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Erotica मुझे लगी लगन लंड की

मैं- फिर आगे क्या हुआ सुहाना जी?

सुहाना- मैंने बहुत कोशिश की कि आशीष का मुंह मेरी चूत से हट जाये लेकिन आज आशीष को मेरी भी परवाह नहीं थी और जब तक उसने एक-एक बूंद मेरी चूत की चाट नहीं ली तब तक उसने मुझे छोड़ा नहीं। जिस तरह से आशीष मेरी चूत चाट रहा था तो मैं सोच रही थी कि मैं भी आशीष के लंड को अपने मुंह में ले लूँ और उसको भी मजा दूं। पर आशीष मुझे अच्छे से नहलाने लगा और उसके बाद मुझे अच्छे से पौंछा और खुद भी नहाने के बाद अपने जिस्म को सुखा कर वो मेरे पास आया। मैं कॉम्ब कर रही थी कि उसने मुझसे कंघी ली और मेरे बालों को कंघी करने लगा। फिर उसने मुझे पाउडर लगाया और सेन्ट को मुझ पर अच्छे से छिड़क रहा था। बॉडी लोशन लेकर फ़िर मेरे पीछे आ गया और लोशन कभी मेरी चूचियों में लगा कर मालिश करता तो कभी नाभि के आस-पास, तो कभी मेरी चूत के ऊपर उस लोशन से मॉलिश करता। उसका लंड मेरी गांड में चुभ रहा था।

लोशन लगाते हुए आशीष मुझसे बोला- सुहाना, क्या आज तुम मेरी बात मानोगी?

मैंने भी कहा- हाँ हाँ, बोलो?

आशीष ने मुझे पीछे से कस कर हग किया और बोला- सुहाना, आज तुम मेरे साथ खुल कर मजा लो।

मैंने थोड़ा सा उसे चिढ़ाते हुए कहा- इतनी देर से मैं और कर क्या रही थी।

रितेश- फिर क्या हुआ?

सुहाना- आशीष थोड़ा सा मेरी चिरोरी करते हुए बोला 'सुहाना मेरा लंड तुम्हारे होंठों का प्यासा है, आज इसकी प्यास बुझा दो। मैं उसकी तरफ घूमी और उसकी आँखों में आँखें डाल कर बोली 'मुझसे ये मत कहो प्लीज, मुझे ये अच्छा नहीं लगता।'

मेरा मन भी कर रहा था कि मैं आशीष के लंड का पानी निकाल कर उसके स्वाद को चखूँ, लेकिन मैं थोड़ा उसे और तड़पना चाहती थी। आशीष मेरी पीठ को सहलाते हुए अपने घुटने के बल पर बैठ कर एक फिल्मी हीरो की तरह उसने मेरे दोनों हाथों को पकड़ा और मुझे मनाने लगा, बोलने लगा 'आज पहली बार इस हुस्न का आनन्द ले रहा हूँ।'

पता नहीं क्या-क्या आशीष मेरी हुस्न के तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा था। मुझे लगा कि क्यों सुहाना तुमने इतना सब कुछ मिस किया।

मैं झुकी और आशीष से बोली 'अब से मैं तुम्हारे लिये वो सब करूँगी जो तुम्हें अच्छा लगे।'

कहकर मैंने उसको खड़ा किया और खुद थोड़ा इस तरह झुककर आशीष के लंड को मुंह में लिया कि आशीष जब मेरी गांड शीशे में देखे तो उसे और मजा आये। मैं आशीष के लंड को चूसे जा रही थी और वो मेरी गांड को सहला रहा था और आशीष के मुंह से 'आह ओह... आह ओह...' ही निकल रहा था, बोल रहा था 'जानेमन, बहुत मजा आ रहा है। बस ऐसे ही चूसो। आह, चूसो, चूसो और चूसो बहुत मजा आ रहा है।'

मेरा मुंह उसके लंड को चूसते चूसते दर्द करने लगा था। फिर थोड़ी देर बाद ही खुद आशीष ने मेरे मुंह से अपना लंड निकाला और मेरे पीछे आकर मुझे उसी पोजिशन में रहने के लिये कहा और फिर एक बार वो मेरी चूत को गीला करने लगा। जब उसके हिसाब से मेरी चूत गीली हो गई तो उसने अपना लंड को मेरी चूत के अन्दर बड़े धीरे से डाला। उसका लंड मेरे चूत के अन्दर थोड़ा ही गया था। फिर उसने अपने लंड को निकाला और फिर उसी प्यार से अपने लंड को मेरी चूत के अन्दर से निकाला। इस तरह उसने तीन चार बार किया, तब जाकर उसके लंबे लड़ को मैं अपने अन्दर महसूस कर पाई।

उसके बाद वो मुझे कभी धीरे-धीरे पेलता तो कभी-कभी तेजी से पेलता। फिर एक वक्त आया जब आशीष के मुंह से निकलने लगा 'बहुत मजा आया आज, अब मैं निकलने वाला हूँ।' बस इतना सुनते ही मेरे मन में आज आशीष का पानी पीने का मन हुआ तो मैंने आशीष को रूकने के लिये कहा और जल्दी से उसके लंड को अपने मुंह ले लेकर चूसने लगी। आशीष मुझे मना कर रहा था 'नहीं सुहाना, मेरा पानी तुम्हारे मुंह गिरेगा, अपना मुंह हटाओ।' पर मैंने भी उसकी बात को अनसुना कर दिया और जितनी देर में वो अपना लंड मेरे मुंह से निकालने की कोशिश करता, उतनी देर में उसका पानी मेरे मुंह के अन्दर छूट गया और उसके वीर्य मेरा पूरा मुंह भर गया। मैं अपना मज़ा लेते हुए उसके वीर्य के रस का एक-एक बूंद चट कर गई, आशीष बोलता ही रहा 'यह क्या कर रही हो? मत करो ऐसा!'पता नहीं क्या-क्या!

फिर मैं खड़ी हुई और एक रंडी की तरह मैंने कस कर उसके होंठों को चूसना शूरू कर दिय। आशीष ने मुझे गोद में उठाया और ले जाकर मुझे बिस्तर में पटक दिया और

फिर मेरे बगल में लेटते हुए बोला 'मैं मना कर रहा था तो भी तुम नहीं मानी?'

कहते हुए एक उंगली से मेरी जिस्म के पोर-पोर को वो गिटार के तार की भांति मुझे बजा रहा था। कभी उसकी उंगली मेरी चूचियों की गहराई के बीच होते हुए नाभि तक पहुँचती तो कभी मेरी भगनासा को छेड़ती तो कभी मेरी चूत के फांको के बीच होकर अन्दर खाई में जाती।

मैं उसके इस हरकत का आनन्न्द लेते हुए बोली- तुम ही तो कह रहे थे आज तुम्हें इस खेल को खुल कर खेलना है।

आशीष बोला- वो तो ठीक है। लेकिन!!!

मैंने कहा- लेकिन क्या? तुम भी तो मेरा रस के एक-एक बूंद को जब तक नहीं पी गये तब तक तुमने भी अपना मुंह कहाँ हटाया था।

मेरे इतना कहते ही वो मेरे होंठो पर अपनी उंगलियाँ चलाने लगा और फिर अपनी एक टांग को मेरे ऊपर चढ़ाते हुए मेरे होंठों को चूसने लगा। आज मुझे उसका इस तरह से मेरे ऊपर टांग चढ़ाना भी बहुत अच्छा लग रहा था। होंठ चूसने के बाद उसने मुझे पलटा दिया और फिर फ्रिज से आईस क्यूब एक कटोरे में ले आया और दो-तीन आईस क्यूब मेरी पीठ में थोड़ी थोड़ी दूर रखता हुआ उसे अपने मुंह में रखता और फिर मेरी पीठ में रखता। मेरे साथ बहुत कुछ नया हो रहा था, मैं बेड में लगे हुए शीशे से आशीष की इन सब प्यारी हरकतों को देख कर आनन्दित हो रही थी। तभी आशीष मेरी पीठ पर लेट गया और

मुझसे कान में बोला- जानू, आज तुम बहुत मस्त लग रही हो!
 
मैंने भी उत्तर दिया- तुम्हारा खेल मुझे बहुत पसंद आ रहा है।

वो खुश होते हुए बोला- पक्का पसंद आ रहा है?

'हुम्म सच में!' मैं बोली।

फिर आशीष बोला- और मजा लोगी?

मैं- हाँ।

आशीष- तो अपनी गांड की फांकों को अपने हाथों से फैलाओ।

मैंने आशीष के कहे अनुसार अपनी गांड के पुट्ठे को पकड़ा और उसे फैला दिया, आशीष बोला-वाऊऊउ क्या मस्त गांड है।

कहकर उसने उंगली को गांड के छेद के अन्दर डाल दी, फिर उसने कटोरे से आईस उठाई और थोड़ी ऊँचाई से उस आईस क्यूब को ठीक मेरी गांड के छेद की सीध में लगा दिया और जब उस आईस की एक-एक ठंडी बूंद मेरी गांड की छेद में पड़ रही थी तो मैं अन्दर तक हिल जा रही थी। 10-15 बूंद उस आईस से सीधा मेरी गांड में गिरी। उसके बाद वो उस आईस को मेरी गांड में रगड़ने लगा। आशीष को बहुत दिन बाद इस तरह बिना किसी तनाव के मेरे साथ सेक्स करने का मौका मिला था और वो उस मौके के हर एक पल के आनन्द का मजा लूट रहा था। वैसे भी मजा मुझे भी आ रहा था। फिर मुझे मेरी गांड में कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ। मैंने शीशे से देखा तो आशीष की जीभ मेरी गांड के छेद को चाट रहा था और फिर अचानक आशीष ने मेरे पुट्ठे को पकड़ा और

जोर से कहा- सुहाना, आज तुमको एक और नया मजा मैं देने जा रहा हूँ!

इतना कहने के साथ ही एक झटके में वो अपना लंड मेरी गांड के अन्दर पेल चुका था। मैं चीख उठी और हिलडुल कर मैं उसके लंड को गांड से बाहर निकालना चाहती थी, पर वो मेरे ऊपर पूरी तरह से लेट गया और मुझे हिलने का मौका बिल्कुल नहीं दिया। एक उसका लंड जो अचानक मेरे गांड के अन्दर जा चुका था, उसकी जलन हो रही थी और ऊपर से आशीष का वजन मेरे ऊपर था, सांस घुटती सी लग रही थी। कुछ देर बाद आशीष मेरे ऊपर से उठा और फिर धीरे-धीरे मेरी गांड की चुदाई करने लगा। मुझे भी मजा आ रहा था, लंड के वजह से गांड काफी ढीली पड़ चुकी थी।

अब आशीष मुझे घोड़ी बना कर कभी मेरी बुर चोदता तो कभी मेरी गांड की चुदाई करता। काफी देर तक आशीष मेरी गांड और बुर के छेदों की चुदाई करता रहा और फिर अन्त में वो मेरी गांड के अन्दर ही झड़ गया।

उसके बाद हम दोनों एक-दूसरे से चिपक कर सो गये। आज सुबह जैसे ही उठा उसने मेरी चुदाई शुरू कर दी। फिर दोनों ही तैयार होकर ऑफिस के लिये निकल पड़े।

सुहाना की बात खत्म होते ही हम दोनों साथ-साथ बोल पड़े- मुबारक हो गांड और चूत दोनों के मजे साथ-साथ लेने के!

सुहाना हँसने लगी।

फिर रितेश बोला- मेरा गिफ्ट?

सुहाना बोली- उसको मैं भूली नहीं हूँ।

तभी मैं बोल पड़ी- सुहाना, अगर आप चाहे तो मैं-रितेश और टोनी-मीना एक कपल नोएडा के हैं, हम लोग स्वैपिंग करते हैं।

सुहाना बोल पड़ी- ये स्वैपिंग क्या होता है?

तो मैंने सुहाना को बताया कि इस खेल में कपल्स होते हैं, एक मर्द दूसरे की बीवी से उसके सामने ही सेक्स करता है यानि की अदला बदली कर के!

सुहाना- इसका मतलब तुम भी रितेश के सामने दूसरे मर्द से चुदवाती हो?

मैं- हाँ, शुरू शुरू में अच्छा नहीं लगा पर अब मजा आता है। अगर तुम चाहो तो तुम भी आशीष के साथ मेरे ग्रुप में शामिल हो सकती हो, बहुत मजा आयेगा।

सुहाना- 'चलो देखते हैं, मुझे तो ये बड़ा डेयरिंग खेल लग रहा है, पता नहीं आशीष मानेगा या नहीं!'

फिर बाकी इधर उधर की बात होने लगी और फिर सुहाना ने यह कहकर फोन काट दिया कि एक दो दिन में वो फोन करेगी।

सुहाना की कहानी सुनकर हम दोनों काफी उत्तेजित हो चुके थे तो फोन कटते ही रितेश ने मुझे पटक दिया, मेरी चूत में अपना लंड डाल दिया और तेज तेज चोदने लगा। थोड़ी देर बाद वो डिस्चार्ज हो गया और मेरे ऊपर लेट गया। रितेश हाँफ रहा था। वो फिर मेरे से अलग हुआ तो मेरी उंगली अपने आप ही मेरी चूत की तरफ चली गई और हम दोनों की जो मिक्स मलाई मेरी चूत से बाहर आ रही थी, उसको उंगली पर लेकर उसका स्वाद लेने लगी। मेरी देखा देखी रितेश भी अपनी उंगली से मिक्स मलाई को चाटने लगा। हम दोनों का कोटा पूरा हो चुका था, अब मुझे इंतजार था कि रात में रितेश के साथ उसकी बहन की चुदाई को देख कर आनन्द लेने का। फिर मुझे ऑफिस वाला प्रोपोजल याद आया तो,

रितेश ने कहा- मैं अपने ऑफिस में जाकर बात करता हूँ। अगर छुट्टी मिल जायेगी तो हम दोनों कलकत्ता में हनीमून मनायेंगे।

उसके बाद हम दोनों ने अपने कपड़े पहने और नीचे आ गये।

रितेश घर के बाकी सदस्यों के साथ बात कर रहा था जबकि मैं और नमिता शाम के खाने की तैयारी में लग गये थे। चूंकि घर के सभी सदस्य बड़े से छोटे तक चाहते थे कि मैं घर में गाउन ही पहन कर रहूँ तो फिर मैंने भी मन में ठान लिया था कि अब मैं घर में मटकते हुए चलूँगी ताकि सबको मेरी मटकती हुई गाण्ड का भी मजा मिले। हम लोग खाना बना ही रहे थे कि अचानक बाबूजी ने सबको बुलाया और करीब 20-22 रिश्तेदारो के आने की खबर दी जो मुझसे मिलने कल ही आ रहे हैं और मुझसे पूछने लगे कि दो दिन रहेंगे, तुम्हें तो ऐतराज तो नहीं है। मैं न भी कैसे करती।
 
रितेश मेरे पास आया और बोला- लो दो दिन के लिये फिर मुश्किल हो गई तो आज रात तैयार हो जा, तेरी खूब गांड और चूत चोदूँगा। मुझे भी क्या चाहिए था, रितेश का लंड ही तो चाहिये था। खाना खाते खाते यह तय हुआ कि जितनी लेडीज आयेंगी वो ऊपर मेरे और नमिता के कमरे में रहेंगी और जेन्टस हॉल में तथा विजय और रितेश के कमरे में रहेंगे। चूंकि सासू मां ने पहले से ही मना कर दिया कि कोई भी उनके कमरे में नहीं रहेगा तो बस उनसे यही कहा गया कि यदि मेहमानों की सख्या अधिक हुई तो मैं और नमिता ही उनके कमरे में रात को सोयेंगे। सासू मां इस बात पर मान गई। हम लोग खा-पीकर एक बार फिर सब अपने अपने कमरे में चले गये।

कमरे में पहुँचते ही मैंने हल्की सी रोशनी की ताकि देखने वाले देख सकें। मैं जैसे ही अपना गाउन उतराने लगी तो देखा कि रितेश नंगा खड़ा है,

मुझे देखकर मुस्कुराते हुए कहा- यार अपना कमरा अपना ही होता है, कोई रोक टोक नहीं।

मैंने अपना गाउन उतारा और रितेश की बांहो में अपने को समेट लिया। तभी मुझे हल्की सी आवाज दरवाजे के बन्द होने की आई, इसका मतलब था कि अमित और नमिता दोनों ऊपर आ गये हैं और उन्होंने ही दरवाजा बंद किया है।

उसी समय मैंने रितेश से थोड़ी उँची आवाज में कहा- रितेश, आज 69 की पोजिशन करके तुम मेरी चूत चाटो और मैं तुम्हारे लंड को चूसूँ, लेकिन खड़े वाली 69 की पोजिशन!

चूंकि रितेश भी काफी हृष्ट-पुष्ट था तो वो तैयार हो गया।

मेरी नजर खिड़की पर ही थी जहाँ पर नमिता और अमित दोनों खड़े होकर हमे देख रहे थे।

रितेश ने मुझे उठाया और हवा में ही मुझे उल्टा कर दिया, मेरा मुंह उसके लंड पर आ गया। अब हमारी पोजिशन काफी रोचक थी और शायद बाहर से देखने वालों के लिये भी। मैं रितेश के लंड को चूस रही थी, रितेश मेरी चूत का रसास्वादन कर रहा था। काफी थ्रिल था।

थोड़ी देर बाद रितेश ने मुझे अपनी गोद से उतारा और मुझे घोड़ी बनने का इशारा किया। मैंने जानबूझ कर खिड़की की दीवार से अपने को सपोर्ट दिया, मैं देखना चाहती थी कि नमिताको कैसा लग रहा है। खिड़की की एक तरफ नमिता और दूसरी तरफ अमित छुप कर अन्दर के नजारे का मजा ले रहे थे। रितेश ने मेरी गांड में थूक लगाया और एक झटके में अपने लंड को मेरी चूत के अन्दर पेल दिया।

मैं - 'उईईई ईईईई मां... मादरचोद हमेशा इसी तरह से मेरी गांड मारोगे कि कभी प्यार से भी?'

रितेश - 'अरे बहन की लौड़ी, जब तेरी गांड ही इतनी मस्त है तो मैं अपने को कैसे रोकूँ?'

मैं - 'तो यह बात है- तुमको सिर्फ मेरी गांड ही मस्त लगती है चूत नहीं?'

रितेश बोला- नहीं डार्लिंग, चूत तो तुम्हारी दुनिया की सबसे मस्त चूत है। इतनी चूत चोदी, लेकिन जब तक तेरी चूत न चोदूँ तो मजा नहीं आता है। आज तो पूरी रात मेरा लंड तुम्हारी चूत और गांड की सेवा करेगा। क्योंकि कल से फिर दो तीन दिन के लिये अपना मिलन जरा मुश्किल है।

कहकर वो जोर-जोर से मेरी चूत और गांड का बाजा बजाने लगा और साथ ही साथ मेरे चूतड़ पर कसकर तड़ी मारता और जोर-जोर से मेरी चूची को मसलता। दर्द के कारण मेरे मुंह से सीत्कार निकल जाती।

इधर वो दोनों मेरी बात को सुनकर एक दूसरे को कमरे में चलने का इशारा कर रहे थे लेकिन मेरी नजर में ना आ जायें इसलिये वो वहीं रूके रहे। तब तक रितेश मेरी कायदे से बजा चुका था

और चिल्ला रहा था- मैं झड़ने वाला हूँ!

उसको सुनकर मैं तुरन्त ही नीचे बैठ गई और उसके लंड को अपने मुँह में लेकर उसके माल को जैसा कि आप सभी समझ गये होंगे, लेकर मैंने क्या किया होगा। इधर मुझे दौड़ने की आवाज आई और यही दौड़ने की आवाज रितेश ने भी सुनी।
 
इधर मुझे दौड़ने की आवाज आई और यही दौड़ने की आवाज रितेश ने भी सुनी।

वो बोला- आकांक्षा, ऐसा लगा कि कोई दौड़ रहा है।

मैं जानती थी कि दौड़ने वाले कौन है लेकिन मैंने रितेश को टाल दिया, मैं चाहती थी कि आज रितेश भी चुदाई को लाईव देखे, मैं जानती थी कि अगर मैं रितेश को अमित और नमिता की चुदाई देखने के लिये कहूँगी तो हो सकता है वो मना कर दे।

इसलिये मैं बोली- रितेश, आओ छत पर चलें।

रितेश तो पहले पहल नंगा छत पर घूमने से कतराने लगा लेकिन मेरे फोर्स करने पर वो तैयार हो गया। मैं और रितेश एक-दूसरे के कमर में हाथ डाले अपने कमरे से निकल पड़े। रितेश का सारा ध्यान मैंने अपने ऊपर लगा दिया और टहलते हुए नमिता के कमरे के पास पहुँचे तो दोनों की बातों की आवाज आ रही थी। रितेश मुझसे वापस चलने के लिये इशारा कर रहा था जबकि मैंने रितेश को चुपचाप उन दोनों की बातों को सुनने का इशारा किया और नमिता के कमरे की खिड़की के और पास जाकर खड़ी हो गई, उन दोनों की बातें सुनने लगी।

एक बात तो थी रितेश में वो मेरी कोई बात नहीं टालता था, इसलिये वो मेरे पीछे आकर चिपक गया। मैंने जो जगह बनाई थी नमिता के कमरे के अन्दर देखने की, वहां खड़ी हो गई और अन्दर का नजारा करने लगी। अन्दर अमित की गोद में नमिता बैठी हुई थी और अमित की उंगलियाँ उसकी चूचियों पर चल रही थी और साथ में अमित मेरी ही तारीफ कर रहा था।

दोस्तो, यहां से अमित और नमिता की बातचीत सुनिये।

अमित- यार, रितेश सही ही कह रहा था कि भाभी की चूत है बहुत मस्त... चूत ही क्या उनके जिस्म का एक एक अंग बहुत मस्त है।

नमिता थोड़ा चिढ़ते हुए- हाँ हाँ, अब तुम्हें भाभी की चूत अच्छी लगने लगी।

अमित- लो, मैं क्या गलत कह रहा हूँ। उनके होंठ देखो, ऐसा लगता है कि गुलाब की दो पखुंडियाँ। उनके जब मैंने होंठ क्या रसीले आम की तरह है, मन करता है कि चूसता रहूँ।

नमिता- तो जाओ ना, फिर भाभी के होंठ को चूसो, मुझे छोड़ो। आज मैंने भाई का भी लंड देखा है। क्या लंबा मोटा है। इसलिये तो भाभी भाई से खुश है। काश भाई जैसा लंड मुझे भी मिलता!

अमित- मेरा भी लंड तो तेरे भाई जैसा है।

नमिता- तो मेरी चूत कौन सी बीमार है? जो एक बार मेरी चूत देख ले वो मेरी चूत में ही खो जाये।

रितेश पीछे से मेरी पीठ पर लगातार अपने चुम्बन की झड़ी लगाये हुए थे और मेरा हाथ रितेशके लंड को मसल रहा था। नमिता की इतनी बात सुनते ही अमित रास्ते पर आ गया

अमित- लेकिन नमिता तेरी चूची, क्या गोल गोल है बहुत मस्त है।

कहते हुए अमित नमिता की चूची को उसके कपड़े के ऊपर से ही मसल रहा था और उसकी गर्दन, गालों पर अपने चुम्बन की बौछार लगा रहा था।

इधर रितेश का हाथ भी मेरी चूचियों से खेल रहा था।

नमिता की चूचियाँ मसलते मसलते अमित नमिता के ऊपर के कपड़े को उतार दिया और उसकी चूची को मुंह में ले लिया था और अब उसके हाथ नमिता की चूत को सहलाने में व्यस्त थे। इस बार नमिता ने खुद ही अपने नीचे के कपड़े उतार लिये और अपनी चूत को सहलाने में अमित की मदद कर रही थी। फिर अमित ने नमिता को अपने ऊपर से उतारा और कुर्सी पर बैठा कर उसके दोनों पैरों को खोल दिया और अपनी जीभ को उसकी चूत पर लगा कर चाटने लगा।

नमिता उसके बालो को सहलाते हुए बोली- आज भाई ने भाभी को किस तरह उल्टा लटका कर अपना लंड चुसवाया। देख कर मजा आ गया।

नमिता की बात खत्म होती, इससे पहले मेरे पिछवाड़े एक चपत पड़ी, मैंने पल ट कर देखा तो इशारे में उसने नमिता की कही हुई बात का मतलब पूछा। मैंने उसे चुप रहने का एक बार फिर संकेत किया।

तभी अमित ने अपना सर ऊपर उठाया और बोला- यार तुम्हारे भाई और भाभी सेक्स में बिल्कुल परफेक्ट है। एक से एक नई स्टाईल लाते हैं।

कहकर एक बार फिर वो नमिता की चूत को चाटते हुए बोला- अगर तुम कहो तो तुम भी इस तरह मेरे लंड को चूस सकती हो।

'नहीं बाबा!' नमिता बोली- चलो बेड पर... मुझे भी तुम्हारे लंड को मजा देना है।

फिर दोनों उठ कर बिस्तर पर चले गये और 69 की पोजिशन में आकर एक दूसरे का रसास्वादन करने लगे।

थोड़ी देर तक ऐसा करते रहने के बाद नमिता उठी और घोड़ी बन गई और अमित घुटने के बल बैठ कर अपने लंड को नमिता की चूत में सेट कर एक धक्का मारा, गप्प से अमित का लंड नमिता की चूत के अन्दर समा गया और फिर धक्के की आवाज से साथ साथ दोनों की आहें भी सुनाई देने लगी।

तभी मैं बोल पड़ी- अकेले अकेले मजा ले रहे हो?

दोनों चौंक कर हम लोगों की तरफ देख रहे थे, जबकि नमिता इतना शर्मा गई कि वो आँखें फाड़े हमारी ही ओर देख रही थी, उसको अहसास नहीं था कि मेरे साथ रितेश भी खड़ा है। अचानक जैसे उसे याद आया तो चादर खींचकर नमिता ने अपने आपको ढका।

फिर मैं बोल पड़ी- अगर तुम दोनों को ऐतराज न हो तो क्या हम दोनों अन्दर आ सकते हैं?

नमिता और अमित दोनों एक दूसरे को देख रहे थे।

तभी रितेश बोल पड़ा- आकांक्षा, तुम इन लोगों को परेशान मत करो।

रितेश की बात सुनकर दोनों ने एक दूसरे को इशारा किया और फिर

अमित ही बोला- नहीं साले साहब, आओ अन्दर आओ।

कहकर अमित ने दरवाजा खोला।

रितेश भी थोड़ा बहुत शर्मा रहा था। हालाँकि नमिता की जगह कोई और दूसरा होता तो शायद रितेश इतना न शर्माता। मैं रितेश को पीछे से धकेल कर अन्दर ले गई। दोनों भाई बहन की नजर एक दूसरे से नहीं मिल रही थी। हालाँकि नमिता की नजर बार बार अपने भाई के लंड पर ही थी, वो बार बार कोशिश कर रही थी कि उसकी नजर लंड से हट जाये, लेकिन चाह कर भी नमिता की नजर हट नहीं रह थी।
 
तभी अमित ने मेरी तरफ देखा और मैंने अमित को आँख मारी, अमित मेरे इशारे को समझ चुका था, वो मुझे कुछ कह नहीं सकता था।

मैं रितेश को लेते हुए नमिता के पास गई और नमिता के जिस्म पर पड़े हुए चादर को एक झटके से हटाते

हुए बोली- तीन नंगे हैं और तुम चादर ओढ़े हुई हो? वैसे भी कल से दो तीन दिन तक किसी को कुछ मिलने वाला नहीं है। तो आज पूरी रात एन्जॉय करें।

जैसे ही नमिता के ऊपर से चादर हटी उसने अपने दोनों पैरो को सिकोड़ लिया और दोनों हाथों से अपनी चूचियों को ढक लिया। आखिर रितेश था एक मर्द ही, सामने नंगी लड़की देखी तो उसकी भी शर्म चली गई, अमित की तरफ देखते हुए बोला- अमित, तुमने आज तक नमिता को ठीक से देखा नहीं, नहीं तो आकांक्षा की तारीफ नहीं करते।

कहते हुए रितेश नमिता के पास बैठ गया और उसके चेहरे से बालों को हटाते हुए बोला- इसका भी पूरा जिस्म किसी काम देवी से कम नहीं है। अच्छा सा अच्छा मर्द इसके सामने नहीं टिक सकता।

जब रितेश नमिता की तारीफ कर रहा था तो मेरी नजर अमित पर पड़ी, जो थोड़ा बहुत असहज सा लग रहा था।

मैं अमित की तरफ गई और उसके जिस्म से चिपकते हुए बोली- कैसा लगा मेरा सरप्राईज?

अमित बोला- भाभी मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था।

मैं - 'अब बताओ कि मैं कैसी लग रही हूँ?'

अमित थोड़ा सहज होने की कोशिश में उसने अपनी बांहों को मेरी कमर में डाल दिया,

और बोला- हो तो भाभी तुम मादरचोद, लेकिन तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं। तुम इस खेल को बहुत खुल कर खेलती हो। तुम्हारी यही अदा मुझे पसंद है। कहते हुए उसने मेरी गर्दन पर अपने चुम्बन की झड़ी लगा दी, जबकि उसका लंड मेरे गांड में रह रह कर चुभ रहा था।

उधर रितेश अभी भी बड़े ही प्यार से नमिता के गालों को सहला रहा था और नमिता से खुलने का प्रयास कर रहा था। गालों को सहलाते हुए रितेश ने धीरे से नमिता के दोनों कैद चूचियों को उसके बेदर्द हाथों से आजाद कराया और फिर उसकी चूचियों को सहलाने लगा।

अमित की तरफ देखते हुए बोला- तुम सही कह रहे थे, इसकी जैसी चूची तो मेरी आकांक्षा की भी नहीं है।

यह रितेश का स्टाइल था कि कैसे किसी लड़की या औरत की तारीफ की जाती है।

इधर अमित के दोनों हाथों की दो-दो उंगलियाँ मेरे चूचुकों को मसल रही थी।

उधर रितेश नमिता की चूचियों को सहलाते सहलाते उसके टांगों को सीधा कर चुका था और नीचे जमीन पर बैठते हुए रितेश का अंगूठा नमिता की चूत की सैर करने लगा। रितेश अपने अंगूठे से नमिता की चूत से खेल रहा था, वो बार-बार अपने अंगूठे को नमिता की चूत के अन्दर डालता और फिर बाहर निकालता और फिर उसको सहलाता।

इधर अपनी बीवी के साथ ये सब होता देखकर अमित को भी जोश चढ़ गया तो वह भी मेरी चूत की सेवा करने लगा। कमरे में शान्ति थी, लेकिन खेल मस्त चल रहा था। मेरा हाथ अमित के लंड के सुपारे के साथ खेल रहा था।

उधर रितेश कभी नमिता की चूत में अपनी जीभ चलाता तो कभी अंगूठे से उसकी चूत का निरीक्षण करता। नमिता को भी सरूर चढ़ने लगा था, वो अपने हाथ से अपनी चूची मसल रही थी, अपने गले को ऐसे सहला रही थी कि वो बहुत प्यासी हो और पानी पीने की बहुत इच्छा हो.. उसकी कमर अपने आप उठ रही थी, ऐसा लग रहा था कि जब रितेश की उंगली उसकी चूत के मुहाने पर जाती तो वो कमर उचका कर उसकी पूरे अंगूठे को अपनी चूत में लेने की कोशिश करती।

मैं ये सब देख कर मस्त हो रही थी कि मुझे लगा कि मेरे हाथ से लंड छिटक गया है, लगा कि अमित को हाथ मेरी गांड की फांकों को फैला कर उसको चाट रहा था। मैं भी हल्की झुक गई ताकि अमित को मेरी गांड और चूत दोनों छेद का मजा आसानी से और भरपूर मिल सके।
 
उधर नमिता की हालत बहुत ही खराब थी क्योंकि मेरा प्यारा रितेश उसको बड़े प्यार से मजे दे रहा था। अचानक नमिता अपनी चूचियों को बहुत तेजी से मसलने लगी और अपनी कमर को उठाने लगी, फिर वो ढीली पड़ गई। रितेश ने उसकी चूत का पानी निकाल दिया। नमिता की चूत का पानी रितेश के अंगूठे पर था, रितेश ने उस अंगूठे को अपने मुंह के अन्दर लिया और चूसने लगा, फिर नमिता की दोनों टांगों को फैलाते हुए अपना मुंह उसकी चूत पर रख दिया और उसे सूंघने लगा। चूत को सूंघने के बाद रितेश ने एक लम्बी सी सांस छोड़ी,

और बोला- मुझे पता नहीं था कि नमिता की चूत की सुंगध इतनी सेक्सी होगी। मन कर रहा है कि इसकी चूत को मैं चबा जाऊँ, कहते हुए रितेश ने नमिता की चूत को चाटना शुरू कर दिया।

इधर अमित को अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था, वो उठा और अपने लंड को मेरी चूत पर सेट कर दिया और धक्के लगाने लगा। इतनी देर के बाद नमिता की आंखें खुली और वो अमित को मेरी चुदाई करते हुए देखने लगी, उसने रितेश को भी अपनी चूत खुजला कर उसका लंड उसकी चूत के अन्दर डालने के लिये इशारा किया। रितेश इशारा समझ कर बिस्तर पर आ गया और अपने लंड को नमिता की चूत में डालकर धक्के लगाने लगा। अब उस कमरे का नजारा बदल गया था, दोनों औरतें कुतिया की पोजिशन में थी और दोनों मर्द कुत्ते की तरह चोद रहे थे। कभी चूत के अन्दर तो कभी गांड के अन्दर उनका लंड होता। मैंने भी अमित को मेरी गांड चोदने से नहीं रोका। अब हम सब बदल बदल कर चुदने और चुदवाने का मजा ले रहे थे। अन्त में मेरे कहने पर अमित ने मेरे मुंह को अपने रस से भर दिया और रितेश ने नमिता के मुंह को अपने रस से भर दिया। हम दोनों ही उस रस की एक एक बूंद को गटक गई और उसके बाद दोनों मर्दों ने हमारी चूत से बहते हुए पानी को अपनी जुबान से साफ किया। रात दो बजे तक चुदाई का प्रोग्राम चलता रहा और उसके बाद हम सभी नमिता के रूम में सो गये।

सुबह नींद खुलने पर देखा कि अमित और रितेश के लंड बिल्कुल खूंटे की तरह सीधे तने हुए थे, नमिता की एक टांग अमित पर और एक टांग रितेश पर चढ़ी हुई थी, रितेश और अमित दोनों के हाथ नमिता की चूत को सहला रहे थे। मैं उठ कर बैठ गई और सब को जगा दिया। अमित ने मेरी तरफ देखकर आँख मारी। उसके बाद सभी लोग चादर ओढ़ कर बैठ गये।

अमित ही बोला- रात को मजा आ गया! चलो कहीं ऐसा प्रोग्राम बनाते है जहाँ पर हम चारों आसानी से एक दो दिन खुलकर मजा लें। नमिता बोली- लो भाभी, अब इससे ज्यादा क्या खुला चाहिये कि एक बहन अपने भाई से चुद गई और भाई बहनचोद बन गया।

तभी मोबाईल की घण्टी बजी, पता चला कि पापा का बुलावा आया है। सब जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहने और सब नीचे पहुँच गये।

पापा जी ने बताया कि मेहमान एक-दो घण्टे में कभी भी आ सकते हैं और मेरी तरफ देखते हुए बोले- बहू तुम्हें अगर छुट्टी मिल जाये तो ले लो।

पापा जी की बात को रखते हुए मैंने अपने बॉस से बात की, अब बॉस को मुझे छुट्टी देने में कोई ऐतराज नहीं था, बस एक ही शर्त थी कि जब छुट्टी से वापस ऑफिस जाऊँ तो मैं उनकी सेवा कर दूं। मुझे भला क्या ऐतराज हो सकता था। फिर सभी अपने काम में व्यस्त हो गये। रितेश, अमित, सूरज और रोहन अपने अपने गन्तव्य पर चल दिये, घर में मैं, नमिता, सासू मां और ससुर ही रह गये। मेहमानों के स्वागत की तैयारी चल रही थी।

थोड़ी ही देर में काफी लोग आ गये, नाश्ता पानी का दौर चला, उसके बाद सभी मुझसे मिले और कुछ न कुछ गिफ्ट दिया। सभी कुछ तो सामान्य था पर एक लड़की जिसका नाम स्नेहा था वो काफी सेक्सी लग रही थी, मतलब उसके पहनावे से लग रहा था कि वो कपड़े पहनने के लिये नहीं पहनती है, बल्कि दिखाने के लिये ज्यादा पहनती है। पापा जी स्नेहा के ठीक सामने बैठे थे और वो काफी बेचैन लग रहे थे। बार बार उनकी नजर स्नेहा के पैरों की ही तरफ जा रही थी और उनके माथे पर पसीना भी बहने लगा तो थोड़ी देर के बाद वो खुद ही उठ कर चल दिये जबकि स्नेहा बेफिक्री से वहीं बैठी रही। पापाजी के वहाँ से हटने के बाद मैं उस जगह बैठ गई, देखा तो स्नेहा वैसे भी स्कर्ट और टॉप पहने हुए थी और बैठने के कारण उसकी स्कर्ट ऊपर की ओर चढ़ गई थी और उसकी पैन्टी साफ-साफ दिखाई पड़ रही थी। वह 18 या 19 साल की होगी, फिगर कोई 32-30-34 का रहा होगा। स्टाईल तो बहुत ही मार रही थी और वो जानबूझ कर इस तरह से बैठी थी कि उसकी पैन्टी सामने वाले को दिखे।
 
हम लोग सब बातें ही कर रहे थे कि तभी रोहन आ गया, सब को नमस्ते करने के उपरान्त मेरे पास ही खड़ा हो गया। मैं तुरन्त ही उठी और उसको उस जगह बैठा दिया, मैं देखना चाहती थी कि स्नेहा का अगला रिऐक्शन क्या होगा। मेरी सोच के मुताबिक ही हुआ, रोहन के बैठने के कुछ देर बाद ही मैंने नोटिस किया कि स्नेहा ने अपने पैरों को थोड़ा सा और फैला दिया और अपने मोबाईल से सेल्फी लेने लगी। मैंने सोचा कि अपने प्यारा देवर के लिये इंतजाम कर दूँ, दोनों लोग अपनी क्षुधा को शान्त कर लें।

मैंने स्नेहा से कहा- चलो, मैं तुमको पूरा घर दिखा दूं।

वो तुरन्त तैयार हो गई, मैं और स्नेहा दोनों वहां से चल दिये, इशारों ही इशारों में मैंने रोहन को भी बुला लिया। मैं स्नेहा को लेकर अपने कमरे में ले आई और उसके साथ बैठ कर बातें करने लगी। थोड़ी देर बाद रोहन ऊपर आया और

मुझसे कहा- भाभी, आपको नीचे बुलाया है।

मैंने दोनों को वहीं रहकर आपस में बाते करने के लिये कहा और मैं चल दी। मुझे पता था कि रोहन और स्नेहा के बीच जो होगा वो मुझे रोहन खुद ही बतायेगा। काम निपटाते निपटाते कब रात के सोने का समय आ गया, पता ही नहीं चला। मैं, नमिता, सासू माँ के अलावा मेहमान में से एक दो और लोगों ने हम लोगों की मदद की। सबके बिस्तर लग गये थे, सभी लोग सोने भी चले गये थे।

मैं और नमिता सासू मां के कमरे में सोने के लिये आ गये। मैं और नमिता नाईटी पहन कर लेटे ही थे कि रोहन कमरे में आ गया और बोलने लगा कि उसको सोने के लिये कही जगह नहीं मिल रही थी, वो भी उसी कमरे में सोने की जिद करने लगा। चूंकि सास का बेड इतना ही बड़ा था कि उस पर मुश्किल से कोई एक और लेट सकता था। तो नमिता अपनी मां के पास लेट गई और वहीं नीचे जो दो गद्दे मेरे और नमिता के लिये बिछे थे उसमें से एक पर मैं लेट गई और दूसरी पर पर रोहन लेट गया। इस समय उसने लोअर और बन्डी पहना हुआ था और उसके लोअर को देखकर लग रहा था कि वो काफी उत्तेजित है। मैं करवट लेकर सो गई लेकिन कुछ देर बाद मुझे लगा कि कोई मेरे ऊपर लदा हुआ है। थोड़ा मैं चेतन हुई तो समझ में आया कि रोहन का एक पैर मेरे ऊपर था।

यह क्या... मेरी नाईटी मेरी कमर के ऊपर तक थी, इसका मतलब मैं आधी नंगी थी और रोहन अपने लंड को मेरी गांड से रगड़ रहा है और कोशिश कर रहा है कि गांड के अन्दर उसका लंड चला जाये।

मैं इतना जान गई थी कि मेरे लिये लंड का हर समय जुगाड़ है, चाहे घर में कितने ही मेहमान क्यों न आ जायें। मैं आँखें बन्द किये लेटी रही और रोहन का लंड और हाथ दोनों ही मेरी गांड से खेलते रहे। कुछ देर तक तो उसका लंड मेरी गांड में चलता रहा और फिर मुझे मेरी गांड में गीला सा लगा, स्पष्ट था कि रोहन डिस्चार्ज हो चुका था, लेकिन उसकी उंगलियां चलती रही। उसके बाद रोहन का पैर मेरे ऊपर से हट गया और रोहन धीरे से नीचे की तरफ सरकने लगा। रोहन बेफिक्र था कि उसे कोई देख नहीं रहा है इसलिये बेफिक्र होकर वो अपनी जीभ मेरी गांड में चला रहा था। मैं रोहन का लंड तो चूत में नहीं ले सकती थी, लेकिन मजा भरपूर ले सकती थी तो मैं पलट गई और अब मैंने अपनी एक टांग रोहन के ऊपर चढ़ा दी, उसका मुंह ठीक मेरी चूत के सामने था। मैं इतनी देर में उत्तेजित हो चुकी थी तो मैं भी मदहोशी में अपनी कमर हिला हिला कर उससे अपनी चूत चटवा रही थी और यहीं पर रोहन ने मुझे पकड़ लिया वो समझ गया कि मैं जगी हुई हूँ और मजा ले रही हूँ, उसने तुरन्त अपनी दिशा बदल ली और अपने पैर वाला हिस्सा मेरे चेहरे तरफ घुमा लिया। अब उसका लंड मेरे मुंह की तरफ था। उसने अपना हाथ मेरी गांड पर रखते हुए मुझे अपने मुँह की तरफ खींच लिया और अपने लंड को मेरे होंठों से लगाते हुए मेरे मुंहके अन्दर डाल दिया। हम दोनों ही 69 की पोजिशन में थे। थोड़ी देर तक ऐसा ही चलता रहा, मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा था और मुझे रोहन का लंड अपनी चूत में चाहिये था इसलिये मैंने इशारे से उसको अपनी तरफ बुलाया और उसके कान में धीरे से बोली- रोहन, मेरी चूत में खुजली बहुत हो रही है।

रोहन अपने हाथ को मेरी चूत में ले गया और खुजलाने लगा। मुझे उसकी इस प्यारी हरकत पर बहुत अच्छा लगा लेकिन फिर भी मैं बोली इस तरह खुजली नहीं मिटेगी तुम्हारा लंड मेरी चूत में जायेगा तो मिटेगी, जाओ बाहर देखो अगर कोई न हो तो बाथरूम में मेरा इंतजार करो मैं वही पर मिलूँगी। रोहन चुपचाप उठा और बाहर चला गया और वहीं से उसने मुझे इशारा किया। रोहन के पीछे-पीछे मैं भी वहां चली गई और जैसे ही मैं बाथरूम में घुसी, रोहन बाथरूम का दरवाजा बन्द करके मुझसे चिपक गया और तुरन्त ही मेरी नाईटी को उतार कर फेंक दी, नीचे बैठते हुए मेरी चूत की फांकों को फैला कर देखने लगा। मैंने पूछना चाहा तो उसने मुझे इशारे से चुप रहने के लिये कहा और फिर मेरे पीछे आकर मेरी गांड को फैलाकर गांड की छेद में अपनी उंगली डालकर अन्दर बाहर करने लगा, फिर खड़ा होकर मुझसे

बोला- भाभी, मुझे आपको मूतते हुए देखना और हगते हुए देखना है। उस साली मादरचोद स्नेहा से बोला तो बोली ये सब नहीं करूंगी अगर चोदना हो तो चोदो।

मैं रोहन को रोकते हुये बोली- आखिर मुझे मूतते हुए क्यों देखना है?

रोहन- 'मुझे औरत को मूतते हुए देखने में बड़ा मजा आता है।'

मैं- 'चल मुझे तू मूतते हुए देख ले, पर मैं हगूंगी नहीं क्योंकि इस समय टट्टी नहीं आ रही है। कभी मौका लगा तो तुम मुझे हगते हुये भी देख लेना।'

कहकर मैं मूतने बैठ गई और मूतने लगी। रोहन भी ठीक मेरे सामने बैठ गया और मुझे देखने लगा। जब मैं मूत चूकी तो

बोला- भाभी मजा आ गया!

कहते हुए एक बार उसने फिर मेरी चूत में अपनी जीभ लगा दी और चाटने लगा। काफी देर हो रही थी, मुझे डर लग रहा था कि कोई बाथरूम में ना आ जाये,
 
मैंने रोहन से कहा- अब जब कभी मौका मिले तो चाहे जितनी देर तक चाहे मेरी चूत चाट लेना लेकिन अभी अपना लंड मेरी चूत में डालकर मेरी खुजली मिटाओ।

रोहन खड़ा हुआ और मैं झुक गई, रोहन ने मेरे पीछे आकर मेरी चूत में अपना लंड डाला और धीरे-धीरे मेरी चुदाई शुरू कर दी। चुदाई करते करते उसकी स्पीड तेज होती गई और फिर एक समय ऐसा आया कि मैं समझ गई कि वो झड़ने वाला है।

मैं रोहन से बोली- रोहन, अगर तुम झड़ने वाले हो तो मेरे अन्दर मत झड़ना, अपना वीर्य मेरे मुंह में निकालना।

रोहन ने मेरी बात मानते हुए मेरे सामने आ गया, मैंने उसके लंड को अपने मुंह में लिया, दो चार बार उसके लंड को पकड़ कर मैंने हिलाया कि रोहन का वीर्य बाहर आना शुरू हो गया।

मैंने उसके वीर्य रस चाट चाट कर साफ किया और फिर रोहन से मेरी चूत चाट कर साफ करने को कहा। मैंने रोहन से पूछा कि स्नेहा के साथ क्या हुआ तो बोला कल आपको सब बता दूंगा।

उसके बाद मैं बाथरूम से बाहर निकलकर कमरे में आ गई और पीछे पीछे रोहन भी कमरे में आ गया, वो मुझसे काफ़ी दूरी पर लेटकर सो गया और जबकि मुझे पता नहीं कब यह सोचते सोचते नींद आ गई कि अब घर में कौन है जो मुझे चोदेगा क्योंकि रितेश मेरा पति है और उसका पूरा अधिकार मेरी चूत पर था, अमित, सूरज और रोहन ने जिसे जब मौका लगा मुझे चोद दिया। मेरी ससुराल में ही इतने लंड हो चुके थे कि। मुझे अपनी चूत की चिन्ता नहीं थी क्योंकि मुझे अपनी चूत की खुजली मिटाने के लिये मेरी ससुराल में ही कोई भी लंड मिल सकता था। सुबह हुई और फिर सबकी सेवा की तैयारी में लग गई लेकिन जो सेवा मेरी हो रही थी, उसका कोई जवाब नहीं था।

मौका मिलने पर मैंने रितेश को बता दिया कि उसके घर के तीन मर्द निपट चुके हैं।

मुझे गले लगाते हुए रितेश बोला- अब मुझे विश्वास हो गया है कि तुम इस घर को अच्छे से संभाल लोगी, अगर किसी ने कुछ इधर से उधर करने की कोशिश की तो वो तुम्हारी चूत के आगे हार मान लेगा।

एक बार फिर नमिता, मैंने और मेहमानों में 2-3 लोगों ने मिल कर नाश्ता वगैरह तैयार किया, सबने नाश्ता किया। रोहन आज घर पर ही था, बाकी सब अपने-अपने काम पर जा चुके थे। रितेश के ऑफिस जाने से पहले मैंने उससे कहा- छुट्टी की पूरी-पूरी कोशिश करना क्योंकि कम्पनी मुझे ट्रेन में केबिन दे रही है, अगर तुम होंगे तो केबिन में भी मजा लेंगे।

रितेश बोला- जान, मैं पूरी कोशिश करूँगा कि मेरी सेक्सी बीवी के साथ ट्रेन की केबिन में चुदाई का मजा लूँ।

उसने मुझे चूमा। (हाँ, जब से हम दोनों की शादी हुई थी तो ऑफिस जाने से पहले हम दोनों चुदाई का खेल जरूर खेलते थे।)

सभी मेहमान एक जगह बैठ कर हंसी मजाक कर रहे थे लेकिन मुझे रोहन और स्नेहा कही नहीं दिखाई पड़ रहे थे, मेरी नजर उनको ढूंढ रही थी। मैं उन दोनों को देखने ऊपर चली आई तो मेरे कानों में रोहन की आवाज पड़ी- चल, मैं तेरे साथ कुछ नहीं करूंगा।

स्नेहा बोली- क्यूं? कल तो तूने मेरे साथ अच्छे से मजा लिया आज क्यों मना कर रहा है? चल एक बार मुझसे खेल! शाम तक चली जाऊंगी।

रोहन बोला- तो मैं क्या करूँ? तू मेरी बात नहीं मानती... तुमसे तो अच्छी मेरी भाभी है, कल मैंने उससे बोला कि मुझे उसको मूतते हुए देखना है तो वो तुरन्त मेरे सामने पेशाब करने लगी।

स्नेहा- तेरी भाभी ने तुझे मूत कर दिखाया?

स्नेहा सोच की मुद्रा में थी। फिर स्नेहा अपने हाथ को रोहन के लंड के ऊपर फेरते हुए बोली- मतलब तेरी भाभी तुझसे चुदवाती भी है?

रोहन ने जवाब दिया- कल रात पहली बार भाभी ने मुझसे चूत चुदवाई थी।

फिर स्नेहा पर झल्लाते हुए बोला- मूत के दिखाती है या मैं जाऊँ?

स्नेहा बोली- ठीक है बाबा, मैं भी तुझको मूत कर दिखाऊंगी तब तो मेरे साथ मजा करेगा?
 
रोहन बोला- हाँ, अगर तू मुझे मूत कर दिखायेगी तो मैं तुझे मजा दूंगा।

स्नेहा - 'तो ठीक है!'

कहकर स्नेहा छत पर चारों ओर देखने लगी, मैं तब तक अपने कमरे में आ चुकी थी और एक ओट लेकर खड़ी होकर उन दोनों की हरकतों पर नजर भी रख रही थी और उनकी बातों को भी सुन पा रही थी क्योंकि वो दोनों मेरे कमरे से थोड़ी ही दूरी पर ही खड़े होकर बात कर रहे थे। फिर अचानक स्नेहा को कुछ याद आया और

रोहन से बोली- तुम बिल्कुल बकलौल के लौड़े ही हो! सीढ़ी का दरवाजा खुला है, कोई आ गया तो दोनों की गांड खूब कुट जायेगी।

स्नेहा की बात सुनने के बाद राहुल झट से सीढ़ी के पास गया और उसने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। यह तो अच्छा था कि मैं मौका देखकर अपने कमरे में घुस गई थी।

रोहन दरवाजा बन्द करने के बाद स्नेहा के पास आया, स्नेहा ने अपनी पैन्टी उतारी और मूतने के लिये बैठने ही वाली थी कि रोहन ने उसे रोका।

स्नेहा बोली- अब क्या हो गया, तू इतनी नाटक क्यो पेल रहा है?

रोहन बोला- 'कुछ नहीं!' कल तूने अपनी मर्जी से मुझसे मजा लिया था और आज मैं जो कहूंगा वो तू करेगी!

स्नेहा- 'ठीक है, बोल बाबा!' स्नेहा थोड़ा झुंझलाने लगी थी।

रोहन- 'चल अन्दर तो आ!' कहते हुए रोहन ने स्नेहा का हाथ पकड़ा और कमरे के अन्दर आ गया।

मुझे तुरन्त ही अपने को छुपाना पड़ा पर्दे के पीछे... मैं छुप कर दोनों पर नजर रख रही थी।

अन्दर आते ही रोहन ने अपने कपड़े उतारे और स्नेहा के भी उसने कपड़े उतार दिए।

रोहन- 'चल नीचे बैठ और अपना मुंह खोल...' रोहन ने स्नेहा से कहा।

स्नेहा रोहन के कहे अनुसार नीचे बैठ गई और अपना मुंह खोल दिया। रोहन ने अपना लंड को उसके मुंह के पास ले गया और... जो रोहन ने हरकत की उससे मेरी आंखें खुली रह गई! रोहन ने अपने पेशाब की धार स्नेहा के मुंह में छोड़ दी।

स्नेहा- 'मादरचोद... यह क्या कर रहा है?' स्नेहा थोड़ा जोर से बोली, मेरे मुंह में पेशाब क्यों कर रहा है?

थोड़ा सा मुंह बनाते हुये बोली- अभी भोसड़ी के मुझे मूतता हुआ देखना चाहता था और अब लौड़े की मेरे मुंह में ही मूत रहा है।

जितनी गन्दी गाली एक लड़का बकता है उससे कहीं ज्यादा गंदी-गंदी गाली स्नेहा के मुंह से निकल रही थी। रोहन को पता नहीं क्या हुआ कि एक तमाचा खींचकर स्नेहा के गाल पर दिया और

रोहन बोला- बहन की लौड़ी, चुदवाने तू मेरे पास आई थी, मैं नहीं गया था तेरे पास... और मादरचोद इतनी शरीफ बन रही थी तो बुर चोदी अपनी बुर मेरे लंड पर कल क्यों रखी थी।
 
मैं समझ गई कि रोहन एक साईको है और कल रात जो मुझसे गलती हुई है वो मुझे आगे भारी पड़ने वाली है। जितनी गाली स्नेहा के मुंह में निकली थी, उससे कही ज्यादा रोहन के मुंह से निकल रही थी। स्नेहा की आँखों में आँसू आ गए थे, स्नेहा के आंसू देखकर रोहन को अपने गलती का अहसास हुआ और

उसने स्नेहा के गालों को चूमते हुए कहा- मेरी जान... मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे मुंह में मूतो और मैं तुम्हारे मुंह में मूतूँ!

स्नेहा चुदासी ज्यादा थी, शायद मार खाने के बाद भी उसने रोहन का कोई विरोध नहीं किया। रोहन नीचे बैठकर अपने मुंह को खोलते हुए

बोला- चलो, तुम पहले मूत लो।

रोहन उसकी चूत को सहालते हुए

बोला- चलो मूतो ना।

दो तीन बार ऐसा कहने के बाद एक हल्की सी धार स्नेहा के चूत से निकली और रोहन के होंठ को गीला कर गई। रोहन अपनी जीभ होंठों पर फिराते हुए

बोला- तेरी गांड मारू जान, तेरी मूत का स्वाद तो बहुत ही प्यारा है, चल और धार गिरा! स्नेहा की गांड, चूतड़ों को पकड़कर अपनी ओर खींचता हुआ

बोला- शाबास! चल शुरू हो जा।

रोहन स्नेहा के पुट्ठे को भींचता हुआ और उसके हौसले बढ़ाता हुआ बोल चल शर्म नहीं कर!

वह उसकी बुर में अपनी जीभ चलाते हुए उसका हौसला बढ़ा रहा था। स्नेहा ने अपने थप्पड़ को भूलते हुए एक बार फिर धीरे धीरे धार छोड़ी, इस बार वो रुक रुक कर रोहन के मुंह में मूत रही थी, स्नेहा रोहन को मूत को गटकने का पूरा मौका दे रही थी। रोहन भी उसके मूत को गटक रहा था। जब स्नेहा पेशाब कर चुकी तो रोहन ने उसको पीछे की तरफ घुमा दिया। स्नेहा की गांड अब मेरी आँखों के सामने थी, दोनों पुट्ठों को पकड़ कर रोहन ने फैलाया और फिर एक धार अपने मुंह से स्नेहा की गांड के ऊपर छोड़ी। मतलब रोहन ने मूत को थोड़ा सा अपने मुंह में भर लिया था। फिर रोहन उसकी गांड को चाटने लगा। स्नेहा जो कुछ देर पहले गुस्से में थी अब उसके मुख से आओह... आह... ओह... की आवाज आ रही थी। गांड चाटने के बाद रोहन खड़ा हो गया, स्नेहा समझ चुकी थी कि अब उसे भी वही सब करना है। वो चुपचाप नीचे बैठ गई और अपने मुंह को खोल दिया। इस बार रोहन धीरे-धीरे और बड़े ही प्यार के साथ स्नेहा को अपनी मूत पिला रहा था। स्नेहा ने भी रोहन के साथ वही किया, उसने भी रोहन के गांड में कुल्ला किया और उसकी गांड चाटने लगी। रोहन का लंड देखने से मुझे ज्यादा खुशी हो रही थी कि ससुराल में सबके लंड काफी बड़े थे।

स्नेहा एक कुतिया के माफिक झुक गई और रोहन उसकी चुदाई कर रहा था। मेरा कमरा दोनों की उत्तेजनात्मक आवाज से गूंज रहा था।

दोनों की चुदाई की मधुर आवाजें मेरे कानों में गूंज रही थी। काफी देर से स्नेहा कुतिया वाले पोजिशन में खड़ी थी, रोहन कभी उसकी चूत को चोदता तो कभी उसकी गांड मारता। स्नेहा पहले से खूब खेली खाई हुई थी। कुछ देर तक इसी तरह चलता रहा,

तब रोहन बोला- मेरी जान, मेरा माल निकलने वाला है।

स्नेहा बोली- अन्दर मत निकाल, पहले मेरे मुंह को भी चोद... और वहीं अपना माल निकालना!

कहते हुए स्नेहा वापस घुटने के बल बैठ गई और रोहन ने उसके मुंह में अपना लंड पेल दिया, उसका लंड स्नेहा के हलक के अन्दर तक जा रहा था, स्नेहा के मुंह से खों खों की आवाज आ रही थी। चार-पांच धक्के के बाद रोहन ने अपना पूरा माल स्नेहा के मुंह में छोड़ दिया, वीर्य पीने के बाद स्नेहा ने रोहन के लंड को भी चाट कर साफ किया और उसके बाद रोहन स्नेहा की चूत को चाटने लगा। दोनों की चुदाई देखकर मेरी भी चूत में आग लग गई थी और मैं बहुत ही देर से अपनी चूत में उंगली कर रही थी, जिसके परिणामस्वरूप मैं भी झड़ चुकी थी और मेरी उंगली गीली हो चुकी थी। मैंने अब छिपना उचित नहीं समझा और पर्दे के पीछे से निकल आई। दोनों मेरी तरफ आंखें फाड़ फाड़ देख रहे थे।

मैंने स्नेहा को अनदेखा करते हुए रोहन से कहा- तुम दोनों की चुदाई देख कर मैंने भी पानी छोड़ दिया! कहते हुए मैंने उसको अपनी उंगली दिखाई जिसमें मेरी चूत का रस लगा हुआ था। रोहन ने तुरन्त ही मेरी उंगली पकड़ी और उसे चाटने लगा।

तभी मैंने रोहन से कहा- तुम दोनों मिल कर मेरी चूत से निकलते हुए रस को चाटकर साफ करो!

कहते हुए मैंने अपनी नाईटी को ऊपर उठाया और अब स्नेहा और रोहन दोनों ही बारी-बारी से मेरी चूत चाट कर साफ कर रहे थे। चूत चटाई होने के बाद

रोहन बोला- भाभी अब तुम भी हो तो चलो दोनों की एक बार और चुदाई कर देता हूं।

मैं- 'ठीक है, चोद लो... लेकिन पहले मैं नीचे देख आऊँ कि किसी का ध्यान हम तीनों पर है या नहीं... फिर मैं आती हूँ और तुम्हारे लंड का पानी मैं और स्नेहा मिलकर निकालेंगी।
 
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