magar iske liye to

devika se baat karni padegi.1 kaam karte hain,is weekend estate chalte

hain.Roma bhi baar-2 fone karti rehti hai ki vaha jake Prasun ko kuchh

painting sikhaoon."

"thik hai.",kamini ke chehre pe abhi bhi halke gusse ki jhalak thi.

"kya jaan!",viren ne apna chamcha neeche rakh mez pe rakhe kamini ke

hath pe apna hath rakha,"..pehle to itni badhiya biryani khilane le

aati ho & uske zayke me jab doob jata hu to kaam ki baat chhed deti

ho.ab tumhari baat thik se nahi suni iske liye mujhse kyu is biryani

se khafa ho na!mat khao ise!",viren ki baat pe kamini ko hansi aa gayi

& raha-saha gussa bhi kafur ho gaya.

"main bas itna keh rahi hu,viren ki please hoshiyar raho.jab tak shiva

hume nahi mil jata samjho khatra bana hua hai.",kitni galat thi

kamini!us bechari ko kya pata tha ki shiva Sahay parivar ka bura nahi

chahta tha balki us se zyada bada parivar ka shubhchintak to shayad

koi tha hi nahi.

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kramashah.................
 
गतान्क से आगे...

"मन्नू,कैसे हो भाई?",देविका ने बंगल के रखवाले के सलाम का जवाब दिया.

"बढ़िया हू,मालकिन.आप अचानक कैसे आ गयी?",उसने बंगल के अंदर जाने का

दरवाज़ा खोला,"..आपलोग यहा हॉल मे बैठिए तब तक मैं आपका कमरा & गेस्ट रूम

सॉफ करवाता हू.",मन्नू ने बगल के बंगल से अपने 1 दोस्त को मदद के लिए

बुलाया & दोनो कमरो की सफाई मे लग गये.

"यहा सब ठीक है ना,मन्नू?तुम्हे किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही?",उपरी

मंज़िल पे बने दोनो कमरो की सफाई मे लगे नौकर से देविका ने पुचछा.

"नही,मालकिन.हमे तो कोई चीज़ की ज़रूरत नही लेकिन कल अपना जेनरेटर खराब

हो गया उसे ठीक करवा दीजिएगा."

"तुमने एस्टेट मे खबर नही की?"

"नही,मालकिन.सोचा था की आज करूँगा पर भूल गया.अभी आपको देखा तो याद

आया.",कमरो की सफाई हो गयी थी,देविका & इंदर खाना तो ख़ाके आए थे तो

मन्नू ने दोनो के कमरो मे पीने का पानी & 1-1 मोमबत्ती रख दी.

"और कुच्छ तो नही चाहिए,मालकिन?"

"नही,मन्नू.तुम जाके सो जाओ."

"ठीक है,मालकिन.आप दरवाज़ा अंदर से बंद कर लीजिए.सवेरे वही 8 बजे आऊँ

ना?",मन्नू पुराना नौकर था & देविका की रोज़मर्रा की आदतो से अच्छे से

वाकिफ़ था.

"हां,मन्नू.",देविका ने बंगल का मैं दरवाज़ा बंद किया & फिर सीढ़िया चढ़

उपर आने लगी की बत्ती चली गयी.घुप अंधेरे मे देविका को कुच्छ भी नही सूझ

रहा था.

"इंदर..इंदर..",सीढ़ियो के उपर पहुँच उसने इंदर को आवाज़ दी जोकि

मोमबत्ती ढूढ़ने मे लगा था.

"आया मॅ'म.",इंदर कमरे से निकला & देविका की आवाज़ की ओर बढ़ा & अपनी ओर

आती देविका से टकरा गया.देविका गिरने लगी तो इंदर ने उसे बाहो मे संभाल

लिया.ठीक उसी वक़्त कोई जानवर उनके बगल से कूद के भागा.

"ऊओवव!",देविका डर से चीखी & इंदर से चिपक गयी.इंदर ने उस बाँहो मे भरा &

उस भागते जानवर को देखा जो देविका के कमरे की बाल्कनी के खुले दरवाज़े से

कूद के भाग रहा था-वो 1 छ्होटी सी बिल्ली थी.

"बस बिल्ली थी,भाग गयी.",इंदर की बाहे देविका की पीठ को घेरे थी.दोनो का

कद लगभग 1 सा था & देविका सर झुका के उसके सीने मे मुँह च्छुपाया हुआ

था.उसने अपनी बाहे इंदर की कमर पे कसी हुई थी.इस तरह से सटे होने के कारण

देविका अपनी चूत पे इंदर का लंड-जोकि धीरे-2 तन रहा था,उसका दबाव सॉफ

महसूस कर रही थी.स्टड फार्म की रात के बाद इंदर को पूरा यकीन हो गया था

की देविका उसके करीब आना चाहती थी.आज बिल्कुल सही मौका था उसकी हसरत पूरी

करने का,अगर आज उसने ये शुभ काम नही किया तो हो सकता है देविका ये समझे

की उसे उसमे कोई दिलचस्पी नही & पीछे हट जाए.

देविका अभी भी इंदर से चिपकी हुई थी.वो चाहती थी की इंदर पहल करे & उसे

अपने से अलग करे मगर उसे क्या पता था की शातिर इंदर भी आज उसी के जैसे

ख़याल अपने दिल मे संजो रहा था.इंदर ने अपनी बाहो का दबाव थोड़ा बढ़ा

दिया जिसे महसूस करते ही देविका की आह निकल गयी & उसने अपना सर उसके सीने

से उठा दिया.

अब दोनो की आँखे अंधेरे की आदि हो गयी थी & 1 दूसरे के चेहरे को देख पा

रही थी.दोनो इस वक़्त देविका के कमरे के ठीक बाहर खड़े थे.जैसे ही देविका

ने सर उठाया इंदर ने अपने होंठ उसके होंठो से लगा दिए.देविका ने सोचा भी

नही था की इंदर ऐसा करेगा.उसे बड़ा सुखद आश्चर्या हुआ.

इंदर उसके गुलाबी होंठो को चूमे जा रहा था.देविका की खुशी का तो ठिकाना

ही नही था.उसकी बाहे भी इंदर की कमर पे और कस गयी.थोड़ी देर बाद इंदर ने

अपनी ज़ुबान को देविका के होंठो के पार उसके मुँह मे घुसाने की कोशिश

की.देविका के बदन मे आग लगी थी & इंदर की इस मस्तानी हरकत ने उस आग को और

भड़का दिया.दिल मे अरमानो का ऐसा सैलाब उमड़ा पड़ा था जोकि देविका से

संभाला नही गया & उसने बेचैन हो अपने होंठ इंदर के होंठो से अलग कर दिए &

अपना चेहरा दाई तरफ घुमा लिया.इंदर के तपते होंठ उसके बाए गाल से आ

लगे.चूमते-2 इंदर उसके दाए गॉल पे पहुँचा & मजबूरन देविका को अब अपना

चेहरा बाई ओर घुमाना पड़ा.

इंदर की किस्सस उसे बहुत प्यारी लग रही थी.लग रहा था जैसे हल्की बारिश की

फुहारे उसके प्यासे बदन को भिगो उसे सुकून पहुँचा रही थी.1 बार फिर इंदर

के होंठ देविका के खूबसूरत चेहरे पे घूमने के बाद उसके होंठो से आ

लगे.देविका समझ गयी की थी की इंदर के अंदर भी उसी के जैसे आग भड़क रही

है.ये ख़याल आते ही उसके चूमने की शिद्दत बढ़ गयी & इस बार जब इंदर ने

उसकी ज़ुबान को अपनी ज़ुबान से तलाशा तो देविका ने बड़ी गर्मजोशी से दोनो

का मिलन करवाया.

चूमते हुए इंदर के हाथ उसकी पीठ से उसकी नंगी कमर पे आ गये थे & देविका

के हाथ उसकी गर्दन के गिर्द.दोनो पागलो की तरह 1 दूसरे को चूमे जा रहे

थे.अपनी बाहो मे भर इंदर देविका को उसके कमरे के अंदर ले आया.बड़ी देर तक

दोनो 1 दूसरे को चूमते रहे.थोड़ी-2 देर पे सांस लेने के लिए दोनो के लब

अलग होते मगर फिर ऐसे जुड़ जाते जैसे की जुड़ा रहे तो ज़िंदा नही

रहेंगे.जी भर के चूमने के बाद इंदर के होंठ नीचे बढ़े & देविका की गोरी

गर्दन पे घूमने लगे.देविका मस्ती मे खो गयी थी.उसके चूत से पानी रिसना

शुरू हो गया था & वो इंदर के बालो मे बेचैनी से उंगलिया फिरा रही थी.
 
दोनो की जद्दोजहद मे देविका की सारी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर गया

था & अब इंदर उसके नुमाया हो चुके क्लीवेज पे लगा हुआ था.देविका की

चूचियो से मदहोश करने वाली खुश्बू आ रही थी & इंदर उसमे डूबा चला जा रहा

था.शिवा के जाने के बाद ये पहली बार था जब देविका का बदन किसी मर्द की

बाहो मे था & वो इस पल का भरपूर मज़ा उठा रही थी.इंदर उसके सीने से भी

नीचे जा रहा था.देविका अब अपने पीछे की दीवार से सॅट के खड़ी थी & इंदर

अपने घुटनो पे बैठा उसकी कमर को सहलाता उसके गोरे पेट को चूम रहा

था.देविका की सांस मानो अटकने लगी.इंदर की गर्म साँसे & तपते लब उसके पेट

को च्छू उसके दिल मे हुलचूल मचा रहे थे.इंदर का सर पकड़ उसने बेचैनी मे

उसे अपने पेट से लगा करना चाहा मगर इंदर ने उसकी अनसुनी करते हुए उसकी

नाभि मे अपनी जीभ घुसा दी & जल्दी-2 चलाने लगा.

देविका पागल हो गयी.उसका सर दीवार से सटे हुए उपर उठ गया.उसका बाया हाथ

उसके सर के उपर दीवार से लगा था & दाए से वो इंदर के बालो को पकड़े

थी.इंदर उसकी नाभि चाते जा रहा था.इंदर का मक़सद चाहे जो भी हो इस वक़्त

देविका के पूर्कशिष जिस्म का नशा उसके सर चढ़ के बोल रहा था & वो भी उस

हुसनपरी के साथ मस्ती के सागर की उन गहराइयो तक जाना चाहता था जहा वो

किसी & के साथ कभी जा नही पाया था.

इंदर की ज़ुबान देविका की गहरी नाभि से निकली & नाभि के नीचे & बँधी असरी

के उपर की कोमल जगह पे घूमने लगी.देविका इतनी मस्ती सहन नही कर पाई & फिर

बेचैन हो घूम गयी & दीवार को पकड़ अपना चेहरा च्छूपा लिया.इस से इंदर कहा

रुकने वाला था!उसने देविका की कमर की बगलो को पकड़ा & उन्हे हौले-2 दबाते

हुए उसकी कमर & निचली पीठ को चूमने लगा.देविका ने काले रंग का स्लीव्ले

ब्लाउस पहना था जोकि पीछे से काफ़ी खुला था.दिन भर तो वो सारी के आँचल को

अपने कंधो पे लपेटे रही थी तो इंदर को उसकी गुदाज़ बाँहो का दीदार नही

हुआ था मगर इस वक़्त पीछे से ऐसा लग रहा था की कमर के उपर देविका जैसे

नंगी ही हो.इंदर के गर्म हाथ उसकी कमर की बगलो पे उपर उसके ब्लाउस तक

जाते & फिर नीचे सारी तक आते.उसके होंठ उसकी कमर को दीवानो की तरह चूम

रहे थे.

देविका का बुरा हाल था.वो दीवार को पकड़े आहे भर रही थी & उसकी चूत मे

कसक उठ रही थी.वो बेचैनी मे अपनी जंघे आपस मे रगड़ रही थी.इंदर समझ गया

था की वो बहुत मस्त हो चुकी है & आज रात ये हसीन औरत उसे बहुत मज़ा देने

वाली है.वो चूमते हुए खड़ा हुआ & अब उसके होंठ ब्लाउस मे से दिख रही

देविका की उपरी पीठ पे थे.उसने अपने हाथ देविका के दीवार से लगे हाथो पे

रख दिए & अपनी उंगलियो को उसके उंगलियो मे पीछे से फँसा दिया.देविका के

जिस्म ने उसे पागल कर दिया था.चूमते हुए वो उसकी गर्दन पे आया & 1 बार

फिर उसके होंठ देविका के हसीन चेहरे से लग गये.

देविका ने अपना चेहरा दाई तरफ घुमाया तो 1 बार फिर इंदर ने अपने होंठ

उसके लरज़ते होंठो से लगा दिए.उसने देविका के दीवार पे लगे हाथो को वैसे

ही पकड़ा हुआ था.चूमते हुए उसके हाथ देविका के हाथो को छ्चोड़ उसकी कलाई

पे आए & फिर उसकी गोरी बहो पे.ऐसी गोरी & गुदाज़ बाहें इंदर ने अपनी

ज़िंदगी मे नही देखी थी.वो बस अपने उंगलियो के पोरो से उसको कोहनी से

लेके कंधे तक उन मस्त बाहो को सहलाए जा रहा था.अपने बदन की तारीफ देविका

को इंदर की हर हरकत मे दिख रही थी.उसे अपने हुस्न पे थोड़ा गुमान भी हुआ

& बहुत सारी खुशी भी & वो और शिद्दत के साथ अपने नये प्रेमी को चूमने

लगी.

थोड़ी देर तक इंदर के हाथ वैसे ही उसकी बाहो पे घूमते रहे फिर इंदर ने

अपने हाथ उसकी बाहो से उसके कंधे पे लाए & फिर उसकी पीठ की बगल से होते

हुए दोबारा उसकी कमर की बगल मे जा लगे.दोनो अभी भी वैसे ही 1 दूसरे को

चूम रहे थे.इंदर के हाथ उसकी कमर को सहलाते हुए आगे उसके पेट पे गये &

उसकी कमर मे अटकी सारी को खींच दिया.देविका के मुँह से आह निकली मगर इंदर

ने उसे चूमना नही छ्चोड़ा....अब वो नंगी हो रही थी..इंदर के सामने ..पहली

बार...देविका को इस ख़याल से शर्म आ गयी & उसके गालो मे मस्ती की लाली के

साथ शर्म का रंग भी घुल गया.इंदर के हाथो ने तेज़ी से सारी को निकाला &

फिर उसके पेटिकोट के बगल मे लगे हुक को भी खोल दिया.पेटिकोट अपनेआप ज़मीन

पे गिर गया मानो वो भी दोनो बेकरार जिस्मो के मिलन मे आड़े ना आना चाहता

हो.

क्रमशः..........
 
बदला पार्ट--37

गतान्क से आगे...

"Mannu,kaise ho bhai?",devika ne bungle ke rakhwale ke salam ka jawab diya.

"badhiya hu,malkin.aap achanak kaise aa gayi?",usne bungle ke andar

jane ka darwaza khola,"..aaplog yaha hall me baithiye tab tak main

aapka kamra & guest room saaf karwata hu.",mannu ne bagal ke bungle se

apne 1 dost ko madad ke liye bulaya & dono kamro ki safai me lag gaye.

"yaha sab thik hai na,mannu?tumhe kisi chiz ki zarurat to nahi?",upari

manzil pe bane dono kamro ki safai me lage naukar se devika ne puchha.

"nahi,malkin.hume to koi chiz ki zarurat nahi lekin kal apna generator

kharab ho gaya use thik karwa dijiyega."

"tumne estate me khabar nahi ki?"

"nahi,malkin.socha tha ki aaj karunga par bhul gaya.abhi aapko dekha

to yaad aaya.",kamro ki safai ho gayi thi,devika & inder khana to

khake aaye the to mannu ne dono ke kamro me peene ka pani & 1-1

mombatti rakh di.

"aur kuchh to nahi chahiye,malkin?"

"nahi,mannu.tum jake so jao."

"thik hai,malkin.aap darwaza andar se band kar lijiye.savere vahi 8

baje aaoon na?",mannu purana naukar tha & devika ki rozmarra ki aadto

se achhe se wakif tha.

"haan,mannu.",devika ne bungle ka main darwaza band kiya & fir

seedhiya chadh upar aane lagi ki batti chali gayi.ghup andhere me

devika ko kuchh bhi nahi sujh raha tha.

"inder..inder..",seedhiyo ke uapr pahunch usne inder ko aavaz di joki

mombatti dhoondane me laga tha.

"aaya ma'am.",inder kamre se nikla & devika ki aavaz ki or badha &

apni or aati devika se takra gaya.devika girne lagi to inder ne use

baaho me sambhal liya.thik usi waqt koi janwar unke bagal se kud ke

bhaga.

"OOOWW!",devika darr se chikhi & inder se chipak gayi.inder ne us

ebaho me bhara & us bhagte janwar ko dekha jo devika ke kamre ki

balcony ke khule darwaze se kud ke bhag raha tha-vo 1 chhoti si billi

thi.

"bas billi thi,bhag gayi.",inder ki baahe devika ki pith ko ghere

thi.dono ka kad lagbhag 1 sa tha & devika sar jhuka ke uske seene me

munh chhupaya hua tha.usne apni baahe inder ki kamar pe kasi hui

thi.is tarah se sate hone ke karan devika apni chut pe inder ka

lund-joki dhire-2 tan raha tha,uska dabav saaf mehsus kar rahi

thi.stud farm ki raat ke baad inder ko pura yakin ho gaya tha ki

devika uske karib aana chahti thi.aaj bilkul sahi mauka tha uski

hasrat puri karne ka,agar aaj usne ye shubh kaam nahi kiya to ho sakta

hai devika ye samjhe ki use usme koi dilchaspi nahi & peechhe hat

jaye.

devika abhi bhi inder se chipki hui thi.vo chahti thi ki inder pahal

kare & use apne se alag kare magar use kya pata tha ki shatir inder

bhi aaj usi ke jaise khayal apne dil me sanjo raha tha.inder ne apni

baaho ka dabav thoda badha diya jise mehsus karte hi devika ki aah

nikal gayi & usne apna sar uske seene se utha diya.

ab dono ki aankhe andhere ki aadi ho gayi thi & 1 dusre ke chehre ko

dekh pa rahi thi.dono is waqt devikia ke kamre ke thik bahar khade

the.jaise hi devika ne sar uthaya inder ne apne honth uske hontho se

laga diye.devika ne socha bhi nahi tha ki inder aisa karega.use bada

sukhad aashcharya hua.

inder uske gulabi hotho ko chume ja raha tha.devika ki khushi ka to

thikana hi nahi tha.uski baahe bhi inder ki kamar pe aur kas

gayi.thodi der baad inder ne apni zuban ko devika ke hotho ke par uske

munh me ghusane ki koshish ki.devika ke badan me aag lagi thi & inder

ki is mastani harkat ne us aag ko aur bhadka diya.dil me armano ka

aisa sailab umda pada tha joki devika se sambhala nahi gaya & usne

bechain ho apen honth inder ke hontho se alag kar diye & apna chehara

dayi taraf ghuma liya.inder ke tapte honth uske baye gaal se aa

lage.chumte-2 inder uske daaye gall pe pahuncha & majburan devika ko

ab apna chehra bayi or ghumana pada.

inder ki kisses use bahut pyari lag rahi thi.lag raha tha jaise halki

barish ki fuhare uske pyase badan ko bhigo use sukun pahuncha rahi

thi.1 bar fir inder ke honth devika ke khubsurat chehre pe ghumne ke

baad uske hotho se aa lage.devika samajh gayi ki thi ki inder ke andar

bhi usi ke jaise aag bhadak rahi hai.ye khayal aate hi uske chumne ki

shiddat badh gayi & is bar jab inder ne uski zuban ko apni zuban se

talasha to devika ne badi garmjoshi se dono ka milan karwaya.

chumte hue inder ke hath uski pith se uski nangi kamar pe aa gaye the

& devika ke hath uski gardan ke gird.dono paglo ki tarah 1 dusre ko

chume ja rahe the.apni baaho me bhar inder devika ko uske kamre ke

andar le aaya.badi der tak dono 1 dusre ko chumte rahe.thodi-2 der pe

sans lene ke liye dono ke lab alag hote magar fir aise jud jate jaise

ki juda rahe to zinda nahi rahenge.ji bhar ke chumne ke baad inder ke

honth neeche badhe & devika ki gori gardan pe ghumne lage.devika masti

me kho gayi thi.uske chut se pani risna shuru ho gaya tha & vo inder

ke baalo me bechaini se ungliya fira rahi thi.

dono ki jaddojahad me devika ki sari ka pallu uske kandhe se neeche

gir gaya tha & ab inder uske numaya ho chuke cleavage pe laga hua

tha.devika ki chhatiyo se madhosh karne vali khushbu aa rahi thi &

inder usme dooba chala ja raha tha.shiva ke jane ke baad ye pehli baar

tha jab devika ka badan kisi mard ki baaho me tha & vo is pal ka

bharpur maza utha rahi thi.inder uske seene se bhi neeche ja raha

tha.devika ab apne peechhe ki deewar se sat ke khadi thi & inder apne

ghutno pe baitha uski kamar ko sehlata uske gore pet ko chum raha

tha.devika ki sans mano atakne lagi.inder ki garm sanse & tapte lab

uske pet ko chhu uske dil me hulchul macha rahe the.inder ka sar pakad

usne bechaini me use apne pet se laga karna chaha magar inder ne uski

ansuni karte hue uski nabhi me apni jibh ghusa di & jaldi-2 chalane

laga.

devika pagal ho gayi.uska sar deewar se sate hue upar uth gaya.uska

baya hath uske sar ke uapr deewar se laga tha & daye se vo inder ke

baalo ko pakde thi.inder uski nabhi chate ja raha tha.inder ka maqsad

chahe jo bhi ho is waqt devika ke purkashish jism ka nasha uske sar

chadh ke bol raha tha & vo bhi us husnpari ke sath masti ke sagar ki

un gehraiyo tak jana chahta tha jaha vo kisi & ke sath kabhi ja nahi

paya tha.

inder ki zuban devika ki gehri nabhi se nikli & nabhi ke neeche &

bandhi asri ke upar ki komal jagah pe ghumne lagi.devika itni masti

sahan nahi kar payi & fir bechain ho ghum gayi & deewar ko pakad apna

chehra chhupa liya.is se inder kaha rukne wala tha!usne devika ki

kamar ki baglo ko pakda & unhe haule-2 dabate hue uski kamar & nichli

pith ko chumne laga.devika ne kale rang ka sleeveless blouse pehna tha

joki peechhe se kafi khula tha.din bhar to vo sari ke aanchal ko apne

kandjo pe lapete rahi thi to inder ko uski gudaz baho ka deedar nahi

hua tha magar is waqt peechhe se aisa lag raha tha ki kamar ke upar

devika jaise nangi hi ho.inder ke garm hath uski kamar ki baglo pe

upar uske blouse tak jate & fir neeche sari tak aate.uske honth uski

kamar ko deewano ki tarah chum rahe the.

devika ka bura haal tha.vo deewar ko pakde aahe bhar rahi thi & uski

chut me kasak uth rahi thi.vo bechaini me apni janghe aapas me ragad

rahi thi.inder samajh gaya tha ki vo bahut mast ho chuki hai & aaj

raat ye haseen aurat use bahut maza dene wali hai.vo chumte hue khada

hua & ab uske honth blouse me se dikh rahi devika ki upari pith pe

the.usne apne hath devika ke deewar se lage hatho pe rakh diye & apni

ungliyo ko uske ungliyo me peechhe se fansa diya.devika ke jism ne use

pagal kar diya tha.chumte hue vo uski gardan pe aaya & 1 bar fir uske

honth devika ke haseen chehre se lag gaye.

devika ne apna chehara dayi taraf ghumaya to 1 bar fir inder ne apne

honth uske larazte hotho se laga diye.usne devika ke deewar pe lage

hatho ko vaise hi pakda hua tha.chumte hue uske hath devika ke hatho

ko chhod uski kalai pe aaye & fir uski gori baho pe.aisi gori & gudaz

bahen inder ne apni zindagi me nahi dekhi thi.vo bas apne ungliyo ke

poro se usko kohni se leke kandhe tak un mast baaho ko sehlaye ja raha

tha.apne badan ki tarif devika ko inder ki har harkat me dikh rahi

thi.use apne husn pe thoda guman bhi hua & bahut sari khushi bhi & vo

aur shiddat ke sath apne naye premi ko chumne lagi.

thodi der tak inder ke hath vaise hi uski baaho pe ghumte rahe fir

inder ne apne hath uski baaho se uske kandhe pe laye & fir uski pith

ki bagal se hote hue dobara uski kamar ki bagal me ja lage.dono abhi

bhi vaise hi 1 dusre ko chum rahe the.inder ke hath uski kamar ko

sehlate hue aage uske pet pe gaye & uski kamar me atki sari ko khinch

diya.devika ke munh se aah nikli magar inder ne use chumna nahi

chhoda....ab vo nangi ho rahi thi..inder ke samne ..pehli

baar...devika ko is khayal se sharm aa gayi & uske galo me masti ki

lali ke sath sharm ka rang bhi ghul gaya.inder ke hatho ne tezi se

sari ko nikala & fir uske petticoat ke bagal me lage hook ko bhi khol

diya.petticoat apneaap zamin pe gir gaya mano vo bhi dono bekarar

jismo ke milan me aade na aana chahta ho.

kramashah..........
 
गतान्क से आगे...

देविका शर्मा गयी & उसने किस तोड़ अपना चेहरा फिर से दीवार से लगा

लिया.इंदर फिर उसकी पीठ को चूमने लगा.वो जल्द से जल्द उस हुस्न की

मल्लिका को उसके पूरे शबाब मे देखना चाहता था.उसके हाथो ने उसके ब्लाउस

के हुक्स & फिर ब्रा के हुक्स को भी खोल दिया & बेचैनी से उसकी नंगी पीठ

पे फिरने लगे.देविका की चूत उसकी हर्कतो से पागल हो अब और अपनी छ्चोड़

रही थी.इंदर ने अपने हाथो को उसके बदन पे चलते हुए ब्लाउस & ब्रा को उसके

कंधो से नीचे सरकया मगर देविका की बाहे कोहनी से मूडी होने कारण दोनो

कपड़े उसके बदन से अलग नही हुए.इंदर ने देविका के कंधे पकड़ बड़े प्यार

से उसे अपनी ओर घुमाया तो हया की मारी देविका ने अपनी आँखे बंद कर ली.

इंदर ने उसके हाथ पकड़ बाहे नीची की & ब्लाउस & ब्रा को फर्श पे गिरने

दिया.अब देविका के जिस्म पे बस 1 छ्होटी सी,काले रंग की पॅंटी थी जो उसकी

चूत से निकले रस के कारण गीली हो उस से चिपक गयी थी.इंदर ने 1 बार सर से

पाँव तक देविका के हुस्न को निहारा.उपरवाला उसपे मेहेरबन था,उसका बदला भी

पूरा होनेवाला था & साथ मे ये मस्त औरत भी उसकी बाहो मे उस से चूड़ने

वाली थी.इनडर ने अपनी बाई बाँह देविका के कंधो के गिर्द डाली & दाए हाथ

मे उसका बाया हाथ पकड़ा & बिस्तर की ओर बढ़ चला.

दोनो 1 दूसरे से सटे बिस्तर पे बैठ गये.देविका को ना जाने कब से इस पल का

इंतेज़ार था मगर इस वक़्त उसे इतनी शर्म आ रही थी की पुछो मत.इंदर ने उसे

तोड़ा चूमा & फिर उठके अपनी शर्ट निकाल दी.देविका ने उसके बालो भरे चौड़े

सीने को देखा & बेचैनी से अपनी गोरी,कसी जंघे आपस मे रगडी,इंदर दोबारा

उसके बाए तरफ बैठा ,अपनी बाई बाँह उसके बदन के गिर्द डाली,दाई को उसकी

कमर मे डाला & उसके गुलाबी होंठ चूमते हुए उसे बिस्तर पे लिटा दिया.अब

दोनो के पैर बिस्तर से नीचे लटके थे & उपरी जिस्म बिस्तर पे लेटे थे.

इंदर का दाया हाथ उसके सीने पे आया & उसके उभारो को सहलाने लगा.इतनी बड़ी

& इतनी कसी,ऐसी मस्तानी चूचिया उसने अपनी ज़िंदगी मे पहली बार देखी

थी.उसके हाथ बहुत हल्के-2 गोलाई मे उसकी चूचियो पे घूम रहे थे.देविका

काजिस्म इंदर के च्छुने से रोमांच से भर उठा था.उसकी आँखे मज़े मे बंद हो

गयी थी.इंदर झुका & उन मस्त गोलाईयो को अपने मुँह मे भरने लगा.देविका की

साँसे अटकने लगी.इंदर की ज़ुबान उसकी चुचियो को कभी मुँह मे भरती, कभी

चुस्ती कभी बस निपल को छेड़ती.

इंदर काफ़ी देर तक उसके सीने के उभारो से खेलता रहा.देविका की चूत मे

उठती कसक बहुत बढ़ गयी थी.इंदर ने उसकी बाई चुचि को मुँह मे भर अपना मुँह

उपर उठाते हुए ऐसे खींचा की देविका के होश उड़ गये & उसकी चूत ने पानी

छ्चोड़ दिया.देविका के मुँह से लंबी सी आह निकली & वो झाड़ गयी.इंदर ने

उसकी चूचियो को अपने होंठो के निशानो से ढँक दिया था.वो दोबारा देविका के

पेट को चूम रहा था मगर इस बार मंज़िल देविका की नाभि नही उसके नीचे थी.वो

उसके पेट को चूमते हुए उसकी कसी पॅंटी के उपर कमर के बगल मे उसके गुदाज़

हिस्से को दबा रहा था.

देविका समझ गयी की अब उसके जिस्म से उसका आख़िरी कपड़ा भी उतरने वाला

है.ठीक उसी वक़्त इंदर ने अपना हाथ पॅंटी के वेयैस्टबंड मे फँसाया & उसे

खींचा.देविका को ना जाने क्यू बहुत शर्म आई & उसने इंदर का हाथ पकड़ना

चाहा मगर इंदर उसके नाभि के नीचे चूमते हुए उसकी पॅंटी को नीचे सरकाता

रहा.

जैसे ही पॅंटी निकली देविका ने शर्म से करवट ले बिस्तर मे अपना मुँह

च्छूपा लिया मगर ऐसा करने से उसकी भरी हुई गंद इंदर के सामने चमक उठी.अभी

तक बिजली नही आई थी बस कमरे के बाल्कनी के खुले दरवाज़े से पूरे चाँद की

दूधिया रोशनी आ रही थी जिसमे नहाके देविका का नशीला जिस्म & भी पुर्कशिश

हो गया था.

इंदर ने देखा की ये तो वही कमरा है जहा सुरेन सहाय ने कॉल गर्ल को चोदा

था जब उसने उनकी दवा बदली थी.उसे अपने बदले की याद आई & ये याद आते ही

उसे सामने नंगी पड़ी देविका का जिस्म 1 खिलोने से ज़्यादा कुच्छ नही

लगा.वो खिलोना जिस से जी भर के खेलने के बाद उसे तोड़ के फेंक देना था.

इस खिलोने से वो जैसे मर्ज़ी जितना मर्ज़ी खेलेगा....उसने अपनी पॅंट की

ज़िप खोली....इस खिलोने के साथ कोई रहम नही करेगा वो....पॅंट नीचे सरकने

के बाद वो अपना अंडरवेर उतार रहा था.जब देविका ने देखा की इन्दर उसके बदन

को नही च्छू रहा है तो उसने वैसे ही पड़े-2 अपनी गर्दन घुमा के पीछे देखा

& जो देखा उसे देखते ही उसे शर्म भी आई मगर उसके साथ ढेर सारी खुशी भी.

इंदर अब पूरा नंगा था & उसका लंड तना हुआ देविका की निगाहो के सामने

था.देविका ने पाया की इंदर का लंड शिवा जितना लंबा तो नही था मगर उस से

बहुत ज़्यादा छ्होटा भी नही था.इंदर की आँखो मे जो बदले का जुनून था उसे

देविका ने अपने जिस्म की चाह समझा & शर्मा के फिर अपना चेहरा बिस्तर मे

च्छूपा लिया.इंदर उसके करीब पहुँचा & उसकी टाँगो को उठा के बिस्तर पे

किया & फिर उसके बगल मे बैठ के उसकी गंद को मसलने लगा.देविका की आहे फिर

से कमरे मे गूंजने लगी.इंदर ने गंद की मोटी फांको को फैलाया & झुक के

अपनी जीभ देविका की गीली चूत से सटा दी.इंदर देविका के बाए तरफ घुटनो पे

बैठा था.उसकी पीठ देविका के सर की तरफ थी & वो झुक के उसकी गंद को चाट

रहा था.देविका का सर बिस्तर से उठ गया था & वो इंदर की ज़ुबान की बेशर्म

हर्कतो से जड़े जा रही थी.

"आहह....आआनंह...बस..इंदर...ऊहह..प्लीज़.....रुक..जा...ऊओ...ऊओ...!",इंदर

उसकी मिन्नतो के बावजूद उसकी चूत चाते चला जा रहा था.बीच-2 मे उसकी

उंगलिया भी उसकी चूत की गहराइयाँ नाप लेती.देविका को होश नही था की वो

कितनी बार झड़ी.इंदर का लंड अब ठुमके लगाने लगा था,उसके आंडो मे भी मीठा

दर्द शुरू हो गया था.वो घुमा & देविका की दाई टांग को उपर कर घुटनो से

मोड़ दिया & पीछे से अपना लंड उसकी चूत मे घुसा

दिया,"..हाइईईईईई....!",इंदर को देविका के दर्द की कोई परवाह नही थी.उसने

1 झटके मे ही लंड को अंदर पेल दिया था.चूत गीली होने के बावजूद देविका को

थोड़ा दर्द महसूस हुआ.

इंदर उसकी पीठ पे लेट गया तो देविका ने अपना सर उठा के दाई तरफ घुमाया

उसके दाए कंधे के उपर से झुकते हुए इंदर उसे चूमने लगा.वो किसी प्रेमी की

तरह नही चूम रहा था बल्कि किसी वहशी की तरह चूम रहा था.देविका को लगा की

इंदर बहुत जोश मे है इसलिए ऐसे कर रहा है.उसके धक्के भी बड़े गहरे & तेज़

थे.देविका को उसका ये अंदाज़ भा रहा था..बेचारी!अगर जानती की इंदर के

वहशिपान की वजह उसके जिस्म का नशा नही बल्कि उस से इन्तेक़ाम का जुनून था

तो पता नही उस पे क्या बीतती.

इंदर के हाथ देविका की बगलो से घुस उसकी मोटी चूचियो को मसल रहे

थे.देविका को बहुत मज़ा आ रहा था.कभी-कभार शिवा की चुदाई ऐसी होती थी मगर

उसमे भी वो पागलपन भरा जोश नही रहता था.इंदर तो ऐसे चुदाई कर रहा था जैसे

सब भूल गया हो,अब वो अपने होंठ उसके होंठो से अलग कर उसकी पीठ पे दन्तो

से काट रहा था,देविका के बदन मे तो जैसे मस्ती के पटाखे फुट रहे थे!.उसकी

पीठ से चिप्टा उसकी चूचिया मसल्ते हुए इंदर तब तक उसे चोद्ता रहा जब तक

वो झाड़ नही गयी.उसके झाड़ते ही वो उसकी पीठ से उपर उठा & फिर उसकी कमर

पकड़ हवा मे उठा ली.उसका लंड अभी भी चूत मे धंसा था.देविका का अस्र

बिस्तर से लगा हुआ था.उसने गर्दन बाई ओर घुमाई & इंदर को देखा.उसकी नशीली

आँखो ने इंदर के जिस्म का जोश दुगुना कर दिया & साथ ही उसके बदले का

जुनून भी उसके और सर चढ़ गया.
 
इंदर ने उसकी कमर थामी & दनादन धक्के लगाने लगा.देविका के गले से फिर से

आहें निकलने लगी.उसने अपना बाया हाथ अपनी चूत से लगाया & अपने दाने को

रगड़ने लगी.इंदर ने दाए से उसकी चूचियो को मसलना जारी रखा & बाए से उसकी

कमर को थाम धक्के लगाता रहा.उसके अंडे मानो फटने को तैय्यार थे मगर वो

ऐसे नही झड़ना चाहता था.झाड़ते वक़्त उसे इस मतलबी,स्वार्थी औरत का चेहरा

देखना था..उसे देखना था की कैसे..ये दूसरो का हक़ मारने वाली औरत उसके

लंड की गुलाम बन गयी है.

देविका की चूत मे इंदर के लंड ने फिर से खलबली मचा दी थी.रही-सही कसर

उसकी उंगली पूरी कर रही थी की तभी इंदर ने उसकी गांद पे 1 थप्पड़

मारा.."तदाक..!"..देविका को दर्द हुआ मगर उस से भी ज़्यादा मज़ा आया.इंदर

उसे चुदाई के नयी पहलू दिखा रहा था.इंदर के हर थप्पड़ पे उसकी गांद लाल

हो रही थी & उसका दर्द बढ़ रहा था मगर इसके साथ ही उसकी मस्ती की भी

इंतेहा नही रही थी.जिस्मो के मिलन की खुमारी 1 बार फिर उसके उपर पूरी तरह

से हावी हो गयी थी.उसके जिस्म मे जैसे अकड़न सी भर गयी थी & वो जानती थी

की इस अकड़न से उसे इंदर का लंड ही निजात दिलाएगा.इंदर के धक्के & थप्पड़

और तेज़ हो गये थे & देविका की उंगली की रगड़ान भी.

"आअनन्नह.....!",देविका ने बिस्तर से सर उठा के कमर हिलाकर इंदर के धक्को

का जवाब देते हुए ज़ोर की आह भरी.इंदर के लंड पे देविका की चूत थोड़ा और

कस गयी थी.उसे हैरत हुई की इस उमर मे भी वो इतनी हसीन & पूर्कशिश जिस्म

की मल्लिका कैसे थी!....उसकी चूत किसी कुँवारी लड़की की चूत की तरह कसी

थी & देविका के झड़ने पे वो और कस गयी थी.बड़ी मुश्किल से इंदर ने अपने

को झड़ने से रोका.

देविका हानफते हुए बिस्तर पे निढाल हो गिर गयी थी & इंदर का लंड उसकी चूत

से निकल गया था मगर इंदर का काम अभी पूरा नही हुआ था.उसने देविका को सीधा

किया & उसकी दाई टांग को उठा के अपने बाए कंधे पे रखा,अपने घुटनो पे बैठ

1 बार फिर उसने अपना लंड देविका की चूत मे घुसा दिया.देविका के लिए अब

बात बर्दाश्त के बाहर थी.वो 1 बार झड़ती नही थी की इंदर अगले हमले के लिए

तैय्यार हो जाता था.उसने सर उठाके उसके तगड़े लंड को अपनी चूत मे

अंदर-बाहर होते देखा & 1 बार फिर उसका जोश बढ़ गया.अपने हाथो से अपनी

चूचिया दबाते हुए वो आहे भरने लगी & इंदर से मिन्नते करने

लगी,"..हाइईईईईई....ऊहह...इन..देर.....प्लीज़.......आअनंह......रुक...जाओ.....आँह.......आहह....!",मगर

इंदर जैसे बेहरा हो गया था.वो बस घुटनो पे बैठा उसकी जाँघो को थामे धक्के

लगाए जा रहा था.उसकी आँखो के सामने उसके नाम की माला जपती देविका उसे अब

अपनी औकात पे आती दिख रही थी.इस ख़याल से उसके धक्के और तेज़ हो गये.

देविका अभी भी यही समझ रही थी की इंदर उसके जिस्म का दीवाना हो गया है &

इसलिए ऐसी क़ातिलाना चुदाई कर रहा है.अपने सख़्त निपल्स को उंगलियो मे

मसल्ते हुए उसने अपनी बाई टांग इंदर के कमर पे लपेट दी.इंदर समझ गया की

वो फिर से झड़ने वाली है.उसने उसकी दाई टांग को कंधे से गिराया तो देविका

ने उसे भी उसकी क्मर पे कस दिया.इंदर अपने हाथो पे झुक अपनी टाँगे फैला

धक्के लगा रहा था.देविका ने अपने हाथ अपने सीने से हटाए & उसके मज़बूत

बाज़ू पकड़ बिस्तर से जैसे उठने की कोशिश करने लगी.उसका चेहरा देखने से

ऐसा लगता था ,मानो उसे बहुत तकलीफ़ हो रही है मगर इंदर जानता था की इस

वक़्त वो मज़े के आसमान मे उड़ रही है.इंदर झुका & उसके होंठो को अपने

होंठो से कस लिया.देविका ने अपनी बाँहे उसकी पीठ पे डाली & फिर बेचैनी से

उसकी पीठ पे हाथ फिराते हुए अपने नाख़ून उसमे धंसा दिए-वो फिर से झाड़

रही थी.इस बार इंदर ने अभी अपने सब्र का बाँध खोल दिया & उसका जिस्म झटके

खाने लगा.उसका गाढ़ा,गर्म वीर्या देविका की चूत मे भर रहा था.

इंदर ने उसे चूमना नही छ्चोड़ा था क्यूकी वो जानता था की अगर उसने अपने

होंठ अलग किए तो इस कमज़ोर लम्हे मे उसके मुँह से वो गलिज़ लफ्ज़ निकल

जाएँगे जो वो देविका को असल मे कहना चाहता था.उसे अपने उपर काबू रखना

होगा,अपने जज़्बातो को वो ऐसे आज़ाद नही छ्चोड़ सकता था....वरना सारे

किए-धरे पे पानी फिर जाएगा..वो दिन बा दिन मंज़िल के करीब आ रहा था.इतने

पास पहुँच के वो सब खोना नही चाहता था...झड़ने के बाद उसका जिस्म भी

सुकून महसूस कर रहा था & दिल भी.उसके & देविका के होंठ अभी भी जुड़े थे

की तभी बिजली आ गयी & सारा कमरा रोशनी से नहा गया.इंदर ने देविका को देखा

& जैसे उसे कुच्छ याद आ गया.

वो 1 झटेके मे अपने होंठ अलग करता उसके उपर से लंड खींचता उठा & सामने

रखे लकड़ी के कॅबिनेट पे हाथ रख सर झुका के खड़ा हो गया.

"इंदर,क्या हुआ?",फ़िक्रमंड देविका उसके करीब आई & उसके कंधे पे हाथ रखा.

"ई..ई आम सॉरी.",ये इंदर के नाटक का अगला भाग था.

"कोई बात नही,इंदर..",देविका ने सोचा की इंदर अपनी जुनूनी चुदाई के बारे

मे शर्मिंदा है,"..जब इंसान के अरमान दिल मे बहुत गहरे पैठ जाते हैं तो

कभी-कभार उनका गुबार ऐसे ही निकलता है.तुम पहले ही मेरे पास आ जाते तो

ऐसा नही होता.",देविका ने उसे पीछे से ही अपनी बाँहो मे भरा & अपना दाया

गाल उसकी पीठ से लगा दिया,"..वैसे सच कहु तो मुझे बहुत मज़ा आया....मैने

तुम्हारे साथ उन उँचाइयो को च्छुआ जिनके वजूद का मुझे इल्म ही नही

था.",उसने प्यार से अपने हाथ इंदर के चौड़े सीने पे फिराए.

..तो ये बेचारी सोच रही थी की उसका जुनून देविका के जिस्म की वजह से

था...हाः...पागल कही की!बेवकूफ़!

"बात ये नही है..",इंदर ने उसे अपने जिस्म से अलग किया & दूसरी तरफ पीठ

करके खड़ा हो गया.

"तो क्या बात है?",देविका उसके सामने आई.

"ये..ये नही होना चाहिए था..ये ग़लत है..",इंदर बहुत परेशान होने का नाटक

कर रहा था.

"ओह..समझी..",देविका ने उसेक चेहरे को हाथो मे भरा,"..इंदर,तुम हमारे

मालिक-नौकर के रिश्ते की बात कर रहे हो ना."

इंदर ने हा मे सर हिलाया.

"इंदर,तुम 1 मर्द हो & मैं 1 औरत.हम दोनो 1 दूसरे की ओर खींच रहे थे & आज

वो हुआ जो की कुदरती बात है.अगर दो लोग 1 दूसरे को चाहे तो

इज़हारे-मोहब्बत तो होगा ही ना!"

"मगर ये हक़ीक़त है की आप मेरी मालकिन हैं."

"और ये भी हक़ीक़त है की तुम मुझे चाहते हो.हां या ना?"

"हां.",इनडर ने सर झुका के कहा.

"फिर क्या बात है?"

"पता नही...ये ठीक नही लगता."

"क्या ठीक नही लगता?"

"डर लगता है."

"कैसा डर?"

"की कही मैं इस रिश्ते का कोई नाजायज़ फ़ायदा ना उठा लू."

"ओह्ह..इंदर..",डेविका ने उसे गले से लगा लिया,"..हमेशा ऐसे डरते रहना

कभी कुच्छ भी ग़लत नही होगा."

इंदर ने उसके कंधे से सर उठाके सवालिया निगाहो से उसे देखा.

"हां..",देविका ने उसके बालो मे हाथ फेरा,"..कोई और मर्द होता ना इंदर तो

मैं अभी भी उस बिस्तर पे पड़ी होती & वो मेरे जिस्म से खेल रहा होता मगर

इस वक़्त भी तुम ये नही भूले.इस से तो बस तुमहरि अच्छाई ज़ाहिर होती है."

"..इंदर,इस बात का डर की तुम कही कभी इस रिश्ते का ग़लत इस्तेमाल ना करो

ही तुम्हे इस ग़लती से बचाए रखेगा.तुम घबराव मत,मुझे पूरा यकीन है की तुम

कभी कोई ग़लत काम नही करोगे..",इंदर कुच्छ बोलने को हुआ मगर देविका ने

अपने कोमल हाथ उसके होंठो पे रख दिए,"..& अगर कभी ऐसा किया तो मैं तुम्हे

रोक दूँगी.अब तो तुम्हारे मन मे कोई शुबहा नही है ना?"
 
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