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Erotica वासना का भंवर

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वासना का भंवर

केरल के सेंट मैरी शहर के पुलिस स्टेशन में सुबह ८ बजे की हलचल थी। रात के स्टाफ़ की ड्यूटी ख़त्म हो रही थी लिहाज़ा मॉर्निंग स्टाफ़ के साथ हैन्डिंग ओवर की प्रक्रिया चल रही थी। थाना इंचार्ज जय सिंह जिसकी उम्र लगभग ३6 साल की थी, क़द ६ फ़ीट, रंग गेहूँआ। अपने रिलीवर का इंतज़ार कर रहा था।

ये रात भी बिना किसी जुर्म के कट गयी। कोई वारदात नहीं हुई थी। इस बात की तसल्ली के साथ वो चाय की चुस्कियाँ ले रहा था कि अचानक कंट्रोल रूम का फ़ोन लम्बी घंटी के साथ बज उठा। वहाँ खड़े सभी पुलिसकर्मी चौंक गये। कंट्रोल का फ़ोन एक ऐसा फ़ोन था जिसकी घंटी कोई भी नहीं सुनना चाहता था।

जय ने हाथ बढ़ाकर फ़ोन उठा लिया-

"हैलो पंजिम पुलिस स्टेशन, एस एच ओ जय सिंह।" जय ने कंट्रोल से कुछ आदेश लिये और हरकत में आ गया। उसने अपनी टोपी उठायी और स्टाफ़ को आवाज़ लगाते हुए कहा-

"जल्दी चलो.. होटल तलसानियाँ.." अगले ही पल पुलिस की वैन अपना परिचित सायरन बजाते हुए केरल की सड़कों पर दौड़ रही थी। जिसमें तीन हवलदार और दो लेडी कांस्टेबल भी थीं। मामला गंभीर लग रहा था। जय ने वक़्त बर्बाद न करते हुए रास्ते में ही डिटेक्टिव कुणाल को फ़ोन लगा दिया।

कुणाल जिसकी उम्र ४० के आस पास रही होगी। सर पे हल्के घुँघराले बाल। हर काम धीमी गति से करने की जिसकी आदत है। यहाँ तक कि बात भी उसी गति से करता है। उसने सुबह की पहली उबासी लेते हुए पूछा-

"बोलिये जय जी सुबह-सुबह मेरी याद कैसे आ गयी।

जय जो अभी भी अपनी जीप में होटल तलसानियाँ की तरफ़ बढ़ रहा था उसने मुस्कुराते हुए कहा-

डिटेक्टिव कुणाल अभी-अभी एक वारदात हुई है होटल तलसानियाँ में, वहीं जा रहा हूँ। सोचा आप इस केस में इंट्रेस्टेड होंगे तो फ़ोन कर दिया।"

कुणाल- "क्या हुआ है?"

जय- "मर्डर

एक नहीं दो-दो ..हनीमून कपल था।" इतना सुनकर कुणाल की नींद हवा हो गयी।

"रियली? साउंड्स वीयर्ड! ठीक है मैं पहुँचता हूँ।" कहते ही वो बाथरूम में घुस गया।

उधर होटल तलसानियाँ की तीसरी मंज़िल के कमरा नंबर 224 के बाहर होटल के स्टाफ़ की भीड़ जमा थी। तभी इंस्पेक्टर जय को अपनी टीम के साथ वहाँ पाकर, वहाँ के मैनेजर कुलकर्णी ने सबको पीछे कर दिया और जय को रास्ता दिखाते हुए रूम नंबर 224 में ले गया। जय वो नज़ारा देखकर चौंक गया। वहाँ ज़मीन पर एक लड़का जिसकी उम्र लगभग २८ साल की रही होगी, सर से ख़ून बहकर सूख गया था। हाथ में चाक़ू था जो ख़ून से सना हुआ था। ये राज है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसने इस चाक़ू से उस लड़की का क़त्ल कर दिया है जिसकी लाश सामने ही बैड पर पड़ी थी। जय ने नज़दीक जाकर देखा, बैड पर एक ख़ूबसूरत लड़की की लाश पड़ी थी। ये डॉली थी। बदन से काफ़ी ख़ून बहने से पूरा का पूरा बिस्तर ख़ून से भरा हुआ था। जय ने कुलकर्णी की तरफ़ रुख़ करते हुए पूछा-

"कौन हैं ये लोग?"

कुलकर्णी- "सर इस लड़के का नाम राज शर्मा है और ये इसकी पत्नि डॉली शर्मा। हनीमून के लिए आये थे यहाँ। दो दिन पहले ही इन्होंने इस होटल में चेक इन किया था और आज सुबह जब हाउस कीपिंग वाला राउंड पर आया तो उसने रूम नंबर 224 में इन दोनों की लाश देखी... फ़ौरन मैंने १०० नंबर पर फ़ोन कर दिया।" जय ने हवलदार को दोनों लाशों का मुआयना करने को कहा और ख़ुद कुलकर्णी के साथ बाहर आ गया।

जय अभी कुलकर्णी से पूछताछ कर ही रहा था कि जय ने देखा डिटेक्टिव कुणाल भी वहाँ पहुँच चुका था। सर पर एक भूरे रंग की हैट और उससे मैचिंग लम्बा कोट। जय ने उसे आधी ही बात बतायी थी पर कुणाल पूरी बात समाझ गया था। यही तो उसकी ख़ासियत थी कि वो इन्सान की चाल देखकर बता देता था कि वो कहाँ से आया है और कहाँ को जायेगा। वक़्त बर्बाद ना करते हुए उसने जय के साथ रूम नंबर 224 का रुख़ किया। जहाँ पुलिस टीम वारदात के सारे सबूत इकठ्ठा कर रही थी। कुणाल ने डॉली की लाश को ग़ौर से देखा जिसकी उम्र २५-२६ के आस पास थी। निहायत ख़ूबसूरत, रंग गोरा। कुणाल ने तो आँखों से ही उसका क़द नाप लिया ५" ७' और फिर राज की लाश को जिसका रंग गोरा था, वर्ज़िशी बदन, देखने में किसी अच्छी फ़ैमिली से लग रहे थे दोनों।

जय- "मुझे तो कोई आपसी झगड़े का मामला लगता है। शायद एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर का चक्कर। हाल में कुछ मामले आये हैं मेरे सामने कि शादी के बाद लड़कियाँ अपने पुराने बॉयफ़्रेंड्स से मिलती हैं जिससे उनके पतियों को तकलीफ़ होती है या लड़के को उसकी एक्स-गर्लफ़्रैंड मिलने आती है और पत्नि को पता चल जाता है। कुणाल ने ग़ौर से दोनों लाशों को देखते हुए कहा,

"पोस्सीबल है.." पर अब इस बात की पुष्टि करने के लिए दोनों में से कोई ज़िन्दा नहीं है! अब तो हमें उन सुबूतों पर निर्भर होना पड़ेगा जो यहाँ मिलेंगे या फिर वही पोस्टमोर्टम रिपोर्ट, CCTV फ़ुटेज। आप एक काम कीजिये लाशों को पोस्टमोर्टम के लिए भिजवाइये, CCTV फ़ुटेज चेक करवाइये फिर देखते हैं।" कहते हुए उसने अपनी सिगरेट निकाली और उसे सूँघता हुआ बाहर कॉरिडोर में आ गया।

पुलिस टीम के लोग, प्राथमिक औपचारिकता के बाद दोनों लाशों को स्ट्रेचर पर ले जा रहे थे। जय कुलकर्णी से पूछताछ करने लगा। कुणाल जेब से लाइटर निकालकर सिगरेट जलाने लगा कि अचानक सिगरेट जलाते हुए कुणाल की नज़र ज़मीन पर गयी। उसने पाया कि कुछ ख़ून की बूँदें कॉरिडोर में गिरी हुई हैं। उसने वहीं से आवाज़ लगाकर उन लोगों को रोक दिया जो इन लाशों को ले जा रहे थे।

कुणाल-"ऐ ... एक मिनट रुको.." और भागता हुआ डॉली और राज की लाश के पास आ गया। उसकी ये हरकत देख जय भी चौंक गया। कुणाल ने ग़ौर से देखा के ख़ून की बूँदें राज की लाश से टपक रही थीं। उसने फट से अपने कोट की जेब से रबर का दस्ताना निकालकर पहना और राज की गर्दन पर हाथ रख कर उसकी नब्ज़ देखने लगा। जय भी ये नज़ारा देखकर हैरान था। कुणाल ने तब सबको ये कहकर चौंका दिया-

"ये लड़का ज़िन्दा है! जय जी जल्दी एम्बुलेंस बुलवाइए।"

कुणाल की बात सुनकर जय हरकत में आ गया उसने एक हवलदार को इशारा किया और वो हवलदार अपना फ़ोन निकालकर काम पे लग गया।

जय- "आपको कैसे शक हुआ कि ये ज़िन्दा है?"

कुणाल- "इसकी बॉडी का ख़ून अभी सूखा नहीं है, जबकि इस लड़की की बॉडी का ख़ून सूख चुका है।" कहते हुए उसने अपनी सिगरेट जला दी।
 
जय भी कॉरिडोर में राज के बदन से टपकी इक्का-दुक्का ख़ून की बूँदों को देख रहा था। इतनी बारीक नज़र रखता है डिटेक्टिव कुणाल, इसीलिए तो जय भी उसे मानता है।

कुछ ही पलों में एम्बुलेंस होटल के आहाते में आ गयी और डॉली की लाश को मुर्दाघर में और राज को इलाज के लिए हॉस्पिटल भेज दिया गया। अगले ही पल जय और कुणाल होटल तलसानियाँ के रेस्टोरेंट में बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। होटल का मैनेजर अपना रजिस्टर लेकर जय को उपयुक्त जानकारी दे रहा था। जय ने मैनेजर से पूछा-

"ये दोनों 224 में कब से रुके हैं?" कि मैनेजर कुलकर्णी ने कुणाल को ये कह कर चौंका दिया-

"नही सर ये दोनों राज शर्मा और उनकी पत्नी डॉली शर्मा तो 331 नंबर रूम में रुके थे। ये रूम तो कल तक ज्योति शर्मा नाम की लड़की के नाम से बुक था।"

"ज्योति शर्मा?" इस केस में नया नाम सुनकर कुणाल ने हैरानी से जय की ओर देखा। जय जानता था कि उसे क्या करना है, उसने फट से मैनेजर से कहा-

इस वक़्त ज्योति शर्मा कहाँ मिलेगी? उसका कोई फ़ोन नंबर?"

मैनेजर रजिस्टर पलटकर उसे ज्योति शर्मा की सारी इन्फ़ोर्मशन देने लगा।

उधर केरल एयरिपोर्ट पर अनायुन्स्मेंट हो रही थी, "मिस ज्योति शर्मा जो गो एयर की उड़ान संख्या GA 563 से दिल्ली जा रही हैं, उनके लिए ये फ़ाइनल कॉल है। कृपया बोर्डिंग के लिये प्रस्थान करें।" कि अचानक वहाँ बैठी एक ख़ूबसूरत लड़की की ये आवाज़ सुनकर नींद खुली। ये ज्योति थी। रंग गोरा उम्र लगभग २४ साल, सर पे हल्के घुँघराले बाल। किसी मॉडल से कम नहीं लग रही थी। उसे एहसास हुआ कि नींद के कारण उसकी फ़्लाइट छूटने वाली थी। उसने तो अभी सिक्यूरिटी चेक भी नहीं किया था। बस हाथ में बोर्डिंग पास पकड़े सो गयी थी। उसने अपना एक हैण्ड बैग हाथ में लिया और ट्राली बैग को घसीटते हुए सिक्यूरिटी चेक इन काउंटर की तरफ़ दौड़ने लगी।

"हट जाइये... प्लीज़ मेरी फ़्लाइट छूट जायेगी... प्लीज़ रास्ता दीजिये।" वो दौड़ते हुए सभी से आग्रह कर रही थी, पर वो जैसे सिक्यूरिटी चेक इन काउंटर पर पहुँचने वाली थी कि उसका फ़ोन बज उठा। उसने देखा कि ट्रू कॉलर पर केरल पुलिस फ़्लैश हो रहा था। ज्योति हैरान हुई कि केरल पुलिस का फ़ोन उसे क्यों आ रहा है? उसने झट से फ़ोन उठाया-

"हैलो, कौन?"

दूसरी ओर होटल तलसानियाँ के रिसेप्शन से जय कुलकर्णी के साथ खड़ा था। जिसने रजिस्टर में ज्योति का नंबर देखकर अपने मोबाइल से उसे फ़ोन लगाया था।

जय- "मिस ज्योति मैं इंस्पेक्टर जय बोल रहा हूँ, केरल पुलिस। आपसे ज़रूरी बातचीत..."

ज्योति ने उसकी बात काटते हुए कहा-

"देखिये आपको जो भी बात करनी है ५ मिनट के बाद कीजिये प्लीज़, मेरी फ़्लाइट छूट जायेगी।"

जय ने सख़्ती से जवाब दिया-

"आप कहीं नहीं जा रहीं, आप होटल तलसानियाँ के जिस कमरा नंबर 224 में ठहरी थीं उसमें एक ख़ून हो गया है.."

ज्योति- "ख़ून? किसका?"

जय- " एक लड़की का.... नाम है डॉली... हेलो! हेलो, मिस ज्योति आप सुन रही हैं?"

ज्योति को तो काटो ख़ून नहीं, वो सुन रही थी कि उसके नाम की अनाउंसमेंट बार-बार हो रही है।

ज्योति- "जी हाँ.."

जय ने आगे लगभग उसे चेतावनी देते हुए कहा-

"आप इसी वक़्त अपनी फ़्लाइट कैंसिल करवाकर होटल तलसानियाँ पहुँचिए, वर्ना आपको यहाँ बुलवाने के लिए हमें गुड़गाँव पुलिस की मदद लेनी पड़ेगी..."

ज्योति ने ख़ुद को सँभालते हुए कहा-

"हाँ... मैं आ रही हूँ वापस.." उसकी आँख भीगने लगी थी, गला भर रहा था।

जय- "थैंक्स.. क्या आप जानती थीं इस लड़की को?"

ज्योति ने एक छोटा-सा विराम लेते हुआ कहा-

"जी हाँ! डॉली मेरी बड़ी बहन है।" इसके आगे तो ज्योति के सर के ऊपर से उड़ते हवाई जहाज़ के शोर में कुछ सुनायी नहीं दिया कि ज्योति और जय में क्या बातचीत हुई।
 
कुणाल अब जय के पीछे होटल तलसानियाँ के रिसेप्शन पर आ चुका था। कुणाल ने जय की आँखों में हैरानी भरे भाव पढ़ते हुए पूछ लिया-

"क्या हुआ?"

जय- "224 नंबर रूम में जहाँ डॉली का क़त्ल हुआ, वो उस रूम में नहीं बल्कि 331 में अपने पति के साथ ठहरी हुई थी।"

कुणाल- "तो फिर इस रूम में कौन ठहरा था?"

जय- "डॉली की छोटी बहन...ज्योति शर्मा।" ये सुनकर तो कुणाल भी चौंक गया, उसके चेहरे पर एक चमक थी कि केस इंट्रेस्टिंग होने वाला था।

जय- "मुझे तो लगता है दो बहनों के झगड़े का मामला है।"

कुणाल ने जय की बात काटते हुए कहा-

"बहुत जल्दी रहती है आपको केस क्लोज़ करने की जय जी। आपको क्लूज़ मिले हैं, सबूत नहीं। सब्र कीजिये अभी तो कहानी शुरू हुई है। अभी तो किरदारों ने कहानी में आना शुरू किया है। अभी तो कई किरदार आने बाक़ी हैं।" अपने परिचित अंदाज़ में मुस्कुराते हुए उसने जेब से सिगरेट निकाली और उसे सूँघता हुआ वहाँ से निकल गया।

जय जानता था कि बहुत मेहनत करवाने वाला था कुणाल उससे, पर वो उसके लिए तैयार था। क्योंकि वो जानता था बेशक वक़्त लेता है डिटेक्टिव कुणाल पर जुर्म की जड़ तक पहुँचता है कि अचानक एक हवलदार ने जय को आकर बताया कि ज्योति शर्मा होटल पहुँच रही है।

जय- "ठीक है कुलकर्णी से कहो कुछ वक़्त के लिए उनका कॉफ़्रेंस हॉल हम इस्तेमाल करेंगे।" वो हवलदार से बात करते हुए होटल के मेन गेट पर पहुँच गया। उसने देखा कि कुणाल उससे पहले ही वहाँ मौजूद था। वो रह-रहकर अपनी घड़ी देख रहा था।

जय हैरान था कि कुणाल किसका इंतज़ार कर रहा है! कि तभी वहाँ एक टैक्सी आकर रुकी और उसमें से उतरी ज्योति शर्मा। उसके हाव भाव देखकर कुणाल पहचान गया कि यही ज्योति है और जय भी जान गया कि कुणाल ज्योति का ही इंतज़ार कर रहा था। कुणाल ने आगे बढ़कर ज्योति की तरफ़ हाथ बढ़ा दिया-

"आप मिस ज्योति शर्मा हैं? हाय! आई एम डिटेक्टिव कुणाल और ये इंस्पेक्टर जय इन्होंने आपको फ़ोन किया था।"

ज्योति वहीं खड़े-खड़े रो दी।

"क्या हुआ डॉली को? कहाँ हैं वो मुझे उसे देखना है।"

जय- "उनकी बॉडी को पोस्टमोर्टेम के लिए ले गये हैं, आप अंदर चलिये, अंदर बैठकर बात करते हैं।" कहते हुए उसने शिष्टाचार का परिचय देते हुए ज्योति का बैग ख़ुद पकड़ लिया।

होटल तलसानियाँ के कॉफ़्रेंस हॉल में कुलकर्णी ने सारा इंतज़ाम कर दिया था। जहाँ ज्योति अब बीच में एक कुर्सी पर बैठी थी। उसके आँसू बहकर सूख चुके थे और सामने जय बैठा था। कुणाल दूर कोने में उस वार्तालाप के शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था जो अब जय और ज्योति के बीच होने वाली थी।

ज्योति ने पानी पीकर टेबल पर ख़ाली गिलास रखकर जय से पूछा-

"क्या मेरे घरवालों को पता है कि डॉली..?"

जय ने उसकी बात को काटते हुए कहा-

"उनको भी फ़ोन कर देंगे पर कुछ सवाल पहले आपसे पूछना चाहता हूँ। ये तो आपने बता दिया कि डॉली आपकी बहन थी और राज आपका जीजा। वो लोग हनीमून के लिए यहाँ आये थे, पर सवाल मेरा ये है कि आप इन दोनों के हनीमून के बीच क्या कर रही थीं? वो भी उनके ही होटल में और उनके बग़ल वाले कमरे में?"

जय के इस सवाल का जवाब ना देते हुए ज्योति ने जय को ही पूछ लिया-

"मेरे जीजा जी.. राज शर्मा कहाँ है?"

जय ने एक बार कुणाल को देखा, "वो हॉस्पिटल में हैं.. उनका इलाज चल रहा है!"

ज्योति - "क्या हुआ राज को?"

"वो भी उसी कमरे में बुरी तरह ज़ख़्मी हालत में हमें मिले जहाँ आपकी बहन की लाश। उनके हाथ में एक चक्कू था जिससे शायद डॉली का.." कहते हुए वो रुक गया।

ज्योति- "मतलब! राज ने डॉली को मार दिया...?"

जय- "फ़िलहाल हम कुछ नहीं कह सकते, कि राज ने डॉली को मारा या फिर दोनों को किसी तीसरे ने?" कहते हुए उसने ज्योति पर अपनी तीखी नज़र गाड़ दी।

जय की बात सुनकर ज्योति चौंक गयी। उसके मुँह से अचानक निकल गया-

"ये कैसे हो सकता है, मैं सबकुछ तो ठीक करके गयी थी!"
 
जय ने ज्योति के इस वाक्य को अपने अगले सवाल का आधार बनाते हुए पूछा-

"क्या ग़लत था दोनों के बीच जो तुम ठीक करके गयी थीं? बोलो ज्योति!"

ज्योति अब अपनी बात कहकर घबरा गयी थी। वो अब जय की किसी भी बात का जवाब नहीं देना चाहती थी।

"देखिये पहले आप मेरे घरवालों को इन्फ़ॉर्म कर दीजिये.."

जय ने उसकी बात को काटते हुए कहा-

"यही सवाल तो तुम्हारे घर वाले भी तुमसे पूछेंगे? क्या कर रही थीं तुम अपनी बहन के हनीमून पर? क्या ठीक करने आयी थीं तुम यहाँ? जिससे तुम्हारी बहन डॉली की जान चली गयी और तुम्हारे जीजा जी जान से जा-जाते!" ज्योति चुप थी मानो वो कोई सच्चाई छुपाना चाह रही हो।

जय ने कुणाल को देखा मानो थोड़ी सख़्ती की अनुमति माँग रहा हो और कुणाल ने अपना सर हिलाकर उसे अनुमति दे दी। इसके बाद जय अपनी कुर्सी ज्योति के और क़रीब ले आया और सीधा उस पर इल्ज़ाम लगा डाला-

"कोई झगड़ा था डॉली के साथ तुम्हारा? जिसका बदला लेने के लिए तुम उसके पीछे आ गयीं?"

ज्योति- "बदला? मैं? अपनी बहन से?"

जय- "हाँ बदला.. वही तो मैं जानना चाहता हूँ! किस बात का बदला लेना चाहती थीं तुम अपनी बहन से? ऐसी क्या ग़लती हो गयी थी उससे कि तुमने इतनी बेरहमी से उसका मर्डर कर दिया, फिर अपने जीजा को मारने की कोशिश की!" कहते हुए उसने ज़ोर से टेबल पर अपना हाथ दे मारा।

ज्योति पहले तो जय के मज़बूत हाथों की थाप सुनकर डर गयी। पर फिर ख़ुद को सँभालते हुए बोली-

"गलत कर रहे हैं आप इंस्पेक्टर साहब। आपके पास पावर है इसका मतलब ये नहीं कि आप मुझे पर दबाव डालकर मुझसे कुछ भी क़बूल करवा लेंगे। मैंने डॉली का ख़ून नहीं किया, ना ही अपने जीजा को मारने की कोई ऐसी कोशिश की। मैं तो रात को १ बजे ही होटल से चली गयी थी। ये देखो मेरा बोर्डिंग पास १.४० पे मैंने लिया था।" कहते हुए उसने अपना बोर्डिंग पास निकालकर जय को थमा दिया।

जय ने भी ज्योति की बात की पुष्टि की और बोर्डिंग पास कुणाल को थमा दिया जो उसे ध्यान से देखने लगा। ज्योति ने आगे कहा-

"आप पुलिस वालों का यही काम है, असली मुजरिम को कभी पकड़ते नहीं, जो हाथ आया उसे मुजरिम साबित करने के लिए पूरी ताक़त लगा देते हो।"

जय की नज़रें कुणाल से मिलीं, मानो उससे पूछ रहा हो कि अब आगे क्या करना है।

ये देख कुणाल ने मुस्कुराते हुए ज्योति को देखा और उसके सामने कुर्सी पर आकर बैठ गया। वो अपने परिचित अंदाज़ से अपनी गर्दन इधर-उधर घूमा रहा था। जय जानता था कि जब भी कुणाल ऐसे गर्दन घूमाता है तो अपने पिटारे से कुछ न कुछ ज़रूर निकलता है।

कुणाल ने ज्योति के सामने एक मुस्कराहट बिखेरते हुए कहा-

"देखो ज्योति सही कहा तुमने ये पुलिस वाले कई बार अपनी पावर का ग़लत इस्तेमाल करते हैं और असली मुजरिम को पकड़ने की बजाए अपनी सारी पावर किसी कमज़ोर बेगुनाह को मुजरिम साबित करने में लगा देते हैं।" वो ये बात अब ज्योति की आँख में आँख डालकर कह रहा था और ज्योति ख़ुद को कुणाल के अगले सवाल के लिए तैयार कर रही थी। कुणाल ने एक लम्बा साँस लेते हुए कहा-

"और तुम अब इंस्पेक्टर जय के हत्ते चढ़ गयी हो और मुझे पूरा यक़ीन है कि ये अपनी सारी पावर तुम्हें मुजरिम साबित करने में लगा देंगे और कामयाब भी हो जायेंगे। मैं इनकी क़ाबिलियत को जानता हूँ।"

ज्योति- "पर मैं आपसे कह रही हूँ कि मैंने डॉली का ख़ून नहीं किया!"

कुणाल- "फिर किसने? आई मीन तुम्हें किसी पे शक?

ज्योति- "शायद .. शायद राज ने?"

कुणाल- "शक? कि यक़ीन?"

ज्योति- "मुझे क्या पता? आप ही ने अभी-अभी कहा है कि दोनों एक ही कमरे में ज़ख़्मी हालत में मिले। राज के हाथ में चक्कू था।"

"वो कमरा तुम्हारा था.... तुम उसमें रुकी हुई थीं।" कुणाल ने अपनी आवाज़ हल्की सी ऊपर करते हुए कहा।

"मैंने कहा मैं रात को कमरा छोड़ चुकी थी!" ज्योति से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था वो फूट-फूट के रो पड़ी।

"मैं कुछ नहीं जानती... कुछ नहीं जानती!"

कुणाल- "ठीक है तो जो जानती हो वो बताओ!" ज्योति ने देखा कि कुणाल रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसके पास हर सवाल के जवाब में एक नया सवाल था। कुणाल ने ज्योति को आश्वासन देते हुए कहा-

"देखो ज्योति तुम्हारे पास ख़ुद को बचाने के लिए सिर्फ़ एक ही रास्ता है कि तुम मुझे पूरी कहानी सच-सच सुनाओ.. नहीं तो..."

ज्योति ने हैरानी जतलाते हुए कहा-

"नही तो क्या? मतलब क्या है आपका? ग़लती कर दी जो आपके कहने पर यहाँ चली आयी। हाँ मैं आयी थी अपनी बहन और जीजा के साथ घूमने। इसमें क्या बुराई है! और फिर किस बिनाह पर आप मुझ पर ये इल्ज़ाम लगा रहे हैं?"

कुणाल- "क्यों कि तुम्हारी बहन की लाश तुम्हारे कमरे में मिली है!"

ज्योति- "मैंने कहा मैं अपना कमरा छोड़कर जा चुकी थी, उसके बाद कौन मेरे कमरे में आया, मुझे क्या मालूम। आपको एक बार में बात समझ नहीं आती? बार-बार एक ही सवाल पूछे जा रहे हैं!"

कुणाल ज्योति की आँखें पढ़ रहा था जिनमें कई राज़ छुपे थे जो ज्योति बताना नहीं चाहती थी। ज्योति ने अपनी नज़रें घूमाते हुए कुणाल के हर सवाल को नकारते हुए कहा-

"आप मुझसे यूँ ही कुछ भी नहीं उगलवा सकते, समझे? मुझे अपने घरवालों से बात करनी !"

जय की अब सब्र की सीमा पार होने लगी थी। उसने टेबल पर ज़ोर से हाथ मारते हुए कहा-

"बोलती हो या दूसरा रास्ता अपनाऊँ?"

ज्योति भी बेबाक थी। उसने भी टेबल को धक्का देते हुए कहा-

“मारो! मरोगे मुझे? मारो। वीडियो बनाकर वायरल कर दूँगी कि कैसे पुलिस वाले पूछताछ करने के बहाने से बुलाकर मासूम लोगों को जुर्म क़बूल करने के लिए मजबूर करते हैं!"

जय की आँखों में क्रोध देखकर कुणाल ने उसे शांत रहने की सलाह दी। इस पर ज्योति ने आगे कहा-

"जो करना है कर लो, पर मैं ऐसा कोई भी बयान नहीं दूँगी जो आप चाहते हैं। मुझे कुछ नहीं पता ना ही मैं जानती हूँ।"

ये देख जय ने दरवाज़ा खोलकर दो लेडी हवलदार को बुलवाया और उन्हें ज्योति को पुलिस स्टेशन ले जाने का आदेश दे दिया। जय का आदेश पाकर हवलदार ज्योति को घसीटने लगे और ज्योति यही चिल्ला थी-

"ग़लत कर रहे हैं आप। बिना किसी सबूत के आप मुझे रोक नहीं सकते...मैंने डॉली का ख़ून नहीं किया।"

ज्योति के जाते ही जय ने कुणाल की ओर देखा जो अपने दिमाग़ में कोई नयी गणित कर रहा था। उसने उत्सुकतावश कुणाल से पूछ लिया-

"क्या लगता है आपको?"
 
इस पर कुणाल ने मुक्सुराकर कहा-

"लगा तो आपको है, आपने उस लड़की को पुलिस स्टेशन भेज दिया।"

जय- "कुणाल जी तेवर देखे थे उसके? ऊपर से उसके कमरे से एक दो लाशें बरामद हुई हैं।"

कुणाल- "तो उससे वो मुजरिम तो साबित नहीं हो जाती?"

जय- "पर अगर हुई तो? अगर मैं उसे जाने की इज़ाज़त दे दूँ और वो फ़रार हो गयी तो?"

कुणाल ने मुस्कुराते हुए कहा-

"देखा फिर आपको बहुत जल्दी है केस क्लोज़ करने की, अभी तो हमें ये भी नहीं पता कि राज ने डॉली को मारा है कि बचाव में डॉली ने उसे! या फिर कोई तीसरा है जिसने इन दोनों पर हमला किया और अगर कोई तीसरा है तो वो ज्योति है या कोई और? अब ये बात तो तभी सामने आयेगी जब एक बार पोस्टमॉर्टेम की रिपोर्ट आ जाये या फिर राज को होश!"

जय ने कुणाल की बात को समझते हुए अपना ग़ुस्सा शांत किया। कुणाल ने जय को पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा-

"फ़िलहाल इस कहानी में तीन पात्र हैं.. एक डॉली जिसकी मौत हो गयी है.. दूसरा उसका पति राज जो हॉस्पिटल में ज़िन्दगी और मौत से लड़ रहा है और तीसरी ज्योति, फ़िलहाल ज्योति ही है जो इस कहानी की बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ सकती है।" कहते हुए उसने जेब से सिगरेट निकाली।

जय ने भी उसके पैकेट से एक सिगरेट निकालते हुए पूछा-

"आपको लगता है कि वो लड़की इतनी आसानी से मुँह खोलेगी? बस एक सबूत मिल जाये न.." वो अपनी बात पूरी ही नहीं कर पाया था कि एक हवलदार ने जय को कुछ सामान लाकर दिया जो उसे डॉली और राज के कमरे से मिला था। यानी कमरा नंबर 331 से। उस सामान में डॉली और राज के मोबाइल भी थे।

कुणाल ने राज का मोबाइल उठाते हुए हवलदार से पूछ लिया-

"ये कमरा नंबर 331 से मिला तुम्हें?"

हवलदार- "जी सर!" कुणाल ने मोबाइल देखना शुरू किया, तो उसकी आँखें चमख उठीं। उसने एक लंबा कश लेते हुए कहा-

"लो आपको ज्योति की ज़ुबान खुलवाने के लिए कोई सबूत चाहिए था ना? ये रहा!" कहते हुए उसने जय के हाथ में राज का मोबाइल थमा दिया।

जय ने जब राज का मोबाइल देखा तो उसकी आँखों में भी एक चमक आने लगी। मानो उसके हाथ जैकपोट लग गया हो।

……………………………………………………….

उधर पुलिस स्टेशन में ज्योति परेशान बैठी थी। वो बार-बार हवलदार को अनुरोध कर रही थी कि उसका मोबाइल दे दें, उसने अपने घरवालों से बात करनी है, पर उसकी कोई नहीं सुन रहा था। अचानक उसने देखा सामने ही जय अपनी सिगरेट सुलगा रहा था। ज्योति ने वहीं से चिल्लाते हुए कहा-

"तुम मुझे ज़बरदस्ती फँसा रहे हो। यही करते हो पुलिस स्टेशन में मासूम लोगों के साथ?"

इतना सुनते ही जय तेज़ी से उसकी और आया और राज का मोबाइल दिखाते हुए ज्योति से कहा-

"तो क्या है ये? बोल दो ये वीडियो भी झूठ है?"

ज्योति के होश उड़ गये। उस वीडियो में उसकी और राज की एक अश्लील फ़िल्म चल रही थी। जहाँ वो और राज निर्वस्त्र, प्रेम क्रीड़ा में लीन थे।

जय ने ज्योति से मोबाइल छीनते हुए कहा-

"इस वीडियो में तुम और तुम्हारा जीजा राज ही हैं न? यही ग़लत था जो तुम ठीक करके गयी थीं? है ना?... क्या बोली थीं कि बहन और जीजा के साथ घूमने नहीं आ सकती? तुम उनके साथ घूमने आयी थीं कि घुमाने? बोलो ये तुम ही हो ना, या तुम्हारे घरवालों को बुलवाकर इस वीडियो की पुष्टि करूँ?"

ज्योति जानती थी वो फँस चुकी है। वो वहीं बैठकर रोने लगी-

"हाँ ये मैं ही हूँ...पर मैंने डॉली को नहीं मारा... नहीं मारा.."

जय ने थोड़ी नर्मी दिखाते हुए कहा-

"देखो अगर तुम चाहती हो कि हम तुम्हारी मदद करें तो हमें सारी कहानी बताओ सच सच। इस वीडियो की सच्चाई की कहानी!"

ज्योति की आँख मैं आँसू थे। वो समझ गयी थी कि पुलिस को सच्चाई बताने के सिवा उसके पास कोई रास्ता नहीं था। और अगले ही पल पुलिस स्टेशन के एक कमरे में ज्योति कुणाल और जय के सामने बैठी थी। जय ने अपने मोबाइल में रिकॉर्डर ऑन कर दिया। कुणाल ने ज्योति को रिलैक्स्ड करते हुए कहा-

"बोलो जो भी बोलना है, पर याद रखना तुम्हारे बयान की सच्चाई ही तुम्हें बेगुनाह साबित कर सकती है!"

ज्योति अतीत में जाने लगी। मानो वो सारे घटनाक्रम को याद करने की कोशिश कर रही थी। उसके दिमाग़ में जैसे अब सारी बातें किसी फ़िल्मी फ़्लैशबैक की तरह घूमने लगी थीं।

इस कहानी की शुरूआत कुछ दिन पहले मानेसर से हुई थी। गुड़गाँव से सटे मानेसर के एक फ़ार्म हाउस में शादी का माहौल था। हर तरफ़ रौनक़ ही रौनक़ थी। सामने एक बड़ा-सा बोर्ड चमक रहा था। राज वेड्स डॉली। दो दिन बाद राज शर्मा और डॉली शर्मा की शादी जो थी। यह एक अरेंज्ड मैरिज थी। राज के पिता प्रेम शर्मा और डॉली के पिता सिद्धेश्वर शर्मा बचपन के दोस्त थे। इसी के रहते उन्होंने अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल लिया था।

डॉली को तो राज पहली नज़र में ही भा गया था। डॉली की मम्मी ने जब डॉली को राज की तस्वीर दिखायी थी तो उसने तभी ही शर्माकर हामी भर दी थी और एक महीने में ही शादी की तारीख़ भी निकल आयी। सेंट मैरी दोनो के पिता ने मिलकर मानेसर में एक रिसोर्ट बुक कर डाला। नज़दीकी रिश्तेदारों और दोस्तों को ही निमंत्रण भेजा था।

उसी रिसोर्ट में सभी रस्में एक साथ करने का फ़ैसला दोनों परिवारों का ही था। हाँ डेस्टिनेशन मैरिज। हर तरफ़ ख़ुशी का माहौल था। रिसोर्ट के एक तरफ़ लड़की वाले और दूसरी तरफ़ लड़के वाले। इधर लड़की वालों के यहाँ डॉली को हल्दी लग रही थी। उसकी चाचियाँ, उसकी मामियाँ सभी उसके गोरे बदन पर हल्दी लगाकर उसे निखार रही थीं और सबसे आगे थी कांता चाची। कांता चाची डॉली से तक़रीबन ६-७ साल ही बड़ी रही होंगी इसीलिए वो कुछ ज़्यादा ही खुली हुई थीं डॉली से।

कांता चाची ने देखा कि सभी औरतें डॉली के पाँव पर या बाज़ुओं पर हल्दी लगा रही थीं, मानो सिर्फ़ औपचारिकता कर रही हों। कांता चाची की नज़र ज्योति से मिली और दोनों ने आँखों ही आँखों में ये तो तय कर लिया था कि सब बहुत बोरिंग चल रहा है। मज़ा नहीं आ रहा। बस फिर क्या था कांता चाची को शरारत सूझी, उसने मट्ठी में ढेर सारा हल्दी का लेप उठाया और डॉली का ब्लाउज़ खोलकर उसके अंदर अपना हाथ घुसा दिया। डॉली को तो कांता चाची की इस हरकत की उम्मीद ही नहीं थी। उसने कस कर अपना ब्लाउज़ पकड़कर अपने गले के साथ दबा लिया और चिल्लाने लगी-

"अरे!.. ये क्या कर रही हो चाची...?"

कांता चाची की नज़रें ज्योति से मिलीं, दोनों के बीच इस शरारत को लेकर सहमती हुई और फिर कांता ने डॉली पर अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए कहा-

"अब भला चाची से कैसी शर्म? वही तो तेरे पास है जो मेरे पास.." कहते हुए उसने हाथ में और हल्दी भरी और डॉली के ब्लाउज़ में हाथ डालकर उसके वक्षों पर मसलने लगी।

डॉली को गुदगदी सी हो रही थी।

डॉली- "क्या कर रही हो चाची, गुदगुदी हो रही है।" कि एक मामी ने फब्ती कसते हुए कहा-

"राज तो और भी कई जगह छूएगा.. तब भी यही कहगी कि गुदगुदी हो रही है?" कहते हुए वो क्या हँसी वहाँ बैठी सभी औरतें हँस दीं।

डॉली को तो जैसे समझ ही नहीं आया कि इसमें हँसने की क्या बात थी! इतनी सीधी थी डॉली और यह बात उसकी छोटी बहन ज्योति जानती थी। डॉली के विपरीत एक दम चंट थी ज्योति। ज्योति डॉली से बेशक एक साल छोटी थी पर बातों में डॉली से कहीं बड़ी। वो भी चाची और मामी के इस मज़ाक़ में शामिल हो गयी।

"चाची ज़रा बताओ तो सही जीजा जी दीदी को कहाँ कहाँ छुएँगे?"

कांता चाची को समझने में देर नहीं लगी कि ज्योति अब मज़ाक़ के मूड में है। उसने मामी को आँख मारी जिसने इस मज़ाक़ में अपने शामिल होने की सहमती दे दी थी।

कांता चाची- "ज्योति ज़रा दरवाज़ा तो बंद कर।"

इतना सुनते ही ज्योति ने फट से कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया और फिर बड़ी चाची और मामी ने तो डॉली के हाथ-पॉंव पकड़ लिये।

"अरे!अरे! ये क्या कर रही हैं आप लोग?" डॉली ने घबराते हुए पूछा। पर इन औरतों के आगे उसकी एक नहीं चल रही थी और फिर जो हुआ डॉली को तो उसकी कल्पना भी नहीं थी। सबने मिलकर डॉली के हाथ-पॉंव पकड़ लिये। किसी ने उसका ब्लाउज़ खोल दिया तो किसी ने उसका घाघरा ऊपर उठा दिया और फिर एक लोक गीत गाते हुए उसके बदन पर हल्दी का उबटन लगाने लगे। लोक गीतों के बोलों में किसी सुन्दरी की ख़ूबसूरती की प्रशंसा थी। उसके हर अंग के बारे में ज़िक्र और जिस अंग का नाम उस गीत में आता। सभी औरतें उसी अंग पर हल्दी मलने लगतीं। डॉली इस बेहूदगी से छटपटा उठी-

"व्हाट इज दिस नॉनसेंस... मम्मी! मम्मी!"

चाची- "इसमें तेरी मम्मी क्या कर लेगी डॉली? ये तो हमारे ख़ानदान की परम्परा है। हर नवेली दुल्हन के बदन को उसके पति के लिए यूँ ही हल्दी और उबटन का लेप लगा के सजाया जाता है ताकि वो अपनी नयी नवेली दुल्हन के बदन को ऐसे छुकर आनंद ले सके। ये जो हम कर रहे हैं न?.. ये सब राज करेगा.. बस उसे इमेजिन कर.." कहते हुए वो हँस दीं।
 
डॉली देखकर हैरान थी कि इतनी सीधी सांस्कारिक दिखने वाली उसकी मामियाँ और चाचियाँ, इस तरह की गंदी और बेहूदा बातें भी कर सकती हैं। पर चाहकर भी वो उन सब का विरोध नहीं कर पा रही थी। धीरे-धीरे डॉली ने आँख बंद करके अपने बदन को उन सबके हवाले कर दिया था। अब डॉली के बदन पर हल्दी की एक चादर-सी बन गयी थी। अब उसे भी सभी औरतों का स्पर्श अच्छा लगने लगा था।

ज्योति भी अब ये सारा नज़ारा देखकर हैरान थी। डॉली की ये हालत देख उसके मन में भी तितलियाँ उड़ने लगीं। उसका भी मन कर रहा था कि ये सब उसके साथ भी हो कि अचानक उसने देखा चाची अब डॉली की दोनों टाँगों के बीच हल्दी का लेप लगा रही है, पर अचानक चाची का हाथ डॉली की दोनों टाँगों के बीच में जाकर रुक गया-

"ये क्या डॉली तूने यहाँ नीचे से क्लीनिंग नहीं करवाई?" और सभी औरतें डॉली का घाघरा उठाकर उसकी टाँगों के बीच झाँक कर देखने लगीं।

अब डॉली का सब्र का बाँध टूट रहा था। वो ज़ोर-ज़ोर से अपनी टाँगे हिलाकर छटपटाने लगी।

"बेशरम हो गये हो आप सभी लोग। ऐसा कौन करता है?" वो रोने की कगार पर थी, पर वो कुछ कर नहीं पा रही थी क्योंकि औरतों ने उसके हाथ पॉंव जकड़े हुए थे और लोक गीत गाने में मस्त थीं।

डॉली- "चाची स्टॉप इट ...ज्योति मम्मी को बुला... मम्मी को बुला!" वो ज़ोर से चिल्ला रही थी।

पर ज्योति भी अब मज़े लेने के मूड में थी। चाची के कहने पर तो वो हेयर रिमूवर ले आयी।

डॉली के होश उड़ गये, उसने देखा दो महिलाओं ने उसके हाथ जकड़ लिये और छोटी मामी की मदद से चाची ने डॉली की टाँगे फैला दीं। ये देख डॉली डर गयी। उसका मुँह खुल गया।

"ये क्या करने लगे हो आप लोग? ये क्या बदतमीज़ी है? हाथ छोड़ो मेरे नहीं तो चिलाऊँगी!!"

ज्योति ने हेयर रिमूवर की डिब्बी खोलते हुए चाची के हाथ में थमा दी और चाची अब लोक गीत गाते हुए हेयर रिमूवर से डॉली की टाँगों के बीच लगाने लगी थी। डॉली का रोना निकल आया, "इसकी क्या ज़रूरत है?"

चाची- "ज़रूरत तेरी नहीं बाबूराव की है जो चुनमुनियाँ का दरवाज़ा खोलने आयेगा और उसे कोई रुकावट नहीं मिलनी चाहिए।" इतना सुन सभी औरतों की हँसी छूट गयी और बेचारी डॉली इन औरतों के पागलपन पर रोये जा रही थी।

ज्योति ने आज जाना कि बाबूराव किसे और चुनमुनियाँ किसे कहते हैं। उसके बाद चाची ने एक कपड़े का टुकड़ा उठाया और डॉली की टाँगों के बीच में रख दिया। डॉली जानती थी कि इसके बाद क्या होने वाला था। वो पहले ही चिल्लाने लगी, पर चाची ने बिना परवाह किये उस कपड़े को ज़ोर से खींच डाला और डॉली की चीख़ उस लोक गीत के शोर में दब के रह गयी। वो रोये जा रही थी।

"बहुत ग़लत कर रहे हो तुम लोग!!" बेशक डॉली के आँसू निकल आये थे। पर ज्योति का मन तो राज और डॉली की सुहागरात तक पहुँच चुका था कि बड़ी चाची की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

बड़ी चाची- "जल्दी करो लड़के को भी हल्दी लगाने जाना है.."

उधर लड़के वालों के यहाँ यही कार्यक्रम चल रहा था। राज को उसकी भाभियाँ हल्दी लगा रही थीं और रागिनी अपनी टीम के साथ इस पूरे कार्यक्रम की फ़ोटोग्राफ़ी कर रही थी कि तभी राज की माता जी श्रीमती शर्मा ने आकर बताया-

"लड़की वाले राज को मेहँदी लगाने आ रहे हैं.."उसने रागिनी को भी कहा-

"रागिनी सबकी अच्छी-सी तस्वीरें खींचना। एल्बम में कमी नहीं रहनी चाहिए।"

रागिनी- "जी आंटी जी..." कहते हुए उसने अपना कैमरा नीचे किया और उसका कार्ड बदलने के लिए अंदर अपने कमरे की ओर चली गयी। राज भी खड़ा हो गया। ये देख उसकी मम्मी ने उसका हाथ पकड़ते हुए पूछ लिया-

"अरे तू कहाँ जा रहा है राज? ऐसे बीच में नहीं उठते अपशगुन होता है।"

राज-"मम्मी बाथरूम आ रहा है, यहीं निकल गया तो वैसे ही शगुन अपशगुन हो जायेगा!"

यह सुन सभी हँस पड़े। राज की ताई जी ने कह दिया-

"जाने दे लीला, कोई अपशगुन न होता। हल्दी तो लग चुकी है।" ताई की बात पर राज को अंदर जाने की इजाज़त मिल गयी थी।
 
कुछ देर बाद उस हॉल में लड़की वाले राज को हल्दी लगाने पहुँच गये। ज्योति, उसकी चाचियाँ, मामियाँ, सभी औरतें वहाँ आ गयी थीं। ज्योति की नज़रें राज को तलाश रही थीं। उसने राज की मम्मी से पूछ लिया-

"आंटी जी जीजू कहाँ हैं? दिख नहीं रहे.. या हमारे डर से छुप गये हैं?"

इतना सुन सभी हँस पड़े। राज की मम्मी राज को पुकारने ही वाली थी कि तभी राज आ गया। राज की मम्मी ने राज को प्यार से बिठाते हुए ज्योति से कहा-

"लो! आ गया तेरा जीजू, कर ले अपने अरमान पूरे.." और फिर कांता चाची ने हल्दी रस्म शुरू कर दी। सभी औरतें लोक गीत गाने लगीं और राज के बदन पर हल्दी लगा रही थीं। इस बार गीत के बोलों में लड़के को उसकी होने वाली पत्नी के लिए सँवारने की बात हो रही थी।

ज्योति देख रही थी कि राज का बदन वर्ज़िशी है। माँसपेशियाँ काफ़ी सख़्त हैं। उसके मन में कई ख़याल आने लगे कि इन्हीं सख़्त मसल्स को उसकी बहन कल रात छूएगी। ज्योति ने देखा कि राज ने पायजामा पहना हुआ है और वो चुपचाप सभी औरतों से हल्दी लगवा रहा था। ज्योति अब कल्पना करने लगी कि राज के पायजामे के अंदर बाबूराव आराम कर रहा होगा! जो कल रात उसकी बहन की चुनमुनियाँ में प्रवेश करेगा। कैसा होगा? ये जानने के लिए उसके मन की उत्सुकता बढ़ने लगी थी। उसे एक शरारत सूझी। उसने चाची के कान में कहा-

"चाची जीजा जी को भी वैसे ही हल्दी लगाओ न जैसे डॉली दीदी को लगायी थी!" चाची ज्योति की बात समझकर ख़ुद ही शर्मा गयी।

"पागल हो गयी है क्या.. चुप ऐसी बात नहीं करते।"

ज्योति- "क्यों? दीदी के साथ वो सब कर सकते हो, जीजा के साथ क्यों नहीं?" वो इतनी ज़ोर से बोली कि सभी देखने लगे के आख़िर ज्योति ने क्या बोला! बल्कि सब अब ये जानना चाहते थे कि ज्योति क्या चाहती है।

राज की मम्मी ने ज्योति से प्यार से पूछ ही लिया-

"बोल ज्योति बेटा क्या बात है? मुझे बता.. शर्मा नहीं अब ये घर भी तेरा भी है .. बोल!" कांता चाची घबरा रही थी कि कहीं मुँहफट ज्योति कुछ उल्टा-सुलटा न बोल दे। पर वही हुआ, ज्योति ने बेबाक होकर सबके सामने राज की मम्मी से कह दिया-

"आंटी जी जब मेरी दीदी को हल्दी लगी, तो उसके सारे कपड़े उतार कर उसके पूरे बदन पर हल्दी लगायी गयी, ये कहकर जीजा जी उसके पूरे बदन को छुएँगे तो उनको अच्छा लगेगा.. और जब जीजा जी की बारी आयी तो इन्होंने तो कमर से लेकर पॉंव तक सब ढँक रखा है। क्यों डॉली दीदी जीजा जी को कमर के नीचे नहीं छूएगी क्या?" ज्योति की ये बातें सुनकर सभी औरतें अपनी बग़लें झाँकने लगीं कि कैसी अजीब लड़की है ये और कांता चाची ने तो उसे चिमटी काटते हुए चुप रहने की सलाह दे डाली।

"चुप कर जा ज्योति.. क्या बकवास किये जा रही है। कोई अक्ल वक्ल नाम की चीज़ है कि नहीं तुझमे?" पर ज्योति तो समझ रही थी कि उसकी बात में तर्क है। उसने अगला सवाल राज की मम्मी पर दाग दिया। जिससे राज की मम्मी अब पानी पानी हो गयी-

"आंटी जी आप ही मुझे बताइए एक लड़के के लिए लड़की के हर अंग को सँवारा जाता है। सर से पॉंव तक हल्दी उबटन लगाया जाता है.. तो लड़के को ऐसे आधा ढँक कर क्यों रखा जाता है? ये कहाँ की परम्परा हुई भला?" इतना सुनकर सबने अपने कान बंद कर लिये। कांता चाची ने तो ज्योति को डाँटते हुए कह दिया-

"तू जा यहाँ से, तेरी कोई ज़रूरत नहीं है!" पर ज्योति जाने को तैयार नहीं थी। ज्योति का बेबाकपन देखकर राज की मम्मी वहाँ से कहते हुए निकल गयी-

"बेटा अब राज तुम्हारा है जो मर्ज़ी करो इसके साथ.." राज भी कहाँ कम था.. वो तो ज्योति की बड़ी-बड़ी आँखों में उसकी मासूमियत देखकर दंग था। ज्योति की आँख में आँख डालते हुए उसने फट से अपने पायजामे का नाड़ा खोलना शुरू कर दिया। यह देख वहाँ सभी औरतों ने ऑंखें बंद कर लीं।

चाची- "नहीं नहीं दामाद जी.. ये ज्योति तो पागल है... मत करो ये सब!" बेशक सब औरतों ने अपनी आँखें बंद कर लीं थी पर ज्योति ने नहीं। उसकी उत्सुकता बढ़ रही थी। वो देखना चाहती थी कि डॉली की चुनमुनियाँ के लिए उसका बाबूराव कैसा होगा।

राज ने तब अपना पायजामा खोलकर सबको चौंका दिया। उसने नीचे वो एक भूरे रंग का वी शेप जाँघिया पहने हुआ था। सभी औरतों की जान में जान आयी कि राज ने कम से कम नीचे कुछ तो पहना हुआ था, पर ये देख ज्योति निराश हो गयी। उसकी तो बाबूराव के दर्शन की अभिलाषा ही रह गयी थी। वक़्त बर्बाद न करते हुए कांता चाची ने लोक गीत गाते हुए हल्दी का कार्यक्रम शुरू कर दिया और रागिनी इस पूरे कार्यक्रम को

अपने कैमरे में क़ैद करने लगी। ज्योति ने हल्दी का लेप लेकर राज की टाँगों पे मलना शुरू कर दिया और फिर धीरे-धीरे उसकी मज़बूत जाँघों पर। उसके हाथ राज के जाँघिये को छूने को मचल रहे थे। मानो वो जानना चाह रही थी कि ऐसा क्या छुपा रखा है राज ने जो उसकी बहन डॉली को मिलने वाला है और राज अब समझ चुका था कि बेशक ज्योति बड़बोली है पर है मासूम। चाची ने यह देख लिया और उसने ज्योति का हाथ पीछे करके कार्यक्रम को जल्दी से ख़त्म कर दिया और सभी औरतें राज को आशीर्वाद देकर निकल गयीं।

लड़की वालों के जाते ही राज की मम्मी अंदर आयीं-

"कितनी बेशर्म है यह लड़की ज्योति!"

कि राज की चाची ने कहा-

"भाभी आज कल की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं, वैसे उसकी बात में लॉजिक तो था। आप ही जवाब नहीं दे पायीं!" कहते हुए सभी हँस दिए। पर राज के दिमाग़ में ज्योति छा चुकी थी। अब वो उस मौक़े की तलाश में था जब ज्योति से वो अकेले में मिल सके।

पूरे बारातघर में एक हलचल थी। सभी ऐसे घुले मिले थे जैसे कि एक ही परिवार के हों। अक्सर ऐसी शादियों में ऐसा ही माहौल होता है, ख़ास कर जब दोनों तरफ़ का हलवाई एक ही हो। उस दिन हलवाई गरमा-गरम पकोड़े तल रहा था और ज्योति लड़की की बहन होने का अपना हक़ दिखाते हुए लाइन तोड़कर सबसे आगे आ गयी और अपनी प्लेट हलवाई के आगे करते हुए बोली-

"भईया जी पहले मुझे दे दो.."

राज की मामी भी वहीं खड़ी थी, उसने हँसते हुए कहा-

"ज्योति ऐसे कैसे तू लाइन तोड़कर आगे आ रही है!"

ज्योति- "आंटी लड़की की बहन हूँ, डॉली के लिए ले जा रही हूँ!"

मामी- "मैं भी लड़के की मामी हूँ, ये पकोड़े तेरे होने वाले जीजा राज के लिए ले जा रही हूँ!"

कि तभी राज वहाँ पहुँच गया, शायद पहले से ही वहीं-कहीं था। बस ज्योति के क़रीब आने का इंतजार कर रहा था। उसने मामी से प्लेट लेते हुए कहा-

"जाने दो मामी जी, हमारी होने वाली साली है और साली का हक़ तो घरवाली से ज़्यादा होता है।" कहते हुए उसने ज्योति को मुस्कुराकर देखा।

ज्योति राज की तीखी नज़रों को ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पायी। उसने नज़रें झुकाते हुए कहा-

"नहीं जीजा जी, पहले आप ले लीजिए.." इतना सुन मामी वहाँ से कहते हुए निकल गयी-
 
"वाह राज अब तो तू ससुराल वालों का हो गया है, अब तो तेरी साली ही तेरी सेवा करेगी!" राज ने हलवाई से प्लेट में गरम पकोड़े डलवाकर ज्योति को अलग ले जाकर प्लेट उसके आगे कर दी

"लो.. ले जाओ।" ज्योति ने शिष्टाचार का परिचय देते हुए कहा-

"नहीं जीजा जी, आप पहले ले लीजिये।"

राज- "ना, अब तो न खाते हम ये पकोड़े!"

ज्योति- "क्यों?"

राज- "-अब तो जलन हो रही है हमें तुम्हारी दीदी से?"

ज्योति ने हैरानी से पूछा, "क्यों?"

राज ने हँसते हुए कहा, "भाई डॉली को पकोड़े खिलाने के लिए इतनी सुंदर ज्योति है और हमें देखो बूढ़ी मामी खिला रही थी!" ज्योति ने राज की अठखेली को समझते हुए कहा-

"ओके जीजा जी, लीजिये हम आपको ऑफ़र कर देते हैं!" कहते हुए उसने प्लेट लेकर राज के आगे कर दी। राज को पकोड़ों से ज़्यादा ज्योति के सौन्दर्य में दिलचस्पी थी। एक ही पल में उसने ज्योति को ऊपर से नीचे तक नाप लिया था। उसने प्लेट को पीछे करते हुए कहा-

"ना! अब तो हम पकोड़े तब खाएँगे जब तुम हमें देने आयोगी। सामने ऊपर कोने वाला कमरा मेरा है!" कहकर मुस्कुरा कर चला गया। ज्योति को समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए! पर इतना तो वो जानती थी कि राज उसका होने वाला जीजा है तो उसे सेवा करवाने का हक़ भी है। ये सोच वो मुस्कुरायी और राज के कमरे की ओर चल पड़ी।

राज का कमरा पहली मंज़िल पर कोने में था। जहाँ कम ही लोग आते-जाते थे। ज्योति पकोड़ों की प्लेट लेकर राज के कमरे के पास पहुँच गयी। उसने जैसे ही दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक दी, अंदर से राज की आवाज़ आयी-

"अंदर आ जाओ.." ज्योति दरवाज़ा खोलकर अंदर आ गयी। ज्योति ने देखा कि वहाँ बिस्तर पर राज के कपड़े बिखरे हुए हैं और वहाँ शीशे के सामने राज शेव करने के लिए चेहरे पर साबुन लगा रहा था। राज के बदन पर कोई कपड़ा नहीं था। सिर्फ़ नीचे पायजामा पहन रखा था। ज्योति ने देखा राज का बदन बहुत सुडोल है। उसने नज़रें झुकाकर कहा-

"लीजिये आपके लिए पकोड़े लायी हूँ.." राज ने मुड़कर ज्योति को देखा। वाक़ई अनछुई कच्ची कली थी ज्योति। ज़ुबान की बेशक तेज़ रही हो पर एक दम मासूम। राज प्लेट पकड़ने के बहाने ज्योति का हाथ पकड़ लिया। ज्योति सिहर उठी। ये देख राज ने मुस्कुराते हुए पूछ लिया-

"अरे तुम तो डर गयीं, नाबालिग़ हो?" ज्योति को राज से ऐसे किसी भी सवाल की उम्मीद नहीं थी।

ज्योति- "नहीं! २३ की हूँ।" राज ने छेड़ते हुए कहा- "बिहेवियर तो १५ साल की लड़की की तरह कर रही हो, अच्छा चलो अपने हाथ से पकोड़े खिलाओ अपने जीजा जी को.."

ज्योति- "आप ख़ुद खा लीजिये!" हिचकिचाते हुए कहा। राज में ज्योति के हाथ अपने मुँह के पास ले जाते हुए कहा-

"क्यों डर लग रहा है कि मैं तुम्हारा हाथ खा जाऊँगा, सुबह तो खुलकर मेरे बदन पर हल्दी लगा रही थीं, तब घबराहट नहीं हो रही थी?" कहते हुए वो ज्योति का हाथ अपने होंटो के पास ले आया। ज्योति समझ गयी थी कि राज ने उसे ऐसी बात पर घेर लिया था जिसका जवाब उसके पास नहीं था। ज्योति ने सर झुकाकर अपने हाथ राज के होंटों के नज़दीक कर दिया जिससे वो पकोड़ा खा सके और राज ने मौक़े का फ़ायदा उठाकर ज्योति की दो उँगलियाँ ही अपने मुँह में डाल लीं और अपने होटों से लगभग चाट डालीं। ज्योति सिहर उठी। वो तो बस प्लेट वहाँ रखकर जाना चाहती थी कि राज ने उसकी कलाई पकड़ते हुए कहा-

"क्या हुआ? ऐसा क्या कर दिया जो भाग रही हो?"

ज्योति- "मुझे जाना है, देर हो रही है!" राज ने अपने मज़बूत हाथों से ज्योति को अपने क़रीब खींचते हुए कहा-

"क्यों मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा?" कहते हुए वो अपने गाल ज्योति के इतने क़रीब ले आया कि उसके चेहरे पर लगा साबुन ज्योति के गाल पर लग गया। ज्योति सँभल पाती कि राज ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा और ज्योति के कँधे पकड़कर उसे शीशे के सामने कर दिया। ज्योति ने देखा कि उसके चेहरे पर साबुन से दाढ़ी-मूँछ बन गयी है। ज्योति ने प्यार भरी शिकायत करते हुए अपना चेहरा पोंछना शुरू कर दिया-

"ये क्या किया जीजा जी!" राज ने ज्योति के दोनों हाथ पकड़ लिया-

"नहीं रुको, एक ही बार पोंछना! तुम्हें एक खेल दिखता हूँ। बस सीधी खड़ी रहो।" कहते हुए उसने अपने गाल से ज्योति के गाल पर साबुन लगाना शुरू कर दिया। पहले तो ज्योति ने हल्का विरोध किया-

"जीजा जी प्लीज़ मुझे जाने दीजिये.." राज ने ज्योति के दोनों हाथ जकड़ते हुए कहा, "कुछ कहा मैंने? कुछ ग़लत किया? नहीं ना। बस एक खेल खेल रहा हूँ, साबुन खेल। बचपन में हम सब खेला करते थे!" कहते हुए उसने अब अपना चेहरा ज्योति की गर्दन पर घूमना शुरू कर दिया। ज्योति को अब राज की ये छुवन अच्छी लग रही थी। उसका विरोध ढीला होता जा रहा था और राज की पकड़ मज़बूत। राज ने देखा कि ज्योति की आँख बंद ,है उसके वक्ष उसके सामने थे। उसने साहस करके धीरे से अपने हाथ ज्योति के एक

वक्ष पर रख दिया। राज का हाथ अपने वक्ष पर अचानक से पाकर ज्योति चौंक उठी। उसने लगभग राज को धक्का दे दिया-

"जीजा जी ये क्या कर रहे हैं आप, हटिये मुझे जाने दीजिये!" कहते हुए वो जाने को थी के राज जोर से हँस पड़ा।

"सॉरी! सॉरी! यार मुझे नहीं पता था तुम एक डरपोक, पिछड़ी हुई नाबालिग़ बच्ची हो। सॉरी!" ज्योति को ऐसा महसूस हुआ जैसे राज ने ये तीन शब्द कहकर उसे गाली दे दी है। उसके अहम को ठेस पहुँच गयी थी। उसने वहाँ पड़े टॉवेल से अपना मुँह पोंछते हुए कहा-

"ना मैं डरपोक हूँ, ना पिछड़ी हुई और ना ही नाबालिग़!" इसके तुरंत बाद जो राज ने जो किया ज्योति को उसकी उम्मीद ही नहीं थी। राज ने अपनी दोनों हथेलियाँ ज्योति के वक्षों पर रख दीं।
 
राज-"अभी साबित हो जायेगा!" कहते हुए उसने वैसे ही ज्योति को दीवार की तरफ़ धकेल दिया। ज्योति के बाल बिखर गये उसके साँसें बढ़ने लगीं थीं पर इस बार ज्योति ने राज का विरोध नहीं किया, वो ग़ुस्से में राज को देखे जा रही थी। ज्योति की साँसें ज़ोर-ज़ोर से चल रही थीं। जिससे उसके वक्ष ज़ोर-ज़ोर से हिल रहे थे और राज के हाथ उसके वक्षों से ताल-मेल बिठा रहे थे।

"वर्जिन हो?" राज का अगला प्रश्न भी ज्योति के अहम को एक और चोट पहुँचाने के लिए काफ़ी था। ज्योति के जवाब से पहले ही राज ने कह दिया-

"जानता हूँ, कभी किसी लड़के ने नहीं छुआ तुम्हें। इतने तने हुए आकर्षित वक्ष सिर्फ़ एक वर्जिन लड़की के ही हो सकते हैं। कभी इन्हें शीशे में देखा है? देखना ख़ुद महसूस करोगी कितने ख़ूबसूरत हैं, जिन्हें किसी की तारीफ़ की ज़रूरत है.." ज्योति तो राज की किसी भी बात का जवाब नहीं दे रही थी। वो बस राज को देखे जा रही थी। राज भी अब समझ चुका था कि चिड़िया जाल में फँस चुकी है। उसने ज्योति के चेहरे पर अपनी साँस बिखरते हुए कहा-

"किस कर लूँ?" ज्योति बस लम्बे-लम्बे साँस लेकर राज को घूरे जा रही थी। उसकी लटें माथे पर बिखर कर राज को आमंत्रण दे रही थीं कि राज ने हिम्मत दिखायी और वो अपने होंट जैसे ही ज्योति के गाल के नज़दीक लेकर गया, ज्योति ने राज को एक धक्का दिया और राज के चेहरे पर तीन चार चपत जड़ डाले। राज एकदम अवाक रह गया। उसे ज्योति से इस रव्विये की उम्मीद नहीं थी। एक पल के लिए वो डर भी गया। उसने देखा कि ज्योति अभी भी ग़ुस्से से साँसें फूला रही है। अब राज को लगा कि उसे ज्योति से माफ़ी माँग लेनी चाहिए,

पर उससे पहले ही ज्योति वहाँ से भाग गयी। राज की नज़रों में एक डर था कि कहीं ज्योति ये बात किसी को जाकर बता ना दे।

उधर ज्योति जैसे ही लड़की वालों की तरफ़ पहुँची, तो पाया वहाँ काफ़ी हलचल थी। हॉल में हर औरत अपनी सुविधा अनुसार जगह ढूँढ़ कर तैयार हो रही थी। ज़्यादातर सभी औरतें, चाची, ताई, मामियाँ, बुआ सभी तो पेटीकोट और ब्लाउज़ में ही थीं। किसी को किसी से शर्म नहीं थी कि अचानक कांता चाची ने उसके कँधे पर हाथ मर कर उसे चौंका दिया-

"कहाँ रह गयी थी तू? पकोड़े लेने गयी थी ना!" इतना सुनते ही ज्योति के सामने राज के संग उसकी मुलाक़ात में मंज़र उभर गये।

"वो मैं.. ज़रा अरेंजमेंट देख रही थी.." कहते हुए उसने देखा कि कांता चाची ने हाथ में एक छोटा-सा शीशा पकड़ा हुआ है और उसमें देखकर वो लिपस्टिक लगा रही है। उसने नीले रंग का ब्लाउज़ और पेटीकोट पहना हुआ था। जिसमें से चाची के बड़े-बड़े वक्ष ब्लाउज़ से दब रहे थे। अचानक चाची ने देखा कि ज्योति उसके वक्षों को बड़े ध्यान से देख रही है।

"क्या देख रही है?" चाची ने अपने होंटों से लिपस्टिक को दबाते हुए पूछा। ज्योति ने शरारत भरे स्वर में कहा-

"चाची चाचू आपके वक्षों की तारीफ़ करते हैं?" इतना सुन तो चाची का मुँह खुला का खुला रह गया-

"एक मिनट में यहाँ से चली जा नहीं तो थप्पड़ खा लेगी, चल जाकर तैयार हो, पता है न कीर्तन है। तेरी माँ को पता चल गया ना!" चाची की बात पूरी होने से पहले ही ज्योति ने चाची के गाल चूम लिये और उसके वक्षों की तरफ़ इशारा करते हुए बोली-

"यू आर हॉट चाची.." और चाची को आँख मार कर कमरे में चली गयी। अब तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती? चाची भी एक पल के लिए मुस्कुरायी और फिर से शीशे में देखकर अपने होटों पर लिपस्टिक लगाने लगी।

इधर ज्योति जब कमरे में आयी तो देखा कि उसकी माँ डॉली का बैग पैक कर रही थी।

"ये देख इस तरफ़ तेरी सारी साड़ियाँ रखी हैं और इस तरफ़ ये तेरे नाइट सूट्स।" और डॉली भी किसी छोटे बच्चे की तरह हाँ में सर हिलाकर सब ध्यान से देख रही थी कि ज्योति को देखकर उसकी माँ उस पर बरस पड़ी-

"आ गयीं महारानी। घर में इतना काम पड़ा है और इनके सैर सपाटे ही ख़त्म नहीं होते!"

ज्योति- "माँ मुझे आज तक समझ नहीं आया कि मुझे देखकर तुम मुझ पर बरस क्यों पड़ती हो?"

माँ- "क्योंकि तेरी हरकतें ऐसी हैं। यहाँ इतने काम पड़े हैं। मैं मेहमानों को देखूँ या डॉली को?"

ज्योति- "अच्छा आप जाकर मेहमानों को देखो मैं डॉली को देख लूँगी!"

माँ बड़बड़ाती हुई बाहर निकल गयी। ज्योति ने देखा कि डॉली के लिए काफ़ी शौपिंग हुई थी। हर ड्रेस पे टैग लगा हुआ था। डॉली ने पैकिंग करते हुए ज्योति से पूछ लिया-

"कहाँ ग़ायब थी तू?" ज्योति ने एक पल के लिए डॉली को चौंका दिया-

"जीजा जी से मिलने गयी थी!"

डॉली- "क्या? पर क्यों?"

ज्योति- "कमाल है जीजा हैं मेरे, मिल नहीं सकती?" डॉली के पास इस बात का जवाब नहीं था। ज्योति बैड पर दोनों हाथों का सहारा लेकर बैठ गयी।

"जानना नहीं कि उन्होंने क्या कहा?"

डॉली- "नहीं!"

ज्योति- "ठीक है तो फिर नहीं बताते कि जीजा जी ने क्या-क्या कहा? क्या-क्या किया?

डॉली- "क्या किया? मतलब क्या है तेरा?" ज्योति ने शरारत भरी मुस्कान बिखरते हुए कहा-

"जब तुझे जानना ही नहीं तो फिर जाने दे!" अब डॉली के मन में उत्सुकता बढ़ रही थी कि अचानक दरवाज़ा, खुला चाची ने लगभग डॉली को खींचते हुए कहा-

"जल्दी चल बाहर, तेरी सास आयी.." कहते हुए वो डॉली को बाहर ले गयी।

ज्योति वहाँ पड़े डॉली के कपड़ों को देख रही थी। उसने डॉली की ब्रा उठा ली, जो गुलाबी रंग की थी। मानो वो अब कल्पना कर रही थी कि राज इस ब्रा को देखकर डॉली के वक्षों की तारीफ़ करेगा। अचानक वो ब्रा लेकर बाथरूम में घुस गयी। ख़ुद को शीशे में देखने लगी। उसके कानों में अभी भी राज की आवाज़ पड़ रही थी, 'तुमने कभी अपने वक्षों को ग़ौर से देखा है? बहुत सुंदर हैं..' राज की इन बातों को याद कर न जाने उसे क्या हुआ उसने फट से अपने ऊपर से अपनी कुर्ती उतार दी। उसने काले रंग की ब्रा पहनी हई थी। अब वो ध्यान से अपनी ब्रा कर हाथ फेर कर अपने वक्षों को देख रही थी। उसके कानों में राज का स्वर बार-बार गूँज रहा था। वो अपनी ब्रा उतारकर अपने वक्षों को देखना चाहती थी, पर ये उसे क्या हुआ आज उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी, बल्कि मन में एक गुदगुदी-

सी जो उसे ऐसा करने से रोक रही थी। फिर भी उसने हिम्मत की और अपनी ब्रा उतार कर फेंक दी और ख़ुद ही अपने वक्षों को अपने हाथ से ढँक लिया। ये पहली बार तो नहीं था कि वो अपने वक्षों को देख रही थी। पर आज वो अपने वक्षों को राज की नज़रों से देखने वाली थी। उसने धीरे-धीरे अपने हाथ अपने वक्षों से खिसका दिये। सही था राज, उसने बिना देखे ही अंदाज़ा लगा लिया था कि उसके वक्ष एक दम तने हुए हैं। हाँ वो वर्जिन थी ये भी वो समझ गया था। न जाने आज उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि वो अपने वक्षों को सहलाये। वो वैसा ही करने लगी। उसे ये क्रिया अच्छी लग रही थी। अचानक उसने डॉली की पिंक ब्रा उठायी और अपने वक्षों पर लगाकर ऐसे महसूस करने लगी, मानो यही एक तार हो जो राज की छुवन को वक्षों से जोड़ेगी। पर वो वक्ष डॉली के होंगे। अभी वो इन अजीब से ख़यालों में गुम थी कि अचानक उसके पीछे बाथरूम का दरवाज़ा खुल गया। पीछे डॉली खड़ी थी। डॉली ये नज़ारा देखकर हैरान थी कि ज्योति निर्वस्त्र अपने वक्षों को सहला रही थी और उसके हाथ उसकी ब्रा थी। डॉली को तो समझ ही नहीं आया कि वो ज्योति से सवाल भी क्या पूछे-

"छी! क्या कर रही है तू, और ये मेरी ब्रा?"

ज्योति- "नहीं कुछ नहीं डॉली, वो मैं तेरी ब्रा देख रही थी कि मुझ पर कैसी लगेगी!" डॉली ने ज्योति के हाथ से अपनी ब्रा छीनते हुए कहा- "तेरा न इलाज करवाने वाला हो गया है। जल्दी तैयार होकर आ, वो लोग आ गये हैं। कीर्तन शुरू होने वाला है।" कहते हुए दरवाज़ा बंद करके चली गयी। अब ज्योति बेबाक होकर अपने वक्षों को शीशे में देख रही थी। मानो उसे उन पर गर्व हो। उसे राज की तारीफ़ पर यक़ीन हो चला था। पर वो ये क्या सोच रही थी। राज उसका होने वाला जीजा था, उसकी बहन डॉली का होने वाला पति। उसने जल्दी फ़व्वारा खोला और उसके नीचे खड़ी हो गयी। अपने बदन पर ख़ास कर वक्षों पर हाथ से मल-मलकर पानी साफ़ किया, जैसे कि वो राज के ख़यालों को मिटा देना चाहती हो।
 
उस शाम ग्राउंड में टेंट लगाकर माता का कीर्तन था। कीर्तन गाने के लिए अरविंदर सिंह की पार्टी आयी हुई थी। बेशक मेहमान कम थे, सिर्फ़ लड़के वाले और लड़की वाले ही थे। पर अरविंदर सिंह ने अपने परिचित अंदाज़ से समा बाँध दिया था। पूरे कीर्तन में राज की नज़र ज्योति की नज़रों से मिलने को बेताब थी पर ज्योति ने उसकी तरफ़ नज़र ही नहीं की और इस बात को राज ने ईगो पर ले लिया था। कीर्तन ख़त्म होने के बाद आरती हुई, जहाँ परम्परा अनुसार डॉली और राज द्वारा आरती करवायी जा रही थी। इस पूरे फ़ंक्शन को प्रिय अपने कैमरे में क़ैद कर रही थी। वो शायद कैमरे के लेंस से देख पा

रही थी कि राज की नज़र ज्योति पर है। इसीलिए तो जब आरती ख़त्म हुई और राज ज्योति से बात करना चाहता था, रागिनी ने राज के कँधे पर हाथ रखकर उसे मुस्कुराते हुए कहा-

"राज प्लीज़ इस वक़्त मुझे तुम्हारा थोड़ा टाइम चाहिए, डॉली के साथ थोड़ी फ़ोटो खिंचवा लो.." राज ने भी मुस्कुराकर हामी भर दी और रागिनी उन दोनों को लेकर बाहर गार्डेन में चली गयी जहाँ राज और डॉली का फ़ोटो शूट होने लगा। बेशक राज रागिनी के कहने पर हर पोज़ दे रहा था, उसकी आँखें डॉली पर थीं पर मन की आँखों से वो ज्योति को ही देख रहा था। उस फ़ोटो शूट में सभी मौजूद थे, हर कोई अपने स्टाइल के पोज़ बता रहा था दोनों को।

ये सारा घटनाक्रम ज्योति कुणाल और जय को केरल के पुलिस स्टेशन में बता रही थी। कुणाल ने देखा कि इन लम्हों को याद करके ज्योति परेशान हो रही थी। ज्योति ने कहा-

"मैं समझ गयी थी कि मैंने राज की शिकायत किसी से नहीं लगायी तो उसका हौसला बढ़ गया था। अब वो रह-रहकर मुझसे अकेले में मिलने का मौक़ा तलाश करने लगा। जब कभी मौक़ा मिलता मुझे अकेले में पकड़ लेता। कभी मुझे हर जगह छूने की इजाज़त माँगता तो कभी किस करने की। इतना कि मैं डरने लगी थी।"

जय- "ये बात तुमने घर में किसी को क्यों नहीं बतायी?"

ज्योति- "क्या बताती? कि जीजा जी मेरे साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं? बवाल हो जाता। शादी सर पे थी। कुछ भी होता, मुझे ग़लत और राज को सही ठहराकर मुझे चुप करवा दिया जाता। बस मैंने तय कर लिया था कि मैं अपने तरीक़े से इस बात को सोल्व करूँगी।"

कुणाल- "तो फिर क्या किया तुमने?"

ज्योति- "मैं समझ चुकी थी कि राज मुझे पाने के लिए उतावला हो रहा है और अगर मैं राज को ख़ुद के बजाए डॉली के नज़दीक ले आऊँ तो शायद राज मुझे भूल जाये और मैं भी उस घटना को एक हादसा समझकर भूला दूँगी। मैंने तय कर लिया कि किसी भी तरह मैं डॉली को राज के साथ अकेले में मिलने भेज दूँगी।"

उसके बाद जो ज्योति ने बताया वो किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह जय और कुणाल के सामने घूमने लगा। उस रात कोकटेल पार्टी और लेडीस संगीत का कार्यक्रम एक साथ रखा गया था। नीचे हॉल में औरतें बॉलीवुड के गानों पर थिरक रही थीं तो वहीं छत पर जेंट्स के लिए बार बन चुका था। ज्योति ने देखा कि डॉली इन औरतों के बीच बोर हो रही है। वो डॉली को चुपचाप छत पर ले आयी। उसने देखा दूर मर्द शराब पी रहे हैं, उनके बीच में ही कहीं राज भी होगा। ज्योति डॉली को साइड में ले गयी। ये देख डॉली ने ज्योति से पूछ लिया-

"तू मुझे यहाँ क्यों ले आयी है?"

ज्योति- "जीजू से मिलवाने.."

डॉली- "क्यों?"

ज्योति- "मिल के देख, कैसा है तेरा निर्णय, कितना सही है। मैं तो कहती हूँ आज ही अपनी वर्जिनिटी..." ज्योति इतना ही कह पायी थी कि डॉली ने फिर से अपने कानों पर हाथ रख लिया।

"छी.. फिर से मत शुरू हो जाना नहीं सुननी मुझे कोई गंदी बात.." डॉली के कान से उँगली हटाते हुए ज्योति ने कहा, "क्या छी? तो शादी क्यों कर रही है? अगर सेक्स नहीं करेगी तो बच्चे कैसे पैदा होंगे..?"

डॉली- " हाँ तो ये बातें कहने की थोड़े न होती हैं!" शर्माते हुए उसने कहा।

ज्योति- "हाय मेरी बुलबुल.. आम चूसना भी है पर उसके रस से हाथ गंदे भी न हों!"

डॉली- "मतलब?"

ज्योति- "मैं ना जीजू को हल्दी लगाने गयी थी... यार क्या बॉडी है उसकी! एक दम टाइट मसल्स। सच्ची पता है मैंने तो उसका पायजामा भी उतरवा दिया.."

डॉली- "पता चला मुझे, जो बेवक़ूफ़ी करके आयी तू वहाँ.. जा मैंने बात नहीं करनी तुझसे.." कहकर आधे मन से जाने को थी कि ज्योति ने उसे रोकते हुए कहा-

"सुनना तो सब चाहती है तू है ना?.. अच्छा सुन.. पता है मैं तो बस ये देखना चाहती थी कि मेरी बहन की चुनमुनियाँ में प्रवेश करने वाले बाबूराव का आकार क्या होगा। सच्ची मैंने न जब राज की जाँघों पर हल्दी लगायी न... तो उसके जाँघिये में हरकत हुई! सच्च्ची!.. मैंने कहा नॉक-नॉक... उसने मुझसे पूछा कौन? मैंने कहा साली... एक बार सूरत तो दिखायो बाबूराव.. पता तो चले कि मेरी बहन की क़िस्मत में क्या है?" ज्योति के मुँह से ऐसी बातें सुनकर डॉली बहुत हैरान थी।

डॉली- "हे राम... कहाँ से सीखती है तू ये सब बातें"

ज्योति- "सब नेट पे है.. ये देख.." कहते हुए ज्योति ने अपने मोबाइल पर एक पोर्न क्लिप चला दी। ये देख तो डॉली बस बेहोश ही होने वाली थी। उसने अपनी आँख बंद कर ली और वापस जाने लगी कि ज्योति ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा-

"अच्छा सुन.. जीजू से मिलना है अकेले में?

डॉली- "अकेले में? क्यों? क्या बकवास किये जा रही है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा!"

ज्योति- "चल स्ट्रैट टॉक... हाँ? सेक्स करना है जीजू के साथ?"

डॉली- "छी...मैं जा रही हूँ.. तेरी तरह अपना दिमाग़ ख़राब नहीं कर सकती मैं!" कहते हुए डॉली निकल ही रही थी कि ज्योति ने उसका रास्ता रोक लिया।

ज्योति- "हर्ज ही क्या है? जो कल करना है सो आज क्यों नहीं!..पति है तेरा.."

डॉली- "अभी हुआ नहीं!"

ज्योति- "तो तुझे डाउट है कि कल तुझसे शादी नहीं करेगा?"

डॉली- "नहीं...मतलब हाँ.. मतलब.. नहीं.. ज्योति शादी से पहले ये सब ठीक नहीं है!"

ज्योति- "इसका मज़ा ही कुछ और होता है डॉली... सच्ची बोल रही हूँ याद करेगी ज़िन्दगी भर मुझे..रुक...." डॉली कुछ बोल पाती कि उसने देखा एक लड़का सोनू जो उनकी बुआ का बेटा था, एक ट्रे में बर्फ़, सोडा और पानी लेकर जा रहा है। उसे देख ज्योति ने सीटी मारी। सोनू मुड़ा और ज्योति ने उसे इशारे से उसे अपनी और बुलवाया।

सोनू- "हाँ ज्योति दीदी कुछ चाहिए?"

ज्योति- "ये सब कहाँ लेके जा रहा है?"

सोनू- "वो वहाँ दूसरी तरफ़ सभी अंकल लोग बैठे हैं न!"

ज्योति- "सुन सोनू एक पऊआ मिलेगा?"

सोनू- "पऊआ नहीं, अधिया है.. ये मेरी बायीं जेब में, निकल लो!" डॉली तो शर्म से पानी-पानी हो रही थी कि ज्योति कैसे किसी गली के गुंडे की तरह सीटी मारकर उसके कज़न से शराब माँग रही थी।

ज्योति ने सोनू की जेब से एक अधिया निकला, पानी की एक बोतल और दो गिलास ट्रे से उठाये और सोनू को जाने के लिए कहा।

डॉली- "क्या कर रही है तू? वो सबको बता देगा!" ज्योति ने फिर सीटी मारी सोनू पलटा-

ज्योति- "ऐ सोनू... ये बात किसी को बताना नहीं!" सोनू भी स्मार्ट था, "मैं आपको जानता ही नहीं!.." कहकर हँसता हुआ चला गया।

ज्योति- "ये हैं आज की जैनरेशन.. चल आ जा.." कहते हुए डॉली का हाथ पकड़ते हुए किसी अँधेरे कोने में ले गयी। उसने दो गिलास में दो पैग बनाये, पानी डाला। डॉली देख रही थी कि ज्योति को तो पैग बनाने भी आते हैं। ज्योति ने डॉली को उसका गिलास पकड़ाते हुए कहा-

"गटक जा.."

डॉली- "नहीं, मैं नहीं पीती!.. मतलब कभी पी नहीं.. मुझसे नहीं पी जायेगी सच्ची ज्योति.."

ज्योति- "ओके चल खड़ी हो अभी पापा से जा के बोल दे कि तू ये शादी नहीं कर रही, चल खड़ी हो!" डॉली ज्योति की इस हरकत पर हैरान थी कि शराब न पीने से उसकी शादी का क्या तअल्लुक़ है? डॉली की आँख में सवाल पढ़ते हुए ज्योति ने कहा-

"शादी के बाद जीजा जी तेरे साथ सेक्स करेंगे और तू उन्हें यही कहने वाली है न? ना ना.. जी मैंने ये सब पहले नहीं किया... मुझसे नहीं हो पायेगा ...सच्ची!" मुँह बनाते हुए वो डॉली की नक़ल उतार रही थी। डॉली जानती थी कि ज्योति उसे पिलाये बिना मानेगी नहीं। उसने एक हाथ से अपना नाक पकड़ा और किसी कड़वी दवा की तरह उसने सारा गिलास एक ही घूँट में ख़ाली कर दिया। ज्योति के चेहरे पर एक जीत भरी मुस्कान थी।
 
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