• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

रौनक इस बीच मेरे दोनों वक्षो को अपने हाथों में ले कर मसल रहा था और मेरे निप्पलों से खेल रहा था। मेरा तो अब मूड बन चूका था। एक का सोचा था पर यहाँ तो दो दो को चुपचाप हैंडल करना था।

रौनक ने अब मेरे दोनों वक्षो को छोड़ा और अपने नीचे के कपडे उतार दिए। अब वह मेरे सीने पर बैठ गया। उसका पिछवाड़ा मेरे वक्षो की गद्दी पर बैठा था। अपना लंड मेरे मुँह के पास लाया और अपने हाथ से मेरा मुँह थोड़ा खोल कर अपना कड़क लंड अंदर डालने लगा।

उसने एक झटका मारा और लंड मेरे मुँह में घुसा दिया। उसकी मोटाई बहुत ज्यादा थी जिससे मेरा पूरा मुँह भर गया कि हवा पानी निकलने की भी जगह नहीं थी। फिर उसने लंड थोड़ा बाहर निकाल कर और भी जोर के झटके से मेरे गले तक उतार दिया। थोड़ा और अंदर डालता तो मेरी सांस ही बंद हो जाती।

एक तरफ वो मेरे मुँह में झटके मारे जा रहा था तो दूसरी तरफ नीचे के छेद में संदीप ऊँगली कर रहा था। मेरा मुँह अब खारा होने लगा था जैसे नमकीन गुनगुनी शिकंजी पी ली हो। मैंने मन ही मन सोचा ये क्यों वीर्य बर्बाद कर रहा हैं, जहा जरुरत हैं वहा डाले।

संदीप ने अब अपनी ऊँगली बाहर निकाल दी। उसने अपने कपडे उतार दिए थे। थोड़ी ही देर में मेरी दोनों टाँगे ऊपर की और उठा कर अपने कंधो पर रख दी थी। एक मांस का लोथड़ा मैंने अपने नीचे के छेद के पास टकराता महसूस किया। ये संदीप का लंड था। जिसके लिए ये सारी मेहनत की थी उसकी घडी आ गयी थी।

कुछ सेकंड तक संदीप अपने लंड से डंडे की तरह मेरे नीचे के नाज़ुक अंग पर मारता रहा जिससे चटाक चटाक आवाज़े आने लगी।

अब वो मेरी चूत के बाहर की अंदरूनी दीवारों पर लंड रगड़ने लगा। मेरी सिसकिया नहीं निकल पा रही थी क्यों की मुँह में रौनक का लंड था। संदीप ने थोड़ी देर ऐसे ही तड़पाया फिर अपना लंड मेरे छेद के मुहाने पर लगा दिया।

अब संदीप अपने लंड को एक इंच अंदर डाल कर बाहर निकाल रहा था। थोड़ी देर ऐसे ही करने से मेरी तड़प और बढ़ने लगी। तब तक रौनक ने अब झटके मारना बंद कर दिया था और ऐसे ही मेरे मुँह में लंड डाल कर बैठा रहा।

संदीप अब एक इंच की बजाय 2 इंच तक लंड अंदर बाहर करने लगा। मैं अब तड़पने लगी। ऐसे ही खेलते रहने के बाद उसने अब धीरे धीरे ओर भी अंदर उतरना शुरू कर दिया।

अब वो पूरा मेरे अंदर था क्यों कि उसकी बॉडी मेरे नीचे टकरा गयी थी। मुझे अंदाज़ा हो गया कि उसका लंड मेरे पति के मुकाबले थोड़ा पतला और छोटा ही था, जिससे मुझे ज्यादा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। वो अंदर अठखेलिया कर रहा था और मझे जैसे गुदगुदी हो रही थी।

मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं देख कर संदीप को शायद गुसा आ गया और वो जोर जोर से अंदर झटके मारते वक़्त अपना शरीर मेरे शरीर से टकरा रहा था।

वो इतनी ताकत से मार रहा था कि मुझे चोट लग रही थी। दर्द के मारे मेरी बॉडी नीचे से छटपटाने लगी। पर उसको कोई रहम नहीं आया और एक जानवर की तरह झटके मारता रहा।

मेरा दर्द असहनीय सा हो रहा था पर मैं उठ नहीं सकती थी क्यों कि काम पूरा होने से पहले ही खेल ख़त्म हो जाता। मैंने जैसे तैसे सहन करना जारी रखा। पता ही नहीं चला कब धीरे धीरे दर्द कम होता गया या फिर मुझे अंदर जो मज़ा आने लगा था जिससे दर्द का अह्सास कम लग रहा था।

अब रौनक ने लंड मेरे मुँह से बाहर निकाला और पास में बैठ कर मेरे वक्षो को मलता हुआ संदीप को देखने लगा जो कि लगा पड़ा था। अब हम दोनों का पानी छूटने लगा था। चटाक चटाक की आवाज़े अब धीरे धीरे फचाक फचाक में बदलने लगी थी। मेरे मुँह से अब आह निकलने लगी, थोड़ी बहुत दर्द के मारे और थोड़ी मजे की वजह से।

संदीप का जोश और बढ़ गया। थोड़ी ही देर में मेरा सारा पानी छूट गया और उसके 2 मिनट बाद संदीप ने भी आ… ऊ… करते हुए अपना सारा पानी मेरे अंदर खाली कर दिया।

इसके बाद वो रुक गया और लंड अंदर ही रखे थोड़ी देर बैठा रहा। मुझे दर्द से थोड़ी राहत मिली। अब उसने अपना अंग मेरे अंदर से बाहर निकाल दिया। मेरी टाँगे अपने कंधो से उतार कर नीचे सुला दी।

संदीप के झाड़ते ही मैंने चैन की सांस भी पूरी नहीं ली थी कि कुछ ही सेकंड में अब रौनक मेरी दोनों टांगो को चौड़ा कर बीच में आकर बैठ गया। मैं भी चाहती थी कि दो लोग करेंगे तो बच्चा होने की सम्भावना बढ़ जाएगी परन्तु थोड़ा ब्रेक तो मुझे भी चाहिए था।

 
उसने मेरा साइड में पड़ा गाउन उठाया और मेरी योनी पर लगा पानी साफ़ करने लगा जो संदीप छोड़ कर गया था। अब उसने अपना लंड पकड़ कर मेरे छेद में डालना शुरू किया।

थोड़ी देर पहले उसका मुँह में लेने से ही मुझे उसकी मोटाई का अंदाजा था। मुँह में बड़ी मुश्किल से समां रहा था तो नीचे के छोटे छेद में कैसे जायेगा ये सोच मैं घबरा गयी।

वैसा ही हुआ, दो इंच भी अंदर नहीं गया और अटक गया, मेरी तो हालत खराब हो गयी इतने में ही। उसने थोड़ा जोर लगाने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुआ, उल्टा मुझे दर्द हुआ और थोड़ी चीख निकल गयी।

संदीप ने पीछे से उसको बोला कि सारा लुब्रीकेंट तो तूने साफ़ कर दिया अब सूखे में कैसे जाएगा, पहले गीला कर।

उसने अपना लंड पूरा बाहर खींच लिया। मैंने चैन की सांस ली। अब उसने झुक कर अपने होठ मेरे योनी के होठों पर लगा दिए। थोड़ी देर चूमने के बाद अपनी जबान ऊपर से नीचे रगड़ने लगा चूत की दरार पर।

ऐसे ही वो अपनी खुरदरी गीली जुबान दरार में फेराता रहा तो मुझे मज़ा आने लगा। थोड़ी देर में उसने अपनी जबान रोल की और अंदर छेद में डाल कर जीभ लपलपाने लगा। मेरी तो झुरझुरी छूट गयी। अंदर एक करंट दौड़ गया।

कुछ मिनटों तक ऐसे ही मुझे वो करंट लगाता रहा फिर सीधा बैठ गया। मेरे अंदर अच्छा खासा गीला हो गया था। थोड़ी देर पहले ही छूटी थी और अब उसने फिर मेरा मूड बना दिए था। अब उसने अपना लंड धीरे धीरे प्यार से अंदर घुसाना शुरू किया।

उसकी मोटाई इतनी ज्यादा थी कि मेरा छोटा छेद उसको सहन नहीं कर पा रहा। मुझे बहुत दर्द हुआ, ऐसे मोटे लंड का ये पहला अनुभव था।

मेरी जागरण वाली कहानी में मोहित के लंड से भी ये थोड़ा मोटा था। मुझे डर लगा कही मेरी चूत फट ही ना जाए।

अगले कुछ सेकंड में उसका लगभग 6 इंच से भी लम्बा रहा होगा लंड मेरे अंदर था। हालांकि वो बहुत प्यार से अंदर डाल रहा था पर मैं तो दर्द से एक बार फ़िर चीख रही थी। अब रौनक ने अपना लंड वैसे ही धीरे धीरे करते पूरा बाहर निकाल लिया।

बाहर निकालते ही एक बार फिर पहले की तरह पूरा अंदर घुसा दिया। ऐसे 8 -10 बार रौनक ने ऐसे पूरा बाहर और फिर पूरा अंदर डाला। पता नहीं कैसा खेल खेल रहा था वो।

पति क्लोसेट के पीछे छिपे थे, कही मेरा दर्द देख कर बाहर ना जाये। सारा भांडा फुट जायेगा ऐसे तो। पर सब देख सुन कर भी वो सहन करते रहे अंदर से।

अब रौनक मेरे पास आकर लेट गया। मेरा हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचने लगा, उधर से संदीप ने मेरी टाँगे और कमर उठा कर मुझे धकेलते हुए रौनक पर सुला दिया। नीचे रौनक था और उसके ऊपर पीठ के बल मैं लेटी थी।

रौनक ने अपना हाथ नीचे ले जा कर अपना लंड एक बार फिर मेरे अंदर डालना शुरू किया। उसके पुरा अंदर जाने के बाद उसने अंदर बाहर धीरे धीरे झटका मारना शरू कर दिया।

संदीप मेरे पास आकर बैठ गया और मेरी नाभी और उसके आस पास चूमने लगा। मेरा बदन वहां से थर थर कापने लगा। संदीप ने अब अपनी एक ऊँगली मेरी चूत के थोड़ा ऊपर रख मलने लगा।

उधर रौनक लगातार झटके मार रहा था जबकि संदीप लगातार मेरे पेट पर चूमते हुए मेरी उत्तेजना बढ़ा रहा था। मुझे मजा तो बहुत आ रह था पर जल्दी से ये सब ख़त्म करना था क्यों कि दर्द सहन नहीं हो रहा था।

अब धीरे धीरे रौनक ने झटको की रफ़्तार बढ़ा दी, तब संदीप ने पेट चूमना बंद किया और मेरे वक्षो को मसलने लगा। एक हाथ से वक्ष तो दूसरे हाथ की ऊँगली से मेरी चूत के ऊपर की तरफ मालिश कर रहा था।

रौनक बहुत देर तक करता रहा पर उसक तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था जबकि मेरा तो अच्छा ख़ासा पानी छूटने लगा था। इससे पहले कि मैं दोबारा छूट जाती रौनक ने लंड बाहर निकाल दिया। मुझे पता था कि उसका अभी हुआ नहीं हैं।

रौनक ने मुझे अपने ऊपर से उतार कर उल्टी लेटा दिया और मेरे दोनों पाँव पकड़ कर बिस्तर से नीचे लटका दिए जब की कमर के ऊपर का हिस्सा पलंग पर था। उसने मेरी एक टांग पकड़ कर शरीर टेढ़ा किया और एक टांग ऊपर 90 डिग्री पर खड़ी कर दी जब की दूसरी टांग नीचे जमीन पर।

मैंने अब टेडी होकर लेटी थी। मेरी दोनों टाँगे विपरीत दिशा में थी जिससे छेद पूरा खुल गया था। रौनक ने अपना एक पाँव मोड़ कर पलंग के किनारे पर टिकाते हुए अपना लंड मेरे अंदर एक बार फिर घुसा दिया।

उधर संदीप मेरे चेहरे के पास आया और मेरे गालो को दबा कर मुँह खोलते हुए अपना नरम चूसा पड़ा लंड मेरे मुँह में डाल दिया। इधर संदीप मेरे मुँह में नरम छोटा लंड अंदर बाहर कर रहा था तो नीचे के छेद में रौनक अपना मोटा लंड झटके मारते हुए दर्द के साथ आनंद दे रहा था।

नीचे अब मेरे पानी के रिसने के साथ ही रौनक का पानी भी आ मिला था और फचाक फचाक की आवाज़े कमरे में गूंजने लगी। इन सब के दौरान मेरी आँखें लगातार बंद थी और पलकों के नीचे झिर्री से थोड़ा बहुत देख रही थी।

संदीप ने अपना लंड मेरे मुँह में लगाए रखते हुए मेरे वक्षो को दबाना शुरु कर दिया। साथ ही बेरहमी से मेरे निपल दबा रहा था। ऊपर और नीचे दोनों तरफ बराबर दर्द हो रहा था।

रौनक के चरम के नजदीक पहुंचते हुए इतनी जोर के झटके मारे कि मेरी तो जान ही निकल गयी थी। उसके मोटे लंबे लंड में इतना पानी भरा था कि सब मेरे अंदर खाली होने लगा था। फिर उसने एक जोर की हुंकार भरी और उसका किला ढह गया।

 
रौनक ने काम ख़त्म कर कपडे पहनना शुरू कर दिया था पर संदीप अभी भी अपना नरम लंड मेरे मुँह में फिरा रहा था। रौनक ने उसको भी कपडे पहनने की हिदायत दी। फिर दोनों ने मिलकर मुझे मेरा गाउन फिर से पहना दिया और सीधा लेटा दिया।

संदीप ने बोला चल निकलते हैं, पर रौनक ने कहा बाहर से पानी का गिलास ले कर आ, इनको उठाना तो पड़ेगा। संदीप पानी ले आया और रौनक को दिया। उसने उंगलिया गीली कर हल्का हल्का पानी मरे मुँह पर दो बार छिड़का। मैंने अपनी आँखें मिचमिचाई और फिर बंद कर ली।

संदीप झल्लाया ला मुझे दे और अगले ही सेकंड मेरे मुँह पर बहुत सारा पानी आकर गिरा। उसने तो पूरा गिलास ही मुँह पर उंढेल दिया। थोड़ा पानी नाक में भी चला गया तो मेरी सांस रुक गयी और मैं तुरंत खांसते हुए बैठ गयी। अपना मुंह हाथों से पौंछते हुए उनकी तरफ आश्चर्य से देखा जैसे पहली बार देखा हो।

मैं जिस हड़बड़ाहट से उठी दोनों झेंप गए। तुरंत अपनी सफाई देने लगे कि मैं वहां बाहर नशे में पड़ी थी तो वो लोग मुझे अंदर ले आये और पानी छिड़क कर उठाने की कोशिश कर रहे थे।

मैंने दोनों को अविश्वास की नजरो से देखा। रौनक ने बोला कि अशोक का फ़ोन आया था आप फ़ोन नहीं उठा नहीं थी तो मुझे देखने के लिए भेजा था। वो बोले अब हम चलते हैं आप आराम करो।

अब नाटक के दूसरे भाग की बारी थी। मैंने अपने हाथ से अपना पेट पकड़ा, बदन में दर्द तो वैसे भी थोड़ा हो ही रहा था तो ओर दर्द के भाव लाते हुए उनसे कहा एक मिनट रुको, तुमने क्या किया यहाँ। वो घबरा गए। हकलाते हुए बोले कुछ नहीं बस आपको लेटाया और पानी छिड़का।

मैं आवाज़ में दर्द लाते हुए उन पर चिल्लाने लगी, मुझे बेवक़ूफ़ मत बनाओ, तुमने मेरे साथ कुछ तो गलत किया हैं। चारो तरफ नज़रे फेराते हुए एक दो जो भी हलकी फुलकी गाली आती थी देते हुए कहा तुम लोगो ने मेरे अंदर कोई तो डंडा या ऐसी कोई चीज़ डाली हैं।

दोनों की सिट्टी पिट्टी घूम हो गयी। मैंने चिल्लाना जारी रखा, सच सच बोलो क्या किया तुम लोगो ने, मैं अभी सबको इकठ्ठा करती हूँ। दोनों हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगते हुए बोले डंडा नहीं डाला,, वो हमने,, हमने खुद ही सेक्स किया था आपको ऐसी हालत में देख कर बहक गए थे। पर आप हमको माफ़ कर दो हमारा करियर जस्ट शुरू ही हुआ हैं सब बर्बाद हो जायेगा।

मैंने उनको डराना जारी रखा, तुम लोगो ने मेरी ऐसी वैसी फोटो वीडियो निकाली हैं न, ताकि बाद में मुझे बदनाम कर सको। दोनों गिड़गिड़ाने लगे, फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा कर बोले आप हमारा फ़ोन चेक कर लो कुछ नहीं हैं। मैंने दोनों के फ़ोन लिए और चेक करने लगी, हालांकि मुझे पता था की कुछ फोटो वीडियो नहीं लिया हैं।

मैंने फोन लौटाते हुए कहा अकेली देख कर जबरदस्ती कर रहे थे। मेरे पति को पता चल गया तो तुम्हारा खैर नहीं। तुम्हारे खिलाफ केस चलेगा। मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हो तुम दोनों।

दोनों घुटनो के बल बैठ गए, और हाथ जोड़ कर बोले ऐसा कुछ नहीं हैं। हम किसी को कुछ नहीं कहेंगे। हम तो वैसे भी अपने होम टाउन के पास ट्रांसफर लेने वाले हैं। अपना छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दो दीदी।

मैंने कहा दीदी बोल के ऐसा काम करते हो। मैं ये कपडे संभल कर रखने वाली हूँ जिसमे तुम्हारा सीमेन लगा हैं, अगर मैं कभी मुसीबत में फंसी तुम्हारी वजह से तो ये सबूत हैं तुमको नहीं छोडूंगी। फिर एक दो गाली देकर कहा दोनों यहाँ से जल्दी से फुट लो और कभी मेरे सामने मत आना।

दोनों फिर दुम दबा कर भाग गए। मैंने बाहर जाकर चेक किया वो जा चुके थे। मैं बैडरूम में आयी और पति को कहा कि बाहर आ जाओ रास्ता साफ़ हैं।

पति बाहर आये और मेरी तारीफ़ करने लगे सब गड़बड़ हो जाती अगर तुम संभालती नहीं तो। हमने सोचा ही नहीं कि दोनों दोस्त आ जायेंगे।

खैर हमने तो एक बार में एक को फंसाने का प्लान किया था पर एक साथ दो मुर्गे फंस गए, हालांकि मेरी हालत बहुत खराब हुई थी। दो तीन दिन तक शरीर में बहुत दर्द रहा। इस तरह हमारी साजिश का दुसरा पड़ाव पूरा हुआ।

फिर जब हमने दूसरा जाल फैलाया तो कही न कही मैं खुद ही फंस गयी और लेने के देने पड़ गए। हालांकि हमारा प्लान दोनों बार कामयाब रहा, पर कुछ दिनों तक बदन में बहुत दर्द रहा।

प्रैग्नैंसी टेस्ट तो चार पांच हफ्तों से पहले हो नहीं सकता था, इस बीच हम इंतज़ार करें या एक बार और साजिश करके किसी को फंसाया जाए ये निश्चित नहीं कर पा रहे थे।

मेरे शरीर के साथ रौनक और संदीप ने जैसे मजे लिए थे और जो मेरे साथ बीता इसके बाद मेरी तो हिम्मत नहीं हो रही थी।

इस बीच मेरे ससुराल से फ़ोन आया कि घर में एक फंक्शन हैं तो छुट्टी लेकर आ जाओ। ट्रैन के टिकट नहीं मिल रहे थे। दोनों शहरो के बीच ओवरनाइट स्लीपर बस की सर्विस थी, तो पति ने एक डबल स्लीपर बुक करवा दिया। इन चार पांच दिनों में मेरा दर्द धीरे धीरे कम पड़ते हुए ख़त्म हो गया था और मैं सामान्य होती जा रही थी।

अगले दिन होम टाउन जाना था और शाम को पति ने आकर बताया कि आज रंजन का फ़ोन आया था। रंजन मेरे पति का दूर के रिश्ते में भाई लगता हैं।

 
मैं शादी के पहले से उसको जानती थी, क्यों कि स्कूल में मेरी क्लास में ही पढता था। उसका घर भी हमारे होम टाउन में ही हैं।

पति ने बताया कि रंजन कल हमारे शहर आने वाला हैं वीसा स्टांपिंग के लिए। उसकी कंपनी उसको अपने विदेश वाली ब्रांच में शिफ्ट कर रही थी।

पति ने आगे बताया कि रंजन ने फ़ोन करके कहा था कि उसको कल वापस घर जाने के लिए कोई ट्रैन या बस की रिजर्वेशन नहीं मिल रही हैं। वो एक दिन के लिए हमारे घर में रुकने के लिए कह रहा था। मैंने बताया कि मगर कल तो हम बस से घर के लिए निकलने वाले है। तो उसने पूछा कि क्या हम उसे अपने साथ उस डबल स्लीपर में एडजस्ट कर सकते हैं क्या।

पति ने मुझसे पूछ कर उसको जवाब देने के लिए समय मांग लिया। उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं उसे हमारे साथ ही ले जाने में। वैसे भी तुम तो उसको पहले से जानती हो स्कूल टाइम से।

मैंने कहा डबल स्लीपर में तीन लोग होंगे तो जगह की समस्या से हमें असुविधा तो होगी। अभी आप ही सोच लो आपका ही रिश्तेदार हैं।

पति ने कहा मैं रंजन की माँ को भुआजी कहता हूँ, ऐसे कैसे उसको मना बोल दू। पहली बार उसने मदद मांगी हैं, एक रात की ही तो बात हैं, जैसे तैसे एडजस्ट कर लेंगे। मैंने कहा ठीक हैं जो आपकी इच्छा।

रात को सोते वक़्त पति ने पूछा ये रंजन कैसा लड़का हैं। मैंने कहा क्या मतलब कैसा लड़का हैं। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारी तबियत भी ठीक हैं, और हम वैसे भी चार हफ्ते इंतज़ार करने वाले हैं प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए। अगर रौनक और संदीप से पिछली बार कुछ नहीं हुआ होगा तो हमें फिर सब शुरू से करना पड़ेगा।

पति ने पूछा कि क्यों ना हम रंजन का इस्तेमाल कर ले अपने काम के लिए। वो तो तुम्हारे साथ पढ़ा हुआ हैं तो उसका तुम्हारे प्रति कोई झुकाव रहा होगा। ऐसे में उसको फंसाना आसान होगा।

मैंने कहा स्कूल के टाइम पर इतना कहा पता होता हैं। वो पढ़ने में तेज था तो सिर्फ नोट्स मांगने के लिए बात होती थी। स्कूल के बाद वो कॉलेज के लिए बड़े शहर चला गया। उसके बाद तो कभी कभार ही दिखता था। हालांकि मेरी सहेलिया कहती थी कि रंजन का मुझमे इंटरेस्ट हैं, पर उस उम्र में कभी ध्यान नहीं दिया।

पति ने कहा कि रंजन हमारे लिए सही शिकार हैं। वो वैसे भी कुछ दिनों बाद विदेश चला जायेगा। नजदीकी रिश्तेदार हैं तो शर्म और झिझक के मारे किसी को ये राज बताएगा भी नहीं। अगर तुम्हे पहले से थोड़ा बहुत चाहता होगा तो आसानी से फंस भी जायेगा।

मैंने सवाल उठाया मगर करेंगे कहाँ?

उन्होंने बताया कि बस में, वैसे भी जगह कम होगी तो उसको तुम्हारे नजदीक लाना मुश्किल नहीं होगा। बस में ही करवा लेंगे उससे अपना काम।

मैंने कहा तुम्हारे वहा होते हुए उसकी हिम्मत तो नहीं होगी मुझे हाथ लगाने की।

उन्होंने कहा कि उसके बारे में प्लान कर लेते हैं, कोशिश करने में कोई बुराई नहीं।

हमारे पास ज्यादा समय नहीं था प्लान बनाने का। आधी रात तक हमने सोच विचार किया पर ज्यादा कुछ बना नहीं पाए। फिर सबकुछ किस्मत पर छोड़ दिया। बस में देखा जाएगा क्या करना हैं। जैसी परिस्तिथि होगी वैसे करते जायेंगे।

अगली सुबह तक जो भी दिमाग में आया हमने आपस में विचार विमर्श कर लिया। अब रात की बारी थी। रंजन हमें बस स्टॉप पर ही मिलने वाला था। साडी से सफर में दिक्कत होती हैं तो मैंने बटन डाउन शार्ट शर्ट पहना और नीचे केपरी पैंट थी।

रात आठ बजे की बस थी तो हम वहा पहुंच गए, रंजन पहले से हमारा इंतज़ार कर रहा था। हमने टिकट चेक करवा कर कंडक्टर को थोड़े एक्स्ट्रा रुपये देकर एडजस्ट कर लिया ताकि तीसरे आदमी की अनुमति दे दे।

स्लीपर बस में दो टियर होते हैं। हमारा स्लीपर ऊपर की तरफ था। गैलरी के एक तरफ डबल स्लीपर तो दूसरी तरफ सिंगल स्लीपर होते हैं।

हम तीनो ने हमारे डबल स्लीपर के केबिन में चढ़ कर उसका शटर बंद कर दिया। अब हम तीनो आपस में बातें करने लगे। थोड़ी देर में बस रवाना हो गयी।

उसके आगे के क्या फ्यूचर प्लान हैं वो बताने लगा। उसका प्लान विदेश में ही बसने का था, जो की हमारे राज को बनाये रखने के लिए भी ठीक ही था।

 
बातें करते करते साढ़े नौ बज चुके थे, तो प्लान के मुताबिक पति ने कहा कि उनको अब नींद आ रही हैं तो सो जाते हैं।

मैंने कहा कि इतनी जल्दी क्या हैं, रोज तो देर से सोते हैं।

रंजन ने भी हां में हां मिलाई कि थोड़ी देर और बात करते हैं।

पति ने कहा कि आज ऑफिस में काम बहुत था तो थकान हो रही हैं तो बैठे बैठे नींद की झपकी आ रही हैं उनको तो सोना हैं।

हमें तो सोना था नहीं तो वो खिड़की के पास एक तरफ सो गए ताकि बाकी की जगह में हम बातें कर सके। उन्होंने एक छोटा चद्दर लिया और ओढ़ कर सोने का नाटक करने लगे।

मैं और रंजन अब स्कूल के समय की बातें करने लगे, अपने टीचर और अपने क्लासमेट को याद करने लगे। पता नहीं नहीं चला कब समय निकल गया।

मैंने अब रंजन से कहा अब सो जाते हैं, तुम भी थक गए होंगे।

रंजन ने कहा ठीक हैं, पर जगह बहुत कम हैं, तीनो को एक करवट सोना पड़ेगा। भैया को जगा देते हैं वो बीच में सो जायेंगे।

मैंने उसको टोकते हुए कहा, नहीं, इनको सोने दो गहरी नींद में उठाना ठीक नहीं हैं, उठाया तो वापस नींद मुश्किल से आएगी।

मैंने कहा मैं इनके पास सो जाती हूँ यहाँ बीच में और तुम मेरे पीछे सो जाना। एक रात की ही तो बात हैं हम एडजस्ट कर लेंगे।

रंजन ने पूछा कुछ ओढ़ने के लिए हैं क्या?

मैंने एक थोडी बडी चद्दर उसको देते हुए कहा कि छोटी वाली सिंगल चद्दर तुम्हारे भैया ने ओढ़ रखी है, मेरे पास ये डबल वाली चद्दर हैं ये तुम ओढ़ लो।

रंजन ने आनाकानी की, नहीं आप ओढ़ लो, आप क्या करोगे?

मैंने कहा चिंता मत करो मुझे वैसे भी जरुरत नहीं पड़ेगी। अगर जरुरत पड़ी तो तुमसे मांग लुंगी।

अब मैं पति की तरफ मुँह करके करवट लेकर सो गयी। मैंने अपने और पति के बीच में थोड़ी जगह छोड़ दी ताकि मेरे पीछे रंजन के सोने के लिए ज्यादा जगह ना बचे।

अब रंजन मेरे पीछे बची हुई जगह में लेट गया। ज्यादा जगह थी नहीं तो वो मुझसे सिर्फ चार इंच की दुरी पर रहा होगा।

अगर वो जोर की सांस लेता तो मुझे पीछे छोड़ी हुई सांस महसूस होती इतना नजदीक था। केबिन की लाइट पहले ही बंद कर दी थी, रास्ते में रोड लाइट की रोशनी कभी कभार हमारे केबिन में खिड़की के कांच से आती।

मैं अब इंतज़ार करने लगी कब वो पहली हरकत करेगा। एक दो बार वो हिला भी जब उसका शरीर मुझसे थोड़ा छू गया पर इसके अलावा कुछ हुआ नहीं।

अब मैंने ठण्ड लगने की एक्टिंग की और थोड़ा सिकुड़ गयी। रंजन ने चद्दर ओढ़ रखा था तो उसको लंबा करते हुए मुझे भी ओढ़ा दिया।

मैंने पलटते हुए कहा तुमको पूरी आ रही हैं न चद्दर। मुझे ओढ़ाने के चक्कर में खुद से मत हटा लेना।

उसने कहा नहीं ठीक हैं मेरे पास भी हैं।

मैंने उसको कहा थोड़ा ओर पास में खिसक जाओ पर पूरा ओढ़ कर रखना।

अब हम दोनों एक ही चद्दर में थे और मेरे कहे अनुसार वो ओर भी पास में खिसक कर लेटा था।

 
अब रह रह कर हमारी बॉडी टच हो रही थी। बीच बीच में, मैं ही थोड़ा हिल कर अपने शरीर को थोड़ा छुआ देती उससे। इस छूने वाला खेल काम कर रहा था। वो उत्तेजित होकर जानबूझ कर अब वो एक बार छू जाने के बाद शरीर वही चिपकाये रख रहा था।

मैंने अब तेज गहरी सांसें निकालना शुरू कर दिया, जिससे उसे लगे कि मैं सो रही हूँ। अब उसके नाक से निकलती सांसें मैं अपने गर्दन पर महसूस कर रही थी, वह मेरे बहुत नजदीक आ चूका था। थोड़ी ही देर में उसके होठ मेरे गर्दन और कान के नीचे चुमते और दूर हो जाते।

अगली बार जैसे ही वो अपने होठ मेरे गर्दन के पास लाया, मैंने अपनी गर्दन थोड़ी सी घुमाई जिससे उसके होठ तेजी से मेरी गर्दन पर टकरा कर छू गए और चुम्मा ले लिया। उसके होठ वही चिपक गए, उसने हटाए नहीं। उसको मजा आ रहा था।

थोड़ी देर ऐसे ही वो अपने होठ मेरी गर्दन पर हलके हलके फेरता रहा। मुझे एक मीठी गुदगुदी हो रही थी।

उसने अपना शरीर मेरे पिछवाड़े से चिपका दिया, मैं उसकी पैंट के अंदर के अंग को महसूस कर पा रही थी। वो अंग अब कड़क हो चूका था, मतलब वो तैयार था बस हिम्मत करने की देर थी। वो अपने शरीर को अब हल्का सा ऊपर नीचे कर मेरे पिछवाड़े पर रगड़ रहा था।

उसने अब हिम्मत करके अपना हाथ मेरी पतली कमर पर रख दिया। मेरे हाथ ऊपर आगे की तरफ थे जिससे मेरा शार्ट शर्ट कमर से थोड़ा ऊपर उठ चूका था।

जिससे उसका हाथ मेरी नंगी कमर पर छू रहा था। मेरी पतली कमर उसके हाथ की उंगलियों और अंगूठे के बीच आराम से समा गयी। कमर को पकडे हुए उसकी उंगलिया मेरे कमर पर चल रही थी।

उसके हौंसले अब थोड़े और बढे तो उसने कमर पर रखा हाथ धीरे धीरे खिसका कर शर्ट के अंदर डाल कर ऊपर की तरफ बढ़ाना शरू किया।

कुछ ही देर में उसकी एक ऊँगली मेरे ब्रा को छू गयी और अंदर के वक्ष थोड़े दब गए। उसके हाथ वही रुक गए और वो ऊँगली कुछ देर वक्षो को ऐसे ही छूती रही।

वो एक बार फिर हाथ को खिसकाते हुए मेरे नाभी तक ले आया और अपना पंजा पूरा मेरे पेट पर फैला दिया। काफी देर तक वह हाथ मेरे पेट पर फेराता रहा, शायद पति के पास लेटे होने से उसकी हिम्मत नहीं पा रही थी आगे बढ़ने की।

मैंने सोचा अब मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। अब तक हमारी साजिश का एक रूल था कि सारी हरकते सामने वाले को ही करनी थी, मुझे तो सिर्फ ब्लेम गेम खेलना था काम होते ही। पर आज बात अलग थी।

मैंने उसको थोड़ा सा ग्रीन सिग्नल देने के लिए अपना हाथ उसके हाथ पर रखने के लिए नीचे खिसकाया। मुझमे हरकत होते देख वो डर गया और अपना हाथ तुरंत मेरे पेट से हटा लिया और पीछे से थोड़ा दूर भी हट गया। मुझे अफ़सोस हुआ, मैंने तो उल्टा काम बिगाड़ कर उसको डरा दिया।

मुझे पता था कि उसको मजा तो आया होगा, इसलिए वो फिर से कोशिश जरूर करेगा। उसको सरप्राइज के साथ ग्रीन सिग्नल देने के लिए मैंने अपने शर्ट के सारे बटन खोल कर शर्ट को सामने से पूरा पीछे हटा दिया। अब मैंने अपने हाथ फिर से पुरानी स्तिथि में ऊपर की तरफ ले गयी।

ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा, रंजन जल्द ही फिर मुझसे चिपक गया और अपना हाथ मेरे कूल्हे पर रख दिया, जहा मेरी कैपरी कमर से बंधी हुइ थी।

अब वो अपना हाथ धीरे धीरे खिसकाते हुए कमर से होते हुए नाभी तक ले आया। पिछली बार की तरह फिर उसने अपना हाथ शर्ट में घुसाने की कोशिश की। पर शर्ट तो उसको छुआ ही नहीं, वो तो मैं पहले ही हटा चुकी थी।

वो दो तीन इंच और आगे बढ़ा पर शर्ट का नामोनिशान नहीं था। चद्दर ओढ़े होने से वो देख भी नहीं पा रहा था कि शर्ट कहाँ हैं।

उसको अब अहसास हो गया था कि शर्ट तो हैं ही नहीं, मैंने ही निकाला होगा। वो खुश हो गया मेरे सिग्नल को देख कर। एक झटके में उसने अपना पंजा मेरे ब्रा पर मारा और मेरा एक वक्ष दबोच लिया और मसलने लगा, जैसे अपनी जीत का जश्न मना रहा हो।

पर किला तो अभी फतह करना बाकी था। उसने मेरे ब्रा में हाथ डाल कर मेरे वक्षो को छूने की कोशिश की। पर ज्यादा कामयाबी नहीं मिली तो अपने हाथ पीछे ले जाकर मेरे आधे खुले शर्ट में घुसा कर ब्रा का हुक खोलने की कोशिश करने लगा।

पर उसकी आदत तो थी नहीं तो थोड़ी देर संघर्ष करता रहा एक हाथ से वो टाइट हुक खोलने की।

जैसे ही उसने हुक खोला तो शायद बहुत खुश हुआ और इसी ख़ुशी में मेरी बगल से होते हुए अपना हाथ मेरे ब्रा में डाल दिया और मेरे वक्ष को भींच लिया।

 


मुझसे इतना इंतज़ार नहीं हुआ। मैं अपना फ्री हाथ पीछे की तरफ ले गयी और उसकी जींस का बटन खोल दिया। फिर उसकी चैन नीचे करके उसके अंतवस्त्र में हाथ डाल दिया।

मेरा हाथ उसके कड़क अंग को छू गया। मैंने उसको पकड़ा और अपने हाथ से उसको ऊपर नीचे रगड़ने लगी। उसको तो जैसे करंट लगा। उसके होठ मेरी गर्दन और कंधो को चूमने लगे।

मैंने अपना हाथ बाहर निकाल कर उसकी जीन्स को नीचे खींचने लगी, पर हाथ पीछे होने से इतना जोर नहीं लगा पाई। उसने मेरे वक्षो को छोड़ा और मेरी मदद के लिए अपने अंतवस्त्र सहित जींस नीचे खिसका दी। उसका लंड अब जींस के बंधन से मुक्त हो गया था, और मेरे तैयार होंने के संकेत भी मिल गए।

अब उसने मेरी केपरी के बटन और चैन खोल दी और नीचे खिसका कर घुटनो तक ले गया। उसके बाद मैंने ही अपने दोनों टांगो को झटकते हुए केपरी सहित अंतवस्त्र अपनी एक टांग से पूरा निकाल दिया।

उसने हाथ मेरे नंगे कूल्हों पर रख दिए और मेरे फिगर को महसूस करने लगा। वो घुटनो से लेकर मेरे चुचियों तक अपने हाथो को मेरे बदन के ऊपर नीचे रास्तो की सैर करवा रहा था। इस बीच उसका कड़क लंड मेरे पिछवाड़े को छू रहा था।

उसने अब हाथ मलना छोड़ा और अपना लंड पकड़ कर मेरी दोनों टांगो के बीच डाल कर धक्का मारने लगा। मैं अपना हाथ नीचे ले गयी और उसके लंड को पकड़ कर सही रास्ता दिखाते हुए आगे के छेद में लगा दिया। इतनी देर की मालिश से वैसे भी पानी बनाने लगा था। वो तेजी से मेरे अंदर प्रवेश कर गया।

एक बार अंदर डालने के बाद तो उसका नियंत्रण ही नहीं रहा। वो झटके पर झटके मारने लगा। हमारे पास हिलने को ज्यादा जगह नहीं थी तो वो जोर से नहीं मार पा रहा था, पर फिर भी काफी गहराई में उतर रहा था। इन सबके बीच उसका एक हाथ बराबर मेरे चुचों को दबा रहा था।

मैंने भी बदन दर्द के मारे पिछले कुछ दिनों से नहीं किया था तो मैं वैसे भी तड़प रही थी। अगले दस बारह मिनट तक वो ऐसे ही मजे लेता रहा। अब उसने अपने आप को मुझसे अलग कर लिया।

मेरे कंधो पर हाथ रख अपनी तरफ घुमाया। मैं पलट कर अब उसकी तरफ मुँह करके लेट गयी। जिससे चद्दर मेरे ऊपर से हट गयी।

अब उसने मेरे दूसरे हाथ से भी शर्ट और ब्रा पूरा निकाल दी जिससे मैं टॉपलेस हो गयी। उसने मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए और चूसने लगा। मैंने भी उसके होठों को चूसना शुरू किया। हम दोनों को नशा चढ़ने लगा।

उसने एक बार फिर अपना लंड पकड़ा और मेरे अंदर डालना शुरू किया। मैने अपनी ऊपर वाली एक टांग उठा कर उसकी जांघो पर रख दी, जिससे मेरा छेद ओर खुल जाये और उसको अंदर डालने की ज्यादा जगह मिल सके।

एक बार फिर वो मेरे अंदर था और झटके पे झटके मार रहा था। हम दोनों के होठ चिपके हुए थे और रासपान कर रहे थे साथ ही बीच बीच में उसका हाथ मेरी चुचियों को दबा रहा था।

मैंने अपनी पीठ पर एक हाथ फिरते हुए महसूस किया। रंजन का एक हाथ नीचे दबा था और दूसरा मेरे सीने पर तो पीठ वाला हाथ पति का ही था। शायद वो बताने की कोशिश कर रहे थे कि हमारी साजिश सही जा रही हैं।

जैसे ही रंजन ने अपना हाथ मेरी कमर पर रखा मेरे पति ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। थोड़ी देर में जैसे ही रंजन चरम की तरफ बढ़ा तो उसने मुझे पीठ से कस कर पकड़ अपने सीने से चिपका दिया और ओर भी गहरे झटके मारने लगा। बस के तेज चलने की आवाज़ों के बीच हमारी आवाज़े दब सी गयी थी।

मेरा भी पानी निकलने लगा था और उसके पानी से संगम होने लगा। चरम पे पहुचते ही उसने पता नहीं कब से संभाल कर रखा हुआ ढेरो चिपचिपा पानी मेरे अंदर पूरा खाली कर दिया।

 
पानी इतना था कि खाली होने में ही कुछ सेकंड लग गए। थोड़ी देर ऐसे रहने के बाद उसने लंड बाहर निकाला।

इतना पानी निकला था कि मेरे नीचे पूरा गंदा हो गया था। मैं खुश थी कि इतने पानी से मेरा काम तो हो ही गया होगा। मैंने सर के पास रखे पर्स में पहले से रखे पेपर नैपकिन निकाले और थोड़े उसको दिए।

अब हम दोनों अपने अपने अंगो को साफ़ करने लगे। फिर गंदे नैपकिन एक थैली में रखकर कोने में रख दिए।

हमने अपने कपडे वापिस पहन लिए, और फिर से पहले वाली पोजीशन में चद्दर ओढ़ कर सो गए।

आधी रात के करीब रास्ते में एक ढाबे पर बस रुकी तो रंजन वो नैपकिन की थैली बाहर फेंक आया और एक बार फिर सो गया।

सुबह छह बजे मेरी नींद खुली मैंने घडी देखी। बाहर अभी भी अँधेरा था। मुझे याद आया कि सुबह का सेक्स गर्भवती होने के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं। मैंने सोचा मुझे एक बार फिर से करना चाहिए। परन्तु पति तो सो रहे थे उनकी इजाजत कैसे लेती।

उनको उठाने के चक्कर में रंजन को पता चल जाता तो। मैंने पलट कर देखा रंजन भी रात की मेहनत के बाद चैन से सो रहा था। ये आखरी मौका था मेरे लिए। माँ बनने का लालच मेरे दिल पर हावी हो गया और सो मैंने उसको जगाने का फैसला किया।

मैं अपना हाथ पीछे ले गयी और एक बार फिर उसकी जीन्स का बटन और चैन खोल कर उसके अंगवस्त्र में अपना हाथ डाल दिया। उसका लंड भी रात की मेहनत के बाद सोया पड़ा था।

मैं अब उसकी छोटी नरम चीज़ को हाथ से ऊपर नीचे कर मसलने लगी। रंजन की आँख खुली और उसने अपना हाथ मेरी जांघो पर रख दिया।

थोड़ी देर रगड़ने के बाद ही उसका लंड धीरे धीरे विशाल रूप धारण करने लगा। थोड़ी देर पहले मैं अपनी दो तीन उंगलितो से उसको रगड़ पा रही थी अब एक पूरी हथेली भी छोटी पड़ रही थी।

जैसे ही वो काम करने लायक कड़क हुआ तो मैं उसको छोड़ दिया और उसकी जींस नीचे खिसकाने का इशारा किया। जब तक उसने अपनी जीन्स नीचे की मैंने भी अपनी केपरी और अंतवस्त्र खोल कर नीचे कर दिए।

मेरे कपडे खोलते ही उसका लंड मेरे नग्न पिछवाड़े से टकरा गया। उसने बिना इंतज़ार करे अपना लंड पकड़ कर मेरे पीछे वाले छेद में डालने का प्रयास करने लगा। मुझे तो उसका माल आगे वाले छेद में चाहिए था न कि पीछे वाले में।

मैं अपना हाथ पीछे ले जाकर उसको रोकती तब तक तो उसने एक दो इंच अंदर डाल ही दिया और आगे पीछे मारने भी लगा। मुझे दर्द हुआ, और अपने शरीर को उससे थोड़ा दूर कर दिया जिससे उसका लंड बाहर निकल गया।

मैंने अब खुद ही बिना देर किया उसका लिंग फिर पकड़ा और एक टांग उठा कर अपने आगे के छेद में घुसा दिया। उसकी मशीन एक बार फिर चालु हो गयी और झटके मारने लगी।

सुबह के समय थोड़े सेंसेशन कम होते हैं तो उसको मजा कम आ रहा था। ज्यादा मजे के लिए उसको जोर से झटके मारने थे। पर उतनी जगह तो वह थी नहीं। मुझे एक ऊपर सुझा।

अगर आपको यह कहानी पसंद आ रही है, तो सबसे पहली हिन्दी सेक्स की कहानी जरुर पढियेगा। वह भी आपको जरुर पसंद आएगी।

मैंने उसका पिछवाड़ा एक हाथ से पकड़ा और अपनी तरफ खींचते हुए मैं मुँह के बल उल्टा लेट गयी और वो मेरे ऊपर सवार हो गया। चद्दर ऊपर से हट कर मेरे और पति के बीच आ गिरी। मेरी पैंट घुटनो पर अटकी थी तो मैंने जितना हो सकता था दोनों पाव थोड़े से फैला दिए।

उसने अपने दोनों हाथ मेरे हाथों पर रखे और अब वो ऊपर नीचे होते हुए जोर से मेरे पीछे झटके मारने लगा। उसको इस बात की भी परवाह नहीं रही कि मेरे पति पास में सो रहे हैं।

वो इतनी जोर से मेरे पिछवाड़े से टकरा रहा था कि जोर जोर से आवाज़ हो रही थी। जोर के झटको की वजह से थोड़ी ही देर में हम छूटने की हालत में आ गए।

तभी इन आवाज़ों से मेरे पति की नींद में व्यवधान आया और वो थोड़े से हिले। उन्हें तो पता नहीं भी था कि हम दोनों सुबह भी करने वाले थे।

रंजन घबरा कर मेरे ऊपर से हटा और लुढ़क कर अपनी जगह वापस लेट गया। मैंने भी पति की तरफ करवट करते हुए पास रखा चद्दर ओढ़ लिया। रंजन ने भी पीछे से चद्दर अपने ऊपर ओढ़ लिया।

रंजन एक बार फिर मेरे पिछवाड़े से चिपक गया। रंजन चरम के काफी नजदीक जाकर बाहर निकला था सो उस ने एक बार फिर मेरे अंदर प्रवेश किया। उसके झटके फिर से शुरू हो गए। उसने अपना एक हाथ भी मेरे शर्ट में घुसाते हुए मेरे ब्रा को दबोच लिया।

पति ने अब आँख खोली और मेरी तरफ देखा। मेरी आँखें खुली थी। रंजन को भी पता चल गया तो उसने झटके मारना बंद कर दिया पर लंड अभी भी मेरे अंदर ही था। अब वो बहुत ही होले होले अंदर बाहर कर रहा था, इतना धीरे की मैं बिलकुल ना हिलु और पति को शक न हो।

 
Back
Top