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Erotica मुझे लगी लगन लंड की

मैं वहां जाकर इस तरह खड़ी हो गई कि सूरज को यह न लगे कि मैंने उस छेद को देख लिया है। कुछ देर ऐसे ही खड़ी रही, फिर हल्के से दूसरी तरफ देखा तो सूरज टहल रहा था। इसका मतलब यह था कि वो मुझे नंगी देखने के लिये बड़ा उत्सुक है, लेकिन अभी तक मैंने कपड़े पहने हुए थे और इसी को लेकर वो बैचेन था। मैं उस छेद से थोड़ा दूर होते हुए इस तरह से खड़ी हुई कि मेरी गर्दन के नीचे से सूरज को अच्छी तरह से मेरे पूरे जिस्म का दर्शन हो जाये। उसके बाद मैंने अपनी नाईटी उतार दी और अपने चूचियों को और चूत को अच्छे से सहलाने लगी ताकि सूरज को और मजा मिले। थोड़ी देर तक तो मैं सूरज को अपने गांड, चूत और चूची का नजारा धीरे धीरे नहा कर देती रही कि तभी मुझे कुछ तेज आवाज सुनाई दी तो उसी छेद से झांककर देखा तो सूरज ही कम्बोड पर बैठा हुआ था, उसकी आंखें बन्द थी और वो बड़बड़ाते हुए मुठ मार रहा था। मैं नहा कर निकली और कपड़े बदलने चली गई। नीचे उतर कर देखा तो अब सूरज नहाने जा रहा था। अब मेरी भी लालसा उसके लंड को देखने की हो रही थी। मैं बाहर से देख नहीं सकती थी और नहा चुकी थी लेकिन देखना तो था ही, जैसे ही सूरज गुसलखाने में घुसा, वैसे ही मैंने नमिता को अपना पेट खराब होने की जानकारी देकर मैं लैट्रिन में घुस गई। सूरज को उम्मीद नहीं रही होगी कि उसे भी कोई नंगा देखने की तमन्ना रखता है।

अन्दर घुस कर मैं उसी छेद से बाथरूम के अन्दर झांक रही थी। सूरज अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा शॉवर के नीचे खड़ा था और पानी के बौछार का आनन्द ले रहा था। क्या जिस्म था उसका... पूरा मर्द लगता था। उसकी गांड की उभार भी क्या टाईट थे। लेकिन मेरा पूरा ध्यान तो उसके लंड पर था और जो मैं देखना चाह रही थी। वो जब घूमा तो उसका लंड बिल्कुल तना हुआ था और बार बार ऊपर नीचे हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि कोई रह रह कर नाग फुंफकार रहा हो। सूरज भी नहा धोकर बाहर निकला और उधर मैं भी।

मैं ऑफिस के लिये तैयार होने जा ही रही थी कि

नमिता मुझे टोकते हुये बोली- जब तबियत ठीक नहीं है तो ऑफिस मत जाओ।

फिर सूरज की तरफ देखते हुए बोली- सूरज, भाभी की तबियत ठीक नहीं है, तुम आज कॉलेज मत जाओ और जाकर किसी डॉक्टर के यहां दिखा दो।

सूरज को तो जैसे मन की मुराद मिल गई हो,

वो तपाक से बोला- जी दीदी, जरूर! मैं भाभी को डॉक्टर के यहां चेकअप करा दूंगा।

सूरज का लंड देखने के बाद तो मेरा भी ऑफिस जाने का मन नहीं कर रहा था तो मैंने भी नमिता से बोल दिया कि मैं ऑफिस फोन करके बता देती हूँ कि आज मैं नहीं आ पाऊँगी।

लेकिन मेरे दिमाग में यह घूम रहा था कि सूरज के लंड का मजा कहाँ लूँ। घर पर नहीं ले सकती थी और बाहर होटल वो भी नहीं जंच रहा था कि मेरे दिमाग बॉस के घर पर घूमा, उसका घर पूरा खाली था और कोई भी खतरा होने के डर भी नहीं था। यह ख्याल दिमाग में आते ही मैंने अपने बॉस को फोन किया ऑफिस न आने का कारण बता दिया। बॉस ने खुशी खुशी छुट्टी मंजूर कर ली। जब छुट्टी मंजूर हो गई तो,

मैंने अपने बॉस से कहा- बॉस, मुझे आपका एक फेवर चाहिये?

बॉस - 'हाँ हाँ... बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ?'

मैं - 'आज मेरे हबी बाहर से वापस आ रहे है और मैं उन्हें ऐन्टरटेन करना चाह रही हूँ। दिन में मैं उन्हें घर पर ऐन्टरटेन नहीं कर सकती तो मुझे आपके घर की चाबी चाहिये। जहाँ केवल मैं और मेरे हबी हों।'

वो तुरन्त ही बोले- मुझे कोई ऐतराज नहीं है, मैं ऑफिस में हूँ, जब चाहो आकर चाबी ले जाना।

मेरे लिये सब कुछ आसान हो गया था, अब सूरज के लिये मुझे तैयार होना था। करीब दस बजे के करीब मैं थोड़े अच्छे से तैयार हुई,

तभी सूरज मेरे कमरे में आया और बोला- भाभी, मैं तैयार हूँ।

फिर मुझे देखते हुए बोला- वाव भाभी, आप कितनी अच्छी लग रही हो।

लेकिन मैंने उसकी बातों को अनसुना कर दिया और अपने रूम से बाहर आ गई। इतनी देर में सूरज ने अपनी बाईक स्टार्ट कर ली थी, मैं अन्दर सब को बता कर सूरज के साथ बाईक पर बैठ गई। मेरे अन्दर एक अलग सी आग भड़क रही थी और चाह रही थी कि जितनी जल्दी हो सूरज मेरी बाँहों में हो। रितेश के बाद सूरज ऐसा पहला मर्द था, जिसकी बांहो में मैं खुद आना चाह रही थी। बाईक अपनी गति से चली जा रही थी और मैं सूरज से सट कर बैठी थी और उसके कमर को अपनी बांहो से जकड़े हुए थी। पता नहीं उसे कैसा लग रहा होगा। अभी हम घर से थोड़ी दूर ही चले थे कि मैंने सूरज से मेरे ऑफिस चलने के लिये बोला तो वह बिना कुछ बोले दस मिनट बाद मुझे मेरे ऑफिस ले आया

और बोला- भाभी, आपका ऑफिस!

जैसे मैं नींद से जागी और जल्दी से बाईक उतर कर अपने ऑफिस के अन्दर घुस गई और सीधे बॉस के केबिन में। मुझे देखते ही बॉस ने अपनी आदतानुसार मुझे बांहों में जकड़ लिया और एक चुम्मा मेरे होंठों पर चस्पा कर दिया। मैंने बॉस से चाबी ली और चलने लगी तो बॉस ने मुझसे बोले कि मेरे हबी से वो मिलना चाहते हैं।

मैंने उन्हें उन्ही के केबिन से नीचे मोटरसाईकिल पर बैठे सूरज को दिखा दिया। उसके बाद मैं तेजी से चलते हुए नीचे आ गई और मोटर-साईकिल पर बैठ गई, सूरज ने बाईक आगे बढ़ा दी।

उसके बाद फिर मैंने सूरज को मेरी बताई हुई जगह पर चलने के लिये कहा,

तो सूरज बोल उठा- भाभी, हमें तो डॉक्टर के यहाँ चलना है।
 
मैं - 'हाँ चलती हूँ, बस एक छोटा सा काम है, निपटा लूँ, फिर डॉक्टर के यहाँ चलते हैं। उसके बाद सीधे घर चलकर मैं आराम करूंगी।'

फिर बिना कुछ बोले सूरज ने गाड़ी आगे बढ़ा दी और उसके बाद बॉस के फ्लैट पर पहुँचने से पहले मेरे और सूरज के बीच कोई बात नहीं हुई। फ्लैट पर पहुंचने के बाद मैंने सूरज को गाड़ी पार्क करने के लिये बोला तो उसने वहीं रहकर इंतजार करने के लिये बोला।

मैं सूरज के हाथ को अपने हाथ में लेते हुये बोली- भाभी की बात मानने में बहुत मजा आता है और जो नहीं मानता है तो फिर पछताने के सिवा कुछ नहीं मिलता है।

फिर बिना कुछ बोले सूरज ने गाड़ी को पार्क किया और मेरे साथ फ्लैट के अन्दर आ गया।

कमरे के अन्दर पहुँचने पर सूरज आश्चर्य से इधर उधर देखने लगा।

उसको देख कर मैंने पूछा - क्या देख रहे हो तो सूरज बोला - भाभी आपने तो कहा था कि आप यहां काम से आई हो लेकिन इस फ्लैट में कोई नहीं रहता है और फिर आप बाहर से लॉक खोल कर आई हो। मैं समझा नहीं?

मैं - 'मैं यहां अपना इलाज करवाने आई हूँ।'

सूरज - 'यहाँ कौन है जो आपका इलाज करेगा?'

मैं - 'तुम...' छूटते ही मैं बोली।

सूरज की आंख आश्चर्य से और चौड़ी हो गई, हकलाते हुए बोला- मैं आपका इलाज कैसे कर सकता हूँ?

मैं - 'अरे वाह, सुबह तो तुम कह रहे थे कि भाभी आप बहुत अच्छी लग रही हो और अब नादान बन रहे हो।' कहते हुए मैं उसके और समीप आ गई थी और उसके शर्ट के ऊपर ही उंगली चलाते हुए,

बोली- क्यों सूरज, तुम्हें अपनी भाभी को नंगी देखना कैसा लगता है?

सूरज - 'मैं समझा नहीं भाभी?'

मैं - 'देखो बनो मत... तुम्हारे दिल की ही तमन्ना है न कि भाभी को तुम नंगी देखो। तो आज इलाज के बहाने तुम मुझे नंगी देख सकते हो। घर मे यह मौका तो तुम्हे कभी भी नहीं मिलता इसलिये मैं तुम्हे यहां लाई हूँ।' उसके हाथ को पकड़कर मैंने अपनी चूचियों पर रख दिया, तुम अपनी इच्छा पूरी कर लो!

सूरज - 'भाभी...' वो कुछ बोल नहीं पा रहा था।

मैं अब पूरी बेशर्मी पर उतर आई थी, मेरा हाथ उसके तने हुए नागराज पर फिसल रहा था जो बाहर आने को बहुत बैचेन था।

सूरज - 'भाभी...' बस इतना ही बोल पाया था, उसका संकोच उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा था।

मैं - 'देखो, मेरे नाम की मुठ मारने से भाभी की चूत नहीं मिलेगी। या फिर ये हो सकता है कि तुम्हारा लंड केवल मुठ मारने के लिये है न कि चूत चोदने के लिये।'

मेरी इस बात को सुनते ही उसने मुझे तुरन्त अपनी बांहों में भर लिया और अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख दिया और थोड़ी देर मेरे होंठ को चूसने के बाद,

सूरज बोला- भाभी, अपने देवर का आज कमाल देखना। कैसे वो आपको खुश करता है।

कहते हुए उसने मुझे पलट दिया और मेरी चूचियों को टॉप के ऊपर से ही दबाने लगा। कभी वो मेरी चूची दबाता तो कभी मेरी चूत से छेड़खानी करता और मैं आंखें बन्द किये हुये ये सब करवाती रही। थोड़ी देर बाद उसने मेरे टॉप को मेरे जिस्म से अलग कर दिया और मेरी नंगी चूची को बिना ब्रा के देख कर,

सूरज बोला- वाआओ... भाभी आप तो पूरी तैयारी से आई हो? अन्दर ब्रा भी नहीं पहनी हो।

मैं - 'मैं ब्रा और पैन्टी नहीं पहनती हूँ।'

सूरज - 'क्या कह रही हो?'

मैं - 'हाँ, तेरे भाई को मेरा ब्रा और पैन्टी पहनना अच्छा नहीं लगता है।'

फिर उसने मेरी जींस भी उतार दी, मैं बिल्कुल नंगी खड़ी थी। मेरी गर्दन को चूमते हुए,

सूरज बोला- भाभी, आज मेरा सपना सच हो रहा है। मैं अपनी सेक्सी भाभी को अपनी आँखों के सामने नंगी देख रहा हूँ।

कहकर वो मेरी पीठ को चूमते-चूमते मेरे गांड के पास पहुँच गया और मेरे पुट्ठे को चूची समझ कर तेज-तेज दबाने लगा।फिर उसने मेरे पुट्ठे को कस कर फैला दिया और दरार में उंगली चलाने लगा और बीच-बीच में मेरी गांड के छेद में उंगली डाल देता। मुझे उसकी इस हरकत पर बहुत मजा आ रहा था।

सहसा वो उठा और बोला- भाभी, आज मैं आपको जी भर कर देखना चाहता हूँ।

कहकर वो मेरे एक एक अंग को छूकर देख रहा था और साथ ही साथ मेरे फिगर की तारीफ एक अनुभवी खिलाड़ी की तरह किये जा रहा था।

सूरज बोला- भाभी, आज तक मैंने इतना परफेक्ट और सेक्सी फिगर नहीं देखा।

मैंने पूछा- कितनी लड़कियां अब तक?

सूरज - 'बहुत को चोदा है भाभी, लेकिन तुम्हारी जैसी बिन्दास और सेक्सी नहीं देखा। तुम तो पूरी की पूरी काम देवी लग रही हो।'

कहकर उसने मुझे गोदी में उठाया और पास पड़े बेड पर बड़ी सावधानी से लिटा दिया और फिर अपनी उंगलियाँ मेरी चूचियों की गोलाइयों में चलाने लगा और बीच बीच में मेरे निप्पल को दबा देता। उसके बाद वो मुझे चूमने लगा और फिर मेरी नाभि में अपनी जीभ को घुमाने लगा। सूरज जितने प्यार से मेरे जिस्म से खेल रहा था कि उसे किसी बात की कोई जल्दी नहीं है।

उसके इस तरह से मेरे जिस्म से खेलने के कारण मैं पानी छोड़ चुकी थी कि तभी उसकी उंगली ने मेरे चूत प्रदेश की यात्रा शुरू कर दी। और जैसे ही उसकी उंगली मेरे चूत के अन्दर गई तो उसकी उंगली गीली हो गई। उसने उंगली को बाहर निकाला और अपने मुंह में ले जाकर अपनी उंगली इस तरह से चूस रहा था कि जैसे वो कोई लॉलीपॉप चूस रहा हो।

उसके बाद वो बोला- भाभी, तेरी गीली चूत को प्यार करने में बड़ा मजा आयेगा।

कहकर उसने मेरी दोनों टांगों को जो अब तक एक दूसरी से चिपकी हुई थी, अलग कर दिया और अपनी जीभ से हौले-हौले चाटने लगा।

अभी तक उसने अपने एक भी कपड़ा नहीं उतारा था और न ही अपने लंड को मसल रहा था। सूरज अपनी जीभ के साथ-साथ अपने दोनों हाथों का प्रयोग भी कर रहा था, कभी वो मेरी क्लिट से छेड़खानी करता तो कभी कण्ट से... तो कभी अपनी उंगली मेरी चूत के अन्दर डालकर अन्दर खरोंच करता जैसे कोई छोटी शीशी के तले से चाशनी निकाल रहा हो।

मेरे मुंह से 'उफ ओह उफ ओह...' के अलावा कुछ नहीं निकल रहा था।

उसकी इस प्यारी हरकत के कारण मेरे मुंह से कुछ नहीं निकल पा रहा था।

बड़ी मुश्किल से मैं बस इतना ही बोल पाई- सूरज, भाभी को पूरी नंगी देख लिया और खुद इतना शर्मा रहे हो कि भाभी के सामने नंगे भी नहीं हो पा रहे हो।

सूरज - 'सॉरी भाभी, मैं आपके नंगे जिस्म में इतना खो गया था कि मुझे याद नहीं कि मैंने अभी तक अपने कपड़े नहीं उतारे।'

फिर वो तुरन्त ही खड़ा हुआ और अपने पूरे कपड़े उतार दिये। क्या लंबा लंड था उसका... बिल्कुल टाईट। वो लंड नहीं ऐसा लग रहा था कि कोई ड्रिलिंग मशीन हो। मैं तुरन्त खड़ी हो गई और

उसके लंड को हाथ में लेकर बोली- जब तुम्हारे पास इतना बढ़िया औजार था तो अभी तक मुझसे इसको छिपाया क्यों?
 
कह कर मैंने अपनी जीभ उसके सुपारे के अग्र भाग में लगा दी। उसके लंड से भी रस की एक दो बूंद टपक रही थी जो अब मेरे जीभ का स्वाद बढ़ा रही थी। मैं भी अब उसके लंड को अपने मुंह में रखकर चूसने लगी। बड़ा ही कड़क लंड था उसका... अब सूरज ज्यादा उत्तेजित हो रहा था। उसने मेरा सिर कस कर पकड़ा और मेरे मुंह को ही चोदने लगा। उसका लंड बार बार मेरे गले के अन्दर तक धंस रहा था, जिसकी वजह से बीच-बीच में मुझे ऐसा लगता था कि लंड अगर मेरे मुंह से नहीं निकला तो मैं मर जाऊँगी। थोड़ी देर तक मेरे मुंह को चोदने के बाद सूरज ने एक बार फिर मुझे गोद में उठाया और पास पड़ी हुई डायनिंग टेबिल पर लेटा दिया। उसके बाद सूरज ने मेरे दोनों पैरों को हवा में फैलाते हुए उसे एक दूसरे से दूर करते हुए अपने लंड को मेरी चूत के मुहाने में सेट किया और एक तेज झटका दिया। गप्प से उसका लंड मेरी चूत के अन्दर जाकर फिट हो गया। सूरज हवा में ही मेरे दोनों टांगो को पकड़े हुए ही अब मुझे चोदे जा रहा था और मैं इस समय एक ब्लू फिल्म की हिरोइन की तरह चुद रही थी। इस पोजिशन में चोदने के बाद उसने मुझे अपनी गोद में उठा कर ही मुझे चोदने लगा।

मैं डिस्चार्ज हो चुकी थी, लेकिन वो मुझे चोदे ही जा रहा था। एक बार फिर सूरज ने मुझे डायनिंग टेबिल पर लेटा दिया और

बोलने लगा- भाभी, मेरा निकलने वाला है, जल्दी बोलो कहाँ निकालूँ?

मैं तुरन्त बोली- मेरे मुंह में!

मेरे इतना कहने पर सूरज मुझसे अलग हो गया और मैं उठ गई और सूरज के लंड को अपने मुंह में लेकर उसके निकलते हुए रस को पीने लगी।

सूरज - 'आ... ओ... आ...' करके अपने लंड को हिलाये जा रहा था।

उसने भी अपना लंड मेरे मुंह से तब तक नहीं निकाला जब तक कि उसके रस का एक एक बूंद मेरे गले से नहीं उतर गई। उसके बाद सूरज ने मेरी बगल में हाथ लगा कर मुझे उठाया और डायनिंग टेबल पर बैठा दिया और फिर मेरी टांगों को फैलाते हुए उसने अपने मुंह को मेरी चूत के मुहाने में रख दिया और मेरे अन्दर से निकलते हुए रस को चाटने लगा। उसके बाद मैं और सूरज दोनों ही एक दूसरे के होंठों के एक बार फिर चूमने लग थे।

बॉस के घर के बॉलकनी में एक आराम चेयर रखी हुई थी सूरज उसे लेकर अन्दर आ गया और उसमे बैठकर अपनी दोनों टांगों को फैला कर मुझे अपने ऊपर बैठा लिया। हम दोनों के एक-एक अंग चिपके हुए थे, उसके दोनों हाथ मेरे पेट को कसे हुए थे और उसके होंठ मेरे गर्दन को पुचकार रहे थे। थोड़ी देर हम दोनों ऐसे ही शांत पड़े रहे,

फिर सूरज ही बोला- भाभी, कई लड़कियों के चूत को मेरे इस लंड ने चोदा है पर जितना मजा आज आया है, वो मजा मुझे पहले कभी नहीं मिला है।

मैं - 'अच्छा तो मेरे देवर को लड़कियाँ अपनी चूत देने के लिये तैयार रहती हैं।' कहकर मैं हँसने लगी और सूरज ने मेरी निप्पल को कस कर मसल दिया।

मेरे मुंह से केवल 'उईईई ईईईई...' ही निकल पाया और अब सूरज हंस रहा था।

अब तक आपने पढ़ा की कैसे सूरज ने मुझे बॉस के घर पर चोदा...

अब आगे. . .

बॉस के फ़्लैट में अपने देवर से चूत चुदवाने के बाद

मैंने उससे कहा- देवर जी, अपनी पहली चुदाई की कहानी सुनाओ।

सूरज बोला- मेरी पहली चुदाई कोई खास नहीं थी लेकिन उसको भूल भी नहीं सकता। आप सुनो भाभी!

सूरज के शब्दों मे. .

जब मैं एडमिशन के बाद पहले दिन कॉलेज गया तो क्लास की सभी सीटें भरी हुई थी। मेरे साथ रागिनी नाम की एक लड़की थी जो देखने में ठीक ठाक ही थी, वो बहुत ज्यादा हाई-फाई नहीं दिख रही थी। हम दोनों को ही क्लास में बैठने की जगह नहीं मिल रही थी कि तभी प्रोफेसर आ गये और जब उन्होंने हमें इस तरह देखा तो चपरासी से कह कर एक बेंच सबसे पीछे लगा दी। बेंच की लम्बाई बहुत ज्यादा नहीं थी, हम दोनों ही उस बेंच पर बैठ गये लेकिन मेरा मन अपनी स्टडी में नहीं लग रहा था, कारण मेरा जिस्म और रागिनी का जिस्म एक दूसरे से सट रहा था। शायद उसका भी मन नहीं लग रहा था क्योंकि बार-बार वो मेरी तरफ बड़े ही नर्वस होकर देख रही थी। नर्वस तो मैं भी था लेकिन मैंने अपनी नर्वसनेस को शो नहीं किया। किसी तरह मेरा पहला दिन बीता।

दूसरे दिन मैं कॉलेज जल्दी इस उम्मीद से पहुँच गया कि मैं अपनी कोई दूसरी जगह को अरेंज कर लूंगा लेकिन दूसरे लड़के लड़कियों ने न तो मुझे और न ही रागिनी को किसी दूसरी सीट पर नहीं बैठने दिया। क्लास में जितने भी प्रोफसर आये, सभी से हम दोनों ने रिक्वेस्ट की पर हम दोनों के मजाक उड़ने के सिवा कुछ नहीं हुआ, विवश होकर हम दोनों को फिर उसी सीट पर बैठना ही पड़ा। अब धीरे-धीरे हम दोनों के लिये वही सीट फिक्स हो गई। क्लास के शेष लड़के और लड़कियाँ हम दोनों का मजाक उड़ाते और भद्दे कमेन्टस पास करते।

मैं बीच में ही बोल पड़ी- कमेन्टस, कैसे कमेन्टस?

सूरज - 'यही कि अबे लड़की मिली है तो पटा कर मजा ले!'

खैर अब हम दोनों ही झिझक छोड़ कर पढ़ाई पर ध्यान देने लगे और अच्छे दोस्त हो गये। हम लोग एक दूसरे से हंसी मजाक भी करने लगे। मजाक करते-करते या बात करते-करते कभी मेरा हाथ उसकी जांघ पर चला जाता तो कभी उसका हाथ मेरी जांघ पर होता। रागिनी भी मुझे कभी चूतिया तो कभी गांडू कहकर बुलाने लगी। एक दिन वो मुझे किसी बात पर पता नहीं क्या हुआ था, शायद रागिनी मुझसे कई दिन से नोटस मांग रही थी, लेकिन मैं उसे वो नोटस नहीं दे पा रहा था कि एक दिन

रागिनी मुझे बोली- अबे साले गांडू, कभी तो कोई काम कर लिया कर, इतने दिन से मैं तुझसे नोटस मांग रही हूँ और तू गांडू कि दे नहीं रहा है।

इस बार मैं बोल उठा- बोल ले तू साली मुझे जितना गांडू... पर एक दिन तेरी गांड मैं ही मारूँगा।

मेरी इस बात को सुनकर उसने थोड़ा सा मुंह बनाया और चली गई।

कहानी बताते बताते सूरज मेरे जिस्म को सहलाता जा रहा था। खास तौर पर उसके दोनों हाथ मेरे चूचियों को ऐसे दबा रहे थे मानो ये आम हों और इनमें से रस निकल रहा हो! और तो और सूरज के नाखून मेरे निप्पल को मसल रहे थे।

मैंने फिर पूछा- फिर क्या हुआ?

तो सूरज बोला- भाभी, दो-तीन दिन तक रागिनी कॉलेज नहीं आई तो मुझे भी लगा कि कही वो मेरी बात का बुरा नहीं मान गई।

पर चौथे दिन जब वो कॉलेज आई तो पहले की अपेक्षा वो काफी सेक्सी लग रही थी। हालाँकि कपड़े उसने वही सलवार सूट पहना हुआ था पर कायदे से मेकअप करके आई थी। सीट पर आकर मेरे पास खड़ी हो गई और

थोड़ा झुकती हुई बोली- और गांडू, क्या हाल है?

मैं बीच में बोली- रागिनी ने तुम्हारा निक नेम गांडू तो नहीं रख दिया था?

सूरज - 'भाभी आप भी?'

मैं - 'अच्छा ठीक है, अब आगे बताओ?'

सूरज - 'हाँ तो मैंने उसके इस बात का रिसपॉन्स नहीं दिया तो वो थोड़ा और पास आई और बोली- है न तू गांडू का गांडू... उस दिन गांड मारने की बोल रहा था और आज मुझसे बात भी नहीं कर रहा है।

सूरज - मैंने उसकी गांड में उंगली कर दी तो आउच करके पीछे हट गई और फिर बगल में मेरे पास बैठ गई।

थोड़ी देर तक तो हम दोनों की बात नहीं हुई, फिर हार कर मैंने ही पूछा तो

रागिनी बोली- यार, वास्तव में उस दिन मैं बुरा मान गई थी, इसलिये मैं घर चली गई। इसी दौरान मुझे मेरी एक दूर की रिश्तेदार की शादी में जाना पड़ा। काफी भीड़ थी। चूंकि मैं पहली बार अपनी उस बहन के पास गई थी तो वो हर वक्त मुझे अपने साथ ही रखती थी। यहां तक कि रात में मैं उसके साथ उसके कमरे में सोती थी। परसो आधी रात को अचानक कुछ फुसफुसाहट से मेरी नींद खुली तो मेरी वो बहन फोन पर बातें कर रही थी और बोल रही थी 'मत परेशान हो मेरे राजा, शादी के बाद तेरे ही पास आ रही हूँ, तेरे लौड़े की जम के सेवा करूँगी। अभी अपने लंड को शान्त रख।' इसी तरह गन्दे शब्दों का वो बोल रही थी कि बीच में वो बोल पड़ी 'अबे गांडू, मार लेना मेरी गांड... अब फोन रखो। मुझे नींद आ रही है।' फिर दोनों की बाते खतम हो गई और वो मेरे ऊपर अपनी टांग चढ़ा कर सो गई लेकिन उसकी बात 'अबे गांडू, मार लेना मेरी गांड' ही मेरे कानों में सुनाई पड़ रही थी। मुझे लगा कि जब ये इस तरह खुल के बात कर सकती है तो मैं तो तुमको अक्सर कहती रहती हूँ।

मैं जोर से हँसा।उसके साथ साथ सभी मुझे देखने लगे।

मैंने धीरे से रागिनी से कहा- लगता है कि तुम्हारे पूरे घर में गांडू बोलने की आदत है?

पता नहीं मुझे क्या हो गया था कि मैं उसे छेड़ना चाह रहा था इसलिये मैंने उसकी जांघों को सहलाना शुरू कर दिया। एक-दो मिनट उसको अहसास नहीं हुआ।

फिर मैं और सूरज दोनों बिस्तर पर पहुँच गये।

सूरज बिस्तर पर लेट गया

और बोला- भाभी, मेरे लंड को अपनी चूत के अन्दर लेकर मेरे ऊपर लेट जाओ।

मैंने उसके कहे अनुसार उसके लंड को अपनी चूत के अन्दर कर लिया और उसके ऊपर लेट गई। सूरज एक बार फिर मेरी पीठ सहलाते सहलाते अपनी आगे की कहानी बताने लगा:

रागिनी होंठों को चबाये जा रही थी और अपने दोनों पैरों को जितना सिकोड़ सकती थी, सिकोड़ने की कोशिश कर रही थी। उस दिन पहली बार मुझे पीछे की सीट पर बैठने का फायदा मिला, कुछ देर मैं उसकी जांघ को सहलाता रहा, फिर धीरे से उसकी चूत के ऊपर हाथ ले जाने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया,

और बोली- सूरज, यह तुमने क्या किया?

सूरज - 'क्या हुआ?'

वो बोली- पता नहीं मेरे अन्दर से क्या निकल रहा है कि मेरी पैन्टी गीली हो गई है।

सूरज -'भाभी, आप तो जानती हो कि लड़कों की आदत शुरू से ही खराब होती है, मैंने उसके हाथ को पकड़ा और जल्दी से उसकी चूत के ऊपर अपनी उंगली लगा दी। वास्तव में उसकी सलवार भी गीली थी।' मैंने अपनी उंगली का दवाब उसकी चूत पर और दिया इससे उसका पानी मेरी उंगली पर आ गया और उसके रस से गीली हुई मेरी उंगली को मैंने अपनी जीभ से लगा लिया।

रागिनी ने जब मुझे ऐसा करते हुए देखा तो,

रागिनी बोली- छीः छीः, यह क्या कर रहे हो? यह गन्दा है। मैंने उसकी तरफ देखा,

और बोला- मुझे तो इसका स्वाद बड़ा ही अच्छा लग रहा है।

फिर उससे बोला- देखो, मेरी वजह से तुम्हारी पैन्टी गीली हुई है। तो ऐसा करो कि अपनी पैन्टी मुझे दे दो तो मैं उसे कल धोकर ला दूंगा।

रागिनी - 'नहीं दूंगी, मैं खुद धो लूंगी।'

मैं उससे मजे लेने के लिये बोला- अगर नहीं दोगी तो मैं खड़ा होकर चिल्ला दूंगा कि रागिनी ने पेशाब कर दिया है। अब देख लो?

उसने मुझे एक तेज चुटकी काटी और, रागिनी बोली- ठीक है, थोड़ी देर बाद।

लेकिन तो मुझे तुरन्त ही चाहिये थी ताकि मैं उसके रस को सूंघ सकूँ और मजा ले सकूँ।

फिर मैं रागिनी को धौंस देते हुए बोला कि मुझे अभी तुरन्त ही चाहिये।
 
रागिनी दाँत पीसते हुये वो अपना बैग लेकर गई और थोड़ी देर बाद वापस आई और बैग से अपनी पैन्टी निकाल कर मुझे देती हुई रागिनी बोली- लो।

मैंने उसकी पैन्टी ली और जहां पर उसका रस लगा था उसको अपने नाक के पास ले गया, सूंघने लगा।

वो मेरा हाथ दबाते हुए धीरे से बोली- सूरज, यह क्या कर रहे हो।

मैंने कहा- मैं अपनी दोस्त के रस की महक ले रहा हूँ।

कहकर उस हिस्से को मैंने अपने मुंह के अन्दर भर लिया।

मैं बोली- यार सूरज तुम तो शुरू से ही बहुत ही चोदू किस्म के इंसान थे।

सूरज - 'हाँ भाभी, लेकिन तुम्हारे जैसी चुददक्ड़ नहीं देखी। क्योंकि तुम जान जाती हो कि कब और कैसे मजा दिया जाये।'

मैं - 'अच्छा फिर क्या हुआ?

सूरज - बस मैंने उसकी चड्डी को खूब अच्छे से चाट कर साफ किया और फिर उसके बाद मैं अपना लंड बाहर निकालने लगा तो,

रागिनी बोली- सूरज तुम बहुत बेशर्म होते जा रहे हो।

मैं बिना कुछ बोले लंड को मुठ मारने लगा और कुछ ही देर में मैंने अपना पूरा माल उसकी पैन्टी में गिरा दिया, जबकि इतनी देर में रागिनी इस बात को लेकर डर रही थी कि कहीं कोई आकर मेरी यह हरकत न देख ले। मेरा जितना वीर्य उसकी पैन्टी में गिर सकता था उतना गिरा बाकी का मैंने उसकी ही पैन्टी से साफ किया और उसकी ओर पैन्टी बढ़ाते हुए

कहा- अब तुम्हारी बारी!

वो बोली- छीः मैं ये नहीं करूँगी।

मैं समझ गया कि यह सीधे से मानने वाली नहीं है तो एक बार उसको फिर ब्लैक मेल किया कि अगर नहीं करोगी तो मैं खड़े होकर तुम्हारी पैन्टी सबको दिखा दूंगा। विवश होकर उसने अपनी पैन्टी ली और इस तरह झुक गई कि वो क्या कर रही है किसी को पता नहीं चले और फिर वो पैन्टी को मुंह के पास ले गई और हल्के से अपनी जीभ को टच किया और फिर मुंह बनाते हुए,

रागिनी बोली- मुझे नहीं करना है।

मैंने उसे समझाया कि जब मैं तुमसे तुम्हारी पैन्टी मांग कर मैं चाट सकता हूँ तो तुम क्यों नहीं।

रागिनी बोली- तुमने अपनी मर्ज़ी से किया।

मैं बोला- हाँ ठीक है, लेकिन सोचो कि जब तुम्हारी शादी होगी और तुम्हारा आदमी अपना लंड जबरदस्ती तुम्हारे मुंह में डालेगा तो तो तुमको वही करना पड़ेगा, चाहे तुम्हारी मर्जी हो या न हो। फिर अभी कर के मजा लो।

मैं इसी तरह की बाते करके उसे फुसलाता रहा और अन्त में हारकर रागिनी ने अपनी पैन्टी को चाट कर साफ किया। उसके बाद रागिनी ने मेरे वीर्य को अपने थूक के साथ एकत्र करके मेरे मुंह को खोलते हुए उसने वो थूक मेरे अन्दर थूक दिया जिसको मैं गटक गया था।

मैंने रागिनी से बोला- अब हमारी दोस्ती पक्की हो गई है, कहते हुए उसके होंठों को चूम लिया।

रागिनी अपनी पैन्टी को अपने बैग में रखते हुए बोली- अब तुम केवल मेरे ही गांडू हो।

उसके बाद जब कॉलेज ओवर होने तक हम लोग एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए पढ़ाई कर रहे थे।

सूरज और मुझे काफी जोश चढ़ चुका था और मैं उसके ऊपर तेज तेज उछलने लगी और सूरज मेरी हिलती-डुलती हुई चूचियों को पकड़ पकड़ कर मसल रहा था। अब मैं खलास हो चुकी थी और दो तीन धक्के मारने के बाद मैं सूरज के ऊपर ही लेट गई, सूरज का टाईट लंड अभी भी मेरी चूत के अन्दर हरकत कर रहा था। सूरज ने मुझे उठाया और घोड़ी के पोजिशन में खड़ा होने के लिये बोला। मैं घोड़ी बन गई। सूरज की जीभ मेरे गांड को चाट रही थी। थोड़ी ही देर मैं मेरी गांड सूरज के थूक से काफी गीली हो चुकी थी कि सहसा सूरज अपने लंड को मेरी गांड से रगड़ने लगा, तो मुझे समझते देर नहीं लगी कि सूरज मेरे गांड भी चोदना चाहता है। मैंने तुरन्त ही सूरज को ऐसा करने से मना किया तो सूरज भी बिना कोई सवाल किये हुए अपने लंड को मेरी चूत पर सेट करके एक तेज झटका मारा और उसका समूचा लंड मेरी चूत के अन्दर था। अब सूरज धक्के पे धक्का दिये जा रहा था। काफी धक्के लगाने के बाद सूरज ने मुझे सीधा किया और मेरे ऊपर अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ दी, उसका वीर्य मेरी चूचियों पर गिरा। सूरज अपनी उंगली में वीर्य लेता और फिर वही उंगली मेरे मुंह के अन्दर करता। इस तरह करके उसने मुझे अपना पूरा वीर्य चटा दिया और उसके बाद अपने लंड को साफ करने के लिये कहा जो मेरा सबसे पसन्दीदा काम था, मैंने उसके लंड को अपने मुंह में लेकर साफ किया। इतना करने के बाद सूरज ने भी मेरी चूत को साफ किया। एक बार फिर बेड पर मैं सूरज की बांहो में लेटी हुई थी।
 
मैंने सूरज से आगे की कहानी बताने को कहा तो,

सूरज बोला- भाभी, उसके बाद अब हम दोनों रोज ही एक दूसरे के समान से खेलते और पढ़ाई कर रहे थे।

फिर रविवार का दिन आया और रागिनी का फोन आया और बोली कि उसका बर्थडे है और मैं तुरन्त ही उसके घर पहुंचूँ।

मेरे खुरापाती दिमाग में ख्याल आया कि रागिनी की चूत फड़क रही है, मैं तुरन्त ही तैयार होकर रागिनी के घर की ओर चल दिया। घर का दरवाजा रागिनी ने ही खोला, रागिनी बहुत ही सेक्सी नजर आ रही थी, जिससे मुझे और मेरी सोच को बल मिला।

उसने बहुत ही छोटी टॉप और स्कर्ट पहना हुआ था, अगर वो सोफे पर भी बैठ जाये तो उसके सामने बैठे हुए बन्दे को उसका पूरा योनि प्रदेश मुफ्त में ही देखने को मिलेगी। रागिनी ने बहुत ही ज्यादा मेक अप किया हुआ था। मैं अन्दर पहुँचा, देखा कि अन्दर मेरे और रागिनी के अतरिक्त कोई नहीं था,

मैंने रागिनी से कहा- रागिनी अगर तेरे को गांड मरवानी थी तो सीधे बोल देती कि आज घर में कोई नहीं है, तो मैं थोड़ा जल्दी आ जाता।

मेरी बात को इगनोर करते हुये बोली- बता गांडू, मैं कैसे लग रही हूँ?

सूरज - 'इतनी सेक्सी कि मेरा मन कर रहा है कि अभी ही तुझे चोद दूं!'

रागिनी - 'इसीलिये तो मेरे गांडू, तुझे बुलाया है कि आज तेरे साथ मैं अपना बर्थडे मना लूँ!'

कहकर रागिनी मुझे अपने कमरे में ले गई और मुझे बेड पर बैठाते हुए वो अपनी पैन्टी को इस प्रकार उतारने लगी कि मुझे उसके स्कर्ट के अन्दर कुछ भी न दिखे। पैन्टी उतारकर मुझे देती हुई बोली- हमारे पास पूरे दो घंटे है, मुझे आज खूब मजा दो। आज तुम मुझे मसल दो। अच्छे से मेरा बर्थडे मना दो।

जैसे ही उसकी पैन्टी मेरे हाथ में आई तो मुझे गीली लगी। इसका मतलब आज वो सिर्फ मेरे बारे में ही सोच रही थी और जैसे ही उसे पता चला कि आज वो घर में दो-तीन घंट के लिये अकेली रहेगी तो वो मेरे बारे में और सोच सोच कर उत्तेजित हो गई और पैन्टी ही अपने रस को निकाल दिया। मैंने उसकी पैन्टी सूंघी और उसको चाटने लगा। पैन्टी चाटने के बाद मैं घुटने के बल उसके पास बैठ गया और उसके स्कर्ट को ऊपर उठाकर उसकी चूत को भी सूंघने लगा। उसकी चूत की महक बहुत ही अच्छी लग रही थी हालांकि उसकी चूत में झांटें काफी बड़ी हो गई थी। मैंने अपने पूरे कपड़े उतार दिए और अपने लंड को रागिनी को दिखाते हुए उसे चूसने के लिये कहा। रागिनी बिना कोई प्रतिरोध किये मेरे लंड को चूसने बैठ गई। पहली बार रागिनी ने लंड को अपने मुंह में लिया था तो उसके दांत मेरे लंड में गड़ रहे थे लेकिन धीरे-धीरे वो मेरे लंड को सही तरीके से चूसने लगी। अब मुझे लगने लगा कि मेरा माल निकलने वाला है तो मैंने अपने लंड को रागिनी के मुंह से निकाला और उसकी पैन्टी को लंड पर लगाते हुए मूठ मारने लगा।

आज किसी बात का डर नहीं था सो वो भी बड़े मजे से मुझे मुठ मारते हुए देख रही थी।

दो चार हाथ चलाने के बाद मेरा पूरा वीर्य उसकी पैन्टी में आ गया। रागिनी पैन्टी लेकर बड़े ही प्यार से मेरे माल को चाटने लगी। पैन्टी को चाटने के बाद रागिनी ने मेरे लंड में बचे हुए माल को साफ किया और फिर मुझसे चिपकते हुए

बोली- गांडू, मैंने तेरे को पूरा नंगा देख लिया है अब तू मेरे कपड़े उतार कर मुझे पूरा नंगा देख!

मैंने तुरन्त ही उसके कपड़े उसके बदन से अलग किए। उसके नंगे जिस्म को देखकर पूरा विश्वास हो गया कि रागिनी अभी कोरी है और आज उसका कोरापन मैं ही खत्म करूंगा।

मैं आकांक्षा अपने देवर सूरज की कहानी में इतना डूब चुकी थी कि उसने मुझे झकझोरा और पूछने लगा- कहाँ खो गई भाभी?

मैं बोली- काश, मैं भी पैन्टी पहनती तो तुमसे अपनी पैन्टी चटवाती।

सूरज हंसने लगा और बोला- वो तो ठीक है, लेकिन आप कहां खो गई थी?

मैं - 'तुम जो कहानी सुना रहे हो, उसमें मैं अपने आपको ही रागिनी समझने लगी।'

सूरज बोला- तो यह बात है और मैं सोच रहा था कि आप पूछोगी कि तुम कैसे जाने कि रागिनी कोरी होगी।

मैंने भी उसकी हां में हां मिलाते हुए कहा- तो बताओ कि तुमने कैसे जाना कि रागिनी कोरी होगी।

सूरज - 'क्योंकि उसके चूचे सख्त थे और चूचुक भी काफी छोटे थे मतलब वो अभी चूसे हुए नहीं थे। और जब मैंने उसकी चूत पर हाथ फेरा तो उसके मुलायम झांटों के बीच उसकी बुर भी बहुत मुलायम थी। मैंने उसकी चूत सूंघने के बाद उसे घुमाया और उसके गांड के फांकों को फैलाया तो उसकी गांड का छेद क्या लाल लाल था। मेरे होंठ अपने आप ही उसकी गांड को चूमने लगे और रागिनी गहरी गहरी सांसें लेने लगी। गांड चूमने के बाद मैं खड़ा हो गया और रागिनी को अपनी बांहो में भर लिया।

क्या गर्म जिस्म था उसका। फिर मैंने उसे बिस्तर पर लेटाया और उसकी अमरूद जैसी चूची को मुंह में भर लेता और चूसता खास कर उसकी निप्पल को... और उसके जिस्म के हर हिस्से से मैं छेड़खानी कर रहा था। कभी मैं उसके जिस्म से छेड़खानी करता और कभी वो मेरी ही नकल मेरे जिस्म में उतारती। इस तरह बारी-बारी से हम दोनों एक दूसरे के जिस्म से छेड़खानी कर रहे थे कि मेरी नजर रागिनी के हाथों की तरफ गई तो देखा कि रागिनी अपनी चूत को तेज-तेज खुजली कर रही थी। मैंने उसके हाथ को हटाया और उसकी जांघों के बीच आकर बैठ गया और अपने लंड से उसकी चूत को सहलाने लगा। क्या गर्म थी साली की चूत... ऐसा लग रहा था कि कोई दहकती हुई भट्टी हो। जब मैं अपने लंड से उसकी चूत को सहलाने लगा तो,

रागिनी बोल उठी- बस सूरज, ऐसे ही सहलाते रहो, बड़ा अच्छा लग रहा है।

मैंने उसके कहेनुसार अपने लंड को उसकी बुर में सहलाना चालू रखा और जब मुझे विश्वास हो गया कि रागिनी खूब मस्त हो गई है तो मैंने एक झटके में अपने लंड को उसकी चूत में पेल दिया। अचानक हुए इस हमले से वो बिलबिला गई और चिल्लाने लगी। यह तो अच्छा था कि उस वक्त घर में कोई नहीं था। मैंने तुरन्त ही उसके मुंह में हाथ रखा लेकिन रागिनी अपने हाथों पैरों को पटक रही थी और बार-बार मेरी पीठ पर अपने मुक्के जमाये जा रही थी और अपने से अलग करने की कोशिश कर रही थी। मैं उसके मुंह में हाथ रखते हुए उसकी चूची को मुंह में लेकर बारी-बारी चूसने लगा। जब धीरे-धीरे रागिनी ने अपने हाथ पांव को पटकना बंद कर दिया तो मैंने उसके मुंह से हाथ हटाया तो,

छुटते ही बोली- हरामजादे मुझे मार कर ही दम लेगा क्या?

मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया और उसके चूची को मुंह में लेकर जब तक पीता रहा जब तक कि रागिनी के अन्दर फिर से एक बार उत्तेजना बढ़नी शुरू न हो गई। इस बार रागिनी अपनी कमर उठा कर मेरे लंड को पूरा का पूरा अपने अन्दर लेने की कोशिश करने लगी। मैंने लोहे को गर्म देखा तो तुरन्त ही एक चोट और पहुँचा दी लेकिन इस बार रागिनी ने चिल्लाने के साथ साथ अपने नाखूनों को मेरी पीठ में गड़ा दिया। मैं भी इस तरह नाखून को गड़ा देने से बिलबिला उठा लेकिन अपने ऊपर संयम रखते हुए उसके दिये हुए दर्द को बर्दाश्त करने लगा और उसके जिस्म से एक बार फिर जब तक खेलता रहा और रागिनी को दुबारा जोश दिलाने लगा। जोश आने के बाद रागिनी सब कुछ भूल गई और कमर उठा कर एक बार फिर मेरे लंड को अपने अन्दर लेने लगी।
 
रागिनी का कुंवारापन खत्म हो चुका था, अब वो कमर उचका उचका कर मजे लेने लगी और थोड़ी देर बाद ढीली पड़ गई और हांफने लगी और अपने हाथ-पैरों को इस तरह ढीला छोड़ दिया कि वो चाह रही हो कि भाई मैं पड़ी हूं और तुम्हे जो कुछ भी मेरे साथ करना हो कर लेना। उसके कुछ देर बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं भी अब खलास होने वाला हूं तो मैंने अपना लंड निकाल लिया और रागिनी की चूत के ऊपर अपने वीर्य को गिरा दिया, फिर उसके बगल में लेटा रहा।

रागिनी मुझसे बोली- सूरज, अन्दर बहुत जलन हो रही है।

मैं बोला- तुम्हारे अन्दर की झिल्ली फटी है, इस वजह से जल रहा है। उठो, उठ कर अपनी चूत को धो लो, मैं क्रीम लगा देता हूँ, कुछ देर बाद जलन दूर हो जायेगी।

जब हम दोनों ही बिस्तर से उठे तो देखा कि उसके खून से बिस्तर का एक खास हिस्सा सना हुआ था। खून देख कर वो मेरी ओर देखने लगी तो मेरे बताने के बाद उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, उसने अपनी जलन को भूलती हुई चादर को उठाया और वाशरूम में ले जाकर साफ करने लगी। मैंने रागिनी को दिलासा देते हुए कहा कि कोई पूछे तो माहवारी बता देना और बोल देना कि मैं गहरी नींद में सोई थी पता नहीं कब हो गया। शायद रागिनी को मेरी बात समझ में आ गई थी, इसलिये उसने जितनी चादर धोई थी, उसके बाद उसे वहीं छोड़ दिया। और फिर मैंने उसकी चूत को साफ करने के बाद चूत के अन्दर क्रीम लगा दी। फिर हम दोनों ने अपने कपड़े पहने। रागिनी ने अपनी उस सेक्सी ड्रेस को अलमारी में छिपा दिया और फिर से सलवार सूट पर आ गई। उसके घर वालों के आने का समय हो चुका था इसलिये उसने मुझे जल्दी जाने के लिये बोला और बोली- बर्थडे गिफ्ट देने के लिये शुक्रिया।

कहानी सुनते सुनाते एक बार फिर हम दोनों देवर भाभी को जोश चढ़ गया और सूरज एक बार फिर मेरी सवारी करने लगा और इस समय उसका जोश केवल मैं ही महसूस कर सकती थी। तीन बार मैं सूरज से चुद चुकी थी और हम दोनों को भी घड़ी इशारा दे रही थी कि समय खत्म हो चुका है। हमने अपने कपड़े पहने और रास्ते में अपने बॉस को चाभी देकर धन्यवाद दिया। बॉस साला हरामी का हरामी ही रहा, विदा करने से पहले मेरी गांड में उंगली करने के साथ-साथ चिकोटी भी काट लिया। उसके बाद मैं जब घर पहुंची तो नमिता ने डॉक्टर की जानकारी ली तो मैंने सूरज की तरफ देखते हुए नमिता के कान में बताया कि डॉक्टर ने अच्छे से चेकअप किया और मेरी चूत के अन्दर उंगली करके बोली कि यह सूख रही है, पति से ही इसका इलाज संभव है। कहकर मैं अपने कमरे में चली गई कपड़े बदले और फिर लेटे ही लेटे रितेश का इंतजार करने लगी। नमिता ने मुझे खाना मेरे ही कमरे में दे दिया था। लगभग एक घंट बाद ही रितेश आ गया, पूरे घर वालों को हाल चाल देने के बाद हम दोनों ने एकांत पाया और फिर हम दोनों अपने कमरे में आ गये। जब तक रितेश घर पर नहीं था तो मैंने अपने कमरे के पर्दे को इस तरह से सेट किया था कि जो चाहे मेरे कमरे में झांक कर अन्दर हो रहे खेल का नजारा लेकर मस्त हो सकता था।

कमरे के अन्दर आते ही रितेश और मैं एक दूसरे की बाँहों में बहुत देर तक रहे। यही हम दोनों का प्यार था कि हम दोनों ने एक दूसरे से कुछ नहीं छिपाते हैं, खुल कर एक दूसरे से बातें करते हैं, किसने किसके साथ कब सेक्स किया है, ये हम दोनों को पूरा पूरा पता था। बहुत देर तक मैं उसकी बाँहों में और वो मेरी बाँहों में था। चूंकि अब हम दोनों को दो-तीन घंटे की पूरी छूट थी तो मैं और रितेश अपने बेड पर एक दूसरे से चिपक के बैठे हुए थे। मैं ज्यादा उत्सुक थी कि सुहाना ने अपने पति के साथ की हुई रतिक्रिया के बारे में क्या बताया। लेकिन रितेश के पास अभी तक सुहाना का फोन नहीं आया था, इसलिये उसको भी कोई जानकारी नहीं थी। फिर मेरे पूछने पर कि सुहाना के साथ कैसा बीता तो वो बोला कि मजा तो आ रहा था लेकिन जब उसके गांड का बाजा बज चुका था तो वो चली गई और बोली कि मेरा गिफ्ट उधार है और अगर कभी मिले तो मुझे वो गिफ्ट पूरा करेगी। मेरी उंगलियाँ रितेश की छाती के बालों से खेल रही थी जबकि रितेश मेरी बांहों को सहला रहा था। तभी रितेश ने पूछा- आज तुम्हारी तबीयत खराब थी?

तो मैं सूरज की पूरी कहानी सुनाने लगी ताकि रितेश को समझ में आ जाये कि मेरी तबीयत क्यों खराब हुई। अचानक रितेश को याद आया कि उसके जीजा के साथ मैंने क्या किया तो,

मुझे रोकते हुए बोला- तुमने जीजाजी को अपने पानी का भरपूर मजा दिया।
 
मैं - 'हाँ दिया तो... लेकिन वो मेरा गुस्सा था। उस रात को तुम्हारे बिना मुझे नींद नहीं आ रही थी तो मैं छत पर चुपचाप टहल रही थी कि अचानक मैंने नमिता और अमित की लड़ाई की आवाज सुनी तो देखा कि अमित चाह रहा था कि नमिता उसके साथ सेक्स करे जबकि नमिता तैयार नहीं थी। तभी मुझे समझ में आ गया कि अमित इसलिये हर जगह हाथ पाँव मारने की कोशिश करता है।'

रितेश - 'फिर तुमने क्या किया?' रितेश ने पूछा।

मैं - 'कुछ नहीं... नमिता को रास्ते पर ले आई। दोनों खूब मजा करते है। एक बार तो हम तीनों ने मजा भी साथ ही साथ लिया।'

रितेश मेर निप्पल को दबाते हुए बोला- तुम खूब मजे कर रही थी मेरे पीछे?

थोड़ा सा भाव मारते हुये,

मैं बोली- अगर तुम्हें न पसंद हो तो मैं नहीं करूंगी।

रितेश - 'अरे नहीं यार, मैं तो मजाक कर रहा था।'

उसके बाद मैंने अपने, नमिता और अमित के बीच हुई कहानी को एक बार फिर रितेश को बताया। रितेश को कहानी सुनाने के बाद मैं बोली- यार, चल आज रात हम दोनों ही अमित और नमिता की चुदाई देखते हैं।

रितेश - 'यह क्या कह रही हो?'

मैं - 'तो क्या हुआ, वो भी तो तुम्हारे बारे में अब सब जानती है।'

रितेश - 'अच्छा, चल रात की रात देखते हैं, अब मेरा लंड तन रहा है।'

तो मैं बड़ी ही स्टाईल से रितेश के सामने खड़ी हुई और अपने गाउन को ऊपर करते हुये बोली- ये छेद दूँ तुम्हारे इस लंड को?

फिर मैं पीछे घूम कर अपनी गांड को दिखाते हुये बोली- या तुम्हारे लंड को इस छेद की जरूरत है या फिर मेरा मुंह?

रितेश छुटते ही बोला- मुँह!! आओ दोनों एक दूसरे का पहले पानी निकालें, फिर तुम मुझे सूरज के बारे में बताना!

हम दोनों ही 69 की अवस्था में आ गये, रितेश अपने मुंह से मेरे चूत की सेवा कर रहा था और मैं उसके लंड की सेवा कर रही थी। कुछ देर बाद ही हम दोनों का पानी एक दूसरे के मुंह में था। उसके बाद मैं फिर रितेश के बगल में बैठ गई। हाँ, बीच बीच में मेरी नजर खिड़की की तरफ उठ जाती थी। मैं लंड चूस के उठी ही थी कि मुझे लगा कि किसी की परछाई है जो कमरे के अन्दर झांक रही थी। मैंने तुरन्त अपने गाउन को उतारा और पूर्ण रूप से नंगी होकर थोड़ा सा खिड़की के और करीब आ गई और रितेश से भी पूरे कपड़े उतार कर मेरी बुर को एक बार और चाटते हुये कहानी सुनने को कहा। रितेश को भला क्या ऐतराज हो सकता था, वो भी तुरन्त अपने कपड़े उतार कर मेरे पास आ गया और नीचे बैठ कर अपनी जीभ मेरी बुर में लगा दी। मैं तिरछी नजर से खिड़की पर देखते हुए रितेश को अपनी और सूरज की कहानी थोड़ा ऊँची आवाज में सुनाने लगी ताकि जो बाहर खड़ा है, उसे भी खुली खिड़की का मजा आये। मैंने रितेश को अपने और सूरज की चुदाई के बारे में शुरू से कहानी सुनानी शुरू की कि कैसे मुझे पता लगा कि उसके अन्दर मेरे लिये क्या है और उसने मुझे कब कब और कहाँ कहाँ नंगी देखा। मैं रितेश को कहानी सुना रही थी पर मेरी नजर बाहर ही थी और जो मैंने देखा तो मुझे मेरे मन मुताबिक ही लगा। वो मेरा सबसे छोटा देवर रोहन ही था जिसको मेरा चस्का लग गया था।

इधर मेरी कहानी खत्म हुई, उधर रितेश कि चटाई खत्म हुई। रितेश खड़ा हुआ तो उसका लंड मेरी चूत चूसाई और चटाई और ऊपर से मेरे और सूरज की कहानी सुनने के बाद काफी टाईट हो चुका था।

वो मुझे अपना लंड दिखाते हुए बोला- जान, तेरी चूत का तो काम हो चुका है, अब मेरे लंड का क्या होगा?

मैं बोली- मेरी जान, चिन्ता क्यों कर रहे हो, तुम्हारी यह प्यारी रंडी दुल्हन कब काम आयेगी। चलो आ जाओ, अपने लंड महराज को मेरी गांड की सैर करा दो।

मैं रितेश के और करीब आ गई, उसके कान में बोली कि बाहर उसका सबसे छोटा भाई काफी देर से हम लोगों को देखकर अपना लंड हिला रहा है, लेकिन उसका पानी नहीं निकला है।
 
बात काटते हुए रितेश बोला- तो मेरी प्यारी रंडी बीवी अपने शौहर को छोड़ कर उसका पानी निकालने जायेगी?

'नहीं यार!' मैं बोली। तुम मेरी गांड इस तरह मारो कि रोहन को मेरी गांड और लंड की चुदाई पूरी दिखे पर उसे ऐसा नहीं लगे कि हम उसे देख रहे हैं।

रितेश मेरी बात समझ गया, मैं और रितेश खिड़की के और करीब आ गये। हमारी पीठ खिड़की की ही तरफ थी, लेकिन मेरी समझ से मेरी गांड चुदाई बाहर से पूरी तरीके से देखी जा सकती थी। अब मैं झुक चुकी थी और रितेश मेरे पीछे थोड़ा सा इस तरह से हट कर खड़ा होकर मेरे गांड की उठान को इस प्रकार फैलाया था कि अन्दर का छेद बाहर खड़े रोहन को अच्छे से दिखे। उसके बाद मुझे मेरी गांड पर कुछ गीलापन सा लगा, रितेश अपने थूक से मेरी गांड को तीन-चार बार गीली कर चुका था। तभी गप्प से उसका लंड मेरी गांड में घुस गया... चीख के साथ मेरे मुंह से गाली भी निकली- माआआदरचोद... मेरी गांड में अपने गधे जैसा लंड को प्यार से नहीं डाल सकता क्या?

उधर रितेश ने भी वैसा ही जवाब दिया- हाँ बहन की लौड़ी, तेरी गांड है या गुफा? मेरा लंड एक ही बार में पूरा का पूरा अन्दर चला गया। चल बता बुर चोदी कितनों से अपनी गांड मरवाई है?

मैं - 'अरे मेरे गांडू राजा, ऐसा अपनी प्यारी रंडी के लिये मत बोलो, मेरी चूत के अन्दर किसी का भी लंड सैर कर सकता है, पर मेरी गांड में केवल तेरा ही लंड सैर करता है।'

इस तरह हम लोग गाली गलौच वाली भाषा का प्रयोग करके चुदाई का मजा भी ले रहे थे। बाहर खड़े रोहन का तो मुझे पता नहीं लेकिन रितेश की स्पीड बढ़ गई और कुछ देर बाद रितेश का माल मेरे मुंह में था। मैं धीरे से पर्दे के पीछे गई और देखने लगी कि रोहन क्या कर रहा है। बाहर का नजारा कुछ अलग ही था, रोहन मदहोश होकर अपने लंड को फेंट रहा था और थोड़ी देर बाद उसकी मलाई उसके हाथ में थी। रोहन ने अपनी जीभ इस तरह अपनी मलाई में लगाई मानो कि वो नमक चाट रहा हो। एक दो-बार ऐसा करने के बाद वो अपनी मलाई ही पूरी चाट गया कि तभी रितेश का मोबाईल बजने लगा और रोहन अपनी मदहोशी से बाहर आया।

उधर रितेश थोड़ी उँची आवाज में बोला- आकांक्षा, मेरा मोबाईल बज रहा है।

मैं भी थोड़ी ऊँची आवाज में बोली- आई।

ताकि रोहन को यह समझ में आ जाये कि कोई भी उसे देख सकता है।

और मेरी बात भी सही हुई, रोहन ने तुरन्त अपना लोअर पहना और दरवाजा खोलकर नीचे भाग गया।

रितेश ने मोबाईल उठा लिया, फोन सुहाना का था।

मैं भी रितेश के पास बैठ गई, रितेश ने मोबाईल को स्पीकर में कर दिया, उधर से सुहाना बोली -हैलो!

रितेश- हैलो!

सुहाना- कौन बोल रहा है?

रितेश- मैं रितेश!
 
रितेश ने अपना पूरा परिचय दिया। पूरा परिचय लेने के बाद सुहाना जब कन्फर्म हो गई कि उसकी बात रितेश से ही हो रही है तो वो बोली- रितेश मैं सुहाना बोल रही हूँ।

रितेश- ओह, हाँ मैम बोलिये, बन्दे को कैसे याद किया।

सुहाना- मुझे तुम सुहाना ही बोलो।

रितेश- ओ के सुहाना, कल रात मैं तुम्हारे ही फोन का इंतजार ही कर रहा था, जब नहीं आया तो सोचा कि बिजी होगी इसलिये मैंने डिस्टर्ब नहीं किया।

सुहाना- हाँ, रात मैं ज्यादा थक गई थी और फिर सुबह ऑफिस में ही बिजी थी। अब जा कर थोड़ा फ्री हुई हूँ तो तुमको फोन लगा लिया। बाई दी वे तुम क्या कर रहे हो?

रितेश ने मेरी तरफ देखा, मेरी चूत को अपनी दूसरी हथेली से कस कर भींच दिया और हौले से मुस्कुराते हुए कहा- काफी दिनों बाद मैं अपनी वाईफ से मिला तो उसकी गांड मार रहा था।

सुहाना- तो क्या वाईफ भी तुम्हारे साथ बैठी है?

रितेश ने इस जगह पर थोड़ा सा झूठ बोला- नहीं, वो अन्दर अपनी गांड साफ करने गई है।

रितेश की यह बात सुनकर सुहाना बोली- रितेश, तुमको गांड मारने में बड़ा मजा आता है? तुमने मेरी भी गांड चोदी और इस समय अपनी वाईफ की गांड चोद दी?

रितेश- क्या करूँ सुहाना, आकांक्षा ने ही मुझे ये गांड मारने की आदत डलवाई है।

मेरा सिर रितेश के सीने पर था, दोनों की बाते सुनते-सुनते मैं उसके निप्पल के साथ भी खेल रही थी।

सुहाना- इसका मतलब तुम्हारी वाईफ को भी वाईल्ड सेक्स पसंद है?

रितेश- क्यों नहीं, मेरी वाईफ है ही ऐसी! जो एक बार उसको देख भर ले तो उसके चूत और गांड के पीछे अपना लंड लिये हुए दौड़ता रहे।

सुहाना- इसका मतलब अगर तुम्हारी परमिशन उसे मिल जाये तो वो किसी के साथ भी सेक्स कर सकती है?

रितेश- क्या सुहाना जी, सेक्स नहीं इसको चुदना बोलते है और इसमे परमिशन की क्या बात है। उसका छेद है, जिसे देना चाहे वो दे सकती है।

सुहाना- इसका मतलब तुम चाहते हो कि आकांक्षा किसी के साथ भी चुदे?

रितेश- मैं चाहता नहीं, जानता हूँ कि वो कब किससे चुदी है। मेरी आकांक्षा है, मुझसे कुछ नहीं छिपाती है और वो भी जानती है कि मैं किसकी चूत में अपना लंड डालता हूँ।

सुहाना- वाव! क्या जोड़ी है तुम दोनों की!

रितेश- हाँ सुहाना! हम दोनों का मानना है कि जिसको जहाँ भी मौका मिले वो एन्जॉय करे। अब बतायें कि क्या हुआ था रात को?

सुहाना- अपनी वाईफ को भी बुला लो, वो भी मेरी कल रात वाली कहानी सुने!

मैं सुहाना की बात सुनने के बाद बोली- हाय सुहाना जी, कैसी हैं आप?

सुहाना- मैं ठीक हूँ, तुम कैसी हो। तुम्हारा पति तो कमाल का है, क्या चुदाई करता है।

मै- हाँ! अभी-अभी उसने मेरे गांड का भी बाजा बजाया है।

सुहाना- वाआओ... तुम भी खुले शब्दों का प्रयोग करती हो।

मै- तो क्या हुआ, सेक्स करना है तो खुले दिल से करो।

रितेश- हाँ, अब आप सुनाओ अपना किस्सा!

सुहाना- कल रात जब मैं तुम्हारे पास से अपनी गांड मरवा कर घर गई तो देखा मेरा हबी आशीष मेरा इंतजार कर रहा था। उसने तुरन्त ही मेरे लिये कॉफी बना कर दी और मेरे कंधे को दबाने लगा। मेरे मना करने के बाद भी वो दबाता रहा और बोल रहा था कि तुम बहुत थक गई हो और तुमको इससे रिलेक्स मिलेगा।
 
वास्तव मैं मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था और सोच रही थी कि जब मैं एक गैर मर्द के साथ खुल कर सेक्स कर सकती हूँ तो अपने पति के साथ क्यों नहीं। कल से पहले मुझे पता नहीं क्यों उसके साथ सेक्स केवल तब तक अच्छा लगता था जब तक कि उसका पानी मेरी चूत के अन्दर न चला जाये।

रितेश- तो क्या वो जल्दी झर जाता था?

सुहाना- नहीं, आशीष का बस चले तो वो पूरी रात चोदे तो भी उसका स्टेमिना कम न हो।

रितेश- फिर आपको मजा क्यों नहीं आता था?

सुहाना- मुझे समझ में कभी नहीं आया। लेकिन मैं उसके साथ पहले कभी नहीं खुल पाई।

मैं- फिर कल क्या हुआ आप दोनों के बीच?

सुहाना- कल जब मैं तुम्हारे पास से वापस पहुँची तो तय कर लिया था कि आज आशीष जो भी मेरे साथ करेगा, उसमें मैं उसका पूरा साथ दूंगी। फिर मैंने कॉफी पी और उसके बाद मैं बाथरूम में नहाने चली गई। आज मैं आशीष के लिये अपने दिल से शर्म निकालने जा रही थी। इसलिये मैंने बाथरूम का दरवाजा इस प्रकार बंद किया कि आशीष आसानी से अन्दर देख सके।

मैं शॉवर के नीचे नग्न खड़े होकर शॉवर ले रही थी और एक मेलोडी सॉन्ग गुन गुना रही थी कि मेरी पीठ पर आशीष का हाथ महसूस हुआ। वो मेरी पीठ पर साबुन मल रहा था।

मैं नादान बनते हुए उसकी तरफ घूमी।

अरे तुम? देखा तो आशीष एकदम नंगा था और उसके हाथ में साबुन था।

आशीष बोला- यार सॉरी, दरवाजा खुला था और तुमको साक्षात काम देवी के रूप में देखा तो खुद को रोक नहीं पाया। आज मुझे मत रोकना आज मुझे तुम अच्छे से देख लेने दो।

कहते ही वो मुझे चुमते हुए नीचे मेरी चूत के पास अपनी जीभ निकाल दी और शॉवर का पानी जो मेरे जिस्म के एक-एक हिस्से पर गिरते हुए मेरी चूत से टपक रहा था, उस एक-एक बूँद को वो अपने जीभ में ले रहा था। उस दिन मुझे लगा कि हर आदमी खुल कर सेक्स करना चाहता है, वो चाहता है कि उसकी बीवी या पार्टनर अगर उसके साथ बिस्तर में हो तो पूरी रंडी की तरह हो।

रितेश- फिर क्या हुआ सुहाना?

सुहाना- आशीष ने मेरी दोनों जांघों को पकड़ लिया और फिर अपनी जीभ को मेरी चूत के ऊपर चलाने लगा। एक तरफ पानी मेरे जिस्म को ठण्डा करने की कोशिश कर रहा था तो दूसरी तरफ आशीष की यह हरकत मुझमें एक उत्तेजना पैदा कर रही थी और मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं आशीष को ही समूचा अपनी चूत के अन्दर डाल लूँ।

सुहाना की यह बात सुनकर हम दोनों ही हँसने लगे।

फिर रितेश बोला- फिर आगे क्या हुआ सुहाना?

सुहाना- मैं मस्त होकर आशीष से अपनी चूत चटवा रही थी। वो बार-बार मेरी पुतिया को अपने दाँतों से दबाता, जिससे मेरे मुँह से सिसकारी निकल जाती। वो मेरी चूत चाटने में बहुत मस्त हो गया। उसके इस चूत चटाई से मैं अपना पानी छोड़ चुकी थी, लेकिन पता नहीं क्यों मैं नहीं चाहती थी कि मेरा पानी उसके मुंह में जाये। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।
 
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