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Erotica वासना का भंवर

"मैं उस रात बहुत नशे में था। जब मेरी नींद खुली तो डॉली कमरे में नहीं थी। मैं उसे ढूँढ़ने के लिए बहार निकला तो पाया कि बग़ल वाला रूम जहाँ ज्योति ठहरी हुई थी, उसका दरवाज़ा खुला था। मैं उस कमरे में गया तो कमरे की लाइट्स बंद थीं। मैंने हल्की-सी रौशनी में देखा कि डॉली की लाश बैड पर पड़ी थी। उसके सीने में चक्कू घुसा हुआ था। मैंने जैसे वो चक्कू उसके सीने से निकला कि मेरे सर पर एक दो वार हुए। पता नहीं कौन था? उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं, आँख खुली तो हॉस्पिटल में था।" कहते हुए वो फिर से रो दिया। कुणाल आखों में सवाल लिये जय को देखे जा रहा था। जय समझ गया कि अब उसकी बारी थी। उसने राज से कहा-

"डॉली ज्योति के कमरे में क्या करने गयी थी?"

राज- "कहा ना मैं नहीं जानता, मैं तो रात भर से नशे में था!"

कुणाल- "क्या लगता है राज? कौन हो सकता है? जो तुम्हारी और डॉली की जान का दुशमन...?"

कुणाल की बात काटते हुए राज ने कहा-

"ज्योति! पागल थी वो मेरे लिए... वो मुझे अपना ग़ुलाम बनाके रखना चाहती थी। वो कुछ भी कर सकती थी। किसी को भी रास्ते से हटा सकती थी चाहे वो उसकी बहन डॉली ही क्यों ना हो। उसने मुझसे कहा भी था कि अगर मैंने उसकी ग़ुलामी नहीं की तो वो डॉली को मार देगी... उसी ने मारा है उसे... उसी ने!" कहते हुए वो रो पड़ा। जय और कुणाल अब आँखों ही आँखों में बातें कर रहे थे। एक तरफ़ ज्योति राज पर डॉली के क़त्ल का इल्ज़ाम लगा रही थी तो दूसरी तरफ़ अब राज ज्योति पर। गुथी सुलझने की बजाये और उलझती जा रही थी।

कुणाल- "देखो राज जब तक तुम हमें अपनी, डॉली और ज्योति की कहानी शुरू से नहीं सुनाओगे! ना तो हम तुम्हारी किसी बात का यक़ीन कर पायेंगे न ही तुम्हारी मदद। सो बेहतर होगा कि तुम हमें शुरू से सब कुछ सच-सच बताओ। एक-एक बात जो तुम्हारी बेगुनाही साबित कर सके!"

जय ने तब राज को वो कहानी सुनायी जो ज्योति ने उन्हें सुनायी थी। राज जय के मुँह से अपनी और ज्योति की कहानी सुनकर दंग था। एक भी शब्द ना ग़लत था ना झूठ। जय और कुणाल को ये तो समझ आ गया था कि ज्योति ने जो भी घटना बारात घर की बतायी थी वो बात सच थी। पर बारात घर के बाद क्या हुआ वो राज के मुँह से जानने को इच्छुक थे। जय ने कहा-

"देखो राज मानेसर के फ़ार्म हाउस में जो कुछ भी हुआ ज्योति ने हमें सब सच बता दिया है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि उसके बाद क्या हुआ। जब तुम डॉली की डोली लेकर

वहाँ से चले गये।" जय ने देखा कि राज आगे की बात बताने में हिचकिचा रहा था। जय ने उसे चेतावनी दे डाली कि अगर उसने कुछ भी झूठ बताया तो डॉली के क़त्ल का शक उस पर भी जा सकता है। राज झल्ला उठा।

"मुझे शक है... शक नहीं यक़ीन है कि डॉली का मर्डर ज्योति ने ही किया है.. हाँ।"

जय- "अगर तुम्हें यक़ीन है तो मुझे बताओ फ़ार्म हाउस से जाने के बाद क्या हुआ था?" राज समझ चुका था कि ज्योति उसके और अपने रिश्ते के बारे में पुलिस को सब बता चुकी है। लिहाज़ा उसने भी आगे की बात बताने में कोई शर्म नहीं की। उसने बताना शुरू किया और जय की आँखों के सामने राज की कहानी किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह घूमने लगी।

राज डॉली को अपने घर मेरठ ले आया था और वो अपने घर आकर वो कुछ ज़्यादा व्यस्त हो गया था। रिश्तेदारों के आमंत्रण की फ़ेरिस्त इतनी लम्बी थी कि कभी-कभी तो दिन में तीन बार उसका और डॉली का रिश्तेदारों के घर आना-जाना हो रहा था। उसे डॉली के साथ अकेले में वक़्त बिताने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था। जैसे एक ड्यूटी थी सुबह उठो, देखो आज किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है, फिर देर रात को ओवरइटिंग करके घर आकर सो जाओ और इसी भाग दौड़ में उसके दिमाग़ से ज्योति भी निकल गयी थी। और फिर आख़िरकार वो दिन आ गया जब डॉली और राज को हनीमून के लिए निकलना था। वो केरल जा रहे थे। बेशक राज और डॉली के बीच अभी शारीरिक सम्बन्ध पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था, पर दोनों के बीचे एक इमोशनल बोन्डिंग बन चुकी थी। डॉली राज को ख़ूब समझने लगी थी, इसीलिए तो उसने राज के कहे बिना उसका सारा सामान पैक कर दिया था और राज ने पाया कि उसके ज़रूरत की हर चीज़ उसके बैग में थी। ख़ुश था राज कि डॉली उसे अच्छी तरह समझने लगी थी। हाँ अब सब ठीक हो जायेगा। यही सोच उस दिन दोनों ने अपने माता-पिता से आशीर्वाद लिया और दिल्ली एयरपोर्ट के लिए टैक्सी पकड़कर रवाना होने लगे। राज की मम्मी रह-रहकर डॉली को हिदायत दिये जा रही थी-

"डॉली केरल जाकर अपना ख़याल रखना, खाने पीने में लापरवाई मत बरतना, राज खाने पीने में लापरवाह है, फ़ोन करती रहना!" और डॉली हर बात पर हाँ किये जा रही थी कि राज के पापा ने टोकते हुए कहा-

"अब जाने भी दो उनकी फ़्लाइट छूट जायेगी.. जा बेटा माँ की नसीहत तो ज़िन्दगी भर ख़त्म नहीं होती!" राज ने अपनी घड़ी देखी, वाक़ई देर हो रही थी। उसने मम्मी-पापा से आशीर्वाद लिया और डॉली को लेकर टैक्सी मैं बैठ रवाना हो गया।

"ये मिस्टर राज शर्मा और मिसेस डॉली शर्मा के लिए आख़िरी कॉल है। उनसे अनुरोध है कि वो जल्द से जल्द अपना सिक्यूरिटी चेक-इन काउंटर पर, नयी दिल्ली से केरल जाने वाली विमान संख्या E219 के लिए गेट न. 23A की तरफ़ प्रस्थान करें।" दिल्ली हवाई अड्डे पर घोषणा हो रही थी।
 
दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुँचकर राज ने जल्दी से टैक्सी से सामन उतारा, उसने पाया देर हो चुकी है। उसने दो बैग ख़ुद पकड़े और एक बैग डॉली को पकड़ा दिया।

"भागो डॉली.. भागो.. जल्दी, वरना गया हमारा हनीमून, पानी में और तेज़ भागो।"

जैसे-तैसे दोनों दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल 1D पर शतुरमुर्ग की तरह भाग रहे थे, पर वो जैसे ही सिक्यूरिटी गेट पर पहुँचे, वहाँ खड़े सी.आर.पी.एफ़. के जवान ने उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया।

"प्लीज़ जाने दो... हमें जाने दो। हमारा हनीमून है। सब गड़बड़ हो जाएगा। प्लीज़... प्लीज़.." डॉली उस गार्ड से गिड़गिड़ा के विनती कर रही थी, पर बेचारा वो भी लाचार था। उनकी फ़्लाइट अब तक रन-वे पर चलनी शुरू हो गयी थी। वो बेचारा अदना-सा गार्ड... हवाई अड्डे का प्रोटोकॉल तो नहीं तोड़ सकता था। पसीने से लतपत वो दोनों वहीं... सिक्यूरिटी गेट पर ही गिर से पड़े, पर फिर अपने आपको सँभालते हुए और सामान को घसीटते हुए, जाकर प्रतीक्षा लाउंज में बैठ गये। वो नहीं जानते थे उन पर किसी और की भी नज़र थी। जो उनका साये की तरह पीछा कर रही थी।

पर अब राज और डॉली क्या करते। ख़ैर... कुछ मिनटों बाद राज उठा और डॉली से बोला, "तुम यहीं इंतज़ार करो, मैं देखता हूँ केरल की अगली फ़्लाइट कब की मिल सकती है। चिंता ना करो, हो जाएगा..आता हूँ देखकर।" और कहकर तत्काल बुकिंग काउंटर की तरफ़ बढ़ गया और वो जैसे ही कुछ क़दम बढ़ा, दायें मुड़ा, उसे किसी ने अंदर खींच लिया। उस तरफ़ पुरुष और महिला प्रसाधन था। उसे दीवार पर दबा किसी ने उसे चूमना शुरू कर दिया।

"अरे-अरे कौन हो... कौन हो तुम... और ये क्या बतमीज़ी है। राज झल्लाया।

"अच्छा... अब मैं... कौन हो गयी। अब दूँ मैं अपना परिचय। बोलो... दूँ?" और वो उससे दूर हटी। राज देखकर चौंक गया वो ज्योति थी।

“ज्योति ...ये क्या है? और तुम यहाँ कैसे? तुम्हें तो मेरठ में होना चाहिए था अभी। तुम्हें सब वहाँ ढूँढ़ रहे होंगे। तुम यहाँ एयरपोर्ट पर क्या कर रही हो।" राज ने ज्योति से कहा।

"घर वालों के मुताबिक़ मैं इस वक़्त अपनी सहेली सीमा के घर बंगलौर में हूँ। वैसे सच्चाई ये है कि मैं केरल की अगली फ़्लाइट से.... तुम्हारे पीछे-पीछे आ रही थी जी... जा... जी...। अब तुम चीज़ ही ऐसी हो। मुझ से रहा ही नहीं गया। तुम्हारे बिना

15 दिन कैसे काटती। चलो 15 दिन बाद तो तुम आ ही जाते, पर तब तक कैसे रहती।" ज्योति ने कहा। राज को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि ज्योति इस तरह उस एयरपोर्ट पर आ जायेगी।

"यार... तुम बिल्कुल पागल हो। क्या ज़रूरत थी यहाँ आने की.. मतलब मैं १५ दिन बाद वापस आ रहा था न! पर तुमसे इतना भी सब्र नहीं हुआ।" राज ज्योति पर ग़ुस्सा हो रहा था।

ज्योति- "जीजा जी... अब आप ऐसा करोगे हमारे साथ। बीवी क्या मिली ... हमें भूल जाओगे।"

राज- "ज्योति... समझो बात को। तुमने जैसा चाहा मैंने किया था न फिर ये सब क्यूँ।" राज गिड़गिड़ाने की कगार पर था कि राज की अचानक आवाज़ बंद हो गयी उसके चेहरे पर दर्द के भाव उभर रहे थे। उसने दर्द भरी नज़रों से नीचे देखकर कहा, "छोड़ो ज्योति दर्द हो रही है.." ज्योति ने मट्ठी में राज का ज़िप वाला हिस्सा ज़ोर से दबा रखा था। उसकी आँख में हल्का-सा ग़ुस्सा था, "मुझे सोचकर भी... कोफ़्त हो रही थी कि तुम दीदी के साथ मज़े करोगे और मेरी रातें वहाँ मेरठ में काली होंगी। एक काम करो इसे यहाँ छोड़ जाओ।" अपनी मट्ठी की ओर इशारा करते हुए कहा। जैसे-तैसे राज ने उसकी मट्ठी ढीली की और चैन की साँस लेने लगा। ज्योति ने मट्ठी ढीली करते हुए अपना फ़ैसला सुना दिया, "जीजा जी सुन लो... मैं तुम लोगों के पीछे-पीछे केरल आ रही हूँ। तुम्हारे होटल में ही कमरा लूँगी और हर रात... या हर बार जब तुम दीदी की लोगे... तुम्हें मेरी भी लेनी पड़ेगी। राज झल्लाकर बोला, "यह क्या लैंग्वेज इस्तेमाल कर रही हो लूँगा?.. लेनी पड़ेगी?..छी!" ज्योति ने उससे छेड़ते हुए कहा, "चलो सभ्य भाषा में समझा देती हूँ.. जब भी आप दीदी के संग सम्भोग करेंगे आपको मेरे साथ भी करना होगा. .क्लियर है यह अंग्रेज़ी में भी समझाऊँ"। राज डॉली को देख रहा था जो ग़ज़ब की थी पर बला थी.. पर उसे साथ ले जाने में ख़तरा था।

"क्या बकवास कर रही हो ज्योति। तुम जानती भी हो क्या कह रही हो..." पर उसने देखे ज्योति कॉन्फ़िडेंस के साथ उसे देखे जा रही थी। उसे समझाना नामुमकिन था।

"जैसा मैं कह रही हूँ... बस वैसा करो। तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए। दुनिया भर के सारे मर्द जो बात कहावत बोलकर ही ख़ुश होते रहते हैं.. तुम्हें तो जीने का मौक़ा मिल रहा है। घरवाली के साथ साली फ़्री। वो भी आधी-आधी नहीं...पूरी-पूरी। राज को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वो बड़ी कशमकश में था। वो जानता था कि वो ज्योति को किसी तरह भी नहीं टाल सकता था। शायद अब उसे ज्योति के डर की आदत पड़ती जा रही थी।

ज्योति ने उसका ध्यान तोड़ते हुए कहा- "आप एक काम करो। सबसे पहले तो आप इंडिगो की 7:30 बजे वाली फ़्लाइट से अपना और दीदी का टिकट करवाओ। अब क्योंकि मेरी फ़्लाइट आप लोगों से जल्दी है, मैं वहाँ होटल पहुँचकर अपना कमरा आप लोगों के बग़ल में ले लूँगी और फिर आपके व्हट्स अप्प पर मैसेज कर, आगे क्या करना है बताती रहूँगी। जाओ पहले जाकर टिकट लो। मिलते हैं...केरल में।

राज... परेशान सा..तत्काल टिकट काउंटर पर पहुँचा और जैसा ज्योति ने कहा था, उसी इंडिगो की फ़्लाइट में दो टिकट बुक करा, डॉली के पास पहुँच गया। डॉली... थकी हुई थी। शादी के चक्कर में वो 34 दिनों से सोयी नहीं थी। इसलिये राज के जाते ही... लाउंज की आरामदायक गद्देनुमा कुर्सी पर लेटते ही सो गयी थी। राज ने ही पहुँचकर उसे उठाया, "डॉली... डॉली...उठो... टिकट हो गयी है। अब 2 घंटे बाद है फ़्लाइट। आराम करना चाहो तो थोड़ा और कर लो। डेढ़ घंटे बाद बोर्डिंग है।" और ये कहकर राज भी बग़ल वाली कुर्सी पर लेट गया। पर उसे नींद नहीं आ रही थी, उसकी तो नींद उड़ गयी थी। ज्योति ने उसकी नींद के परखचे उड़ा दिये थे।
 
राज और डॉली भी अपनी फ़्लाइट पकड़ आख़िरकार केरल पहुँच ही गये। अद्भुत नज़ारा था केरल का। रोमांटिक हवा, हर तरफ़ जवान जोड़े बस एक-दूसरे में खोये हुए थे। ऐसे ही केरल को हनीमून शहर नहीं कहा जाता। टैक्सी में बैठी डॉली नज़रें चुराकर राज को देख लेती, जो खिड़की के बहार अपने ख़यालों में खोया हुआ था। हवा से उसकी शर्ट फड़फड़ा रही थी, उसकी छाती के हल्के-हल्के बाल डॉली को उसकी आने वाली पहली रात के सपने बुनने के लिए मजबूर कर रही थी। डॉली अपने ही ख़यालों से गुदगुदा उठी। बस कुछ पलों की तो देरी है डॉली राज के इस सुडोल शरीर की गर्मी महसूस कर रही होगी, ख़ुद को ही समझाते हुए मन ही मन मुस्कुरा दी।

रात 9 बजे के क़रीब उन्होंने चेक-इन किया। अच्छा स्वागत हुआ था उनका उस तलसानियाँ होटल में। वो केरल पहली बार आयी थी इस चमचमाते होटल में। वो बस आराम कुर्सी पर बैठकर कमरे में जाने का इंतज़ार कर रही थी और राज एक ज़िम्मेदार पति की तरह बाक़ी की औपचारिकता पूरी कर रहा था।

डॉली की नज़रें राज से हट नहीं रहीं थी। उसका उतावलापन उसके चेहरे पर साफ़ छलक रहा था।

उसका ध्यान तब टूटा जब वेटर ने उसे वेलकम ड्रिंक ला कर दिया। तभी राज ने आवाज़ लगायी, "चलो डॉली रूम की चाभी मिल गयी है।" राज की आवाज़ सुनते ही डॉली किसी चाभी वाली गुड़िया की तरह उसके पीछे चल दी। क्या राज उसे कमरे में घुसते ही दबोच लेगा? या खाने का आर्डर करेगा? लिफ़्ट में खड़े-खड़े उसके मन में ऐसे कई सवाल एक साथ दौड़ गये और डॉली ख़ुद ही शर्मा गयी। आज तक किसी मर्द के प्रति ऐसे ख़याल नहीं आये थे उसके मन में,

पर इसमें ग़लत ही क्या है.. आख़िर राज पति है उसका। बस उसने सोच लिया जैसा राज चाहेगा वो वैसा ही करेगी। वो तो ख़ुद को राज को समर्पित करके जीवन का असीम सुख प्राप्त करना चाहती है। आख़िर वो भी तो यही सब कुछ सोच रहा होगा

। आख़िर इतनी सुंदर पत्नी है उसकी। पर दूसरी तरफ़ राज के मन में कुछ और ही चल रहा था। कमरे में जाते ही राज की घबराहट बढ़ने लगी। यहीं-कहीं बग़ल के कमरे में ज्योति होगी कि डॉली ने उसका ध्यान तोड़ा-

"आपको नहाना है राज?" राज ने देखा डॉली ख़ुद को शीशे में निहारकर अपने गहने उतार रही थी। इसी दौरान उसकी साड़ी का पल्लू ख़ुद-बा-ख़ुद उसकी पीठ से खिसक गया, जिसे डॉली ने ठीक करने की कोशिश नहीं की। शायद वो चाहती थी कि राज उसकी ख़ूबसूरती के उतार-चढ़ाव को देखकर उत्तेजना के सफ़र पर चल पड़े और हुआ भी ऐसा, डॉली के गोये बदन के उतार-चढ़ाव को देखकर राज एक पल के लिए ज्योति को भूल गया। इतनी सुंदर थी डॉली। मोर पंखी साड़ी, डीप नैक वाला छोटा-सा ब्लाउज़। जो उसकी पतली लम्बी कमर पर नाम भर के लिए था। उसे डॉली को इतने क़रीब से देखने का मौक़ा कई दिनों बाद मिला था। वो कुछ तय कर पाता कि डॉली ने अपनी साड़ी उतार दी।

अब वो सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज़ में थी। उसने झुक कर अपनी अटेची खोली और उसमें से अपनी नाइट ड्रेस निकलने लगी। झुकते ही डॉली के गोरे वक्ष बहार झाँकने लगे, राज ने देखा कि डॉली के वक्ष बाहर आने को उतारू हैं, उसे निमंत्रण दे रहे हैं कि अचानक डॉली को इस बात का एहसास हुआ, उसने अपने हाथ से अपनी छाती को ढँक लिया और अपनी नाइट ड्रेस निकाल ली। उसके हाथ में अंडर गारमेंट्स नहीं थे। वो नहाकर सिर्फ़ नाइट ड्रेस ही पहनने वाली थी। राज की नज़रों ने एक पल में डॉली का दिमाग़ पढ़ लिया था और डॉली भी समझ गयी थी कि राज क्या सोच रहा था। उसने मुस्कुराकर इतना कहा, "मैं बस दो मिनट मैं आयी" और कहकर बाथरूम की लाइट जलाकर अंदर चली गयी।
 
राज ने देखा डीप बैक ब्लाउज़ में उसका बदन और ख़ूबसूरत लग रहा था। बस कुछ ही पलों में यह उसकी बाँहों में होगा, वो जानता था। दरवाज़ा बंद करते हुए डॉली ने उसे आख़िरी बार देखा। दरवाज़ा बंद होते ही। राज अपने मोबाइल की ओर लपका पर उस पर ज्योति का कोई मैसेज नहीं था। ज्योति पहुँची भी है या उसे सिर्फ़ डरा रही थी। शायद वो बंगलौर ही चली गयी होगी कि अचानक उसे बाथरूम से डॉली के गुनगुनाने की आवाज़ आने लगी।

उसने बाथरूम के दरवाज़े पर कान लगा कि सुना बहते फ़व्वारे की धुन में डॉली कोई रोमांटिक गीत गुनगुना रही थी। बग़ल में ही एक पर्दा लगा था, उसने पर्दा हटाकर देखा एक धुंधला-सा पारदर्शी शीशा था जहाँ से डॉली नहाते हुए दिख रही थी। हाँ हनीमून स्वीट में ऐसे शीशे लगे होते हैं। राज ने देखा कि डॉली के बदन पर एक भी

कपड़ा नहीं था, सिर्फ़ हाथ में लाल चूड़ा, गले में मंगलसूत्र और पॉंव में पायल। फ़व्वारे से टपकती तेज़ पानी की फ़ुहार उसके बदन को नहला रही थी। नये महँगे शैम्पू का इस्तेमाल कर रही थी डॉली, जिसकी महक बाहर तक आ रही थी। राज की उत्तेजना बढ़ने लगी थी। वो अपनी जीन्स में उभार महसूस कर रहा था।

अचानक फ़व्वारा बंद हो गया और फिर बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आयी। राज बिस्तर की ओर गया, वो फिर से एक बार सुनिचित कर लेना चाहता था कि ज्योति का कोई मैसेज तो नहीं है कि डॉली के गोरे हाथों ने उससे उसका मोबाइल छीनकर बैड पे फेंक दिया। राज देख के दंग रह गया। पारदर्शी सफ़ेद रंग का ब्लाउज़ जो डॉली के गोरे कंधों से नीचे लटक रहा था। ऐसा लग रहा था कि वो बस डॉली के वक्ष बिन्दुओं के सहारे ही अटका हुआ है और नीचे हल्के लाल रंग की प्रिंटेड छोटी-सी स्कर्ट। ऐसा लग तरह था किसी चित्रकार ने उत्तेजित करने वाली तस्वीर कैनवास पर उतार दी हो। उस लिबास में डॉली का शरीर की बनावट साफ़ दिख रही थी। बदन पर ज़रा-सी चर्भी नहीं, एक दम दमकता हुआ बदन, अक्सर २२ साल की लड़की का होता है।

डॉली ने सर झुकाकर ख़ुद को राज की नज़रों के हवाले कर दिया। राज अब सर से लेकर पॉंव तक डॉली को निहार रहा था। डॉली के बाल अभी गीले थे, जिनसे पानी की बूँदें डॉली के बदन पर गिर रही थीं। डॉली ने राज की नज़रों को पढ़ लिया था जो उसके बदन में गड़ी जा रही थीं। राज का हौसला और बढ़ाने के लिए उसने अपनी बाज़ू ऊपर उठा ली ताकि राज उसके हुस्न का दीदार अच्छी तरह से कर सके। राज ने धीरे से हाथ बढ़ाकर उसके छोटे से ब्लाउज़ को उसके काँधे से नीचे खिसका दिया। उसके हाथ डॉली के वक्षों पर लहराने लगे। इतना मुलायम था डॉली का बदन कि राज सब कुछ भूलने लगा।

राज की साँसें बढ़ने लगीं, वो उत्तजित हो उठा। उसने अपने हाथ डॉली की कमर में घूमा दिये। डॉली इसी पल का इंतज़ार तो कर रही थी। राज के सख़्त हाथों का स्पर्श पाकर उसने अपने बदन को राज के हवाले कर दिया। उसने धीरे-धीरे राज की शर्ट के बटन खोल दिये। वही सख़्त गरम छाती राज की और उस पर काले बालों के रुएँ। इसी की कल्पना तो डॉली रास्ते भर करती आ रही थी और उसका ख़याल अब हकीकत बनके उसके सामने था।

वक़्त न बर्बाद करते हुए उसने अपनी सारी शर्म को भुला दिया और अपने नग्न वक्षों को राज के बदन में लगभग गाड़ दिया। वो राज के बदन की गर्मी को महसूस करना चाहती थी। राज की साँसें भी अब बढ़ने लगी थीं उसका सब्र अब ज्वालामुखी बन चुका था। उसने देखा कि डॉली आँख बंद करके ख़ुद को उसके हवाले कर चुकी है अब बारी राज की थी। उसने डॉली को गोद में उठाया और बैड पर ले जाकर बैठ गया। वो अपने होंट डॉली के नज़दीक ले जाकर उससे चूमने को ही था कि अचानक!

अचानक! डॉली उसकी बाँहों में बेहोश हो गयी। उसका निर्जीव-सा नग्न शरीर उसके सामने पड़ा था। राज घबरा गया, "डॉली? डॉली?" उसने डॉली को हिलाने की कोशिश की पर डॉली अब निढाल थी, उसकी दोनों बाज़ुएँ नीचे की ओर लटक रही थीं। राज ने निर्वस्त्र डॉली को अपनी बाँहों में उठाकर बिस्तर पर लेटाया।

"डॉली उठो आँखें खोलो, डॉली।" उसके गाल हिला रहा था वो। वो घबराने लगा के वो क्या करे! किसे फ़ोन करे! डॉली ने तो अभी कपड़े भी नहीं पहने हुए थे कि अचानक उसके मोबाइल पर टूं करके एक मैसेज आया। उसने जैसे-तैसे, डरते-डराते व्हट्स एप्प खोला और फिर क्या था ज्योति के मैसेजों की क़तार सी लग गयी। टूँ... टूँ... टूँ... बस बजती ही रही।

झटपट उसने फ़ोन को म्यूट किया और खोलकर पढ़ने लगा-

"आ गये जीजा जी... स्वागत है आपका... केरल में। क्यूँ फ़ोन पर व्हट्स एप्प खोलकर मेरे मैसेज का इंतज़ार कर रहे थे। बस मेरे दिल तक ये बात पहुँची और मैंने इतने सारे भेज दिए। अब ख़ुश हो।

"आ जाओ... बग़ल वाला कमरा ही लिया है, 224।" राज घबरा रहा था। उसने झट से ज्योति को फ़ोन लगाया, "ज्योति तुम्हारी दीदी.." बीच में ही उसकी बात काटकर ज्योति ने कहा, "जानती हूँ बेहोश हो गयी हैं, दीदी की चिंता ना करो। मैंने वेलकम ड्रिंक में उनके वाले गिलास में नींद की

दवा मिलवा दी थी। वेटर ने भी बख़ूबी काम किया है। बस मुझे डर था कि कहीं वो गिलास आप ना पी लो। आ जाओ... दीदी तो रात भर के लिए गयी... स्वप्न लोक में। अब हम भी तो समय बिता लें।" राज ने फ़ोन नीचे करते हुए देखा कि डॉली वाक़ई गहरी नींद में सो रही थी। उसने जैसे-तैसे उसके बदन पर उसके कपड़ों को फँसाकर बिस्तर पर लेटा दिया।

डॉली गज़ब की ख़ूबसूरत लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि काँधे से उसका छोटा-सा क्रीम कलर का ब्लाउज़ बस अब उसके बदन का साथ छोड़ने की कगार पर था। वक्ष कांता अपना दीदार देने को तैयार थे। बस राज को हिम्मत करनी थी। अगर वो बेहोश न होती तो अबतक कि अचानक उसमें मोबाइल में फिर से टूं-टूं की आवाज़ आयी। इस बार मोबाइल पर ज्योति की कुछ तस्वीरें थीं ऐसी तस्वीरें जिन्हें देखकर उससे एक पल के लिए भी कमरे में रुका नहीं गया। उसने डॉली के बदन को चादर से ढँका और चुपचाप दबे पाँव, अपने कमरे से निकला और बग़ल वाले कमरे में जाकर दस्तक देने लगा।

पहली ही दस्तक में दरवाज़ा खुल गया और खुलते ही... उसने जो देखा उसके बाद तो बस... उसके होश ही उड़ गये। ज्योति ने बिल्कुल वैसा ही पारदर्शी सा गाउन पहन रखा था जैसा डॉली ने पहना था। ज्योति भी अपनी बहन डॉली से कहीं कम नहीं थी। हाँ उसके वक्षों के उभार डॉली से थोड़े कम थे पर तने हुए। राज की हैरानी को समझते हुए ज्योति दरवाज़ा बंद करते हुए मुस्कुरायी और बैड पर जाकर बैठ गयी।

"मैंने दीदी के साथ शौपिंग की थी। उन्होंने जो कपड़े पहने थे मेरी ही पसंद के थी। मैंने ही उन्हें सिखाया था कि नाइटी के अंदर अंडर गारमेंट्स नहीं पहनते। राज हैरान था, उसका सामने ज्योति के रूप में बहुत बड़ी खिलाड़ी थी। फिर क्या जैसे ही पहला क़दम राज ने कमरे में बढ़ाया, ज्योति ने उस पारदर्शी ब्लाउज़ के धागे खोल दिए और राज के सामने आँख बंद करके बैठ गयी। उसने जानबूझ कर अपने वक्षों को और तान दिया जिससे उसके बदन का मख़मली ब्लाउज़ हार मानने लगा था। ज्योति के वक्ष कांता अब उसके ब्लाउज़ से झाँक रहे थे और राज के लिए मानो ये उस क्रीडा की दूसरी कड़ी थी जो अभी-अभी डॉली के संग खेल कर आया था।
 
राज काँप -सा रहा था और हिम्मत जुटाते हुए उसने ज्योति के बदन के उस हल्के से कपड़े को समेटकर उसे ढँकने की कोशिश की, पर सब व्यर्थ था। ज्योति उस समय बिल्कुल वहशीपन से ग्रस्त थी और उसने राज की शर्ट के बटन खोलना दूर, शर्ट फाड़ ही दी... शर्ट के बटन.. इधर-उधर कमरे में जा गिरे। ज्योति ने राज को बैड पर ज़ोर से धक्का दिया और उस पर किसी भूखी शेरनी की तरह बरस पड़ी। किसी वहशी जानवर की तरह आवाज़ें निकलने लगी। राज जो पहले से अपने कमरे से उत्तेजित आया था उसने भी ज्योति के इस वहशीपन का स्वागत उसी स्वर में किया। उसने ज्योति के दोनों हाथ ज़ोर से बिस्तर पर दबा दिये जिससे उसके बदन से सारे कपड़े हट गये।

राज की आँखों में उत्तेजना भरा क्रोध था। वो लम्बी-लम्बी साँसें लेकर ज्योति के भरे हुए बदन को देख रहा था और ज्योति मुस्कुरा रही थी। यही तो चाहती थी, उसने अपने दोनों हाथ छुड़वाकर राज की पीठ में गाड़ दिए। राज की नज़रों से लग रहा था कि सागर मंथन शुरू हो चुका है और फिर जो उसके बाद हुआ.. उसके गवाह सिर्फ़ वो दोनों ही थे।

रात को ज्योति और राज वहीं थक कर सो गये। अचानक बीच रात के राज की नींद खुली उसने देखा कि ज्योति निर्वस्त्र उसके बग़ल में सो रही थी। उसने जल्दी से अपने कपड़े पहने और देखा कि ज्योति कैसे निडर होकर बैड पर ऐसे पड़ी है मानो, उसे किसी बात की फ़िक्र ही न हो। ज्योति का गोरा बदन ही तो था जो राज की कमज़ोरी बना हुआ था। अगर ज्योति उसे पहले मिल गयी होती तो शायद वो उसी से शादी करता पर अब तो डॉली उसकी पत्नी थी। उसने एक बार ज्योति को आँख भर के देखा और निकल गया।

राज अपने कमरे में चुपचाप आ गया, उसने देखा डॉली उसी मुद्रा में सो रही है जैसे वो उसे छोड़कर गया था। उसने अपना ब्लाउज़ भी ठीक नहीं किया था। हर तरफ़ से उसका अंग झाँक था था। मानो इसी इंतज़ार में थी केकि ना जाने कब राज आ जाये और उसे प्यार करे। उसके चेहरे के नूर साफ़ बता रहा था कि वो सोते हुए भी राज को निराश नहीं करना चाहती थी। राज ये बात समझ रहा था कि सोये हुए भी डॉली उसके लिए तैयार थी, पर राज को तो ज्योति ने निचोड़ कर भेजा था। फ़िलहाल डॉली को देने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था।

लिहाज़ा वो वहाँ एक कुर्सी पर बैठ गया। बस इसी सोच में था कि आया तो था वो अपनी पत्नी डॉली के संग हनीमून मानाने पर बग़ल के कमरे में उसने वो काम अपनी साली के साथ कर लिया और किसी को यह बात पता नहीं। पर वो नहीं जानता था कि उसके इस कांड का गवाह कोई तीसरा भी है।

राज अब डर सा गया था कि ये कब तक और कैसे चलेगा? क्योंकि यह तो अभी शुरूआत थी। वो अपने हनीमून की रात एक ऐसी चिंगारी को जन्म दे आया था जो बुझेगी नहीं बल्कि जंगल में आग की तरह फैलेगी। ज्योति का ख़याल आते ही कपकपी सी छूट रही थी राज की। उसने २-३ व्हिस्की के पैग लगाये और सोने की कोशिश करने लगा। नींद तो उसे फिर भी तुरंत नहीं आयी पर बड़ी जद्दोजहद के बाद वो आख़िरकार सो गया।

अगले दिन सुबह.. उसकी नींद सूरज की रौशनी से खुली। जब डॉली ने होटल बैडरूम में लगे हुए पर्दे को हटाया... तो सूरज की रौशनी पर्दों की छाती को चीरते हुए... सीधा राज पर जा के गिरी। बस फिर असुविधाजनक स्थिति में उसे उठना ही पड़ गया। उसने देखा कि डॉली चाय बना रही है।

राज के मन में अनेक सवाल चल रहे थे, "क्या डॉली को पता चला कि रात भर वो कमरे में नहीं था? अगर उसने पूछ लिया कि उसे रात को क्या हुआ था तो वो क्या जवाब देगा!" वो इसी उधेड़बुन में गुम अपने अंदर इन सवालों के जवाब खोज रहा था जैसे कि इंटरव्यू से पहले कैंडिडेट अपने मन में हर संभव प्रश्न के उत्तर तैयार करता है कि डॉली ने उसे चाय का कप पकड़ते हुए कहा-

"कल जो हुआ उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। इतना सुनते ही राज के हाथ से चाय का कप फिसलने ही वाला था।

"मतलब.. क्या हुआ कल रात..मैं समझा नहीं.." डॉली ने शर्माते हुए कहा- "हम हनीमून पे आये और मैं सो गयी।"

राज की जान में जान आयी, उसने डॉली के हाथ पकड़ते हुए कहा, "कोई बात नहीं, अब तक शादी के झंझटों में नींद ही कहाँ मिली है।.. मैं भी बस सो ही गया था... तुम रेडी हो जाओ, नाश्ता १० बजे तक ही है ।" कहकर वो बाथरूम में चला गया।

राज का यह व्यवहार डॉली को अजीब नहीं लगा, बल्कि तो उसे यह लगा कि वो पिछली रात राज की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, पर वो आज रात यह कमी पूरी कर देगी।

होटल के रेस्टोरेंट में अभी वो नाश्ता कर ही रहे थे कि राज के फ़ोन पर एक टूं सी आवाज़ आयी। शायद मैसेज था। उसने फ़ोन को नीचे रख पढ़ने की कोशिश की। लिखा हुआ था, "एक घंटे में मैं तुम्हारा अपने कमरे के बाथरूम में इंतज़ार करती मिलूँगी, एक साथ नहायेंगे, अपनी बीवी को कैसे बहलाते हो ..तुम देखो।" राज का दिमाग ख़राब

हो रहा था। साफ़ दिखायी दे रह था, उसका चेहरा लाल हो गया था।

ख़ैर फिर अपने आपको सामान्य करते हुए वो बोला, चलो कहीं बाहर घूमने चलें, बीच पर चलें?" पर डॉली का कुछ और ही मूड था। सुहागरात अब तक उन्होंने मनायी नहीं थी। चार दिन हो चुके थे शादी को। उसके अंदर की आग भी उबाल मार रही थी।

उसने राज से कहा, "एक काम करतें हैं, बीच पर कल चलते हैं... सुबह-सुबह। आज अपने कमरे में ही वक़्त गुज़ारते हैं। अभी तो पूरा समय है अपने पास।" मुस्कुराते हुए शरारत भरे स्वर में उसने कहा।

राज को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वो उसे इस होटल से कहीं दूर ले जाना चाह रहा था।

"कमरे में जाने के लिए तो रात पड़ी है... और फिर में यहाँ समुंदर के किनारे सन सेट से पहले तुम्हारी तस्वीरें लेना चाहता हूँ न!" राज ने टालते हुए कहा।

डॉली समझ गयी और मुस्कुराते हुए उसने हामी भर दी। "ठीक है मैं चेंज करके आयी।" कहकर वो रूम की तरफ़ निकल गयी।

ज्योति की एक घंटे की धमकी के बारे में राज सोच-सोच पागल हुए जा रहा था कि ये लड़की अब क्या करने वाली है।

राज और डॉली ने पूरा दिन, बीच पर गुज़ारा तस्वीरें खींचते। राज ने अपने और डॉली के फ़ोन को भी फ़्लाइट मोड पर डाल दिया था। उन दोनों ने ख़ूब अच्छा वक़्त गुज़ारा और फिर शाम को नहा-धो, स्विमिंग पूल के किनारे बैठ गये।

डॉली ख़ुश थी। वैसे ऐसे लम्हे भी एक नवविवाहित जोड़े के लिए ज़रूरी हैं। हम-बदन होने की प्यास को जागते हैं। पर कोई इन दोनों को दूर नवीं मंज़िल से दूरबीन द्वारा देख रहा था। वो ख़ूब हँस रहे थे..एक-दूसरे के साथ ख़ूब मज़ाक़ कर रहे थे.. छेड़ रहे थे। अब तक भी राज ने अपना फ़ोन चालू नहीं किया था, पर डॉली ने फ़ोन को सामान्य मोड पर कर लिया था। ऑन करते ही सबसे पहला मैसेज ज्योति का ही था। ज्योति का मैसेज पढ़कर मन ही मन मुस्कुराने लगी। राज ने पूछ ही लिया किसका मैसेज देख के इतना हँस रही हो।"

डॉली ने तापाक से कहा, "आपकी साली का मैसेज है आप के लिए।" डॉली राज को छेड़ते हुए बोली।

राज चौंक सा गया और बोला, "क्या... ज्योति का मैसेज?" और फिर कहीं डॉली को कोई शक ना हो जाये, ये ध्यान में रखते हुए बहुत ही सरलता से बोला, "क्या कह रही है... हमारी एकलौती साली साहिबा.."

"अरे कुछ नहीं बस मजे ले रही है। कह रही है जीजाजी का इंतज़ार कर रही हूँ उन्हें यह मैसेज दे देना ।"डॉली हँसते हुए बोली।

"अच्छा मैं ज़रा वॉशरूम से होकर आयी।" बोलते हुए डॉली उठी और चली गयी।
 
राज के पसीने छूटने लगे थे। मौसम सुहाना सा था, पर फिर भी राज के पसीने छूट रहे थे और फिर बड़ी हिम्मत करते हुए, उसने अपना फ़ोन चालू किया और चालू करते ही उसे म्यूट पर डाल दिया। उसको पूरी उम्मीद थी कि फ़ोन चालू करते ही मैसेजेस की लड़ी लग जाएगी और बिल्कुल वैसा ही हुआ। 310 मैसेज थे, राज के मोबाइल पर। ये देख राज का दिमाग ख़राब हो गया और उन 310 मैसज्स में 290 ज्योति के ही थे।

राज की हिम्मत ही नहीं हो रही थी उन्हें पढ़ने की, पर जैसे ही उसने पढ़ना शुरू किया, तरतराते हुए उसके पसीने छूटने लगे। उसके कपड़े का कोई एक हिस्सा नहीं बचा था, जहाँ से पसीना ना छूट रहा हो, बिल्कुल तर हो चुका था वो। सब बातों में जो सबसे ख़तरनाक बात जो थी वो थी कि उसके पास राज के कल रात की रासलीला की पूरी वीडियो थी।

जिसमें कहीं पर भी ज्योति नहीं दिख रही है और राज पूरी तरह से छाया हुआ है। सैंपल के लिए उसने एक मिनट की एक वीडियो राज की ईमेल आई.डी. पर भेजी है, ऐसा लिखा था। बस फिर क्या था उसने फ़टाफ़ट ईमेल खोल के वीडियो डाउनलोड की और जैसे ही वो डाउनलोड हुई... उसे देख... उसे बहुत ग़ुस्सा आया... वो कोई पोर्न वीडियो थी, कहीं इन्टरनेट से डाउनलोड की हुई और जैसे ही वो ख़त्म हुई, एक और मैसेज आया राज के मोबाइल पर, "देख ली, वीडियो। ये तो एक मज़ाक़ था। वैसे कैसा लगा हीरो इस वीडियो का, पर अगली वीडियो में हीरो कोई और नहीं, आप होंगे जीजा जी, अगर आप ने जैसा मैं कह रही हूँ, वैसा नहीं किया। पूरी पिक्चर है मेरे पास, याद रहे आप कल रात मेरे साथ 4 घन्टे खेल के गये हो। हर एंगल से शॉट लिये हुए हैं और बहुत बड़ी फ़ुटेज है, एक-डेढ़ घंटे की सुपरहिट फ़िल्म निकल सकती है और मैं सिर्फ़ तुम्हें नहीं, पूरी दुनिया को दिखाऊँगी, अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी।" राज ने लिखा, "अच्छा बताओ, क्या करना है।"

"ये हुई ना बात, जीजा जी। अच्छा चलो, एक काम करो, दीदी के साथ थोड़ा समय बिताकर, उन्हें रात का खाना-वाना खिलाकर, सुलाकर आ जाओ। मालूम है ना कहाँ आना है, भूले तो नहीं ना। रूम नंबर 224"

"ठीक है... आता हूँ।" राज ने लिखा ही था कि डॉली आ गयी। "चले.. अब अंदर। कुछ खा पी लें और फिर सोते हैं।" बोलते हुए.. उसने राज को एक आँख मारी और उठने लगी। राज भी उठ लिया और साथ उसके कमरे में चला गया।

वो लोग खाना खा के कमरे में पहुँच गये थे। डॉली समझ रही थी कि राज को उसे प्यार करने की जल्दी होगी। वो उसके सामने अपनी साड़ी उतरने लगी के राज ने मुँह फेर लिया। डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा, "जाने दीजिये आज यह काम आपको सौंपते हैं!" इतना कहकर उसने राज के गले में अपनी बाहें डाल दीं। डॉली का दमकता हुआ चेहरा एक दम उसके चेहरे के नज़दीक था और चेहरे पर बिखरी एक उम्मीद भरी मुस्कान। डॉली शायद उम्मीद में थी कि राज अपने होंट उसके होंटों पर रख देगा, पर राज का ध्यान तो उसके फ़ोन पर था जिसमें ज्योति की ख़तरनाक धमकी थी।

अचानक उसने पाया कि डॉली उबासी लेने लगी है।" अचानक बहुत नींद आ रही है, सर भी भारी सा हो रहा है! आपको थकान महसूस नहीं हो रही?" बिस्तर पर बैठते हुए उसने राज से पूछ लिया। राज समझ गया था कि ज्योति फिर से कोई ख़तरनाक खेल खेल गयी है।

"आ तुम सो जाओ अगर नींद आ रही है तो!" डॉली ने मुस्कुराते हुए राज को दीवार की ओर खींच लिया।

"नहीं आज आपको निराश करके नहीं सोऊँगी, आख़िर बिहाकर लाये हो मुझे, पत्नी हूँ आपकी।" इतना कहते ही वो बिस्तर पे जाकर लेट गयी। बिस्तर पर लेटते ही मुस्कुराते हुए उसने अपने ऊपर चादर खींच ली। राज उसे देखे जा रहा था। डॉली अब भी मुस्कुरा रही थी और चादर के अंदर कोई हरकत कर रही थी। यह क्या? देखते-देखते उसने अपने बदन के सारे कपड़े उतारकर ज़मीन पर फेंक दिए। राज कल्पना कर पा रहा था कि चादर के अंदर डॉली निर्वस्त्र थी। सही तो थी डॉली, पत्नी थी उसकी। उसके प्यार पर उसका हक़ पहला था और शायद आख़िरी भी। वो अपने गिल्ट को दबाना चाहता था। लिहाज़ा उसने अपनी टीशर्ट निकाल दी।

डॉली ने देखा हल्के हल्के बालों के रूएँ से थे राज के बदन पर जो उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। डॉली ने धीरे से राज का हाथ पकड़कर चादर को अंदर खींच लिया। चादर के भीतर प्रवेश करते ही राज डॉली के बदन की गर्मी महसूस करने लगा। हाँ उसकी कल्पना अनुसार वो निर्वस्त्र थी। राज ने पाया कि डॉली ने उसकी हथेली अपने वक्षों पर रख दी है और उसके हाथों पर हाथ रखकर उन्हें दबाने की इजाज़त दे रही थी। कितने सख़्त हैं डॉली के वक्ष और वक्ष कांता जो अब तन चुके थे। राज समझ गया था कि डॉली अब उत्तेजित हो चुकी है।

डॉली राज की हथेली पकड़कर अपना बायाँ वक्ष मसलती तो कभी दायाँ। राज की उँगलियाँ न जाने उसका साथ छोड़कर कब और कैसे डॉली के वक्ष बिन्दुओं से खेलने लगीं। बेशक वो कुछ देख नहीं पा रहा था परन्तु कल्पना ज़रूर कर पा रहा था। जैसे-जैसे उसकी उँगलियाँ डॉली के वक्ष कांता दबाये जा रहे थे वो और सख़्त हो रहे थे। उत्तेजना से डॉली की आँखें बंद थीं। राज को पता ही नहीं चला कि कब उसका हाथ डॉली के पेट के नीचे चला गया।

जहाँ एक अद्भुत गरम तरल पदार्थ को महसूस किया राज ने। डॉली को न जाने क्या हुआ उसने राज की उँगलियाँ वहीं रोक दीं। वो अपनी तुलना एक ऐसी भूमि से कर रही थी जिसमें जल तो अपार भरा है पर उस जल से प्यास बुझाने वाला कोई नहीं। बस डॉली तो चाह रही थी कि राज अपनी उँगलियों से उसकी भूमि में किसी कुदाल की तरह चलता जाये और राज डॉली की बंद आँखों से भाँप चुका था कि शादी के इतने दिनों बाद भी उसने आज तक डॉली को तृप्त नहीं किया था। बस उतेज्जित करके छोड़ देता था, तड़पने के लिए, पर आज वो डॉली की प्यास बुझाकर रहेगा।

हक़ है डॉली का! आख़िर पत्नी है उसकी! वो जानता था कि डॉली को उसकी ज़रूरत है और उसका धर्म उसे निराश करने की इजाज़त नहीं देता। लिहाज़ा उसने भी अपनी पेंट उतार दी और डॉली के संग चादर के अंदर सिमट गया और डॉली को कसकर अपनी बाहों में भर लिया। अब डॉली भी उसके बदन की गर्मी को अपने बदन में महसूस कर रही थी। राज भी अब मदहोश होने लगा था। डॉली को न जाने क्या हुआ उसने राज के सर के पीछे हाथ रखकर ज़ोर से अपनी ओर दबाया और अपने होंट राज के होंटों के हवाले कर दिये।

अब राज के दिमाग़ से ज्योति का डर जा चुका था। उसका फ़ोन बार-बार बज रहा था। वो जानता था यह ज्योति ही होगी। पर बिना देखे उसने अपने फ़ोन को ऑफ़ कर दिया। अब उसके सामने उसकी पत्नी डॉली थी। इतनी ख़ूबसूरत। इतना कोमल बदन। डॉली अब इस प्यार का चरम सुख पाना चाहती थी जो उसे उसके पति से मिलना था। बस अब वो वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहती थी उसने राज को अपने ऊपर खींच लिया। राज का सारा भार वो अपने बदन पर ले चुकी थी। उसने राज की सख़्ती को अपनी जाँघों के बीच महसूस करना शुरू कर दिया था जो डॉली के द्वार पर दस्तक दे रहा था और उसने चरम सुख की लालसा में अपनी टाँगें फैला दीं। बस इसी घड़ी का इंतज़ार तो हर प्रेमी को होता है जो अब डॉली भोगने वाली थी कि अचानक! अचानक! दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक होने लगी।

दोनों डर गये। राज ने ख़ुद को सँभालते हुए वहीं से आवाज़ लगायी, "कौन है?" पर किसी ने जवाब नहीं दिया दस्तक जारी थी।
 
राज की नज़रें एक पल के लिए डॉली से मिलीं जिसका चेहरा एक दम उसके क़रीब था। उसके होंटों से लिपस्टिक बिखरकर उसका गालों पर अपनी पहचान बना चुकी थी। डॉली भी इस बेवक़्त की दस्तक से हैरान थी। राज के चेहरे पे डर के भाव दिखने लगे, कहीं यह ज्योति तो नहीं थी। ठक! ठक ! की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी। उसकी बाँहों में डॉली ने इशारे से कहा कि जाके देखो और ख़ुद अपनी नाइटी उठा कर बाथरूम में भाग गयी।

अपनी पैंट ठीक करते हुए वो दरवाज़े तक पहुँचा उसने फिर आवाज़ लगायी, "कौन है?" इस बार बाहर से एक लड़की की आवाज़ आयी, "हाउस कीपिंग.." आवाज़ परिचित थी।

राज डर गया, उसने जैसे ही दरवाज़ा खोला उसके होश उड़ गये। सामने ज्योति ही थी। ज्योति ने अंदर झाँक कर देखा तो बिस्तर पर उसे डॉली का ब्लाउज़ और ब्रा दिखी उसने देखा के राज की पैंट में अभी भी उभार था।

राज घबरा गया। ज्योति ने उसे घूरते हुए फुसफुसाते हुए कहा, अगले पाँच मिनट में तुम मेरे कमरे में होने चाहिए!" और कहकर निकल गयी। राज के होश उड़ चुके थे। उसने पलटकर देखा डॉली नाइटी पहनकर मुँह साफ़ करके बाहर आ गयी है। "कौन था?" उसने हैरानी से पूछ लिया। राज ने बात को टालते हुए कहा, "कोई नहीं.. हाउस कीपिंग।"

ज्योति बिस्तर पर बैठ गयी, "हमारी प्राइवेसी भी कोई चीज़ है कि नहीं कभी भी आ जाते हैं!"

राज- "आ तुम सो जाओ, मैं ज़रा इनकी ख़बर लेकर आता हूँ!"

डॉली- "अब जाने भी दो न!" उसने हाथ उठाते हुए राज से कहा मानो कहना चाहती हो कि जो काम अधूरा छोड़ा है उसे पूरा कर लो।

राज- "पैसे दिए हैं हमने, यह फिर दोबारा आ सकते हैं, तुम आराम करो मैं आता हूँ!" इतना कहकर वो जाने को था कि पलटकर डॉली के पास आया। डॉली ने उसकी आँख में आँख डालकर पूछा, "क्या?" राज ने उसका माथा चूमा- आई लव यू.."

"आयी लव यू टू...” राज के हाथ चूमकर डॉली ने कह डाला।

राज- "मैं दूसरी चाबी लेजा रहा.. दरवाज़ा खोल के आ जाऊँगा.. तुम सो जाओ।" मुस्कुराकर वो वहाँ से चला गया और डॉली राज के साथ बिताये वक़्त से विभोर चादर में सिमटी उन पलों को याद करके मुस्कुराने लगी थी।

राज अभी बग़ल वाले कमरे के दरवाज़े न. 331 पर पहुँचा ही था कि दरवाज़ा खुल गया और ज्योति ने राज को अंदर खींच लिया, पर आज, कल जैसा माहौल नहीं था। बल्कि टी.वी. चालू था कि तभी टीवी का शायद चैनल बदला गया और एक वीडियो चलने लगी और ये क्या, ये तो वही वीडियो थी, जिसकी धमकी ज्योति राज को दे रही थी। उनके कल रात के राज की गाथा गाती हुई वीडियो। राज की आँखें फटी की फटी रह गयीं। ये वीडियो किसी पोर्न फ़िल्म से कम नहीं थी जिसका नायक था राज और नायिका ज्योति। राज ने ज्योति की तरफ़ देखा और ज्योति ने वीडियो बंद कर दी।

"क्या चाहती हो तुम ज्योति... क्या चाहती हो? जो तुम चाह रही हो... तुम्हें सब मिल तो रहा है... फिर ये क्या है... अब क्या तुम मुझे ब्लैकमेल करोगी, ये वीडियो दिखा-दिखा कर? बोलो.." राज बस रोने कगार पर था और ज्योति राज की बेबसी पर मुस्कुरा रही थी कि अचानक राज खड़ा हुआ।

"बस ज्योति आज के बाद तुम इस रिश्ते की मर्यादा रखोगी कि तुम मेरी साली हो और मैं तुम्हारा जीजा।

"नहीं जीजा जी नहीं... अब बर्दाश्त नहीं हो रहा.. नहीं सह सकती तुम मेरे सिवाए किसी के बदन को छूओ भी.. जब मैं तुम्हें जीजा जी कहती हूँ तो बेगाना पन लगता है।" उसने लगभग राज का कॉलर पकड़कर अपनी ओर खींच लिया। तुम्हारे होटों से रस कोई और नहीं पी सकता.. मेरे सिवाए!"

राज- "और कौन है?.. डॉली है.. और वो मेरी पत्नी है.. और यह रिश्ता ज़िन्दगी भर का है!"

ज्योति- "मुझे कुछ नहीं पता, मुझे तुमसे अपने हिस्से का प्यार चाहिए.."

राज- "और डॉली?"

"मार दो डॉली को " ज्योति ने ये बात कहकर राज को चौंका दिया और अगले पल राज के गले से लिपटकर रोने लगी।

"मैं तुमसे अलग नहीं रह सकती और ये चूहे-बिल्ली का खेल मुझे भी पूरी ज़िन्दगी नहीं खेलना। अगर मुझे तुम्हारे साथ दिन... हाँ... रातें भी गुज़ारनी है तो डॉली को रास्ते से हटना होगा!" ज्योति बेधड़क बोल रही थी।

"क्या बकवास कर रही हो, ज्योति तुम? डॉली तुम्हारी बड़ी बहन है। तुम उसके बारे में ऐसे कैसे सोच सकती हो? शर्म आनी चाहिए तुम्हें!" लगभग डाँटते हुए बोला राज।

"मुझे क्यूँ शर्म आनी चाहिए। ये तो अच्छा है, पहले मेरा प्यार मुझसे छीन लो और फिर मैं कुछ सोचूँ भी ना। देखो मैं भी ये करना नहीं चाहती राज, पर हमारे पास कोई दूसरा चारा नहीं है। अगर तुम डॉली को नहीं मारोगे तो मैं मार दूँगी!"

राज का अब दिमाग़ फिर गया था। और वो चीख़ के बोला-

"देख ज्योति, तुझे जो करना है कर, पर सुन ले कान खोलकर मैं डॉली से प्यार करता हूँ और तू जो भी चाहती है ना, ऐसा अब कभी नहीं होगा, तू अगर मुझे बदनाम करेगी तो भूल मत मेरे साथ-साथ तेरा और मेरा दोनों का परिवार बदनाम होगा और अगर मेरे परिवार पर हल्की-सी भी आँच आयी तो मैं भी तुझे छोडूँगा नहीं!" और ये बोलते हुए वो बाहर निकल गया। उसका दिमाग़ चकरा रहा था। उसकी और ज्योति की ये छोटी-सी नादानी अब एक ख़तरनाक जुर्म की शक्ल इख़्तियार कर रही थी। वो सीधा नीचे लाउन्ज में बने बार में पहुँच गया और बैठकर शराब पीने लगा। वो एक के बाद एक पैग पिए जा रहा था इतना कि अब वो गिरने लगा था, पर चिलाये जा रहा था।

"और दो... और दो...” कि बारटेंडर ने देखा कि राज आपे से बहार हो रहा है तो उसने उसे और शराब देने से मना कर दिया।
 
बारटेंडर- "नहीं सर मैं आपको और नहीं दे सकता!" इतना सुनते ही राज ने वहाँ पड़े गिलास तोड़ दिये।

"क्यों नहीं दे सकते... पैसे दूँगा कितने चाहिए?" कि अब वहाँ कुछ और वैटेर्स आ गये उन्होंने राज को पकड़कर कुर्सी पे बिठाया और राज एक बात बड़बड़ा रहा था, "मुझे शराब दो!" कि तभी किसी ने राज के रूम नंबर 331 में इंटरकोम लगाकर डॉली को बताया

कि उसके हसबंड बार में तमाशा कर रहे हैं। इतना सुन डॉली लिफ़्ट में दौड़कर नीचे आयी और कमलेश नाम के एक वेटर की मदद से राज को ऊपर ले गयी।

डॉली लड़खड़ाते हुए राज को कमरे के अंदर ले आकर आयी और बैड पर लेटा दिया। डॉली ने राज के जूते उतारे। उसने देखा के राज बड़बड़ाये जा रहा था।

"बहुत बुरा आदमी हूँ मैं... बहुत बुरा.." उसने देखा कि डॉली उसके एक दम नज़दीक बैठी उसके माथे को सहला रही थी।

राज- "डॉली तुम बहुत अच्छी हो, मैं बहुत बुरा.."

डॉली- " नहीं आप बहुत अच्छे हो.." कहते हुए उसने राज के सर को अपने वक्षों में प्यार से दबा लिया। राज की हालत देख उसके भी आँसू निकल आये थे।

"आप सो जाइये बाद में बात करेंगे.. आप इस वक़्त होश में नहीं हैं.."

राज- "हाँ होश? साला होश में जब भी आना चाहूँ.. वो मुझे... वो मुझे.." उसको इतनी चढ़ गयी थी कि उससे बात नहीं हो रही थी।

डॉली- "वो... कौन? किसकी बात कर रहे हो आप?" राज ने ज़ोर लगाकर हिम्मत की, "वो ने..........." और बेहोश हो गया। वो ओंधे मुँह डॉली की गोद में पड़ा था। राज की ये हालत देखकर उसकी आँख में आँसू आ गये थे कि अचानक उसने देखा कि राज की जेब में उसका मोबाइल वाइब्रेटर पे बज रहा है। उसने बड़ी मुश्किलों से राज को सीधा करके उसकी जेब से उसका मोबाइल निकला। राज की मम्मी का फ़ोन था। डॉली ने देखा कि राज गहरी नींद में है उसने फ़ोन अटेंड किया।

डॉली- "पाए लागु मम्मी जी.."

मम्मी- "अरे डॉली कैसी हो... और ये राज कहाँ है?.. जब से तुम्हारे साथ गया है उसके फ़ोन आने ही बंद हो गये!" प्यार से छेड़ते हुए उसने डॉली से कहा।

डॉली- "नहीं वो सो रहे हैं... रात को ज़्यादा देर तक जाग रहे थे तो..."

मम्मी- "समझ गयी... चल जब उठे तो बात करवा देना... और तू ख़ुश है न?" डॉली ने अपने आँसू सँभालते हुए कहा-

"हाँ मम्मी जी... बहुत ख़ुश!"

मम्मी- "चलो ख़ुश रहो.. रखती हूँ.."

"हाँ.." कहकर डॉली ने फ़ोन नीचे कर लिया। वो अभी भी राज को इस हाल में देख रही थी। उसके लिए ये भी एक नया ही अनुभव था। उसने कभी किसी लड़के को इस तरह शराब के नशे में चूर अपने बैड पर नहीं देखा था। वो भी जो उसका पति था। उसने अपने आँसू पहुँचे और जैसे ही राज का मोबाइल टेबल पर रखने को थी उसकी नज़र उसके मोबाइल के मैसेज बॉक्स पे गयी। उसे कुछ परिचित नाम दिख रहे थे।

उसने राज के मोबाइल में मैसेजस खँगालने शुरू कर दिए। अचानक उसने पाया कि राज की नींद खुल गयी है उसे शायद उल्टी आ रही थी। डॉली ने झट से उसका मोबाइल वहाँ साइड में रख दिया और उसे बाथरूम में ले गयी। जहाँ से राज के उल्टी करने की आवाज़ें आ रही थीं और डॉली उसे सहारा दे रही थी।

केरल के एक हॉस्पिटल में राज जय और कुणाल को अपना बयान दे रहा था। उसने आगे बताया कि जब उसकी नींद खुली तो डॉली उसके कमरे में नहीं थी। वो उसे ढूँढ़ने बाहर गया तो 224 नंबर रूम का दरवाज़ा खुला था जिसमें ज्योति ठहरी हुई थी। वहीं उसे डॉली की लाश मिली। उसके सीने में चक्कू गड़ा हुआ था और फिर किसी ने उसके सर पर वार कर दिया।

ये बात तो जय और कुणाल पहले से ही जानते थे। ख़ैर उन्होंने इस बात की पुष्टि तो कर दी कि राज और ज्योति के बयान कुछ हद तक मेल खा रहे थे कि तभी नर्स अंदर आ गयी उसने जय और कुणाल को बाहर जाने के लिए कहा।

कुणाल जय के साथ बाहर खुली हवा में आ गया। उसे अभी भी इन कहानियों की उन कड़ियों की तलाश थी जो डॉली के क़त्ल से जुड़ती हैं। लिहाज़ा उन्होंने ज्योति की कहानी को पूरी करने का फ़ैसला लिया और फिर वो दोनों उसी कमरे में ज्योति के साथ बैठे थे। वो उससे उस रात के बारे में जानना चाहते थे जिस रात वो होटल छोड़कर गयी थी।
 
ज्योति जय और कुणाल के सामने बैठी हुई थी। कुणाल ज्योति को ग़ौर से देखकर उसके दिमाग़ को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। उसने जेब से सिगरेट का नया पैकेट निकला। वो जैसे ही उसमें से एक सिगरेट निकलने वाला था ज्योति ने उससे पूछ लिया-

"क्या मैं एक सिगरेट ले सकती हूँ?"

कुणाल की नज़र एक बार जय से मिलीं। उसने ज्योति के आगे पैकेट करते हुए पूछ लिया-

"तुम सिगरेट भी पीती हो?"

ज्योति ने कुणाल से सिगरेट लेते हुए कहा-

"हाँ पापा की कभी-कभी चुराकर!" और कहते ही उसने कुणाल के लाइटर से अपनी सिगरेट जला ली।

कुणाल देख रहा था कि ज्योति का मन अब अपनी कहानी सुनाकर हल्का हो गया था। उसने ज्योति से कहा, "अगर तुम चाहती हो तो थोड़ी देर बाहर बरामदे में खड़ी होकर सिगरेट पी सकती हो!"

ज्योति शायद ये ब्रेक चाहती थी, वो थैंक्स कहकर कमरे से सटे बरामदे में चली गयी। उसके जाते ही जय के मन में उभरे प्रश्न कुणाल के सामने आ गये। उसने भी कुणाल के पैकेट से एक सिगरेट निकालते हुए कहा-

"इसकी और राज की अय्याशी की कहानी तो बहुत ही रंगीन है। दाद देनी पड़ेगी दोनों की हिम्मत की!"

कुणाल ने मुस्कुराते हुए कहा-

"हर जुर्म की जड़ ज़र-जोरू-ज़मीन ही होती है जय जी। राज और ये लड़की इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं। जो कुछ भी इन दोनों ने कहा एक एक शब्द सच है और सच्चाई ऐसी ही भयानक होती है।"

जय- "मुझे तो लगता है कि ये लोग ऐसी अश्लील कहानी सुनाकर हमें गुमराह कर रहे हैं!" इस पर कुणाल ने ठहाका लगते हुए कहा, "लुक हू इज़ टाकिंग? वो पुलिस इंस्पेक्टर? जो दिन रात मुजरिमों के बीच रहता है, जो सिर्फ़ ऐसे ही अश्लील जुर्मों से घिरे रहते हैं। जय जी कीचड़ साफ़ करने के लिए कीचड़ को पहले अपनाना पढ़ता है!" जय के चेहरा पर शर्म के भाव उभर आये थे।

सही तो सोच थी कुणाल की, अगर कीचड़ साफ करना है तो कीचड़ में लिप्त तो होना पड़ेगा। वो अभी इसी सोच में था कि ज्योति वापस आ गयी।

जय ने अपना रिकॉर्डर ओन करते हुए उससे पूछा, "तो शुरू करें?" ज्योति ने आगे बोलना शुरू किया-

"उस रात भी मैं राज का इंतज़ार करने लगी। काफ़ी देर हो गयी जब राज नहीं आया तो मैंने राज को बुलाने के लिए उसे मैसेज किया पर राज नहीं डॉली मेरे कमरे में आयी। मैं नहीं जानती थी कि राज शराब पीकर सो रहा था और मेरा मैसेज डॉली ने पढ़ लिया था!" फिर जो उसने बताया वो सब कुछ कुणाल और जय के आगे किसी फ़िल्मी मंज़र की तरह परदे पर घूमने लगा। कैसे रात को जब ज्योति राज का इंतज़ार कर रही थी उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई-

ज्योति- "आ जाओ राज, बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ!" पर उसके होश उड़ गये जब उसने देखा सामने डॉली खड़ी थी। डॉली ज्योति के कपड़े देखकर दंग रह गयी। एक पतली-सी नाइटी अंदर कुछ भी नहीं था। अचानक उसने राज के मोबाइल में उसे एक वीडियो दिखाया जिसमें ज्योति और राज करम कांड कर रहे थे।

डॉली- "क्या है ये... हैं क्या है ये......? "

ज्योति- "डॉली मैं तुझे सब समझती हूँ!!"

डॉली- "नहीं समझना मुझे कुछ भी.... समझी.. अरे बहन नहीं सहेली समझती तुझे सबसे अच्छी सहेली... और तू तो डायन निकली, मेरा घर खा गयी तू... क्या चाहती है मैं तुम दोनों के रस्ते से हट जाऊँ? ठीक है..ठहर.." कहते हुए डॉली ने वहाँ पड़ा एक चक्कू उठा लिया और अपने सीने में घोंपने को थी कि ज्योति ने उसके हाथ से चक्कू छीनकर फेंक दिया।"

ज्योति -"नहीं डॉली ऐसा मत करना.."

डॉली- "ठीक है फिर, पापा को ही फ़ोन लगाती हूँ!.... डर मत मैं तेरी शिकायत नहीं लगा रही.. ये कहने के लिए कि मैं अभी इसी वक़्त राज को तलाक़ दे रही हूँ.. और तेरी शादी करवा दे उससे, वैसे भी आज तक राज से मझे वो सुख तो मिला नहीं जो उसने भर-भर के तुझे दिया है.. हाँ सच ज्योति ये शादी सिर्फ़ नाम की है इसे ख़त्म हो जाना चाहिए!"

ज्योति- "नहीं डॉली प्लीज़ नहीं... देख डॉली मैं बुरी हूँ बहुत बुरी हूँ... अपनी बहन का घर बर्बाद कर दिया.... मैं सच में तुम लोगों से दूर चली जाऊँगी.. कभी शक्ल नहीं दिखाऊँगी.. पर प्लीज़ पापा को फ़ोन करके ये मत कहना कि तुम राज को तलाक़ दे रही हो..." कहते हुए उसने अपने कपड़े बदलने शुरू कर दिए और अलमिरा से कपड़े निकालकर बैग में डालने लगी थी।

ज्योति- "डॉली जो भी हुआ उसमें राज का उतना क़सूर नहीं जितना मेरा है..मैंने ही उसे हमेशा ब्लैकमेल किया था... वो तो तुझे बहुत चाहता है... प्लीज़ बेशक मुझसे ज़िन्दगी भर बात मत करना पर.. राज को मत छोड़ना!" कहते हुए वो कमरे से बाहर निकल गयी थी और डॉली माथा पकड़कर वहीं बैठ गयी। ज्योति ये सारी घटना कुणाल को सुना रही थी। उसने आगे कहा-

"उसके बाद मैं सीधी एयरपोर्ट चली गयी रास्ते में जो भी पहली फ़्लाइट मिली बुक कर ली.." ये सारी बात सुनाते हुए वो रो भी रही थी।

कुणाल- "उसके बाद तुम्हारी डॉली से कोई बात नहीं हुई?" ज्योति ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, "नहीं!" कुणाल अपनी सिगरेट को सूँघता हुआ उस कमरे से बाहर आ गया। उसके पीछे जय भी।

जय- "क्या लगता है आपको?"

कुणाल- "ज्योति की बात में इतनी सच्चाई तो है कि वो देर रात होटल छोड़कर चली गयी थी। अगर वो एयरपोर्ट पर रात २ बजे के आसपास थी तो इसका मतलब उसने होटल तक़रीबन एक बजे छोड़ा होगा... और डॉली का क़त्ल?"

जय- "ये तो अब पोस्टमोर्टेम की रिपोर्ट से पता चलेगा कि डॉली का क़त्ल कितने बजे हुए था!"

कुणाल- "हाँ जय ये तो पता चल जायेगा कि डॉली का मर्डर कितने बजे हुआ। CCTV फ़ुटेज से कुछ पता चला?"

जय- " हैरानी की बात है कि रात १२ बजे से CCTV बंद था.. सुबह चालू हुआ है!" जय की बात सुनकर कुणाल मुस्कुरा दिया-

"यानी क़ातिल रात १२ बजे होटल में पहुँच गया था!"

जय- "कौन है क़ातिल?" कुणाल ने लम्बी साँस लेते हुए कहा, "कोई भी हो सकता है जो इस कहानी से पहले दिन से जुड़ा हुआ है, राज, ज्योति या फिर कोई और।

फ़िलहाल इस मुद्दे में मैं कुछ नहीं कह सकता, आई आल्सो नीड सम रेस्ट, तब तक तुम राज और डॉली के बाक़ी रिश्तेदारों से बातचीत करो, राज की उस रात की टेलीफ़ोन कॉल्स की डिटेल्स निकालो.. हो सकता है कोई सुराग़ मिल जाये!" कहकर कुणाल चला गया।
 
अगले दिन डॉली की मौत की ख़बर उसके माइके और ससुराल वालों तक पहुँच गयी थी। दोनों ही घरों में हा-हा कार मच गया था। राज के मम्मी-पापा और डॉली के पापा सब अगली फ़्लाइट से केरल पहुँच गये थे। जय ने सबसे बातचीत करनी शुरू की पर किसी को न तो राज से मिलने की इजाज़त दी ना ही ज्योति से।

यही सवाल कुणाल को खाए जा रहा था। उसके शक के दायरे में फ़िलहाल केवल दो ही लोग थे। एक ज्योति, दूसरा राज। पर ना जाने क्यों उसका एक्सपीरियंस कह रहा था कि क़ातिल कोई और ही है? पर कौन?

उसके बाद उसने डॉली के घर वालों के बयान लिये। पहले उसके पापा के फिर कांता चाची के जो डॉली के बहुत क़रीब थी। पर उनकी बातों से कोई ऐसी बात सामने निकलकर नहीं आयी जिससे डॉली के क़त्ल का शक किसी और पर जाये। राज के पिता ने तो जय को राज और ज्योति की शादी की DVD भी दे दी ये कहकर कि इतनी सुंदर शादी की थी हमने। पता नहीं किस से कहाँ ग़लती हो गयी।

जय अपने पुलिस स्टेशन में बैठा उस DVD को देखे जा रहा था। उसे अभी भी क़ातिल की तलाश थी कि तभी एक हवलदार ने उसे राज के फ़ोन रिकार्ड्स की लिस्ट लाकर दी जो उस दिन राज के नंबर से हुए थे। जय ने वो DVD और फ़ोन लिस्ट की एक कॉपी कुणाल के घर भी भेजने का आदेश दे दिया। आज के लिए वो बहुत थक चुका था। लिहाज़ा उसने आज रात आराम करने की सोची।

अगली सुबह कुणाल के घर की डोर बेल से उसकी नींद खुली। कुणाल ने देखा बाहर एक हवलदार खड़ा था जिसके हाथ में जय द्वारा भेजा हुआ एक पैकेट था। उसने हवलदार को रवाना करके उस पैकेट को खोला तो उसमें एक राज और डॉली की शादी की DVD थी और राज के फ़ोन रिकार्ड्स की लिस्ट। कुणाल उस DVD को पलटकर देखने लगा। बड़ा सुंदर कवर था जिस पर ज्योति और राज की मुस्कुराते हुए तस्वीर थी और नीचे लिखा था 'लॉन्ग लिव दा कपल'।

कुणाल ने वक़्त बर्बाद न करते हुए DVD अपने लैपटॉप में लगा दी। हर शादी की DVD की तरह वो भी एक फ़िल्मी तरीक़े से शूट हुई फ़िल्म जैसी थी। जगह-जगह पर फ़िल्मी गीत भरी हुए थे। अपना नाश्ता बनाते हुए कुणाल रुक-रुक कर उस फ़िल्म को देख रहा था।

अचानक न जाने क्यों उसे उस फ़िल्म में रूचि होने लगी और अपनी प्लेट में टोस्ट रखकर उसने पूरी फ़िल्म देख डाली। फ़िल्म के ख़त्म होते ही उसकी गर्दन घूमने लगी। मानो उसे उस फ़िल्म से कोई तो सुराग़ मिल गया था। उसकी आँखों ने कुछ ऐसा देख लिया था जो शायद कोई और नहीं देख पाया था। इसके बाद उसने झट से राज के फ़ोन की लिस्ट निकली और एक नंबर को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी। वक़्त न बर्बाद करते हुए उसने जय को फ़ोन लगा दिया। जय जो दो रातों से सोया नहीं था उसने पहली घंटी में ही कुणाल का फ़ोन उठा लिया और फिर कुणाल ने उसे जो बताया, उसकी नींद उड़ाने के लिए काफ़ी था।

"मैं अभी पहुँच रहा !" कहते हुए वो फ़ोन रखकर बाथरूम की तरफ़ निकल गया।

एक घंटे बाद जय कुणाल के घर पे था और कुणाल के लैपटॉप पर वही राज और डॉली की शादी की DVD चल रही थी। जय ने पूरी फ़िल्म देख डाली पर उसे कुछ समझ नहीं आया।

जय ने हैरानी से कुणाल को देखते हुए पूछा-

"आप तो कह रहे थे कि क़ातिल इस DVD में है, पर मुझे तो पता नहीं चला कौन!"

कुणाल ने अपने अंदाज़ में जेब से सिगरेट निकलते हुए कहा-

"क़ातिल इसी DVD में है बस उसका चेहरा सामने नहीं दिख रहा!"

जय- "मैं समझा नहीं!" कुणाल ने फिर से कुणाल को कुछ चुनिदा शॉट्स रिवाइंड करके दिखाने शुरू किये। जहाँ राज को हल्दी लग रही थी। राज छत पर दोस्तों के साथ था और फिर आख़िर वाला शॉट जब राज डॉली के साथ कार में उसकी डोली लेकर जा रहा था। कुणाल अपनी सिगरेट जलाते हुए कहा- "ग़ौर से देखिये जय जी, हर शॉट में राज किसी को देख रहा है मानो उसकी किसी से आँखों ही आँखों में बातें हो रही हों!"

जय- "किसे देख रहा है? किस से बात कर रहा है राज?"

कुणाल ने आख़िरी शॉट फिर से दिखाते हुए कहा, "ये वो जो कैमरा के पीछे है, जो ये वीडियो बना रहा था और ये आख़िरी शॉट में उसकी आवाज़ भी है!"

जय ने ध्यान से सुना जब राज डोली में जा रहा था तो कोई लड़की राज से कह रही थी-

"ओके राज, ऑल दा बेस्ट फ़ॉर योर न्यू लाइफ़.. बस इतना ही कहूँगी कि इस रिश्ते को ईमानदारी से निभाना जैसे तुमने आज तक हर रिश्ते को निभाया है!"

जय ने फिर से उस आवाज़ को रिवाइंड करके सुना। पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने कुणाल से पूछा-

"कौन है ये लड़की?"

कुणाल ने सिगरेट का कश लेते हुए कहा, "इस कहानी की अहम पात्र जो राज के साथ पहले फ़्रेम से थी।" मुस्कुराते हुए उसने DVD का कवर उठाया उस पर एक नाम लिखा था, 'रागिनी दुबे' और अपनी बात की पुष्टि करने के लिए उसने जय को राज के फ़ोन रिकार्ड्स की लिस्ट दिखाते हुए कहा-

"क़त्ल की रात को राज की दो बार रागिनी दुबे से बात हुई थी। पहला फ़ोन राज ने किया था और दूसरा फ़ोन रागिनी का आया था!"

जय- "तो?"

कुणाल- "राज ने अपनी कहानी में रागिनी का ज़िक्र नहीं किया जबकि इस वीडियो से साफ़ है कि राज और रागिनी के बीच कोई तो रिश्ता था। वो केवल एक फ़ोटोग्राफ़र ही नहीं थी। उसके ये आख़िरी लफ़्ज़ जहाँ वो राज को उसकी आने वाली ज़िन्दगी के लिये शुभकामनाएँ दे रही है, या कहें.. नसीयत और ऐसी बातें वही कर सकता है जो नज़दीक हो और ये फ़ोन कॉल्स इस बात के सबूत हैं। अब ये रागिनी ही हमारी आख़िरी कड़ी है जो इस कहानी के किरदारों को डॉली के क़त्ल से जोड़ेगी।"
 
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