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चालाक औरत
हमीद का दिल बुरी तरह उलझन में पड़ा हुआ था। कभी वह सचमुच शहनाज़ पर शक करने लगता और कभी इस शक को मुहब्बत की लहर अपने साथ बहा ले जाती। वह सोच रहा था कि अगर वाक़ई वह ख़त शहनाज़ को मिला होता तो वह उसे मेज़ के नीचे न डाल देती और यह भी अजीब बात है कि पुलिस का शक ख़त्म करने के लिए ग़ायब हो गयी। ऐसी सूरत में तो उसे यहीं मौजूद रहना चाहिए था, ताकि पुलिस का शक ख़त्म हो जाये। मगर ऐसा भी हो सकता है कि इस गिरोह के लोगों ने उसे महज़ इसलिए ग़ायब कर दिया है कि कहीं पुलिस उस पर ज़ुल्म करके सारा राज़ उगलवा न ले, मगर ऐसी सूरत में भी शहनाज़ वह ख़त पढ़ने के बाद ज़रूर जला देती। फिर आख़िर क्या बात है? वह उकता कर फ़रीदी के ख़त का जवाब लिखने बैठ गया। मगर लिखे क्या? फ़रीदी की तरफ़ से एक तरह की नफ़रत उसके दिल में पैदा हो गयी थी। कुछ-कुछ लिखना तो शुरू कर दिया, लेकिन येलो डिंगू का ज़िक्र नहीं किया। उसके बारे में सिर्फ़ इतना लिखा कि उसके खो जाने पर उसे अफ़सोस है। शहनाज़ के बारे में भी यह लिख दिया कि वह अभी तक नहीं मिल सकी। इस बीच में उसने क्या किया, उसके बारे में उसने कुछ भी लिखना बेकार समझा। उसने इरादा कर लिया कि इस मुहिम को वह अकेले ही पूरा करने की कोशिश करेगा और फ़रीदी को यह दिखा देगा कि वह निरा बुद्धू नहीं है। आख़िर उसे भी तो तरक़्क़ी करनी ही है। कब तक फ़रीदी का सहारा लेता रहेगा। इस तरह तो शायद वह ज़िन्दगी भर तरक़्क़ी का मुँह न देख सकेगा। रह गया फ़रीदी तो वह अच्छा-ख़ासा झक्की है। कितनी बार चीफ़ इन्स्पेक्टरी मिली। ठुकरा दी। न जाने किस तरह का आदमी है। उसकी बात ही समझ में नहीं आती। कभी यह हाल होता है कि चाहे कोई वास्ता हो या न हो, ज़बर्दस्ती हर मामले में टाँग अड़ा देता है और जब कोई ख़ास मौक़ा आता है तो इतनी सफ़ाई से अलग हो जाता है जैसे कोई बात ही न हो। हमीद के और उसके सम्बन्ध अच्छे थे, लेकिन फिर भी उसने उसकी परवाह नहीं की और यहाँ से चला गया। अगर शहनाज़ से उसका कोई ताल्लुक़ न होता तो शायद वह अपनी जान तक की बाज़ी लगा देता। हमीद जितना सोचता जा रहा था, उसकी तबीयत की उकताहट उतनी ही बढ़ती जा रहा थी। दीवार पर लगी हुई घड़ी आठ बजा रही थी। उसने सोचा, क्यों न ‘गुलिस्ताँ होटल’ ही में चल कर दिल बहलाया जाय और इस तरह शायद कर्नल प्रकाश के बारे में भी कुछ मालूम हो सके। मगर उसके बारे में मालूम करने की ज़रूरत ही क्या है, क्योंकि वह तो क़तई परदेसी आदमी है। सूरत से ख़तरनाक ज़रूर मालूम होता है, लेकिन इस घटना से उसका क्या सम्बन्ध है। उसके पीछे पड़ना बेकार ही वक़्त बर्बाद करना है।
उसने कपड़े पहने, पहले सोचा कि फ़रीदी की कार निकाल ले, लेकिन फिर कुछ सोच कर पैदल ही चल पड़ा। आगे चल कर एक टैक्सी की और ‘गुलिस्ताँ होटल’ की तरफ़ रवाना हो गया।
नाच घर में काफ़ी रौनक थी। अभी नाच शुरू नहीं हुआ था। लोग इधर-उधर बैठे कुछ खा-पी रहे थे। शराब के काउण्टर पर अच्छी-ख़ासी भीड़ थी। हमीद ने छिछलती-सी नज़र सब पर डाली। एक मेज़ पर कर्नल प्रकाश बैठा कुछ पी रहा था और साथ ही कोई अख़बार भी देखता जा रहा था। वह उस मेज़ पर अकेला ही था। बाक़ी तीन कुर्सियाँ ख़ाली थीं। उसी के क़रीब एक और मेज़ ख़ाली थी। हमीद ने न जाने क्यों अपने लिए वही जगह चुनी।
कर्नल प्रकाश अपने आस-पास से बेख़बर पढ़ने में लगा था। उस वक़्त हमीद को उसे बहुत ही क़रीब से देखने का मौका मिला। वह उसे पहले से ज़्यादा ख़तरनाक मालूम हो रहा था।
हमीद इधर-उधर बैठी हुई औरतों को इस तरह घूरने लगा जैसे वह एक बहुत अय्याश क़िस्म का आदमी हो। अचानक उसने यूँ ही पीछे मुड़ कर देखा, लेडी सीताराम हॉल में दाख़िल हो रही थी।
वह चुपके से कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी हो गयी। कर्नल प्रकाश पढ़ने में मशग़ूल रहा। लेडी सीताराम सत्ताईस-अट्ठाईस साल की औरत थी। उसके होंट बहुत ज़्यादा पतले थे जिन पर बहुत गहरे रंग की लिपस्टिक लगायी गयी थी, ऐसा मालूम होता था जैसे उसने अपने होंट भींच रखे हों। माथे पर पड़ी हुई लकीरें ख़राब नहीं मालूम होती थीं। वह कुछ पल उसी तरह कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी रही, फिर उसने धीरे से कुछ कहा और वापस जाने के लिए मुड़ गयी। कर्नल प्रकाश चौंक कर पीछे देखने लगा। उसके चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट नाच रही थी। लेडी सीताराम ऊपर गैलरी में जाने के लिए ज़ीने पर चढ़ रही थी। उसके जाने के तीन-चार मिनट बाद कर्नल प्रकाश भी उठा। अब वह भी उसी ज़ीने पर चढ़ रहा था। हमीद हैरत से पलकें झपकाने लगा। यह बात उसकी समझ में बिलकुल न आयी कि लेडी सीताराम कर्नल प्रकाश से इस क़िस्म के ताल्लुक़ात कैसे रखती है, जबकि ख़ुद सीताराम कर्नल प्रकाश के लिए बिलकुल अजनबी थे और उन दोनों की पहली मुलाक़ात लॉरेंस बाग़ में ख़ुद उसी के सामने हुई थी।
आख़िर यह मामला क्या है? हमीद थोड़ी देर तक सोचता रहा कि उसे क्या करना चाहिए। वह उठा और लापरवाही से टहलता हुआ ख़ुद भी उसी ज़ीने पर चढ़ने लगा। गैलरी ख़ाली पड़ी थी। उसने बालकनी में झाँक कर देखा। वे दोनों जँगले पर झुके, खड़े हुए बातें कर रहे थे, उन्हीं के क़रीब से दो खम्भों के नीचे से आती हुई लिण्टर फैली हुई थी। ऊपर आ कर लिण्टर इतना फैल गया था कि बालकनी का वह हिस्सा बिलकुल बेकार हो गया था। सार्जेंट हमीद दूसरे दरवाज़े से निकल कर लिण्टर की आड़ में छिप गया। इस तरफ़ अँधेरा होने के कारण उधर वालों की नज़रें हमीद तक नहीं पहूँच सकती थीं। इस तरह वह ऐसी जगह पहूँच चुका था जहाँ से उनकी बातचीत का एक-एक शब्द साफ़ सुन सकता था।
लेडी सीताराम कह रही थी–
‘‘कर्नल... तुम शायद कोई जादूगर हो।’’
‘‘क्यों... क्यों, ख़ैरियत तो है?’’ कर्नल प्रकाश क़हक़हा लगा कर बोला।
‘‘मुझे बताओ कि मैं अपना ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त तुम्हारे साथ क्यों गुज़ारना चाहती हूँ?’’
‘‘यह अपने दिल से पूछो।’’ कर्नल प्रकाश बहुत ही रूमानी अन्दाज़ में बोला।
‘‘काश! मैं अफ़्रीका में पैदा हुई होती।’’
‘‘तब तुम इतनी हसीन न होतीं।’’
‘‘तो क्या मैं वाक़ई हसीन हूँ?’’
‘‘काश! मैं तुम्हारे हुस्न की तस्वीर शब्दों में खींच सकता।’’
‘‘हटो भी।’’ लेडी सीताराम ने शर्मीले अन्दाज़ में कहा।
‘‘लेडी सीताराम, मैं सच कहता हूँ कि...’’
‘‘देखो कर्नल, तुम मेरा नाम जानते हो।’’ वह प्रकाश की बात काट कर बोली। ‘‘मुझे इस मनहूस नाम से मत पुकारा करो। मुझे तकलीफ़ होती है।’’
‘‘अच्छा, चलो यही सही... हाँ, तो हसीन रेखा... मैं एक सिपाही क़िस्म का अक्खड़ आदमी हूँ। लेकिन तुम्हारी प्यारी-प्यारी-सी शख्सियत ने मुझे बिलकुल मोम बना दिया है।’’
‘‘तुम मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो।’’ लेडी सीताराम नाज़ से बोली।
‘‘नहीं रेखा, तुम पहली औरत हो जिससे मुझे इतना लगाव है। मैं अभी तक कुँवारा हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश! तुम मेरे हिस्से में आयी होतीं।’’
‘‘मेरी ऐसी क़िस्मत कहाँ थी।’’ लेडी सीताराम ठण्डी आह भर कर बोली।
‘‘हाँ, और सुनो...’’ कर्नल प्रकाश बोला। ‘‘आज शाम इत्तफ़ाक़ से तुम्हारे खूसट से मुलाक़ात हो गयी। मुझसे मिल कर बहुत ख़ुश हुआ है और कल शाम को चाय की दावत दी है। कितना मज़ा आयेगा जब वह मेरा परिचय तुमसे अजनबी की हैसियत से करायेगा। मुझे तो सोच-सोच कर हँसी आ रही है।’’
‘‘बहुत अच्छा हुआ डियर कर्नल... अब मैं तुमसे बाक़ायदा मिल सकूँगी। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ।’’
‘‘तुम नहीं, बल्कि मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे यहाँ एक अनमोल हीरा नसीब हुआ है जिसका जवाब दुनिया में नहीं।’’
‘‘और तुम ठहरे हीरों के व्यापारी...’’ लेडी सीताराम क़हक़हा लगा कर बोली।
कर्नल प्रकाश हँसने लगा।
‘‘अरे, यह कौन आ रहा है?’’ लेडी सीताराम चौंक कर बोली। ‘‘मेरा भतीजा सुरेन्द्र कुमार... अच्छा कर्नल साहब... अब तुम नीचे जाओ... मैं भी अभी आयी। सुरेन्द्र के सामने हम एक-दूसरे के लिए अजनबी ही रहेंगे।’’
‘‘अच्छा, मैं चला... लेकिन यह तो बताओ कि अब कब मिलेंगे?’’
‘‘बहुत जल्द...’’ लेडी सीताराम ने कहा और टहलती हुई बालकनी के दूसरे किनारे तक चली गयी।
तक़रीबन दस-पन्द्रह मिनट तक वह वहाँ टहलती रही, फिर वह भी नीचे चली गयी। हमीद लिण्टर की आड़ से निकला और पूरी बालकनी का चक्कर लेता हुआ दूसरे ज़ीने से नीचे उतर आया। नाच शुरू हो चुका था। कर्नल प्रकाश एक नयी लड़की के साथ नाच रहा था। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र एक किनारे बैठे हुए कुछ पी रहे थे। हमीद दोनों को देखता हुआ बार की तरफ़ चला गया। उसकी निगाहें उन्हीं दोनों पर टिकी हुई थीं। सुरेन्द्र एक मामूली तबीयत का, मगर ख़ूबसूरत नौजवान था। उसने काला सूट पहन रखा था जो उस पर बहुत ज़्यादा खिल रहा था। दूसरा राउण्ड शुरू होने पर लेडी सीताराम और सुरेन्द्र उठ कर टहलते हुए गैलरी के ज़ीनों की तरफ़ गये। दूसरे पल दोनों ग़ायब थे। कर्नल प्रकाश अब एक दूसरी औरत के साथ नाच रहा था। न जाने क्यों हमीद का दिल चाहा कि उन दोनों के पीछे जाये, वह टहलता हुआ ज़ीने के क़रीब आया, लेकिन ठिठक गया और वह अपने मक़सद में कामयाब न हो सका। कर्नल प्रकाश के क़दम कुछ डगमगा रहे थे। वह इस तरह लड़खड़ा रहा था जैसे वह बहुत ज़्यादा पी गया हो। उसके साथ नाचने वाली औरत ने शायद इसे महसूस कर लिया था, इसलिए वह उसकी पकड़ से निकल जाने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद कर्नल प्रकाश ने ख़ुद उसे छोड़ दिया और लड़खड़ाता हुआ ज़ीने की तरफ़ बढ़ा।
हमीद हैरान था कि आख़िर यह बात क्या है। यह ऊपर क्यों जा रहा है, क्योंकि अभी-अभी लेडी सीताराम ने उससे कहा था कि वह सुरेन्द्र की मौजूदगी में एक-दूसरे के लिए बिलकुल अजनबी होंगे। हमीद अभी सोच ही रहा था कि वह क्या करे कि कर्नल प्रकाश लड़खड़ाता हुआ नीचे उतर आया। ग़ुस्से से उसके नथुने फूल रहे थे, निचला होंट उसने अपने दाँतों में दबा रखा था। वह लड़खड़ाता हुआ बार की तरफ़ चला गया। हमीद ने इधर-उधर देखा और दबे पाँव ज़ीने पर चढ़ता चला गया।
हमीद का दिल बुरी तरह उलझन में पड़ा हुआ था। कभी वह सचमुच शहनाज़ पर शक करने लगता और कभी इस शक को मुहब्बत की लहर अपने साथ बहा ले जाती। वह सोच रहा था कि अगर वाक़ई वह ख़त शहनाज़ को मिला होता तो वह उसे मेज़ के नीचे न डाल देती और यह भी अजीब बात है कि पुलिस का शक ख़त्म करने के लिए ग़ायब हो गयी। ऐसी सूरत में तो उसे यहीं मौजूद रहना चाहिए था, ताकि पुलिस का शक ख़त्म हो जाये। मगर ऐसा भी हो सकता है कि इस गिरोह के लोगों ने उसे महज़ इसलिए ग़ायब कर दिया है कि कहीं पुलिस उस पर ज़ुल्म करके सारा राज़ उगलवा न ले, मगर ऐसी सूरत में भी शहनाज़ वह ख़त पढ़ने के बाद ज़रूर जला देती। फिर आख़िर क्या बात है? वह उकता कर फ़रीदी के ख़त का जवाब लिखने बैठ गया। मगर लिखे क्या? फ़रीदी की तरफ़ से एक तरह की नफ़रत उसके दिल में पैदा हो गयी थी। कुछ-कुछ लिखना तो शुरू कर दिया, लेकिन येलो डिंगू का ज़िक्र नहीं किया। उसके बारे में सिर्फ़ इतना लिखा कि उसके खो जाने पर उसे अफ़सोस है। शहनाज़ के बारे में भी यह लिख दिया कि वह अभी तक नहीं मिल सकी। इस बीच में उसने क्या किया, उसके बारे में उसने कुछ भी लिखना बेकार समझा। उसने इरादा कर लिया कि इस मुहिम को वह अकेले ही पूरा करने की कोशिश करेगा और फ़रीदी को यह दिखा देगा कि वह निरा बुद्धू नहीं है। आख़िर उसे भी तो तरक़्क़ी करनी ही है। कब तक फ़रीदी का सहारा लेता रहेगा। इस तरह तो शायद वह ज़िन्दगी भर तरक़्क़ी का मुँह न देख सकेगा। रह गया फ़रीदी तो वह अच्छा-ख़ासा झक्की है। कितनी बार चीफ़ इन्स्पेक्टरी मिली। ठुकरा दी। न जाने किस तरह का आदमी है। उसकी बात ही समझ में नहीं आती। कभी यह हाल होता है कि चाहे कोई वास्ता हो या न हो, ज़बर्दस्ती हर मामले में टाँग अड़ा देता है और जब कोई ख़ास मौक़ा आता है तो इतनी सफ़ाई से अलग हो जाता है जैसे कोई बात ही न हो। हमीद के और उसके सम्बन्ध अच्छे थे, लेकिन फिर भी उसने उसकी परवाह नहीं की और यहाँ से चला गया। अगर शहनाज़ से उसका कोई ताल्लुक़ न होता तो शायद वह अपनी जान तक की बाज़ी लगा देता। हमीद जितना सोचता जा रहा था, उसकी तबीयत की उकताहट उतनी ही बढ़ती जा रहा थी। दीवार पर लगी हुई घड़ी आठ बजा रही थी। उसने सोचा, क्यों न ‘गुलिस्ताँ होटल’ ही में चल कर दिल बहलाया जाय और इस तरह शायद कर्नल प्रकाश के बारे में भी कुछ मालूम हो सके। मगर उसके बारे में मालूम करने की ज़रूरत ही क्या है, क्योंकि वह तो क़तई परदेसी आदमी है। सूरत से ख़तरनाक ज़रूर मालूम होता है, लेकिन इस घटना से उसका क्या सम्बन्ध है। उसके पीछे पड़ना बेकार ही वक़्त बर्बाद करना है।
उसने कपड़े पहने, पहले सोचा कि फ़रीदी की कार निकाल ले, लेकिन फिर कुछ सोच कर पैदल ही चल पड़ा। आगे चल कर एक टैक्सी की और ‘गुलिस्ताँ होटल’ की तरफ़ रवाना हो गया।
नाच घर में काफ़ी रौनक थी। अभी नाच शुरू नहीं हुआ था। लोग इधर-उधर बैठे कुछ खा-पी रहे थे। शराब के काउण्टर पर अच्छी-ख़ासी भीड़ थी। हमीद ने छिछलती-सी नज़र सब पर डाली। एक मेज़ पर कर्नल प्रकाश बैठा कुछ पी रहा था और साथ ही कोई अख़बार भी देखता जा रहा था। वह उस मेज़ पर अकेला ही था। बाक़ी तीन कुर्सियाँ ख़ाली थीं। उसी के क़रीब एक और मेज़ ख़ाली थी। हमीद ने न जाने क्यों अपने लिए वही जगह चुनी।
कर्नल प्रकाश अपने आस-पास से बेख़बर पढ़ने में लगा था। उस वक़्त हमीद को उसे बहुत ही क़रीब से देखने का मौका मिला। वह उसे पहले से ज़्यादा ख़तरनाक मालूम हो रहा था।
हमीद इधर-उधर बैठी हुई औरतों को इस तरह घूरने लगा जैसे वह एक बहुत अय्याश क़िस्म का आदमी हो। अचानक उसने यूँ ही पीछे मुड़ कर देखा, लेडी सीताराम हॉल में दाख़िल हो रही थी।
वह चुपके से कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी हो गयी। कर्नल प्रकाश पढ़ने में मशग़ूल रहा। लेडी सीताराम सत्ताईस-अट्ठाईस साल की औरत थी। उसके होंट बहुत ज़्यादा पतले थे जिन पर बहुत गहरे रंग की लिपस्टिक लगायी गयी थी, ऐसा मालूम होता था जैसे उसने अपने होंट भींच रखे हों। माथे पर पड़ी हुई लकीरें ख़राब नहीं मालूम होती थीं। वह कुछ पल उसी तरह कर्नल प्रकाश के पीछे खड़ी रही, फिर उसने धीरे से कुछ कहा और वापस जाने के लिए मुड़ गयी। कर्नल प्रकाश चौंक कर पीछे देखने लगा। उसके चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट नाच रही थी। लेडी सीताराम ऊपर गैलरी में जाने के लिए ज़ीने पर चढ़ रही थी। उसके जाने के तीन-चार मिनट बाद कर्नल प्रकाश भी उठा। अब वह भी उसी ज़ीने पर चढ़ रहा था। हमीद हैरत से पलकें झपकाने लगा। यह बात उसकी समझ में बिलकुल न आयी कि लेडी सीताराम कर्नल प्रकाश से इस क़िस्म के ताल्लुक़ात कैसे रखती है, जबकि ख़ुद सीताराम कर्नल प्रकाश के लिए बिलकुल अजनबी थे और उन दोनों की पहली मुलाक़ात लॉरेंस बाग़ में ख़ुद उसी के सामने हुई थी।
आख़िर यह मामला क्या है? हमीद थोड़ी देर तक सोचता रहा कि उसे क्या करना चाहिए। वह उठा और लापरवाही से टहलता हुआ ख़ुद भी उसी ज़ीने पर चढ़ने लगा। गैलरी ख़ाली पड़ी थी। उसने बालकनी में झाँक कर देखा। वे दोनों जँगले पर झुके, खड़े हुए बातें कर रहे थे, उन्हीं के क़रीब से दो खम्भों के नीचे से आती हुई लिण्टर फैली हुई थी। ऊपर आ कर लिण्टर इतना फैल गया था कि बालकनी का वह हिस्सा बिलकुल बेकार हो गया था। सार्जेंट हमीद दूसरे दरवाज़े से निकल कर लिण्टर की आड़ में छिप गया। इस तरफ़ अँधेरा होने के कारण उधर वालों की नज़रें हमीद तक नहीं पहूँच सकती थीं। इस तरह वह ऐसी जगह पहूँच चुका था जहाँ से उनकी बातचीत का एक-एक शब्द साफ़ सुन सकता था।
लेडी सीताराम कह रही थी–
‘‘कर्नल... तुम शायद कोई जादूगर हो।’’
‘‘क्यों... क्यों, ख़ैरियत तो है?’’ कर्नल प्रकाश क़हक़हा लगा कर बोला।
‘‘मुझे बताओ कि मैं अपना ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त तुम्हारे साथ क्यों गुज़ारना चाहती हूँ?’’
‘‘यह अपने दिल से पूछो।’’ कर्नल प्रकाश बहुत ही रूमानी अन्दाज़ में बोला।
‘‘काश! मैं अफ़्रीका में पैदा हुई होती।’’
‘‘तब तुम इतनी हसीन न होतीं।’’
‘‘तो क्या मैं वाक़ई हसीन हूँ?’’
‘‘काश! मैं तुम्हारे हुस्न की तस्वीर शब्दों में खींच सकता।’’
‘‘हटो भी।’’ लेडी सीताराम ने शर्मीले अन्दाज़ में कहा।
‘‘लेडी सीताराम, मैं सच कहता हूँ कि...’’
‘‘देखो कर्नल, तुम मेरा नाम जानते हो।’’ वह प्रकाश की बात काट कर बोली। ‘‘मुझे इस मनहूस नाम से मत पुकारा करो। मुझे तकलीफ़ होती है।’’
‘‘अच्छा, चलो यही सही... हाँ, तो हसीन रेखा... मैं एक सिपाही क़िस्म का अक्खड़ आदमी हूँ। लेकिन तुम्हारी प्यारी-प्यारी-सी शख्सियत ने मुझे बिलकुल मोम बना दिया है।’’
‘‘तुम मुझे बेवकूफ़ बना रहे हो।’’ लेडी सीताराम नाज़ से बोली।
‘‘नहीं रेखा, तुम पहली औरत हो जिससे मुझे इतना लगाव है। मैं अभी तक कुँवारा हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश! तुम मेरे हिस्से में आयी होतीं।’’
‘‘मेरी ऐसी क़िस्मत कहाँ थी।’’ लेडी सीताराम ठण्डी आह भर कर बोली।
‘‘हाँ, और सुनो...’’ कर्नल प्रकाश बोला। ‘‘आज शाम इत्तफ़ाक़ से तुम्हारे खूसट से मुलाक़ात हो गयी। मुझसे मिल कर बहुत ख़ुश हुआ है और कल शाम को चाय की दावत दी है। कितना मज़ा आयेगा जब वह मेरा परिचय तुमसे अजनबी की हैसियत से करायेगा। मुझे तो सोच-सोच कर हँसी आ रही है।’’
‘‘बहुत अच्छा हुआ डियर कर्नल... अब मैं तुमसे बाक़ायदा मिल सकूँगी। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ।’’
‘‘तुम नहीं, बल्कि मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे यहाँ एक अनमोल हीरा नसीब हुआ है जिसका जवाब दुनिया में नहीं।’’
‘‘और तुम ठहरे हीरों के व्यापारी...’’ लेडी सीताराम क़हक़हा लगा कर बोली।
कर्नल प्रकाश हँसने लगा।
‘‘अरे, यह कौन आ रहा है?’’ लेडी सीताराम चौंक कर बोली। ‘‘मेरा भतीजा सुरेन्द्र कुमार... अच्छा कर्नल साहब... अब तुम नीचे जाओ... मैं भी अभी आयी। सुरेन्द्र के सामने हम एक-दूसरे के लिए अजनबी ही रहेंगे।’’
‘‘अच्छा, मैं चला... लेकिन यह तो बताओ कि अब कब मिलेंगे?’’
‘‘बहुत जल्द...’’ लेडी सीताराम ने कहा और टहलती हुई बालकनी के दूसरे किनारे तक चली गयी।
तक़रीबन दस-पन्द्रह मिनट तक वह वहाँ टहलती रही, फिर वह भी नीचे चली गयी। हमीद लिण्टर की आड़ से निकला और पूरी बालकनी का चक्कर लेता हुआ दूसरे ज़ीने से नीचे उतर आया। नाच शुरू हो चुका था। कर्नल प्रकाश एक नयी लड़की के साथ नाच रहा था। लेडी सीताराम और सुरेन्द्र एक किनारे बैठे हुए कुछ पी रहे थे। हमीद दोनों को देखता हुआ बार की तरफ़ चला गया। उसकी निगाहें उन्हीं दोनों पर टिकी हुई थीं। सुरेन्द्र एक मामूली तबीयत का, मगर ख़ूबसूरत नौजवान था। उसने काला सूट पहन रखा था जो उस पर बहुत ज़्यादा खिल रहा था। दूसरा राउण्ड शुरू होने पर लेडी सीताराम और सुरेन्द्र उठ कर टहलते हुए गैलरी के ज़ीनों की तरफ़ गये। दूसरे पल दोनों ग़ायब थे। कर्नल प्रकाश अब एक दूसरी औरत के साथ नाच रहा था। न जाने क्यों हमीद का दिल चाहा कि उन दोनों के पीछे जाये, वह टहलता हुआ ज़ीने के क़रीब आया, लेकिन ठिठक गया और वह अपने मक़सद में कामयाब न हो सका। कर्नल प्रकाश के क़दम कुछ डगमगा रहे थे। वह इस तरह लड़खड़ा रहा था जैसे वह बहुत ज़्यादा पी गया हो। उसके साथ नाचने वाली औरत ने शायद इसे महसूस कर लिया था, इसलिए वह उसकी पकड़ से निकल जाने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर बाद कर्नल प्रकाश ने ख़ुद उसे छोड़ दिया और लड़खड़ाता हुआ ज़ीने की तरफ़ बढ़ा।
हमीद हैरान था कि आख़िर यह बात क्या है। यह ऊपर क्यों जा रहा है, क्योंकि अभी-अभी लेडी सीताराम ने उससे कहा था कि वह सुरेन्द्र की मौजूदगी में एक-दूसरे के लिए बिलकुल अजनबी होंगे। हमीद अभी सोच ही रहा था कि वह क्या करे कि कर्नल प्रकाश लड़खड़ाता हुआ नीचे उतर आया। ग़ुस्से से उसके नथुने फूल रहे थे, निचला होंट उसने अपने दाँतों में दबा रखा था। वह लड़खड़ाता हुआ बार की तरफ़ चला गया। हमीद ने इधर-उधर देखा और दबे पाँव ज़ीने पर चढ़ता चला गया।