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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

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मुझे अपनी साडी खतरे में दिखाई दी. मैं तुरंत बचने के लिए वहा से खिसकने लगी, पर नितिन ने पीछे से मेरी साड़ी पकड़ ही ली और साड़ी खींचने से मुझे रुकना पड़ा. उसने मेरी साड़ी छोड़ एक हाथ से मुझे कमर से कस कर पकड़ लिया. उसके दूसरे हाथ में कलर की डिबिया थी.

मैं: “नहीं नितिन, पक्का कलर नहीं. मेरी साड़ी हलके कलर की हैं, इस पर ये काला दाग लग जायेगा तो नहीं निकलेगा. मेरी नयी साड़ी हैं.”

नितिन: “अरे कलर तो लगाना ही पड़ेगा, होली हैं. साड़ी की चिंता हैं तो भले ही निकाल दो पर कलर तो लगाऊंगा.”

ये कहते हुए उसने दूसरे हाथ से कलर की डिबिया टेबल पर रखी और उस हाथ से मेरी साड़ी का पल्लू मेरे कंधे से निकाला और नीचे गिरा दिया.

उसने अपना हाथ जो कमर पर था उसको हटाया जिससे साड़ी का पल्लू पूरा नीचे जमीन पर गिर गया. पहला हाथ कमर से हटते ही उसने अपने दूसरे हाथ से मेरी कमर को पकड़ लिया.

अब तक उसका हाथ साड़ी के ऊपर से मेरे कमर को पकडे था, अब बिना साड़ी के मेरी नंगी पतली कमर को दबोचे हुए था. साड़ी हटने से मेरी पतली कमर के ऊपर सफ़ेद ब्लाउज के अंदर मम्मो का उभार अच्छे से दिखने लगा था. अंदर ब्रा भी नहीं था और सफ़ेद रंग के पतले ब्लाउज से मेरे गहरे गुलाबी निप्पल की झलक हलकी सी दिखने लगी थी.

उसने मुझे इतना कस के पकड़ा था कि उसके लंड का हिस्सा मेरे नितंबो से चिपका हुआ था. शायद भांग का नशा करके आया हो ऐसा लग रहा था. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था. उसको पूरा होश भी नहीं था कि होली की आड़ में वो क्या कर रहा हैं.

उसने अब वो पक्के कलर की डिबिया दूसरे खाली हाथ से उठाई और पहले हाथ के पास ले आया जिससे कमर को पकडे हुए था. कमर वाले हाथ की उंगलियों से उसने डिबिया का ढक्कन खोला और अब उसी हाथ में डिबिया को पकड़ लिया.

उसने थोड़ा रंग अपने एक हाथ पर लगा दिया और उंगलिया रगड़ कर कलर अपनी हथेली पर फैला दिया और मेरे दोनों गालो और ललाट पर लगा दिया. मैं ज्यादा नहीं हिली, वरना कमर वाले हाथ में पकड़ी खुली डिबिया से रंग मेरी साड़ी पर गिर सकता था.
 
मेरे चेहरे पर कलर लगाने के बाद मुझे लगा अब वो मुझे छोड़ देगा, पर उसने थोड़ा और कलर अपने हाथ में लिया.

मैं: “अब तो छोडो, लग तो गया मुँह पर पक्का कलर.”

नितिन: “रुको तो सही, और भी जगह लगाना हैं कलर.”

उसने अब कलर मेरी नंगी बाहों पर लगा दिया. और फिर थोड़ा कलर और ले मेरे पेट और कमर पर मलता हुआ मेरे बदन को छूने के मजे लेने लगा.

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फिर उसने थोड़ा कलर और निकाला और मेरे ब्लाउज के ऊपर की तरफ पीठ और गर्दन पर कलर लगाया. मैं हिल नहीं रही थी इस डर से कि कलर कही साड़ी पर ना गिर जाये और इसका फायदा उठा उसने अपनी उंगलिया पीठ पर मेरे ब्लाउज में डाल कलर लगाने लगा.

अंदर ऊँगली जाते ही मैं विरोध में थोड़ा आगे की तरफ झुकी तो झटके से खिंच कर मेरे ब्लाउज का आगे से ऊपर का एक हुक भी टूट गया और मेरा क्लीवेज दिखने लगा. मैं फिर से शांत हो गयी.

नितिन: “ऊप्स, सॉरी, हुक टूट गया, ज्यादा हिलो मत, चुपचाप कलर लगवा लो. जो जो जगह दिख रही हैं बस वहा कलर लगाऊंगा.”

ये कहते हुए वो आगे से मेरे गले और फिर मेरे सीने पर कलर लगाने लगा. कलर लगाते हुए उसने थोड़ी उंगलिया ब्लाउज के अंदर भी डाल दी थी. एक हुक खुलने से उसको ज्यादा जगह मिल गयी थी. मेरे मम्मो के उभार को थोड़ा दबाते हुए उसने कलर लगा दिया.

वो किसी भी क्षण मेरे मम्मो को दबोच सकता था. मै खुद को छुड़ाने के लिए फिर थोड़ा जोर से हिली और उसकी उंगलिया अभी भी ब्लाउज के अंदर थी जिससे मेरा एक और हूक टूट कर निकल गया.

मेरे मम्मो के बीच की घाटी और भी दिखने लगी. मैं अब कही ना कही हार मानने लगी थी. अब उसने मुझे कमर से पकडे रखा था तो छोड़ दिया और कलर की डिबिया को रख दिया.

हुक टूट निकल चुके थे तो मैं अपने ब्लाउज के दोनों हिस्सों को अपने हाथ से पकड़ खड़ी हो गयी. कुछ अनहोनी होने से पहले छूट जाने से मैं खुश थी. मैंने अपने नीचे लटके पड़े साडी के पल्लू को ऊपर उठाया.

मैं: “ये कपड़ा फाड़ होली खेलने आये थे तुम?”

नितिन: “तुम चुपचाप कलर लगवा देती तो हुक नहीं टूटता ना.”

मैं: “चलो अब नाश्ता कर लो, होली खेल ली.”

नितिन: “बिना पानी के कौनसी होली होती हैं! अभी तुमको पानी में डालना बाकी हैं. पिछले साल तो तुम कमरे में बंद हो गयी थी बचने के लिए.”

ये सुनते ही मैं चीखते हुए रसोई की तरफ भागने को हुई और उसने मुझे फिर पीछे से पकड़ लिया.

मैं: “नहीं नितिन, प्लीज. मेरी साड़ी ड्राई क्लीन की हैं, उसको पानी में नहीं भिगो सकते ख़राब जो जाएगी. अब छोड़ दो, वैसे भी बहुत होली खेल ली हैं तुमने. अब प्लीज परेशान मत करो.”

नितिन: “बुरा न मानो होली हैं. साड़ी नयी आ जाएगी.”

मैं: “नहीं, बहुत महँगी हैं, पहली बार पहनी हैं.”

नितिन: “मुझे वैसे भी तुम्हे पानी में भिगोना हैं, साड़ी को नहीं. पहले साड़ी निकालते हैं फिर तुम्हे पानी में डालूंगा.”

मैं: “नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकते.”

नितिन: “अरे मैं करके बताता हूँ.”

मेरी साड़ी का पल्लू गिर कर वैसे ही मेरे मुड़े हुए बाहों में आ गया था, उसने उसको वहा से हटाया. मैंने साड़ी पकड़ कर रखी थी पर मैं जहा से पकड़ती वो दूसरी जगह से साड़ी निकाल देता. उसमे मेरी पूरी साड़ी को मेरे पेटीकोट से जल्दी ही अलग कर दिया और साड़ी सोफे पर फेंक दी.

मैं अब सिर्फ एक पेटीकोट और ब्लाउज में थी जिसके ऊपर के दो हुक टूट चुके थे. उसने मुझे उठाया और बाथरूम के अंदर ले आया. मुझे टब में खडी कर उसने नल चालू कर दिया और टब में पानी भरने लगा. मैं अपने ब्लाउज के टूटे हुए हुक के हिस्से पर हाथ रखे ब्लाउज को बंद रखे खड़ी थी.

मैं: “नितिन ये क्या कर रहे हो तुम बेशर्मो की तरह. मैंने कपडे नहीं पहन रखे हैं.”

नितिन: “पहन तो रखे हैं.”

मैं: “मेरा ब्लाउज आधा खुला है, और मैंने अंदर कुछ नहीं पहना हैं, कुछ तो समझो.”

नितिन: “अब झूठे बहाने मत मारो, पहले साड़ी का बहाना बनाया अब ये. बताओ कहा नहीं पहना हैं.”

मैं: “पागल हो गए हो तुम. अब मेरे कपड़ो में झांकोगे?”
 
नितिन: “भूल गयी, उस दिन पिकनिक में तुम, अशोक, मैं और पूजा पानी में उतरे थे. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी तो कार में तुम लड़कियों ने कपड़े बदले थे और हम कार की खिड़की पर पीठ कर परदे बने थे.” (नितिन की पत्नी का नाम पूजा था.)

मैं: “पानी में धक्का भी तुम लोगो ने ही मारा था उस दिन. वैसे भी अशोक मेरे साथ था उस वक्त.”

नितिन: “अब होली के दिन बुरा मत मानो, गीला तो होना पड़ेगा.”

काश मैंने बिना दरवाजा खोले उसको बाहर से ही भगा दिया होता तो मेरी ये हालत नहीं होती. गनीमत थी कि कम से कम मेरी नयी साड़ी ख़राब होने से बच गई.

आधा पानी भरने के बाद उसने मुझे टब में बैठा दिया और अपनी दोनों हथेली में पानी भर मेरे ऊपर पानी डालने लगा. वह पानी डालते जाता और शरीर के उस हिस्से पर अपने हाथ से मुझे रगड़ते हुए पानी लगा रहा था. उसके हाथ मेरे पीठ, गर्दन, सीने, पेट, कमर पर आराम से फिरते हुए मुझे जैसे नहला रहे थे.

मैं उसके हाथों को अपने मम्मो से जैसे तैसे दूर रख रही थी. थोड़ी ही देर में मैं पूरी गीली हो गयी. उसका कलर ज्यादा पक्का नहीं था तो उसकी रगड़ से मेरा कलर भी काफी निकल गया था.

अब उसने मुझ पर पानी डालना और छूना बंद कर दिया और खड़ा हो गया. मैं भी अब टब में ही खड़ी हो गयी और उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए पीछे रखा टॉवेल माँगा और उस पर ताना कसा.

मैं: “तुम मुझे होली खेला रहे थे या नहला रहे थे? साबुन भी लगा ही देते तो पूरी नहा लेती.”

मैं भूल ही गयी कि मेरा ब्लाउज सफ़ेद रंग का था और अंदर ब्रा भी नहीं पहना था. मेरा ब्लाउज गीला हो मेरे मम्मो से चिपक गया था और मेरे निप्पल साफ़ नजर आ रहे थे और मेरे मम्मो का उभार पूरी तरह से नजर आ रहा था. मेरा ब्लाउज पारदर्शी बन चूका था और मैं लगभग टॉपलेस खड़ी थी.

वो मेरे सीने को ही घूर रहा था तो मेरी भी नजर पड़ी और इससे पहले की मैं संभलती वो मेरी तरफ आगे बढ़ गया.

नितिन: “जैसी तुम्हारी इच्छा, मैं अब साबुन लगा देता हूँ.”

मैं: “नहींहीहीही, मैं मजाक कर रही थी.”

नितिन: “मगर मैंने तो सीरियसली ले लिया हैं, अब तो साबुन लगाना ही पड़ेगा.”

उसने साबुन उठाया और अपनी हथेली पर लगा कर हथेली मेरे शरीर पर रगड़ साबुन लगाने लगा. मेरे अंग जहा जहा से खुले थे वहा साबुन लगी हथेली रगड़ने लगा. मैं अपने दोनों हाथ अपने सीने पर लगाए हुए थी ताकि वो मेरे गीले ब्लाउज से दीखते हुए निप्पल ना देख पाए.

एक बार फिर साबुन लगाने के बहाने सीने पर कुछ ज्यादा ही नीचे जाकर मेरे ब्लाउज में हाथ डालने की भी कोशिश की उसने. मैं अपने हाथों से ब्लाउज कस कर पकड़ उसको खदेड़ते रही.

उसने मुझे सीधी करने के लिए मेरे पेटीकोट का नाड़ा पकड़ कर खिंचा जिससे वो नाड़ा खुल गया. वैसे तो पेटीकोट गीला हो मेरे शरीर से चिपक गया था फिर भी मैंने एहतियात के तौर पर एक हाथ सीने से हटा अपना पेटीकोट पकड़ लिया.

मैं: “बेशर्म, मेरे कपड़े क्यों खोल रहे हो.”

नितिन: “मैं तो तुम्हे सीधी कर रहा था गलती से खुल गया. पेटीकोट के अंदर तो कुछ पहन रखा होगा न? क्यों चिंता करती हो.”

मैं: “नितिन, ऐसी बातें करोगे मुझ से.”

नितिन: “भूल गयी, पूजा और तुम्हे दो महीने तक मेरे दोस्त के स्विमिंग पूल में स्विमिंग सिखाने ले गया था. वहा भी तो तुम लोग बिकिनी में रहते थे मेरे सामने. तब तो शर्म नहीं आयी.”

मैं: “अभी हम स्वीमिंग नहीं कर रहे हैं.”

नितिन: “तुम्हारी सोच कितनी छोटी हैं. पिछली होली पर अशोक ने पूजा को टब में पूरा लेटा दिया था. पूजा ने तो कोई शिकायत नहीं की.”

मैं: “तुम भी तो होंगे वहा.”

नितिन: “मैं तो तुम्हारे घर पर था, तुम्हे कमरे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था, तुम अंदर बंद जो थी. वैसे पूजा की भी गलती थी. होली पूरी ख़त्म नहीं हुई और वो नहाने चली गयी थी तुम्हारी तरह. अशोक को पता चला तो रंग लेकर बाथरूम में ही घुस गया और रंग दिया पूजा को.”

मैं: “नहीं, अशोक तुम्हारी तरह नहीं हैं.”

नितिन: “सच बोल रहा हूँ, पूजा से कन्फर्म कर लेना. तुमने तो ब्लाउज और पेटीकोट भी पहन रखा हैं. पूजा ने तो नहाने के लिए कपड़े खोल लिए थे और सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी. मैंने उसको बोला था इतना जल्दी मत नहा.”

मैं: “तुम फेंक रहे हो या सच बोल रहे हो?”
 
नितिन: “सच, मैंने आकर उसका टब में लेटे हुए फोटो भी लिया था.”

मैं: “पूजा के साथ इतना हुआ और तुमने अशोक को कुछ नहीं कहा!”

नितिन: “होली पर इतनी मस्ती तो चलती हैं. वो पूजा भी तो हंस रही थी.”

मैं: “तो तुम मुझसे पूजा का बदला ले रहे हो?”

नितिन: “कैसा बदला, वो पूजा तो सुबह से इंतजार कर रही हैं अशोक कब आएगा होली खेलने. अब मुझे साबुन लगाने दो.”

मैं सोच में पड़ गयी, मेरे पीठ पीछे अशोक क्या कर रहा हैं. मेरा एक हाथ पेटीकोट को पकड़े था और दूसरा मेरे ब्लाउज को. मेरा एक अकेला हाथ दोनों मम्मो को मुश्किल से ढक पा रहा था, उसने मेरे ब्लाउज में थोड़ी सी ऊँगलीया घुसा साबुन लगाना शुरू कर दिया, मैं उस पर हल्का गुस्सा करते हुए उसको मना करती रही.

मैं एक मम्मा ढकती तो वो दूसरे के तरफ साबुन लगाने लगता. उसके हौंसले बढ़ते रहे और जल्द ही अपना एक पूरा हाथ का पंजा मेरे ब्लाउज में घुसा मेरा एक मम्मा पकड़ लिया और साबुन मलने लगा.

उसकी इस हरकत पर, जिस हाथ से मैंने पेटीकोट पकड़ रखा था उससे मैंने उसको एक घुसा मार हल्का धक्का मारा. इस झटके से मेरा नाड़ा खुला पेटीकोट नीचे गिर गया और मैं पैंटी में आ गयी. मैं एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी.

वो मझ पर हंसने लगा कि मैं खुद अपने कपड़े खोल रही हूँ.

नितिन: “अब रहने भी दो, क्यों इतना शरमा रही हो? पूल में में भी तो बिकिनी पहन कर नहाते ही हैं.”

मैंने अपने दोनों हाथो से अपने ब्लाउज को पकडे रखने पर ध्यान दिया. उसने मेरे ब्लाउज को मेरे एक कंधे से निकाल उस कंधे पर साबुन लगाने लगा.

नितिन: “अब हाथ हटाओ, सिर्फ सीने पर साबुन लगाना बाकि हैं.”

मैं: “देखो, तुम अब अपनी लिमिट पार कर रहे हो. मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा हैं.”

वो मेरे करीब आ मेरे सीने पर साबुन लगाने का प्रयास करने लगा. मैंने अपने दोनों हाथो से उसको धक्का देना चाहा पर उसने मेरे हाथ पकड़ लिए और थोड़ी छीना झपटी में मेरे ब्लाउज के आगे के बाकी हुक भी खुल गए और मेरे मम्मे पुरे दिखने लगे. नितिन ने मेरे दोनों हाथ पकड़ मुझे मेरे मम्मे ढकने नहीं दिए और चिढ़ाने लगा.

नितिन : “ओ, शेम शेम.”

मेरी एक बार तो हंसी छूट गयी पर अपनी हालत देख तुरंत सुधार किया.

मैं: “मेरे हाथ छोडो, और तुरंत बाहर जाओ.”

नितिन: “अच्छा जाता हूँ, पहले तुम्हारे साबुन तो लगा लू, नयी जगह दिख रही हैं जहा साबुन नहीं लगा हैं.”

मैं: “लग गया मेरे साबुन, और नहीं लगवाना, जाओ.”

नितिन: “ठीक हैं तो नहला देता हूँ.”

उसने अब मेरे हाथ छोड़े और मैंने अपना ब्लाउज फिर अपने मम्मो के ऊपर कर दिया और हाथ से ढक दिया.

फिर उसने मेरे ऊपर पानी डालना शुरू कर दिया और मैं अपना सीना दबाये नीचे बैठ गयी.

नितिन: “और नहाना हैं या हो गया?”

मैं: “अब तुम बाहर जाओ, मेरा हो गया.”

नितिन बाथरूम से बाहर गया और मैंने चैन की सांस ली कि कुछ अनहोनी से पहले ही मैं बच गयी.

मैंने टॉवल उठाया अपने बदन को पोंछ गीले कपड़े निकाल दिए. बाथरूम के अंदर पहनने के कोई कपड़े थे नहीं तो मेरे मम्मो से लेकर जांघो तक मैं टॉवल लपेट कर ही बाहर आयी.
 
नितिन की इन हरकतों की वजह से मेरे हाथ पैर अभी भी कांप रहे थे, और मेरे शरीर पर मैं उसके स्पर्श महसूस कर पा रही थी, ख़ास तौर से जब उसने मेरे मम्मो पर साबुन मला था.

मैं जैसे ही टॉवेल लपेट बाहर आयी सामने थोड़ी दूर नितिन खड़ा हो कुछ खा रहा था. हम दोनों की नज़रे मिली और वो मुस्कराने लगा.

नितिन: “अरे तुमने तो आज होली खेली ही नहीं, देखो कोई रंग ही नहीं लगा.”

वो मेरी तरफ बढ़ता उससे पहले ही मैं चीखते हुए बैडरूम की तरफ भागी और वो मेरे पीछे. मैं बैडरूम का दरवाजा पूरा बंद करती उसके पहले ही वो दरवाजे पर आ गया और बंद नहीं करने दिया.

मैं: “कपड़े पहनने दो, फिर रंग लगा देना, अभी दरवाजा बंद करने दो. जाओ.”

नितिन: “पिछली होली पर भी यही बोलकर कमरे में बंद हो गयी थी. कपड़े बदलने हैं तो मेरे सामने बदलो और फिर होली खेलो.”

वो दरवाजे पर धक्का लगाते हुए अंदर आ गया. मैं मुड़ी और अंदर भागी और उसने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया और बिस्तर पर धक्का दे उल्टा लेटा दिया और खुद पीछे से मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गया. मैं अपने टॉवल को कस कर पकड़े लेटी रही.

वो मेरे बालो को हटा मेरे कानो के पीछे और गर्दन और कंधे पर चूमने लगा. मेरे शरीर में मीठी सी गुदगुदी होने लगी और मैं सब सहती रही. इतनी देर की मस्तियो से उसने कही ना कही मुझे कमजोर कर दिया था.

कई बार हम नितिन के साथ पिकनिक पर भी गए हैं और उसके साथ मेरा मजाक मस्ती काफी चलता था पर इतना ज्यादा होगा ये नहीं सोचा था. हर साल होली पर रंग लगाते वक़्त ऐसी मस्ती करता था पर आज वो अकेला था तो उसने हद कर दी थी, मेरे कपड़े तक खोल दिए थे और अंदर हाथ डाल दिया था.

मैं कई बार बिकिनी में उसकी पत्नी पूजा और नितिन के साथ स्विमिंग पूल में तैर चुकी हूँ. मेरे प्रति उसकी ऐसी भावनाये होगी मुझे कभी लगा नहीं था. फिलहाल वो टॉवल के ऊपर से ही मेरी गांड पर अपने लंड को रगड़ रहा था.

थोड़ी देर में वो मेरे ऊपर से उठा और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर मेरे टॉवल के ऊपर के हिस्से में सीने पर चूमने लगा. मैंने टॉवल को और कस के पकड़ लिया. उसको मैं लगातार मना कर हल्का प्रतिरोध कर रही थी.

मैं: “तुम्हे पता भी हैं तुम क्या कर रहे हो? अशोक को पता चलेगा तो क्या होगा पता हैं?”

नितिन: “ठीक हैं उसी से पूछ लेते हैं.”

ये कह कर उसने अपना मोबाइल निकाला और स्पीकर पर रख फोन मिलाने लगा. उसने अशोक को ही फ़ोन मिलाया था.

अशोक (फ़ोन पर): “अबे नितिन मैं तेरे घर पर होली खेलने आया हूँ, तू कहा हैं?”

नितिन: “मैं तेरे नए घर पर हूँ. प्रतिमा होली खेलने से मना कर रही हैं. उसको जरा बोल मुझे मेरे हिसाब से होली खेलने दे, मना ना करे.”

अशोक (फ़ोन पर):”अच्छा फ़ोन दो उसे.”

नितिन ने फ़ोन मेरे हाथ में थमा दिया.

मैं: “हां, हेल्लो..”

नितिन ने मेरे टॉवल को खींचना शुरू कर दिया. मैं एक हाथ से फ़ोन पकड़े और दूसरे से टॉवल पकड़े रखने का प्रयास कर रही थी. जब कि नितिन दोनों हाथों से मेरा टॉवल निकाल रहा था.

मैं: “आउच, छोड़ो, ये नितिन को समझाओ, ये मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा हैं.”

नितिन दूर से ही जोर से चिल्लाने लगा “ये मुझे रंगने नहीं दे रही.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुम्हे पता हैं, वो जबरदस्ती होली खेलाए बिना नहीं छोड़ेगा, तुम बाद में वापिस नहा लेना, उसको जल्दी होली खेला कर यहाँ भेज दो, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.”

नितिन ने मेरा पूरा टॉवल खिंच कर मुझे नंगी कर दिया. मैं पूरी नंगी हो गयी थी और उसने मेरी दोनों टाँगे दबा के रखी थी. मैं एक हाथ से फ़ोन और दूसरे से अपना सीना ढके हुई थी और शरम से सिकुड़ती जा रही थी. मैंने अशोक से फ़ोन पर मदद मांगी.

मैं: “तुम समझ नहीं रहे हो. ये कुछ ज्यादा ही कर रहा हैं. हमेशा के लिए मेरे दामन पर दाग लग जायेगा.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुमने वो नयी साड़ी पहन ली क्या! उसको बोलो पहले खोलने दे.”

मैं: “कपड़े तो सब खोल ही चूका हैं.”

अशोक (फ़ोन पर): “फिर क्या टेंशन हैं. होली हैं, थोड़ी मस्ती चलती हैं. तुम फ़ोन दो उसको.”

मैंने फ़ोन नितिन की तरफ बढ़ाया पर उसने अपने हाथों से मेरे पाँव पकड़ रखे थे, तो उसने फ़ोन ना लेकर मुंह आगे फ़ोन के पास बढ़ा कर बात करने लगा.

नितिन: “पूजा घर पर हैं ना, होली खेल ली?”

अशोक (फोन पर): “नहीं वो तेरी छोटी बच्ची को बाहर छोड़ने गयी हैं, उसके सामने पूजा को रंग रगड़ता तो वो बच्ची डर जाती इसलिए वो बाहर छोड़ने गयी हैं.”

नितिन: “हां ठीक किया, पिछली बार रगड़ा था वैसे रगड़ने वाला हैं तो बच्ची डर जाएगी.”

अशोक (फ़ोन पर): “चल पूजा आ गयी हैं, तूने खेलना शुरू किया?”

नितिन: “बस शुरू करने ही वाला हूँ”

मैंने फ़ोन अपने मुँह के पास खिंचा, मेरा एक हाथ अभी भी मेरे सीने पर मम्मो को ढके हुआ था. इस बीच नितिन ने अपनी जेब से एक कंडोम निकाल कर अपने कपड़े नीचे किये और अपने लंड को पहना दिया.

मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि होली के दिन वो कंडॉम लेकर क्यों घूम रहा हैं, या नितिन पहले ही सोच कर आया था कि आज वो मुझे चोदने वाला हैं. वो सचमुच पूरी तैयारी के साथ ही आया था.

मैं: “तुम्हे पता हैं, तुम्हारा दोस्त क्या करने वाला हैं?”

अशोक (फ़ोन पर): “अरे क्या हुआ? होली हैं, उसको रंग लगाने दो. एक मिनट होल्ड करो.”

फ़ोन पर पीछे से फुसफुसाहट हो रही थी और पूजा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी. नितिन ने मेरे पाँव चौड़े किये और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया.

उसको जो चाहिए था वो ले चूका था, अब मेरे विरोध से कोई फायदा नहीं था. मैं फ़ोन पकड़े छत की तरफ शुन्य में निहार रही थी.
 
अशोक (फ़ोन पर): “अच्छा प्रतिमा अभी तुम ज्यादा मत सोचो, होली के मजे लो, मैं होली खेल कर आता हूँ. जरा नितिन को फोन दो.”

नितिन ने अब मुझे धक्के मार चोदना शुरु कर दिया था. मैंने फ़ोन नितिन को पकड़ा दिया.

नितिन: “हां बोल!”

अशोक (फ़ोन पर): “ज्यादा परेशान मत करना उसको, प्रोटेक्शन का ध्यान रखना.”

नितिन: “चिंता मत कर, वो मान गयी हैं, फ़ोन रख.”

फिर नितिन ने फ़ोन काट दिया और फिर अपने धक्को की गति बढ़ा दी.

उनकी बातें सुनकर मैं सन्न रह गयी, क्या अशोक को पहले से ही पता था. कही ये इन दोनों के बीच कुछ डील तो नहीं हैं कि होली के दिन एक दूसरे की बीवी के मजे लेंगे. ये इन दोनों दोस्तों की मिलीभगत हैं. हालांकि अशोक कोड लैंग्वेज में बात कर रहा था पर उसकी बातो का मतलब मैं समझ सकती थी.

मुझे शायद खुलकर अशोक को नितिन की करतूत बता देनी चाहिए थी, पर मुझे उस वक़्त बिना कपड़ो के इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने सोचा अशोक मेरी इतनी सी बात सुनकर वैसे ही नितिन को रोक देगा. मगर वो तो उसका और भी साथ दे रहा था.

नितिन ने इतनी देर होली खेलते और नहलाते मुझे तैयार कर ही दिया था सिर्फ अशोक का डर था, वो भी इजाजत मिल ही गयी थी. मजे लेने का हक़ क्या सिर्फ पतियों को ही हैं, वो वहा पूजा के मजे ले रहा हैं तो मैं भी ले सकती हूँ.

मैंने अपना हाथ अपने सीने से हटा उसको अपने मम्मे दिखा दिए, ये मेरी सहमति थी.

नितिन ने अपनी टीशर्ट निकाल दी थी और अब आगे झूक कर मेरे मम्मो को चूसने लगा. थोड़ी देर चूसने के बाद मुझ पर पूरा लेट गया. उसके वजन से मेरे मम्मे दब गए और उसने मुझे चोदना जारी रखा.

मैं: “तुम जो मेरे साथ कर रहे हो, अशोक भी पूजा के साथ कर रहा होगा तो?”

नितिन: “मेरे हिसाब से तो उन्होंने पिछली होली पर भी किया था.”

मैं: “तुमने फिर अशोक को कुछ नहीं बोला?”

नितिन: “मैं घर पंहुचा तब तक तो वो लोग कर चुके थे.”

मैं: “तो तुम्हे कैसे पता चला?”

नितिन: “बाथरूम अंदर से बंद था. बहुत देर तक नहीं खोला बस आवाजे आ रही थी. तुम्हारी तरह पूजा बचाने के लिए आवाज नहीं लगा रही थी. सिसकियाँ भर रही थी.”

मैं: “तो तुमने उनको बाहर आने के बाद पूछा नहीं!”

नितिन: “अशोक बोला कि वो पूजा को पानी में गीला कर रहा था. शायद बाथरूम के पानी से नहीं उसके लंड के पानी से गीला किया था.”

मैं: “और पूजा ने क्या कहा?”

नितिन: “वो तो टब में पूरी रंगी पड़ी थी. पूरा मुँह रंग से काला हो गया था. सच में मुँह काला करा लिया था उसने. मेरे पास कोई सबूत तो था नहीं तो इल्जाम कैसे लगाता.”

मैं: “सच सच बताओ अशोक ने ही तुम्हे यहाँ भेजा न मुझे चोदने के लिए?”

नितिन: “मुझे तो पूजा ने कहा कि अशोक ने फ़ोन करके मुझे यहाँ बुलाया हैं. वो यहाँ नहीं था. मैं समझ गया पूजा की चाल हैं. एक विकल्प था उन दोनों को घर जाकर रंगे हाथों पकडू लू, दूसरी तरफ तुम थी. जब से तुम्हे बिकिनी में देखा था तब से ही नज़रे थी, मैंने तुम पर ट्राय मारा. उधर अशोक मेरी बीवी पूजा को चोद रहा होगा, तो मैंने सोचा मैं उसकी बीवी को चोद दूं.”

दोस्तों अगर आप मेरी देसी चुदाई कहानी पहली बार पढ़ रहे है? तो मेरी पिछली चुदाई की कहानियों को पढना मत भूलियेगा.

मैं: “तुम तीनो मुझे क्यों फंसा रहे हो?”

नितिन: “मैंने तुम्हारे सामने अशोक को फ़ोन किया, तुम्हारी गुहार के बावजूद उसने खुद ने मुझे इजाजत दी तो मुझे पता चल गया वो उधर क्या कर रहा हैं. अब तुम ज्यादा मत सोचो, मजा नहीं आ रहा क्या?”

मैं: “इतनी देर नहीं आ रहा था, अब आ रहा हैं.”

नितिन: “मैं पूजा को फ़ोन लगाता हूँ और बात नहीं करेंगे, सिर्फ फ़ोन चालू रख छोड़ देंगे. उनको हमारी चुदाई की आवाजे सुना कर जलाते हैं.”

मैं: “इसे कहते हैं बदला, लगाओ फ़ोन.”
 
नितिन ने फ़ोन लगाया, मैंने उससे फ़ोन लेकर चेक किया तो पूजा को ही कॉल जा रही थी. मैंने फ़ोन अपने पास में ही बिस्तर पर रख दिया.

पूजा (फ़ोन पर): “हेलो, क्या हुआ?… हेलो… हेलो… आउच.. अब इसे तो रहने दो, सारे कपड़े मत खोलो.”

उधर से पूजा की कामुक मदहोश आवाजे आने लगी और हमें उनसे तेज आवाज करनी थी.

मैं: “कम ऑन नितिन, जोर से चोदो मुझे.”

नितिन मेरी तरह आवाज नहीं कर रहा था, पर उसने मेरी आवाज सुनकर और जोश के साथ चोदना शुरू कर दिया. मैंने एक हाथ से उसको उसकी गर्दन के पीछे से पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसकी पीठ झकड़ ली. अपनी टांगे उठा कर उस पर लपेट दी और अब मैं भी चुदने के मजे लेने को तैयार थी.

मैंने आहें जोर जोर से आहें भरना शुरू किया आह्ह, आह्हहह आह्ह ओ नितिन, चोद दे मुझे, हां यही पे, हम्म, आउच, ऊहहह आहह्ह्ह आ मेरी चूत भर दे.

फिर मैंने महसूस किया फ़ोन से आती आवाज लगभग बंद हो गयी थी. जरूर उन्होंने मेरी आवाज सुन ली होगी और अब पछता रहे होंगे. मुझे और जोश आ गया. मैं और भी आवाज कर उन्हें चिढ़ाने लगी.

इस बीच मेरा मजे के मारे पानी छूटना शुरू हो गया था. नितिन का कंडोम लगा लंड मेरी चूत के पानी को चीरते हुए अंदर बाहर हो फच्चाक फच्चाक की आवाजे करने लगा. मैं फ़ोन उठा कर अपनी चूत के पास ले गयी और थोड़ी देर चुप हो कर उनको वो आवाजे सुनाने लगी.

मैं अपनों आहें तो रोक नहीं पा रही थी तो फ़ोन फिर नीचे रख दिया और हम दोनों चीखते हुए चुदने के मजे लेते रहे.

आह्हहह ओआह्ह आ आ आ आ अम्म आईईईई ईईहीहीहीही ऊहूऊऊऊऊ, उसने चोद चोद कर मेरा काफी सारा पानी निकाल दिया और मेरी नशीली आवाज की सिसकियों से वो खुद ही झड़ गया.

झड़ने के बाद भी वो अपना लंड मेरी चूत में डाले रखे हुए मुझ पर लेटा रहा. उसने फिर इसी तरह लेटे लेटे ही अपना मोबाइल उठाया और मैंने उससे छीन कर अपनी आखरी भड़ास निकालते हुए दूसरी तरफ फ़ोन पर लोगो को सुनाया “क्या मस्त चोदा हैं नितिन तुमने”.

पहली बार मेरा ध्यान गया फ़ोन तो म्यूट पर था. मतलब इतनी देर तक चिल्लाने का कोई फायदा ही नहीं हुआ. नितिन ने फ़ोन मुझसे छीना और कॉल काट दिया.

मैं: “ये तुमने म्यूट पर क्यों रखा?”

नितिन: “गलती से दब गया होगा. छोड़ो न, अपना काम तो हो गया न.”

मैं: “सिर्फ तुम्हारा ही हुआ हैं, मेरा नहीं.”

उसने मेरे ऊपर से हटते के बाद अपना इस्तेमाल किया हुआ कंडोम निकाला. फिर घुटनो के बल बैठ मेरे चेहरे के पास आ गया.

नितिन: “चलो मेरा लंड रगड़ कर तैयार करो, मैं तुम्हारा भी पुरा कर देता हूँ.”

मैं: “फ़ालतू मेहनत मत करवाओ, अब ये खड़ा नहीं होने वाला.”

नितिन: “तुम्हे अपने मुँह का जादू पता ही नहीं हैं. तुम्हारा चेहरा देख कर ही लोगो का लंड खड़ा हो जाता हैं, मुँह में लोगी तो मुर्दा लंड भी खड़ा हो जायेगा.”

मैं: “मैं पागल हूँ, इस गंदे लंड को अपने मुँह में लुंगी.”

नितिन: “मुँह में लेकर ही तो साफ़ करना हैं. एक बार लेकर देखो स्वाद पसंद ना आये तो निकाल देना.”

वो आगे बढ़कर अपना लंड मेरे मुँह के पास ले आया. वो नरम पड़ा लंड मेरे मुँह में डालता उसके पहले ही मैंने हाथ से पकड़ लिया और अपनी हथेली से रगड़ कर थोड़ा साफ़ कर लिया और हाथ से खिंच रगड़ने लगी. वो एक बार मुँह में डालने की ज़िद करता रहा तो मैंने उसका लंड अपने मुँह में ले चूसना शुरू किया.

वो सिसकिया भरते हुए मेरे मुँह को ही चोदने लगा. एक हाथ से वो मेरे मम्मे भी दबा रहा था और फिर उसने हाथ लंबा कर मेरी चूत पर अपनी ऊँगली रगड़ने लगा.

उसकी उंगलियों के मेरी चूत पर रगड़ से मुझे नशा चढ़ने लगा. मैंने अपने पाँव पुरे खोल अपनी गांड को हिला उसकी ऊँगली अपनी चूत में घुसाने की कोशिश की.
 
मेरे मुँह में उसका लंड फिर कड़क हो बड़ा हो गया था, क्यों की वो अब मेरे गले तक चोद रहा था. मैंने उसका लंड अपने मुँह से बाहर निकाला.

मैं: “चलो अब जल्दी से ख़त्म करो मेरा काम…”

वो फिर मेरे ऊपर चढ़ गया, और अपना लंड मेरी चूत में घुसा चोदना चालू कर दिया. मेरा काफी सारा काम तो उसकी पिछली चुदाई और ऊँगली करने से ही हो गया था, तो उसक लंड के अंदर घुस चोदते ही मेरे अंदर का पानी आवाज करने लगा. मैं भरी हुई बैठी थी तो मैं झड़ने को हो आयी.

मैं: “मेरा होने वाला हैं, जोर जोर से चोदो, आहहह आहहह..”

मैं खुद नीचे से अपने शरीर को ऊपर नीचे पटकते हुए झटको का वेग बढ़ा रही थी. कुछ ही क्षणों में चीखते चिल्लाते हुए झड़ गयी उह मम्मी, आईईईई उहुँहुँहुँहुँ ओ मम्मी ओ मम्मी, हां कर लो, कर लो, ऊ आ आ आ, ईशश्श्श्श्स ऊअआ.

झड़ने के बाद वही बिना हिले डुले शांत पड़ी रही. पर नितिन तो पूरा तैयार था दूसरी बार झड़ने को, मैंने उसको अपने ऊपर से गिरा दिया. आधा छूटने से उसको अच्छा नहीं लगा.

नितिन: “मेरा भी तो पूरा करने दो.”

मैं: “प्रोटेक्शन किधर हैं? माँ बनाओगे क्या मुझे? जाकर पूजा को माँ बनाना.”

नितिन: “खुद को झड़ना था तब प्रोटेक्शन याद नहीं आया.”

मैं: “तुम्हारा एक बार हो चूका हैं ना? मुझे रिस्क नहीं लेना.”

नितिन: “मैं पहले झड़ने के बाद ही चला जाता तो? तुम्हारा पूरा किया न मैंने?”

मैं: “रो मत, चलो पीछे से कर लो, आगे रिस्क नहीं ले सकती मैं.”

मैंने अब करवट ली और वो मेरे पीछे आकर लेट गया और मेरे गांड में अपना लंड ठूंस कर चोदना शुरू कर दिया. ज्यादा देर नहीं लगी और उसने अपना पानी मेरी गांड में भरते, आहें भरते हुए दूसरी बार झड़ गया.

उसने अपने कपड़े पहन लिए और मैंने भी अपना टॉवेल फिर लपेटा. मेरा शरीर अब थोड़ा हल्का महसूस कर रहा था. वो बाहर गया तो मैंने टॉवेल निकाल अपना गाउन पहन लिया. मेरे बैडरूम से बाहर आने पर वो बाथरूम से निकला और मुझसे जाने की इजाजत मांगने लगा.

मैं: “तुमने जान बूझकर तो म्यूट नहीं किया था न मोबाइल?”

नितिन: “हम दोनों ने किया वो हमारे बीच. अशोक को बताने की जरूरत नहीं इस बारे में.”

वो वहा से चला गया और मैं एक पहेली में उलझ गयी. अगर नितिन यहाँ पर पूजा के कहने पर गलती से आया था तो वो अपने साथ कंडोम लेकर क्यों आया.

अब झूठ कौन बोल रहा हैं ये पता करना मुश्किल था. हो सकता हैं अशोक ने पूजा के साथ कुछ किया ही ना हो, नितिन ने मुझे झूठ बोलकर अपने जाल में फंसाया हो.

मुझे पूजा पर भी शक था, वो नितिन के साथ मिली हो सकती हैं. दूसरी बार फ़ोन उसी ने उठाया था, अशोक की आवाज तो आयी ही नहीं. पहले भी मैं उसकी हरकते देख चुकी थी और वो मुझसे नंगी नंगी बातें करती थी.

पर एक सच तो ये भी था कि मेरी गुहार के बावजूद अशोक यही कहता रहा कि नितिन को मस्ती करने दूँ.

शाम को अशोक घर लौटा और मैंने उससे थोड़ी शंका समाधान करने की कोशिश की.

मैं: “तुम फ़ोन पर पूजा को रगड़ने की क्या बात कर रहे थे?”

अशोक: “मुझे कुछ याद नहीं मैंने क्या बोला, वो पूजा ने इस साल भी भांग पिला दी धोखे से.”

मैं: “इस साल भी मतलब, पिछले साल भी…”

अशोक: “पिछले साल पकोड़े में भांग मिलाई थी, मेरी हालत ख़राब हुई तो वो मुझे बाथरूम में ले गयी ताकि गीला होने से नशा उतर जाए, पर मुझे कुछ ज्यादा याद नहीं. उठा तब टब में था और नितिन मुझ पर पानी डाल उठा रहा था.”

मैं :”तो इस साल क्यों खाया भांग का पकोड़ा?”

अशोक: “मैंने नहीं खाया, पूजा ने मिठाई खिलाई ये बोलकर कि बाजार की हैं, पर उसमे भी भांग थी.”

मैं: “तुम तो नितिन को फ़ोन पर मेरे साथ कुछ भी मस्ती करने की छूट दे रहे थे, वो मेरे साथ कितनी जबरदस्ती कर रहा था पता हैं?”

अशोक: “क्या बदतमीजी की बताओ?”

मैं: “मेरे कपड़े फाड़ दिए थे, और नंगी कर दिया था.”
 
अशोक: “क्या! अभी फ़ोन लगता हूँ उस हरामी को.”

मैं: “नहीं, कोई जरुरत नहीं झगड़ा करने की.”

अशोक: “तुम झूठ तो नहीं नहीं बोल रही, बताओ फटे कपड़े.”

मैं: “कपड़े नहीं फाड़े, छीना झपटी में ब्लाउज का हुक टूट गया था. उसने मेरे साथ कुछ कर लिया होता तो?”

अशोक: “ऐसे कैसे कर लेता, बाप का माल हैं क्या. तुम बताओ क्या किया उसने, मैं उसको देख लूंगा.”

मैं: “मैं उसको कुछ करने थोड़े ही देती, उस दिन हिल स्टेशन पर डीपू को भी नहीं करने दिया था याद हैं?”

अशोक: “मैं फिर भी उससे बात करूँगा. अगली बार से वो यहाँ नहीं आएगा.”

उस वक्त तो बात आयी गयी हो गयी. कभी कभी मौन ही सबसे अच्छा उपाय होता हैं. मैंने इस होली के दिन को भुला आगे बढ़ने में ही भलाई समझी, हो सकता हैं ऐसा कुछ ना हो जो मैं समझ रही थी.

मगर अब अशोक पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा था. मैं इस दुनिया से बाहर आना चाहती थी और अपने जीवन की एक नयी शुरुआत चाहती थी. मैंने शपथ ले ली कि अब मै किसी गैर मर्द के चक्कर में बिलकुल नहीं फँसूँगी.

जब एक पत्नी का भरोसा अपने पति से उठ जाता है तो एक बहुत बड़े बदलाव की जरुरत महसूस होती हैं। मैंने भी फैसला कर लिया कि मुझे अपनी ज़िन्दगी खुद जीना सीखना होगा इसके बजाय कि पति पर निर्भर रहु।

कल का क्या भरोसा, मुझे मेरा पति छोड़ कर किसी और के साथ शादी कर ले या मेरा इस्तेमाल कर अपना मतलब निकाले। मुझे अपनी ज़िन्दगी की एक नयी पारी शुरू करनी थी और मैंने अपने लिए नौकरी ढूढ़ना शुरू कर दिया।

मेरे पति अशोक ने मेरी नौकरी ढूंढने में मदद देने की कोशिश की पर मैंने मना कर दिया, मुझे अपनी योग्यता से बिना सिफारिश की नौकरी चाहिए थी।

मुझे ऐसी जगह नौकरी चाहिए थी जहा मुझे मेरी खूबसूरती को देख कर काम नहीं दिया जाये, कोई भी ठरकी बॉस मेरे सेक्सी फिगर को देख कर मुझे काम दे सकता था पर मुझे अब किसी का शिकार नहीं बनना था।

सेक्रेटरी के जॉब के लिए मेरी शैक्षिक योग्यता देखे बिना सिर्फ मेरे शरीर को देखते ही दो तीन जगह नौकरी मिल भी गयी, पर उन ठरकी बॉस और मैनेजर की नीयत उनकी आँखों में ही दिख गयी और मैंने वहा काम ना करना ही ठीक समझा।

छोटे शहर में महिला बॉस मिलना बहुत मुश्किल था। मैंने कुछ बड़े ऑफिस में काम ढूंढना भी जारी रखा, थोड़ा समय और लग गया और मुझे वो जगह शायद मिल गयी जो मेरे मुताबिक थी।

मेरे साथ कुछ और उम्मीदवारो को भी लिखित परीक्षा से होकर गुजरना था, जिसके बाद साक्षात्कार का राउंड होने वाला था। जगह सिर्फ एक खाली थी और उम्मीदवारी थे कई।

मैंने अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी थी और दो लोग़ जिनको साक्षात्कार राउंड के लिए चुन लिया गया उनमे मैं भी थी। साक्षात्कार कंपनी का बॉस राहुल खुद लेने वाला था जिसके लिए सेक्रेटरी चाहिए थी।

मेरे साथ जो लड़की चुनी गयी थी वो एक कुंवारी लड़की थी जो दिखने में अच्छी खासी थी और छोटे कपड़े पहन कर आयी थी। मुझे लग गया कि अगर ये भी दूसरे ठरकी बॉस जैसा होगा तो मेरा चुना जाना मुश्किल हैं।

हम दोनों को एक साथ इंटरव्यू के लिए अंदर बुलाया गया।

राहुल एक पच्चीस तीस की उम्र का नौजवान था, मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी कम उम्र का बॉस भी हो सकता हैं। बॉस शब्द सुनते ही मुझे एक अधेड़ उम्र का ठरकी मर्द ही दिमाग में आता हैं।

राहुल की पिछली सेक्रटरी अचानक काम छोड़ कर चली गयी थी और उसको तुरंत किसी की जरुरत थी। पुरे साक्षात्कार के दौरान उसने एक नजर भी हम दोनों नारियो पर नहीं डाली बस हमारे दस्तावेज़ देखता रहा और सवाल पूछता रहा।

मेरे लिए ये बहुत अलग अनुभव था जब कोई मर्द खूबसूरत औरत को नहीं देख रहा था। मुझे भी ऐसी ही जगह पर काम की तलाश थी पर बीच का रौड़ा वो लड़की थी जो मेरी प्रतियोगी थी।

राहुल को हम दोनों की शैक्षिक योग्यता पर कोई शक नहीं था उसने हमसे सिर्फ हमारी महत्वकांक्षा पूछी और हम ये जॉब क्यों करना चाहते हैं। मेरा लक्ष्य साफ़ था कि मुझे अपने पैरो पर खड़ा होना हैं और बहुत आगे जाना हैं क्यों कि ज़िंदगी में बाकी सब तो वैसे भी पा लिया हैं।

मेरे साथ वाली उम्मीदवार के साथ ये समस्या था कि वो एक दो साल से ज्यादा प्रतिबद्धता नहीं दे सकती थी क्यों कि उसकी शादी होने वाली थी और फिर अपने होने वाले पति के साथ उसे काम छोड़ कर दूसरे शहर जाना था।
 
ये बात मेरे पक्ष में आ गयी और मुझे वो नौकरी दे दी गयी। मैं बहुत खुश हो कर घर आयी, अशोक को इतना फर्क नहीं पड़ा। मुझे खुश देख उसने मुझे बधाई जरूर दी। उसके लिए तो अच्छा ही था, दिन भर मेरे घर पर नहीं होने से उसको मौका मिल जायेगा अपनी किसी महिलामित्र को घर ला अपने अरमान पुरे करने का।

मुझे इस सब से अब जैसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था, ये उसकी ज़िन्दगी हैं वो कैसे भी जीए पर मुझे अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तो पर जीनी थी।

मैंने ऑफिस में पहनने के हिसाब से कपड़ो की शॉपिंग कर ली और जल्द ही ऑफिस ज्वाइन कर लिया। वहा के महिला स्टाफ से मेरी पहले ही दिन अच्छी खासी बात हो गयी और मैंने अपना काम भी समझ लिया था।

मेरी सुन्दरता देख जरूर पुरुष कर्मचारी मुझसे बात करना चाह रहे थे पर मैंने शुरू से ही ऐसी अपेक्षा बना दी थी कि मैं किसी के झांसे में फंसने वाली नहीं हु।

एक दो बार राहुल के केबिन में जाने को भी मिला पर वो सिर्फ एक पल के लिए अपना सर उठा कर देखता कि कौन हैं और फिर नीचे टेबल पर अपना काम करता हुआ बात करता था जैसे सामने वाले की तो कोई औकात नहीं हैं।

या तो वो अपना बॉस होने का रौब दिखा रहा था या काम में सचमुच बिजी था या मुझे नया आया देख मुझे इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहा था।

पर मेरे लिए तो अच्छा ही था, मैंने जो अपने लिए नयी ज़िन्दगी चुनी थी मुझे ऐसा ही बॉस चाहिए था। उसके जो भी इरादे हो मैं उससे पटने वाली नहीं थी।

दूसरे सहकर्मियों से पता चला कि पहले कंपनी का बॉस राहुल के पिता थे, उनकी तबियत ख़राब रहने लगी तो राहुल ने कम उम्र में ही उनका सारा कारोबार संभाल लिया था। उसके आने के बाद बिज़नेस और अच्छा चलने लगा था।

मुझे भी गर्व हुआ कि मैं ऐसे बॉस की सेक्रटरी हु, हम दोनों ही बहुत महत्वाकांक्षी थे। धीरे धीरे समय गुजरते हुए दो महीने हो गए पर राहुल के बर्ताव में कोई फर्क नहीं आया।

वो अब भी नज़रे उठा कर बात नहीं करता था। जब कोई बात समझानी होती थी तब भी सिर्फ मेरी आँखों में देखता था जरा भी नीचे की तरफ मेरा फिगर देखने की कोशिश नहीं की।

मुझे वो एक सामान्य मर्द नहीं लगा, वरना मुझ जैसी अच्छे फिगर वाली नारी को एक बार देख कर उसको निहारता ना रहे ये मुमकिन नहीं था। मुझे लगा जरूर इसकी बीवी बहुत खूबसूरत होगी इसलिए दूसरो की तरफ नजर नहीं डालता।

मेरी गलतफ़हमी जल्द ही दूर हो गयी जब पता चला उसकी अभी शादी नहीं हुई हैं। मुझे लगा फिर जरूर कोई खूबसूरत गर्लफ्रेंड होगी उसकी जो उसे किसी ओर की तरफ देखने से मना करती होगी।

वहा काफी सालो से काम करने वाली एक अधेड़ महिला सुधा आंटी ने बताया कि राहुल एक लड़की को चाहता था पर उस पर अपने पिता के बिज़नेस का भार आ पड़ा और धीरे धीरे दोनों अपनी महत्वाकांक्षा के साथ धीरे धीरे दूर हो गए।

अब थोड़ा समझ में आया कि राहुल के लिए उसका बिज़नेस और महत्वकांक्षाए उसकी ज़िन्दगी में लड़कियों से कही ज्यादा महत्त्व रखती हैं। इसलिए लड़कियों के प्रति उसका आकर्षण ही ख़त्म हो गया हैं।

समय इसी तरह गुजरता रहा और मैंने अपने आप को ऑफिस में स्थापित कर लिया था। राहुल का भरोसा मैंने जीत लिया था और वो ज्यादा जिम्मेदारी के काम सौपने लगा। शिकायत थी तो बस ये एक कि जब भी वो बात करे पुरे समय मेरी तरफ देख कर तो बात करे।

कही ना कही उसकी ये मुझे ना देखने की आदत मेरे अहम को चोट पंहुचा रही थी। एक खूबसूरत महिला जो अच्छे फिगर की मल्लिका हैं वो कम से कम अपनी ख़ूबसूरती की तारीफ़ की हकदार तो बनती हैं।

मुँह से ना सही कम से कम आँखों के इशारे से तो तारीफ़ कर दे पर वो भी नहीं। मुझे जब ढंग से देखता ही नहीं तो तारीफ़ क्या करेगा। जब भी मैं उसके केबिन में जाती एक आशा के साथ जाती कि आज तो वो मुझे देखेगा या मेरी तारीफ़ करेगा पर हमेशा खिसियाते हुए निराश हो कर ही बाहर आती।

ऐसी बात नहीं थी कि वो मेरी तारीफ़ नहीं करता था पर सिर्फ काम की तारीफ़ करता था। जिसकी मैं हकदार भी थी पर मेरी खूबसूरती की तारीफ़ कर देगा तो कौनसा उसकी इज्जत कम हो जाएगी या उसके उसूल टूट जायेंगे।

इसी तरह छह महीने बीत चुके थे और दिन पर दिन मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं कोई भी कसर नहीं छोड़ती कि मैं अपने आप को उसके सामने प्रस्तुत करू पर वो हमेशा मुझे इग्नोर करता ही रहा।

अपनी जिंदगी में हमेशा ऐसे मर्दो से पाला पड़ा था जिन्होंने हमेशा मेरे शरीर को पाने की कोशिश की थी, मुझे घूरते हुए मेरे कपड़ो के अंदर झाँकने की कोशिश पर ये बिलकुल अलग था। मेरे लिए ये अब एक मिशन बन चूका था, ये मिशन था अपने बॉस के अंदर के मर्द को बाहर निकालने का या अपनी खूबसूरती की सत्ता राहुल के दिल पर जमाने का।

ऐसा नहीं था कि मैं उसके साथ सोना चाहती थी, बस मेरे ईगो को चोट पहुंची कि मुझे मेरे हिस्से की तारीफ़ राहुल से मिलनी ही चाहिए। ये मेरी अब जिद बन चुकी थी।

मैं अब क्या कर सकती थी, जिससे उसका ध्यान बात करते वक़्त मेरी आँखों के सिवाय मेरे शरीर पर भी जाये और तारीफ़ के बोल तो फूटे। क्या मुझे अपना पहनावा बदलना था!
 
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