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उस घटना के दो दिन बाद, राज और सतीश पिक्चर देखने जाने की तैयारी कर रहे थे कि फोन की घंटी बज उठी। राज ने रिसीवर उठाया।
"हैलो...।"
"क्या राज साहब बोल रहे हैं?" दूसी तरफ से कहा गया, “मैं डॉक्टर सावंत हूं।"
“जी हां, डॉक्टर साहब। मैं राज ही हूं।" राज ने जवाब दिया।
"अगर फुर्सत हो तो इसी वक्त चले आओ।"
"कोई खास बात है?" राज ने पूछा।
“जी हां। सेठ हरसुख मेहता का आज सुबह पोस्टमार्टम हो गया है, उस पर थोड़ा विचार-विमर्श करेंगे।"
“बहुत अच्छा, मैं अभी आ रहा हूं।“ राज ने जवाब दिया
और रिसीवर रख दिया।
सतीश पिक्चर देखने चला गया और राज डॉक्टर सावंत के घर की तरफ चल पड़ा। डॉक्टर सावंत अपने लेब्रॉटरी ऑफिस में उसके प्रतीक्षक था। राज को देखते ही उन्होंने कहा
"अजीब बात है यार राज! सेठ हरसुख की मौत वाकई किसी घातक जहर से हुई है।"
"घातक जहर से?" राज ने चौंककर पूछा।
“हां। ऐसे जहर से जो बहुत तेज असर था, जिसने तुरत-फुरत दिल की घड़कने बन्द कर दी थी और वो मर गया।"
"इसका मतलब है कि प्लेटफार्म की भीड़ में चलते-चलते किसी तरह उसके जिस्म में जहर दाखिल कर दिया गया?"
"लेकिन सवाल यह है कि उसके जिस्म पर किसी जख्म का तो क्या सुई का निशान भी नहीं था। तो जहर किस तरह उसके जिस्म में पहुंचाया गया? जाहिर है कि चलते-चलते उसने कोई
चीज खाई भी नहीं थी।"
"मैं खुद हैरान हूं कि यह मामला क्या है?"
"क्या आपने जहर का परीक्षण किया था?"
"हां, किया था। डॉक्टर सावंत ने कहा, " वो सायनाइड नहीं है, लेकिन सायनाइड जितना ही तेज और घातक कोई दूसरा जहर है।
अचानक राज के जेहन में एक ख्याल उभरा, उसने कहा
"क्या यह मुमकिन नहीं कि सुबह नाश्ते में सेठ हरसुख को वो जहर दिया गया हो? जिसका असर एक-डेढ़ घंटे बाद हुआ हो?"
"नहीं। मेरे ख्याल में ऐसा नामुमकिन है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, “ क्योंकि वो जहर इतना घातक है जिसका तुम अन्दाजा भी नहीं लगा सकते। मृतक के दिल के ऊपर इस तरह छाले पड़े हुए हैं जैसे बहुत तेज किस्म का तेजाब डाल दिया गया हो उसके दिल पर...।
"फिर सवाल यह है कि आखिर जहर किस तरह इस्तेमाल किया गया?"
“यही सवाल तो तहकीकात मांगता है।"
कुछ क्षण खामोश रहने के बाद राज ने पूछा
"क्या आप लाश के खून का सैम्पल साथ लाए हैं?"
"हां। मुझे पूरी उम्मीद थी कि खून का ख्याल तुम्हें जरूर आयेगा।
“तो चलिए लेब्रॉटरी में । मैं खुद उसकी परीक्षण करना चाहता हूं।" राज बोला।
वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वहां की हर चीज राज की जानी-पहचानी थी। डॉक्टर सावंत ने एक बड़ी सी शीशी उसे दी, जिसमें सेठ हरसुख मेहता का खून था। राज ने पहले तो माईक्रोस्कोप से खून के कुछ कतरों का मुआयना किया ।
खून के कणों में एक अजीब से रंग के कण शामिल थे जो यकीनन जहर के कण थे। उसके बाद राज ने एक रासायनिक प्रक्रिया से शुद्ध खून को अलग कर दिया। अब जो कुछ बाकी बचा था, उसमें जहर की मात्र त्यादा थी और खून कम था।
हालांकि जहर की मात्र किसी भी परक्षण या प्रयोग के लिए कम था, लेकिन जहर चूंकि बहुत घातक था, इसलिए उसके परिणाम भी आम जहरों से ज्यादा स्पष्ट होने जरूरी थे।
शुरूआती कामों से फारिग होकर राज ने तरल बनाया और उसे इंजेक्शन द्वारा एक स्वस्थ खरगोश के जिस्म में पहुंचा दिया। सुई चुभने से खरगोश कसमसाया, बस। इसके सिवा और
कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई उस पर । जहर की वो मात्र एक खरगोश को मारने के लिए बहुत थी। लेकिन खरगोश इंजेक्शन लगने के बावजूद स्वस्थ व चुस्त दिखाई दे रहा था।
डॉक्टर सावंत एक कुर्सी पर बैठा सब कुछ खामोशी से देख रहा
था। दोनों बहुत देर तक खरगोश पर बारीकी से नजर रखते रहे। डॉक्टर सावंत उसके दिल की धड़कनें गिनता रहा। राज मैग्नीफाईंग ग्लास से उसकी आंखों पर नजर रखे रहा। लेकिन खरगोश के जिस्मानी मैनेजमेंट में कोई फर्क नहीं पड़ा।
“अजीब गोरखधंधा है...।“ राज बड़बड़ाया।
"हां।" डॉक्टर सावंत ने चश्में से घूरते हुए कहा, “इतना घातक जहर है। हालांकि इसकी मात्र काफी कम थी। फिर भी खरगोश पर थोड़ा असर तो होना ही चाहिए था। शायद कुछ देर बाद हो..."
राज ने एक नए ख्याल के तहत कहा-“बेहतर है कि इस खरगोश पर निशान लगा कर छोड़ दिया जाए और कल सुबह फिर इसका मुआयना किया जाए।
"ऐसा करके भी देख लेते हैं। डॉक्टर सावंत ने सिर हिला कर इस सुझाव से सहमति जताते हुए कहा।
राज ने खरगोश के गले में प्रयोग का वक्त और तारीख लिखकर बांध दी और खरगोश को पिंजरे में छोड़ दिया।
फिर दोनों लेब्रॉटरी से बाहर आ गए।
"हैलो...।"
"क्या राज साहब बोल रहे हैं?" दूसी तरफ से कहा गया, “मैं डॉक्टर सावंत हूं।"
“जी हां, डॉक्टर साहब। मैं राज ही हूं।" राज ने जवाब दिया।
"अगर फुर्सत हो तो इसी वक्त चले आओ।"
"कोई खास बात है?" राज ने पूछा।
“जी हां। सेठ हरसुख मेहता का आज सुबह पोस्टमार्टम हो गया है, उस पर थोड़ा विचार-विमर्श करेंगे।"
“बहुत अच्छा, मैं अभी आ रहा हूं।“ राज ने जवाब दिया
और रिसीवर रख दिया।
सतीश पिक्चर देखने चला गया और राज डॉक्टर सावंत के घर की तरफ चल पड़ा। डॉक्टर सावंत अपने लेब्रॉटरी ऑफिस में उसके प्रतीक्षक था। राज को देखते ही उन्होंने कहा
"अजीब बात है यार राज! सेठ हरसुख की मौत वाकई किसी घातक जहर से हुई है।"
"घातक जहर से?" राज ने चौंककर पूछा।
“हां। ऐसे जहर से जो बहुत तेज असर था, जिसने तुरत-फुरत दिल की घड़कने बन्द कर दी थी और वो मर गया।"
"इसका मतलब है कि प्लेटफार्म की भीड़ में चलते-चलते किसी तरह उसके जिस्म में जहर दाखिल कर दिया गया?"
"लेकिन सवाल यह है कि उसके जिस्म पर किसी जख्म का तो क्या सुई का निशान भी नहीं था। तो जहर किस तरह उसके जिस्म में पहुंचाया गया? जाहिर है कि चलते-चलते उसने कोई
चीज खाई भी नहीं थी।"
"मैं खुद हैरान हूं कि यह मामला क्या है?"
"क्या आपने जहर का परीक्षण किया था?"
"हां, किया था। डॉक्टर सावंत ने कहा, " वो सायनाइड नहीं है, लेकिन सायनाइड जितना ही तेज और घातक कोई दूसरा जहर है।
अचानक राज के जेहन में एक ख्याल उभरा, उसने कहा
"क्या यह मुमकिन नहीं कि सुबह नाश्ते में सेठ हरसुख को वो जहर दिया गया हो? जिसका असर एक-डेढ़ घंटे बाद हुआ हो?"
"नहीं। मेरे ख्याल में ऐसा नामुमकिन है।" डॉक्टर सावंत ने कहा, “ क्योंकि वो जहर इतना घातक है जिसका तुम अन्दाजा भी नहीं लगा सकते। मृतक के दिल के ऊपर इस तरह छाले पड़े हुए हैं जैसे बहुत तेज किस्म का तेजाब डाल दिया गया हो उसके दिल पर...।
"फिर सवाल यह है कि आखिर जहर किस तरह इस्तेमाल किया गया?"
“यही सवाल तो तहकीकात मांगता है।"
कुछ क्षण खामोश रहने के बाद राज ने पूछा
"क्या आप लाश के खून का सैम्पल साथ लाए हैं?"
"हां। मुझे पूरी उम्मीद थी कि खून का ख्याल तुम्हें जरूर आयेगा।
“तो चलिए लेब्रॉटरी में । मैं खुद उसकी परीक्षण करना चाहता हूं।" राज बोला।
वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वहां की हर चीज राज की जानी-पहचानी थी। डॉक्टर सावंत ने एक बड़ी सी शीशी उसे दी, जिसमें सेठ हरसुख मेहता का खून था। राज ने पहले तो माईक्रोस्कोप से खून के कुछ कतरों का मुआयना किया ।
खून के कणों में एक अजीब से रंग के कण शामिल थे जो यकीनन जहर के कण थे। उसके बाद राज ने एक रासायनिक प्रक्रिया से शुद्ध खून को अलग कर दिया। अब जो कुछ बाकी बचा था, उसमें जहर की मात्र त्यादा थी और खून कम था।
हालांकि जहर की मात्र किसी भी परक्षण या प्रयोग के लिए कम था, लेकिन जहर चूंकि बहुत घातक था, इसलिए उसके परिणाम भी आम जहरों से ज्यादा स्पष्ट होने जरूरी थे।
शुरूआती कामों से फारिग होकर राज ने तरल बनाया और उसे इंजेक्शन द्वारा एक स्वस्थ खरगोश के जिस्म में पहुंचा दिया। सुई चुभने से खरगोश कसमसाया, बस। इसके सिवा और
कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई उस पर । जहर की वो मात्र एक खरगोश को मारने के लिए बहुत थी। लेकिन खरगोश इंजेक्शन लगने के बावजूद स्वस्थ व चुस्त दिखाई दे रहा था।
डॉक्टर सावंत एक कुर्सी पर बैठा सब कुछ खामोशी से देख रहा
था। दोनों बहुत देर तक खरगोश पर बारीकी से नजर रखते रहे। डॉक्टर सावंत उसके दिल की धड़कनें गिनता रहा। राज मैग्नीफाईंग ग्लास से उसकी आंखों पर नजर रखे रहा। लेकिन खरगोश के जिस्मानी मैनेजमेंट में कोई फर्क नहीं पड़ा।
“अजीब गोरखधंधा है...।“ राज बड़बड़ाया।
"हां।" डॉक्टर सावंत ने चश्में से घूरते हुए कहा, “इतना घातक जहर है। हालांकि इसकी मात्र काफी कम थी। फिर भी खरगोश पर थोड़ा असर तो होना ही चाहिए था। शायद कुछ देर बाद हो..."
राज ने एक नए ख्याल के तहत कहा-“बेहतर है कि इस खरगोश पर निशान लगा कर छोड़ दिया जाए और कल सुबह फिर इसका मुआयना किया जाए।
"ऐसा करके भी देख लेते हैं। डॉक्टर सावंत ने सिर हिला कर इस सुझाव से सहमति जताते हुए कहा।
राज ने खरगोश के गले में प्रयोग का वक्त और तारीख लिखकर बांध दी और खरगोश को पिंजरे में छोड़ दिया।
फिर दोनों लेब्रॉटरी से बाहर आ गए।