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Diler mujrim ibne safi

गोलियों की बौछार

फ़रीदी ने अपनी कार को क़स्बे की तरफ़ मोड़ दिया। अब वह नवाब के फ़ैमिली डॉक्टर से मिलना चाहता था। डॉक्टर तौसीफ़ एक बूढ़ा आदमी था। इससे पहले वह सिविल सर्जन था। पेन्शन लेने के बाद उसने अपने पुराने मकान में रहना शुरू कर दिया था जो राजरूप नगर में स्थित था। उसकी गिनती क़स्बे के इज़्ज़तदार और दौलतमन्द लोगों में होती थी। फ़रीदी को उसका घर मालूम करने में कोई परेशानी न हुई।

डॉक्टर तौसीफ़ इन्स्पेक्टर फ़रीदी को शायद पहचानता था, इसलिए वह उसके अचानक आ जाने से कुछ घबरा-सा गया।

‘‘मुझे फ़रीदी कहते हैं।’’ फ़रीदी ने अपना विज़िटिंग कार्ड देते हुए कहा।

‘‘मैं आपको जानता हूँ...!’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने हाथ मिलाते हुए कहा। ‘‘कहिए, कैसे आना हुआ।’’

‘‘डॉक्टर साहब, मैं एक ज़रूरी काम के सिलसिले में आपसे राय लेना चाहता हूँ?’’

‘‘ठीक है!...अन्दर चलिए।’’

‘‘आप ही नवाब साहब के फ़ैमिली डॉक्टर हैं?’’ फ़रीदी ने सिगार लाइटर से सिगार सुलगाते हुए कहा।

‘‘जी हाँ...जी...बोलिए।’’ डॉक्टर ने चौंकते हुए कहा।

‘‘क्या कर्नल तिवारी आपके कहने पर नवाब साहब का इलाज कर रहे हैं?’’ वह अचानक पूछ बैठा।

डॉक्टर तौसीफ़ चौंक कर उसे घूरने लगा।

‘‘लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘डॉक्टर साहब! मुझे दिमाग़ी बीमारियों के इलाज की थोड़ी-सी मालूमात है और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि इस तरह की बीमारी का सिर्फ़ एक ही इलाज है और वह है ऑपरेशन...आखिर ये कर्नल तिवारी देर क्यों कर रहे हैं? यह चीज़ मुझे सोचने पर मजबूर कर रही है। कर्नल तिवारी एक नौजवान डॉक्टर से इलाज करवाने की बजाय, जो इस बीमारी को चुटकियों में ठीक कर सकता है, एक बूढ़े डॉक्टर से इलाज करवा रहे हैं।’’

‘‘मेरा ख़याल है कि आप एक निजी मामले में दख़लन्दाज़ी कर रहे हैं।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने नाराज़ होते हुए कहा।

‘‘आप समझे नहीं।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘मैं नवाब साहब की जान लेने की एक गहरी साज़िश का पता लगा रहा हूँ। इस सिलसिले में आपसे मदद लेना चाहता हूँ।’’

‘‘जी...!’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने चौंक कर कहा और फिर उदास हो गया।

‘‘जी हाँ...क्या आप मेरी मदद करेंगे?’’ फ़रीदी ने सिगार का कश ले कर कहा।

‘‘बात दरअसल यह है इन्स्पेक्टर साहब कि मैं ख़ुद भी इस मामले में बहुत परेशान हूँ। लेकिन क्या करूँ.... ख़ुद नवाब साहब की भी यही ख़्वाहिश थी। उन्हें दो-एक बार कर्नल तिवारी के इलाज से फ़ायदा हो चुका है।’’

‘‘लेकिन मुझे तो मालूम हुआ है कि कर्नल तिवारी को इलाज के लिए उनके ख़ानदान वालों ने चुना है।’’

‘‘नहीं! यह बात नहीं है। अलबत्ता उन्होंने मेरी ऑपरेशन वाली बात नहीं मानी थी। मैं आपको वह ख़त दिखाता हूँ जो नवाब साहब ने दौरा पड़ने से एक दिन पहले मुझे लिखा था।’’

‘‘डॉक्टर तौसीफ़ उठ कर दूसरे कमरे में चला गया और फ़रीदी सिगार के कश लेता हुआ अधखुली आँखों से छत को ताक़ता रहा।’’

‘‘यह देखिए नवाब साहब का ख़त...!’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने फ़रीदी की तरफ़ ख़त बढ़ाते हुए कहा। फ़रीदी ख़त को देखने लगा। ख़त नवाब साहब के लेटर पैड पर लिखा गया था। फ़रीदी ख़त पढ़ने लगा।

‘‘डियर डॉक्टर...

आज दो दिन से मुझे महसूस हो रहा है जैसे मुझ पर दौरा पड़ने वाला है। अगर आप शाम तक कर्नल तिवारी को ले कर आ जायें तो ठीक है। पिछली बार भी उनके इलाज से फ़ायदा हुआ था। मुझे ख़बर मिली है कि कर्नल तिवारी आजकल बहुत मशग़ूल हैं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप उन्हें ले कर ही आयेंगे।

आपका

वजाहत मिर्ज़ा

‘‘डॉक्टर साहब, क्या आपको यक़ीन है कि यह ख़त नवाब साहब ही के हाथ का लिखा हुआ है।’’ फ़रीदी ने ख़त पढ़ कर कहा।

‘‘उतना ही यक़ीन है जितना कि इस बात पर कि इस वक़्त मैं आपसे बात कर रहा हूँ। मैं नवाब साहब की लिखावट लाखों में पहचान सकता हूँ।’’
 
‘‘अच्छा...!’’ फ़रीदी ने कुछ सोचते हुए कहा। ‘‘लेकिन डॉक्टर साहब, ज़रा इस पर ग़ौर कीजिए, क्या आपने कभी इतनी चौड़ाई रखने वाले काग़ज़ का इतना छोटा पैड भी देखा है? कितना बेढंगा मालूम हो रहा है। ओह...यह देखिए...साफ़ मालूम होता है कि दस्तख़त के नीचे से किसी ने काग़ज़ का बाक़ी टुकड़ा कैंची से काटा है। डॉक्टर, क्या आपको यह इसी हालत में मिला था।’’

‘‘जी हाँ...!’’ डॉक्टर ने हैरान हो कर कहा। ‘‘लेकिन मैं आपका मतलब नहीं समझा।’’

‘‘वही बताने जा रहा हूँ। क्या यह मुमकिन नहीं कि नवाब साहब ने ख़त लिख कर दस्तख़त कर देने के बाद भी नीचे कुछ और लिखा हो जिसे किसी ने बाद में कैंची से काट कर उसे बराबर करने की कोशिश की है? मेरा ख़याल है कि नवाब साहब इतने कंजूस नहीं हैं कि बाक़ी बचा हुआ काग़ज़ काट कर रख लें।’’

‘‘उफ़, मेरे ख़ुदा।’’ डॉक्टर ने सिर पकड़ लिया। ‘‘यहाँ तक तो मेरी नज़र नहीं पहुँची थी।’’

‘‘बहरहाल, हालात कुछ ही क्यों न हों, क्या आप बहैसियत फ़ैमिली डॉक्टर इतना नहीं कर सकते कि कर्नल तिवारी के बजाय किसी और डॉक्टर से इलाज करायें?’’

‘‘मैं इस मामले में बिलकुल बेबस हूँ, फ़रीदी साहब। हालाँकि नवाब साहब ने कई बार मुझसे ऑपरेशन के बारे में बात की थी...और हाँ, क्या नाम है उसका, इस सिलसिले में सिविल हस्पताल के स्पेशलिस्ट डॉक्टर शौकत का भी नाम आया था।’’

‘‘अब तो मामला बिलकुल साफ़ हो गया।’’ फ़रीदी ने हाथ मलते हुए कहा। ‘‘हो सकता है, ख़त लिख चुकने के बाद नवाब साहब ने यह लिखा हो कि अगर कर्नल तिवारी न मिल सकें तो डॉक्टर शौकत को लेते आइएगा। इस हिस्से को किसी ने ग़ायब कर दिया।’’

‘‘हूँ...!’’ तौसीफ़ ने कुछ सोचते हुए कहा।

‘‘मेरा ख़याल है कि आप डॉक्टर शौकत से ज़रूर मिल लीजिए। कम-से-कम इस सूबे में वह अपना जवाब नहीं रखता।’’

‘‘मैं उसकी तारीफ़ें अख़बार में पढ़ता रहता हूँ और एक बार मिल भी चुका हूँ। मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि वह नवाब साहब का सौ फ़ीसदी कामयाब ऑपरेशन करेगा, लेकिन फ़रीदी साहब, मैं कर्नल तिवारी की मौजूदगी में बिलकुल बेबस हूँ। ऐसा झक्की आदमी तो आज तक मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा।’’

‘‘कर्नल तिवारी की आप फ़िक्र न करें, इसका इन्तज़ाम मैं कर लूँगा। आप जितनी जल्द हो सके, डॉक्टर शौकत से मिल कर बात कर लीजिए।’’

‘‘आप कर्नल तिवारी का क्या इन्तज़ाम करेंगे।’’

‘‘इन्तज़ाम करना कैसा! वह तो क़रीब-क़रीब हो चुका है।’’ फ़रीदी ने सिगार जलाते हुए कहा।

‘‘मैं आपका मतलब नहीं समझा।’’

‘‘तीन दिन बाद कर्नल तिवारी का यहाँ से ट्रांसफ़र हो जायेगा। ऊपर से हुक्म आ गया है। मुझे सूत्रों से ख़बर मिली है। लेकिन ख़ुद कर्नल तिवारी को अभी तक इसका पता नहीं। उन्हें इतनी जल्द जाना होगा कि शायद वह धोबी के यहाँ से अपने कपड़े भी न मँगा सकें। लेकिन यह राज़ की बात है, इसे अपने तक ही रखिएगा।’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने की बात है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा।

‘‘अच्छा, तो अब मैं चलूँ...आप कर्नल तिवारी के ट्रांसफ़र की ख़बर सुनते ही डॉक्टर शौकत को यहाँ ले आइएगा। मेरा ख़याल है कि उस वक़्त फिर किसी को ऐतराज़ भी नहीं होगा। हाँ देखिए, इसका ख़याल रहे कि मेरी मुलाक़ात का हाल किसी को पता न चले। ख़ासकर नवाब साहब के ख़ानदान के किसी आदमी को और उस सनकी बूढ़े प्रोफ़ेसर को इसकी ख़बर न होने पाये। साहब, मुझे तो वह बूढ़ा पागल मालूम होता है।’’

‘‘मैं भी उसके बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखता...!’’

‘‘वह आखिर है कौन?’’ फ़रीदी ने दिलचस्पी ज़ाहिर करते हुए कहा।

‘‘मेरे ख़याल से वह नवाब साहब का कोई रिश्तेदार है, लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि नवाब साहब ने मेरे ही सामने उससे पुरानी कोठी का किरायानामा लिखवाया था, बल्कि मैंने ही उस पर गवाह की हैसियत से दस्तख़त किये थे।’’

‘‘ख़ैर...अच्छा, अब मैं जाना चाहूँगा।’’ फ़रीदी ने उठते हुए कहा। ‘‘मुझे उम्मीद है कि आप जल्द ही डॉक्टर शौकत से मुलाक़ात करेंगे।’’

फ़रीदी की कार तेज़ी से शहर की तरफ़ जा रही थी। आज उसका दिमाग़ बहुत उलझा हुआ था। बहरहाल, वह जो मक़सद ले कर राजरूप नगर आया था, उसमें अगर बिलकुल नहीं, तो थोड़ी-बहुत कामयाबी उसे ज़रूर मिली थी। अब वह आगे के लिए प्रोग्राम बना रहा था। जैसे-जैसे वह सोच रहा था, उसे अपनी कामयाबी का पूरा यक़ीन होता जा रहा था।

सड़क के दोनों तरफ़ दूर-दूर तक घनी झाड़ियाँ थीं। सड़क बिलकुल सुनसान थी। एक जगह उसे बीच सड़क पर एक ख़ाली ताँगा खड़ा नज़र आया। वह भी इस तरह जैसे वह ख़ास तौर पर रास्ता रोकने के लिए खड़ा किया गया हो। फ़रीदी ने कार की रफ़्तार धीमी करके हॉर्न देना शुरू किया, लेकिन दूर-नज़दीक कोई दिखायी न देता था। सड़क ज़्यादा चौड़ी न थी, इसलिए फ़रीदी को कार रोक कर उतरना पड़ा। ताँगा किनारे लगा कर वह गाड़ी की तरफ़ लौट ही रहा था कि उसे दूर झाड़ियों में एक भयानक चीख़ सुनाई दी। कोई भर्रायी हुई आवाज़ में चीख़ रहा था। ऐसा मालूम होता था जैसे बार-बार चीख़ने वाले का मुँह दबा लिया जाता हो और वह गिरफ़्त से निकलने के बाद फिर चीख़ने लगता हो। फ़रीदी ने जेब से रिवॉल्वर निकाल कर आवाज़ की तरफ़ दौड़ना शुरू किया। वह ऊँची-ऊँची झाड़ियों से उलझता, गिरता, पड़ता जंगल में घुसा जा रहा था। अचानक एक फ़ायर हुआ और एक गोली सनसनाती हुई उसके कानों के क़रीब से निकल गयी। उसके बाद कई फ़ायर हुए। वह फुर्ती के साथ ज़मीन पर लेट गया। लेटे-लेटे रेंगता हुआ वह एक खाई की आड़ में हो गया। उसने भी अपना रिवॉल्वर ख़ाली करना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ़ से फ़ायर होने बन्द हो गये। शायद गोलियाँ चलाने वाला अपने ख़ाली रिवॉल्वर में कारतूस चढ़ा रहा था। फ़रीदी ने खाई की आड़ से सिर उभारा ही था कि फ़ायर हुआ; अगर वह तेज़ी से पीछे की तरफ़ न गिर गया होता तो खोपड़ी उड़ ही गयी थी। दूसरी तरफ़ से फिर अन्धाधुन्ध फ़ायर होने लगे। फ़रीदी ने भी दो-तीन फ़ायर किये और फिर चीख़ता हुआ सड़क की तरफ़ भागा। दूसरी तरफ़ से अब भी फ़ायर हो रहे थे, लेकिन वह गिरता-पड़ता भागा जा रहा था। कार में पहुँचते ही वह तेज़ रफ़्तार से शहर की तरफ़ रवाना हो गया।
 
भयानक घटना

शाम का अख़बार बाज़ार में आते ही सारे शहर में सनसनी फैल गयी। अख़बार वाले गली-कूचों में चीख़ते फिर रहे थे— ‘‘इन्स्पेक्टर फ़रीदी का क़त्ल....एक हफ़्ते के अन्दर-अन्दर शहर में तीन क़त्ल...शाम की ताज़ा ख़बर...शाम की ताज़ा ख़बर...’’

अख़बार में इस घटना का ब्योरा कुछ इस तरह दिया गया था—

‘‘आज दो बजे दिन इन्स्पेक्टर फ़रीदी की कार पुलिस हस्पताल के कम्पाउण्ड में दाख़िल हुई। इन्स्पेक्टर फ़रीदी कार से उतरते वक़्त लड़खड़ा कर गिर पड़े। किसी ने उनके दायें बाज़ू और बायें कन्धे को गोलियों का निशाना बना दिया था। फ़ौरन ही डॉक्टरी मदद पहुँचायी गयी, लेकिन फ़रीदी साहब बच न सके। तीन घण्टे मौत और ज़िन्दगी की कशमकश में जूझने के बाद वे हमेशा-हमेशा के लिए रुख़सत हो गये। यक़ीनन यह मुल्क के लिए बहुत बड़ा नुक़सान है।

‘‘इन्स्पेक्टर फ़रीदी शायद सविता देवी के क़त्ल के सिलसिले में छान-बीन कर रहे थे, लेकिन उन्होंने इसकी ख़बर किसी को नहीं दी थी। चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब को भी इस बात का पता नहीं कि उन्होंने जासूसी का कौन-सा तरीक़ा अपनाया था। अभी तक कोई नहीं बता सकता कि इन्स्पेक्टर फ़रीदी आज सुबह कहाँ गये थे। लेकिन उनकी कार पर जमी हुई धूल और पहियों की हालत बताती है कि उन्होंने काफ़ी लम्बा सफ़र किया था।

‘‘इन्स्पेक्टर फ़रीदी की उम्र तीस साल थी। वे कुँवारे थे। उन्होंने दो बँगले और एक बड़ी जायदाद छोड़ी है। उनके किसी वारिस का पता नहीं चल सका।’’

यह ख़बर आग की तरह सारे शहर में फैल गयी। डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के दफ़्तर में हलचल मची हुई थी। इन्स्पेक्टर फ़रीदी के दोस्तों ने लाश हासिल करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें लाश देखने तक की इजाज़त न दी गयी और कई ख़बरों से मालूम हुआ कि पोस्ट मॉर्टम करने पर पाँच या छै ज़ख़्म पाये गये थे।

यह सब कुछ हो रहा था, लेकिन सार्जेंट हमीद न जाने क्यों चुप था। उसे अच्छी तरह मालूम था कि इन्स्पेक्टर फ़रीदी राजरूप नगर गया था, लेकिन उसने इसकी कोई ख़बर चीफ़ इन्स्पेक्टर को न दी। वह पुलिस और ख़ुफ़िया पुलिस की भागदौड़ देख रहा था।

दूसरे जासूसों और बहुत सारे लोगों ने उससे पूछा, लेकिन उसने एक को भी ठीक ढंग से जवाब न दिया। किसी से कहता कि उन्होंने मुझे अपना प्रोग्राम नहीं बताया था, किसी से कहता उन्होंने मुझसे यह तक तो बताया नहीं था कि उन्होंने अपनी छुट्टी कैन्सिल करा दी है, फिर जासूसी का प्रोग्राम क्या बताते। किसी को यह जवाब देता कि वे अपनी स्कीमों में किसी से न राय लेते थे और न मिल कर काम करते थे।

लगभग दस बजे रात को एक नेपाली चोरों की तरह छिपता-छिपाता सार्जेंट हमीद के घर से निकला। बड़ी देर तक यूँ ही सड़कों पर मारा-मारा फिरता रहा फिर एक घटिया-से शराब-ख़ाने में घुस गया। जब वह वहाँ से निकला तो उसके पैर बुरी तरह डगमगा रहे थे। आँखों से मालूम होता था जैसे वह बहुत पी गया हो। वह लड़खड़ाता हुआ टैक्सियों की तरफ़ चल पड़ा।

‘‘भाई शाप, हम दूर जाना माँगता है।’’ उसने एक टैक्सी ड्राइवर से कहा।

‘‘साहब, हमें फ़ुर्सत नहीं...!’’ टैक्सी ड्राइवर ने कहा।

‘‘ओ बाबा, पैसा देगा...’’ उसने जेब में हाथ डाल कर पर्स निकालते हुए कहा।

‘‘नहीं...नहीं साहब...मुझे फ़ुर्सत नहीं।’’ टैक्सी ड्राइवर ने दूसरी तरफ़ मुँह फेरते हुए कहा।

‘‘अरे लो, हमारा बाप...तुम भी शाला क्या याद करेगा।’’ उसने पचास-पचास के दो नोट उसके हाथ पर रखते हुए कहा। ‘‘अब चलेगा हमारा बाप।’’

‘‘बैठिए, कहाँ चलना होगा।’’ टैक्सी ड्राइवर ने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा।

‘‘जाओ, हम नहीं जाना माँगता...हम तुमको सौ रुपया भीख दिया।’’ उसने रूठ कर ज़मीन पर बैठते हुए कहा।

‘‘अरे नहीं साहब, उठिए, चलिए...जहाँ आप कहें, आपको पहुँचा दूँ। चाहे जहन्नुम ही क्यों न हो।’’ टैक्सी ड्राइवर ने उसके नशे की हालत से लुत्फ़ उठाते हुए हँस कर कहा।

‘‘जहन्नुम ले चलेगा।’’ नेपाली ने उठ कर कहा। ‘‘तुम बड़ा अच्छा है। तुम हमारा बाप है...तुम हमारा भाई है...तुम हमारा माँ है...तुम हमारा बीबी है...तुम हमारा बीबी का शाला है...तुम हमारा...तुम हमारा...तुम हमारा क्या है?’’

‘‘साहब, हम तुम्हारे सब कुछ हैं। बोलो, कहाँ चलेगा?’’ टैक्सी ड्राइवर ने उसका हाथ अपनी गर्दन से हटा कर हँसते हुए कहा।

‘‘जिधर हम बतलाना माँगता। शाला तुम नहीं जानता कि हम बड़ा लोग है। हम तुमको और बख़्शिश देगा।’’ मदहोश नेपाली ने पिछली सीट पर बैठते हुए कहा। ‘‘शीधा चलो।’’

दूसरे मोड़ पर पहुँच कर टैक्सी राजरूप नगर की तरफ़ जा रही थी।
 
कुत्ते की मौत

डॉक्टर शौकत इन्स्पेक्टर फ़रीदी की मौत की ख़बर सुन कर दंग रह गया। उसे हैरत थी कि आखिर एकदम से यह क्या हो गया। लेकिन वह सोच भी न सकता था कि उसकी मौत सविता देवी के क़त्ल की ख़ोज-बीन के सिलसिले में हुई है। वह यही समझ रहा था कि फ़रीदी के किसी पुराने दुश्मन ने उसे मौत के घाट उतार दिया होगा। जासूसी विभाग वालों के लिए दुश्मनों की अच्छी-ख़ासी फ़ौज पैदा कर लेना कोई बड़ी बात नहीं। इस पेशे में कामयाब आदमियों की मौतें ज़्यादातर इसी तरह होती हैं।

सविता देवी के क़त्ल के सिलसिले में उसकी अब तक यही राय थी कि यह काम उन्हीं के किसी मज़हब वाले का है, जिसने मज़हबी जज़्बात से अन्धा हो कर आखिरकार उन्हें क़त्ल कर दिया। इन्स्पेक्टर फ़रीदी का यह ख़याल कि वह हमला दरअसल उसी पर था, धीरे-धीरे उसके दिमाग़ से हटता जा रहा था। यही वजह थी कि जब उसे राजरूप नगर से डॉक्टर तौसीफ़ का ख़त मिला तो उसने उस क़स्बे के नाम पर ध्यान तक न दिया।

दूसरे, डॉक्टर तौसीफ़ ख़ुद उससे मिलने के लिए आया था। उसने नवाब साहब के म़र्ज की सारी बातें बता कर उसे ऑपरेशन करने पर राज़ी कर लिया।

डॉक्टर शौकत की कार राजरूप नगर की तरफ़ जा रही थी। वह अपने असिस्टेंट और दो नर्सों को हिदायत कर आया था कि वे चार बजे तक ऑपरेशन का ज़रूरी सामान ले कर राजरूप नगर पहुँच जायें।

नवाब साहब के ख़ानदान वाले अभी तक कर्नल तिवारी के ट्रांसफ़र और तौसीफ़ के नये फ़ैसले से वाक़िफ़ न थे। डॉक्टर शौकत की आमद से वे सब हैरत में पड़ गये। ख़ासकर नवाब साहब की बहन तो आपे से बाहर हो गयीं।

‘‘डॉक्टर साहब...!’’ वे तौसीफ़ से बोलीं। ‘‘मैं आपकी इस हरकत का मतलब नहीं समझ सकी।’’

‘‘मोहतरमा, मुझे अफ़सोस है कि मुझे आपसे राय लेने की ज़रूरत नहीं।’’ तौसीफ़ ने लापरवाही से कहा।

‘‘क्या मतलब?’’ नवाब साहब की बहन ने हैरत और ग़ुस्से के मिले-जुले अन्दाज़ में कहा।

‘‘मतलब यह कि अचानक कर्नल तिवारी का तबादला हो गया है और अब इसके अलावा कोई और सूरत बाक़ी नहीं रह गयी।’’

‘‘कर्नल तिवारी का तबादला हो गया है।’’

‘‘उनका ख़त पढ़िए।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाल कर उनके सामने डाल दिया। वे ख़त पढ़ने लगीं। कुँवर सलीम और नवाब साहब की भानजी नजमा भी झुक कर देख़ने लगी।

‘‘लेकिन मैं ऑपरेशन तो हरगिज़ न होने दूँगी।’’ बेगम साहिबा ने ख़त वापस करते हुए कहा।

‘‘देख़िए, मोहतरमा...यहाँ आपकी राय का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। नवाब साहब का डॉक्टर होने की हैसियत से इसकी सौ फ़ीसदी ज़िम्मेदारी मुझ पर होती है। कर्नल तिवारी की ग़ैरमौजूदगी में मैं क़ानूनन अपने हक़ का इस्तेमाल कर सकता हूँ।’’

‘‘बिलकुल...बिलकुल...डॉक्टर साहब।’’ कुँवर सलीम ने कहा। ‘‘अगर डॉक्टर शौकत मेरे चचा को इस बीमारी से निजात दिला दें तो इससे बढ़ कर और क्या बात हो सकती है। मेरा भी यही ख़याल है कि अब ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया।’’

‘‘सलीम...!’’ नवाब साहब की बहन ने गरज कर कहा।

‘‘फूफी साहिबा...मैं समझता हूँ कि आप मुहब्बत करने वाली बहन का दिल रखती हैं, लेकिन उनकी सेहत की ख़ातिर दिल पर पत्थर रखना पड़ेगा।’’

‘‘कुँवर भैया...आप इतनी जल्द बदल गये।’’ नजमा ने कहा।

‘‘क्या करूँ नजमा...अगर कर्नल तिवारी मौजूद होते तो मैं कभी ऑपरेशन के लिए तैयार न होता। लेकिन ऐसी सूरत में, तुम ही बताओ, चचा जान कब तक यूँ ही पड़े रहेंगे।’’

‘‘क्यों साहब, क्या ऑपरेशन के अलावा कोई और सूरत नहीं हो सकती?’’ नवाब साहब की बहन ने डॉक्टर शौकत से पूछा।

‘‘यह तो मैं मरीज़ को देखने के बाद ही बता सकता हूँ।’’ डॉक्टर शौकत ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘हाँ, हाँ, हो सकता है कि इसकी नौबत ही न आये।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा।

नवाब साहब जिस कमरे में थे, वह ऊपरी मंज़िल पर था। सब लोग नवाब साहब के कमरे में आये। वे कम्बल ओढ़े लेटे हुए थे, ऐसा मालूम हो रहा था जैसे वे गहरी नींद में सो रहे हों।

डॉक्टर शौकत ने अपने आले की मदद से उनका चेक-अप करना शुरू किया। फिर बोला।

‘‘मुझे अफ़सोस है बेगम साहिबा कि ऑपरेशन के बग़ैर काम न चलेगा।’’ डॉक्टर शौकत ने अपना आले को हैंडबैग में रखते हुए कहा।

फिर सब लोग नीचे वापस आ गये।

डॉक्टर शौकत ने नवाब साहब के ख़ानदान वालों को काफ़ी इत्मीनान दिलाया। उनकी तसल्ली के लिए उसने इन लोगों को अपने बेशुमार ख़तरनाक केसों के हालात सुना डाले। नवाब साहब का ऑपरेशन तो उनके मुक़ाबले में कोई चीज़ न था।

‘‘फूफी साहिबा, आप नहीं जानतीं।’’ बेगम साहिबा से सलीम ने कहा। ‘‘डॉक्टर शौकत जैसा डॉक्टर पूरे हिन्दुस्तान में नहीं मिल सकता।’’

‘‘मैं किस क़ाबिल हूँ।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा। ‘‘सब ख़ुदा की मेहरबानी और उसका एहसान है।’’

‘‘हाँ, यह तो बताइए कि ऑपरेशन से पहले कोई दवा वग़ैरह दी जायेगी?’’ कुँवर सलीम ने पूछा।

‘‘फ़िलहाल एक इंजेक्शन दूँगा।’’

‘‘और ऑपरेशन कब होगा?’’ नवाब साहब की बहन ने पूछा।

‘‘आज ही...आठ बजे रात से ऑपरेशन शुरू हो जायेगा। चार बजे तक मेरा असिस्टेंट और दो नर्सें यहाँ आ जायेंगी।’’

‘‘मेरा तो दिल घबरा रहा है।’’ नवाब साहब की भानजी ने कहा।

‘‘घबराने की कोई बात नहीं है।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा। ‘‘मैं अपनी सारी कोशिशें लगा दूँगा। केस कुछ ऐसा ख़तरनाक नहीं। और अल्लाह ताला से बड़ा कोई नहीं, उससे हम सब को उम्मीद है। इंशा अल्लाह ऑपरेशन कामयाब होगा। आप लोग बिलकुल परेशान न हों।’’

‘‘डॉक्टर साहब, आप इत्मीनान से अपनी तैयारी पूरी कीजिए।’’ कुँवर सलीम हँस कर बोला। ‘‘बेचारी औरतों के बस में घबराने के अलावा और कुछ नहीं।’’

नवाब साहब की बहन ने उसे तेज़ नज़रों से देखा और नजमा के माथे पर लकीरें पड़ गयीं।

‘‘मेरा मतलब है फूफी साहिबा कि कहीं डॉक्टर साहब आप लोगों की हालत देख कर परेशन न हो जायें। अब चचा जान को अच्छा ही हो जाना चाहिए। हद है, अट्ठारह दिन हो गये, अभी तक उनको होश नहीं आया।’’

‘‘तुम इस तरह कह रहे हो जैसे हम लोग उन्हें सेहतयाब देखने के ख़्वाहिशमन्द नहीं हैं!’’ बेगम साहिबा ने मुँह बना कर कहा।

‘‘ख़ैर... ख़ैर...!’’ फ़ैमिली डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा। ‘‘हाँ तो डॉक्टर शौकत, मेरे ख़याल से अब आप इंजेक्शन दे दीजिए।’’

डॉक्टर शौकत, डॉक्टर तौसीफ़ और कुँवर सलीम ऊपरी मंज़िल पर मरीज़ के कमरे में चले गये और दोनों माँ-बेटियाँ हॉल में रुक कर आपस में बातें करने लगीं। नजमा कुछ कह रही थी और नवाब साहब की बहन के माथे पर लकीरें उभर रही थीं। उन्होंने दो-तीन बार सीढ़ियों की तरफ़ देखा और बाहर निकल गयीं।
 
इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर शौकत, कुँवर सलीम और डॉक्टर तौसीफ़ के साथ बाहर आया।

‘‘अच्छा कुँवर साहब, अब हम लोग चलेंगे। चार बजे तक नर्सें और मेरा असिस्टेंट आपके यहाँ आ जायेंगे और मैं भी ठीक छै बजे यहाँ पहुँच जाऊँगा।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘तो यहीं रुक जाइए ना...!’’ सलीम ने कहा।

‘‘नहीं...डॉक्टर तौसीफ़ के यहाँ ठीक रहेगा और फिर क़स्बे में मुझे कुछ काम भी है। हम लोग छै बजे तक आ जायेंगे।’’

डॉक्टर कार में बैठ गये, लेकिन डॉक्टर शौकत की लाख कोशिशों के बावजूद कार स्टार्ट न हुई।

‘‘यह तो बड़ी मुसीबत हुई।’’ डॉक्टर शौकत ने कार से उतर कर मशीन का जायज़ा लेते हुए कहा।

‘‘फ़िक्र मत कीजिए...मैं अपनी गाड़ी निकाल कर लाता हूँ।’’ कुँवर सलीम ने कहा और लम्बे डग भरता हुआ गैराज की तरफ़ चला गया, जो पुरानी कोठी के क़रीब था।

थोड़ी देर बाद नवाब साहब की बहन आ गयीं।

‘‘डॉक्टर शौकत की कार ख़राब हो गयी। कुँवर साहब कार के लिए गये हैं।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने उनसे कहा।

‘‘ओह...कार तो मैंने ही शहर भेज दी है और भाई जान वाली कार बहुत दिनों से ख़राब है।’’

‘‘अच्छा, तो फ़िर आइए डॉक्टर साहब, हम लोग पैदल ही चलें...सिर्फ़ डेढ़ मील तो चलना है।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘डॉक्टर तौसीफ़! मुझे आपसे कुछ राय-मशवरा करना है।’’ नवाब साहब की बहन ने कहा। ‘‘अगर आप लोग शाम तक यहीं ठहर जायें तो क्या हर्ज है।’’

‘‘डॉक्टर साहब को आप रोक लें। मुझे कोई ऐतराज़ न होगा।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘आप कुछ ख़याल न कीजिए...! बेगम साहिबा बोलीं। ‘‘अगर कार शाम तक वापस आ गयी तो मैं छै बजे तक भिजवा दूँगी, वरना फिर किसी दूसरी सवारी का इन्तज़ाम किया जायेगा।’’

‘‘शाम को तो मैं हर सूरत में पैदल ही आऊँगा, क्योंकि ऑपरेशन के वक़्त मैं काफ़ी चाक़-चौबन्द रहना चाहता हूँ।’’ शौकत ने कहा और क़स्बे की तरफ़ रवाना हो गया। रास्ते में कुँवर सलीम मिला।

‘‘मुझे अफ़सोस है डॉक्टर कि इस वक़्त कार मौजूद नहीं। आप यहीं रहिए, आखिर इसमें हर्ज ही क्या है।’’

‘‘हर्ज तो कोई नहीं, लेकिन मुझे तैयारी करनी है।’’ डॉक्टर शौकत ने जवाब दिया।

‘‘अच्छा तो चलिए, मैं आपको छोड़ आऊँ।’’

‘‘नहीं...शुक्रिया...रास्ता मेरा देखा हुआ है।’’

डॉक्टर शौकत जैसे ही पुरानी कोठी के क़रीब पहुँचा उसे एक अजीब तरह का क़हक़हा सुनाई दिया। बूढ़ा प्रोफ़ेसर इमरान क़हक़हे लगाता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ रहा था।

‘‘हैलो, हैलो...!’’ बूढ़ा चीख़ा। ‘‘अपने मकान के क़रीब अजनबियों को देख कर मुझे ख़ुशी होती है।’’

डॉक्टर शौकत रुक गया। उसे महसूस हुआ जैसे उसके जिस्म के सारे रोयें खड़े हो गये हों। इतनी ख़ौफ़नाक शक्ल का आदमी आज तक उसकी नज़रों से न गुज़रा था।

‘‘मुझसे मिलिए...मैं प्रोफ़ेसर इमरान हूँ।’’ उसने हाथ मिलाने के लिए दायाँ हाथ बढ़ाते हुए कहा। ‘‘और आप...!

‘‘मुझे शौकत कहते हैं...!’’ शौकत ने बेदिली से हाथ मिलाते हुए कहा, लेकिन उसने महसूस किया कि हाथ मिलाते वक़्त बूढ़ा कुछ सुस्त पड़ गया था। बूढ़े ने फ़ौरन ही अपना हाथ खींच लिया और क़हक़हा लगाता, उछलता-कूदता, फिर पुरानी कोठी में वापस चला गया।

डॉक्टर शौकत हैरान खड़ा था। तभी एकाएक क़रीब की झाड़ियों से एक बड़ा-सा कुत्ता उस पर झपटा। डॉक्टर शौकत घबरा कर कई क़दम पीछे हट गया। कुत्ते ने छलाँग लगायी और एक भयानक चीख़ के साथ ज़मीन पर जा गिरा। कुछ सेकेण्ड तक वह तड़पा और फिर उसकी हरकत बन्द हो गयी। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि डॉक्टर शौकत को कुछ सोचने-समझने का मौक़ा न मिल सका। इसके बाद कुछ समझ ही में न आ रहा था कि वह क्या करे।

‘‘अरे, यह मेरे कुत्ते को क्या हुआ...टाइगर! टाइगर...!’’ एक ज़नाना आवाज़ सुनायी दी। शौकत चौंक पड़ा। सामने नवाब साहब की भानजी नजमा खड़ी थी।

‘‘मुझे ख़ुद हैरत है।’’ शौकत ने कहा।

‘‘मैंने इसके ग़ुर्राने की आवाज़ सुनी थी। क्या यह आप पर झपटा था? लेकिन इसकी सज़ा मौत न हो सकती थी।’’ वह तेज़ आवाज़ में बोली।

‘‘यक़ीन कीजिए, मोहतरमा! मुझे ख़ुद हैरत है कि उसे एकदम से हो क्या हो गया...अगर आपको मुझ पर शक है तो भला बताइए मैंने उसे क्योंकर मारा...?’’

नजमा कुत्ते की लाश पर झुकी उसे पुकार रही थी। ‘‘टाइगर, टाइगर...!’’

‘‘बेकार है मोहतरमा, यह ठण्डा हो चुका है।’’ शौकत कुत्ते की लाश को हिलाते हुए बोला।

‘‘आखिर उसे हो क्या गया।’’ नजमा ने डरे हुए अन्दाज़ में पूछा।

‘‘मैं ख़ुद यही सोच रहा हूँ। बाहर से तो कोई ज़ख़्म भी नहीं नज़र आ रहा।’’

‘‘हैरत है...!’’

तभी अचानक डॉक्टर शौकत के दिमाग़ में एक ख़याल आया। वह उसके पंजों को देखने लगा।

‘‘ओह...!’’ उसके मुँह से हैरत की चीख़ निकली और उसने कुत्ते के पंजे में चुभी हुई ग्रामोफ़ोन की सुई खींच ली और ग़ौर से उसे देर तक देखता रहा।

‘‘देखिए, मोहतरमा, मेरे ख़याल से यह ज़हरीली सुई ही आपके कुत्ते की मौत का सबब बनी है।’’

‘‘सुई...!’’ नजमा ने चौंक कर कहा। ‘‘ग्रामोफ़ोन की सुई...क्या मतलब...?’’

‘‘मतलब तो मैं भी नहीं समझा, लेकिन पूरे तौर से यह कह सकता हूँ कि यह सुई ख़तरनाक हद तक ज़हरीली है। मुझे बहुत अफ़सोस है। कुत्ता बहुत उम्दा नस्ल का था।’’

‘‘लेकिन यह सुई यहाँ कैसे आयी?’’ वह पलकें झपकाती हुई बोली।

‘‘किसी से गिर गयी होगी।’’

‘‘अजीब बात है?

शौकत ने वह सुई एहतियात से थर्मामीटर रखने वाली नली में रख ली और बोला, ‘‘यह एक दिलचस्प चीज़ है। मैं इसकी जाँच करूँगा। आपके कुत्ते की मौत पर एक बार फिर अफ़सोस करता हूँ।’’

‘‘ओह...डॉक्टर, मैं आपसे सच कहती हूँ कि मैं इस कुत्ते का बहुत ख़याल रखती थी।’’ उसने हाथ मलते हुए कहा।

‘‘वाक़ई, बहुत अच्छा कुत्ता था। इस नस्ल के ग्रेहाउण्ड बहुत कम मिलते हैं।’’ शौकत ने जवाब दिया।

‘‘होने वाली बात थी...अफ़सोस तो होता है, मगर अब हो ही क्या सकता है। मगर एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि सुई यहाँ आयी कैसे।’’

‘‘मैं ख़ुद यही सोच रहा हूँ।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘हो सकता है कि यह सुई उस पागल बूढ़े की हो। उसके पास अजीबो-ग़रीब चीज़ें हैं...मनहूस कहीं का।’’

‘‘क्या आप उन साहब के बारे में तो नहीं कह रही हैं जो अभी इस कोठी से निकले थे।’’

‘‘जी हाँ...वही होगा...!’’ नजमा ने जवाब दिया।

‘‘ये कौन साहब हैं। बहुत ही अजीबो-ग़रीब आदमी मालूम होते हैं?’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘यह हमारा किरायेदार है। प्रोफ़ेसर इमरान....लोग कहते हैं कि अन्तरिक्ष वैज्ञानिक है। मुझे तो यक़ीन नहीं आता। वह देखिए, उसने मीनार पर एक दूरबीन भी लगा रखी है।’’

‘‘प्रोफ़ेसर इमरान...अन्तरिक्ष वैज्ञानिक...ये बहुत मशहूर आदमी हैं। मैंने इनकी कई किताबें पढ़ी हैं। अगर वक़्त मिला तो मैं उनसे ज़रूर मिलूँगा।’’

‘‘क्या कीजिएगा मिल कर...दीवाना है। वह होश ही में कब रहता है। वह जानवर से भी बदतर है।’’ नजमा ने कहा। ख़ैर, हटाइए इन बातों को...डॉक्टर साहब ऑपरेशन में कोई ख़तरा तो नहीं?

‘‘जी नहीं, आप इत्मीनान रखिए...इन्शा अल्लाह कोई गड़बड़ न होने पायेगी।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा। ‘‘अच्छा, अब मैं चलूँ। मुझे ऑपरेशन की तैयारी करनी है।’’

डॉक्टर शौकत क़स्बे की तरफ़ चल पड़ा। एक शख़्स झाड़ियों की आड़ लेता हुआ उसका पीछा कर रहा था।
 
बाल बाल बचे

रास्ते भर शौकत का दिमाग़ सुई और कुत्ते की मौत में उलझा रहा। साथ-ही-साथ वह ख़लिश भी उसके दिल में चुभ रही थी जो नजमा से बात करने के बाद पैदा हो गयी थी। उसका दिल तो यही चाह रहा था कि वह ज़िन्दगी भर खड़ा उससे इसी तरह बातें करे। औरतों से बात करना उसके लिए नयी बात न थी। वह तक़रीबन दिन-भर नर्सों में घिरा रहता था और इसके अलावा उसका पेशा भी ऐसा था कि दूसरी औरतों से भी उसका साबक़ा पड़ता रहता था। लेकिन नजमा में न जाने कौन-सी ऐसी बात थी जिसकी वजह से रह-रह कर उसका चेहरा उसकी नज़रों के सामने आ जाता था।

डॉक्टर तौसीफ़ के घर पहुँचते ही वह सब कुछ भूल गया। क्योंकि अब वह ऑपरेशन की स्कीम तैयार कर रहा था। वह एक ज़िन्दगी बचाने जा रहा था...उसे अपनी कामयाबी का उसी तरह यक़ीन था जिस तरह इसका कि वह ग्यारह बजे खाना खायेगा।

लगभग एक घण्टे के बाद डॉक्टर तौसीफ़ नवाब साहब की कार ले कर घर पर आ गया।

‘‘कहिए डॉक्टर साहब, कोई ख़ास बात?’’ डॉक्टर शौकत ने पूछा।

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं, अलबत्ता कुत्ते की मौत से हर शख़्स हैरान है। लाइए, देखूँ तो वह सुई।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने सुई लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा।

‘‘यह देखिए...बड़ी अजीब बात है। मालूम नहीं सुई किस ज़हर में बुझायी गयी है।’’ डॉक्टर शौकत थर्मामीटर की नलकी से सुई निकाल कर उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए बोला। ‘‘देखते-ही-देखते कुत्ता ख़त्म हो गया।’’

‘‘ग्रामोफ़ोन की सुई है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने सुई को ग़ौर से देखते हुए कहा। ‘‘मालूम नहीं किस ज़हर में बुझायी गयी है।’’

‘‘मेरे ख़याल में पोटैशियम सायानाइड या उसी क़िस्म का कोई और ज़हर है,’’ डॉक्टर शौकत ने सुई को ले कर फिर थर्मामीटर की नलकी में रखते हुए कहा।

‘‘मुझे तो यह सुई पागल प्रोफ़ेसर की मालूम होती है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा। ‘‘उसकी अजीबो-ग़रीब चीज़ें और हरकतें दूर तक मशहूर हैं।’’

‘‘मुझे अभी तक प्रोफ़ेसर के बारे में कुछ ज़्यादा नहीं मालूम। लेकिन मैं उस शाख़्सियत के बारे में और जानना चाहता हूँ। वैसे तो मैं यह जानता हूँ कि वह एक मशहूर अन्तरिक्ष वैज्ञानिक है।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘उसकी ज़िन्दगी अभी तक एक राज़ है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा। ‘‘लेकिन इतना मैं भी जानता हूँ कि अब से दो साल पहले वह एक ठीक दिमाग़ का आदमी था। उसके बाद अचानक उसकी आदतों में तब्दीलियाँ आने लगीं और अब तो सभी का यह ख़याल है कि उसका दिमाग़ ख़राब हो गया है।’’

‘‘मैंने तो साहब, इतना भयानक आदमी आज तक नहीं देखा।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

थोड़ी देर तक ख़ामोशी छायी रही उसके बाद डॉक्टर तौसीफ़ बोला, ‘‘हाँ तो आपका क्या प्रोग्राम है। मेरे ख़याल से तो अब दोपहर का खाना खा लेना चाहिए।’’

खाने के दौरान ऑपरेशन और दूसरे विषयों पर बातचीत होती रही। अचानक डॉक्टर शौकत को कुछ याद आ गया।

‘‘डॉक्टर साहब, मैं जल्दी में अपने असिस्टेंट को कुछ ज़रूरी बात बताना भूल गया हूँ...अगर आप कोई ऐसा इन्तज़ाम कर सकें कि मेरा पर्चा उस तक पहुँचा दिया जाय तो बहुत अच्छा हो।’’ डॉक्टर शौकत ने कहा।

‘‘चलिए, अब दो काम हो जायेंगे।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा। ‘‘मैं दरअसल शहर जाने के लिए ही नवाब साहब की कार लाया था। आप पर्चा दे दीजिएगा और हाँ, क्यों न आपके साथियों को अपने साथ लेता आऊँ।’’

‘‘इससे बेहतर क्या हो सकता है।’’

‘‘इस पर्चे के अलावा कोई और काम...?’’

‘‘जी नहीं, शुक्रिया। मेरे ख़याल से आप उन लोगों को उसी तरफ़ से कोठी लेते जाइएगा।

‘‘ठीक है...छै बजे आप के लिए कार भिजवा दी जायेगी।’’

‘‘नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं। मैं पैदल ही आऊँगा।’’

‘‘क्यों....?’’

‘‘बात दरअसल यह है डॉक्टर साहब, कि ऑपरेशन ज़रा नाज़ुक है। मैं चाहता हूँ कि ऑपरेशन से पहले इतनी कसरत हो जाये जिससे जिस्म में चुस्ती पैदा हो सके।’’

‘‘डॉक्टर शौकत, मैं आपकी तारीफ़ किये बग़ैर नहीं रह सकता। हक़ीक़त में एक अच्छे डॉक्टर को ऐसा ही होना चाहिए।’’

डॉक्टर तौसीफ़ के चले जाने के बाद डॉक्टर शौकत ने एक के बाद एक वे किताबें पढ़ना शुरू कीं जो वह अपने साथ लाया था। एक काग़ज़ पर पेंसिल से कुछ ख़ाके बनाये और देर तक उन्हें देखता रहा। पुराने रिकॉर्डों की कुछ फ़ाइलें देखीं। इस तरह दिन ख़त्म हो गया। तक़रीबन पाँच बजे उसने किताबें और फ़ाइलें एक तरफ़ रख दीं। उसे ठीक छै बजे यहाँ से निकलना था। दिसम्बर का महीना था। शाम की किरनें फीकी-फीकी लाली में बदलती जा रही थीं। डॉक्टर तौसीफ़ का नौकर अण्डे के सैंडविच और कॉफ़ी ले आया। रात का खाना उसे कोठी में खाना था, इसलिए उसने सिर्फ़ एक सैंडविच खाया और दो कप कॉफ़ी के बाद सिग्रेट सुलगा कर टहलने लगा। घड़ी ने छै बजाये...उसने कपड़े पहने और चेस्टर कन्धे पर डाल कर रवाना हो गया। वह धीरे-धीरे टहलता हुआ जा रहा था। चारों तरफ़ अँधेरा फैल गया था। सड़क की दोनों तरफ़ घनी झाड़ियाँ और पेड़ों की क़तारें थीं जिनकी वजह से सड़क और ज़्यादा अँधेरी हो गयी थी। लेकिन डॉक्टर शौकत ऑपरेशन के ख़याल में मगन बेख़ौफ़ चला जा रहा था। उससे तक़रीबन पचास फ़ुट पीछे एक दूसरा आदमी झाड़ियों से लगा हुआ चल रहा था। शायद उसने रबड़सोल के जूते पहन रखे थे जिसकी वजह से डॉक्टर शौकत को उसके क़दमों की आवाज़ सुनायी नहीं दे रही थी। एक जगह डॉक्टर शौकत सिग्रेट सुलगाने के लिए रुका, तो वह शख़्स भी रुक कर झाड़ियों की ओट में चला गया। जैसे ही शौकत ने चलना शुरू किया, वह फिर झाड़ियों से निकल कर उसी तरह उसका पीछा करने लगा।
 
सड़क ज़्यादा चलती हुई न थी। वजह यह कि सड़क महज़ कोठी के लिए बनायी गयी थी। अगर नवाब साहब ने अपनी कोठी बस्ती के बाहर न बनवायी होती तो फिर इस सड़क का वजूद भी न होता। शौकत के वज़नी जूतों की आवाज़ इस सुनसान सड़क पर इस तरह गूँज रही थी जैसे वह झाड़ियों में दुबक कर टीं-टीं, रीं-रीं करने वाले झींगुरों को डाँट रही हो...शौकत चलते-चलते हल्के सुरों में सीटी बजाने लगा। उसे अपने जूतों की आवाज़ सीटी की धुन पर ताल देती मालूम हो रही थी। किसी पेड़ पर एक बड़े पक्षी ने चौंक कर अपने पर फड़फड़ाये और उड़ कर दूसरी तरफ़ चला गया। झाड़ियों के पीछे क़रीब ही गीदड़ों ने चीख़ना शुरू कर दिया। जो शख़्स डॉक्टर शौकत का पीछा कर रहा था, उसका अब कहीं पता न था। कुछ आगे बढ़ कर बहुत ज़्यादा घने पेड़ों का सिलसिला शुरू हो गया। यहाँ पर दोनों तरफ़ के पेड़ों की डालियाँ इस तरह आपस मिल गयी थीं कि आसमान नहीं दिखायी देता था। डॉक्टर शौकत दुनिया से बेख़बर अपनी धुन में चला जा रहा था। अचानक उसके मुँह से एक चीख़ निकली और हाथ ऊपर उठ गये। उसके गले में एक मोटी-सी रस्सी का फन्दा पड़ा हुआ था। धीरे-धीरे फन्दे की पकड़ कसती गयी और साथ-ही-साथ वह ऊपर उठने लगा। गले की रगें फूल रही थीं। आँखें निकली पड़ रही थीं। उसने चीख़ना चाहा, लेकिन आवाज़ न निकली। उसे ऐसा मालूम हो रहा था जैसे उसका दिल कनपटियों और आँखों में धड़क रहा हो। धीरे-धीरे उसे अँधेरा गहरा होता हुआ मालूम हुआ। झींगुरों और गीदड़ों का शोर दूर क्षितिज में डूबता जा रहा था। फिर बिलकुल ख़ामोशी छा गयी। वह ज़मीन से दो फुट की ऊँचाई पर झूल रहा था। कोई उसी पेड़ पर से कूद कर झाड़ियों में ग़ायब हो गया। फिर एक आदमी उसकी तरफ़ दौड़ कर आता दिखायी दिया। उसके क़रीब पहुँच कर उसने हाथ मलते हुए इधर-उधर देखा...दूसरे पल में वह फुर्ती से पेड़ पर चढ़ रहा था। एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता हुआ वह उस डाल पर पहुँच गया जिससे रस्सी बँधी हुई थी। उसने रस्सी ढीली करनी शुरू की और धीरे-धीरे डॉक्टर शौकत के पैर ज़मीन पर टिका दिये। फिर रस्सी को उसी तरह बाँध कर नीचे उतर आया। अब उसने जेब से चा़कू निकाल कर रस्सी काटी और शौकत को हाथों पर सँभाले हुए सड़क पर लिटा दिया। फन्दा ढीला होते ही बेहोश डॉक्टर गहरी-गहरी साँसें ले लेने लगा था। उस अजनबी ने माचिस जला कर उसके चेहरे पर नज़र डाली। आँखों की पलकों में हरकत पैदा हो चुकी थी। मालूम हो रहा था जैसे वह दस-पाँच मिनट के बाद होश में आ जायेगा। दो-तीन मिनट गुज़र जाने पर उसके जिस्म में हरकत पैदा हुई और अजनबी जल्दी से झाड़ियों के पीछे छिप गया।

थोड़ी देर के बाद एक कराह के साथ डॉक्टर शौकत उठ कर बैठ गया और आँखें फाड़-फाड़ कर चारों तरफ़ देखने लगा। धीरे-धीरे कुछ देर पहले के वाक़यात उसके दिमाग़ में कौंध गये...न चाहते हुए भी उसका हाथ गर्दन की तरफ़ गया, लेकिन अब वहाँ रस्सी का फन्दा न था। अलबत्ता गर्दन बड़ी बुरी तरह दुख रही थी। उसे हैरत हो रही थी कि वह किस तरह बच गया। अब उसे फ़रीदी मरहूम के अल्फ़ाज़ बुरी तरह याद आ रहे थे और साथ ही सविता देवी की ख़्वाब की बड़बड़ाहट भी याद आ गयी थी। ‘‘राजरूप नगर!’’ उसके सारे जिस्म से ठण्डा-ठण्डा पसीना छूट पड़ा। वह सोचने लगा, वह भी कितना बेवकूफ़ था कि उसने फ़रीदी के शब्द भुला दिये और ख़ौफ़नाक जगह पर अँधेरी रात में अकेला चला आया। उसकी जान लेने की यह दूसरी कोशिश थी। उसकी आँखों के सामने उस नेपाली का नक़्शा घूम गया जिसने उसे धमकी दी थी। फिर अचानक वह ज़हरीली सुई याद आयी और प्रोफ़ेसर का भयानक चेहरा...जो उसने उससे हाथ मिलाते हुए देखा था। और ठीक उसी जगह कुत्ता भी उछल कर गिरा था। तो क्या प्रोफ़ेसर...प्रोफ़ेसर...लेकिन आखिर क्यों? यह सब सोचते-सोचते उसे अपनी मौजूदा हालत का ख़याल आया और वह कपड़े झाड़ता हुआ खड़ा हो गया। चेस्टर क़रीब ही पड़ा था। उसने जल्दी से चेस्टर उठा कर कन्धे पर डाला और तेज़ी से कोठी की तरफ़ रवाना हो गया। उसने सोचा कि घड़ी में वक़्त देखे, लेकिन फिर माचिस जला कर देखने की हिम्मत न पड़ी।

कोठी में सब लोग बेसब्री से उसका इन्तज़ार कर रहे थे। उसने सात बजे आने का वादा किया था, लेकिन अब आठ बज रहे थे।

‘‘शौकत बहुत ही पंक्चुअल आदमी मालूम होता है। ना जाने क्या बात है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने बाग़ में टहलते हुए कहा।

नजमा बार-बार अपनी कलाई पर बँधी हुई घड़ी देख रही थी।

‘‘क्या बात हो सकती है।’’ कुँवर सलीम ने पंजों के बल खड़े होते हुए माथे पर हाथ रख कर अँधेरे में घूरते हुए कहा।

‘‘मेरा ख़याल है कि वह देर में घर से रवाना हुआ। मैं तो कह रहा था कि कार भिजवा दूँगा, लेकिन उसने कहा कि मैं पैदल ही आऊँगा। अरे, यह कौन आ रहा है...हैलो... डॉक्टर... भई इन्तज़ार करते करते आँखें पत्थरा गयीं।’’

डॉक्टर शौकत बरामदे में दाख़िल हो चुका था। वह रास्ते भर अपने चेहरे से परेशानी के भाव मिटाने की कोशिश करता आया था।

‘‘मुझे अफ़सोस है।’’ डॉक्टर शौकत ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘‘अपनी बेवकूफ़ी की वजह से चलते वक़्त टॉर्च ले कर नहीं चला...नतीजा यह हुआ कि रास्ता भूल गया।’’

‘‘लेकिन आपके सिर में यह इतने सारे तिनके कहाँ से आ गये...जी, वहाँ नहीं। पीछे की तरफ़...!’’ नजमा ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘तिनके...ओह...बताइए ना....आखिर बात क्या है?’’ कुँवर सलीम ने गम्भीरता से पूछा।

‘‘अरे, वह तो एक पागल कुत्ता था...राह में उसने मुझे दौड़ाया। अँधेरा काफ़ी था...मैं ठोकर खा कर गिर पड़ा। वह तो कहिए एक राहगीर उधर आ निकला वरना...!’’

‘‘आजकल दिसम्बर में पागल कुत्ता?’’ नजमा ने हैरत से कहा। ‘‘कुत्ते तो ज़्यादातर गर्मियों में पागल होते हैं।’’

‘‘नहीं...यह ज़रूरी नहीं।’’ कुँवर सलीम ने जवाब दिया। ‘‘अकसर सर्दियों में भी कुछ कुत्तों का दिमाग़ ख़राब हो जाता है। ख़ैर...आप ख़ुशक़िस्मत थे डॉक्टर शौकत...पागल कुत्तों का ज़हर बहुत ख़तरनाक होता है। आप तो जानते ही होंगे।’’

‘‘हाँ भई डॉक्टर...वह आपके आदमियों ने बीमार के कमरे में सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।’’

‘‘वे लोग इस वक़्त वहीं हैं...!’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा।

‘‘आपके इन्तज़ार में शायद उन लोगों ने भी अभी तक खाना नहीं खाया।’’ नजमा बोली।

‘‘मेरा इन्तज़ार आप लोगों ने बेकार किया। मैं ऑपरेशन से पहले थोड़ा-सा सूप पीता हूँ। खाना खा लेने के बाद दिमाग़ किसी काम का नहीं रह जाता...!’’
 
‘‘जी हाँ! मैंने भी अकसर किताबों में यही पढ़ा है और जहाँ तक मेरा ख़याल है कि दुनिया के किसी बड़े आदमी ने यह ज़रूर कहा होगा।’’ नजमा ने शोख़ी से कहा। डॉक्टर शौकत ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखा। नजमा से निगाहें मिलते ही वह ज़मीन की तरफ़ देखने लगा।

‘‘ख़ैर साहब...वह सब कुछ ठीक है, पर मैं तो दिन भर में पाँच सेर से कम नहीं खाता।’’ कुँवर सलीम ने हँस कर कहा। ‘‘खाना देर से इन्तज़ार में है। हर तन्दुरुस्त आदमी का फ़र्ज़ है कि उसे इन्तज़ार की ज़हमत से बचाये।’’

सब लोग खाने के कमरे में चले गये।

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पुरानी कोठी के बाहर

पुरानी कोठी के बाग़ में प्रोफ़ेसर इमरान किसी से बातचीत कर रहा था। कभी-कभी दोनों की आवाज़ें तेज़ हो जातीं तो कभी खुसर-फुसर में बदल जातीं।

प्रोफ़ेसर कह रहा था, ‘‘लेकिन मैं नहीं जाऊँगा।’’

‘‘तो इसमें बिगड़ने की क्या बात है, मेरी जान,’’ दूसरी आवाज़ सुनाई दी, ‘‘न जाने में तुम्हारा ही नुक़सान है।’’

‘‘मेरा नुक़सान...!’’ प्रोफ़ेसर की आवाज़ आयी, ‘‘यूनान और रोम के देवताओं की क़सम हरगिज़ न जाऊँगा।’’

‘‘तुम्हें चलना पड़ेगा।’’ किसी ने कहा।

‘‘सुनो इसे, अबाबील के बच्चे...तुम में इतनी हिम्मत नहीं कि मुझे मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कहीं ले जा सको।’’ प्रोफ़ेसर चीख़ा।

‘‘ख़ैर, न जाओ, लेकिन तुम्हें इसके लिए पछताना पड़ेगा। देखना है कि तुम्हें कल से सफ़ेदा कैसे मिलता है!’’ दूसरे आदमी ने कहा और बाग़ से निकलने लगा।

‘‘ठहरो...ठहरो...तो ऐसे बात करो न! तुमने पहले ही क्यों नहीं बताया कि तुम बीर बहूटी के बच्चे हो!’’ प्रोफ़ेसर हँस कर बोला।

‘‘बीर बहूटी...हाँ, बीर बहूटी...मगर इसके लिए तुम्हें मेरे साथ माली के झोंपड़े तक चलना होगा।’’

‘‘अच्छा, तो आओ, फिर चलें।’’ प्रोफ़ेसर ने कहा और दोनों माली के झोंपड़े की तरफ़ चल पड़े।

लगभग आधे घण्टे के बाद प्रोफ़ेसर लँगड़ाता हुआ माली के झोंपड़े से बाहर निकला। वह अकेला था और उसके कन्धे पर एक वज़नी गठरी थी। एक जगह रुक कर उसने इधर-उधर देखा फिर माली के झोंपड़े की तरफ़ घूँसा तान कर कहने लगा।

‘‘अबे, तूने मुझे समझा क्या है? मैं कुत्ते का गोश्त खिला दूँगा। छछूँदर की औलाद नहीं तो...अबे, मैं वह हूँ जिसने सिकन्दरे-आज़म का मुर्ग़ा चुराया था। चमगादड़ मुझे सलाम करने आते हैं। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तू अपने दादा का बीज है। हरामी! चला है वहाँ से मक्खियाँ मारने....बड़ा आया कहीं का तीस मार ख़ाँ। तीस मार ख़ाँ की ऐसी-की-तैसी...नहीं जानता कि मैं भूतों का सरदार हूँ। आओ, ऐ भेड़ियो! उसे खा जाओ। आओ, ऐ लोमड़ियो! उसे चबा जाओ। चुड़ैलों की हरामी नानी अशकलोनिया, तू कहाँ है। देख, मैं नाच रहा हूँ। मैं तेरा भतीजा हूँ...आ जा प्यारी...!’’ यह कह कर प्रोफ़ेसर ने वहीं पर नाचना शुरू कर दिया। फिर वह सीने पर हाथ मार कर कहने लगा। ‘‘मैं इस आग का पुजारी हूँ जो मिर्रीख़ में जल रही है। हज़ारों साल से मैं उसकी पूजा करता आ रहा हूँ। मैं पाँच हज़ार साल से इन्तज़ार कर रहा हूँ, लेकिन सितारा कभी न टूटेगा। मैंने तेरे लिए ख़रगोश पाले। मैं तुझे गिलहरियों के कबाब खिलाता हूँ...मैं तितलियों के परों से सिगरेट बना कर तुझे पिलाता हूँ। ऐ प्यारे शैतान! तू कहाँ है। मैं तुझे अपना कान काट कर खिला दूँगा...!’’

वह और न जाने क्या बड़बड़ाता, उछलता, कूदता हुआ पुरानी कोठी के बाग़ में ग़ायब हो गया।

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प्रोफ़ेसर की शरारत

मरीज़ के कमरे का दृश्य कुछ हद तक ऑपरेशन रूम में बदल चुका था। नर्स और डॉक्टर सफ़ेद कपड़ों में धीरे-धीरे, इधर-उधर आ-जा रहे थे। ऑपरेशन टेबल, जो सिविल हस्पताल से यहाँ लायी गयी थी, कमरे के बीच में पड़ी थी। मरीज़ को उस पर लिटाया जा चुका था। कमरे में बहुत ज़्यादा वॉट वाले बल्ब जला दिये गये थे। चिलमचियों में गर्म और ठण्डा पानी रखा हुआ था। उसी के क़रीब एक दूसरी मेज़ पर अजीबो-ग़रीब क़िस्म के ऑपरेशन के औज़ार और रबड़ के दस्ताने पड़े हुए थे।

डॉक्टर शौकत कुछ देर पहले हुए हादसे को बिलकुल भुला चुका था। अब उसका ध्यान सिर्फ़ ऑपरेशन की तरफ़ था। एक आदमी की ज़िन्दगी ख़तरे में थी। उसने सारी कोशिशें कर देखने का फ़ैसला कर लिया था। नौजवान डॉक्टर यह भी अच्छी तरह समझता था कि अगर उसे इस केस में कामयाबी मिल गयी तो उसकी शख़्सियत कहीं-की-कहीं जा पहुँचेगी। कामयाबी उसे तरक़्क़ी के ज़ीनों पर ले जायेगी...और नाकामी! लेकिन...नहीं... उसके ज़ेहन में नाकामी के ख़याल का नामोनिशान भी न था। वह एक क़ाबिल डॉक्टर की तरह इत्मीनान में नज़र आ रहा था। डॉक्टर तौसीफ़ भी कमरे में मौजूद था, लेकिन उसकी हैसियत एक तमाशाई जैसी थी। वह देख रहा था और हैरान था कि यह नौजवान लड़का किस तरह सुकून और इत्मीनान के साथ अपनी तैयारियों में जुटा है। ऐसे अवसर पर इतना इत्मीनान तो उसने अच्छे-अच्छे क़ाबिल डॉक्टरों के चेहरों पर भी नहीं देखा था। वह दिल-ही-दिल में उसकी तारीफें कर रहा था।

बाहर बरामदे में नवाब साहब की बहन और नजमा बैठी थीं। दोनों परेशान नज़र आ रही थीं। कुँवर सलीम टहल-टहल कर सिग्रेट पी रहा था।

‘‘मम्मी, क्या वह कामयाब हो जायेगा?’’ नजमा ने बेताबी से कहा। ‘‘मुझे यक़ीन है कि वह ज़रूर कामयाब हो जायेगा। लेकिन कितनी देर लगेगी...?’’

‘‘परेशान मत हो बेटी।’’ बेगम साहिबा बोलीं। ‘‘मेरा ख़याल है कि कई घण्टे लगेंगे। हो सकता है, सुबह हो जाये। इसलिए हम लोगों का यहाँ इस तरह बैठना ठीक नहीं। क्यों न हम ड्रॉइंग-रूम में चल कर बैठें। कॉफ़ी अब तक तैयार हो गयी होगी। सलीम, क्या आज तुम कॉफ़ी न पियोगे।’’

‘‘कॉफ़ी का किसे होश है फूफी साहिबा!’’ सलीम ने सिग्रेट को बरामदे में बिछे हुए कालीन पर गिरा कर पैर से रगड़ते हुए कहा। ‘‘नजमा से ज़्यादा मैं परेशान हूँ। मुझे हैरत है कि आप ऐसे वक़्त में भी कॉफ़ी नहीं भूलीं।

‘‘तुम सारे कालीनों का सत्यानास कर दोगे।’’ बेगम साहिबा ने नाक-भौं सिकोड़ कर कहा। ‘‘क्या सिग्रेट को दूसरी तरफ़ नहीं फेंक सकते!’’

‘‘जहन्नुम में गया कालीन...!’’ वह तेज़ लहजे में बोला। ‘‘मेरा दिमाग़ इस वक़्त ठीक नहीं है।’’

‘‘औरत न बनो।’’ बेगम साहिबा ने ताना मारते हुए कहा। ‘‘अभी कितनी देर की बात है कि तुम मेरे मना करने के बावजूद ऑपरेशन की हिमायत कर रहे थे। अपनी हालत को सँभालो। तुम्हें तो हम लोगों को दिलासा देना चाहिए।’’

‘‘मैं कोशिश करता हूँ कि ख़ुद को सँभाल लूँ, लेकिन यह मुमकिन नहीं। मुझे कर्नल तिवारी की बात याद आ रही है जिसने कहा था कि बचने की उम्मीद नहीं। आखिर यह बेवकूफ़ लड़का किस उम्मीद पर ऑपरेशन कर रहा है? मेरा मतलब यह है कि वह ख़तरे को जल्द-से-जल्द क़रीब लाने की कोशिश कर रहा है।’’

‘‘नहीं, कुँवर साहब...!’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने बीमार के कमरे से निकलते हुए कहा, ‘‘मुझे यक़ीन होता जा रहा है कि वह जल्द-से-जल्द नवाब साहब को ठीक कर देगा।’’

‘‘मैं आपका मतलब नहीं समझा।’’ सलीम उसकी तरफ़ घूम कर बोला, ‘‘क्या ऑपरेशन शुरू हो गया?’’

‘‘नहीं...अभी वे लोग तैयारी कर रहे हैं और मेरा वहाँ कोई काम भी नहीं। मैं इसलिए यहाँ चला आया।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘‘आप बहुत अच्छे हैं डॉक्टर...मम्मी तो काफ़ी सब्र वाली हैं, लेकिन शायद मुझे और सलीम को जल्द-से-जल्द डॉक्टरी मदद की ज़रूरत पेश आयेगी। मुझे यह सुन कर ख़ुशी हुई कि आप इस नौजवान डॉक्टर की कामयाबी पर इतना यक़ीन रखते हैं। वह कितना संजीदा और मुतमईन है।’’ नजमा बोली।

‘‘और साथ-ही-साथ काफ़ी ख़ूबसूरत भी।’’ सलीम ने मुँह बनाते हुए कहा।

‘‘तुम क्या बक रहे हो सलीम।’’ बेगम साहिबा तेज़ी से बोलीं और नजमा ने शर्मा कर सिर झुका लिया।

‘‘माफ़ कीजिएगा फूफी साहिबा, मैं बहुत परेशान हूँ।’’ सलीम यह कह कर टहलता हुआ बरामदे के दूसरे किनारे तक चला गया।

‘‘कुँवर साहब, मेरे ख़याल से बिजली का इन्तज़ाम बिलकुल ठीक होगा। शायद डायनैमो की देख-भाल आप ही करते हैं।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा।

‘‘जी हाँ...क्यों...डायनैमो बिलकुल ठीक चल रहा है, लेकिन यह पूछने का मतलब...!’’ सलीम ने डॉक्टर को घूरते हुए पूछा।

‘‘मतलब साफ़ है।’’ डॉक्टर तौसीफ़ ने कहा। ‘‘अगर डायनैमो फ़ेल हो गया तो अँधेरे में ऑपरेशन किस तरह होगा? एक बड़े ऑपरेशन के लिए काफ़ी एहतियात की ज़रूरत होती है।’’

‘‘वैसे तो डायनैमो फ़ेल होने का कोई चांस नहीं, लेकिन अगर फ़ेल ही हो गया तो मैं क्या कर सकूँगा। उफ़! यह एक ख़तरनाक ख़याल है। अगर वाक़ई ऐसा हुआ तो डॉक्टर शौकत बड़ी मुसीबत में पड़ जायेगा। ओह, नहीं-नहीं...मेरे ख़ुदा, ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता....!’’ कुँवर सलीम के चेहरे पर बेचैनी के भाव पैदा हो गये।

इतने में एक नौकर दाख़िल हुआ।

‘‘क्यों क्या है...!’’ सलीम ने उससे पूछा।

‘‘प्रोफ़ेसर साहब नीचे खड़े हैं। आपको बुला रहे हैं।’’ नौकर ने कहा।

‘‘प्रोफ़ेसर...मुझे...इस वक़्त।’’ सलीम ने हैरत से कहा।

‘‘जाओ भई...नीचे जाओ...!’’ बेगम साहिबा जल्दी से बोलीं। ‘‘कहीं वह पागल यहाँ न चला आये।’’

‘‘मुझे हैरत है कि वह इस वक़्त यहाँ किसलिए आया है।’’ सलीम ने नौकर से कहा। ‘‘क्या तुमने उसे ऑपरेशन के बारे में नहीं बताया...?’’

‘‘हुज़ूर, मैंने उन्हें हर तरह समझाया...लेकिन वे सुनते ही नहीं।’’

‘‘ख़ैर चलो, देखूँ, क्या बकता है।’’ सलीम ने कहा। ‘‘इस पागल से तो मैं तंग आ गया हूँ।’’

सलीम नीचे आया...प्रोफ़ेसर बाहर खड़ा था। उसने सर्दी से बचने के लिए सिर पर मफ़लर लपेट रखा था और चेस्टर का कॉलर उसके कानों के ऊपर तक चढ़ा था। इन सब बातों के बावजूद वह सर्दी की वजह से सिकुड़ा जा रहा था।

‘‘क्यों प्रोफ़ेसर, क्या बात है?’’ सलीम ने उसके क़रीब पहुँच कर पूछा।

‘‘एक चमकदार सितारा दक्षिण की तरफ़ निकला है।’’ प्रोफ़ेसर ने ख़ुशमिज़ाज लहजे में कहा। ‘‘अगर तुम अपनी मालूमात में बढ़ोत्तरी करना चाहते हो तो मेरे साथ चलो।’’

‘‘जहन्नुम में गयी मालूमात...!’’ सलीम ने झुँझला कर कहा। ‘‘क्या इतनी-सी बात के लिए तुम दौड़े आये हो?’’

‘‘बात तो कुछ दूसरी है। मैं तुम्हें बहुत ही हैरतनाक चीज़ दिखाना चाहता हूँ। ऐसी चीज़ तुमने कभी न देखी होगी।’’ उसने सलीम का हाथ पकड़ कर उसे पुरानी कोठी की तरफ़ ले जाते हुए कहा।
 
सलीम प्रोफ़ेसर के साथ चलने लगा, लेकिन उसने लोहे की उस मोटी-सी सलाख़ को न देखा जो प्रोफ़ेसर अपनी आस्तीन में छिपाये हुए था।

खट...! थोड़ी दूर चलने के बाद प्रोफ़ेसर ने वह सलाख़ सलीम के सिर पर दे मारी। सलीम बग़ैर आवाज़ निकाले चकरा कर धम से ज़मीन पर आ रहा। प्रोफ़ेसर हैरतंगेज़ फुर्ती के साथ झुका और उसने बेहोश सलीम को उठा कर अपने कन्धे पर डाल लिया, बिलकुल उसी तरह जैसे कोई हल्के-फुल्के बच्चे को उठा लेता है। वह तेज़ी से पुरानी कोठी की तरफ़ जा रहा था। यह सब इतनी जल्दी और ख़ामोशी से हुआ कि वह नौकर, जो हॉल में सलीम का इन्तज़ार कर रहा था, यही सोचता रह गया कि अब सलीम प्रोफ़ेसर को उसकी कोठी में धकेल कर वापस आ रहा होगा।

पुरानी कोठी में पहुँच कर प्रोफ़ेसर ने बेहोश सलीम को एक कुर्सी पर डाल दिया और झुक कर सिर के उस हिस्से को देखने लगा जो चोट लगने की वजह से फूल गया था। उसने बहुत ही इत्मीनान से इस तरह सिर हिलाया जैसे उसे यक़ीन हो गया हो कि वह अभी काफ़ी देर तक बेहोश रहेगा। फिर इस पागल बूढ़े ने सलीम को पीठ पर लाद कर मीनार पर चढ़ना शुरू किया। ऊपर के कमरे में अँधेरा था। उसने टटोल कर सलीम को एक बड़े सोफ़े पर डाला और मोमबत्ती जला कर ताक़ पर रख दी।

हल्की रोशनी में चेस्टर के कॉलर के साये की वजह से उसका चेहरा और ज़्यादा ख़ौफ़नाक मालूम होने लगा था। उसने सलीम को सोफ़े से बाँध दिया फिर वह दूरबीन के क़रीब वाली कुर्सी पर बैठ गया और दूरबीन के ज़रिये नवाब साहब के कमरे का जायज़ा लेने लगा। नवाब साहब के कमरे की खिड़कियाँ खुली हुई थीं। डॉक्टर और नर्सों ने अपने चेहरों पर सफ़ेद नक़ाब लगा रखे थे।

डॉक्टर शौकत खौलते हुए पानी से रबड़ के दस्ताने निकाल कर पहन रहा था। वे सब ऑपरेशन की मेज़ के पास खड़े थे। ऑपरेशन शुरू होने वाला था।

‘‘बहुत ख़ूब....!’’ प्रोफ़ेसर बड़बड़ाया। ‘‘मैं ठीक वक़्त पर पहुँच गया, लेकिन आखिर इस सर्दी के बावजूद उन्होंने खिड़कियाँ क्यों नहीं बन्द कीं?’’

नवाब साहब की कोठी के चारों तरफ़ अजीब तरह की ख़ामोशी छायी हुई थी। छोटे से ले कर बड़े तक को अच्छी तरह मालूम था कि बीमार के कमरे में क्या हो रहा है। बेगम साहिबा का सख़्त हुक्म था कि किसी क़िस्म का शोर न होने पाये। लोग इतनी ख़ामोशी से चल रहे थे जैसे ख़्वाब में चल रहे हों।

कोठी में नौकरानियाँ पंजों के बल चल रही थीं। घर के सारे कुत्ते बाग़ के आखिरी किनारे पर एक ख़ाली झोंपड़े में बन्द कर दिये गये थे, ताकि कोठी के क़रीब शोर न मचा सकें।

प्रोफ़ेसर दूरबीन पर झुका हुआ, चारों तरफ़ से बेख़बर, बीमार के कमरे का मंज़र देख रहा था। वह इतना ध्यानमग्न था कि उसने सलीम के जिस्म की हरकत को भी महसूस नहीं किया। सलीम धीरे-धीरे होश में आ रहा था। एक अजीब क़िस्म की सनसनाहट उसके जिस्म में फैली हुई थी। उसने अपने बाज़ुओं पर रस्सी के तनाव को भी नहीं महसूस किया। दो-तीन बार सिर झटकने के बाद उसने आँखें खोल दीं। उसे चारों तरफ़ अँधेरा-ही-अँधेरा फैला नज़र आ रहा था। फिर दूर एक टिमटिमाता हुआ तारा दिखायी दिया। तारे के चारों तरफ़ हल्कीहल्की रोशनी थी। धीरे-धीरे रोशनी फैलती गयी। मोमबत्ती की लौ थर्रा रही थी। प्रोफ़ेसर दूरबीन पर झुका हुआ था। उसने उठने की कोशिश की। मगर यह क्या...वह बँधा क्यों है? फिर उसे कुछ देर पहले का क़िस्सा उसे याद आ गया।

‘‘प्रोफ़ेसर, आखिर यह क्या हरकत है?’’ उसने भर्रायी हुई आवाज़ में क़हक़हा लगा कर कहा। ‘‘आखिर इस मज़ाक़ की क्या ज़रूरत थी?’’

‘‘अच्छा, तुम जाग गये?’’ प्रोफ़ेसर ने सिर उठा कर कहा। ‘‘घबराने की कोई बात नहीं। तुम इस वक़्त उतने ही बेबस हो जितने कि मेरे दूसरे शिकार...तुम्हें यह सुन कर ख़ुशी होगी कि मैं अब गिलहरियों, ख़रगोशों और मेंढकों के साथ-साथ आदमियों का भी शिकार करने लगा हूँ। क्यों, है न दिलचस्प ख़बर...!’’

पहले तो सलीम समझ न सका। लेकिन दूसरे पल में उसे महसूस हुआ जैसे उसके जिस्म का सारा ख़ून जम गया हो। वह काँप गया...वह अच्छी तरह जानता था कि बूढ़े ने अपने दूसरे शिकारों का हवाला क्यों दिया है...तो...क्या...तो... क्या...अब वह अपनी ख़ूनी प्यास बुझाने के लिए जानवरों के बजाय आदमियों का शिकार करने लगा है?

अरे.....!

सलीम ने घबराहट के बावजूद लापरवाही का अन्दाज़ पैदा करके क़हक़हा लगाने की कोशिश की।

‘‘बहुत अच्छे, प्रोफ़ेसर...लेकिन मज़ाक़ का वक़्त और मौक़ा होता है। चलो...शाबाश, ये रस्सियाँ खोल दो। मैं वादा करता हूँ....!’’

‘‘सब्र...सब्र...मेरे अच्छे लड़के।’’ उसने उसकी तरफ़ झुक कर मुस्कुराते हुए कहा। ‘‘अब मेरी बारी आयी है, हा-हा-हा।’’

‘‘तुम्हारी बारी...क्या मतलब.....!’’ सलीम ने चौंक कर कहा।

‘‘क्या तुम नहीं जानते।’’ प्रोफ़ेसर ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘कहो-कहो, मैं कुछ समझ नहीं सका।’’ सलीम ने बेपरवाही से कहा।

‘‘मेरा इरादा यह था कि नौजवान डॉक्टर अपने मक़सद में कामयाब हो जाये।’’ प्रोफ़ेसर ने कहा। ‘‘और यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम दोबारा आज़ाद कर दिये गये तो ऐसा न हो सकेगा। इसी का मुझे ख़ौफ़ है...बहरहाल, मैं यह चाहता हूँ कि वह इत्मीनान के साथ नवाब साहब की जान बचा सके। इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ लाया हूँ। मेरे भोले सलीम, क्या समझे? मैं...कम चालाक नहीं...!’’

‘‘बहुत चालाक हो, क्या कहने...!’’ सलीम ने हँस कर कहा।

‘‘तुम यहाँ बिलकुल बेबस हो। यहाँ मैं तुम्हारी पिटाई भी करूँगा और बीमार के कमरे का मंज़र भी देख सकूँगा।’’ प्रोफ़ेसर ने दूरबीन के शीशे में आँख लगाते हुए कहा। ‘‘न तो मैं बेवकूफ़ हूँ और न मेरी दूरबीन...महज़ मज़ाक़ है...क्या समझे।’’
 
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