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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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आखिर...जब वो मायूस होकर पलटने वाले थे कि अचानक नीकण्ठ को सफेद दीवार पर एक छोटा सा सुराख नजर आया। वो सुराख इतना छोटा था कि उस पर किसी किस्म का सन्देह नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस वक्त राज को न जाने क्या धुन सवार हुई कि उसने लोहे की एक बारीक रेती का पिछला हिस्सा उस सुराख में डाल कर इधर-उधर घुमाया। फिर जरा सा रेती को दबाया तो ऐसी आहट हुई जैसी कोई खटका दबा हो।

दूसरे ही क्षण डॉली ने खुशी से हल्की सी एक चीख मारकर मजबूती से राज का कंधा थाम लिया। राज ने पलट कर देखा तो सामने वाली दीवार में एक दरवाजा आहिस्ता-आहिस्ता खुलता जा रहा था।

"शुक्र है, अन्धेरे में फेंका तीर निशाने पर जा लगा।" राज ने कहा और डॉली का हाथ पकड़ जल्दी से अन्दर दाखिल हो गया। टार्च की रोशनी में बिजली का स्विच तलाश करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई थी उसे।

तेज रोशनी में उन्होंने देखा, कमरे में चारों तरफ शीशे लगी हुई अलमारियां थीं जिनमें तरह-तरह के औजार रखे हुए थे। एक छोटी सी अलमारी में दवाओं की शीशियां भी रखी हुई थीं।

“यही वो जगह है जिसकी हमें तलाश थी। राज ने अलमारी की तरह इशारा करते हुए कहा।

लेकिन डॉली राज की बात अनसुनी करके कोने में रखी मेज को हैरत से देखे जा रही थी। अभी तक चूंकि राज ने कमरे पर सरसरी निगाह ही डाली थी, इसलिए उसका ध्यान मेज की तरफ नहीं गया था। अब उसने मेज की तरफ गौर से देखा, तो वह भी खौफ से चकरा गया।

यह मेज उसी तरह की पहियेदार थी जैसी कि आमतौर पर हस्पतालों में मरीजों को इधर-उधर ले जाने के काम में आती है। लेकिन उन्हें भयभीत करने वाली मेज नहीं, वो इन्सानी जिस्म था, जो सफेद चादर से ढका मेज पर रखा हुआ था।

“यह क्या है?" डॉली ने राज की तरफ देखते हुए डरी हुई सी आवाज में पूछा।

"अभी चलकर देख लेते हैं। राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखकर तसल्ली देने के अन्दाज में थपथपाते हुए कहा।

वो मेज के करीब गया और ढकी सफेद चादर खींच ली। उसका अन्देशा सही निकला। वो वाकई एक लाश थी। शायद ज्योति के किसी आशिक की।

राज ने लाश के करीब जाकर लाश का मुआयना किया तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। उसने डॉली को अपने करीब बुलाया और बोला

“तुम्हें याद होगा कि आज से करीब सात महीने पहले ऐ शख्स की लाश शहर के एक नाले के पास आई थी, उसके जिस्म पर ऐसे निशान थे, जैसे उसे रस्सियों से जकड़ा गया हो...।"

“हां।“ डॉली ने गर्दन हिलाते हुए कहा।

"इस लाश पर भी वैसे ही निशान हैं। यकीनन वो पहला खून भी डॉक्टर जय या ज्योति ने ही किया होगा।"

डॉली ने गौर से उन मटियाले निशानों को देखा जो पूरी लाश पर थे। फिर वो सोचते हुए बोली

“तुमने तो डॉक्टर जेम्स के साथ मिल कर उस लाश का पोस्टमार्टम किया था। क्या किसी नतीजे पर पहुंचे थे कि ये निशान कि तरह के हैं?"

“उस वक्त तो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका था।" राज ने गम्भीरता से कहा, "लेकिन अब मैं एक खास नतीजे पर पहुंच चुका हूं।"

"किस नतीजे पर?" डॉली ने उत्सुकता से पूछा।

"मेरी राय में यह घोड़ा पछाड़ सांप के निशान हैं। राज बोला।

“यह क्या बला होती है?" डॉली ने पूछा।

राज उसे समझाते हुए बोला

“उस सांप की भयंकरता का अन्दाजा तुम इसी बात से लगा सकती हो कि वो दौड़ते हुए घोड़े की टांगों से इस तरह चिपट जाता है कि घोड़ा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। यहां तक कि वो घोड़े की टांगों पर पकड़ कसकर उसकी चारों टांगों की हयां तोड़ देता है। घोड़ा मरकर गिर जाता पड़ता है।"

“बड़ा खतरनाक सांप होता है...।“ डॉली ने खौफ से कहा।

"हां। अब मैं सोचने पर मजबूर हूं कि डॉक्टर जय के संग्रह में जरूर इस नस्ल का भी कोई सांप है। उसका जहर निकालने के बजाय वो इसकी असाधारण ताकत से काम ले रहा है। मेरे ख्याल में, जय जिस शख्स को इस सांप के जरिये मारना चाहता होगा, उसे घोड़ा पछाड़ सांप के साथ कमरे में बन्द कर देता होगा। ये निशान यकीनन उस सांप के जिस्म से ही पड़े हो सकते हैं।"

“क्या ये निशान रस्सी से बांधने के नहीं हो सकते?" डॉली ने पूछा।

"नहीं। रस्सी अगर इन्सानी जिस्म पर बांधी जाए तो वहां खून जमा हो जाता। लेकिन उस केस में यह एक खास बात थी कि लाश में खून इस तरह सूख गया था, जैसे कभी रहा ही न हो।

“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शख्स को तारों में जकड़ कर उसे बिजली के करेंट से मार दिया जाए?" डॉली ने पूछा।

"हां। यह हो सकता है। राज ने जवाब दिया-“लेकिन उस हालत में खून जल जाना चाहिए। लेकिन उस लाश में खून जलने के कोई लक्षण नहीं थे। बल्कि उन धारी जैसे निशानों में खून चूसे जाने के लक्षण थे।"

राज लाश के पास से हटने ही वाला था कि अचानक उसकी निगाह पहले मृतक की छाती पर पड़ी, जिसमें एक बड़ा गड्डा था, जैसे किसी शख्स को आपरेशन के बाद खुला छोड़ दिया गया हो। फिर उसकी नजर मृतक की दाईं कलाई पर पड़ी, वहां उसने अपने नाम के प्रथम अक्षर गुदवा रखे थे-पी. के.।

राज ने वो अक्षर डॉली को दिखाते हुए पूछा

"इन अक्षरों को देखकर कुछ याद आता है इस शख्स के बारे में?"

डॉली कुछ देर सोचती रही फिर बोली

"हां, मुझे यादे पड़ता है। अखबारों में मैंने प्रेम कुमार नाम के एक जवान बिजनेसमैन के लापता जो जाने की खबरें पढ़ीं थीं। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।"

“तो यही वो बदनसीब प्रेम कुमार है?" राज ने ठण्डी सांस लेकर कहा।

"लेकिन इसे क्यों खत्म किया गया?"

"अभी जब मैं ज्योति की तिजोरी से निकले पत्र देख रहा था, तो

उसमें कुछ पत्र ऐसे थे जिन पर पी.के. लिखा हुआ था। ज्योति ने पहले इसे अपने हुस्न के जाल में फांसा होगा और फिर उस जहरीली नागिन ने इससे ऐ मोटी रकम ऐंठ कर इसे मौत के घाट उतार दिया होगा। यही इसकी कार्य-प्रणाली है।"

थोड़ी देर वो डर भरी निगाहों से मृतक प्रेम कुमार की लाश को देखते रहे। फिर अचानक राज को ख्याल आया कि वक्त काफी गुजर चुका है और अभी तक उन्हें वो चीज नहीं मिल पाई, जिसकी तलाश में वो यहां आए थे। इसलिए राज डॉली की पतली कमर में हाथ डाल कर उसे उस छोटी सी अलमारी की तरफ ले गया जिसमें दवाओं की शीशियां और बोतलें रखी हुई थीं।

“यहीं डॉक्टर जय के खास आविष्कार हो सकते हैं।" राज बोला।

"तो फिर किस तरह इनकी खासियत का पता चलाया जाए?" डॉली ने पूछा।

"मैं कोशिश करता हूं। शायद कामयाबी मिल जाए।" राज ने अलमारी से कुछ छोटी-छोटी शीशियां निकालकर उन सारी बोतलों और शीशियों के सैम्पल ले लिए।

"चलो अब लेब्रॉटरी में चलकर जरा इनका विश्लेषण कर लें।"

“और इस लाश को यों ही पड़ा रहने दें?" डॉली ने पूछा

"फिलहाल हस बारे में कुछ नहीं कर सकते। इसमें कोई शक नहीं कि यह लाश डॉक्टर जय के खिलाफ एक बड़ा सबूत है। लेकिन अभी तक जब तक हम उसके खिलाफ कुछ और पक्के सबूत हालिस न कर लें, उस पर हाथ डालना उचित नहीं है।"

बाहर निकल कर नीकण्ठ ने खुफिया कमरे का दरवाला सावधानी से बन्द कर दिया। फिर वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वो कुल छः किस्म के जहर थे, इसलिए राज ने पिंजरे में से छः खरगोश निकाले और एक-एक करके छहों जहरों को बहुत हल्का करके इंजेक्शन द्वारा उन खरगोशों के जिस्म में पहुंचा दिया।

डॉली उसके बराबर में खड़ी यह सारी प्रक्रिया देख रही थी।

आज क्योंकि उन्हें कोठी के लोगों की फिक्र नहीं थी इसलिए पहरा देने की जरूरत नहीं थी।

इंजेक्शन देने के बाद राज घड़ी लेकर बैठ गया और जहरों के असर पर नजर रखे रहा। हालांकि जहर उसने बहुत हल्के करके दिए थे, इसके बावजूद दो मिनट के अन्दर-अन्दर चार खरेगाश मर गए।

एक खरगोश सिर्फ बेहोश हुआ। छठा खरगोश एकदम स्वस्थ रहा। आधे घंटे बाद जब राज ने उसे छोड़ा तो वह उछलता हुआ दूसरे कमरे में अपने साथियों से जा मिला।

बेहोश खरगोश आधे घंटे तक निश्चल पड़ा रहा, फिर राज ने उसे होश लाने वाला इंजेक्शन दिया, जो वहीं लेब्रॉटरी में मौजूद था।

दो मिनट बाद ही खरगोश ने आंखें खोल दी। लेकिन होश में आने पर भी वो उसी तरह टांगे फैलाए पड़ा रहा, जैसे उसका जिस्म बेजान हो चुका हो। सिर्फ दिमाग जिन्दा हो। लेकिन जब राज ने उसकी टांगें पकड़कर हिलाया तो उसे पता चला कि वो बिल्कुल ठीक है। राज ने उसे उठा कर बिठा दिया, वो बैठ गया और लाल-लाल आंखों से चारों तरफ देखने लगा।

“इसे क्या हो गया है?" डॉली ने हैरत से पूछा।

"कुछ पता नहीं। अगर बातचीत करने वाला कोई जीव होता तो बोल कर अपनी अन्दरूनी हालत बता देता। अब यह बेजुबान क्या कह सकता है? वैसे मेरा ख्याल है कि इन्हीं छ: शीशियों में ही किसी में दिमाग पर असर करने वाला जहर हो सकता है। हो सकता है वो यही जहर हो, जिसका इंजेक्शन मैंने इस खरगोश को लगाया है। क्योंकि इनमें चार जहर तो जानलेवा हैं, जिनसे चार खरगोश मर गए हैं। एक बिल्कुल ठीक रहा, इसका मतलब है वो जहर नहीं था। हो सकता है वो किसी जहर का तोड़ हो या टॉनिक हो।"

“क्या यह मुमकिन है कि किसी जहर को ताकत की दवा में बदला जा सके?" डॉली ने पूछा।

"हां। अगर जहर में से उसके घातक कण खत्म कर दिए जाएं, फिर वो ताकत ही ताकत रह जाता है।"

आधा घंटा और गुजर गया, लेकिन वो खरगोश उसी तरह बैठा इधर-उधर आंखें घुमाता रहा । राज ने घड़ी देखी तो सुबह के साढ़े तीन बज चुके थे।

"अब वापिस चलना चाहिए...।“ डॉली ने सरगोशी की।

"हां...चलो। अगर आज डॉक्टर गुप्ता आ गए तो उनके साथ मिलकर इस जहर का विश्लेषण करके ही आगे कोई फैसला

करेंगे।

"अब इस खरगोश का क्या करोगे?" डॉली ने पूछा।

“इसे मैं खरगोशों के पिंजरे के दरवाजे पर छोड़ दिया। वो कुछ देर निश्चल खड़ा दरवाजे को सूंघता रहा, फिर धीरे-धीरे चलता हुआ सफेद चूहों के पिंजरे के पास पहुंच गया। एक मिनट तक वहां खड़ा रहने के बाद वो खरगोश वहां से हट गया और

आहिस्ता से जाकर कमरे के कोने में बैठ गया।

"डॉली!” राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,

"ऐसे लगता है जैसे इस खरगोश का दिमाग आऊट हो चुका है। यह अपने साथियों को भी नहीं पहचान सकता । तुमने देखा कि पहला खरगोश किस तरह उछलता हुआ अपने पिंजरे में चला गया था। यह पिंजरे के दरवाजे पर छोड़े जाने के बावजूद वहां से हट कर कोने में जा बैठा है। इसका मतलब है उस खरगोश का दिमाग काम नहीं कर रहा है।"

"अभी अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। डॉक्टर गुप्ता के आने पर उनसे मशविरा करके ही कुछ कह सकूँगा, क्या चक्कर है? मैंने उन्हें फोन कर दिया था।

वक्त क्योंकि ज्यादा गुजर चुका था, इसलिए राज ने उस खरगोश को पकड़ कर पिंजरे में बंद किया। मुर्दा खरगोशों को ले जाकर कोठी से बाहर फेंक दिया जहां डॉक्टर जय प्रयोग के बाद मरे हुए जानवर डालता था, सुबह सवेरे जमादार आकर उन्हें उठा ले जाता था।

वापिसी पर डॉली ने कहा

"अगर सवेरे डॉक्टर जय ने खरगोश गिन लिए, तो?"

'इतने सारे खरगोश में से चार कम भी हो गए तो क्या पता चलेगा उसे, जो गिनने बैठेगा?"

अपने कमरे के सामने जाकर राज ने गुड नाइट कहा और डॉली सोने चली गई।

अगले दिन डॉली शहर गई तो शाम को उसने आकर बताया कि सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता पहुंच गए हैं और उन्हें विस्तार से सब बातें बता आई है। वो उन्हें रात को तैयार रहने के लिए कह आई है।

"ग्यारह बजे के करीब, जब सब लोग सो जाएंगे, मैं जाकर उन्हें ले आऊंगी।" डॉली ने कहा।

"तब तो आज फिर तुम्हें खाने में वो नींद की दवा मिलानी पड़ेगी?"

"मैं अभी से कोशिश शुरू करती हूं।" डॉली ने जवाब दिया।

डॉली दवा लेकर किचेन में चली गई।

आधे घंटे बाद वो कामयाबी की मुस्कराहट होठों पर लिए हुए लौटी! डॉक्टर जय आज सारा दिन बाहर ही रहा था, इसलिए खरगोश वाले मामले का भी किसी को पता नहीं चला था।

रात ग्यारह बजे, सब लोग सो गए तो डॉली ज्योति की कार लेकर सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता को लेने शहर चली गई।
 
राज सोच रहा था कि डॉली अजीब लड़की है। आमतौर पर नों को मरीजों की देखभाल करने और नौजवान खूबसूरत मरीजों से गप्पें लड़ाने के अलावा कोई काम नहीं होता। यह अजीब नर्स थी। ऐसे खतरनाक काम में यह उसका पूरा साथ दे रही है। ऐसी कीमती राय देती है कि कोई तजुर्बेकार जासूस भी नहीं दे सकता। कार चलाना आता है और राम जाने क्या-क्या जानती है! उसे डॉली भी रहस्यमयी नजर आने लगी थी।

पौन घंटे में ही सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता को लेकर डॉली वापिस आ गई थी। राज को देखते ही दोनों उससे लिपट गए। बहुत देर तक वो लिपटे खड़े रहे। जब दिलों का जोश कुछ ठण्डा पड़ा तो वह बैठ कर बातें करने लगे। जब दिलों का जोश कुछ ठण्डा पड़ा तो वह बैइ कर बातें करने लगे। राज ने पूछा

"हेरत है डॉक्टर गुप्ता कि मैं छः महीने तक गायब रहा...लेकिन आपको मेरे बारे में कोई फिक्र नहीं हुई है?"

डॉक्टर गुप्ता मुस्कराया और उसने आठ-दस पत्र जेब से निकालकर राज के सामने डाल दिए

"हमें तुम्हारी फिक्र क्यों होती, जबकि तुम्हारे पत्र हमें नियमित रूप से मिलते रहते थे?"

नीकण्ठ ने वो पत्र देखा तो हैरान रह गया। ये पत्र वाकई उसकी अपनी राईटिंग में थे। वो सोच में पड़ गया

"कब लिखे ये पत्र मैंने?"

"तुम्हारी याददाश्त जो चली गई थी।“ सतीश ने कहा, “मेरे ख्याल में डॉक्टर जय ही तुम्हारे से पत्र लिखवाकर हमें भेजता रहा होगा, ताकि हम तुम्हारे बारे में कोई छानबीन न करवाएं।"

“ऐसा ही लगता है। लेकिन क्या डॉक्टर जेम्स ने भी कभी मेरे बारे में न खबर की, न पत्र लिखा है?" राज ने पूछा।

“लिखा था उसने।" डॉक्टर गुप्ता ने जवाब दिया, “उसने लिखा था कि तुम उससे बगैर कुछ कहे सुने ही कहीं चले गए हो और जाने के पांचवे-छठे दिन तुमने एक पत्र भेजा था और उनके यहां से अपना सामान भी मंगवा लिया था।"

"हालांकि मुझे जरा भी याद नहीं कि मैंने अपना सामान कब

और किससे मंगवाया था....।"

"तो यह भी डॉक्टर जय की साजिश का एक हिस्सा होगा।" डॉली ने कहा।

"क्या आप लोग डॉक्टर जेम्स से मिल चुके हैं?" राज ने पूछा।

"हां। हम शाम को उससे मिले थे।“ सतीश ने कहा, “और हमने संक्षेप में सारी घटना बता दी थी, जो मिस डॉली ने हमें बताई थी। उन्हें सब कुछ सुन कर बहुत ताज्जुब हुआ था।"

"तो फिर आप लोग सोचिए कि अब हमें क्या कदम उठाना चाहिए?" राज ने कहा।

"डॉली बता रही थी कि रात तुम लोग कुछ जहरों का प्रयोग करते रहे हो?" डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा,

"क्या उनमें से किसी खास जहर के बारे में इस नतीजे पर पहुंचे हो कि वो याददाश्त खत्म करने में सक्षम हो सकता है?"

"सिर्फ एक जहर के बारे में मुझे सन्देह है कि वो इस किस्त का हो सकता है। राज ने जवाब दिया, “क्योंकि जिस खरगोश को मैंने उसका इंजेक्शन दिया था, वो एक घंटे बाद ही अपना पिंजरा और अपने साथियों को भूल गया था।"

“तो उस जहर की शीशी तुम मुझे दे दो।" डॉक्टर गुप्ता बोला, "कल मैं जेम्स की लेब्रॉटरी में कभी-कभी उस जहर के असर के बारे में मालूम करने की कोशिश करूंगा।"

"जैसे आप कहें।" राज ने कहा और मेज की दराज से उस जहर की शीशी निकालकर डॉक्टर गुप्ता को दे दी।

डॉक्टर गुप्ता ने वो शीशी जेब में रखते हुए कहा

“मैं, एक नजर लाश को भी दोबारा देखना चाहता हूं, जो तुमने उस कमरे में देखी थी।

"चलिए, अभी देख लेते हैं। राज ने उठते हुए कहा।

"अभी लोग चलिए, मैं अभी आती हूं।" डॉली ने कहा। वो अपने कमरे में चली गई। वो दोनों तहखाने की तरफ बढ़ गए। डॉक्टर गुप्ता कुछ सोच रहा था।

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तहखाने के उस खुफिया कमरे में पहुंचकर डॉक्टर गुप्ता ने गौर से उस लाश का मुआयना शुरू कर दिया। दस मिनट गाद डॉली भी वहां पहुंच गई। राज को यह देखकर हैरत हुई कि उसने टॉमी की जंजीर थाम रखी थी।

और खौफनाक नस्ल का वो बुलडॉग पूंछ हिलाता हुआ उसके पीछे-पीछे आ रहा था। यह वही कुत्ता था जिसके बारे में ज्योति ने हस्पताल में राज को बताया था कि टॉमी राज के बगैर उदास है। हालांकि वो राज के आने के बाद भी खुश नहीं हुआ था। राज को कुत्ता पसन्द ही नहीं करता था। उसने डॉली की तरफ देखकर पूछा

"कुत्ता क्यों साथ लाई हो?"

"एक प्रयोग करने के लिए।"

"कैसा प्रयोग?

“अभी पता चल जाएगा...।“ उसने छोटा सा जवाब दिया। डॉक्टर गुप्ता लाश का मुआयना करने में व्यस्त था, डॉली कुत्ते से खेल रही थी। मौके फायदा उठाकर सतीश राज को एक तरफ ले गया और बोला

"ये आदरणीया कौन हैं?

"क्यों?" राज ने कहा।

“भोले मत बन कर दिखाओ खलीफा ।“ सतीश ने उसके बाजू पर चिकोटी काट कर कहा, “सच-सच बताओ, क्या इश्क विश्क

का मामला चला रखा है?

"दुर्घटना तो ऐसी ही हो गई लगती है। राज ने मुस्कराकर कहा।

"इसमें कोई शक नहीं कि लड़की बहुत सुन्दर और चालाक है । मगर यह है कौन?"

"इसकी हकीकत तो मैं नहीं जानता। जिस हस्पताल में मैं जख्मी होकर दाखिल हुआ था, उसमें नर्स के तौर पर काम करती थी। जब ज्योति और जय मुझे यहां लाए तो वो मेरी देखभाल के लिए इसे भी साथ ले आए। अब यह मेरी असिस्टेंट के रूप में काम कर रही है।"

"असिस्टेंट या प्रेमिका के रूप में?"

"एक ही बात है यार...।" राज मुस्कराया।

"क्या बातें हो रही हैं चुपके-चुपके?" अचानक डॉली की सुरीली आवाज से वो चौंक उठे।

“आपका ही जिक्र हो रहा था।“ सतीश ने बेतकल्लुफी से कहा। डॉली उसकी बात का अर्थ समझकर शरमा गई। डॉक्टर गुप्ता लाश का मुआयना कर चुका तो राज ने पूछा

"कहिये, क्या पता चला कुछ?"

"कुछ नहीं।" डॉक्टर घोष ने गम्भीरता से इन्कार कर दिया- 'बड़ा अजीब केस है। अजीब और दहशत भरा।" राज ने उसे बीती घटना की याद दिलाते हुए कहा

“यह लाश उस लाश से बिल्कुल मिलती है जिसकी तहकीकात में मदद करने के लिए आपने मुझे डॉक्टर जेम्स के पास कलकत्ता भेजा था।"

"क्या उस लाश पर भी ऐसे ही निशान थे?" डॉक्टर गुप्ता ने पूछा।

“जी हां। बिल्कुल ऐसे ही निशान थे ओर बचे-खुचे खून के जहर के कण थे।"

"हूं।" डॉक्टर गुप्ता ने सोचते हुए कहा, “बेहतर हो कि तुम एक शीशी में इस लाश के खून का सैम्पल भी मुझे दे दो, ताकि मैं उसका भी परीक्षण कर सकूँ।"

"ठीक है।" राज ने जवाब दिया और लाश के एक हिस्से में चीरा लगाकर अधजमा खून डॉक्टर गुप्ता को शीशी में डाल कर दे दिया।

"अब मैं जरा उस अजीबो-गरीब खेल को देखना चाहता हूं।''

डॉक्टर गुप्ता ने शीशी जेब में रखकर कहा।

"चलिए। अब उस बड़े कमरे में चलते हैं।"

"मेरा प्रयोग उसी कमरे में होगा।“ डॉली ने जल्दी से कहा।

वो सब खुफिया कमरे से निकल कर बेल वाले कमरे की तरफ चल पड़े।

डॉली ने कमरे में दाखिल होकर टॉमी के गले से जंजीर निकाल ली और उसे साथ लेकर बेल की शाखाओं के बिल्कुल करीब पहुंच गई। राज डॉक्टर गुप्ता से बातों में व्यस्त था, वो तीनों बेल की तरफ पीठ किए खड़े थे। अचानक डॉली हल्की सी चीख मार कर दौड़ती हुई राज से आ चिपटी।

"राज...राज ।" उसने सहमी हुई आवाज में कहा।

राज डॉली की यह हालत देखकर घबरा गया, और उसने दोनों हाथों से डॉली को सम्भालते हुए पूछा

"क्या बात है डॉली?"

"वो...वो...देखो...।"

उन्होंने पलट कर पीछे की तरफ देखा तो हैरत और खौफ से उनकी आखें फटी की फटी रह गई। अचानक उस बेल में नई किस्म की जान पड़ गई थी। टॉमी, जो बेल के बिल्कुल पास खड़ा था, उसके एक पैर में एक पतली सी बेल लिपटी हुई थी, जिसे वो पैर झटक-झटक कर झटकने की कोशिश कर रहा था। लेकिन वो पतली सी नाजुक बेल उसके पैर से अलग नहीं हो रही थी।

मगर सब से खौफनाक बात यह थी कि कमरे की दीवारों पर

और फर्श पर जो बेल की शाखाएं फैली हुई थीं, वो जहरीले सांपों की तरह बल खाती हुईं, रेंगे-रेंग कर टॉमी की तरफ बढ़ रही थीं।

यह ऐसा भयानक दृश्य था जिसे देखकर उन सबके दिलों की धड़कनें तेज हो गईं और आंखें हैरत से खुली की खुली रह गईं। अचानक राज के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी, और दिमाग में जो एक अन्धेरा सा फैला हुआ था, वो पल भर में दूर हो गया।

अब उसकी समझ में पूरा किस्सा था। पूरा भेद खुल गया था। सारे रहस्य पर से पर्दा हट गया था और हकीकत उसके सामने थी।

कुछ साल पहले उसने एक साइंस मैगजीन में पढ़ा था कि अफ्रीका के मेडगास्कर द्वीप पर एक खौफनाक पेड़ पाया जाता है जो हर उस प्राणी का खून चूस लेता है, जो उसकी छांव में पहुंच जाए।
 
"तो क्या यह उसी जाति की बेल है?" राज ने सोचा।

टॉमी ने अब उन शाखाओं के खिलाफ जोरदार संघर्ष शुरू कर दिया था, क्योंकि वो धीरे-धीरे उसकी चारों टांगों के गिर्द लिपटी जा रही थीं। थोड़ी देर में ही उसने उछल-उछल कर भौंकना शुरू कर दिया।

राज ने डॉक्टर गुप्ता की तरफ देखा तो वह चेहरे पर गम्भीरता लिए इस खौफनाक मंजर को देख रहा था। डॉली सहमी हुई राज से चिपटी खड़ी थी। सतीश स्तब्ध खड़ा सभी उन सब को घूर रहा था और कभी उछलते-भौंकते टॉमी को।

दस मिनट के थोड़े से समय में ही तमाम शाखाएं दीवारों पर से रेंगती हुई फर्श पर आ चुकी थीं और उन्होंने टॉमी को चारों तरफ से घेर लिया था। एक शाखा फंदे की तरह टॉमी के गले से भी लिपट गई थी, जिसकी वजह से उसका भौंकना भी कम होता जा रहा था।

इस वक्त उन सबकी आंखों के सामने वही सीन था जो मकड़ी के जाल में किसी मक्खी के फंस जाने पर होता है। शाखाएं पूरी तरह टॉमी पर छा गई थीं।

राज को देखकर हैरत हुई कि खूखार नस्ल का वो कुत्ता शाखाओं में फंस कर इतना बेबस हो गया था जैसे उन नाजुक सी शाखाओं ने नहीं, लोहे की जंजीरों ने उसे पकड़ लिया हो।

अगले दिन मिनटों में वो बेल लाल पत्तों की एक गेंद सी बन गयी थी जिसके बीच में टॉमी आखिरी सांसें ले रहा था। उसका जरा सा चेहरा ही दिखाई दे रहा था, जो

ऊपर की तरफ उठा हुआ था।

"मेरा अन्दाजा सही निकला...।“ डॉली गहरी सांस लेकर सहमी हुई आवाज में बोली।

"हां, तुम बहुत अक्लमंद हो डॉली जी।" डॉक्टर गुप्ता ने कहा, "मैं पहले ही समझ गया था। यह वही अफ्रीकी बेल है, जो हर प्राणी को खींचकर उसका खून चूस लेता है।"

“जी हां। वही लगती है।“ राज ने जवाब दिया।

"इसका मतलब है, बगल वाले कमरे में जो लाश पड़ी है, वो शख्स इसी बेल का शिकार हुआ है?"

“जी! यह साफ हो गया है कि वो इसी बेल का शिकार हुआ था क्या?" डॉली ने पूछा।

“जी हां।" डॉक्टर गुप्ता ने जवाब दिया, “इसके पत्ते खून की वजह से ही लाल हैं। इनकी शाखाओं में ऐसे रोएं होते हैं जो कोई शिकार पकड़ में आते ही कांटों की तरह खड़े हो जाते हैं

और रोम-रोम में घुसकर खून चूसने लगते हैं।

एक घंट तक वो हैरत से स्तब्ध खड़े बेल की उस गोल गेंद को देखते रहे। जिसके अन्दर टॉमी की लाश छुपी हुई थी।

एक घंटे बाद उन खूनी शाखाओं ने खुलना शुरू कर दिया और पन्द्रह मिनट बाद टॉमी की लाश फर्श पर पड़ी रह गई। तमाम शाखाएं उसका खून चूस कर दोबारा दीवार पर चढ़ने लगी थीं।

"राज!" डॉली ने चीखकर उनका ध्यान उन दो-चार शाखाओं की तरफ खींचा जो रेंगती हुई उन्हीं की तरफ बढ़ रही थीं।

“अब हमें चलना चाहिए।" डॉक्टर गुप्ता ने कहा, “बेल के मुंह खून लग चुका है। इसलिए वो हमारा शिकार करने इधर ही बढ़ रही हैं।

"लेकिन उसे किसी प्राणी की मौजूदगी का पता कैसे चलता है?" सतीश के पूछा।

"भगवान जाने कि वो क्या अहसास इस नस्ल के पेड़ों में है कि उसे अपने पास किसी प्राणी के आ जाने का खुद ही पता चल जाता है। डॉक्टर गुप्ता ने जवाब दिया।

शाखाएं धीरे-धीरे उनकी तरफ रेंग रही थीं। अचानक डॉक्टर गुप्ता ने पूछा

“क्या तुम्हारे पास चाकू है?"

“जी हां। मेरे पास है।" डॉली ने जवाब दिया और जल्दी से चाकू निकाल कर डॉक्टर गुप्ता को दे दिया। राज ने उसकी तरफ हैरत से देखा तो वह बोली

"मैं इसलिए चाकू साथ लाई थी कि शायद जरूरत पड़ जाए।"

डॉक्टर गुप्ता ने आगे बढ़ कर अपना पैर उस शाख के करीब रख दिया, और वो शाख बिल्कुल किसी सांप की तरह रेंगती हुई

उसकी पिण्डली पर लटक गई।

डॉक्टर गुप्ता ने अपने पैर को झटका दिया। शाख को खींचने से पूरी बेल खलबली मच गई। लेकिन बेल उसकी टांग से अलग न हुई, बल्कि दूसरी शाखाएं भी तेजी से उसकी तरफ रेंगने लगीं। दीवारों पर चढ़ने वाली शाखाएं दोबार नीचे उतरने लगीं।

"क्या कर रहे हैं, आप डॉक्टर गुप्ता?" डॉली ने सहमी हुई आवाज में पूछा।

" ।" डॉक्टर ने मुस्कराकर कहा और झुककर चाकू से वो शाख काट दी जो उनकी पिंडली से लिपट गई थी। तब तक दूसरी शाख भी आगे बढ़कर उसके बूट से लिपट चुकी थी, उसको उसने काट डाला और दोनों कटे हुए टुकड़े हाथ में उठा लिए। दोनों टुकड़े छिपकली की कटी हुई पूंछ की तरह अभी तक तड़प रहे थे।

"आओ, अब चलें।"

"लेकिन टॉमी की लाश का क्या होगा?" डॉली ने राज का ध्यान इस तरफ दिलाया।

“हां। कुत्ते की लाश को हटाना बहुत जरूरी है। वर्ना अगर कल किसी ने देख लिया तो भेद खुल जाएगा।डॉक्टर गुप्ता ने कहा।

उन्होंने एक रस्सी तलाश करके कुत्ते की लाश के गले में डाली

और उसे घसीटते हुए कोठी से बाहर ले गए। वहां उन्होंने लाश फेंक दी।

कमरे में वापिस आकर जब सभी आराम से बैठ गए तो राज ने पूछा

“अब क्या करना चाहिए?

“फिलहाल कुछ नहीं।" डॉक्टर गुप्ता ने जवाब दिया, “कल मैं जरा इन जहरों का परीक्षण कर लूं उसके बाद ही हम कोई अगला कदम निश्चित करेंगे।"

"मेरे ख्याल से तो अब हमें विदा हो लेना चाहिए। सतीश ने राय पेश की।

“ठीक है। रात काफी हो चुकी है। डॉक्टर गुप्ता ने उठते हुए कहा, “डॉली हमें हमारे होटल छोड़ आएगी।

उनके जाने के बाद राज बहुत देर तक लेटा सोचता रहा कि अब क्या करना चाहिए? फिर उसने सोचा, क्यों न याददाश्त खत्म करने वाले उस जहर का प्रयोग रोजी पर किया जाए?

कुछ देर वो इस ख्याल से सभी पहलूओं पर सोचता रहा, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका। डॉक्टर जय और ज्योति की गिरफ्तारी के लिए जरूरी थी कि उनके खिलाफ कुछ ठोस सबूत इकट्ठे किए जाएं। जिनमें जहरों का सबूत भी काम आ सकता था और इस जहर का परीक्षण करने के लिए अगर वो रोजी को बहुत हल्की मात्र में जहर दे देता तो कुछ हर्ज नहीं था। यह तो वो जानता ही था कि जहर घातक नहीं है, इसलिए परीक्षण में रोजी की जान जाने का भी कोई खतरा नहीं था।

थोड़ी देर और सोचने के बाद राज ने यह प्रयोग करने का फैसला कर लिया। पहले वो डॉक्टर जय के तहखाने वाले कमरे में गया, उस खास जहर की थोड़ी मात्र निकाली और लेब्रॉटरी से ही सिरिंज लेकर रोजी के कमरे में जा पहुंचा।

रोजी गहरी नींद में बेसुध पड़ी थी, बेखबरी में उसकी नाईट ड्रेस एक तरफ पड़ी थी और जवानी की मस्ती में एकदम नंगी सो रही थी। हल्के नीले रंग की रोशनी में उसकी पिण्डलियां दो मछलियों की तरह लग रही थीं। गुदाज वक्ष सांसों के उतार-चढ़ाव से तूफान में फंसी नाव की तरह उठ-गिर रहे थे। उसका सुडौल बदन पत्थर की एक मूर्ति सा ठोस नजर आ रहा था।

राज उसके करीब बेड पर बैठ गया। रोजी के नग्न जिस्म को देख कर उसके तन में से चिंगारियां सी फूटने लगी थीं। लेकिन क्योंकि यह वक्त ऐसी बातों का ध्यान देने का नहीं था, इसलिए राज ने खुद पर काबू पाते हुए रोजी का बाजू पकड़कर आहिस्ता से अपनी तरफ खींचा और इतनी सफाई से इंजेक्शन की सुई उसके बाजू में घुसाई कि अगर वो जाग भी रही होती, तब भी उसे इंजेक्शन लगाने का पता न चला पातां

इंजेक्शन लगाने के बाद राज रोजी की नब्ज पकड़ कर इंजेक्शन की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश करने लगा। फौरन ही उसकी नब्ज धीमी पड़ने लगी थी और सांसों का आवागमन भी धीमा पड़ गया था। करीब पन्द्रह मिनट तक राज उसकी नब्ज पर हाथ रखे बैठा रहा।

फिर अचानक उसने कमरे के बाहर किसी के चलने की आहट महसूस की। राज रोजी की बांह छोड़ कर तेजी से दरवाजे पर पहुंचा तो बाहर डॉली परेशान सी खड़ी इधर-उधर देख रही

थी। शायद वो राज को ही तलाश कर रही थी।

"डॉली...।" राज ने उसे धीरे से पुकारा ।

डॉली चौंक उठी, लेकिन फिर राज को दरवाजे पर देख उसने राहत की गहरी सांस ली। वो तेजी से कमरे में आ गई। रोजी को नग्नावस्था में और राज को उकसे कमरे में देखकर डॉली का चेहरा काला सा पड़ गया। सन्देह के बादल उसके चेहरे पर छा गए थे। उसने सवालिया निगाहों से राज की तरफ देखा।

"फिक्र न करो।" राज ने उसे तसल्ली दी, "मैं इसके साथ ऐश करने यहां नहीं आया था...।"

"तो फिर क्या करने आए थे इस बेशर्म के पास?"

“तुम्हारे जाने के बाद एक नई बात सूझी थी मुझे...।" राज ने उसे सब कुछ बता दिया।

सब कुछ सुनकर डॉली ने सोचते हुए कहा

"मेरे ख्याल में यह ठीक नहीं किया तुमने।"

"क्यों?"

"क्योंकि सुबह को रोजी के बाजू पर इंजेक्शन का निशान देखकर और उसकी याददाश्त खोई हुई पाकर डॉक्टर जय चौकन्ना हो जाएगा और फौरन समझ जाएगा कि यह हरकत तुम्हारे अलावा किसी और की नहीं हो सकती। तुम्हें कम से कम इस जहर के रासायनिक परीक्षण का तो इन्तजार कर लेना चाहिए था..."

"मेरे ख्याल में अब हमारा खामोश रहना ठीक नहीं है। खूनी बेल का रहस्य जान लेने के बाद अगर हमें उस जहर के बारे में भी पक्का सबूत मिल गए तो डॉक्टर जय को कानून की पकड़ में ला सकते हैं। जहर के बारे में जानने का इससे अच्छा कोई तरीका नहीं था। राज ने समझाते हुए कहा।

"लेकिन अगर वो मर गई तो?"

"नहीं, मरेगा नहीं।

"फिर भी मेरा ख्याल है कि यह सब अभी नहीं करना चाहिए था।"

“अब भी मेरा ख्याल है कि यह सब अभी नहीं करना चाहिए था।"

“अब तो जो होना था, हो चुका। राज ने डॉली को बाहों में लेते हुए कहा, "कल जो होगा, देखा जाएगा।"

"सवाल है कि अभी अगर डॉक्टर जय को शक हो गया कि तुम होश में आ चुके हो और उसके खिलाफ सरगर्म हो, तब क्या होगा?" डॉली ने चिंतित स्वर में कहा, “सबसे पहले वो वो तमाम सबूत मिटाने की कोशिश करेगा जो उसे फंसा सकते हैं। उसके बाद उसका दूसरा कदम तुम पर काबू पाना होगा।"

“कल हम बहुत ज्यादा होशियार रहेंगे। अब जाओ, चलकर आराम करें, कल की कल देखी जाएगी। राज बोला।

डॉली खामोशी से अपने कमरे में वापिस आ गई, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता के भाव मौजूद थे।

“अब सोने का टाईम नहीं रहा...।“ डॉली ने घड़ी देखकर कहा, “साढ़े चार बजे हैं, तुम जाक सो जाओ। कम से कम मैं आज की रात नहीं सो सकती।

"क्यों ?"

“मैं सुबह सावधान रहकर देखना चाहती हूं कि रोजी को बेहोश पाकर डॉक्टर जय की क्या प्रतिक्रिया होती है। हो सकता है कि वो रोजी को बीमार समझ कर उसकी देखभाल भी मेरे सुपुर्द कर दे।"

"फिर तो मैं भी नहीं सोऊंगा। राज ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

“नहीं, तुम्हें सो जाना चाहिए।" डॉली ने राज के होठों से सिगरेट निकाल कर ऐश-ट्रे में डालते हुए कहा-"तुम्हें जागते देखकर उन्हें शक हो सकता है, क्योंकि रोजाना तुम देर तक सोते रहते हो।

कहकर उसने राज को बेड पर लिटाया और उसे अच्छी तरह चादर ओढ़ाकर उसके सिर में अंगुलियां फिराने लगी... ।

राज बोला

"लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही है।"

"ठहरो, मैं तुम्हें राग मालकौंस में लोरी सुनाती हूं, तुम तो जाना।" वो वाकई धीरे-धीरे अपनी सुरीली मधुर आवाज में गुनगुनाने लगी। दो मिनट बाद ही राज के पपोटे भारी होने लगे। फिर वह सो गया।
 
किसी ने कंधा पकड़ कर राज को हिलाया तो उसने आंखें खोल दीं। यह देख कर उसका दिल जोर से धड़कने लगा कि ज्योति उसके सिरहाने खड़ी उसे जगा रही थी। पैरों की तरफ खड़ा डॉक्टर जय गहरी निगाहों से उसे घूर रहा था।

"ओह डॉक्टर साहब, बैठिए प्लीज।" राज ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

“मैं ऐसे ही ठीक हूं।" डॉक्टर जय ने ढीली सी आवाज में कहा, लेकिन उसकी निगाहें राज के चेहरे पर ही जमी हुई थीं।

“रोजी अचानक बीमार हो गई है राज । ज्योति ने कहा।

“क्या?" राज ने बनावटी हैरत जताई, “उसे क्या हो गया

“घबराने की जरूरत नहीं। बस थोड़ी तबियत खराब हो गई है उसकी।" डॉक्टर जय ने उसके चेहरे पर नजरें जमाए-जमाए जवाब दिया। ऐसा लगता था जैसे वो राज के चेहरे के भावों से दिल का हाल जानने की कोशिश कर रहा हो।

"डॉली कहां है?" राज ने पूछा।

"मैंने उसे रोजी की देखभाल के लिए भेज दिया है। ज्योति ने जवाब दिया। फिर दो क्षण के बाद उसने पूछा, “क्या तुम रात को रोजी के कमरे में गए थे?"

एक सैकिण्ड के हजारवें हिस्से में राज के दिमाग में सैंकड़ों सवाल आकर गुजर गए। क्या वो इन्कार कर दे? लेकिन न जाने क्यों वह इन्कार नहीं कर सका।

“हां। राज ने जवाब दिया, “रात को हम देर तक बातें करते रहे थे।"

कई बार दिल की बात मानने से भी फायदा होता है। बाद में उसे डॉली ने बताया कि उसका रोजी के कमरे में जाना कबूल लेना अच्छा और उचित रहा था, क्योंकि उसकी कमीज का एक बटन कफ से निकलकर वहीं गिर पड़ा था। वो बटन डॉक्टर जय के हाथ लग गया था।

राज के मान लेने पर डॉक्टर जय चकराकर रह गया था। फिर शायद उसके दिल से राज के बारे में सन्देह दूर हो

चुका था, क्योंकि उसने इत्मीनान की एक गहरी सांस ली थी।

"रात को किस वक्त तुम रोजी के पास से आए थे?"

‘‘डेढ़ बजे से ऊपर का वक्त हो चुका था...।“ राज बोला, लेकिन हुआ क्या है?"

"कुछ नहीं। वो जरा बीमार हो गई है, जल्दी ठीक हो जाएगी।" डॉक्टर जय ने कहा, “तुम फिक्र न करो।"

"क्या कल रात उसने तुमसे तबीयत खराब होने का जिक्र किया था?" ज्योति ने पूछा।

"हां। वो कह रही थी कि उसे चक्कर से आ रहे हैं अब मुझे याद आया कि कल जब वो शहर गई थी तो ताकत का कोई इन्जेक्शन लगवा कर आई थी।"

डॉक्टर बड़े जोर से चौंका। फिर उसने राज की तरफ घूर कर देखा और बोला

"क्या वो शाम को इंजेक्शन लगवा कर आई थी?"

"वो यही कह रही थी...।" राज ने जवाब दिया।

डॉक्टर जय ने एक गहरी सांस लेकर ज्योति की तरफ देखा।

दोनों ने आंखों में इशाने किए।

"क्या अब तुम चलने-फिरने के काबिल हो चुके हो?" डॉक्टर जय ने पूछा।

"हां, सहारे से थोड़ा बहुत चल लेता हूं।" राज ने कहा,

"दो दिन से मैं रोजी के साथ तहखाने में जाकर उस बेल को पानी और भाप भी लगा रहा हूं।"

“अच्छा! खैर...तुम रोजी की चिंता मत करना।" ज्योति ने डॉक्टर जय के पास जाते हुए कहा, “दिल चाहे तो नाश्ते के बाद उसे देख आना। फिर वो डॉक्टर जय से बोली

"चलो जय।"

डॉक्टर जय ने खामोशी से सिर हिलाया और ज्योति के साथ कमरे से बाहर निकल गया। उनके जाने के बाद राज ने राहत की सांस ली। खतरा टल गया था। उसने नाश्ता किया ही था कि डॉली आ पहुंची।

"क्या हाल है रोजी का?" राज ने उसे देखते ही सवाल किया।

"अभी तक बेहोश पड़ी है, डॉक्टर जय ने सुबह से दो बार उसे होश में लाने के इंजेक्शन लगा चुका है।"

"उसे किसी किस्म का सन्देह तो नहीं हुआ है?"

“मेरे ख्याल में तो उसे शक हो गया है। क्या वो यहां आया

था?

"हां! ज्योति और जय दोनों यहां आए थे। राज ने जवाब दिया। फिर डॉली को उसन वो तमाम बातें बता दी जो उन दोनों से उसकी हुई थीं।

"हूं...।“ डॉली ने सोचते हुए कहा, “मामला अब बहुत त्यादा गर्म हो गया है। अब हमें बहुत ज्यादा होशियार रहकर काम करना होगा।

"फिर...अब करना क्या है?"

"यह तो शाम को डॉक्टर गुप्ता से मिलने के बाद ही सो जाएगा।

"ठीक है, फिर चलो। जरा मैं भी रोजी को देखना चाहता हूं।" राज ने उठते हुए कहा।

डॉली राज को दिखावटी सहारा देकर रोजी के कमरे तक ले आई। रोजी कमरे में उसी तरह बेहोश पड़ी थी। राज उसके पहलू में बेड पर बैठ गया। उसने रोजी की नब्ज देखी। उतनी ही धीमी चल रही थी, जितनी रात को इंजेक्शन लगाने बाद धीमी हो गई थी।
 
"डॉक्टर जय और ज्योति कहां गए?" उसने डॉली से पूछा।

“ज्योति तो शहर गई है।" डॉली ने कहा, “और डॉक्टर जय कोठी से कहीं गया भी नहीं और नजर भी नहीं आ रहा। इसका मतलब है कि वो अपने खुफिया कमरे में ही होगा।"

"अच्छा, थोड़ा गर्म पानी तो ले आओ।" राज ने डॉली से कहा तो वह सिर हिलाकर किचेन में चली गई। डॉली एक जग में गर्म पानी ले आई। राज ने एक तौलिया पानी में भिगो कर रोजी की दोनों कनपटियों पर रख दिया। रह-रह कर वो यही क्रिया दोहराता रहा।

करीब आधे घंटे बाद इस इलाज के परिणाम दिखाई देने लगे। रोजी के चेहरे पर जो पीलापन आ गया था, वो गुलाबीपन में बदलने लगा, नब्ज की रफ्तार बढ़ गई, सांसें भी तेजी से चलने लगीं। थोड़ी देर बाद ही उसके पपोटों और चेहरों की मांसपेशियां हरकत करने लगीं। डॉली रोजी के सिरहाने खड़ी यह क्रियाएं देख रही थी।

"अब तो यह होश में आने वाली है। उसने आहिस्ता से कहा।

"हां। दिमाग को गर्म पानी की भाप बहुत जल्दी हरकत में ले आती है।" राज ने जवाब दिया, "क्योंकि इससे खून के दौरे को मदद मिलती है।

"अब देखना यह होगा कि होश में आने के बाद उसकी क्या हालत होती है?" डॉली बोली थी।

"यह भी अभी पता चल जाएगा।" राज ने रोजी की नब्ज पर अंगुलियां घुमाते हुए कहा।

“अब इसकी नब्ज बिल्कुल ठीक चल रही है। उसने बताया। उसके दो मिनट बाद ही रोजी ने आंखें खोल दी।

"रोजी...।" राज ने धीरे से उसे पुकारा । रोजी ने खाली-खाली आंखों से उसकी तरफ देखा और कुछ देर तक यों ही देखती रही, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो। फिर राज की तरफ से मुंह फेर कर वो कमरे का जायजा लेने लगी। फिर निगाहें डॉली पर जम गईं तो वह डॉली को ही घूरती रही।

“रोजी...।“ राज ने फिर उसे पुकारा । रोजी ने फिर उसकी तरफ देखा, लेकिन बोली कुछ नहीं, “कैसी तबीयत है तुम्हारी?" राज ने उसका हाथ थामकर कहा। वो फिर भी कुछ नहीं बोली। सहमी-सहमी नजरों से राज की तरफ देखती रही।

“रोजी, कैसे तबीयत है अब?" राज ने उसकी ठोड़ी के नीचे हाथ लगाकर उसका चेहरा ऊपर उठाते हुए पूछा। उसने

अपने होठों पर जुबान फेरी और बड़ी मुश्किल से बोली

"पानी....

डॉली फौरन पानी का गिलास ले आई। राज ने सहारा देकर रोजी को गोद में भरा और उसे पानी पिलाने लगा। फिर उसे लिटाते हुए बोला

"कैसी है तुम्हारी तबीयत?"

उसने कोई जवाब नहीं दिया, भयभीत हिरणी की तरह उसे देखती रही। फिर बोली

“म...मैं कौन हूं?"

राज और डॉली ने एक-दूसरे की तरफ अर्थपूर्ण निगाहों से देखा। फिर राज बोला

“तुम रोजी हो।" उसने प्यार से रोजी के सिर पर हाथ फेरा,

“क्या तुम मुझे नहीं पहचानतीं? अपने राज को...।"

उसने घूरकर राज की तरफ देखा और इन्कार में सिर हिलाकर बोली

"नहीं। मैं नहीं जानती तुम कौन हो...।"

"क्या तुम डॉक्टर जय और ज्योति को भी नहीं जानतीं?"

“नहीं।" उसने फिर इन्कार में सिर हिला दिया।

"कोई तकलीफ तो नहीं तुम्हें?"

“हां... । सिर पत्थर की तरह भारी और बेजान हो रहा है।"

"ठीक है। राज उसका सिर दबाते हुए बोला-“अब तुम

197%27:43 PM इच्दाधारी नागिन

थोड़ी देर सो जाओ। ठीक हो जाओगी।"

उसने बगैर कुछ कहे फौरन आंखें बन्द कर लीं। राज उसका सिर सहलाने लगा, पांच मिनट बाद ही रोजी सो गई। फिर राज ने उठते हुए कहा

"मेरा ख्याल है कि अब मुझे अपने कमरे में जाना चाहिए। ऐसा न हो कि जय आ जाए।"

"और अगर इसने होश में आकर डॉक्टर जय के सामने भी ऐसी ही बातें की तो फिर क्या होगा?"

"इसका उपाय तो यही है कि इसके होश में आने पर तुम इसे वहीं नींद की दवा खिला देना जो हम इन सबको देते हैं। कम से कम कल तक इसे होश में नहीं आना चाहिए।"

“कल के बाद क्या होगा?" डॉली ने पूछा।

"उम्मीद है, कल हम डॉक्टर जय को गिरफ्तार करवाने में कामयाब हो जाएंगे।"

"वो नींद की दवा इसे कुछ नुकसान तो नहीं पहुंचाएगी?" डॉली ने पूछा।

"नहीं।" राज ने जबाव दिया, “शाम को तुम डॉक्टर गुप्ता से मिलना मत भूलना।"

"मुझे याद रहेगा।" डॉली ने कहा और राज उठ कर अपने कमरे में आ गया।

शाम को डॉली अपने घर जाने का बहाना करके डॉक्टर गुप्ता के पास उसके होटल में चली गई।

दो घंटे बाद वह वापस आई। ज्योति भी तब लौट आई थी और इस वक्त ज्योति और डॉक्टर लेब्रॉटरी में न जाने क्या कर रहे

डॉली आई तो राज ने कहा

"कहिए, क्या समाचार है?"

"बहुत से समाचार हैं।“ डॉली ने कहना शुरू किया- 'डॉक्टर गुप्ता ने उस लाश के खून का रासायनिक परीक्षण कर लिया है। उस खूनी बेल की जो शाखाएं वो काट कर ले गए थे, उनका परीक्षण हो गया है। उससे साबित होता है कि जिस किस्म के जहर के कण उन शाखाओं में पाए गए हैं, बिल्कुल वैसा ही जहर मृतक के खून में भी पाया गया है। इसके साथ ही डॉक्टर जेम्स ने सात महीने पहले पाई जाने वाली लाश के खून का परीक्षण भी किया तो उसके जहरीले कण भी उसी तरह के निकले। इससे साबित होता है कि वो दोनों आदमी उसी पेड़ के

जरिये मौत के घाट उतारे गए थे।

"लेकिन सवाह यह है कि बेल में जहर के कण कहां से आए

"डॉक्टर गुप्ता का ख्याल है कि डॉक्टर जय खाद के साथ-साथ बेल को कोई जहर भी पहुंचाता रहा है। जिसकी वजह से वो बेल खतरनाक और खूनी होने के साथ-साथ जहरीली भी हो गई है।"

'हूं। उस जहर के बारे में उनकी राय क्या है?" राज ने पूछा, “उस दूसरे जहर के बारे में!"

"उनकी राय में वो शीशी वाला जहर याददाश्त पर असर कर सकता है। मैंने उन्हें रोजी वाली घटना सुनाई तो उन्होंने कहा था, ठीक है। यही प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी उसकी। उस जहर में दो जहरों का मिश्रण है। एक तो बर्मा के सबसे खतरनाम सांप लांसी का जहर और दूसरे सायनाइड।"

"लासी का जहर और सायनाइड?" राज ने हैरत से कहा, “यह तो नामुमकिन लगता है।"

डॉली ने कुछ नहीं कहा, वो खामोश ही रही। राज ही

बोला

“अब मुझे मानना पड़ रहा है कि भारत में सांपों और जहरों के माहिर सिर्फ दो ही शख्स हैं।"

"डॉक्टर जय और डॉक्टर गुप्ता।"

“और तुम..."

"मेरी हैसियत तो इन दोनों मास्टरों के सामने एक नर्सरी क्लॉस के बच्चे जैसी है, जिसे कुछ भी न आता हो। बहरहाल, अब तुम बताओ कि डॉक्टर गुप्ता ने आगे के लिए क्या तरकीब सोची

“उनकी राय है कि आज रात किसी वक्त में और तुम स्टैण्डर्ड होटल चलें ताकि वहां सलाह मशविरा करने के बाद हम

सी.आई.डी. डिपार्टमेंट की पूरी स्थिति से अवगत करवा सकें

और उन दोनों मुजरिमों के गिरफ्तारी वारण्ट हालिस कर सकें।"

“उनकी राय में क्या आज रात ही यह काम कर लेना जरूरी

"हां।“ डॉली ने कहा-“मेरे ख्याल में भी अब देर करना उचित नहीं है।

"लेकिन रात को जाएंगे कैसे? अगर जय को पता चल गया तो?"

"कोई फिक्र नहीं।" डॉली ने कहा, "हम ग्यारह बजे के करीब यहां से चलेंगे। एक घंटा डॉक्टर गुप्ता के साथ विचार विमर्श करेंगे। उसके बाद एक घंटा पुलिस के उच्चाधिकारियों को सारा चक्कर समझा कर वारण्ट हासिल करने में लगेगा। उसके बाद रात के करीब तीन बजे हम पुलिस पार्टी के साथ चुपके से कोठी पर धावा बोल देंगे और नींद की हालत में ही उन सबको गिरफ्तार कर लेंगे।"

"जैसे तुम चाहो। राज मुस्करा कर बोला, “ हम तो हुक्म के अे हैं।"

“मेरे हुक्म के या रोजी के?"

"अपने दिल से पूछो मैडम...।"

डॉली शरमाकर अपने कमरे में भाग गई। राज सोचने लगा।

डॉक्टर जय और ज्योति के बारे में राज को कुछ पता न चल सका कि वो लेब्रॉटरी में क्या करते रहे हैं।

खाना खाते ही वो दोनों अपने कमरों में सोने चले गये थे।

जब राज और डॉली को यकीन हो गया कि वो सो गए होंगे, तो राज और डॉली गैरेज में से ज्योति की कार लेकर स्टैण्डर्ड होटल रवाना हो गए।

होटल में डॉक्टर गुप्ता और डॉक्टर जेम्स उनके प्रतीक्षक थे। रस्मी बातों के बाद जब सभी आराम से बैइ गए तो सतीश ने बातचीत शुरू करते हुए कहा

“अब क्या प्रोग्राम है?

"हमें फौरन पुलिस कमिश्नर से मिलकर सारी स्थिति उन्हें बता देनी चाहिए।" डॉली ने कहा, “और वारण्ट तैयार करवा के

फौरन डॉक्टर जय और ज्योति को गिरफ्तार करवा देना चाहिए।"

"लेकिन सवाल यह है कि हम लोग यहां अजनबी हैं।" डॉक्टर गुप्ता ने कहा, "फिर रात को बारह बजे हम कैसे जाकर पुलिस कमिश्नर से मिलने जा सकते हैं? किस तरह एक इज्जतदार डॉक्टर का वारण्ट गिरफ्तारी हासिल कर सकते हैं?"

“मिस डॉली के रहते हुए आपको ऐसे मामलों की फिक्र नहीं करनी चाहिए डॉक्टर गुप्ता।" डॉक्टर जेम्स बोला।

"क्या मतलब?" राज ने हैरत से पूछा

डॉक्टर जेम्स ने मुस्कराकर अर्थपूर्ण नजरों से डॉली की तरफ देखा और बोला

"मेरे ख्याल में डॉली, अब ज्यादा रहस्य रखने की जरूरत नहीं है। अब वक्त आ चुका है कि तुम अपनी असलियत प्रकट कर दो।"

डॉक्टर गुप्ता, सतीश और राज डॉक्टर जेम्स की बात सुनकर हैरात रह गए। राज का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। तीनों की निगाहें डॉली के चेहरे पर जा लगीं।

डॉली मुस्करा रही थी। फिर वो बोली

"दरअसल मैं नर्स नहीं हूं बल्कि इंटेलीजेंस डिपार्टमेंट की एक एजेंट हूं।"

सभी यह सुन कर हैरत से बुत रह गए। फिर डॉक्टर गुप्ता बोला

"इसका मतलब आपको पहले से सब कुछ मालूम था?"

"जी हां। शुरू से ही। कम से कम मैं मिस डॉली के बारे में सब कुछ जानता था।"

“ठहरिये।“ डॉली ने कहा, “मैं शुरू से आपको सब कुछ बता देती हूं।" कहकर डॉली ने मुस्कराकर राज की तरफ देखा। राज का दिल तेजी से रेलवे इंजन की तरह छुक-छुक कर रहा था। अब उसे वो सब बातें याद आ रही थीं जिन्हें सोचकर वो डॉली के बारे में हैरान हुआ करता था। उसे पहले से ही शक था कि डॉली भी रहस्यमय हस्ती है। क्योंकि एक नर्स इस तरह की जासूसी वाली हरकतें नहीं कर सकती थी। एक शातिर मुजरिम से मुकाबले में उसे ऐसी-ऐसी बढ़िया तरकीबें नहीं बता सकती थी।

“यह कुछ महीने पहले की बात है।" डॉली कह रही थी-“शहर में बड़ी अजीब-अजीब सी वारदातें होने लगी थीं। एक मशहूर करोड़पति बिजनेसमैन की लाश बड़ी अजीब हालत में मिली थी। यह वही लाश थी जिस पर डॉक्टर जेम्स प्रयोग करते रहे थे। उसके बाद कुछ दिन शांति रही थी।

लेकिन दो महीने बाद ही चोरी की दो बहुत बड़ी वारदातें बड़े हैरत भरे ढंग से हुई थीं। जिसमें एक जगह से लाखों रूपया नकद चोरी हुआ था और जेवर भी। उसके बाद एक मकान में आग लग गई थी। चोरी की उन वारदात में और एक शख्स को जहर देकर मारने की जगह से किसी अज्ञात आदमी के फिंगरप्रिंट मिले थे।

यह केस मुझे मिला तो सबसे पहले मैंने उस लाश का मुआयना करना चाहा और डॉक्टर जेम्स के पास पहुंच गई। इस बीच पुलिस फाइल में रखे फिंगरप्रिंट से पता लग गया था मुझे कि सभी वारदातों में मुजरिम एक ही आदमी है। लाश पर भी कुछ अंगुलियों के निशान थे, जो मैंने उठवा लिए थे और बाद में वो उसी मुजरिम के फिंगरप्रिंट निकले थे।

मैं फिर डॉक्टर जेम्स के यहां गई और उनसे पूछा कि क्या लाश को उनके अलावा और भी किसी ने छुआ था, इन्होंने बताया कि डॉक्टर राज ने लाश को छुआ था, जिसने डॉक्टर जेम्स के साथ लाश का परीक्षण किया था।

मैंने उनसे पूछा था कि डॉक्टर नीकण्ठ अब कहां है। उन्होंने बताया कि डॉक्टर राज पच्चीस दिसम्बर की रात से ही लापता थे। उसके कुछ दिन बाद उन्होंने किसी आदमी को एक पत्र देकर भेजा था और अपना सामान भी मंगवा लिया था। मैं हैरान रह गई थी कि यह क्या पहेली है? डॉक्टर राज के बारे में डॉक्टर जेम्स ने मुझे बताया था कि वो बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की सलाह पर मुम्बई से बुलाए गए थे। और अब वहीं डॉक्टर राज मुजरिम साबित हो रहे थे, लेकिन फर्ज हर हाल में फर्ज होता है। इसलिए मैं सब कुछ भूल कर अपनी जांच-पड़ताल में लगी रही।

यह चूंकि लापता थे इसलिए मैंने इनकी एक फोटो हालिस करके कलकत्ता के सारे पुलिस स्टेशनों में भेज दिया और पूरी सरगर्मी से इन्हें तलाश करने का निर्देश दे दिया।

कई हफ्तों बाद मुझे सी.आई.डी. के एक सब इंस्पेक्टर से सूचना मिली कि जिस शख्स की तस्वीरें सारे थाने में भेजी गई थीं, वो कलकत्ता के एक होटल में देखा गया है, एक लड़की के साथ। मैं फौरन उस होटल में पहुंची थी और यह देख कर खुश हो गई

थी कि वो यही डॉक्टर राज थे।

उस दिन से मैं साये की तरह उनके पीछे लग गई थी तभी मुझे पता चला था कि उस लड़की का नाम रोजी है। दो दिन तक ये होटल में रहे और उसके बाद ये वापस डॉक्टर जय की कोठी पर पहुंच गए। उन लोगों ने अपनी समझ में पुलिस की नजरों से बचने की कोशिश की, लेकिन फिर भी मैं इनके पीछे साये

की तरह लगी रही। जब कभी मैं इनकी निगरानी से उकता जाती थी तो मेरे दो असिस्टेंट मेरी जगह ड्यूटी देती थे।

संक्षेप में यह कि, ये लोग वापस जय की कोठी पर पहुंच गए और मुझे पता चल गया कि वो दोनों स्थाई रूप से वहीं रहते हैं।

उस दिन के बाद मैंने उस कोठी की निगरानी भी शुरू कर दी

और गुप्त रूप से डॉक्टर जय के बारे में जानकारी हासिल करनी शुरू कर दी। लेकिन वो इतना चालाक है कि कोशिश के बावजूद उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। लेकिन मैं एक नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि असली मुजरिम डॉक्टर राज ही हैं। जय के यहां वो सिर्फ एक दोस्त की हैसियत से रह रहे

इसी तरह एक महीना गुजर गया। फिर अट्ठारह जून को एक दूसरी दुर्घटना घट गई। मैं कोठी से थोड़े फासले पर खड़ी थी कि उस दिन डॉक्टर राज अकेले कोठी से निकले और पैदल ही शहर की तरफ चल पड़े थे। मैंने उनका पीछा करना शुरू कर दिया था।
 
ये बेमतलब आधे पागल की तरह सड़कों पर घूमते रहे। मैं भी सब्र से उनका पीछा कर रही थी। फिर जब एक बार ये सड़क पार कर रहे थे तो बेध्यानी में एक कार से टकराकर जख्मी हो गए थे। मैं भी वहां जमा लोगों की भीड़ में घुस गई थी और इन्हें उठाकर हॉस्पिटल ले गई थी। फिर मैंने अपने अफसरों के जरिये हॉस्पिटल में ऐसा इन्तजाम करवाया कि मुझे नर्स के रूप में इनके साथ रहने दिया जाए। ये सारे इन्तजाम पक्के हो जाने के बाद मैंने फोन करके डॉक्टर जय को बता दिया था कि उनका दोस्त जख्मी हालत में फलां हॉस्पिटल में दाखिल है। डॉक्टर जय ने फौरन चीफ मैडीकल ऑफिसर को फोन करके इनके इलाज का पूरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले ली थी और इन्हें स्पेशल रूम में शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन मैं नर्स के में इनके साथ ही लगी रही।

उसके बाद जो कुछ हआ, वो आप लोगों को मालूम ही है। जब इन्होंने मुझे डॉक्टर जय और ज्योति के अतीत के बारे में

बताया था तो मैं समझ गई थी कि यह निर्दोष हैं और इन्हें चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह अपने आप को निर्दोष साबित करना चाहते थे, इसलिए मैं इस काम में इनकी मदद करने लगी।"

डॉली ने अपनी कहानी खत्म करके राज की तरफ देखा। उसकी आंखों में शरारत थी। सब उसे इस तरह प्रशंसा भरी नजरों से देख रहे थे, जैसे वो कोई अनोखी हस्ती हो।

"इस सब बातों के साफ हो जाने के बाद ।“ डॉक्टर जेम्स ने कहा, “हमें वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, बल्कि फौरन पुलिस कमिश्नर से मिल कर वारण्ट हासिल कर लेने चाहिएं। ऐसा न हो कि वो लोग होशियार हो जाएं और बचाप या भागने का कोई तरीका ढूंढ लें।

“मेरा ख्याल है, कमें फौरन कमिश्नर साहब की कोठी पर चलना चाहिए।“ डॉली ने सहमति जता दी।

"चलिए। हम सब तैयार हैं। डॉक्टर गुप्ता ने उठते हुए कहा।

और डॉक्टर जय की कार में ही बैठ कर सभी लोग चीफ कमिश्नर की कोठी की तरफ रखारा हो गए।

करीब एक-सवा घंटा उन्हें कमिश्नर साहब को सारी घटनाएं सुनाने और समझाने में लगा गया। उसके बाद आधा घंटा वारण्ट बनवाने और पुलिस पार्टी तैयार करने में लग गया। ठोक तीन बज रहे थे, जब वो डॉक्टर जय की गिरफ्तारी के लिए लैस होकर उसकी कोठी के लिए चल पड़े।

तेज रफ्तार से पुलिस जीपें और डॉक्टर जय की मर्सीडीज कार दौड़ाते वो जल्दी ही डॉक्टर जय की कोठी पर पहुंच गए।

डॉली ने पुलिस पार्टी को निर्देश दिया कि वो फौरन कोठी को घेर ले और किसी को भी बाहर न निकलने दे।

फिर वो उन सबको साथ लेकर कोठी में दाखिल हुई। दो

इंस्पेक्टर भी रिवाल्वर थामे उनके साथ थे।

पूरी कोठी में चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था. सभी लोग दबे कदमों से चलते हुए सबसे पहले डॉक्टर जय के बेडरूम में पहुंचे। बेडरूम का दरवाजा खुला हुआ था और अन्दर अंधेरा था।

डॉली ने सबसे पहले अन्दर दाखिल होकर लाईट का स्विच ऑन किया। रोशनी होते ही सभी के मुंह से हैरत की आवाजें गई, जय अपने बिस्तर पर नहीं था, बिस्तर से कि उस पर कोई लेटा तक नहीं है। डॉली फौरन

“ज्योति भी अपने कमरे में नहीं है।" उसने आकर के बीच कहा, "कहां गए वे लोग?"

"रात की वो दोनों लेब्रॉटरी में थे।" राज ने उसे याद दिलाया, “ हो सकता है इस वक्त भी वो वहां कोई खास काम कर रहे हों।

"चलो, फिर वहीं चलते हैं। डॉली ने सबसे पहले कमरे से निकलते हुए कहा । सब उसके पीछे चल पड़े । लेकिन लेबॉटरी में भी अन्धेरा छाया हुआ था ।लाइट जलाई गई तो वह कमरा भी खाली निकला । राज फुर्ती से आगे बढ़ा और उसने सांपों वाले कमरे में झांक कर देखा। जानवरों वाले कमरे में तलाश किया। लेकिन ज्योति और जय गधे के सींगो की तरह गायब हो चुके थे।

अचानक सतीश ने उनका ध्यान उस आलमारी की तरफ दिलाया, जहां डॉक्टर जय सांपों से प्राप्त जहर रखता था। उसमें से अब बहुत सी शीशीयां कम थीं, दो चार शीशियां इस तरह उतरी हुई थीं जैसे किसी ने बहुत जल्दी में वहां से अपने मतलब की शीशियां निकाली हों।

डॉली ने राज की तरफ अर्थपूर्ण नजरों से देखा।

“मालूम होता है कि पंछी उड़ गए...।" नीलकण्ड ने कहा।

"ऐसा कैसे हो सकता है?" डॉली बोली, “उन्हें हम पर किसी तरह का सन्देह नहीं था।

"इसके बावजूद यह हकीकत है कि खत की गंध पाकर वो भाग चुके हैं। राज ने मुस्करा कर कहा।

"नहीं।" डॉली जल्दी से बोली," हो सकता है वो तहखाने में हों। चलो...वहां तलाश करते हैं।"

वो सब जल्दी से तहखाने की तरफ भागे। सबसे पहले उन्होंने खूनी बेल वाला कमरा खोल कर देखा। वहां कोई नहीं था। उसके बाद उन्होंने खुफिया कमरे का दरवाजा खोला। वो कमरा भी अन्धेरा पड़ा था। रोशनी करने पर उन्हें पता चला कि वाकई वो लोग फरार हो चुके हैं। यहां की कई चीजें उलटी-पुलटी पड़ी थीं, जैसे किसी ने जल्दबाजी में तलाशी ली हो । आलमारी में से खास जहरों की शीशियां भी गायब थीं।

"अफसोस...वो मुजरिम फरार हो गए हैं। डॉली ने अफसोस से हाथ मलते हुए कहा, “वो ठीक उस वक्त भागे होंगे जब हम शहर में तैयारियां पूरी कर रहे थे।"

"जरूर उन्हें किसी तरह शक हो गया होगा।" डॉक्टर गुप्ता ने राय दी।

"ऐसा ही लगता है...।“ डॉली ने धीरे से कहा।

प्रेम कुमार की लाश अभी तक उस कमरे में मेज पर पड़ी थी। उसके सीने पर एक बड़ी सी बोतल रखी हुई थी। सतीश ने राज का ध्यान उधर दिलाया

“यह क्या मामला है?"

वो सभी लाश की तरफ बढ़ गए। करीब जाकर उन्होंने देखा तो बोतल के नीचे लाश के सीने पर एक बन्द लिफाफा रखा हुआ था। राज ने जल्दी से वो लिफाफा निकाल लिया । पते की जगह उसने देखा तो वहां मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था

अपने सबस प्यारे दोस्त और सबसे खतरनाक दुश्मन राज के नाम।

"लगता है मेरे मेहरबान दोस्त मेरे नाम कोई सन्देश छोड़ गए हैं।“ राज ने लिफाफे का ऊपरी हिस्सा फाड़ते हुए कहा।

सब लोग सिमटकर एक जगह जमा हो गए। अन्दर से कुछ कागज निकले, लेख से पता चलता था कि उन्हें बड़ी उतावली में लिखा गया है।

"डॉक्टर राज , ऊंची आवाज में पढ़कर सबको सुना दो, क्या लिखा है!" डॉक्टर गुप्ता ने कहा।

"बहुत अच्छा । राज बोला, और उसने वो लम्बा पत्र पढ़ना शुरू कर दिया

"बाकई तुम्हारी किस्मत और अक्ल को मानना पड़ता है राज । पहले भी दो बार तुम मौत के मुंह में जाते-जाते बच चुके हो और दो बार मैं भी तुमसे शिकस्त खाकर अपनी जान बचा कर भागने में कामयाब हो चुका हूं। यह तीसरी बार थी, तीसरी बार भी तुम बव गए हो।
 
तुम्हारी एक बचकाना हरकत ने तुम्हारी पोल खोल दी और मैं होशियार हो गया। स्वीकार करता हूं कि तुम इस बार इतनी खूबसूरती से मुझे धोखा देना चाहते थे कि मुझ जैसा चतुर इन्सान भी कभी तुम पर शक नहीं कर सका।

हालांकि ज्योति ने शक जताया था कि तुम्हारी याददाश्त वापिस आ चुकी है और तुम मेरे साथ ड्रामा कर रहे हो। लेकिन तुम्हारे सब्र और तुम्हारी बेमिसाल एक्टिंग ने मुझे तुम पर शक नहीं करने दिया । मुझे हैरानी है कि छः महीने तक याददश्त खोई रहने के बावजूद तुम्हें यह कैसे मालूम हो गया कि बीते छ: महीने में तुम क्या करते रहे हो। कम से कम नर्स डॉली पर तो मुझे जरा भी शक नहीं हो पाया था। मैं सोच भी नहीं सकता

था कि इन्टेलीजेंस विभाग की एक एजेंट मेरे घर में ही रह कर मेरे खिलाफ जासूसी कर रही है।

लेकिन अब सारे भेद खुल चुके हैं और इन भेदों को खोलने की सारी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ तुम पर है। अगर तुम कल रात रोजी को याददाश्त खत्म करने वाजा इन्जेक्शन न देते तो शायद मुझे कभी भर तुम पर शक न होता। ऐन उस वक्त, तब तुम कामयाबी से सिर्फ एक कदम दूर रह गए थे, तुम्हें ऐसी बेवकूफी नहीं करनी चाहिए थी-जिस पर अब तुम्हें काफी लम्बे वक्त तक पछताना पड़ेगा।

मैं तुम्हारे कमरे में गया तो तुमने मुझे बेवकूफ बना दिया। लेकिन फिर भी मैं राज जानने की कोशिश में लगा रहा। इत्तेफाक से दोपहर को मैं उस जगह चला गया जहां तुमने टॉमी की लाश पत्तों में छुपा दी थी। टॉमी की लाश ही तुम्हारा भेद खोलने की वजह बनी है।

टॉमी की लाश पर उस खूखार अफ्रीकी बोल के निशान देखकर ही मैं यह यमझ गया कि तुम पर मेरे भेद खुल चुके हैं। मैं समझ गया कि तुम मेरे उस खुफिया कमरे और अफ्रीकी बेल के राज से भी वाकिफ हो चुके हो और तुम्हीं वो आदमी हो जिसने रोजी को याददाश्त खो देने का इंजेक्शन दिया है, और खुद तुम्हारी याददाश्त वापिस आ चुकी है।

मैंने ज्योति से इन बातों में सिगार की राख मेज के नीचे पड़ी हुई थी और तहखाने के फर्श पर सिगार का एक टुकड़ा भी पाया गया है।

जाहिर है कि तुम सिगार नहीं पीते , मैं भी नहीं पीता। तो फिर वो सिगार का टुकड़ा कहां से आ गया? फिर ज्योति ने समझा कि अगर तुम्हारी याददाश्त वापिस आ चुकी है तो तुमने जरूर सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता को बुलवाया होगा और उन्हें जरूर तुमने फोन पर सभी हालात बता दिए होंगे, सूचना पाते ही वो लोग यहां आ गए होंगे।

मैंने फौरन ज्योति को शहर भेजा ताकि वो वहां जाकर डॉक्टर जेम्स से किसी बहाने मालूम करे कि क्या डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता शहर में आए हुए हैं? ज्योति ने पता लगा लिया कि कल वाकई डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता और सतीश शहर में आ पहुंचे थे। इससे मैं समझ गया कि डॉक्टर गुप्ता ही उस खुफिया तहखाने में गए होंगे।

मुझे हैरत इस बात की थी कि रात को मेरे घर में ये सब होता रहा-और मैं पड़ा सोता रहा। आखिर यह क्या चक्कर है? लेकिन तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने तुम्हारे कमरे की तलाशी ली तो मुझे वो नींद की दवा मिल गई जो राम जाने तुमने किस तरह हम लोगों को खिला दी होगी। इस तरह यह राज भी खुल गया।

छः-सात महीने पहले मैंने उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि लोकल पुलिस की मदद के लिए इन्टेलीजेंस की एक लेडी ऑफिसर शहर में आई हुई है। लेकिन उसके बाद जब किसी औरत जासूस ने मेरे मामले में दखल नहीं दिया तो मैंने समझ लिया कि वो सिर्फ मेरी मामले में दखल नहीं दिया तो मैंने समझ लिया कि वो सिर्फ मेरी अफवाहें ही थीं।

फिर मैंन सोचा, हो सकता है वो नर्स जासूस न हो, तुम्हारी कोई हमदर्द हो क्योंकि ज्योति बहुत पहले तुम दोनों की निगाहों से अन्दाजा लगा चुकी थी कि तुम दोनों में प्यार है।

अब जरूरत यह बात मालूम करने की थी कि इस सारे हंगामें के बाद आखिर तुम्हारा अगला कदम अब क्या होगा।

इसलिए, रात को बारह बजे, जब तुमने समझा कि हम लोग सो चुके हैं और तुम नर्स डॉली के साथ स्टैण्डई होटल की तरफ मेरी कार लेकर गए तो मैंने भी थोड़ी देर बाद ही तुम्हारा पीछा करना शुरू कर दिया था

तुम्हारे पीछे-पीछे मैं भी स्टैण्डर्ड होटल पहुंचा था। मैंने सावधानीवश ज्योति को समझा दिया था कि वो खास-खास चीजें सूटकेस में रखकर भागने के लिए तैयार रहे, क्योंकि हो सकता है, पानी सिर से , ऊंचा हो चुका हो। हमें भागना पड़ जाए।

हां, तो मैं तुम्हारे पीछे-पीछे स्टैण्डर्ड होटल पहुंचा और जब तुम लोगों अपनी कान्फ्रेंस में व्यस्त थे तो मैं साथ वाले कमरे में खड़ा तुम लोगों की सारी बातें सुन रहा था। वहीं पर मुझे मालूम हुआ कि नर्स डॉली नर्स नहीं, एक पेशेवर जासूस है।

ये तमाम बातें मालूम करने के बाद मेरा वहां ठहरना बेकार था, क्योंकि तुम्हारी स्कीम पूरी हो चुकी थी। अगर मैं उस वक्त सुस्ती दिखाता तो मेरी गिरफ्तारी में कोई कसर बाकी न रह जाती।

मैं अपनी दूसरी कार में गया था, उसी में तुरंत वापिस लैटा और ज्योति भी। फिर तुम्हारे नाम यह लम्बा-चौड़ा खत लिखा और अब मैं एक अज्ञात मंजिल की तरफ रवाना हो रहा हूं।

मुझे अफसोस है कि इस बार फिर तुम मौत के मुंह से बच गए

और मुझे गच्चा दे गए। लेकिन मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहूंगा, या फिर तुम्हें मिलता रहूंगा। मेरी जिन्दगी ज्योति मेरे साथ है। उसके साथ होने की वजह से बड़ा से बड़ा खतरा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । उसे अपनी खोई हुई मणि की तलाश है

और मैं उस काम में उसकी मदद कर रहा हूं, इस क्रम में न जाने हमें कहां-कहां भटकना पड़ेगा!

मुमकिन है कि निकट भविष्य में ही हमारी फिर मुलाकात हो जाए।

गुड बाई डॉक्टर राज।

तुम्हारे सबसे प्यारे दोस्त और

तुम्हारी जान के दुश्मन

ज्योति-जय।

पत्र समाप्त हो जाने के बाद सब लोग हैरत से स्तब्ध बैठे थे। जय और ज्योति की चतुराई का उन सबको लोहा मानना पड़ा, फिर सबसे पहले डॉली ही उस स्तब्धता से चौंकी।

"जल्दी करो तुम लोग।" उसने पुलिस इंस्पेक्टरों से कहा,

"हम उनका पीछा करेंगे।"

"लेकिन पीछा कैसे करेंगे?" राज बोला, "हमें क्या मालूम वो कौन सी दिशा में गए है?"

"यह अभी पता चल जाएगा।" डॉली ने कहा और फोन वाले कमरे की तरफ दौड़ गई। वो सभी उसके पीछे थे। डॉली ने रिसीवर उठाकर पुलिस हैडक्वार्टर फोन किया कि नाकाबंदी लगा दी जाए और नीले रंग की होण्डा सिटी कार को शहर से बाहर न जाने दिया जाए। अगर कोई ऐसी गाड़ी निकल चुकी है तो फौरन इस नम्बर पर सूचना दी जाए कि वो किस तरफ गई

पुलिस और खुफिया विभाग की पूरी मशीनरी डॉली की सूचना पर हरकत में आ गई । वायरलेसों पर सन्देश जाने-आने लगे । पन्द्रह मिनट बाद ही फोन की घंटी बजी और हैडक्वार्टर से उन्हें सूचना दी गई कि नीले रंग की होण्डा सिटी कार आधा घंटा पहले शहर से बाहर निकल गई है। जिसमें एक मर्द और एक

औरत बैठे हुए थे। वो कार कृष्णा नगर जाने वाली सड़क पर गई है।

डॉली ने सूचना पाते ही रिसीवर फेंक दिया और दोनों में से एक पुलिस इंस्पेक्टर को हुक्म दिया

"देखो, बराबर वाले कमरे में एक लड़की बेहोश पड़ी होगी।

उसे लेकर फौरन हॉस्पिटल पहुंचो।"

फिर उसने दूसरे इंस्पेक्टर से कहा

“तुम जीप लेकर कृष्णा नगर जाने वाली सड़क पर जितनी तेजी से जा सकते हो, रवाना हो जाओ। सब सिपाहियों को अपने साथ ले जाओ।

“ओ के मैडम।" इंस्पेक्टर ने सैल्यूट किया और दौड़ता हुआ काठी से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद सब लोग डॉली के पीछे-पीछे रोजी के कमरे में जा पहुंचे। वो अभी तक बेहोश पड़ी थी। उसे उठाकर उन्होंने पुलिस की तीसरी जीप में डाला

और इंस्पेक्टर के साथ उसे भेज दिया। उसके बाद सभी लोग डॉक्टर जय की मर्सीडीज में बैठकर उसके पीछे चल पड़े।

डॉली गाड़ी चला रही थी, राज को कामयाबी की कतई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि उन्हें भागे आधा घंटा गुजर चुका था

और कम से कम शहर से पैंतीस-चालीस मील दूर निकल गए होंगे।

लेकिन डॉली ने हिम्मत नहीं हारी थी। रात सुनसान थी और सड़कें खाली, इसलिए डॉली ने स्टेयरिंग पर झुक कर गाड़ी फुल स्पीड पर कर रखी थी। मर्सीडीज का ताकतवर इन्जन कार को उड़ाए लिए जा रहा था। डॉली इस वक्त गुस्सैल शेरनी की तरह बिफरी हुई थी। वो इतनी निडर हो सकती है, यह राज ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उस आकर्षक युवती में बहादुरी और फुर्ती की कमी नहीं थी।

रास्ते में वो सभी खामोश रहे, सबकी निगाहे सामने काली सड़क पर जमी हुई थीं। पुलिस की दोनों जीपें जो उनसे पांच मिनट पहले चली थीं, कब की पीछे छूट गई थीं।

अढ़ाई घंटे तक वो सभी निरंतर खामोश और निश्चल बैठे रहे। डॉली उसी मुद्रा में स्टेयरिंग पर झुकी रही और कार की स्पीड अस्सी और सौ के बीच झूलती सुई बताती रही। आखिर जब सूर्य देवता ने पूर्व की पहाड़ियों के पीछे से झाका तो उन्हें सीधी सड़क पर एक कार की सुर्ख टेल लाईट नजर आई।

पन्द्रह मिनट में ही उनकी कार आगे वाली कार से करीब सौ गज के फासले पर रह गई। उन्होंने यही समझा कि शायद यह हाईवे पर चलत कोई दूसरी कार ही होगी। लेकिन ठीक उसी वक्त रायफल चलने के दो धमाके हुए और दो शोले चमक कर उनकी कार के करीब से गुजर गए।

"वही है!“ डॉली ने खुशी से चीखकर कहा। बाकी सब भी समझ गए कि वही कौन है। अगर कोई दूसरे होते तो उन पर गोली क्यों चलाते? यकीनन वो कार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।
 
दरम्यानी फासला धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। अब कार का नीला रंग भी पहचाना जा रहा था। यह सड़क जिस पर कारें दौड़ रही थीं, एक पहाड़ी के दामन में से होकर गुजरती थी। अचानक डॉक्टर जेम्स ने चिल्लाकर डॉली से कहा

"डॉली सावधानी से, आगे एक खतरनाक मोड़ है।"

"क्या आप इधर पहले भी आ चुके हैं?" राज ने पूछा।

"हां, एक बार मैं पहले किसी काम से इधर आया था और जंगल में भी थोड़ा घूमा था। वो मोड़ बहुत खतरनाक है, एक तरफ दीवार की तरह सीधी चानें खड़ी हैं और दूसरी तरफ गहरी खाई है।"

फिक्र न कीजिए । कम से कम हम कार एक्सीडेंट से नहीं मरेंगे।" डॉली ने सड़क पर निगाहें जमाए हुए चिल्लाकर जवाब दिया। कार की स्पीड में धीरे बोलने से आवाज सुनाई नहीं देती थी।

आगे वाली कार से दो गोलियों के बाद कोई गोली नहीं चलाई गई थी। फासला धीरे-धीरे और कम होता गया। अब डॉली की कार आगे वली कार से करीब चालीस गज पीछे थी। थोड़ी देर बाद सामने एक पहाड़ी नजर आने लगी।

“यही वो खतरनाक मोड़ है।" डॉक्टर जेम्स ने कहा-“गाड़ी की रफ्तार कम कर लो।"

कुछ सैकिण्ड में ही पहाड़ी के पहलू में घूमती सड़क का मोड़ नजर आने लगा था। जिसके पास बोर्ड लगा था

मोड़ खतरनाक है, रफ्तार कम रखिये।

लेकिन अगली कार हवा से बाते करती भागती रही, उन्होंने बोर्ड की रत्ती भर परवाह नहीं की थी। पिछली कार में सभी लोगों के दिल आशंका से जोर-जोर से धड़क रहे थे, जब वो लोग बोर्ड के पास पहुंचे तो डॉली ने कार की रफ्तार बहुत सुस्त कर दी थी। उनके देखते अगली कार खतरनाक मोड़ पर घूम गई थी।

फिर दो चीखों की आवाज ने सबके रोंगटे खड़े कर दिये। उसके कुछ क्षण बाद ही दिल दहला देने वाला एक खौफनाक धमाका सुना उन्होंने जैसे कोई बहुत भारी चीज हजारों फुट गहरी खाई में जा गिरी हो।

उन सबने एक दूसरे की तरफ सहमी हुई निगाहों से देखा ।बगैर एक शब्द भी कहे-सुने सब समझ गए कि दोनों फरार मुजरिमों के साथ दुर्घटना घट चुकी है।

डॉली ने फौरन गाड़ी रोक दी और सभी लोग कार से उतरकर उस तरफ दौड़ने लगे। मोड़ वाकई खतरनाक था। एक तरफ पहाड़ी दीवारी की तरह खड़ी थी और दूसरी तरफ इतनी गहरी खाई थी के उसमें झांकते हुए भी दहशत होती थी।

पांच मिनट की दौड़ के बाद सब उस जगह पहुंच गए जहां से

कार के टायरों के निशान सीधी सड़क पर जाने के बजाय खाई की तरफ मुड़ गए थे।

खाई के किनारे उगे छोटे-छोटे पौधे मुचले-टूटे पड़े थे। उन सबने नीचे झांक कर देखा तो अन्दर खाई में उन्हें एक काली सी चीज पड़ी नजर आई, जो यकीनन ज्योति और जय की कार थी।

सबके चेहरे गम्भीरता से खुले हुए थे और दिल इस भयानक दुर्घटना से उदास थे। आखिर काफी देर बाद डॉक्टर गुप्त ने खामोशी तोड़ते हुए कहा

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"चलिए...अब वापिस चलें। किस्सा खत्म हो गया।"

"हां, चलिए ।“ डॉली मरी हुई आवाज में बोली।

सभी वापिस कार में बैठ गए और शहर की तरफ रवाना हो गए। कोई पचास मील वापिस आने के बाद उन्हें पुलिस की जीपें आती हुई मिल गईं। डॉली ने उन्हें रोक कर संक्षेप में एक्सीडेंट के बारे में बता दिया। वो लोग करीब चार घंटे के थका देने वाले सफर के बाद वापिस शहर पहुंच गए।

उसके बाद राज पर मुकदमा चला। लेकिन तमाम सबूतों ने, जो उन्होंने डॉक्टर जय के खिलाफ इके किए थे, राज को अदालत में बेगुनाह साबित कर दिया । रोजी डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता की मेहनत से दस दिन में ही भली-चंगी हो गई। उसकी याददाशत पूरी तरह वापिस आ गई और उसने अपने छोटे-मोटे गुनाह कबूल की लिए कि उसने डॉक्टर जय के कहने पर डॉक्टर राज को एक दवा सुंघाकर बेहोश किया था। फिर डॉक्टर जय उन्हें कार में डाल कर कोठी पर ले गया था।

रोजी को दो साल कैद की सजा सुनाई गई। अदालती फैसले के एक हफ्ते बाद ही डॉली और राज की शादी हो गई थी

और अब वो डॉक्टर जय की सजी सजाई कोठी में चैन और खुशी से जिन्दगी गुजार रहे थे।

राज अब डॉक्टर जय की लेब्रॉटरी में नए-नए प्रयोग करता था। उस खूनी बेल के बारे में भी परीक्षण का वादा वो मैडीकल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से कर चुका था।

डॉली जितनी नर्मदिल नर्स थी, उससे ज्यादा बहादुर और खतरनाक जासूस थी, और उससे भी ज्यादा वो प्यारी बीवी साबित हो रही थी। डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता दिल्ली लौट गए थे, लेकिन सतीश उनके साथ कलकत्ता में ही ठहर गया था और अपनी खूखार पूर्व पत्नी के कमरे में बैठा घंटों सोचता रहता था।

ट्रेन धड़धड़ाती हुई प्लेटफार्म में दाखिल हुई और एक झटके के साथ रूक गई। सतीश अपने ख्यालों में इस तरह खोया हुआ था कि उसे ट्रन के रूकने का पता तक नहीं चला। राज ने उसका कंधा पकड़कर हिलाते हुए कहा

"उठ जाओ यार, स्टेशन आ गया है।"

सतीश ने नशे में टल्ली आदमी की तरह एक अंगड़ई ली, मुस्करा कर राज की तरह देखा और उठाकर उसके साथ चल दिया।

वो दोनों ट्रेन से उतरकर बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़े। इतनी देर में लोगों का एक लम्बा सा अजगर उतर कर धीरे-धीरे बाहर जाने वाले रास्ते पर बढ़ रहा था, रेंगता हुआ। अभी कुछ लोग रतर रहे थे।

फर्स्ट क्लास से एक अधेड़उम्र और बढ़िया लिबास पहने शख्स उतरा। उसके पीछे-पीछे एक हसीना हाथों में कागजात लिए उतरती दिखाई दी।

लड़की अयाधारण तौर पर सुन्दर थी। उन दोनों की निगाहें लड़की के चेहरे पर जम कर रह गईं। लड़की की उम्र बीस-बाईस साल से ज्यादा नहीं थी। खिलता हुआ रंग, काली-काली आंखें, गुलाबी होंठ। इस वक्त तो बदामी रंग की साड़ी बांधे हुई थी और उसके अन्दाज से पता चलता था कि वो उस अधेड़उन शख्स के साथ है।

राज और सतीश भी धीरे-धीरे चलते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े, लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लड़की और अधेड़ आदमी कब उनकी नजरों से ओझल हो गए, उन्हें पता तक न चला।

"चलिए साहब!" अचानक सतीश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा-"चिड़िया खेत चुग गई है...।"

"ठहरो, जरा भीड़ कम हो जाने दो।" राज ने कहा , और दोनों एक साईड में खड़े होकर भीड़ कम होने का इन्तजार करने लगे।

लेकिन अभी उन्हें खड़े हुए ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था कि लोगों के रेले में उन्हें किसी मर्द की भयानक चीख सुनाई दी। अगले कुछ सैकिण्डों में ही उनसे पल्द्रह-बीस गज दूर लोगों का जमघट लग गया। राज और सतीश ने एक-दूसरे की तरफ देखा

और फिर कुछ कहे बगैर तेजी से उस भीड़ की तरफ दौड़ पड़े। लेकिन किसी रहस्यमय घटना के अनुमान ने ऐसा जोश भर दिया था कि कोशिश के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल सका। तरह-तरह की बातें भी शुरू हो गई थीं।

कोई कह रहा था,“ किसी को कत्ल कर दिया दिया है।"

दूसरा कह रहा था, “बीमार था बेचारा , दौरा पड़ा है।"

लेकिन असल बात किसी को भी मालूम नहीं थी। आखिर थोड़ी देर बाद रेलवे पुलिस ने मौका-ए-वारदात को घेरकर सारा इन्तजाम उपने हाथ में ले लिया तो भीड़ भी कम होनी शुरू हो गई। लोग इधर-उधर हटने लगे। पुलिस ने लोगों को धकेल-धकेल कर प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। उन्हें भी वो बाहर निकालने वाले थे कि सरकारी डॉक्टर सावंत की नजर उन दोनों पर पड़ गई।

"हैलो, राज!" डॉक्टर सावंत ने बड़े जोश में आगे बढ़ कर उन दोनों से हाथ मिलाकर कहा," और सुनाओ , मिजाज तो कढ़िया हैं, बम्बई कब आए?"

"कल आए थे।" जवाब सतीश ने दिया।

“अजीब आदमी हो यार तुम दोनों!" डॉक्टर सावंत ने मुंह बनाकर कहा, "कल आए थे और खबर तक नहीं दी? ठहरे कहां हुए हो?"

"होटल में। फ्लैट तो हमने बेच ही दिया था।"

"तो मेरे घर का रास्ता भूल गए थे क्या?"

"नहीं।" राज ने कहा," ऐसी कोई बात नहीं है। बगैर किसी प्लानिंग के अचानक आने का प्रोग्राम बन गया। इस

वक्त हम आपसे और कुछ दूसरे दोस्तों से मिलने ही बान्द्रा से यहां आए हैं कि प्लेटफार्म पर अचानक यह हंगामा हो गया और...।"

"ओह यार। मैं तो बिल्कुल भूल गया था।" डॉक्टर सावंत को अचानक अपना फर्ज याद आ गया और वो फिर उस तरफ चल पड़ा जिधर पुलिस पार्टी जमा थी। वो कांस्टेबल, जो उन्हें वहां से हटाने आया था, उन्हें डॉक्टर का दोस्त जानकर दूसरी तरफ के लोगों को हटाने लगा था।

"आओ मेरे साथ । “ डॉक्टर सावंत ने उन्हें रूकते देख कर कहा।

"चक्कर क्या है?" राज ने आगे बढ़ कर पूछा।

“यह तो अभी मुझे भी नहीं मालूम ।“ डॉक्टर सावंत ने कहा,

"मैं तो इत्तेफाक से किसी दूसरे काम से रेलवे स्टेशन की पुलिस चौकी आया हुआ था कि एक सिपाही दौड़ता हुआ वहां पहुंचा

और उसने सुचना दी कि प्लेटफार्म पर कोई दुर्घटना घट गई है। इंस्पेक्टर मुझे भी साथ खींच लाया कि डॉक्टर तो हो ही।"

वो दोनों अब उस जगह पहुंच गए थे जहां पहले लोग जमा थे। उस जगह अब सिर्फ कुछ बगैर वर्दी के और आठ-दस वर्दी वाले पुलिस मैन ही रह गए थे। कांस्टेबल वहां घेरा बनाए खड़े थे।

तब उन्होंने देखा कि वही अधेड़ उम्र शख्स फर्श पर पड़ा हुआ था, और अज्ञात हसीना उसके पास बैठी फिक्रमंद निगाहों से इधर-उधर देख रही थी।

डॉक्टर सावंत ने आगे बढ़ कर चार्ज सम्भाल लिया और उस

शख्स की नब्ज देखने लगा। राज और सतीश स्तब्ध खड़े यह दृश्य देखते रहे। एक मिनट बाद ही डॉक्टर सावंत मायूसी से सिर हिला कर उठ खड़ा हुआ।

"मर गया क्या?" सतीश ने बैचैनी से पूछा।

डॉक्टर सावंत ने "हां" में सिर हिला दिया। फिर वो पुलिस इंस्पेक्टर से बोला

“लाश के फोटोग्राफ लेकर इसे फौरन पुलिस चौकी ले चलो। मैं इत्मीनान से इसका मुआयना करके ही कुछ पक्की बात बता सकूँगा।"

इंस्पेक्टर ने सम्मान से सिर झुकाया और सिपाहियों को हिदायतें देने लगा। राज ने आगे बढ़ कर डॉक्टर सावंत के कान में कहा

"जितने भी लोग यहां मौजूद हैं, उन्हें भी अपने साथ चौकी ले चलिए, ताकि घटना के बारे में जानकारी मिल सके।"

“ठीक कहा तुमने।" डॉक्टर सावंत ने कहा। फिर उसने दबी जुबान से इंस्पेक्टर से कुछ कहा।
 
वो लकड़ी बड़ी परेशानी में इधर-उधर देख रही थी। इस अनापेक्षित घटना ने उसके होश उड़ा दिए थे। राज आगे बढ़ कर उसके करीब जा पहुंचा और तसल्ली देना वाले लहजे में बोला

“मुझे अफसोस है कि आपके साथ यह दुखद घटना घट गई। क्या मैं आपका और दिवंगत का नाम पूछ सकता हूं?"

“जी...जी?" पहले तो वो घबरा गई, लेकिन फिर फौरन ही अपने आप पर काबू पाकर बोली, “जी...जी हां जरूर! मेरा नाम सोनाली है और मैं...इनकी सैक्रेटरी हूं।" उसने लाश की तरफ इशारा किया।

"और यह साहब कौन हैं?"

"ये...इन्हें नहीं जानते आप?" उसने हैरानी से कहा, "यह बम्बई के मशहूर ज्वैलर हरसुख मेहता हैं।"

"ओह...तो ये सेठ हरसुख मेहता हैं!" राज ने थोड़ा ताज्जुब से कहा, क्योंकि सेठ हरसुख मेहता का नाम कई बार वो अखबारों में पढ़ चुका था।

राज अभी सोनाली से कुछ पूछना चाहता था कि डॉक्टर सावंत ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा

“आओ राज, पुलिस चौकी चलते हैं। वहीं बैठकर इत्मीनान से बातें करेंगे।"

राज ने सोनाली की तरफ इशारा किया

"बेहतर हो कि इन्हें भी साथ ले चलिए।"

डॉक्टर सावंत ने सवालिया निगाहों से राज की तरफ देखा, फिर सोनाली की तरफ

"अभी-अभी मालूम हुआ है कि ये सोनाली जी हैं-मृतक सेठ हरसुख मेहता की प्राईवेट सैक्रेटरी।" राज बोला, “ इनसे आपको सही स्थिति की जानकारी हासिल हो सकती है। से सेठ हारसुख मेहता के साथ ही थीं।"

"मुझे अफसोस है कि आपसे मेरी मुलाकात ऐसे मनहूस समय हो रही है। डॉक्टर सावंत ने सोनाली से हाथ मिलाते हुए कहा।

सोनाली ने कुछ रस्मी बातें कहीं और उनके साथ पुलिस चौकी की तरफ चल पड़ी।

आधे घंटे में ही लाश पुलिस चौकी पहुंचा दी गई। वो तमाम लोग भी आ गए जो मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे। प्लेटफार्म से पुलिस चौकी ज्यादा दूर नहीं थी, लेकिन देर दसलिए हो गई थी क्योंकि पुलिस का फोटोग्राफर देर से पहुंचा था। तहकीकात बाकायदा शुरू करने से पहले डॉक्टर सावंत ने राज का पुलिस इंस्पेक्टर से परिचय कराते हुए कहा

“ये डॉक्टर राज हैं, सांपों और जहरों के एक्सपर्ट, और मेरे साथ भी काम करते रहे हैं।

इस बात का पुलिस इंस्पेक्टर पर बहुत रौब पड़ा

उसके बाद राज और डॉक्टर सावंत ने मिलकर लाश का मुआयना किया। लेकिन इसके सिवा वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए कि सेठ हरसुख अचानक मर गया था। उसके जिस्म पर कोई निशान तक नहीं था। पहले चीख सुनकर उसने यही समझा था कि किसी ने किसी को कत्ल कर दिया है।

डॉक्टर सावंत लाश का मुआयना करने के बाद सख्त हैरान थे कि आखिर हरसुख मेहता का देहांत कैसे हो गया? फिर उन्होंने

सोचा कि एक बार सभी लोगों के ब्यान सुन लिए जाएं, उसके बाद ही कोई नतीजा निकाला जाए।

राज ने डॉक्टर सावंत और पुलिस इंस्पेक्टर की इजाजत से उन लोगों से कुछ सवाल पूछे, जो उस वक्त मृतक सेठ के बिल्कुल करीब थे, जब वो चीखकर गिर पड़ा था।

सोनाली के अलावा उन तमाम लोगों से पूछताछ के बाद जो जानकारी उन्हें मिली, उसका सार यह था कि सेठ हरसुख मेहता बड़े आराम से खुशी-खुशी चलते आ रहे थे। चलते-चलते वो इस तरह रूक गया था जैसे सामने कोई खौफनाक चीज आ गई हो।

उसका एक हाथ कोट कि जेब में था, वो तेजी से उठा था और उसके गले पर जम गया था। दूसरे ही पल उसने एक जोरदार चीख मारी थी और नशेड़ियों की तरह गिर पड़ा था, लड़खड़ा कर। गिरते वक्त उसकी आंखों में खौफ और तकलीफ के भाव थे। फर्श पर गिरने के बाद सिर्फ एक बार उसके जिस्म ने झटका सा खाया था। उसके बाद उनका कोई अंग हिला तक नहीं था। शायद जमीन पर गिरते ही उसके प्राण निकल गए थे।

"अजीब केस है!" राज ने डॉक्टर सावंत से कहा,

"अगर हार्टफेल हो जाने से भी मौत हुई है, तब भी इतनी जल्दी जान लिकलना मुमकिन नहीं था।

"वाकई हैरत की बात है।" डॉक्टर सावंत ने गम्भीर लहजे में कहा, "लेकिन अब जरा सोनाली से भी जानकारी ले लो , हो

सकता है वो दिल की किसी बीमारी का मरीज रहा हो।"

“मुझे उम्मीद नहीं। फिर भी पूछना हमारा फर्ज है।“ राज बोला।

राज ने सोनाली को उस कमरे में बुला लिया, जहां वो चार लोगों के ब्यान ले रहे थे। सोनाली छोटे-छोटे कदम उठाती कमरे में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर उदासी और परेशानी के मिले-जुले भाव थे। ऐसा लगता था, वो खुद भी इस खतरनांक घटना के लिए तैयार नहीं थी, जिससे जाहिर होता था कि सेठ हरसुख पूरी तरह स्वस्थ रहा होगा।

सोनाली के कुर्सी पर बैठ जाने के बाद डॉक्टर सावंत ने उससे पूछा

“सोनीली जी, आपको सेठ हरसुख मेहता के यहां काम करते कितना अर्सा हुआ है?"

"करीब चार महीने ।

"आप उनकी प्राईवेट सैक्रेटरी थीं?"

“जी हां।"

"मेरा मतलब है, क्या आप...उनके तमाम राजों से वाकिफ थीं?
 
"बहुत ज्यादा नहीं।" सोनाली ने जवाब दिया , " मेरा काम सिर्फ इतना था कि मैं उनके प्राईवेट लैटर्स का जवाब लिखू और

उनसे मिलने के इच्छुक लोगों को समय दिया करूं।"

"क्या आपकी राय में सेठ साहब दिल की किसी बीमारी से ग्रस्त थे?

"बिल्कुल नहीं। बल्कि वो हंस कर कहा करते थे कि मेरा दिल मेरे तमाम अंगों से ज्यादा मजबूत है।"

"क्या वो शराब पीने के आदी थे?" राज ने पूछा।

"जी हां। लेकिन वो बहुत कम मात्र में लेते थे। सिर्फ एक डेढ़ पैग।" उसने जवाब दिया।

"क्या वो ऑफिस जाने से पहले भी पैग-शैग लेते थे?

“जी नहीं। ज्यादातर वो रात को क्लब वगैरह में ही पीते थे।"

“घटने के समय आप उनके साथ थीं?"

“जी हां। मैं बिल्कुल उनके बराबर चल रही थी।"

“फिर अचानक क्या हो गया था?"

"कुछ भी नहीं । हम दोनों आहिस्ता-आहिस्ता भीड़ में चल रहे थे कि अचानक वो चलते-चलते रूक गये थे। इससे पहले कि मैं

कुछ समझ सकती , वो चीख मार कर फर्श पर गिर पड़े थे। यह देखकर खुद मेरे गले से चीख निकलते-निकलते रह गई थी।"

एक दो क्षण के लिए कमरे में खामोशी रही, फिर राज ने पूछा

"क्या आप इस बारे में कोई अनुमान लगा सकती हैं कि सेठ साहब की मौत कैसे हो गई? जबकि वो दिल के भी मरीज नहीं

थे!"

“मुझे खेद है कि मैं इस बारे में कोई अनुमान भी नहीं लगा सकती।" सोनाली ने जवाब दिया, “मैं खुद भी हैरान हूं कि वो सेहतमंद आदमी अचानक कैसे चल बसा?'

इसके बाद सवाल जवाब का यह सिलसिलो खत्म हो गया और एक बार फिर राज और डॉक्टर सावंत लाश का मुआयना

करने लगे।

अचानक राज के जेहन में एक घटना घूम गई। अब से कुछ साल पहले उसने अखबारों में एक अजीबोगरीब घटना की खबर पढ़ी थी, जो इस घटना से बहुत मिलती-जुलती थी।

कलकत्ता में रेलवे स्टेशन पर कोई शख्स गाड़ी से उतरा था और जब वो इसी तरह भीड़ में से चल कर बाहर जा रहा था कि अचानक किसी ने उसके कूल्हे में कोई सुई चुभो दी थी। भीड़ में कोई नहीं जान सका था कि वो किसने चुभोई थी। वो शख्स चीखकर गिरा था और कुछ ही क्षण में मर गया था।

बाद में जब खोजबीन हुई थी तो उसके कपड़ों में एक तेज नोंक वाली सुई उलझी हुई मिली थी। जिसकी नोक किसी घातक जहर में बुझी हुई थी। और उस शख्स के कूल्हे पर उस सुई के चुभने का गोल निशान मौजूद था। यह घटना भी वैसी ही थी, फर्क सिर्फ इतना था कि सेठ हरसुख मेहता के जिस्म पर ऐसा कोई निशान नहीं था। न ही उसके कपड़ों में कोई अटकी हुई थी।

फिर भी राज के जेहन में यह सवाल आया कि शायद कोई ऐसी ही बात इस घटना के पीछे भी हो। जहरीली सुई, सुई चुभोने वाला अपने साथ ही ले गया हो।

अपना यह सन्देह राज ने डॉक्टर सावंत पर प्रकट किया तो वह भी दोनों घटनाओं की समानता पर हैरान रह गया। थोड़े से विचार-विमर्श के बाद उन्होंने तय किया कि लाश को दुसरे कमरे में ले जाकर उसके सारे कपड़े उतारकर मुआयना किया जाए।

ताकि कोई निशान मिल जाए और यह पहेली हल हो जाए।

फौरन ही लाश उठवा कर दूसरे कमरे में रखवाई गई। राज

और डॉक्टर सावंत ही अन्दर रह गए। उनहोंने लाश के पूरे कपड़े उतार कर अच्छी तरह उसका मुआयना शुरू किया। लेकिन उल्हें कोई संदिग्ध निशान नजर नहीं आया। यहां तक कि डॉक्टर सावंत ने मैग्नीफाईंग ग्लास से लाश का एक-एक इंच हिस्सा देख डाला।

नाकाम होकर डॉक्टर सावंत ने चश्में के शीशे साफ करते हुए मायूस लहजे में कहा

“इससे साबित हुआ कि जहरीली सुईं वाला ख्याल गलत है।"

"हां।" राज बोला, “अब मौत की वजह लाश का पोस्टमार्टम करके ही मालूम हो सकेगी।

"मेरा भी यही ख्याल है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, “उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि मौत स्वाभाविक थी या अस्वाभाविक।

“अस्वाभाविक...।“ राज ने हैरत से डॉक्टर सावंत के शब्द दोहराए।

"हां।" डॉक्टर सावंत ने सिर हिलाते हुए कहा, “ मेरा मतलब है, वारदात कल की भी हो सकती है।"

"नहीं। मेरे ख्याल में कत्ल की वारदात नहीं है, क्योंकि जाहिरी लक्षण यहीं बताते हैं।"

वक्त क्योंकि काफी गुजर चुका था, इसलिए राज ने फिर मिलने का वादा करके डॉक्टर सावंत से विदा ली। इंस्पेक्टर ने

तमाम गवाहों के नाम पते लिखकर उन्हें भी छोड़ दिया। राज और सतीश भी सोनाली के साथ पुलिस चौकी से बाहर आए। कुछ कदम चलने के बाद राज ने सोनाली से कहा

“सोनाली जी, अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?"

“कहिए!" उसने हैरत से राज की तरफ देखते हुए कहा।

राज ने उसके चेहरे पर निगाहें जमा दीं और धीरे-धीरे बोला

"यह अजीब बात है...कि आप हैरान नहीं हैं।"

एक-दो पल के लिए सोनाली के चेहरे पर एक साया सा आकर गुजर गया। सतीश उन्हें बातचीत का मौका देने के लिए आगे चल रहा था क्योंकि वो राज की निगाहों का मतलब समझता था।

सोनाली ने फौरन ही खुद पर काबू पा लिया और बोली

"मैं आपके कहने का मतलब नहीं समझी?"

“मतलब तो साफ है।" राज ने उसके चेहरे पर निगाहें जमाए-जमाए कहा, “इसकी वजह सिर्फ एक ही हो सकती है कि सेठ हरसुख मेहता की मौत आपके लिए अनापेक्षित नहीं थी।"

"यह आप क्या कह रहे हैं?" सोनाली ने लरजते हुए भयभीत लहजे में कहा और वो चलते-चलते ठहर गई।

"अभी थोड़ी देर पहले आप कह चुकी हैं कि सेठ हरसुख मेहता बिल्कुल स्वस्थ था और उसका दिल बहुत मजबूत था। आपको अच्छी तरह मालूत कि उस पर किसी हथियार से हमला नहीं किया गया। बिल्कुल अचानक वो गिर कर मर गया। ऐसी हालत में आपको परेशानी से ज्यादा हैरानी होनी चाहिए थी। लेकिन मैं यकीन से कह सकता हूं कि आपको हैरानी बिल्कुल नहीं हुई, बल्कि हादसे की उलझन और परेशानी है...जिससे मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि आप...।"

“मिस्टर राज ।“ अचानक सोनाली ने उसकी बात काट कर कहा, “भगवान जाने आप क्या पहेलियां बुझा रहे हैं, जो मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रही हैं। आपने मुझे और भी डरा दिया है।

“खैर...।" राज ने लापरवाही से कहा, “ अगर आपको यह जिक्र पसन्द नहीं है तो मैं एक बात और छेड़ता हूं। जाहिर है कि मेरा इस मामले से कोई सम्बंध नहीं है। मैं कलकत्ता का रहने वाला हूं और यहां सिर्फ एक मेहमान की हैसियत से आया हुआ हूं।"

"फिलहाल आप इस जिन को छोड़ ही दें तो अच्छा है।" सोनाली ने कहा, "मैं इस वक्त दिमागी तौर तर बहुत परेशान हूं। अगर एक दो दिन बाद आप इस बारे में बात करना चाहें तो मैं खुशी से आपको जवाब दूंगी। उस वक्त तक उम्मीद है कि लाश का पोस्टमार्टम भी हो जाएगा।"

"तो क्या आप मुझे दोबारा मिलने की इजाजत देंगी?"

“जरूर।" उसने कहा, “मुझे दोबारा आप से मिलकर खुशी होगी। “कहकर उसने अपने पर्स से एक विजिटिंग कार्ड लिकाला

और राज की तरफ बढ़ाते हुए बोली, “ यह मेरा एड्रेस है। कल, परसों जब भी आपको फुर्सत हो, जरूर इस पते पर पधारिये।

"थैक्यू।" कहकर राज ने कार्ड लेकर रख लिया।

सोनाली उससे विदा लेकर टैक्सी में बैठ कर चली गई।

उसके बाद सतीश ने राज के बराबर आकर उसे टहोका देते हुए कहा

"लड़की तो पटाखा है! कुछ बात बनी ?"

"हां, लड़की बहुत खूबसूरत है।" राज ने लापरवाही से कहा, "लेकिन जितनी खूबसूरत है। “उससे ज्यादा रहस्यभरी है।"

"रहस्यभरी?" सतीश ने हैरत से कहा।

"हां।" राज ने जवाब दिया, “मैं यकीन से कह सकता हूं कि हरसुख मेहता की मौत सोनाली के लिए अनापेक्षित रूप से अचानक नहीं थी। लेकिन असल रहस्य क्या है, यह में अभी नहीं कह सकता।"

“राज !“ सतीश ने हैरत और खौफ भरे लहजे में कहा,

"कहीं तुम यह तो नहीं कहना चाहते कि उस लड़की ने ही किसी तरह सेठ को मार डाला है?"

"हो सकता है ऐसा ही हो।" राज ने जवाब दिया,

“लेकिन फिलहाल इस बारे में अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। जब तक लाश का पोस्टमार्टम न हो जाए।"

सतीश खामोश हो गया। राज ने एक खाली टैक्सी रोकी

और उसमें बैठ कर वो दोनों अपने पुराने दोस्त वकील सुनील पांडे से मिलने चले गए।
 
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