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चादर के अंदर डीपू जोर जोर से झटके मारते हुए मुझे चोदे जा रहा था, और मुझे डर लगा कि कही अशोक को सच में शक ना हो जाये और चादर निकाल दे. पायल ने अब चादर को बीच में से एक जगह पकड़ लिया.
पायल: “अशोक, खींचू क्या चादर?”
मेरी तो सांस रुक गयी. मेरा हाथ मेरी जांघो पर था तो उसको पीछे ले जाकर मैंने डीपू को रोकने की कोशिश की, पर वो तो मुझे पूरा चोदे बिना छोड़ने वाला नहीं था.
क्या ये पायल की चाल थी मुझे और डीपू को रंगे हाथों पकड़ने की? क्यों कि सुबह भी उसे हम पर शक हो गया था.
पायल ने थोड़ी थोड़ी चादर को खींचना शुरू कर दिया. वो एक झटका मारती तो चादर हट जाती और हमारी पोल खुल जाती.
मेरी डीपू को रोकने की सारी कोशिशे नाकाम रही. मैंने अब अपना हाथ अपनी चूत के आगे रख कर उसको ढक दिया ताकि अगर चादर हट भी जाये तो छुपा सकू.
चादर अब धीरे धीरे खिसकते हुए मेरी गांड तक आ गयी थी और आधी गांड चादर के बाहर आ चुकी थी. मैंने चादर को पाँव में फंसा दिया ताकि मेरी कमर से नीचे ना गिर जाये.
डर के मारे मैं मजा लेना ही भूल गयी थी, रह रह के उसके लंबे लंड के झटको की वजह से होने वाले दर्द से मेरी सिसकिया जरूर निकल रखी थी.
मैं: “पायल तुम चादर नहीं खिंच सकती, सिर्फ अशोक खिंच सकता हैं.”
पायल: “अशोक तुम्हारी जगह मैं खींच दूँ चादर? सोच लो तुम्हारी बीवी को रंगे हाथों पकड़ सकते हो.”
अशोक: “तुम बहुत कोशिश कर रही हो कि मैं शक कर के हार जाऊ, पर ये होने वाला नहीं.”
इस बीच डीपू ने एक बार फिर अपना पानी मेरे अंदर छोड़ दिया था. पर उसने फिर भी झटके मारना नहीं छोड़ा.
मैं: “चलो बहुत टेस्ट हो गया, डीपू अब बंद करो.”
डीपू का काम तो वैसे भी हो गया था, तो उसने अपना लंड बाहर निकाल दिया. उसने मेरे मम्मो को दबाना भी बंद किया और चादर को फिर अपने ऊपर खिंच दिया.
मैंने अपना बाथरोब नीचे किया और अपने अंग ढक लिए. फिर मैंने चादर हटाया और लैस बांधते हुए राहत की सांस ली. मुझे लग गया डीपू भरोसे के काबिल नहीं हैं.
दोनों मर्द खुश थे कि वो शक ना करने का टास्क जीत गए, पर शायद उनकी बीवियां टास्क जीती थी जो अपने पतियों के सामने ही गैर मर्द से चुदवाने में कामयाब रही.
हालांकि मैं निश्चित तौर पर ये तो कह नहीं सकती कि उस चादर में अशोक ने सचमुच पायल को चोदा था.
पायल और डीपू अपने रूम में चले गए. हम चारो अपने बेग पैक करके तैयार हो गए और नीचे रिसेप्शन पर मिले.
हम चारो ने आज जीन्स पहनी थी और और ऊपर टीशर्ट. अपने बैग होटल के लॉकर में रखवा कर हम लोग घूमने निकले. हमने लोकल बाजार में शॉपिंग की और फिर वहां से निकलने के लिए कार में बैठे.
वहा माता का एक मंदिर था, उसको देख कर अशोक को कुछ याद आया.
अशोक: “अरे तुम्हारी सजा का क्या हुआ? मैंने अपनी माँ की कसम खायी थी कि मैं प्रतिमा से सजा पूरी करवाऊंगा.”
डीपू: “कसम तो मैंने भी खायी थी, अच्छा हुआ याद दिला दिया.”
मैं: “सजा को भूल जाओ, हम लोग घूमने का मजा लेते हाँ ना.”
अशोक: “ऐसे कैसे भूल जाओ, मैंने माँ की कसम खायी हैं.”
पायल: “हम दोनों आपस में कैंसल करने को तैयार हैं तो क्या जरुरत हैं.”
डीपू: “तो हमको माँ की कसम क्यों दिलवाई. अब तो करनी ही पड़ेगी. लाओ बेग में से चिट्ठी निकाल कर दो.”
पायल: “अशोक, खींचू क्या चादर?”
मेरी तो सांस रुक गयी. मेरा हाथ मेरी जांघो पर था तो उसको पीछे ले जाकर मैंने डीपू को रोकने की कोशिश की, पर वो तो मुझे पूरा चोदे बिना छोड़ने वाला नहीं था.
क्या ये पायल की चाल थी मुझे और डीपू को रंगे हाथों पकड़ने की? क्यों कि सुबह भी उसे हम पर शक हो गया था.
पायल ने थोड़ी थोड़ी चादर को खींचना शुरू कर दिया. वो एक झटका मारती तो चादर हट जाती और हमारी पोल खुल जाती.
मेरी डीपू को रोकने की सारी कोशिशे नाकाम रही. मैंने अब अपना हाथ अपनी चूत के आगे रख कर उसको ढक दिया ताकि अगर चादर हट भी जाये तो छुपा सकू.
चादर अब धीरे धीरे खिसकते हुए मेरी गांड तक आ गयी थी और आधी गांड चादर के बाहर आ चुकी थी. मैंने चादर को पाँव में फंसा दिया ताकि मेरी कमर से नीचे ना गिर जाये.
डर के मारे मैं मजा लेना ही भूल गयी थी, रह रह के उसके लंबे लंड के झटको की वजह से होने वाले दर्द से मेरी सिसकिया जरूर निकल रखी थी.
मैं: “पायल तुम चादर नहीं खिंच सकती, सिर्फ अशोक खिंच सकता हैं.”
पायल: “अशोक तुम्हारी जगह मैं खींच दूँ चादर? सोच लो तुम्हारी बीवी को रंगे हाथों पकड़ सकते हो.”
अशोक: “तुम बहुत कोशिश कर रही हो कि मैं शक कर के हार जाऊ, पर ये होने वाला नहीं.”
इस बीच डीपू ने एक बार फिर अपना पानी मेरे अंदर छोड़ दिया था. पर उसने फिर भी झटके मारना नहीं छोड़ा.
मैं: “चलो बहुत टेस्ट हो गया, डीपू अब बंद करो.”
डीपू का काम तो वैसे भी हो गया था, तो उसने अपना लंड बाहर निकाल दिया. उसने मेरे मम्मो को दबाना भी बंद किया और चादर को फिर अपने ऊपर खिंच दिया.
मैंने अपना बाथरोब नीचे किया और अपने अंग ढक लिए. फिर मैंने चादर हटाया और लैस बांधते हुए राहत की सांस ली. मुझे लग गया डीपू भरोसे के काबिल नहीं हैं.
दोनों मर्द खुश थे कि वो शक ना करने का टास्क जीत गए, पर शायद उनकी बीवियां टास्क जीती थी जो अपने पतियों के सामने ही गैर मर्द से चुदवाने में कामयाब रही.
हालांकि मैं निश्चित तौर पर ये तो कह नहीं सकती कि उस चादर में अशोक ने सचमुच पायल को चोदा था.
पायल और डीपू अपने रूम में चले गए. हम चारो अपने बेग पैक करके तैयार हो गए और नीचे रिसेप्शन पर मिले.
हम चारो ने आज जीन्स पहनी थी और और ऊपर टीशर्ट. अपने बैग होटल के लॉकर में रखवा कर हम लोग घूमने निकले. हमने लोकल बाजार में शॉपिंग की और फिर वहां से निकलने के लिए कार में बैठे.
वहा माता का एक मंदिर था, उसको देख कर अशोक को कुछ याद आया.
अशोक: “अरे तुम्हारी सजा का क्या हुआ? मैंने अपनी माँ की कसम खायी थी कि मैं प्रतिमा से सजा पूरी करवाऊंगा.”
डीपू: “कसम तो मैंने भी खायी थी, अच्छा हुआ याद दिला दिया.”
मैं: “सजा को भूल जाओ, हम लोग घूमने का मजा लेते हाँ ना.”
अशोक: “ऐसे कैसे भूल जाओ, मैंने माँ की कसम खायी हैं.”
पायल: “हम दोनों आपस में कैंसल करने को तैयार हैं तो क्या जरुरत हैं.”
डीपू: “तो हमको माँ की कसम क्यों दिलवाई. अब तो करनी ही पड़ेगी. लाओ बेग में से चिट्ठी निकाल कर दो.”