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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

मैंने कहा शायद मेरे अंदर के कसे वस्त्रो की वजह से तुम्हे महसूस नहीं हो रहा होगा, रुको मैं तुम्हे बताती हूँ कह कर मैं उठने लगी. पर पियूष ने मुझे फिर लेटा दिया और बोला जो भी काम हैं मुझे बताओ.

मैं बोली, मैं अपने अंदर के कसे हुए वस्त्र निकाल कर तुमसे पूछना चाहती हूँ कि क्या में सच में मोटी हूँ.

पियूष ने कहा, इसकी कोई जरुरत नहीं तुम मोटी नहीं हो.

मुझको यह झूठ लगा, मुझे दूध का दूध और पानी का पानी करना था. मैंने आग्रह किया कि मैंने पेटीकोट पहना हुआ हैं और पियूष मेरे अंदर के कसे वस्त्रो को उतार सकता हैं जिससे मेरी शंका का समाधान हो सके.

मेरी मनोस्तिथि पहले काफी बिगड़ गयी थी और अब सुधार था, पर फिर भी कभी कभार बेवकूफी भरी गलतियां भी कर बैठती थी. शायद उस वक्त मुझे ऐसा ही दौरा पड़ा था, एक गैर मर्द मुझे सहानुभूति दिखा रहा था और मैं उसको अपना शुभचिंतक मान उस पर हद से ज्यादा भरोसा दिखा बेवकूफी करे जा रही थी.

पियूष ने मन मार कर मेरे पेटीकोट के नीचे से अंदर हाथ डाल कर मेरी पैंटी निकाल दी. फिर मेरे पेट पर हाथ फिराते हुए कहने लगा यहाँ मोटापा नहीं हैं तुम एकदम फिट हैं.

मैं उसकी बात पर चाहते हुए भी यकीन नहीं कर पा रही थी.

मैंने कहा, शायद लेटे होने की वजह से मेरा पेट अंदर दबा हुआ हैं. मैं तुरंत उल्टी लेट गयी और गाय की तरह घुटने और हथेली के बल बैठ गयी, और बोली अब चेक करो.

मैंने बताया कि मेरा घुटना अब इस स्थिति में अच्छा महसूस कर रहा हैं. पियूष ने मेरे पेट पर हाथ फेरते हुए कहा अब भी कोई ज्यादा फ़र्क़ नहीं हैं और मेरा पेट एकदम फिट हैं.

मैं बोली अब आखरी शंका, शायद पेटीकोट का नाड़ा कस के बंधा हैं इस वजह से फ़र्क़ महसूस नहीं हो रहा होगा, तुम नाड़ा ढीला करो और फिर चेक करो.

पियूष ने बिना हिचकिचाहट के मेरा नाड़ा खोल दिया और पेट पर हाथ फेरते हुए बताने लगा सबकुछ ठीक हैं, कोई मोटापा महसूस नहीं हो रहा अभी भी. मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. पियूष ने मेरी दो समस्याओ का हल करने में उसकी बहुत मदद की थी.

मैं ये भूल गयी थी कि मेरा ब्लाउज और ब्रा के हुक खुले पड़े हैं और अब मेरा पेटीकोट का नाड़ा भी खुल चूका था.

पियूष अपना एक हाथ मेरे पेट और दुसरा कमर पर फेरते हुए कहने लगा, यह एकदम सपाट हैं और किसी मोटापे की चिन्ता की जरुरत नहीं हैं.

अगर आप पहली बार मेरी चुदाई की कहानी पढ़ रहे है, तो मेरी पिछली चुदाई की सेक्सी कहानियां पढना मत भूलियेगा!

हाथ फिराते हुए थोड़ी ही देर में उसका पेट वाला हाथ अनायास ही मेरे मम्मो तक जा पंहुचा जहा ब्रा और ब्लाउज के हुक खुला होने की वजह से उसके हाथ सीधे मेरे मम्मो को छू गए और वह उन्हें दबाने लगा.

मुझे अब अहसास हुआ कि मैं किस स्थिति में हूँ. पर मैं पियूष को रोक न पायी, उसने बड़े प्यार से मेरी मदद जो की थी. जब से मैंने गर्भधारण किया और फिर गर्भपात हुआ था, अशोक मुझसे थोड़े दूर दूर ही रहते थे और हमारे बीच शारीरिक संबंध लगभग ना के बराबर थे.

अब पियूष का कमर वाला हाथ आगे बढ़कर मेरे नितंबो की तरफ बढ़ा और मेरे नाड़ा खुल चुके पेटीकोट को नितंबो से नीचे उतार दिया और उंगलिया मेरे नितंबो के बीच फेरने लगा.

हम दोनों को पता था कि अशोक को आने में काफी समय हैं, हम दोनों उस छुअन का आनंद लेने लगे. धीरे धीरे वो आनंद अनियंत्रित होने लगा.

काफी महीनो बाद मैं एक बार फिर वो महसूस कर पा रही थी जिन्हे अब तक शायद मिस कर रही थी.

पियूष ने अपने नीचे के कपड़े निकाल दिए और मेरे कूल्हों को पकड़ कर अपने लंड से मेरे नितंबो पर बाहर से ही हलके हलके धक्के मारने लगा.

उसके गरम गरम कड़क लंड की छुअन से मेरी गांड और चूत के छेद जैसे लम्बी नींद के बाद जाग से गए और पुरे खुल गए.

रह रह कर दोनों छेद बंद होते फिर खुलते और पियूष के लंड के इंतजार में बेताब हुए जा रहे थे.

पियूष ने अपना लंड पकड़ा और मेरे दोनों छेदो के ऊपर रगड़ने लगा. रगड़ते रगड़ते वो अपने लंड की टोपी को थोड़ा दोनों छेदो में से होकर भी गुजार रहा था.

वो जान बुझ कर मेरी हालत देख मुझे तड़पा रहा था और मैं तड़प के मारे अपने शरीर को हल्का सा पीछे की तरफ धक्का दे रही थी, ताकि उसके लंड की टोपी मेरे छेद में घुस मुझे थोड़ा सुकून दे सके.

मेरा पूरा शरीर कपकपा रहा था और उसने अचानक अपना लंड मेरी चूत के छेद में घुसा ही दिया. एक गहरी आहहह के साथ जैसे लहरों को साहिल मिल गया.

पर पियूष लंड अंदर डाल वही रुक गया, शायद मेरी चूत की गरमाहट महसूस करना चाह रहा था पर मेरी तड़प को ये मंजूर नहीं था.

मैं खुद ही आगे पीछे धक्का मारने लगी. महीनो बाद मिले इस सुकून को जैसे में एक झटके में पा लेना चाहती थी.
 
मेरे धक्को की गति एकदम से बढ़ गयी और मैं पागलो की तरह सब भुला कर लगातार तेज धक्के मारते हुए सिसकिया निकालने लगी. आह्ह आह्ह ओह्ह ओह्ह उह्ह उह्ह उम्म उम्म.

बढे हुए वजन के कारण या लम्बे समय से कसरत नहीं करने से मैं जल्द ही थकने लगी और धक्को की गति कम होने लगी और थोड़ी देर में रुक गयी.

लेकिन तब तक पियूष को आग लग चुकी थी. उसने एक जोर का धक्का मारा और मेरी चूत के बहुत अंदर तक अपने होने का अहसास कराया.

उसके बाद वो नहीं रुका, उसने एक के बाद झटके मारते हुए मुझे चोदना शुरू कर दिया.

थोड़ी देर चोदने के बाद उसकी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी थी. मेरी भी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी थी. उसके झटको से मेरे खुले पड़े ब्लाउज से मेरे मम्मे लटकते हुए आगे पीछे तेजी से हिल रहे थे.

थोड़ी देर में मुझे सच्चाई का भी आभास हुआ, कही मैं फिर से पहले वाली गलती तो नहीं कर रही.

मैं: “आह्हह पियूष रुको, कुछ हो जायेगा.”

पियूष: “अब मत रोको भाभी, अब तो पुरे मजे लेने ही दो. देखो, आपको भी मजा आ रहा हैं न? ये लो और जोर से मारता हूँ.”

मैं: “आह्हहह, रुक जाओ, उम्ममम्म मैं प्रेगनेंट हो जाउंगी, तुम समझ नहीं रहे.”

पियूष: “चिंता मत करो, दो बच्चो के बाद मैंने अपनी नसबंदी करा ली थी. अब कोई चिंता नहीं, जम के चुदवाने के मजे लो.”

मैं: “सच में?”

पियूष: “अरे हां, मैं झूठ क्यों बोलूंगा.”

मैं: “तो फिर धीरे धीरे क्यों मार रहे हो, जल्दी जल्दी से कर लो. अशोक के आने से पहले काम ख़त्म कर लो, उसने देख लिया तो मेरी शामत आ जाएगी.”

पियूष ने आव देखा ना ताव जोर से जोर से मुझे चोदने लगा. उसका और मेरा पानी बनने लगा तो उसका लंड फिसलता हुआ चप चप की आवाज करता हुआ मेरी चूत के अंदर तेजी से अंदर बाहर होता रहा.

पियूष: “भाभी, मेरा तो अब पानी निकलने वाला हैं, आपका कितना बाकि हैं?”

मैं: “तुम अपना कर लो, मेरी चिंता मत करो.”

पियूष: “रुको आपका भी करता हूँ.”

उसने अपना लंड मेरी चूत से निकाला और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर उसने अपनी दो उंगलिया मेरी चूत में घुसा दी और तेज तेज अंदर बाहर खोदने लगा. उसकी उंगलियों की रगड़ से मेरा नशा फिर चढ़ने लगा.

अगले पांच मिनट में ऐसे ही उंगलियों से चोदते चोदते उसने मेरा पानी निकालना शुरू कर दिया था.

मैं अपने हाथ दोनों तरफ फैलाये बिस्तर के चद्दर को पकड़ खिंच कर तड़पते हुए आहें भरे जा रही थी. मुझे लगने लगा अब मैं झड़ने वाली हूँ तो मैंने पियूष को रोका.

मैं: “पियूष मेरा अब होने वाला हैं, तुम अब मेरे ऊपर आ जाओ और पूरा कर लो.”

पियूष अब मेरे ऊपर चढ़ गया और मुझसे चिपक कर लेट गया. लेटते लेटते उसने मेरा ब्लाउज और ब्रा को मेरे मम्मो से पूरा हटा दिया और अपना टीशर्ट भी निकाल दिया. उसका सीना अब मेरे मम्मो को दबा रहा था.

उसने एक बार फिर मेरी चूत में अपना लंड डाल दिया. इतनी देर से उसकी पतली उंगलियों से चुदाने के बाद उसके मोटे लंड के अंदर जाते ही मुझे ज्यादा सुखद अहसास हुआ और मेरी चूत में होती रगड़ भी बढ़ गयी थी.

दो तीन मिनट बाद ही हम दोनों बड़ी गहरी और तेज सिसकियाँ भरते हुए एक दूसरे से चुदने के मजे लेने लगे. उसने मेरे दोनों हाथों की उंगलियों में अपनी उंगलिया फंसा ली और झटके मारने की गति एक दम बढ़ा ली.

महीनो बाद झड़ने का लुत्फ़ उठाने के लिए मैंने भी अपनी दोनों टाँगे उठा कर पहले तो उसकी टैंगो पर लपेट दी.

थोड़ी देर बाद मैंने अपनी टाँगे और भी ऊपर उठा पियूष के कमर पर अजगर की तरह लपेट दी. मेरी चूत का छेद और भी खुल गया और पियूष मेरी चुत की और भी गहराइयों में उतारते हुए चोदने लगा.

आहह्ह्ह्ह आहह्ह्ह ओहह्ह्ह मम्मी ओ मम्मी आअहह्ह्ह आअह आअ जोर जोर से चीखते हुए हम दोनों एक साथ झड़ गए.

काफी समय बाद मैंने अपना काम पूरा किया था तो एक संतुष्टि हुई. हम दोनों उठ कर फिर कपडे पहनने लगे. पियूष ने जल्दी से कपडे पहने और वो बाहर हॉल में चला गया. मैं भी अपनी साड़ी फिर से पहन कर बाहर आ गयी.

सारे पछतावे गुनाह करने के बाद ही याद आते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ. मैंने अपनी बेवकूफी में या महीनो की जरुरत पूर्ति नहीं होने से पियूष के साथ गलत काम कर लिया था. मेरी बात कही खुल ना जाये इसलिए मैंने बाहर आकर पियूष को समझाना चाहा.

मैं: “पियूष, किसी को इस बारे में बताना मत.”

पियूष: “क्या बात कर रही हो. मेरे भी बीवी बच्चे हैं, मैं क्यों बताने लगा.”

मैं: “सब कुछ कैसे हुआ पता ही नहीं चला.”

पियूष: “कोई बात नहीं, कभी कभी ऐसा हो जाता हैं. जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.”

पियूष ने मुझे रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम के प्लान के बारे में ब्रोचर दिया, ताकि मैं अशोक को बता सकू और जाने लगा.

मैं: “पियूष, प्लीज इसे भूल जाना कि हमारे बीच कभी कुछ हुआ था. जो भी था एक गलती थी.”

पियूष ने आँखों से हां का इशारा कर मुझे सांत्वना दी और वहा से चला गया.

अशोक को मैंने वो ब्रोचर पढ़ा दिया और हमने रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम को कुछ और समय तक नहीं लगवाने का विचार किया. मैंने ही ज्यादा फ़ोर्स किया क्यों कि मैं पियूष का सामना फिर से नहीं करना चाहती थी.
 
जो भी हुआ गलत था, पर मैंने महसूस किया कि मेरी चेतना लौट आयी हैं. अपनी ज़िन्दगी में मैं जो कमी महसूस कर रही थी क्या वो यही था. क्या मुझे दूसरे मर्दो की आदत पड़ गयी थी, या फिर पति के मुझसे दूर रहने से मेरी जरुरत पूरी नहीं हो पा रही थी.

मैंने कसम खायी कि दो महीनो में, मैं अपना पुराना फिगर पाकर रहूंगी. अगले दिन से ही मैंने योगा और कसरत फिर शुरू कर दिए और खानपान की आदत फिर से पहले वाली कर ली. दो महीनो में ही मुझे परिणाम दिखने लगे और मेरे पुराने कपड़े अब धीरे धीरे फिट आने लगे थे.

अशोक भी अब खुश थे और बच्चे को फिर अपने साथ रख लिया था. अशोक ने इसी शहर की दूसरी खुली ब्रांच में ऑफिस जाना शुरू कर दिया था. मेरी ज़िन्दगी फिर पटरी पर लौट आयी.

पियूष के साथ हुई इस एक घटना ने मेरे जीवन को एक सही मौड़ दे दिया था. मैं वापिस उस रास्ते पर नहीं जाना चाहती थी और अशोक के साथ ही अपना तन और मन लगा रही थी.

मैं इसमें कितना कामयाब हो पाऊँगी वो तो आने वाला वक्त ही बताएगा, क्यों कि मैंने अपना सेक्सी फिगर फिर पा लिया था, तो भँवरे कब तक मुझसे दूर रहेंगे.

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नए घर में मेरी पहली होली थी. मुझे अब वैसे भी होली खेलना इतना पसंद नहीं था जितना बचपन में था. हमारे मौहल्ले में ही होली का दहन हुआ और हमने उसमे हिस्सा लिया. ये होली सेक्स स्टोरी उसी दिन के बाद शुरू हुई!

अगले दिन रंगो की होली थी. मुझमे तो इतना उत्साह नहीं था पर पति हर बार की तरह उत्साही थे. उन्होंने हमारे बच्चे को भी इस उत्साह में शामिल कर लिया था.

उनका प्लान था कि यहाँ होली खेलने के बाद वो लोग अपने पुश्तैनी घर भी जायेंगे जहा मेरी सास रहती हैं. वहाँ भी पुराने पडोसी और रिश्तेदार हैं जिनके साथ हर साल होली खेलते आये हैं..

मैंने उनको पहले ही मना कर दिया कि मेरा दो दो जगह होली खेलने का कोई प्लान नहीं हैं. इस मोहल्ले में हम वैसे भी नए थे तो ज्यादा कोई रंगो से भरेगा नहीं पर पुराने घर गए तो जान पहचान की वजह से कुछ ज्यादा ही रंग भर देंगे.

होली का दिन भी आया और सुबह एक घंटे के अंदर ही हमने मोहल्ले की छोटी सी होली खेल ली. पति का पेट तो इस छोटी सी होली खेलने से जैसे भरा ही नहीं. उनका प्लान वो वैसे ही पुराने घर जा होली खेलने का था.

मैं वापिस घर पर आ कर नहा ली. पति बच्चे को लेकर पुराने घर होली खेलने निकल गए.

मैंने अपनी वो नयी साड़ी पहन ली जो होली पर पति ने उपहार में दी थी. वैसे भी अब कोई रंग तो लगाने वाला ही नहीं था और कोई दिक्कत नहीं थी.
 
मैंने मोतीया रंग की काम वाली साडी और उस पर सफ़ेद रंग का ब्लाउज पहन लिया और अच्छे से मेकअप कर देखने लगी, आने वाले सामाजिक कार्यक्रम में ये साड़ी कैसी लगेगी. थोड़ी देर के लिए ही पहननी थी तो मैंने ब्रा भी नहीं पहना.

अभी पूरा तैयार भी नहीं हुई थी कि डोर बेल बज उठी. कौन आया होगा ये विचार करने लगी, कही अशोक कुछ भूल तो नहीं गए जो वापिस आ गए. पीप-होल से झाँका तो देखा हमारे पुराने घर का पडोसी नितिन जो अशोक का ख़ास दोस्त भी हैं, वो खड़ा हैं.

हर साल वो और अशोक साथ में होली की मस्ती करते हैं. इस साल हम नए घर पर हैं तो शायद नितिन यहाँ अशोक के साथ होली खेलने की चाहत में आया था. पर अशोक तो खुद उसके घर के उधर ही गया हुआ हैं.

मैं सोचने लगी, दरवाजा खोलू या नहीं, कही वो मुझे रंग से ना भर दे, मेरी नयी साड़ी ख़राब हो जाएगी. ना खोलू तो उसको बुरा लगेगा की वो घर आया और दरवाजा भी नहीं खोला. कोई और रास्ता नहीं था तो मैंने अब दरवाजा खोला.

नितिन: “हैप्पी होली”

मैं: “हैप्पी होली.”

नितिन: “अरे ये क्या तुमने तो होली खेली ही नहीं, हर साल तो खेलती हो.”

मैं: “मैंने तो होली खेल भी ली और फिर मैं नहा भी ली.”

नितिन: “अशोक को बाहर बुलाओ, उसको मैं लेने आया हूँ, उसके बिना होली खेलने का मजा ही नहीं आता हैं.”

मैं: “अशोक तो तुम्हारे वही गया हैं. अभी थोड़ी देर पहले ही निकला हैं.”

नितिन: “अच्छा ठीक हैं, मैं उसे वही मिलता हूँ. अब आया हूँ तो होली मना कर ही जाऊंगा. रंग तो लगवाना पड़ेगा.”

मैं: “होली का मतलब सिर्फ रंग लगान ही तो नहीं, मुँह मीठा करके भी होली मना सकते हैं. आज मुँह मीठा कर होली मना लो, अगले साल रंग लगा देना. अंदर आ जाओ, कुछ नाश्ता कर लो होली का.”

नितिन अब दरवाजे से अंदर आ गया और मैंने टेबल पर पड़े नाश्ते से कुछ खाने को कहा.

नितिन: “क्या प्रतिमा, थोड़ी बहुत होली तो मेरे साथ भी खेलनी ही पड़ेगी. वरना होली का कैसा नाश्ता!”

मैं: “अरे मैं नहा चुकी हूँ, वरना मैं मना नहीं करती होली खेलने से. तुम नाश्ता लो.”

नितिन: “अच्छा एक काम करो एक रंग से तिलक ही लगवा लो माथे पर, वो तो चलेगा?”

मैं: “अच्छा ठीक हैं, पर संभल कर, थोड़ा सा ही रंग लेना, साड़ी पर ना गिर जाये.”

नितिन: “अरे तुम चिंता मत करो.”

नितिन ने अपने साथ लाये गुलाल की थैली को अपने एक हाथ में पकड़े दूसरे हाथ को उसमे डाला. मैंने आँखों में गुलाल ना जाये इसलिये आँखें बंद कर दी और चेहरा आगे कर दिया ताकि रंग साड़ी पर ना गिरे.

वो मेरे ललाट पर एक तिलक लगाने लगा और तेजी से मेरे पुरे चेहरे पर रंग लगा दिया. मैं एक दम से दूर हटी.

मैं: “अरे ये क्या किया? सिर्फ तिलक लगाने को बोला था.”

नितिन: “अरे सूखा रंग हैं, कुछ नहीं होगा साड़ी को, धो लेना. होली बार बार थोड़े ही आएगी.”

मैं अपनी साड़ी पर गिरा थोड़ा गुलाल झटकते हुए बोली “अच्छा अब तो नाश्ता कर लो.”

नितिन: “हर साल मैं तुम्हे पक्का कलर लगाता हूँ, इसके बिना होली पूरी कैसी होगी.”

ये कहते हुए उसने जेब से एक पक्के कलर की छोटी डिबिया निकाल ली.

मैं: “नितिन, इसको अंदर रखो. पक्का रंग नहीं चलेगा.”

नितिन: “बस थोड़ा सा मुँह पर लगवा लो, जल्दी रंग उतर जाए तो कैसी होली.”
 
मुझे अपनी साडी खतरे में दिखाई दी. मैं तुरंत बचने के लिए वहा से खिसकने लगी, पर नितिन ने पीछे से मेरी साड़ी पकड़ ही ली और साड़ी खींचने से मुझे रुकना पड़ा. उसने मेरी साड़ी छोड़ एक हाथ से मुझे कमर से कस कर पकड़ लिया. उसके दूसरे हाथ में कलर की डिबिया थी.

मैं: “नहीं नितिन, पक्का कलर नहीं. मेरी साड़ी हलके कलर की हैं, इस पर ये काला दाग लग जायेगा तो नहीं निकलेगा. मेरी नयी साड़ी हैं.”

नितिन: “अरे कलर तो लगाना ही पड़ेगा, होली हैं. साड़ी की चिंता हैं तो भले ही निकाल दो पर कलर तो लगाऊंगा.”

ये कहते हुए उसने दूसरे हाथ से कलर की डिबिया टेबल पर रखी और उस हाथ से मेरी साड़ी का पल्लू मेरे कंधे से निकाला और नीचे गिरा दिया.

उसने अपना हाथ जो कमर पर था उसको हटाया जिससे साड़ी का पल्लू पूरा नीचे जमीन पर गिर गया. पहला हाथ कमर से हटते ही उसने अपने दूसरे हाथ से मेरी कमर को पकड़ लिया.

अब तक उसका हाथ साड़ी के ऊपर से मेरे कमर को पकडे था, अब बिना साड़ी के मेरी नंगी पतली कमर को दबोचे हुए था. साड़ी हटने से मेरी पतली कमर के ऊपर सफ़ेद ब्लाउज के अंदर मम्मो का उभार अच्छे से दिखने लगा था. अंदर ब्रा भी नहीं था और सफ़ेद रंग के पतले ब्लाउज से मेरे गहरे गुलाबी निप्पल की झलक हलकी सी दिखने लगी थी.

उसने मुझे इतना कस के पकड़ा था कि उसके लंड का हिस्सा मेरे नितंबो से चिपका हुआ था. शायद भांग का नशा करके आया हो ऐसा लग रहा था. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था. उसको पूरा होश भी नहीं था कि होली की आड़ में वो क्या कर रहा हैं.

उसने अब वो पक्के कलर की डिबिया दूसरे खाली हाथ से उठाई और पहले हाथ के पास ले आया जिससे कमर को पकडे हुए था. कमर वाले हाथ की उंगलियों से उसने डिबिया का ढक्कन खोला और अब उसी हाथ में डिबिया को पकड़ लिया.

उसने थोड़ा रंग अपने एक हाथ पर लगा दिया और उंगलिया रगड़ कर कलर अपनी हथेली पर फैला दिया और मेरे दोनों गालो और ललाट पर लगा दिया. मैं ज्यादा नहीं हिली, वरना कमर वाले हाथ में पकड़ी खुली डिबिया से रंग मेरी साड़ी पर गिर सकता था.
 
मेरे चेहरे पर कलर लगाने के बाद मुझे लगा अब वो मुझे छोड़ देगा, पर उसने थोड़ा और कलर अपने हाथ में लिया.

मैं: “अब तो छोडो, लग तो गया मुँह पर पक्का कलर.”

नितिन: “रुको तो सही, और भी जगह लगाना हैं कलर.”

उसने अब कलर मेरी नंगी बाहों पर लगा दिया. और फिर थोड़ा कलर और ले मेरे पेट और कमर पर मलता हुआ मेरे बदन को छूने के मजे लेने लगा.

होली के दिन कैसे एक खुबसूरत इंदौर की देसी लड़की की चुदाई हुई? इस होली सेक्स स्टोरी में जानिए और मजे करिए.

फिर उसने थोड़ा कलर और निकाला और मेरे ब्लाउज के ऊपर की तरफ पीठ और गर्दन पर कलर लगाया. मैं हिल नहीं रही थी इस डर से कि कलर कही साड़ी पर ना गिर जाये और इसका फायदा उठा उसने अपनी उंगलिया पीठ पर मेरे ब्लाउज में डाल कलर लगाने लगा.

अंदर ऊँगली जाते ही मैं विरोध में थोड़ा आगे की तरफ झुकी तो झटके से खिंच कर मेरे ब्लाउज का आगे से ऊपर का एक हुक भी टूट गया और मेरा क्लीवेज दिखने लगा. मैं फिर से शांत हो गयी.

नितिन: “ऊप्स, सॉरी, हुक टूट गया, ज्यादा हिलो मत, चुपचाप कलर लगवा लो. जो जो जगह दिख रही हैं बस वहा कलर लगाऊंगा.”

ये कहते हुए वो आगे से मेरे गले और फिर मेरे सीने पर कलर लगाने लगा. कलर लगाते हुए उसने थोड़ी उंगलिया ब्लाउज के अंदर भी डाल दी थी. एक हुक खुलने से उसको ज्यादा जगह मिल गयी थी. मेरे मम्मो के उभार को थोड़ा दबाते हुए उसने कलर लगा दिया.

वो किसी भी क्षण मेरे मम्मो को दबोच सकता था. मै खुद को छुड़ाने के लिए फिर थोड़ा जोर से हिली और उसकी उंगलिया अभी भी ब्लाउज के अंदर थी जिससे मेरा एक और हूक टूट कर निकल गया.

मेरे मम्मो के बीच की घाटी और भी दिखने लगी. मैं अब कही ना कही हार मानने लगी थी. अब उसने मुझे कमर से पकडे रखा था तो छोड़ दिया और कलर की डिबिया को रख दिया.

हुक टूट निकल चुके थे तो मैं अपने ब्लाउज के दोनों हिस्सों को अपने हाथ से पकड़ खड़ी हो गयी. कुछ अनहोनी होने से पहले छूट जाने से मैं खुश थी. मैंने अपने नीचे लटके पड़े साडी के पल्लू को ऊपर उठाया.

मैं: “ये कपड़ा फाड़ होली खेलने आये थे तुम?”

नितिन: “तुम चुपचाप कलर लगवा देती तो हुक नहीं टूटता ना.”

मैं: “चलो अब नाश्ता कर लो, होली खेल ली.”

नितिन: “बिना पानी के कौनसी होली होती हैं! अभी तुमको पानी में डालना बाकी हैं. पिछले साल तो तुम कमरे में बंद हो गयी थी बचने के लिए.”

ये सुनते ही मैं चीखते हुए रसोई की तरफ भागने को हुई और उसने मुझे फिर पीछे से पकड़ लिया.

मैं: “नहीं नितिन, प्लीज. मेरी साड़ी ड्राई क्लीन की हैं, उसको पानी में नहीं भिगो सकते ख़राब जो जाएगी. अब छोड़ दो, वैसे भी बहुत होली खेल ली हैं तुमने. अब प्लीज परेशान मत करो.”

नितिन: “बुरा न मानो होली हैं. साड़ी नयी आ जाएगी.”

मैं: “नहीं, बहुत महँगी हैं, पहली बार पहनी हैं.”

नितिन: “मुझे वैसे भी तुम्हे पानी में भिगोना हैं, साड़ी को नहीं. पहले साड़ी निकालते हैं फिर तुम्हे पानी में डालूंगा.”

मैं: “नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकते.”

नितिन: “अरे मैं करके बताता हूँ.”

मेरी साड़ी का पल्लू गिर कर वैसे ही मेरे मुड़े हुए बाहों में आ गया था, उसने उसको वहा से हटाया. मैंने साड़ी पकड़ कर रखी थी पर मैं जहा से पकड़ती वो दूसरी जगह से साड़ी निकाल देता. उसमे मेरी पूरी साड़ी को मेरे पेटीकोट से जल्दी ही अलग कर दिया और साड़ी सोफे पर फेंक दी.

मैं अब सिर्फ एक पेटीकोट और ब्लाउज में थी जिसके ऊपर के दो हुक टूट चुके थे. उसने मुझे उठाया और बाथरूम के अंदर ले आया. मुझे टब में खडी कर उसने नल चालू कर दिया और टब में पानी भरने लगा. मैं अपने ब्लाउज के टूटे हुए हुक के हिस्से पर हाथ रखे ब्लाउज को बंद रखे खड़ी थी.

मैं: “नितिन ये क्या कर रहे हो तुम बेशर्मो की तरह. मैंने कपडे नहीं पहन रखे हैं.”

नितिन: “पहन तो रखे हैं.”

मैं: “मेरा ब्लाउज आधा खुला है, और मैंने अंदर कुछ नहीं पहना हैं, कुछ तो समझो.”

नितिन: “अब झूठे बहाने मत मारो, पहले साड़ी का बहाना बनाया अब ये. बताओ कहा नहीं पहना हैं.”

मैं: “पागल हो गए हो तुम. अब मेरे कपड़ो में झांकोगे?”
 
नितिन: “भूल गयी, उस दिन पिकनिक में तुम, अशोक, मैं और पूजा पानी में उतरे थे. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी तो कार में तुम लड़कियों ने कपड़े बदले थे और हम कार की खिड़की पर पीठ कर परदे बने थे.” (नितिन की पत्नी का नाम पूजा था.)

मैं: “पानी में धक्का भी तुम लोगो ने ही मारा था उस दिन. वैसे भी अशोक मेरे साथ था उस वक्त.”

नितिन: “अब होली के दिन बुरा मत मानो, गीला तो होना पड़ेगा.”

काश मैंने बिना दरवाजा खोले उसको बाहर से ही भगा दिया होता तो मेरी ये हालत नहीं होती. गनीमत थी कि कम से कम मेरी नयी साड़ी ख़राब होने से बच गई.

आधा पानी भरने के बाद उसने मुझे टब में बैठा दिया और अपनी दोनों हथेली में पानी भर मेरे ऊपर पानी डालने लगा. वह पानी डालते जाता और शरीर के उस हिस्से पर अपने हाथ से मुझे रगड़ते हुए पानी लगा रहा था. उसके हाथ मेरे पीठ, गर्दन, सीने, पेट, कमर पर आराम से फिरते हुए मुझे जैसे नहला रहे थे.

मैं उसके हाथों को अपने मम्मो से जैसे तैसे दूर रख रही थी. थोड़ी ही देर में मैं पूरी गीली हो गयी. उसका कलर ज्यादा पक्का नहीं था तो उसकी रगड़ से मेरा कलर भी काफी निकल गया था.

अब उसने मुझ पर पानी डालना और छूना बंद कर दिया और खड़ा हो गया. मैं भी अब टब में ही खड़ी हो गयी और उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए पीछे रखा टॉवेल माँगा और उस पर ताना कसा.

मैं: “तुम मुझे होली खेला रहे थे या नहला रहे थे? साबुन भी लगा ही देते तो पूरी नहा लेती.”

मैं भूल ही गयी कि मेरा ब्लाउज सफ़ेद रंग का था और अंदर ब्रा भी नहीं पहना था. मेरा ब्लाउज गीला हो मेरे मम्मो से चिपक गया था और मेरे निप्पल साफ़ नजर आ रहे थे और मेरे मम्मो का उभार पूरी तरह से नजर आ रहा था. मेरा ब्लाउज पारदर्शी बन चूका था और मैं लगभग टॉपलेस खड़ी थी.

वो मेरे सीने को ही घूर रहा था तो मेरी भी नजर पड़ी और इससे पहले की मैं संभलती वो मेरी तरफ आगे बढ़ गया.

नितिन: “जैसी तुम्हारी इच्छा, मैं अब साबुन लगा देता हूँ.”

मैं: “नहींहीहीही, मैं मजाक कर रही थी.”

नितिन: “मगर मैंने तो सीरियसली ले लिया हैं, अब तो साबुन लगाना ही पड़ेगा.”

उसने साबुन उठाया और अपनी हथेली पर लगा कर हथेली मेरे शरीर पर रगड़ साबुन लगाने लगा. मेरे अंग जहा जहा से खुले थे वहा साबुन लगी हथेली रगड़ने लगा. मैं अपने दोनों हाथ अपने सीने पर लगाए हुए थी ताकि वो मेरे गीले ब्लाउज से दीखते हुए निप्पल ना देख पाए.

एक बार फिर साबुन लगाने के बहाने सीने पर कुछ ज्यादा ही नीचे जाकर मेरे ब्लाउज में हाथ डालने की भी कोशिश की उसने. मैं अपने हाथों से ब्लाउज कस कर पकड़ उसको खदेड़ते रही.

उसने मुझे सीधी करने के लिए मेरे पेटीकोट का नाड़ा पकड़ कर खिंचा जिससे वो नाड़ा खुल गया. वैसे तो पेटीकोट गीला हो मेरे शरीर से चिपक गया था फिर भी मैंने एहतियात के तौर पर एक हाथ सीने से हटा अपना पेटीकोट पकड़ लिया.

मैं: “बेशर्म, मेरे कपड़े क्यों खोल रहे हो.”

नितिन: “मैं तो तुम्हे सीधी कर रहा था गलती से खुल गया. पेटीकोट के अंदर तो कुछ पहन रखा होगा न? क्यों चिंता करती हो.”

मैं: “नितिन, ऐसी बातें करोगे मुझ से.”

नितिन: “भूल गयी, पूजा और तुम्हे दो महीने तक मेरे दोस्त के स्विमिंग पूल में स्विमिंग सिखाने ले गया था. वहा भी तो तुम लोग बिकिनी में रहते थे मेरे सामने. तब तो शर्म नहीं आयी.”

मैं: “अभी हम स्वीमिंग नहीं कर रहे हैं.”

नितिन: “तुम्हारी सोच कितनी छोटी हैं. पिछली होली पर अशोक ने पूजा को टब में पूरा लेटा दिया था. पूजा ने तो कोई शिकायत नहीं की.”

मैं: “तुम भी तो होंगे वहा.”

नितिन: “मैं तो तुम्हारे घर पर था, तुम्हे कमरे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था, तुम अंदर बंद जो थी. वैसे पूजा की भी गलती थी. होली पूरी ख़त्म नहीं हुई और वो नहाने चली गयी थी तुम्हारी तरह. अशोक को पता चला तो रंग लेकर बाथरूम में ही घुस गया और रंग दिया पूजा को.”

मैं: “नहीं, अशोक तुम्हारी तरह नहीं हैं.”

नितिन: “सच बोल रहा हूँ, पूजा से कन्फर्म कर लेना. तुमने तो ब्लाउज और पेटीकोट भी पहन रखा हैं. पूजा ने तो नहाने के लिए कपड़े खोल लिए थे और सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी. मैंने उसको बोला था इतना जल्दी मत नहा.”

मैं: “तुम फेंक रहे हो या सच बोल रहे हो?”
 
नितिन: “सच, मैंने आकर उसका टब में लेटे हुए फोटो भी लिया था.”

मैं: “पूजा के साथ इतना हुआ और तुमने अशोक को कुछ नहीं कहा!”

नितिन: “होली पर इतनी मस्ती तो चलती हैं. वो पूजा भी तो हंस रही थी.”

मैं: “तो तुम मुझसे पूजा का बदला ले रहे हो?”

नितिन: “कैसा बदला, वो पूजा तो सुबह से इंतजार कर रही हैं अशोक कब आएगा होली खेलने. अब मुझे साबुन लगाने दो.”

मैं सोच में पड़ गयी, मेरे पीठ पीछे अशोक क्या कर रहा हैं. मेरा एक हाथ पेटीकोट को पकड़े था और दूसरा मेरे ब्लाउज को. मेरा एक अकेला हाथ दोनों मम्मो को मुश्किल से ढक पा रहा था, उसने मेरे ब्लाउज में थोड़ी सी ऊँगलीया घुसा साबुन लगाना शुरू कर दिया, मैं उस पर हल्का गुस्सा करते हुए उसको मना करती रही.

मैं एक मम्मा ढकती तो वो दूसरे के तरफ साबुन लगाने लगता. उसके हौंसले बढ़ते रहे और जल्द ही अपना एक पूरा हाथ का पंजा मेरे ब्लाउज में घुसा मेरा एक मम्मा पकड़ लिया और साबुन मलने लगा.

उसकी इस हरकत पर, जिस हाथ से मैंने पेटीकोट पकड़ रखा था उससे मैंने उसको एक घुसा मार हल्का धक्का मारा. इस झटके से मेरा नाड़ा खुला पेटीकोट नीचे गिर गया और मैं पैंटी में आ गयी. मैं एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी.

वो मझ पर हंसने लगा कि मैं खुद अपने कपड़े खोल रही हूँ.

नितिन: “अब रहने भी दो, क्यों इतना शरमा रही हो? पूल में में भी तो बिकिनी पहन कर नहाते ही हैं.”

मैंने अपने दोनों हाथो से अपने ब्लाउज को पकडे रखने पर ध्यान दिया. उसने मेरे ब्लाउज को मेरे एक कंधे से निकाल उस कंधे पर साबुन लगाने लगा.

नितिन: “अब हाथ हटाओ, सिर्फ सीने पर साबुन लगाना बाकि हैं.”

मैं: “देखो, तुम अब अपनी लिमिट पार कर रहे हो. मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा हैं.”

वो मेरे करीब आ मेरे सीने पर साबुन लगाने का प्रयास करने लगा. मैंने अपने दोनों हाथो से उसको धक्का देना चाहा पर उसने मेरे हाथ पकड़ लिए और थोड़ी छीना झपटी में मेरे ब्लाउज के आगे के बाकी हुक भी खुल गए और मेरे मम्मे पुरे दिखने लगे. नितिन ने मेरे दोनों हाथ पकड़ मुझे मेरे मम्मे ढकने नहीं दिए और चिढ़ाने लगा.

नितिन : “ओ, शेम शेम.”

मेरी एक बार तो हंसी छूट गयी पर अपनी हालत देख तुरंत सुधार किया.

मैं: “मेरे हाथ छोडो, और तुरंत बाहर जाओ.”

नितिन: “अच्छा जाता हूँ, पहले तुम्हारे साबुन तो लगा लू, नयी जगह दिख रही हैं जहा साबुन नहीं लगा हैं.”

मैं: “लग गया मेरे साबुन, और नहीं लगवाना, जाओ.”

नितिन: “ठीक हैं तो नहला देता हूँ.”

उसने अब मेरे हाथ छोड़े और मैंने अपना ब्लाउज फिर अपने मम्मो के ऊपर कर दिया और हाथ से ढक दिया.

फिर उसने मेरे ऊपर पानी डालना शुरू कर दिया और मैं अपना सीना दबाये नीचे बैठ गयी.

नितिन: “और नहाना हैं या हो गया?”

मैं: “अब तुम बाहर जाओ, मेरा हो गया.”

नितिन बाथरूम से बाहर गया और मैंने चैन की सांस ली कि कुछ अनहोनी से पहले ही मैं बच गयी.

मैंने टॉवल उठाया अपने बदन को पोंछ गीले कपड़े निकाल दिए. बाथरूम के अंदर पहनने के कोई कपड़े थे नहीं तो मेरे मम्मो से लेकर जांघो तक मैं टॉवल लपेट कर ही बाहर आयी.
 
नितिन की इन हरकतों की वजह से मेरे हाथ पैर अभी भी कांप रहे थे, और मेरे शरीर पर मैं उसके स्पर्श महसूस कर पा रही थी, ख़ास तौर से जब उसने मेरे मम्मो पर साबुन मला था.

मैं जैसे ही टॉवेल लपेट बाहर आयी सामने थोड़ी दूर नितिन खड़ा हो कुछ खा रहा था. हम दोनों की नज़रे मिली और वो मुस्कराने लगा.

नितिन: “अरे तुमने तो आज होली खेली ही नहीं, देखो कोई रंग ही नहीं लगा.”

वो मेरी तरफ बढ़ता उससे पहले ही मैं चीखते हुए बैडरूम की तरफ भागी और वो मेरे पीछे. मैं बैडरूम का दरवाजा पूरा बंद करती उसके पहले ही वो दरवाजे पर आ गया और बंद नहीं करने दिया.

मैं: “कपड़े पहनने दो, फिर रंग लगा देना, अभी दरवाजा बंद करने दो. जाओ.”

नितिन: “पिछली होली पर भी यही बोलकर कमरे में बंद हो गयी थी. कपड़े बदलने हैं तो मेरे सामने बदलो और फिर होली खेलो.”

वो दरवाजे पर धक्का लगाते हुए अंदर आ गया. मैं मुड़ी और अंदर भागी और उसने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया और बिस्तर पर धक्का दे उल्टा लेटा दिया और खुद पीछे से मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गया. मैं अपने टॉवल को कस कर पकड़े लेटी रही.

वो मेरे बालो को हटा मेरे कानो के पीछे और गर्दन और कंधे पर चूमने लगा. मेरे शरीर में मीठी सी गुदगुदी होने लगी और मैं सब सहती रही. इतनी देर की मस्तियो से उसने कही ना कही मुझे कमजोर कर दिया था.

कई बार हम नितिन के साथ पिकनिक पर भी गए हैं और उसके साथ मेरा मजाक मस्ती काफी चलता था पर इतना ज्यादा होगा ये नहीं सोचा था. हर साल होली पर रंग लगाते वक़्त ऐसी मस्ती करता था पर आज वो अकेला था तो उसने हद कर दी थी, मेरे कपड़े तक खोल दिए थे और अंदर हाथ डाल दिया था.

मैं कई बार बिकिनी में उसकी पत्नी पूजा और नितिन के साथ स्विमिंग पूल में तैर चुकी हूँ. मेरे प्रति उसकी ऐसी भावनाये होगी मुझे कभी लगा नहीं था. फिलहाल वो टॉवल के ऊपर से ही मेरी गांड पर अपने लंड को रगड़ रहा था.

थोड़ी देर में वो मेरे ऊपर से उठा और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर मेरे टॉवल के ऊपर के हिस्से में सीने पर चूमने लगा. मैंने टॉवल को और कस के पकड़ लिया. उसको मैं लगातार मना कर हल्का प्रतिरोध कर रही थी.

मैं: “तुम्हे पता भी हैं तुम क्या कर रहे हो? अशोक को पता चलेगा तो क्या होगा पता हैं?”

नितिन: “ठीक हैं उसी से पूछ लेते हैं.”

ये कह कर उसने अपना मोबाइल निकाला और स्पीकर पर रख फोन मिलाने लगा. उसने अशोक को ही फ़ोन मिलाया था.

अशोक (फ़ोन पर): “अबे नितिन मैं तेरे घर पर होली खेलने आया हूँ, तू कहा हैं?”

नितिन: “मैं तेरे नए घर पर हूँ. प्रतिमा होली खेलने से मना कर रही हैं. उसको जरा बोल मुझे मेरे हिसाब से होली खेलने दे, मना ना करे.”

अशोक (फ़ोन पर):”अच्छा फ़ोन दो उसे.”

नितिन ने फ़ोन मेरे हाथ में थमा दिया.

मैं: “हां, हेल्लो..”

नितिन ने मेरे टॉवल को खींचना शुरू कर दिया. मैं एक हाथ से फ़ोन पकड़े और दूसरे से टॉवल पकड़े रखने का प्रयास कर रही थी. जब कि नितिन दोनों हाथों से मेरा टॉवल निकाल रहा था.

मैं: “आउच, छोड़ो, ये नितिन को समझाओ, ये मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा हैं.”

नितिन दूर से ही जोर से चिल्लाने लगा “ये मुझे रंगने नहीं दे रही.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुम्हे पता हैं, वो जबरदस्ती होली खेलाए बिना नहीं छोड़ेगा, तुम बाद में वापिस नहा लेना, उसको जल्दी होली खेला कर यहाँ भेज दो, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.”

नितिन ने मेरा पूरा टॉवल खिंच कर मुझे नंगी कर दिया. मैं पूरी नंगी हो गयी थी और उसने मेरी दोनों टाँगे दबा के रखी थी. मैं एक हाथ से फ़ोन और दूसरे से अपना सीना ढके हुई थी और शरम से सिकुड़ती जा रही थी. मैंने अशोक से फ़ोन पर मदद मांगी.

मैं: “तुम समझ नहीं रहे हो. ये कुछ ज्यादा ही कर रहा हैं. हमेशा के लिए मेरे दामन पर दाग लग जायेगा.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुमने वो नयी साड़ी पहन ली क्या! उसको बोलो पहले खोलने दे.”

मैं: “कपड़े तो सब खोल ही चूका हैं.”

अशोक (फ़ोन पर): “फिर क्या टेंशन हैं. होली हैं, थोड़ी मस्ती चलती हैं. तुम फ़ोन दो उसको.”

मैंने फ़ोन नितिन की तरफ बढ़ाया पर उसने अपने हाथों से मेरे पाँव पकड़ रखे थे, तो उसने फ़ोन ना लेकर मुंह आगे फ़ोन के पास बढ़ा कर बात करने लगा.

नितिन: “पूजा घर पर हैं ना, होली खेल ली?”

अशोक (फोन पर): “नहीं वो तेरी छोटी बच्ची को बाहर छोड़ने गयी हैं, उसके सामने पूजा को रंग रगड़ता तो वो बच्ची डर जाती इसलिए वो बाहर छोड़ने गयी हैं.”

नितिन: “हां ठीक किया, पिछली बार रगड़ा था वैसे रगड़ने वाला हैं तो बच्ची डर जाएगी.”

अशोक (फ़ोन पर): “चल पूजा आ गयी हैं, तूने खेलना शुरू किया?”

नितिन: “बस शुरू करने ही वाला हूँ”

मैंने फ़ोन अपने मुँह के पास खिंचा, मेरा एक हाथ अभी भी मेरे सीने पर मम्मो को ढके हुआ था. इस बीच नितिन ने अपनी जेब से एक कंडोम निकाल कर अपने कपड़े नीचे किये और अपने लंड को पहना दिया.

मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि होली के दिन वो कंडॉम लेकर क्यों घूम रहा हैं, या नितिन पहले ही सोच कर आया था कि आज वो मुझे चोदने वाला हैं. वो सचमुच पूरी तैयारी के साथ ही आया था.

मैं: “तुम्हे पता हैं, तुम्हारा दोस्त क्या करने वाला हैं?”

अशोक (फ़ोन पर): “अरे क्या हुआ? होली हैं, उसको रंग लगाने दो. एक मिनट होल्ड करो.”

फ़ोन पर पीछे से फुसफुसाहट हो रही थी और पूजा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी. नितिन ने मेरे पाँव चौड़े किये और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया.

उसको जो चाहिए था वो ले चूका था, अब मेरे विरोध से कोई फायदा नहीं था. मैं फ़ोन पकड़े छत की तरफ शुन्य में निहार रही थी.
 
अशोक (फ़ोन पर): “अच्छा प्रतिमा अभी तुम ज्यादा मत सोचो, होली के मजे लो, मैं होली खेल कर आता हूँ. जरा नितिन को फोन दो.”

नितिन ने अब मुझे धक्के मार चोदना शुरु कर दिया था. मैंने फ़ोन नितिन को पकड़ा दिया.

नितिन: “हां बोल!”

अशोक (फ़ोन पर): “ज्यादा परेशान मत करना उसको, प्रोटेक्शन का ध्यान रखना.”

नितिन: “चिंता मत कर, वो मान गयी हैं, फ़ोन रख.”

फिर नितिन ने फ़ोन काट दिया और फिर अपने धक्को की गति बढ़ा दी.

उनकी बातें सुनकर मैं सन्न रह गयी, क्या अशोक को पहले से ही पता था. कही ये इन दोनों के बीच कुछ डील तो नहीं हैं कि होली के दिन एक दूसरे की बीवी के मजे लेंगे. ये इन दोनों दोस्तों की मिलीभगत हैं. हालांकि अशोक कोड लैंग्वेज में बात कर रहा था पर उसकी बातो का मतलब मैं समझ सकती थी.

मुझे शायद खुलकर अशोक को नितिन की करतूत बता देनी चाहिए थी, पर मुझे उस वक़्त बिना कपड़ो के इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने सोचा अशोक मेरी इतनी सी बात सुनकर वैसे ही नितिन को रोक देगा. मगर वो तो उसका और भी साथ दे रहा था.

नितिन ने इतनी देर होली खेलते और नहलाते मुझे तैयार कर ही दिया था सिर्फ अशोक का डर था, वो भी इजाजत मिल ही गयी थी. मजे लेने का हक़ क्या सिर्फ पतियों को ही हैं, वो वहा पूजा के मजे ले रहा हैं तो मैं भी ले सकती हूँ.

मैंने अपना हाथ अपने सीने से हटा उसको अपने मम्मे दिखा दिए, ये मेरी सहमति थी.

नितिन ने अपनी टीशर्ट निकाल दी थी और अब आगे झूक कर मेरे मम्मो को चूसने लगा. थोड़ी देर चूसने के बाद मुझ पर पूरा लेट गया. उसके वजन से मेरे मम्मे दब गए और उसने मुझे चोदना जारी रखा.

मैं: “तुम जो मेरे साथ कर रहे हो, अशोक भी पूजा के साथ कर रहा होगा तो?”

नितिन: “मेरे हिसाब से तो उन्होंने पिछली होली पर भी किया था.”

मैं: “तुमने फिर अशोक को कुछ नहीं बोला?”

नितिन: “मैं घर पंहुचा तब तक तो वो लोग कर चुके थे.”

मैं: “तो तुम्हे कैसे पता चला?”

नितिन: “बाथरूम अंदर से बंद था. बहुत देर तक नहीं खोला बस आवाजे आ रही थी. तुम्हारी तरह पूजा बचाने के लिए आवाज नहीं लगा रही थी. सिसकियाँ भर रही थी.”

मैं: “तो तुमने उनको बाहर आने के बाद पूछा नहीं!”

नितिन: “अशोक बोला कि वो पूजा को पानी में गीला कर रहा था. शायद बाथरूम के पानी से नहीं उसके लंड के पानी से गीला किया था.”

मैं: “और पूजा ने क्या कहा?”

नितिन: “वो तो टब में पूरी रंगी पड़ी थी. पूरा मुँह रंग से काला हो गया था. सच में मुँह काला करा लिया था उसने. मेरे पास कोई सबूत तो था नहीं तो इल्जाम कैसे लगाता.”

मैं: “सच सच बताओ अशोक ने ही तुम्हे यहाँ भेजा न मुझे चोदने के लिए?”

नितिन: “मुझे तो पूजा ने कहा कि अशोक ने फ़ोन करके मुझे यहाँ बुलाया हैं. वो यहाँ नहीं था. मैं समझ गया पूजा की चाल हैं. एक विकल्प था उन दोनों को घर जाकर रंगे हाथों पकडू लू, दूसरी तरफ तुम थी. जब से तुम्हे बिकिनी में देखा था तब से ही नज़रे थी, मैंने तुम पर ट्राय मारा. उधर अशोक मेरी बीवी पूजा को चोद रहा होगा, तो मैंने सोचा मैं उसकी बीवी को चोद दूं.”

दोस्तों अगर आप मेरी देसी चुदाई कहानी पहली बार पढ़ रहे है? तो मेरी पिछली चुदाई की कहानियों को पढना मत भूलियेगा.

मैं: “तुम तीनो मुझे क्यों फंसा रहे हो?”

नितिन: “मैंने तुम्हारे सामने अशोक को फ़ोन किया, तुम्हारी गुहार के बावजूद उसने खुद ने मुझे इजाजत दी तो मुझे पता चल गया वो उधर क्या कर रहा हैं. अब तुम ज्यादा मत सोचो, मजा नहीं आ रहा क्या?”

मैं: “इतनी देर नहीं आ रहा था, अब आ रहा हैं.”

नितिन: “मैं पूजा को फ़ोन लगाता हूँ और बात नहीं करेंगे, सिर्फ फ़ोन चालू रख छोड़ देंगे. उनको हमारी चुदाई की आवाजे सुना कर जलाते हैं.”

मैं: “इसे कहते हैं बदला, लगाओ फ़ोन.”
 
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