उसका दूसरा साथी जब उसके ज़ोर ज़ोर से हिला कर जगाने पर भी न जागा तो वो और भी ज़्यादा घबरा गया। उसका अपना जिस्म ये सोच कर ठंडा सा पड़ गया कि कहीं उसका साथी मर तो नहीं गया? हकबका कर वो एक तरफ को भागा और जल्दी ही हवेली के मुख्य दरवाज़े के पास पहुंच गया। मुख्य द्वार पर खड़े दरबान को उसने हांफते हुए सारी बात बताई तो उस दरबान के भी होश उड़ गए। उसने फ़ौरन ही अंदर जा कर बैठक में बैठे भैया के चाचा ससुर को सारी बात बताई तो बैठक में बैठे बाकी सब भी बुरी तरह उछल पड़े।
अब आगे....
उस वक्त रात के साढ़े बारह बज रहे थे जब दादा ठाकुर का काफ़िला पास के ही एक गांव माधोपुर के पास पहुंचा। गांव से कुछ दूर ही काफ़िले को रोक कर सब अपनी अपनी गाड़ियों से उतरे। कुल तीन जीपें थी। एक दादा ठाकुर की, दूसरी अर्जुन सिंह की और तीसरी मेरे नाना जी की। तीनों जीपों में आदमी सवार हो कर आए थे। किसी के हाथ में बंदूक, किसी के हाथ में पिस्तौल, किसी के हाथ में लट्ठ तो किसी के हाथ में तलवार। दादा ठाकुर के निर्देश पर सब के सब एक लंबा घेरा बना कर गांव के अंदर की तरफ उस दिशा में बढ़ चले जिधर साहूकारों के मौजूद होने की ख़बर मुखबिरों ने दादा ठाकुर को दी थी।
आधी रात के वक्त पूरे गांव में शमशान की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। चारो तरफ अंधेरा तो था किंतु इतना भी नहीं कि किसी को कुछ दिखे ही न। आसमान में हल्का सा चांद था जिसकी मध्यम रोशनी धरती पर आ रही थी, ये अलग बात है कि क्षितिज पर काले बादलों की वजह से कभी कभी वो चांद छुप जाता था जिसकी वजह से उसके द्वारा आने वाली रोशनी लोप भी हो जाती थी।
"मैं अब भी आपसे यही कहूंगा ठाकुर साहब कि थोड़ा होश से काम लीजिएगा।" दादा ठाकुर के बगल से ही चल रहे अर्जुन सिंह ने धीमें स्वर में कहा____"कहीं ऐसा न हो कि आवेश और गुस्से में किए गए अपने कृत्य से बाद में आपको पछतावा हो।"
"हमें अब किसी बात का पछतावा नहीं होने वाला अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहा____"बल्कि हमें तो अब इस बात का बेहद अफ़सोस ही नहीं बल्कि दुख भी है कि हमने आज से पहले होश क्यों नहीं गंवाया था? अगर हमने इसके पहले ही पूरी सख़्ती से हर काम किया होता तो आज हमें ये दिन देखना ही नहीं पड़ता। हमारे दुश्मनों ने हमारी नरमी का फ़ायदा ही नहीं उठाया है बल्कि उसका मज़ाक भी बनाया है। इस लिए अब हमें किसी बात के लिए होश से काम नहीं लेना है बल्कि अब तो दुश्मनों के साथ वैसा ही सुलूक किया जाएगा जैसा कि उनके साथ होना चाहिए।"
"मैं आपकी बातों से इंकार नहीं कर रहा ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"यही वजह है कि इस वक्त मैं यहां आपके साथ हूं। मैं तो बस ये कह रहा हूं कि कुछ भी करने से पहले एक बार आपको उन लोगों से भी पूछना चाहिए कि ऐसा उन्होंने क्यों किया है?"
"पूछने की ज़रूरत ही नहीं है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने आवेशयुक्त भाव से कहा____"हमें अच्छी तरह पता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया है। तुम शायद भूल गए हो लेकिन हम नहीं भूले।"
"क्या मतलब??" अर्जुन सिंह ने उलझन पूर्ण भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखा____"मैं कुछ समझा नहीं। आप किस चीज़ की बात कर रहे हैं?"
"बहुत पुराना मामला है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारे पिता जी के ज़माने का। अगर हम ये कहें तो ग़लत न होगा कि साहूकारों का मन मुटाव हमारे पिता जी की वजह से ही शुरू हुआ था। हमने एक बार तुम्हें बताया तो था इस बारे में।"
"ओह! हां याद आया।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"तो क्या साहूकार लोग अभी भी उसी बात को लिए बैठे हैं?"
"कुछ ज़ख्म इंसान को कभी चैन और सुकून से नहीं बैठने देते।" दादा ठाकुर ने कहा____"पिता जी ने उस समय भले ही सब कुछ ठीक कर के मामले को रफा दफा कर दिया था मगर सच तो ये है कि वो मामला साहूकारों के लिए कभी रफा दफा हुआ ही नहीं। उस समय पिता जी के ख़ौफ के चलते भले ही साहूकारों ने कोई ग़लत क़दम नहीं उठाया था मगर वर्षों बाद अब उठाया है। हमें हैरत है कि ऐसा कोई क़दम उठाने में उन लोगों ने इतना समय क्यों लगाया मगर समझ सकते हैं कि हर चीज़ अपने तय वक्त पर ही होती है।"
"आपका मतलब है कि इतने सालों बाद ही उनके द्वारा ऐसा करने का वक्त आया?" अर्जुन सिंह ने बेयकीनी से दादा ठाकुर की तरफ देखा____"पर सोचने वाली बात है कि क्या उन्हें ऐसा करने के बाद अपने अंजाम की कोई परवाह न रही होगी?"
"इंसान के सब्र का घड़ा जब भर जाता है तो उसकी नियति कुछ ऐसी ही होती है मित्र अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने कहा____"जैसे इस वक्त हम बदले की भावना में जलते हुए उन सबको ख़ाक में मिलाने के लिए उतावले हो रहे हैं उसी तरह उन लोगों की भी यही दशा रही होगी।"
अर्जुन सिंह अभी कुछ कहने ही वाला था कि दादा ठाकुर ने चुप रहने का इशारा किया और पिस्तौल लिए आगे बढ़ चले। सभी गांव में दाखिल हो चुके थे। हमेशा की तरह बिजली गुल थी इस लिए किसी भी घर में रोशनी नहीं दिख रही थी। हल्के अंधेरे में डूबे गांव के घर भूत की तरह दिख रहे थे। दादा ठाकुर की नज़र घूमते हुए एक मकान पर जा कर ठहर गई। मकान कच्चा ही था जिसके बाहर क़रीब पच्चीस तीस गज का मैदान था। उस मैदान के एक तरफ कुछ मवेशी बंधे हुए थे।
"वो रहा मकान।" दादा ठाकुर ने उंगली से इशारा करते हुए बाकी सबकी तरफ नज़र घुमाई____"तुम सब मकान को चारो तरफ से घेर लो। उनमें से कोई भी बच के निकलना नहीं चाहिए।"
अंधेरे में सभी ने सिर हिलाया और मकान की तरफ सावधानी से बढ़ चले। दादा ठाकुर के साथ में अर्जुन सिंह और मामा लोग थे जबकि बाकी हवेली के मुलाजिम लोग दूसरे छोर पर थे। उन लोगों के साथ में भैया के साले वीरेंद्र सिंह थे और जगताप चाचा का एक साला भी।
सब के सब मकान की तरफ बढ़ ही रहे थे कि तभी अंधेरे में एक तरफ से एक साया भागता हुआ उस मकान के पास पहुंचा और शोर करते हुए अंदर घुस गया। ये देख दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि बाकी लोग भी बुरी तरह चौंक पड़े। दादा ठाकुर जल्दी ही सम्हले और सबको सावधान रहने को कहा और साथ ही आने वाली स्थिति से निपटने के लिए भी।
वातावरण में एकाएक ही शोर गुल गूंज उठा और मकान के अंदर से एक एक कर के लोग बाहर की तरफ निकल कर इधर उधर भागने लगे। हल्के अंधेरे में भी दादा ठाकुर ने भागने वालों को पहचान लिया। वो सब गांव के साहूकार ही थे। उन्हें भागते देख दादा ठाकुर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें ये सोच कर भी गुस्सा आया कि वो सब बुजदिल और कायरों की तरह अपनी जान बचा कर भाग रहे हैं जबकि उन्हें तो दादा ठाकुर का सामना करना चाहिए था।
इससे पहले कि वो सब अंधेरे में कहीं गायब हो जाते दादा ठाकुर ने सबको उन्हें खत्म कर देने का हुकुम सुना दिया। दादा ठाकुर का हुकुम मिलते ही वातावरण में बंदूखें गरजने लगीं। अगले ही पल वातावरण इंसानी चीखों से गूंज उठा। देखते ही देखते पूरे गांव में हड़कंप मच गया। सोए हुए लोगों की नींद में खलल पड़ गया और सबके सब ख़ौफ का शिकार हो गए। इधर दादा ठाकुर के साथ साथ अर्जुन सिंह और मामा लोगों की बंदूकें गरजती रहीं। जब बंदूक से निकली गोलियों से फिज़ा में गूंजने वाली चीखें शांत पड़ गईं तो दादा ठाकुर के हुकुम पर बंदूक से गोलियां निकलनी बंद हो गईं।
जब काफी देर तक फिज़ा में गोलियां चलने की आवाज़ नहीं गूंजी तो ख़ौफ से भरे गांव के लोगों ने राहत की सांस ली और अपने अपने घरों से निकलने की जहमत उठाई। लगभग सभी घरों के अंदर कुछ ही देर में रोशनी होती नज़र आने लगी। इधर दादा ठाकुर के कहने पर सब मकान की तरफ बढ़ चले।
"सम्हल कर ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"दुश्मन अंधेरे में कहीं छुपा भी हो सकता है और वो आप पर वार भी कर सकता है।"
"यही तो हम चाहते हैं।" दादा ठाकुर आगे बढ़ते हुए बोले____"हम चाहते हैं कि हमारे जिगर के टुकड़ों को छिप कर वार करने वाले एक बार हमारे सामने आ कर वार करें। हम भी तो देखें कि वो कितने बड़े मर्द हैं और कितना बड़ा जिगर रखते हैं।"
थोड़ी ही देर में सब उस मकान के क़रीब पहुंच गए। मकान के दोनों तरफ लाशें पड़ीं थी जिनके जिस्मों से निकलता लहू कच्ची ज़मीन पर अंधेरे में भी फैलता हुआ नज़र आ रहा था।
"अंदर जा कर देखो तो ज़रा।" दादा ठाकुर ने अपने एक मुलाजिम से कहा____"कि इस घर का वो कौन सा मालिक है जिसने हमारे दुश्मनों को अपने घर में पनाह देने की जुर्रत की थी?"
दादा ठाकुर के कहने पर मुलाजिम फ़ौरन ही घर के अंदर चला गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर आगे बढ़े और लाशों का मुआयना करने लगे। ज़ाहिर है उनके साथ बाकी लोग भी लाशों का मुआयना करने लगे थे।
इधर कुछ ही देर में गांव के लोग भी एक एक कर के अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे। कुछ लोगों के हाथ में लालटेनें थी जिसकी रोशनी अंधेरे को दूर कर रही थी। लालटेन की रोशनी में जिसके भी चेहरे दिख रहे थे उन सबके चेहरों में दहशत के भाव थे। तभी मुलाजिम अंदर से बाहर आया। उसने एक आदमी को पकड़ रखा था। मारे ख़ौफ के उस आदमी का चेहरा पीला ज़र्द पड़ा हुआ था। उसके पीछे रोते बिलखते एक औरत भी आ गई और साथ में उसके कुछ बच्चे भी।
"मालिक ये है वो आदमी।" मुलाजिम ने दादा ठाकुर से कहा____"जिसने इन लोगों को अपने घर में पनाह देने की जुर्रत की थी।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" वो आदमी दादा ठाकुर के पैरों में ही लोट गया, रोते बिलखते हुए बोला____"लेकिन ऐसा मैंने खुद जान बूझ के नहीं किया था बल्कि ये लोग ज़बरदस्ती मेरे घर में घुसे थे और मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने उनके बारे में किसी को कुछ बताया तो ये लोग मेरे बच्चों को जान से मार डालेंगे।"
"कब आए थे ये लोग तुम्हारे घर में?" अर्जुन सिंह ने थोड़ी नरमी से पूछा तो उसने कहा____"कल रात को आए थे मालिक। पूरा गांव सोया पड़ा था। मेरी एक गाय शाम को घर नहीं आई थी इस लिए उसे देखने के लिए मैं घर से बाहर निकला था कि तभी ये लोग मेरे सामने आ धमके थे। बस उसके बाद मुझे वही करना पड़ा जिसके लिए इन्होंने मुझे मजबूर किया था। मुझे माफ़ कर दीजिए मालिक। मैं अपने बच्चों की क़सम खा के कहता हूं कि मैंने आपसे कोई गद्दारी नहीं की है।"
"मेरा ख़याल है कि ये सच बोल रहा है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"इस सबमें यकीनन इसका कोई दोष नहीं है।"
"ठीक है।" दादा ठाकुर ने सपाट लहजे में उस आदमी की तरफ देखते हुए कहा____"हम तुम पर यकीन करते हैं। ख़ैर ज़रा अंदर से लालटेन ले कर तो आओ।"
"जी अभी लाया मालिक।" जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर उस आदमी ने राहत की सांस ली और फ़ौरन ही अंदर भागता हुआ गया। कुछ ही पलों में लालटेन ले कर वो दादा ठाकुर के सामने हाज़िर हो गया।
दादा ठाकुर ने उसके हाथ से लालटेन ली और उसकी रोशनी में लाशों का मुआयना करने लगे। घर से बाहर कुछ ही दूरी पर एक लाश पड़ी थी। दादा ठाकुर ने देखा वो लाश साहूकार शिव शंकर की थी। अभी दादा ठाकुर उसे देख ही रहे थे कि तभी वो आदमी ज़ोर से चिल्लाया जिसकी वजह से सब के सब चौंके और साथ ही सावधान हो कर बंदूखें तान लिए।
दादा ठाकुर ने पलट कर देखा, वो आदमी अपने एक मवेशी के पास बैठा रो रहा था। भैंस का एक बच्चा था वो जो किसी की गोली का शिकार हो गया था और अब वो ज़िंदा नहीं था। वो आदमी उसी को देख के रोए जा रहा था। उसके पीछे उसकी बीवी भी आंसू बहा रही थी। ये देख दादा ठाकुर वापस पलटे और फिर से लाशों का मुआयना करने लगे।
कुछ ही देर में सभी लाशों का मुआयना कर लिया गया। वो क़रीब आठ लाशें थीं। शिनाख्त से पता चला कि वो लाशें क्रमशः शिव शंकर, मणि शंकर, हरि शंकर तथा उनके बेटों की थी। मणि शंकर अपने दोनों बेटों के साथ स्वर्ग सिधार गया था। हरि शंकर और उसका बड़ा बेटा मानिकचंद्र स्वर्ग सिधार गए थे जबकि रूपचंद्र सिंह लाश के रूप में नहीं मिला, यानि वो ज़िंदा था और भागने में कामयाब हो गया था। शिव शंकर और उसका इकलौता बेटा गौरव सिंह मर चुके थे। इधर लाशों में गौरी शंकर तो नहीं मिला लेकिन उसके इकलौते बेटे रमन सिंह की लाश ज़रूर मिली। सभी लाशें बड़ी ही भयानक लग रहीं थी।
अभी सब लोग लाशों की तरफ ही देख रहे थे कि तभी वातावरण में धाएं की आवाज़ से गोली चली। गोली चलते ही एक इंसानी चीख फिज़ा में गूंज उठी। वो इंसानी चीख दादा ठाकुर के पास ही खड़े उनके सबसे छोटे साले अमर सिंह राणा की थी। उनके बाएं बाजू में गोली लगी थी। इधर गोली चलने की आवाज़ सुनते ही गांव में एक बार फिर से हड़कंप मच गया। जो लोग अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे वो सब चीखते चिल्लाते हुए अपने अपने घरों के अंदर भाग लिए। इधर मामा को गोली लगते ही सब के सब सतर्क हो गए और जिस तरफ से गोली चलने की आवाज़ आई थी उस तरफ ताबड़तोड़ फायरिंग करने लगे।
"तुम ठीक तो हो न अमर?" दादा ठाकुर ने अपने सबसे छोटे साले अमर को सम्हालते हुए बोले____"तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं न?"
"मैं बिल्कुल ठीक हूं जीजा जी।" अमर सिंह ने दर्द को सहते हुए कहा____"आप मेरी फ़िक्र मत कीजिए और दुश्मन को ख़त्म कीजिए।"
"वो ज़िंदा नहीं बचेगा अमर।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहने के साथ ही बाकी लोगों की तरफ देखते हुए हुकुम दिया____"सब जगह खोजो उस नामुराद को। बच के निकलना नहीं चाहिए।"
दादा ठाकुर के हुकुम पर सभी मुलाजिम फ़ौरन ही उस तरफ दौड़ पड़े जिधर से गोली चली थी। इधर दादा ठाकुर ने फ़ौरन ही अपने कंधे पर रखे गमछे को फाड़ा और उसे अमर सिंह की बाजू में बांध दिया ताकि खून ज़्यादा न बहे।
"हमारा ख़याल है कि हमें अब यहां से निकलना चाहिए जीजा श्री।" चाची के छोटे भाई अवधराज सिंह ने कहा____"हमारा जो दुश्मन यहां से निकल भागा है वो कहीं से भी छुप कर हमें नुकसान पहुंचा सकता है। मुलाजिमों को आपने उन्हें खोजने का हुकुम दे ही दिया है तो वो लोग उन्हें खोज लेंगे। हवेली चल कर अमर भाई साहब की बाजू से गोली निकालना बेहद ज़रूरी है वरना ज़हर फैल जाएगा तो और भी समस्या हो जाएगी।"
"अवधराज जी सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"यहां से अब निकलना ही हमारे लिए उचित होगा।"
"ठीक है।" दादा ठाकुर ने कहा____"मगर यहां पर पड़ी इन लाशों को भी तो यहां से हटाना पड़ेगा वरना इन लाशों को देख कर गांव वाले ख़ौफ से ही मर जाएंगे।"
"हां सही कहा आपने।" अर्जुन सिंह ने सिर हिलाया____"इन लाशों को ठिकाने लगाना भी ज़रूरी है। अगर पुलिस विभाग को पता चला तो मुसीबत हो जाएगी।"
"पुलिस विभाग को तो देर सवेर पता चल ही जाएगा।" दादा ठाकुर ने कहा___"मगर इसकी हमें कोई फ़िक्र नहीं है। हम तो ये सोच रहे हैं कि लाशों को ऐसी जगह रखा जाए जिससे इन गांव वालों को भी समस्या ना हो और साथ ही हमारे बचे हुए दुश्मन भी हमारी पकड़ में आ जाएं।"
"ऐसा कैसे होगा भला?" अर्जुन सिंह के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।
"इन लाशों का क्रिया कर्म करने के लिए इनके घर वाले इन लाशों को लेने तो आएंगे ही।" दादा ठाकुर ने कहा____"अब ऐसा तो होगा नहीं कि मौत के ख़ौफ से वो लोग इनका अंतिम संस्कार ही नहीं करेंगे। इसी लिए हमने कहा है कि लाशों को ऐसी जगह रखा जाए जहां से इनके चाहने वालों को इन्हें ले जाने में कोई समस्या ना हो किंतु साथ ही वो आसानी से हमारी पकड़ में भी आ जाएं।"
दादा ठाकुर की बात सुन कर अभी अर्जुन सिंह कुछ कहने ही वाला था कि तभी कुछ मुलाजिम दादा ठाकुर के पास आ गए। उन्होंने बताया कि गोली चलाने वाले दुश्मन का कहीं कोई अता पता नहीं है। दादा ठाकुर ने उन्हें हुकुम दिया कि वो सब लाशों को बैलगाड़ी में लाद कर ले चलें।
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"रुक जाओ वरना गोली मार दूंगा।" अंधेरे में भागते एक साए को देख मैंने उस पर रिवॉल्वर तानते हुए कहा तो वो साया एकदम से अपनी जगह पर ठिठक गया।
एक तो अंधेरा दूसरे उसने अपने बदन पर काले रंग की शाल ओढ़ रखी थी इस लिए उसकी परछाईं मुझे धुंधली सी ही नज़र आ रही थी। उधर मेरी बात सुनते ही वो ठिठक गया था किंतु पलट कर मेरी तरफ देखने की जहमत नहीं की उसने। मैं पूरी सतर्कता से उसकी तरफ बढ़ा तो एकदम से उसमें हलचल हुई।
"तुम्हारी ज़रा सी भी हरकत तुम्हारी मौत का सबब बन सकती है।" मैंने सख़्त भाव से उसे चेतावनी देते हुए कहा____"इस लिए अगर अपनी ज़िंदगी से बेपनाह मोहब्बत है तो अपनी जगह पर ही बिना हिले डुले खड़े रहो।"
मगर बंदे पर मेरी चेतावनी का कोई असर न हुआ। वो अपनी जगह से हिला ही नहीं बल्कि पलट कर उसने मुझ पर गोली भी चला दी। पलक झपकते ही मेरी जीवन लीला समाप्त हो सकती थी किंतु ये मेरी अच्छी किस्मत ही थी कि उसका निशाना चूक गया और गोली मेरे बाजू से निकल गई। एक पल के लिए तो मेरी रूह तक थर्रा गई थी किंतु फिर मैं ये सोच कर जल्दी से सम्हला कि कहीं इस बार उसका निशाना सही जगह पर न लग जाए और अगले ही पल मेरी लाश कच्ची ज़मीन पर पड़ी नज़र आने लगे। इससे पहले कि वो मुझ पर फिर से गोली चलाता मैंने रिवॉल्वर का ट्रिगर दबा दिया। वातावरण में धाएं की तेज़ आवाज़ गूंजी और साथ ही उस साए के हलक से दर्द में डूबी चीख भी।
गोली साए की जांघ में लगी थी और ये मैंने जान बूझ कर ही किया था क्योंकि मैं उसे जान से नहीं मारना चाहता था। मैं जानना चाहता था कि आख़िर वो है कौन जो रात के इस वक्त इस तरह से भागता चला जा रहा था और मेरी चेतावनी के बावजूद उसने मुझ पर गोली चला दी थी। बहरहाल, जांघ में गोली लगने से वो लहराया और ज़मीन पर गिर पड़ा। पिस्तौल उसके हाथ से निकल कर अंधेरे में कहीं गिर गया था। उसने दर्द को सहते हुए ज़मीन में अपने हाथ चलाए। शायद वो अपनी पिस्तौल ढूंढ रहा था। ये देख कर मैं फ़ौरन ही उसके क़रीब पहुंचा और उसके सिर पर किसी जिन्न की तरह खड़ा हो गया।
"मुद्दत हुई पर्दानशीं की पर्दादारी देखते हुए।" मैंने शायराना अंदाज़ में कहा____"हसरत है कि अब दीदार-ए-जमाले-यार हो।"
कहने के साथ ही मैंने हाथ बढ़ा कर एक झटके में उसके सिर से शाल को उलट दिया। मेरे ऐसा करते ही उसने बड़ी तेज़ी से अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। ये देख कर मैं मुस्कुराया और अगले ही पल मैंने अपना एक पैर उसकी जांघ के उस हिस्से में रख कर दबा दिया जहां पर गोली लगने से ज़ख्म बन गया था। ज़ख्म में पैर रख कर जैसे ही मैंने दबाया तो वो साया दर्द से हलक फाड़ कर चिल्ला उठा।
"शायद तुमने ठीक से हमारा शेर नहीं सुना।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अगर सुना होता तो हमारी नज़रों से अपनी मोहिनी सूरत यूं नहीं छुपाते।"
कहने के साथ ही मैंने अपने पैर को फिर से उसके ज़ख्म पर दबाया तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इस बार उसके चिल्लाने से मुझे उसकी आवाज़ जानी पहचानी सी लगी। उधर वो अभी भी अपना चेहरा दूसरी तरफ किए दर्द से छटपटाए जा रहा था और मैं सोचे जा रहा था कि ये जानी पहचानी आवाज़ किसकी हो सकती है? मुझे सोचने में ज़्यादा समय नहीं लगा। बिजली की तरह मेरे ज़हन में उसका नाम उभर आया और इसके साथ ही मैं चौंक भी पड़ा।
"शायद तुमने ठीक से हमारा शेर नहीं सुना।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अगर सुना होता तो हमारी नज़रों से अपनी मोहिनी सूरत यूं नहीं छुपाते।"
कहने के साथ ही मैंने अपने पैर को फिर से उसके ज़ख्म पर दबाया तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इस बार उसके चिल्लाने से मुझे उसकी आवाज़ जानी पहचानी सी लगी। उधर वो अभी भी अपना चेहरा दूसरी तरफ किए दर्द से छटपटाए जा रहा था और मैं सोचे जा रहा था कि ये जानी पहचानी आवाज़ किसकी हो सकती है? मुझे सोचने में ज़्यादा समय नहीं लगा। बिजली की तरह मेरे ज़हन में उसका नाम उभर आया और इसके साथ ही मैं चौंक भी पड़ा।
अब आगे....
गांव से बाहर एक बड़े से पेड़ के पास पहुंचते ही सफ़ेदपोश ने जगन को रुकने को कहा तो जगन रुक गया। वो बुरी तरह हांफ रहा था और उसी के जैसे सफ़ेदपोश भी हांफ रहा था। यूं तो हल्के अंधेरे में जगन को उसकी कोई प्रतिक्रिया ठीक से समझ नहीं आ रही थी किंतु उसने इतना ज़रूर महसूस किया था कि सफ़ेदपोश उससे तेज़ नहीं भाग पा रहा था। बहरहाल, वो इसी बात से बेहद खुश था कि उस सफ़ेदपोश ने उसे दादा ठाकुर की क़ैद से निकाल लिया है। एक तरह से उसने उसकी जान बचा ली थी वरना वो तो अब यही समझ चुका था कि कल का दिन उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।
"आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने मेरी जान बचा ली।" जगन ने हांफते हुए सफ़ेदपोश की तरफ देख कर कहा____"मैं जीवन भर अब आपकी गुलामी करूंगा।"
"अगर तुम ऐसा समझते हो।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"तो ये भी समझते होगे कि तुम्हें ये जो नई ज़िंदगी मिली है उस पर सबसे ज़्यादा अब हमारा अधिकार है।"
"बिल्कुल है मालिक।" जगन ने सफ़ेदपोश को मालिक शब्द से संबोधित करते हुए कहा____"आपने मेरी जान बचा कर मुझे नई ज़िंदगी दी है इस लिए मेरी इस ज़िंदगी में अब आपका ही हक़ है। अब से आप मेरे मालिक हैं और मैं आपका गुलाम जो आपके हर हुकुम का बिना सोचे समझे पालन करेगा।"
"बहुत बढ़िया।" सफ़ेदपोश ने कहा____"अगर तुम हमारे हर हुकुम का पालन करोगे तो यकीन करो आज के बाद तुम्हारे अपने बीवी बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी हम ख़ुद लेते हैं। उन्हें अब किसी भी चीज़ का अभाव नहीं होगा।"
"आपका बहुत बहुत शुक्रिया मालिक।" जगन इस बात से बेहद खुश और बेफ़िक्र सा हो गया, बोला____"आप सच में बहुत महान हैं। मुझे हुकुम दीजिए कि अब मुझे क्या करना है?"
"तुम्हें इसी वक्त माधोपुर की तरफ जाना है।" सफ़ेदपोश ने कहा____"हमारा ख़याल है कि माधोपुर के रास्ते में ही कहीं तुम्हें वैभव सिंह मिलेगा। तुम्हारा काम उसको जान से मार डालना है। क्या तुम ये कर सकोगे?"
"मैं आपके इस हुकुम को अपनी जान दे कर भी पूरा करुंगा मालिक।" जगन वैभव का नाम सुन कर अंदर ही अंदर कांप गया था किंतु अपनी घबराहट को छुपाते हुए बड़ी ही गर्मजोशी से बोला____"और अगर उसके साथ कोई और भी हुआ तो उसको भी जान से मार दूंगा।"
"बहुत बढ़िया।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"हम उम्मीद करते हैं कि कल का सूरज वैभव सिंह की मौत का पैग़ाम ले कर ही उदय होगा। अगर तुम सच में उसको मारने में कामयाब हुए तो तुम्हें उपहार के रूप में मुंह मांगी मुराद मिलेगी।"
"धन्यवाद मालिक।" जगन मन ही मन गदगद होते हुए बोला।
"इसे अपने पास रखो।" सफ़ेदपोश ने अपने लिबास के अंदर से एक पिस्तौल निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"इसके माध्यम से तुम्हें वैभव सिंह को जान से मारने में आसानी होगी। अब तुम जाओ।"
सफ़ेदपोश से पिस्तौल ले कर जगन ने अदब से सिर झुका कर सफ़ेदपोश को सलाम किया और पलट कर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला गया। कुछ ही पलों में वो अंधेरे में गायब हो गया। उसके जाने के बाद सफ़ेदपोश पलटा और वो भी उसी की तरह कुछ ही देर में अंधेरे में कहीं गायब हो गया।
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मैं चौंकने के बाद सोच में डूब ही गया था कि तभी अचानक मैं लड़खड़ा कर गिर गया। ज़मीन पर पड़े साए ने मेरा पैर पकड़ कर उछाल दिया था। मुझे उससे ऐसी हरकत की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी इस लिए मैं इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कच्ची ज़मीन पर गिरते ही मैं बिजली की सी तेज़ी से उठ कर खड़ा हो गया। तभी मेरी नज़र साए पर पड़ी जो अपने दर्द को सहते हुए मुझे दबोचने के लिए मुझ पर झपट ही पड़ा था। इससे पहले कि वो मुझ तक पहुंचता मैंने दाएं घुटने का वार उसके जबड़े में किया तो वो दर्द से बिलबिलाते हुए एक तरफ को उलट गया।
"लगता है मरने की बहुत ही जल्दी है तुझे।" मैंने उसके पास पहुंचते ही उसकी ज़ख्म वाली जांघ पर पैर की ठोकर मारते हुए कहा तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इधर झुक कर मैंने उसकी गर्दन को पीछे से अपने हाथ की कैंची बना कर दबोच लिया और फिर गुर्राते हुए बोला____"तेरे जैसे नामर्द ठाकुर वैभव सिंह को मारने के ख़्वाब कब से देखने लगे? वैसे मुझे शक तो था लेकिन यकीन नहीं कर पा रहा था कि तू ऐसा कुछ कर सकता है।"
"तेरे जैसे मंद बुद्धि वाले लोग सोच भी नहीं सकते वैभव सिंह।" साया दर्द में भी नफ़रत से गुर्राया____"तू तो बस दूसरो की बहू बेटियों की इज्ज़त लूटना ही जानता है। ये उसी का परिणाम है कि आज तुम सब इस हाल में पहुंच गए हो।"
"मान लिया कि मुझे सिर्फ दूसरो की बहू बेटियों की इज्ज़त लूटना ही आता है।" मैंने उसी लहजे में कहा___"मगर ठाकुर वैभव सिंह उस जियाले का नाम है जो अपना हर काम डंके की चोट पर करता है। तेरे जैसे नामर्द तो छुप कर ही वार करते हैं।"
मेरी बात सुन कर साया बुरी तरह कसमसा कर रह गया। इधर मैं उसकी बेबसी को देखते हुए बोला___"ख़ैर ये तो बता क्या तेरी बीवी भी इस खेल में शामिल है?"
"नहीं।" साया ढीला पड़ते हुए बोला____"होगी भी कैसे? उसे तो तेरा मोटा लंड मिल रहा था। बुरचोदी बड़े मज़े से तुझसे चुदवाती थी। मैंने और मेरे बापू ने लोगों से सुना तो था पर यकीन नहीं था कि दादा ठाकुर का पूत मेरे ही घर की इज्ज़त को इस तरह लूट सकता है। एक दिन जब मैंने अपनी आंखों से देख लिया तो यकीन करना ही पड़ा। रजनी पर गुस्सा तो बहुत आया था मुझे, जी किया कि जान से मार दूं उसे लेकिन फिर सोचा कि क्यों न उसी के हाथों उसके यार को मरवाया जाए। मैंने एक दिन धर लिया उसे और उससे खुल कर पूछा। पहले तो साली मुकर रही थी और कह रही थी कि मैं बेवजह ही अपनी बीवी पर ऐसा घटिया आरोप लगा रहा हूं। फिर जब मैंने तबीयत से उसको कूटना शुरू किया तो जल्दी ही क़बूल कर लिया उसने। तब मैंने कहा कि अब वो वही करे जो मैं कहूं, अगर उसने ऐसा नहीं किया तो मैं उसे बेइज्ज़त कर के घर से निकाल दूंगा। उसके मायके में भी सबको बता दूंगा कि वो पूरे गांव के मर्दों का बिस्तर गरम करती है। मेरी इस धमकी से वो डर गई थी इस लिए उसने वो सब कुछ करना मंज़ूर कर लिया जो करने के लिए मैं उसे बोल रहा था।"
"अपनी बीवी के हाथों।" मैंने बीच में ही उसे टोकते हुए कहा____"तू किस तरह मुझे मरवा देना चाहता था?"
"तू जब अपनी हवस मिटाने के लिए मेरे घर आता।" रघुवीर ने नफ़रत से कहा____"तो वो मेरे कहे अनुसार तेज़ धार वाले खंज़र से तेरा गला चीर देती। उसके बाद मैं तेरी लाश को सबकी नज़रों से छुपा कर कहीं दफ़ना देता।"
"वाह! बहुत खूब।" मैं उसकी बात सुन कर हल्के से मुस्कुराया, फिर बोला____"अगर तेरा यही मंसूबा था तो फिर तूने अपने इस मंसूबे को पूरा क्यों नहीं किया?"
"हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे कि ऐसा कुछ करने का मौका ही नहीं मिल सका मुझे।" रघुवीर ने जैसे अफ़सोस जताते हुए कहा____"दूसरी बात ये भी कि उसके बाद से तू भी मेरे घर नहीं आया। मैं तो हर रोज़ तेरे आने की राह देखता था। इधर हालात कुछ ऐसे हो गए कि तू अपने बाप चाचा और भाई के साथ किसी और ही काम में उलझ गया। इसी बीच मुझे और बापू को एक और बात पता चली।"
"कौन सी बात?" मेरे माथे पर शिकन उभरी।
"मेरा मंसूबा पूरा नहीं हो पा रहा था इस लिए मैं बेहद गुस्से में था।" रघुवीर ने कहा____"और इसी गुस्से में मैंने एक दिन रजनी को फिर से कूटना शुरू कर दिया तो उसके मुख से अंजाने में ही कुछ ऐसा निकल गया जो मेरी कल्पनाओं में भी नहीं था।"
"क्या मतलब??" मैं पूछे बग़ैर न रह सका____"ऐसा क्या निकल गया था तेरी बीवी के मुख से?"
"शायद वो मेरे द्वारा बेमतलब कूटे जाने से गुस्से में आ गई थी।" रघुवीर ने कहा____"इसी लिए उसने गुस्से में मुझसे कहा कि मैं सिर्फ उसे ही क्यों मार रहा हूं जबकि मेरी मां के भी तो तेरे साथ उसी के जैसे संबंध हैं। रजनी के मुख से ये सुन कर मैं एकदम से सुन्न सा पड़ गया था। मुझे लगा वो मेरी मां पर झूठा इल्ज़ाम लगा रही है इस लिए मैंने गुस्से में उसे फिर से कूटना शुरू कर दिया तो उसने कहा कि अगर मुझे यकीन नहीं है तो मैं खुद जा कर अपनी मां से इस बारे में पूछ लूं।"
"तो फिर तुमने अपनी मां से पूछा?" रघुवीर एकदम से चुप हो गया तो मैंने उत्सुकतावश उससे पूछ ही लिया।
"हिम्मत तो नहीं पड़ रही थी लेकिन मेरे अंदर गुस्सा भी था इस लिए जैसे ही मां गांव से आई तो मैंने उससे पूछ लिया।" रघुवीर ने कहा____"पहले तो मां मेरे मुख से ऐसी बातें सुन कर गुस्सा होते हुए मुझ पर खूब चिल्लाई मगर जब मैंने दहाड़ते हुए उसको मारने दौड़ा तो वो डर गई। ऊपर से रजनी भी आ गई और मेरे सामने ही मां को बताने लगी कि उसे सब पता है कि कैसे वो तेरे साथ अकेले में गुलछर्रे उड़ाती है। रजनी की बात सुन कर मां से कुछ कहते ना बन पड़ा था। मैं समझ गया कि रजनी मां के बारे में सच बोल रही है। मुझे इतना ज़्यादा गुस्सा आया कि मैं मां को मारने के लिए दौड़ पड़ा उसकी तरफ मगर तभी बापू की आवाज़ सुन कर रुक गया।"
"यानि इस सबकी वजह से तेरे बाप को भी सब पता चल गया?" मैंने पूछा तो उसने कहा____"उन्हें ये सब पहले से ही पता था किंतु ये बात उनके लिए भी हैरान कर देने वाली थी कि उनकी बूढ़ी बीवी ने अपने बेटे समान लड़के से यानि तुझसे ऐसा गंदा संबंध बनाया हुआ है। उस दिन बापू का गुस्सा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया और फिर उनके अंदर वर्षों से जो कुछ दबा हुआ था वो सब गुस्से में निकल गया।"
"ऐसा क्या था तेरे बाप के अंदर?" मैंने भारी उत्सुकता के साथ पूछा____"जो वर्षों से दबा हुआ था?"
"उस दिन उन्हीं के मुख से मुझे पता चला कि मेरी मां का हवेली से बहुत पुराना संबंध रहा है।" रघुवीर ने कहा____"बड़े दादा ठाकुर अपने मुंशी यानि मेरे बाप की बीवी को अपनी रखैल बनाए हुए थे।"
रघुवीर के मुख से ये सुनते ही मेरे पिछवाड़े से धरती गायब हो गई। साला मुंशी की बीवी प्रभा तो छुपी रुस्तम थी। मेरे दादा जी यानी बड़े दादा ठाकुर की रखैल थी वो और उनके बाद उनके पोते यानि मेरे साथ मज़े कर रही थी। मेरा तो ये सोचते ही सिर चकराने लगा था। तभी मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या प्रभा के ऐसे संबंध मेरे अपने पिता से भी हो सकते हैं? इस ख़याल ने मेरे जिस्म में झुरझरी सी पैदा कर दी। मुझे अपने पिता पर यकीन तो नहीं हुआ मगर ये सब सुन कर यही लगने लगा कि कुछ भी हो सकता है।
"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है।" फिर मैंने रघुवीर से कहा____"लेकिन ये समझ नहीं आया कि जब तेरे बाप को अपनी बीवी के बारे में पहले से ही सब पता था तो वो इतने वर्षों से चुप क्यों था? क्या तेरे बाप का खून इतने वर्षों में कभी नहीं खौला?"
"उस दिन गुस्से में मैंने भी बापू से यही सब कहा था।" रघुवीर ने कहा____"जवाब में बापू ने यही कहा कि वो कुछ नहीं कर सकते थे। असल में बापू का ब्याह बड़े दादा ठाकुर ने ही मां से करवाया था। जब बापू को बड़े दादा ठाकुर के साथ अपनी बीवी के संबंधों का पता चला तो वो बहुत ख़फा हुए थे मां से। पूछने पर मां ने बताया था कि बड़े दादा ठाकुर से उनके संबंध तब से हैं जब उनका बापू से ब्याह भी नहीं हुआ था। मैंने भी लोगों से ही सुना था कि बड़े दादा ठाकुर ऐसे ही ठरकी आदमी थे। उन्हें जो भी लड़की या औरत पसंद आ जाती थी उसे वो फ़ौरन ही अपने हरम में पेश करवा लेते थे। दूर दूर तक के लोगों में उनका ख़ौफ था इस लिए कोई उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जा भी नहीं सकता था। यही वजह थी कि मेरे बापू कभी इस बारे में कुछ नहीं कर सके थे। जब बड़े दादा ठाकुर की मृत्यु हुई तब मेरे बापू ये सोच कर खुश हुए थे कि ऊपर वाले ने उनकी सुन ली और बड़े दादा ठाकुर जैसे पापी को उसके अपराध के चलते मौत मिल गई। बड़े दादा ठाकुर के बाद तेरे पिता दादा ठाकुर बन कर गद्दी पर बैठे। दादा ठाकुर के बारे में बापू बचपन से जानते थे इस लिए उन्होंने ये सोच कर कभी बदला लेने का नहीं सोचा कि वो अपने पिता के जैसे नहीं हैं। बस उसके बाद वो हमेशा शांत ही रहे और दादा ठाकुर की सेवा करते रहे मगर उस दिन जब उन्हें पता चला कि बड़े दादा ठाकुर के बाद बड़े दादा ठाकुर के पोते ने उनकी बीवी को अपनी हवस का शिकार बना लिया है तो उनके पुराने ज़ख्म फिर से ताज़ा हो गए।"
"वाह! काफी दिलचस्प कहानी है।" मैंने कहा____"मगर इस कहानी से मैं बस यही समझा हूं कि तेरा बापू एक नंबर का चूतिया और डरपोक आदमी था। बड़ी हैरत की बात है कि उसे अपनी बीवी के बारे में शुरू से सब पता था इसके बावजूद कभी उसका खून नहीं खौला। बड़े दादा ठाकुर के ख़ौफ ने उसके खून को पानी बना के रख दिया था। चलो मान लिया कि वो बड़े दादा ठाकुर का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था मगर क्या वो अपनी बीवी का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता था? अरे! ऐसी बेवफ़ा बीवी को कभी भी वो ज़हर दे कर मार सकता था मगर नहीं उसने सब कुछ सह लिया और वर्षों तक कायरों का तमगा लिए घूमता रहा। ख़ैर, तो उस दिन तेरे बापू का पानी बना खून फिर से खून में तब्दील हुआ जिस दिन उसे ये पता चला कि उसकी बीवी ही नहीं बल्कि उसकी बहू भी मेरे साथ मज़े कर रही है?"
"हां।" रघुवीर ने जैसे क़बूल किया____"हम दोनों बाप बेटे इस सबसे बहुत दुखी थे। ये कैसी अजीब बात थी कि हम दोनों बाप बेटे की बीवियां तेरे साथ संबंध बनाए हुए थीं और हम नामर्द से बन गए थे। उसी दिन मैंने और बापू ने मिल कर ये फ़ैसला कर लिया था कि अब चाहे जो हो जाए इसका बदला हम ले कर रहेंगे।"
अभी मैं रघुवीर की बात सुन कर उससे कुछ कहने ही वाला था कि तभी एक तरफ से अजीब सी आवाज़ हुई जिसे सुन कर मैं चौंक पड़ा। पलट कर मैंने दूर दूर तक अंधेरे में नज़र दौड़ाई मगर अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया। मैंने गौर किया कि आवाज़ स्वाभाविक रूप से नहीं हुई थी। मैं एकदम से सतर्क हो गया। वैसे भी इस समय हालात अच्छे नहीं थे। मैंने रघुवीर को छोड़ा और इससे पहले कि वो कुछ कर पाता मैंने तेज़ी से रिवॉल्वर के दस्ते का वार उसकी कनपटी के खास हिस्से पर कर दिया। रघुवीर के मुख से घुटी घुटी सी चीख निकली और अगले कुछ ही पलों में वो अपने होश खोता चला गया। उसके बेहोश होते ही मैंने उसके जिस्म को उठा कर अपने कंधे पर डाला और अंधेरे में एक तरफ को बढ़ता चला गया।
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कुसुम अपनी भाभी के बिस्तर पर गहरी नींद में सो ही रही थी कि तभी किसी के द्वारा ज़ोर ज़ोर से हिलाए जाने पर उसकी आंख खुल गई। वो हड़बड़ा कर उठी और फिर बदहवास हालत में उसने इधर उधर देखा तो जल्दी ही उसकी नज़र अपने एकदम पास झुकी रागिनी पर पड़ी।
"भ...भाभी आप?" कुसुम एकदम से चौंकते हुए बोली____"क्या हुआ, आप इस तरह खड़ी क्यों हैं? सोई नहीं आप?"
"नींद ही नहीं आ रही थी मुझे।" रागिनी ने बुझे मन से कहा____"इस लिए तुम्हें सोता देख मैं कमरे से बाहर चली गई थी। बाहर गई तो मेरे मन में वैभव का ख़याल आ गया। वो पहले भी बहुत देर तक मेरे पास ही सिरहाने पर बैठा हुआ था। उसे भी नींद नहीं आ रही थी। मैंने उसे आराम करने के लिए भेजा था तो सोचा देखूं वो आराम कर रहा है या अभी भी जाग रहा है? जब मैं उसके कमरे में पहुंची तो देखा वहां उसके कमरे में बिस्तर पर विभोर सो रहा था जबकि वैभव नहीं था?"
"क...क्या???" कुसुम अपनी भाभी की बात सुन कर बुरी तरह चौंकी____"ये क्या कह रही हैं आप? वैभव भैया अपने कमरे में नहीं थे?"
"हां कुसुम।" रागिनी ने सहसा चिंतित भाव से कहा____"वो अपने कमरे में नहीं था। अब तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे वो हवेली से चला गया है, शायद मेरी शर्त पूरी करने।"
"श...शर्त...पूरी करने???" कुसुम का जैसे दिमाग़ ही चकरा गया____"ये सब आप क्या कह रही हैं भाभी? मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
रागिनी ने संक्षेप में कुसुम को वो बातें बता दी जो उसकी और वैभव के बीच हुईं थी। सारी बातें सुन का कुसुम के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें उभर आईं।
"अब क्या होगा भाभी?" कुसुम घबराए हुए भाव से बोली____"कहीं वैभव भैया सच में ही न आपकी शर्त पूरी करने चले गए हों मगर उन्हें रात के इस वक्त हवेली से बाहर नहीं जाना चाहिए था।"
"यही तो मैं भी सोच रही हूं कुसुम।" रागिनी ने चिंतित और परेशान भाव से कहा____"उसे मेरी शर्त को पूरा करने के लिए इस तरह का पागलपन नहीं दिखाना चाहिए था। अगर उसे कुछ हो गया तो उसकी ज़िम्मेदार मैं ही तो होऊंगी। अगर हवेली में किसी को इस बारे में पता चला तो कोई भी मुझे माफ़ नहीं करेगा। कोई क्या मैं ख़ुद अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगी।"
कहने के साथ ही रागिनी की आंखें छलक पड़ीं। ये देख कुसुम झट से उठी और रागिनी को बिस्तर पर बैठा कर उसे दिलासा देने लगी।
"शांत हो जाइए भाभी।" फिर उसने कहा____"वैभव भैया को कुछ नहीं होगा। भगवान इतना भी बेरहम नहीं हो सकता कि वो हम सबको एक ही दिन में इतना सारा दुख दे दे।"
"कौन भगवान? कैसा भगवान कुसुम?" रागिनी ने हताश भाव से कहा____"नहीं, कहीं कोई भगवान नहीं है। सब झूठ है। ये सब लोगों का फैलाया हुआ अंधविश्वास है। अगर सच में कहीं भगवान होता तो अपने होने का कोई तो सबूत देता। जब से मैंने होश सम्हाला है तब से उसकी पूजा आराधना करती आई हूं मगर क्या किया भगवान ने? नहीं कुसुम, सच तो यही है कि इस दुनिया में भगवान जैसा कुछ है ही नहीं। आज मैं भी एक वादा करती हूं कि अगर इस भगवान ने वैभव के साथ कुछ भी बुरा किया तो मैं अपने हाथों से हवेली में मौजूद भगवान की हर मूर्ति को उठा कर हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"
"ऐसा मत कहिए भाभी।" रागिनी की बातें सुन कर कुसुम के समूचे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई, बोली____"आपकी ज़ुबान पर इतनी कठोर बातें ज़रा भी अच्छी नहीं लगती। यकीन कीजिए वैभव भैया के साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। अब चलिए आराम कीजिए आप।"
कुसुम ने ज़ोर दे कर रागिनी को बिस्तर पर लिटा दिया और खुद किनारे पर बैठी जाने किन ख़यालों में खो गई। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन कमरे के अंदर मौजूद दो इंसानों के अंदर जैसे कोई आंधी सी चल रही थी।
"ऐसा मत कहिए भाभी।" रागिनी की बातें सुन कर कुसुम के समूचे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई, बोली____"आपकी ज़ुबान पर इतनी कठोर बातें ज़रा भी अच्छी नहीं लगती। यकीन कीजिए वैभव भैया के साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। अब चलिए आराम कीजिए आप।"
कुसुम ने ज़ोर दे कर रागिनी को बिस्तर पर लिटा दिया और खुद किनारे पर बैठी जाने किन ख़यालों में खो गई। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन कमरे के अंदर मौजूद दो इंसानों के अंदर जैसे कोई आंधी सी चल रही थी।
अब आगे....
जगन हल्के अंधेरे में बढ़ता ही चला जा रहा था। आसमान में काले बादल न होते तो कदाचित इतना अंधेरा न होता क्योंकि थोड़ा सा ही सही मगर आसमान में चांद ज़रूर था जिसकी रोशनी अंधेरे को दूर कर देती थी। कुछ देर पहले उसने गोली चलने की आवाज़ सुनी थी। गोली चलने की आवाज़ से वो डर तो गया था लेकिन सफ़ेदपोश के हुकुम का पालन करना उसके लिए हर कीमत पर अनिवार्य था। जिस तरफ उसने गोली चलने की आवाज़ सुनी थी उसी तरफ वो बढ़ चला था। अभी कुछ ही देर पहले उसे ऐसा लगा था जैसे कुछ दूरी पर दो लोग बातें कर रहे हैं। रात के सन्नाटे में उसे आवाज़ें साफ सुनाई दी थीं इस लिए वो तेज़ी से उस तरफ बढ़ता चला गया था मगर फिर अचानक से आवाज़ें आनी बंद हो गईं।
आसमान में मौजूद चांद के वजूद से थोड़ी देर के लिए बादल हटे तो रोशनी में उसने दो सायों को देखा। इसके पहले वो क़दम दर क़दम चल रहा था किंतु अब उसने दौड़ लगा दी थी। उसके हाथ में पिस्तौल थी इस लिए उसे किसी का डर नहीं लग रहा था। जल्दी ही वो उन सायों के क़रीब पहुंच गया और अगले ही पल वो ये देख कर चौंका कि वो असल में एक ही साया था। जगन ने स्पष्ट देखा कि साया अपनी पीठ पर कोई भारी चीज़ को ले रखा था और बड़े तेज़ क़दमों से आगे बढ़ता ही चला जा रहा था। ये देख जगन और भी तेज़ी से उसकी तरफ दौड़ने लगा। अचानक ही अंधेरा हो गया, जाहिर है काले बादलों ने फिर से थोड़े से चमकते चांद को ढंक लिया था।
जगन दौड़ते दौड़ते बुरी तरह हांफने लगा था। जैसे ही अंधेरा हुआ तो उसे वो साया दिखना बंद हो गया। इसके बावजूद वो आगे बढ़ता रहा। कुछ ही देर में उसे आस पास कई सारे पेड़ नज़र आने लगे। उसने एक जगह रुक कर इधर उधर निगाह दौड़ाई मगर वो साया उसे कहीं नज़र न आया। जगन एकदम से बेचैन और परेशान हो गया। हाथ में पिस्तौल लिए अभी वो परेशानी की हालत में इधर उधर देख ही रहा था कि अचानक वो एक तरफ हुई आहट से बुरी तरह चौंका। मारे घबराहट के उसने एकदम से उस तरफ हाथ कर के गोली चला दी। गोली चलने की तेज़ आवाज़ से फिज़ा गूंज उठी और खुद जगन भी बुरी तरह खौफ़जदा हो गया। उधर गोली चलने पर आवाज़ तो हुई मगर उसके अलावा कोई प्रतिक्रिया ना हुई। ये देख वो और भी परेशान हो गया।
जगन अपनी समझ में बेहद चौकन्ना था जबकि असल में वो घबराहट की वजह से घूम घूम कर इधर उधर नज़रें दौड़ा रहा था। इतना तो वो समझ गया था कि वो साया यहीं कहीं है। उसे डर भी था कि कहीं वो उसे कोई नुकसान न पहुंचा दे किंतु फिर वो ये सोच कर खुद को तसल्ली दे लेता था कि उसके पास पिस्तौल है। अभी वो ये सोच ही रहा था कि तभी एक तरफ से गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंजी और इसके साथ ही उसके हलक से दर्द भरी चीख वातावरण में गूंज उठी। गोली उसकी कलाई में लगी थी जिससे उसके हाथ से पिस्तौल छूट कर कच्ची ज़मीन पर ही कहीं छिटक कर गिर गई थी। वो दर्द से बुरी तरह चिल्लाने लगा था।
"मादरचोद कौन है जिसने मुझे गोली मार दी?" वो दर्द में गुस्सा हो कर चिल्लाया___"सामने आ हरामजादे।"
"ये तो कमाल ही हो गया जगन काका।" जगन की आवाज़ सुन कर मैं बड़ा हैरान हुआ था। मेरी समझ में तो वो हवेली के बाहर वाले एक कमरे में क़ैद था। बहरहाल मैं एक पेड़ से बाहर निकल कर उसकी तरफ बढ़ते हुए बोला____"बल्कि कमाल ही नहीं, ये तो चमत्कार ही हो गया। तुम तो हवेली के एक कमरे में क़ैद थे न, फिर यहां कैसे टपक पड़े?"
मुझे एकदम से अपने सामने आ गया देख जगन की नानी ही नहीं बल्कि उसका पूरा का पूरा खानदान ही मर गया। वो अपनी कलाई को थामें दर्द से कराह रहा था। मैं एकदम से किसी जिन्न की तरह उसके सामने आ कर खड़ा हो गया।
"तुमने जवाब नहीं दिया काका?" मैंने क़रीब से उसकी आंखों में देखते हुए पूछा____"हवेली से बाहर कैसे निकले और यहां कैसे टपक पड़े?"
"व...व....वो मैं।" जगन बुरी तरह हकलाया, उससे आगे कुछ बोला ना गया।
"अभी तो बड़ा गला फाड़ कर गाली दे रहे थे तुम।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अब क्या हुआ?"
मेरी बात सुन कर जगन मुझसे नज़रें चुराने लगा। उसका जिस्म जूड़ी के मरीज़ की तरह कांपने लगा था। उधर उसकी कलाई में जहां पर गोली लगी थी वहां से खून बहते हुए नीचे ज़मीन पर गिरता जा रहा था।
"मादरचोद बोल वरना इस बार तेरी गांड़ में गोली मारूंगा।" उसे कुछ न बोलता देख मैं गुस्से से दहाड़ उठा____"हवेली के कमरे से बाहर कैसे निकला तू और यहां कैसे पहुंचा?"
"म...म...माफ़ कर दो छोटे ठाकुर।" जगन एकदम से मेरे पैरों में गिर पड़ा, फिर गिड़गिड़ाते हुए बोला___"बहुत बड़ी ग़लती हो गई मुझसे।"
"मैंने जो पूछा उसका जवाब दे बेटीचोद।" मैंने गुस्से में उसको एक लात मारी तो वो पीछे उलट गया। फिर किसी तरह वो सम्हल कर उठा और बोला____"मुझको सफ़ेदपोश ने हवेली के कमरे से बाहर निकाला है छोटे ठाकुर और यहां भी मैं उसके ही कहने पर आया हूं।"
"स..सफ़ेदपोश???" मैं जगन के मुख से ये सुन कर बुरी तरह चकरा गया, फिर बोला____"वो वहां कैसे पहुंचा? सब कुछ बता मुझे।"
"म..मुझे कुछ नहीं पता छोटे ठाकुर।" जगन ने कहा____"मैं तो उस कमरे में ही क़ैद था। अचानक ही दरवाज़ा खुला तो मैं ये देख कर घबरा गया कि हाथ में मशाल लिए सफ़ेदपोश कैसे आ गया? उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में मुझे कमरे से बाहर निकल कर अपने साथ चलने को कहा तो मैं चल पड़ा। आख़िर अपनी जान मुझे भी तो प्यारी थी छोटे ठाकुर। सुबह दादा ठाकुर मुझे मौत की सज़ा देने वाले थे। जब सफ़ेदपोश ने मुझे अपने साथ चलने को कहा तो मैं समझ गया कि वो मुझे बचाने आया है। बस, यही सोच कर मैं उसके साथ वहां से निकल आया।"
"तो यहां उसी ने भेजा है तुझे?" मैं अभी भी ये सोच कर हैरान था कि सफ़ेदपोश हवेली में इतने दरबानों की मौजूदगी में जगन को निकाल ले गया था, बोला____"तुझे कैसे पता कि मैं यहां मिलूंगा तुझे?"
"मुझे नहीं पता छोटे ठाकुर।" जगन ने कहा____"वो तो सफ़ेदपोश ने मुझसे कहा कि आप मुझे यहीं कहीं मिल सकते हैं।"
कहने के साथ ही जगन ने सारी बात मुझे बता दी। मैं ये जान कर चौंका कि सफ़ेदपोश ने जगन को मुझे जान से मारने के लिए भेजा था। मेरे लिए ये बड़े ही हैरत की बात थी कि सफ़ेदपोश को इतना कुछ कैसे पता रहता है? आख़िर है कौन ये सफ़ेदपोश? क्या दुश्मनी है इसकी हमसे?
"उस दिन तो तुझे बड़ा अपने किए पर पछतावा हो रह था।" मैंने गुस्से से बोला____"और अब फिर से वही कर्म करने चल पड़ा है जिसके लिए तू दादा ठाकुर से रहम की भीख मांग रहा था। पर शायद तेरा कसूर नहीं है जगन काका। असल में तेरी किस्मत में मेरे हाथों मरना ही लिखा था। तभी तो घूम फिर कर तू इस तरीके से मेरे सामने आ गया। तुझ जैसे इंसान को अब जीने का कोई हक़ नहीं है।"
"मुझे माफ़ कर दो छोटे ठाकुर।" जगन ने रोते हुए मेरे पैर पकड़ लिए, बोला____"सफ़ेदपोश ने मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया था। तुम कहो तो मैं उसे ही जान से मार दूं?"
"तेरे जैसे लतखोर जो बात बात पर नामर्दों की तरह पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगते हैं।" मैंने रिवॉल्वर को उसके माथे पर लगाते हुए कहा____"वो सफ़ेदपोश जैसे शातिर इंसान का क्या ही उखाड़ लेंगे। तूने निर्दोष मुरारी काका की हत्या कर के उसके परिवार को अनाथ कर दिया है इस लिए अब तू भी उन्हीं के पास जा। शायद वो ही तुझे माफ़ कर दें.....अलविदा।"
कहने के साथ ही मैंने ट्रिगर दबा दिया। फिज़ा में गोली चलने की आवाज़ गूंजी और साथ ही जगन की जीवन लीला समाप्त हो गई। उसकी लाश को वहीं छोड़ मैं पलटा और उस तरफ चल पड़ा जिधर मैंने रघुवीर को रखा था। कुछ ही पलों में मैं उस पेड़ के पीछे पहुंच गया मगर अगले ही पल मैं ये देख कर चौंका कि वहां से रघुवीर गायब है। मैंने तो उसे बेहोश कर दिया था, फिर वो होश में कैसे आया? मेरे ज़हन में बड़ी तेज़ी से ये सवाल तांडव सा करने लगा।
अंधेरे में मैं उसे खोजने लगा। रघुवीर का मिलना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। अगर वो हाथ से निकल गया तो बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता था वो। इधर उधर खोजते हुए मैं सोचने लगा कि आख़िर कहां गया होगा वो? क्या सच में उसे होश आ गया रहा होगा या कोई और ही ले गया उसे? किसी और का सोचते ही मैं एकदम से परेशान हो गया। तभी बादलों ने चांद को आज़ाद किया तो थोड़ी रोशनी फैली जिससे दूर मुझे एक साया नज़र आया। उसे देख मैं तेज़ी से उस तरफ दौड़ पड़ा। कुछ ही देर में मैं उसके क़रीब पहुंच गया।
रघुवीर को मैंने उसकी जांघ पर गोली मारी थी इस लिए वो लंगड़ा कर चल रहा था। दर्द की वजह से वो ज़्यादा तेज़ नहीं चल पा रहा था। पीछे से किसी के आने की आहट सुन वो बुरी तरह उछल पड़ा और लड़खड़ा कर वहीं गिर गया।
"आज तो चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिल रहे हैं भाई।" उसके सामने पहुंचते ही मैं बोला____"पहले जगन का हवेली के कमरे से बाहर आना ही नहीं बल्कि यहां मुझ तक पहुंच भी जाना और दूसरा तेरा होश में आ जाना। कमाल ही हो गया न? बहरहाल ये तो बता, तू इतना जल्दी होश में कैसे आया?"
"गोली चलने की आवाज़ से होश आया मुझे।" रघुवीर बोला____"जब मैंने देखा कि तुम जगन से बातें करने में व्यस्त हो तो मैं चुपके से खिसक गया।"
"बड़ा बेवफ़ा है यार तू।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अपने दुश्मन को अकेला ही छोड़ कर चला जा रहा था?"
रघुवीर मेरी बात सुन कर कुछ न बोला। बस कसमसा कर रह गया था। उसकी कसमसाहट पर मेरी मुस्कान और भी गहरी हो गई मगर फिर अचानक ही मुझे उसके किए गए कर्म याद आ गए जिसके चलते मेरे अंदर उसके प्रति गुस्सा उभर आया।
"आगे की कहानी सुनने के लिए ना तो अभी वक्त है और ना ही ये कोई माकूल जगह है।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"इस लिए तुझे एक बार फिर से बेहोशी की गहरी नींद में जाना होगा।"
इससे पहले कि रघुवीर मेरी बात सुन कर कुछ कर पाता मैंने बिजली की सी तेज़ी से रिवॉल्वर के दस्ते का वार उसकी कनपटी पर कर दिया। वातावरण में उसकी घुटी घुटी सी चीख गूंजी और इसके साथ ही वो बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया।
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"छ...छोटे कुंवर आप यहां??" भुवन ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो बाहर अंधेरे में मुझे देख कर चौंकते हुए बोल पड़ा था____"ऐसे हालात में आपको इस तरह कहीं नहीं घूमना चाहिए।"
"हां मुझे पता है।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"अच्छा ये बताओ कि तुम अपने घर क्यों नहीं गए? बाकी लोग तो थे ही यहां पर।"
"आपने ही तो कहा था कि मैं मुरारी के घर वालों की सुरक्षा व्यवस्था का ख़याल रखूं।" भुवन ने कहा____"आज कल जिस तरह के हालात हैं उससे मैं नावाकिफ नहीं हूं। यही सोच कर मैं पिछले कुछ दिनों से रात में भी यहीं रुकता हूं और एक दो बार मुरारी के घर का चक्कर भी लगा आता हूं।"
"ये सब तो ठीक है भुवन।" मैं भुवन के इस काम से और उसकी ईमानदारी से मन ही मन बेहद प्रभावित हुआ, बोला____"लेकिन तुम्हें ख़ुद का भी तो ख़याल रखना चाहिए। आख़िर हालात तो तुम्हारे लिए भी ठीक नहीं हैं। मेरे दुश्मनों को भी पता ही होगा कि तुम मेरे आदमी हो और मेरे कहने पर कुछ भी कर सकते हो। ऐसे में वो तुम्हारी जान के भी दुश्मन बन जाएंगे।"
"मैं किसी बात से नहीं डरता छोटे कुंवर।" भुवन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"ख़ास कर किसी होनी या अनहोनी से तो बिल्कुल भी नहीं। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि जीवन में जिसके साथ जो भी होना लिखा है उसे कोई चाह कर भी मिटा नहीं सकता। ख़ैर आप बताइए इस वक्त मेरे लिए क्या हुकुम है?"
"कोई ख़ास बात नहीं है।" मैंने कहा____"बस एक दुश्मन मेरे हाथ लगा है तो मैं चाहता हूं कि आज रात भर के लिए उसे यहां पर रख दूं। कल दिन में मैं उसे ले जाऊंगा यहां से।"
"जैसी आपकी इच्छा।" भुवन ने कहा____"वैसे कौन है वो?"
"रघुवीर सिंह।" मैंने कहा____"मुंशी चंद्रकांत का बेटा।"
"क...क्या???" भुवन उछल ही पड़ा, बोला____"तो क्या वो भी इस सब में शामिल है? हे भगवान! ये सब क्या हो रहा है?"
"ज़्यादा मत सोचो।" मैंने कहा____"उसको यहां पर बाकी लोगों की नज़रों से छुपा कर ही रखना है। मैं नहीं चाहता कि बेवजह कोई तमाशा हो जाए और बाकी लोग घबरा जाएं।"
मेरी बात सुन कर भुवन ने सिर हिलाया और फिर मेरे कहने पर उसने रघुवीर को उठा कर मेरे नए बन रहे मकान के उस हिस्से में ले जा कर बंद कर दिया जिसे बाकी लोगों से छुपा कर बनवाया था मैंने। उसके बाद मैं और भुवन बाहर आ गए।
"क्या अब आप हवेली जा रहे हैं?" भुवन ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैंने कहा____"हां, हवेली जाना ज़रूरी है। वैसे भी पिता जी और बाकी लोग बाहर गए हुए हैं तो ऐसे में मेरा हवेली में रहना ज़रूरी है।"
"पर मैं रात के इस वक्त आपको अकेले नहीं जाने दूंगा।" भुवन ने चिंतित भाव से कहा____"मैं भी आपके साथ चलूंगा।"
"अरे! तुम मेरी फ़िक्र मत करो यार।" मैंने कहा____"मुझे किसी से कोई ख़तरा नहीं है और अगर है भी तो कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"
"अगर बात दिन की होती तो कोई बात नहीं थी छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"मगर ये रात का वक्त है। आसमान में बादल छाए हुए हैं जिसकी वजह से अंधेरा भी है। ऐसे में दुश्मन कहीं भी घात लगाए बैठा हो सकता है। इस लिए मेरी बात मानिए इस वक्त अकेले मत जाइए।"
"यहां भी तुम्हारे लिए रहना ज़रूरी है।" मैंने कहा____"दुश्मन कहीं भी घात लगाए बैठा हो सकता है। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि रघुवीर के साथ कोई अनहोनी हो जाए। उससे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है।"
"उसकी आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए छोटे कुंवर।" भुवन ने पूरे आत्म विश्वास के साथ कहा____"उस तक कोई नहीं पहुंच पाएगा। मैं जानता हूं कि आपका हवेली में जाना ज़रूरी है इस लिए मैं आपको रोकूंगा नहीं किंतु अकेले जाने भी नहीं दूंगा। भगवान के लिए मेरी बात मान जाइए।"
"अच्छा ठीक है।" भुवन के ज़ोर देने पर आख़िर मुझे मानना ही पड़ा____"तुम भी चलो मेरे साथ किंतु किसी और को भी साथ ले लो वरना वापसी में तुम अकेले हो जाओगे। मैं भी तो नहीं चाहता कि तुम्हें कुछ हो जाए।"
भुवन मेरी बात मान गया। वो अंदर गया और एक आदमी को जगा कर ले आया। भुवन के कहने पर उस आदमी ने पानी से अपना चेहरा धोया ताकि उसका आलस और नींद दूर हो जाए। उसके बाद भुवन मोटर साईकिल ले कर चल पड़ा। उसने मोटर साइकिल को स्टार्ट नहीं किया था बल्कि उसे पैदल ही ठेलते हुए ले चला। मेरे पूछने पर उसने बताया कि ऐसा वो सावधानी के तौर पर कर रहा है। मुझे उसकी समझदारी पर बड़ा फक्र हुआ। क़रीब आधा किलो मीटर पैदल आने के बाद उसने मुझे मोटर साइकिल पर बैठाया और फिर मेरे पीछे एक दूसरा आदमी बैठा। उसके बाद भुवन ने मोटर साइकिल को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।
भुवन मेरा सबसे वफ़ादार आदमी था। वो मेरे लिए खुशी से अपनी जान दे सकता था। एक साल पहले मैंने उस पर एक उपकार किया था। उसकी बीवी बहुत ज़्यादा बीमार थी और वो उस वक्त शहर में उसका इलाज़ करवा रहा था। डॉक्टर के अनुसार उसकी बीवी को कोई ऐसी बीमारी थी जिसके लिए ज़्यादा रूपये लगने थे। भुवन के पास जो भी पैसा था वो पहले ही उसकी बीवी के इलाज़ में ख़र्च हो गया था। ये एक इत्तेफ़ाक ही था कि उसी समय मैं अपने दोस्त सुनील के साथ उस अस्पताल में गया हुआ था। भुवन की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो वो दौड़ते हुए मेरे पास आया और मुझसे अपनी बीवी के इलाज़ के लिए पैसे मांगने लगा। मैं भुवन को जानता था क्योंकि वो हमारी ही ज़मीनों पर काम किया करता था। वो जिस तरह से रो रो कर पैसे के लिए मुझसे मिन्नतें कर रहा था उसे देख मैंने फ़ौरन ही उसे नोटों की एक गड्डी थमा दी थी और कहा था कि अगर और पैसों की ज़रूरत पड़े तो वो बेझिझक मुझसे मांग ले। बस, इतना ही उपकार किया था मैंने उसके ऊपर और कमबख़्त उसी उपकार के लिए उसने ख़ुद को मेरा कर्ज़दार मान लिया था। बाद में मैंने उसको बोला भी था कि उसे ऐसा नहीं सोचना चाहिए पर वो नहीं माना और बोला कि अब से वो मेरे लिए कुछ भी करेगा।
कुछ ही देर में भुवन की मोटर साईकिल हवेली पहुंच गई। रास्ते में कहीं कोई परेशानी जैसी बात नहीं हुई थी। मैं जब नीचे उतर कर हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ जाने लगा तो भुवन जल्दी से मेरे पीछे आया और मुझे रुकने को बोला।
"एक बात कहना चाहता हूं आपसे।" भुवन ने भारी झिझक के साथ कहा____"मैं जानता हूं कि उसके लिए ये समय सही नहीं है फिर भी कहना चाहता हूं।"
"कोई बात नहीं भुवन।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा___"तुम बेझिझक कहो, क्या कहना चाहते हो?"
"मुझे लगता है कि मुरारी की बेटी अनुराधा के मन में आपके लिए प्रेम जैसी भावना है।" भुवन ने झिझकते हुए कहा___"मैं जानता हूं कि वो अभी नादान और नासमझ है और आपसे उसका कोई मेल भी नहीं है। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उसे किसी भ्रम में मत रखिएगा। उस मासूम को मैंने दिल से अपनी छोटी बहन मान लिया है। अगर उसे किसी तरह की दुख तकलीफ़ हुई तो मुझे भी होगी। इस लिए....।"
"फ़िक्र मत करो भुवन।" मैंने उसकी बात को काटते हुए कहा____"तुमसे कहीं ज़्यादा मुझे उसके दुख तकलीफ़ की फ़िक्र है। अगर नहीं होती तो तुम्हें उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी न देता।"
"आपका बहुत बहुत धन्यवाद छोटे कुंवर।" भुवन ने खुश हो कर कहा____"अच्छा अब मैं चलता हूं, नमस्कार।"
उसके जाने के बाद मैं भी आगे बढ़ चला। ज़हन में भुवन की ही बातें गूंज रहीं थी। ख़ैर, मुख्य द्वार पर मौजूद दरबानों ने मुझे देखते ही दरवाज़ा खोल दिया। मैं अंदर दाखिल हो कर जैसे ही बैठक के पास पहुंचा तो नाना जी और भैया के चाचा ससुर मुझे देखते ही खड़े हो गए।
"आ गया मेरा बच्चा।" नाना जी ने नम आंखों से देखते हुए मुझसे कहा____"बिना किसी को बताए कहां चले गए थे तुम? तुम्हें पता है हम सब यहां कितना घबरा गए थे?"
"चिंता मत कीजिए नाना जी।" मैंने कहा____"मैं ठीक हूं और जहां भी गया था कुछ न कुछ कर के ही आया हूं।"
"क...क्या मतलब??" नाना जी के साथ साथ बाकी लोग भी चौंके____"ऐसा क्या कर के आए हो तुम और तुम्हारे पिता जी लोग मिले क्या तुम्हें?"
उनके पूछने पर मैंने उन्हें आराम करने को कहा और इस बारे में कल बात करने का बोल कर अंदर चला गया। असल में मैं किसी को इस वक्त परेशान नहीं करना चाहता था। ये अलग बात है कि वो फिर भी परेशान ही नज़र आए थे। इधर मैं दो बातें सोचते हुए अंदर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। एक ये कि कल का दिन नरसिंहपुर के लिए कैसा होगा और दूसरी ये कि भुवन ने अनुराधा के संबंध में जो कुछ कहा था क्या वो सच था?
उनके पूछने पर मैंने उन्हें आराम करने को कहा और इस बारे में कल बात करने का बोल कर अंदर चला गया। असल में मैं किसी को इस वक्त परेशान नहीं करना चाहता था। ये अलग बात है कि वो फिर भी परेशान ही नज़र आए थे। इधर मैं दो बातें सोचते हुए अंदर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। एक ये कि कल का दिन नरसिंहपुर के लिए कैसा होगा और दूसरी ये कि भुवन ने अनुराधा के संबंध में जो कुछ कहा था क्या वो सच था?
अब आगे....
पता नहीं रात का वो कौन सा पहर था किंतु मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी। मैं अपने कमरे में बिस्तर पर विभोर के बगल से लेटा हुआ था। विभोर गहरी नींद में था। तभी गहन सन्नाटे में कहीं दूर से उठता शोर सुनाई दिया। मेरे कान एकदम से उस शोर को ध्यान से सुनने के लिए मानों खड़े हो गए। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो शोर असल में कुछ लोगों के रोने धोने का है। मुझे समझते देर न लगी कि पिता जी जिस काम से इतने लोगों के साथ गए थे वो काम कर आए हैं। ये उसी का नतीजा था कि इतने वक्त बाद ये रोने धोने का शोर ख़ामोश वातावरण में गूंजने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में कुछ सवाल उभर आए और उनके साथ ही कुछ ख़याल भी जिन्होंने मुझे थोड़ा विचलित सा कर दिया।
अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। रात के इस वक्त किसी दस्तक से मैं एकदम से सतर्क हो गया। बिस्तर से मैं बहुत ही सावधानी से उतरा और दबे पांव दरवाज़े के पास पहुंचा। कुंडी खोल कर जब मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर पिता जी को खड़े पाया।
"बैठक में आओ।" पिता जी ने सपाट लहजे में कहा____"कुछ बात करनी है तुमसे।"
"जी ठीक है।" मैंने कहा तो वो पलट कर चल दिए।
कुछ ही देर में मैं बैठक में पहुंच गया जहां पर बाकी सब लोग भी बैठे हुए थे। हवेली में जो लोग सो रहे थे वो जाग चुके थे, सिवाय अजीत और विभोर के।
"हमारी इजाज़त के बिना।" पिता जी ने सख़्त भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और बिना किसी को बताए आख़िर तुम हवेली से बाहर क्यों गए थे?"
"आप यहां थे नहीं इस लिए आपसे इजाज़त ले नहीं सका।" मैंने बेख़ौफ भाव से कहा____"और यहां किसी को बताता तो कोई मुझे बाहर जाने ही नहीं देता। अब क्योंकि मेरे लिए बाहर जाना ज़रूरी था इस लिए चला गया।"
"वैभव।" नाना जी ने नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"ये क्या तरीका है अपने पिता से बात करने का?"
"आप ही बताइए नाना जी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"कि ये सब बताने के लिए मुझे कौन सा तरीका अपनाना चाहिए था?"
"हमें तो ख़बर मिली थी कि तुम पहले से काफी बदल गए हो।" नाना जी ने उसी नाराज़गी से कहा____"लेकिन तुम तो अभी भी वैसे ही हो। ख़ैर क्या कह सकते हैं हम।"
"आख़िर कब तुम अपनी मनमानियां करना बंद करोगे?" पिता जी ने गुस्से से कहा____"क्या चाहते हो तुम? हम सबको ज़िंदा मार देना चाहते हो?"
"शांत हो जाइए ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"ये समय इन सब बातों का नहीं है।"
"अरे! कैसे नहीं है अर्जुन सिंह?" पिता जी ने कहा____"हम अपने दो जिगर के टुकड़ों को खो चुके हैं और ये जिस तरीके से यहां से बिना किसी को बताए चला गया था अगर इसे कुछ हो जाता तो? क्या फिर हम ज़िंदा रह पाते?"
"मैं समझता हूं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने पिता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"किंतु ये अच्छी बात है न कि वैभव के साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ। हम उम्मीद करते हैं कि अब से ये ऐसा नहीं करेगा।" कहने के साथ ही अर्जुन सिंह मुझसे मुखातिब हुए____"हम ठीक कह रहे हैं न वैभव बेटा?"
"जी चाचा जी।" मैंने सिर झुकाते हुए कहा____"और मैं माफ़ी चाहता हूं आप सबसे अपने बर्ताव के लिए। मैं जानता हूं कि मुझे इस तरह बाहर नहीं जाना चाहिए था किंतु उस वक्त मेरी भी मानसिक अवस्था ऐसी थी कि मुझे कुछ और सूझा ही नहीं। जब मुझे पता चला कि मेरे पिता जी रात के वक्त आप सबको ले कर चले गए हैं तो मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया था कि कहीं आप में से किसी के साथ कुछ हो न जाए। मैं अपने चाचा और बड़े भैया को खो चुका हूं चाचा जी, और अब मैं अपने पिता जी को नहीं खोना चाहता। मेरे अकेले चले जाने पर तो इन्होंने कह दिया कि मुझे कुछ हो जाता तो क्या होता लेकिन क्या आप में से किसी ने ये सोचा कि अगर मेरे पिता जी को कुछ हो जाता तो हम सबका क्या होता?"
मेरी ये बात सुन कर किसी के मुख से कोई अल्फाज़ न निकला। बात छोटे मुंह से भले ही निकली थी लेकिन थी बड़ी।
"आप सब तो मुझसे बड़े हैं।" मैंने सबको ख़ामोश देख कहा____"फिर भी किसी ने ये नहीं सोचा कि रात के वक्त इस तरह से हुजूम ले कर निकल पड़ना भला कौन सी समझदारी की बात थी? हमारा समय बहुत ख़राब चल रहा है चाचा जी। हमें नहीं पता कि हमारा कौन कौन दुश्मन है और कहां कहां से हम पर घात लगाए बैठा है? जगताप चाचा और बड़े भैया तो दिन के समय ढेर सारे आदमियों के साथ निकले थे इसके बावजूद दुश्मनों ने उन सबकी हत्या कर दी। जब दिन के समय वो लोग अपना बचाव नहीं कर पाए तो क्या रात के वक्त आप लोग अपना बचाव कर पाते?"
"पर हमारे साथ कुछ हुआ तो नहीं वैभव।" अर्जुन सिंह ने ये कहा तो मैंने कहा____"कुछ हुआ नहीं तो इसका एक ही मतलब है चाचा जी कि आप सबकी किस्मत अच्छी थी। हालाकि अमर मामा जी को गोली तो लग ही गई न। अगर वही गोली पिता जी के सीने में लग जाती तो क्या होता? समय जब ख़राब होता है तो कुछ भी अच्छा नहीं होता। मैं आपसे पूछता हूं कि अगर आप सब यही काफ़िला दिन में ले कर जाते तो क्या बिगड़ जाता? क्या हमारा दुश्मन रात में ही कहीं भाग जाता और आप लोग उसे पकड़ नहीं पाते?"
"शायद तुम सही कह रहे हो वैभव।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस ले कर कहा____"रात के वक्त हमारा यहां से जाना वाकई में सही फ़ैसला नहीं था। ख़ैर छोड़ो, जो हुआ सो हुआ। अच्छी बात यही हुई कि हमने अपने दुश्मन को नेस्तनाबूत कर दिया है।"
"क...क्या सच में??" मैं उनकी बात सुनते ही हैरानी से बोल पड़ा____"कौंन लोग थे वो?"
"और कौन हो सकते हैं?" अर्जुन सिंह ने कहा____"वही थे तुम्हारे गांव के साले वो साहूकार लोग। सबके सब मारे गए, बस दो ही लोग बच गए।"
"बहुत जल्द उनको भी मौत नसीब हो जाएगी अर्जुन सिंह।" पिता जी ने सहसा सर्द लहजे में कहा____"बच कर जाएंगे कहां?"
"जो लोग मुझे मारने के लिए चंदनपुर गए थे।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"उनमें से एक को पकड़ा था मैंने। उसने मुझे बताया था कि उन लोगों को मुझे जान से मारने के लिए साहूकार गौरी शंकर ने भेजा था।"
"और ये तुम अब बता रहे हो हमें?" पिता जी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इतने लापरवाह कैसे हो सकते हो तुम?"
"बताने का समय ही कहां मिला था पिता जी।" मैंने कहा____"मैं तो चंदनपुर से तब आया जब जगताप चाचा और बड़े भैया की दुश्मनों ने हत्या कर दी थी।"
"गौरी शंकर और वो हरि शंकर का बेटा रूपचंद्र बच गए हैं।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर कोई बात नहीं, जल्द ही उनका भी किस्सा ख़त्म हो जाएगा।"
"क्या उन दोनों को भी जान से मार देना सही होगा?" नाना जी ने कहा____"हमारा ख़याल है कि उन्हें कोई दूसरी सज़ा दे कर जीवित ही छोड़ देना चाहिए। वैसे भी उनके घर की बहू बेटियों को सहारा देने के लिए उनके घर में किसी न किसी मर्द का होना आवश्यक है।"
"उनके घर की बहू बेटियों को शायद पता चल गया है कि उनके घर के मर्द अब नहीं रहे।" मामा जी ने कहा____"ये रोने धोने का शोर शायद वहीं से आ रहा है?"
"हां हो सकता है।" अर्जुन सिंह ने कहा।
"वैसे मुझे भी कुछ ऐसा पता चला है।" मैंने कहा____"जिसकी आप लोग शायद कल्पना भी नहीं कर सकते।"
"क...क्या पता चला है तुम्हें?" पिता जी ने मेरी तरफ उत्सुकता से देखा।
"हमारे दुश्मनों की सूची में सिर्फ साहूकार लोग ही नहीं हैं पिता जी।" मैंने कहा____"बल्कि आपका मुंशी चंद्रकांत और उसका बेटा रघुवीर भी है।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के साथ साथ सभी के चेहरों पर आश्चर्य उभर आया।
"यही सच है पिता जी।" मैंने कहा____"मुंशी और उसका बेटा रघुवीर दोनों ही हमारे दुश्मन बने हुए हैं।"
"पर तुम्हें ये सब कैसे पता चला?" अर्जुन सिंह ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
"जब मैं यहां से आपके पीछे गया था।" मैंने कहा____"तो रास्ते में मुझे एक साया भागता हुआ अंधेरे में नज़र आया। मैंने उस पर रिवॉल्वर तान कर जब उसे रुकने को कहा तो उल्टा उसने मुझ पर ही गोली चला दी। वो तो अच्छा हुआ कि गोली मुझे नहीं लगी मगर फिर मैंने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया। आख़िर वो मेरी पकड़ में आ ही गया और तब मैंने जाना कि वो असल में मुंशी का बेटा रघुवीर है।"
"वो दोनो बाप बेटे।" अर्जुन सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"भला किस वजह से ऐसी दुश्मनी रखे हो सकते हैं?"
"बड़े दादा ठाकुर जी की वजह से।" मैंने कुछ सोचते हुए पिता जी की तरफ देखा____"शायद आप समझ गए होंगे पिता जी।"
"हैरत की बात है।" पिता जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"अगर वो दोनों हमारे स्वर्गीय पिता जी की वजह से हमसे दुश्मनी रखे हुए हैं तो उन्होंने अपनी दुश्मनी के चलते हमारे साथ कुछ भी बुरा करने के लिए इतना समय क्यों लिया? हमें आशंका तो थी लेकिन यकीन नहीं कर पा रहे थे। ऐसा इस लिए क्योंकि हमने कभी भी ऐसा महसूस नहीं किया कि चंद्रकांत के मन में हमारे प्रति कोई बैर भाव है।"
"कुछ लोग अपने अंदर के भावों को छुपाए रखने में बहुत ही कुशल होते हैं ठाकुर साहब।" मामा अवधराज जी ने कहा____"जब तक वो ख़ुद नहीं चाहते तब तक किसी को उनके अंदर की बातों का पता ही नहीं चल सकता।"
"हम्म सही कह रहे हैं आप।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ख़ैर रात काफी हो गई है। आप सभी को अब आराम से सो जाना चाहिए। इस बारे में बाकी बातें कल पंचायत में होंगी।"
पिता जी के कहने पर सभी ने सहमति में अपना अपना सिर हिलाया और फिर पिता जी के उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में बैठक कक्ष खाली हो गया। इधर मैं भी ऊपर अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेट गया।
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अगले दिन।
हवेली के विशाल मैदान में लोगों की अच्छी खासी भीड़ थी। वातावरण में लोगों का शोर गूंज रहा था।। भीड़ में साहूकारों के घरों की बहू बेटियां भी मौजूद थीं जो दुख में डूबी आंसू बहा रहीं थी। लगभग पूरा गांव ही हवेली के उस बड़े से मैदान में इकट्ठा हो गया था। एक तरफ ऊंचा मंच बना हुआ था जिसमें कई सारी कुर्सियां रखी हुई थीं और उन सबके बीच में एक बड़ी सी कुर्सी थी जिसमें दादा ठाकुर बैठे हुए थे। मंच में रखी बाकी कुर्सियों में नाना जी, मामा जी, भैया के साले, और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे। मंच के सामने लोगों की भीड़ थी और भीड़ के आगे साहूकारों के घरों की बहू बेटियां खड़ी हुई थीं। मंच के सामने ही एक तरफ मुंशी चंद्रकांत और उसका बेटा खड़ा हुआ था। दोनों ही बाप बेटों के सिर झुके हुए थे। उनके दूसरी तरफ मैं खड़ा हुआ था। सुरक्षा का ख़याल रखते हुए हर जगह कई संख्या में हमारे आदमी हाथों में बंदूक लिए खड़े थे और साथ ही पूरी तरह सतर्क भी थे।
भीड़ में ही आगे तरफ मुरारी और जगन के घरों से उनकी बीवियां और बच्चे थे। अपनी मां और छोटे भाई अनूप के साथ अनुराधा भी आई हुई थी जिनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भुवन के कंधों पर थी। वो ख़ुद भी उनके पास ही खड़ा था। ऐसे संवेदनशील वक्त में ना चाहते हुए भी मेरी नज़र अनुराधा की तरफ बारहा चली जाती थी और हर बार मैं ये देख कर विचलित सा हो जाता था कि उसकी नज़रें मुझ पर ही जमी होती थीं। मेरा ख़याल था कि वो पहली बार ही हवेली आई थी। बहरहाल, सरोज के बगल से जगन की बीवी गोमती और उसके सभी बच्चे खड़े हुए थे। गोमती और उसकी बेटियों की आंखों में आसूं थे।
वातावरण में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी। तभी हवेली के हाथी दरवाज़े से दो जीपें अंदर आईं और एक तरफ आ कर रुक गईं। उन दो जीपों से कुछ लोग नीचे उतरे और भीड़ को चीरते हुए मंच की तरफ आ गए। उन्हें देखते ही मंच पर अपनी कुर्सी में बैठे मेरे पिता जी उठ कर खड़े हो गए।
"नमस्कार ठाकुर साहब।" आए हुए एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा तो पिता जी ने भी जवाब में उनका अभिवादन किया। कुछ मुलाजिमों ने फ़ौरन ही पिता जी के इशारे पर कुछ और कुर्सियां ला कर मंच पर रख दी। मेरे पिता जी के आग्रह पर वो सब बैठ गए।
"पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है।" दादा ठाकुर ने अपनी कुर्सी से खड़े हो कर अपनी भारी आवाज़ में कहा____"और पिछली रात जो कुछ हुआ है उससे दूर दूर तक के गांव वालों को पता चल चुका है कि वो सब कुछ हमसे ताल्लुक रखता है। यूं तो आस पास के कई सारे गावों के मामलों के फ़ैसले हम ही करते आए हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है उसका फ़ैसला आज हम ख़ुद नहीं करेंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि हम नहीं चाहते कि कोई भी व्यक्ति हमारे फ़ैसले को ग़लत माने या उस पर अपनी ग़लत धारणा बना ले, या फिर ये समझ ले कि हमने अपनी ताक़त और पहुंच का नाजायज़ फ़ायदा उठाया है। इस लिए हमने सुंदरगढ़ से ठाकुर महेंद्र सिंह जी को यहां आमंत्रित किया है। हम यहां पर मौजूद हर ब्यक्ति से यही कहना चाहते हैं कि ठाकुर महेंद्र सिंह जी हर पक्ष के लोगों की बातें सुनेंगे और फिर उसके बारे में अपना निष्पक्ष फ़ैसला सुनाएंगे। हम लोगों के सामने ये वचन देते हैं कि अगर इस मामले में हम गुनहगार अथवा अपराधी क़रार दिए गए तो फ़ैसले के अनुसार जो भी सज़ा हमें दी जाएगी उसे हम तहे दिल से स्वीकार करेंगे। अब हम आप सभी से जानना चाहते हैं कि क्या आप सब हमारी इस सोच और बातों से सहमत हैं?"
दादा ठाकुर के ऐसा कहते ही विशाल मैदान में मौजूद जनसमूह ने एक साथ चिल्ला कर कहा कि हां हां हमें मंज़ूर है। जनसमूह में से ज़्यादातर ऐसी आवाज़ें भी सुनाई दीं जिनमें ये कहा गया कि दादा ठाकुर हमें आपकी सत्यता और निष्ठा पर पूरा भरोसा है इस लिए आप ख़ुद ही इस मामले का फ़ैसला कीजिए। ख़ैर दादा ठाकुर ने ऐसी आवाज़ों को सुन कर इतना ही कहा कि फिलहाल वो ख़ुद एक मुजरिम की श्रेणी में हैं इस लिए इस मामले में फ़ैसला करने का हक़ वो ख़ुद नहीं रखते।
इतना कह कर पिता जी ने ठाकुर महेन्द्र सिंह जी को अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया तो वो थोड़े संकोच के साथ आए और बैठ गए। उनके बैठने के बाद पिता जी मंच से नीचे उतर आए। ये देख कर लोग हाय तौबा करने लगे जिन्हें देख पिता जी ने सबको शांत रहने को कहा।
"इस मामले से जुड़े सभी लोग सामने आ जाएं।" पिता जी की कुर्सी पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"और एक एक कर के अपना पक्ष रखें।"
महेंद्र सिंह जी की बात सुन कर साहूकारों के घरों की औरतें थोड़ा आगे आ गईं। उनको देख जहां सरोज और गोमती भी आगे आ गईं वहीं मुंशी और उसका बेटा भी दो क़दम आगे आ गया।
"ठाकुर साहब।" मणि शंकर की बीवी फूलवती देवी ने दुखी भाव से कहा____"सबसे ज़्यादा बुरा हमारे साथ हुआ है। हमारे घर के मर्दों और बच्चों को रात के अंधेरे में गोलियों से भून दिया दादा ठाकुर ने। अब आप ही बताइए कि हमारा क्या होगा? हम सब तो विधवा हुईं ही हमारे साथ हमारी जो बहुएं थी वो भी विधवा हो गईं। इतना ही नहीं हमारी बेटियां अनाथ हो गईं। हम अकेली औरतें भला इस दुख से कैसे उबर सकेंगी और कैसे अपने साथ साथ अपनी अविवाहित बेटियों के जीवन का फ़ैसला कर पाएंगी?"
"ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"इस बारे में आप क्या कहना चाहते हैं? इतना ही नहीं, इनके घरों के मर्द और बच्चों की इस तरह से हुई हत्या के लिए क्या आप खुद को कसूरवार मानते हैं?"
"बेशक कसूरवार मानते हैं।" पिता जी ने बेबाक लहजे में सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन ये भी सच है कि वो सब अपनी मौत के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार थे। उन्हें अपने किए गए कर्मों का फल मिला है।"
"कैसे?" महेंद्र सिंह ने सवालिया भाव से उन्हें देखते हुए पूछा____"इस मामले में क्या आप सबको खुल कर तथा विस्तार से बताएंगे कि उन्हें उनके कौन से कर्मों का फल दिया है आपने?"
"उन्होंने हमारे छोटे भाई जगताप और हमारे बड़े बेटे अभिनव सिंह के साथ जाने कितने ही लोगों की हत्या की थी।" पिता जी ने कहा____"इतना ही नहीं उन्होंने हमारे छोटे बेटे वैभव को भी जान से मारने की कोशिश की थी जिसके लिए वो चंदनपुर तक पहुंच गए थे।"
"क्या आपके पास।" महेंद्र सिंह ने पूछा____"इन बातों को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण है?"
"बिल्कुल है।" पिता जी ने मुंशी चंद्रकांत और उसके बेटे रघुवीर की तरफ इशारा करते हुए कहा____"ये दोनों पिता पुत्र खुद हमारी बात का प्रमाण देंगे। ये दोनों खुद इस बात को साबित करेंगे। अगर ये कहा जाए तो बिल्कुल भी ग़लत न होगा कि ये दोनों खुद भी साहूकारों के साथ मिले हुए थे और गहरी साज़िश रच कर हमारे जिगर के टुकड़ों की हत्या की।"
पिता जी की इस बात को सुनते ही जहां भीड़ में खड़े लोगों में खुसुर फुसुर होने लगी वहीं फूलवती और उसके घरों की बाकी बहू बेटियां हैरत से उन्हें देखने लगीं थी।
"ठाकुर साहब ने जो कुछ कहा।" महेंद्र सिंह ने मुंशी की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो सच है? क्या आप दोनों क़बूल करते हैं कि आप दोनों साहूकारों से मिले हुए थे और उनके साथ मिल कर ही मझले ठाकुर जगताप सिंह और बड़े कुंवर अभिनव सिंह की हत्या की थी?"
"हां हां यही सच है ठाकुर साहब।" मुंशी हताश भाव से जैसे चीख ही पड़ा____"हम दोनों बाप बेटों ने साहूकारों के साथ मिल कर ही वो सब किया है लेकिन यकीन मानिए मुझे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। अगर मेरा बस चले तो मैं इस हवेली में रहने वाले हर व्यक्ति को जान से मार डालूं। ख़ास कर इस लड़के को जिसका नाम वैभव सिंह है?"
"हम तुम्हारा इशारा अच्छी तरह समझ रहे हैं चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"लेकिन तुम्हें भी ये अच्छी तरह पता है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। कसूर सिर्फ एक हाथ का नहीं होता।"
"कहना बहुत आसान होता है ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"और सुनने में भी बड़ा अच्छा लगता है लेकिन असल ज़िंदगी में जब किसी के साथ ऐसी कोई बात होती है तो यकीन मानिए बहुत तकलीफ़ होती है। धीरे धीरे वो तकलीफ़ ऐसी हो जाती है कि नासूर ही बन जाती है। एक पल के लिए भी वो इंसान को चैन से जीने नहीं देती।"
"चलो मान लिया हमने।" पिता जी ने कहा____"मान लिया हमने कि बेहद तकलीफ़ होती है लेकिन जिसने तुम्हें तकलीफ़ दी थी सज़ा भी सिर्फ उसी को देनी चाहिए थी ना। हमारे भाई जगताप और बेटे अभिनव का क्या कसूर था जिसके लिए तुमने साहूकारों के साथ मिल कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया?"
"आपने भी सुना ही होगा ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने कहा____"कि गेंहू के साथ हमेशा घुन भी पिस जाता है। मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की मौत घुन की तरह पिस जाने जैसी ही थी।"
"हम इस मामले से संबंधित सारी बातें विस्तार से जानना चाहते हैं।" महेंद्र सिंह जी ने ऊंची आवाज़ में मुंशी की तरफ देखते हुए कहा____"इस लिए सबके सामने थोड़ा ऊंची आवाज़ में बताओ कि जो कुछ भी आप दोनों पिता पुत्र ने किया है उसे कैसे और किस किस के सहयोग से अंजाम दिया है?"
"असल में ये रंजिश और ये दुश्मनी बहुत पुरानी है ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"बड़े दादा ठाकुर के समय की रंजिश है ये। उन्होंने जो कुछ किया था उसका बदला उनके ज़िंदा रहते कोई भी होता तो लेने का सोच ही नहीं सकता था। मैं भी नहीं सोच सका, बस अंदर ही अंदर घुटता रहा। कुछ सालों बाद वो अचानक से बीमार पड़ गए और फिर ऐसा बीमार पड़े कि शहर के बड़े से बड़े चिकित्सक भी उनका इलाज़ नहीं कर पाए। अंततः बीमारी के चलते उनकी मृत्यु हो गई। उनकी ऐसी मृत्यु हो जाने के बारे में कोई कुछ भी सोचे लेकिन मैं तो यही समझता आया हूं कि उन्हें अपने पाप कर्मों की ही सज़ा इस तरह से मिल गई थी। बहरहाल, जिनसे मैं बदला लेना चाहता था वो ईश्वर के घर पहुंच गया था। मैंने भी ये सोच कर खुद को समझा लिया था कि चलो कोई बात नहीं। उसके बाद ठाकुर प्रताप सिंह जी ने दादा ठाकुर की गद्दी सम्हाल ली। शुकर था कि ये अपने पिता के जैसे नहीं थे। मैं खुद भी इन्हें बचपन से जानता था। ख़ैर उसके बाद आगे चल कर इनके द्वारा कभी कुछ भी बुरा अथवा ग़लत नहीं हुआ तो मैंने सोचा काश! इस दुनिया का हर इंसान इनके जैसा ही हो जाए। कहने का मतलब ये कि जब इनके द्वारा किसी के साथ बुरा नहीं हुआ तो मैं भी सब कुछ भुला कर पूरी ईमानदारी से हवेली की सेवा में लग गया था। वक्त गुज़रता रहा, फिर एक दिन मुझे पता चला कि वर्षों पुराना किस्सा फिर से दोहराया जा रहा है और वो किस्सा पुराने वाले किस्से से भी कहीं ज़्यादा बढ़ चढ़ कर दोहराया जा रहा है। जिन ज़ख्मों को मैंने किसी तरह मरहम लगा कर दिल में ही कहीं दफ़न कर दिया था वो ज़ख्म गड़े हुए मुर्दे की मानिंद दिल की कब्र से निकल आए। पहले बड़े दादा ठाकुर थे इस लिए उनके ख़ौफ के चलते मैं कुछ न कर सका था लेकिन इस बार मैं ख़ुद ही किसी तरह से ख़ुद को समझाना नहीं चाहता था। सोच लिया कि अब चाहे जो हो जाए लेकिन उस इंसान का नामो निशान मिटा कर ही रहूंगा जिसने बड़े दादा ठाकुर का किस्सा दोहराने की हिमाकत ही नहीं की बल्कि पाप किया है।"
"गुस्से में इंसान बहुत कुछ सोच लेता है लेकिन जब दिमाग़ थोड़ा शांत होता है तो वैसा कर लेना आसान नहीं लगता।" सांस लेने के बाद मुंशी ने फिर से बोलना शुरू किया____"यही हाल हम दोनों बाप बेटे का था। वैभव सिंह दादा ठाकुर का बेटा था जोकि पूरा का पूरा अपने दादा पर गया था। वही ग़ुस्सा, वही अंदाज़ और वही हवसीपन। छोटी सी उमर में ही दूर दूर तक उसके नाम का डंका ही नहीं बज रहा था बल्कि उसका ख़ौफ भी फैल रहा था। मैंने गुप्त रूप से पता किया तो पाया कि इसकी पहुंच भी कम नहीं है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसके इशारे पर कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं। हम दोनों चिंता में पड़ गए कि आख़िर अब करें तो करें क्या? अचानक ही मुझे साहूकारों का ख़याल आया और बस मैंने उनसे मिल जाने का मन बना लिया।"
"उनसे कैसे मिल गए तुम?" पिता जी ने पूछा____"क्या तुम्हें पहले से पता था कि वो हमारे खिलाफ़ ग़लत करने का इरादा रखते हैं?"
"बिल्कुल पता था ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"सच तो ये है कि वो बहुत पहले से मुझे अपनी तरफ मिलाने की पहल कर रहे थे। वो तो मैं ही उनकी बात नहीं मान रहा था क्योंकि मैं आपसे गद्दारी करने का ख़याल भी ज़हन में नहीं लाता था। यही वजह थी कि साहूकारों से मेरी हमेशा अनबन ही रहती थी मगर मैं ये कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक दिन मुझे उन्हीं साहूकारों से मदद लेनी पड़ जाएगी। बहरहाल, ये तो जग ज़ाहिर बात है कि इंसान किसी के सामने तभी झुकता है जब या तो वो झुकने के लिए मजबूर हो या फिर उसे उसकी कोई ज़रूरत हो। मैं भी खुशी से झुक गया लेकिन इसके लिए पहल मैं ख़ुद नहीं करना चाहता था। असल में मैं चाहता था कि हमेशा की तरह साहूकार एक बार फिर से मेरे पास अपना इरादा ले कर आएं। मैं नहीं चाहता था कि वो ये समझने लगें कि मैं उनके बिना कुछ कर ही नहीं सकता। ख़ैर, काफी लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ा मुझे। एक दिन मणि शंकर से अचानक ही मुलाक़ात हो गई। पहले तो हमेशा की तरह औपचारिक बातें ही हुईं। उसके बाद उसने फिर से अपना इरादा मेरे सामने ज़ाहिर कर दिया और साथ ही प्रलोभन भी दिया कि इस सबके बाद वो और मैं मिल कर एक नए युग की शुरुआत करेंगे। थोड़ी ना नुकुर के बाद आख़िर मैं मान ही गया।"
"साहूकार लोग तुमसे क्या चाहते थे?" चंद्रकांत सांस लेने के लिए रुका तो पिता जी ने पूछा।
"सबसे पहले तो यही कि आपके और उनके बीच के संबंध बेहतर हो जाएं और दोनों परिवार पूरी सहजता के साथ एक दूसरे के यहां आने जाने लगें।" चंद्रकांत ने कहा____"संबंध सुधार लेने का एक कारण ये भी था कि मणि शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के लिए आपकी भतीजी कुसुम का हाथ मांगना चाहता था। उसने मुझे बताया था कि कुसुम के साथ रूपचंद्र का ब्याह कर के वो इससे बहुत कुछ लाभ लेना चाहता था।"
"किस तरह का लाभ?" पिता जी पूछे बगैर न रह सके।
"इस मामले में ठीक से कुछ नहीं बताया था उसने।" चंद्रकांत ने कहा____"दूसरी वजह थी आपके दोनों बेटों को बदनाम कर देना। ज़ाहिर है इसके लिए वो कोई भी हथकंडा अपना सकता था। तीसरी वजह थी ज़मीनों के कागज़ात जोकि मेरे द्वारा चाहता था वो।"
"ज़मीनों के कागज़ात क्यों चाहिए थे उसे?" पिता जी के चेहरे पर हैरानी उभर आई थी।
"ज़ाहिर है आपकी ज़मीनों को हथिया लेना चाहते थे वो।" मुंशी ने कहा____"हालाकि ये इतना आसान नहीं था लेकिन उसके अपने तरीके थे शायद। वैसे भी उसका असल मकसद तो यही था आपके पूरे खानदान को मिटाना। जब आपके खानदान में कोई बचता ही नहीं तो लावारिश ज़मीन को कब्ज़ा लेने में ज़्यादा समस्या नहीं हो सकती थी।"
"ख़ैर।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"उसके बाद तुम दोनों ने मिल कर क्या क्या किया?"
"उसका और मेरा क्योंकि एक ही मकसद था इस लिए मैंने उसे ये बताया ही नहीं कि असल में मेरी आपसे या आपके परिवार के किसी सदस्य से क्या दुश्मनी है?" मुंशी ने कहा____"सिर्फ़ इतना ही कहा कि बदले में ज़मीन का कुछ हिस्सा मुझे भी मिलना चाहिए।"
"ख़ैर।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"उसके बाद तुम दोनों ने मिल कर क्या क्या किया?"
"उसका और मेरा क्योंकि एक ही मकसद था इस लिए मैंने उसे ये बताया ही नहीं कि असल में मेरी आपसे या आपके परिवार के किसी सदस्य से क्या दुश्मनी है?" मुंशी ने कहा____"सिर्फ़ इतना ही कहा कि बदले में ज़मीन का कुछ हिस्सा मुझे भी मिलना चाहिए।"
अब आगे....
रूपा अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी आंसू बहा रही थी। उसे इस बात का बेहद दुख था कि उसके पिता के साथ साथ उसके ताऊ चाचा और भाईयों की हत्या कर दी गई किंतु वो ये भी जानती थी कि इसके लिए वो खुद ही ज़िम्मेदार थे। कहते हैं कि अपने लाख बुरे हों लेकिन होते तो वो अपने ही हैं। खून के रिश्तों से जुड़ाव अलग ही होता है और जब अपनों की इस तरह से हत्याएं हो जाएं तो कलेजा हाहाकार कर उठता है।
अब तक रूपा जाने कैसे कैसे विचारों के मंथन से गुज़र चुकी थी। एक तरफ वो ये भी सोच रही थी कि उसके ये वही अपने थे जिन्होंने वैभव के चाचा और भाई की हत्या की थी। उसे बखूबी एहसास था कि जब किसी के अपनों के साथ ऐसा होता है तो कैसा महसूस होता है।
रूपा के घर की सभी औरतें और सभी बहू बेटियां आज हवेली में होने वाली पंचायत में गई हुईं थी किंतु उसे कोई अपने साथ नहीं ले गया था। बल्कि बड़ी ही सख़्ती के साथ उसको उसके ही कमरे में क़ैद कर दिया गया था। उसकी देख रेख के लिए सिर्फ उसकी भाभी कुमुद ही घर पर थी। यूं तो कुमुद उसकी भाभी से कहीं ज़्यादा उसकी सहेली जैसी थी किंतु अब वो भी उसके खिलाफ़ हो गई थी। सुबह से लाखों बार उसने उसे पुकारा था किंतु कुमुद ने उसकी तरफ देखा तक नहीं था। रूपा ये बात समझ गई थी कि उसकी मां और ताई चाची वगैरह उसे अपने साथ हवेली की पंचायत में क्यों नहीं ले गईं। शायद कुमुद ने उन्हें सारी बात बता दी थी और अब वो ये समझती थीं कि रूपा अपने परिवार के खिलाफ़ जा सकती है। आख़िर वो दादा ठाकुर के लड़के वैभव सिंह से बेहद प्रेम जो करती है। प्रेम में पड़ा व्यक्ति अपने परिवार से कहीं ज़्यादा अपने प्रेम और प्रेमी को ही अहमियत देता है। ज़रूरत पड़ने पर वो अपने ही परिवार से बगावत कर बैठता है। शायद यही सब सोच कर उसे उसके ही कमरे में बंद कर दिया गया था।
जैसे जैसे समय गुज़र रहा था रूपा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और साथ ही एक भय उसके अंदर घर करता जा रहा था। उसने अपनी भाभी कुमुद को आवाज़ें लगा कर दरवाज़ा खोल देने की बहुत मिन्नतें की मगर कुमुद ने दरवाज़ा खोलना तो दूर जवाब में एक लफ्ज़ भी अपने मुंह से नहीं निकाला था। रूपा को ये सोच कर रोना आ जाता था कि उसकी सहेली इतनी कठोर कैसे हो सकती है?
रूपा अचानक ही अपने बिस्तर से उठी। उसके चेहरे पर किसी दृढ़ निश्चय जैसे भाव नुमायां होते नज़र आए। उसने कमरे में चारो तरफ निगाहें दौड़ाना शुरू कर दिया। एकाएक ही उसकी नज़र खिड़की पर जा कर ठहर गई। वो एक झटके में बिस्तर से उठी और खिड़की के पास जा पहुंची। उसने खिड़की को खोल कर बाहर की तरफ झांक कर देखा। ये वही खिड़की थी जहां से एक समय वैभव उससे मिलने उसके कमरे में आया करता था। रूपा ने झांक कर देखा नीचे की ज़मीन क़रीब आठ दस फीट नीचे थी। उसके जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई। वो एकदम से पलटी और बिस्तर में पड़े कपड़ों को समेटने लगी। कुछ ही देर में उसने कपड़ों को जोड़ जोड़ कर एक रस्सी बना ली। उस रस्सी को ले कर वो खिड़की के पास आई। कपड़े की रस्सी के एक सिरे को उसने खिड़की के बीचो बीच लगे लकड़ी के मोटे डंडे पर बांधा और दूसरे सिरे के साथ साथ बाकी सारी रस्सी को उस पार उछाल दिया। रस्सी लहराते हुए जल्दी ही नीचे की ज़मीन तक पहुंच गई।
रूपा एक बार फिर से पलट कर अपने बिस्तर के पास आई और बिस्तर के सिरहाने के पास पड़े अपने दुपट्टे को उठा कर उसे अपने सीने पर डाल लिया। उसके बाद वो तेज़ी से खिड़की के पास आ गई। खिड़की के उस पार रस्सी के सहारे झूल जाने के ख़याल ने एकदम से उसके जिस्म में सर्द लहर पैदा कर दी। उसने आंख बंद कर के गहरी गहरी सांसें ली और साथ ही मन ही मन खुद को तैयार करने लगी।
रूपा आंखें खोल कर आगे बढ़ी और खिड़की के बीच लगे लकड़ी के मोटे डंडे को पकड़ते हुए उस पार जाने का प्रयास करने लगी। ये निश्चित था कि उसकी ज़रा सी चूक उसे सीधा नीचे ला कर पटक सकती थी जिसके चलते उसके साथ कुछ भी हो सकता था। रूपा को अंदर से भय और घबराहट तो बहुत हो रही थी किंतु उसने ठान लिया था कि वो यहां से निकल कर हवेली ज़रूर जाएगी।
रूपा ने खिड़की के उस पार आने के बाद कपड़े की रस्सी को मजबूती से थाम लिया और फिर धीरे धीरे झूल गई। जैसे ही वो झूली तो कपड़े की रस्सी उसके हाथ से फिसलने लगी जिससे उसकी जान हलक में आ कर फंस गई। मारे डर के उसकी चीख निकलते निकलते रह गई। अपनी पकड़ को जल्दी ही उसने मजबूत बनाया ताकि कपड़े की रस्सी उसकी मुट्ठियों से फिसले न। रस्सी को पकड़े झूले रहना उसके लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा था। उसकी लाख कोशिश के बाद भी उसकी मुट्ठी से रस्सी थोड़ा थोड़ा कर के फिसलती ही जा रही थी। दूसरी तरफ अपने वजन को थामे रखना भी अब उसे भारी लगने लगा था। दीवार पर कभी उसके पैर टकरा जाते तो कभी उसके जिस्म का कोई दूसरा हिस्सा। आख़िर बड़ी मेहनत के बाद वो किसी तरह नीचे पहुंच ही गई। नीचे कच्ची ज़मीन पर आ कर उसने राहत की सांस ली। उसके बाद उसने पहले चारो तरफ निगाह घुमाई और फिर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ती चली गई।
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"वाह! बहुत खूब।" मुंशी चंद्रकांत की बात सुनते ही पिता जी बोल उठे____"ख़ैर हमारे भाई जगताप और बेटे अभिनव की हत्या कैसे की तुम लोगों ने जबकि वो दोनों अपने साथ काफी सारे आदमी ले कर गए थे? हमें पूरा यकीन है कि उन लोगों पर तुमने अचानक से तो हमला नहीं कर दिया होगा बल्कि यकीनन पहले से ही रणनीति बना कर उनके आने की ताक में रहे होगे।"
"चंदनपुर में मिली नाकामी के बाद।" चंद्रकांत ने कहा____"हम लोग अपने आदमियों पर ही नहीं बल्कि खुद पर भी बेहद गुस्सा थे। मेरा बेटा रघुवीर तो खुद ही चंदनपुर जा कर वैभव की हत्या करना चाहता था लेकिन मणि शंकर ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया था। शायद वो नहीं चाहता था कि हम में से किसी की ज़रा सी भी चूक अथवा लापरवाही के चलते हमारा भेद आप सबके सामने खुल जाए। यही वजह थी कि वैभव की हत्या करने के लिए हमने अपने ऐसे चुनिंदा आदमियों को चंदनपुर भेजा था जो ऐसे कामों को अंजाम देने में सक्षम थे। जब हमारे आदमी चंदनपुर में वैभव की हत्या करने में नाकाम हो गए तो हमें बड़ी निराशा हुई और साथ ही हम ये सोच कर हैरान भी हुए कि चंदनपुर में वैभव की सुरक्षा के लिए अचानक से इतने सारे लोग कहां से और कैसे आ गए थे? बाद में हमने सोचा कि वैभव की सुरक्षा के लिए इतने सारे लोग तभी वहां पहुंच सकते थे जब उन्हें पहले से ही पता हो कि वैभव के साथ ऐसा कुछ होने वाला है। हमारे लिए ये बड़ी हैरानी की बात बन गई थी कि ये बात उन्हें कैसे पता चल गई होगी जबकि वैभव की हत्या करने की योजना हमने अपने सामने बेहद ही गुप्त तरीके से बनाई थी।"
"ये शेर तो तुमने भी सुना ही होगा कि मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।" पिता जी ने अजीब भाव से कुछ सोचते हुए कहा____"कहने का मतलब ये कि जिस समय तुम लोगों ने ये योजना बनाई थी उसके कुछ ही समय बाद हमें इस बात की ख़बर मिल गई थी। रात के वक्त हमसे मिलने दो औरतें हवेली आईं थी और उन्होंने ही हमें इस मामले में ये बताया था कि कुछ लोग अगली सुबह हमारे बेटे वैभव की हत्या करने के लिए चंदनपुर जाने वाले हैं। वैसे बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे ज़हन में उन औरतों के संबंध में ये ख़याल उसी समय क्यों नहीं आया था?"
"क...कौन सी औरतें हैं??" मुंशी चंद्रकांत हैरत से पिता जी की तरफ देखते हुए पूछ बैठा था।
"हमने उन्हें वचन दिया था कि उनके बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताएंगे।" पिता जी ने कहा____"बस इतना समझ लो कि वैभव का जीवन उन्हीं की बदौलत बच सका है और उन्हें हवेली में रहने वालों के भले का ख़याल था।"
पिता जी की बातें सुन कर मैं खुद भी बड़ा हैरान हुआ और साथ ही सोचने लगा कि मेरी सलामती की चाह रखने वाली वो दोनों औरतें कौन रही होंगी? बहुत सोचा मगर ऐसी किसी औरत का ख़याल मेरे ज़हन में न आ सका।
"चंद्रकांत जी।" सहसा फिज़ा में ठाकुर महेन्द्र सिंह की भारी आवाज़ गूंजी____"आप सबको ये बताइए कि ठाकुर जगताप सिंह और कुंवर अभिनव सिंह के साथ साथ उनके साथ मौजूद उनके उतने सारे आदमियों की हत्या कैसे की आप लोगो ने?"
"हम तो असल में अभिनव की हत्या करने का ही सोचे हुए थे।" चंद्रकांत ने कहा____"हमारी योजना थी कि एक तरफ चंदनपुर में वैभव का किस्सा ख़त्म करेंगे और यहां पर इसके बड़े भाई का। मझले ठाकुर की हत्या करने की कोई योजना नहीं थी बल्कि उनका नंबर तो बाद में आना था। ख़ैर जब हमारे मुखबिर ने हमें बताया कि अभिनव अपने चाचा तथा कई सारे आदमियों के साथ हवेली से निकल पड़ा है तो हम लोग अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार हो गए। हमने अंदाज़ा लगाया था कि हो न हो मझले ठाकुर अपने भतीजे तथा कई सारे आदमियों के साथ चंदनपुर ही जा रहे होंगे। इस लिए हम भी उनके पीछे लग जाना चाहते थे और फिर मौका देख कर रास्ते में ही उनका किस्सा ख़त्म कर देना चाहते थे।"
"कई बार की नाकामियों के बाद इस बार हम हर हाल में अपने मकसद में पूरी तरह से सफल होना चाहते थे।" चंद्रकांत ने दो पल रुकने के बाद कहा____"इस लिए हमने भी बहुत से आदमियों को इकट्ठा किया और फिर उनके पीछे लग गए। जल्दी ही हमारा काफ़िला मझले ठाकुर के क़रीब पहुंच गया। हमें अपने पीछे आते देख वो दोनों चाचा भतीजे बड़ा हैरान हुए और साथ ही सतर्क भी हो गए थे। इधर हमने पहले ही योजना बना ली थी कि सब कुछ कैसे करना है। जब हम सब मझले ठाकुर के काफ़िले के कुछ पास पहुंच गए तो हमने उन्हें आवाज़ दे कर ये बताया कि हम सब भी उनकी मदद करने के लिए चंदनपुर जाना चाहते हैं। हमारी बातें सुन कर मझले ठाकुर और बड़े कुंवर पहले तो बड़ा हैरान हुए फिर खुश दिखाई देने लगे। उसके बाद वो पूरी तरह से बेफ़िक्र हो कर हमारे आगे आगे चलने लगे। हम समझ गए कि उन्होंने हम पर भरोसा कर लिया है, तभी तो इतनी बेफ़िक्री से चल पड़े हैं।"
"योजना के अनुसार हमें यहीं पर अब आगे का काम करना था।" मुंशी के चुप होते ही रघुवीर ने कहा____"हमने पहले ही सबको सब कुछ समझा दिया था इस लिए गौरी शंकर का इशारा मिलते ही हम सबने एक साथ अपनी अपनी बंदूकों का मुंह खोल दिया। मझले ठाकुर या अभिनव को हमसे इस तरह अचानक हमला कर देने की ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी इस लिए जब तक वो सम्हल पाते तब तक देर हो चुकी थी। हमने अपने आदमियों को उनके आदमियों को ढेर करने का काम दे दिया था और इधर मैं बापू और गौरी शंकर ने मझले ठाकुर और अभिनव को ख़त्म करने का काम ले रखा था। सबने बचने की बहुत कोशिश की और जवाब में गोलियां भी चलाई मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंततः मझले ठाकुर अपने भतीजे अभिनव के साथ हमारे द्वारा मारे ही गए। इधर एक दो आदमी हमारे भी मरे मगर उसका हमें कोई अफ़सोस नहीं था। बल्कि इस बात की खुशी थी कि हम अपने दुश्मन को मार डालने में आख़िर कामयाब हो गए। उसके बाद हम जल्दी ही वहां से निकल लिए। हमें डर था कि गोलियां चलने की आवाज़ों को सुन कर आस पास के गांव के लोग हमारी तरफ न आ जाएं। इस लिए हमने अपने मारे गए आदमियों को लिया और फिर वहां से निकल गए।"
"हम सब जानते थे कि जब इस हत्याकांड की ख़बर आपके पास पहुंचेगी।" रघुवीर सांस लेने के लिए रुका तो चंद्रकांत ने बात आगे बढ़ाई____"तो हर तरफ तहलका मच जाएगा। गौरी शंकर और मणि शंकर का कहना था कि इस हत्याकांड का आरोप उन पर ही लगाया जाएगा। इतना ही नहीं बल्कि दूर दूर तक के लोग भी यही मानेंगे कि उन्होंने ही चाचा भतीजे की हत्या की है। ऐसे में पूरी तरह संभव था कि आपका क्रोध और आक्रोश दोनों ही उनके लिए घातक हो जाएगा इस लिए उन्होंने फ़ैसला किया कि वो अपने सभी भाइयों और बच्चों को ले कर कहीं छुप जाएंगे। जब मामला थोड़ा ठंडा हो जाएगा तब वो आपके सामने आ कर अपनी बेगुनाही की सफ़ाई दे देंगे।"
"बहुत खूब।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हम ये मान भी लेते कि उन्होंने हमारे जिगर के टुकड़ों की हत्या नहीं की है बल्कि वो तो गंगा जल की तरह निर्दोष और पाक हैं, है ना?"
दादा ठाकुर के इस तरह कहने पर चंद्रकांत कुछ न बोला। विशाल मैदान में लोगों की इतनी भीड़ के बाद भी सन्नाटा सा छा गया था। ये अलग बात है कि अगले कुछ ही पलों में लोग आपस में खुसुर फुसुर करने लगे थे।
"ये सब झूठ है।" मणि शंकर की पत्नी फूलवती एकदम से चिल्ला उठी____"ना मेरे पति ने कुछ किया है और ना ही मेरे देवरों ने। सब कुछ इन दोनों बाप बेटों का ही किया धरा है। पकड़े गए तो अब ये हमारे घर के मर्दों पर ही आरोप लगा रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ है ही नहीं। ये सच है कि हमारे घर के मर्द और बच्चे हवेली में रहने वालों से ईर्ष्या और बैर रखते थे लेकिन फिर उन्हें भी लगने लगा था कि उनका इस तरह से ईर्ष्या या बैर रखना ठीक नहीं है। हमारे साथ तो बड़े दादा ठाकुर ने बुरा किया था, लेकिन वो तो अब रहे नहीं। उनके बाद भी अगर हवेली में रहने वाला कोई हमारे साथ बुरा करता तो हमारा ईर्ष्या या बैर रखना जायज़ है। यही सब सोच कर हमने दादा ठाकुर से अपने रिश्तों को सुधार लिया था और अपने अंदर से हर तरह का बैर भाव निकाल दिया था। आपका ये मुंशी हमारे घर के मर्दों और बच्चों पर झूठा आरोप लगा रहा है दादा ठाकुर, हमारा यकीन कीजिए।"
"मैं किसी पर झूठा आरोप नहीं लगा रहा हूं ठाकुर साहब।" मुंशी ने मंच में सिंहासन पर बैठे महेंद्र सिंह की तरफ देखते हुए कहा____"बल्कि मेरा कहा गया एक एक शब्द सच है। आप खुद सोचिए कि अगर इनके घर के मर्द और बच्चे इतने ही पाक साफ थे तो अपनी अपनी जान बचाए रखने के लिए छुपते क्यों फिर रहे थे? अगर सच में उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था तो वो सब दादा ठाकुर के सामने आने की बजाय रातों रात कहीं भाग क्यों गए थे? ये कहती हैं कि उन्होंने दादा ठाकुर से अपने रिश्ते सुधार लिए थे तो आप ही बताइए कि ये किस तरह का रिश्तों में सुधार किया था उन्होंने कि मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की हत्या की बात सुन कर भी दादा ठाकुर का दुख बाटने उनके पास नहीं आए? सच तो यही है ठाकुर साहब कि वो भी उतने ही अपराधी हैं जितना कि मैं और मेरा बेटा। मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुझे अपने किए का कोई अफ़सोस नहीं है। अतः आप मुझे और मेरे बेटे को जो भी सज़ा देंगे वो मुझे मंज़ूर होगा मगर दूसरी तरफ उन्हें निर्दोष मान कर छोड़ देना मेरे साथ नाइंसाफी होगी।"
"फ़िक्र मत करो।" महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"हर अपराधी को उसके किए की सज़ा मिलेगी किंतु हमारा ख़याल ये है कि साहूकारों को भी यहां मौजूद होना चाहिए। उनकी मौजूदगी में उनसे ही पूछा जाएगा कि उनका इस मामले में कोई हाथ है अथवा नहीं। इस लिए इस पंचायत के पंच होने के नाते हम ये आदेश देते हैं कि साहूकारों में जो जीवित बचे हैं उन्हें जल्द से जल्द खोज कर यहां पर हाज़िर किया जाए।"
"साहूकारों में से अब दो ही लोग बचे हैं ठाकुर साहब।" दादा ठाकुर ने कहा____"गौरी शंकर और हरि शंकर का बेटा रूपचंद्र। हमारे आदमी उन दोनों को खोजने में लगे हुए हैं। जल्दी ही वो यहां नज़र आएंगे।"
"हमने तो आपको देवता समझा था दादा ठाकुर।" फूलवती ने दुखी हो कर कहा____"मगर आपने पिछली रात जो किया उससे आपने साबित कर दिया है कि आप में और आपके पिता बड़े दादा ठाकुर में कोई अंतर नहीं है। वो भी जल्लाद थे और आप भी जल्लाद बन गए। अपने अहंकार और गुस्से के चलते आप इतने अंधे हो गए कि आपने हमारे घर की औरतों के सुहाग ही नष्ट कर दिए। एक झटके में हमें अनाथ और असहाय बना दिया। इसकी भयंकर बद्दुआ लगेगी आपको।"
"हमें बद्दुआ मंज़ूर है भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"मगर ये भी सच है कि उन सबको उनके किए गए कर्मों की ही सज़ा दी है हमने। उनकी हत्या होने पर अब आप ऐसे आरोप लगा कर हमें ऐसी बातें कह रहीं हैं जबकि आपकी तरह हम भी यही कह सकते हैं कि आपके पति और देवरों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या कर के कौन सा महान काम कर दिया था? एक मां बाप से उनका बेटा छीन लिया, एक पत्नी से उसका पति छीन लिया। बच्चों से उसका पिता छीन लिया। क्या आपको ये एहसास नहीं है कि हमारी तरह जल्लाद तो वो भी थे? हम पूछते हैं कि आख़िर हमारे भाई और बेटे ने किसी के साथ क्या बुरा कर दिया था जिसके लिए उन दोनों की इस तरह से हत्या कर दी आपके घर वालों ने? बदले में अगर हमने भी वही कर दिया तो अब आप हमें बद्दुआ लगने की बात कह रही हैं?"
"हमें आपके भाई और बेटे की हत्या हो जाने का दुख है दादा ठाकुर।" फूलवती ने कहा____"मगर हम ये नहीं मान सकते कि उनकी हत्या हमारे घर के मर्दों ने आपके मुंशी के साथ मिल कर की है। ये हमारे घर वालों पर झूठा आरोप लगा रहे हैं।"
"आप उमर में मेरी मां से बड़ी हैं।" सहसा मैंने फूलवती के क़रीब जाते हुए कहा____"इस लिए आपको बड़ी मां कह सकता हूं। यकीन मनाइए मेरे दिल में आप में से किसी के लिए भी कोई ग़लत भावना अथवा बैर भाव नहीं है। मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि दुनिया में हर किसी को अपने बच्चे और अपने घर वाले दूसरों से कहीं ज़्यादा अच्छे और पाक साफ लगते हैं। आप कहती हैं कि आपके घर के मर्दों ने कुछ नहीं किया है जबकि मैं कहता हूं कि इसका सबूत मैं इसी वक्त आपको दे सकता हूं।"
मेरी बात सुनते ही फूलवती की आंखें फैल गईं और सिर्फ उसी की ही क्यों बल्कि बाकी सबकी भी। इधर फूलवती और उसके घर की बाकी बहू बेटियां मुझे इस तरह देखने लगीं थी जैसे मेरे सिर पर अचानक से ही सींग उग आए हों।
"ये तुम क्या कह रहे हो वैभव?" मंच पर बैठे महेंद्र सिंह ने कहा____"क्या सच में तुम ऐसा कोई सबूत यहां सबके सामने पेश कर सकते हो?"
"हां।" मैंने बेझिझक हो कर कहा____"किंतु उससे पहले ये जान लीजिए कि मेरे पास वो सबूत आया कैसे? असल में जब यहां से कुछ लोग मुझे जान से मारने के इरादे से चंदनपुर गए थे तो शायद उन लोगों को ये बिल्कुल भी नहीं पता था कि वहां पर भी मेरी रक्षा करने के लिए मेरे कई सारे आदमी मौजूद होंगे जिनसे उनका टकराव हो जाएगा। ख़ैर टकराव हुआ और अच्छा खासा हुआ। आख़िर में मुझे जान से मारने के इरादे से आए हुए लोग मारे गए और एक दो भाग गए लेकिन एक आदमी मेरे हाथ भी लगा। मेरे ये पूछने पर कि मुझे जान से मारने के लिए उसे किसने भेजा है उसने कोई जवाब नहीं दिया। उल्टा मुझसे ये कहने लगा कि मैं उसका या किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उस नामुराद को पता ही नहीं था कि वो किससे ऐसी बात कह रहा था। ख़ैर फिर मैंने अपने तरीके से उससे सच उगलवा ही लिया। ये अलग बात है कि सच बोलने से पहले उसे अपने एक कान से हाथ धोना पड़ गया था। उसने बताया कि वो ये सब करने के लिए मजबूर था और उसे मजबूर करने वाले कोई और नहीं बल्कि हमारी इन्हीं बड़ी मां के देवर गौरी शंकर काका थे। गौरी शंकर काका ने उसे धमकी दे रखी थी कि अगर उसने उनके कहे अनुसार काम नहीं किया तो वो अपना कर्ज़ तो उससे वसूलेंगे ही साथ में उसके बीवी बच्चों को भी जान से मार देंगे। ज़ाहिर है, आदमी अपने बीवी बच्चों की जान बचाने के लिए कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाएगा।"
"पंचायत के सामने उस आदमी को पेश करो वैभव।" महेंद्र सिंह ने कहा____"इस मामले में सारी बात उसके मुख से ही सुनी जाएंगी। तुम्हारे इस बयान का न तो कोई मतलब है और ना ही वो इस पंचायत में मान्य होगा।"
"जैसा आपका हुकुम।" मैंने अदब से सिर नवाते हुए कहा और फिर अपने एक आदमी को इशारा कर दिया।
कुछ ही देर ने मेरा आदमी उस आदमी को ले कर आ गया जिसे मैंने चंदनपुर में पकड़ा था और उसे वहीं पर रखे हुए था। सबकी नज़रें उस आदमी पर ठहर गईं। उसका एक कान मैंने काट दिया था इस लिए इस वक्त उसके उस कान में पट्टी लगी हुई थी। सबके सामने आते ही वो बेहद घबराया हुआ नज़र आने लगा था। फूलवती और उसके घर की बाकी बहू बेटियां भी उसे देख रहीं थी। सहसा मेरी निगाह कुछ ही दूरी पर अपनी मां के साथ खड़ी अनुराधा पर पड़ गई। इसे इत्तेफ़ाक कहूं या कुछ और लेकिन ये सच है कि वो अब भी मुझे ही देखे जा रही थी। मैंने जल्दी ही उससे नज़रें हटा ली। मेरे अंदर एक बेचैनी सी पैदा होने लगी थी।
"कौंन हो तुम?" तभी फिज़ा में महेंद्र सिंह की आवाज़ गूंजी____"और किस गांव के रहने वाले हो और ये भी बताओ कि तुम यहां पर इस हाल में क्यों हो?"
महेंद्र सिंह के पूछने पर उस व्यक्ति ने बताया कि वो पास के ही एक गांव सिंहपुर का रहने वाला है और उसका नाम मनसुख यादव है। उसके बाद वो वही सब बताता चला गया जो उसने चंदनपुर में मुझे बताया था। उसकी बातें सुन कर भीड़ में खड़े लोग एक बार फिर से खुसुर खुसुर करने लगे। वहीं फूलवती का चेहरा देखने लायक हो गया।
"मैं नहीं मानती इस आदमी की इन बातों को।" गौरी शंकर की बीवी सुनैना ने सहसा तीखे भाव से कहा___"ज़रूर दादा ठाकुर के इस बेटे ने इस आदमी को मेरे पति के खिलाफ़ ऐसा बोलने के लिए मजबूर किया होगा। मैं अपने पति को अच्छी तरह जानती हूं। वो ऐसा कुछ कर ही नहीं सकते।"
"नहीं ठाकुर साहब।" मनसुख एकदम से बोल पड़ा____"मुझे किसी ने ऐसा बोलने के लिए मजबूर नहीं किया है। हां ये सच है कि इसके पहले छोटे कुंवर ने मुझसे सच जानने के लिए गुस्से में आ कर मेरा ये कान काट दिया था लेकिन सच यही है कि इन्होंने मुझे ऐसा बोलने के लिए मजबूर नहीं किया है। सच वही है जो मैंने अभी सबके सामने आप सबको बताया है। अगर मेरा कहा एक भी शब्द झूठ हो तो मेरे झूठ बोलने के चलते मैं अपने बच्चों का मरा हुआ मुंह देखूं।"
मनसुख की इस बात से सनसनी सी फैल गई फिज़ा में।
"क्या अब भी आपको यकीन नहीं है काकी?" मैंने सुनैना की तरफ देखते हुए कहा___"आप भी जानती हैं कि चाहे जैसी भी परिस्थिति हो मगर कोई भी मां बाप अपने बच्चों की झूठी क़सम नहीं खा सकते। इसके बावजूद अगर आपको यकीन नहीं है तो ठीक है। बहुत जल्द गौरी शंकर काका और रूपचंद्र को खोज लिया जाएगा और उन्हें यहां ला कर उन्हीं के द्वारा सच का पता चल जाएगा आपको।"
"हां हां आप सब तो चाहते ही हैं कि हमारे घर के सभी मर्द और बच्चों को सूली पर लटका दिया जाए।" सुनैना बिफरे हुए लहजे से एकाएक रोने ही लगी, बोली____"और हम सबको अनाथ, बेसहारा और लाचार बना दिया जाए।"
"ऊपर वाला ही जानता है काकी कि हम सब क्या चाहते हैं।" मैंने कहा____"मेरे जैसा इंसान भी उस दिन बड़ा खुश हुआ था जब आप लोगों से हमारे रिश्ते सुधर गए थे। ये अलग बात है कि मुझे संबंधों का इस तरह से सुधर जाना हजम नहीं हो रहा था लेकिन फिर भी ये सोच कर खुश हो गया था कि चलो दोनों परिवार अब एक साथ हो गए हैं तो दोनों मिल कर एक नए सिरे से एक नए युग का निर्माण करेंगे। जीवन बहुत छोटा होता है काकी। इंसान अपने छोटे से जीवन में न जाने किस किस के साथ कैसा कैसा बैर बना लेता है और फिर दोनों ही उस बैर के चलते अपना वही छोटा सा जीवन बर्बाद कर बैठते हैं जिस छोटे से जीवन में वो अगर प्रेम भाव से रहते तो शायद वो एक सुनहरा इतिहास ही बना डालते।"
"तुमने सही कहा वैभव।" मैं ये सब बोल कर पलटा ही था कि तभी मेरे कानों में किसी लड़की की चिर परिचित मधुर आवाज़ पड़ी। मैं बिजली की तरह वापस मुड़ा तो देखा भीड़ को चीरते हुए रूपा अपनी ताई और चाची सुनैना के बगल में आ कर खड़ी हो गई। उसको देख जहां एक तरफ मैं चौंक पड़ा था वहीं उसके घर वाले भी चौंक पड़े थे। रूपा को यहां देख जाने क्यों मेरी नज़र उससे हट कर अनायास ही अनुराधा की तरफ चली गई। मैंने देखा वो रूपा को गौर से देखें जा रही थी। ये देख मेरे अंदर अजीब तरह की हलचल शुरू हो गई।
"तुमने बिल्कुल सही कहा वैभव कि अगर दोनों ही परिवार के लोग प्रेम भाव से रहते तो एक सुनहरा इतिहास बना डालते।" उधर रूपा मेरी तरफ देखते हुए दुखी भाव से बोली____"मगर शायद ऐसा इतिहास बनाने के लिए वैसा प्रेम भाव ही नहीं था मेरे घर वालों के अंदर।"
"र...रूपा।" हरि शंकर की पत्नी और रूपा की मां ललिता देवी ने गुस्से से रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"ये तू क्या बकवास कर रही है और....और तू यहां आई कैसे?"
"बड़े दुख की बात है मां।" रूपा की आंखों से आंसू बह चले, बोली____"कि आप सब भी ताऊ चाचा और पिता जी के जैसी ही हैं। इतना कुछ होने के बाद भी आप सब ऐसा बर्ताव कर रही हैं?"
"तू चुप होती है कि नहीं?" ललिता ने गुस्से से चीखते हुए कहा____"और तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस तरह बात करने की?"
"आप जानती थी न कि मुझे सब पता है?" रूपा ने कहा____"इसी लिए तो आपने मुझे मेरे कमरे में बंद कर दिया था ताकि मैं यहां ना आ सकूं और किसी को सच न बता सकूं? आख़िर क्या सोच कर अब आप सब सच को छुपा रही हैं मां? क्या आप सब ये चाहती हैं कि जो ज़िंदा बचे हुए हैं उनकी भी हत्या हो जाए?"
रूपा की बात सुन कर ललिता देवी कुछ न बोल सकी। बस अपने दांत पीस कर रह गईं। यही हाल उनकी जेठानी और बाकी देवरानियों का भी था। फिर सहसा जैसे उन्हें किसी बात का एहसास हुआ तो एक एक कर के सभी चेहरों के भाव बदलते नज़र आए।
"आप जानती थी न कि मुझे सब पता है?" रूपा ने कहा____"इसी लिए तो आपने मुझे मेरे कमरे में बंद कर दिया था ताकि मैं यहां ना आ सकूं और किसी को सच न बता सकूं? आख़िर क्या सोच कर अब आप सब सच को छुपा रही हैं मां? क्या आप सब ये चाहती हैं कि जो ज़िंदा बचे हुए हैं उनकी भी हत्या हो जाए?"
रूपा की बात सुन कर ललिता देवी कुछ न बोल सकी। बस अपने दांत पीस कर रह गईं। यही हाल उनकी जेठानी और बाकी देवरानियों का भी था। फिर सहसा जैसे उन्हें किसी बात का एहसास हुआ तो एक एक कर के सभी चेहरों के भाव बदलते नज़र आए।
अब आगे....
"मुझमें अब यहां से कहीं जाने की हिम्मत नहीं है रूप बेटा।" पास ही के जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठे गौरी शंकर ने असहाय भाव से कहा____"मुझे समझ आ गया है कि हम अपनी मौत से दूर नहीं भाग सकते। मेरे भाई मेरे बच्चे सब मर चुके हैं और अब मैं भी जीना नहीं चाहता।"
"बदला लिए बिना हम मर नहीं सकते काका।" रूपचंद्र ने गुस्से से कहा____"हिसाब तो बराबर का करना ही पड़ेगा। उन्होंने हमारे इतने सारे अपनों की जान ली है तो उनमें से भी किसी को ज़िंदा रहने का हक़ नहीं है।"
"नहीं रूप बेटा।" गौरी शंकर जाने किस चीज़ की कल्पना से कांप उठा था, बोला____"अब ऐसा सोचना भी मत। हमने अपने सभी लोगों को खो दिया है। खानदान का वंश बढ़ाने के लिए अब सिर्फ तुम ही बचे हो मेरे बच्चे। इस लिए अब अपने ज़हन में बदले का कोई भी ख़याल मत लाओ।"
"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने चीखते हुए कहा____"नहीं, हर्गिज़ नहीं। मैं उनमें से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोडूंगा। जैसे हमारा खानदान पूरी तरह से मिटा दिया है दादा ठाकुर ने उसी तरह मैं उसके भी खानदान का नामो निशान मिटा दूंगा। हवेली के ज़र्रे ज़र्रे में करुण क्रंदन गूंजेगा।"
"नहीं बेटा ऐसा मत कह।" गौरी शंकर बेबस भाव से कह उठा____"तुझे मरे हुए हमारे अपनों की क़सम है। तू ऐसा कुछ भी करने का नहीं सोचेगा। हमारी स्थिति अब बेहद कमज़ोर हो गई है बेटा। तू अकेला उनका कुछ नहीं कर सकेगा, उल्टा होगा ये कि तू भी बाकी सबकी तरह अपनी जान से हाथ धो बैठेगा। अगर ऐसा हुआ तो खानदान का वंश ही नष्ट हो जाएगा। मेरी जांघ में गोली लगी है जिसके चलते अब मैं अपाहिज सा हो गया हूं। एक तू ही है जिसे अब अपने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी। तेरी मां, तेरी चाचियां, तेरी भाभी और तेरी बहनें उन सबका ख़याल रखना होगा तुझे। सोच अगर तुझे कुछ हो गया तो उन सबका क्या होगा? हमारी बेसहारा बहू बेटियों का जीवन नर्क सा हो जाएगा बेटा। इस लिए कहता हूं कि अब अपने अंदर किसी से भी बदला लेने का ख़याल मत ला।"
रूपचंद्र को पहली बार एहसास हुआ कि उसकी और उसके परिवार की स्थिति वास्तव में कितनी गंभीर और दयनीय हो गई है। ये एहसास होते ही उसके चेहरे पर मौजूद आक्रोश और गुस्सा किसी झाग की तरह बैठता नज़र आया।
"हमें बिल्कुल भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अचानक से ऐसा भी कुछ हो जाएगा।" गौरी शंकर ने बेहद गंभीरता से कहा____"जो सोचा था वैसा बिल्कुल भी नहीं हुआ। शायद ऊपर वाला हमेशा से ही हमारे खिलाफ़ रहा है या फिर हकीक़त यही है कि हमने बेवजह ही इतने वर्षों से अपने अंदर उनके प्रति दुश्मनी को पाले रखा था।"
"ये आप क्या कह रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने हैरत से गौरी शंकर को देखा।
"तुझे तो बताया ही था हमने कि वर्षों पहले बड़े दादा ठाकुर की वजह से ये सब शुरू हुआ था।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"उसी की वजह से हमने हमारी बहन गायत्री को खोया था। उसने हमारी बहन को अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर उसे अपने ही एक किसान के साथ जाने कहां भेज दिया। अपने कुकर्म को छुपाने के लिए उसने हर तरफ ये ख़बर फैला दी थी कि साहूकारों की बहन एक किसान के साथ भाग गई। उस समय बड़े दादा ठाकुर की तूती बोलती थी। वो खुद तो ताकतवर और जल्लाद था ही किंतु उसके ताल्लुक बड़ी बड़ी हस्तियों से भी थे। ये उसके ख़ौफ का ही असर था कि बाद में सब कुछ जान लेने के बाद भी हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके थे। हालाकि एक बार पिता जी अपनी इस ब्यथा को ले कर उसके पास गए भी थे लेकिन उसने स्पष्ट रूप से उन्हें धमकी दे कर कहा था कि अगर उन्होंने इस बारे में ज़्यादा हो हल्ला करने की हिमाकत की तो इसका अंजाम उनकी सोच से भी कहीं ज़्यादा उन्हें भुगतना पड़ जाएगा। बस, उसके बाद पिता जी कभी हवेली की दहलीज़ पर नहीं गए। हम लोग भी इतने परिपक्व अथवा ताकतवर नहीं थे जिसके चलते हम अपनी बहन के साथ हुए इस जघन्य अत्याचार का बदला ले लेते। वो तो अच्छा हुआ कि उस कुकर्मी को ऊपर वाले ने ही सज़ा दे दी। ऊपर वाले ने उसे ऐसा बीमार किया कि बड़ा से बड़ा वैद्य भी उसका इलाज़ न कर सका। उसके बाद उनकी गद्दी पर उनका बड़ा बेटा प्रताप सिंह बैठा। आश्चर्य की बात थी कि इतने बड़े कुकर्मी और जल्लाद का बेटा प्रताप सिंह अपने पिता की सोच और विचारों से बिल्कुल उलट था। हालाकि उसका भाई जगताप थोड़ा गुस्सैल स्वभाव का ज़रूर था किंतु ये सच है कि उसमें भी अपने पिता जैसे गुण नहीं थे। दोनों ही भाई अपनी मां पर गए थे।"
"जब प्रताप सिंह दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठा तो हमें फिर से इस बात का ख़ौफ होने लगा कि गद्दी में बैठने के बाद कहीं प्रताप सिंह की भी मानसिकता न बदल जाए।" कुछ पल रुकने के बाद गौरी शंकर ने कहा____"सत्ता और ताक़त का नशा ही ऐसा होता है बेटे कि अच्छे अच्छे शरीफ़ और संस्कारी लोग गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते हैं। हालाकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और ये हमारे लिए आश्चर्य की बात तो थी ही किंतु हम ये भी समझते थे कि प्रताप सिंह बहुत ही धीर वीर और गंभीर प्रकृति का इंसान है। उस दिन तो हम सबको और भी ज़्यादा आश्चर्य हुआ जब प्रताप सिंह दादा ठाकुर बनने के कुछ दिन बाद ही हमारे घर खुद ही आया और हमारे पिता जी से अपने पिता के द्वारा किए गए कुकर्म के लिए माफ़ी मांगी। वो मेरे पिता जी के पैरों को पकड़ के माफ़ियां मांग रहा था और यही कह रहा था कि अब से ऐसा कुछ भी नहीं होगा बल्कि दोनों ही परिवारों के बीच गहरा प्रेम भाव रहे ऐसी वो हमेशा कोशिश करेगा। प्रताप सिंह पिता जी से माफ़ी मांग कर और ये सब कह कर भले ही चला गया था लेकिन इसके बावजूद हमारे अंदर से हवेली में रहने वालों के प्रति घृणा न गई। हवेली में रहने वाले लोग हमें कभी पसंद ही नहीं आए और यही वजह थी कि हमने अपने बच्चों के अंदर भी हवेली वालों के लिए ज़हर ही भरा। आज इतना कुछ हो जाने के बाद एहसास हो रहा है कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमारे गुनहगार तो बड़े दादा ठाकुर थे और उसने जो कुकर्म किए थे उसकी सज़ा ऊपर वाले ने खुद ही दे दी थी उसे। यानि हमारा प्रतिशोध उसके मर जाने पर ही ख़त्म हो जाना चाहिए था। उसके बेटे ने या उसके भाई ने तो कभी हमारे साथ कुछ बुरा नहीं किया था। अगर वो सच में अपने पिता की तरह होता तो दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठने के बाद वो खुद हमारे घर आ कर हमारे पिता जी से माफ़ी नहीं मांगता। ख़ैर शायद ये हमारा दुर्भाग्य ही था कि हम कभी अपने अंदर से उनके प्रति गहराती घृणा को नहीं निकाल पाए जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने और भोगने को मिला है।"
"माना कि हम अपने अंदर से उनके प्रति घृणा को नहीं निकाल पाए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन ये घृणा भी तो उन्हीं के द्वारा मिली थी हमें? अगर यही सब उनके साथ हुआ होता तो क्या वो इतने वर्षों तक चुप बैठे रहते? नहीं काका, वो तो पहले ही हमारा क्रिया कर्म कर चुके होते। हमने मान लिया कि हमसे ग़लती हुई लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि उस ग़लती के लिए हमारे पूरे खानदान को ही मिटा दिया जाए? ये कैसा न्याय है काका?"
"वहां पर कोई है शायद।" रूपचंद्र की बात पर गौरी शंकर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी एक मर्दाना आवाज़ सुन कर चौंक पड़ा। उसके साथ रूपचंद्र भी चौंक पड़ा था।
"लगता है उन्होंने हमें खोज लिया है काका।" रूपचंद्र ने एकदम से आवेश में आते हुए कहा____"हमें फ़ौरन ही यहां से निकल लेना चाहिए।"
"नहीं बेटा।" गौरी शंकर ने शांत भाव से कहा____"अब हम कहीं नहीं जाएंगे। अगर यहां से हमने भागने की कोशिश की तो संभव है कि वो लोग हम पर गोली चला दें जिससे हम दोनों ही मारे जाएं। बेहतर यही है कि हम खुद को उनके सामने आत्म समर्पण कर दें।"
"आत्म समर्पण करने से भी तो वो हमें मार ही डालेंगे काका।" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक ख़ौफ के भाव उभरते नज़र आए____"क्या आपको लगता है कि वो हमें जीवित छोड़ देंगे?"
"सब ऊपर वाले पर छोड़ दो बेटा।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"अब जो होगा देखा जाएगा। आत्म समर्पण करने से बहुत हद तक संभव है कि हमारे साथ वैसा सलूक न हो जैसा हमारे अपनों के साथ हुआ है।"
"वो रहे।" तभी दाएं तरफ से एक आदमी की आवाज़ आई____"घेर लो उन दोनों को किंतु सम्हल कर।"
गौरी शंकर ने जब महसूस किया कि आवाज़ एकदम पास से ही आई है तो वो अपनी जगह से किसी तरह उठा और पेड़ के पीछे से निकल कर बोला____"गोली मत चलाना, हम खुद को आत्म समर्पण करने को तैयार हैं।"
अगले कुछ ही देर में गौरी शंकर और रूपचंद्र को गिरफ़्त में ले लिया गया। शेरा के साथ पांच आदमी और थे जिन्होंने दोनों को रस्सियों में जकड़ लिया था। तलाशी में शेरा के हाथ एक पिस्तौल लगी जो रूपचंद्र के पास थी। शेरा के इशारे पर बाकी लोग दोनों चाचा भतीजे को ले कर चल पड़े।
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जैसे ही गौरी शंकर और रूपचंद्र को लिए शेरा हवेली के विशाल मैदान में लगी पंचायत के सामने पहुंचा तो लोग बड़ी तेज़ी से तरह तरह की बातें करने लगे। उधर दोनों चाचा भतीजे को देख साहूकारों के घर की औरतें और बहू बेटियों के चेहरे देखने लायक हो गए। उन सभी के चेहरों पर डर और घबराहट साफ दिखाई देने लगी थी। ज़ाहिर है उन सभी को ये एहसास हो गया था कि उनके घर के अंतिम बचे हुए मर्द भी अब मौत के मुंह में आ गए हैं।
वातावरण में एक सनसनी सी फैल गई। मंच पर बैठे महेंद्र सिंह के कहने पर गौरी शंकर और रूपचंद्र को बेड़ियों से आज़ाद कर दिया गया। दोनों चाचा भतीजे सिर झुकाए खड़े थे। ये अलग बात है कि इसके पहले वो दोनों एक एक कर के वहां उपस्थित सभी का चेहरा देख चुके थे।
"गौरी शंकर सिंह।" मंच में कुर्सी पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में गौरी शंकर को देखते हुए कहा____"क्या तुम क़बूल करते हो कि तुमने मुंशी चंद्रकांत के साथ मिल कर हवेली में रहने वालों के ख़िलाफ़ गहरी साज़िश रची और फिर उसी साज़िश के तहत ठाकुर जगताप सिंह और बड़े कुंवर अभिनव सिंह की हत्या की? इतना ही नहीं चंदनपुर में अपने आदमियों को भेज कर ठाकुर साहब के छोटे बेटे वैभव को भी जान से मारने का प्रयास किया था?"
"नहीं नहीं।" गौरी शंकर की बीवी सुनैना सिंह तेज़ी से भागती हुई गौरी शंकर के पास आई, फिर उसे देखते हुए लगभग रोते हुए बोली____"कह दीजिए कि आप पर लगाए गए ये सारे आरोप झूठ हैं। बता दीजिए सबको कि आपने किसी के भी साथ मिल कर न तो कोई साज़िश रची है और ना ही किसी की हत्या की है।"
सुनैना की बातों को सुन कर गौरी शंकर ने सख़्ती से अपने होठ भींच लिए। चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते और लोप होते नज़र आए। तभी मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से सुनैना देवी से कहा____"आप एक तरफ हट जाएं, हमने जिससे सवाल किया है उसे जवाब देने दें।"
सुनैना देवी तब भी न हटीं। वो अपने पति को आशा भरी नज़रों से देखती रहीं। उधर कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद गौरी शंकर ने कहा____"हां, मैं क़बूल करता हूं ठाकुर साहब कि मुंशी चंद्रकांत के साथ मिल कर हमने ही ये सब किया है।"
"नहीं.....नहीं।" सुनैना देवी पूरी ताक़त से चिल्ला उठी____"ये सच नहीं हो सकता। कह दीजिए कि ये सब झूठ है। कह दीजिए कि आपने कुछ नहीं किया है।"
सुनैना देवी कहने के साथ ही वहीं घुटनों के बल बैठ कर फूट फूट कर रोने लगी। यही हाल उनके घर की बाकी औरतों और बहू बेटियों का भी था। गौरी शंकर ने जब अपनी बीवी को यूं सरे आम फूट फूट कर रोते देखा तो उसका कलेजा हिल गया। अपने अंदर उमड़ उठे भयंकर तूफ़ान सतत को उसने अपनी आंखें बंद कर के जज़्ब करने की कोशिश की। उधर रूपचंद्र का चेहरा अजीब तरह से सख़्त नज़र आ रहा था।
"क्यों? आख़िर क्यों?" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह तेज़ आवाज़ में बोले____"पंचायत ही नहीं बल्कि यहां उपस्थित सब लोग भी ये जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों किया तुमने?"
"हम चारो भाई।" गौरी शंकर ने अजीब भाव से कहा____"अपने अंदर से वर्षों पहले पैदा हुई नफ़रत को कभी मिटा नहीं पाए ठाकुर साहब। वर्षों पहले जो ज़ख्म बड़े दादा ठाकुर ने हमें हमारी बहन गायत्री को बर्बाद कर के दिया था वो ज़ख्म कभी भरा ही नहीं बल्कि हर गुज़रते वक्त के साथ वो नासूर ही बनता चला गया। बहुत कोशिश की हमने हवेली में रहने वालों के प्रति अपनी नफ़रत को दूर करने की मगर कभी कामयाब न हो सके। ये उसी का नतीजा है ठाकुर साहब कि हमारे द्वारा ये सब हो गया और हमारे साथ भी इतना कुछ हो गया।"
"तुम जिस ज़ख्म की बात कर रहे हो गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"उसका पहले भी हमें बेहद दुख और अफ़सोस था और उसके लिए हमारे पिता भले ही खुद को गुनहगार न समझते रहे हों मगर हम ज़रूर समझते थे। तभी तो उनके बाद जब हम दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठे तो हम खुद तुम्हारे घर आए और उनके द्वारा किए गए जघन्य अपराध के लिए तुम्हारे पिता जी से हमने माफ़ी मांगी थी। इतना ही नहीं ये वचन भी दिया था कि अब से कभी भी हमारे द्वारा तुम में से किसी के भी साथ बुरा नहीं होगा। ऊपर वाले की क़सम खा कर कहो कि क्या हमने अपने इस वचन को नहीं निभाया? बच्चों के लड़ाई झगड़े की बातें छोड़ो क्योंकि बच्चे तो अक्सर झगड़ते ही हैं लेकिन क्या कभी किसी ने उस नीयत से तुम्हारे साथ बुरा किया कभी?"
"माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" गौरी शंकर सहसा घुटनों के बल बैठ गया____"ये हमारा दुर्भाग्य ही था कि हम चारो भाई उस बात को कभी अपने दिल से निकाल नहीं सके और हमेशा आपसे नफ़रत करते रहे। ऐसा शायद इस लिए भी कि इतने वर्षों की खोज के बाद भी जब हमें हमारी बहन कहीं नहीं मिली तो मन में हवेली में रहने वालों के प्रति नफ़रत में और भी इज़ाफा होता गया। एक ही तो बहन थी हमारी। वर्षों से हम चारो भाइयों की कलाइयां सूनी थी। जब भी रक्षाबंधन का पावन त्यौहार आता था तो बहन की याद आती थी और अपनी अपनी कलाइयां देख कर हम चारो भाइयों के अंदर टीस सी उभरती थी। बस, जिस ज़ख्म को भरने की कोशिश करते थे वो ये सब सोच कर फिर से हरा हो जाता था। ज़हन में बस यही सवाल उभरते थे कि आख़िर क्या कसूर था हमारी बहन का? क्यों वो बड़े दादा ठाकुर की हवस का शिकार हो गई और क्यों उसे इस तरह से गायब कर दिया गया कि आज इतने वर्षों बाद भी उसका कहीं कोई पता तक नहीं है? वो इस दुनिया में कहीं है भी या उसे जान से ही मार दिया गया? दादा ठाकुर, कहने के लिए अक्सर लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर जिनके साथ गुज़रती है उसका दर्द वही जानते हैं।"
"माना कि तुम्हारी बहन के साथ गुनाह ही नहीं बल्कि संगीन अत्याचार हुआ था।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"लेकिन किसी और के द्वारा किए गए गुनाह के लिए किसी दूसरे की हत्या कर देना क्या उचित था?"
"उचित तो ये भी नहीं था न ठाकुर साहब कि हमने जो किया वही दादा ठाकुर ने भी कर दिया।" गौरी शंकर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"मान लिया मैंने कि हम चारो भाइयों ने किसी और के द्वारा किए गए अपराध के चलते बदले की भावना में मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की हत्या कर दी। मगर इन्होंने जो किया क्या वो सही था? अगर इन्हें सच में पता चल गया था कि हमने ही वो सब किया था तो क्या इन्हें इतना जल्दी नर संघार ही कर देना चाहिए था? क्या इन्हें एक बार भी ये नहीं सोचना चाहिए था कि हमें भी अपनी बात रखने का मौका देना चाहिए? ये तो मुखिया हैं ठाकुर साहब और सिर्फ इसी गांव बस के ही नहीं बल्कि आस पास कई गावों के भी। इसके बावजूद इन्होंने इस मामले का फ़ैसला किसी पंचायत में नहीं बल्कि जंग के मैदान में कर डाला। क्या ये अन्याय और अपराध नहीं है?"
"बेशक है।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"और यकीन मानो हर अपराधी को उचित दंड दिया जाएगा, फिर चाहे वो खुद दादा ठाकुर ही क्यों न हों।"
"हमें हमारे अपराध के लिए मिलने वाली सज़ा से इंकार नहीं है।" पिता जी ने कहा____"किंतु उससे पहले हम कुछ और भी जानना चाहते हैं। अभी भी कुछ ऐसा बाकी है जिसे हमारे लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए जानना ज़रूरी है।"
"आपके मन में अगर अभी कुछ सवाल हैं तो बेशक पूछ सकते हैं।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"हम भी उत्सुक हैं ये जानने के लिए कि इस मामले में अभी और क्या शेष है?"
"ये तो समझ आया कि अपनी नफ़रत के चलते अथवा ये कहें कि बदले की भावना के चलते गौरी शंकर ने अपने भाइयों सहित हमारे मुंशी चंद्रकांत के साथ गठजोड़ कर के ये सब किया।" पिता जी के कहा____"किंतु हम इन लोगों से ये भी जानना चाहते हैं कि इन लोगों ने अपने साथ किसी सफ़ेदपोश का ज़िक्र क्यों नही किया? जबकि शुरू से ही वो रहस्यमय आदमी हमारे छोटे बेटे वैभव को जान से मारने की फ़िराक में रहा है और इतना ही नहीं कई बार उसने उसके ऊपर जान लेवा हमला भी किया। और तो और अभी पिछली रात वो हमारी हवेली के बाहर बने कमरे से मुरारी के भाई जगन को भी छुड़ा ले गया।"
"मैं किसी सफ़ेदपोश को नहीं जानता ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"बल्कि ये जान कर तो अब मैं खुद ही हैरान हो गया हूं कि हमारे अलावा भी कोई ऐसा था जो हवेली के किसी व्यक्ति को जान से मारना चाहता था।"
"तो आप ये कहना चाहते हैं कि ऐसे किसी सफ़ेदपोश को आप नहीं जानते?" पिता जी ने कहा____"और ना ही उससे आपका कोई ताल्लुक है?"
"अगर जानता तो क़बूल करने में मुझे भला क्या आपत्ति होती ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने कहा____"जब इतना सब क़बूल कर लिया है तो उसके बारे में भी क़बूल कर लेता।"
"तुम्हारा क्या कहना है उस सफ़ेदपोश के बारे में?" पिता जी ने मुंशी की तरफ पलट कर उससे पूछा____"क्या तुम्हें भी उसके बारे में कुछ नहीं पता?"
"हाहाहाहा।" पिता जी के पूछने पर मुंशी पहले तो ज़ोर से हंसा फिर बोला____"वैसे तो मैं ऐसे किसी सफ़ेदपोश के बारे में नहीं जानता और ना ही मेरा उससे कोई संबंध है लेकिन इस बात से मैं खुश ज़रूर हूं कि हमारे बाद भी अभी कोई है जो हवेली में रहने वालों से इस क़दर नफ़रत करता है कि उनकी जान तक लेने का इरादा रखता है। ख़ास कर इस वैभव सिंह की। ये तो कमाल ही हो गया, हाहाहा।"
मुंशी चंद्रकांत जिस तरीके से हंस रहा था उसे देख मेरा खून खौल उठा। गुस्से से मेरी मुट्ठियां भिंच गईं। जी किया कि अभी जा के उसकी गर्दन मरोड़ दूं मगर फिर किसी तरह अपने गुस्से को पी कर रह गया।
"हाहाहाहा।" पिता जी के पूछने पर मुंशी पहले तो ज़ोर से हंसा फिर बोला____"वैसे तो मैं ऐसे किसी सफ़ेदपोश के बारे में नहीं जानता और ना ही मेरा उससे कोई संबंध है लेकिन इस बात से मैं खुश ज़रूर हूं कि हमारे बाद भी अभी कोई है जो हवेली में रहने वालों से इस क़दर नफ़रत करता है कि उनकी जान तक लेने का इरादा रखता है। ख़ास कर इस वैभव सिंह की। ये तो कमाल ही हो गया, हाहाहा।"
मुंशी चंद्रकांत जिस तरीके से हंस रहा था उसे देख मेरा खून खौल उठा। गुस्से से मेरी मुट्ठियां भिंच गईं। जी किया कि अभी जा के उसकी गर्दन मरोड़ दूं मगर फिर किसी तरह अपने गुस्से को पी कर रह गया।
अब आगे....
मुंशी चंद्रकांत और गौरी शंकर ने जिस तरह से सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई थी उससे दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि मैं खुद भी सोच में पड़ गया था। ये तो स्पष्ट था कि सफ़ेदपोश के बारे में वो दोनों झूठ नहीं बोल रहे थे क्योंकि अब झूठ बोलने का ना तो कोई समय था और ना ही इससे उन्हें कोई फ़ायदा था। तो अब सवाल ये था कि अगर सच में उन दोनों का संबंध अथवा कोई ताल्लुक सफ़ेदपोश से नहीं है तो फिर कौन है सफ़ेदपोश? आख़िर वो कौन हो सकता है जो खुद को सफ़ेदपोश के रूप में हमारे सामने स्थापित कर चुका है और हमसे दुश्मनी रखता है?
सफ़ेदपोश एक ऐसा रहस्यमय किरदार है जो हमारे लिए गर्दन में लटकी तलवार की तरह साबित हो चुका है। अगर ये पता चल जाए कि वो कौन है तो ज़ाहिर है कि ये भी समझ में आ ही जाएगा कि वो हमें अपना दुश्मन क्यों समझता है? इतना कुछ होने के बाद लगा था कि अब सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया है किंतु नहीं, ऐसा लगता है जैसे सबसे बड़ी मुसीबत और ख़तरा तो वो सफ़ेदपोश ही है। समझ में नहीं आ रहा कि वो अचानक कहां से आ टपकता है और फिर कैसे गायब हो जाता है?
"यहां किसी और को भी अगर कुछ कहना है तो कह सकता है।" मंच पर बैठे महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"अगर किसी को लगता है कि उसके साथ ठाकुर साहब ने अन्याय किया है अथवा उसके साथ किसी तरह का इंसाफ़ नहीं हुआ है तो बेझिझक वो अपनी बात इस पंचायत के सामने रख सकता है।"
ठाकुर महेंद्र सिंह की ये बात सुन कर भीड़ में खड़े लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे। कुछ देर बाद दो आदमी भीड़ से निकल कर बाहर आए। ये वही थे जिनकी बीवियां हवेली में काम करती थीं और कुछ दिन पहले जिनकी हत्या हो गई थी।
"प्रणाम ठाकुर साहब।" उनमें से एक ने कहा____"हम दोनों ये कहना चाहते हैं कि दादा ठाकुर की हवेली में हम दोनों की बीवियां काम करती थीं और कुछ दिनों पहले उनकी हत्या हो गई। हमारे छोटे छोटे बच्चे बिना मां के हो गए। क्या हमें ये जानने का हक़ नहीं है कि किसने उनकी हत्या की और क्यों की?"
"ठाकुर साहब आपका क्या कहना है इस बारे में?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पिता जी से पूछा।
"ये सच है कि इन दोनों की बीवियां हमारी हवेली में काम करती थीं।" पिता जी ने कहा____"कुछ समय पहले उन दोनों की आश्चर्यजनक रूप से हत्या कर दी गई थी। हमने उनकी हत्या की तहक़ीकात की तो जल्द ही हमें पता चल गया कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ? असल में वो दोनों औरतें किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा मजबूर किए जाने पर हवेली में ग़लत काम को अंजाम दे रहीं थी। हमें तो इसका पता भी न चलता किंतु कहते हैं ना कि ग़लत करने वाले के साथ ही बुरा होता है फिर चाहे वो जैसे भी हो। उन दोनों को जिसने मजबूर किया हुआ था उसने उन्हें साफ तौर पर ये समझाया हुआ था कि अगर पकड़े जाने का ज़रा सा भी अंदेशा हो तो वो अपनी जान ले लें। एक ने तो हवेली में ही ज़हर खा कर अपनी जान ले ली थी जबकि दूसरी हवेली से भाग गई थी। शायद उस वक्त उसके पास ज़हर नहीं था इस लिए पकड़े जाने के डर से वो हवेली से भाग गई। हमारे बेटे ने उसका पीछा किया किंतु लाख कोशिश के बावजूद ये उसे बचा नहीं सका। ऐसा इस लिए क्योंकि दोनों औरतों को मजबूर करने वाला वहां पहले से ही मौजूद था और उसने इसकी बीवी की हत्या कर दी। ये सब बातें हमारे छोटे भाई जगताप ने इन दोनों को बताया भी थी। कहने का मतलब ये है ठाकुर साहब कि इन दोनों की बीवियों की हत्या से हमारा कोई संबंध नहीं है बल्कि सच ये है कि उन्हें खुद ही उनके ग़लत कर्म करने की सज़ा मिल गई। हमारे लिए ये जानना ज़रूरी था कि आख़िर उन दोनों को मजबूर करने वाला वो व्यक्ति कौन हो सकता है किंतु अब हम समझ चुके हैं कि वो कौन है?"
"ये क्या कह रहे हैं आप?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने चौंकते हुए पूछा। इधर पिता जी की बात सुन कर भीड़ में खड़े लोग भी हैरानी से देखने लगे थे। जबकि महेंद्र सिंह जी के पूछने पर पिता जी ने गौरी शंकर की तरफ देखा। गौरी शंकर ने झट से सिर झुका लिया।
"उन दोनों औरतों की जब हत्या हो गई थी तो हमारे गांव के साहूकार मणि शंकर जी हमारी हवेली पर हमसे मिलने आए थे।" पिता जी ने कहा____"उस समय जिस तरह से उन्होंने अपना पक्ष रख कर हमसे बातें की थी उससे हमें भी यही लगा था कि यकीनन किसी और ने ही उन औरतों की कुछ इस तरह से हत्या की है कि हमारे ज़हन में उनके हत्यारे के रूप में गांव के साहूकारों का ही ख़याल आए। हमने सोचा कि हो सकता है कि वो हम दोनों परिवारों के संबंध सुधर जाने से नाराज़ हो गया होगा और हर्गिज़ नहीं चाहता होगा कि हमारा आपस में ऐसा प्रेम संबंध हो। बहरहाल दिमाग़ भले ही नहीं मान रहा था लेकिन हमने दिमाग़ की जगह दिल की सुनना ज़्यादा बेहतर समझा। आख़िर हम भी तो नहीं चाहते थे कि दोनों परिवारों के बीच एक दिन में ही बैर भाव अथवा किसी तरह का संदेह भाव पैदा हो जाए। सच तो ये है कि हमें उस दिन दिल की नहीं बल्कि दिमाग़ की ही सुननी चाहिए थी और समझ जाना चाहिए था कि साहूकारों का हमसे अपने रिश्ते सुधार लेना सिर्फ और सिर्फ एक दिखावा था। बल्कि ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि रिश्तों को सुधार लेना उनकी योजना का एक हिस्सा था। क्यों गौरी शंकर हमने सच कह न?"
"हां।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"मगर अब समझे तो क्या समझे ठाकुर साहब? पर शायद सच यही है कि उस समय अगर आपने दिल की सुनी तो ये आपकी नेक नीयती और उदारता की ही बात थी। यानि आप सच में यही चाहते थे कि हमारे रिश्ते ऐसे ही बेहतर बने रहें मगर हम इतने नेक और उदार नहीं थे। हमारे अंदर तो वर्षों से बदले की भावना धधक रही थी जिसके चलते हमने कभी ये सोचना गवारा ही नही किया कि बदला लेने की जगह अगर हम दोनों परिवार मिल कर एक नई शुरुआत करें तो कदाचित दोनों ही परिवारों का भविष्य बेहद सुखद हो सकता है। ख़ैर ये सच है कि हमने ही इन लोगों की औरतों को मजबूर कर के हवेली में नौकरानी के रूप में स्थापित किया था। एक का काम था वैभव को चाय में थोड़ा थोड़ा मिला कर ऐसा ज़हर देना जिसकी वजह से वैभव की मर्दानगी हर रोज़ कम होती जाए और फिर एक दिन वो पूरी तरह से नामर्द ही बन जाए। दूसरी का काम था हवेली में गुप्त रूप से आपकी ज़मीनों के कागज़ात खोज कर उन्हें हासिल करना। उन दोनों को सख़्त आदेश था कि अगर उन्हें ज़रा सा भी लगे कि उनका भेद खुल गया है अथवा उनका पकड़े जाना निश्चित है तो वो हमारे द्वारा दिए गए ज़हर को खा कर अपनी जान ले लें।"
"बस कीजिए।" सुनैना देवी रोते हुए चीख ही पड़ी____"और कितने गुनाहों का बखान करेंगे आप? यकीन नहीं होता कि इतना सब कुछ मेरे घर के मर्दों ने किया है। काश! मुझे थोड़ा सा भी इल्म हो जाता तो मैं ये सब आपको करने ही नहीं देती। हे ईश्वर! किसी इंसान की बुद्धि इतनी भ्रष्ट कैसे हो सकती है? कोई खुशी खुशी इतने बड़े बड़े पाप कैसे कर सकता है?"
"चुप हो जाइए मां।" गौरी शंकर की बेटी राधा ने दुखी भाव से अपनी मां से कहा____"ये सब सोच कर इस तरह आंसू बहाने से अब क्या होगा? कितना गर्व करते थे हम कि हमारे अपने कितने अच्छे हैं लेकिन क्या पता था कि अच्छी सूरतों के पीछे कितने बड़े शैतान छुपे हुए हैं।"
कहने के साथ ही राधा अपने पिता गौरी शंकर से मुखातिब हुई और फिर बोली____"मैंने कभी भी आप में से किसी के भी सामने कुछ बोलने की हिमाकत नहीं की पिता जी। ऐसा सिर्फ इस लिए क्योंकि ये सब आप लोगों द्वारा दिए गए अच्छे संस्कार थे। मैं आपसे सिर्फ इतना जानना चाहती हूं कि आख़िर क्या हासिल कर लिया आपने बदला ले कर? क्या इस बदले से आप अपने उस परिवार को अपार खुशियां दे पाए जो अब तक सबके साथ हंसी खुशी जी रहे थे?"
"म...मुझे माफ़ कर दे बेटी।" गौरी शंकर अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था, बोला____"ऊपर बैठा विधाता हमसे यही करवाना चाहता था। कहते हैं कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं होता। वो बड़े से बड़े नासूर बन गए ज़ख्मों को भी भर देता है मगर कदाचित वो हमारे ज़ख्म नहीं भर सका। अगर भर दिया होता तो क्या आज हम सब ऐसी हालत में होते?"
"मैं ज़्यादा तो कुछ नहीं जानती पिता जी।" राधा ने कहा____"किंतु आप लोगों से ही सुना है कि इंसान के हाथ में सिर्फ कर्म करना ही होता है। तो अब आप ही बताइए अगर इंसान के बस में सिर्फ कर्म करना था तो आपने ऐसे कर्म क्यों किए जिसकी वजह से हमारा पूरा परिवार मिट्टी में मिल गया? अपने कर्म को विधाता अथवा किस्मत का लिखा मत बताइए। विधाता आपसे ये कहने नहीं आया कि आप बदले की आग में जलिए और किसी की हत्या कर दीजिए।"
गौरी शंकर अवाक सा देखता रह गया अपनी बेटी को। कुछ कहना तो चाहा उसने लेकिन जुबान ने साथ नहीं दिया। उसके बगल से रूपचंद्र किसी पुतले की तरह खड़ा था।
"अब हम सबका क्या होगा पिता जी?" राधा की आंखें छलक पड़ीं____"आप लोगों ने तो बदला लेने के चक्कर में खुद को ही मिटा दिया मगर हमारा क्या? आपके घर की ये औरतें और आपकी बहू बेटियां किसके सहारे जियेंगी अब?"
राधा की बातें सुन कर और उसका रोना देख भीड़ में खड़े जाने कितने ही लोगों की आंखें नम हो गईं। मुझे खुद भी बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था। तभी मैंने देखा रूपा आगे आई और उसने राधा को अपने से छुपका लिया। राधा उससे छुपक कर और भी ज़्यादा रोने लगी। गौरी शंकर अपनी बेटी और अपने घर की बाकी औरतों को नम आंखों से देखता रहा।
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"पंच के रूप में हमने आप सबकी बातें और साथ ही दुख तकलीफ़ों को बड़े ध्यान से सुना है।" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने मैदान में खड़े समस्त जन समूह को देखते हुए ऊंचे स्वर में कहा____"ये एक ऐसा मामला है जिसका फ़ैसला करना बिल्कुल भी आसान नहीं हैं। अगर गहराई से सोचा जाए तो इस मामले का फ़ैसला किसी के लिए भी बेहतर नहीं हो सकता। माना कि कुछ लोगों को इसके फ़ैसले से आत्मिक शांति मिल सकती है लेकिन ये भी सच है कि महज आत्मिक शांति से किसी के भी परिवार के सदस्यों का जीवन बेहतर तरीके से नहीं चल सकता।"
"यहां ऐसे भी हैं जो हमारे फ़ैसले पर पक्षपात करने का आरोप भी लगा सकते हैं।" कुछ पल की ख़ामोशी के बाद महेंद्र सिंह ने पुनः कहा____"ऐसे व्यक्तियों से हमारा यही कहना है कि अगर वो चाहें तो इस मामले को हमारे देश के कानून के समक्ष रख सकते हैं और उसी कानून के द्वारा इंसाफ़ हासिल कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करने से पहले ये भी अच्छी तरह सोच लें कि देश का कानून जो फ़ैसला सुनाएगा उससे किसी का भी भला नहीं हो सकेगा जबकि हमने इस मामले में ऐसा फ़ैसला करने का सोचा है जिससे सबका भला भी हो सके। क्या आप सब हमारी इस बात से सहमत हैं?"
ठाकुर महेंद्र सिंह की इन बातों को सुन कर पूरे जन समूह में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे उनमें से किसी को भी महेंद्र सिंह जी की बातें समझ नहीं आईं थी।
"इसमें इतना सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं है किसी को।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने किसी को कुछ न बोलता देख कहा____"बहुत ही सरल और साधारण सी बात है जिसे आप सबको समझने की ज़रूरत है। आप सब जानते हैं कि इस मामले से जुड़ा हर व्यक्ति गुनहगार है। इस मामले से जुड़े हर व्यक्ति ने एक दूसरे के अपनों की हत्याएं की हैं और हत्याएं करना सबसे बड़ा अपराध है जिसकी कोई माफ़ी नहीं हो सकती। अगर ये सोच कर हम फ़ैसला करें कि हर हत्यारे को मौत की सज़ा दी जाए तो क्या ये उचित होगा? एक तरफ इस गांव के साहूकार हैं जिन्होंने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी के चलते ठाकुर साहब के छोटे भाई और बड़े बेटे की हत्या की और इतना ही नहीं उनके छोटे बेटे का भी जीवन बर्बदाद कर देना चाहा। बदले में ठाकुर साहब ने भी बदले के रूप में साहूकारों का संघार कर दिया। दोनों परिवारों में गुनहगार के रूप में एक तरफ गौरी शंकर और रूपचंद्र हैं तो दूसरी तरफ ठाकुर साहब। अब अगर इनके अपराधों के लिए इन्हें मौत की सज़ा सुना दी जाए तो क्या ये उचित होगा? सवाल है कि गौरी शंकर और रूपचंद्र की मौत हो जाने के बाद इनके घर परिवार की औरतों और बहू बेटियों का क्या होगा? वो सब किसके सहारे अपना जीवन बसर करेंगी? यही सवाल ठाकुर साहब के बारे में भी है कि अगर इन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी तो हवेली में रहने वाले किसके सहारे जिएंगे? दूसरी तरफ मुंशी चंद्रकांत हैं जिन्होंने अपनी दुश्मनी ठाकुर साहब से निकाली और इन्होंने साहूकारों के साथ मिल कर मझले ठाकुर जगताप और बड़े कुंवर अभिनव की हत्या की। हालाकि बदले में ठाकुर साहब ने इनकी अथवा इनके बेटे की हत्या नहीं की। इस हिसाब से देखा जाए तो वास्तव में ये दोनो पिता पुत्र ठाकुर साहब के अपराधी हैं और इन्होंने जो किया है उसके लिए इन्हें यकीनन मौत की सज़ा ही मिलनी चाहिए लेकिन सवाल वही है कि क्या इन्हें भी ऐसी सज़ा देना उचित होगा? आखिर इनके बाद इनके घर की औरतों का क्या होगा?"
ठाकुर महेंद्र सिंह इतना सब कहने के बाद भीड़ में खड़े लोगों की तरफ देखने लगे। इतने बड़े जन समूह में आश्चर्यजनक रूप से सन्नाटा फैला हुआ था। किसी को भी महेंद्र सिंह से ऐसी बातों की उम्मीद नहीं थी।
"पंच के रूप में बिना कोई पक्षपात किए न्याय करना हमारा फर्ज़ है।" उन्होंने फिर से कहना शुरू किया____"किंतु हमारा ये देखना भी फ़र्ज़ है कि इस सबके बाद भी किसी के लिए क्या उचित है? देखिए, जो बीत गया अथवा जो कर दिया गया वो सिर्फ दुश्मनी या बदले की भावना से किया गया। हम अच्छी तरह जानते हैं कि इतना कुछ करने के बाद भी किसी को भी सुख चैन नहीं मिला होगा बल्कि सिर्फ दुख और ज़माने भर की निंदा ही मिली है। इस लिए हम व्यक्तिगत रूप से ये चाहते हैं कि सब कुछ भुला कर आप सब एक नए सिरे से शुरुआत कीजिए। किसी से बैर रख कर किसी की हत्या करने से कभी कोई खुशी हासिल नहीं हो सकती। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते कि आप लोगों की वजह से आपके घर परिवार के बाकी सदस्यों का जीवन नर्क के समान हो जाए। इस लिए अगर आप सबको हमारी ये बातें समझ आ रही हैं तो बेझिझक हो कर हमें बता दें। बाकी पंच के रूप में तो हमें फ़ैसला करना ही है लेकिन ये भी सच है कि उस फ़ैसले से यही होगा कि जो कुछ बचा है वो भी बर्बाद हो जाएगा।"
इस बार जन समूह में खुसुर फुसुर की आवाज़ें आनी शुरू हो गईं। साहूकार गौरी शंकर और रूपचंद्र के चेहरों पर अजीब तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। यही हाल मुंशी चंद्रकांत और उसके बेटे रघुवीर का भी था।
"ठाकुर साहब।" सहसा गौरी शंकर ने कहा____"अगर ऐसा सच में हो सकता है तो ये हमारे लिए खुशी की ही बात होगी लेकिन इसका यकीन भला हम कैसे करें कि इसके बाद हम पर या हमारे परिवार के किसी सदस्य पर ठाकुर साहब का क़हर नहीं बरपेगा?"
"मेरा भी यही कहना है ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने महेंद्र सिंह से कहा____"हम कैसे भरोसा करें कि हमारे द्वारा इतना कुछ किए जाने के बाद ठाकुर साहब द्वारा हम पर कभी कोई आंच नहीं आएगी? ठाकुर साहब का तो हम एक घड़ी के लिए यकीन भी कर सकते हैं किंतु हमें छोटे कुंवर पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।"
"बेशक आप लोगों का ऐसा सोचना जायज़ है चंद्रकांत।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"किंतु यही बात आप लोगों पर भी तो लागू होती है। ये तो सभी जानते हैं कि जब से दादा ठाकुर की कुर्सी पर ठाकुर प्रताप सिंह बैठे हैं तब से इनके द्वारा कभी भी किसी का अनिष्ट नहीं हुआ। इन्होंने हमेशा सबकी भलाई का ही काम किया है और हर ज़रूरतमंद की हर तरह से मदद की है। ज़ाहिर है इतना कुछ होने के बाद भी आम जनता को इन पर भरोसा होगा कि इसके बाद भी इनके द्वारा आप लोगों के साथ ही नहीं बल्कि किसी के साथ भी अनिष्ट नहीं होगा। हां, आम जनता को आप लोगों पर ही भरोसा नहीं हो सकेगा क्योंकि हत्या जैसे अपराध तो आप लोगों ने ही करने शुरू किए थे। इस बारे में क्या कहेंगे आप लोग?"
ठाकुर महेंद्र सिंह की ये बातें सुन कर गौरी शंकर और चंद्रकांत कुछ न बोले। कदाचित उन दोनों को ही इस बात का एहसास हो गया था कि उनके बारे में जो कुछ महेंद्र सिंह ने कहा है वो एक कड़वा सच है। तभी सहसा जन समूह में से कुछ लोग चिल्लाने लगे। एक साथ कई लोगों के स्वर वातावरण में गूंज उठे। सबका यही कहना था कि उन्हें साहूकार गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत पर भरोसा नहीं है।
"कमाल है।" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह मुस्कुराते हुए बोल उठे____"हमने तो बस अपना अंदेशा ज़ाहिर किया था लेकिन हमारे अंदेशे की पुष्टि तो यहां मौजूद लोगों ने ही कर दी। क्या अब भी आप लोगों को लगता है कि इस तरह का सवाल आप लोगों को करना चाहिए था?"
गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत ने सिर झुका लिया। इधर महेंद्र सिंह ने पिता जी से कहा____"आपका क्या कहना है ठाकुर साहब? हमारा मतलब है कि क्या आप हमारी व्यक्तिगत राय से सहमत हैं? क्या आप भी ये समझते हैं कि सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से शुरुआत की जाए ताकि जो कुछ बचा है वो बर्बाद होने से बच जाए? अगर आप सहमत हैं और आपकी इजाज़त हो तो इस मामले का यही फ़ैसला हम सुना देते हैं।"
"हम आपकी बातों से सहमत हैं।" पिता जी ने कहा____"हम खुद भी नहीं चाहते कि किसी कठोर फ़ैसले की वजह से गौरी शंकर के परिवार की औरतें और उनकी बहू बेटियां अनाथ और बेसहारा हो जाएं। हम तो पहले भी यही चाहते थे कि दोनों परिवार प्रेम पूर्वक रहें और ऐसा हमेशा ही चाहेंगे। हां ये सच है कि हमने गुस्से में आ कर इनके भाइयों और बच्चों को मार डाला जिसका अब हमें बेहद अफ़सोस ही नहीं बल्कि बेहद दुख भी हो रहा है। हम चाहते हैं कि किसी और को उनके अपराधों की सज़ा मिले या न मिले लेकिन हमें ज़रूर मिलनी चाहिए। इतना बड़ा नर संघार करने के बाद हम कभी चैन से जी नहीं पाएंगे। अच्छा होगा कि हमें मौत की सज़ा सुना दी जाए।"
पिता जी की बात सुन कर मैं तो हैरान हुआ ही था किंतु गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत भी आश्चर्य से देखने लगे थे उन्हें। कदाचित उन्हें मेरे पिता जी से ऐसा सुनने की सपने में भी उम्मीद नहीं थी।
"ऐसा नहीं हो सकता ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"अगर सज़ा मिलेगी तो फिर हर अपराधी को सज़ा मिलेगी अन्यथा किसी को भी नहीं। वैसे आपके लिए ये सज़ा जैसा ही होगा कि आप अपने गुनाहों का जीवन भर पश्चाताप करते रहें। एक और बात, आज के बाद अब आप कभी भी पंच अथवा मुखिया नहीं बन सकते।"
"हत्या जैसा अपराध करने के बाद तो हम खुद भी पंच अथवा मुखिया बने रहना पसंद नहीं करेंगे ठाकुर साहब।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"पंच अथवा मुखिया तो परमेश्वर का रूप होता है, हमारे जैसा हत्यारा नहीं हो सकता।"
उसके बाद जब सभी पक्ष राज़ी हो गए तो यही फ़ैसला किया गया कि सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से शुरआत की जाए। ज़ाहिर है ये फ़ैसला इसी बिना पर किया गया कि इससे सभी के परिवारों का भला हो सके। पंच के रूप में ठाकुर महेन्द्र सिंह ने सभी पक्षों को ये सख़्त हिदायत दी कि अब से कोई भी एक दूसरे का बुरा नहीं करेगा अन्यथा कठोर दण्ड दिया जाएगा।
गौरी शंकर इस फ़ैसले से खुश तो हुआ लेकिन अपने भाइयों तथा बच्चों की मौत से बेहद दुखी भी था। दूसरी तरफ मुंशी चंद्रकांत सामान्य ही नज़र आया। सफ़ेदपोश के बारे में यही कहा गया कि उसे जल्द से जल्द तलाश कर के पंच के सामने हाज़िर किया जाए। हालाकि ये अब हमारा मामला था जिसे देखना हमारा ही काम था। ख़ैर इस फ़ैसले से मुझे भी खुशी हुई कि चलो एक बड़ी मुसीबत टल गई वरना इतना कुछ होने के बाद कुछ भी हो सकता था। सहसा मेरे मन में ख़याल उभरा कि _____'इस तरह का फ़ैसला शायद ही किसी काल में किसी के द्वारा किया गया होगा।'
गौरी शंकर इस फ़ैसले से खुश तो हुआ लेकिन अपने भाइयों तथा बच्चों की मौत से बेहद दुखी भी था। दूसरी तरफ मुंशी चंद्रकांत सामान्य ही नज़र आया। सफ़ेदपोश के बारे में यही कहा गया कि उसे जल्द से जल्द तलाश कर के पंच के सामने हाज़िर किया जाए। हालाकि ये अब हमारा मामला था जिसे देखना हमारा ही काम था। ख़ैर इस फ़ैसले से मुझे भी खुशी हुई कि चलो एक बड़ी मुसीबत टल गई वरना इतना कुछ होने के बाद कुछ भी हो सकता था। सहसा मेरे मन में ख़याल उभरा कि _____'इस तरह का फ़ैसला शायद ही किसी काल में किसी के द्वारा किया गया होगा।'
अब आगे....
"मालिक, बाहर पुलिस वाले आए हैं।" एक दरबान ने बैठक में आ कर पिता जी से कहा____"अगर आपकी इजाज़त हो तो उन्हें अंदर भेज दूं"
"हां भेज दो।" पिता जी ने कहा तो दरबान अदब से सिर नवा कर चला गया।
"शायद कानून के नुमाइंदों को पता चल गया है कि यहां क्या हुआ है।" पास ही एक कुर्सी पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"ज़रूर इस मामले के बारे में किसी ने पुलिस तक ये ख़बर भेजवाई होगी। इसी लिए वो यहां आए हैं। ख़ैर सोचने वाली बात है कि अगर इस मामले में पुलिस ने कोई हस्ताक्षेप किया तो भारी समस्या हो सकती है ठाकुर साहब।"
"वर्षों से इस गांव के ही नहीं बल्कि आस पास के गावों के मामले भी हम ही देखते आए हैं महेंद्र सिंह जी।" पिता जी ने कहा____"ना तो इसके पहले कभी पुलिस या कानून का हमारे किसी मामले में कोई दखल हुआ था और ना ही कभी हो सकता है।"
पिता जी की बात सुन कर महेंद्र सिंह अभी कुछ कहने ही वाले थे कि तभी बैठक के बाहर किसी के आने की आहट हुई जिसके चलते वो चुप ही रहे। अगले ही पल पुलिस के दो अफ़सर खाकी वर्दी पहने बैठक में नमूदार हुए। दोनों ने बड़े अदब से पहले पिता जी को सिर नवाया और फिर बैठक में बैठे बाकी लोगों को। पिता जी ने इशारे से उन्हें खाली कुर्सियों में बैठ जाने को कहा तो वो दोनों धन्यवाद ठाकुर साहब कहते हुए बैठ गए।
"कहो एस पी।" पिता जी ने दोनों में से एक की तरफ देखते हुए कहा____"यहां आने का कैसे कष्ट किया और हां हमारे छोटे भाई तथा बेटे की लाशों का क्या हुआ? वो अभी तक हमें क्यों नहीं सौंपी गईं?"
"माफ़ कीजिए ठाकुर साहब।" एस पी ने खुद को संतुलित रखने का प्रयास करते हुए कहा____"ऐसे कामों में समय तो लगता ही है। हालाकि मैंने पूरी कोशिश की थी कि आपको इन्तज़ार न करना पड़े। ये मेरी कोशिश का ही नतीजा है कि मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की डेड बॉडी का जल्दी ही पोस्ट मॉर्टम हो गया। शाम होने से पहले ही वो आपको सुपुर्द कर दी जाएंगी।"
"तो आपको हमारे जिगर के टुकड़ों की डेड बॉडीज के साथ ही यहां आना चाहिए था।" पिता जी ने कहा____"इस तरह खाली हाथ यहां चले आने का सोचा भी कैसे आपने?"
"ज...जी वो बात दरअसल ये है कि हमें पता चला है कि यहां आपके द्वारा बहुत बड़ा नर संघार किया गया है।" एस पी ने भारी झिझक के साथ कहा____"बस उसी सिलसिले में हम यहां आए हैं। अगर आपकी इजाज़त हो तो हम इस मामले की छानबीन कर लें?"
"ख़ामोश।" पिता जी गुस्से से दहाड़ ही उठे____"तुम्हारे ज़हन में ये ख़याल भी कैसे आया कि तुम हमारे किसी मामले में दखल दोगे अथवा अपनी टांग अड़ाओगे? हमने अपने जिगर के टुकड़ों की डेड बॉडीज़ भी तुम्हें इस लिए ले जाने दिया था क्योंकि उस समय हमारी मानसिक अवस्था ठीक नहीं थी। किंतु इसका मतलब ये नहीं है कि हमने पुलिस को अपने किसी मामले में हस्ताक्षेप करने का अधिकार दे दिया है। ये मत भूलो कि वर्षों से हम खुद ही आस पास के सभी गांवों के मामलों का फ़ैसला करते आए हैं। न इसके पहले कभी पुलिस का कोई दखल हुआ था और ना ही कभी होगा।"
"म....माफ़ कीजिए ठाकुर साहब।" दूसरे पुलिस वाले ने झिझकते हुए कहा____"लेकिन ऐसा हमेशा तो नहीं हो सकता ना। इस देश के कानून को तो एक न एक दिन सबको मानना ही पड़ेगा।"
"लगता है तुम नए नए आए हो बर्खुरदार।" महेंद्र सिंह ने कहा____"इसी लिए ऐसा बोलने की हिमाकत कर रहे हो ठाकुर साहब से। ख़ैर तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम यहां पर कानून का पाठ मत पढ़ाओ किसी को।"
"अ...आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?" वो थोड़ा तैश में आ गया____"मैं इस देश के कानून का नुमाइंदा हूं और मेरा ये फर्ज़ है कि मैं ऐसे हर मामले की छानबीन करूं जिसे कानून को हाथ में ले कर अंजाम दिया गया हो।"
"अच्छा ऐसा है क्या?" अर्जुन सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा____"ज़रा हम भी तो देखें कि कानून के इस नुमाइंदे में कितना दम है? हमें दिखाओ कि हमारे मामले में कानून का नुमाइंदा बन कर तुम किस तरह से हस्ताक्षेप करते हो?"
"इन्हें माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" एस पी दूसरे पुलिस वाले के कुछ बोलने से पहले ही झट से बोल उठा____"इन्हें अभी आप सबके बारे में ठीक से पता नहीं है। यही वजह है कि ये आपसे ऐसे लहजे में बात कर रहे हैं।"
"य...ये आप क्या कह रहे हैं साहब?" दूसरा पुलिस वाला आश्चर्य से एस पी को देखते हुए बोला____"कानून के रक्षक हो कर आप ऐसी बात कैसे कह सकते हैं?"
"लाल सिंह।" एस पी ने थोड़े गुस्से में उसकी तरफ देखा और फिर कहा____"ये शहर नहीं है बल्कि वो जगह है जहां पर इस देश का कानून नहीं बल्कि यहां के ठाकुरों का कानून चलता है। अपने लहजे और तेवर को ठंडा ही रखो वरना जिस वर्दी के दम पर तुम ये सब बोलने की जुर्रत कर रहे हो उसे तुम्हारे जिस्म से उतरने में ज़रा भी समय नहीं लगेगा।"
अपने आला अफ़सर की ये डांट सुन कर लाल सिंह भौचक्का सा रह गया। हालाकि यहां आते समय रास्ते में एस पी ने उसे थोड़ा बहुत यहां के बारे में बताया भी था किंतु ये नहीं बताया था कि ऐसा बोलने पर उसके साथ ऐसा भी हो सकता है। बहरहाल एस पी के कहने पर उसने सभी से अपने बर्ताव के लिए हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी। ये अलग बात है कि अंदर ही अंदर वो अपमानित सा महसूस करने लगा था।
"ठीक है ठाकुर साहब।" एस पी ने पिता जी की तरफ देखते हुए नम्रता से कहा____"अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो यही सही। वैसे भी मुझे ऊपर से ही ये हुकुम मिल गया था कि मैं आपके किसी मामले में कोई हस्ताक्षेप न करूं। मैं तो बस यहां यही बताने के लिए आया था कि मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की डेड बॉडीज को आज शाम होने से पहले ही आपके सुपुर्द कर दिया जाएगा। आपको हमारी वजह से जो तक़लीफ हुई है उसके लिए हम माफ़ी चाहते हैं।"
कहने के साथ ही एस पी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। उसके साथ ही उसका सहयोगी पुलिस वाला लाल सिंह भी जल्दी से उठ गया। उसके बाद वो दोनों सभी को नमस्कार कर के बैठक से बाहर निकल गए।
"एक वो वक्त था जब हमारे पिता जी के दौर में कोई पुलिस वाला गांव में घुसने की भी हिम्मत नहीं करता था।" पिता जी ने ठंडी सांस लेते हुए कहा____"और एक ये वक्त है जब कोई पुलिस का नुमाइंदा इस गांव में ही नहीं बल्कि हमारी हवेली की दहलीज़ को भी पार करने की जुर्रत कर गया। हमारी नर्मी का बेहद ही नाजायज़ फ़ायदा उठाया है सबने।"
"सब वक्त की बातें हैं ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज कम से कम अभी इतना तो है कि इतने बड़े संगीन मामले के बाद भी पुलिस अपना दखल देने से ख़ौफ खा गई है। ज़ाहिर है ये आपके पुरखों का बनाया हुआ कानून और ख़ौफ ही रहा है। सबसे ज़्यादा तो बड़े दादा ठाकुर का ख़ौफ रहा जिसके चलते कानून का कोई भी नुमाइंदा गांव की सरहद के इस पार क़दम भी नहीं रख सकता था। ख़ैर इसे आपकी नर्मी कहें अथवा समय का चक्र कि अब ऐसा नहीं रहा और यकीन मानिए आगे ऐसा भी समय आने वाला है जब यहां भी कानून का वैसा ही दखल होने लगेगा जैसा शहरों में होता है।"
"सही कहा आपने।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"यकीनन आने वाले समय में ऐसा ही होगा। ख़ैर ये तो बाद की बातें हैं किंतु ये जो कुछ हुआ है उसने हमें काफी ज़्यादा आहत और विचलित सा कर दिया है। हमें अब जा कर एहसास हो रहा है कि हमने साहूकारों का इस तरह से नर संघार कर के बिल्कुल भी ठीक नहीं किया है। माना कि वो सब अपराधी थे लेकिन उनके बच्चों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था। अपराधी तो मणि शंकर और उसके तीनों भाई थे जबकि उनके बच्चे तो निर्दोष ही थे। ऊपर वाला हमें इस जघन्य पाप के लिए नर्क में भी जगह नहीं देगा। काश! पंचायत में आपने हमें मौत की सज़ा सुना दी होती तो बेहतर होता। कम से कम हमें इस अजाब से तो मुक्ति मिल जाती। जीवन भर ऐसे भयानक पाप का बोझ ले कर हम कैसे जी सकेंगे?"
"अब तो आपको इस बोझ के साथ ही जीना होगा ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"अच्छा होगा कि अपने किए गए कृत्य के लिए आप कुछ इस तरह से प्रायश्चित करें जिससे आपकी आत्मा को शांति मिल सके।"
"ऐसा क्या करें हम?" पिता जी ने आहत भाव से कहा____"हमें तो अब कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। मन करता है कि कहीं ऐसी जगह चले जाएं जहां इंसान तो क्या कोई परिंदा भी न रहता हो।"
"ऐसा सोचिए भी मत ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"क्योंकि ऐसी जगह पर जा कर भी आपको सुकून नहीं मिलेगा। शांति और सुकून प्रायश्चित करने से ही मिलेगा। अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप ऐसा क्या करें जिससे आपको ये प्रतीत हो कि उस कार्य से आपके अंदर का बोझ कम हो रहा है अथवा आपको सुकून मिल रहा है।"
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"मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी।" कमरे में भाभी के सामने पहुंचते ही मैंने सिर झुका कर कहा____"मैं आपसे किया हुआ वादा नहीं निभा सका। आपके सुहाग को छीनने वालों को मिट्टी में नहीं मिला सका।"
"कोई बात नहीं वैभव।" भाभी ने अधीरता से कहा____"शायद ऊपर वाला यही चाहता है कि मेरी आत्मा को कभी शांति ही न मिले। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है क्योंकि तुमने उन हत्यारों का पता तो लगा ही लिया है जिन्होंने मेरे सुहाग को मुझसे छीन लिया है। पिछली रात जब तुम बिना किसी को कुछ बताए चले गए थे तो मैं बहुत घबरा गई थी। अपने आप पर ये सोच कर गुस्सा आ रहा था कि मैंने तुमसे अपने सुहाग के हत्यारे को मिट्टी में मिलाने की बात ही क्यों कही? अगर इसके चलते तुम्हें कुछ हो जाता तो कैसे मैं अपने आपको माफ़ कर पाती? सारी रात यही सोच सोच कर कुढ़ती रही। जान में जान तब आई जब मुझे पता चला कि तुम सही सलामत वापस आ गए हो। अब मैं तुमसे कहती हूं कि तुम्हें ऐसा कोई काम नहीं करना है जिसकी वजह से तुम्हें कुछ हो जाए। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहती कि तुम्हें कुछ हो जाए। तुम इस हवेली का भविष्य हो वैभव। तुम्हें हम सबके लिए सही सलामत रहना है।"
"और आपका क्या?" मैंने भाभी की नम हो चुकी आंखों में देखते हुए कहा____"क्या आपको कभी उन हत्यारों के जीवित रहते आत्मिक शांति मिलेगी जिन्होंने आपके सुहाग को छीन कर आपकी ज़िंदगी को नर्क बना दिया है?"
"सच तो ये है वैभव कि उन ज़ालिमों के मर जाने पर भी मुझे आत्मिक शांति नहीं मिल सकती।" भाभी ने दुखी भाव से कहा____"क्योंकि उनके मर जाने से मेरा सुहाग मुझे वापस तो नहीं मिल जाएगा न। मेरे दिल को खुशी तो तभी मिलेगी ना जब मेरा सुहाग मुझे वापस मिल जाए किंतु इस जीवन में तो अब ऐसा संभव ही नहीं है। तुमने अपनी क़सम दे कर मुझे जीने के लिए मजबूर कर दिया है तो अब मुझे जीना ही पड़ेगा।"
"मैं आपसे वादा करता हूं भाभी कि चाहे मुझे जो भी करना पड़े।" मैंने भाभी की दोनों बाजुओं को थाम कर कहा____"लेकिन आपको खुशियां ज़रूर ला कर दूंगा। आपसे बस यही विनती है कि आप खुद को कभी भी अकेला महसूस नहीं होने देंगी और ना ही चेहरे पर उदासी के बादलों को मंडराने देंगी।"
"तुम्हारी खुशी के लिए ये मुश्किल काम ज़रूर करूंगी।" भाभी ने कहा____"ख़ैर ये बताओ कि वो लड़की कौन थी जिसने पंचायत में आते ही तुम्हारा नाम ले कर सुनहरा इतिहास बनाने की बातें कह रही थी?"
भाभी के इस सवाल पर मैं एकदम से गड़बड़ा गया। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने पंचायत में किसी ऐसी लड़की को देखा ही नहीं था बल्कि उसकी बातें भी सुनी थीं।
"इतना तो मैं जान चुकी हूं कि वो साहूकारों की बेटी है।" भाभी ने कहा____"किंतु अब ये जानना चाहती हूं कि वो तुम्हें कैसे जानती है? वो भी इस तरह कि इतने सारे लोगों के रहते हुए भी उसने तुम्हारी बात का समर्थन किया और तुम्हारा नाम ले कर वो सब कहा। तुम्हारी बात का समर्थन करते हुए वो अपने ही परिवार के खिलाफ़ बोले जा रही थी। क्या मैं ये समझूं कि साहूकारों की उस लड़की के साथ तुम्हारा पहले से ही कोई चक्कर रहा है?"
"आप ये सब मत पूछिए भाभी।" मैंने असहज भाव से कहा____"बस इतना समझ लीजिए कि मेरा नाम दूर दूर तक फैला हुआ है।"
"हे भगवान!" भाभी ने हैरत से आंखें फैला कर मुझे देखा____"तो मतलब ऐसी बात है, हां?"
"क...क्या मतलब??" मैं उनकी बात सुन कर बुरी तरह चौंका।
"जाओ यहां से।" भाभी ने एकदम से नाराज़गी अख़्तियार करते हुए कहा____"मुझे अब तुमसे कोई बात नहीं करना।"
"म...मेरी बात तो सुनिए भाभी।" मैं उनकी नाराज़गी देख अंदर ही अंदर घबरा उठा।
"क्या सुनूं मैं?" भाभी ने इस बार गुस्से से देखा मुझे____"क्या ये कि तुमने अपने नाम का झंडा कहां कहां गाड़ रखा है? कुछ तो शर्म करो वैभव। किसी को तो बक्स दो। मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि ये सब जो कुछ भी हुआ है उसमें तुम्हारी इन्हीं करतूतों का सबसे बड़ा हाथ है।"
"मानता हूं भाभी।" मैंने शर्मिंदा हो कर कहा____"मगर यकीन मानिए अब मैं वैसा नहीं रहा। चार महीने के वनवास ने मुझे मुकम्मल रूप से बदल दिया है। पहले ज़रूर मैं ऐसा था लेकिन अब नहीं हूं, यकीन कीजिए।"
"कैसे यकीन करूं वैभव?" भाभी ने उसी नाराज़गी से कहा____"क्या तुम्हें लगता है कि तुम पर कोई इन बातों के लिए यकीन कर सकता है?"
"जानता हूं कि कोई यकीन नहीं कर सकता।" मैंने सिर झुका कर कहा____"मगर फिर भी आप यकीन कीजिए। अब मैं वैसा नहीं रहा।"
"अच्छा।" भाभी ने मेरी आंखों में देखा____"क्या यही बात तुम मेरे सिर पर हाथ रख कर कह सकते हो?"
भाभी की ये बात सुन कर मैं कुछ न बोल सका। बस बेबसी से देखता रहा उन्हें। मुझे कुछ न बोलता देख उनके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।
"देखा।" फिर उन्होंने कहा____"मेरे सिर पर हाथ रखने की बात सुनते ही तुम्हारी बोलती बंद हो गई। मतलब साफ है कि तुम अभी भी वैसे ही हो जैसे हमेशा से थे। भगवान के लिए ये सब बंद कर दो वैभव। एक अच्छा इंसान बनो। ऐसे काम मत करो जिससे लोगों की बद्दुआ लगे तुम्हें। यकीन मानो, तुम में सिर्फ़ यही एक ख़राबी है वरना तुमसे अच्छा कोई नहीं है।"
"अब से आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा भाभी।" मैंने गंभीर भाव से कहा____"अब से आपको कभी भी मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी।"
"अगर ऐसा सच में हो गया।" भाभी ने कहा____"तो यकीन मानो, भले ही ईश्वर ने मुझे इतना बड़ा दुख दे दिया है लेकिन इसके बावजूद मुझे तुम्हारे इस काम से खुशी होगी।"
उसके बाद मैं अपने कमरे में चला आया। जाने क्यों अब मुझे ये सोच कर अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि ऐसा क्यों हूं मैं? आज से पहले क्यों मैंने ऐसे घिनौने कर्म किए थे जिसके चलते मेरी छवि हर किसी के मन में ख़राब बनी हुई है? मेरी इसी ख़राब छवि के चलते अनुराधा ने उस दिन मुझे वो सब कह दिया था। हालाकि ये सच है कि उसके बारे में मैं सपने में भी ग़लत नहीं सोच सकता था इसके बावजूद उसने मुझ पर भरोसा नहीं किया और मुझे वो सब कह दिया था। अचानक ही मुझे भुवन की बातें याद आ गईं। उसने कहा था कि अनुराधा मुझसे प्रेम करती है। मैं सोचने लगा कि क्या ये सच है या उसने अनुराधा के बारे में ग़लत अनुमान लगा लिया है? मुझे याद आया कि आज पंचायत में अनुराधा मुझे ही देखे जा रही थी। मैंने हर बार उससे अपनी नज़रें हटा ली थीं इस लिए मुझे उसके हाल का ज़्यादा अंदाज़ा नहीं हो पाया था किंतु इतना ज़रूर समझ सकता हूं कि उसमें कुछ तो बदलाव यकीनन आया है। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर वो मुझसे नफ़रत कर रही होती तो यूं मुझे ही न देखती रहती। कोई इंसान जब किसी को पसंद नहीं करता अथवा उससे घृणा करता है तो वो उस इंसान की शकल तक नहीं देखना चाहता किंतु यहां तो अनुराधा को मैंने जब भी देखा था तो उसे मैंने अपनी तरफ ही देखते पाया था। मतलब साफ है कि या तो भुवन की बात सच थी या फिर उसमें थोड़ा बहुत बदलाव ज़रूर आया है। एकाएक ही मैंने महसूस किया कि इस बारे में मैं सच जानने के लिए काफी उत्सुक और बेचैन हो उठा हूं।
रूपा, इस नाम को कैसे भूल सकता था मैं?
आज पंचायत में जिस तरह से उसने मेरी बात का समर्थन करते हुए मेरा नाम ले कर वो सब कहा था उसे देख सुन कर मैं हैरत में ही पड़ गया था। उसकी बातों से साफ पता चल रहा था कि उसे हमारे इस मामले के बारे में पहले से कुछ न कुछ पता था और इस बात का ज़िक्र भी उसने किया था।
अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मैं चौंक पड़ा। किसी बिजली की तरह मेरे ज़हन में ये ख़याल उभरा कि कहीं ये रूपा ही तो नहीं थी जिसका ज़िक्र पिता जी ने इस बात पर किया था कि चंदनपुर में मुझे जान से मारने की जब साहूकारों ने मुंशी के साथ मिल कर योजना बनाई थी तो उसी समय हवेली में दो औरतें इस बात की सूचना देने आईं थी?
ज़हन में इस ख़याल के आते ही मैं आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लगा। एकदम से मेरे ज़हन में सवाल उभरा कि कैसे?? मतलब कि अगर उन दो औरतों में से एक रूपा ही थी तो उसे ये कैसे पता चला था कि कुछ लोग मुझे जान से मारने के लिए अगली सुबह चंदनपुर जाने वाले हैं? ये एक ऐसा सवाल था जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था।
ज़हन में इस ख़याल के आते ही मैं आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लगा। एकदम से मेरे ज़हन में सवाल उभरा कि कैसे?? मतलब कि अगर उन दो औरतों में से एक रूपा ही थी तो उसे ये कैसे पता चला था कि कुछ लोग मुझे जान से मारने के लिए अगली सुबह चंदनपुर जाने वाले हैं? ये एक ऐसा सवाल था जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था।
अब आगे....
हवेली में एक बार फिर से कोहराम सा मच गया था। असल में पुलिस वाले जगताप चाचा और बड़े भैया की लाशों को पोस्ट मॉर्टम करने के बाद हवेली ले आए थे। हवेली के विशाल मैदान में लकड़ी के तख्ते पर दोनों लाशें लिटा कर रख दी गईं थी। मां, मेनका चाची, कुसुम और रागिनी भाभी दहाड़ें मार मार कर रोए जा रहीं थी। यूं तो अर्जुन सिंह का सुझाव था कि लाशों को सीधा शमशान भूमि में ही ले जाएं और पिता जी मान भी गए थे किंतु मां के आग्रह पर उन्हें घर ही लाया गया था। मां का कहना था कि कम से कम आख़िरी बार तो वो सब उन्हें अपनी आंखों से देख लें।
गांव की औरतें और चाची के ससुराल से आई उनकी एक भाभी सबको सम्हालने में लगी हुईं थी। पिता जी एक तरफ खड़े थे। उनकी आंखों में नमी थी। विभोर और अजीत भी सिसक रहे थे। दूसरी तरफ मैं भी खुद को अपने जज़्बातों के भंवर से निकालने की नाकाम कोशिश करते हुए खड़ा था। आख़िर सभी बड़े बुजुर्गों के समझाने बुझाने के बाद किसी तरह घर की औरतों का रुदन बंद हुआ। उसके बाद सब अंतिम संस्कार करने की तैयारी में लग गए।
क़रीब एक घंटे बाद दोनों लाशों को अर्थी पर रख कर तथा फिर उन्हें कंधों में ले कर शमशान की तरफ चल दिया गया। लोगों का हुजूम ही इतना इकट्ठा हो गया था कि एक बहुत लंबी कतार सी बन गई थी। पिता जी उस वक्त खुद को बिल्कुल भी सम्हाल नहीं पाए थे जब उन्हें अपने ही बड़े बेटे की अर्थी को कंधा देने को कहा गया। उन्होंने साफ इंकार कर दिया कि ये उनसे नहीं हो सकेगा। उसके बाद उन्होंने जगताप चाचा की अर्थी को कंधे पर ज़रूर रख लिया था। उनके साथ अर्जुन सिंह, चाचा का साला और खुद जगताप चाचा का बड़ा बेटा विभोर था। इधर बड़े भैया की अर्थी को मैं अपने कंधे पर रखे हुए था। मेरे साथ भैया का साला, शेरा और भुवन थे।
शमशान भूमि जो कि हमारी ज़मीनों का ही एक हिस्सा थी वहां पर पहले से ही दो चिताएं बना दी गईं थी। पूरा गांव ही नहीं बल्कि आस पास के गावों के भी बहुत से लोग आ कर जमा हो गए थे।
पंडित जी द्वारा क्रियाएं शुरू कर दी गईं। जगताप चाचा को चिताग्नि देने के लिए उनका बड़ा बेटा विभोर था जबकि भैया का अंतिम संस्कार करने के लिए मैं था। शमशान में खड़े हर व्यक्ति की आंखें नम थी। इतनी भीड़ के बाद भी गहन ख़ामोशी विद्यमान थी। कुछ ही देर में क्रिया संपन्न हुई तो मैंने और विभोर ने एक एक कर के चिता में आग लगा दी। भैया का चेहरा देख बार बार मेरा दिल करता था कि उनसे लिपट जाऊं और खूब रोऊं मगर बड़ी मुश्किल से मैं खुद को रोके हुए था।
दूसरी तरफ साहूकारों की अपनी ज़मीन पर जो शमशान भूमि थी वहां भी जमघट लगा हुआ था। साहूकारों के चाहने वाले तथा उनके सभी रिश्तेदार आ गए थे। सभी ने मिल कर मृत लोगों के लिए चिता तैयार कर दी थी और फिर सारी क्रियाएं करने के बाद रूपचंद्र ने एक एक कर के आठों चिताओं पर आग लगा दी। आज का दिन दोनों ही परिवारों के लिए बेहद ही दुखदाई था। खास कर साहूकारों के लिए क्योंकि उनके घर के एक साथ आठ सदस्यों का मरण हुआ था और ज़ाहिर है जाने वाले अब कभी वापस नहीं आने वाले थे।
अंतिम संस्कार के बाद बहुत से लोग शमशान से ही अपने अपने घर वापस चले गए और कुछ हमारे साथ ही खेत में बने एक बड़े से कुएं में नहाने के लिए आ गए। सबसे पहले मैं और विभोर नहाए और फिर मृतात्माओं को तिलांजलि दी। उसके बाद सभी एक एक कर के नहाने के बाद यही क्रिया दोहराने लगे। उसके बाद हम सब वापस हवेली की तरफ चल पड़े।
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रात बड़ी मुश्किल से गुज़री और फिर नया सवेरा हुआ। हमारे जो भी रिश्तेदार आए हुए थे वो जाने को तैयार थे। नाना जी सबसे बुजुर्ग थे इस लिए उन्होंने सबको समझाया बुझाया और अच्छे से रहने को कहा। उसके बाद सभी चले गए। सबके जाने के बाद हवेली में जैसे सन्नाटा सा छा गया।
मैंने और विभोर ने क्योंकि दाग़ लिया था इस लिए हम दोनों के लिए बैठक के पास ही एक अलग कमरा दे दिया गया था। हम दोनों तब तक हवेली के अंदर की तरफ नहीं जा सकते थे जब तक कि हम शुद्ध नहीं हो जाते अथवा तेरहवीं नहीं हो जाती। ऐसे मामलों में कुछ नियम थे जिनका हमें पालन करना अनिवार्य था।
ख़ैर दिन ऐसे ही गुज़रने लगे और फिर ठीक नौवें दिन शुद्ध हुआ जिसमें हवेली के सभी मर्द और लड़कों ने सिर का मुंडन करवाया। इस बीच शेरा को और अपने कुछ खास आदमियों को इस बात की ख़ास हिदायत दी गई थी कि वो साहूकारों और मुंशी चंद्रकांत पर नज़र रखे रहें। कोई भी संदिग्ध बात समझ में आए तो फ़ौरन ही उसकी सूचना दादा ठाकुर को दें। सफ़ेदपोश की तलाश भी गुप्त रूप से हो रही थी। हालाकि इन नौ दिनों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। ख़ैर ऐसे ही तीन दिन और गुज़र गए और तेरहवीं का दिन आ गया।
तेरहवीं का कार्यक्रम बड़े ही विशाल तरीके से हुआ। जिसमें आस पास के गांव वालों को भोजन ही नहीं बल्कि उन्हें यथोचित दान भी दिया गया। साहूकारों के यहां भी तेरहवीं थी इस लिए वहां भी उनकी क्षमता के अनुसार सब कुछ किया गया। इस सबमें पूरा दिन ही निकल गया। तेरहवीं के दिन मेरे मामा मामी लोग और विभोर के मामा मामी भी आए हुए थे और साथ ही भैया के ससुराल वाले भी। सारा कार्यक्रम बहुत ही बेहतर तरीके से संपन्न हो गया था। सारा दिन हम सब कामों में लगे हुए थे इस लिए थक कर चूर हो गए थे। रात में जब बिस्तर मिला तो पता ही न चला कब नींद ने हमें अपनी आगोश में ले लिया।
अगले दिन एक नई सुबह हुई। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सब कुछ बदला बदला सा है। इतने सारे लोगों के बीच भी एक अकेलापन सा है। सुबह नित्य क्रिया से फुर्सत होने के बाद और कपड़े वगैरह पहन कर जब मैं अपने कमरे से निकल कर सीढ़ियों की तरफ आया तो सहसा मेरी नज़र भाभी पर पड़ गई।
सफ़ेद साड़ी पहने तथा हाथ में पूजा की थाली लिए वो सीढ़ियों से ऊपर आ रहीं थी। यूं तो वो पहले भी ज़्यादा सजती संवरती नहीं थी क्योंकि उन्हें सादगी में रहना पसंद था और यही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती होती थी किंतु अब ऐसा कुछ नहीं था। उनके चेहरे पर एक वीरानी सी थी जिसमें न कोई आभा थी और न ही कोई भाव। जैसे ही वो ऊपर आईं तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ गई।
"प्रणाम भाभी।" वो जैसे ही मेरे समीप आईं तो मैंने हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया। उनके चेहरे पर मौजूद भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया, बोलीं____"हमेशा खुश रहो, ये लो प्रसाद।"
"अब भी आप भगवान की पूजा कर रही हैं?" मैंने उनके बेनूर से चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा___"बड़े हैरत की बात है कि जिस भगवान ने आपकी पूजा आराधना के बदले सिर्फ और सिर्फ दुख दिया उसकी अब भी पूजा कर रही हैं आप?"
"खुद को बहलाने के लिए मेरे पास और कुछ है भी तो नहीं।" भाभी ने सपाट लहजे में कहा____"जिसके लिए हवेली की चार दीवारों के अंदर ही अपना सारा जीवन गुज़ार देना मुकद्दर बन गया हो वो और करे भी तो क्या? ख़ैर, अब मैं ये पूजा अपने लिए नहीं कर रही हूं वैभव बल्कि अपनों के लिए कर रही हूं। मेरे अंदर अब किसी चीज़ की ख़्वाइश नहीं है किंतु हां इतना ज़रूर चाहती हूं कि दूसरों की ख़्वाइशें पूरी हों और वो सब खुश रहें।"
"और जिन्हें आपको खुश देख कर ही खुशी मिलती हो वो कैसे खुश रहें?" मैंने उनकी सूनी आंखों में देखते हुए पूछा।
"दुनिया में सब कुछ तो नहीं मिल जाया करता न वैभव?" भाभी ने कहा____"और ना ही किसी की हर इच्छा पूरी होती है। किसी न किसी चीज़ का दुख अथवा मलाल तो रहता ही है। इंसान को यही सोच कर समझौता कर लेना पड़ता है।"
"मैं किसी और का नहीं जानता।" मैंने दृढ़ता से कहा____"मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि आप खुश रहें। आप मुझे बताइए भाभी कि आपके लिए मैं ऐसा क्या करूं जिससे आपके चेहरे का नूर लौट आए और आपके होठों पर खुशी की मुस्कान उभर आए?"
"तुम्हें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने सहसा अपने दाहिने हाथ से मेरे बाएं गाल को सहला कर कहा____"किंतु हां, अगर तुम चाहते हो कि मुझे किसी बात से खुशी मिले तो सिर्फ इतना ही करो कि एक अच्छे इंसान बन जाओ।"
"मैंने आपसे कहा था ना कि अब मैं वैसा नहीं हूं?" मैंने कहा____"क्या अभी भी आपको मुझ पर यकीन नहीं है?"
"ये सवाल अपने आपसे करो वैभव।" भाभी ने कहा____"और फिर सोचो कि क्या सच में तुम पर इतना जल्दी कोई यकीन कर सकता है?"
मैं भाभी की बात सुन कर ख़ामोश रह गया। मुझे कुछ न बोलता देख उनके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई। फिर वो बिना कुछ कहे अपने कमरे की तरफ चली गईं और मैं बुत बना देखता रह गया उन्हें। बहरहाल मैंने खुद को सम्हाला और नीचे जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला।
रास्ते में मैं भाभी की बातों के बारे में ही सोचता जा रहा था। इस बात को तो अब मैं खुद भी समझता था कि आज से पहले तक किए गए मेरे कर्म बहुत ही ख़राब थे और ये उन्हीं कर्मों का नतीजा है कि कोई मेरे अच्छा होने पर यकीन नहीं कर रहा था। मैंने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि अब से चाहे जो हो जाए एक अच्छा इंसान ही बनूंगा। वो काम हर्गिज़ नहीं करूंगा जिसके लिए मैं ज़माने में बदनाम हूं और ये भी कि जिसकी वजह से कोई मुझ पर भरोसा करने से कतराता है।
आंगन से होते हुए मैं दूसरी तरफ के बरामदे में आया तो देखा मां और चाची गुमसुम सी बैठी हुईं थी। कुसुम नज़र नहीं आई, शायद वो रसोई में थी। मेनका चाची को सफ़ेद साड़ी में और बिना कोई श्रृंगार किए देख मेरे दिल में एक टीस सी उभरी। मुझे समझ में न आया कि अपनी प्यारी चाची के मुरझाए चेहरे पर कैसे खुशी लाऊं?
"अरे! आ गया तू?" मुझ पर नज़र पड़ते ही मां ने कहा____"अब तू ही समझा अपनी चाची को।"
"क...क्या मतलब?" मैं चौंका____"क्या हुआ चाची को?"
"तेरी चाची मुझे अकेला छोड़ कर अपने मायके जा रही है।" मां ने दुखी भाव से कहा____"और अपने साथ कुसुम तथा दोनों बच्चों को भी लिए जा रही है। अब तू ही बता बेटा मैं इसके और कुसुम के बिना यहां अकेली कैसे रह पाऊंगी?"
"बस कुछ ही दिनों के लिए जाना चाहती हूं दीदी।" मेनका चाची ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा___"पिता जी और भैया भाभी से तो मिल चुकी हूं लेकिन मां को देखे बहुत समय हो गया है। बहुत याद आ रही है मां की। कुछ दिन मां के पास रहूंगी तो शायद मन को थोड़ा सुकून मिल जाए और ये दुख भी कम हो जाए।"
"चाची सही कह रहीं हैं मां।" मैं चाची की मनोदशा को समझते हुए बोल पड़ा____"आप तो अच्छी तरह समझती हैं कि जो सुकून और सुख एक मां के पास मिल सकता है वो किसी और के पास नहीं मिल सकता। इस लिए इन्हें जाने दीजिए। कुछ दिनों बाद मैं खुद जा कर चाची और कुसुम को ले आऊंगा।"
"तू भी इसी का पक्ष ले रहा है?" मां ने दुखी हो के कहा____"मेरे बारे में तो कोई सोच ही नहीं रहा है यहां।"
"ये आप कैसी बात कर रही हैं मां?" मैंने कहा____"मुझे पता है कि इस समय हम सब किस मनोदशा से गुज़र रहे हैं। इस लिए यहां सिर्फ एक के बारे में सोचने का सवाल ही नहीं है बल्कि सबके बारे में सोचने की ज़रूरत है। आप इस हवेली में पिता जी के बाद सबसे बड़ी हैं इस लिए सबके बारे में सोचना आपका पहला कर्तव्य है। चाची को जाने दीजिए और ये मत समझिए कि आपके बारे में कोई सोच नहीं रहा है।"
आख़िर मां मान गईं। मुझे याद आया कि चाची के साथ कुसुम भी जा रही है। मैंने चाची से कुसुम के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वो अपने कमरे में जाने की तैयारी कर रही है। मैं फ़ौरन ही कुसुम के पास ऊपर उसके कमरे में पहुंच गया। दरवाज़ा खटखटाया तो अंदर से कुसुम की आवाज़ आई____'दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं है, आ जाइए।'
मैं जैसे ही दरवाज़ा खोल कर अंदर दाखिल हुआ तो कुसुम की नज़र मुझ पर पड़ी। वो मुझे देखते ही उदास सी हो कर खड़ी हो गई। मैं उसके क़रीब पहुंचा।
"माफ़ कर दे मुझे।" मैंने उसके बाजुओं को थाम कर कहा____"हालात ही ऐसे बने कि मुझे अपनी लाडली बहन से मिलने का समय ही नहीं मिल सका।"
"कोई बात नहीं भैया।" कुसुम ने कहा____"हमेशा सब कुछ अच्छा थोड़े ना होता रहता है। कभी कभी ऐसा बुरा भी हो जाता है कि फिर उसके बाद कभी अच्छा होने की इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता।"
"इतनी बड़ी बड़ी बातें मत बोला कर तू।" मैंने उसे खुद से छुपका लिया____"तेरे मुख से ऐसी बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगतीं। मैं जानता हूं कि हमारे साथ बहुत बुरा हो चुका है लेकिन इसके बावजूद हमें इस दुख से उबर कर आगे बढ़ना होगा। मैं चाहता हूं कि मेरी बहन पहले जैसी शोख और चंचल हो जाए। पूरी हवेली पहले की तरह तेरे चहकने से गूंजने लगे।"
"बहुत मुश्किल है भैया।" कुसुम सिसक उठी____"अब तो ऐसा लगता है कि जिस्म के अंदर जान बची रहे यही बहुत बड़ी बात है।"
"सब ठीक हो जाएगा, तू किसी चीज़ के बारे में इतना मत सोचा कर।" मैंने उसे खुद से अलग करते हुए कहा____"ख़ैर ये बता मामा के यहां जा रही है तो वापस कब आएगी? तुझे पता है ना कि मैं अपनी लाडली बहन को देखे बिना नहीं रह सकता।"
"मैं तो जाना ही नहीं चाहती थी।" कुसुम ने मासूमियत से कहा____"मां के कहने पर जा रही हूं। सच कहूं तो मेरा कहीं भी जाने का मन नहीं करता। हर पल बस पिता जी और बड़े भैया की ही याद आती है। आंखों के सामने से वो दृश्य जाता ही नहीं जब उनको तख्त में निर्जीव पड़े देखा था। भगवान ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया भैया?"
कहने के साथ ही कुसुम सिसक सिसक कर रोने लगी। उसकी आंखों से बहते आसूं देख मेरा कलेजा हिल गया। मैंने फिर से उसे खींच कर खुद से छुपका लिया और फिर उसे शांत करने की कोशिश करने लगा। आख़िर कुछ देर में वो शांत हुई तो मैंने उसे जल्दी से तैयार हो जाने को कहा और फिर बाहर चला आया।
जगताप चाचा और बड़े भैया की मौत हम सबके के लिए एक गहरा आघात थी जिसका दुख सहन करना अथवा हजम कर लेना हम में से किसी के लिए भी आसान नहीं था। हवेली में रहने वाला हर व्यक्ति जैसे इस अघात से टूट सा गया था। मैंने इस बात का तसव्वुर भी नहीं किया था कि ऐसा भी कुछ हो जाएगा।
नीचे आया तो देखा सब जाने के लिए तैयार थे। मैं सबसे मिला और फिर चाची का झोला ले जा कर बाहर मामा जी की जीप में रख दिया। जीप में विभोर और अजीत पहले से ही जा कर बैठ गए थे। कुछ देर में कुसुम और चाची भी आ गईं। पिता जी के चेहरे पर अजीब से भाव थे, शायद अपने अंदर उमड़ रहे जज़्बात रूपी बवंडर को काबू करने का प्रयास कर रहे थे। सब एक दूसरे से मिले और फिर पिता जी से इजाज़त ले कर जीप में बैठ गए। अगले ही पल जीप चल पड़ी। पिता जी ने सुरक्षा का ख़याल रखते हुए शेरा के साथ कुछ आदमियों को उनके पीछे जीप में भेज दिया था। शेरा को आदेश था कि गांव की सरहद से ही नहीं बल्कि उससे भी आगे तक उन्हें सही सलामत भेज कर आए।
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"कहां जा रहे हो?" मैं मोटर साईकिल की चाभी लिए जैसे ही बैठक के सामने से निकला तो पिता जी की आवाज़ सुन कर एकदम से रुक गया। फिर पलट कर बैठक में पिता जी के सामने आ गया।
"बैठो यहां पर।" उन्होंने अपने पास ही रखी एक कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा तो मैं बैठ गया। इस वक्त बैठक में मां भी बैठी हुईं थी, बाकी कोई नहीं था।
"ये तो तुम्हें भी पता है कि जो कुछ हमारे साथ हुआ है उससे हम सब कितना दुखी हैं।" पिता जी ने जैसे भूमिका बनाते हुए कहा____"एक तरह से ये समझ लो कि सब कुछ बिखर सा गया है। दिल तो यही करता है कि सब कुछ त्याग कर कहीं चले जाएं मगर जानते हैं कि जीवन ऐसे नहीं चलता। इसे मजबूरी कहो या बेबसी कि हमें इतना कुछ होने के बाद भी अपने लिए न सही मगर अपनों के लिए जीना ही पड़ता है और इसके साथ साथ वो सब कुछ भी करना पड़ता है जो जीवन में अपनों के लिए ज़रूरी होता है। इस लिए हम उम्मीद करते हैं कि ऐसे हालात में तुम हवेली में रहने वालों के लिए एक मजबूत सहारा बनोगे। अपने छोटे भाई और बेटे को खोने के बाद हम ऐसा महसूस कर रहें हैं जैसे हम एकदम से ही असहाय हो गए हैं। क्या तुम अपने पिता को सहारा नहीं दोगे?"
"य...ये आप कैसी बातें कर रहे हैं पिता जी?" मैंने अपने अंदर अजीब सी हलचल होती महसूस की____"मैं आपको सहारा न दूं अथवा अपनों के बारे में न सोचूं ऐसा तो सपने में भी नहीं हो सकता। ईश्वर करे कि आप क़यामत तक हमारे पास रहें। आप हमारे लिए सब कुछ हैं पिता जी, आपके बिना हम जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते।"
"किसी के जीवन का कोई भरोसा नहीं है बेटे।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"ऊपर वाला इंसान को कब अपने पास बुला ले इस बारे में कोई नहीं जानता। वैसे भी इस संसार सागर से हर किसी को एक दिन तो जाना ही होता है। ख़ैर हमें तुमसे ये सुन कर अच्छा तो लगा ही किन्तु इसके साथ बेहद संतोष भी हुआ कि तुम अपनों के लिए ऐसा सोचते हो। हम चाहते हैं कि तुम अब पूरी ईमानदारी के साथ अपनी हर ज़िम्मेदारी को निभाओ और हर उस व्यक्ति को खुश रखो जो तुम्हारा अपना है।"
"आप फ़िक्र मत कीजिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"अब से मैं अपनी हर ज़िम्मेदारी को निभाऊंगा और सबको खुश रखने की हर संभव कोशिश करूंगा।"
"बहुत बढ़िया।" पिता जी ने कहा____"हमारा छोटा भाई था तो हमें कभी किसी चीज़ की चिंता नहीं रहती थी। हमारी ज़मीनों में होने वाली खेती बाड़ी को वही देखता था। हमारी ज़मीनों पर कौन सी फ़सल किस जगह पर लगवानी है ये सब वही देखता और करवाता था किन्तु अब ये सब तुम्हें देखना होगा।"
"आप बेफिक्र रहें पिता जी।" मैंने कहा____"मैं सब कुछ सम्हाल लूंगा।"
"चंद्रकांत हमारा मुंशी था।" पिता जी ने आगे कहा____"वो हमारे सभी बही खातों का हिसाब किताब रखता था। किससे कितना लेन देन है और किसने कितना हमसे कर्ज़ ले रखा है ये सब वही हिसाब किताब रखता था। अब क्योंकि वो हमारा मुंशी नहीं रहा इस लिए हमें इन सब कामों के लिए एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जो ईमानदार हो, सच्चा हो और साथ ही वो हमारे इन सभी कामों को कुशलता पूर्वक कर सके।"
"तो क्या आपकी नज़र में है कोई ऐसा व्यक्ति?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"ऐसे कुछ लोग हमारी जानकारी में तो हैं।" पिता जी ने कहा____"लेकिन उनके बारे में भी बस सुना ही है हमने। दुनिया में इंसान जिस तरह नज़र आते हैं वो असल में वैसे होते नहीं हैं इस लिए जब तक हमें उनके अंदर का सच नज़र नहीं आएगा तब तक हम ऐसे कामों के लिए किसी को नहीं रख सकते।"
"ठीक है जैसा आपको ठीक लगे कीजिए।" मैंने शालीनता से कहा।
"अब हमारी सबसे महत्वपूर्ण बात सुनो।" पिता जी ने कहा____"और वो ये कि अब से तुम अपने गुस्से और ब्यौहार पर नियंत्रण रखोगे। अब हम मुखिया नहीं रहे इस लिए अपना हर काम तुम्हें सोच समझ कर ही करना होगा। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते कि तुम अपनी किसी ग़लत हरकत की वजह से किसी गहरी मुसीबत में फंस जाओ।"
"जी मैं इस बात का ख़याल रखूंगा।" मैंने कहा।
"साहूकारों के अथवा मुंशी के परिवार के किसी भी सदस्य से तुम कोई मतलब नहीं रखोगे।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए ठोस लहजे में कहा____"ये संभव है कि तुम्हारे उग्र स्वभाव के आधार पर वो तुम्हें उकसाने की कोशिश कर सकते हैं। उनके द्वारा उकसाए जाने पर अगर तुम गुस्से में आ कर कोई ग़लत क़दम उठा लोगे तो ज़ाहिर है किसी न किसी मुसीबत में फंस जाओगे और तब वो पंचायत के फ़ैसले पर सवाल खड़ा करने लगेंगे। इस लिए हम चाहते हैं कि अगर इत्तेफ़ाक से तुम्हारा उन लोगों से सामना हो जाए और वो तुम्हें किसी तरह से उकसाने की कोशिश करें तो तुम उन्हें नज़रअंदाज़ कर के निकल जाओगे।"
"जी मैं समझ गया।" मैंने सिर हिलाया।
"अभी कहां जा रहे थे तुम?" पिता जी ने पूछा।
"बस यूं ही मन बहलाने के लिए बाहर जाना चाहता था।" मैंने कहा।
"मत भूलो कि ख़तरा अभी टला नहीं है।" पिता जी ने कहा____"हमारी जान का एक ऐसा दुश्मन बाहर कहीं भटक रहा है जो खुद को हर किसी से छिपा के रखता है। हमारा मतलब उस रहस्यमय सफ़ेदपोश से है जो कई बार तुम्हें जान से मारने अथवा मरवाने की कोशिश कर चुका है।"
"हे भगवान! ये सब क्या हो रहा है?" सहसा मां बोल पड़ीं____"हमने तो कभी किसी के साथ कुछ बुरा नहीं किया फिर क्यों ऐसे लोग हमारी जान के दुश्मन बने हुए हैं?"
"इस दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता सुगंधा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"हर चीज़ के होने के पीछे कोई न कोई वजह ज़रूर होती है। साहूकार और चंद्रकांत क्यों हमारी जान के दुश्मन थे इसकी वजह उस दिन पंचायत में उन दोनों ने सबको बताई थी। इसी तरह उस सफ़ेदपोश के पास भी कोई न कोई वजह ज़रूर होगी जिसके चलते वो हमारे बेटे को जान से मारने पर आमादा है। हमने तो यही सोचा था कि सफ़ेदपोश जैसा रहस्यमय व्यक्ति साहूकारों में से या फिर मुंशी के घर वालों में से ही कोई होगा मगर उस दिन उन लोगों ने जब सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता तथा किसी ताल्लुक से इंकार किया तो हमें बड़ी हैरानी हुई। हम सोच में पड़ गए थे कि अगर वो सफ़ेदपोश इन लोगों में से कोई नहीं है तो फिर आख़िर वो है कौन?"
"सच में ये बहुत ही बड़ी हैरानी की बात है पिता जी।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"आपकी तरह मैं भी यही समझता था कि वो उन लोगों में से ही कोई होगा मगर उन लोगों के इंकार ने मुझे भी हैरत में डाल दिया था। सोचने वाली बात है कि एक तरफ जहां साहूकार और मुंशी हमारे दुश्मन बने हुए थे और हमें ख़ाक में मिला देना चाहते थे वहीं दूसरी तरफ वो सफ़ेदपोश है जो सिर्फ मुझे जान से मारना चाहता है। हां पिता जी, उसने अब तक सिर्फ मुझे ही मारने अथवा मरवाने की कोशिश की है, जबकि मेरे अलावा उसने हवेली में किसी के भी साथ कुछ बुरा नहीं किया है। क्या आपको कुछ समझ में आ रहा है कि इसका क्या मतलब हो सकता है?"
"सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि वो सिर्फ तुम्हें ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए कहा____"और कदाचित इस हद तक नफ़रत भी करता है कि वो तुम्हें जान से ही मार देना चाहता है। सबसे पहले उसने तुम्हें बदनाम करने के लिए जगन को अपना हथियार बना कर उसके द्वारा उसके ही भाई की हत्या करवाई और उस हत्या का इल्ज़ाम तुम पर लगवाया। जब वो उसमें नाकाम रहा तो उसने अपने दो काले नकाबपोश आदमियों के द्वारा तुम पर जानलेवा हमला करवाया। इसे उसकी बदकिस्मती कहें या तुम्हारी अच्छी किस्मत कि उसकी इतनी कोशिशों के बाद भी वो तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया अथवा ये कहें कि वो तुम्हें जान से मारने में सफल नहीं हो पाया। हैरत की बात है कि जगन के अलावा उसने तुम्हारे दोस्तों यानि सुनील और चेतन को भी अपना मोहरा बना लिया। "
"आप सही कह रहे हैं।" मैं एकदम से ही चौंकते हुए बोल पड़ा____"सुनील और चेतन के बारे में तो मैं भूल ही गया था। माना कि वो दोनों सफ़ेदपोश के मोहरे बन गए हैं लेकिन हैं तो वो दोनों मेरे दोस्त ही। हमारे साथ इतना कुछ हो गया लेकिन वो दोनों एक बार भी मुझसे मिलने नहीं आए। क्या मुझसे मिलने से उन्हें उस सफ़ेदपोश ने ही रोका होगा? वैसे मुझे ऐसा लगता तो नहीं है क्योंकि ऐसे में वो खुद ही ये ज़ाहिर कर देगा कि वो दोनों उसके लिए काम करते हैं। यानि एक तरह से वो उन दोनों के साथ अपने संबंधों की ही पोल खोल देगा जोकि वो यकीनन किसी भी कीमत पर नहीं करना चाहेगा। मतलब साफ है कि मेरे उन दोनों दोस्तों के मन में भी कुछ है जिसके चलते वो दोनों मुझसे मिलने नहीं आए।"
"अब तुम खुद सोचो कि उनके मन में ऐसा क्या हो सकता है?" पिता जी ने मेरी तरफ देखा____"क्या तुमने उनके साथ कुछ उल्टा सीधा किया है जिसके चलते वो इस हद तक तुम्हारे खिलाफ़ चले गए कि तुम्हें जान से मारने का प्रयास करने वाले उस सफ़ेदपोश का मोहरा ही बन गए?"
"जहां तक मुझे याद है।" मैंने सोचते हुए कहा___"मैंने उन दोनों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं किया है। हां ये ज़रूर है कि जब आपने मुझे निष्कासित कर दिया था और मैं चार महीने उस बंज़र जगह पर रहा था तो वो दोनों आख़िर में मुझसे मिलने आए थे। चार महीने में वो तब मुझसे मिलने आए थे जबकि मुझे आपके द्वारा वापस बुलाया जा रहा था। मुझे उन दोनों पर उस समय ये सोच कर बहुत गुस्सा आया था कि खुद को मेरा जिगरी दोस्त कहने वाले वो दोनों दोस्त मेरे मुश्किल वक्त में किसी दिन मुझसे मिलने नहीं आए थे और अब जबकि मैं हवेली लौट रहा हूं तो वो झट से मेरे पास आ गए। बस इसी गुस्से में मैंने उन दोनों को बहुत खरी खोटी सुनाई थी। इसके अलावा तो मैंने उनके साथ कुछ किया ही नहीं है।"
"कोई तो वजह ज़रूर है।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"जिसके चलते वो तुम्हारे खिलाफ़ हो कर उस सफ़ेदपोश व्यक्ति का मोहरा बन गए। ख़ैर सच का पता तो अब उनसे रूबरू होने के बाद ही चलेगा। हमें जल्द ही इस बारे में कोई क़दम उठाना होगा।"
"कोई तो वजह ज़रूर है।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"जिसके चलते वो तुम्हारे खिलाफ़ हो कर उस सफ़ेदपोश व्यक्ति का मोहरा बन गए। ख़ैर सच का पता तो अब उनसे रूबरू होने के बाद ही चलेगा। हमें जल्द ही इस बारे में कोई क़दम उठाना होगा।"
अब आगे....
आसमान में काले बादल मंडरा रहे थे। ऐसा लगता था जैसे आज बारिश ज़रूर होगी। आज कल काफी गर्मी होती थी। जिसकी वजह से अक्सर लोग बीमार भी पड़ रहे थे। मैं अपनी मोटर साईकिल द्वारा भुवन से मिलने अपने नए बन रहे मकान में आया था। मकान लगभग तैयार ही हो गया था, बस कुछ चीजें शेष थीं जोकि कुछ दिनों में पूरी हो जाएंगी। भुवन किसी काम से कहीं गया हुआ था और मैं उसी का इंतज़ार कर रहा था।
मेरे ज़हन में मकान को देखते हुए कई सारे विचार उभर रहे थे। जिसमें सबसे पहला विचार यही था कि मैंने क्या सोच कर यहां पर ये मकान बनवाया था और अब क्या हो चुका था। ऐसा क्यों होता है कि हम सोचते कुछ हैं और हो कुछ और जाता है? मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं अपने चाचा और बड़े भाई को इस तरह से खो दूंगा। यूं तो मुझे दोनों के ही इस तरह चले जाने का बेहद दुख था लेकिन सबसे ज़्यादा दुख अपने भाई के चले जाने का हो रहा था। क्योंकि उनके चले जाने से भाभी का जैसे संसार ही उजड़ गया था।
सुहागन के रूप में कितनी खूबसूरत लगती थीं वो। मैं हमेशा उनके रूप सौंदर्य पर मोहित हो जाता था। अपनी ग़लत आदतों की वजह से मैं हमेशा उनसे दूर ही रहता था। मैं ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था कि उनके रूप सौंदर्य को देख कर मेरे मन में ग़लती से भी उनके प्रति ग़लत ख़याल आ जाए। हालाकि मेरे ना चाहने पर भी ग़लत ख़याल आ ही जाते थे मगर फिर भी मैं अब तक अपनी कोशिशों में कामयाब ही रहा था और अपनी भाभी के दामन पर दाग़ लगाने से खुद को रोके रखा था। मगर ये जो कुछ हुआ है वो हर तरह से असहनीय है।
जिस भाभी के चेहरे पर हमेशा नूर रहता था उनका वही चेहरा आज विधवा हो जाने के चलते किसी उजड़े हुए चमन का हिस्सा नज़र आने लगा था। मेरा हर सच जानने के बावजूद वो मेरी परवाह करती थीं और हवेली में सबसे बड़ा मेरा मुकाम बना हुआ देखना चाहती थीं। अपने जीवन में मैंने उनके जैसी सभ्य, सुशील, संस्कारी और सबके बारे में अच्छा सोचने वाली नारी नहीं देखी थी। बार बार मेरे मन में एक ही सवाल उभरता था कि इतनी अच्छी औरत को ऊपर वाला इतना बड़ा दुख कैसे दे सकता है? मैंने उन्हें हमेशा खुश रखने का उनसे वादा तो किया था लेकिन मैं खुद नहीं जानता था कि उनके इतने बड़े दुख को मैं कैसे दूर कर सकूंगा और कैसे उन्हें खुशियां दे पाऊंगा? सच तो ये था कि मेरे लिए ऐसा कर पाना बिल्कुल भी आसान नहीं था।
अभी मैं ये सोच ही रहा था कि अचानक ही आसमान में बिजली चमकी और अगले कुछ ही पलों में तेज़ गर्जना हुई। मेरे देखते ही देखते कुछ ही पलों में बूंदा बांदी होने लगी। मकान में काम कर रहे मजबूर बूंदा बांदी होते देख बड़ा खुश हुए। फ़सल काटने के बाद की ये पहली बारिश थी जो होने लगी थी। पहले बूंदा बांदी और फिर एकदम से तेज़ बारिश होने लगी। चारो तरफ एकदम से अंधेरा सा हो गया। मैं मकान के दरवाज़े के बाहर ही बरामदे में बैठा हुआ था। बाहर जो मज़दूर मौजूद थे वो भीगने से बचने के लिए भागते हुए जल्दी ही बरामदे में आ गए। मैं दरवाज़े के पास ही एक लकड़ी के स्टूल पर बैठा हुआ था। तेज़ हवा भी चल रही थी जो बारिश में घुल कर ठंडक का एहसास कराने लगी थी। दरवाज़े के बाहर बरामदे जैसा था इस लिए बारिश के छींटे मुझ तक नहीं पहुंच सकते थे। देखते ही देखते तपती हुई ज़मीन में छलछलाता हुआ पानी नज़र आने लगा। ज़मीन से एक अलग ही सोंधी सोंधी महक आने लगी थी।
बारिश इतनी तेज़ होने लगी थी कि दूर वाले पेड़ पौधे धुंधले से नज़र आने लगे थे। एकाएक मेरी घूमती हुई निगाह एक जगह पर ठहर गई और इसके साथ ही मेरे माथे पर सिलवटें भी उभर आईं। जल्दी ही मेरी नज़र ने उस जगह पर भागते व्यक्ति को पहचान लिया। वो अनुराधा थी जो तेज़ बारिश में दौड़ते हुए इस तरफ ही आ रही थी। अनुराधा को इस तरह यहां आते देख मेरी धड़कनें बढ़ गईं। ज़हन में ख़याल उभरा कि ये यहां क्यों आ रही है?
"अरे! वो तो अनुराधा बिटिया है न रे भीखू?" बरामदे के एक तरफ खड़े एक अधेड़ मज़दूर ने दूसरे आदमी से पूछा____"ये बारिश में यहां कहां भींगते हुए आ रही हैं?"
"अपने भाई भुवन से मिलने आ रही होगी।" दूसरे मज़दूर ने कहा____"लेकिन बारिश में नहीं आना चाहिए था उसे। देखो तो पूरा भीग गई है ये।"
मज़दूरों की बात सुन कर मैं ख़ामोश ही रहा। असल में मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? मैं तो खुद सोच में पड़ गया था कि वो यहां क्यों आ रही है, वो भी बारिश में भींगते हुए। मेरे देखते ही देखते वो जल्दी ही हमारे पास आ गई। गीली और पानी से लबरेज़ मिट्टी पर थल्ल थल्ल पैर जमाते हुए वो बरामदे में आ गई। उसकी नज़र अभी मुझ पर नहीं पड़ी थी। शायद तेज़ बारिश के चलते वो ठीक से सामने का नहीं देख रही थी। मैंने देखा सुर्ख रंग का उसका कुर्ता सलवार पूरी तरह भीग गया था। दुपट्टे को उसने सिर पर ओढ़ा हुआ था जिसे उसने बरामदे में आते ही जल्दी से सीने पर डाल लिया। भीगे होने की वजह से उसके सीने के उभार साफ नज़र आ रहे थे।
"अरे! इतनी तेज़ बारिश में तुम यहां क्यों आई हो अनुराधा?" भीखू ने उससे पूछा____"देखो तो सारे कपड़े गीले हो गए हैं तुम्हारे और ये क्या, तुम्हारा एक चप्पल टूट गया है क्या?"
"हां काका।" अनुराधा ने मासूमियत से कहा____"शायद दौड़ने की वजह से टूट गया है। वैसे उसे टूटना ही था। पुराना जो हो गया था।"
"पर तेज़ बारिश में तुम्हें यहां भींगते हुए आने की क्या ज़रूरत थी?" भीखू ने कहा____"भींगने से बीमार पड़ गई तो?"
"मुझे क्या पता था काका कि इतना जल्दी बारिश होने लगेगी।" अनुराधा ने अपने चप्पल को पैर से निकालते हुए कहा____"जब घर से चली थी तब तो बूंदा बांदी भी नहीं हो रही थी।"
"हां लगता है तुम्हारे घर से निकलने का ही ये बारिश इंतज़ार कर रही थी।" भीखू ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"ख़ैर भुवन तो यहां है ही नहीं। हमारे छोटे कुंवर भी उसी का इंतज़ार कर रहे हैं यहां।"
अनुराधा भीखू के मुख से छोटे कुंवर सुन बुरी तरह चौंकी। उसने फिरकिनी की तरह घूम कर पीछे देखा तो उसकी नज़र मुझ पर पड़ गई। उफ्फ! भीगने की वजह से कितनी प्यारी लग रही थी वो। मेरे पूरे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई। मैंने देखा वो अपलक मुझे ही देखने लगी थी। बारिश में भीग जाने की वजह से उसके गीले हो चुके गुलाबी होंठ हल्के हल्के कांप रहे थे। अचानक ही मुझे वस्तिस्थित का एहसास हुआ तो मैंने उससे नज़रें हटा लीं और बाहर बारिश की तरफ देखने लगा। मैंने महसूस किया कि जो लड़की इसके पहले मुझसे नज़रें नहीं मिला पाती थी वो अपलक मुझे ही देखे जा रही थी। एक अलग ही तरह के भाव उसके चेहरे पर उभरे दिखाई दिए थे मुझे।
"अरे! तुम्हें क्या हुआ बिटिया?" भीखू की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी मगर मैंने उसकी तरफ नहीं देखा। उधर वो अनुराधा से बोला____"तुम एकदम से बुत सी क्यों खड़ी हो? हमारे छोटे कुंवर को देखा नहीं था क्या कभी तुमने?"
भीखू की बात सुन कर अनुराधा जैसे आसमान से गिरी। उसने हड़बड़ा कर भीखू की तरफ देखा और फिर खुद को सम्हालते हुए बोली____"देखा था काका। पहले ठीक से पहचानती नहीं थी लेकिन अब पहचान गई हूं। पहले यकीन नहीं होता था पर अब हो चुका है।"
"ये तुम क्या कह रही हो बिटिया?" भीखू को जैसे अनुराधा की बात समझ नहीं आई, अतः बोला____"मैं समझा नहीं तुम्हारी बात को।"
"हर बात इतना जल्दी कहां समझ आती है काका?" अनुराधा ने अजीब भाव से कहा____"समझने में तो वक्त लगता है ना? ख़ैर छोड़िए, मुझे लगता है कि बारिश के चलते भुवन भैया नहीं आएंगे। मुझे भी घर जाना होगा, नहीं तो मां परेशान हो जाएगी। बारिश देख के डांटेगी भी मुझे।"
"हां पर इतनी तेज़ बारिश में कैसे जाओगी तुम?" भीखू ने हैरान नज़रों से अनुराधा की तरफ देखते हुए कहा____"ज़्यादा भींगने से बीमार हो जाओगी। कुछ देर रुक जाओ। बारिश रुक जाए तो चली जाना।"
"अरे! मैं तो पहले से ही बीमार हूं काका।" अनुराधा ने कहा____"ये बारिश मुझे भला और क्या बीमार करेगी? अच्छा अब चलती हूं। भैया आएं तो बता देना कि मैं आई थी।"
भीखू ने ही नहीं बल्कि और भी कई लोगों ने अनुराधा को रोका मगर वो न रुकी। तेज़ बारिश में जैसे वो कूद ही पड़ी और पूरी निडरता से ख़राब मौसम में वो बड़े आराम से आगे बढ़ती चली गई। इधर मैं पहले ही उसकी बातों से हैरान परेशान था और अब उसे यूं भींगते हुए जाता देखा तो और भी चिंतित हो उठा। एकाएक ही मेरे मस्तिष्क में जैसे भूचाल सा आ गया। उस दिन भुवन द्वारा कही गई बातें मेरे ज़हन में गूंज उठीं। मतलब अनुराधा ने भीखू से अभी जो बातें की थी उसमें उसका संदेश था। शायद वो ऐसी बातें मुझे ही सुना रही थी और चाहती थी कि मैं समझ जाऊं। मेरे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि एक भोली भाली और मासूम सी लड़की में कुछ ही दिनों में इतना ज़्यादा परिवर्तन कैसे आ गया?
"पता नहीं आज क्या हो गया है इस लड़की को?" एक अन्य मज़दूर ने भीखू से कहा____"एकदम पगला ही गई है। देखो तो कैसे भींगते हुए चली जा रही है। देखना पक्का बीमार पड़ेगी ये। भुवन को पता चलेगा तो वो भी परेशान हो जाएगा इसके लिए।"
"अरे! हमारे पास एक छाता था न?" किसी दूसरे मज़दूर ने अचनाक से कहा____"तेज़ धूप से बचने के लिए भुवन लाया था। रुको अभी देखता हूं।"
"हां हां जल्दी ले आ।" भीखू बोल पड़ा____"वो ज़्यादा दूर नहीं गई है अभी। दौड़ कर जल्दी से उसको छाता पकड़ा के आ जाना।"
कुछ ही देर में वो मज़दूर छाता ले आया। इधर मेरे अंदर मानों खलबली सी मच गई थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं क्या न करूं? सहसा मेरी नज़र एक मज़दूर को छाता ले कर बरामदे से बाहर की तरफ जाते देखा तो मैं हड़बड़ा कर स्टूल से उठ कर खड़ा हो गया।
"रुको।" मैंने उसे पुकारा तो वो एकदम से रुक गया और मेरी तरफ पलट कर देखने लगा।
"इधर लाओ छाता।" मैं उसकी तरफ बढ़ते हुए बोला____"मैं इसे ले कर जा रहा हूं उसके पास।"
"छ...छोटे कुंवर आप?" उसके साथ बाकी मज़दूर भी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगे जबकि मैं उसके क़रीब पहुंचते ही बोला____"हां तो क्या हो गया? काफी दिन हो गए मुरारी काका के घर नहीं गया। इसी बहाने काकी से घर का हाल चाल भी पूछ लूंगा। भुवन आए तो कहना मैं मुरारी काका के घर गया हूं और जल्दी ही वापस आऊंगा।"
अब क्योंकि किसी में भी हिम्मत नहीं थी जो मुझसे कोई और सवाल जवाब करता था इस लिए उस मज़दूर ने फ़ौरन ही मुझे छाता पकड़ा दिया। मैंने जल्दी से छाते को खोला और बाहर हो रही बारिश में जंग का मैदान समझ कर कूद पड़ा। सच कहूं तो मेरे दिल की धड़कनें असमान्य गति से चल रहीं थी। अनुराधा मुझसे क़रीब चालीस पचास क़दम की दूरी पर पहुंच चुकी थी। मैं छाता लिए तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ने लगा। बाहर बारिश तो तेज़ हो ही रही थी लेकिन उसके साथ हवा भी चल रही थी जिसके चलते बारिश की बौछारें चारो तरफ अपना रुख बदल लेती थीं। जल्दी ही मेरे घुटने से ऊपर का भी हिस्सा बारिश की बूंदों से भीगता नज़र आया। उधर अनुराधा बिना इधर उधर देखे बड़े आराम से चली जा रही थी। मैं हैरान था कि आते समय वो भींगने से बचने के लिए दौड़ते हुए आई थी जबकि अब वो बड़े आराम से जा रही थी। ज़ाहिर था उसे बारिश से ना तो भीग जाने की परवाह थी और ना ही भीग जाने के चलते बीमार पड़ने की। सही कहा था उस मज़दूर ने कि एकदम पगला गई थी वो।
जब मैं उसके क़रीब पहुंच गया तो मैंने झिझकते हुए उसे आवाज़ दी और अगले ही पल मेरी आवाज़ का उस पर जैसे किसी चमत्कार की तरह असर हुआ। वो अपनी जगह पर इस तरह रुक गई थी जैसे किसी ने जादू से उसको एक जगह पर टिका दिया हो। मुझे समझते देर न लगी कि वो मेरे ही आने का इंतज़ार कर रही थी। तभी तो वो इतना आराम से चल रही थी वरना भला ऐसा कौन मूर्ख होगा जो तेज़ बारिश में इतना आराम से चले?
यूं तो मैंने अनुराधा को वचन दिया था कि अब कभी उसके घर की दहलीज़ पर नहीं आऊंगा और कदाचित ये भी कि उससे बातें भी नहीं करूंगा मगर इस वक्त मुझे अपना ही वचन तोड़ना पड़ रहा था। ऐसा सिर्फ इस लिए क्योंकि मैं किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहता था कि उसे कुछ हो जाए।
मैं जल्दी ही उसके क़रीब पहुंच गया और उसको छाते के अंदर ले लिया। मैंने देखा वो थर थर कांप रही थी। ज़ाहिर है बारिश में भीग जाने का असर था और उसके साथ ही शायद इसका भी कि इस वक्त वो मेरे इतने क़रीब थी। मेरी नज़दीकियों में पहले भी उसकी हालत ठीक नहीं रहती थी।
"बारिश के रुकने तक अगर वहां रुक जाती तो काकी खा नहीं जाती तुम्हें।" मैंने सामने की तरफ देखते हुए कहा____"इस तरह भींगने से अगर बीमार पड़ जाओगी तो उन्हें बहुत परेशानी होगी।"
"अ...आपको मां की परेशानी की चिंता है मेरी नहीं?" अनुराधा ने तिरछी नज़रों से मेरी तरफ देखते हुए धीमें से मानों शिकायत की।
"अगर तुम्हारी चिंता न होती तो छाता ले कर तुम्हारे पास नहीं आता।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"वैसे माफ़ करना, आज एक बार फिर से मैंने तुम्हें दिया हुआ अपना वादा तोड़ दिया। मैंने तुमसे वादा किया था कि अब से कभी भी ना तो मैं तुम्हारे घर की दहलीज़ पर क़दम रखूंगा और ना ही तुम्हारे सामने आऊंगा। कितना बुरा इंसान हूं ना जो अपना वादा भी नहीं निभा सकता।"
"न...नहीं, ऐसा मत कहिए।" अनुराधा का गला सहसा भारी हो गया____"सब मेरी ग़लती है। मैं ही बहुत बुरी हूं। मेरी ही ग़लती की वजह से आपने ऐसा वादा किया था मुझसे।"
"नहीं, तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।" मैं सहसा आगे बढ़ा तो वो भी मेरे साथ बढ़ चली। इधर मैंने आगे कहा____"तुमने कुछ भी ग़लत नहीं किया है। तुमने तो वही कहा था जो सच था और जो मेरी वास्तविकता थी। शायद मैं वाकई में किसी के भरोसे के लायक नहीं हूं। ख़ैर छोड़ो, ये छाता ले लो और घर जाओ।"
"क...क्या मतलब??" अनुराधा ने चौंक कर मेरी तरफ देखा____"क...क्या आप नहीं चलेंगे घर?"
"तुमसे मिलने का और बात करने का वादा तोड़ दिया है मैंने।" मैंने अजीब भाव से कहा____"पर तुम्हारे घर की दहलीज़ पर क़दम न रखने का वादा नहीं तोड़ना चाहता। आख़िर अपने किसी वादे को तो निभाऊं मैं। शायद तब किसी के भरोसे के लायक हो जाऊं।"
मैंने ये कहा और अनुराधा को छाता पकड़ा कर उससे दूर हट कर खड़ा हो गया। मैंने देखा उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। मुझे तकलीफ़ तो बहुत हुई मगर शायद मैं इसी तकलीफ़ के लायक था।
"तुम्हारी आंखों में आसूं अच्छे नहीं लगते।" मैंने तेज़ बारिश में भींगते हुए उससे कहा____"इन आंसुओं को तो मेरा मुकद्दर बनना चाहिए और यकीन मानो ऐसे मुकद्दर से कोई शिकवा नहीं होगा मुझे।"
"न...नहीं रुक जाइए।" मुझे पलट कर जाता देख अनुराधा जल्दी से मानों चीख पड़ी____"भगवान के लिए रुक जाइए।"
"किस लिए?" मैं ठिठक कर उसकी तरफ पलटा।
"म...मुझे आपसे ढेर सारी बातें करनी हैं।" अनुराधा बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हालते हुए बोली____"और, और मुझे आपसे कुछ सुनना भी है।"
"मतलब??" मैं सहसा उलझ सा गया___"मुझसे भला क्या सुनना है तुम्हें?"
"ठ...ठकुराईन।" अनुराधा ने अपनी नज़रें झुका कर भारी झिझक के साथ कहा____"हां मुझे आपसे यही सुनना है। एक बार बोल दीजिए न।"
"क्यों?" मैं अंदर ही अंदर चकित हो उठा था किंतु अपने भावों को ज़ाहिर नहीं होने दिया।
"ब...बस सुनना है मुझे।" अनुराधा ने पहले की भांति ही नज़रें झुकाए हुए कहा।
"पर मैं ऐसा कुछ भी नहीं बोल सकता।" मैंने खुद को जैसे पत्थर बना लिया____"अब दिल में चाहत जैसी चीज़ को फिर से नहीं पालना चाहता। तुम्हारी यादें बहुत हैं मेरे लिए।"
कहने के साथ ही मैं पलट गया और फिर बिना उसके कुछ बोलने का इंतज़ार किए बारिश में भींगते हुए अपने मकान की तरफ बढ़ता चला गया। मैं जानता था कि ऐसा कर के मैंने बिल्कुल भी ठीक नहीं किया था क्योंकि अनुराधा को इससे बहुत तकलीफ़ होनी थी मगर मेरा भी तो कोई वजूद था। मेरे अंदर भी तो तूफ़ान चल पड़ा था जिसकी वजह से मैं उसके सामने कमज़ोर नहीं पड़ना चाहता था।
मुझे जल्दी ही वापस आ गया देख बरामदे में खड़े सारे मज़दूर हैरानी से मुझे देखने लगे। शायद ऐसा उनकी कल्पनाओं में भी नहीं था मगर उन्हें भला क्या पता था कि दुनिया में अक्सर ही ऐसा होता है जो किसी की कल्पनाओं में नहीं होता।
"छोटे कुंवर आप तो बड़ा जल्दी वापस आ गए?" एक अधेड़ उम्र का मज़दूर मुझे देखते हुए बोल पड़ा____"आपने तो कहा था कि आप मुरारी के घर जा रहे हैं उस लड़की के साथ? फिर वापस क्यों आ गए और तो और भीग भी गए?"
"हां छोटे कुंवर।" भीखू बोल पड़ा____"अगर आपको अनुराधा बिटिया को छाता ही दे के आ जाना था तो ये काम तो फुलवा भी कर देता। नाहक में ही भीग गए आप।"
"अरे! मैं तो मुरारी काका के घर ही जा रहा था काका।" मैंने कहा____"मगर फिर अचानक से मुझे एक ज़रूरी काम याद आ गया इस लिए वापस आ गया। रही बात भीग जाने की तो कोई बात नहीं।"
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मेरे इस तरह चले जाने पर अनुराधा जैसे टूट सी गई थी। उसे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि मैं उससे इस तरह मुंह फेर कर और उसकी कोई बात बिना माने अथवा सुने चला जाऊंगा। हाथ में छाता पकड़े वो बस रोए जा रही थी। आज से पहले भी वो अकेले में रोती थी मगर उसके दुख में आज की तरह पहले इज़ाफ़ा नहीं हुआ था। मेरे चले जाने पर उसे ऐसा लगा था जैसे उसके अंदर से एक झटके में कुछ निकल गया था। उसका कोमल हृदय तड़प उठा था जिसके चलते उसके आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। तभी आसमान में तेज़ बिजली कड़की तो वो एकदम से घबरा गई। उसके हाथ से छाता छूटते छूटते बचा। उसने एक नज़र उस तरफ देखा जिधर मैं गया था और फिर वो अपने आंसू पोंछते हुए पलट कर अपने घर की तरफ चल दी।
अनुराधा एक हाथ से छाता पकड़े बढ़ी चली जा रही थी। दिलो दिमाग़ में बवंडर सा चल रहा था। शून्य में खोई वो कब अपने घर पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला। चौंकी तब जब एक बार फिर से तेज़ बिजली कड़की। उसने हड़बड़ा कर इधर उधर देखा तो उसकी नज़र सहसा अपने घर के दरवाज़े पर पड़ी।
दरवाज़ा खोल कर अनुराधा जैसे ही अंदर आई तो आंगन के पार बरामदे में बैठी उसकी मां की नज़र उस पर पड़ी। सरोज उसी की चिंता में बैठी हुई थी। अनुराधा को वापस आया देख वो एकदम से उठ कर खड़ी हो गई।
"हाय राम! ये क्या तू भीग कर आई है?" सरोज हैरत से आंखें फाड़ कर बोल पड़ी____"मना किया था न कि मौसम ख़राब है और बारिश कभी भी हो सकती है फिर भी चली गई अपने भाई से मिलने? ऐसा क्या ज़रूरी काम था तुझे उससे जिसके लिए तूने मेरी बात भी नहीं मानी?"
अनुराधा अपनी मां की बातें सुन कर कुछ न बोली। आंगन से चलते हुए वो बरामदे में आई और फिर छाते को बंद कर के अंदर कमरे की तरफ चली गई। उसके जाते ही सरोज जाने क्या क्या बड़बड़ाने लगी।
इधर कमरे में आते ही अनुराधा ने दरवाज़ा बंद किया और फिर दरवाज़े से ही पीठ टिका कर सिसक उठी। अपने अंदर का गुबार उससे सम्हाला न गया। आवाज़ बाहर उसकी मां के कानों तक ना पहुंचे इस लिए उसने अपने मुंह को हथेली से सख़्ती पूर्वक दबा लिया। जाने कितनी ही देर तक वो रोती रही। रोने से जब उसे थोड़ा राहत हुई तो वो आगे बढ़ी और फिर अपने गीले कपड़े उतारने लगी। उसे बेहद ठंड लगने लगी थी। कमरे में चिमनी जल रही थी इस लिए उसे कोई परेशानी नहीं हुई। जल्दी ही उसने दूसरे कपड़े पहन लिए और अपने गीले बालों को खोल कर उन्हें सुखाने का प्रयास करने लगी।
"अगर बीमार पड़ी तो देख लेना फिर।" वो जैसे ही बाहर आई तो सरोज उसे डांटते हुए बोली____"दवा भी नहीं कराऊंगी। रोज़ रोज़ तेरी बीमारी का इलाज़ करवाने के लिए पैसे नहीं हैं मेरे पास।"
"हां ठीक है मां।" अनुराधा ने संजीदगी से कहा____"मत करवाना मेरी दवा। मैं खुद चाहती हूं कि इस बार मैं ऐसी बीमार पड़ जाऊं कि कोई वैद्य मेरा इलाज़ ही न कर पाए। मर जाऊंगी तो अच्छा ही होगा। कम से कम अपने बापू के पास जल्दी से तो पहुंच जाऊंगी।"
अनुराधा की बातें सुन कर सरोज चौंकी। उसने बड़े ध्यान से अपनी बेटी के चेहरे की तरफ देखा। आज से पहले उसने कभी भी उससे ऐसी बातें नहीं की थी। अगर ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उसने कभी अपनी मां से ज़ुबान ही नहीं लड़ाया था। उसके चेहरे पर मौजूद संजीदगी को देख कर सरोज के मन में कई तरह के ख़याल उभरे। वो चलते हुए उसके पास आई और उसके दोनो बाजुओं को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया उसे।
"हाय राम! तू रो रही थी?" अनुराधा की सुर्ख और नम आंखों को देख सरोज ने किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा कर पूछा____"क्या बात है अनू? क्या हुआ है तुझे? तू भुवन से मिलने गई थी न? उसने कुछ कहा है क्या तुझे?"
सरोज एक ही सांस में जाने कितने ही सवाल उससे कर बैठी। अपनी बेटी को उसने ऐसी हालत में कभी नहीं देखा था। वो बीमार ज़रूर हो जाती थी लेकिन ऐसी हालत में कभी नज़र नहीं आई थी वो। उधर मां के इतने सारे सवाल सुन कर अनुराधा एकदम से घबरा गई। उसे लगा कहीं मां को सच न पता चल जाए। उसे कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा था।
"क्या हुआ तू चुप क्यों है अनू?" बेटी को कुछ न बोलता देख सरोज और भी घबरा गई, उसने उसे हिलाते हुए पूछा____"बताती क्यों नहीं कि क्या हुआ है? देख मेरा मन बहुत घबरा रहा है। तुझे इस हालत में देख कर मेरे मन में बहुत ही बुरे बुरे ख़याल आ रहे हैं। बता क्या हुआ है तुझे? भुवन ने कुछ कहा है क्या तुझे?"
"न...नहीं मां।" अनुराधा ने खुद को किसी हद तक सम्हालते हुए कहा____"मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा है।"
"तो फिर तू रोई क्यों है?" सरोज का अंजानी आशंका के चलते मानो बुरा हाल हो गया____"तेरी आंखें बता रही हैं कि तू रोई है। ज़रूर कुछ हुआ है तेरे साथ। बता मेरी बच्ची।"
"तुम बेकार में चिंता कर रही हो मां।" अनुराधा ने अब तक खुद को सहज कर लिया था, अतः बोली____"मैं रोई ज़रूर हूं लेकिन उसकी वजह ये नहीं है कि किसी ने मुझे कुछ कहा है। असल में बारिश होने लगी थी तो भींगने से बचने के लिए मैं दौड़ने लगी थी। पता नहीं मेरे पैर को क्या हुआ कि मैं रास्ते में एक जगह गिर गई। बहुत तेज़ दर्द हो रहा था इस लिए रोने लगी थी।"
"तू सच कह रही है ना?" सरोज की जैसे जान में जान आई, फिर एकदम से बैठ कर अनुराधा का पैर देखते हुए बोली____"दिखा मुझे कहां चोट लगी है तुझे?"
अनुराधा ये सुन कर बौखला ही गई। उसने तो अपनी समझ में बढ़िया बहाना बनाया था मगर उसे क्या पता था कि उसकी मां उसको चोट दिखाने को बोलने लगेगी।
"क्या हुआ?" अनुराधा को ख़ामोश देख सरोज ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखा____"दिखा क्यों नहीं रही कि कहां चोट लगी है तुझे?"
"चोट नहीं लगी है मां।" अनुराधा ने हड़बड़ा कर जल्दी से कहा____"शायद पैर में मोच आई है। उस समय मैंने भी यही सोच कर देखा था कि शायद चोट लग गई है मुझे मगर चोट नहीं लगी थी।"
"ऊपर वाले का लाख लाख शुक्र है कि तुझे चोट नहीं आई।" सरोज ने कहा____"अच्छा बता कौन से पैर में मोच आई है। जल्दी दिखा मुझे, मोच भी बहुत ख़राब होती है। दर्द के मारे चलते नहीं बनता आदमी से।"
अनुराधा को मजबूरन अपना एक पैर दिखाना ही पड़ा। चिमनी की रोशनी में सरोज ने बड़े ध्यान से अपनी बेटी की बताई हुई जगह पर देखा मगर उसे कुछ समझ न आया। उसने एक बार सिर उठा कर अनुराधा को देखा और फिर उसकी बताई हुई जगह पर अपनी दो उंगलियों से दबा कर पूछा____"कहां दर्द हो रहा है तुझे?"
अनुराधा ने मुसीबत से बचने के लिए झूठ मूठ का ही दर्द का नाटक करते हुए बता दिया कि हां यहीं पर दर्द हो रहा है। सरोज ने उठ कर उसे चारपाई पर बैठाया और फिर तेज़ क़दमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसके जाते ही अनुराधा ने राहत की सांस ली। कुछ देर में जब सरोज आई तो उसके हाथ में एक कटोरी थी।
"ये शहद हल्दी और चूना है।" फिर वो अनुराधा के पैर के पास बैठते हुए बोली____"इसे लगा देती हूं जिससे तुझे जल्दी ही आराम मिल जाएगा।"
सरोज कटोरी से निकाल कर शहद हल्दी और चूने के मिश्रण को अनुराधा के पैर में लगाने लगी। उधर अनुराधा को ये सोच कर रोना आने लगा कि उसे अपनी मां से झूठ बोलना पड़ा जिसके चलते उसकी मां उसके लिए कितना चिंतित हो गई है। उसका जी चाहा कि अपनी मां से लिपट कर खूब रोए मगर फिर उसने सख़्ती से अपने जज़्बातों को अंदर ही दबा लिया।