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Erotica मुझे लगी लगन लंड की

हुआ यूं कि मुझे अपने हेड ऑफिस एक रिपोर्ट मेल करनी थी, रिपोर्ट मैं तैयार कर चुकी थी और बस मेल करने जा ही रही थी कि सिस्टम अपने आप ही ऑफ हो गया।

मुझे लगा कि मेरी गलती के कारण ही कम्प्यूटर बन्द हो गया होगा, मैंने एक बार स्टार्ट किया, लेकिन कम्प्यूटर बार-बार ऑन करने के बाद भी ऑन नहीं हो रहा था। मैं चाह रही थी कि किसी तरह वो रिपोर्ट फाईल ही मिल जाये तो मैं किसी और कम्प्यूटर पर जाकर मेल कर दूंगी, पर मेरा पूरा प्रयास व्यर्थ हो रहा था। हार कर मैंने राकेश को फोन लगाया तो पता चला कि वो लीव पर है और नहीं आ सकता है। रिपोर्ट इतनी जरूरी थी कि उस पर कम्पनी का करोड़ों दांव पर लगा था और एक चूक का मतलब था कि करोड़ों का नुकसान! मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से बॉस को कोई बात सुननी पड़े... भले ही मेरी चूत के कारण, बॉस हमेशा मेरा सपोर्ट करता था।

मेरे बहुत कहने पर राकेश आने को तैयार हो गया था, लेकिन साले मादरचोद ने बदले मेरी चूत चोदने की डिमांड कर दी। वैसे तो किसी का लंड मेरी चूत में जाये, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था, बस थोड़ा राकेश से चिढ़ सी थी तो मैं उसे उतना भाव नहीं देती थी। पर वो दिन उसका था, नहीं चाहते हुए भी मैंने हां कर दी। ऑफिस बन्द होने का समय भी हो रहा था, राकेश ऑफिस आ चुका था,

कम्प्यूटर चेक करने के बाद बोला- बिना फार्मेट हुए नहीं चल सकता।

मुझे अगले 10 मिनट में मेल करनी थी, तो एक बार फिर

मैंने राकेश से बोला- किसी तरह मेल करा दो, फिर फार्मेट करना!

वो बोला 'ठीक है!' - मैं मेल तो करा दे रहा हूँ लेकिन जब मैं सिस्टम फार्मेट करूं तो तुम मेरे साथ रहोगी।

मेरे हां बोलने में उसने 2-3 मिनट में सिस्टम को ऑन करके रिपोर्ट निकाल ली और फिर उस रिपोर्ट को मेल भी कर दिया।

मेल करने के बाद वो मुझसे बोला- देखो मैंने तुम्हारा काम कर दिया, अब तुम्हारी बारी है।

मैं- 'मैं तैयार हूँ, बोलो कहां?'

राकेश- 'यहीं ऑफिस में... मैं तुम्हारे कम्प्यूटर को सही करूंगा और तुम मेरे!'

मैं- 'लेकिन अभी तो काफी लोग हैं।'

राकेश बोला- पांच मिनट के बाद ऑफिस खाली हो जायेगा, बॉस से कह कर तुम रूक जाना!

राकेश ने मुझे बताया कि मुझे बॉस से क्या कहना है। मैं और राकेश दोनों ही बॉस के सामने थे और जैसा राकेश ने मुझसे कहने को कहा, वैसा मैंने बॉस से कह दिया। बॉस ने चपरासी दीपक जो 60 वर्ष का था को बुला कर रूकने के लिये बोला, बेचारा बॉस के सामने कुछ भी न बोल पाया, पर हम दोनों के पास आकर अपनी परेशानी बताई

और बोला- जब भी आपका काम खत्म हो जाये तो मुझे कॉल कर देना, मैं तुरन्त आकर ऑफिस बन्द कर दूँगा।

मेरे बोलने से पहले ही राकेश बोल उठा- हाँ हाँ जाओ, पर समय पर आ जाना।

थोड़ी देर बाद पूरा ऑफिस खाली हो गया था, सबके जाने के बाद दीपक भी चला गया। सब के जाते ही राकेश ने मुझे पीछे से जकड़ लिया और मेरी गर्दन को चूमने लगा, मेरे कान को दांतों से काटने लगा और मेरी चूची को जोर जोर से दबाने लगा।

मैं उसकी गिरफ्त से निकलते हुये बोली- सिस्टम को रिपेयर भी करते चलो और जो भी तुमको मेरे साथ करना है वो करो, ज्यादा समय नहीं है, घर भी जाना है।

राकेश अपने कपड़े को उतारता हुआ बोला- चलो, तुम भी अपने कपड़े उतारो, अब ऑफिस में कोई नहीं है।

सेक्स करते हुए जब तक तक कि जिस्म पूरा नंगा न हो, मुझे मजा नहीं आता है। इसलिये राकेश के कहने पर मैंने भी अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए।

राकेश देखने में ही पतला दुबला था लेकिन उसका लटका हुआ लंड भी बड़ा तगड़ा लग रहा था।
 
कपड़े उतारते हुए राकेश बोला- बेबी, आज जब तुम मेरा लंड अपनी चूत में लोगी तो तुम सभी लंड को भूल जाओगी!

कह कर एक सीडी निकाली, कम्प्यूटर पर लगा दी और कम्प्यूटर को इन्स्टॉलेशन पर कर दिया और मुझको अपने जिस्म में चिपकाते हुए मेरी पीठ और हिप पर हाथ फिराने लगा। मैंने भी राकेश को कस कर पकड़ लिया। वो मेरे दरार में भी अपनी उंगली को रगड़ता। राकेश के इस तरह करते रहने से मेरी जीभ स्वतः ही उसके निप्पल को चूसने लगी। जैसे ही मेरी जीभ ने राकेश को अपना कमाल दिखाना शुरू किया, वैसे ही राकेश के हाथ भी मेरे चूतड़ों को सहलाता, मेरी गांड में उंगली करता और मेरी छाती को कस कर मसलता था। मेरा हाथ और मुंह उसके निप्पल पर ही थे, मैं उसके दानों को दांतों से काट रही थी, वो हल्के से सिसकारी लेता और उतनी ही तेजी से मेरे जिस्म के जिस हिस्से में उसके हाथ होते वो कस कर मसल देता। मेरे और राकेश के बीच में जंग चल रही थी, मेरे हाथ उसके लंड को भी पकड़े हुए थे और अगर मेरे हाथों में उसके गोले आ जाते तो मैं उसको भी मसलने से नहीं चूकती और राकेश भी कुछ इसी तरह से मेरे साथ बदला लेता, वो मेरे चूत के अन्दर अपनी उंगली बड़ी ही बेदर्दी के साथ डालता और मेरे पुत्तियों को मसल देता और मेरी क्लिट को भी बुरी तरह नोचता।

सीत्कारें दोनों ही तरफ से हो रही थी और शायद इसमें हम दोनों को ही मजा आ रहा था। फिर राकेश मेरे होंठों को चूसने लगा और मेरी जीभ को अपने मुंह के अन्दर लेकर चूस रहा था। जब तक इन्स्टॉलेशन का पहला पार्ट चल रहा था, तब तक हम दोनों यही करते रहे, फिर राकेश ने सिस्टम को आगे की कमाण्ड देकर मेरी कमर को पकड़ कर वही खाली पड़ी हुई दूसरी कम्प्यूटर टेबल पर बैठा दिया और मेरी टांगों को फैला कर मेरी चूत को चूम लिया और फिर धीरे-धीरे सहलाने लगा। उसके बाद अपने उंगलियों पर खूब सारा थूक लिया, उसको मेरी चूत पर मल दिया और फिर चूत की दोनों फांकों को फैला कर अपनी जीभ चलाने लगा। जिस तरह से राकेश पिछले पंद्रह मिनट से मुझे मजा दे रहा था, उससे मैं झड़ने के काफी करीब आ गई थी और

सिसकारते हुए बोली- राकेश, मैं झड़ने वाली हूँ।

लेकिन राकेश ने शायद मेरी बात अनसुनी कर दी और जोर जोर से अपनी जीभ को मेरी चूत में चलाना चालू रखा। आखिरकार मैं अपने को रोक नहीं सकी और मेरा पानी छूटने लगा लेकिन राकेश को इसकी भी परवाह नहीं थी। वो मेरी चूत उसी तरह चाटता रहा और जब उसने मेरे निकलते हुए पानी की एक एक बूंद को चाट लिया तो वो खड़ा हो गया और मुझे उसी टेबल पर लेटा दिया और हल्के से मुझे अपनी तरफ खींच लिया, मेरी पीठ ही टेबल पर थी, बाकी का हिस्सा हवा में ही लटका हुआ था, राकेश ने अपने लंड को मेरी चूत में एक झटके से पेल दिया। राकेश का लंड वास्तव में तगड़ा और लम्बा था। भला हो जो मेरी चूत रोज रोज किसी न किसी का लंड जाता था, तो राकेश के तगड़े लंड का असर मुझे न हुआ। राकेश मेरी चूत को पेलता रहा और मैं कल्पना करने लगी कि राकेश अनचुदी लड़की का क्या करता होगा, निश्चित रूप से जो लड़की उससे पहली बार चुदती होगी, वो पक्का उसकी फाड़ कर रख देता होगा।

राकेश के धक्के समय के साथ-साथ और तेज होते गये और जितनी तेज उसके धक्के होते गये उतने ही तेज उसके और मेरे मुंह से 'उम्म्ह... अहह... हय... याह...' की आवाज आती जा रही थी।

तभी राकेश बोला- आकांक्षा मैं झड़ने वाला हूँ, अपना माल कहाँ निकालूँ? तुम्हारी चूत के अन्दर या फिर तू मेरे माल का स्वाद चखेगी?

राकेश के साथ चुदाई की शुरूआत से पहले तक मैं उसे पसन्द नहीं करती थी और न ही अपने पास फटकने देती थी, हाँ आज जिस तरह से उसने मुझे मजा दिया, मैं सब कुछ भुला बैठी और उठकर उसके लंड को अपने हाथ में लिया और बड़े प्यार से सहलाने लगी। अगर उस समय स्केल होती तो मैं जरूर नापती, लेकिन मुझे फिर भी लग रहा था कि कम से कम नौ इंच का तो होगा ही। मैंने उसके सुपारे पर अपनी जीभ रखी। पहले तो मुझे मेरे ही पानी का स्वाद मिला और फिर दो चार बार जीभ फेरने से उसके लंड ने फव्वारा छोड़ दिया, मेरा पूरा मुंह उसके वीर्य से भर गया था, कुछ बूंद मेरे चेहरे पर थी और कुछ मेरी दोनों चूचियों के ऊपर पेट पर और जमीन पर गिरी थी। उसके लंड से एक-एक बूंद निकल चुकी थी लेकिन लंड उतना ही टाईट था और एक बार और मेरी चूत की अच्छे से चुदाई कर सकता था। इधर सिस्टम भी फार्मेट हो चुका था और जरूरी सॉफ्टवेयर भी लोड हो चुका था। मैं अपने कपड़े पहनने लगी तो राकेश ने फिर मुझे पीछे से पकड़ लिया और एक राउन्ड के लिये और बोला लेकिन मुझे देर हो रही थी, सो उससे नेक्स्ट टाईम के लिये बोला तो वो भी मेरी बात को मान गया,

बस इतना ही बोला- आकांक्षा, तुम्हारी जैसी गांड आज तक मुझे देखने को नहीं मिली, बस पाँच मिनट रूको तो मैं तुम्हारी गांड को अपनी जीभ से थोड़ा सा गीला कर दूं!

उसकी बात सुनकर मेरी गांड में झुरझुरी सी होने लगी थी, मैं उसकी बात काट नहीं पाई, मैंने अपने ज़ींस को एक बार फिर जमीन पर गिरा दिया और उसी कम्प्यूटर टेबल पर अपने हाथों को टिका दिया।
 
राकेश मेरे दोनों उभारों को पकड़ कर भींचने लगा और फिर थोड़ा सा फैलाते हुए अपनी जीभ छेद पर लगा दी और फिर बाकी का काम उसकी जीभ कर रही थी। थोड़ी देर तक गांड चाटने के बाद राकेश उठा, चपरासी दीपक को फोन किया। दीपक के आने तक हम दोनों ही अपने कपड़े पहन चुके थे। दीपक ने ऑफिस को बन्द किया और मैं और राकेश ने अपने-अपने रास्ते को पकड़ लिया। राकेश से साथ हुई चुदाई को सोच कर कब मुझे नींद आ गई ट्रेन में, पता ही नहीं चला जब ट्रेन हावड़ा पहुँच गई तो ससुर जी ने मुझे जगाया। मैं खुद को फ्रेश महसूस कर रही थी लेकिन वो नई पैंटी जो अभय सर ने मुझे दी थी, गीली हो चुकी थी।

हम दोनों ट्रेन से उतरकर सर के बताये हुए होटल में पहुँचे। होटल का मैनेजर बाकी की फार्मेल्टी निभाते निभाते लगातार मुझे ही घूरे जा रहा था। उसके बाद मैं और पापा जी अपने कमरे में आ गये।

रात के लगभग 12 बज रहे थे और मुझे एक बार फिर हरारत लग रही थी लेकिन पापा जी परेशान न हो इसलिये मैंने उनसे कुछ नहीं बताया और हल्का-फुल्का खाकर जब लेटने की बारी आई तो उस सुईट कमरे में कहाँ सोया जाये, मैं यही सोच रही थी।

मेरी परेशानी को समझते हुए बाबूजी बोले- तुम परेशान न हो, मैं सोफे पर सो जाता हूँ, तुम बेड पर सो जाओ। अगर तुम चाहो तो अपने कपड़े चेंज कर सकती हो।

इतना कहते हुए पापाजी ने अपनी लुंगी निकाल कर पहन ली और सोफे पर सोने चले गये।

मैंने भी गाऊन निकाल कर पहना और बेड पर आकर लेट गई। एक तो पहले से ही हरारत और दूसरा A.C. चलने के कारण मुझे ठंड भी लगने लगी, मैंने अपने आपको सिमटा लिया। बुखार धीरे धीरे बढ़ने लगा था और मैं बुखार से काम्पने लगी, उम्म्ह... अहह... हय... याह... मेरी आँखों से पानी भी बह रहा था। वैसे भी लेटते लेटते एक बज गया था।

मुझे कराहते हुए देखकर पापाजी मेरे पास आये, मेरे माथे के छुआ और फिर रिसेप्शन पर फोन लगाया, फिर मेरे पास आकर बैठ गये। उनके कहे हुए शब्द मेरे कान में नहीं पड़ रहे थे। फिर मुझे लगा कि मेरे माथे पर गीली पट्टी रखी जा रही है। मेरा जिस्म लगातार तप रहा था। फिर मेरे साथ क्या हुआ, मुझे पता ही नहीं चला।
 
सुबह जब मेरी नींद खुली और मैं थोड़ा उठकर बैठने के काबिल हुई तभी मुझे अहसास हुआ कि मेरे जिस्म पर कोई कपड़ा नहीं है और मेरे चूतड़ के नीचे एक पन्नी है जो गीली है। तभी मेरी नजर बाथरूम में गई, बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और पापाजी पेशाब कर रहे थे।

मैं अपनी नजर वहाँ से हटाने की लाख कोशिश कर रही थी, लेकिन पापाजी के लंड के कारण हट नहीं रही थी। पापाजी लुंगी को कमर के ऊपर तक चढ़ा कर पेशाब कर रहे थे, इसलिये उनके लम्बे लंड को मैं साफ-साफ देख पा रही थी, शायद राकेश और रितेश या अभी तक जितने मर्दो ने मुझे चोदा था, उन सबसे लम्बा उनका लंड लग रहा था और पापाजी के चूतड़, गोल आकार के, उठे हुए... न चाहते हुए भी मैं आँख चुराकर देखने की कोशिश कर रही थी। पेशाब करने के बाद पापाजी अन्दर ही कुछ धुले हुए कपड़े फैला रहे थे। फिर वो बाहर निकलने लगे, तो मैंने अपने ऊपर पड़ी हुई रजाई को ऊपर तक कर लिया, ताकि पापाजी को न पता चले कि मैं नंगी हूँ।

पापाजी मेरे पास आकर बैठ गये और मेरे माथे को छूकर देखने लगे और,

फिर सन्तुष्ट होते हुए बोले- चलो अब बुखार उतर गया, लेकिन तुम तैयार हो लो, फिर डॉक्टर के पास चल कर दवा लेते हैं।

कहकर चुप हो गये और अपने दोनों हाथों को आपस में मलने लगे और कुछ चिन्तित से दिखाई पड़ रहे थे। मुझे लगा कि वो कुछ बोलना चाह रहे हैं इसलिये मैं उनसे उनकी चिन्ता का कारण जब पूछने लगी,

तो वो बोले- बेटा, चिन्ता तो कुछ नहीं है, लेकिन एक अफसोस है और इसलिये मैं परेशान हूँ।

मैं- 'अफसोस?' मैंने पूछा,

तो बोले- हाँ, अफसोस! और मैं तुमसे माफी भी मांगता हूँ।

मैं- 'माफी!?' अब मैं चिन्तित होने लगी थी।

तभी पापाजी ने कहना शुरू किया- रात में तुम्हें बहुत तेज बुखार था, मैंने दवाई के लिये रिसेप्शन पर कॉल किया।

(यह बात जो पापा जी मुझे बता रहे थे, शायद ये सब मेरी आँखों के सामने हो रहा था, पर उसके बाद जो पापा जी ने बोला, वो बोलते गये और मेरे होश उड़ते गये।)

पापा जी कह रहे थे और मैं सर को नीचे किये हुए सुन रही थी।

पापा जी पूरी बात बताने लगे:

जब रिशेप्शन से कोई हेल्प नहीं मिली तो मैं मग में पानी लेकर गीली पट्टी तुम्हारे माथे पर रख रहा था, लेकिन बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था कि तभी मुझे कुछ गीला सा लगा। क्योंकि मैं तुम्हारे पैर के पास ही बैठा हुआ था, तो मुझे लगा कि पानी गिर गया होगा, लेकिन मग तो मेरे हाथ में था।,मैंने तुम्हारी रजाई को उठाया तो देखा कि तुम्हारी पेशाब निकल रही है और तब तक तुम काफी कर भी चुकी थी। अब मेरे सामने समस्या यह थी कि तुम्हारे बुखार के वजह से मैं तुम्हें गीला नहीं रख सकता था और न ही मैं तुम्हारे कपड़े उतार सकता था, तो करूँ तो मैं क्या करूँ... होटल में कोई ऐसी लेडी स्टॉफ नहीं थी कि उससे मैं इस समस्या को कह सकूं।

अब इस समस्या से निपटने के लिये मुझे ही कुछ करना था, इस विश्वास के साथ कि तुम मेरी बात को सुननेके बाद बुरा नहीं मानोगी, मैंने तुम्हारी पैन्टी उतार कर उसी से तुम्हारी योनि अच्छे से साफ की और फिर पन्नी वाली थैली को दूसरे जगह बिछाकर वहां तुम्हें लेटाने के लिये जैसे तुम्हें उठाया तो पाया कि तुम्हारा गाउन भी गीला है। मैंने तुरन्त ही A.C. बन्द किया और फिर तुम्हारे गाउन को उतार कर तुम्हे सूखी जगह पर लेटा दिया और तुम्हारे गीले कपड़े को बाथरूम में डाल दिया, जिसको अभी मैं धोकर फैला कर आ रहा हूँ।

शर्म के मारे मेरी नजर जमीन पर गड़ी जा रही थी, अभी मेरे कानों को और भी कुछ सुनना था।

पापा जी फिर बोले:

देखो आकांक्षा, मेरी नियत पर शक मत करना, अगर मजबूरी न होती तो मैं यह कभी भी नहीं करता। उसके बाद भी मैं तुम्हारे माथे पर पट्टी रख रहा था, लेकिन बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।

तभी मुझे याद आया कि तुम्हारी मम्मी के साथ मैं सम्भोग करना चाह रहा था, वैसे भी तुम्हारी मम्मी मुझे कभी भी मना नहीं करती थी, लेकिन उस दिन जैसे ही मैंने उसके बदन को टच किया तो उसको भी बुखार था, मेरे पूछने पर उसने बताया कि दवा तो ली थी पर बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। मैंने दुबारा दवा देनी चाही तो उसने बताया कि उसने कुछ देर ही पहले दवा ली है। मेरी इच्छा तो बहुत हो रही थी कि मैं उसके साथ सम्भोग करूँ, लेकिन उसके बुखार को देखकर मैंने अपनी इच्छा त्याग दी और अपने हाथ से ही अपने लिंग से खेलने लगा तो तुम्हारी मम्मी बोली कि उसके होते हुये मुझे अपने हाथ से काम चलाना पड़े, उसे अच्छा नहीं लगेगा, तुम्हारी मम्मी ने मुझे सम्भोग कर लेने के लिए कहा।

लेकिन मैंने तुम्हारी सास को सान्त्वना देते हुए कहा 'देखो, तुम्हें बुखार है और मैं तुम्हारे साथ नहीं कर सकता! हो सकता है कि तुम्हें और तेज बुखार हो जाये। चलो, मैं सो जाता हूँ और तुम भी सो जाओ' कहकर मैंने करवट बदल ली।

लेकिन मेरी आँखों से नींद गायब हो चुकी थी और रह रह कर मैं करवट बदल रहा था। यह बात मेरी बीवी समझ रही थी,

उसने मुझसे एक बार फिर कहा 'देखो मैं जानती हूँ कि इस समय तुम्हें जो चाहिये, नहीं मिल रहा है और मैं नहीं चाहती कि तुम रात भर करवट बदलो, तो आ जाओ और सवारी कर लो ताकि तुम सो सको, कल तुम मुझे डॉक्टर को दिखा देना।'

अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था तो मैंने उसके पेटीकोट को उठाया और उसकी पैन्टी को उतार कर अपने लिंग को उसकी योनि में डाल दिया। हालाँकि उस रात के पहले जब भी मैं उसके साथ सेक्स करता था तो काफी मजे लेकर करता था और वो भी मुझे खूब मजे देती थी लेकिन उस रात केवल लिंग को उसकी योनि में प्रवेश करा कर धक्का मारने लगा और फिर मेरा जो भी माल था उसी की योनि में गिरा दिया और उसको चिपका कर सो गया।

सुबह जब हम दोनों सोकर उठे तो देखा कि तुम्हारी सास का बुखार उतर चुका था और वो पहले की तरह फुर्ती से अपने काम निपटा रही थी। उसके बाद अब जब भी तुम्हारी सास को बुखार होता तो इसी तरह हम दोनों सम्भोग करते। इसलिये जैसे ही यह वाकया मुझे याद आया तो मैंने तुम्हारी ब्रा भी उतार दी और अपने भी कपड़े उतारकर तुम्हें अपने से चिपका लिया और फिर तुम्हारी योनि में अपने लिंग को प्रवेश करा दिया और फिर अपने वीर्य को तुम्हारे योनि के अन्दर ही डाल दिया और फिर तुम्हें अपने से चिपकाकर मैं सो गया।

ये अन्तिम वाक्य पापाजी के मुंह से सुनकर मेरा मुंह खुला रह गया 'जो नहीं होना चाहिये था, इस बुखार की वजह से हो चुका था।' मैं अपने ही ससुर से चुद चुकी थी। मेरे आँखों में आंसू आ रहे थे।
 
मेरे आंसू पौंछते हुए पापा बोले- देखो, मैं तुमसे पहले ही माफी मांग चुका हूँ। चूँकि मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था, तो मैंने किया। चलो अब जो हुआ वो हो चुका है, उठ कर तैयार हो जाओ, तुम्हें डॉक्टर को दिखा देता हूँ और फिर मैं कोई दूसरे होटल में शिफ्ट हो जाता हूँ, जब तुम्हारा काम खत्म हो जाये तो फिर हम लोग वापस अपने घर चले जायेंगे।

कहकर वो उठने लगे।

मुझे उनकी बात समझ में आ चुकी थी, क्योंकि मुझे बुखार बहुत तेज था और मैं बेहोश थी। कोई हेल्प न मिलने के कारण उन्होंने मेरे साथ सम्भोग किया,

मैंने उनका हाथ पकड़ा और बोली- पापा जी, आज से आप मेरे दोस्त भी हो, जो आदमी उस समय हेल्प करे जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो तो उससे अच्छा तो कोई दोस्त हो ही नहीं सकता।

पापाजी ने मेरे सर पर हाथ फेरा और सोफे पर बैठ कर अखबार पढ़ने लगे।

अब मैं सोचने लगी, भले ही बेहोशी में ही सही, पापाजी का इतना लम्बा और मोटा लंड मेरी चूत की सैर कर चुका है।

तभी मुझे पॉटी महसूस हुई, मैंने रजाई को अपने सीने से चिपकाये रखा और उठने की कोशिश करने लगी। लेकिन इस समय कमजोरी बहुत लग रही थी, मैं वापस बेड पर गिर गई। पापा जी तुरन्त मेरे पास आये और बार बार मुझसे पूछने लगे। मुझे पता था कि वो समझ चुके है कि मुझे क्या समस्या है लेकिन फिर भी पापा मुझसे पूछे जा रहे थे।

तभी पापा ने कहा- देखो, अभी तुमने मुझे अपना दोस्त कहा है और अब तुम ही अपने दोस्त को नहीं बता रही हो?

उनके इतना कहते ही मैं उनकी तरफ देखकर बोली- पापा जी, पॉटी बहुत तेज आ रही है और कमजोरी के कारण मैं चल नहीं पा रही हूँ।

मुझे नंगी ही बिना किसी हिचक के उन्होंने अपनी गोदी में उठा लिया और बोले चलो- मैं तुम्हें लिये चलता हूँ, ऐसा न हो रात की तरह तुम बिस्तर पर ही पॉटी भी कर दो।

पापा ने मुझे ले जाकर पॉटी सीट पर बैठा दिया।

पॉटी करके जब मैं उठने लगी तो मेरे ससुर जी ने वहीं पास पड़ी हुई कुर्सी को बाथरूम के अन्दर रख दिया और फिर मुझे सहारा देकर उस पर बैठा दिया ताकि मैं ब्रश कर सकूं। उन्होंने मेरे ऊपर चादर डाल दी। जितनी देर तक मैं ब्रश करती रही, उतनी ही देर में ससुर जी ने एक बाल्टी को गर्म पानी से भर दिया। मुझे बहुत दुख हो रहा था कि मैं इस अवस्था में हूँ और मेरे ससुर जी को मेरी सेवा करनी पड़ रही थी। वो मेरे ऊपर इतना ध्यान रख रहे थे कि मैं उसको बता नहीं सकती थी। उसके बाद ससुर जी ने गर्म पानी में तौलिया भिगो कर मेरे जिस्म को अच्छी तरह से साफ किया और बाहर लाकर मुझे पैन्टी, ब्रा पहनाने लगे। और फिर मेरी जो सबसे अच्छी ड्रेस (सलवार-सूट) उनके हिसाब से थी, वो पहना दी और बाकी सजने संवरने का सामान मुझे दे दिया। उसके बाद नाश्ता करके ससुर जी मुझे लेकर जो होटल के आस-पास डॉक्टर था, ले कर गये। डॉक्टर ने मुझे दो-तीन दिन आराम करने के लिये कहा।

चेक अप करवाने के बाद में वापस आई। मैं बड़ी चिन्तित थी, जिस काम के लिये कोलकाता आई थी, वो ही पूरा नहीं होगा और मुझे एक जगह बैठ कर टाईम बिताना अच्छा भी नहीं लग रहा था। फिर भी ससुर जी के कहने पर मैंने अभय सर को फोन किया और सारी स्थिति बता दी, लेकिन दूसरे दिन से ऑफिस जाने की बात भी कही। मेरे ससुर मेरी तरफ देख रहे थे।

जैसे ही मैंने फोन काटा, वो बोले पड़े- बेटा, जब डॉक्टर ने तुम्हें दो-तीन दिन का आराम करने को कहा है तो आराम करो। चलो आज शाम को वापस चलते हैं। जब तुम ठीक हो जाओगी, तो रितेश के साथ चली आना।

ससुर जी की बात मेरे कानो में गूंज रही थी, लेकिन मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था। अब ससुर जी के सामने मैं बेपर्दा हो चुकी थी और वो मेरे जिस्म के एक एक अंग को नंगा देख चुके थे, मैंने अपने ट्रिप को सही करने का सोचा।

तभी उन्होंने झकझोरा, बोले- क्या हुआ बेटी, क्या सोचने लगी?

मैं अचकचा कर बोली- कुछ नहीं पापा जी!

इन सब बातो में इतना पता तो मुझे चल गया था कि पापा जी के मन में मेरे प्रति कुछ भी गलत नहीं था, बस कल रात जो कुछ भी हुआ वो मेरी बिगड़ती तबीयत की वजह से हुआ और शायद इसीलिये वो इतना मुझे तवज्जो नहीं दे रहे थे। फिर भी मेरे दिमाग में कीड़ा चलने लगा।

वो एक बार फिर बोले- तो ठीक है, चलो मैं पैकिंग किये देता हूँ और शाम की कोई गाड़ी पकड़ लेंगे और टीटीई को कुछ ले देकर सीट का जुगाड़ बैठा लूंगा।

कहकर वो उठे और सामान उठाने लगे।

तभी मैं उनसे बोली- नहीं पापा जी, मेरी तबियत इतनी ठीक नहीं है कि मैं ट्रेवेल कर पाऊँ... आज रात रूकते हैं, अगर कल मैं ठीक नहीं हुई और घर चलने के काबिल रही तो हम कल चलेंगे।

कहकर मैं चुप हो गई और टी॰वी॰ देखने लगी। मैं बड़ी देर तक यही करती रही और सोच रही थी कि किसी तरह से पापा जी पहल करें तो कुछ बात बने। लेकिन पूरे दो घंटे बीत गये थे और पाप जी पेपर पढ़ने के बाद वही सोफे पर लेट गये, लेकिन अपनी तरफ से कुछ नहीं बोले।
 
मैं परेशान थी और मेरी चूत में खुजली हो रही थी, मैं पापा जी का लंड एक बार और देखना चाह रही थी। मैंने ही बेशर्म बन कर पापा जी को आवाज लगाई और बेड पर मेरे पास आकर लेटने को बोली। वो बार-बार न करते रहे लेकिन अन्त में हार कर बेड पर आ गये। पापा जी के लेटते ही मैं उनकी तरफ करवट करके लेट गई और उनको एकटक देखने लगी, मेरा इस तरह से लगातार घूरते जाना वो बर्दाश्त नहीं कर पाये और,

पापाजी बोले- क्या हुआ, कुछ चाहिये क्या?

मैंने सिर हां में हिलाया,

तो पापाजी बोले- बताओ

मैंने तुरन्त ही उनसे वादा लिया कि मेरी किसी बात का वो बुरा नहीं मानेगे?

जब वो बोले कि 'ठीक है, पूछो, मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानूंगा!'

तो मैंने तुरन्त ही उनके हाथ को अपने हाथ में लिया और बोली- पापा जी आपने मुझे जो सुबह कहानी सुनाई थी क्या वो सच थी?

पापा जी बोले- हाँ, बिल्कुल सोलह आने सच है। एक बार जब उनको बुखार था तो मेरा मन उनके साथ करने का था पर तेरी सास ने पहली बार मना किया लेकिन जब उन्होंने देखा कि मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूँ तो उन्होंने मुझे सम्भोग करने की इजाजत दे दी, उसके बाद मैंने उनके साथ सम्भोग किया और दूसरे दिन उनका बुखार उतरा हुआ था। कल रात यही विचार करके मैंने तुम्हारे साथ सम्भोग किया था। कहकर पापाजी चुप हो गये।

मैंने फिर पूछ लिया- पापाजी, मम्मी जी के अलावा और कोई था आपकी लाईफ में?

तुरन्त ही पापा बोले- न...ना... कोई भी नहीं, तुम्हारी मम्मी है ही इतनी खूबसूरत कि मुझे किसी दूसरे की जरूरत ही नहीं पड़ी। हां अब अगर कोई दूसरा है तो वो तुम हो जिसके साथ मैंने कल रात सम्भोग किया था, लेकिन वो भी मजबूरी में।

मैं- 'कोई बात नहीं पापा जी, लेकिन एक बात बताइए, जब आप मम्मी जी के साथ सम्भोग करते हैं तो सम्भोग को आप और मम्मी जी दोनों ही महसूस करते होंगे?' (धीरे धीरे मैं खुल रही थी) तभी आप दोनों को मजा भी आता होगा?

पापाजी- 'हां, हम दोनों ही सम्भोग को खुलकर महसूस करते थे और मजा लेते थे।'

उनकी बात खत्म होने से पहले ही मैं बोल उठी- लेकिन पापा जी, मैंने कल रात के सम्भोग को तो महसूस ही नहीं किया, इसका मतलब आपको भी सम्भोग का मजा तो नहीं आया होगा?

पापा जी मेरी बात सुनकर चौंके, बोले- क्या?

मैंने तुरन्त ही उनके हाथ को पकड़ा और अपने छाती पर रखते हुए बोली- पापा जी, मैं महसूस करना चाहती हूँ।

पापा जी ने झटके से अपना हाथ हटाया और बोले- नहीं, कल बात अलग थी जो मुझे करना पड़ा और अब मैं जानबूझ कर वो नहीं कर सकता, जो मुझे करना शोभा नहीं देता।

पापा जी मेरे काबू में नहीं आ रहे थे, उनकी जगह कोई और होता, तो शायद अब तक मैं दो बार तो कम से कम चुद चुकी होती। लेकिन पापा जी तो मुझे रात को चोद चुके हैं, मुझे पूरी नंगी देख चुके हैं, यहाँ तक कि मुझे नहालते समय मेरे जिस्म के एक-एक अंग को छुए हैं।

मैंने एक बार फिर उनका हाथ पकड़ा, इस बार वो अपने हाथ को बड़ी ताकत के साथ अपनी तरफ खींचे हुए थे।

मैंने फिर कहा- ठीक है पापाजी, रात को तो आप को मजबूरी थी, लेकिन आपने तो मुझे पूरी नंगी भी देखा है और मेरे नंगे बदन को छुआ भी है तो अब आप मेरे साथ सम्भोग क्यों नहीं करना चाहते?
 
पापाजी एक बार मुझे समझाते हुए उठ कर बैठ गये और बोले- जिस समय मैंने तुम्हारे बदन को छुआ, उस समय भी तुम खुद से उठने के काबिल नहीं थी, इसलिये मुझे यह सब करना पड़ा। लेकिन अब तुम इस समय होश में हो और वो माँग रही हो जो मैं पूरी नहीं कर सकता।

कहकर वो वापिस सोफे पर बैठ गये।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि पापाजी वास्तव मैं मेरे साथ करना नहीं चाह रहे या फिर दिखावा कर रहे हैं क्योंकि मेरा मन नहीं मान रहा था कि वो मुझे चोदना नहीं चाह रहे हो। और अगर मुझे चोदने की उनके मन में इच्छा नहीं थी तो फिर वो बाथरूम का दरवाजा खुला छोड़कर क्यों मूत रहे थे, जबकि जब भी मेरी नींद खुलती, मेरी नजर सीधी वही जाती और यह बात पापा जी भी जानते थे। अगर मैं मतलब निकालती हूँ तो वो जानबूझ कर दरवाजा खुला रखकर मूत रहे थे ताकि मेरी नजर उनके लम्बे लंड पर पड़े। दूसरी बात जब वो मेरे जिस्म को पोंछ रहे थे तो भी मेरे उन अंगों को अच्छे से रगड़ रहे थे जहां से मैं उत्तेजित हो सकती थी। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण कि वो दुबारा मेरे कहने पर जबकि मैंने ज्यादा जोर भी नहीं दिया था, फिर भी अपने और सास के बीच हुए सम्भोग की कहानी बताने लगे। यही सोच कर मैंने अबकी जो मेरी नजर में सबसे सटीक था, वही दांव चला, मैं एक बार फिर बिस्तर से उठी और लड़खड़ा कर गिर पड़ी जानबूझ कर...

पापा जी तुरन्त ही हड़बड़ा कर फिर उठकर आये और मुझे सँभालते हुए

पापाजी कहने लगे- तुम्हें कमजोरी बहुत है आज मुझे बता दो, मैं तुम्हारा सब काम कर दूंगा।

मैं धीरे से बोली- पापा जी, बहुत जोर से पॉटी आई थी, इसलिये मैं॰॰॰

मेरी बात को समझते हुए बोले- तो तुम मुझे बता दो न, मैं तुम्हें लेकर चलता हूँ

मैं- लेकिन मेरे हाथ पैर भी शून्य पड़े हैं, मैं कपड़े कैसे उतारूंगी?

मेरी इतनी बात सुनी कि मुझे एक बार फिर बेड पर बैठाया और पहले मेरी सलवार का नाड़ा खोल कर सलवार को मेरे जिस्म से अलग किया। इस समय मैं उनकी एक एक हरकत पर ध्यान दे रही थी, सलवार उतराते समय उन्होंने कुछ खास नहीं किया लेकिन जब मेरी पैन्टी उतारने लगे तो वो मेरे चूतड़ को पैन्टी उतराने के साथ-साथ सहलाते जा रहे थे। फिर पापा ने मुझे गोदी में उठाया और ले जाकर मुझे सीट पर बैठा दिया, जितनी देर मैं वहां बैठी रही उतनी देर तक वो मुझे पकड़े खड़े रहे। मैंने जानबूझ कर वाशिंग पाईप उठाया और छोड़ दिया। मेरे हाथ से वाशिंग पाईप गिरते ही

पापाजी बोल उठे- बेटा, जब तुम्हें बहुत कमजोरी है तो तुम मुझसे बोलो, मैं साफ किये देता हूँ।

कहते हुए पापाजी ने मुझे थोड़ा सा अपनी तरफ खींचा और वाशिंग पाईप मेरे पीछे लाये और गांड धुलाने लगे, लेकिन इस बार वो छेद के अन्दर तक उंगली डाल रहे थे।

मतलब साफ-साफ था कि मजा चाहिये, लेकिन अच्छे बनने की कोशिश कर रहे थे।

मैं भी इस मामले में कम नहीं थी, जब दो-तीन बार उन्होंने मेरी गांड धोने के साथ-साथ मेरी चूत को भी सहलाने की कोशिश की तो मैंने पेशाब की धार छोड़ना शुरू कर दिया। पर पापाजी कुछ बोल नहीं रहे थे और लगातार अपने हाथ से मेरी चूत सहला रहे थे। जब मेरा पेशाब निकलना बंद हो गया तो पापा जी ने पानी बंद किया और सिस्टर्न चला कर मुझे गोदी में उठा लिया और बेड पर बैठा दिया।

बस अब मैंने अपना आखिरी दांव चला, पापाजी ने जब मुझे बेड पर बैठाया तो मैं तुरन्त ही बिस्तर पर लेट गई और अपने पैरों को सिकोड़ते हुए बिस्तर पर ही रख लिया और अपनी चिकनी चूत जो सूरज ने कल शाम को ही थी, पापा को खुले रूप से दर्शन कराने लगी। इस बात पर पापाजी बोल्ड हो गये और मेरी टांगों को फैलाकर मेरी चूत को चूमते हुए,

पापाजी बोले- तुम मानोगी नहीं! मैंने अपने ऊपर बहुत संयम रखने की कोशिश की पर तुमने अन्त में मेरा ईमान डिगा दिया!

और मेरी चूत को सूंघने लगे,

फिर बोले- बहुत ही बढ़िया खुशबू आ रही है तुम्हारी योनि से।

मैंने अपना हाथ बढ़ाया और पापा जी के सर को पकड़ते हुए बोली- पापाजी, यह आपकी ही योनि है और यह आपकी योनि कब से आपका ही इंताजार कर रही है। यह कह रही है आओ और मुझसे खेलो।

पापाजी- 'हां बेटा, अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है और अब मैं न तो खुद तड़पूंगा और न ही इस प्यारी योनि को तड़पाऊँगा।'

कह कर वो अपने जिस्म से कपड़े अलग करने लगे। अब उनके जिस्म में चड्डी के अतिरिक्त कुछ नहीं था। उनकी भरी भरी बांहें, चौड़ी छाती, गठीला नंगा बदन... सब मैं खुल कर देख रही थी। फिर वो नीचे बैठ गये और मेरे कुर्ते को पेट से ऊपर करके मेरे पेट को सहलाने के साथ साथ मेरी चूत से खेलने लगे, बड़े ही प्यार से बिना किसी जल्दी के अपनी जीभ से मेरी पुतिया को इस तरह से चूसते जैसे कोई आम की चुसाई कर रहा हो, उनकी पूरी कोशिश होती कि मेरी पुतिया भी उनके मुंह के अन्दर चली जाये। पापाजी चूत की फांक को चाटने के साथ-साथ जीभ को चूत के अन्दर तक पेल रहे थे और साथ ही मेरे पेट को सहलाते जाते और फिर मेरे दोनों गोलों को बड़े ही प्यार से और धीरे-धीरे दबा रहे थे। मैं बहुत मस्त हो चुकी थी, उम्म्ह... अहह... हय... याह... मैं भी अपनी कमर को उठा उठा कर अपनी चूत को पापाजी के जीभ के और पास ले जा रही थी जिससे उनकी जीभ और अन्दर चली जाये। मैं बार-बार अपनी कमर उठाती और पापा जी उसी तरह रिसपॉन्स करते। मेरी चूत उनकी थूक से काफी गीली हो चुकी थी, मैं झरने के करीब आ चुकी थी और इसलिये मैं अपनी चूत उनके मुंह से कस कस कर रगड़ रही थी।

सहसा मेरे मुंह से निकला- पापाजी, आपकी इस रंडी बहू की योनि से पानी निकलने वाला है!

पापाजी- 'निकलने दे बहू... निकलने दे! मेरी बहू तड़पे मुझे पसंद नहीं है, निकाल अपना पानी।'

मेरी चूत के अन्दर अजीब सी खुजली मची हुई थी, मैं अपनी खुजली को मिटाने के लिये पापाजी के मुंह से चूत को रगड़े जा रही थी कि तभी मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। पापाजी का मुंह अभी भी मेरी चूत से लगा हुआ था, वो उसी तरह से चूत को चाटे जा रहे थे। फिर पापाजी ने जब अपना काम पूरा कर लिया तो वो मेरे बगल में आकर लेटे,

और पापाजी बोले- वास्तव में आज तुमने पिछले 10 वर्षों की प्यास फिर जगा दी! बहुत मजा आया!

कहते हुए मेरे होंठों को चूसने लगे और मेरी चूत को सहलाने लगे। फिर मेरे होंठ चूसते हुए अपनी उंगली को मेरी चूत में डालकर चलाते हुए,

पापाजी फिर बोले- तुम्हारा रस मुझे बहुत अच्छा लगा, मेरा मन कर रहा है कि तुम्हारी योनि के पास से अपना मुंह न हटाऊं और जो भी रस तुम्हारी योनि से निकले, उसे मैं पीता रहूँ।

अब उन्होंने चूत से उंगली निकाली और अपने मुंह में डालकर लॉलीपॉप की तरह चूसने लगे। फिर मुझे अपने ऊपर खींचकर अपने ऊपर कर लिया,

और पापाजी मुझसे बोले- योनि का स्वाद तो दे दिया, अब अपने स्तन (चूची) का भी मजा दे दो।

पापा जी का इतना बोलना था कि मैं थोड़ा और ऊपर हो गई और उनके मुंह पर अपनी चूची को लगा दिया, पापा जी बारी बारी से मेरी चूची को पीते रहे और मेरे चूतड़ों को दबाते रहे। फिर मेरी गांड के अन्दर उंगली करने लगे। जितनी देर मेरे चूची को पीते रहे उतनी ही देर तक वो मेरी गांड में उंगली करते रहे, फिर उंगली निकालकर सूंघते हुये

पापाजी बोले- बेटी, तुम्हारी गुदा के अन्दर की महक भी बहुत मस्त है।

कहकर एक बार फिर उस उंगली को चूसने लगे। मेरे चूत की खुजली बढ़ती जा रही थी,

हार कर मैं ही बोली- पापा जी, आपका लिंग मुझे मेरी योनि में चाहिये ताकि मैं आपको महसूस कर सकूं।

मेरी बात सुनते ही पापाजी बोले- बिल्कुल, लेकिन मेरे लिंग को गीला कर दो, ताकि तुम्हारी योनि में आसानी से जा सके।
 
मैं तुरन्त ही उनके ऊपर से उतरी और उनकी तरफ अपना पिछवाड़ा करके जैसे ही उनके लंड को अपने मुंह में लेने लगी,

मेरे मुंह से निकला- हाय दय्या!!

पापाजी तुरन्त बोले- क्या हुआ बेटी?

मैं- 'कुछ नहीं पापाजी, आपका कितना बड़ा है। ऐसा लगता है जैसे गधे का लंड!' मैं एक सांस में पूरी बात बोल गई और मेरे मुंह से लिंग की जगह लंड निकल गया।

लेकिन पापा जी ने तुरन्त मेरी बात को पकड़ लिया और बोले- एक बार फिर बोलो जो अभी तुमने बोला है?

मैं अपनी बात को थोड़ा बदलते हुए बोली- आपका लिंग इतना बड़ा है ऐसा लगता है कि गधे का लिंग।

पापाजी- 'नही नहीं... यह नहीं, जो तुमने बोला है, वो बोलो!'

पापाजी की बात सुनकर मैं समझ गई कि उनको मेरे मुंह से लंड शब्द सुनना है,

मैंने कहा- जैसे गधे का लंड!

पापाजी तुरन्त मेरे चूतड़ पर एक चपत लगाते हुए बोले- लेकिन तुम्हें कैसे मालूम कि मेरा लंड गधे जैसा है?

उनकी बात का जवाब देती हुई मैं बोली- रीतेश ही बोलता था कि उसका लंड गधे के लंड के जैसा है। लेकिन आपका तो उससे भी बड़ा है।

तभी मोबाईल बजने लगा।

जब तक मैं फोन को पिक करती, तब तक पापा ने फोन उठा लिया, फोन रितेश का था। पापा ने तुरन्त ही मोबाईल को स्पीकर मोड पर कर दिया, पापा के हैलो बोलते ही रितेश हॉल चाल पूछने लगा, पापा ने कल रात मुझे हुए फीवर के बारे में बता दिया।

जैसे ही मेरे फीवर के बारे में रितेश को पता चला, वो चिन्तित हो गया और मुझे फोन देने के लिये कहा।

पापा ने मुझे फोन पकड़ा दिया और मेरे पीठ को अपनी बांहों का घेरा बना कर मुझे अपने से चिपका दिया।

रितेश मेरा हाल चाल लेने लगा, फिर बोला- अगर पापा तुम्हारे पास हों तो थोड़ा उनसे दूर होकर बात करो।

मैं उठकर जाने लगी तो पापा ने मोबाईल को कस कर अपने हाथों में जकड़ लिया

और मेरे कान में बोले- यहीं मेरे पास रहकर बात कर लो, मैं भी सुनना चाहता हूँ कि मेरा बेटा मेरी इस प्यारी बहू को कितना प्यार करता है।

मुझे कोई तकलीफ नहीं थी, मैं पापाजी की बांहों में ही रहकर रितेश से बात करने लगी।

जैसे ही रितेश को यह विश्वास हो गया कि वो केवल मुझसे बात कर रहा है

तो बोला- यार, मेरे लंड की मेरी चूत रानी, तेरी चूत का क्या हाल चाल है?

मैं भी बिंदास बोली- कुछ खास नहीं यार, बस तेरे लौड़े की याद आ रही है तो उसका पानी टप टप कर रहा है।

रितेश- 'किसी से चुदवाने की इच्छा हो तो वही ऑफिस में देख... कोई जवान मर्द मिल जायेगा।'

जब रितेश ने यह बात बोली तो मैं थोड़ा शर्मा गई, पापा जी भी मेरी तरफ देख रहे थे, मैंने बात को खत्म करने के लिये बाद में बात करने की कही और फोन काट दिया।

पापाजी बोले- मतलब तुम लोग??

फिर पापा जी को मैंने पूरी कहानी बताई।

कहानी सुनने के बाद,

पापाजी बोले- यार, मुझे पता नहीं था कि मेरा बेटा और बहू बहुत ही एडवांस हैं, अगर मुझे मालूम होता तो मैं शराफत की चादर ट्रेन में ही छोड़ देता और फिर हम दोनों खूब मजे करते हुए यहां तक आते।

मैं बोली- चलिये पापा जी, अभी भी आप खूब मजे ले सकते हैं।

पापाजी मुझसे वापस रितेश को फोन लगाने के लिये बोले और रितेश को कहने के लिये बोले कि 'लंड का तो इंतजाम है लेकिन तुम्हारे बाप का है! देखो क्या कहता है?'

मैंने फोन लगाया तो जैसा पापा जी ने रितेश को बोलने के लिये बोला, वैसा ही मैंने रितेश को कहा।

मेरी बात को सुनने के बाद रितेश बोला- यार लंड तो लंड होता है। अगर तेरी चूत को इस समय मेरे बाप के लंड से शांति मिल सकती है तो उन्हीं से चुदवा लो, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

बात सुनने के बाद मैं बोल पड़ी- यार भोंसड़ी के, तेरा बाप है और तुम कह रहे हो कि मैं उनसे चुदवा लूं?

रितेश मुझे समझाते हुए बोला- यार तुम और मैं, जैसा भी मौका मिला, लंड और चूत से खेल चुके हैं। तो अब क्या शर्माना, वैसे भी हमारी बात जब तक हम किसी को न बताये तो कैसे पता चलेगा।
 
फिर उसके बाद रितेश जो बोला, सुन कर मैं भी अचम्भित हो गई और पापा जी माथा पकड़ कर बैठ गये।

रितेश बोला- मैं अगर तुमसे बोल रहा हूँ कि तुम मेरे बाप से चुदवा लो तो इसका मतलब मैं भी तुम्हारी किसी प्यारी चीज की चूत पर हाथ साफ कर रहा हूँ।

मैं समझी कि सुनिधि होगी। पर जब वो बोला कि तुम मेरे बाप से चुदवा और मैं तेरी मां को चोद रहा हूँ तो मेरा माथा ठनका और मेरे ससुर जी माथा पकड़ कर बैठ गये।

मैं कुछ न तो कह सकती थी और न ही कर सकती थी।

अगर वो मेरी माँ को चोद रहा है तो इसका मतलब मेरी माँ की रजामंद होगी।

और मैं खुद उसके बाप से चुदने को तैयार थी।

मैं पापा जी की बांहो में थी और पापाजी मेरी चूची को सहलाते जा रहे थे, फिर

एकाएक पापाजी बोले- मेरे ही घर में कामदेव और कामदेवी है और मैं मजे के लिये तरसता रहा।

फिर बोले- कोई बात नहीं, वहाँ तुम्हारी मां चुद रही है तो तुम यहाँ मुझसे चुद कर मजा लो। अब तो मैं खुल कर तुमको चोदूंगा और तुम्हारे साथ मजा करूंगा।

मेरा दिमाग उड़ चुका था, मैं अहसास नहीं कर पा रही थी कि मैं क्या करूँ, वैसे भी मेरी मां 40 से थोड़ी ही ज्यादा की थी और उसका भी जिस्म भरा हुआ था।

तभी झकझोरते हुए पापा जी बोले- क्या सोचने लगी?

मैं- 'कुछ नहीं!

पापाजी- 'अरे आकांक्षा, तुम दोनों एक दूसरे के साथ कितनी सच्चाई से रहते हो। कम से कम किसी बात का पछतावा तो नहीं है।' कहते हुए मेरी गर्दन चूमने लगे।

लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था, मैं पापा से बोली,

तो वो बोले- कोई बात नहीं, जब तुम्हारी इच्छा तब हम मजे करेंगे।

फिर वो मुझे मेरा कपड़ा पहनाकर अपने कपड़े को पहन लिये।

कपड़े पहनने के बाद पापा बोले- तुम शायद इस समय अकेले रहना चाहती हो, तो मैं तब तक बाहर घूम आता हूँ।

मैंने भी हां में सर को हिला दिया।

पापाजी के बाहर जाते ही मैं लेट गई और दिमाग थका होने के कारण मुझे नींद भी आ गई। करीब दो घंटे के बाद पापाजी वापस आये, उनके हाथ में एक बहुत ही बड़ा से केरी बैग था, कमरे में आकर मुझे जगाया। जब मैं जागी तो मैं अपने आप को काफी फ्रेश महसूस कर रही थी। पापाजी ने वही मेरे सामने अपने सब कपड़े उतारे और केवल लुंगी को पहन लिया। इस समय भी पापा जी का मुरझाया हुआ लंड काफी बड़ा लग रहा था।

मैं पेशाब करने के लिये बाथरूम की तरफ चल दी, मैं अपनी सलवार का नाड़ा खोल ही रही थी कि पापा जी भी अन्दर आ गये और अपनी लुंगी हटा के लंड को हाथ में लिये और मूतने लगे। जैसे ही मैं अपनी सलवार को उतार कर खड़ी हुई, पापा जी ने अपने लंड को मेरे हाथ में पकड़ा दिया। अचानक लंड हाथ में आने से मेरा हाथ गीला हो गया।

जब पापाजी मूत चुके तो उन्होंने मेरी पैन्टी उतारी और मुझे पीछे से पकड़ कर इस तरह से उठा लिया जैसे किसी छोटे बच्चे को मूतने या पॉटी कराने के लिये माँ उठाती हो और जब तक मैं पूरी तरह से मूत न ली मुझे पापाजी इसी तरह से पकड़े रहे। फिर मुझे गोदी में ही उठा कर बेड तक लाये और बैठा दिया और केरी बैग से खाने का कुछ सामान और दो बियर की केन निकाल कर मेरे सामने रख दी। धीरे धीरे मैं एक बार फिर अपने पूरे रंगत में आ चुकी थी और भूल चुकी थी कि रितेश और मेरी मां साथ साथ हैं। मैंने पापा द्वारा लाई हुई स्नेक्स खाना शुरू किया। पापा ने बियर की केन खोलते हुए एक खुद ली और एक मुझे दी। जानबूझ कर मैंने थोड़ी न नुकुर की लेकिन पापा जी के कहने पर ले ली।

पापा जी वही पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गये और मुझे अपनी गोदी में बैठा लिया, मैं अर्द्धनग्न ही पापा की गोदी में बैठ गई। अब हम दोनों ससुर बहू साथ साथ स्नेक्स खाने और बीयर पीने का मजा ले रहे थे। पापा बीच बीच में मेरी चूची को दबा देते। अब मुझे मेरे जिस्म पर पड़ा हुआ कपड़ा भारी लगने लगा। मैं चाह रही थी कि मैं पूरी नंगी ही पापा जी के गोदी में बैठ जाऊँ और वो मुझे रौंदने लगे लेकिन पापाजी का हौले हौले मेरे जिस्म को सहलाना भी मुझे बहुत मस्त कर रहा था और मैं मस्ती में कामलोक पहुंच चुकी थी। पापाजी कभी मेरी पीठ सहलाते तो कभी मेरी कांख को सहलाते तो कभी मेरी जांघ में हाथ फेरते, कभी मेरी नाभि के अन्दर भी उंगली कर देते थे। उंगली क्या करते थे जैसे किसी परत को खरोंच कर निकाला जाता है उसी तरह पापाजी भी मेरी नाभि के अन्दर खरोंच रहे थे। बियर पीने और पापा जी का हाथ जो मेरे जिस्म पर चल रहा था, उससे मुझे और खुमारी बढ़ती जा रही थी। सच कहूँ मेरी चूत की आग बढ़ती जा रही थी उम्म्ह... अहह... हय... याह... और मैं चाह रही थी कि पापा जी मुझे पटक दें और मुझे चोदना शुरू कर दें।
 
तभी पापा जी अपने बियर के कन्टेनर को एक किनारे रखते हुए और अपने दोनों हाथों को मेरे कुरते के अन्दर डाल कर बोबे दबाने लगे और मेरी गर्दन को चूमते हुए बोले- आकांक्षा!

मैं मदहोशी के आलम में बोली- हूँ?

तो पापा जी बोले- यह बताओ तुमने अभी तक कितने मर्दों से अपनी चूत और गांड चुदवाई है?

मैं उनके इस प्रश्न को सुनकर चुप हो गई, लेकिन पापा जी बताने के लिये फोर्स किये ही जा रहे थे। उनके बार- बार पूछने से मैंने बस इतना ही बताया कि पता नहीं मेरी चूत गांड का कितने मर्दों ने मजा लिया होगा।

पापाजी- 'थोड़ा खुल कर बताओ?'

बस पापाजी का इतना बोलना था कि मैं घूमी और पापाजी के लंड को अपनी चूत के अन्दर ले लिया और

उनकी आँखों में आँखें डाल कर बोली- मैं सच कह रही हूँ कि कितने मर्दों के लंड से मेरी चूत चुद चुकी है या कितने मर्दों ने मेरी गांड का बाजा बजाया है, मुझे अब सच में कुछ याद नहीं है। हाँ, जो भी मर्द मुझसे अपनी प्यास बुझाने की चाहत रखता है, मैं उसकी प्यास बुझा देती हूँ।

पापाजी- रितेश को कब पता चला कि उसके अलावा तुम औरों से भी चुदती हो और उसका क्या रिऐक्शन था?

पापाजी की बात सुनकर मैं हँसी।

मुझे हँसती हुई देख कर पापाजी पूछने लगे- हँस क्यो रही हो?

मैंने बताया- रितेश ने ही मुझे सिखाया है कि चूत का मजा कैसे लिया जाता है। मैं रितेश को बहुत प्यार करती थी और आज भी करती हूँ और उसके प्यार के कारण ही मैंने ये सब किया है।

कहकर रितेश से पहली मुलाकात से लेकर जो जो कहानी घटी थी, सब मैं पापाजी को सुनाने लगी।

मेरी कहानी सुनकर उनका लंड मेरी चूत के अन्दर ही उबाल मार रहा था। मेरी कहानी सुनने के साथ साथ वो मेरी चूत की चुदाई भी कर रहे थे और उनकी उंगली मेरी गांड के अन्दर तक धंसी हुई थी।

फिर अचानक मुझे रोकते हुए पापाजी बोले- इसका मतलब तुम बहुत खुलकर और गन्दा से गन्दा चुदाई का खेल खेलती हो?

मैं- 'हां, अगर पार्टनर को पसन्द हो! मैं कभी भी किसी को किसी बात के लिये मना नहीं करती!'

पापाजी- 'हम्म, सही बताओ, क्या तुम टोनी और दूसरे मर्दो के सामने टट्टी कर चुकी हो और उन लोगों ने तुम्हारी गांड साफ की है?'

मैं- 'हां बिल्कुल वैसे ही जैसे आपने मेरी गांड साफ की थी।'

पापाजी- 'इसका मतलब कोई भी तुम्हारे जिस्म से कुछ भी करे, तुम उसे मना नहीं करती?

मैं- 'बिल्कुल नहीं, बल्कि मुझे भी इसमें खूब मजा मिलता है और मैं खूब उत्तेजित हो जाती हूँ।'

मेरे इतना कहते ही पापा ने अपनी उंगली मेरी गांड से निकाली और उसको अपने मुंह में रखकर चूसते हुए बोले- मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी गांड चाटो।

उनके इतना कहते ही मैं उनके ऊपर से उतर गई और उनका हाथ पकड़ कर बोली- आईये, बेड पर उल्टे लेट जाईये। हां एक बात बताईये, मैं आपके साथ कुछ भी करूंगी आप बुरा तो नहीं मानोगे?

पापाजी- 'बिल्कुल नहीं!' छूटते ही बोले, बस मुझे मजा आना चाहिए।

मैं- 'तब ठीक है, आप बिस्तर पर ऐसे लेटो कि आपका कमर के ऊपर का हिस्सा बिस्तर पर हो और गांड आपकी बिस्तर से बाहर हो।'

पापाजी मेरे कहे अनुसार लेट गये, मैंने तुरन्त अपने उस कपड़े को उतार फेंका जो मेरे जिस्म पर बोझ बना हुआ था, फिर मैंने दो तेज चपट पापा के चूतड़ों को लगाये और फिर उनके उभारों को फैलाते हुए उनके छेद पर अपनी जीभ चलाने लगी और उनके लंड को पकड़ कर इस तरह से सहलाने लगी, जैसे ग्वाला किसी भैंस से दूध निकालने के लिये भैंस का थन सहलाता हो। पापा जी के मुंह से आवाजें निकलनी शुरू हो चुकी थी। मैं उनके सुपारे को अपने नाखूनों से कुरेदती और बीच बीच में गांड चाटने के साथ साथ उनके लंड पर अपनी जीभ फेर लेती। मेरे ससुर की सिसकारियाँ बढ़ती जा रही थी,

पापाजी बोले जा रहे थे- आकांक्षा, अब मेरी गांड और लंड चाटना छोड़ो, अपनी योनि में मेरा लिंग ले लो, नहीं तो मेरा माल निकल कर जमीन पर गिर जायेगा।

मैं- 'क्या पापाजी?' लिंग और योनि में अटके हो आप? चूत और लंड बोलो न... मेरे कानों को यही अच्छा लगता है।

पापाजी- 'ठीक है, मेरा लंड अपनी चूत में ले लो, नहीं तो मेरा वीर्य जमीन में गिर जायेगा।'

मैं- 'नहीं गिरेगा, और न मैं गिरने दूंगी आपके लंड से निकलते हुए वीर्य को!'

पापाजी- 'मेरा निकलने वाला है आकांक्षा... उनके शब्द मेरे कानों में पड़ रहे थे और मैं लगातार उनके लंड पर अपनी जीभ चलाये जा रही थी ताकि उनका माल निकले तो सीधा मेरे मुंह में जाये।

उधर पापा जी भी दबी आवाज में चिल्ला रहे थे- आकांक्षा मेरा निकल॰॰॰॰ रहा है!
 
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