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Fantasy मोहिनी

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मोहिनी

यह एक काल्पनिक रचना है । विभूतियों, स्थानों और संस्थाओं के नामों का प्रयोग केवल कथ्य को प्रामाणिकता प्रदान करने के लिये किया गया है । कहानी में आये सभी चरित्र, नाम और घटनाएं लेखक की कल्पना पर आधारित हैं और किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध एक संयोग मात्र होगा ।

मोहिनी

इंसान चाहे उम्र के किसी भी ढलान पर क्यों न हो, कुछ तस्वीरें स्क्रीनशॉट की तरह उसके मानस पटल पर हमेशा के लिये चिपक जाती हैं और वह चाहकर भी उन्हें नहीं हटा पाता। उसके अंतर्मन में चलचित्र की तरह यादों का भंडार हमेशा रहता है। वह जब भी अपने अतीत में झांकता है तो वह फिल्में रोल होने लगती हैं जो उसकी ज़िंदगी के अनगिनत विलक्षण मोड़ होते हैं, कभी कांटो भरे रास्ते, तो कभी फूलों की हसीन वादियां। कभी ठहरा हुआ मौसम, कभी रुका हुआ वक्त, कभी खुशनुमा नज़ारे। मैंने अपने अतीत को बहुत संभाल कर रखा है और आज मैं उस अतीत की पर्त दर पर्त खंगाल रहा हूँ, क्योंकि अपनी गुमनाम मौत से पहले दुनिया को बताना जरुरी समझता हूँ कि जिस राह पर मैं चलता गया और जो कुछ मैंने किया, वह हरगिज कोई भी इंसान भूल से न करे। पहला कदम बढ़ाने से पहले ही उसे पीछे खींच ले। चार दिनों की चांदनी की खातिर खुद को जहन्नुम की आग ने न झोंके।

मोहिनी, जिसका वर्णन मैं करने जा रहा हूँ, वह मेरी आपबीती है, वह मेरे लिये खुला आसमान लेकर आई तो घुटन भरा अँधेरा भी लेकर आई। उसे मैं जितना प्यार करता था उतनी ही नफरत भी करता था। मेरी यह प्रेमकथा ऐसी कथा है जिसमें अपनी प्रेयसी को मैं छू भी नहीं सकता था। वह कोई इंसानी वजूद नहीं था, वह एक चंडालिनी है जिसे हासिल करने के लिये तांत्रिक सिर-धड़ की बाजी लगा देते हैं।

अपने जीवन की अनगढ़ वस्त्रों को सिलने से पहले सुई के उस बारीक़ छेद पर फोकस कर रहा हूँ जहाँ से सुई में धागा पिरोया जाता है। उम्र होगी लगभग नौ बरस। नौ बरस की कमसिन उम्र में वह पहली घटना घटी जो मुझे ज्यों की त्यों याद है। बेहद निर्धन परिवार में मेरा जन्म हुआ। माँ-बाप जमींदार की खेती में काम करते थे और घर में हमेशा रोटी के लाले रहते थे। मैं बच्चा था, कभी-कभी भूखे पेट भी सो जाना पड़ता था। हम सात भाई बहन थे और मैं उन सबसे छोटा था। उन दिनों न जाने किन हालात में मेरे माँ-बाप ने सात बच्चों में से एक बच्चे को बेचने का फैसला किया। यह उस परिवार की आर्थिक तंगी का अत्यंत दुखदायी पहलू था वरना कौन अपने बच्चे को बेचता है। मुझे याद है मेरे पिता ने उस शख्स से कुछ रुपये हासिल किये थे और मुझे उसके सुपुर्द कर दिया था।

अपने झोपड़े नुमा घर को छोड़ते हुए मैं रोया भी बहुत था। पर मेरे आंसुओ की वहां कोई कीमत नहीं थी। वह दौर 1950 का था। आज मेरी उम्र अस्सी उम्र हो चुकी है। पर वह लम्हा मुझे आज भी ज्यो का त्यों याद है। मुझे खरीद कर ले जाने वाले व्यक्ति का नाम जयधर था। जब मैं उसके साथ उसके घर गया तो वहां एक खौफनाक इंसान धुनि रमाये नंगधड़ंग बैठा था। उसके आसपास अजीब किस्म की वस्तुएं रखी थी। उसकी जटायें लम्बी और गुथी हुई थी। मैंने इन बातों का पहले कभी जिक्र नहीं किया। उस वक्त वह कोई मन्त्र पढ़ रहा था और अपनी एक जटा से पानी की धार निकाल रहा था। धार एक बर्तन में गिर रही थी।

“जय गंगे...।” वह पानी की धार छोड़ते हुए फ़टी-फ़टी आवाज में बोला, “ले आया जयधर ?”

“हाँ, मैंने कहा था न आज सौदा पक्का हो जायेगा। देख लो कैसा नग है।”

उसने लाल-लाल आँखों से मेरी तरफ देखा फिर अपने पास रखी खोपड़ी उठा ली। खोपड़ी पर हाथ फेरा और कहा–“कालिया मसान! अब वक्त आ गया है, मैं तुझे खुश कर दूंगा। ऐसा भोजन दूंगा कि तू हमेशा के लिये मेरा गुलाम हो जायेगा।”

फिर उसने मेरी तरफ देखा– “इधर आ।”

मैं थर-थर काँप गया। उसकी शक्ल-सूरत ही ऐसी भयानक थी कि मेरी रूह फना हो गई।
 
“अरे डरता क्यों हो, इधर आ...” इस बार उसने कुछ प्यार भरे स्वर में कहा। मैं डरता-सहमता उसके करीब आकर खड़ा हो गया। उसने दायां हाथ मेरे सर पर रखा फिर कुछ मन्त्र पढ़ा और धीरे-धीरे हाथ को नीचे लाया फिर अपने पीले-पीले दांतो की नुमाइश करके मुस्कुराया, उसके बाद वह मुझे इस प्रकार टटोल-टटोल कर देखने लगा जैसे कोई कसाई कुर्बानी के बकरे को टटोल कर उसके गोश्त का अनुमान लगाता है।”

“जयधर! तैयारी करो, कल हम भानगढ़ी के लिये कूच करेंगे। इसी अमावस्या की रात को सारा काम निपटा देना है। वरना चातुर्मास लग जायेगा और हम किसी देवी-देवता को जगा नहीं पाएंगे।”

मुझे खाना खिलाकर एक चटाई पर डाल दिया गया। पिछले दो दिन से मैंने कुछ खाया भी नहीं था। भूखे पेट होने पर भी खाने का मन नहीं करता था। पर भूख तो भूख होती है जब खाने लगा तो डट कर खाया और उसके बाद मुझे नींद आ गई। सुबह जयधर ने मुझे जगाया।

“मैं तो तेरे बाप से तेरा नाम पूछना ही भूल गया था।” उसने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा – “क्या नाम है तेरा ?”

“राज!” मैंने पहली बार उसके सामने जुबान खोली और टुकुर टुकुर उसे देखने लगा।

“नहा-धोकर तैयार हो जा। अभी तू यही कपड़े पहन ले फिर मैं तेरे लिये नए कपड़े सिलवा दूंगा। उधर डोल में पानी रखा है...जा नहा ले।”

मैं चुपचाप उसी तरफ चल पड़ा।

“और हाँ टट्टी-पेशाब के लिये जाना हो तो पीछे जो आड़ है उसमे चला जा।”

☐☐☐
 
भानगढ़ी के बारे में मुझे बहुत बाद में पता चला था। उस वक्त मैं नहीं जानता था कि भानगढ़ी तांत्रिकों की सिद्धपीठ है। वहां का शमशान घाट बहुत विशाल था, जहाँ दूर दराज के लोग भी अपने मुर्दे फूंकने आते थे। जगह-जगह तांत्रिकों की साधना के लिये गुमटियां बनी हुई थी। यह गुमटियां मिट्टी और गारे की बनी हुई थी और इन पर तरह-तरह के रंग पुते हुए थे। शमशान के पीछे दूर तक घना जंगल था।

भानगढ़ी पहुँचने के बाद हमने शाम तक का वक्त एक झोपड़ी में गुजारा फिर रात होते ही जयधर मुझे लेकर चल पड़ा, एक अंजाने से सफर की ओर। न जाने क्यों मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा था। मेरी आत्मा जैसे चीख-चीख कर कह रही थी...भाग जा...भाग जा....पर मेरे कदम भागने के लिये मेरा साथ नहीं दे रहे थे। रात का अँधेरा फैलने लगा। वह मुझे उसी शमशान घाट में ले आया। वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। जो तांत्रिक वहां साधना कर रहे थे वह अपनी गुमटियों में थे। कहीं-कहीं पर आग भी जल रही थी।

जयधर मेरा हाथ पकड़े आगे बढ़ रहा था। मेरी टांगे कांप रही थी। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैर मन-मन भर के हो गए हैं। एक अंजाना सा खौफ मेरे भीतर समाने लगा। आखिर जयधर मुझे यहाँ लेकर क्यों आया।

फिर एक ऐसी स्थिति भी आ गई जब वह मुझे घसीटते हुए जंगल में दाखिल हुआ।

कुछ दूर आगे चलकर एक जगह रौशनी नज़र आई...पर जयधर अँधेरे में भी सधे कदमो से चल रहा था। वह मुझे उस रौशनी के पास ले आया।

यहाँ वही तांत्रिक धूनी रमाये बैठा था।

“कपाली बाबा!” जयधर बोला, “लड़का बहुत डर रहा है।”

कपाली बाबा ने लाल-लाल आँखो से मुझे देखा। अँधेरे में भी उसकी आँखें अंगारो की तरह चमक रही थी। उसके पास एक और शख्स बैठा था। वह दुबला-पतला था और काला चोला पहने हुए था। उसने एक बार मेरी तरफ देखा फिर चिलम का धुंआ नथुनों से ख़ारिज करते हुए एक नारा-सा लगाया “जय काली माता! जय भोले भंडारी!”

पास ही एक चौकी रखी थी जिस पर लाल कपड़ा बिछा हुआ था। उसके चारो तरफ सिंदूर की रेखाएं बनी थी। ये रेखाएं तीन घेरों में बनी हुई थी।

कपाली बाबा धुनि में कुछ भस्म फेंकता मन्त्र पढ़ने लगा। धुनि में जो सामग्री डाली जा रही थी उससे अजीब सी दुर्गन्ध उठ रही थी – जैसे किसी जानवर के सड़ने से आती है। धुनि से धुंआ उठने लगा। कपाली बाबा ने खोपड़ी पर सिंदूर से तिलक लगाकर दूसरे तांत्रिक को खोपड़ी थमा दी।

दूसरा तांत्रिक उठा और उसने खोपड़ी एक चौकोर पत्थर पर चौकी के सामने रख दी।

“जयधर! इसके वस्त्र उतार और इसे चौकी पर बिठा दे।”

जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे तो मैं थर-थर कांप रहा था। मेरी न तो जुबान खुल पा रही थी न जिस्म में ताकत थी। मेरे सारे कपड़े उतारकर मुझे चौकी पर बिठाया गया। फिर कपाली बाबा अपनी जगह से उठा और उसने मेरे नंगे जिस्म पर सिंदूर से कुछ निशान बना डाले। मेरे माथे पर तिलक लगाया। दूसरा तांत्रिक खोपड़ी के पास खड़ा था। धुनि के अलाव की रौशनी के साथ वहां एक लालटेन भी रोशन थी।

हवा में ठंडक थी पर वह कुछ रुक सी गई थी। आसपास के वृक्ष शांत खड़े थे। अमावस्या की रात होने के कारण घना अँधेरा चारो ओर फैला हुआ था...दूर से कहीं किसी कुत्ते के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।
 
कपाली बाबा वापस मुड़ा। उसने अपने एक थैले से एक छोटी सी गुड़िया निकाली। गुड़िया ने लाल कपड़ा पहना हुआ था। लालटेन की रौशनी में मैंने वह खूबसूरत सी गुड़िया देखी। उसने उस गुड़िया को मेरे सामने ही एक दूसरे पत्थर पर टिका दिया। फिर वह दोनों हाथ उठाकर उस गुड़िया के सामने खड़ा हो गया और जोर-जोर से बोलने लगा।

“हे चंडालिनी देवी मोहिनी...रानियों की रानी! सभी शक्तियों की स्वामिनी... मैं तुम्हारा आह्वाहन करता हूँ...मैं कपाली बाबा तुम्हारे सामने नतमस्तक होकर तुम्हे प्रणाम करता हूँ।” उसने गुड़िया के पांव छुए फिर उसे तिलक लगाया, उसके सामने फूल सजाये और कुछ मन्त्रों का जाप करने लगा। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। उसने लोबान को सुलगाकर चौकी में मेरे सामने रखा।

“शम्भू।” उसने अपने चेले को पुकारा–“अपना काम शुरू करो। समय निकला जा रहा है।”

शम्भू ने अपना सिर हिलाया। चिलम एक तरफ रखी और पत्थर से जो चौकोर तराशा हुआ था, जिस पर लाल-लाल धब्बे लगे थे, उसे उठाकर मेरे सामने रख दिया।

अब उसने अपने लिबास से एक चॉपर जैसा खंजर निकाला और मेरे पीछे चला गया। मेरी तो जैसे धड़कनें ही बन्द हो गई थी। पता नहीं वह क्या करने वाला था !

फिर डमरू ने मेरे सामने मेरी आरती उतारी और मुझे तिलक लगाया। उसके बाद वह पीछे हट कर खड़ा हो गया।

अचानक शम्भु ने मेरे बाल पकड़े और मेरा सिर झुका कर चौकोर पत्थर पर टिका दिया। वह मेरी दायीं तरफ आया। उसने वह चॉपर हवा में उठाया चॉपर एक झटके से मेरे सिर की ओर आया।

तभी कुछ हुआ। चॉपर मेरी गर्दन पर आकर जड़ सा हो गया। मुझे अपनी गर्दन पर उसकी चुभन महसूस हो रही थी फिर यह चुभन भी खत्म हो गई चॉपर ऊपर उठ गया। मैंने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया। अचानक शम्भू अपनी जगह से हिला चॉपर अब भी उसके हाथ में था...डमरू खौफजदा होकर चार कदम पीछे हट गया।

शम्भु आगे बढ़ा और जयधर के पास आकर रुका।

अचानक उसका चॉपर वाला हाथ लहराया। जयधर की चीख बड़ी भयानक थी जो सन्नाटे को तोड़ती चली गई।

जयधर का सिर कटकर ज़मीन पर गिरा गया। शम्भु अब डमरू की तरफ मुड़ा। डमरू ने एकदम से छलांग लगाई और जंगल के अँधेरे सायो में गुम हो गया। शम्भु उसका पीछा करने लगा।
 
अब वहां मेरे अतिरिक्त कोई नहीं था और मैं थर-थर कांप रहा था। मेरे दांत आपस में जकड़ से गए थे। बड़ी मुश्किल से मैं उठकर खड़ा हुआ। पता नहीं मेरे कपड़े कहाँ पड़े थे। मैं नंगे बदन ही लड़खड़ाता, गिरता पड़ता वहां से चल पड़ा। घना जंगल उस पर घुप्प अँधेरा। झाड़-झंकार की शाखाओं से कहीं भी कांटे चुभ जाते। नंगे पांव में भी कांटे-कंकर चुभ रहे थे...मैं लड़खड़ा कर गिरता, फिर उठता फिर चलता फिर मैंने अपने पीछे कुछ आवाजें सुनी। कुछ रोशनियाँ जो शायद टॉर्चों की रोशनियाँ थी...चमक रही थीं। मैंने जान लगाकर दौड़ना शुरू कर दिया, फिर पता नहीं कहाँ-कहाँ से गुजरा और गिरकर बेहोश हो गया।

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जब मुझे होश आया तो मैं एक तालाब के किनारे रेत पर पड़ा था और नंग-धड़ंग ही था। कुछ लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। धीरे-धीरे आँखें खोली तो पहले हर दृश्य धुंधला नज़र आया फिर तस्वीर साफ़ होने लगी। वे गांव के देहाती लोग थे। उनके पीछे एक बैलगाड़ी भी खड़ी थी। वे लोग आठ-दस रहे होंगे। जो मेरे आस-पास खड़े थे। मुझे होश में आते देख उनमे से दो आदमी मेरे पास आये। मुझे रेत पर से उठाकर बैठाया। मेरे जिस्म पर जगह-जगह काँटों के निशान थे।

“कौन है तू ? किस गांव का है ?” एक ने पूछा।

मुझसे कुछ भी जवाब न बन सका। बोल मुंह से निकला ही नहीं।

“गूंगा है शायद।” दूसरा बोला।

फिर एक तीसरा आदमी बोला, “अरे इसे कोई कपड़ा ओढ़ा दो, नंगा है बेचारा।”

किसी ने मेरे ऊपर गमछा डाल दिया। मैंने अपने बदन पर गमछा लपेट लिया।

“इसे सरपंच के पास ले चलते हैं।”

सबने सहमति प्रकट की। वे लोग मुझे सहारा देकर एक गांव तक ले गए फिर सरपंच के घर पहुंचा दिया।

सरपंच ने मुझसे वही सवाल-जवाब किये, पर मैंने उसे भी कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने मुझे गूंगा समझ लिया। मैं बच्चा जरूर था पर अपने गांव का और अपने माँ-बाप का नाम जानता था। पर मैं उन लोगों के पास वापस नहीं जाना चाहता था जिन्होंने मुझे कुर्बानी के लिये बेच दिया था।

जब वे मेरे बारे में कुछ भी न जान सके तो मुझे अनाथालय पहुंचा दिया। बस उसी अनाथालय में मेरी परवरिश शुरू हुई। वहां पढ़ाई भी होती थी। मेरा जीवन वहीं सिमट कर रह गया। धीरे-धीरे मैं उन सब बातों को भूलता गया जो मेरे साथ गुजरी थीं।
 
वक्त पंख लगाकर उड़ता चला गया और फिर मैंने किशोरावस्था से जवानी की दहलीज पर कदम रखा। जवानी हौसलों और उमंगो के साथ आगे बढ़ती है, अनगिनत कामनाएं अंगड़ाई लेती हैं, मेरी भी तमन्नाएँ थी, हसरते थी, आरजू थी। अब मैं वहां से शुरू करता हूँ जहाँ से मेरी जिंदगी की जंग का आगाज हुआ।

उन दिनों मैं दिल्ली के स्लम एरिया में रहता था जो गांधीनगर में झील के नाम से जाना जाता है। एक कम्पनी में जॉब लग गई थी जहाँ मैं अकाउंट सेक्शन में एक क्लर्क की हैसियत से काम करता था। यह कम्पनी दरियागंज में आसिफ अली रोड पर थी। रविवार अवकाश का दिन होता था। बाकि दिन मैं ठीक वक्त पर ऑफिस पहुँचता और ऑफिस बंद होते ही बस पकड़कर गांधीनगर आ जाता था। बस यही मेरी दिनचर्या थी। ऑफिस के कर्मचारियों के अतिरिक्त न मेरा कोई मित्र था न परिचित। मैं एक कमरे के फ़्लैट में रहता था। खाना एक मीडियम क्लास होटल में खा लेता था।

एक दिन मैं मॉर्निंग वॉक से वापस आ रहा था तो रास्ते में एक अधेड़ आयु की महिला ने मुझे रोक लिया। उनके हाथ में पूजा की एक थाली थी। वह शक्ल से ही पूजा-पाठी दिखती थी। माथे पर दोनों भौंहो के मध्य गोल टीका लगा हुआ था। चेहरे पर विलक्षण तेज था और आँखों में अजीब सी कशिश थी। मुझे हैरानी हुई कि वह मेरे लिये अपरिचित थी परन्तु उसने मेरा नाम लेकर पुकारा था।

“राज!” उसने ठीक मेरे सामने रुक कर कहा, “जरा रुको तो...।”

मैं ठिठक गया, हैरानी से उसे देखने लगा, “अरे! ऐसे क्या देख रहे हो, मैं तुम्हारे पड़ोस में रहती हूँ।”

“पर आप मेरा नाम कैसे जानती हैं ?” मैंने पूछा।

“मेरा बेटा रामा तुमसे मिल चुका है। वह तुम्हारे कमरे पर आया होगा। उसी से मुझे तुम्हारा नाम पता चला।”

मुझे ध्यान आया कि एक-दो बार मेरे पड़ोस में रहने वाला एक नौजवान मुझसे मिल चुका था। उसका नाम रामा था।

“जी कहिये....।”

“आज शाम को मेरे घर माता की चौकी लगेगी, पूजा है। मुझे एक अनुष्ठान करना है, अगर तुम पूजा में शामिल हो जाओ तो बहुत शुभ होगा। मेरी मनोकामना पूरी हो जायेगी।”

“अरे आंटी! मैं क्या देवता हूँ जो मेरे आने से आपकी मनोकामना पूरी हो जायेगी।”

“बेटा पूजा में शामिल होने से इंकार नहीं करते।”

“ठीक है! आ जाऊंगा।” मैं लापरवाही से कन्धे उचका कर बोला।

“शाम आठ बजे का समय है।” वह बोली।

“ठीक है आठ बजे आ जाऊंगा।”

फिर मैं आगे बढ़ गया। मैं देवी-देवताओं या कर्मकांड पर विश्वास नहीं करता था। मैं पूरी तरह नास्तिक था। कभी किसी मंदिर या दरगाह में नहीं गया था। फिर भी उस औरत की आवाज में कुछ खास बात जरूर थी जो मैंने पूजापाठ में शामिल होने का वादा कर लिया।
 
शाम को आठ बजे मैं उसके घर पर था। उसने चौकी सजाई हुई थी। जिस पर माता की मूर्ति स्थापित की गई थी। पूजापाठ की सारी सामग्री रखी थी। चौकी पर दीपक जल रहा था। उस वक्त वह वहां अकेली बैठी थी। उसका बेटा रामा वहां मौजूद नहीं था। घर का दरवाजा खुला था इसलिए मैं सीधा अंदर चला आया। साधारण सा घर था। उस कमरे में लोबान की महक उठ रही थी। उसने मुझे बैठने का इशारा किया।

वह थोड़ी देर तक पूजा की क्रियाएँ करती रही फिर उसने मुझे रोली का टीका लगाया।

“राज! मेरी एक बात मान लो तो जीवन का जो सुख चाहोगे वह तुम्हारे कदमो में होगा।”

“जी फरमाइए।”

“मैं एक तांत्रिक हूँ। छोटे मोटे अम्ल कर लेती हूँ, इन अम्लों से मैं लोगों के रोगों का निदान भी करती हूँ, लेकिन तुम्हारे भीतर एक विलक्षण शक्ति है। मैंने महसूस किया है।”

“मैं कुछ समझा नहीं। मैं तो एक साधारण सा इंसान हूँ एक छोटी सी नौकरी करता हूँ और उसी से गुजर-बसर करता हूँ।”

“तुम पर मोहिनी मेहरबान हो सकती है। यही विलक्षण शक्ति तुम्हारे अंदर है।”

“मोहिनी....मोहिनी...क्या ?”

“मोहिनी एक चंडालिनी है। जो उसे साध लेता है वह मालामाल हो जाता है। वह छिपकली जैसी दिखती है...वही उसका वास्तविक रूप है। आवश्यकता पड़ने पर वह इंसानी रूप भी धारण करती है। तांत्रिकों के लिये मोहिनी सिद्ध कर पाना बहुत कठिन होता है, अगर साधना विफल हो गई तो खुद के प्राण भी गंवाने पड़ सकते हैं इसलिए मोहिनी को सिद्ध करने की कोशिश बिरले ही तांत्रिक करते हैं।”

“यह सब बेकार की बातें हैं आंटी जी, मैं इन बातों पर यकीन नहीं करता।”

“तुम मोहिनी को बहुत सरलता से बिना सिद्ध किये हासिल कर सकते हो। बस तुम्हे कुछ जाप....”

मैं उसकी पूरी बात सुने बिना उठ खड़ा हुआ, मैं ऐसी औरत के पास भी नहीं बैठ सकता था जो इस तरह की बातें करे।

“रुको तो....मेरी बात तो सुनो...”

पर मैं बात सुने बिना उस घर से निकल आया।

मैं सोच रहा था कि मेरे पड़ोसी अच्छे लोग नहीं हैं। मुझे तांत्रिकों से बेहद नफरत थी और मेरे दिलो दिमाग में यह बात मुकम्म्ल तौर पर घर कर गयी थी कि तांत्रिक बहुत बुरा, गंदा और नीच इंसान होता है। इनके साथ से भी दूर रहना चाहिये।

अब मैं कहीं और मकान तलाश करने लगा लेकिन चंद दिन ही बीते थे कि एक अविश्वसनीय घटना हुई। उस दिन रविवार था। मैं घर पर ही था। शाम के चार बजे थे। मेरा दरवाजा खटखटाया गया। मैंने घर का दरवाजा खोला तो सामने रामा को खड़े पाया। वह मुझे देखते ही रोने लगा।

“बात क्या है ?” मैंने उसे पूछा– “तुम रो क्यों रहे हो?”

रामा औसत कद का मेरा हमायु नौजवान था। उसका पूरा नाम रामदयाल था। रंगत अपनी माँ की तरह गोरी थी बाल घुघिरपले थे, शरीर मोटा था।

“माँ ...” वह भर्राये स्वर में अटक-अटक कर बोला– “माँ का स्वर्गवास हो गया है।”

“क्या ?”

“हाँ राज बाबू... जरा मेरी मदद करो।” वह आंसू बहाते हुए बोला, “अब यहाँ हमारे रिश्तेदार भी नहीं हैं...दो-चार मोहल्ले वाले इकट्ठा होकर माँ का दाह संस्कार...।”

यह वह वक्त होता है जब कोई इंसान कितना भी व्यस्त हो अपनी व्यस्तता छोड़कर इस कार्य में सबसे पहले शिरकत करता है। लोग अजनबियों की शवयात्रा के साथ भी चल देते हैं। भले ही मैं उसकी माँ से नफरत करता था पर वह नफरत एक पल में खत्म हो गई।
 
मैं जल्दी से कपड़े पहन कर रामा के साथ हो लिया। कुछ मोहल्ले वाले भी इकट्टा हो गए थे। उनकी बातों से पता चला कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई थी। वह ध्यान में बैठी थी और बैठे-बैठे उसके प्राण शरीर से निकल गए।

उसी समय अंतिम यात्रा की तैयारी कर ली गई और उस औरत को शमशान घाट ले जाया गया। जमुना किनारे चंद लोगों ने उसकी अंतिम क्रिया में शिरकत की। उनमे से एक मैं भी था। चिता को आग उस वक्त दी गई जब रात का अँधेरा फ़ैल चुका था।

चिता की लपटें उठ रही थी। रामा की माँ का शव चिता में जल रहा था। मुझे जाने-अंजाने उस औरत की बातें याद आ रही थी कि एकाएक न जाने क्या हुआ मेरे दिल की धड़कने तेज होने लगी। मैं बेहद खौफजदा हो गया। ठंड में भी मेरे पसीने छूटने लगे। मैंने उस औरत को जलती चिता में उठते देखा। उसका जिस्म आग में धधक रहा था और वह चिता के बीच में एकदम तन कर सीधी खड़ी थी। उसकी दहकती अंगारो जैसी आँखें मुझे घूर रही थी। मैं थर-थर कांपने लगा। फिर एक करुणा भरी आवाज मेरे कानो में सरसराने लगी, यह उसी औरत की आवाज थी वह कह रही थी–

“मैं मोहिनी को सिद्ध करना चाहती थी। उसने मुझे मार डाला...मार दिया उसने मुझे। काश कि तुमने मेरी बात मान ली होती। मोहिनी तुम पर मेहरबान है।”

आवाज रोने में तब्दील हो गई। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं ज्यादा देर तक वहां ठहर नहीं पाया और रामा को बताये बिना चुपचाप लड़खड़ाते कदमों से शमशान घाट के बाहर आ गया। उस वक्त मुझे कोई सवारी नहीं मिली। मैं जमुना ब्रिज की तरफ पैदल चल पड़ा। बार-बार उस औरत के शब्द मेरे कानों में नश्तर की तरह चुभ रहे थे। मैं अनगिनत सवालो के मंजर में फंसा पैदल-पैदल चलता रहा।

घर तक का सफर मैं पैदल ही तय कर रहा था। अचानक मेरा सिर भारी होने लगा जैसे किसी ने मेरे सिर पे वजनी पत्थर रख दिया हो...कि चलते-चलते मुझे यूँ लगा जैसे कोई तिनका मेरे सिर पर आ गिरा हो। मैंने दायें हाथ से सिर पर गिरे तिनके को हटाने की कोशिश की परन्तु तिनका मेरे हाथ में नहीं आया फिर भी महसूस हो रहा था कि तिनका बदस्तूर मेरे सिर पर विराजमान है।

दो-तीन बार कोशिश करने पर भी मैं तिनके को हटा नहीं पाया। घर पहुँच कर मैंने स्नान किया। आईने में उस तिनके को देखने की कोशिश की पर वह नज़र नहीं आया। जब मैं बिस्तर पर लेटा तो यूँ लगा तिनके में हलचल शुरू हो गई और वह मेरे बालो में इधर-उधर सरक रहा है। कभी-कभी उसकी चुभन भी मुझे महसूस होती। मैं परेशान सा करवटें बदलता रहा। खाना भी नहीं खाया। देर रात गुजरने पर मुझे नींद आ गई। फिर मैं सुबह देर से जागा। मैंने घड़ी में वक्त देखा आठ बज रहे थे। ठीक दस बजे तक मैं दफ्तर पहुँच जाता था। मैं जल्दी से उठकर सुबह के कामो से निवृत हो गया। चाय नाश्ता मैं घर पर ही बना लेता था। जल्दी से नाश्ता तैयार किया। नौ बजकर पंद्रह मिनट में मैं घर से निकला।

वह तिनका अब भी मेरे सिर पर मौजूद था। कई बार उसे हटाने के लिये बार-बार कंघा कर चुका था। जिस वक्त मैं दफ्तर पहुंचा तो मैंने घड़ी में वक्त देखा दस बजने में पांच मिनट बाकि थे।

दफ्तर में एंटर हुआ ही था कि बुरी तरह उछल पड़ा। मुझे लगा उस तिनके ने छिपकली की शक्ल धारण कर ली है। छिपकली मेरे सिर पर पंजे गाढ़े हुए चिपकी थी। अब मेरी इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि सिर पर हाथ ले जा सकूँ। मेरे माथे पर पसीने की बूँदें सरकने लगी। एक अजीब सा खौफ सनसनाने लगा। मैं दफ्तर पहुँचते ही तुरन्त बाथरूम में पहुंचा। आईने में खुद को देखा। पर सिर पर छिपकली नज़र नहीं आई। लेकिन मैं महसूस कर सकता था कि छिपकली सिर पर मौजूद थी। हिम्मत करके मैंने कंघे को बालो पर फिराया कंघा छिपकली के आर-पार निकल गया। मैं डरा सहमा सा वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया। अभी सीट पर बैठे पांच मिनट भी नहीं गुजरे थे कि ऑफिस का चपरासी मेरे पास आया।

“साहब आपको बुला रहे हैं।” उसने कहा।

“ठीक है! मैं आता हूँ।”

दो मिनट बाद ही मैं बॉस के केबिन में खड़ा था।

“मैं देख रहा हूँ पिछले पंद्रह दिन से तुम ऑफिस में बराबर लेट आ रहे हो। आज भी आधा घण्टा लेट हो।” बॉस बोला।

यह ऐसा इल्जाम था जिसे मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकता था। मैं हमेशा ठीक वक्त पर ऑफिस पहुँचता था।

“नहीं सर। मैं कभी लेट नहीं होता। आज भी नहीं।”

“इडियट मुझे पढ़ा रहे हो।”

मैंने महसूस किया छिपकली मेरे सिर से गायब थी।

बॉस गरज रहा था “हरामखोर, कई बार तो मैं तुम्हे टोक चुका हूँ....रोज झूठ बोलते हो...हद हो गई जरा घड़ी में वक्त देखो। साढ़े दस बज रहे हैं इस वक्त।

मैंने ऑफिस में लगी वॉल क्लॉक को देखा– वाकई साढ़े दस बज रहे थे।

“सर! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैं ठीक वक्त पर आया हूँ यह घड़ी शायद आगे चल रही है।”

“मुंह जोरी करता है मुझसे....।” वह अपनी सीट से उठा और उसने मेरे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया। थप्पड़ इतना जोरदार था कि मेरा सिर झनझना उठा।
 
“मैं अभी तुझे नौकरी से बर्खास्त कर रहा हूँ।”

“सॉरी सर...सर एक चांस।” थप्पड़ खाकर भी मैं उसके आगे गिड़गिड़ाया था। वह ऑफिस टेबल पर बैठ कर एक पेपर पर कुछ लिखने लगा।

“दफा हो जाओ।” उसने कागज मेरी तरफ सरका दिया।

“सर! मैं आइन्दा ध्यान रखूँगा।” मैंने हाथ जोड़ दिए।

अचानक छिपकली फक्क से मेरे सिर पर आई। उसने करवटें बदली और फिर एक खूबसूरत लड़की के रूप में तब्दील हो गई। उसके सुर्ख होंठ मुस्कुरा रहे थे वह आलथी पालथी मारे सिर पर बैठ गई। उसकी जुल्फे काली घनेरी थी आँखें पुरकाशिश थी। बेहद हसीन लड़की थी।

फिर मेरे कानों में किसी नारी का सुरीला स्वर सुनाई दिया– “राज! कोई तुम्हे थप्पड़ मारे इसे मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। तुम्हारा बॉस झूठा है, कमीना है।

“त....तुम...कौन ?” मैं बड़बड़ाया।

“ओय! अब यहाँ खड़ा-खड़ा मेरा मुँह क्या देख रहा है।” तभी बॉस गरजा, “निकल जा मेरे ऑफिस से अभी।”

“सबक सिखा इस हरामी को....” कान में वही सुरीला स्वर सुनाई दिया, “डर मत मैं तेरे साथ हूँ...चल पेपरवेट उठा और मार दे इसके सिर पर....चल पेपरवेट....देख क्या रहा है।”

मुझे लगा किसी ने मेरे बालों को बुरी तरह जकड़ लिया है और उस आवाज ने मुझे अपने वश में कर लिया है। मैंने आव देखा न ताव, पेपरवेट उठाया और लगातार तीन चार बार बॉस के सिर पर दे मारा। बॉस की खोपड़ी खुल गई, वह औंधे मुंह मेज पर लुढ़क गया, उसके सिर से बहता खून मेज पर फैलने लगा।

मैं यह देख कर घबरा गया कि मैंने क्या कर दिया। फिर मुझे कुछ नहीं सूझा और दफ्तर से बाहर निकल आया। बस स्टॉप से बस पकड़ी और गांधीनगर के लिये रवाना हो गया। अब वह हस्ती मेरे सिर पर नहीं थी। मुझे राहत सी महसूस होने लगी। सोचने लगा वह क्या था। पहले तिनका, फिर छिपकली, फिर लड़की। अचानक मुझे याद आया कि रामा की माँ ने कहा था कि मोहिनी का असली रूप छिपकली का होता है....तो क्या ये मोहिनी है...हे भगवान...यह मेरे साथ क्या हो रहा है ? हो सकता है मेरा बॉस मर गया हो। पुलिस उसके कत्ल के इल्जाम में पकड़ लेगी, फिर मेरा क्या होगा, जेल की सलाखें फिर फांसी का फंदा।

फांसी का फंदा मेरी आँखों के सामने झूल रहा था।

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