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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

उसने लुंगीनुमा साडी को मेरे पेरो में पिरो कर ऊपर खींचते हुए कमर तक ले आया। साड़ी काफी ढीली थी उसने एक्सट्रा बचे हिस्से को तह बना कर फोल्ड किया पेटीकोट में घुसा दिया। साडी अब अच्छी खासी टाइट पेटीकोट से बंध चुकी थी।

मैंने बाकी की साडी के प्लीट्स बनाये और उसने ऊपर से नीचे तक साडी को अच्छे से व्यवस्थित कर दिया।

उसकी इस कला पर मैं फ़िदा हो गयी। असंभव लगने वाला काम उसने कर दिया था। मुश्किल काम हो चूका था तो मैंने बाकी की साडी बैठ कर पहन ली।

अब वो मेरे करीब आया और कानो में कहने लगा, अभी थोड़ा टाइम हैं तो एक राउंड और हो जाये। मैंने उसको धक्का देते हुए दूर किया।

बाकी के बचे रास्ते में हम दोनों एक दूसरे को छूते रहे और मस्ती करते रहे। जैसे ही हमने शहरी इलाके में प्रवेश किया, प्रशांत ने बीच का पर्दा हटा दिया। उसकी मम्मी सो रही थी तो उनको उठाया।

कार अब मेरे घर के बाहर थी, अंकल ने कार के अंदर की लाइट्स लगा दी। मौसी उठ गए और मेरे साथ बाहर आ गए। प्रशांत मेरा बैग निकालने डिक्की की तरफ गया।

मौसी ने कार के अंदर इशारा किया और कहा इसे बाहर फेंक दे। मैंने अंदर देखा आधा इस्तेमाल किया कंडोम पड़ा था जिसे हटाना हम भूल गए थे।

मेरे पैरो के तले जमीन खिसक गयी। मौसी को सब मालूम चल गया था। मैंने कंडोम उठा कर बाहर फेंक दिया। मौसी कार में जाकर बैठ गए और मैं ठगी सी वहाँ खड़ी रह गयी।

प्रशांत को अहसास हो गया था, उसने मेरा बैग थमाया और आँखों के इशारे से दिलासा दिलाया। वो गाडी में बैठ कर जा चुके थे और मैं धीमे भारी कदमो से घर के अंदर जाने लगी।

कुछ दिन बाद मुझको अपने पति और बच्चे के साथ फिर काम वाले शहर लौटना था. पर दो दिनों तक मैं इस तनाव में रही कि कहीं मौसी घर पर ना आ जाए और सास – पति को सब न बता दे।

इतने तनाव के मारे मेरा अगले ही दिन पीरियड भी आ गया था। इन दो दिनों में मैंने भी घर से बाहर निकलना छोड़ दिया था। जब भी घर में फ़ोन की घंटी बजती मेरा दिल धक् से रह जाता कही मौसी का ही फ़ोन तो नहीं।

खैर दो दिन बाद ही मुझे एक अनजाने नंबर से मैसेज मिला, वो प्रशांत का ही था। उसने लिखा था कि माँ ने अकेले में बहुत डांटा था और इस घटना का जिक्र किसी से भी ना करने को कहा हैं वरना सबकी बहुत बदनामी होगी। यहाँ तक की उसकी बीवी को भी पता नहीं चलने दिया हैं।

उस दिन के बाद मैं कभी उसके घर नहीं गयी और ना ही मेरे वहा रहते मौसी या प्रशांत कभी मेरे घर आये। यहाँ तक की मेरी कभी फ़ोन पर भी बात नहीं हुई। हमने इसे एक बुरे अध्याय की तरह भुला दिया।

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खैर इस बात को अब कुछ समय बीत गया था। इस बीच अब ससुराल में बार बार जाने के बजाय मैंने पति को बोल कर सासुमां को ही हमारे साथ रहने के लिए बुला लिया था।

इससे दो फायदे हुए, एक तो सास को मौसी से दूर कर दिया ताकि भांडा ना फूटे और मेरे वहां ना जाने से उनको उस काण्ड की याद भी नहीं आएगी।

एक दिन मेरी माँ का फ़ोन आया कि घर में कुछ फंक्शन रखा हैं तो हो सके तो कुछ दिन पहले ही आ जाना, घर में इतने काम रहेंगे तो मदद हो जाएगी।

मैंने पति और सास से बात की और ये फैसला किया की बाकी लोग फंक्शन वाले दिन आ जायेंगे, पर मैं कुछ दिन पहले जाकर उनकी मदद कर दू।

मैं अपने मायके पहुंच गयी। मेरे पापा, मम्मी भैया और भाभी ने काफी काम पहले ही बाँट रखे थे। सबसे पहला काम था लोगो को निमंत्रण देना।

हमने इलाको के हिसाब से मेहमानो की तीन लिस्ट बना ली, एक लिस्ट पापा को, दूसरी भैया भाभी को तो तीसरी मेरे और मम्मी के हिस्से आयी जहाँ हमें निमंत्रण देने जाना था।

हमारी लिस्ट में वो एरिया था जो नया नया बसा था, जहां हमारे कुछ रिश्तेदार कुछ समय पहले ही शिफ्ट हुए थे। मुझे और मम्मी को उस एरिया के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी।

परंतु उस एरिया के पास मुख्य सड़क पर मेरी मम्मी की सहेली सुधा आंटी रहती थी, जिनके घर मम्मी पहले जा चुकी थी। चूँकि वो उसी एरिया के पास रहती हैं तो उनको वहां की पूरी जानकारी हैं, कौन कहाँ रहता हैं।

निमंत्रण तो उनको भी देना ही था, तो ये तय किया की पहले उनके घर जाएंगे और फिर उनकी मदद से बाकी लोगो को भी निमंत्रण दे देंगे।

पहले सुधा आंटी हमारे घर के पास में ही रहते थे, इसी वजह से मेरी मम्मी और उनकी दोस्ती हुई थी। दोनों पक्की सहेलिया थी तो एक दूसरे के घर काफी आना जाना था तो हम बच्चे लोग भी अच्छे से जानते थे। कुछ सालो पहले ही वो अपने इस नए घर में रहने को आये थे।

अगले दिन दोपहर से पहले मैं और मम्मी भाभी की स्कूटी लेकर सुधा आंटी के वहां पहुंच गए। मैं उस एरिया में काफी सालों बाद आयी थी, तो सब कुछ बदला बदला सा लगा।

मम्मी भी काफी समय से नहीं आयी थी, तो वो भी थोड़ा कंफ्यूज थी नयी नयी गलियों की वजह से। पर सुधा आंटी का घर मुख्य सड़क पर था तो ज्यादा मुश्किल नहीं हुई।

उन्होंने हमारा स्वागत किया और बहुत अच्छे से आवभगत की। मुझसे वो काफी समय बाद मिल रही थी तो मेरी खैर खबर ली। उन्होंने मम्मी को अपनी अपडेट भी दी कि वो जल्द ही दादी बनाने वाली हैं, उनकी बहु बच्चे की डिलीवरी के लिए 2 महीनो से पीहर गयी हुई हैं।

 
हमने उनको फंक्शन में आने का निमंत्रण दिया और फिर अपनी समस्या बताई की उनकी मदद चाहिए। उनको लिस्ट दिखाई तो उन्होंने कहाँ ये सब लोग यहाँ आस पास ही रहते हैं मैं आपको ले चलती हूँ वहां।

तभी उन्होंने कहाँ कि मैं पहले संजू को फ़ोन कर देती हूँ, वो दूकान से लंच के लिए इसी समय आता हैं। उसको थोड़ा थोड़ा लेट आने को बोल देती हूँ। वो फ़ोन कर ही रहे थे कि डोरबेल बजी। उन्होंने दरवाज़ा खोला तो संजू ही था।

संजू सुधा आंटी का लड़का था जिसकी बीवी डिलीवरी के लिए उसके मायके गयी हुई थी। संजू मेरे भैया का दोस्त भी था। क्यों कि पहले पडोसी थे और दोनों की मम्मिया पक्की सहेली थी तो उनके बच्चे भी आपस में दोस्त बन गए।

जब मैं छोटी थी और स्कूल में पढ़ती थी तो संजू के साथ खेला करती थी। पर जैसे जैसे उम्र बढ़ी लड़का लड़की में फ़र्क़ पता चला तो खेलना छूट गया और शर्म आने लगी। हालांकि संजू मेरे भैया का दोस्त था तो हमारे घर कभी कभार आता रहता था।

संजू ने अंदर आकर मेरी माँ के पाँव छुए और मुझसे हाय हेलो हुआ। आंटी ने संजू को पूरी बताई कि वो उसी को फ़ोन कर रहे थे। अब तुम आ ही गए हो तो पहले तुम्हारे लिए खाना बना देती हूँ, सब्जी तैयार हैं सिर्फ गरम करनी हैं और आटा गुंथा हुआ हैं सिर्फ रोटी डालनी हैं।

अब मेरी मम्मी ने बीच में अड़ंगा लगा दिया, वो बोली अरे संजू के लिए खाना तो मेरी बेटी बना लेगी, तब तक हम दोनों जाकर वो निमंत्रण का काम कर आते हैं।

मैंने अपनी अपनी मम्मी को घूरते हुए गुस्से से देखा कि वो कहाँ फंसा रही हैं। मम्मी ने तुरंत मेरा चेहरा पढ़ लिया और बोली बना ले वरना तो हम लेट हो जायेंगे, घर पर ओर भी काम पड़े हैं।

आंटी खुश हुए कि चलो आज खाना बनाने से छुट्टी और मम्मी खुश की समय बच जाएगा। मम्मी बोली हम आधे घंटे के अंदर आ जाएंगे निमंत्रण देके, जैसे उनको उस एरिया की पूरी जानकारी हो।

आंटी बोले चलो मैं तुमको किचन में सब सामान कहाँ पड़ा हैं बता देती हूँ। अब बीच में कूदने की बारी संजू की थी। वो बोला आप चिंता मत करो मम्मी मैं बता दूंगा सामान कहाँ पड़ा हैं मुझे पता हैं।

मम्मी और आंटी अब बाहर निकल पड़े। मैं उनको देखती ही रह गयी जब तक कि दरवाज़ा बंद नहीं हो गया।

संजू बोला आओ मैं तुम्हे बता देता हूँ सामान कहाँ हैं। किचन में ले जाकर बोला ये किचन हैं। मैंने सोचा बोल दूं कि मुझे भी दिख रहा हैं ये किचन हैं। उसने अब चकला, बेलन, लाइटर वगैरह सब सामान बताये।

उसने अब एप्रन लाकर दिया ताकि मेरी साड़ी खराब ना हो जाये। वो वही पीछे खड़ा रहा और मैंने रोटी बनाना शुरू किया।

मैंने पूछा कितनी रोटी बनाऊ? तो उसने लापरवाही से कहाँ जितनी प्यार से खिला सको उतनी बना दो।

बचपन में उसके साथ खेलते वक्त वो हमेशा मुझसे जीतता था और फिर बहुत चिढ़ाता था, तो उसपर गुस्सा भी आता था। और अब उसकी इस बात पर गुस्सा आया।

उसने आगे कहाँ कि तुम्हारी साइज के हिसाब से बताता हूँ। मैंने सोचा क्या मतलब था उसका, मैं तो ठहरी एक दुबली पतली लड़की तो फिर किस साइज की बात कर रहा था। मेरे सिर्फ स्तन और कूल्हे ही थोड़े बड़े थे।

पर उसने बात संभालते हुए बताया कि वो रोटी की साइज की बात कर रहा हैं। पहली बेली रोटी के आधार पर उसने चार रोटियों की फरमाइश की।

अगर अपने मेरी पिछली देसी हिन्दी सेक्सी स्टोरी “बेगानी शादी में सुहागरात मेरी” नहीं पढ़ी तो उसे जरुर पढ़िए।

उसने आगे बात करना जारी रखते हुए पूछा, तुम्हे पता हैं मेरी मम्मी मेरे लिए तुम्हारा हाथ मांगने आयी थी और तुम्हारी मम्मी ने ये कहते हुए मना कर दिया था, कि इतने पास में शादी नहीं करनी वरना झगडे ज्यादा होते हैं।

 
मुझे याद हैं जब मैं हाई स्कूल में थी तब एक बार मेरी मम्मी मेरे पापा से ये बात कर रही थी। मैं तो इतनी बड़ी थी नहीं कि उन बातों में कोई दिलचस्पी दिखाती। वैसे भी मेरे घर वालो ने मना कर दिया था।

मैंने संजू को जवाब दिया, हां याद हैं, मेरी मम्मी पापा से बात कर रही थी और यही कारण दिया था। मैंने पूछा तुम्हे पता था?

वो बोला मैंने ही तो भेजा था उनको। मैं चुप हो गयी।

संजू ने पूछा अगर तुम्हारी मम्मी तुमसे राय मांगती तो तुम क्या कहती?

मैंने कहा पता नहीं, मैं तो छोटी थी, पढाई करनी थी तो शायद ना ही बोलती।

संजू ने पूछा अच्छा अगर ये सवाल तुम्हारे कॉलेज ख़त्म होने के बाद पूछा होता तो तुम क्या बोलती?

अब मैं असमंजस में पड़ गयी। अगर ना बोलती, तो कारण क्या बताती, अगर हां बोलू तो पता नहीं मेरे बारे में क्या सोचेगा।

सच्चाई तो ये थी की जब मैंने मेरे मम्मी पापा को उस ऑफर के बारे में बात करते सुना था तो मैं शर्मा गयी थी। उसके बाद जब भी वो हमारे घर आता था तो उसको देख कर मैं सामने जाने से कतराती थी पर छुप कर जरूर देखती थी।

शायद मन ही मन उसको अपना मंगेतर मान लिया था, जब तक कि कुछ सालों बाद मेरी सच मैं मेरे पति के साथ सगाई नहीं हो गयी थी।

फिलहाल मैंने सोचा उसका दिल क्या दुखाना सच तो खैर यही हैं, इसलिए मैंने जवाब दिया कि हां कह देती, ऐसा कुछ ना कहने के लिए था ही नहीं।

संजू बोला मैं तुम्हारे भैया से मिलने तुम्हारे घर आता था, असल में मैं इसलिए आता था कि इस बहाने से तुम्हे देखने का मौका मिल जाता था। कभी कभार तुमसे बात हो जाती तो आवाज सुनने को भी मिल जाती थी।

वो एक के बाद एक ऐसे राज बता रहा था और मुझे भी कुरेद कर मेरे दिल को टटोल रहा था।

उसने कहा कि स्कूल कॉलेज के समय से लेकर अब तक तुम काफी बदल गयी हो।

उसने पूछा एक बात बताउ, बुरा तो नहीं मानोगी?

मैंने कहा मैं अब पांच सात साल उम्र में ज्यादा हो गयी होंगी ओर क्या।

वो बोला नहीं, तुम पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गयी हो। पहले सलवार कुर्ता पहनती थी और अब साड़ी, जिससे तुम्हारी पतली सेक्सी कमर अब अच्छे से दिखती हैं।

अपनी तारीफ़ सुन मैंने अपनी हंसी अंदर ही दबा ली और शर्मा गयी। उसने तारीफ़ जारी रखी, पहले तुम्हारे सीने का हल्का उभार था अब इतना ज्यादा कि अच्छी अच्छी हीरोइने भी देख कर शर्मा जाए।

तुम्हारे ब्लाउज के पीछे के जालीदार हिस्से से झांकती तुम्हारी पीठ की स्किन पहले नहीं दिखती थी अब दिखती है। और तुम्हारे…

मैंने उसको बीच में ही टोंकते हुए कहा बस बहुत हुई तारीफ़।

खाना तैयार था तो मैंने उसको थाली में लगा दिया उसको खाने के लिए बोल दिया। एप्रन निकाल कर रख दिया और बाहर जाने लगी।

उसने मुझे रोकना चाहा और कहा कि वो मेरे प्यार में पागल था। मैंने वहां से जाना ही ठीक समझा और बिना रुके उसके सामने से होते हुए निकलने लगी।

पर उसने पीछे से मेरे साड़ी का पल्लू पकड़ लिया था। जैसे ही मैं तेजी से आगे बढ़ी तो पल्लू खिंच गया और कंधे पर साड़ी और ब्लाउज पर लगी पिन की वजह से मेरा ब्लाउज कंधे से नीचे खिसक गया। फिर झटके से पिन भी निकल गयी और शरीर के ऊपरी भाग से साड़ी नीचे गिर गयी।

मेरी ब्रा का एक स्ट्रेप दिखने लगा और एक कंधा भी नंगा हो गया था। मेरे पेट से लेकर ऊपर के हिस्से में सिर्फ एक ब्लाउज ही बचा था। मैंने तुरंत पल्लू पकड़ा और अपनी तरफ खिंचा।

संजू अब पल्लू को अपनी कलाई पर लपेटता हुआ मेरे नजदीक आ गया। पास आते ही उसने मेरा नीचे खिसका हुआ ब्लाउज फिर से कंधे पर चढ़ा दिया। फिर उसने मेरा पल्लू भी छोड़ दिया।

मैंने फिर से पल्लू अपने ऊपर डाला और किचन के बाहर आ गयी।

 
वो भी मेरे पीछे पीछे बाहर आया और कहने लगा मैं अब भी तुमसे उतना ही प्यार करता हूँ।

उसने मुझसे पूछा क्या तुम्हे भी मुझसे कभी प्यार रहा हैं।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

वह ऊपर सीढ़ियों पर चढ़ने लगा और कहा, मैं ऊपर अपने कमरे में जा रहा हूँ, अगर तुम्हे मुझसे कभी भी थोड़ा सा भी प्यार रहा हो तो ऊपर आ जाना। मैं अब नीचे आके तुम्हे ओर परेशान नहीं करूँगा।

संजू सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर जा चूका था। मैं वही दो मिनट खड़ी रही और सोचने लगी।

दिमाग कह रहा था अब कोई मतलब नहीं, इससे किसी का भी भला नहीं होने वाला। पर दिल कह रहा था कि थोड़े समय के लिए ही सही मुझे उससे प्यार और आकर्षण तो रहा था।

मैं इसी दुविधा में थी कि क्या करना चाहिए और मेरे कदम खुद-ब-खुद सीढ़ियां चढ़ रहे थे।

थोड़ी ही देर में मैं ऊपर पहुंच उसके कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़ी थी। अंदर झाँका तो वो मेरी तरफ पीठ कर खिड़की से बाहर देख रहा था।

मैंने कमरे में प्रवेश किया और हाथ हिलने से मेरी चूड़ियाँ बज उठी। आवाज़ सुनते ही वो ख़ुशी से पलटा। मेरी करीब आया और कहने लगा मुझे पता था तुम जरूर आओगी।

उसने आगे बढ़ कर मुझे अपने सीने से लगा लिया।

मैं उसकी बाहों में जैसे पिघल रही थी। उसका हाथों की उंगलिया मेरे ब्लाउज की जालीनुमा डिज़ाइन से मेरे पीठ को छू रही था। मेरे वक्ष उसके सीने से थोड़ा दब से गए थे। अब मैंने भी अपने हाथ उसकी भुजाओ के अंदर डालते हुए पीछे से उसके कंधे पकड़ लिए।

कुछ मिनटों तक हम यही अहसास करते रहे कि पहले पहले पुराने प्यार की बाहों में कैसा सकून मिलता हैं। जब ये अहसास हुआ की ये सपना नहीं सच हैं तो हमने एक दूंसरे से गले लगना छोड़ा और अनायास ही हमारे होंठ एक दूंसरे के होठों की तरफ बढे और छू गए।

एक दूंजे के मुलायम होठों को छूते ही दोनों को एक झटका सा लगा और हम थोड़ा पीछे हट गए। फिर एक अल्पविराम के बाद दोनों के होंठ एक बार फिर मिले और इस बार एक दूंसरे का रस चूसने का मजा लिए बिना नहीं हटे।

कुछ सेकंड तक तो हमें होशो हवास ही नहीं रहा। जैसे तीन दिन के भूखे खाने पे टूट पड़ते हैं, वैसे ही हम एक दूंसरे के होंठों को दबा दबा के चूस रहे थे। जब हम दोनों का पेट भर गया तो एक दूंसरे को छोड़ा।

संजू के होठों पर मेरी लिपस्टिक लग गयी थी। मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसके होंठ पोछने लगी। उसने तुरंत मेरी कमर में हाथ डाला और पकड़ कर अपनी तरफ खिंच कर नीचे से मुझको अपने से चिपका दिया। हम दोनों के नाजुक अंग कपड़ो के अंदर से ही एक दूंसरे को छू रहे थे।

उसने अब पीछे हाथ ले जाकर मेरे नितम्बो को पकड़ लिया और कहने लगा, शुरू से इच्छा थी इनको पकडू और बिना कपड़ो के देखु, मेरी एक इच्छा पूरी कर दो।

मैंने अपने आप को छुड़ाया और उसकी और पीठ करके खड़ी हो गयी और कहा, कर लो अपनी इच्छा पूरी। वो मुझे धकियाते हुए बिस्तर के पास ले गया और पेट के बल उल्टा लेटा दिया।

उसने अब मेरा पेटीकोट साड़ी सहित ऊपर उठाया, जब तक की मेरी पैंटी पूरी ना दिख गयी। फिर उसने मेरी पैंटी पकड़ कर नीचे खींच दी और मेरे बड़े नितम्बो पर दोनों हाथों को फेरते हुए दबाने लगा।

अब उसने मेरी पैंटी पैरो से पूरी बाहर निकाल दी। मैं तुरंत उठ खड़ी हुई और अपने पेटीकोट साडी को नीचे कर दिए।

मैंने कहा बात सिर्फ देखने और छूने की हुई थी तो हो गया।

वो बोला किस अंग से छूना हैं वो थोड़े ही ना डीसाईड हुआ था। ऐसा कह कर उसने अपनी पैंट और अंडरवियर निकाल दी।

मैं उसका लंड देखने लगी जो कड़क होकर तैयार था। इतना आगे बढ़ने के बाद मुझे भी पीछे मुड़ना ठीक नहीं लगा।

उसने कहा, अब ओर मत तड़पाओ, मिलन होने जाने दो, बहुत सालो से तड़पा हूँ।

मैंने पूछा प्रोटेक्शन कहाँ हैं?

उसने कहा वो तो नहीं हैं, मैंने और बीवी ने बच्चा प्लान किया था तो प्रोटेक्शन की जरुरत ही नहीं थी कुछ महीनो से।

मैंने कहा सिर्फ तुम्हारे लिए मैं थोड़ा रिस्क लेने को तैयार हूँ बिना प्रोटेक्शन के पर तुम बहुत ध्यान रखना, कुछ गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।

समय भी कितना तेजी से बदलता हैं, कुछ समय पहले मैं और पति एक बच्चे के लिए कितने लोगो से मदद ली और दुआ करते थे अब कुछ हो जाए और आज मैं कोशिश करती हूँ कि कुछ ना हो।

खैर मैंने अब उसको बिस्तर पर लेटा दिया। सारी जिम्मेदारी मुझे ही लेनी थी। मैंने अपने कपडे नीचे से ऊपर किये और अपने दोनों पाँव उसके दोनों तरफ फैला कर उसके लंड पर इस तरह बैठी की मेरी पीठ उसके मुँह की तरफ रहे।

 
खैर मैंने अब उसको बिस्तर पर लेटा दिया। सारी जिम्मेदारी मुझे ही लेनी थी। मैंने अपने कपडे नीचे से ऊपर किये और अपने दोनों पाँव उसके दोनों तरफ फैला कर उसके लंड पर इस तरह बैठी की मेरी पीठ उसके मुँह की तरफ रहे।

मैंने उसको कहा तुम्हारी पसंद के अनुसार मिलन के समय तुम मेरे नितंब देखते रह पाओगे और छू भी पाओगे। मैं थोड़ा ऊपर उठी और उसका लंड पकड़ कर अपनी चूत में घुसा दिया।

इतनी देर की छुअन से वैसे भी मेरे अंदर गीला हो चूका था, तो उसका फट से अंदर फिसलता हुआ घुस गया। उसकी एक जोर की आह निकली। जिसको दिल से प्यार करते हो तो शारीरिक सम्बन्ध के वक़्त वैसे भी मजा कुछ ओर होता हैं।

मैं ऊपर नीचे होने लगी, उसका लंड मेरी चूत की दीवारों को रगड़ते हुए अंदर बाहर होने लगा। उसकी जोर जोर से सिसकिया चालु हो गयी। उसकी आवाज़ सुन मुझे भी मजा आने लगा।

वो मेरे नीचे के कपड़ो को अपने हाथ से बार बार उठा कर ऊपर रखने की कोशिश कर रहा था। उसने शिकायत की के मेरे कपडे नीचे गिर रहे हैं जिससे वो मेरा पसंदीदा अंग देख नहीं पा रहा हैं।

मैंने अब अपनी साडी के प्लीट्स पेटीकोट से बाहर निकालने लगी। वो भी मदद करते हुए साड़ी को पेटीकोट से अलग करने लगा।

साडी निकाल कर अलग रखने के बाद मैंने अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला और टीशर्ट के भांति सर के ऊपर से निकाल दिया।

जिससे अब वो मेरी पतली कमर और नितम्बो को अब आसानी से देख सकता था। वो मेरी कमर और कूल्हों पर हाथ फेराने लगा।

अब मैं उसके पैरो की तरफ आगे झुक गयी और ऊपर नीचे हरकत करते हुए उसके लंड को अंदर बाहर करते हुए उसको मजा दिलाती रही।

रवि की माँ और बहन ने कैसे एक चुदक्कड रूप धारण किया और उसके साथ चुदाई के मजे लिए, यह उसकी हिन्दी चुदाई स्टोरी में जानिए।

उसने भी मेरे नितम्बो को पकड़ के चौड़ा कर दिया, जिससे वो अपने लंड को मेरे छेद में अंदर बाहर होते हुए देख पाए। वो सिसकिया मारते हुए बोले जा रहा था, आज तो मजा आ गया, तुम्हारे सेक्सी कूल्हों को नंगा देखा और मेरे लंड को अंदर बाहर होते हुए देख कर जन्नत मिल गयी।

थोड़ी देर हम दोनों ऐसे मजे लेते रहे। अब मैं फिर सीधी बैठ गयी। मैंने अपने हाथ पीछे किये और पीछे झुकते हुए दोनों हाथ उसके सीने पर रख दिए।

अब मैं एक बार फिर ऊपर नीचे होने लगी। उसने अपने दोनों हाथ मेरे ब्लाउज पर रख चुचियाँ दबाने लगा। फिर पीछे से मेरे ब्लाउज और ब्रा के हुक खोल दिए।

मैंने एक एक करके हाथ सीधा किया और उसने ब्लाउज और ब्रा को मेरे हाथों से पूरा निकाल दिया। मैं अब पूरी नंगी हो चुकी थी।

मेरा सीना छत की तरफ था और वो अपने दोनों से मेरे आगे पीछे उछलते हुए चूँचियो को दबा कर मसलने लगा।

मेरी चुत में अंदर बाहर होते लंड के साथ चूंचियो के दबने से मुझे भी मजा आने लगा। पर फिर मैंने सोचा ज्यादा देर करना भी थोड़ा रिस्की हैं। मैं सीधा बैठ गयी और उसके ऊपर से उठ गयी।

हालांकि दोनों का झड़ना बाकी था पर रिस्क भी नहीं लेना था। मेरा बाहर निकालना उसको भी पसंद नहीं आया। जैसे ही मैं बिस्तर से उतरी वो भी उतर गया और मुझे पीछे से पकड़ लिया।

उसने मुझे बिस्तर पर धक्का देते हुए उल्टा लेटा दिया और दोनों टाँगे ऊपर उठा कर चौड़ी करते हुए, अपनी कमर के दोनों तरफ ले गया, जिससे उसका लंड फिर मेरी चुत को छू गया।

मैं सिर्फ कोहनियो के बल बिस्तर पर थी और बाकी का शरीर हवा में था। वो मेरी दोनों जांघो को हवा में पकडे अपने कड़क लंड से मेरी चुत में निशाना लगाने लगा। थोड़ी ही देर में उसका निशाना लगा और उसने फिर मेरे अंदर अपना लंड डाल दिया।

 
वो मेरी दोनों जांघो को पकडे आगे पीछे करते हुए मजे लेने लगा। हवा में इतनी करतबबाजी से मैंने पहले कभी नहीं चुदवाया था और मुझे मजे आने लगे। मैं जोर जोर से आई ऊई करने लगी।

थोड़ी ही देर में फचाक फचाक की आवाज़े आने लगी और मैं झड़ने को आई तो सिसकिया चीखों में बदलने लगी।

अह्ह्ह्हह्ह संजू आज कर लो अपनी इच्छा पुरी अह्ह्ह्हह ठोको मेरी चूत को ऐसे ही अह्ह्ह्हह्ह ऐसे ही करो मेरी चूत की ठुकाई!

ये सब बड बडाते हुए, थोड़ी ही देर में चीखते चिल्लाते हुए मैं झड़ गयी।

वो अब भी मुझे बुरी तरह से चोदे जा रहा था। मैंने उसको कहा अब छोड़ दो वरना कुछ हो जायेगा। वो भी इतनी देर से मुझे आधा उठाये उठाये अब थकने लगा था तो मुझे छोड़ दिया। मैंने चैन की सांस ली।

उसका अभी हुआ नहीं था, तो मेरी तरफ तरसती निगाहो से देख रहा था।

मैंने कहा अभी मुझे रिस्क नहीं लेना हैं, तुम्हारा काम मैं हाथ से ही कर देती हूँ। उसको तो पूरा अंदर घुस कर ही करना था पर उसने हां बोल दिया, भागते भूत की लंगोटी ही सही।

उसने कहा, वाश रूम में कर लेते हैं यहाँ कमरे में गन्दा हो जायेगा। वाशरूम नीचे की तरफ था।

मैंने अपने सारे कपडे वापस पहन लिए। वो अपनी पैंट हाथ में पकडे मेरे साथ सीढ़ियों से होते हुए नीचे आने लगा।

मैंने उसको पूछा कोई अंदर आ तो नहीं जायेगा।

उसने कहा नहीं आएगा, मम्मी चाबी लेकर नहीं गए हैं। हम दोनों अब वाशरूम में घुस गए।

मैंने देखा इतनी देर में उसका लंड मुरझा कर लटक रहा था। मैंने थोड़ा नीचे झुकी और उसका लंड अपनी मुट्ठी में भरकर आगे पीछे खींचने लगी।

कुछ मिनटों की इस खींचातानी से वो फिर से खड़ा होने लगा। एक बार खड़ा हुआ तो मैंने उसको हाथ से रगड़ने लगी। थोड़ी ही देर में उसकी सिसकिया निकलनी शुरू हो गयी।

उसकी फरमाइश थी कि वो मेरे मम्मो के बीच में लंड रख कर रगड़ना चाहता है। मैंने कहा ठीक हैं पर कैसे करोगे, यहाँ तो बैठने की भी जगह नहीं।

उसने कहा बाहर हॉल में सोफे पर करते हैं।

मैंने पूछा वहा गन्दा नहीं होगा क्या, तुम्हारा पानी कहाँ निकालोगे।

उसने कहा वो मेरी चूचियों पर ही पानी निकालेगा।

पर मैंने मना कर दिया कि ऐसी गन्दगी मुझे नहीं चाहिए। आखिर में ये डीसाईड हुआ कि वो मेरे मम्मो के बीच लंड रगड़ेगा पर पानी वाशरूम में आकर ही निकालेगा।

अब हम लोग सोफे पर आ गए। मैंने अपना पल्लू हटा कर ब्लाउज और ब्रा निकाल दिया। उसने मुझे सोफे पर लेटाया और मुझ पर झुक कर अपना लंड मेरे दोनों मम्मो के बीच रख दिया।

मैंने अब अपने दोनों मम्मो को साइड से दबाते हुए उसका लंड को बीच में झकड़ लिया। वो अब आगे पीछे होता हुआ मेरे मम्मो के बीच चोदने लगा।

थोड़ी देर तक ऐसे ही करते करते वो आहें भरने लगा। मेरे सीने पर रगड़ से पसीना होने लगा या वो उसका रिसता हुआ पानी था ये पता नहीं चला।

मैंने उसको फिर चेताया पानी निकलने से पहले उठ जाना, मेरे ऊपर मत डालना। उसने बोला अभी टाइम हैं और जोर से झटके मारने लगा।

कुछ मिनट तक ऐसे करते रहने के बाद उसने अपना लंड पीछे खिंच लिया। मैंने अपने मम्मे छोड़ दिए और कहा अब वाशरूम में जाकर कर आओ।

मैंने अपना वाक्य पूरा ही किया था कि उसके लंड से एक पानी का फव्वारा छूटा और मेरी आँख पर टकराया। फिर दूंसरा फव्वारा मेरे होंठ पर आया। फिर बड़ी बड़ी बुँदे मेरी चूचियों पर आ गिरी।

मैं उसको गुस्सा में कुछ बोलती उससे पहले ही वो कान पकड़ कर सॉरी बोलने लगा और कहा कि क्या करू कण्ट्रोल नहीं हुआ। तुम्हारे मम्मे हैं ही इतने जबरदस्त।

फिर मैं भी क्या कर सकती थी। उसको कुछ साफ़ करने के लिए लाने को कहा। वो भागता हुआ गया और नैपकिन ले आया। मैंने नैपकिन से गन्दा पानी साफ़ किया। मेरा मुँह और चूचियाँ चिपचिपी हो गयी थी।

मैंने अपना ब्लाउज और ब्रा उठाया और वाशरूम में जाकर पानी से पोछ कर चिकनाई मिटाई। उसने भी अपने आप को साफ़ किया और हम कपडे पहन कर हॉल में आ गये।

उसने 5 मिनट में जल्दी जल्दी खाना खा लिया। फिर बाहर की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो हम दोनों की मम्मिया आ गयी थी।

उन्होंने कहा सब जगह थोड़ी थोड़ी देर रुकना पड़ा और चाय नाश्ता करना पड़ा इस कारण बहुत देर हो गयी। आंटी ने पूछा तुम दोनों भी खाना खाकर ही जाओ। मेरी भूख प्यास तो वैसे ही उनके बेटे ने मिटा दी थी।

हम लोग इजाजत लेकर वहां से निकल पड़े। मम्मी ने पूछा हम गए थे तब तुम्हारी शक्ल पे बारह बजे थे, अभी आये तो एकदम खुश लग रही थी।

कुछ शक हो उसके पहले ही मैंने बोल दिया आपका इंतज़ार करते करते इतना टाइम हो गया, तो आपको देख कर ही खुश हो गयी।

फंक्शन के दिन देर सुबह मेरे पति हमारे बच्चे सहित मेरे पीहर पहुंच गए थे। सारा कार्यक्रम घर के पास पांच मिनट की दुरी पर एक कम्युनिटी हॉल में रखा गया था।

संजू भी शाम को फंक्शन में आने वाला था। मुझे डर था कि हमारे बीच उसके घर जो भी हुआ उसके बाद कही वो पति के सामने कोई ऐसी वैसी हरकत ना कर दे कि पति को शक हो जाए।

पापा और भैया नाश्ता करने के बाद ही कार्यक्रम स्थल पर व्यवस्था सँभालने के लिए चले गए।

 
संजू भी शाम को फंक्शन में आने वाला था। मुझे डर था कि हमारे बीच उसके घर जो भी हुआ उसके बाद कही वो पति के सामने कोई ऐसी वैसी हरकत ना कर दे कि पति को शक हो जाए।

पापा और भैया नाश्ता करने के बाद ही कार्यक्रम स्थल पर व्यवस्था सँभालने के लिए चले गए।

बाकी हम सब लोग भी नाश्ते के बाद घर का काम निपटा कर नहा धो कर तैयार हो गए थे। पति चूँकि सफर से आये ही थे तो वो नहा कर नाश्ते के लिए आ गए।

मम्मी ने कहाँ कि हॉल में शाम की तैयारी में सहायता के लिए जाना हैं, तो एक जन दामादजी को नाश्ता कराने रुक जाओ बाकि सब चलते हैं।

मैंने कहा मैं रुक जाती हूँ। भाभी ने सुझाव दिया कि उन्हें वैसे भी बर्तन धोने बाकी हैं तो उनको रुकना ही पड़ेगा, तो वो मेरे पति को नाश्ता करवा देंगे और बाद में हॉल में ले आएंगे।

तो फिर मैं अपनी मम्मी और अपने और भैय्या के बच्चो के साथ हॉल की तरफ निकल पड़े।

पांच मिनट में हम वह पहुंच गए।

हॉल में पहुंचने पर याद आया मेरा मोबाइल तो घर पर ही छूट गया। मैं माँ को बोलकर फिर घर के लिए निकली। जाते वक़्त शायद हमने बाहर का दरवाज़ा लॉक नहीं किया था तो थोड़ा खुला ही था। मैं सीधा अंदर चली गयी।

डाइनिंग टेबल पर देखा तो पति नहीं थे। मैंने टेबल पर रखा मोबाइल उठाया। फिर उत्सुकतावश किचन की तरफ देखा, वहां भी भाभी नजर नहीं आये।

एक स्त्री होने के नाते दिमाग में कुछ खटका। मैंने देखा भैय्या के कमरे का दरवाज़ा बंद था, पर भैय्या तो कम्युनिटी हॉल में थे।

मैं अब धीरे धीरे भैया के कमरे की तरफ बढ़ी और दरवाज़े के बाहर खड़े होकर कान लगा सुनने की कोशिश करने लगी।

अंदर से रह रह के भाभी के खिलखिलाने की आवाज़ आ रही थी।

देसी कहानी पर आपके लिए बहुत सी हिन्दी पोर्न स्टोरी उपलभध है जिनका आप मजा ले सकते है!

मुझे शक हुआ कही मेरे पति भाभी के साथ अंदर तो नहीं। मैं थोड़ी देर के लिए अतीत में चली गयी।

मेरे पति मेरी भाभी को हमारी शादी के पहले से जानते थे, क्यों कि मेरे पति के बड़े चचेरे भाई की साली बाद में मेरी भाभी बनी थी।

हमारी शादी के पहले ही इन दोनों की अच्छी खासी बातें होती थी। पर पहले कभी मुझे शक नहीं हुआ था, क्योकि शादी के बाद से ही हम दूसरे शहर में रहते थे।

कमरे के अंदर से आती आवाज़ों से मैं बेचैन होने लगी। एक इच्छा हुई कि दरवाज़ा तोड़ के अंदर चली जाऊ और उनको रंगे हाथों पकड़ लु। फिर सोचा अगर अंदर गयी और कुछ नहीं निकला तो मेरी ही फजीहत हो जाएगी।

फिर मैंने फैसला किया कि मकान के साइड में इस कमरे की खिड़की हैं, वहां से झांक कर देखती हु, शायद कुछ दिख जाए।

मैं बाहर निकली और खिड़की के करीब पहुची।

अंदर झाँका तो कांच की खिड़की बंद थी, अंदर पर्दा लगा हुआ था और कुछ दिख नहीं रहा था। मैं थोड़ी निराश हुई कि अब क्या किया जाए।

मैं फिर घर के अंदर पहुंची। फिर मैंने देखा कि कमरे के दरवाज़े के ऊपर का रोशनदान खुला हैं।

मैंने अपने बैग से सेल्फी स्टिक निकाली और अपना मोबाइल उस पर लगा के वीडियो मोड चालू कर दिया। मैंने अपनी सेल्फी स्टिक पूरी लम्बी की और रोशनदान के वहां लगा दिया और अंदर का दृश्य देखने लगी।

मोबाइल से अंदर का नजारा देख कर मेरे होश उड़ गए।

मेरे पति मेरी भाभी के साथ बिस्तर पर थे और दोनों अर्धनग्न हालत में थे। भाभी नीचे लेटी थी और पति उनकी चूचियों को चुस रहे थे। मेरी हालत काटो तो खून नहीं वाली हो गयी।

थोड़ी देर तो कुछ सुझा ही नहीं। मेरा माथा ठनक गया, और लड़ाई के मोड में आ गयी। मगर फिर अपने किये हुए काण्ड याद आ गए। पति की पीठ पीछे मैंने भी तो ऐसा ही कुछ किया हैं। यहाँ तक कि एक काण्ड का तो गवाह भी हैं।

अगर किसी दिन पति को पता चल गया तो। फिर सोचा कभी पकड़ी गयी तो ये वीडियो मेरे काम आएगा पति को चुप कराने के लिए।

मैंने मन ही मन फैसला ले लिया था कि मुझे अभी कोई एक्शन नहीं लेना हैं। बस ये सबूत साथ रखना हैं समय आने पर काम आएगा।

इस बीच मेरी भाभी अब एक्शन मोड में थी और मेरे पति का लंड अपने मुँह में ले अपना हाथ उस पर घुमाते हुए मजे लेते हुए चूस रही थी। मुझसे देखा नहीं गया और बहुत जलन हुई।

मैंने अब वो सेल्फी स्टिक नीचे की और वीडियो बंद किया। फिर बाहर का दरवाज़ा धीरे से बंद कर वापिस हॉल की तरफ बढ़ी।

पुरे रास्ते कमरे के अंदर का दृश्य ही मेरी आँखों के सामने घूम रहा था। मेरे साथ मेरे भैया का घर भी बर्बाद हो रहा था। इसी चिंता के साथ मैं हॉल में दूसरे कामों को करने लगी।

आधे घंटे के बाद मेरे पति, भाभी के साथ हॉल में पहुंचे। दोनों के चेहरे की लाली देखते ही बनती थी। मुझे तो खैर पता था इस लाली का राज क्या हैं।

मैंने कई बार नोटिस किया कि काम के बीच बार बार नजरे बचा के वो दोनों एक दूसरे को शरारत भरी नजरो से देख रहे थे और हंस रहे थे।

कई बार मैं इधर उधर काम में व्यस्त होती और वो थोड़ी थोड़ी देर के लिए कही गायब भी हो जाते।

मैंने एक बार उनको फॉलो करने की सोची। पहले भाभी वहां से निकले और उसके कुछ सेकंड बाद पति उनके पीछे पीछे निकले। मैं चुपके से फॉलो करती हुई बाहर गयी।

हम निचली मंजिल पर थे, पर वो लोग दूसरी मंजिल के वाशरूम की तरफ गए थे। मैं भी छुपते हुए वहां पहुंची। वो दोनों एक ही वाशरूम में घुसे थे।

मैं बिना आवाज़ किये दरवाज़े के पास पहुंची। अंदर से फुसफुसाने की आवाज़ आ रही थी। भाभी की चूडियो के खनकने की आवाज़ तो कभी कपडे सरकने की आवाज़।

थोड़ी देर में चप चप की आवाज आने लगी, शायद ये चूचिया चूस रहे थे या भाभी उनका लंड। मैं मन मसौस कर रह गयी। गुस्सा कण्ट्रोल करना पड़ रहा था।

शायद अब तक जो मैंने पति को धोखे दिए हैं उनकी सजा इस तरह मिल रही थी। मैं यही सोचती रह गयी और अंदर से उनकी सिसकियों की आवाज़ शुरू हो गयी।

थोड़ी देर में मेरे गुस्से की जगह उनकी आवाज सुन कर मेरे को भी कुछ कुछ होने लगा। मैं अपने हाथों से अपने ही अंग दबाने लगी। काश अंदर भाभी की जगह मैं होती।

अंदर से अब जोर जोर की आवाजे आने लगी। भाभी कह रही थी अशोक धीरे धीरे करो मेरी जान निकल रही हैं, मेरी चीखें निकल रही हैं कोई सुन कर आ जायेगा।

पति हाँफते हुए बोले बाकी लोगो का काम नीचे हो रहा हैं, ऊपर सिर्फ हमारा काम हो रहा हैं, कोई नहीं आएगा।

भाभी की बीच बीच में हलकी चीखें निकल रही थी और पति तो सिसकिया भर रहे थे।

भाभी बोली तुम्हारे से करवाने का सबसे बड़ा फायदा हैं कि प्रोटेक्शन बीच में नहीं आता। तुमको कुदरत का वरदान हैं कितना भी करो लड़की माँ नहीं बन सकती।

ये बात सुनकर मैं सन्न रह गयी। मैंने और पति ने वादा किया था कि हम दोनों के अलावा ये राज किसी ओर को पता नहीं चलनी चाहिए। इसका मतलब भाभी को पता हैं कि मेरे बच्चे का बाप मेरा पति नहीं हैं।

ऐसी चीटिंग तो मैंने भी कभी नहीं की थी कि घर के राज बाहर बता दू।

थोड़ी ही देर में दोनों जोर की आवाजे निकालते हुए झड़ गए।

मैं तुरंत वहां से निकल फिर नीचे वाली मंजिल पर आ गयी और अपने कामो में लग गयी। थोड़ी देर में वो दोनों भी थोड़े थोड़े अंतराल पर वहां आ गए और इस तरह काम करने लगे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

दिन भर मैं उनकी हरकतें इसी तरह झेलती रही। शाम को हम तैयार होने के लिए घर पर आ गये।

 
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