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Diler mujrim ibne safi

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दिलेर मुजरिम

अजीबो-ग़रीब क़त्ल

‘‘मुझे जाना ही पड़ेगा मामी।’’ डॉक्टर शौकत ने कमरे में दाख़िल होते हुए ओवरकोट की दूसरी आस्तीन में हाथ डालते हुए कहा।

‘‘ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे और इसके सिवा मैं कह ही क्या सकती हूँ।’’ बूढ़ी सविता देवी बोलीं। ‘‘लेकिन सिर में अच्छी तरह मफ़लर लपेट लो...सर्दी बहुत है।’’

‘‘मामी...!’’ डॉक्टर शौकत बचकाने अन्दाज़ में बोला। ‘‘आप तो मुझे बच्चा ही बनाये दे रही हैं...मफ़लर सिर में लपेट लूँ...हा-हा-हा...!’’

‘‘अच्छा बड़े मियाँ! जो तुम्हारा जी चाहे, करो।’’ सविता देवी मुँह बना कर बोलीं। ‘‘मगर मैं कहती हूँ, यह कैसा काम हो गया...न दिन चैन, न रात चैन। आज ऑपरेशन, कल ऑपरेशन।’’

‘‘मैं अपनी अच्छी मामी को किस तरह समझाऊँ कि डॉक्टर ख़ुद आराम करने के लिए नहीं होता, बल्कि दूसरों को आराम पहुँचाने के लिए होता है।’’

‘‘मैंने तो आज ख़ास तौर से तुम्हारे लिए मैकरोनी तैयार करायी थी। क्या रात का खाना भी शहर ही में खाओगे?’’ सविता देवी बोलीं।

‘‘क्या करूँ, मजबूरी है...इस वक़्त सात बज रहे हैं। नौ बजे रात को ऑपरेशन होगा। केस ज़रा नाज़ुक है...अभी जा कर तैयारी करनी होगी...अच्छा, ख़ुदा हाफ़िज़।’’

डॉक्टर शौकत अपनी छोटी-सी ख़ूबसूरत कार में बैठ कर शहर की तरफ़ रवाना हो गया। वह सिविल हस्पताल में असिस्टेंट सर्जन की हैसियत से काम कर रहा था। दिमाग़ के ऑपरेशन का माहिर होने की वजह से उसकी शोहरत दूर-दूर तक थी, हालाँकि अभी उसकी उम्र कुछ ऐसी न थी; वह चौबीसपच्चीस बरस का एक ख़ूबसूरत नौजवान था। अपनी आदतों और व्यवहार के चलते सोसायटी में इज़्ज़त की नज़रों से देखा जाता था। क़ुरबानी का जज़्बा उसकी फ़ितरत में था। आज का ऑपरेशन वह कल पर भी टाल सकता था, लेकिन उसके ज़मीर ने इसकी इजाज़त न दी।

सविता देवी अकसर उसकी भाग-दौड़ पर झल्ला भी जाया करती थीं। उन्होंने उसे अपने बेटे की तरह पाला था। वह हिन्दू धर्म को मानने वाली एक बुलन्द किरदार औरत थीं। उन्होंने अपनी दम तोड़ती हुई सहेली जाफ़री ख़ानम से जो वादा किया था, उसे आज तक निभाये जा रही थीं। सविता देवी ने अपनी सहेली की वसीयत के अनुसार उसके बेटे को डॉक्टरी की उच्च शिक्षा दिला कर इस क़ाबिल बना दिया था कि वह आज सारे देश में अच्छी-ख़ासी शोहरत रखता था। हालाँकि शौकत की माँ उसकी पढ़ाई के लिए काफ़ी धन छोड़ कर मरी थीं, लेकिन किसी दूसरे के बच्चे को पालना आसान काम नहीं और फिर बच्चा भी ऐसा जिसका सम्बन्ध दूसरे धर्म से हो। अगर वे चाहतीं तो उसे अपने धर्म पर चला सकती थीं, लेकिन उनकी नेकनीयती ने यह गवारा न किया था। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने उसकी धार्मिक शिक्षा का भी ठीक-ठाक इन्तज़ाम किया था। यही वजह थी कि वह नौजवान होने पर भी शौकत अली ही रहा। सविता देवी के बिरादरी के लोगों ने एक मुसलमान के साथ रहने की वजह से उनका बाइकाट कर रखा था, मगर वे अपने मज़हब की पूरी तरह पाबन्द थीं और शौकत को उसके धार्मिक कर्तव्य को पूरा करने के लिए मजबूर करती रहती थीं। वे डॉक्टर शौकत और एक नौकरानी के साथ निशात नगर नाम के क़स्बे में रह रही थीं, जो शहर से पाँच मील की दूरी पर था। वहाँ उनकी अपनी कोठी थी। वे जवानी ही में विधवा हो गयी थीं। उनके पति अच्छी-ख़ासी जायदाद के मालिक थे जो किसी क़रीबी रिश्तेदार के न होने के कारण पूरी-की-पूरी उन्हीं के हिस्से में आयी थी।

डॉक्टर शौकत के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरानी से कहा—‘‘मेरे कमरे में बिजली मत जलाना। मैं आज शौकत ही के कमरे में सोऊँगी। वह आज रात भर थकता रहेगा। मैं नहीं चाहती कि सुबह जब वह आये तो अपने बिस्तर को ब़र्फ की तरह ठण्डा पाये। जाओ, जा कर उसका बिस्तर बिछा दो।’’

नौजवान नौकरानी उन्हें हैरत से देख रही थी। आज पहली बार उसने उन्हें इस क़िस्म की बात करते सुना था। वह कुछ कहना ही चाहती थी कि फिर उसे एक ममता-भरे दिल की भावना समझ कर ख़ामोश हो रही।

‘‘क्या सोच रही हो?’’ सविता देवी बोलीं।

‘‘तो क्या आज रात हम अकेले रहेंगे?’’ नौकरानी अपनी आवाज़ धीमी करके बोली। ‘‘वह आदमी आज फिर आया था।’’

‘‘कौन आदमी...?’’

‘‘मैं नहीं जानती कि वह कौन है, लेकिन मैंने कल रात को भी उसको बाग़ में छुप-छुप कर चलते देखा था। कल तो मैं समझी कि शायद वह कोई रास्ता भूला हुआ राहगीर होगा। मगर आज छै बजे के क़रीब वह फिर दिखायी दिया।’’

‘‘अच्छा...!’’ सविता देवी सोच कर बोलीं। ‘‘वह शायद हमारी मुर्गियों की ताक में है। मैं सुबह ही थाने के दीवान से कहूँगी।’’

सविता देवी ने यह कह कर उसको इत्मीनान दिला दिया, लेकिन ख़ुद उलझन में पड़ गयीं। आखिर यह सन्दिग्ध आदमी उनकी कोठी के गिर्द क्यों मँडराता रहता है। उन्हें धार्मिक ठेकेदारों की धमकियाँ अच्छी तरह याद थीं, लेकिन इतने समय के बाद उनकी तरफ़ से भी किसी ख़तरनाक क़दम की आशंका नहीं थी। इस प्रकार की न जाने कितनी गुत्थियाँ उनके ज़ेहन में रेंगती थीं। आखिरकार थक-हार कर दिल के सुकून के लिए उन्हें अपने पहले ही विचार की तरफ़ लौटना पड़ा। यानी वह शख़्स कोई मामूली चोर था जिसे उनकी मुर्गियाँ पसन्द आ गयी थीं। जैसे ही थाने के घण्टे ने दस बजाये, वे सोने के लिए डॉक्टर शौकत के कमरे में चली गयीं। उन्होंने रात खाना भी नहीं खाया।

नौकरानी उनकी आदतें बख़ूबी जानती थी। इसलिए उसने ज़्यादा इसरार भी नहीं किया। थोड़ी देर के बाद वह भी सोने के कमरे में चली गयी। वह लेटने ही वाली थी कि उसने बाहर के फाटक को धमाके के साथ बन्द होते सुना। उसे लगा कि डॉक्टर शौकत जल्दी वापस आ गये हैं। वह बरामदे में निकल आयी। बाग़ में सविता देवी की ग़ुस्सायी आवाज़ सुनायी दी। वे किसी आदमी से ऊँची आवाज़ और तेज़ लहजे में बात कर रही थीं। वह हैरत से सुनने लगी। वह अभी बाहर जाने का इरादा ही कर रही थी कि सविता देवी बड़बड़ाती हुई आती दिखायी दीं।

‘‘तुम...!’’ वे बोलीं। ‘‘अरे लड़की, तू क्यों अपनी जान के पीछे पड़ी है। इस सर्दी में बग़ैर कम्बल ओढ़े बाहर निकल आयी है...न जाने कैसी हैं आजकल की लड़कियाँ।’’

‘‘कौन था...?’’ नौकरानी ने उनकी बात सुनी-अनसुनी करते हुए पूछा। ‘‘वही आदमी तो नहीं था।’’ नौकरानी ने ख़ौफ़ज़दा हो कर कहा।

‘‘नहीं, वह नहीं था। सर्दी बहुत है। सुबह बताऊँगी... अच्छा, अब जाओ।’’ नौकरानी हैरान हो कर चली गयी। सविता देवी थोड़ी देर तक उस आदमी के बारे में सोचती रहीं। वह उन्हें सन्दिग्ध लग रहा था। लेकिन कुछ ही देर बाद वे ख़र्राटे भरने लगीं।
 
दूसरे दिन सुबह आठ बजे जब डॉक्टर शौकत वापस आया तो उसने नौकरानी को परेशान पाया। पूछने पर मालूम हुआ कि सविता देवी अपनी आदत के ख़िलाफ़ अभी तक सो रही हैं। हालाँकि उनकी रोज़ाना की आदत थी कि सुबह तक़रीबन पाँच ही बजे से उठ कर पूजा-पाठ के इन्तज़ाम में जुट जाया करतीं। शौकत को भी इस बात से चिन्ता हो गयी। लेकिन फिर उसने सोचा कि शायद रात में ज़्यादा देर तक जागी होंगी। उसने नौकरानी को इत्मीनान दिला कर नाश्ता लाने को कहा। नौ बज गये, लेकिन सविता देवी न उठीं। अब शौकत की परेशानी हद से ज़्यादा बढ़ गयी। उसने दरवाज़ा पीटना शुरू किया...लेकिन बेकार...अन्दर से कोई जवाब न मिला। हार कर उसने एक बढ़ई बुलवाया।

दरवाज़ा टूटते ही उसकी चीख़ निकल गयी।

सविता देवी सिर से पाँव तक कम्बल ओढ़े चित लेटी हुई थी और उनके सीने में एक ख़ंजर इस तरह घोंपा गया था कि सिर्फ़ उसका हत्था नज़र आ रहा था। बिस्तर ख़ून से तर था।

डॉक्टर शौकत एक मज़बूत दिल का आदमी होते हुए भी थोड़ी देर के लिए बेहोश-सा हो गया। होश आते ही वह बच्चों की तरह सिसकता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा।

सारे घर में मातम छा गया। क़स्बे के थाने को सूचना मिल गयी थी और उस वक़्त एक सब-इन्स्पेक्टर और दो हेड कॉन्स्टेबल मृत महिला के कमरे के सामने बैठे खुसुर-फुसुर कर रहे थे। नौकरानी के बयान पर उन्होंने अपने दिमाग़ी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिये थे। उनके ख़याल में वही सन्दिग्ध आदमी क़ातिल था जो रात को बाग़ में आया था और सविता देवी रात में उसी से झगड़ा कर रही थीं। डॉक्टर शौकत उनकी बातों से सन्तुष्ट नहीं था।

जैसे-जैसे वे अपनी तजरुबेकारी का इज़हार कर रहे थे, उसका ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा था। वैसे भी वह अपने क़स्बे की पुलिस को नाकारा समझता था। इसीलिए उसने खुफ़िया डिपार्टमेंट के इन्स्पेक्टर फ़रीदी को एक निजी ख़त लिख कर बुलवा भेजा था। फ़रीदी उन चन्द इन्स्पेक्टरों में से था जो बहुत ही अहम कामों के लिए बुलाया जाता था, लेकिन निजी सम्बन्धों के चलते डॉक्टर शौकत को पूरा यक़ीन था कि यह केस सरकारी तौर पर उसे न भी सौंपा गया, तो भी वह उसे अपने हाथ में ले लेगा।

लगभग दो घण्टे के बाद इन्स्पेक्टर फ़रीदी अपने असिस्टेंट सार्जेंट हमीद के साथ वहाँ पहुँच गया। इन्स्पेक्टर फ़रीदी तीस-बत्तीस साल का एक तेज़ दिमाग़ और बहादुर जवान था। उसके चौड़े माथे के नीचे दो बड़ी-बड़ी आँखें उसकी क़ाबिलियत को नुमायाँ करती थीं। उसके लिबास के रख-रखाव और ताज़ा शेव किये चेहरे से मालूम हो रहा था वह एक उसूल वाला आदमी है। सार्जेंट हमीद की चाल-ढाल में थोड़ा-सा ज़नानापन था। उसके अन्दाज़ से मालूम होता था कि वह ज़बर्दस्ती अपने हुस्न की नुमाइश करने का आदी था। उसने कोई बहुत ही तेज़ ख़ुशबू वाला सेंट लगा रखा था। उसकी उम्र चौबीस साल से ज़्यादा न थी, लेकिन इस छोटी-सी उम्र में भी वह बहुत चतुर और बुद्धिमान था।

इसी बुद्धिमानी की बिना पर उसके साथ इन्स्पेक्टर फ़रीदी के ताल्लुक़ात दोस्ताना थे। दोनों की आपस की गुफ़्तगू से अफ़सरी या मातहती का पता लगाना मुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर था।

थाने के सब-इन्स्पेक्टर और दीवान उनके अचानक आ जाने से घबरा गये, क्योंकि उन्हें उनके आने की ख़बर नहीं थी। उन्हें उनका आना बुरा लगा।

‘‘डॉक्टर शौकत...!’’ फ़रीदी ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा- ‘‘इस नुक़सान की भरपाई नामुमकिन है, लेकिन रस्मी तौर पर मैं अपने ग़म का इज़हार ज़रूर करूँगा।’’

‘‘इन्स्पेक्टर, आज मेरी माँ मर गयी।’’ शौकत की आँखों में आँसू छलक आये।

‘‘सब्र करो...तुम्हें एक मज़बूत दिल का आदमी होना चाहिए।’’ फ़रीदी ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा।

‘‘कहिए दारोग़ा जी, कुछ सुराग़ मिला?’’ उसने सब-इन्स्पेक्टर की तरफ़ मुड़ कर पूछा।

‘‘अरे साहब! हम बेचारे भला सुराग़ क्या जानें।’’ सब-इन्स्पेक्टर ने बड़े स्टाइल से जवाब दिया।

फ़रीदी ने जवाब की कड़वाहट महसूस ज़रूर की, लेकिन वह सिर्फ़ मुस्कुरा कर ख़ामोश हो गया।

‘‘शौकत साहब! यह तो आप जानते ही हैं कि मैं आजकल छुट्टी पर हूँ।’’ फ़रीदी बोला, ‘‘और फिर दूसरी बात यह कि आम तौर पर क़त्ल के केस उस वक़्त हमारे पास आते हैं जब सिविल पुलिस छान-बीन में नाकाम रहती है।’’

थाने के सब-इन्स्पेक्टर की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने सब-इन्स्पेक्टर की ख़ुशी को महसूस किया और अपने जाने-पहचाने अन्दाज़ में बोला, ‘‘लेकिन मैं निजी तौर पर इस केस को अपने हाथ में लूँगा।’’ थाने के सब-इन्स्पेक्टर की आँखों की चमक एकदम से ग़ायब हो गयी, उसका मुँह लटक गया।

फ़रीदी ने पूरा क़िस्सा सुनने के बाद नौकरानी का बयान लेना शुरू किया। नौकरानी ने शुरू से आखिर तक रात की सारी कहानी दोबारा सुना दी।

‘‘क्या तुम बता सकती हो कि रात में तुमने इस हादसे के बाद भी कोई आवाज़ सुनी थी?’’

‘‘जी नहीं...मैंने सिर्फ़ देवीजी के बड़बड़ाने की आवाज़ सुनी थी। वे अकसर सोते वक़्त बड़बड़ाया करती थीं।’’

हूँ...क्या तुम बता सकती हो कि वे क्या बड़बड़ा रही थीं?’’

‘‘कुछ बेकार की बातें बड़बड़ाती थीं। ठहरिए, याद करके बताती हूँ।’’ कुछ देर सोचने के बाद वह बोली, ‘‘हाँ, ठीक याद आया...वे राजरूप नगर...राजरूप नगर बड़बड़ा रही थीं। मैंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, क्योंकि मैं उनकी आदत जानती थी।’’

‘‘राजरूप नगर...!’’ फ़रीदी ने धीरे से दुहराया और कुछ सोचने लगा।

‘‘हमीद...तुमने इससे पहले भी यह नाम सुना है?’’

हमीद ने ‘‘नहीं’’ में सिर हिला दिया।

‘‘डॉक्टर शौकत, तुमने।’’

‘‘मैंने तो आज तक नहीं सुना।’’

‘‘क्या सविता देवी ने भी यह नाम कभी नहीं लिया?’’

‘‘मेरी याददाश्त में तो नहीं।’’ डॉक्टर शौकत ने ज़ेहन पर ज़ोर देते हुए जवाब दिया।

‘‘हूँ...अच्छा...!’’ फ़रीदी ने कहा—‘‘अब मैं ज़रा लाश को देखना चाहता हूँ।’’

सब लोग उस कमरे आये जहाँ लाश पड़ी हुई थी। चारपाई के सिरहाने वाली खिड़की खुली हुई थी। उसमें सलाख़ें नहीं थीं। इन्स्पेक्टर फ़रीदी देर तक लाश का मुआइना करता रहा। फिर उसने वह छुरा सब-इन्स्पेक्टर की इजाज़त से लाश के सीने से खींच लिया और उसके हत्थे पर उँगलियों के निशान ढूँढने लगा।

फिर खिड़की की तरफ़ गया और झुक कर नीचे देखने लगा। खिड़की से तीन फ़ुट नीचे लगभग एक फ़ुट चौड़ी कॉर्निस थी, जिससे बाँस की एक सीढ़ी टिकी हुई थी। खिड़की पर पड़ी हुई धूल कई जगह से साफ़ थी और एक जगह पाँचों उँगलियों के निशान साफ़ देखे जा सकते थे।

‘‘यह तो साफ़ ज़ाहिर है कि क़ातिल इस खिड़की से आया था।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘यह तो इतना साफ़ है कि घर की नौकरानी भी यही कह रही थी।’’ थाने के सब-इन्स्पेक्टर ने मज़ाक में कहा।

फ़रीदी ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखा और फिर ख़ामोशी से ख़ंजर का जायज़ा लेने लगा।

‘‘क़ातिल ने दस्ताने पहन रखे थे और वह एक बेहतरीन ख़ंजरबाज़ मालूम होता है।’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी बोला। ‘‘और वह एक ताक़तवर इन्सान है...दरोग़ा जी इस ख़ंजर के बारे में आपकी क्या राय है।’’

‘‘ख़ंजर...जी हाँ, यह भी बहुत मज़बूत मालूम होता है।’’ सब-इन्स्पेक्टर मुस्कुरा कर बोला।

‘‘जी नहीं...मैं इसकी बनावट के बारे में पूछ रहा हूँ।’’

‘‘इसकी बनावट के बारे में सिर्फ़ लुहार ही बता सकते हैं।’’

‘‘जी नहीं...मैं भी बता सकता हूँ। इस क़िस्म के ख़ंजर नेपाल के अलावा और कहीं नहीं बनते।’’

‘‘नेपाल...!’’ डॉक्टर शौकत को जैसे झटका लगा और वह एक क़दम पीछे हट गया।

‘‘क्यों...क्या हुआ?’’ फ़रीदी उसे घूरता हुआ बोला।

‘‘कुछ नहीं।’’ शौकत ने ख़ुद पर क़ाबू पाते हुए कहा।

‘‘ख़ैर। हाँ तो मैं यह कह रहा था कि इस क़िस्म के ख़ंजर सिवा नेपाल के और कहीं नहीं बनाये जाते और डॉक्टर, मैं तुमसे कहूँगा कि...!’’ अभी वह इतना ही कह पाया था कि एक कॉन्स्टेबल ने आ कर ख़बर दी कि उस शख़्स का पता लग गया है जिससे कल रात सविता देवी का झगड़ा हुआ था।

सब लोग तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। बाहर एक कॉन्स्टेबल खड़ा था। आने वाले कॉन्स्टेबल ने बताया कि रात सविता देवी उसी से झगड़ रही थीं। वह रात में इस तरफ़ से गुज़र रहा था कि सविता देवी ने उसे पुकारा। उसे जल्दी थी, क्योंकि वह गश्त पर जा रहा था। लेकिन वह फिर भी चला आया। सविता देवी ने उसे बताया कि कोई आदमी उनकी मुर्गियों की ताक में है और हमसे इधर का ख़याल रखने को कहा। उसने जवाब दिया कि पुलिस मुर्गियाँ ताकने के लिए नहीं है और फिर वह दूसरी चौकी का कॉन्स्टेबल है, उसी पर बात बढ़ गयी और झगड़ा होने लगा।
 
थाने का दारोग़ा उसे अलग ले जा कर पूछ-ताछ करने लगा और फ़रीदी ने बुलन्द आवाज़ में कहना शुरू किया। ‘‘हाँ तो डॉक्टर, मैं तुमसे यह कह रहा था कि यह ख़ंजर दरअसल तुम्हारे सीने में होना चाहिए था। सविता देवी धोखे में क़त्ल हो गयीं और जब क़ातिल को अपनी ग़लती का पता चलेगा तो वह फिर तुम्हारे पीछे पड़ जायेगा। अब फिर उसी कमरे में चल कर मैं इसका ख़ुलासा करूँगा।’’

इस बात पर सब-के-सब बौखला गये। शौकत घबराहट में जल्दी-जल्दी पलकें झपका रहा था। दारोग़ा जी की आँखें हैरत से फटी हुई थीं और सार्जेंट हमीद उन्हें मज़ाक़िया तौर पर घूर रहा था।

सब लोग फिर लाश वाले कमरे में वापस आये। इन्स्पेक्टर फ़रीदी खिड़की की कॉर्निस पर उतर गया और लाइन से सारे कमरों की खिड़कियों को देख कर लौट आया।

अब मामला बिलकुल ही साफ़ हो गया कि सविता देवी डॉक्टर ही के धोखे में क़त्ल हुई थीं। ‘‘अगर क़ातिल सविता देवी को क़त्ल करना चाहता था तो उसे यह कैसे मालूम हो सकता था कि सविता देवी शौकत के कमरे में सोयी हुई थीं।’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने कहा। ‘‘अगर वह तलाश करता हुआ इस कमरे तक पहुँचा था तो दूसरी खिड़कियों पर भी इस क़िस्म के निशान होने चाहिएँ थे जैसे कि इस खिड़की पर मिले हैं और फिर सविता देवी के क़त्ल की सिर्फ़ एक ही वजह हो सकती थी—उनकी जायदाद। लेकिन अगर उसका फ़ायदा उनके किसी रिश्तेदार को पहुँचता तो वह उन्हें अब से दस बरस पहले ही क़त्ल कर देता या करा देता, जब उन्होंने अपनी जायदाद धर्मशाला के नाम लिखने का सिर्फ़ इरादा ही ज़ाहिर किया था। अब जबकि दस साल गुज़र चुके हैं और जायदाद के बारे में क़ानूनी वसीयत की कार्रवाई पूरी हो चुकी थी, उनके क़त्ल की कोई ठीक-ठाक वजह समझ में नहीं आ सकती थी। अगर क़ातिल चोरी की नीयत से अचानक इस कमरे में दाख़िल हुआ था, जिसमें वे सो रही थीं तो क्या वजह है कि कोई चीज़ चोरी नहीं गयी।’’

‘‘हो सकता है कि इस कमरे में उसके दाख़िल होते ही सविता देवी जाग उठी हों और वह पकड़े जाने के ख़ौफ़ से उन्हें क़त्ल करके कुछ चुराये बग़ैर ही भाग खड़ा हुआ।’’ दारोग़ा जी ने अपना दिमाग़ी तीर मारा।

‘‘माई डियर...!’’ फ़रीदी जोश में बोला, ‘‘मैं साबित कर सकता हूँ कि क़ातिल हमले के बाद काफ़ी देर तक इस कमरे में ठहरा रहा।’’

सब-इन्स्पेक्टर के चेहरे पर कँटीली मुस्कुराहट फैल गयी और सार्जेंट हमीद उसे दाँत पीस कर घूरने लगा।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने कहना शुरू किया। ‘‘जिस वक़्त शौकत ने लाश को देखा, वह सिर से पैर तक कम्बल से ढँकी हुई थी।

ज़ाहिर है कि इससे पहले कोई कमरे में दाख़िल भी न हो सकता था, क्योंकि दरवाज़ा अन्दर से बन्द था। लिहाज़ा लाश पर पहले शौकत ही की नज़र पड़ी। इसलिए किसी और के मुँह ढाँकने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब ज़रा लाश के क़रीब आइए...दारोग़ा जी, मैं आपसे कह रहा हूँ। यह देखिए लाश का निचला होंट दाँतों में दब कर रह गया है। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि क़ातिल ने एक हाथ से सविता देवी का मुँह दबाया था और दूसरे हाथ से वार किया था। फिर फ़ौरन ही मुँह दबाये हुए इनके पैरों पर बैठ गया था ताकि ये हिल न सकें और वह इस हालत में उस वक़्त तक रहा जब तक कि इन्होंने दम न तोड़ दिया। होंट का दाँतों में दबा होना ज़ाहिर कर रहा है कि ये तकलीफ़ के कारण सिर्फ़ इतना कर सकीं कि इन्होंने दाँतों में होंट लिया, लेकिन क़ातिल के हाथ के दबाव की वजह से होंट फिर अपनी असली हालत पर न आ सका और इसी हालत में लाश ठण्डी हो गयी। क़ातिल को अपने मक़सद की कामयाबी पर इतना यक़ीन था कि उसने कम्बल उलट कर अपने शिकार का चेहरा तक देखने की ज़हमत गवारा न की। हो सकता है कि उसने बाद में मुँह खोल कर देखा भी हो।’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी रुका, लेकिन फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘मगर नहीं, अगर ऐसा करता तो फिर दोबारा ढँक देने की कोई ऐसी ख़ास वजह समझ में नहीं आती।’’

‘‘शायद यह ख़ुदकुशी का केस हो।’’ सब-इन्स्पेक्टर ने फिर अपनी क़ाबिलियत दिखायी।

‘‘जनाबे आला...!’’ सार्जेंट हमीद बोला, ‘‘इतनी उम्र हो गयी, लेकिन कम्बल ओढ़ कर आराम से ख़ंजर घोंप लेने वाला एक भी न मिला कि मैं उसकी क़द्र कर सकता।’’

सब-इन्स्पेक्टर ने झेंप कर सिर झुका लिया।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी इन सब बातों को सुनी-अनसुनी करके डॉक्टर शौकत से बोला।

‘‘डॉक्टर...तुम्हारी जान ख़तरे में है। यह प्लान तुम्हारे ही क़त्ल के लिए बनाया गया था। सोच कर बताओ, क्या तुम्हारा कोई ऐसा दुश्मन है जो तुम्हारी जान तक ले लेने में क़सर नहीं छोड़ेगा।’’

‘‘मेरी याददाश्त में तो कोई ऐसा आदमी नहीं। आज तक मेरे सम्बन्ध किसी से ख़राब नहीं रहे; लेकिन ठहरिए...आपको याद होगा कि मैं नेपाली ख़ंजर की बात पर अचानक चौंक पड़ा था...तक़रीबन पन्द्रह दिन पहले की बात है, एक रात मैं एक बहुत ही ख़तरनाक क़िस्म का ऑपरेशन करने जा रहा था कि एक अच्छी हैसियत का नेपाली मेरे पास आया और मुझसे बोला कि मैं उसी वक़्त एक मरीज़ को देख लूँ जिसकी हालत नाज़ुक थी। मैंने मजबूरी ज़ाहिर की तो वह रोने और गिड़गिड़ाने लगा। लेकिन मैं मजबूर था, क्योंकि पहले ही से एक ख़तरनाक केस मेरे पास था। ख़तरा था कि उसी रात उसका ऑपरेशन न किया तो मरीज़ की मौत हो जायेगी। आखिर जब वह नेपाली उदास हो गया तो मुझे बुरा-भला कहते हुए वापस चला गया। दूसरे दिन सुबह जब मैं हस्पताल जा रहा था तो चर्च रोड के चौराहे पर पेट्रोल लेने के लिए रुका। वहाँ मुझे वही नेपाली नज़र आया। मुझे देख कर उसने नफ़रत से बुरा-सा मुँह बनाया और अपनी ज़बान में कुछ बड़बड़ाता हुआ मेरी तरफ़ बढ़ा और मुक्का तान कर कहने लगा। ‘‘‘‘शाला...हमारा आदमी मर गया। अब हम तुम्हारी ख़बर ले लेगा।’’ मैंने हँस कर मोटर स्टार्ट की और आगे बढ़ गया।’’

‘‘हूँ...अच्छा...!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘उसकी शक्ल-सूरत के बारे में कुछ बता सकते हो?’’

‘‘यह ज़रा मुश्किल है, क्योंकि मुझे तो सारे नेपाली एक ही जैसी शक्ल-सूरत के लगते हैं।’’ डॉक्टर शौकत ने जवाब दिया।

‘‘‘‘ख़ैर, अपनी हिफ़ाज़त का ख़ास ख़याल रखो...अच्छा दरोग़ा जी, मेरा काम ख़त्म...डॉक्टर शौकत, मैंने तुमसे वादा किया था कि इस केस को मैं अपने हाथ में लूँगा, लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता। मेरा ख़याल है कि दारोग़ा जी इस काम को बख़ूबी अंजाम देंगे। अच्छा, अब मैं जाना चाहूँगा। हाँ डॉक्टर, ज़रा कार तक चलो, मैं तुम्हारी, हिफ़ाज़त के लिए तुम्हें कुछ हिदायतें देना चाहता हूँ...अच्छा दारोग़ा जी, आदाब अर्ज़ ।’’
 
कार के क़रीब पहुँच कर फ़रीदी ने जेब से एक छोटी-सी पिस्तौल निकाली और डॉक्टर शौकत को थमा दी। ‘‘यह लो,’’ वह बोला, ‘‘हिफ़ाज़त के लिए मैं तुम्हें यह देता हूँ...और कल तक इस का लाइसेन्स भी तुम तक पहुँच जायेगा।’’

‘‘जी नहीं...शुक्रिया, इसकी ज़रूरत नहीं...!’’ डॉक्टर शौकत ने मुँह फुला कर जवाब दिया।

‘‘बेव़कूफ़ आदमी, बिगड़ गये क्या...? क्या सचमुच तुम समझते हो कि मैं इस केस की खोज-बीन नहीं करूँगा। हाँ, उन गधों के सामने मैंने यह केस अपने हाथ में लेने से इनकार कर दिया। ये कमबख़्त सिर्फ़ बड़े अफ़सरों तक शिकायत पहुँचाने ही के क़ाबिल होते हैं।’’ डॉक्टर शौकत के चेहरे पर रौनक़ आ गयी और उसने पिस्तौल ले कर जेब में डाल ली।

‘‘देखो, जब भी कोई ज़रूरत हो, मुझे बुलवा लेना। हो सकता है कि मैं दस बजे रात तक फिर आऊँ। लेकिन तुम होशियार रहना...अच्छा, ख़ुदा हाफ़िज़।’

ड्राइवर ने कार स्टार्ट कर दी। सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

‘‘क्यों भई, कहो, कैसा केस है?’’ फ़रीदी ने सिगार सुलगा कर सार्जेंट हमीद की तरफ़ झुकते हुए कहा। ‘‘मेरे ख़याल में तो ऐसा दिलचस्प केस बहुत दिनों के बाद हाथ आया है।’’

‘‘आप तो दिन-रात केसों ही के ख़्वाब देखा करते हैं। कुछ हसीन दुनिया की तरफ़ भी नज़र दौड़ाइए।’’ हमीद बेज़ारी से बोला।

‘‘तो इसका मतलब है कि तुम इसमें दिलचस्पी न लोगे।’’

‘‘बस, मुझे तो माफ़ ही रखिए। मैंने सैर-सपाटे के लिए एक महीने की छुट्टी ली है। मुझे अपनी छुट्टियाँ बर्बाद नहीं करनी।’’

‘‘बेकारी में तुम्हारा दिल न घबरायेगा...?’’

‘‘बेकारी कैसी!’’ हमीद जल्दी से बोला। ‘‘क्या आपको मालूम नहीं कि मैंने अभी हाल ही में एक इश्क़ किया है?’’

‘‘एक...!’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा। ‘‘अगर इस तफ़तीश के दौरान कई इश्क़ और हो जायें तो क्या बुरा है!’’

‘‘शायद आपका इशारा डॉक्टर शौकत की नौजवान नौकरानी की तरफ़ है।’’ हमीद मुँह बना कर बोला। ‘‘माफ़ कीजिए...मेरा कैरेक्टर इतना भी गिरा हुआ नहीं है।’’

‘‘बड़े गधे हो तुम...मुझे उसका ख़याल भी न था।’’ फ़रीदी ने सिगार मुँह से निकाल कर कहा। ‘‘ख़ैर, हटाओ...कोई और बात करें। हाँ भई, सुना है कि दो-तीन दिन हुए रेलवे ग्राउण्ड पर सर्कस आया हुआ है; बहुत तारीफ़ सुनी है; चलो, आज सर्कस देखें। सिर्फ़ साढ़े चार बजे हैं। खेल सात बजे शुरू होगा। इतनी देर में हम लोग खाना भी खा लेंगे।’’

‘‘अरे...यह क्या बदपरहेज़ी करने जा रहे हैं। अरे, लाहौल वला....आप और ये बेकार के शौक़...यक़ीन नहीं आता। क्या आपने जासूसी से तौबा कर ली?’’ हमीद ने अजीब-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘तुमने यह कैसे समझ लिया कि वहाँ मैं बेमतलब जा रहा हूँ? तुम देखोगे कि जासूसी कैसे की जाती है।’’ फ़रीदी ने जवाब दिया।

‘‘माफ़ कीजिएगा...इस वक़्त तो आप किसी चालीस रुपये वाले जासूसी नावेल के जासूस की तरह बोल रहे हैं।’’ हमीद बोला।

‘‘तुमने तो सर्कस का विज्ञापन देखा होगा। भला बताओ उसमें किस खेल की ज़्यादा तारीफ़ की गयी थी?’’

‘‘एक नेपाली का मौत के ख़ंजर का खेल।’’ हमीद ने जवाब दिया। फिर उछल कर कहने लगा। ‘‘क्या मतलब...!’’

फ़रीदी ने इसके सवाल को टालते हुए कहा। ‘‘अच्छा, इस खेल में है क्या?...तुम तो एक बार शायद देख भी आये हो।’’

‘‘हाँ, एक लड़की, लकड़ी के तख़्ते से लग कर खड़ी हो जाती है और नेपाली इस तरह ख़ंजर फेंकता है कि वे उसके चारों तरफ़ लकड़ी के तख़्ते में चुभते जाते हैं। आखिर में जब वह इन ख़ंजरों के बीच से निकलती है तो लकड़ी के तख़्ते पर चुभे हुए ख़ंजरों में उसका ख़ाका-सा बना रह जाता है। भई, वाक़ई कमाल है, अगर ख़ंजर एक इंच भी आगे-पीछे बढ़ कर पड़े तो लड़की का काम-तमाम हो जाये।’’

‘‘अच्छा, इन ख़ंजरों की लम्बाई क्या होगी?’’ फ़रीदी ने सिगार का कश ले कर कहा।

‘‘मेरे ख़याल से वे ख़ंजर वैसे ही हैं जैसा कि आपने लाश के सीने से निकाला था।’’

‘‘बहुत ख़ूब...!’’ फ़रीदी इत्मीनान से बोला। ‘‘अच्छा, तो यह बताओ कि ख़ंजर का कितना हिस्सा लकड़ी के तख़्ते में घुस जाता है?’’

‘‘मेरे ख़याल में चौथाई।’’

‘‘मामूली ताक़त वाले के बस का रोग नहीं।’’ फ़रीदी ने हमीद की पीठ ठोंकते हुए जोश में कहा—‘‘अच्छा, मेरे दोस्त, आज सर्कस ज़रूर देखा जायेगा।’’

‘‘आखिर आपका मतलब क्या है?’’ हमीद बेचैनी से बोला।

‘‘फ़िलहाल तो कोई ख़ास मतलब नहीं। अभी तो मेरी स्कीम किसी चालीस रुपये वाले नावेल के जासूस ही की स्कीम की तरह मालूम हो रही है, आगे अल्लाह मालिक है।’’

‘‘आखिर कुछ बताइए तो...!’’

‘‘शायद सविता देवी के क़त्ल में उसी नेपाली का हाथ हो।’’

‘‘यूँ तो क़त्ल में मेरा भी हाथ हो सकता है।’’ हमीद हँस कर बोला।

‘‘तुम नहीं समझते...एक लम्बी-चौड़ी औरत की लाश को फड़कने से रोक देना किसी कमज़ोर आदमी का काम नहीं। एक ज़िबह किये हुए मुर्ग़ को सँभालना मुश्किल हो जाता है। फिर जिस शख़्स ने डॉक्टर शौकत को धमकी दी थी, वह भी नेपाली ही था। ऐसी सूरत में क्यों न हम इस शक से फ़ायदा उठायें। मैं यह पक्के तौर पर नहीं कहता कि क़त्ल में सर्कस वाले नेपाली ही का हाथ है। फिर भी देख लेने में क्या नुक़सान है? अगर कोई सुराग़ न मिल सका तो सैर ही हो जायेगी।’’

‘‘ख़ैर, मैं सर्कस देखने से इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें तक़रीबन दो दर्जन लड़कियाँ काम करती हैं, लेकिन मैं यह भी नहीं चाहता कि वहाँ खेल के दौरान आप बहस करके मेरा मज़ा किरकिरा करें।’’

‘‘तुम चलो तो सही...मुझे यह भी मालूम है।’’ फ़रीदी ने बुझा हुआ सिगार दोबारा सुलगा कर कहा।

शहर पहुँच कर उनकी हैरत का कोई ठिकाना न रहा जब उन्होंने ‘‘ईवनिंग न्यूज़’’ में निशात नगर के क़त्ल की ख़बर पढ़ी। उसमें इन्स्पेक्टर फ़रीदी की बातचीत का एक-एक शब्द लिखा था और यह भी लिखा था कि इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने निजी तौर पर मौक़ा-ए-वारदात का मुआइना किया था, लेकिन उन्होंने निजी तौर पर ख़ूनी को ढूँढने से इनकार कर दिया है। साथ ही यह भी लिखा था कि इन्स्पेक्टर फ़रीदी छै माह की छुट्टी पर हैं। इसलिए ख़याल होता है कि शायद सरकारी तौर पर भी यह काम उनके ज़िम्मे न किया जाये।

‘‘मेरे ख़याल से जिस शख़्स को हम लोग डॉक्टर का पड़ोसी समझ रहे थे, वह ‘‘ईवनिंग न्यूज़’’ का रिपोर्टर था।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘अब तक तो हालात हमारे ही फ़ेवर में हैं। इस ख़बर का आज ही छप जाना बहुत अच्छा हुआ। अगर वाक़ई सर्कस वाला नेपाली ही क़ातिल है तो हम आसानी से उस पर इस ख़बर का असर देख सकेंगे।’’

‘‘हूँ...!’’ हमीद कुछ सोचते हुए यूँ ही बोला।

‘‘क्या कोई नयी बात सूझी?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘मैं कहता हूँ, आखिर सिरदर्द मोल लेने से क्या फ़ायदा? क्यों न हम लोग अपनी छुट्टियाँ हँसी-ख़ुशी गुज़ारें।’’

‘‘अच्छा, बकवास बन्द।’’ फ़रीदी झल्ला कर बोला। ‘‘अगर तुम मेरा साथ नहीं देना चाहते, तो न दो। मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा।’’

‘‘आप तो ख़फ़ा हो गये। मेरा मतलब यह था कि अगर आप भी इस छुट्टी में एक-आधा इश्क़ कर लेते तो अच्छा था।’’ हमीद ने मुँह बना कर कुछ इस अन्दाज़ में कहा कि फ़रीदी मुस्कुराये बग़ैर न रह सका।

‘‘अच्छा, तो खाना इस वक़्त मेरे ही साथ खाना।’’ फ़रीदी ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा।

‘‘सिर-आँखों पर...!’’ हमीद ने संजीदगी से कहा। ‘‘भला मैं अपने अफ़सर का हुक्म किस तरह टाल सकता हूँ।’’

वे दोनों सर्कस शुरू होने से पन्द्रह मिनट पहले ही रेलवे ग्राउण्ड पहुँच गये और बॉक्स के दो टिकट ले कर रिंग के सबसे क़रीब वाले सोफ़े पर जा बैठे। दो-चार खेलों के बाद असली खेल शुरू हुआ। एक नाटे क़द का मज़बूत नेपाली एक ख़ूबसूरत लड़की के साथ रिंग में दाख़िल हुआ।

‘‘ग़ज़ब की लौंडिया है।’’ हमीद ने धीरे से कहा।

‘‘हश्श...हश्श...!’’ फ़रीदी नेपाली को ग़ौर से देख रहा था।
 
‘‘भाइयो और बहनो...!’’ रिंग लीडर की आवाज़ गूँजी। ‘‘अब दुनिया का सब से ख़ौफ़नाक खेल शुरू होने वाला है। यह लड़की उस लकड़ी के तख़्ते से लग कर खड़ी हो जायेगी और यह नेपाली अपने ख़ंजर से लड़की के चारों तरफ़ उसका ख़ाका बनायेगा। नेपाली की ज़रा-सी ग़लती या लड़की की हल्की-सी हरकत उसे मौत की गोद में पहुँचा सकती है, लेकिन देखिए कि यह लड़की मौत का मुक़ाबला किस हिम्मत से करती है और उस नेपाली का हाथ कितना सधा हुआ है। आइए, देखते हैं।’’

खट...! एक सनसनाता हुआ ख़ंजर लड़की के सिर के बालों को छूता हुआ लकड़ी के तख़्ते में तीन इंच धँस गया। लड़की सिर से पैर तक काँप गयी। रिंग मास्टर ने नेपाली की तरफ़ हैरत से देखा और उसके माथे पर कुछ लकीरें दिखने लगीं। देखने वालों पर सन्नाटा छा गया।

खट...! दूसरा ख़ंजर लड़की के कन्धे के क़रीब फ़्रॉक के पफ़ का छेदता हुआ तख़्ते में धँस गया...लड़की का चेहरा दूध की तरह सफ़ेद नज़र आने लगा। रिंग लीडर परेशान हो कर रिंग का चक्कर काटने लगा। नेपाली खड़ा दिसम्बर की सर्दी में अपने चेहरे से पसीना पोंछ रहा था।

‘‘क्या उस दिन भी ये ख़ंजर जिस्म के इतने क़रीब लगे थे।’’ फ़रीदी ने झुक कर हमीद से पूछा।

‘‘हरगिज़ नहीं...हरगिज़ नहीं।’’ हमीद ने बेताबी से कहा। ‘‘इनकी दूरी तीन या चार इंच थी...!’’

‘‘खट...!’’ अब की बार लड़की के मुँह से चीख़ निकल गयी। उसके बाज़ू से ख़ून निकल रहा था। फ़रीदी ने नेपाली को शराबियों की तरह लड़खड़ाते हुए रिंग के बाहर जाते देखा। फ़ौरन ही पाँच-छै जोकरों ने रिंग में आ कर उछल-कूद मचा दी।

‘‘भाइयो और बहनो....!’’ रिंग मास्टर की आवाज़ दोबारा गूँजी।

‘‘मुझे इस वाक़ये पर हैरत है। नेपाली पन्द्रह-बीस बरस से हमारे सर्कस में काम कर रहा है, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ। ज़रूर वह कुछ बीमार है, जिसका पता हमें न था। बहरहाल, अभी बहुत-से दिलचस्प खेल बाक़ी हैं।’’

‘‘आओ, चलें...!’’ फ़रीदी ने हमीद का हाथ पकड़ कर उठते हुए कहा।

कई तम्बुओं के बीच से गुज़रते हुए वे थोड़ी देर बाद मैनेजर के दफ़्तर के सामने पहुँच गये। फ़रीदी ने चपरासी से अपना विज़िटिंग कार्ड अन्दर भिजवा दिया।

मैनेजर उठ कर हाथ मिलाते हुए गर्मजोशी से बोला, ‘‘जी कहिए, कैसे तकलीफ़ फ़रमायी?’’

‘‘मैं ख़ंजर वाले नेपाली के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ।’’

‘‘क्या कहूँ इन्स्पेक्टर साहब...मुझे ख़ुद हैरत है। आज तक ऐसा वाक़या नहीं हुआ। मुझे सख़्त शर्मिन्दगी है। क्या क़ानूनन मुझे इसके लिए जवाब देना पड़ेगा? कुछ समझ ही में नहीं आता। आज कई दिन से इसकी हालत बहुत ख़राब है। वह बेहद शराब पीने लगा है। हर वक़्त नशे में डींगें मारता रहता है। अभी कल ही अपने एक साथी से कह रहा था कि मैं अब इतना दौलतमन्द हो गया हूँ कि मुझे नौकरी की भी परवाह नहीं। उसने उसे नोटों की कई गड्डियाँ भी दिखायी थीं।’’

‘‘उसकी यह हालत कब से है?’’

‘‘मेरा ख़याल है कि राजरूप नगर में जब पड़ाव था, तभी से हमें इसकी हरकतों में बदलाव नज़र आने लगा था।’’

‘‘राजरूप नगर....!’’ हमीद ने चौंक कर कहा। लेकिन फ़रीदी ने उसके पैर पर अपना पैर रख दिया।

‘‘क्या राजरूप नगर में भी आपकी कम्पनी ने खेल दिखाये थे?’’

‘‘जी नहीं....वहाँ कहाँ...वह तो एक क़स्बा है। हम लोग वहाँ ठहर कर अपने दूसरे क़ाफ़िले का इन्तज़ार कर रहे थे।’’

‘‘राजरूप नगर...वही तो नहीं जो नवाब वजाहत मिर्ज़ा की जागीर है?’’

‘‘जी हाँ...जी हाँ, वही।’’

‘‘क्या यह नेपाली पढ़ा-लिखा है?’’

‘‘जी हाँ...मैट्रिक पास है।’’

‘‘मैं उससे भी कुछ सवाल करना चाहता हूँ।’’

‘‘ज़रूर-ज़रूर....मेरे साथ चलिए। लेकिन ज़रा हमारा भी ख़याल रखिएगा। मैं नहीं चाहता कि कम्पनी का नाम बदनाम हो।’’

‘‘आप परेशान न हों।’’

वे तीनों तम्बुओं की क़तारों से गुज़रते हुए एक तम्बू के सामने रुक गये।

‘‘अन्दर चलिए....!’’ मैनेजर बोला।

‘‘नहीं, सिर्फ़ आप जाइए। आप उससे हमारे बारे में कहिएगा। अगर मिलना पसन्द करेगा तो हम लोग मिलेंगे, वरना नहीं।’’ फ़रीदी ने कहा।

मैनेजर पहले तो कुछ देर तक हैरत से उन्हें देखता रहा, फिर अन्दर चला गया। फ़रीदी ने अपनी आँखें ख़ेमे की जाली से लगा दीं। नेपाली अभी तक खेल ही के कपड़े पहने हुए था। वह बहुत परेशान नज़र आ रहा था। मैनेजर के दाख़िल होते ही वह उछल कर खड़ा हो गया। लेकिन फिर उसके चेहरे पर फैली चिन्ता की लकीरें धीरे-धीरे मिटने लगीं।

‘‘ओह...आप हैं। मैं समझा...जी, कुछ नहीं। मुझे सख़्त शर्मिन्दगी है।’’ वह रुक-रुक कर बोला।

‘‘तो क्या तुम किसी और का इन्तज़ार कर रहे थे?’’ मैनेजर ने कहा।

‘‘ज-ज-जी...!’’ वह हकलाने लगा। ‘‘न-न-नहीं...ब-ब- बिलकुल नहीं।’’

बाहर फ़रीदी ने गहरी साँस ली और उसकी आँखों में अजीब क़िस्म की वहशियाना चमक पैदा हो गयी।

‘‘मैं माफ़ी चाहता हूँ...मुझे अफ़सोस है।’’ नेपाली ख़ुद को सँभाल कर बोला।

‘‘मैं इस वक़्त उस मामले पर बात करने नहीं आया हूँ।’’ मैनेजर बोला। ‘‘बात दरअसल यह है कि एक साहब तुमसे मिलना चाहते हैं।’’

नेपाली बुरी तरह काँपने लगा।

‘‘मुझसे मिल...मिलना चाहते हैं।’’ वह बदहवास हो कर बैठते हुए हकलाया। ‘‘मगर मैं नहीं मिलना चाहता। वे मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं?’’

‘‘मैं यही बताने के लिए मिलना चाहता हूँ कि मैं क्यों मिलना चाहता हूँ।’’ फ़रीदी ने तम्बू में प्रवेश करते हुए कहा। उसके पीछे हमीद भी था।

‘‘मैं ख़ुफ़िया पुलिस का इन्स्पेक्टर....!’’ फ़रीदी ने जल्दी से कहा।
 
‘‘ख़ुफ़िया पुलिस.....!’’ वह इस तरह बोला जैसे कोई ख़्वाब में बड़बड़ाता है। ‘‘लेकिन क्यों...आखिर आप मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं?’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान करना नहीं चाहता, लेकिन तुम अगर मेरे सवालों का सही-सही जवाब दोगे तो फिर तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं। क्या तुम कल रात निशात नगर, डॉक्टर शौकत की कोठी पर गये थे?’’ फ़रीदी ने यह सवाल बहुत ही सादगी से पूछा। लेकिन इसका असर किसी बम के धमाके से कम न था। नेपाली तेज़ी से उछल पड़ा। फ़रीदी को अब पूरा यक़ीन हो गया।

‘‘नहीं-नहीं...!’’ वह कँपकँपाती हुई आवाज़ में चीख़ा।

‘‘तुम सफ़ेद झूठ बोल रहे हो...’’

‘‘मैं वहाँ क्यों जाता...नहीं...यह झूठ है...पक्का झूठ।’’

‘‘इससे कोई फ़ायदा नहीं मिस्टर...!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘मैं जानता हूँ कि कल रात तुम डॉक्टर शौकत को क़त्ल करने गये और उसके धोखे में सविता देवी को क़त्ल कर आये। अगर तुम सचमुच बता दोगे तो मैं तुम्हें बचाने की कोशिश करूँगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हें वहाँ किसी दूसरे ने क़त्ल करने के लिए भेजा था।’’

‘‘आप मुझे बचाने की कोशिश करेंगे।’’ वह बेबसी से बोला। ‘‘ओह, मेरे ख़ुदा...मैंने भयानक ग़लती की।’’

‘‘शाबाश! हाँ, आगे कहो।’’ फ़रीदी नर्म लहजे में बोला। सर्कस का मैनेजर उन्हें हैरत और ख़ौफ़ की नज़रों से देख रहा था।

नेपाली इन्स्पेक्टर फ़रीदी के इस अचानक हमले से पहले ही हथियार डाल चुका था। उसने एक बेबस बच्चे की तरह कहना शुरू किया...‘‘जी हाँ...मैं ज़रूर बताऊँगा। मगर मैं ब़ेकसूर हूँ। आपने कहा कि आप मुझे बचा लेंगे। उसने मुझे पचास हज़ार रुपये पेशगी दिये थे और क़त्ल के बाद पचास हज़ार रुपये और देने का वादा किया था। उफ़! मैंने क्या किया...उसका नाम...हाँ, उसका नाम है...अर्र..र्र...हा...उफ़...!’’ वह चीख़ कर आगे की तरफ़ झुक गया।

‘‘वह देखो...!’’ सार्जेंट हमीद चीख़ा।

किसी ने तम्बू के पीछे से नेपाली पर हमला किया था। ख़ंजर तम्बू के कपड़े की दीवार फाड़ता हुआ उसकी पीठ में घुस गया था। वह स्टूल पर बैठे-बैठे दो-तीन बार तड़पा और फिर देखते-ही-देखते फ़र्श पर जा गिरा।

‘‘हमीद...बाहर...बाहर...देखो, जाने न पाये।’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी ग़ुस्से में चिल्लाया।

चीख़ की आवाज़ सुन कर कुछ और लोग भी भागे आये। सब ने मिल कर क़ातिल को तलाश करना शुरू किया, लेकिन बेकार...मैनेजर घबराहट की वजह से बेहोश हो गया।

कोतवाली ख़बर पहुँचा दी गयी...थोड़ी देर बाद कई कॉन्स्टेबल और दो सब-इन्स्पेक्टर मौक़ा-ए-वारदात पर पहुँच गये।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी को वहाँ देख कर उन्हें सख़्त हैरत हुई। फ़रीदी ने उन्हें सारा हाल बता दिया। मृतक के इक़रार-ए-जुर्म का गवाह मैनेजर था, इसलिए मैनेजर का बयान हो रहा था। इन्स्पेक्टर फ़रीदी और सार्जेंट हमीद का वहाँ रुकना समय नष्ट करने जैसा था, इसलिए दोनों वहाँ से रवाना हो गये।

उनकी कार तेज़ी से निशात नगर की तरफ़ जा रही थी।

‘‘क्यों भई, रहा न वही...चालीस रुपये वाले जासूसी नावेल वाला मामला?’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा।

‘‘अब तो मुझे भी दिलचस्पी हो चली है।’’ हमीद ने कहा। ‘‘लेकिन यह तो बताइए कि आपको यक़ीन कैसे हुआ था कि वही क़ातिल है?’’

‘‘यक़ीन कहाँ, सिर्फ़ शक था, लेकिन मैनेजर से बातचीत करने के बाद कुछ-कुछ यक़ीन हो चला था कि साज़िश में किसी दूसरे का हाथ ज़रूर था। मैं यह भी सोच रहा था कि क़त्ल के सिलसिले में अपनी ग़लती का एहसास हो जाने के बाद ही से उसकी हालत ख़राब हो गयी थी। यही वजह थी कि खेल के वक़्त उसका हाथ बहक रहा था और अब उसे शायद उस आदमी का इन्तज़ार था, जिसने उसे क़त्ल के लिए बहकाया था। इस ग़लती की जवाबदेही के ख़याल ने उसे और भी परेशान कर रखा था। इन्हीं सब चीज़ों को मद्देनज़र रख कर मैंने ख़ुद पहले उसके तम्बू में जाना ठीक नहीं समझा। मैनेजर को अन्दर भेज कर मैं जाली से उसके हाव-भाव देखने लगा। जाली से तो तुम भी देख रहे थे।’’

‘‘बहरहाल, आज से मैं आपका पूरा-पूरा शागिर्द हो गया।’’ हमीद ने कहा।

‘‘क्या कहा, आज से...क्या पहले न थे?’’ फ़रीदी ने हँस कर पूछा।

‘‘नहीं, पहले भी था।’’ हमीद ने जवाब दिया और दोनों ख़ामोश हो गये। इन्स्पेक्टर फ़रीदी आगे के लिए प्रोग्राम बना रहा था।

फाटक पर कार की आवाज़ सुन कर डॉक्टर शौकत बाहर निकल आया था। इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने सारी कहानी उसे बता दी।

फिर फ़रीदी ने शौकत के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा। ‘‘तुम्हारा असली दुश्मन अब भी आज़ाद है और वह किसी वक़्त भी तुम्हें नुक़सान पहुँचा सकता है। इसलिए अब भी तुमको सावधानी की ज़रूरत है। मैं कोशिश करूँगा कि असली मुजरिम को बहुत जल्दी गिरफ़्तार करके क़ानून के हवाले कर दूँ।’’
 
क़ातिल की नयी चाल

इन्स्पेक्टर फ़रीदी को अफ़सोस था कि सरकारी तौर पर वह इस केस का इंचार्ज नहीं हो सकता था। अभी उसकी छुट्टी ख़त्म होने में दो महीने बाक़ी थे। उसे इस बात का भी ख़याल था कि दूसरे क़त्ल के बाद से इस मामले में उसकी दख़लअन्दाज़ी का हाल अफ़सरों को ज़रूर मालूम हो जायेगा, जो किसी तरह मुनासिब नहीं था। लेकिन उसे इसकी परवाह न थी। नौकरी की परवाह उसे न पहले कभी थी और न ही अब थी। यह नौकरी वह शौक़िया कर रहा था, वरना वह इतना दौलतमन्द था कि इसके बग़ैर भी अमीरों की-सी ज़िन्दगी ग़ुजार सकता था।

दूसरी वारदात के अगले दिन सुबह जब वह सो कर उठा तो उसे मालूम हुआ कि चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब का अर्दली बहुत देर से उसका इन्तज़ार कर रहा है। पूछने पर पता चला कि चीफ़ साहब अपने बँगले पर बेसब्री से उसका इन्तज़ार कर रहे हैं और पुलिस कमिश्नर साहब भी वहाँ मौजूद हैं। फ़रीदी का माथा ठनका। लेकिन फ़ौरन ही उसने बेकार के ख़यालों को अपने ज़ेहन से निकाल फेंका और नाश्ता करने के बाद चीफ़ साहब के बँगले की तरफ़ निकल पड़ा।

‘‘हैलो फ़रीदी।’’ चीफ़ साहब ने उसको देखते ही तपाक से कहा। ‘‘हम लोग तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रहे थे।’’

‘‘मुझे ज़रा देर हो गयी।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘इस वक़्त एक अहम मामले पर बातचीत करने के लिए आपको तकलीफ़ दी गयी है।’’ पुलिस कमिश्नर ने अपना सिगार केस उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।

‘‘शुक्रिया।’’ फ़रीदी ने सिगार लेते हुए कहा। ‘‘फ़रमाइए।’’

‘‘मिस्टर फ़रीदी...चौबीस घण्टे के अन्दर इस इलाक़े में दो वारदातें हुई हैं। उनसे आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं।’’ पुलिस कमिश्नर साहब ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा। ‘‘और आप यह भी जानते हैं कि ट्रांसफ़र हो कर यहाँ आये हुए मुझे सिर्फ़ दस दिन हुए हैं। ऐसी सूरत में मेरी बहुत बदनामी होगी। सिविल पुलिस तो बिलकुल नाकारा है और मामला बहुत पेचीदा है। क्या ऐसा हो सकता है कि आप अपनी बाक़ी की छुट्टियाँ फ़िलहाल कैन्सिल करा दें और इसका ज़िम्मा मैं लेता हूँ कि क़ातिल का पता लग जाने के बाद मैं आपको दो की बजाय चार महीने की छुट्टी दिला दूँगा। यह मेरी दोस्ताना राय है। इससे अफ़सरी और महकमे का कोई ताल्लुक़ नहीं।’’

‘‘जी, मैं हर वक़्त और हर ख़िदमत के लिए हाज़िर हूँ।’’ फ़रीदी ने अपनी आरज़ू पूरी होते देख कर कहा।

‘‘बहुत-बहुत शुक्रिया।’’ पुलिस कमिश्नर साहब इत्मीनान की साँस ले कर बोले। ‘‘कल रात आप अपना बयान दे कर चले आये थे। इसके बाद नेपाली के तम्बू की तलाशी लेने पर चालीस हज़ार रुपये के नोट बरामद हुए, जो उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा थे। इन रुपयों के अलावा कोई और चीज़ ऐसी न मिल सकी, जिससे उसके क़ातिल का पता लग सकता। बहरहाल, सविता देवी के क़ातिल के सुराग़ का सेहरा तो आप ही के सिर है। लेकिन अब उसके क़ातिल के क़ातिल का पता लगाना बहुत ज़रूरी है और यह काम सिवा आपके और कोई नहीं कर सकता। मैंने कल रात ही ये दोनों केस डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के ज़िम्मे कर दिये हैं अब इसके आगे का प्रोग्राम आपको चीफ़ इन्स्पेक्टर बतायेंगे।’’

‘‘और मैं तुमको इस केस का इंचार्ज बनाता हूँ।’’ चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब ने, जो अब तक दोनों की बातें ग़ौर से सुन रहे थे, आगे कहा। ‘‘इसके काग़ज़ात दस बजे तक तुम्हें मिल जायेंगे।’’

‘‘यह तो आप जानते हैं कि मैं शुरू ही से केस की तफ़तीश कर रहा हूँ,’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने कहा, ‘‘और मैंने इस सिलसिले में अपना काम करने का तरीक़ा भी ढूँढ लिया है। लेकिन आपसे यह गुज़ारिश है कि आप यही ज़ाहिर होने दें कि मैं छुट्टी पर हूँ और यह मामला अभी तक डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन तक नहीं पहुँचा है।’’

‘‘तो इस केस में भी तुम अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़ अकेले ही काम करोगे?’’ चीफ़ इन्स्पेक्टर पुलिस ने कहा। ‘‘यह आदत ख़तरनाक है।’’

‘‘मुझे अफ़सोस है कि कुछ कारणों के चलते मैं यह ज़ाहिर नहीं करना चाहता हूँ और मुझे यही तरीक़ा अपनाना पड़ेगा। अच्छा, अब इजाज़त चाहता हूँ।’’
 
इन्स्पेक्टर फ़रीदी के घर पर सार्जेंट हमीद उसका इन्तज़ार कर रहा था। उसकी आँखों से मालूम हो रहा था जैसे वह रात भर न सोया हो। फ़रीदी के घर पहुँचते ही वह बेताबी से उसकी तरफ़ बढ़ा।

‘‘कहो.... ख़ैरियत तो है?’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘तुम कुछ परेशान से मालूम होते हो।’’

‘‘कुछ क्या...मैं बहुत परेशान हूँ।’’ हमीद ने कहा।

‘‘आखिर बात क्या है?’’

‘‘कल रात तक़रीबन एक बजे मैं आपके घर से रवाना हुआ। थोड़ी दूर चलने के बाद मैंने महसूस किया कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। पहले तो ख़याल हुआ कि कोई राहगीर होगा, लेकिन जब मैंने अपना शक दूर करने के लिए यूँ ही बेमतलब गलियों में घुसना शुरू किया तो मेरा शक यक़ीन की हद तक पहुँच गया, क्योंकि वह अब भी मेरा पीछा कर रहा था। ख़ैर, मैंने घर पहुँच कर ताला खोला और किवाड़ बन्द करके उसकी झिरी से झाँकता रहा। मेरा पीछा करने वाला अब मेरे मकान के सामने खड़ा दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था। फिर वह आगे बढ़ गया। मैं दबे पाँव बाहर निकला और अब मैं उसका पीछा कर रहा था। इस क़िस्म का पीछा कम-से-कम मेरे लिए नया तजरुबा था, क्योंकि पीछा करते-करते पाँच बज गये। ऐसा मालूम होता था जैसे वह यों ही आवारागर्दी करता फिर रहा है।

‘‘मुझे अफ़सोस है कि मैं उसका चेहरा न देख सका, क्योंकि उसने अपने चेस्टर का कॉलर खड़ा कर रखा था और उसकी नाइट कैप उसके चेहरे पर झुकी हुई थी। तक़रीबन पाँच बजे वह बॉटम रोड और बेली रोड के चौराहे पर रुक गया। वहाँ एक कार खड़ी थी। वह उसमें बैठा और कार तेज़ी से उत्तर की तरफ़ रवाना हो गयी। वहाँ उस वक़्त मुझे कोई सवारी न मिल सकी। इसलिए तीन मील पैदल चल कर आ रहा हूँ। रात से अब तक मैंने शायद पन्द्रह मील का चक्कर लगाया होगा।’’

‘‘तुम्हारी नयी कहानी तो बहुत दिलचस्प रही।’’ फ़रीदी कुछ सोचते हुए बोला।

फिर वह थोड़ी देर तक तो चुप रहा। उसकी आँखें इस तरह धुँधला गयीं जैसे उसे नींद आ रही हो। फिर अचानक उनमें एक तरह की वहशियाना चमक पैदा हो गयी और उसने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया।

‘‘क्या कहा तुमने!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘वह बॉटम रोड के चौराहे से उत्तर की तरफ़ चला गया?’’

‘‘जी हाँ।’

‘‘और तुम्हें शायद मालूम न होगा कि इसी चौराहे से अगर तुम दक्खिन की तरफ़ चलो तो पन्द्रह मील चलने के बाद तुम राजरूप नगर पहुँच जाओगे। अब मुझे यक़ीन हो गया है कि क़ातिल का सुराग़ राजरूप नगर ही में मिल सकेगा। देखो, अगर वह सचमुच तुम्हारा पीछा कर रहा होता तो तुम्हें इसका एहसास तक न होने देता। उसने जान-बूझ कर ऐसा किया ताकि तुम उसके पीछे लग जाओ और वह उसी चौराहे से दक्षिण की तरफ़ जाने की बजाय उत्तर की तरफ़ जा कर मेरे दिल से उस ख़याल को निकाल दे कि असली मुजरिम राजरूप नगर का रहने वाला है। ओह मेरे ख़ुदा, तो इसका मतलब है कि वह नेपाली के क़त्ल के पहले से हम लोगों के क़रीब रहा और उसने मैनेजर के दफ़्तर में भी हमारी बातचीत सुनी; वहीं राजरूप नगर की बात आयी थी। अख़बार में तो इसका कोई हवाला नहीं था...मुजरिम मामूली दिमाग़ का आदमी नहीं मालूम होता। क्या तुम उसका हुलिया बता सकते हो।’’

यह तो मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मैं उसका चेहरा नहीं देख सका।’’ हमीद ने कुछ सोच कर कहा। ‘‘लेकिन ठहरिए, उसमें एक ख़ास बात थी जिसकी बिना पर वह पहचाना जा सकता है। उसकी पीठ पर बड़ा-सा कूबड़ था।’’

‘‘अमाँ छोड़ो भी...कूबड़ कोट के नीचे बहुत-सा कपड़ा ठूँस कर भी बनाया जा सकता है। अगर वह सचमुच कुबड़ा होता तो तुम्हें पीछे आने की दावत ही न देता।’’

‘‘वल्लाह, आपने तो जेम्स बॉण्ड के भी कान काट लिये।’’ हमीद हँस कर बोला।

‘‘तुमने फिर वही जासूसी नावेलों के जासूसों के हवाले देने शुरू कर दिये।’’ फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘सच! मैं मज़ाक नहीं उड़ा रहा हूँ।’’

ख़ैर, हटाओ....मैं इस वक़्त राजरूप नगर जा रहा हूँ।’’

‘‘यह आपने बहुत अच्छा किया कि आप अकेले राजरूप नगर जा रहे हैं। मैं रात भर नहीं सोया।’’

‘‘अगर तुम सोते भी होते तो भी मैं तुम्हें अपने साथ न ले जाता, क्योंकि तुम छुट्टी पर हो और मैंने अपनी छुट्टियाँ कैन्सिल करा दी हैं और यह केस सरकारी तौर पर मुझे दिया गया है।’’

‘‘कब से...?’’ हमीद ने हैरान हो कर पूछा।

‘‘अभी-अभी...!’’ फ़रीदी ने जवाब दिया और सारी बात बता दी।

‘‘तो फिर वाक़ई आप अकेले जायेंगे?’’ हमीद ने कहा। ‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि आपने अपने काम करने का तरीक़ा सोच लिया है?’’

‘‘बिलकुल...!’’ फ़रीदी ने जवाब दिया। ‘‘कल रात मैंने तुम्हारे जाने के बाद ही राजरूप नगर के सिलसिले में बहुत-सी जानकारी हासिल की है। जैसे कि राजरूप नगर नवाब साहब वजाहत मिर्ज़ा की जागीर है और नवाब साहब बहुत ज़्यादा दिमाग़ी तौर पर बीमार हैं; मुझे यह भी मालूम हुआ है कि वे तक़रीबन पन्द्रह रोज़ से दिन-रात सो रहे हैं या दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि बेहोश हैं। उनके फ़ैमिली डॉक्टर की राय है कि सिर का ऑपरेशन कराया जाये। लेकिन उनका इलाज इस समय कर्नल तिवारी कर रहे हैं, जो पुलिस हस्पताल के इंचार्ज हैं, और वे ऑपरेशन के ख़िलाफ़ हैं। इस सिलसिले में जो दूसरी बात मालूम हुई है, वह यह है कि नवाब साहब के कोई औलाद नहीं है; उनके साथ उनका सौतेला भतीजा और उनकी बेवा बहन अपनी जवान लड़की के साथ रहती है। मुझे जहाँ तक पता चला है कि नवाब साहब ने अपनी जागीर के सिलसिले में अभी तक किसी प्रकार का कोई वसीयतनामा नहीं लिखा है। क्या यह मुमकिन नहीं कि उनकी बेवा बहन या सौतेले भतीजे में से कोई भी, इस जायदाद के लालच में, यह ख़्वाहिश नहीं रख सकता कि नवाब साहब होश में आने से पहले ही मर जायें? हो सकता है कि उसी मक़सद के तहत दिमाग़ी बीमारियों के मशहूर डॉक्टर शौकत को क़त्ल करा देने की कोशिश की गयी हो? महज़ इस डर से कि कहीं नवाब साहब उससे इलाज न करवाने लगें, क्योंकि उनका फ़ैमिली डॉक्टर ऑपरेशन पर ज़ोर दे रहा था।’’ फ़रीदी इतना कह कर ख़ामोश हो गया।

‘‘आपकी दलील में दम है।’’ हमीद बोला। ‘‘लेकिन आपका वहाँ अकेला जाना ठीक नहीं।’’

‘‘तुम मुझे अच्छी तरह जानते हो कि मैं अपने तरीक़े से काम करने का आदी हूँ; वह भी बिलकुल अकेला।’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा। ‘‘और फिर तुमने अभी हाल ही में एक इश्क़ किया है। मैं तुम्हारे इश्क़ में गड़बड़ नहीं पैदा करना चाहता। वापसी में तुम्हारी महबूबा के लिए एक अँगूठी ज़रूर लेता आऊँगा। अच्छा, अब तुम नाश्ता करके यहीं सो रहो और मैं चला।’’
 
भयानक बूढ़ा

राजरूप नगर में नवाब वजाहत मिर्ज़ा की आलीशान कोठी बस्ती से लगभग डेढ़ मील की दूरी पर खड़ी थी। नवाब साहब बहुत शौक़ीन आदमी थे। इसलिए उन्होंने इस क़स्बे को नन्हा-मुन्ना-सा ख़ूबसूरत शहर बना दिया था। बस, सिर्फ़ इलेक्ट्रिक लाइट की क़सर रह गयी थी। लेकिन उन्होंने अपनी कोठी में एक ताक़तवर डाइनैमो लगा कर इस कमी को पूरा कर दिया था। अलबत्ता, क़स्बे वाले बिजली की रोशनी से महरूम थे। कोठी के चारों तरफ़ चार फ़र्लांग के इलाके में ख़ुशनुमा बाग़ लगे हुए थे। नवाब साहब की कोठी से डेढ़ फ़र्लांग की दूरी पर एक पुरानी इमारत थी जिसमें एक छोटा-सा मीनार था। किसी ज़माने में इस मीनार का ऊपरी हिस्सा खुला रहा होगा और नवाब साहब के पूर्वज उस पर बैठ कर मौज-मस्ती करते होंगे। लेकिन अब यह बन्द कर दिया गया था, सिर्फ़ दो खिड़कियाँ खुली रह गयी थीं। एक खिड़की में एक बड़ी-सी दूरबीन लगी हुई थी जिसका व्यास लगभग एक फ़ुट रहा होगा। इस इमारत में मशहूर अन्तरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर इमरान रहता था। नवाब साहब ने यह पुरानी इमारत उसे किराये पर दे रखी थी। उसने इस मीनार की ऊपरी मंज़िल को चारों तरफ़ से बन्द कराके उस पर सितारों की रफ़्तार का जायज़ा लेने वाली अपनी बड़ी दूरबीन फ़िट करा ली थी। क़स्बे वालों के लिए वह एक सन्दिग्ध आदमी था। बहुतों का ख़याल था कि वह पागल है। उसे आज तक किसी ने इस चार फ़र्लांग के इलाक़े से बाहर जाते न देखा था।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी कोठी के क़रीब पहुँच कर सोचने लगा कि किस तरह अन्दर जाये। अचानक एक नौकर बरामदे में आया। फ़रीदी ने आगे बढ़ कर उससे पूछा। ‘‘अब नवाब साहब की कैसी तबीयत है?’’

‘‘अभी वही हाल है।’’ नौकर उसे घूरता हुआ बोला। ‘‘आप कहाँ से तशरीफ़ लाये हैं?’’

‘‘मैं ‘डेली न्यूज़’ का रिपोर्टर हूँ और कुँवर सलीम से मिलना चाहता हूँ।’’

‘‘यहाँ अन्दर हॉल में आ जाइए। मैं उन्हें ख़बर करता हूँ।’’

फ़रीदी बरामदे से गुज़र कर हॉल में दाख़िल हुआ। हॉल की दीवारों पर चारों तरफ़ नवाब साहब के पूर्वजों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। फ़रीदी उनको देखने लगा। तभी वह चौंक पड़ा। उसकी नज़रें एक पुरानी तस्वीर पर जा टिकी थीं। उसे ऐसा मालूम हुआ जैसे घनी मूँछों और दाढ़ी के पीछे कोई जाना-पहचाना चेहरा है।

‘‘अरे, वह मारा, बेटा फ़रीदी।’’ वह आप-ही-आप बड़बड़ाया।

वह क़दमों की आहट से चौंक पड़ा। सामने के दरवाज़े में एक लम्बा-तड़ंगा नौजवान क़ीमती सूट पहने खड़ा था। पहले तो वह फ़रीदी को देख कर झिझका, फिर मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा।

‘‘साहब, आप रिपोर्टरों से तो मैं तंग आ गया हूँ।’’ वह हँस कर बोला। ‘‘कहिए, आप क्या पूछना चाहते हैं?’’

‘‘शायद मैं कुँवर साहब से बात कर रहा हूँ।’’ फ़रीदी ने अदब से कहा।

‘‘जी हाँ...मुझे कुँवर सलीम कहते हैं।’’ उसने बेदिली से कहा।

‘‘जो कुछ पूछना हो, जल्द पूछिए। मैं बहुत बिज़ी आदमी हूँ।’’

‘‘नवाब साहब का अब क्या हाल है?’’

‘‘अभी तक होश नहीं आया...और कुछ...?’’

‘‘कब से बेहोश हैं?’’

‘‘पन्द्रह दिन से... फ़ैमिली डॉक्टर की राय है कि ऑपरेशन किया जाय। लेकिन कर्नल तिवारी इसके हक़ में नहीं हैं। अच्छा, अब मुझे इजाज़त दीजिए।’’ वह फिर उसी दरवाज़े की तरफ़ घूम गया जिस तरफ़ से आया था।

फ़रीदी के पास वापस जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

जब वह पुरानी कोठी के पास से गुज़र रहा था तो एकदम से उसकी हैट उछल कर उसकी गोद में आ गयी। हैट में बड़ा-सा छेद हो गया था। उसने धीमे से कहा, ‘‘बाल-बाल बचे, फ़रीदी साहब...अब कभी मोटर की छत गिरा कर सफ़र न करना। अभी तो इस बेआवाज़ राइफ़ल ने तुम्हारी जान ही ले ली थी।’’ थोड़ी दूर चल कर उसने कार रोक ली और पुरानी कोठी की तरफ़ पैदल वापस लौटा। बाड़ की आड़ से उसने देखा कि पुरानी कोठी के बाग़ में एक अजीबो-ग़रीब बूढ़ा एक छोटी नाल वाली राइफ़ल लिये गिलहरियों के पीछे दौड़ रहा था।

फ़रीदी बाड़ लाँघ कर अन्दर पहुँच गया। बूढ़ा चौंक कर उसे हैरत से देखने लगा। बूढ़े को देख कर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई मुर्दा क़ब्र से उठ कर आ गया हो या फिर जैसे वह कोई भूत हो। उसका रंग हल्दी की तरह पीला था। बाल क्या, भँवें तक सफ़ेद हो गयी थीं। चेहरा लम्बा था और गालों की हड्डियाँ उभरी हुई थीं। दाढ़ी-मूँछ साफ़...होंट बहुत पतले थे, लेकिन आँखों में बला की चमक और जिस्म में ज़बर्दस्त फुर्ती थी। वह उछल कर फ़रीदी के क़रीब आ गया।

‘‘मुझसे मिलिए...मैं प्रोफ़ेसर इमरान हूँ। अन्तरिक्ष वैज्ञानिक... और आप...’’

‘‘मुझे आपके नाम से दिलचस्पी नहीं।’’ फ़रीदी उसे घूर कर बोला। ‘‘मैं तो उस ख़ौफ़नाक हथियार में दिलचस्पी ले रहा हूँ जो आपके हाथ में है।’’

‘‘हथियार....!’’ बूढ़े ने ख़ौफ़नाक क़हक़हा लगाया। ‘‘यह तो मेरी दूरबीन है।’’

‘‘वह दूरबीन ही सही, लेकिन अभी उसने मुझे दूसरी दुनिया में पहुँचा दिया होता।’’

फ़रीदी ने अपनी हैट का सूराख़ उसे दिखाया। बूढ़े की आँखों से ख़ौफ़ झाँकने लगा। उसने एक बार ग़ौर से राइफ़ल की तरफ़ देखा और फिर हँस कर कहने लगा।

‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं। यह वाक़ई राइफ़ल है। मैं गिलहरियों का शिकार कर रहा था। माफ़ी चाहता हूँ और अपनी दोस्ती का हाथ आपकी तरफ़ बढ़ाता हूँ।’’ बूढ़े ने फ़रीदी का हाथ अपने हाथ में ले कर इस ज़ोर से दबाया कि उसके हाथ की हड्डियाँ तक दुखने लगीं। उस बूढ़े में इतनी ताक़त देख कर फ़रीदी बौखला गया।

‘‘आइए...अन्दर चलिए...आप एक अच्छे दोस्त साबित हो सकते हैं।’’ वह फ़रीदी का हाथ पकड़े हुए पुरानी कोठी में घुस गया।

‘‘आजकल गिलहरियों और दूसरे छोटे जानवरों मेरी ख़ास दिलचस्पी है। आइए, मैं आपको उनके नमूने दिखाऊँ।’’ वह फ़रीदी को एक अँधेरे कमरे में ले जाता हुआ बोला। कमरे में अजीब तरह की बदबू फैली हुई थी। बूढ़े ने कई मोमबत्तियाँ जलायीं। कमरे में चारों तरफ़ मुर्दा जानवरों के ढाँचे रखे हुए थे। बहुत-से छोटे जानवर कीलों की मदद से लकड़ी के तख़्तों में जकड़ दिये गये थे। इनमें से कई ख़रगोश और कई गिलहरियाँ तो अभी तक ज़िन्दा थीं। जिनकी तड़प बहुत ही ख़ौफ़नाक मंज़र पेश कर रही थी। कभी-कभी कोई ख़रगोश दर्द से चीख़ उठता था। फ़रीदी को ऊब-सी होने लगी और वह घबरा कर कमरे से निकल आया।

‘‘अब आइए, मैं आपको अपनी दूरबीन दिखाऊँ।’’ यह कह कर वह मीनार की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। फ़रीदी भी उसके पीछे चल रहा था। मीनार लगभग पच्चीस फ़ुट चौड़ा रहा होगा। आखिर में वह एक कमरे में दाख़िल हुए जो ऊपरी मंज़िल पर था। वहीं एक खिड़की में दूरबीन लगी थी।
 
‘‘यहाँ आइए...!’’ वह दूरबीन के शीशे पर झुक कर बोला। ‘‘मैं इस वक़्त नवाब साहब के कमरे का मंज़र इतना साफ़ देख रहा हूँ जैसे वे यहाँ से सिर्फ़ पाँच फ़ुट की दूरी पर हों। नवाब साहब लेटे हैं। उनके सरहाने उनकी भानजी बैठी है। यह लीजिये देखिए।’’

फ़रीदी ने अपनी आँख शीशे से लगा दी। सामने वाली कोठी की बड़ी-सी खिड़की खुली हुई थी और कमरा बिलकुल साफ़ नज़र आ रहा था। कोई आदमी सिर से पैर तक मख़मल का लिहाफ़ ओढ़े लेटा था और एक ख़ूबसूरत लड़की उसके सरहाने बैठी थी।

‘‘मैं सामने वाले कमरे के बहुत से राज़ जानता हूँ, लेकिन तुम्हें क्यों बताऊँ।’’ बूढ़ा फ़रीदी के कन्धे पर हाथ रखते हुए बोला। ‘‘बस करो, अब आओ, चलें।’’

‘‘मुझे किसी के राज़ जानने की ज़रूरत ही क्या है?’’ फ़रीदी अपने कन्धे उचकाता हुआ बोला।

बूढ़ा क़हक़हा लगा कर बोला। ‘‘क्या मुझे बेवकूफ़ समझते हो। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि यह जुमला तुमने सिर्फ़ इसीलिए कहा है कि मैं सारे राज़ उगल दूँ। तुम ख़तरनाक आदमी मालूम होते हो। अच्छा, अब चलो, मैं तुम्हें बाहर जाने का रास्ता दिखा दूँ।’’

दोनों नीचे उतर आये। अभी वे हॉल ही में थे कि दरवाज़े पर कुँवर सलीम की सूरत दिखायी दी।

‘‘आप यहाँ कैसे...?’’ उसने फ़रीदी से पूछा। ‘‘क्या आप प्रोफ़ेसर को जानते हैं।’’

‘‘जी नहीं...लेकिन आज उन्हें इस तरह जान गया हूँ कि ज़िन्दगी भर न भुला सकूँगा।’’

‘‘क्या मतलब...?’’

‘‘आप गिलहरियों का शिकार करते-करते आदमी का शिकार करने लगे थे।’’ फ़रीदी प्रोफ़ेसर के हाथ में दबी हुई राइफ़ल की तरफ़ इशारा करके बोला। ‘‘मेरी हैट देखिए।’’

‘‘ओह समझा...!’’ कुँवर सलीम तेज़ आवाज़ में बोला। ‘‘प्रोफ़ेसर तुम हमारी कोठी ख़ाली कर दो, वरना मैं तुम्हें पागलख़ाने भिजवा दूँगा...समझे।’’

बूढ़े ने डरते हुए कुँवर सलीम की तरफ़ देखा और भाग कर मीनार के ज़ीनों पर चढ़ता चला गया।

‘‘माफ़ कीजिएगा...यह बूढ़ा पागल है। बेकार ही में हमारी परेशानियाँ बढ़ जायेंगी। अच्छा, ख़ुदा हाफ़िज़।’’
 
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