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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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राज ने सहमति में सिर हिला दिया। डॉक्टर सावंत खामोश और निश्चल खड़ा रहा।

तभी उनकी आंखें एक बार फिर हैरत से फटी की फटी रह गई।

वो नीली-हरी चमकती हुई धुंध, जिसके दरम्यान छ: सौ साल पूर्व की राजकुमारी ज्योति राजसी रूप में खड़ी थी, उस धुन्ध में से धीरे-धीरे ज्योति का आकार नष्ट होने लगा। फिर वो हिलती बोलती ज्योति बिल्कुल गायब हो गइ। केवल मानवाकार में धुन्ध बची रह गई थी, जो धीरे-धीरे राजकुमारी ज्योति की लाश पर छाती जा रही थी।

लाश पूरी तरह धुन्ध से ढक गई थी और फिर धुन्ध गायब हो गई। अगले ही क्षण मेज पर लेटी लाश में जैसे प्राण पड़ गए

और लाश उठकर बैठ गई। डॉक्टर सावंत और राज को मानो काटो तो खून नहीं, दोनों पत्थर बने देखते रहे ओर उनके

देखते-देखते लाश धीरे-धीरे मेज से उतरी और दरवाजे की तरफ बढ़ी। उसके दरवाजे के पास पहंचते ही दरवाजा अपने आप खुल गया वो बाहर चली गई।

राज ने कोशिश की कि वो ज्योति के पीछे जाए, लेकिन चाहने के बावजूद वो अपनी जगह से हिल भी न सका। उसके साथ ही डॉक्टर सावंत भी खड़ा रह गया और कमरे की लाईटें जल उठीं।

वो दोनों उसी तरह बुत बने खड़े रहे। फिर राज बोला

"वो....दोनों ज्योति ही थीं, डॉक्टर सावंत ने माथे पर से पसीना पौंछते हुए कहा, ” उसे हम बाजार में देख कर आए थे, घर पहुंचे तो उसकी लाश पड़ी थी। उस लाश के ऊपर एक ओर ज्योति प्रकट हुई, उसने हमें छ: सौ साल पुरानी कहानी सुना कर अपना दुखड़ा प्रकट हुई, उसने वो लाश भी उठ कर चली गई

और दूसरी ज्योति भी गायब हो गई। मेरी तो अक्ल हैरान

"अब तो हमें मानना ही पड़ेगा डॉक्टर साहब।" राज ने गहरी सांस लेकर कहा, "बाजार में हमने उसे जिन्दा देखाा, यहां पहुंच गई और उसकी लाश पर किसी ने मसाला भी लेप कर दिया, यह नामुमकिन है।"

डॉक्टर सावंत कुछ नहीं बोला, उसके चेहरे पर गहन गम्भीरता छाई हुई थी। बाहरी दरवाजे पर घंटी की आवाज सुनाई दी और

दोनों चौंक कर एक साथ लेब्रॉटरी से निकल पड़े।

सतीश उनके लेब्रॉटरी में रहने के वक्त जाग उठे उल्लू की तरह पलकें झपका-झपका कर इधर-उधर देख रहा था।

राज का दिमाग चकरा रहा था। अभी-अभी जो चमत्कार उसने देखा था, उसकी अक्ल उसे कबूल नहीं कर रही थी, इच्छाधारी नागिन के बारे में उसने बहुत कुछ सुना और पढ़ा था, लेकिन सच बात तो यह है कि अब तक वो ऐसी बातों को पुराने जमाने के नाटककारों की कपोल कल्पना ही समझता आया था, लेकिन.....उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि कुछ देर पहले की घटना को क्या समझे, वहम या हकीकत?

लेकिन वो उस घटना को वहम कहकर भी तो नहीं टाल सकता था। वो अकेला होता शायद वहम समझ भी लेता, लेकिन उसके साथ डॉक्टर मेहता भी था, जो सारी घटना का चश्मदीद गवाह था।

दोनों आमने-सामने सोफों पर बैठे गए। दोनों अपनी-अपनी जगह सोच में गुम थे। फिर कुछ देर सोचने के बाद डॉक्टर सावंत ने ही कहा

"राज, एक बात मेरी समझ में नहीं आई.....।"

"आपकी समझ में एक बात नहीं आई?" राज ने गहरी सांस लेकर कहा-" मेरी समझ में तो कोई बात नहीं आई है। कहिए, आपकी समझ में कौन सी बात नहीं आई?"

"यह ज्योति कारों में घूमती है, ट्रेन पर भी सुर करती होगी। अगर वो परालौकिक चीज है तो उसे सवारियों की जरूरत क्यों पड़ती है?"

"क्योंकि उसके पास एक इन्सानी जिस्म भी है।” राज ने जवाब दिया, "अगर सिर्फ नागिन का मामला होता तो शायद वो यहां न आती, लेकिन उसकी मणि छिन जाना उसके लिए भारी मुसीबत का करण बना हुआ है। जिससे वो मजबूर है। वर्ना इच्धारी नाग तो पल भर में कहीं भी गायब होकर कहीं भी पहुंच सकते हैं।"

"क्या तुम गम्भीर हो राज ?"

"इन परिस्थितियों में जितना गम्भीर रहा जा सकता है, उतना ही हूं। राज ने कहा," हम बाजार गए थे। मेज पर कुछ नहीं था, बाजार में हमें ज्योति दिखाई दी जो वहां से गायब हो गई। यहां लौटे तो लेब्रॉटरी की मेज पर छः सौ साल पुरानी रामगढ़ की राजकुमारी ज्योति की लाश पड़ी हुई थी।

उसके बाद ज्योति की या इच्छाधारी नागिन की आत्मा प्रकट हुई

और उसने हमें एक कहानी सुना दी। आप ही कहिए इसे क्या समझा जाए? हम लोग डॉक्टर हैं और आमतौर पर हम लोग वहमी या अनधविश्वासी नहीं होते । लेकिन जो कुछ हमने देखा है, उसे क्या कहा जाए?"
 
"कहीं वो सारा हिप्नोटिज्म का करिश्मा तो नहीं है?" डॉक्टर सावंत ने हैरानी से पूछा।

" हो सकता है, ऐसा भी हो सकता है।" राज गम्भीरता से बोला-''जिस मामले में ज्योति और डॉक्टर जय इन्वाल्व थे उस मामले के बारे में कुछ भी हो सकता है।"

"अगर वो सब हम दोनों ने सम्मोहन की हालत में देखा था तो फिर यह भी मुमकिन है कि ज्योति की सुनाई कहानी मनघड़त

हो और यह भी उन दोनों की किसी नई साजिश का हिस्सा हो, हमें हमारी जांच से भटकाने के लिए उन्होंने यह लाश , मणि

सपेरे और इच्छाधारी नागिन की स्क्रिप्ट लिखी हो?"

"अगर है तो अब हमें और ज्यादा होशियारी से काम लेना होगा,

और यही सोचकर चलना होगा कि यह ज्योति और डॉक्टर जय की साजिश ही है। ऐसा न हो कि हम एक मजबूर इच्छाधारी नागिन की मदद करने के चक्कर में खुद किसी जाल में फंसें ।" राज ने कहा।

"हां, हमें ऐसा ही करना चाहिए।” डॉक्टर सावंत ने सोचते हुए कहा, "एक और बात भी मेरी समझ में नहीं आ रही है।"

"वो कौन सी?"

"हमने जब बाजार में ज्योति को देखा था तो उसने काली ड्रेस पहन रखी थी। लेकिन जब यहां उसकी लाश थी तो उसने

मटियाले रंग का लम्बा सा लबादा पहन रखा था?"

"यह कोई खास बात नहीं हैं।" राज ने कहा, "जो औरत आधे घंटे में मर कर जिन्दा हो सकती है, उसके लिए ड्रेस चेंज कर लेना क्या मुश्किल है?"

"ऐसे नहीं। यह मान कर बताओ कि वो भूत-प्रेत या इच्छाधारी नागिन नहीं, बल्कि एक आम औरत है।"

"अगर आम औरत के तौर पर मान कर चलें तो , वो हमसे जल्दी यहां पहुंच गई होगी और कपड़े या तो उसने रास्ते में ही किसी काले शीशों वाली कार में बदल लिये होंगे या फिर यहां पहुंचकर किसी बाथरूम वगैरह में बदल लिये होंगे, उसके साथ कोई दूसरा भी होगा, जो उसके उतारे हुए कपड़े साथ ले गया होगा।"

"तो अब क्या करना है?'' डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"किस बारे में?"

"ज्योति के अनुरोध पर औरंगाबाद जाना है या उसे नजरअन्दाज कर देना है?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"अगर ज्योति को इच्छाधारी नागिन न मानकर हम उसे डॉक्टर जय की साजिशी कठपुतली भ समझ लें, तब भी उसकी उस बात में मुझे दम लगता है कि डॉक्टर जय का स्थाई ठिकाना औरंगाबाद से उन्नीस किलोमीटर दूर एलोरा की गुफाओं में या गुफाओं के आसपास कहीं होना चाहिए। वो अपेक्षाकृत सुनसान इलाका है, जहां डॉक्टर जय को खेल खेलने का भरपूर मौका सो मजबूरी में वहां जाना ही पड़ेगा।"

डॉक्टर सावंत ने सहमति में सिर हिला दिया और बोला

"तुम कहो तो हम इंस्पेक्टर त्यागी को इस मामले में सूचना देकर उसका सहयोग भी प्राप्त कर लें?" ।

"नहीं साहब।" राज ने दृढ़ता से कहा," मेरे ख्याल में पहले हम दोनों को अकेले ही उस ओ के बारे में खोजबीन करनी चाहिए। उसके बाद कोई सबूत पाते ही हम इंस्पेक्टर

त्यागी को खबर कर देंगे। पहले हम दोनों ही औरंगाबाद जाएंगे।"

"और सतीश?" डॉक्टर सावंत ने कहा।

" सतीश को तो पता तक नहीं लगना चाएि डॉक्टर साहब कि हमारा क्या प्रोग्राम है।"

"क्यों?" डॉक्टर सावंत ने हैरत से पूछा।

"वो इसलिए कि ज्योति को देखते ही उसके होशोहवास जवाब दे जाती हैं। उसे साथ रखकर हमें परेशानी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।"

"चलो ऐसे ही सही....।" डॉक्टर सावंत बोला, "तो फिर तैयारी करो औरंगा बाद जाने की।"

"जैसा आपका हुक्म ।" राज ने बड़ी देर बाद मुस्कराते हुए कहा।

उन्हें औरंगाबाद आए एक दिन ही गुजरा था, यह अलग बात है कि उन्हें बम्बई से चलते-चलते दो दिन लग गए थे। जब से वो

औरंगाबाद आए थे, कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी थी।

अब उनके सामने सिर्फ एक ही मकसद था, और वो था ज्योति की तलाश । लेकिन ज्योति अब तक उन्हें नजर नहीं आई थी, जबकि वो दो घंटे गोखले मार्किट में भी गुजार आए थे।

इंस्पेक्टर विकास त्यागी को उन्होंने पूरा किस्सा बताए बगैर कहीं बाहर जाने की सूचना दी थी और सतीश को भी राज ने

झूठ बोलकर बहका दिया था कि उसे अपनी रिसर्च के सिलसिले में दो तीन दिन के लिए कोल्हापुर जाना पड़ रहा है।

इंस्पेक्टर त्यागी तो डॉक्टर जय ओर ज्योति की तस्वीरों को अखबारों में छपवा कर उन्हें तलाश करवाना चाहता था, लेकिन राज ने उससे कुछ दिन इंतजार कर लेने के लिए कहा था, जिसकी वजह से वो अपने इस पुलसिया सुझाव पर अमल नहीं

कर पाया था।

लेकिन अगले दिन ज्योति उन्हें नजर आ गई।

राज और डॉक्टर सावंत एक रेस्टोरेंट से काफी पीकर निकले थे, राज एक दुकान के शे-केस में रखे सामान को देखने के लिए ठहर गया।

अचानक डॉक्टर एक दुकान के शो-केस में रखे सामान को देखने के लिए ठहर गया।

अचानक डॉक्टर सावंत ने उसका बाजू पकड़ कर खींचते हुए तेज स्वर में कहा

"राज ,जरा उधर देखो...।"
 
राज ने हैरत से पलटकर उधर देखा जिधर डॉक्टर सावंत इशारा कर रहा था। सामने ही ज्योति एक छोटा सा पैकेट लिए

अकेली जा रही थी। शायद वो कुछ खरीदकर लाई थी।

"ज्योति....।" राज के मुंह से निकला।

"वही लगमी है।" डॉक्टर सावंत ने जल्दी से कहा, " आओ उसका पीछा करते हैं।"

राज ने समर्थन में सिर हिलाया और दोनों थोड़ा फासला बीच में रखकर ज्योति के पीछे लग गए। ज्योति अपना पीछा किए जाने से लापरवाह सीधी चलती रही।

डॉक्टर सावंत ने कहा

"क्यों न हम किसी पुलिस वाले को बुलाकर उसे गिरफ्तार करवा दें?"

"उससे कोई फायदा नहीं होगा डॉक्टर सावंत।" राज ने कहा, " मैं पहले उसका ठिकाना देखना चाहता हूं, हो सकता है यह पहले की तरह अब भी डॉक्टर जय के साथ ही रहती हो और हम एक साथ दोनों पर हाथ डाल सकें, अगर यह वाकई आम औरत है तो।"

"और अगर यह आम औरत न हुई तो?"

"फिर हम इसकी मदद करेंगे।" राज ने दृढ़ स्वर में कहा।

"ठीक है, पहले इसे आम औरत के तौर पर ही ट्रीट करेंगे, जब तक कोई पक्का सबूत इसके इच्छाधारी नागिन होने का सामने नहीं आ जाता।"

डॉक्टर सावंत खामोश हो गया। कुछ दूर चलने के बाद ज्योति एक जनरल स्टोर में घुस गई। वो दोनों बाहर खड़े उसका इन्तजार करते रहे।

आधे घंटे बाद ज्योति दुकान से बाहर निकली तो उसके पास कुछ और पैकेट थे।

वो फिर आगे चल पड़ी तो डॉक्टर सावंत ने कहा

"ऐसा लगता है कि उसकी गाड़ी यहीं कहीं करीब ही खड़ी है, वर्ना वो इतने पैकेट न उठा लाती....।" ।

"शायद।" राज ने ज्योति की तरफ देखते हुए जवाब दिया।

डॉक्टर सावंत का ख्याल सही निकला। करीब पच्चीस गज के फासले पर एक काली एम्बेसडर कार खड़ी चमचमा रही थी। ज्योति ने हाथों के पैकेट कार की खिड़की में से अन्दर डाल दिए

और दरवाजा खोल कर खुद ड्राईविंग सीट पर बैठ गई।

"अब....।" डॉक्टर सावंत ने राज की तरफ सवालियां निगाहों से देखा।

राज ने फौरन मार्किट में खड़ी दो खाली टैक्सियों की तरफ हाथ से इशारा किया। जब तक टैक्सी राज के करीब पहुंची, ज्योति की काली कार चल दी।

राज ने टैक्सी में डॉक्टर सावंत के साथ बैठते हुए टैक्सी ड्राईवर से कहा

"उस काली ऐम्बेसडर का पीछा करो.....।"

ड्राईवर ने एक बार जिज्ञासा भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा।

"यह पुलिस मैटर है, जल्दी करो।" राज अक्खड़ लहजे में बोला।

ड्राईवर ने बगैर कुछ कहे-सुने टैक्सी स्टार्ट कर दी।

कुछ देर दोनों गाड़ियां शहर केक ट्रेफिक में आगे-पीछे चलती रहीं, फिर ज्योति की कार शहर से बाहर जाने वाली सड़क पर मुड़ गई।

"यह सड़क किधर जाती है?" राज ने ड्राईवर से पूछा।

"गुफाओं और पुराने मन्दिरों के खण्डहरों की तरफ।” ड्राईवर ने सड़क पर नजरें जमाए-जमाए जवाब दिया। डॉक्टर सावंत ने आवाज दबाकर कहा

"लगता है, यह उधर ही जा रही है....।"

"ऐसा ही मेरा भी ख्याल है।" राज ने सिर हिलाकर कहा।

कुछ देर बाद ही दोनों गाड़ियां शहर से बाहर निकल आईं। आगे सड़क बिल्कुल सुनसान थी और काफी दूर तक दिखाई दे रही थी।
 
कुछ देर बाद ही दोनों गाड़ियां शहर से बाहर निकल आईं। आगे सड़क बिल्कुल सुनसान थी और काफी दूर तक दिखाई दे रही थी।

"अगर यह सुनसान गुफाओं और मन्दिरों वाले इलाके में जा रही है तो हम टैक्सी में इसका पीछा नहीं कर सकेंगे।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"फिर क्या करन चाहिए?" राज ने पूछा।

"हमें वापिस जाकर अपनी कार लानी चाहिए। इतना तो हमें पता चल ही गया कि किधर जा रही है...।

"मुमकिन है यह उधर न जाकर कहीं और मुड़ जाए।" राज ने सोचते हुए कहा।

"तो फिर हमारे पास वापस जाने का वक्त नहीं होगा।'

"आपका मतलब है कि हमें टैक्सी में ही पीछा करना चाहिए?"

"हां।'' डॉक्टर ने जवाब दिया।

राज ने आगे झुकते हुए ड्रईवर से कहा

"क्या तुम पहाड़ियों मे जा सकता है सर?"

ड्राईवर ने कहा,

"हमें तो रोजी-रोटी चाहिए, टूरिस्ट लोग जाने कहां-कहां ले जाते हैं हम लोगों को....।"

"पैसे की फिक्र न करो।" राज बोला, "हम तुम्हारी मेहनत का भरपुर मुआवजा दंगे। हम उन पुलिस वालों में से नहीं है जो गरीब के पेट पर लात मारते हैं। तुम बस चलते रहो।"

"तुम्हारी गाड़ी में पेट्रोल तो होगा न?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"जी साहब टंकी फुल है।"

"फिर ठीक है।'' डॉक्टर सावंत संतुष्ट होकर बैठ गया।

ज्योति की कार जिस रफ्तार से जा रही थी, उसी रफ्तार से आगे बढ़ती रही। आधा घंटा गुजर गया तो डॉक्टर सावंत ने कहा

"मुझे हैरत है, क्या अब तक ज्योति को असास नहीं हुआ होगा कि उसका पीछा किया जा रहा है? रोड पर हमारी गाड़ियों के सिवा कोई तीसरी गाड़ी नहीं है।"

"अगर आदमी सन्तुष्ट हो तो वह इधर-उधर ध्यान नहीं देता। फिर उसने तो खुद हमें अपना पीछा करने की दावत दे रखी है।" राज ने बताया।

"हां, वो तो है। लेकिन अगर वो आम औरत है, और डॉक्टर संयज की साजिश में शामिल है, तो मैं पिछले अनुभवों के अधार पर कह सकता हूं कि वा असावधान और बेवकूफ नहीं है।"

"फिर आगे क्या ख्याल है।

"मेरा शुरू से यही ख्याल है कि उसे अपना पीछा किए जाने की जानकारी है।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"हो सकता है, वो इसीलिए इस वीराने में आई हो, ताकि हमें परेशान कर सके।"

"या हमें कोई नुकसान पहुंचा सके?" डॉक्टर सावंत ने ठोस लहजे में कहा।

वो दोनों दबे-दबे स्वर में सरगोशियों में बात कर रहे थे।

"वो कैसे?" राज ने पूछा।

"मुमकिन है यहां उसके कुछ साथ मौजूद हों जो हमें घरे लें।"

"कुछ भी हो!" राज ने कंधे उचकाकर मजबूती से कहा, "इसे स्टेज पर हम लोग वापिस नहीं जा सकते। अब तो होगा, देखा जाएगा।"

"राज...."

"जी..."

"क्यों न हम यहां से लौट कर इतिहास की किताबों में रायगढ़ का इतिहास जानने की कोशिश करें? शायद हमें कुछ जानकारी मिल सके?" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"ठीक है, आज यहां देख लेते हैं, लौटकर किताबें तलाश करेंगे।” राज ने जवाब दिया।
 
तब तक उसकी टैक्सी टीलों और पहाड़ियों के इलाके में पहुंच चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था, पेड़ों के झुण्ड और पौधे दिखाई देने लगे थे। टीले भी जगह-जगह खड़े थे, छोटी-छोटी पहाड़ियों जैसे ही लगते थे। मन्दिरों और पहाड़ का रास्ता उन टीलों के बीच में से ही होकर गुजरता था।

फिर अचानक एक मोड़ पर ज्योति की गाड़ी गायब हो गई। राज ने ड्राईवर से कहा

"जरा रफ्तार तेज करके उस मोड़ तक पहुंचो....।"

ड्राईवर ने रफ्तार तेज कर दी।

लेकिन जब वो मोड़ पर पहुंच कर घूमे तो ज्योति की काली एम्बेसडर गायब थी।

उन टीलों के बीच में से गुजरकर वो लोग एक बहुत पुराने मन्दिर की खण्डहर जैसी इमारत के करीब पहुंच गए। लेकिन पूरी दरम्यानी दूर में उन्हें ज्योति की गाड़ी कहीं नजर नहीं आई।

"यह बो ड्रामा था जिसका मैं इन्तजार का रहा था।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"क्या मतलब?” नीलकण्ड ने पूछा।

"मतलब यह कि उसे पीछा किए जाने के पता था। इसीलिए वो निश्चित थी कि वो जब चाहे हमें चमका देकर गायब हो सकती है। वो यकीनन एक आदम लेकिन शातिर औरत है।"

"लेकिन साहब गाड़ी कोई सुई तो नहीं है...जो एकदम कहीं जेब में डालकर गायब कर दी जाए?" राज ने आगे-पीछे देखते हुए हैरत से कहा।

"इसके बावजूद ज्योति गाड़ी समेत गायब है।"

उन मन्दिरों के करीब एक छोटी सी बस्ती थी। मुश्किल से पचास साठ घर होंगे। उन्होंने बस्ती के करीब पहुंचकर टैक्सी रूकवाई। सड़क के किनारे पेड़ों के झुंड में एक बूढ़ा आदमी लकड़ी छी रहा था, उन्होंने उससे पूछा

"इस तरफ से किसी काली कार को गुजरते हुए देखा है?"

"नहीं।" बूढ़े ने जवा दिया।

नीलकण्ड ने गौर से सड़क को देखा। यह कोलतार की सड़क थी इसलिए टायरों के निशान भी नहीं दिखाई देते थे। डॉक्टर सावंत ने आगे बढ़ कर बूढ़े से पूछा

"क्या पीछे की तरफ से भी कोई रास्ता जाता है?"

"नहीं जाता।” जवाब मिला।

"फिर तो वह कार जयर इधर ही आई होगी। क्योंकि वो इधर ही मुड़ी थी।"

"इधर नहीं आई।"

राज डॉक्टर सावंत के कंधे पर हाथ रखकर एक तरफ ले गया और बोला

"हो सकता है यह बूढ़ा झूठ बोल रहा हो । ज्योति अक्सर इधर आती जाती होगी और ये लोग उसे जानते होंगे, उसके लिहाज में यह झूठ बोल रहा होगा।"

"हो सकता है, ज्योति इसे बताने से मना कर गई हो।"

डॉक्टर सांवत ने कहा।

"इसे पैसे का लालच देकर देखें?"

"ठभ्क है।" डॉक्टर सावंत ने जेब से कुछ नोट निकाले और बूढ़े को दिखाए और बोला, "अगर तुम हमें उस कार का पता बता दो तो ये तुम्हारे हैं...."

बूढ़े के माथे पर सलवटें पड़ गईं और वो रूखाई से बोला

"जब मैंने कार देखी ही नहीं तो नोटों को झलक देख कर झूठ बोल दूं क्या?"

वो रिश्वत कबूल करने को भी तैयार नहीं था। डॉक्टर सावंत ने राज की तरफ सवालिया निगाहों से देखा

"अब?"

"यह भी तो हो सकता है कि वो सच बोल रहा हो।" राज ने सोचते हुए जवाब दिया।

"तो फिर वो कार कहां गई?"

"मुमकिन है वो पीछे ही किसी टीले की आड़ में घूम गई हो।"

"तो फिर अब कहां है?" डॉक्टर सावंत ने कहा, "अब हम क्या करें?"

'मेरा ख्याल है कि हमें मोड़ तक पैदल जाना चाहिए।" राज ने सोचते हुए कहा," अगर वो अधर ही कहीं गायब हुई है तो कार के टायरों के निशान जरूर मिलेंगे।"

"फिर टैक्सी यहीं छोड़ दें?"

"हां। ड्राईवर यही हमारा इन्तजार कर सकता है।" राज बोला

"हम अभी आते हैं। तुम यहीं पर इन्तजार करो।" डॉक्टर सावंत ने टैक्सी ड्राईवर से कहा।

"बहुत अच्छा साहब।” ड्राईवर ने गर्दन हिला दी।

वो दोनों पैदल वापिस चल पड़े। लेकिन आधे रास्ते पर आकर

वो एक नई उलझन में पड़ गए। यहां टीले करीब-करीब थे और हर दो टीलों के बीच में कारों के पहियों के निशान थे। इसका मतलब था कि इधर कारों में सवार लोग आते रहते थे।

"अब क्या ख्या है?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"वो इस तरफ गई....।" राज बोला, " आइए, जरा उधर देखते हैं।"

"क्या टैक्सी वाले को इधर ही बुला लें?"

"क्या जरूर है?"

"तो चलो।"

वो दोनों उन टीलों के दरम्यान से होते हुए आगे बढ़े। टीलो के दरम्यान बने वो कच्चे रास्ते किसी भूल-भुलैया से कम नहीं थे।

चूंकि इस जगह मी पर घास भी फैली हुई थी, इसलिए कारें इधर से गुजर सकती थीं।

थोड़ी देर टीलों के दरम्यान चकराने के बाद डॉक्टर सावंत ने कहा

"मेरे ख्याल में, हम यहां दो-चार दिन भी चकराते रहे तो हासिल कुछ नहीं होगा....।"

"तो क्या वापिस चलें?"

"मेरे ख्याल में तो इस सामने वाले टीले पर चढ़कर देखना चाहिए। शायद कुछ दिखाई दे जाए।"

वो सामने वाले टीले पर चढ़ गए। यह टीला काफी ऊंचा था और उसकी चोटी पर से काफी दूर-दूर तक देखा जा सकता था। उन्होंने ऊपर चढ़ कर देखा तो एक पुरानी सी मन्दिर जैसी इमारत करीब ही बनी हुई थी। इमारत देख कर डॉक्टर सावंत ने कहा

"मुमकिन है....बो इस इमारत में गई हो।"

"हां, मुमकिन है। कम से कम वहां जाकर देखने में कोई हर्ज नहीं हैं।" राज ने जवाब दिया। वो दोनों टीले में उतरकर उस पुरानी इमारत की तरफ चल दिए।

हालांकि ऊपर से इमारत बहुत नजदीक नजर आ रही थी, लेकिन रास्ता चूंकि टीलों के बीच में चकराते हुए था, इसलिए वहां पहुंचते-पहुंचते उन्हें आधा घंटा लग गया। राज ने कहा

"ड्राईवर बेचारा इन्तजार कर रहा होगा...."

"मैं भी यही सोचा रहा था। कहीं वो ऐसा ने सोचे कि हम उसके पैसे लेकर उसे छोड़ गए हैं ?"

"ऐसे तो नहीं सोचेगा।” राज ने मुस्कराकर कहा, "सूरत-शक्ल से तो हम शरीक ही नजर आते हैं।"

"हां, यह संयोग ही है, हमारी कोई कोशिश नहीं होती ऐसा दिखने की।" डॉक्टर सावंत हंस पड़ा।

यों ही बातें करते हुए वो मन्दिर तक पहुंच गये। वो दोनों इमारत के दरवाजे पर ठहरा गए। डॉक्टर सावंत दरवाजे पर खुदा लेख पढ़ने लगा, फिर वो बोला

"राज, क्या तुम मुझे सहारा देकर थोड़ा ऊपर उठा सकते हो?"
 
"किसलिए?"

"मैं जरा उन अक्षरों को पास से देखना चाहता हूं।"

"जरूर उठा सकता हूं।"

"कैसे उठाओगे?"

"मैं दरवाजे का सहारा लेकर झुक जाता हूं, आप मेरी पीठ पर खड़े हो जाईए और आराम से पढ़ लीजिए।"

"तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं होगा ?"

"अरे बिल्कुल नहीं। आप आईए।"

"फिर ठीक है।"

सावंत ने जूते उतारे और राज के कंधों पर सवार हो गया। कुछ देर तक वो उन अक्षरों को गौर से देखता रहा जो उस इमारत के दरवाजे के ऊपर खुदे हुए थे। फिर नीचे कूदते हुए बोला

"यह पुराने जमीने में नाग देवता का मन्दिर रहा है। मेरा अन्दाजा दुरुस्त निकला। ज्योति अगर कहीं मिलेगी तो ऐसी ही जगह मिलेगी।" डॉक्टर सावंत ने जवाब दिया-"संस्कृत में लेख है, बहुत पुराना। ज्योति और डॉक्टर जय ने बड़ी चालाकी से यह ठिकाना चुना है।"

"यानि अगर ज्योति वाकई नागिन है तो इससे अच्छी जगह उसे कोई नहीं मिल सकती थी..।"

"हां।" डॉक्टर सावंत ने कहा, "आओ, जरा अन्दर से देखते

"अन्दर जाकर हमने क्या देखना है।"

"मैं एक बार अन्दर जाकर अपने सन्देह की पुष्टि कर लेना चाहता हूं कि वाकई यह ज्योति और डॉक्टर जय का गुप्त हैडक्वार्टर है या नहीं।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"चाहिए।" राज ने गहरी सांस ली।

कमरे में एक अजीब किस्म की गंध फैली हुई थी और एक चौकरी पर पत्थर एक सन्दूक रखा था, जिसका ढक्कन खुला हुआ था।

"ये खुशबू कैसी है?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"मुमकिन है यह भी किसी आत्मा की खुशबू हो, या नागिन वगैरह की हो...।" राज बोला।

"इतनी पुरानी इमारत है, क्या पता यहां कौन-कौन से चमत्कार बंद है।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

ताबूत करीब दो फुट गहरा था और इतना लम्बा था कि उसमें एक आदमी आराम से लेट सकता था।

राज ने पहले कमरे का एक चक्कर काट कर सरसरी तौर पर जायजा लिया, फिर ताबूत जैसे उस सन्दूक वाले चबूतरे पर चढ़ गया।

लेकिन ऊपर पहुंचते ही उसकी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे ही रह गई। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके पूरे जिरूम में बिजली की लहरें दौड़ा दी हों।

क्योंकि ताबूत खाली नहीं था।

डॉक्टर सावंत ने शायद राज के चेहरे के भाव पढ़ लिए थे और अन्दाज लगा लिया था कि कोई खास बात है । इसलिए वो भी चबूतरे पर चढ गया। ताबूत में नजर पड़ते ही उसकी हालत भी राज जैसी ही हुई।

ताबूत में एक लाश थी, जो सिर से पैर तक सफेद चादर से ढकी हुई थी।

"लाश.... ।” डॉक्टर सावंत ने सरसराते हुए लहजे में कहा।

"हां....लाश की लगती है। न जाने किस बदनसीब की लाश है।" राज ने आहिस्ता से कहा।

राज ने हाथ बढ़ा कर वो चादर खींच ली, और एक बार फिर उसका दिल उछल पड़ा। वो लाश ज्योति की थी।

राजकुमारी ज्योति की नहीं बल्कि आम ज्योति की , जो कभी सतीश की बीवी थी।

और....अभी वो दोनों इन झटकों से उभर भी नहीं पाए थे कि एक और हैरत भरी घटना घट गई, जिसने उनके रहे-सहे होश भी उड़ा दिए। लाश ने आंखें खोल दी थी ओर उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई थी।

राज हालांकि एक बार पहले भी ज्योति की लाश की जिन्दा होकर चलते हुए देख चुका था और वो स्वभाव से भी बुजदिल नहीं था, लेकिन इस महौल में लाश की आंखें खोलकर मुस्कराते देखकर उस पर इतना खौफ छा गया कि उसका जी चाहा कि वो चबूतरे से कूदकर बाहर भाग जाए।

मुमकिन है कि अगर डॉक्टर उसके साथ ने होता तो राज भाग खड़ा होगा या फिर दहशत से बेहोश ही हो गया होता। क्योंकि वो दो थे, इसलिए उनकी हिम्मत बंधी रही।
 
फिर भी कुछ देर तक वो दोनों हमप्रभ खड़े रहे, जैसे वो जिन्दा इन्सान न हों बल्कि उन्हें ममी बनाकर रख दिया गया हो।

वो असली ज्योति थी। हाड़-मांस की ज्योति। वो उनहें स्तब्ध खड़े देखकर उठा खड़ी हुई और अपनी सुरीली आवाज में बोली

"डॉक्टर राज, मैं आपका अभिवादन करती हूं...।"

उसकी आवाज सुनकर राज को अपने जिस्म में हरारत दौड़ती महसूस हुई, उसने ताबूत का सहारा ले लिया।

"तो....तुम वाकई ज्योति हो?"

"हां मैं वाकई ज्योति हूं। क्या तुम्हें कोई शक है?" वो मुस्करा रही थी।

"तो वो कौन थी जो डॉक्टर सावंत के घर हमें इच्छाधारी नागिन बनकर दिखा गई थी और हमसे सहयोग मांग रही थी?"

"वो भी मैं ही थी। ज्योति एक ही है।"

"तो फिर तुम दोबारा यहां आकर लाश बन कर क्यों लेट गईं, क्या अब तुम्हें हमारी मदद की जरूरत नहीं रही?"

राज ने संजीदा लहजे में पूछा।

"यह तो मेरा स्थाई स्थान है, कहां जाती मैं?" ज्योति ने कहा, "इसी सन्दूक में तो मैं छ: सौ साल में पड़ी हूं।

हां, जब कभी डॉक्टर जय की आज्ञा होती है तो मैं उसके बताइए हुए कि किसी मानव के साथ, उसे पति बनाकर, कुछ दिन उसके पास रह आती हूं। यहीं पर तो मेरी मणि खोई थी

और बाद में यहीं पर डॉक्टर जय से मेरी भेंट हुई थी। वो इस नाग मन्दिर में सांपों का प्राचीन इतिहास ढूंढने आया था।" ज्योति ने कहा।

"और मेरा आखिरी सवाल....।" राज ने पूछा

"कौन सा सवाल?' ज्योति ने पूछा।

"क्या तुम्हें हमारी मदद की जरूर नहीं है?"

"नहीं।"

"क्यों, अब क्या हो गया है? उस दिन तो भइया-भाई कहकर मदद मांग रही थीं?"

"हां, सहायता मांग रही थी। लेकिन अब मेरा डॉक्टर जय से समझौता हो गया है।” ज्योति ने मुस्करा कर बताया।

"कैसा समझौत?” राज ने हैरत से पूछा।

"तुम्हें खत्म करने के बाद वो मेरी मणि मुझे लौटा देगा, और मैं वापिस नागलोक चली जाऊंगी।'

"तो क्या तुम्हारी मणि डॉक्टर जय के पास थी?" राज ने पूछा।

"नहीं। वो कहता है कि उसने कल ही इस पुराने मन्दिर में से ढूंढ निकाली है।" ज्योति ने कहा।

"क्या तुमने वा मणि देखी है?"

"नहीं। लेकिन वो यहीं कहीं है....।" ज्योति ने कहा।

"तुम्हें कैसे पता है?"

"ऐसे कि जब मणि हमारे आसपास होती है तो हम लोग चाहें किसी भी शरीर में हों, हमारे उस शरीर की शक्ति और कांति

बढ़ जाती है।" ज्योति ने कहा।

"और अब तुम फिर से डॉक्टर जय के साथ मिलकर मेरी दुश्मन बन चुकी हो?"

"मजबूरी है डॉक्टर राज। मुझे नागलोक लौटना ही है, किसी भी कीमत पर। मेरे सब परिजन चिंतित होंगे। वहां छ: वर्ष व्यतीत हो गए होंगे।" ज्योति ने गहरी सांस ली, जैसे नागिन फुकारी हो।

"मैं तो उस दिन को कोसता हूं जब तुमने सतीश से शादी की थी....और मैंने तुम्हारी शक्ल देखी थी।"

"मैं भी यही सोचती हूं कि सतीश से शादी करके मैंने भारी भूल की थी। खैर....ये शायद डॉक्टर सावंत हैं?"

ज्योति ने अचानक पूछा।

डॉक्टर सावंत अब तक खामोश खड़ा था। उसने सिर झुका कर कहा

"जी, हां आदरणीय ज्योति जी। मैं ही डॉक्टर सावंत हूं और राज से आपकी बहुत तारीफ सुनता रहा हूं।"

"आप ही शायद उस दिन भी इनके साथ लेब्रॉटरी में थे ?"

'जी हां, मैं ही था।"

"मैं भी नमस्मार करता हूं डॉक्टर सावंत।"

एक आवाज ने राज और डॉक्टर सावंत, दोनों को ही चौंका दिया। उन्होंने पलटकर देखा तो डॉक्टर सावंत एक दरवाजे से

अन्दर दाखिल हो रहा था।

यह दरवाजा उन दोनों ने पहली बाद देखा था। दरवाजा भी क्या था, किसी मैकेनिज्म से दीवार में लगा एक बड़ा पत्थर एक तरफ सरक गया था और उस खाली हुए स्थान से डॉक्टर जय अन्दर आ रहा था।

डॉक्टर जय के चेहरे पर समय की छाप स्पष्ट दिखाई देने लगी थी, उसके बालों में सफेदी बहुत ज्यादा झलकने लगी थी और चेहरे पर झुर्रियों का जाल सा फैल गया था। लेकिन इतने साल बीत जाने के बावजूद ज्योति वैसी ही हसीन और जवान थी।

डॉक्टर सावंत ने डॉक्टर जय के चेहरे पर नजरें जमा कर कहा

"डॉक्टर जय, हालांकि दस-बारह साल बाद हम मिल रहे हैं, लेकिन मैंने आपको पहचान लिया है।" ।

"यह मेरी खुशकिस्मती है डॉक्टर सावंत । लेकिन अफसोस भी है कि उस वक्त हम दो दोस्तों की तरह मिले थे और आज दुश्मनों की तरह आमने-सामने खड़े हैं।" डॉक्टर जय ने कहा, "मुझे हालांकि आपसे कोई दुश्मनी नहीं है, लेकिन इस तरह के हालात

पैदा हो चुके हैं कि अब आप....।'
 
उसने अपने बात अधूरी छोड़ दी और पलटकर बड़ी अजीब सी भाषा में दरवाजे की तरफ कुछ कहा।

फौरन ही उस खाली स्थान से तीन लम्बे चौड़े और खूखार चेहरे वाले आदमी हाथों में में रिवाल्वर लिए अन्दर आ गए।

डॉक्टर जय ने पलटकर राज से कहा

"अब आप लोग मेरे साथ चलिए।"

"कहां?" डॉक्टर सावंत ने पत्थर के चबूतरे से नीचे उतरते हुए पूछा।

"अभी पता चल जाएगा।" जय ने जवाब दिया।

उन दोनों के पास जय का हुकम मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। वो खामोशी से उसके इशारे पर दीवार के उस खाली स्थान में दाखिल हो गए।

दूसरी तरफ पहुंचकर राज और डॉक्टर सावंत स्तब्ध रह गए। यह कतरा नहीं था, बल्कि एक सुसज्जित और आधुनिक लेब्रॉटरी थी।

यह बहुत लम्बा चौड़ा हॉल था और यकीनन तहखाने में था। हॉल की पथरीली दीवारों में खाने बने हुए थे और दीवारों के साथ-साथ मेजों की कतारें लगी हुई थीं। मेजों पर आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण और मशीनें सजी हुई थीं। दीवार के खानों में कई साईज और कई किस्म की शीशे की ट्यूब और मर्तबान वगैरह सजे हुए थे। हाल के आखिरी सिरे पर एक और दरवाजा नजर आ रहा था।

तीनों खूखार आदमी रिवाल्वर थामें राज और डॉक्टर सावंत को घेरे में लिए हुए थे । ज्योति अब बढ़ कर डॉक्टर जय के पहलू में जा खड़ी हुई थी।

डॉक्टर जय ने ज्योति की कमर में हाथ डालते हुए डॉक्टर सावंत ने कहा

"डॉक्टर सावंत, क्या आपको मेरी लेब्रॉटरी पसंद आई?"

"बहुत ज्यादा।” डॉक्टर सावंत ने अपने गुस्से को दबाते हुए कहा, "लेकिन मुझे आपकी इस असम्य हरकत की वजह समझ नहीं आ रही। ये आदमी....ये पिस्तौलें....।"

"मुझे अफसोस है डॉक्टर सावंत ।” डॉक्टर जय बोला, ''मैं मैं अच्छा दोस्त खो देने वाला हूं। काश....हमारी यह दूसरी मुलाकात डॉक्टर राज के बगैर हुई होती। आप चूंकि डॉक्टर राज के साथ आए हैं, इसलिए मैं आपको भी अपना दुश्मन समझने पर मजबूर हूं। यकीनन आपको डॉक्टर राज ने पिछली सभी घटनाओं के बारे में बता दिया होगा?"

"लगभग....।"

"फिर आप खुद ही समझ सकते हैं। बदकिस्मती से मैं और डॉक्टर राज जानी दुश्मन बन चुके हैं। इनकी वजह से मुझे कई जगह बना-बनाया काम छोड़कर और करोड़ों की चोट खाकर भागना पड़ा था। अब ये यहां भी पहुंच गए हैं और मेरे शांत जीवन में इनकी वजह से फिर भूचाल आ गया है। अब इसके अलावा और कोई चारा नहीं कि मैं इन्हें रास्ते से हटा दूं। अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि इस आसमान की नीचे अब हम दोनों में से एक ही जिन्दा रह सकता है।

लेकिन मुझे अफसोस है कि मुझे डॉक्टर राज के साथ अब आपको भी खत्म करना होगा। आपका जिन्दा रहना भी मेरे लिए खतनाक साबित होगा। लेब्रॉटरी मुझे जान से त्यारी है और में बड़े जतन से पिछले तीस वर्षों से उसे गुप्त रखे हुए था और गुप्त ही रखना चाहता हूं।

डॉक्टर सावंत ने बेबसी से राज की तरफ देखा। राज की तरफ देखा। राज भी इस स्थिति में क्या कर सकता था! वो बड़े दुख से सोच रहा था कि उसकी वजह से डॉक्टर सावंत इस मुसीबत में फंस गया था। फिर भी उसने कहा

"डॉक्टर जय, डाक्टर सावंत का उसमें कोई दोष नहीं है यह निर्दोष है। मुझे अफसोस है कि हम दोनों के लिए यह दुनिया बहुत तंग हो गई है और हम मोड़ पर हम एक-दूसरे से टकरा जाते हैं। लेकिन यकीन कीजिए, हमारे बार-बार इस तरह टकराने के पीछे जरूर किस्मत का ही हाथ है और इस आंख-मिचौली को अंत भी होगा। जब हम दोनों में से एक इस दुनिया से उठा जाएगा।" राज ने गम्भीरता से कहा।

"इस बार यही होगा डॉक्टर राज ।” डॉक्टर जय ने सख्त लहजे में कहा, "चार बार आप मेरे हाथों से बचकर निकल चुके हैं, लेकिन किस्म का पांसा हमेशा एक ही करवट नहीं गिरता।"

"मेरा भी यही ख्याल है, लेकिन एक फर्क है मेरी जिन्दगी किसी के लिए खतरा नहीं है और आपके जिन्दा रहने से पूरी इन्सानियत को खतरा है। मैं आपकी जहानत का लोहा मानता हूं लेकिन अफसोस यह है कि इस बुद्धि का इस्तेमाल आपने जुर्म करने में किया, वो भी किसी घटिया डकैत की तरह दौलत के लिए। आप जिंदा रहने के काबिल नहीं हैं डॉक्टर जय वर्मा।"

डॉक्टर जय ने एक खौफनाक कहकहा लगाया और बोला

"इस बात का फैसला आज हो जाएगा डॉक्टर राज, कृपया मेरे साथ आईए। आप क्योंकि खुद जहरों के माहिर साईटिस्ट हैं, इसलिए मैं आपको अपनी लेब्रॉटरी दिखाना चाहता हूं। इन्सान की यह स्वभाविक कमजोरी होती है कि वो अपने आप को तारीफ दूसरे कलाकारों से सुनना चाहता है। डॉक्टर सावंत,

कृपया कोई गलत कदम उठाने की कोशिश मत कीजिएगा। इस जगह से बचकर निकल पाना नामुमकिन है।"

डॉक्टर सावंत सिर्फ गुर्रा कर रह गया। डॉक्टर सावंत और राज, जय और ज्योति के पीछे-पीछे रिवाल्वरों के घेरे में चलते हुए दूसरे कमरे में आ पहुंचे।

यह कमरा भी पहले कमरे की तरह लम्बा चौड़ा हॉल था और हॉल के मध्य में दो बड़े-बड़े हॉल थे। जिनमें गुलाबी रंग का कोई तरह पदार्थ था। वो तरह पदार्थ खौल रहा था। दोनों हौजों से भाप उठा रही थी और एक अजीब किस्म की गंध हॉल में भरी हुई थी। डॉक्टर जय ने हौजों की तरफ इशारा करते हुए कहा

"यह इन्सानी लाशों को ममी बनाने को मसाला है।"

कुछ देर के लिए राज उस खतरे को भूल गया तो उनके सिरों पर मंडरा रहा था, उसने उन दोनों हौजों में दिलचस्पी लेते

हुए कहा

"क्या इस मसाले में लाशें देर तक अपनी असल हालत में रह सकती हैं?"

"यकीनन । ममी बनाने का यह तीरका बहुत पुराना है। करीब पांच हजार साल पहले मिस्त्र के धार्मिक कहान इसी ढंग से लाशों को ममी बना कर सुरिक्षत रखा करते थे। इसी पुराने मन्दिर में मुझे एक हस्तलिखित किताब मिली थी, जिसमें यह मसाला बनाने को नुस्खा लिखा हुआ था।"

राज का जेहन बड़ी तेजी सक कम कर रहा था। वो चाहता था कि किसी तरह बातों में टाईम पास किया जाए और डॉक्टर जय की वक्त गुजरने का अहसास न हो। हालांकि इस जगह कोई मदद पहुंचने की उसे कोई उम्मीद नहीं थी-फिर भी इन्सानी फितरत है कि वो कभी उम्मीद को दामन नहीं छोड़ता।

वो सोच रहा था, शायद कोई चमत्कार हो ही जाए। मुमकिन है इन्तजार से उकताकर टैक्सी ड्राईवर उन्हें तलाश करता हुआ इधर आ निकले । या वो वापिस ही चला जाए और पुलिस में उनकी शिकायत करे कि वो उसके किराये के पैसे लेकर गायब हो गए हैं। मुमकिन है वो इंस्पेक्टर विकास त्यागी नजर में आ जाए और वा मामले की अहमियत को समझकर इधर आ जाए।

लेकिन यह सब बहुत दूर की और धुंधली सी उम्मीदें थीं। यह जमाना चमत्कारों को नहीं था, न ही हर वक्त ऐसे संयोग घट सकते थे जो उनकी फेवर में जाते।

इसके बावजूद राज वक्त चाहता था, इसलिए वो डॉक्टर जय को बातों में उलझाए रखना चाहता था। इसक अलावा डॉक्टर जय की लेब्रॉटरी में भी राज की दिलचस्पी थी

और उसकी जिज्ञासा डॉक्टर जय की लेब्रॉटरी और इस प्राचीन मन्दिर के सारे राज जान लेने के लिए उकसा रही थी।

राज जानना चाहता था कि अभी किस तरह तैयारी की जानी है कि वो ज्योति के जिस्म को जवान रखने के लिए क्या चीज इस्तेमाल करता था। वो समझा रहा था कि इस वक्त तो चेहनी हालत उकसी है, वही डॉक्टर सावंत की भी होनी चाहिए थी।
 
आखिर राज से नहीं रहा गया तो उसके डॉक्टर जय से पूछा ही लिया। वो मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोला

"डॉक्टर जय, मुझे मरने को दुख नहीं है, लेकिन मैं कुछ बातें जरूर जानना चाहता हूं जो मेरे लिए हैरत की वजह बनी हुई हैं। अगर मुझे मरना ही है तो इन सवालों का बोझ साथ लिए क्यों मरूं?"

डॉक्टर जय ने मुस्कराकर कहा

''मैं आपकी यह इच्छा जरूर पूरी करूंगी डॉक्टर राज ।

आफ्टर ऑल, किसी जमाने में हम दोस्त कहला चुके हैं। पूछिए, क्या पूछना चाहते हैं आप?"

"पहली बात तो मैं यह पूछना चाहता हूं कि ज्योति पर वक्त का असर क्यों नहीं दिखता? यह अब से दस साल पहले भी ऐसी ही थी, बल्कि मैं समझता हूं कि गुजरते वक्त के साथ-साथ इसके दिखने लगी है....जबकि आप बूढ़े हो गए हैं....।"

"मैंने भी इस रहस्य पर बहुत कुछ सोचा है, लेकिन मेरी समझ में सिर्फ एक ही बात आती है। डॉक्टर जय ने कहा।

"कौन सी बात?"

"उसी मिस्त्री सांप का जहर, जिसके दांत नहीं होते।"

"जिसकी जहर ज्योति सतीश पर इस्तेमाल कर ही थी।"

"हां, वही।"

"लेकिन वो जहर तो बहुत ज्यादा खतरनाक होता है।"

"यकीनन होता है लेकिन जब वो जिस्म में दाखिल होकर खून में मिल जाए। ज्योति उस जहर को सिर्फ गालों पर लगाती थी।

उसका बहुत ही कम असर रोम-छिद्रों द्वारा होता था, और चूंकि पहले में इसके जिस्म में एक इच्छाधारी नागिन की अत्मा है, इसलिए

वो जहर इसके जिस्म पर अमृत का सा असर दिखा रहा है।

"मुमकिन है, ऐसा ही हो।" डॉक्टर सावंत ने सिर हिलाते हुए कहा, "हर जहर में मारक क्षमता के साथ-साथ कोई न कोई जीवनदायक तत्व भी जरूर मौजूद होते हैं। काश....मैं उस जहर की इस खूबी पर कुछ परीक्षण कर सकता। अगर मेरा परीक्षण सफल रहता तो इन्सानी जिन्दगी में एक क्रान्ति आ सकती थी।"

थोड़ी देर खामोश रहकर डॉक्टर सावंत ने जय से कहा

"डॉक्टर जय, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम पिछली घटनाओं को भूल कर इन्सानियम की भलाई के लिए काम करें? कम से कम मैं आपके तमाम जुर्मों को नजरअन्दाज करने के लिए तैयार हूं। आप इन्सानियत के लिए अब भी काम करते हैं तो आपके तमाम पिछले गुनाह भुलाए जा सकते हैं।"

डाक्टर जय ने एक गगनभेदी कहकहा लगाया और फिर बोला

"डॉक्टर सावंत, आप मुझे उल्लू का पट्ठा समझते हैं या मेरे दिमाग पर शक करते हैं? या फिर मेरा अपमान करना चाहते हैं? मेरे दोस्त, मैं एक जहरीले सांप पर भरोसा कर सकता हूं लेकिन राज साहब पर नहीं । और जिन्हें तुम इन्सान कहते हो, मैं उन्हें दरिन्दा समझता हूं, मैं इन इन्सानों के सहारे रहता तो ये मुझे गंदी नाली में किसी कीड़े की तरह रेंगने पर मजबूर करे देते। मैंने जो कुछ हासिल किया है, अपने दिमाग और अपनी ताकल के बल पर किया है। इन्सानों से नफरत है मुझे। मुझे आप सब लोगों से नफरत है। मैंने अपनी जिन्दगी के तेरह साल एक अनाथालय में ऐड़ियां रगड़-रगड़ कर आम लोगों की इन्सानियत को खूब परखा है।"

डॉक्टर सावंत ने सिर हिलाते हुए कहा

"हो सकता है आपका वास्ता कुछ गलत इन्सानों से पड़ गया हो। लेकिन दुनिया में सब इन्सान एक जैसे ही होते हैं।"

"होते होंगे, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। मैं सिर्फ उन्हीं इन्सानों को जानता हूं जिनसे मेरा वास्ता पड़ा है। और मुझे उन सबने इन्सानियत से नफरत का पाठ ही पढ़ाया है।"

"लेकिन ज्योति भी तो एक औरत है न, इन्सान!" राज ने बात बनाने के लिए कहा।

"नहीं।" डॉक्टर जय ने मजबूत लहजे में कहा, "ज्योति इन्सान नहीं, एक नागिन है। यह भी इन्सानियत की उतनी ही बड़ी दुश्मन है जितना बड़ा मैं हूं। बहरहाल, वक्त बहुत कम है, और यह बहस ऐसी है कि चाहें जितनी लम्बी खींच लो, यह कभी खत्म नहीं होगी। आईए, मैं आप लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए मैं आपको लेब्रॉटरी का कुछ खास हिस्सा दिखाता हूं। मैं भी नहीं चाहता कि मरे से पहले आप लोगों की कोई हसरत बाकी रह जाए। आप लोगों की मौत से पहले मैं आपको अपनी महानता का अहसास दिला देना चाहता हूं।"

डॉक्टर जय को भी गुजरते वक्त का अहसास हो चुका था

और राज कुछ समय और खींचना चाहता था, इसलिए वो जल्दी से बोला

"डॉक्टर जय, क्या आप हमें ममी तैयार करने का तरीका नहीं बताएंगे?"

"अभी लीजिए साहब.....।" डॉक्टर जय ने मुस्कराकर कहा

और तीनों पिस्तौलबाजों को उसी अज्ञात भाषा में कुछ समझाने लगा।

फौरन ही एक रिवाल्वर वाला सामने दिखाई देने वाले दरवाजे में घुसकर गायब हो गया।

दस मिनट बाद ही दो आदमी एक लाश उठाए अन्दर दाखिल हुए। यह किसी जवान औरत की लाश थी और लाश ताजा लगती थी या फिर डॉक्टर जय ने किसी तरीके से उसे सुरक्षित कर रखा था। उसके चेहरे पर मुर्दनी के भाव नहीं थे। ऐसा लगता था, जैसे वो सो रही हो। लाश बिल्कुल नंगी थी।

मरने वाले का जिस्म कोई आकर्षण नहीं रखता था, लेकिन वो भरपूर जवानी में चल बसी थी। डॉक्टर जय का इशारा पाकर उन्होंने लाश को हौज में डाल दिया, जिसमें गुलाबी रंग का कोई रसायन खोल रहा था।

लाश उस खौलते हुए रसायन की तह में बैठ गई। डॉक्टर जय घड़ी देखता रहा । एक मिनट एक मिनट बाद उसने फिर अपने आदमियों को इशारा किया।

उन्होंने हौज पर लगा हुआ एक चक्का घुमा दिया और हौज में से एक तख्ता जभरकर ऊपर आ गया, जिस पर लाश रखी हुई थी। अब उस लाश का गुलाबी रसायन की एक तह चढ़ चुकी थी। डॉक्टर सावंत ने फिर अपने आदमियों से कुछ कहा।

उन्होंने वो पूरा तख्ता उठाकर दूसरे हौज में डाल दिया। इस हौज में भी गुलाबी रसायन मौजूद था, लेकिन इसका तापमान

बहुत कम था।

करीब दस मिनट बाद उस हौज में से भी लाश की बाहर निकाल लिया गया। इस बार लाश के हर हिस्से पर कोई मोम की तरह गाढ़ा-गाढ़ा पदार्थ जम गया था। उस मोम जैसे पदार्थ के नीचे लाश के सारे नैन-नक्श छुप गए थे।
 
दस मिनट और गुजर जाने के बाद डॉक्टर जय ने कहा-"अब यह ममी तैयार है। यह दूसरा मसाला मोम की तरह लगता है, लेकिन यह गर्मी से पिघलता नहीं है। चौबीस घंटे बाद यह सूख कर रबड़ की तरह सख्ख हो जाता है। इसका चेहरा अब किसी खास औरत का चेहरा नहीं है, बल्कि नाजुक उपकरणों द्वारा इसके नाक-नक्श इच्छानुसार बनाए जा सकते हैं। चौबीस घंटे बाद वो नाक-नक्श स्थाई हो जाएंगे, फिर उन्हें बदला नहीं जा सकेगा।"

राज ने मुस्कराकर कहा

"अलबत्ता, स्प्रिट के जरिये इस मसाले को साफ किया जा सकता है।"

"हां, डॉक्टर राज ! इसीलिए मैंने कहा था कि इस आसमान के नीचे हम दोनों में से एक ही जिन्दा रह सकेगा। आप खतरनाक हद तक जीनियस हैं।"

तभी डॉक्टर सावंत बोल उठा

"हमें कत्ल करके आप भी नहीं बच सकेंगे डॉक्टर जय।"

"मेरे इस ठिकाने की आप दोनों के अलावा किसी को जानकारी नहीं है। कोई साबित नहीं कर सकता कि मेरे आप लोगों से पुरानी दुश्मनी थी। सुबह आपकी लाशें आपके घर भेज दी जाएंगी।

"तो आप हमारी लाशों की ममी नहीं बनाएंगे? राज ने रूखे लहजे में में पूछा।

"आप बड़े हिम्मत वाले और दिलेर भी हैं डॉक्टर राज।" जय ने कहा, "अपनी मौत के बारे में आप इस तरह उत्सुकता से पूछ रहे हैं जैसे लवर से मिलना हो?"

"यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है?"

"आपके सवाल का जवाब यह है कि मिस्टर राज कि मैं आपकी लाशों की ममी नहीं बनाऊंगा। एक अन्य किस्म के जहर से आपकी मौतें होंगी, सुबह को आप दोनों की लाशें डॉक्टर सावंत की लेब्रॉटरी में पड़ी हांगी और दो-तीन मामूली किस्म के जहरीले सांप आपके आसपास रेंग रहे होंगे। पुलिस यही समझेगी कि आप लोग सांपों के साथ कोई प्रयोग कर रहे थे, उन्हीं सांपों में से कुछ सांप खुले रह गए और उन्होंने आप दोनों को डस लिया। किसी को यह सन्देह भी नहीं होगा कि आप दोनों को कल किया गया है।" ।

राज को अन्दर ही अन्दर एक झुरझुरी सी आ गई और वो कल्पना में डॉक्टर सावंत की लेब्रॉटरी में पड़ी अपनीलाश देखने लगा।

फिर अचानक डॉक्टर सावंत की आवाज ने उसकी कल्पना को तिलिस्म तोड़ दिया। वो कह रहा था

"जिन्दगी और मोत का फैसला ऊपर, आसमानों पर होता है डॉक्टर जय। कोई भी इन्सान किसी की किस्मत का फैसला नहीं कर पाया आज तक।"

"देखेंगे।" डॉक्टर जय ने लापरवाही से कहा। उसके बाद अपनी घड़ी देखते हुए बोला, "मेरे ख्याल में अब आपकी जिज्ञासा शांत हो चुकी होगी....या अभी कुछ और पूछना बाकी है?"

"मैं सिर्फ एक और बात पूछना चाहता हूं।" डॉक्टर सावेत ने कहा।

"पूछिए।

"क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है जिससे आप इन्सानियत की भलाई के लिए काम कर सकें?"

डॉक्टर सावंत ने हंसकर कहा

"नहीं डॉक्टर सावंत। मैं अपने काम से संतुष्ट हूं, इसलिए मुझ पर आपका नैतिकता भरा लेक्चर कोई असर नहीं दिखा पाएगा।

उसके बाद उसने पलट कर ज्योति से कहा

"ज्योति डार्लिंग, आज मैं बहुत खुश हूं, क्योंकि इस जमीन पर हमारा सबसे खतरानक दुश्मन हमारी दया पर है।" ।

ज्योति काफी देर से खामोश खड़ी थी। पहली बार उसके होठों पर मुस्कराहट उभरी और उसकी आंखें इस तरह चमकने लगीं जैसे जहरीली नागिन की गोल-गोल आंखें चमकती हैं। वो बोली

"जय, क्या इन लोगों की आसान मौत तुम्हारे इन्तकाम की आग को ठण्डा कर सकेगी ?"

"फिर तुम क्या चाहती हो डार्लिंग ? क्या ये लोग जिन्दा रहें?"

"नहीं। मैं इन लोगों को जिन्दा नहीं देखना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि इनकी मौत एकदम न हो। ये दोनों धीरे-धीरे मोत की तरह सरकते हुए सिसक-सिसक कर मरें। धीरे-धीरे इनकी नसों में मौत का जहर फैले। मौत का पंजा आहिस्ता-आहिस्ता इन लोगों को शिकंजे में ले। मैं इनको तड़पते हुए देखना चाहती हूं

डॉक्टर जय कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला

"क्यों न हम इनका इस्तेमाल अपनी लेब्रॉटरी में करें? जिस तरह हम खरगोशों वगैरह पर अपने जहरों का परीक्षण करते हैं, इस तरह इनकी मौत का पीरियड लम्बा होता जाएगा।"

"हां।" जय ने सिर हिलाकर कहा,

"और मैं चाहती हूं कि इनके मरने के बाद इनकी लाशों की ममी बनाई जाए, ताकि हम वक्त-वक्त पर इन्हें देख कर खुश होते रहें।"

वो दोनों खामोशी से अपनी किस्मत का फैसला सुन रहे थे। राज को भी अब यकीन हो चला था कि अब इनका आखिरी वक्त आ चुका है। खौफ सर्द लहरों की तरह उसकी रीढ़ कह ही में दौड़ रहा था और उसके जिस्म में झनझनाहट सी पैदा कर रहा था।
 
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