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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

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शायद काफी समय से यह सुख नहीं मिलने पर पुरुषो का यही हाल होता होगा. अब मुझे मेरे प्रतिरोध करने का कोई फायदा नजर नहीं आया. मैं अब सब कुछ लुटा चुकी थी. अब वह आगे पीछे होकर गति करने लगे धीरे धीरे यह गति बढ़ती जा रही थी.

वो प्रेमानंद में डूबते जा रहे थे और सिसकिया निकाले जा रहे थे. मैं इस बीच अपने पति के बारे में सोच रही थी. मेरी एक छोटी सी गलती की वजह से अब मैं उनको मुँह नहीं दिखा पाऊँगी.

अब पछताये हो तो क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत. मैंने अब बाकी सब बातों के बारे में सोचना बंद कर दिया और सकारात्मक सोचने लगी.

मेरे इस कदम से मैंने एक पुरुष को जैसे नया जीवन दिया, एक तड़पते पुरुष को वो ख़ुशी दी जो वो ज़िन्दगी भर याद रखेगा.

आखिर औरत होती भी त्याग की मूर्ति हैं. मैंने अपनी आबरू का त्याग कर किसी की खुशिया खरीदी थी. वह लगातार मुझे पीछे से धक्का मारते हुए चोदने का आनंद लिए जा रहे थे, उनकी आहें और सिसकिया सुनकर मुझे अच्छा लग रहा था. जैसे कोई पुण्य कर दिया हो.

अब आखिर मैं भी कब तक अपने शरीर को रोकती. कुछ ही समय में मेरा सब्र भी टूट गया और मेरी भी आहें निकलनी लगी. उससे उनका जोश भी बढ़ गया तथा ओर भी लगन से अपना कार्य करने लगे.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और वो रुक गए.

बाहर से उनकी बच्ची की आवाज आ रही थी. उन्होंने अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाल दिया और खड़े हो अपना पाजामा फिर ऊपर कर लिया. मैंने भी खड़े हो अपना गाउन नीचे कर दिया.

मुझे खुश होना चाहिए था पर थोड़ा बुरा लगा कि ऐसे में मुझे अधूरा नहीं छोड़ना था. मुझे अपनीं मम्मी के गाउन में देख बच्ची क्या सोचेगी इसलिए मैं बाथरूम की तरफ चली गयी.

संजीव ने दरवाजा खोला और बच्ची दौड़ते हुए अंदर गयी और थोड़ी देर में एक नया खिलौना हाथ में ले वापिस दरवाजे से बाहर निकल गयी. उन्होंने फिर से दरवाजा बंद किया. मैं बाथरूम से निकल कर फिर हॉल में आ गयी.

हम दोनों की नजरे फिर से मिली और अभी जो कुछ भी हुआ था, ये सोच मैंने अपनी नजरे नीचे झुका ली. मैंने सोचा शायद इनका जमीर भी जाग जाए और अपना इरादा बदल ले.

पर एक महीने भर से तड़पते हुए मर्द को अगर मौका मिला हो तो वो भला कैसे छोड़ेगा.

उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था. वो मुझे बेडरूम में ले गए. मुझे आईने के सामने खडी किया और नीचे से गाउन पकड़ कर उठाते हुए मेरे सर से बाहर निकाल दिया. उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर उल्टी लेटा दिया.

उन्होंने एक दराज से कुछ सामान निकाल लिया. अब वो मेरे करीब आये और मेरी दोनों नाजुक कलाइयां पकड़ी और उनको पीठ पर ले जाकर उन पर एक हथकड़ी बाँध ली. उस पर मखमल का कपडा चढ़ा था तो चुभ नहीं रही थी.

मुझे समझ नहीं आया वो करना क्या चाह रहे थे. मैं कोई विरोध नहीं कर थी फिर इस हथकड़ी का क्या फायदा.

उन्होंने मुझे अब सीधा लेटा दिया और अपने हाथ में एक लंबी सी पंखनुमा चीज पकड़ ली. मुझे लग गया वो मुझे गुदगुदी करने वाला हैं.

वो अब उस पंखे को मेरे निप्पल के घेरो के चारो तरफ हलके से फेरने लगा. मजे के मारे मेरी सिसकियाँ निकलने लगी. मेरी चूंचिया एकदम से तन गयी और फुल कर और बड़ी हो गयी.

मैना ने मुझसे एक दो बार जिक्र भी किया था, कि उसके पति सेक्स से पहले कुछ गेम खेल कर तड़पाते हैं, आज पता चला वो खेल क्या हैं. जो भी हो आज उसके हिस्से का खेल मैं खेल रही थी.

अब वो पंख घेरा बढ़ाते हुए मेरे पुरे मम्मो को गुदगुदी कर तड़पाने लगा. इतना रोमांटिक पति होते हुए उसको छोड़ कर जाने वाली कोई बेवकूफ पत्नी ही हो सकती हैं. पंख घूमते हुए अब मेरे नाभी और पतली कमर को गुदगुदाने लगा.
 
मैं अब इंतज़ार कर रही थी कि जब ये मेरी चूत पर अठखेलियां करेगा तब कैसा लगेगा.

इससे पहले की मैं उस उन्माद में सो जाऊ, डोरबेल एक बार फिर बजी और मैं उस नशे से बाहर आयी.

संजीव ने अपने सारे सामान फिर से दराज में डाले और मुझ पर एक रजाई पूरी डाल दी. ऐ.सी. से वैसे ही हलकी ठंड थी तो रजाई से थोड़ी गर्माहट मिली.

संजीव बाहर जा चुके थे और किसी महिला से बात कर रहे थे. थोड़ी देर में वो दोनों बैडरूम की तरफ बढ़ रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी, कही किसी को शक तो नहीं हो गया.

मुझे वो आवाज पहचानते देर नहीं लगी, वो मैना की ही आवाज ही थी. बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने बचे हुए कपडे लेने ही आयी थी. मेरी हालत उस वक्त क्या थी ये कोई सोच भी नहीं सकता.

मैं अपनी सहेली की गैरमौजूदगी में उसके बैड पर नंगी लेटी हुई थी, और उसके छोड़े हुए पति के साथ कुछ अनैतिक काम कर चुकी थी.

मैं सोच में पड़ गयी, क्या मुझे आवाज लगा देनी चाहिए. इससे मैं तो बच जाउंगी इस पाप को और आगे बढ़ने से पहले. पर फिर सोचा मैना पर क्या बीतेगी. उसका अपने पति पर रहा सहा भरोसा भी टूट जायेगा. उसके दोनों बच्चो का क्या होगा.

किसी और को अपने बिस्तर पर सोया हुआ देख उसने संजीव को पूछा भी था, पर संजीव ने झूठ बोल दिया कि वो उसकी माँ हैं, सो रही हैं.

मैना का तो वैसे भी उसकी माँ से छत्तीस का आंकड़ा था, तो शायद वो थोड़ी ही देर में वहा से चली गयी थी. क्यों कि आवाजे आना बंद हो गयी थी.

मैं रजाई के नीचे अभी भी इंतज़ार कर रही थी, कि अचानक मेरे ऊपर से वो रजाई हटा दी गयी. मैं डर गयी, कही सामने मैना न खड़ी हो. पर सामने संजीव को देख थोड़ी शांती मिली.

उसने बताया कि मैना आई थी अपने कपडे लेने और मेरा पहना हुआ गाउन भी लेके चली गयी. जो संजीव ने नीचे से उठा कर अंदर अलमारी में छुपा दिया था बाहर जाने से पहले.

मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब और वहा नहीं रुकने वाली. तब तक वो एक बार फिर वो पंख ले आया और मेरे शरीर पर फेरने लगे. उसमे पता नहीं क्या जादू था कि मुझे अपना फैसला फिर से बदलना पड़ा.

शायद संजीव के पास भी ज्यादा समय नहीं था, मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. वो नाजुक पंख मेरी चूत को सहला रहा था और मेरी चूत मजे के मारे कांप रही थी. मेरे मुँह से आह आह की आवाजे आने लगी.

मेरे पैर अपने आप ही एक दूसरे से दूर होते गए और मैंने अपनी चूत के दरवाजे खोल दिए. मुझे बस ये अहसास हो रहा था कि मैं किसी मसाज पार्लर में हूँ और सुकून भरी मसाज करवा रही हूँ. मेरी चूत में बूंद बूंद पानी भरने लगा था और छलकने को उतारू था.

इससे पहले की मेरी चूत का जाम छलक जाए, वो रुक गए और मुझे पलटी मार कर उल्टी लेटा दिया. वो अब दराज से कुछ और निकालने लगे.

तभी एक जोर की चटाक आवाज सुनाई दी और मैंने अपनी गांड पर किसी ने मारा हो ऐसा महसूस किया. उसके कुछ सेकंड्स बाद मुझे वहा हलकी जलन होने लगी जो कुछ सेकंड रही.

मैंने सर पीछे कर देखा संजीव के हाथ में एक पतली छड़ी जैसा था जिस के आगे के सिरे पर चमड़े का छोटा टुकड़ा लगा था.

अब उन्होंने मेरे गांड के दूसरे गाल पर मारा, फिर वही चटाक की आवाज और हलकी जलन. जिसके बाद पुरे शरीर में कंपन सा हुआ.

मेरे पुरे शरीर में रोंगटे खड़े हो गए और खास तौर से मेरी चूत में एक अजीब सी खुजली मचने लगी. ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई आये और मेरे अंगो को हाथ लगा कर सहलाये.

थोड़ी थोड़ी देर से वो मुझे ऐसे ही चटाके मारता रहा और मेरे मुंह से कराहने की आवाज के साथ एक प्यास भरी आह निकलती.

एक लड़के ने अपने दोस्त की मम्मी यही की अपनी रीता चाची की चुदाई कैसे करी. यह आप उसकी सेक्स की स्टोरी में जान सकते है.

जब उसने चटाके मारना पूरा बंद कर दिया, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी गांड पर जहा जहा पड़ी एक साथ हल्का दर्द सा हो रहा था.

वो दर्द थोड़ी देर बाद सामान्य हो गया, क्यों कि वो इतनी जोर से भी नहीं मारा था कि बहुत ज्यादा देर तक रहे. उसने मेरे हाथों से हथकड़ी खोल दी.

मुझे लगा कही इसी कारण से तो मैना इसको छोड़ कर नहीं चली गयी. पर इसमें इतना बुरा भी नहीं था. अगर ज्यादा जोर से ना मारा जाए तो ये औरत को और भी ज्यादा उकसाने के काम आ सकता हैं. मैंने तो सोच लिया था कि मैं भी अपने पति को ऐसी चीज लाने को बोलूंगी, वरना हाथ से भी चांटे मार कर काम चला सकते हैं.
 
मेरी चूत अब फड़फड़ा रही थी. कभी चूत की पंखुडिया सिकुड़ती तो कभी फूल कर खुल जाती.

मैं अब आबरू, नफरत, दया सब भूल चुकी थी, मैं अपने शरीर की जरुरत के आगे लाचार हो चुकी थी. पति ने वैसे भी पिछले एक सप्ताह से मुझे कोई शारीरिक सुख नहीं दिया था.

वो अपने कपडे उतार कर मेरे पास में लेट गए. शायद इतनी मेहनत के बाद थोड़ा आराम करना चाहते थे. मैंने देखा उनका लंड फुँफकार मार रहा था और रह रह ऊपर नीचे हो सलामी दे रहा था.

उनके हाथ में एक कंडोम का पैकेट था. उन्होंने वो कंडोम खोल अपने लंड को पहना दिया.

फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ खिंच कर मुझे अपने आप पर झुका दिया. मैं जैसे उन पर सवार हो गयी. मेरा थोड़ा शरीर उन पर झुका हुआ था. मेरे दोनों मम्मे उनके मुख पर थे.

वह अब मेरी चूँचियो को धीरे धीरे चूसने लगे. साथ ही साथ वो अपने दोनों हाथ मेरे कमर और नितंबो पर फेरने लगे.

उनका लंड नीचे से बार बार खड़ा हो कर मेरी चूत पर चांटे मार रहा था, जिसके छूते ही मुझे करंट सा लगता. मेरे शरीर में झुरझुरी छूट जाती.

थोड़ी देर इसी तरह चलता रहा. अब उन्होंने अपना लंड पकड़ कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मेरे कूल्हे पकड़ कर मुझे आगे पीछे हिलाते हुए मेरी धक्का मशीन चालू कर रहे थे.

एक बार मजा आना चालू हुआ तो मैं उनके हाथ छोड़ने के बावजूद अब खुद ही झटके मारने लगी. अब मैं तेजी से आगे पीछे होते हुए अपने बदन से उनके बदन को रगड़ रही थी.

मेरे मम्मे उनके सीने से रगड़ खाकर और मजा दे रहे थे. थोड़ी ही देर में हम दोनों की आहें एक साथ निकलने लगी. मैं अपने चरम की और बढ़ रही थी. मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया था.

आह्ह्ह आह्ह आह्ह ओह्ह्ह यस्स्स्स उम्म उँह उँहह्ह्ह्ह आह्ह्ह आईईईइ हम्म्म्म की आवाज के साथ और कुछ हल्के धक्को के साथ अपना काम पूरा किया.

उनका अभी भी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए थकी होने के बावजुद मैंने करना जारी रखा. पर थोड़ी ही देर में मैं थक कर रुक गयी.

अब वो नीचे लेटे लेटे ही अपने लंड को मेरे शरीर में अंदर बाहर करने लगे. मुझे फिर मजा आने लगा. थोड़ी देर में मैंने भी साथ देते हुए थोड़ा जोर लगाया.

जिससे मेरा मूड एक बार फिर बनने लगा. शायद ये सारा जादू उस खेल का हैं जो उन्होंने मेरे साथ खेला था. मैं वो पंख अभी भी अपने मम्मो और चूत पर फिरते हुए महसूस कर पा रही थी.

मैंने रुक रुक कर जोर से झटके मारने शुरू किये. मेरा थोड़ा पानी तो पहले ही निकल चूका था तो उन झटको से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी.

हम दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में एक साथ झटके मार रहे थे, जिससे उनका लंड और मेरी चूत एक दूसरे की तरफ तेजी से बढ़ते हुए एक दूजे में समा रहे थे, और झटको का वेग और भी बढ़ने से लंड गहराई में उतर रहा था.

उनकी आहें अब और भी लंबी होने लगी और आवाज भी बढ़ने लगी. अब उन्होंने जोर लगाना बंद कर दिया था शायद उनका होने वाला था. इसलिए मैंने अपना पूरा जोर लगाते हुए करना जारी रखा.

जल्द ही उनकी चीख निकली और मुझे अपने सीने से चिपका कर अंदर की ओर कुछ हलके धक्के देने लगे.

अब तूफ़ान शांत हो चूका था. मैं अपनी चूत से थोड़ा पानी रिसता हुआ महसूस कर रही थी. शायद मैंने ही दूसरी बार झड़ने के करीब होने से पानी छोड़ा होगा.

शारीरिक जरुरत पूरी होने के बाद ही इंसान को अपने सारे गुनाह नजर आते हैं. हम दोनों का हो तो गया, पर मन ही मन में पता था कि हमने क्या गलती कर दी हैं जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हैं.

थोड़ी देर उसी मुद्रा में सोये रहने के बाद मैं उनसे नीचे उतर गयी. जो मैंने देखा उस पर यकीन नहीं कर पायी. मैंने देखा उनका कंडोम फट चूका था. इसका मतलब उनका सारा वीर्य मेरी चूत में जा चूका था. वो जो पानी रिसा था वो मेरा नहीं संजीव का था.

ये मेरे महीने के सबसे खतरनाक दिन चल रहे थे, जब बच्चा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती हैं. शायद वो कंडोम नहीं मेरी किस्मत फटी थी.

वो उठे और कपडे पहन कर बाहर चले गए. मेरा गाउन तो जा चूका था, मेरे कपडे बाहर ड्रायर में थे तो ऐसे ही बैठ मैं इंतज़ार करने लगी. थोड़ी ही देर में वो लौट आये, उनके हाथ में मेरी ड्रायर में सुख चुकी लेगिंग कुर्ता थे. मैंने उनसे वो कपडे ले लिए.

कपड़ो के बीच में वो मेरे अंतवस्त्र छुपा कर लाये थे मेरी ही स्टाइल में. जो की मेरी लापरवाही से फिर नीचे गिर पड़े. मैं एक बार फिर शर्मिंदा हुई. उन्होंने झुककर तुरंत वो कपडे उठाये और मुझे थमा दिए.

अब उनको यह अधिकार था कि वो इन वस्त्र को भी छु सकते थे. वो बाहर चले गए और मैं फिर उसी अलमारी के पास खड़ी हो कपडे पहनने लगी.

दरवाज़ा अभी भी खुला था, पर अब मुझे परवाह नहीं थी. छुपाती भी क्या? सब कुछ तो दे ही चुकी थी. बाहर देखा तो वो सोफे पर बैठे मुझे ही कपडे पहनते देख रहे थे. शायद वो पहले वाला साया सच्चाई ही था.

मैं अब बाहर हॉल में आ गयी थी और उनसे जाने की इजाजत मांगी. वो मेरे पास आये और अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे धन्यवाद करने लगे. अपनी आदत के अनुसार मेरे मुँह से वेलकम निकल गया.

अपनी इस आखिरी गलती पर मैंने अपनी जुबान दाँतों से काट ली. तुरंत मुड़ कर उनसे विदा लेते हुए दरवाज़े के बाहर चली गयी.

नीचे उतरते हुए यही सोच रही थी कि क्या मैंने जो भी किया सही था? मैना के पति के लिए निश्चित रूप से सही किया था.

शायद मेरे खुद के लिए भी ठीक ही किया था. मुझे आज एक नया अनुभव हुआ. मैंने कही मैना का घोंसला तो नहीं तोड़ दिया या फिर वो घोसला पहले से ही टुटा हुआ था.

फटे कंडोम को याद कर मेरा मदद करने का हौंसला भी टूट चूका था. पहले ही हिल स्टेशन पर जो डीपू के साथ किया वो काफी नहीं था जो अब ये कांड भी कर बैठी.

चार दिन के बाद मैना का फ़ोन आया, एक बार तो मैंने डर के मारे उठाया ही नहीं, कि कही उसको सब मालुम तो नहीं चल गया.

दूसरी बार आने पर मैंने उठाया, वो मुझे शुक्रिया बोल रही थी. उसके हिसाब से मैंने उसके पति को अच्छे से समझाया जिससे वो माफ़ी मांग कर उसको फिर अपने घर ले आये थे मैना की शर्तो पर.

मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी इज्जत की कुर्बानी मेरी सहेली के कुछ तो काम आयी. मन में एक अपराध-बोध था वो थोड़ा कम हुआ.

पर मेरी मुसीबत अब दोहरी हो चुकी थी. अगर माँ बनी तो बच्चे का बाप कौन होगा, डीपू या संजीव !

उससे बड़ी मुसीबत अपने पति को क्या जवाब दूंगी कि ये बच्चा किसका हैं? आने वाले दो सप्ताह का इंतज़ार मेरे लिए भारी पड़ने वाला था.

उस वक्त मुझे नहीं पता था कि रंजन की हमारे ज़िन्दगी में वापसी होने वाली थी.

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मेरे पीरियड आने में सिर्फ एक सप्ताह बचा था और हर एक दिन के साथ मेरा डर बढ़ता जा रहा था.

अगर गर्भवती हो गयी तो मेरे पति अशोक को क्या बोलूंगी, क्या इल्जाम डीपू पर डाल दू? पर वो पूछेंगे उसने मेरे साथ कब किया तो क्या बोलूंगी? मैंने हर वक्त ये झुठलाया था कि डीपू ने मेरे साथ कुछ किया था.

सासू जी अपने घर जा चुके थे और जाते वक़्त अपने पोते को भी साथ ले गए, क्यों कि थोड़े दिन बाद हम वैसे भी वहा जाने वाले थे.

शुक्रवार की शाम को ऑफिस से लौटने के बाद अशोक एक और खबर ले कर आये. रंजन विदेश से आ चूका था और उसकी सगाई होने वाली थी. इसी सिलसिले में वो हमारे शहर कुछ खरीददारी के लिए आने वाला था और हमारे साथ रुकना चाहता था.

पहले से ही गर्भवती होने का डर ऊपर से ये और मुसीबत. खास तौर से जब अशोक को पता था कि रंजन के साथ हमने पिछली बार क्या किया था, फिर घर में ठहराना मतलब घास को आग दिखाना.

कम शब्दों कहा जाए तो जाए तो रंजन मेरे बच्चे के असली बाप के तीन उमीदवारो में से एक था. जिसको मैंने और मेरे पति ने मिलकर फंसाया था ताकि वो मुझे गर्भवती कर सके (पूरी कहानी पढ़िए “समझोता साजिश और सेक्स“).

मैंने रंजन को लेकर अपना डर पति के सामने रख दिया.

मैं: “आपको अच्छे से पता हैं उसने मेरे साथ उस रात को स्लीपर बस में क्या किया था, ये जानते हुए हुए भी उसको मेरे यहाँ होते हुए ठहराना! वो फिर से ऐसी हरकत कर सकता हैं. उसके हिसाब से तो मैं भी तैयार थी उसके साथ संबंध बनाने के लिए.”

अशोक: “वो मेरा दूर के रिश्ते में भाई हैं, उसको मैं घर आने से कैसे रोक दू? सब रिश्तेदारों को पता लगेगा मैंने उसकी ठहरने में मदद नहीं की तो कैसा लगेगा.”

मैं: “अगर उसने मुझ पर हमला कर मुझे पकड़ कर कुछ कर दिया तो?”

अशोक: “वो रविवार को सुबह आएगा और मैं उसको दिन भर शॉपिंग पर ले जाऊंगा. शाम को खाना खा कर के सो जायेगा, और मैं तो तुम्हारे साथ ही होऊंगा ना. उसकी हिम्मत नहीं होगी.”

मैं: “सोमवार को तो तुम ऑफिस चले जाओगे, जब कि वो यही रहेगा मेरे साथ अकेला, उसकी शाम को वापसी की ट्रैन तक.”

अशोक: “उसकी चिंता मत करो, मैं सोमवार की छुट्टी ले लूंगा. वो वैसे भी दोपहर में बाकी की बची शॉपिंग करेगा.”

मैं: “तुम्हे क्या लगता हैं, उसको पता चल गया होगा कि पिछली बार बस में उसने जो कुछ भी किया वो हम दोनों की दोनों की साजिश थी?”

अशोक: “नहीं, मुझे नहीं लगता, उसको ऐसे कैसे पता चलेगा? ”

मैं: “फिर भी, बहुत ध्यान रखना पड़ेगा. अगर उसने ये मान लिया कि वो बच्चा उसी का हैं तो?”

अशोक: “तुम खा-मख़ा घबरा रही हो. कुछ नहीं होगा. चिंता मत करो.”

रविवार को देर सुबह रंजन हमारे घर पहुंच गया. मैं उसके सामने आने से बचती रही. अशोक ने उसे हमेशा अपने साथ बिजी रखा. वो मौका देखते ही मुझे घूरने लगता, और मुझे डर लगता कब वो क्या कदम बढ़ा ले.

अशोक उसे बाहर शॉपिंग पर ले गए और सीधा देर शाम को ही वो दोनों ढेर साड़ी शॉपिंग कर घर लौटे. मैंने तब तक खाने की तैयारी कर ली थी. उनके फ्रेश होते ही उनको खाना भी खिला दिया था.

हमेशा मैं रात को स्लीप शार्ट पहनती हूँ, पर रंजन जरा सा भी छोटे कपडे देख भड़क ना जाए इसलिए मैंने पूरा पाजामा पहना.

वो दोनों हॉल में बैठ कर बातें कर रहे थे और मैं रसोई के बाकि के काम निपटा रही थी. थोड़ी देर में उन दोनों में कोई गंभीर चर्चा होने लगी. मैं भी अपना काम छोड़ रसोई के दरवाजे के करीब आ उनकी बात सुनने लगी.

रंजन: “अशोक तुम मानो या ना मानो पर मुझे पूरा यकीन हो गया हैं तुम भी प्रतिमा के साथ मिले हुए थे. मेरे दोस्तों को लगा मैं झूठी कहानी बना रहा हूँ. मेरी कहानी सुन उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि तुम पास में लेटे हुए थे फिर भी तुमको भनक तक नहीं लगी कि मैं और प्रतिमा क्या कर रहे थे. ऐसे कैसे हो सकता हैं.”

अशोक: “मैं फिर से कह रहा हूँ, तुम्हे कोई गलत फहमी हुई हैं. प्रतिमा जानबूझ कर ऐसा नहीं कर सकती. शायद उसे नींद में ग़लतफ़हमी हो गयी होगी और तुम्हे उसने मुझे समझ कर कुछ किया होगा. अब प्लीज उसके सामने ये बातें बोल कर हम दोनों को शर्मिंदा मत करो.”

रंजन: “आप प्रतिमा को यहाँ बुलाओ, और पूछो. मुझे सब कुछ साफ़ करना हैं. अगर कोई गलत फहमी हैं तो दूर होनी चाहिए.”

अशोक: “पुरानी बातें भूल जाओ रंजन, तुम्हारी सगाई होने वाली हैं. आगे बढ़ो.”

रंजन: “गलत फहमी एक बार हो सकती हैं. पर…”

इससे पहले की वो उस दिन बस के अंदर अगली सुबह के वक़्त हम दोनों के बीच दुबारा हुई चुदाई के बारे में बताये. जिसके बारे में अशोक को भी नहीं पता मैं हॉल में आ गयी और रंजन को आगे कुछ बोलने से रोक दिया.

मैं: “क्या हुआ, बहुत जोर की आवाज आ रही थी?”

रंजन: “देखो प्रतिमा, मैंने उस रात को बस में हमारे बीच जो भी हुआ अशोक को बताया, पर उसने आश्चर्य करने बजाय तुमको ही बचाने की कोशिश की. मुझे दाल में काला लग रहा हैं.”

अशोक: “ऐसा कुछ नहीं हैं. रंजन को कोई ग़लतफ़हमी अशोक हुई हैं.”

रंजन: “सच सच क्यों नहीं बता देते. प्रतिमा सच बताओ उस दिन बस में जो भी हुआ वो अशोक और तुमने जान बुझ कर किया था?”

मैं: “ये क्या बात कर रहे हो, साथ सोते सोते गलती से हाथ इधर उधर टच हो गया होगा.”

रंजन: “बात सिर्फ हाथ टच होने की नहीं हैं. तुम्हे अच्छे से पता हैं हमारे बीच सब कुछ हुआ था.”

मैं: “देखो, जो भी हुआ गलती से हुआ. मैंने अशोक को बाद में सब बता दिया था. अब आगे इस बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं.”

रंजन: “गलती से कर दिया! पर मैं तो उस दिन से चैन से नहीं रह पाया. जब भी रात को सोता था तो वही घटना मेरे आँखों के सामने घूमती थी. मेरे लिए तो वो आज भी एक सपना ही हैं. मैं तुम्हे भुला नहीं पाया हूँ.”

अशोक: “तुम अपनी मंगेतर के साथ नयी ज़िन्दगी शुरू करने वाले हो. उस पर ध्यान दो. उसके बाद तुम सब भूल जाओगे.”

रंजन: “ठीक हैं, मैं वो सब भूल जाता हूँ पर मेरी भी एक शर्त हैं. एक आखरी बार मैं प्रतिमा के साथ सोना चाहता हूँ.”

अशोक: “कैसी बातें कर रहे हो? वो तुम्हारी भाभी हैं. अगर एक गलती हुई उसका ये मतलब नहीं कि तुम ब्लैकमेल करो और मज़बूरी का फायदा उठाओ.”
 
रंजन: “फायदा तो आप दोनों ने मेरा उठाया था. अब मैं फायदा उठा रहा हूँ तो उसमे क्या गलत हैं. आप करो तो सही, और मैं करू तो गलत कैसे?”

मैं: “देखो रंजन, भाभी एक माँ की तरह होती हैं. उसके साथ तुम ऐसा करोगे, तुम्हे शर्म नहीं आएगी.”

रंजन: “शर्म तो उस दिन बस में भी नहीं आयी थी. आप समझ क्यों नहीं रहे हो. पिछले एक साल से भी ज्यादा हो गया हैं उस बात को और मैं वो सब भुला नहीं पा रहा हूँ. कभी कभी कुछ भुलाने के लिए एक बार फिर वो सब करना पड़ता हैं. मुझे सिर्फ एक मौका दे दो.”

अशोक: “रंजन, तुम्हारा ज्यादा हो रहा है. मैं तुम्हारी माँ से शिकायत कर दूंगा.”

रंजन: “उसकी जरुरत नहीं, मैं खुद ही बोल देता हूँ माँ को, उस दिन बस में क्या हुआ था.”

मैं: “एक मिनट रुको, बात को बढ़ाने से कोई फायदा नहीं. तुम्हे किसी को कुछ कहने की जरुरत नहीं. तुम्हे क्या चाहिए बोलो?”

अशोक: “प्रतिमा, ये तुम क्या..”

रंजन: “मैं प्रतिमा को एक बार फिर से चोदना चाहता हूँ. उसके बाद मैं सब भूल जाऊंगा और कभी परेशान नहीं करूँगा.”

अशोक: “तुम्हारा दिमाग तो ठीक हैं?”

रंजन: “सोच लो, फैसला आप दोनों को लेना हैं.”

अशोक: “इसकी क्या गारंटी हैं कि तुम भविष्य में परेशान नहीं करोगे.”

रंजन: “मेरी सगाई और फिर शादी होने वाली हैं. मैं अपनी वाइफ के साथ बिजी हो जाऊंगा. फिर विदेश चला जाऊंगा.”

अशोक और मैं एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे. हमें जिस चीज का डर तब था वही अब हो रहा था. हमारे पुराने पाप हम पर भारी पड़ रहे थे.

अशोक: “प्रतिमा क्या तुम तैयार हो इसके लिए?”

मैं: “समाज में हमेशा के लिए बदनामी हो उससे अच्छा हैं मैं बंद कमरे में बदनाम हो जाऊ.”

रंजन की तो जैसे दिल की मुराद पूरी हो गयी. खुश होकर सोफे से उछलता हुआ खड़ा हो गया और बैडरूम में चला गया. मैं वही खड़ी रह गयी और अशोक की तरफ लाचारी से देखने लगी. अशोक ने सांत्वना दी कि बस एक बार की बात हैं जैसे तैसे सहन कर लो.

मैं भारी कदमो से बैडरूम की तरफ जाने लगी. अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया, ये काम मैं अशोक की आँखों के सामने तो नहीं करवा सकती थी. रंजन बिस्तर पर पाँव चौड़े कर पसरा हुआ था. मुझे देख कर कुटिल मुस्कान बिखेर दी.

खड़े खड़े ही मेरे दिमाग में एक विचार आया. मेरी तो वैसे भी शायद डीपू या संजीव के बच्चे की माँ बनने की सम्भावना काफी प्रबल थी. अब मैं ये सारा इल्जाम रंजन पर डाल सकती थी. क्यों कि ये सब तो पति की इजाजत से हो रखा था.

मुझे अब तक लग रहा था कि रंजन एक मुसीबत लेकर आया हैं, पर अब लगा कि वो तो मेरी मुसीबत का हल बन कर आया हैं.

उसने मुझे अपने पास बुलाया. मैं बिस्तर के कोने पर जाकर बैठ गयी. वो मेरे स्लीप शर्ट से बाहर उभरते हुए सीने के उभार को ही घूर रहा था. वो उठ कर मेरे पास आया और अपने दोनों हाथ मेरे शर्ट सहित मम्मो पर रख मसलने लगा.

पिछली बार बस में अँधेरे में किया था आज तो उसको लाइट के उजाले में सब कुछ साफ़ दिखने वाला था.

थोड़ी देर मेरे मम्मो के साथ खेलने के बाद उसने मेरे शर्ट के सारे बटन खोल दिए और शर्ट को मेरे शरीर से पूरा निकाल दिया.

मैं अब ब्रा में सकुचाते हुए बैठी थी. टाइट ब्रा से मम्में बाहर झाँक रहे थे. उनको साक्षात देख कर वो पूरा देखने को मचलने लगा.

उसने मुझे घुमा कर मेरी पीठ उसकी तरफ की और मेरी ब्रा का हुक खोल दिया. फिर ब्रा को पूरा निकालने में जरा सा भी समय व्यर्थ नहीं किया. मैं अपने दोनों हाथ सीने से चिपका कर अपना स्त्रीधन छुपाने लगी. उसने मुझे फिर अपनी तरफ घुमाया.

मैं नजरे नीचे किये हुए एक दुल्हन की भाँती बैठी थी. उसने अपने दोनों हाथ मेरे एक एक कंधे पर रख दिया और अपने हाथ फिराते हुए मेरी बाजुओ से कोहनी और फिर कलाइयों तक ले आया. उसने मेरी कलाईयाँ पकड़ ली और उनको खिंच कर मेरे सीने से हटाने लगा.

उसकी ताकत के आगे मेरा क्या बस चलता, उसने मेरी दोनों कलाइयों को पकड़ कर नीचे कर दिया और मेरे दोनों मम्मे उसके सामने खुल के आ चुके थे.
 
मेरे हाथ पकड़े रखते हुए वह अब आगे झुका अपने होंठो से बारी बारी से मेरी दोनों चूंचियो को चूसने लगा. फिर वो मेरी चूंचियो के बीच के गुलाबी घेरो को अपनी गीली जबान से चाटने लगा.

मेरे दोनों मम्मो के आस पास के रोंगटे खड़े हो गए और छोटे छोटे दाने उभर आये. मेरे मम्मे फुलकर और बड़े हो गए और निप्पल तन गए.

उसने अपनी खुरदुरी जबान मम्मो और निप्पल पर रगड़ना जारी रखा और मैं अपनी सिसकी निकलने से नहीं रोक पायी. मेरी सिसकी सुनकर उसने और भी तेजी से अपनी जबान रगड़ते मेरे दोनों मम्मो को पूरा गीला था.

अब उसने अपने गीले होंठो को मेरे होंठो पर रख दिया और मेरे निचले होंठ को अपने होंठों के बीच में दबा कर रस लेने लगा. पिछली बार बस में वो मेरे मम्मे और होंठ को चूस नही पाया था तो इस बार वो कसर पूरी कर रहा था. मेरी तो पैंटी गीली होने लगी थी.

उसने अब मेरे होंठो को छोड़ा और मुझे बिस्तर के पास नीचे खड़ा कर दिया. मेरे आगे घुटनो के बल बैठते हुए उसने मेरे पाजामा को पैंटी सहित नीचे खिसकाना शुरू कर दिया.

पाजामा जांघो तक आया और उसको मेरी चूत के दर्शन भी हो गए. एक कुआंरे मर्द को चूत के दर्शन हो जाये तो वो पागल हो ही जाता हैं.

मेरा पाजामा को वही आधा खुला छोड़ वो मेरी चूत चाटने लगा. पाजामा आधा खुलने से मेरे पाँव चौड़े नहीं हो सकते थे, तो वो सिर्फ ऊपर से ही चाट पा रहा था. उसने अब जल्दी से मेरा पाजामा और पैंटी पैरो से पूरा निकाल दिया.

उसने अब मुझे बिस्तर के किनारे पर बैठा दिया और फिर पीछे धक्का मारते हुए बिस्तर पर लेटा दिया. मेरे पैर अभी भी बिस्तर से नीचे जमीन पर लटक रहे थे और धड़ बिस्तर पर लेटा था.

वो अब भी नीचे जमीन पर ही घुटनो के बल बैठा था और उसने मेरे पाँव चौड़े कर अपना मुँह मेरी चूत के होंठों पर रख दिया.

अब वो अपनी जबान और मुँह से खोद खोद कर मेरी चूत चाटने लगा. पानी तो पहले से ही बनने लगा था तो वो मेरे मीठे पानी का मजा ले रहा था.

मजे के मारे मेरी जोर जोर की सिसकियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. पता नहीं पति को बाहर मेरी सिसकियाँ सुनाई देगी तो क्या सोचेंगे. चूत चाटते चाटते जब उसका मन भर गया तो वो उठ कर बिस्तर पर आ कर मेरे पास बैठ गया.

उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी पैंट के अंदर के शैतान पर रख दिया. उसका लंड एकदम कड़क हो कर तैयार था. कपडे के अंदर होने के बावजूद भी मैं उसके लंड की गर्माहट अपने हाथों पर महसूस कर पा रही थी.

मेरी सिसकियाँ सुनकर अब तक उसको भी पता चल चूका था कि मुझे भी मजे तो आये थे, तो उसने मुझे अपना लंड चूसने को कहा.

मैं अब उठ कर बैठ गयी और वो लेट गया. मैंने उसका पजामा और अंडरवियर उसके पैरो से पूरा बाहर निकाल दिया. बंधन से मुक्त होते ही उसका लंड एक दम खड़ा हो गया.

मैंने उसका लंड अपने एक हाथ में भर लिया, वो एकदम गरम सलाखों के जैसा था गरम और कड़क. मैं उसके लंड की चमड़ी को ऊपर नीचे रगड़ने लगी. उसकी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी. उसने मुझे मुँह में लेने को कहा.

मैं अब आगे झुकी और उसका लंड अपने मुँह में उतार दिया. थोड़ा सा और गरम होता तो गरम चाय के जैसे मेरा मुँह जल गया होता. मैं लंड अपने मुँह में आगे पीछे धक्का मारते हुए रगड़ने लगी. इसके साथ ही उसकी सिसकियाँ और जोर से निकलने लगी.
 
थोड़ी देर इसी तरह उसका लंड मुँह में रगड़ने के बाद उसने कुछ बूंद पानी की मेरे मुँह में ही छोड़ना शुरू कर दिया.

पहले तो मैंने सहन किया, पर जैसे ही ज्यादा पानी निकलने लगा तो मैंने उसका लंड मुँह से बाहर निकाल दिया. उसका चिकना पानी मेरे मुँह में था और उस पर उसका लंड लौट रहा था तो बाहर निकलते ही मैंने देखा वो पानी से थोड़ा बहुत लिपट चूका था.

मैंने अपना मुँह पोछा. मैं अभी घुटनो के बल ही बैठी थी. वो उठ खड़ा हुआ और इस तरह बैठा कि उसका लंड मेरे दोनों मम्मो के बीच फंसा दिया और मुझे अपने दोनों मम्मे साइड से दबा कर उसका लंड मम्मो के बीच दबाये रखने का निर्देश दिया.

मैंने उसका कहना माना और वो मेरे मम्मो के बीच की गली में अपना लंड दबाये ऊपर नीचे रगड़ने लगा. उसका लंड तो पहले ही चिकना था, ऊपर से थोड़ा और पानी निकलने से मम्मो की दोनों घाटिया भी भीग कर चिकनी हो गयी. जिससे उसका लंड और भी आसानी से फिसलते हुए तेजी से दोनों मम्मो के बीच ऊपर नीचे रगड़ रहा था.

उसकी सिसकियाँ अब भी चालू थी. समय के साथ उसकी सिसकियाँ और भी बढ़ने लगी. उसका पेट मेरे मुँह के सामने ही था रह रह कर मेरे होंठ उसके पेट को चुम रहे थे. उसकी आहें इतनी तेज थी की बाहर अशोक को सुनाई दे रही होगी.

थोड़ी देर में तो उसके लंड से लावा फट पड़ा और मेरे सीने के दोनों पहाड़ो के बीच तैर फेल गया. मेरे सीने पर गरमा गरम पानी के छींटे हो रहे थे. वो बड़ी जोर से चीखते हुए अपने अंदर कब से जमा करके रखा सारा पानी मेरे ऊपर उँड़ेल चूका था.

वो अब मेरे ऊपर से हटा, मैंने मौका मुआयना किया. मेरे दोनों मम्मे और आस पास का इलाका पूरा उसके पानी से गंदा हो चूका था. असली काम करने से पहले ही वो झड़ चूका था.

मेरा तो आखिरी हथियार भी खाली चला गया. अब मैं रंजन पर मुझे गर्भवती होने का इल्जाम कैसे डालती. क्योकि अभी मुझे मेरे पति के दोस्त ने चोदा नहीं था.

रंजन पूरा काम करने से पहले ही बाहर झड़ गया था. मैं ठगी सी रह गयी मेरे प्लान का क्या होगा.

उसके लंड का सारा पानी मेरे सीने पर फैला हुआ था, तो मैं उसको इधर उधर फैलने से रोक रही थी. रंजन को मैंने बताया कि पेपर नैपकिन कहा पड़े हैं और उसने लाकर कुछ मुझे दिए और बाकी से अपना लंड साफ़ करने लगा.

अपनी सफाई करने के बाद हम दोनों ने अपने कपडे पहन लिए. मैं पहले वाशरूम में गयी और बाकी की सफाई कर बाहर हॉल में आ गयी तब तक रंजन वाशरूम में गया.

पति मुझसे जानकारी लेने लगे.

अशोक: “क्या हुआ, निपटा दिया उसे?”

एक बार तो मैंने सोचा कि झूठ बोल दूँ कि रंजन ने कर लिया हैं, इस बहाने अपने गर्भवती होने का ठीकरा उसके माथे फोड़ सकती हूँ.

पर फिर ये विचार त्याग दिया क्योकि रंजन बाहर आकर सब सच बता देगा तो मुसीबत हो जाएगी.

मैं: “नहीं, वो पहले ही बाहर झड़ गया.”

अशोक: “मतलब, उसने नहीं किया?”

मैं: “वो मेरे सीने पर रगड़ रहा था और उसका वही पानी निकल गया.”

अशोक: “तो अब? एक बार करने की बात हुई थी, देखा जाये तो हो गया उसका.”

मैं: “पता नहीं वो इसको मानेगा या नहीं.”

तभी रंजन वाशरूम से बाहर हॉल में आ गया.

रंजन: “सॉरी, मेरा काम पूरा होने से पहले ही मैं निपट गया. अभी मैं कल कर लूंगा. अभी फिर से करना मुश्किल हैं.”

मैं मन ही मन खुश हुई, कि मुझे एक और मौका मिलेगा कि मैं उस पर इल्जाम डाल पाऊँगी.

अशोक: “एक बार का बोला था, वो हो गया, अब क्या हैं?”
 
रंजन: “पर हुआ कहाँ? बात तो चोदने की हुई थी, वो तो हुआ ही नहीं. तुम चाहो तो प्रतिमा को पूछ लो. क्यों प्रतिमा मैंने पूरा नहीं किया हैं ना?”

मैं: “हां, पूरा तो नहीं हुआ.”

अशोक मुझे घूरने लगे. मुझे अपना बचाव भी करना था.

मैं: “पर, काम तो हो गया न तुम्हारा.”

रंजन: “नहीं नहीं, अभी शर्त पूरी नहीं हुई हैं. कल मेरी जब इच्छा होगी तब में बता दूंगा और आप मुझे मना नहीं करोगे. वरना हमारी डील टूट जाएगी.”

मैं और अशोक अब बैडरूम में आ गए. रंजन को बाहर ही सोने के लिए छोड़ आये. अशोक योजना बनाने लगे कि कल कैसे बचा जाए रंजन से.

सुबह मैं और अशोक उठ गए थे और रोजमर्रा के काम निपटा दिए थे. रंजन अभी भी सो रहा था.

अशोक का प्लान था कि हम सुबह ही शहर के थोड़ा बाहर पहाड़ी पर स्थित मंदिर के दर्शन को निकल जायेंगे और देर से आएंगे. तब तक रंजन अपनी शॉपिंग के लिए निकल जायेगा और हम बच जायेंगे.

शाम को वैसे भी उसको घर लौटना हैं तो उसको समय ही नहीं मिल पायेगा कुछ करने का.

मैं और अशोक बिना आवाज किये नाश्ता कर रहे थे. मुझे मेरा प्लान फेल होते हुए दिखा. नाश्ता करने के बाद मैं जान बुझ कर बर्तनो को टकरा कर आवाज निकलवाने की कोशिश कर रही थी कि रंजन हमारे जाने से पहले जाग जाए.

ऐसा ही हुआ और रंजन जाग गया. मैं मन ही मन बड़ा खुश हुई. रंजन वाशरूम में गया तब तक मैं और अशोक तैयार होने चले गए.

मुझे कुछ ऐसे कपडे पहनने थे कि मैं रंजन को उत्तेजित कर पाऊ. मैंने अपनी मरून रंग की साड़ी पहन ली और उस पर बिना ब्रा के बड़े गले वाला ब्लाउज जो की पीछे से पूरा खुला था. मेरी पूरी पीठ नंगी थी सिर्फ ब्लाउज को दो डोरियाँ थी बांधने के लिए.

मैंने अपना पेटीकोट भी नाभी से तीन इंच नीचे बाँधा था ताकि ज्यादा से ज्यादा मेरी पतली कमर दिखे.

साड़ी के बीच से झांकती मेरी पतली कमर, आईने में अपने आप को देख कर मैं खुद ही मोहित हुए जा रही थी तो रंजन का क्या होता.

अशोक तो जल्दी से तैयार हो बाहर हॉल में इंतजार करने लगे. मैं अपने साज श्रृंगार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी. साथ ही थोड़ा समय भी व्यतीत करना था ताकि रंजन वाशरूम से बाहर आये और मुझे देख कर रोक ले.

मैं जब तैयार हो कर बाहर हॉल में आयी तो रंजन भी नहा कर वाशरूम से बाहर आया. मुझ पर नजर पड़ते ही उसकी आँखें वही ठहर गयी.

मरून साड़ी पर गहरी लाल लिपस्टिक में लिपटे मेरे होंठ देख वो वैसे ही घायल हो गया. मैंने उसकी तरफ पीठ घुमा कर पीठ के थोड़े और जलवे भी दिखा दिए.

उसको सदमे में से बाहर आने में कुछ सेकण्ड्स लगे. फिर उसने पूछा.

रंजन: “आप लोग तैयार हो कर कही जा रहे हो क्या?”

अशोक: “हां, हम लोग मंदिर जा रहे हैं. तुम्हारे लिए नाश्ता रखा हैं खा लेना और फिर तुम्हारी बची हुई शॉपिंग पर निकल जाना.”

रंजन: “आप लोग कब तक आओगे?”

अशोक: “दो तीन घण्टे में आ जायेंगे.”

ये झूठ अशोक ने पहले ही तैयार कर लिया था, असल मैं हम शाम को ही लौटने वाले थे.

रंजन: “तो ठीक हैं आप रुको, मैं भी आ जाता हूँ मंदिर दर्शन करने.”

अशोक: “अरे तुम्हारी शॉपिंग का क्या होगा फिर? मंदिर और कभी चले जाना.”

रंजन: “आज कुछ ख़ास नहीं बचा हैं, एक घंटे का ही काम हैं, मंदिर से वापिस आकर कर लूंगा.”
 
अशोक थोड़ी चिंता में पड़ गए. कही रंजन बीच रास्ते में ही कल रात वाली मांग ना रख दे. पर मैं खुश थी, इसलिए नहीं की रंजन मेरे साथ कुछ कर सकता था पर इसलिए कि मुझे इल्जाम डालने वाला एक बकरा मिल गया था.

अशोक के पास और कुछ विकल्प तो था नहीं तो उसको मानना पड़ा. हम लोग इंतजार करने लगे कि रंजन नाश्ता कर तैयार हो जाये. उसके तैयार होते ही हम गाड़ी से निकल पड़े.

वहा पर आपस में लगी हुई दो पहाड़िया थी, दूसरी पहाड़ी पर स्तिथ मंदिर तक पहुंचने के लिए उन पर से एक सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बनाया गया था. सोमवार का दिन था तो मंदिर पर कोई था ही नहीं. हम तीनो दर्शन कर वापिस नीचे उतरने लगे.

मंदिर वाली पहाड़ी पार कर ली थी और दूसरी वाली पहाड़ी से नीचे उतरने लगे. एक जगह आकर रंजन सीढ़ियों पर रुक गया. उसे देख हम दोनों भी रुक गए और उसकी तरफ देखने लगे.

रंजन: “अशोक मेरा अभी मूड बन गया हैं, मैं और प्रतिमा उन झाड़ियों के पीछे जाकर कर लेंगे तुम यही निगरानी रखो और कोई आये तो हमें सचेत कर देना.”

उसने सीढ़ियों के रास्ते से बीस कदम दूर एक झाड़ियों की तरफ इशारा किया. वो छोटा सा घना झाड़ था. इससे पहले कि मेरे पति कुछ बोलते, रंजन मेरी कलाई पकड़ कर मुझे उन झाड़ियों की तरफ ले जाने लगा.

रंजन आगे आगे और मैं उसके पीछे पीछे खींचते हुए चली जा रही थी. पीछे मुड़ कर अशोक को देखा, उसके चेहरे पर एक मज़बूरी थी और वो हमें उन झाड़ियों के पीछे जाता देखता ही रह गया.

वो झाड़ पांच फ़ीट ऊँचा और सात फ़ीट चौड़ा था. हम दोनों झाड़ के पीछे बैठ गए. उस झाड़ के पीछे से पत्तो के बीच की जगह से ऊपर जाने की सीढिया बड़ी मुश्किल से दिखाई दे रही थी.

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रंजन ने मुझे नीचे घास पर लिटा दिया और मेरी साड़ी को मेरे पेट और कमर से हटा दिया. अब वो मेरे शरीर के मध्य भाग को चूमने लगा, जिसको इतनी देर से साड़ी के बीच से देखना चाह रहा था.

कल रात की तरह काम पूरा होने से पहले ही कही झड़ ना जाए इसलिए वो आज कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. उसने मेरी साड़ी नीचे से पेटीकोट सहित ऊपर उठा दी. आगे से मेरे पाँव, फिर जाँघे और फिर मेरी पैंटी दिखने लगी थी.

उसने अब अपने दोनों हाथों से मेरी पैंटी पकड़ कर पैरो से निकाल दी. वो मेरी दोनों टांगे चौड़ी कर बीच में घुटनो के बल बैठ गया. उसने अपनी पैंट और अंडरवियर घुटनो तक नीचे कर दी.

उसका लंड तो मुझको चोदने के ख्याल से पहले से ही तैयार था, फिर भी थोड़ा सा और रगड़ कर उसको लंबा और कठोर करने लगा, जैसे कोई कारीगर अपने औजार इस्तेमाल से पहले तीखे करता हैं.

जब उसे लगा कि उसका सामान तैयार हैं, तो उसने अपना हाथ मेरी चूत पर रख मेरी खुली दरारों में अपनी ऊँगली रगड़ कर वहा चिकना करने लगा.

कुछ सेकंड में ही मेरी चूत के वहा अच्छा ख़ासा गीला हो चूका था. उसके ऊँगली करने से मेरी हलकी आहें भी निकलने लगी थी.
 
कुछ सेकंड में ही मेरी चूत के वहा अच्छा ख़ासा गीला हो चूका था. उसके ऊँगली करने से मेरी हलकी आहें भी निकलने लगी थी.

अब वो तैयार था मेरी चूत को भेदने के लिए. उसने मेरी टांगे थोड़ी और चौड़ी की और अपने लंड की टोपी मेरी चूत के अंदर रख दी. मेरी दोनों टांगो को ऊपर उठाते हुए पकड़ा और अंदर जोर लगाते हुए धीरे धीरे अपना लंड मेरी चूत में पूरा उतार दिया. मेरी एक जोर की आहह्ह्ह् निकली.

अब वो बिना रुके आगे पीछे धक्के मारते हुए मुझे चोदने के मजे लेने लगा. थोड़ी देर में मुझे भी मजे आने लगे और मेरी सिसकियाँ निकलने लगी.

उसने मेरे घुटने से पाँव मोड़ते हुए मेरे कंधो तक ऊपर कर दिए. मेरी पूरी चूत खुल गयी तो वो आगे झुकते हुए और भी जोर जोर से चोदने लगा.

हम दोनों ही इतनी जोर से सिसकियाँ निकाल आहें भर रहे थे कि आवाज जरूर अशोक तक पहुंच रही होगी. ये जरुरी भी था, ताकि अशोक को अहसास हो कि रंजन ने ही मुझे माँ बनाया हैं. रंजन ने तो साल भर से शायद सेक्स नहीं किया था तो वो अपनी तड़प मिटा रहा था.

मजे के मारे मैं अपनी आँखें बंद कर चुदवाती रही और आहें भरती रही. मुझे पता ही नहीं चला कब अशोक भी झाड़ियों के पीछे आ हमारे पास खड़ा हो हमे चुदते हुए देख रहा था.

अशोक की डायरी के हिसाब से तो वैसे भी उसकी इच्छा थी कि वो मुझे किसी के साथ चुदते हुए देखना चाहता था. तो इसको अभी वो मौका मिल रहा था.

रंजन को तो कोई फर्क नहीं पड़ा पर आँखें खुलते ही अशोक को वहा देख मैं झेंप गयी. सदमे से मेरी आवाज निकलना बंद हो गयी. मेरा शरीर लगातार रंजन के झटको से आगे पीछे हिल रहा था.

जैसे जैसे हम दोनों का थोड़ा थोड़ा पानी निकलता रहा मेरी चूत से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी. जिससे जोश में आ रंजन और दम लगा के चोदने लगा.

अब मेरे से भी बर्दाश्त नहीं हुआ और उसके साथ मैं भी आवाजे निकलने लगी आह्हहह आह्हह्ह्ह ओहहह उहह्ह्ह अम्म्म सीईईइ.

तभी अशोक ने कहा कि रुक जाओ कोई सीढ़ियों से आ रहा हैं. रंजन ने झटके मारना बंद कर दिया. पर मेरे अंदर तो एक ररक उठ रही थी. मैं नीचे से ही हौले हौले अपनी गांड को हिला अपनी चूत को रंजन के लंड पर धीरे धीरे आगे पीछे रगड़ने लगी. इससे मुझे थोड़ी शांति मिली.

रंजन ने भी ये महसूस किया तो उसने धीरे धीरे से अपना लंड अंदर बाहर करना शुरू कर दिया. ताकि हम चुप भी रहे और अंदर की खुजली भी शांत होती रहे. रंजन ने आगे झुक कर लाल लिपिस्टिक में लिपटे मेरे होंठो को चूसना शुरू कर दिया.

दो तीन महिला-पुरुष बातें करते हुए सीढ़ियों से होते हुए ऊपर चढ़ गए और थोड़ी देर में उनकी आवाजे आनी भी बंद हो गयी. तो अशोक ने हमको बताया वो लोग चले गए हैं.

ये सुनते ही रंजन फिर से ऊपर उठा और जोर जोर से धक्के मारते हुए मुझे चोदने लगा और मेरी सिसकिया एक बार फिर से शुरु हो गयी.

अशोक वही खड़ा हो मुझे चुदता हुआ देखता रहा और मैं शर्मिंदा होती रही. मेरी भी कोई इच्छा तो नहीं थी कि मैं रंजन से चुदवाऊ पर बच्चे के बाप का नाम भी तो चाहिए था.

अशोक के खड़े रहने से मेरी तो सारी इच्छाएं ही मर गयी. पर एकाएक रंजन में कोई भूत घुस गया, वो जोर जोर से आवाज निकालते हुए गहरे गहरे झटके मारने लगा.

ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह अह्ह्हह्ह्ह्ह उम्म्मम्म करते हुए उसने अपना रात भर से जमा पानी मेरी चूत में खाली कर दिया और झड़ गया.

फिर दो चार धीमे धीमे झटके मारते हुए बाकी की बची खुची बूंदें भी मेरे अंदर टपका दी. मैं अपनी चूत को गरम गरम पानी से भरा हुआ महसूस कर पा रही थी.

उसने जब अपना लंड बाहर निकाला तो मेरी चूत से वजन थोड़ा कम हुआ. पर उसके लंड के साथ ही वो ढेर सारा पानी भी बाहर ले आया और मेरी गांड के नीचे फंसे पेटीकोट पर वो सारा पानी गिर गया. मेरा पेटीकोट उस हिस्से से गीला हो गया जो मेरी गांड पर आने वाला था.
 
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