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Incest अनैतिक संबंध

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साफ़ था की डॉली के ऊपर मेरी किसी भी बात का असर नहीं पड़ने वाला था तो मैंने सोच लिया की इसे अब सब सच बता दूंगा. "ये सभी किताबें बातें हैं! तुझे नहीं पता की असल जिंदगी में प्यार करने वालों के साथ क्या होता है?!" ये कहते हुए मैंने उसे उसकी माँ और उनके प्रेमी के साथ गाँव वालों ने क्या किया था सब सुना दिया और इसे सुनने के बाद वो एक दम सन्न रह गई और उसके चेहरे से साफ़ पता चल गया था की उसके पास इसका कोई भी जवाब नहीं हे.

अगले दस मिनट तक वो भूत बनी खड़ी रही और इधर मेरी नजर मेरी बाइक पर गई जो नीचे पड़ी थी.उसकी इंडिकेटर लाइट टूट गई थी जिसे देख मुझे और गुस्सा आने लगा. मैंने गुस्से से डॉली को बाइक पर बैठने को कहा और इस बार उसने एक ही बार में मेरी बात सुनी और डरी-सहमी सी वो पीछे आ कर बैठ गई. मैंने फटा-फ़ट बाइक दौड़ाई और घर के दरवाजे पर उसे छोड़ा और वहीँ से बाइक घुमा के वापस शहर लौट आया.

शहर आते-आते शाम हो गई और जैसे ही घर में घुसा पिताजी का फोन आया तो मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की बॉस ने कुछ जरुरी काम दिया था इसलिए जल्दी वापस आ गया.उस रात दो बजे तक माल फूँका और दिमाग में रह-रह के डॉली की बातें गूँज रही थी!

एक हफ्ता बीत गया.शुक्रवार के दिन माँ का फ़ोन आया और उन्होंने जो बताया वो सुन के मेरे पाँव-तले जमीन खिसक गई. मैंने बॉस से अर्जेंट छुट्टी माँगी ये कह के की माँ बीमार हैं और मैं वहाँ से धड़-धडाते हुए बाइक चलते हुए घर पहुँचा! भागता हुआ घर में घुसा और सीधा डॉली के कमरे में घुसा तो वो जैसे अध्-मरी वहाँ पड़ी थी. उसके कपड़ों से बू आ रही थी और जब मैंने उसे उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ा तो पता चला की उसका पूरा जिस्म भट्टी की तरह तप रहा था. मैंने पानी की बूँदें उसके चहेरे पर छिडकी तो भी उसकी आँखें नहीं खुली. मैं भागता हुआ नीचे आया तो आँगन में माँ बेचैन खड़ी मिली. उन्होंने बताया की घर पर कोई नहीं है सिवाय उनके और डॉली के. सब किसी ने किसी काम से बाहर गए हैं, बीते ६ दिन से डॉली ने कुछ खाया नहीं है, ना ही वो अपने कमरे से बाहर निकली थी. १-२ दिन तो सबको लगा की बुखार है अपने आप उतर जायेगा पर उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया!

ये सुन के तो मेरी हालत और ख़राब हो गई और मैं घर से भागता हुआ निकला और बाइक स्टार्ट की और भगाते हुए बाजार पहुँचा और वहाँ जाके डॉक्टर से मिन्नत कर के उसे घर ले के आया. उसने डॉली का चेक-उप किया और मुझे तुरंत ड्रिप चढाने को कहा और अपने पैड पर बहुत सारी चीजें लिख दीं जिसे मैं दुबारा बाजार से ले के आया. मेरे सामने डॉक्टर ने डॉली को ड्रिप लगाईं और मुझे खडी हिदायत देते हुए समझाया की ड्रिप कैसे निकालना हे. उनकी बातें सुन के तो मेरी और फ़ट गई की ये मैं कैसे करूँगा!

पहली बोतल तो करीब डेढ़ घंटे में चढ़ी पर उसके बाद वाली चढ़ने में ३ घंटे लगे! मैं सारा टाइम डॉली के कमरे में बैठा था और मेरी नजरे उसके मुख पर टिकी थीं और मन कह रहा था की अब वो आँखें खोलेगी! माँ ने खाने के लिए मुझे नीचे बुलाया पर मैं खाना ऊपर ले के आगया और उसे ढक के रख दिया. रात के एक बजे डॉली की आँख खुली और मैंने तुरंत भाग के उसके बिस्तर के पास घुटने टेक कर उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा; "ये क्या हालत बना ली तूने?" उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आई और उसने पानी पीने का इशारा किया. मैंने उसे सहारा देके बैठाया और पानी पिलाया फिर उससे खाने को कहा तो उसने ना में गर्दन हिला दी. "देख तू पहले खाना खा ले, उसके बाद हम इत्मीनान से बात करते हैं." पर वो अब भी मना करने लगी. "अच्छा... तू जो कहेगी वो मैं करूँगा ... बस तू खाना खा ले! देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ! मैं तुझे इस हालत में नहीं देख सकता!" ये सुन के वो फिर से मुस्कुराई और बैठने की लिए कोशिश करने लगी और मैंने उसे सहारा दे के बैठाया और फिर अपने हाथ से खाना खिलाया और फिर दवाई दे के लिटा दिया.

मैं सारी रात उसी के सिरहाने बैठा रहा और जागता रहा. सुबह के ४ बजे उसका बुखार कम हुआ और उसने अपना हाथ मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया और सोने लगी. सुबह ८ बजे पिताजी और ताऊ जी शादी से लौटे और तब तक मैं डॉली के कमरे में बैठा ऊंघ रहा था. मुझे उसके सिरहाने बैठा देख वो दोनों बहुत गुस्सा हुए और जोर से गरजे; "उतरा नहीं इसका बुखार अभी तक?" ताऊ जी ने बहुत गुस्से में कहा. "ऐसा हुआ क्या था इसे? एक हफ्ते से खाना पीना बंद कर रखा है?" पिताजी ने गुस्से से कहा. "वो पिताजी.... दरअसल पेपर ... आखरी वाला अच्छा नहीं गया था! इसलिए डरी हुई है! कल मैं डॉक्टर को लेके आया था उन्होंने दवाई दी है, जल्दी अच्छी हो जायेगी." मैंने डॉली का बचाव किया. थोड़ी देर बाद ताई जी और माँ भी ऊपर आ गए और मुझे डॉली के सिरहाने बैठे उसके सर पर हाथ फेरते हुए देख के ताई जी बोली; "तूने सर पर चढ़ा रखा है इसे! अब तू अपना काम धंधा छोड़ के इसके पास बैठा है! ये नौकरी आखिर तूने की ही क्यों थी?"

"नौकरी छूट गई तो अच्छा ही होगा, आखिर ताऊ जी भी तो ये ही चाहते हैं!" मैंने उनके ताने का जवाब देते हुए कहा. ताई जी ने मुझे घूर के देखा और फिर नीचे जाने लगी. इधर माँ ने आके मेरे गाल पर एक चपत लगा दी और कहा; "बहुत जुबान निकल आई है तेरी!" इतना कह के वो भी नीचे चलीं गई. डॉली ये सब आंखें मीचे सुन रही थी. माँ के नीचे पहुँचते ही डॉली ने आँख खोली और कहा; "अब भी सबुत चाहिए आपको?" मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. "मैं कुछ समझा नहीं?"

डॉली : "मेरी बीमारी सुनते ही आप अपना सारा काम छोड़ के मेरे सिरहाने बैठे हो! सबसे मेरा बीच-बचाव कर रहे हो! दवा-दारू के लिए भाग दौड़ कर रहे हो, और तो और कल रात से एक पल के लिए भी सोये नहीं! अगर ये प्यार नहीं है तो क्या है?"

मैं: पगली! मैं तुझे कैसे समझाऊँ? मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है!

डॉली : आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लो छुपाने की, पर मेरा दिल कहता है की आप मुझसे प्यार करते हो.

मैं:अच्छा ... चल एक पल को मैं ये मान भी लूँ की मैं तुझसे प्यार करता हूँ, पर आगे क्या?

डॉली : शादी!!! (उसकी आँखें चमक उठी थी.)

मैं: इतना आसान नहीं है पागल! ये दुनिया... ये समाज ... ये नहीं हो सकता! ये नहीं हो सकता. (ये कहता हुए मेरी आँखें भीग आईं थीं और मैंने अपना सर झुका लिया.)

डॉली : कुछ भी नामुमकिन नहीं है! हम घर से भाग जायेंगे, किसी नई जगह अपना संसार बनाएंगे| (उसने मेरे सर को उठाते हुए आशावादी होते हुए कहा.)

मैं: नहीं... तू समझ नहीं रही.... ये सब लोग हम दोनों को मौत के घाट उतार देंगे. मैं अपनी चिंता तो नहीं करता पर तू……….. प्लीज मेरी बात मान और ये भूत अपने सर से उतार दे. (मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा पर मेरी बात उस पर रत्ती भर भी असर नहीं दिखा रही थी.)

डॉली : ऐसा कुछ नहीं होगा! आप विश्वास करो मुझ पर, कोई भी हमें नहीं ढूंढ पायेगा.

मैं: ये नामुमकिन है! तेरी माँ को इन्होने ६ दिन में ढूंढ निकाला था और तब ना तो मोबाइल फ़ोन थे ना ही इंटरनेट. आज के जमाने में मोबाइल, इंटरनेट, जीपीएस सब कुछ है.इन्हें हमें ढूंढने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

डॉली : बस एक मौका .... एक मौका मुझे दे दो की मैं आपके मन में मेरे लिए प्यार पैदा कर सकूँ! वादा करती हूँ की अगर मैं नाकामयाब हुई तो फिर कभी आपको दुबारा नहीं कहूँगी की मैं आपसे प्यार करती हूँ और वही करुँगी जो आप कहोगे.

मैं: ठीक है ... पर अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार पैदा नहीं हुआ तो तुम्हें मुझे भूलना होगा और समय आने पर एक अच्छे से लड़के से शादी करनी होगी!

डॉली : मंजूर है...... पर मेरी भी एक शर्त है! आप मुझसे झूठ नहीं बोलोगे!

मैं: कैसा झूठ?

डॉली : वो समय आने पर आपको पता चल जायेगा. पर अभी आपको मेरे सर पर हाथ रख के कसम खानी होगी.

मैं: मैं कसम खाता हूँ की मैं कभी भी तुमसे झूठ नहीं कहूँगा! अब तू आराम कर ... मैं थोड़ा नहा लेता हु.

ये कहते हुए मैंने एक जोरदार अंगड़ाई ली और फिर नीचे आके ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाया और तब जा के मुझे तारो तजा महसूस हुआ. दोपहर के बारह बज गए थे और भाभी ने मुझे आवाज देके रसोई में बुलाया; "ये लो राज जी, जा के अपनी चाहिती को खिला दो." ये कहते हुए उन्होंने एक थाली में खाना भर के मेरी ओर बढ़ा दी! मैंने चुप-चाप थाली उठाई और बिना कुछ बोले वापस ऊपर आ गया.डॉली जाग चुकी थी और भाभी की बात सुन के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे उठा के बिठाया और वो दिवार से टेक लगा के बैठ गई पर वो प्यारी सी मुस्कान उसके होठों पर अब भी थी! "बड़ी हँसी आ रही है तुझे?" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा. जवाब में उसने कुछ नहीं कहा और शर्माने लगी. मैंने दाल-चावल का एक कोर उसे खिलाने के लिए अपनी उँगलियों को उसके होठों के सामने लाया तो उसने बड़ी नज़ाकत से अपने होठों को खोला और पहला कोर खाया "आपके हाथ से खाना आज तो और भी स्वाद लग रहा हे."

"अच्छा? पहली बार तो नहीं खिला रहा मैं तुझे खाना!" मैंने उसे उस के बचपन के वाक्य याद दिलाये! "याद है.... पर अब बात कुछ और हे." और ये कह के वो फिर से मुस्कुराने लगी. उसकी बात सुन के मैं झेंप गया और उससे नजरें चुराने लगा. अब आगे बढ़ के डॉली ने भी थाली से एक कोर लिया और मुझे खिलाने के लिए अपनी उँगलियाँ मेरी और बढ़ा दी. मैंने भी उसके हाथ से एक कोर खाया और उसे रोक दिया ये कह के; "बस! पहले तू खा ले फिर मैं खा लुंगा."

"नहीं... आप मुझे एक कोर खिलाओ और मैं आपको एक कोर खिलाऊँगी!" उसने बड़े प्यार से मेरी बात का विरोध किया. "तू बहुत जिद्दी हो गई है!" मैंने उसे उल्हना देते हुए कहा. "अब आपकी चहेती हूँ तो थोड़ा तो जिद्दी बन ही जाऊंगी." उसने भाभी की बात प्यार से दोहराई.मैंने आगे कुछ नहीं कहा और हम एक दूसरे को इसी तरह खाना खिलाते रहे. खाने के बाद मैंने उसे दवाई दे के लिटा दिया और मैं नीचे जाने को हुआ तो वो बोली; "आप भी यहीं लेट जाओ." मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और थोड़ा गुस्से से कहा: "आशु..." बस वो मेरी बात समझ गई की ऐसा करने से घरवाले कुछ गलत सोचेंगे. डॉली के बगल वाला कमरा मेरा ही था तो मैं उसमें जा के अपने बिस्तर पर पड़ गया और सो गया.
 
शाम पाँच बजे मेरी आँख खुली और मैं आँखें मलता हुआ डॉली के कमरे में घुसा तो देखा वो वहाँ नहीं हे. मैंने नीचे आँगन में झाँका तो वो वहाँ भी नहीं थी! तभी मुझे छत पर उसका दुपट्टा उड़ता हुआ नजर आया और मैं दौड़ता हुआ छत पर जा चढा. वो मुंडेर पर बैठी दूर कहीं देख रही थी. "आशु यहाँ क्या कर रही है?" मेरी आवाज सुनके जब उसने मेरी तरफ देखा तो उसकी आँखें नम थी. मैं तुरंत ही आपने घुटनों पर आ गया और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में ले के बोला; "क्या हुआ आशु? तू रो क्यों रही है? किसी ने कुछ कहा?" मेरे चेहरे पर शिकन की रेखा देख कर वो मेरे गले आ लगी और रोने लगी और रोते हुए कहा; "आप......आप....कल ......चले ......जाओगे!"

"अरे पगली! मैं सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ! अब काम है तो जाना पड़ेगा ना? काम तो छोड़ नहीं सकता ना?! पर तू मुझे प्रॉमिस कर की तू अपना अच्छे से ख्याल रखेगी और दुबारा बीमार नहीं पडेगी." मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा.

"पहले आप वादा करो की आप अगले शुक्रवार आओगे!" उसने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा.

"आशु.... सॉरी पर मैं नहीं आ पाउँगा! अगले शनिवार मेरी एक डेडलाइन है और बॉस भी इतनी छुट्टी नहीं देंगे. इस बार भी मैं ये झूठ बोल के आया की माँ बीमार हैं." मैंने उसे समझाया.

"तो मेरा..... मैं कैसे...." आगे कुछ बोलना चाह रही थी पर उसके आँसूँ उसे कुछ कहने नहीं दे रहे थे.

"देख... पहले तू रोना बंद कर फिर मैं तुझे एक तरीका बताता हु." उसने तुरंत रोना बंद कर दिया और अपने आँसूँ पोछते हुए बोली; "बोलिये"

"ये देख मेरा नया मोबाइल! मंगलवार को ही लिया था मैंने और ये ले मेरा कार्ड, ये मुझे बॉस ने बनवा के दिया था. इसमें लिखे मोबाइल पर तू रोज १ बजे फ़ोन करना माँ के मोबाइल से. माँ हर रोज दोपहर को १ बजे सो जाती है तो तेरे पास कम से कम एक घंटा होगा मुझसे बात करने का, ठीक है?" ये सुन के वो थोड़ा निश्चिन्त हुई फिर मैंने अपने मोबाइल से हम दोनों की एक सेल्फी खींची और उसी दिखाई तो वो बहुत खुश हुई. घर में सिर्फ मेरे और नारायण भैया के पास ही स्मार्टफोन था बाकी सब अब भी वही बटन वाला फ़ोन इस्तेमाल करते थे. खेर डॉली का मन थोड़ा बहलाने के लिए मैं उसकी फोटो खींचता रहा और उसे स्मार्टफोन के बारे में कुछ बताने लगा और उसे एक-दो गेम भी खेलनी भी सीखा दी.

जब तक डॉली छत पर गेम खेलने में बिजी थी तब तक मैं छत पर टहलने लगा और बीते ४८ घंटों में जो कुछ हुआ उसके बारे में सोचने लगा. तभी अचानक से डॉली ने फुल आवाज में एक गाना बजा दिया और मेरे ध्यान उसकी तरफ गया; "ऐसे तुम मिले हो, जैसे मिल रही हो, इत्र से हवा, काफ़िराना सा है इश्क है या क्या हे." उसने गाने की कुछ पंक्तियों में अपने दिल के जज्बात प्रकट किये. मैं कुछ नहीं बोला पर मुस्कुराता हुआ उसकी सामने मुंडेर पर बैठ गया."ख़ामोशियों में बोली तुम्हारी कुछ इस तरह गूंजती है, कानो से मेरे होते हुए वो दिल का पता ढूंढती हे." डॉली ने फिर से कुछ पंक्तियों से मेरे मन को टटोला. मैं खड़ा हुआ और अपना बायाँ हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और उसने उसे थाम लिया और हम धीरे-धीरे इसी तरह हाथ पकड़े छत पर टहलने लगे और तभी; "संग चल रहे हैं, संग चल रहे हैं, धुप के किनारे छाव की तरह..|" मैंने गाने की कुछ पंक्तियों को दोहराया.

"हम्म.. ऐसे तुम मिले हो, ऐसे तुम मिले हो, जैसे मिल रही हो इत्र से हवा, काफ़िराना सा है, इश्क हैं या, क्या है??" मैंने इश्क़ है या क्या है उसकी आँखों में देखते हुए कहा और ये मेरा उससे सवाल था. उसने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्कुरा के नीचे चली गई और मैं कुछ देर के लिए चुप-चाप मुंडेर पर बैठ गया और उसे नीचे जाते हुए देखता रहा. थोड़ी देर बाद मैं भी नीचे आ गया और डॉली के कमरे में देखा तो वो अपने पलंग पर लेटी हुई थी और छत की ओर देख रही थी. मैं आगे अपने कमरे की तरफ जाने लगा तो वो मुझे देखते हुए बोली; "सुनिए".उसकी आवाज सुनके मैं रुका और उसके कमरे की दहलीज पर से उसके कमरे में झांकते हुए बोला; "बोलिये'ये सुनते ही उसके चेहरे पर फिर से मुस्कराहट आ गई और उसने इशारे से मुझे उसके पास पलंग पर बैठने को कहा.

मैं अंदर आया और उसके पलंग पर बैठ गया.डॉली अभी भी लेटी दुइ थी और उसने लेटे-लेटे ही अपना हाथ आगे बढ़ा के मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया और बोली; "अगर मैं आपसे कुछ माँगू तो आप मुझे मना तो नहीं करोगे?" मैंने ना में सर हिला के उसे आश्वासन दिया. "मैं आपको किस करना चाहती हु." उसने बहुत प्यार से अपनी इच्छा व्यक्त की. पर मैं ये सुनके एकदम से हक्का-बक्का रह गया! मैंने ना में सर हिलाया और बिना कुछ कहे उठ के जाने लगा तो डॉली ने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया. "अच्छाआई एम सॉरी!!!" वो ये समझ चुकी थी की मुझे उसकी ये बात पसंद नहीं आई.

डॉली ने मेरा हाथ छोड़ा और मैं अपने कमरे में आ कर पलंग पर लेट गया और गहरी सोच में डूब गया.ये जो कुछ भी हो रहा था वो सही नहीं था! जिस रास्ते पर वो जा रही थी वो सिर्फ और सिर्फ मौत के पास खत्म होता था. मन में आया की मैं उसकी बातों को इसी तरह दर-गुजर करता रहूँ और शायद धीरे-धीरे वो हार मान ले, पर अगर वो उसका दिल टूट गया तो? उसने कोई ऐसी-वैसी हरकत की जिससे उसके जान पर बन आई तो? कुछ समझ नहीं आ रहा था .... अगर कहीं से माल मिल जाता तो दिमाग थोड़ा शांत हो जाता" इसलिए मैं एक दम से उठा और घर से बाहर निकल के तिवारी के घर जा पहुंचा. वो समझ चूका था तो वो एक कमरे में घुसा और कुछ अपनी जेब में डाल के चुप-चाप मेरे साथ चल दिया. उसके खेत पर आके हम चारपाई पर बैठ गए और फिर इधर-उधर की बातें हुई और माल फूँका! माल फूँकने के बाद मेरे दिमाग शांत हुआ और में आठ बजे तक उसी के खेत पर चारपाई पर पड़ा रहा और आसमान में देखता रहा. तभी अचानक घड़ी पर नजर गई तो एकदम से उठा और घर की तरफ तेजी से चलने लगा. घर पहुँचा तो सभी मर्द आँगन में बैठे खाना खा रहे थे और मुझे देखते ही ताई जी बोली; "आ गया तू? खाने का समय हो गया है! ये ले खाना और दे आ उस महरानी को." मैं डॉली का खाना ले कर उसके कमरे में पहुँचा तो वो सर झुकाये जमीन पर बैठी थी. मेरी आहट सुन के उसने दरवाजे की तरफ देखा और मेरे हाथ में खाने की थाली देख के वो उठ के पलंग पर बैठ गई. मैंने उसे खाना दिया और मुड़ के जाने लगा तो वो बोली; "आप भी मेरे साथ खाना खा लो" मैंने बिना मुड़े ही जवाब दिया; "मेरा खाना नीचे हे." इतना कह के मैं नीचे आ गया और खाना खाने लगा. खाना खा के मैं ऊपर आया की चलो डॉली को दवाई दे दूँ तो वो दरवाजे पर नजरे बिछाये मेरा इंतजार कर रही थी.

मैंने कमरे में प्रवेश किया और कोने पर रखे टेबल पर से उसकी दवाई उठाने लगा की तभी डॉली पीछे से बोली; "नाराज हो मुझसे?" मैंने जवाब में ना में सर हिलाया और फिर दवाई ले कर डॉली की तरफ मुड़ा.मेरे एक हाथ में दवाई और एक हाथ में पानी का गिलास था. ''पहले आप कहो की आप मुझसे नाराज नहीं हे. तभी मैं दवाई लूँगी!" डॉली ने डरते हुए कहा. "हमारा रिश्ता अभी नया-नया है, और ऐसे में जल्दबाजी मुझे पसंद नहीं! अपनी शर्त याद है ना?" मैंने दवाई और पानी का गिलास डॉली के हाथ में देते हुए कहा. "मुझे माफ़ कर दीजिये! आगे से मैं ऐसा नहीं करुंगी." उसने दुखी होते हुए कहा और दवाई ले ली और फिर चुप-चाप अपने पलंग पर लेट गई. मुझे बुरा लगा पर शायद ये उस समय के लिए सही था. अगले दिन मुझे जाना था तो मैं जल्दी उठा और नीचे आया तो देखा डॉली नहाके तैयार आंगन में बैठी मेरा इंतजार कर रही थी. मुझे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई. मैंने भी उसकी मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से दिया और नहाने घुस गया.जब बाहर आया तो डॉली रसोई में बैठी पराठे सेक रही थी. "तुझे चैन नहीं है ना?" मैंने उसे थोड़ा डांटते हुए कहा. "अभी जरा सी ठीक हुई नहीं की लग गई काम में." ये सुन के वो थोड़ा मायूस हो गई की तभी ताई जी बोल पड़ी; "हो गई जितना ठीक होना था इसे. इतने दिनों से खाट पकड़ रखी है और काम हमें करना पड़ रहा हे."

"क्यों भाभी कहाँ गई?" मैंने थोड़ा डॉली का बीच-बचाव किया. इतने में पीछे से भाभी कमरे से निकली और बोली; "ये रही भाभी! मुझसे सारे घर का काम-धाम नहीं होता! एक सहारा था की जब तक इसकी शादी नहीं होती तो कम से कम ये हाथ बंटा देगी पर तुम्हें तो इसे आगे और पढ़ाना है और तो और जब से आये हो तब से इसी की तीमारदारी में लगे हो. कभी बैठते हो हमारे पास?" भाभी ने अच्छे से खरी-खोटी सुनाई और मैं जवाब देने को बोलने ही वाला था की डॉली मेरे पास आ गई और बुदबुदाते हुए बोली; "छोड़ दो, आप ऊपर जा के नाश्ता करो." मैं ऊपर आकर अपने कमरे में बैठ गया और प्लेट दूसरी तरफ रख दी. इधर डॉली भी ऊपर आ गई और प्लेट दूर देख के एकदम से अंदर आई और प्लेट उठाई और पराठे का एक कोर उसने अचार से लगा के मुझे खिलने को हाथ आगे बढाया. "भाभी की वजह से ही तुम नीचे गई थी ना काम करणे." डॉली ने कोई जवाब नहीं दिया बस मूक भषा में मुझे खाने को कहा. मैंने उसके हाथ से एक निवाला खा लिया फिर उसके हाथ से प्लेट ले कर उसे नीचे जाने को कहा. वो भी सर झुकाये हुए नीचे चली गई और कुछ देर बाद मेरी लिए एक कप में चाय ले आई. "तुने नाश्ता किया?" उसने हाँ में सर हिला दिया और जाने लगी की मैंने दुबारा पूछा; "झूठ तो नहीं बोल रही ना?" तो वो मुड़ी और ना में सर हिलाया. "और दवाई?" तब जाके वो बोली; "अभी नहीं ली, थोड़ी देर में ले लुंगी."

"रुक" इतना कह कर मैं उठा और उसके कमरे से दवाई ले आया और उसे दवाई निकाल के दी और अपनी चाय भी उसने मेरे हाथ से दवाई ली और एक घूँट चाय पि कर कप मुझे वापस दे दिया. जैसे ही वो नीचे जाने को पलटी मैंने उसके कंधे पर हाथ रख के उसे रोका और उसे आँखें बंद करने को कहा. उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें मीचली और सर नीचे झुका लिया. मैंने आगे बढ़ कर उसके मस्तक को चूमा! मेरा स्पर्श पाते ही वो आके मुझसे लिपट गई और उसकी आँखों में जो आंसुओं के कतरे छुपे थे वो बाहर आ गये. मैंने भी उसे कस के अपने जिस्म से चिपका लिया और उसके सर पर बार-बार चूमने लगा.

"बस अब रोना नहीं.... और मेरे पीछे अपना ख़याल रखना. समय पर दवाई लेना और मुझे रोज फ़ोन करना." इतना कह के मैंने डॉली को खुद से अलग किया और उसके आँसूं पोछे और मैं नीचे उतर आया. नीचे पिताजी और ताऊ जी भी आ चुका था.. मुझे नीचे उतरता देख वो समझ गए की मैं वापस जा रहा हु. मैंने सब के पाँव छुए की तभी डॉली भागती हुई मेरे पीछे जाने लगी तो मैं रुक गया और उसे फिर से चेतावनी देता हुआ बोला; "दुबारा अगर बीमार पड़ी ना तो बहुत मारूँगा|" उसने मुस्कुरा के हाँ में सर हिलाया और मुझे हाथ उठा के 'बाए' कहने लगी. मैं बाइक स्टार्ट की और शहर लौट गया.ठीक एक बजे मुझे डॉली फ़ोन आया, उस समय मैं रास्ते में ही था तो मैंने बाइक एक किनारे खड़ी की और उससे बात करने लगा.

इसी तरह दिन बीतने लगे और हम रोज एक से दो बजे तक बातें करते. वो मुझे हर एक दिन मुझे यही कहती की आप कैसे हो? आपने खाना खाया? आपकी बहुत याद आती है और आप कब आओगे? पर मैं हर बार उसकी बात को घुमा देता की उसका दिन कैसा था? घरवाले कैसे हैं आदि! वो भी मुझे आस-पड़ोस में होने वाली सभी घटनाएं बताती और कभी-कभी ये भी पूछती की ऑफिस में क्या चल रहा है? एक दिन की बात है की डॉली ने मुझे फ़ोन किया पर मैं उस समय मीटिंग में था तो उसका फ़ोन उठा नहीं सका. उसी रात उसने मुझे ग्यारह बजे फ़ोन किया. समय देखा तो मैं एक दम से घबरा गया की कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई! पर डॉली को लगा की मैं उससे नाराज हूँ इसलिए मैंने उसका फ़ोन नहीं उठाया. खेर मैंने उसे समझा दिया की मैं मीटिंग में था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया और आगे भी अगर मैं उसका फ़ोन न उठाऊँ तो वो परेशान ना हो! इधर मेरी छुटियों से बॉस बहुत परेशान थे इसलिए उन्होंने मुझे आखरी चेतावनी दे दी. इसलिए मेरा घर जाना दूभर हो गया और उधर डॉली ने मुझसे घर ना आने का कारन पुछा तो मैंने उसे सारी बात बता दी. वो थोड़ा मायूस हुई पर मैंने उसे ये कह के मना लिया की हम रोज फ़ोन पर तो बात करते ही हे. वहाँ आने से तो हम खुल के बात भी नहीं कर पायेंगे. पर वो उदास रहने लगी और इधर मैं भी मजबूर था!

महीने बीते और उसके बारहवीं के रिजल्ट का समय आ गया.उसके रिजल्ट से एक दिन पहले मैं रात को घर पहुँच गया.वो मुझे देख के बहुत खुश हुई और मुझे गले लगना चाहा पर मैंने उसे इशारे से मन कर दिया और फिर मैं अपने कमरे में सामान रख के नीचे आ गया.आज रात तो उसने जबरदस्त खाना बनाया जिसे खा के आत्मा तृप्त हो गई. अब चूँकि घरवाले सामने थे तो हम दोनों ने ज्यादा बात नहीं की और मैं पिताजी और ताऊ जी के साथ ही बैठा रहा. घर में सब जानते थे की कल डॉली का रिजल्ट है पर कोई भी उत्साहित या चिंतित नहीं था. उन्हें तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. जब सोने का समय हुआ तो मैं अपने कमरे में आकर लेट गया और दरवाजा बंद कर लिया. रात के दस बजे होंगे की मेरे दरवाजे पर एक बहुत हलकी सी दस्तक हुई! मैं जानता था ये दस्तक किसकी है इसलिए मैंने उठ के दरवाजा खोला और सामने डॉली ही खड़ी थी. मैं वापस आ के अपने पलंग पर बैठ गया और वो उसी दरवाजे पर खड़ी रही. घर में अभी भी सभी जाग रहे थे इसलिए वो अंदर नहीं आई थी. "तो मैडम जी! कल रिजल्ट है?! क्या चल रहा है मन में? डर लग रहा है की नहीं?" मैंने उसे छेड़ते हुए पूछा.

"डर? बिलकुल नहीं! मैं तो बस ये सोच रही हूँ की मेरे पास होने पर आप मुझे क्या दोगे?" उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा.

"क्या चाहिए तुझे?" मैंने उत्सुकता से पूछा.

"पहले वादा करो की आप मना नहीं करोगे?" उसका जवाब सुन मैं सोच में पड़ गया, क्योंकि मैं जानता था की वो किस की ख्वाइश करेगी जो मैं पूरा नहीं कर सकता. अगर वो मुझसे पैसे मांगती, कपडे मांगती, या कुछ भी मांगती तो मैं उसे मना नहीं करता. मुझे चुप देख के शायद वो समझ गई की मैं क्या सोच रहा हु.

डॉली : क्या सोच रहे हो?

मैं: जानता हूँ की तू क्या माँगने वाली है और मैं वो नहीं दे सकता. (मैंने थोड़े रूखेपन से जवाब दिया.)

डॉली : अच्छा? ठीक है! अभी नहीं बाद में दे देना! अब तो ठीक है?

मैं: समय लगेगा.

डॉली : हम इंतज़ार करेंगे... हम इंतज़ार करेंगे...क़यामत तक

खुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए

हम इंतज़ार करेंगे ...

न देंगे हम तुझे इलज़ाम बेवफ़ाई का

मगर गिला तो करेंगे तेरी जुदाई का

तेरे खिलाफ़ शिकायत हो और तू आए

खुदा करे के कयामत हो, और तू आए

हम इंतज़ार करेंगे ...

ये ज़िंदगी तेरे कदमों में डाल जाएंगे

तुझी को तेरी अमानत सम्भाल जाएंगे

हमारा आलम-ए-रुखसत हो और तू आए...

बुझी-बुझी सी नज़र में तेरी तलाश लिये

भटकते फिरते हैं हम आज अपनी लाश लिये

यही ज़ुनून यही वहशत हो और तू आए|

(बहु बेगम फिल्म का गाना कह कर वो जाने लगी तो मैंने भी उसके गाने को पूरा कर दिया.)

मैं: ये इंतज़ार भी एक इम्तिहां होता है

इसीसे इश्क़ का शोला जवां होता है

ये इंतज़ार सलामत हो

ये इंतज़ार सलामत हो और तू आए

ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए

हम इंतज़ार करेंगे...

(ये सुन के वो पलटी और आगे की पंक्तियाँ गाने लगी.)

डॉली : बिछाए शौक़ से, ख़ुद बेवफ़ा की राहों में

खड़े हैं दीप की हसरत लिए निगाहों में

क़बूल-ए-दिल की इबादत हो

क़बूल-ए-दिल की इबादत हो और तू आए

ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए

हम इंतज़ार करेंगे...

मैं: वो ख़ुशनसीब है जिसको तू इंतख़ाब करे

ख़ुदा हमारी....

(इतना कहते हुए मैं रुक गया क्योंकि आगे के शब्द मैं बोलना नहीं चाहता था. पर डॉली ने उन अधूरी पंक्तियों को खुद पूरा किया.)

डॉली : …. ...

मोहब्बत को क़ामयाब करे

जवां सितारा-ए-क़िस्मत हो

जवां सितारा-ए-क़िस्मत हो और तू आए

ख़ुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए

हम इंतज़ार करेंगे.

गाना पूरा कर के वो मुस्कुराई और पलट के चली गई. मैं जानता था की डॉली को गाना गुन-गुनाना बहुत अच्छा लगता था. जब हम छोटे थे तब हम दोनों अक्सर अंताक्षरी खेलते थे और वो सभी गानों को पूरा गाय करती थी और मैं कभी उसका साथ देता और कभी कभी उसका गाना सुनता रहता था. खेर रात में हम दोनों चैन से सोये और जब मैं सुबह उठा तो डॉली पहले से ही तैयार खड़ी थी और नीचे आंगन में मेरा इंतजार कर रही थी. मुझे देखते ही वो इशारे से कहने लगी की आप लेट हो गए हो! मैंने भी ऊपर खड़े-खड़े ही अपने कान पकडे और उसे सॉरी कहा और तुरंत नीचे आ कर नाहा-धो के तैयार हो गया और फिर हम दोनों ही नाश्ता कर के बाइक पर बैठ के निकल गये.
 
हम साइबर कैफे पहुंचे तो आज वहाँ और भी ज्यादा भीड़ लगी थी. मैंने डॉली का हाथ पकड़ा और भीड़ के बीचों-बीच से होता हुआ अंदर जा पहुँचा और फ़टाफ़ट डॉली का रोल नंबर डाल के उसके रिजल्ट के लोड होने का वेट करने लगा. जैसे-जैसे पेज लोड हो रहा था दोनों की धड़कनें तेज हो चली थी. आखिर जब पेज पूरा लोड हुआ तो उसके नंबर देख दोनों की आँखों में खुशियाँ उमड़ चुकी थी. ९८.५% देख के वो ख़ुशी से चिल्ला पड़ी और मेरे गले लग गई. वहाँ खड़े सब हमें ही देख रहे थे और जब उन्होंने देखा की उसके ९८.५% आये हैं तो वहां भी हल्ला मच गया! वहाँ आये की माता-पिता उसे बधाइयाँ देने लगे और वो सब को धन्यवाद करने लगी. आज डॉली के मुख पर बहुत ख़ुशी थी. पहले मैंने उसे अच्छा सा नाश्ता कराया और फिर मिठाई ली और हम घर की तरफ चल दिये. घर आते-आते थोड़ी देर हो गई. करीब बारह बजे होंगे की जैसे ही हम घर के नजदीक पहुंचे तो वहाँ बहुत सी गाड़ियाँ खड़ी थी. दो लाल बत्ती वाली और बाकी डिश एंटेना वाली.

मैने बाइक खड़ी कर के डॉली की तरफ देखा तो वो हैरान थी; "लो भाई ... अब तो तुम सेलिब्रिटी हो गई हो!" मैंने ऐसा कह के उसे छेड़ा और शर्म से डॉली के गाल लाल हो गए और उसने अपना सर झुका लिया. जब हम घर के दरवाजे के पास पहुंचे तो वहाँ गाँव के सभी लोग खड़े अंदर झाँक रहे थे. हम दोनों को देखते ही सब हमें अंदर जाने के लिए जगह देने लगे और हमारे कदम अंदर पड़ते ही ताऊ जी ने हँसते हुए हम दोनों को गले लगने के लिए बुलाया. तब जा के पता चला वहाँ तो मीडिया वालों का जमावड़ा लगा था. आखिर डॉली पूरे प्रदेश में प्रथम आई थी! आज तो ताऊ जी समेत सब ने उसे बहुत प्यार किया और सब उसे मुबारकबाद और आशीर्वाद दे चुके तब मंत्री जी आगे आये.उस ने भी आगे आते हुए डॉली को आशीर्वाद दिया और फिर उसके बाद कैमरे की तरफ देख के लम्बा-चौड़ा भाषण दिया की कैसे हमें लड़कियों को आगे पढ़ाना चाहिए और वो ही इस देश का भविष्य हैं! ये सुन के तो मैं भी दंग था क्योंकि ये वही शक़्स था जिसने डॉली की माँ और उसके प्रेमी को पेड़ से बाँध के जिन्दा जलाने का फरमान सुनाया था.जैसे ही मंत्री जी का भाषण खत्म हुआ सब ने तालियाँ बजा दी और फिर रिपोर्टर ने हेडमास्टर साहब से भी डॉली की इस उपलब्धि के बारे में पुछा तो वो कहने लगे;

"अरे भाई मैं क्या कहूँ! मुझे तो गर्व है की मैं ऐसे स्कूल का हेडमास्टर हूँ जहाँ राज और डॉली जैसे विद्यार्थी पड़ते हैं! पहले राज ने जिल्हे में टॉप किया था और अब देखो उसकी भतीजी ने भी पूरे प्रदेश में टॉप किया."

ये सुन के सारे रिपोर्टर और कैमरा मैन मेरी तरफ घूम गये. "तो बताइये राज जी पहले आपने टॉप मारा और अब आपकी भतीजी ने भी पूरे प्रदेश में टॉप किया है,आपको कैसा लग रहा है?" एक रिपोर्टर ने पूछा.

मेरे कुछ कहने से पहले ही ताऊ जी बोल पड़े; "जी हमारे घर के दोनों बच्चे ही बहुत समझदार है और दिल लगा के पढ़ते हैं."

"तो आगे आप डॉली को कॉलेज पढ़ने भेजेंगे?" एक रिपोर्टर ने उनसे सवाल पूछा. पर उसका जवाब मंत्री जी ने खुद दिया; "इसमें पूछने की क्या बात है? शहर के कॉलेज में बच्ची का दाखिला होगा और आप देखना ये वहाँ भी टॉप ही करेगी!" ये सुन के तो डॉली बहुत खुश हुई और उसके चेहरे से उसकी ख़ुशी साफ झलक रही थी.

मंत्री की बात सुन सभी चमचे ताली बजाने लगे और उनकी जय-जयकार शुरू हो गई. खेर ये ड्रामा दो घंटों तक चला और शाम होने तक सभी चले गए और घर में जितने भी लोग थे सब आज टी.वी. में आने से बहुत खुश थे. रात के खाने के समय ताऊ जी ने डॉली को सभी मर्दों के सामने बिठा दिया और मेरी तरफ देख के सवाल किया;

ताऊ जी: हाँ भाई राज तू बता, ये कॉलेज कहाँ है और कितनी दूर है?

मैं: जी शहर में दो ही कॉलेज हे. एक रेलवे फाटक के पास है और एक वो जिसमें मैंने पढ़ाई की थी. फाटक वाले के पास कोई हॉस्टल नहीं है तो सबसे उत्तम मेरा वाला कॉलेज ही रहेगा.बल्कि मेरी ही कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की की माँ एक लड़कियों का हॉस्टल चलाती हैं.जो की कॉलेज से करीब १० मिनट की दूरी पर हे. हॉस्टल में रहना-खाना और एक पुस्तकालय भी हे. (मैंने उन्हें सारी डिटेल बताई|)

ताऊ जी: वो तो ठीक है ... पर ... वहाँ अगर ये इधर-उधर कहीं चली गई तो?

मैं: जी हॉस्टल के कानून सख्त होते हे. शाम को ७ बजे के बाद वो किसी को भी बाहर जाने नहीं देते..खाने का समय भी निर्धारित है और कहीं भी जाने से पहले वार्डन को बताना जरुरी होता है और अगर कोई बिना बताये कहीं आये-जाए तो उसकी खबर घरवालों को की जाती हे. रहना, खाने, नहाने, कपडे धोने की सब की व्यवस्था हॉस्टल के अंदर में होती हे. डॉली को सिर्फ कॉलेज जाना है और वहाँ से हॉस्टल वापस.

ताऊ जी: ठीक है परसों मैं, नारायण भैया और तेरे पिताजी तुझे शहर में मिलेंगे. वहाँ जा के देखता हूँ!

उनकी बात से साफ़ था की अगर उन्हें मंत्री का डर ना होता तो वो डॉली को कतई कॉलेज पढ़ने नहीं जाने देते. इसलिए मरते क्या न करते. उन्हें उनकी बात का मान तो रखना ही था. खेर खाने के बाद मैं छत पर आ गया और कान में हेडफोन्स लगा के गाना सुनते हुए टहलने लगा. रात को ठंडी-ठंडी हवा चलने के कारन छत पर टहलने में मजा आ रहा था. तभी डॉली दबे पाँव ऊपर गई और पीछे से आके उसने मुझे अपनी बाहों में जकड लिया. उसके स्पर्श से ही मैं हड़बड़ा गया पर डॉली ने अपना सर मेरी पीठ पर रख दिया पर मैं चुप-चाप खड़ा रहा. ठंडी हवा के झोंकें मेरे चेहरे पर आज बहुत अच्छे महसूस हो रहे थे. करीब ५ मिनट बाद मैंने डॉली को खुद से अलग किया और मुंडेर पर जा बैठा. इधर वो भी मुझसे थोड़ा दूर हो कर बैठी, क्योंकि घर पर हम दोनों अकेले तो नहीं थे.

डॉली : मैं सोच रही हूँ की हम कलकत्ता भाग जाते हैं!

मैं: (उसकी बात सुन के चौंकते हुए) क्या?

डॉली : हाँ! वहाँ हमें कोई नहीं जानता!

मैं: अच्छा? और वहाँ जा के रहेंगे कहाँ? खाएंगे क्या? और करेंगे क्या?

डॉली : रहना और खाना तो मुझे नहीं पता पर करेंगे तो प्यार ही! एक नई जन्दगी की शुरुरात करेंगे.

मैं: नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं हे. उसके लिए पैसे चाहिए! मेरे पास कुछ पैसे हैं पर उसमें हमें सर ढकने की जगह भी नहीं मिलेगी खाने और रहने की तो बात ही छोड़ दो. फिर तेरी पढ़ाई का क्या? अगर भागना ही था तो इतना पढ़ाई क्यों की?

डॉली : मेरे जीवन का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ आपसे शादी करना हे.

मैं: पागल मत बन! इतनी मेहनत की है, इसे मैं बर्बाद नहीं होने दूंगा.

डॉली : (अपना सर पीटते हुए) तो अभी और पढ़ना है? घर में आपकी शादी की बात चलने लगी हे.

मैं: जानता हूँ पर तू चिंता मत कर मैं अभी शादी नहीं कर रहा.

डॉली : जबरदस्ती कर देंगे तो क्या करोगे और वैसे भी आपकी कुंडली मैं कौनसे ग्रहों की दशा ख़राब है की आपकी शादी टल जाएगी.

मैं: तो तेरी कुंडली में कौनसा ग्रहों की दशा ख़राब थी. (ये सुनते ही डॉली के पाँव तले जमीन खिसक गई.)

डॉली : तो.....वो..... (डॉली के मुँह से बोल नहीं फुट रहे थे.)

मैं: मैंने उस लालची पंडित को पैसे खिला के झूठ बुलवाया था. तेरे स्कूल और कॉलेज का टाइम कैलकुलेट कर के ही मैंने उसे पाँच साल बोला था. (डॉली ये सुन के उठ खड़ी हुई और आके मेरे सीने से लग कर रोने लगी.)

डॉली : मैं गलत नहीं थी! आप मुझसे बहुत प्यार करते हो बस कभी जताते नहीं हो! आपने मेरे लिए इतना सब कुछ किया.....

इसके आगे मैंने उसे कुछ कहने नहीं दिया और उसे खुद से अलग किया और घडी देखते हुए ऐसे जताया की बहुत लेट हो गया है और मैं वहाँ से जाने लगा तो डॉली बोल पड़ी;

डॉली : कहाँ जा रहे हो आप? आप ने कहा था की आप मुझे गिफ्ट दोगे?

मैं: आशु ... मैंने ....

डॉली : (मेरी बात बीच में काटते हुए) घबराओ मत मैं ऐसा कुछ नहीं माँगूँगी जो आपको देने में दिक्कत हो. ये तो बहुत आसान है आपके लिए!

मैं: अच्छा? क्या चाहिए?

डॉली : आपको याद है जब हम छोटे थे और रात को कभी अगर माँ मुझे डाँट देती तो आप कैसे मुझे अपने सीने से लगा के सुलाते थे? आज भी वैसे ही सोने का मन है मेरा!

मैं: (मुस्कुराते हुए) तब हम छोटे थे और अब.....

डॉली : (मेरी बात बीच में काटते हुए) सारी रात ना सही तो कुछ घंटों के लिए? प्लीज! आप तो जानते हो की मुझे नींद जल्दी आ जाती है, फिर आप चले जाना! प्लीज.. प्लीज.. प्लीज.. प्लीज!!!

उसकी बात सुनके मन नहीं हुआ की उसका दिल तोडूं इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया और वो ख़ुशी से उठ खड़ी हुई और भागती हुई अपने कमरे में भाग गई. करीब १० मिनट बाद में आया तो पाय की वो कुर्सी पर बैठी दरवाजे पर टकटकी बाँधे मेरा इंतजार कर रही हे. जैसे ही मैं अंदर आया वो दौड़ के दरवाजे के पास गई और चिटकनी लगाईं फिर मेरे पास आई और मेरे सीने से लग गई. उसकी साँसों की गर्माहट मुझे मेरे सीने पर महसूस हो रही थी और इधर डॉली के हाथ मेरी पूरी पीठ पर चलने लगे थे और मेरे भी हाथ स्वतः ही उसकी पीठ पर आ गए और उसकी बैकलेस कुर्ती पर आज मुझे पहली बार उसकी नग्न पीठ का एहसास हुआ. ये एहसास इतना ठंडा था की मैं छिटक कर उससे अलग हो गया.उसकी नग्न पीठ के एहसास ने मेरे अंदर वासना की चिंगारी ना जला दे इसलिए मैं उससे छिटक कर दूर हो गया था और उससे नजरें चुराने लगा था. वो फिर भी धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ी और मेरा हाथ पकड़ के अपने पलंग की तरफ ले जाने लगी और फिर वो लेट गई और मुझे धीरे से अपने पास लेटने को खिंचा.

मैं लेट गया पर मेरी नजरें छत पर टिकी थी की तभी डॉली ने मेरे दाएं हाथ को खींच के अपनी तरफ करवट लेटने को मजबूर किया.फिर बाएं हाथ को सीधा किया और उसे अपना तकिया बनाया. फिर वो दुबारा मेरी छाती में समां गई. फिर मेरे बाएं हाथ को उठाके उसने अपनी कमर पर रखा.अपना हाथ मेरी कमर पर रख कर खुद को मेरे सीने से समेट लिया. उसकी गर्म-गर्म सांसें मेरे दिल पर महसूस होने लगी थी. जितनी भी सख्ती मेरे दिल में थी जो मुझे उसके करीब नहीं जाने देती थी आज वो पिघलने लगी थी. मेरे मन में आज बहुत जोरों की उथल-पुथल हो रही थी! दिमाग कह रहा था की ये गलत है, तेरे साथ इस लड़की की भी जिंदगी तबाह हो जाएगी! पर दिल था की वो बहकने लगा था और कह रहा था की जो होगा वो देखा जायेगा! प्यार के लिए जान भी देनी पड़ी तो कोई गम नही. तभी दिमाग बोला की आशु का क्या होगा? तेरे साथ तो वो भी मौत के घाट उतार दी जाएगी! इसी जद्दोजहत के चलते मन बेचैन होने लगा की तभी डॉली ने मेरी छाती को चूमा! उसके नरम होठों के स्पर्श से ही दिल ने दिमाग पर जीत हासिल कर ली और मैंने डॉली को और कस के अपने सीने से चिपका लिया.मेरे इस दबाव के चलते उसने भी अपनी गिरफ्त मेरे इर्द-गिर्द सख्त कर ली. कब आँख बंद हुई ये पता ही नहीं चला और जब पता चला तो घडी में पोन तीन हुए थे. मैंने धीरे से खुद को डॉली की गिरफ्त से छुड़ाया और मैं दबे पाँव उठ के उसके कमरे से अपने कमरे में आ गया.पर नींद अब उचाट हो गई थी और मन में फिर से वहीँ जंग छिड़ चुकी थी. मैं खुद को तो किस्मत के हवाले छोड़ सकता था पर आशु को नहीं! दिमाग और दिल दोनों ने ही एक मत बना लिया की चाहे कुछ भी हो मैं आशु के प्यार को अपना लूँ! मैंने दृढ निश्चय कर लिया था की मैं कैसे न कैसे उसे भगा ले जाऊँगा. कब कहाँ और कैसे इस पर मुझे अब घोर विचार करना था.

सुबह पाँच बजे तक सोचते-सोचते एक जबरदस्त प्लान बना के तैयार कर लिया था. ऐसा प्लान जिसमें बाल भर भी कोई गड़बड़ नहीं थी. हर एक बात का ध्यान रखा था मैंने और अपने इस प्लान पर मुझे फक्र था. मैं इस प्लान के बारे में सोच-सोच के मुस्कुरा रहा था की तभी डॉली मेरे दरवाजे को खोल के अंदर आई और मुझे इस तरह बैठ के मुस्कुराते हुए देख कर बोली; "गुड मॉर्निंग!" उसे देखते ही मैं उठ के खड़ा हो गया और उसे गले लगाने को अपनी बाहें खोल दी. वो भी बिना कुछ बोले आके मेरे सीने से लग गई.

"आई लव यू !!!" मैंने आँखें मूंदें हुए कहा तो वो जैसे अपने कानों पर विश्वास कर ही नहीं पाई और मुझसे थोड़ा अलग हुई और मेरे मुख पर देखने लगी की कहीं मैं उसके साथ मजाक तो नहीं कर रहा. पर उसे मेरी आँख में सचाई और उसके लिए वो प्यार नजर आया तो वो फिर से मेरे गले लग गई और बोली; "आई लव यू टू !!! मैं जानती थी आप मेरा प्यार एक ना एक दिन कबूल कर लोगे." आज हम दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था पर घर की बंदिश भी थी इसलिए हम अलग हुए. पर हाथ अभी थामे हुए थे फिर मैंने जब डॉली के चेहरे पर नजर डाली तो आज उसका चेहरा दमक रहा था.
 
नीचे से भाभी की आवाज आई तो मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वो मुस्कुराते हुए नीचे जाने लगी. वो नीचे पहुँची ही थी की मैंने अपने फोन पर गाना फुल आवाज में चला दिया और खुद भी उसी गाने के अल्फाज गाने लगा;

"हसता रहता हूँ तुझसे मिलकर क्यूँ आजकल....

बदले बदले हैं मेरे तेवर क्यूँ आजकल....

आखें मेरी हर जगह ....

ढूंढे तुझे बेवजह...

ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह..

कैसे हुआ.. कैसे हुआ..

तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ

कैसे हुआ.. कैसे हुआ..

तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ ....

मैं बारिश की बोली समझता नहीं था

हवाओं से मैं यूँ उलझता नहीं था..

है सीने में दिल भी कहाँ थी मुझे ये खबर

कहीं पे हो रातें कहीं पे सवेरा

आवारगी ही रही साथ मेरे

ठहर जा ठहर जा ये कहती है तेरी नज़र

क्या हाल हो गया है ये मेरा..

आखें मेरी हर जगह ढूंढे तुझे बेवजह

ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह..

कैसे हुआ.. कैसे हुआ..

तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ

कैसे हुआ.. कैसे हुआ.. तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ. हम्म्म ममममम मममम… "

जब ये गाना खत्म हुआ तो मैं अपने कपडे ले कर नीचे आय. सभी के सभी आंगन में बैठे चाय पी रहे थे और मेरा गाना सुन रहे थे. मैं जब नीचे आया तो पिताजी बोले; "हो गया तेरा गाना?" मैं बुरी तरह झेंप गया और आशु की तरफ देखने लगा और उम्मीद करने लगा की वो मेरे गाने का मतलब समझ गई हो. वो मुझे देख के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी जो ये जय था की वो समझ चुकी हे. मैं सीधा बाथरूम में घुस के नहाने लगा पर गाना अब भी गुनगुना रहा था. नाहा धो के, चाय नाश्ता कर के मैं निकलने को हुआ तो बाहर ना जाके ऊपर गया, ये बहाना कर के की मैं कुछ भूल गया हु. दो मिनट बाद आशु भी ऊपर आ गई और कमरे की चौखट पर कंधे के सहारे खड़ी हो गई.

आशु: क्या भूल गए?

मैं: वो....वो.... कुछ तो भूल गया हूँ!

आशु चल के आगे आई और मेरे दिल पर अपनी ऊँगली रखते हुए बोली;

आशु: ये तो नहीं?

मैं: नहीं... ये तो तुम्हारे पास है!

ये सुन के डॉली मुस्कुराने लगी और मेरे सीने से लग गई.

आशु: तो अब कब भेंट होगी आपसे?

मैं: अब शहर में ही मिलेंगे.

आशु: हाय! उसमें तो कम से कम एक महीना लगेगा!

मैं: 'बिरहा' के बाद मिलन का दोहरा मजा होता हे.

ये सुन कर आँसूं के दो कतरे आशु की आँखों से छलक आये और मेरी कमीज को भीगोने लगे.

आशु: तो क्या बीच में एक भी दिन नहीं आ सकते मुझे मिलने?

मैं: कोशिश करूँगा पर वादा नहीं कर सकता. बॉस बहुत नाराज है मेरी छुटियों को लेकर!

आशु: ठीक है ... पर मैं फिर भी इंतजार करुँगी आपका!

मैंने आशु को खुद से अलग किया और वो अपने आँसू पोछने लगी. मैंने उसके चेहरे को अपने हथेलियों में लिया और उसके दाएँ गाल पर अपने होंठ रख दिये. मेरे होठों के स्पर्श से जैसे वो सिंहर उठी और पंजों पर खड़ी होके मेरे होठों को चूमना चाहा. पर मैंने उसके होठों पर ऊँगली रख के उसे रोक दिया; "अभी नहीं! कोई आ जाएगा." ये सुन कर वो झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाने लगी. मैंने पुनः उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके बाएँ गाल को चूम लिया. तब जाके उसका गुस्सा शांत हुआ और वो मेरे सीने से फिर लग गई.

इसी मीठी याद को लिए मैं घर से निकला और ऑफिस पहुँचा.बॉस अगले दिन की आधी छुट्टी दे दे इसलिए देर रात तक मैं ऑफिस में बैठा काम निपटाता रहा. अगले दिन पिताजी, ताऊजी और नारायण भैया सब मुझे बस स्टैंड पर मिले. वहाँ से कॉलेज करीब आधा घंटा दूर था तो हम ऑटो से कॉलेज पहुंचे. कॉलेज के गेट पर ही रहीम भैया मिल गए और मुझे देखते ही सलाम करने लगे. कॉलेज के दिनों में मैंने उनकी थोड़ी मदद की थी तो वो तब से मेरी बहुत इज्जत किया करते थे. मुझे सलाम करता देख सभी हैरान थे. रहीम भैया से दुआ-सलाम कर के जब हम अंदर आये तो पिताजी बोले; "तेरा तो बड़ा रुतबा है यहाँ? पढ़ाई करता था की दंगाई!" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और उन्हें कॉलेज दिखाने लगा. चूँकि सुबह का टाइम था तो विद्यार्थी क्लास में थे.अगर सब बाहर मटर गश्ती करते दिख जाते तो आशु का कॉलेज में पढ़ने का सपना तोड़ दिया जाता.

आखिर में मैं पिताजी को हेडमास्टर साहब के पास ले गया तो मुझे देख वो फूले नहीं समाय और तुरंत गले से लगा लिया.आखिर उनके कॉलेज का टॉपर जो था. फिर जब उन्हें पता चला की आशु भी मेरी तरह टॉपर है तो वो बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी को अपने पैसों से मिठाई मंगवा के खिलाई! मंत्री का नाम लेने की जरुरत ही नहीं पड़ी और कॉलेज में डॉली का एडमिशन पक्का हो गया.हेडमास्टर साहब ने जबरदस्ती चाय-नाश्ता कराया और फिर हमने वहाँ से विदा ली और १० मिनट पैदल चल के हॉस्टल के बाहर पहुंचे. हॉस्टल के गार्ड ने मुझे देखते ही सलाम ठोका और ये देख के तो सभी अचरज करने लगे. गार्ड हमें अंदर ले के आया और सुमन मैडम को बुलाया. ये सुमन मैडम वहीँ जो कॉलेज में मेरे साथ पढ़ती थी. नाम बिलकुल रंग-रूप से मेल खाता था उसी की माँ ये हॉस्टल चलाती थी.

सुमन मुझे देखते ही मुस्कुराती हुई आई; "अरे राज जी! इतने सालों बाद कैसे याद आई हमारी?" पिताजी समेत सभी हैरान था क्यों की आजतक उनके सामने मुझे कभी किसी ने 'राज जी' कह के नहीं बुलाया था.

"हाँ वो दरअसल मेरे भाई की लड़की डॉली ...." आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़ी; "मुबारक हो जी आपको! चाचा की तरह उसने भी टॉप मारा!" इतना कहते हुए वो मेरे गले लग गई. पर मैंने उसे अभी तक छुआ नहीं था और ये नजारा देख सभी मुँह बाय हैरान थे.दरअसल सुमन बहुत ही मुँहफट और अल्हड सवभाव की थी. जब वो बात करती थी तो उसे दुनियादारी की कतई चिंता नहीं होती थी और वो अपने मन की बात बोलने से कभी नहीं हिचकती थी. खेर मुझे उसे रोकना था की कहीं वो कुछ और ना बक दे; "ये मेरे पिताजी, ताऊ जी और नारायण भैया हैं! वैसे आंटी जी कहाँ हैं?" मैंने उससे पूछा तो उसे मेरे परिवार वालों का ध्यान आया और उसने पहले सब को हाथ जोड़ कर नमस्ते की फिर शर्मा कर अंदर भाग गई. उसके जाते ही मैं ने सब की तरफ देखा तो वो सब अब भी हैरान थे की उनका सीधा साधा लड़का जो कभी किसी लड़की से बात नहीं करता था वो इतना बड़ा हो चूका है की एक लड़की उसके गले लग रही है वो भी उसके परिवार के सामने.

"जी वो..." मेरे कुछ कहने से पहले ही आंटी जी आ गई. "अरे भाईसाहब आप सब खड़े क्यों हैं? बैठिये-बैठिये! ये लड़की भी न बिलकुल बुधु है!" मैंने आगे बढ़ कर आंटी जी के पाँव छुए तो उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और फिर हम सभी उनके घर की बैठक में बैठ गये. मैंने उनका परिचय सब से कराया और हमारे आने का कारन भी बताया. उन्हें सुन के बड़ी ख़ुशी हुई और उन्होंने तुरंत सुमन को आवाज दे कर चाय-नाश्ता मंगवाया. ताऊ जी और पिता जी ने बड़ी ना-नुकुर की पर आंटी जी नहीं मानी; "अरे भाई साहब आज पहली बार तो आप सभी से मुलाकात हुई है और ये तो घर की बात है! आपका लड़का राज बहुत मन लगा कर पढता था. और इसी की वजह से मेरी बुधु लड़की पास हुई हे. आप डॉली की कतई चिंता ना करो ये उसके लिए उसका दूसरा घर है.यहाँ उसे किसी चीज की कोई दिक्कत नहीं होगी! मेरी बेटी की तरह रहेगी वो यहाँ!" तभी वहाँ सुमन चाय-नाश्ता ले कर आ गई और सब को परोस कर खुद अपनी माँ की बगल में हाथ बंधे खड़ी हो गई.

"सुन लड़की तेरे कमरे में एक अलग से पलंग डलवा और कल से डॉली भी तेरे ही कमरे में रहेगी." आंटी की बात सुन उसने बस 'जी' कहा.

"बहनजी ... वो ... पैसे....." ताऊ जी ने बस इतना ही कहा था की वो बोल पड़ी; "भाई साहब मैं अब क्या बोलूं...घर की बात है!"

इस पर पिताजी भी तपाक से बोले; "देखिये बहनजी, एक-आध दिन की बात होती तो बात कुछ और थी! पर उसे तीन साल यहाँ रहना हे. जो पैसे आप बाकी सभी लड़कियों के घरवालों से ले रही हैं वो हम भी दे देंगे."

तभी नारायण भैया भी बोल पड़ा; "बाकी लड़कियों के घरवाले आपको कितने पैसे देते हैं?" ये सुन के मुझे, पिताजी और ताऊ जी को बहुत गुस्सा आया और ताऊ जी नारायण भैया को घूर के देखने लगे पर तभी मेरी नजर दिवार पर लगे बोर्ड पर पड़ी जिस पर सब कुछ लिखा था. मैंने इशारे से पिताजी को वहाँ देखने को कहा और उन्होंने ताऊ जी को कहा. "चलिए जी ये लीजिये ६०००/-" उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और २००० के नोट निकाले और आंटी जी को देने लगे पर आंटी जी ने मना कर दिया. वो समझ चुकी थी को हम सबने बोर्ड पढ़ लिया हे. "मैं आपकी बात का मान रखती हूँ पर आपको भी मेरी बात का मान रखना होगा. ये पैसे जो बोर्ड पर लिखे हैं वो औरों के लिए है और आप सब तो अपने हैं इसलिए आप मुझे केवल ४०००/- दिजिये." उन्होंने केवल २००० के दो नोट लिए और सुमन को रजिस्ट्रेशन की किताब लाने को कहा. सुमन ने तुरंत वो किताब और बिल बुक उन्हें ला के दी. आंटी जी ने रजिस्ट्रेशन की किताब मुझे दे दी और खुद ४,०००/- के बिल बनाने लगी. "पर बहन जी आप हमारे लिए २०००/- का नुकसान क्यों सह रही हैं?" ताऊ जी ने कहा.

"नुकसान कैसा जी? अब आपका लड़का मेरी बेटी को पढ़ाता था तब तो उसने कभी नहीं कहा की उसका नुकसान हो रहा है?" आंटी ने बिल की कॉपी ताऊ जी को देते हुए कहा. "पर आंटी जी उसमें मेरा नुकसान थोड़े ही था? मेरा भी तो रिविजन हो जाता था!" मैंने उनकी बात का उत्तर दिया. "अब बताइये बहनजी?" पिताजी ने मेरी बात का समर्थन किया. "भाई साहब जिस २,०००/- की बात आप कर रहे हैं वो हमारा मुनाफा होता हे. अब आप बताइये की कोई अपनों से मुनाफा कमाता है?" आंटी की इस बात का किसी के पास भी जवाब नहीं था इसलिए उनकी बात मान कर ताऊ जी ने उनसे वो बिल ले लिया और इधर मैंने रजिस्ट्रेशन वाली बुक में डॉली की सभी जानकारी लिख दी बस मोबाइल नंबर की जगह कुछ नहीं लिखा. जब आंटी जी ने मोबाइल नंबर माँगा तो ताऊ जी ने कहा; "बहन जी डॉली के पास मोबाइल नहीं हे. उसे इन सब चीजों का कोई शौक नहीं हे." ये सुन के आंटी जी ने सुमन को ताना मारा; "सीख इनकी लड़की से कुछ? ये तो सारा दिन मोबाइल में घुसी रहती हे." ये सुन कर उस बेचारी का सर शर्म से झुक गया अब उसे बचाने के लिए मैंने चलने की इजाजत माँगी तो सारे उठ खड़े हुए और आंटी हमें बाहर छोड़ने आई और मुझसे बोली; "अरे राज बेटा तुम क्या कर रहे हो आज कल?" तभी सुमन बीच में बोल पड़ी; "शादी-वादी कर ली होगी!" "नहीं आंटी जी वो मैं फिलहाल बाईपास के पास जो बड़ी सी बिल्डिंग हूँ वहाँ जॉब कर रहा हु."

"कमाल है? इतने सालों से तुम यहीं पर जॉब कर रहे हो पर हमें कभी मिलने नहीं आये!?" उन्होंने थोड़ा गुस्सा दिखते हुए कहा.

"जी वो... समय नहीं मिलता ... शनिवार और इतवार मैं घर चला जाता हूँ... इसलिए...." मैंने सफाई दी.

"ये सब मैं नहीं जानती ... एक शहर में हो कर कभी तो आ जाया करो! ये तो तुम्हारा अपना घर हे." उन्होंने मेरे कान पकड़ते हुए कहा.

"जी ....ठीक... है... आऊँगा....आऊँगा!!!" मैंने हँसते हुए कहा जैसे की वो मेरा कान मरोड़ रही हों और ये देख के सभी खिल-खिला के हंस पडे. खेर हँसी-ख़ुशी मैंने सब को बस स्टैंड छोड़ा और मैं विदा ले कर अपने ऑफिस आ गया.

ठीक १ बजे आशु का फ़ोन आया और मैंने उसे बता दिया की उसके कॉलेज और हॉस्टल दोनों जगह बात हो गई हे. ये सुन कर वो बहुत खुश हो गई और पूछने लगी की सब लोग कहाँ है? तो मैंने उसे बता दिया की वो सब बस में बैठे हैं और ५ बजे तक घर पहुचेंगे. इसके बाद वही प्यार भरी बातें हुई और फिर मेरे बॉस ने आवाज दे दी तो मुझे जल्दी ही जाना पडा.

रात के ग्यारह बजे मेरा फ़ोन बजा तो मैंने घडी देखि, चिंता हुई की सब ठीक तो है?

आशु: ये सुमन कौन है? (उसने बहुत गुस्से में कहा.)

मैं: क्या...? (अभी भी नींद से ऊंघते हूये.)

आशु: वही छमक छल्लो जो आपसे गले लगी थी आज?

मैं: (उबासी लेते हुए) वो... दोस्त ... हे.

आशु: दोस्त है तो दोस्त की तरह रहे! गले लगने की क्या जरुरत है उसे?

मैं: अरे बाबा! वो इतने साल बाद मिले ना तो ....

आशु: (बीच में बात काटते हुए) ऐसी भी क्या दोस्ती है की होश तक नहीं उसे की आपके साथ घर के बड़े लोग भी हैं! और आप को भी बहुत मज़ा आ रहा था जो उसे अपने सीने से चिपकाये हुए थे!

मैं: अरे मेरी बात तो सुनो! वो दरअसल थोड़ा मुँहफट है!

आशु: (बीच में बात काटते हुए) वो सब मैं नहीं जानती, आप उससे दूर रहो वरना मैं उसका मुँह नोच लुंगी!

इतना कह के आशु ने फ़ोन काट दिया. तो मैंने दुबारा फ़ोन घुमाया पर उसने फिर काट दिया. तीसरी बार... चौथी बार... पाँचवी बार... छठी बार...सातवीं बार...आठवीं बार...नौंवी बार... इस बार उसने फ़ोन उठाया.

मैं: आशु... मेरी बात तो सुन लो एक बार?

आशु: (सुबकते हुए) हम्म...

मैं: जैसा तू सोच रही है वैसे कुछ नहीं हे. कॉलेज के दिनों में मैं उसे पढ़ाया करता था वो भी उसके घर जा कर. बस इसके अलावा कुछ नहीं है!

आशु: घरवाले... आपकी शादी की बात कर रहे हैं! (उसने सुबकते हुए कहा.)

मैं: अरे तो करने दे ... मैं कौन सा शादी कर रहा हूँ! तू चिंता मत कर!

आशु: मैं.... आपसे अलग... नहीं रह सकती!.... मैं जान दे दूँगी!

मैं: शट अप!!! दुबारा ऐसी कोई बात कही तो मैं तुझसे कभी बात नहीं करुंगा. अब बेधड़क आराम से सो जा... मैं कोशिश करता हूँ की घर एक चक्कर लगा लु.

ये सुन कर उसका सुबकना बंद हुआ और उसने आई लव यू कह के फ़ोन काटा. अब मुझे उससे कैसे भी मिलने जाना था पर जाऊँ कैसे? बॉस छुट्टी देगा नहीं! पर उन दिनों किस्मत मुझ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान थी. जो चाह रहा था वो मिल रहा था. इसलिए जब घर जाने का मौका चाहने लगा तो अगले दिन वो भी मिल गया.बॉस ने कुछ फाइल पहुँचाने के लिए मुझे कहा. बीच रस्ते में मेरा गाँव था और बॉस जानते थे की मैं घर जरूर जाऊँगा इसलिए मेरी ख़ुशी पढ़ते हुए बोले; "कल लंच तक आ जाना." मैंने ख़ुशी से हाँ कहा और तुरंत निकल पड़ा.पहले फाइल पहुँचाई और फिर वापसी में घर पहुंचा. बुलेट की आवाज सुनते ही आशु भागती हुई बाहर आई और मुझे देखते ही उसकी आँखें चमक उठी. उसने आगे बढ़ के मुझे गले लगाना चाहा पर बाहर पिताजी और ताऊ जी बैठे थे इसलिए अपना मन मार के चुपचाप खड़ी हो कर मुझे उनसे बात करता हुआ देखने लगी. जब तक मेरी बात खत्म नहीं हुई वो वहाँ से हिली नहीं, शायद उसे डर था की मैं कहीं बाहर से ही ना चला जाऊ. जैसे ही मेरी बात खत्म हुई वो भागती हुई अंदर चली गई पर जब मैंने अंदर घुस के देखा तो वो मुझे कहीं नहीं मिली. आंगन में माँ, ताई जी और भाभी बैठी सब्जी काट रही थी. "अचानक कैसे आना हुआ?" भाभी ने पूछा.

"कुछ काम से पास के गाँव आना हुआ था." मैंने रुखा सा जवाब दिया और अपने कमरे की तरफ चल दिया. जैसे ही सीढ़ी चढ़ के ऊपर पहुँचा तो आशु अपने कमरे में घुस गई और इशारे से मुझे अंदर आने को कहा. मैं उसके कमरे में घुसा और उसने मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने पलंग पर बिठा दिया. फिर अपने दुपट्टे से मेरा पसीना पोछने लगी. उसकी ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी. वो मुड़ी और टेबल से पानी की गिलास और गुड़ उठा के मुझे दिया. मैंने गुड़ खाया और फिर पानी पिया और उसकी तरफ प्यार से देखने लगा. "आपको भूख लगी होगी? उसने मुस्कुरा कर कहा और मुड के जाने लगी तो मैंने उसकी कलाई थाम ली और बैग से गुलाब निकाल के अपने घुटनों पर आते हुए कहा; "मेरी जान के लिए!" आशु ने मेरे हाथ से गुलाब ले लिया और फिर उसे अपने होठों से चूमा. फिर वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई और झुक कर मेरे माथे को चूमा. मैं खड़ा हुआ और उसे अपने सीने से जकड़ लिया. इससे पहले की आगे कुछ बात हो पाती नीचे से मेरा बुलावा आ गया और मुझे आशु को छोड़ के नीचे जाना पडा. खेर वो शाम मुझे नीचे सब के बीच बैठ के बितानी पड़ी पर रात को खाने के समय ताऊ जी ने मेरी शादी की बात छेड़ी;

ताऊ जी: तो बरखुरदार! शादी के बारे में क्या विचार है?

मैं: जी अभी नहीं!

पिताजी: क्यों भला? लड़की तो तूने पहले ही पसंद कर रखी है ना?!

मैं: कौनसी लड़की?

नारायण भैया: अरे वही जो शहर में मिली थी. जिसने तुम्हें देखते ही गले लगा लिया था?

मैं: (खीजते हुए) वो खुद गले लग गई थी. मैंने उसे गले नहीं लगाया था. और आप सब से किसने कहा की मैं उससे शादी करना चाहता हूँ? मैं बस उसे कॉलेज टाइम में पढ़ाया करता था इससे ज्यादा और कुछ नहीं है!

ताऊ जी: अरे हम अंधे-बहरे थोड़े ही हैं जो हमें उसकी माँ का बार बार 'अपना' कहना सुनाई नहीं देता! कितनी बार उन्होंने तुझे घर आने को कहा था?
 
मैं: वो सब इसलिए कह रही थी क्योंकि मैं उनकी बेटी को मुफ्त में पढ़ाता था. हॉस्टल का खाना कितना वाहियात होता था.इसलिए वो बदले में मुझे घर का खाना खिलाया करती थी और इसी कारन उनका अपनापन मेरे प्रति थोड़ा ज्यादा हे. इससे ज्यादा उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा.

पिताजी: तो कब करेगा तू शादी?

मैं: पिताजी एक बार नौकरी पक्की हो जाये, पैसा अच्छा कमाने लगूँ तो मैं शादी कर लुंगा.

ताऊ जी: तुझे पैसे की क्यों चिंता है? इतना बड़ा खेत.....

मैं: (उनकी बात काटते हुए) मुझे अपने पाँव पर खड़ा होना हे. जब मुझे लगेगा की मैं अपने पाँव पर खड़ा हो गया हूँ तो मैं आपको खुद बता दूँगा और शायद आप भूल रहे हैं की आपने वादा किया था!

मेरा इतना कहना था की उन्हें अपना वादा याद आ गया और उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा. बस गुस्से से मुझे एक बार देखा और फिर खाना खाने लगे. खाने के बाद मैं ऊपर आ गया और छत पर चक्कर लगाने लगा. घंटे भर बाद आशु भी खाना खा के ऊपर आ गई और मुझे इस तरह गुम-सुम छत पर टहलते हुए देखने लगी. जब मेरी नजर उस पर पड़ी तो मैं ने पाया की वो बड़ी गौर से मुझे देख रही थी और मन ही मन कुछ सोच रही थी. "क्या हुआ जान?" मेरी आवाज सुन कर वो होश में आते हुई बोली; "कुछ नहीं... बस ऐसे ही आपको देख रही थी. आपके जितना प्यार करने वाले को पा कर आज मुझे खुद पर बहुत गर्व हो रहा हे.” आगे कुछ बोलने से पहले ही भाभी आ गई और उन्होंने आशु को बिस्तर लाने को कहा. आज सभी औरतें छत पर सोने वाली थीं सो मैं उतर के अपने कमरे में लेट गया.अगली सुबह मुझे जल्दी जाना था तो मैं बिना नाश्ता किये जाने लगा तो आशु भाग के मेरे पास आई और परांठे जो की उसने पैक कर दिए थे मुझे दे दिए और नीचे चली गई.

कुछ दिन बीते और आखिर वो दिन आ ही गया जब आशु को कॉलेज ज्वाइन करना था. शनिवार को घर आते-आते रात हो गई. घर के सभी लोग खाना खा चुका था.. मुझे देखते ही आशु ने तुरंत खाना परोस के मुझे दे दिया और खुद अपने कमरे में चली गई. मैं खाना खा के ऊपर आया तो देखा उसने अपने कमरे में सारा सामान समेट रखा था. एक बैग जिसमें उसके कपडे थे वो तैयार रखा था. पूरे कमरे को उसने अच्छे से साफ़ किया था. जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो उसके चेहरे ने उसकी सारी खुशियों को बयान कर दिया. उसने मुझे गले लगाना चाहा पर तभी पीछे से ताई जी आ गई और कमरे को देखते हुए आशु को ताना मारते हुए बोली; "चलो शुक्र है तू ने अपने कमरे को साफ़ कर दिया वरना ये भी हमें ही करना पडता."

"समझदार है!" मैंने उनके ताने का जवाब दिया और फिर अपने कमरे में आ कर लेट गया.मेरे जाते ही ताई जी आशु को ज्ञान देने लगी की शहर में उसे किन-किन बातों का ध्यान रखना हे. मैं अपने कमरे से उनकी सारी बातें सुन रहा था. ये ज्ञान कम और ताने ज्यादा थे! मैं चुप-चाप करवट लेके लेट गया और सुबह पाँच बजे के अलार्म के साथ उठ बैठा. मैं बाहर आया और अंगड़ाई लेने लगा तो देखा आशु नीचे घर के काम कर रही हे. मुझे देखते ही वो मुस्कुरा दी और फिर अपने काम में लग गई. मैं जल्दी से नाहा-धो के तैयार हुआ और फिर सभी ने नाश्ता किया.

ताऊ जी: देख आशु शहर जा के कहीं मटर-गश्ती शुरू न कर देना! तेरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई में रहना चाहिए और हर शनिवार-इतवार को दोनों घर आते रहना.

मैं; जी ... आप तो जानते ही हैं की मुझे दूसरे और आखरी शनिवार की छुट्टी मिलती है..... तो....

पिताजी: ठीक है... पर ख्याल रखिओ आशु का और हमें तुम दोनों की कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए!

मैं: जी... वैसे भी हमारा मिलना कहाँ हो पायेगा?

ताई जी: क्यों?

मैं: मेरे पास समय ही नहीं होता! एक रविवार मिलता है तो उसमें भी कपडे धो ना और खाना बनाने में समय निकल जाता हे. शाम को फ्री होता हूँ पर हॉस्टल में ६ बजे के बाद मनाही हे.

ताई जी: तो इसे (आशु) कोई दिक्कत हुई तो?

ताऊ जी: अरे कुछ दिक्कत नहीं होगी. सब देखा है हमने, तू चिंता मत कर.

मैंने आगे कुछ और नहीं कहा और फटाफट नाश्ता किया और अपनी बुलेट रानी को कपडा मारने बाहर चला गया.सब कुछ अच्छे से साफ़ कर के जब मैंने पीछे पलट के देखा तो आशु अपना बैग कंधे में टाँगे खड़ी थी. मैंने आगे बढ़ कर उससे बैग लिया और बाइक पर बैठ गया और बैग को पेट्रोल की टंकी पर रख लिया. एक स्टाइल वाली किक मारी और भड़भड़ करती हुई बुलेट स्टार्ट हुई, मैंने पलट के आशु को पीछे बैठने को कहा. तो वो सम्भल के बैठ गई और अपना दायाँ हाथ मेरे कंधे पर रख लिया. सारे घर वाले बाहर आ कर खड़े हो चुका था. और आशु की कुछ सहेलियां भी बुलेट की आवाज सुन कर वहाँ आ कर खड़ी हो गईं और हाथ हिला कर उसे बाय कहने लगी. ताऊ जी ने फिर से कहा; "सम्भल के जाना और वहाँ जा के हमें फ़ोन करना." अब उन्हें भी तो थोड़ा बहुत दिखावा तो करना था ना! गाँव से करीब दो किलोमीटर दूर पहुंचे होंगे की मैंने बाइक रोक दी और आशु से दोनों तरफ टांग कर के बैठने को कहा. उसने ठीक वैसे ही किया और अपने दोनों हाथों को मेरी बगल से ले कर सामने की तरफ लाइ और मेरी छाती को कस के पकड़ लिया. उसका सर मेरी पीठ में धंसा हुआ था और आँखें बंद थी. आशु की गर्म सांसें मुझे मेरी पीठ पर महसूस हो रही थी. मैं बाइक को चालीस की स्पीड में ही चला रहा था ताकि इस सफर का जितना हो सके उतना आनंद ले सकू.

दो घंटे की ड्राइव के बाद अब थकावट होने लगी तो मैंने बाइक एक ढाबे की तरफ मोड़ दी जहाँ की मैं अक्सर रुका करता था. जब भी घर जाता या आता था. बाइक रुकते ही आशु जैसे अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आई. "चलो चाय पीते हैं." मैंने उसे कहा तो वो बाइक से उतरी और मैंने बाइक पार्क की.हम दोनों ढाबे में घुसे. मुझे देखते ही वेटर ने तपाक से नमस्ते की और आशु को मेरे साथ देखते ही वो समझ गया की वो प्रियतमा है और उसने नमस्ते दीदी कहा! आशु ने उसकी नमस्ते का जवाब दिया और फिर हम खिड़की के पास वाले टेबल पर बैठ गये. "आपको पता है मैं क्या सोच रही थी?" आशु ने मुझसे पुछा तो मैंने ना में सर हिला दिया. "मुझे ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों इस नर्क से भाग के कहीं अपनी छोटी सी दुनिया बसाने जा रहे हे. इन दो घंटों में मैं जो कुछ भी सोच सकती थी वो सब सोच लिया की हमारा घर कैसा होगा, बच्चे कितने होंगे!" आशु ने बड़े भोलेपन से कहा और मैंने सोचा की मुझे उसे अब अपने प्लान से अवगत करा देना चाहिए.

मैं: घर से भागना इतना आसान नहीं है जितना तुम सोच रही हो. जैसे ही हम घर से भागेंगे उसके कुछ घंटों में ही लठैतों को बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन भेजा जायेगा हमें रोकने के लिए. हर बस को रोक कर चेकिंग की जाएगी और हमें पकड़ के मौत के घाट उतार दिया जायेगा. इसलिए हमें जो कुछ भी करना है वो बहुत सोच समझ कर करना होगा और किसी भी हालात में घर पर या किसी भी इंसान को हमारे इस रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं चलना चाहिए! सबसे जरुरी चीज जो हमें चाहिए वो है पैसा. इस डेढ़ साल की नौकरी में मैं कुछ दस हजार ही जोड़ पाया हु. मेरी नौकरी के बारे में घर में सब जानते हैं और मुझे भी कुछ पैसे घर भेजने पड़ते हे. पर अब तुम चूँकि शहर आ चुकी हो तो अगले साल से तुम्हें भी कुछ पार्ट टाइम नौकरी करनी होगी. ये वही पैसे हैं जिससे हम बचा सकते हैं और जिनकी मदद से दूसरे शहर में हमें घर किराये पर लेना, बर्तन-भांडे आदि खरीदने में मदद करेंगे.

आशु: और हम भागेंगे कैसे?

मैं: तुम्हारे थर्ड ईयर के पेपर होने के अगले दिन ही हम भागेंगे. मैं घर पर फ़ोन कर दूँगा की हम घर आ रहे हैं, अब चूँकि घर पहुँचने में ४ घंटे लगते हैं और घर वाले कम से कम ६ से ८ घंटे तक हमें नहीं ढूंढेंगे तो हमारे पास इतना टाइम होगा की हम ज्यादा से ज्यादा दूरी तय कर सके. यहाँ से हम सीधा बनारस जायेंगे और वहाँ से बैंगलोर!

आशु: बैंगलोर?

मैं: हाँ... वो बड़ा शहर है और वहाँ तक हमें ढूँढना इतना आसान नहीं होगा. मोबाइल फेंकना होगा, बैंक अकाउंट बंद करना होगा और तुम्हारे नए कागज बनवाने होंगे.

आशु: कागज?

मैं: आधार कार्ड और पॅन कार्ड.

आशु: वो तो घर में कभी बनाने नहीं दिये.

मैं: जानता हूँ और वही हमारे काम आयेगा. नए कागजों का कोई पेपर ट्रेल नहीं होगा.

आशु मेरी सारी बातें हैरानी से सुन रही थी की मैंने इतनी सारी प्लानिंग कर रखी हे. इतने में सुमन का फ़ोन आ गया, जिसे देख कर आशु को बहुत गुस्सा आया. उसने दरअसल पूछने के लिए फ़ोन किया था की हम दोनों कब तक पहुँच रहे हे. "ये क्यों फोन कर रही थी आपको?" उसने गुस्सा दिखाते हुए पूछा. "जान, वो पूछ रही थी कब तक हम दोनों हॉस्टल पहुंचेंगे. अब गुस्सा छोडो और चाय पियो और हाँ याद रहे उसे भूले से भी हमारे बारे में शक़ नहीं होना चाहिए." ये सुन कर आशु कुछ बुदबुदाई और फिर चाय पीने लगी. उसकी इस अदा पर मुझे हँसी आ गई जिसे देख के वो भी थोड़ा मुस्कुरा दी. खेर हम चाय पी कर निकले और दो घंटे बाद शहर पहुँच गये. रास्ते भर आशु मुझसे उसी तरह चिपकी रही जैसे मुझे छोड़ना ही ना चाहती हो. जैसे ही हम शहर में दाखिल हुए मैंने आशु को ढंग से बैठने को कहा और वो पहले की तरह बायीं तरफ दोनों पैर कर के बैठ गई और उसका दाहिना हाथ मेरे दाएं कंधे पर था.

बुलेट रानी हॉस्टल की गेट पर रुकी तो गार्ड ने आगे आ कर मुझे नमस्ते की और आशु का बैग लेना चाहा तो मैंने उसे मना कर दिया. बाइक पार्क कर मैं आशु के साथ अंदर आया. दरवाजे पर नॉक की तो दरवाजा सुमन ने खोला और उसके चेहरे पर हमेशा की तरह ख़ुशी साफ़ झलक रही थी. "अरे हमारी टॉपर आशु भी आई है!" उसने आशु को छेड़ते हुए कहा. आशु ने सुमन को नमस्ते कहा और फिर हम बैठक में बैठ गए .तभी आंटी जी भी आ गईं. मैने आगे बढ़ कर उनके पाँव छुए और मेरे पीछे-पीछे आशु ने भी उसके पैर छुए. आंटी जी ने सुमन ख़ास हिदायत दी की वो आशु का अच्छे से ख्याल रखे और इसी के साथ मेरे जाने का समय हो गया तो मैं उठ के खड़ा हुआ और नमस्ते कर के जैसे ही बाहर जाने को मुड़ा की आशु रोने लगी और मेरे सीने से लग गई. उस पगली ने ये भी नहीं देखा की वहाँ सुमन और आंटी जी भी हे.

"वो दरअसल पहली बार घर से बाहर कहीं रुकी है, इसलिए घबरा रही हे." मैंने जैसे तैसे बात को सँभालने की कोशिश की. "अरे बेटी रोने की क्या बात है? ये भी तो तेरे घर जैसा ही हे. सुमन अंदर ले जा आशु को." आंटी जी ने आशु के सर पर हाथ फेरते हुए कहा. जैसे-तैसे मैंने आशु के हाथों को जो मेरी पीठ पर कस चुका था. उन्हें खोला और आशु के आँसू पोछे; "बस अब रोना नहीं है! मैं कल सुबह ०९:३० आऊँगा तैयार रहना. तब जा कर उसका रोना बंद हुआ और फिर सुमन आशु का हाथ पकड़ के अंदर ले गई. "अरे बेटा तुम क्यों तकलीफ करते हो? सुमन कल छोड़ आएगी इसे कॉलेज" आंटी ने कहा.

"आंटी जी वो पहला दिन है और मैं साथ रहूँगा तो इसे डर कम लगेगा." मेरी बात सुन के आंटी ने और कुछ नहीं कहा और मैं उनसे विदा ले कर घर आ गया.मेरा घर और ऑफिस हॉस्टल से १ घंटे दूर था. घर लौट कर कपडे वगैरह धो कर, खाना खाया और जल्दी सो गया.

सूबह फटाफट तैयार हो कर मैं हॉस्टल पहुँच गया और मेरी बुलेट रानी की आवाज सुनते ही आशु भागती हुई बाहर आई और उसके पीछे-पीछे सुमन भी आई और आशु की इस भागने की हरकत पर मुस्कुराने लगी. "चलो भाई बेस्ट ऑफ लक पहले दिन के लिए. अगर कोई तकलीफ हो तो मुझे बताना." सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ ... ये कॉलेज की गुंडी थी. आज भी बहुत चलती है इनकी." मैंने हँसते हुए कहा और फिर हम कॉलेज के लिए चल पडे. मुझे कॉलेज गेट पर देखते ही रहीम भैया दौड़ कर आये और सलाम किया. मेरे साथ आशु को देख वो समझ गए की वो मेरी प्रियतमा हे. हम दोनों को देख कर कोई नहीं कह सकता था की मैं आशु का चाचा हूँ, ५ साल का अंतर् तो कोई पकड़ ही नहीं सकता था. खुद को मैं अच्छे से मेन्टेन रखता था. एक दम क्लीन-शैवेन रहता था. कपडे ब्रांडेड जिससे की लगे ही ना की मैं गाँव-देहात का रहने वाला हु.

"अगर कोई भी परेशानी हो तो रहीम भैया को कह देना." मैंने आशु से कहा ताकि उसके मन का डर कम हो. कॉलेज पूरा घुमा के उसे उसकी क्लास की तरफ छोड़ने जा रहा था की उसकी नजर उस दिवार पर पड़ी जहाँ मेरी तस्वीर लगी थी और वो मुझे खींच के उस तरफ ले जाने लगी. मेरी तस्वीर देख कर उसे काफी गर्व महसूस हो रहा था. "मैं चाहता हूँ तुम्हारी भी तस्वीर मेरी बगल में लगे." मेरी बात सुन कर आशु का आत्मविश्वास लौट आया और उसने हाँ में सर हिलाया. "शाम को ५ बजे मुझे गेट पर मिलना. इतना कह के मैंने उसे उसकी क्लास में भेज दिया.

ऑफिस आने में घंटा भर लग गया और बॉस बहुत गुस्सा हो गए. पर मुझे तो शाम को जल्दी जाना था और ये बात कैसे कहूँ उनको?! मैंने उनकी डाँट का जरा भी विरोध नहीं किया और सर झुकाये सुनता रहा. एक कंपनी का पूरा फाइनेंसियल डाटा मेरे पास पेंडिंग पड़ा था इसलिए उनकी डाँट खत्म होते ही मैं सिस्टम पर बैठ गया और काम करने लगा. लंच के समय भी सभी कहते रहे पर मैं नहीं गया और बड़ी मुश्किल से केशबूक कम्पलीट की. बॉस ने जब देखा तो खुद ही मुझे खाने के लिए बोलने लगे तब मैंने उनसे जल्दी जाने की बात कही तो वो भड़क गये. "गर्लफ्रेंड का चक्कर है ना?" उन्होंने डाँटते हुए कहा. "जी मेरे भाई की लड़की का आज कॉलेज में पहला दिन है वो कहीं इधर-उधर न चली जाए इसलिए उसे हॉस्टल छोड़ के मैं वापस आ जाऊंगा." मैंने उनसे आखरी बार विनती की तो थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान गए और बोल दिया की कल सुबह तक सारा डाटा उन्हें किसी भी हालत में कम्पलीट चाहिए. जैसे ही चार बजे मैं फ़टाफ़ट अपनी बुलेट रानी को ले के कॉलेज के लिए निकला और ठीक पाँच बजे मैं कॉलेज गेट पर रुका, मुझे देखते ही आशु रोती हुई भाग के मेरे पास आई.

मैं: क्या हुआ रो क्यों रही हो?

आशु: वो....वो....कैंटीन में.... रैगिंग .... उसने... मुझे .... डांस..... करने को.....|

मैं: (बीच में बोलते हुए) क्या नाम है उसका?

आशु: तोमर

बस आशु का इतना कहना था की मैं बाइक से उतरा और उसका हाथ पकड़ के तेजी से कैंटीन में घुसा. मैने देखा वहाँ कुछ लड़कियां डांस कर रही हैं और सेकंड और थर्ड ईयर के बच्चे खड़े देख कर हँस रहे हे. मैंने आशु का हाथ छोड़ा और भीड़ के बीचों-बीच होता हुआ सामने जा पहुंचा. ५ लड़कों का एक झुण्ड सब की रैगिंग कर रहा था और मुझे देखते ही उनमें से एक बोला; "ये लो एक और बच्चा आ गया."
 
"तुम में से तोमर कौन है?" मैंने गरजते हुए कहा. ये सुन कर उनका हीरो लड़का सामने आया और बोला; "मैं हूँ बे!" उसकी आँखें पूरी लाल थी. जिसका मतलब था उसने अभी-अभी गांजा फूंका हे. "इस कॉलेज में रैगिंग अलाउड नहीं है, जानता है ना तू?" मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल के कहा. "तू कौन है बे? प्रिंसिपल का चमचा!?" ये सुनते ही मैंने एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर रख दिया और वो मिटटी चाट गया.उसके सारे चमचे आ कर उसे उठाने लगे. जिन बच्चों की रैगिंग हो रही थी वो सब डरे-सहमे से एक तरफ खड़े हो गए और पूरी कैंटीन में शान्ति छ गई!

"तेरी ये हिम्मत साले!" ये कहते हुए वो तोमर नाम का लड़का अपने होठों पर लगे खून को साफ़ करते हुए बोला और अपना मोबाइल निकाल कर अपने भाई को फ़ोन करने लगा. "भाई....भाई....एक लड़के ने... मुझे बहुत मारा...मेरा खून निकाल दिया... आप जल्दी आओ भाई!" ये कहके उसने फ़ोन काट दिया और मुझे बोला; "रुक साले ...तू यहीं रुक.... एक बाप की औलाद है तो यहीं रुक|"

"यहीं बैठा हूँ.... बुलाले जिसे बुलाना हे." ये कह कर मैंने पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसे उस लड़के की तरफ घुमा कर रख कर बैठ गया.तभी पीछे से आशु आ गई और इससे पहले वो कुछ कहे मैंने उसे इशारा कर के वापस भेज दिया.

तोमर: अच्छा ... ये तेरी बंदी है ना?! कौन से क्लास में है तू?

मैं: वो प्रिंसिपल रूम के बाहर जो दिवार है न उस पर सबसे ऊपर वाली तस्वीर मेरी है!

तोमर: वही तस्वीर तेरी कल अखबार में भी छपेगी!

मैं: आने दे तेरे भाई को फिर पता चलेगा किसकी तस्वीर छपेगी कल!

तोमर: हाँ-हाँ देख लेंगे.... और तुम लोग भी सुन लो सालों! जो कोई भी मेरे खिलाफ जाता है उसका क्या हाल होता है!

मैं: चुप-चाप बैठ जा अब! वरना दूसरे झापड़ में यहीं हग देगा!

तोमर: तेरी तो.....

इसके आगे वो कुछ कहता की उसका भाई पीछे से आ गया.मेरी पीठ अभी भी उस शक़्स की तरफ थी की तभी आवाज आई; "हाँ भई किसने पेल दिया तुझे?" ये सुन कर जैसे ही मैं पलटा तो देखा ये तो सिद्धू भैया हे. उन्होंने भी देखते ही मुझे पहचान लिया और आगे बढ़ कर सीधे गले लगा लिया. "अरे राज इतने साल बाद! कैसा है तू?" ये कहते हुए सिद्धू भइया मुस्कुरा कर मुझसे बात कर रहे थे और वो तोमर को भूल ही गये.

"ओ भैया? इसे क्या गले लगा रहे हो इसी ने तो मारा है मुझे!" तोमर बोला.

"अरे? तू तो पढ़ाकू लड़का था. तूने कैसे हाथ छोड़ दिया?!"

"भैया .... आपका भाई लड़कियों की रैगिंग कर रहा था. उन्हें यहाँ आइटम नंबर वाले गानों पर डांस करवा रहा था." ये सुनते ही उनका चेहरा तमतमा गया और वो बड़ी तेजी से उसके पास गए और एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर दे मारा. ठीक उसी समय उन्हें गांजे की महक आई तो उन्होंने उसे उठा के एक और तमाचा मारा और वो फिर नीचे जा गिरा| "हरामजादे!!! तेरी हिम्मत कैसे हुई लड़कियों की रैगिंग करने की? ये कॉलेज हमारी माँ के नाम पर है और तू उन्हीं के नाम को गन्दा कर रहा है! समझाया था ना तुझे की कॉलेज की लड़कियों का सम्मान करना, पर तू....कुत्ते! बहुत चर्बी चढ़ी है न तुझे, अभी उतारता हूँ तेरी चर्बी!" ये कहते हुए सिद्धू भैया ने अपनी बेल्ट निकाल ली और एक जोर दार चाप उसके कंधे पर पड़ी.मैंने भाग कर उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोका; "छोड़ दे मुझे राज ! इस कुत्ते ने हमारे खानदान की इज्जत पर कीचड़ उछाला है!"

"भैया...." मैंने बस इतना ही कहा था की उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और एक बेल्ट और चाप दी! अब मैंने जैसे तैसे उन्हें पीछे से पकड़ लिया और पीछे की तरफ खींचने लगा पर मुझे बहुत ताकत लगानी पढ़ रही थी. भैया थे ही इतने बलिष्ट! उधर तोमर जमीन पर पड़ा दर्द से करहा रहा था और उसके चमचे हाथ बांधे पीछे खड़े सब कुछ देख रहे थे.

सिद्धू भैया: तेरी तो मैं जान ले लूँगा कुत्ते!

मैं: भैया.. छोड़ दो ... तमाशा मत खड़ा करो... हम बैठ कर बात करते हैं!"

सिद्धू भैया: कोई बात-वात नहीं करनी मुझे! छोड़ तू मुझे!

मैं: भैया मैं आपके आगे हाथ जोड़ के विनती कर रहा हूँ! आप घर चलो ... वहाँ आप जो चाहे इसे सजा दे देना.

तब जा कर भैया का गुस्सा कुछ काबू में आया और उन्होंने बेल्ट छोड़ दी. "तुम सब लोग सुन लो! आज के बाद यहाँ किसी ने भी रैगिंग की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. रैगिंग करनी है तो उस फाटक वाले कॉलेज में पढ़ो, इस कॉलेज में प्यार, मोहब्बत, आशिक़ी, नशे के लिए कोई जगह नहीं हे. राज जैसे स्टूडेंट्स ने इस कॉलेज की जो शान बनाई है वो बनी रहनी चाहिए और इस शान पर अगर किसी ने कलंक लगाने की कोशिश की तो वो जान से जायेगा!" सिद्धू भैया ने गरज के साथ अपना फरमान सुनाया. "....और राज , इस कुत्ते की गलती के लिए मैं तुझसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगता हु." ये कहते हुए भैया ने हाथ जोड़े तो मैंने उनके हाथ पकड़ लिए; "ये क्या कर रहे हो भैया? लड़का भटक गया है, आप इस समझाओगे तो समझ जायेगा."

"सुना तूने कुत्ते! चल माफ़ी माँग राज से." भैया ने गरजते हुए तोमर से कहा. वो बेचारा रोता हुआ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ के माफ़ी मांगने लगा तो मैंने भी उसे माफ़ कर दिया. "आज के बाद तूने किसी को भी परेशान किया ना तो देख फिर! और आप सभी को भी बता दूँ, इसका नाम राकेश है और आज के बाद आप में से किसी भी स्टूडेंट को इससे डरने की जरुरत नहीं है, कोई भी इसे तोमर नहीं कहेगा. साले कुत्ते! हमारी जात का नाम ले कर ऐसे डरा रखा है जैसे की कोई तोप हो! घर चल तू अब, जरा पिताजी को भी पता चले तेरे खौफ के बारे में." ये कहते हुए भैया ने उसके पिछवाड़े पर लात मारी और वो बेचारा शर्म के मारे सर झुका कर निकल लिया. भैया से कुछ बातें हुई और फिर हम दोनों गेट पर पहुँचे, पीछे पीछे आशु भी आ रही थी तो भैया ने उससे पूछा: "हाँ भई तुम क्यों हमारे पीछे आ रही हो? कुछ काम है क्या मुझसे?"

"जी....वो....." इतना कहते हुए आशु ने मेरी तरफ इशारा कर दिया और ये सुनके भैया हँसते हुए बोले; "अच्छा जी... तो यही हैं जिनकी वजह से तुम ने राकेश को पेल दिया."

"भैया वो...."

"अरे छोडो भाई! हम सब समझ गए!" ये कहते हुए वो मुझे छेड़ने लगे. "चलो बढ़िया है! खुश रहो!" इतना कह कर भैया अपनी गाडी में बैठ के निकल गये.

उनके जाते ही डरी-सहमी सी आशु मेरे सीने से लग गई और रोने लगी. उस ने आज पहली बार ऐसा कुछ देखा था जो उसके लिए पूरी तरह नया नितुभव था. मैंने उसे पुचकार के चुप कराया और उसके माथे को चूमा तो वो कुछ शांत हुई. फिर उसे बाइक पर बिठा कर हॉस्टल छोड़ा.कल की मुलाक़ात का समय भी तय हुआ और इसी तरह रोज़ कॉलेज के बाद एक घंटे के लिए मिलना, घूमना-फिरना, प्यार भरी बातें करना... ऐसे करते हुए दिन बीते.. बस मेरे लिए ऑफिस और पर्सनल लाइफ को बैलेंस करना मुश्किल हो रहा था जिसका पता मैंने आशु को कभी चलने नहीं दिया.... और फिर वो दिन आया जब आशु का जन्मदिन था.

मैंने आज पूरे दिन की छुट्टी ले रखी थी. आशु को भी मैंने बता दिया था की वो आज आधे दिन के बाद बंक मार के मेरे साथ चले. सबसे पहले तो मैं उसे एक अच्छी सी रोमांटिक मूवी दिखाने ले गया और फिर उसके बाद उसे आज पहली बार अपने घर पर लाया. कमरे में दाखिल होते ही वो कमरे की सजावट देख कर दंग रह गई. फ्रिज से केक निकाल के जब मैंने रखा तो उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसूं छलक आये. केक पर लगी मोमबत्ती बुझा कर सबसे पहला टुकड़ा उसने मुझे खिलाया और फिर वही आधे टुकड़ा मैंने आशु को खिला दिया. मैंने उसे कस के अपने सीने से लगा लिया पर अगले ही पल वो मुझसे थोड़ा दूर हुई और नीचे जमीन की तरफ देखने लगी. फिर मेरी आँखों में देखा और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होठों को चूम लिया. मैं उसके इस अचानक हुए हमले से थोड़ा हैरान था. जो उसने साफ़ पढ़ ली और शर्म से सर झुका लिया. पर आज मैं अपनी जान को कैसे नाराज करता सो मैं आगे बढ़ा और आशु के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसे गुलाबी होठों को चूमा. मेरे स्पर्श से आशु के जिस्म में हलचल शुरू हो चुकी थी और उसने अपने दोनों होठों को मेरे होठो पर रख दिया. इधर मैंने अपने होठों को थोड़ा खोला और आशु के निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा. ५ सेकंड के बाद मैंने ऐसा ही उसके ऊपर वाले होंठ के साथ भी किया. आशु ने कभी ऐसा चुम्बन महसूस नहीं किया था इसलिए वो मदहोश होने लगी थी. उसका जिस्म हल्का होने लगा था और उसके जिस्म का वजन मुझ पर आने लगा था. इधर मैं बारी-बारी उसके दोनों होठों को चूसने में लगा था की तभी मेरे लिंग में तनाव आने लगा और दिमाग ने जैसे बहुत तेज करंट मुझे मारा और मैंने आशु को खुद से अलग किया. हम दोनों की सांसें भारी हो चली थी और मेरे तन और दिमाग में जंग छिड़ चुकी थी. तन संभोग चाहता था और दिमाग उसके परिणाम से डरता था. आशु को आ रहे आनंद में जैसे ही विघ्न पड़ा उसने अपनी आँखें खोली और फिर मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी की भला क्यों मैंने ये चुंबन तोडा?! पर उसके ऊपर जैसे कुछ फर्क पड़ा ही नही. इसलिए वो धीरे-धीरे कदमों से मेरे पास आई और मैं धीरे-धीरे पीछे हटने लगा और पलंग पर जा बैठा. वो मेरे पास आकर खड़ी हो गई और फिर घुटने मोड़ के नीचे बैठ गई और मेरे चेहरे को अपने हाथ में थामा और फिर से अपने गुलाबी होंठ मेरे होठों पर रखे और मेरे नीचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूस ने लगी. आशु मेरे कश्मक़श को समझ नहीं रही थी और बस मेरे होठों को बारी-बारी से चूस रही थी. इधर मेरा काबू भी खुद के ऊपर से छूटने लगा था और हाथ अपने आप ही उठ के उसके दोनों गालों पर आ चुका था., मेरी जीभ भी अब कोतुहल करने को तैयार थी. जैसे ही आशु ने मेरे ऊपर के होंठ को छोड़ के नीचले होंठ को पकड़ने के लिए अपना मुँह खोला मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में सरका दी और मैं ये महसूस कर के हैरान था की उसने तुरंत ही मेरी जीभ को मुँह में भर के चूसना शुरू कर दिया. अब तो मेरी हालत ख़राब हो चुकी थी. लिंग कस के खड़ा हो चूका था और पैंट में तम्बू बना चूका था. हाथ नीचे आ कर आशु के वक्ष को छूना चाहते थे पर अभी भी दिमाग में थोड़ी ताक़त थी इसलिए उसने हाथों को नीचे सरकने नहीं दिया.
 
इधर आशु को तो जैसे मेरी जीभ इतनी पसंद आ रही थी की वो उसे छोड़ ही नहीं रही थी और सांसें रोक कर उसे चूस-चूस के निचोड़ना चाहती थी. आशु के हाथ भी हरकत करने लगे थे और उस ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए थे. बस तीन ही बटन खुले थे की मैंने उसके हाथों को रोक दिया. तभी आशु ने मेरी जीभ की चुसाई छोड़ी और अपनी जीभ मेरे मुँह में सरका दी तो मैंने उसकी जीभ को चूसना शुरू कर दिया. इधर आशु के हाथों ने फिर से मेरी कमीज के बटन खोलना शुरू कर दिया था और मेरे हाथों ने उसके चेहरे को थामा हुआ था. अब लिंग की हालत यूँ थी की वो पैंट फाड़ के बाहर आने को मचल रहा था और दिमाग में फिर से घंटी बजने लगी थी की कहीं कुछ हो ना जाए! मैंने आशु की जीभ को चूसना बंद किया और इससे पहले की मैं कुछ कहूं उसने पुनः अपने होठों से मेरे निचले होंठ को अपने मुँह की गिरफ्त में ले लिया. जैसे-तैसे कर के मैंने इस चुंबन को तोडा और आशु के होठों पर ऊँगली रखते हुए कहा; "बस! बाकी...शादी के बाद!" ये सुन के वो ऐसे मुँह बनाने लगी जैसे किसी छोटे बच्चे के हाथ से लॉलीपॉप छीन ली हो!

"आऊच.... मेरा छोटा बच्चा|" ये कह के मैंने उसे गले लगा लिया और फिर खाने ले लिए कुछ आर्डर किया. मैं बाथरूम में घुसा ताकि अपने लिंग को शांत कर लूँ, कहीं आशु देख लेती तो पता नहीं क्या सोचती?!

दस मिनट में मैं मुँह धो कर बाहर लौटा तो देखा आशु पलंग पर बैठी हे. उसकी पीठ दिवार से लगी थी और दोनों पाँव पलंग पर सीधे थे. उसने अपनी दोनों बाहें खोल के मुझे पलंग पर बुलाया. मैं उसके गले लगने के बजाये उसकी गोद में सर रख कर लेट गया.आशु के उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी;

आशु: ये बर्थडे अब तक का बेस्ट बर्थडे था. थैंक यू जानू!

मैं: हम्म...

आशु: एक और थैंक यू आपको!

मैं: एक और? किस लिए?

आशु: किस करना सिखाने के लिए. (ये कह के आशु हँसने लगी.) वैसे आप तो काफी माहीर निकले? और कितनी बार कर चुके हो?

मैं: पागल फर्स्ट टाइम था!

आशु: अच्छा? इतना परफेक्ट कैसे?

मैं: वीडियो देख-देख के सीख गया.

आशु: अच्छा? मुझे भी दिखाओ!

मैं: नहीं... उसमें 'और' भी कुछ है! 'वो सब' अभी नहीं!

आशु: स्कूल और कॉलेज में बहुत सी लड़कियां हैं जिन्होंने 'वो सब' कर रखा है और वो सब मज़े ले कर सुनाती हे. इसलिए थेअरी तो मुझे अच्छे से पता हे.

मैं: अच्छा? चलो प्रैक्टिकल शादी के बाद कर लेना?

आशु: इतना इंतजार करना पड़ेगा? आप भी ना?! आप की उम्र के लड़के तो लड़कियों के पीछे पड़े रहते हैं इन सब के लिए और एक आप हो की.....

मैं: अब कुछ तो फर्क होगा न मुझ में और बाकियों में, वरना तुम मुझिसे प्यार क्यों करती?

आशु: आपका मन नहीं करता?

मैं: करता है.... पर जिम्मेदारियां भी हैं! घर से भागना आसान काम नहीं है!

आशु: हम प्रोटेक्शन इस्तेमाल करते हे.

मैं: तुम सच में चाहती हो की पहली बार में मैं कॉन्डम इस्तेमाल करूँ?

आशु: नहीं....(कुछ सोचते हुए) मैं गर्भनिरोधक गोली ले लुंगी.

मैं: ऐसा कुछ नहीं करना ... थोड़ा सब्र करो! (मैंने थोड़ा डाँटते हुए कहा.)

आशु: सॉरी! पर आप वीडियो तो दिखा दो ना प्लीज? देखने से तो कुछ नहीं होगा.

मैं: तुम बहुत जिद्दी हो! ये लो...

ये कहते हुए मैंने उसे अपने फ़ोन में रखी एक ब्लू-फिल्म लगा के दे दी और तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. खाना आ चूका था तो मैंने खाना लिया और आशु के हाथ से फ़ोन छीन लिया और कहा; "पहले खाना ... बाद में देख ना." ये कहते हुए मैंने उसे पहली बार पिज़्ज़ा दिखाया और बताया की ये है क्या| आशु को पिज़्ज़ा बहुत पसंद आया और हम दोनों ने खाना खाया और वापस पलंग पर बैठ गए पर इस बार आशु ने अपना सर मेरी गोद में रखा था और वो वही ब्लू-फिल्म देखने लगी. ब्लू-फिल्म से उसके जिस्म का तो पता नहीं पर मेरे लिंग में हरकत होने लगी थी. वो तन के खड़ा होना चाहता था पर आशु का सर ठीक उसी के ऊपर था. मैंने थोड़ा हिलना चाहा की मैं उसका सर हटा दूँ पर वो ये सब समझ चुकी थी और उसने कुछ इस कदर करवट ले ली अब उसका बायां गाल ठीक मेरे लिंग के ऊपर था. वो मुझ से कुछ नहीं बोली बस बड़ी गौर से ब्लू-फिल्म देखती रही. इधर लिंग बगावत पर उत्तर आये और अपने आप ही पैंट के ऊपर से आशु के गाल पर थाप देने लगे जिसे आशु ने शायद महसूस भी किया. अब मैंने उठ के खड़े होने की कोशिश की तो आशु ने वीडियो रोक दी और हँसते हुए कहा; "अच्छा बाबा! अब तंग नहीं करुँगी!" मतलब वो मेरे लिंग को साफ़ महसूस कर रही थी और जान बुझ कर मेरे साथ ऐसा कर रही थी. "तू बदमाश हो गई हे." ये कहते हुए मैंने उसके गाल पर हलकी सी थपकी लगाई. मैं वापस दिवार से पीठ लगा कर बैठ गया और उसने भी अपना सर अब मेरे सीने से टिका लिया और वीडियो देखने लगी. ठुकाई का सीन शुरू हुआ ही था की आशु का हाथ मेरे लिंग पर आगया और ऐसा लगा जैसे वो नाप के देख रही हो के मेरा लिंग उस आदमी के लिंग के मुकाबले कितना बड़ा हे. मैंने धीरे से उसका हाथ अपने लिंग से हटा दिया और वापस उसका हाथ अपनी छाती पर रख दिया. तीस मिनट की वीडियो को उसने बिना काटे देखा और उसका जिस्म पूरा गर्म हो चूका था" उसने वीडियो पूरी होते ही फ़ोन रखा और खड़ी हो गई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच के लेटने को कहा और फिर खुद मेरी बगल में लेट गई. अपने दाएं हाथ को मेरे गाल पर रखा और मुझे किस करने लगी. शुरू-शुरू में मैंने भी उसकी किस का जवाब बहुत अच्छे से दिया पर जब लिंग फिर से खड़ा हो गया तो मैंने उसे रोक दिया; "बस जान!" और फिर घडी देखि तो सवा पांच बजे थे. "कुछ देर और रुक जाते हैं ना?" आशु ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे उठने से रोकते हुए कहा. "आने-जाने में १ घंटा लगेगा, फिर हॉस्टल में क्या बोलोगी?" मैंने तुरंत अपने कपड़े ठीक किये पर आशु का तो जैसे जाने का मन ही नहीं था. "कल भी बंक मारूँ?" उसने खुश होते हुए कहा.

"दिमाग ख़राब है? यही सब करने के लिए यहाँ आई थी? फर्स्ट सेमेस्टर में फ़ैल हो गई तो घर वाले फिर घर पर बिठा देंगे. समझी? कॉलेज पढ़ने के लिए होता है समय बर्बाद करने के लिए नहीं और आज के बाद कभी मुझे बिना बताये बंक मारा ना तो सोच लेना!" मैंने आशु को थोड़ा झड़ते हुए कहा. डाँट सुन के उसका सर झुक गया; "पढ़ाई के मामले में कोई मस्ती नहीं! समझी?" उसने हाँ में सर हिलाया और फिर मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊँची की और उसके होठों को चूमा. तब जा के वो फिर से खुश हो गई और अपने कपडे ठीक किये और मुँह हाथ धो के हम घर से निकले और मैंने आशु को हॉस्टल छोडा. आशु को मैं कभी भी कॉलेज के गेट से पिकअप नहीं करता था बल्कि चौक पर बत्ती के पास मेरी बाइक हमेशा खड़ी होती थी और हॉस्टल भी मैं उसे कुछ दूरी पर छोड़ता था ताकि कोई भी हमें एक साथ न देखे.

आशु बाइक से तो उत्तर गई पर उस का हॉस्टल जाने का मन कतई नहीं था इसलिए उसे खुश करने के लिए मैंने अपने बैकपैक से उसके लिए एक गिफ्ट निकाला और उसे दे दिया. गिफ्ट देख कर वो खुश हो गई. गिफ्ट में एक फ़ोन था और एक सिम-कार्ड भी. वो ख़ुशी से उछलने लगी और अचानक से मेरे गले लग गई और थैंक यू कहते हुए उसकी जुबान नहीं थक रही थी. "इसका पता किसी को भी नहीं चलना चाहिए? न कॉलेज में न हॉस्टल में?" मैंने उसे थोड़ा सख्त लहजे में कहा और जवाब में उसने हाँ में सर हिलाया पर उसके चेहरे की ख़ुशी अब भी कायम थी. जाने से पहले उसने अचानक से मेरे होठों को चूमा और फिर हॉस्टल की तरफ भागती हुई घुस गई. मैंने भी बाइक घुमाई और ऑफिस आ गया और काम करने लगा. ये मेरा रोज का काम था की शाम को जल्दी आशु को मिलने पहुँचो और आशु को हॉस्टल छोड़ के ऑफिस देर तक बैठो और फिर देर रात घर पहुँचो और बिना खाये-पीये सो जाओ! बॉस इसलिए कुछ नहीं कहता था की उसे काम कम्पलीट मिलता था पर मेरी कई बार रेल लग जाती थी!

जो बदलाव अब मैं आशु में देख रहा था वो ये था की वो अब उसका प्यार मेरे लिए अब कई गुना बढ़ चूका था. जब भी उसे टाइम मिलता तो वो कहीं छुप कर मुझे फ़ोन करती, व्हाट्स ऍप पर मैसेज करती रहती. रोज सुबह-सुबह उसका प्यार भरा मैसेज देख कर मैं उठता. तरह-तरह के हेयर स्टाइल बना कर उसका सेल्फी भेजना और मेरे पीछे पड़ जाना की मैं उसे सेल्फी भेजूँ! जब भी हम मिलते तो वो मेरा हाथ थाम लेती, और तरह-तरह की फोटो खीचती. कभी मुझे किस करते हुए तो कभी पॉउट करते हुए और बहाने से मुझे किस करती. कभी इस पार्क में, कभी उस पार्क में, कभी किसी कैफ़े में और यहाँ तक की एक दिन उसने एक पुराने खंडर जाने की भी फरमाइश कर दी. ये खंडर प्रेमी जोड़ों के लिए जन्नत था क्योंकि यहाँ कोई आता-जाता नहीं था. जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ कोई जगह खाली नहीं थी पर आशु मेरा हाथ थामे मुझे खींच के अंदर और अंदर ले जा रही थी. उसे तो जैसे भूत-प्रेत का कोई डर ही नहीं था. अंदर पहुँच कर वो मेरी तरफ मुड़ी और अपनी बाहें मेरे इर्द-गिर्द लपेट ली. फिर वो अपने पंजो पर खड़ी हो गई और मेरे होठों पर किस कर दी. मेरे दोनों हाथ उसकी पीठ पर घूमने लगे थे और इधर आशु ने अपनी बाहें मेरे गले में डाल ली. हम अपने किस में इतना मग्न थे की आस-पास की कोई खबर ही नहीं थी. जब जेब में फ़ोन बजा तब जा के होश आया, फोन आशु के हॉस्टल से था जिसे देखते ही हम तुरंत बाहर आये और फटाफट हॉस्टल पहुंचे.

इस शनिवार हमें घर जाना था तो मैं सुबह-सुबह आशु को लेने हॉस्टल पहुंचा. रास्ते भर आशु मेरी पीठ से चिपकी रही और हमारा एक मात्र हॉल्ट वो ढाबा ही था जहाँ रुक कर हम चाय पीने लगे.

आशु: तो अब हम अपने रिश्ते को आगे कब ले कर जा रहे हैं?

मैं: आगे? मतलब?

आशु: 'वो'

मैं: वो सब शादी के बाद

आशु: पर क्यों?

मैं: तुम प्रेग्नेंट हो गई तो?

आशु: ऐसा कुछ नहीं होगा.

मैं: आशु! मैं इस बारे में अब कोई बात नहीं करूँगा! नहीं मतलब नहीं! (मैंने गुस्से से कहा)

आशु: अच्छा ठीक है! पर आप आज रात को मेरे कमरे में तो आओगे आज? कितने दिनों बाद आज मौका मिला हे.

मैं: पागल हो गई हो क्या? किसी ने देख लिया तो क्या होगा जानती हो ना?

आशु: कोई नहीं देखेगा. आप सब के सोने के बाद आ जाना.

मैं: नहीं!

आशु: मैं इंतजार करुँगी!

इतना कह कर वो टेबल से उठ गई और बाइक के पास जा कर खड़ी हो गई. मैं बिल भर के बाहर आया और बिना उससे कुछ बोले बाइक स्टार्ट की और हम फिर से हवा से बातें करते हुए घर की ओर चल दिये. रास्ते में आशु उसी तरह मुझसे चिपकी रही पर मैंने उससे और कोई बात नहीं की. हम घर पहुँचे और आशु ने सब के पैर छू के आशीर्वाद लिया और मैं सीधा अपने कमरे में घुस गया और बिस्तर पर पड़ गया.कुछ देर बाद आशु ऊपर आई और मेरे कमरे में झांकते हुए निकल गई. वो समझ गई थी की मैं उससे नाराज हु. उसी ने घर पर आज खाना बनाया और फिर सब के साथ बैठ के यहाँ-वहाँ की बातें चल ने लगी. हमेशा की तरह आशु भी कोने में बैठी बातें सुनती रही पर मेरा सर भन्ना रहा था सो मैं उठ के बाहर चला गया.कुछ ही दूर गया हूँगा की पीछे से जय की आवाज आई और फिर उस के साथ खेत पर बैठ कर माल फुंका. रात साढ़े आठ बजे घर घुसा तो घरवालों ने ताने मारने शुरू कर दिए की इतने दिन बाद आया है, ये नहीं की कुछ देर सब के साथ बैठ जाये. मैं बिना कुछ कहे ऊपर गया और तौलिया ले कर नीचे आ कर नहाया और ऊपर कमरे में टी-शर्ट डालने ही वाला था की मेरे नंगे जिस्म पर मुझे आशु ने पीछे से जकड लिया. उसकी उँगलियाँ मेरी छाती पर घूमने लगी थी. मैंने तुरंत ही उसे खुद से दूर किया; "दिमाग ख़राब है तेरा?" गुस्से से लाल मैंने टी-शर्ट पहनी और नीचे जा कर सब के साथ बैठ गया और बातों में ध्यान लगाने लगा.

रात के खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था और आशु में आये बदलावों के बारे में सोच रहा था. उसके जिस्म में भूख की ललक मुझे साफ़ नजर आ रही थी.तभी वहाँ आशु चुप-चाप आ कर खड़ी हो गई. नजरें झुकी हुई, हाथ बाँधे वो जैसे अपने जुर्म का इकरार कर रही हो. बचपन में जब भी उससे कोई गलती हो जाती थी तो वो इसी तरह खड़ी हो जाती थी और उस समय जब तक मैं उसे गले लगा कर माफ़ न कर दूँ उसके दिल को चैन नहीं आता था. 'आशु.... तू ये सब क्यों कर रही है? खुद पर काबू रखना सीख प्लीज! वरना सब कुछ खत्म हो जायेगा!" ये कहते हुए मैंने उसके सामने हाथ जोड़ दिये. जिसे देख उसकी आँख से आँसूं गिरने लगे. इस बात की परवाह किये बिना की हम घर पर हैं और कोई हमें देख लेगा मैंने आशु को कस कर अपने गले लगा लिया. मेरी बाहों में आते ही वो टूट के सुबकने लगी और बोली; "जानू.... मैं क्या करूँ? मुझसे ये दूरी बर्दाश्त नहीं होती. हम एक शहर में हो कर भी कभी दिल भर के मिल नहीं पाते. हमेशा हॉस्टल की घंटी या कोई साथ न देख ले वाला डर हमें एक दूसरे के करीब नहीं आने देता. आप जी तोड़ कोशिश करते हो की हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहे पर आपको अपनी नौकरी भी देखनी हे. आप जब भी मिलते हो तो वो पल मैं आपके साथ जी भर के जीना चाहती हूँ इसलिए उन कुछ पलों में मैं सारी हदें तोड़ देती हु. जन्मदिन वाले दिन के बाद से तो आपके बिना एक पल को भी चैन नहीं आता! रात-रात भर तकिये को खुद से चिपकाए सोती हूँ, ये सोच कर की वो तकिया आपका जिस्म है जिसकी गर्मी से शायद मेरा जिस्म थोड़ा ठंडा पद जाए पर ऐसे कभी नहीं होता. पढ़ाई में भी मन नहीं लगता, किताब खोल कर बस आप ही के ख्यालों में गुम रहती हु. आपके जिस्म की गर्माहट को महसूस करने को हरपल बेताब रहती हु. प्लीज-प्लीज हम अभी क्यों नहीं भाग जाते? मैं आप के साथ एक पेड़ के नीचे रह लूँगी पर अब और आप से दूर नहीं रहा जाता." उसकी बातें सुन कर उसके दिल का हाल मैं जान चूका था पर इस कोई इलाज नहीं था. अगर मेरा खुद के शरीर पर काबू है इसका मतलब ये तो नहीं तो की दूसरे का भी उसके शरीर पर काबू हो?

"जान! मैं समझ सकता हूँ तुम कैसा महसूस करती हो, और यक़ीन मानो मेरा भी वही हाल है पर हम दोनों को एक दूसरे पर काबू रखना होगा! हम अभी नहीं भाग सकते, बिना पैसों के हम बनारस तो क्या इस जिले के बाहर नहीं जा सकते. हमें बहुत बड़ी लड़ाई लड़नी है और उसके लिए खुद पर काबू रखना होगा. मैं ये नहीं कहता की हम मिलना बंद कर दें, पर हमें जिस्मानी रिश्ते को रोकना होगा. ये किस करणा, ये गले लगणा ..... इन सब पर काबू रखना होगा. जब मौका मिलेगा तब हम ये सब करेंगे और प्लीज संभोग अभी नहीं! वो शादी के बाद!"

इसके आगे मेरे कुछ कहने से पहले ही आशु मुझसे अलग हो गई और सर झुकाये हुए बोली; "इससे तो अच्छा है की मैं जान ही दे दूँ!" आशु की आँखें से आँसूं थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, मैंने आगे बढ़ कर उसके आँसू पोछने चाहे पर वो एकदम से मुड़ी और नीचे अपने कमरे में चली गई. मैं कुछ देर तक और छत पर टहलता रहा और सोचता रहा. घडी पर नजर डाली तो बारह बज रहे थे. मैं अपने कमरे की तरफ जाने लगा तो आशु के कमरे का दरवाजा खुला था. अंदर झाँका तो पाया आशु अब भी रो रही थी और अपने तकिये को अपनी छाती से चिपकाये हुए थी. पता नहीं क्यों पर बार-बार वो तकिये को चुम रही थी. शायद ये सोच रही होगी की वो तकिया मैं हु. तभी उसने करवट बदली पर इससे पहले वो मुझे देख पाती मैं दिवार की आड़ में छुप गया और वो करवट बदल के फिर से उसी तकिये को खुद से चिपकाये हुए प्यार करती रही. १५ मिनट तक मैं छुप कर उसे यूँ तकिये से लिपटे रोता देखता रहा पर मजबूर था क्योंकि अगर कोई घरवाला देख लेता तो?!!! मन मार के जैसे ही अपने कमरे में जाने को मुड़ा की नीचे से ताऊ जी की आवाज आई; "इतनी रात गए क्या कर रहा है?" ये सुनते ही मैं हड़बड़ा गया, शुक्र है की मैं आशु के कमरे में नहीं घुसा वरना आज सब कुछ खत्म हो जाता.

"जी वो.... नींद नहीं आ रही थी इसलिए छत पर टहल रहा था." मेरी आवाज सुनते ही आशु उठ के बाहर आ गई और बिना कुछ बोले ही मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया. मैं भी उसके इस बर्ताव से चौंक गया और समझ गया की उसे बहुत बुरा लगा हे. मैं अपना इतना सा मुँह ले कर अपने कमरे में आ गया और बिस्तर पर लेट गया पर नींद तनिक भी नहीं आई. घड़ियाँ गिन-गिन कर रात गुजारी और सुबह जब चलने का समय हुआ तो आशु अब भी खामोश थी.

गाँव से कुछ दूर आने के बाद मैंने बाइक रोक दी और आशु को दोनों तरफ पैर कर के बैठने को कहा तो उसने मेरी ये बात भी अनसुनी कर दी. मजबूरन मुझे ऐसे ही बाइक चलानी पड़ी, ढाबे पर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी और आशु को चाय पीने चलने को कहा तो उसने फिर से मना कर दिया. अब मैंने जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ के खींचा और उसे ढाबे में ले गया और जबरदस्ती चाय पिलाई.

"जान!आई एम सॉरी!!! प्लीज मुझे माफ़ कर दो! मैं तुम्हें दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था. तुम जो सजा दोगी वो मंजूर है पर प्लीज मुझसे बात करो!"

मैंने आशु से की मिन्नतें की पर वो कुछ नहीं बोली. हमने चुप-चाप चाय पी और फिर हम वापस हाईवे पर आ गए, पर मैंने बाइक बजाये हॉस्टल की तरफ ले जाने के अपने घर की तरफ मोड़ दी. घर पहुँचने से पहले मैंने बाइक एक मेडिकल स्टोर के पास रोकी और कुछ दवाइयाँ ले कर वापस आया. "आपकी तबियत ख़राब है?" आशु ने चिंता जताते हुए पूछा. तो मैंने मुस्कुरा कर नहीं कहा और बाइक घर की तरफ घुमा दी. जैसे ही घर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी तो आशु बड़ी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी. मैंने उसे ऊपर कमरे की तरफ चलने को कहा और कमरे की चाभी भी उसे दे दी. मैंने बाइक नीचे पार्क की और घर फ़ोन कर दिया की हम घर पहुँच गए हैं, और साथ ही आशु के हॉस्टल में फ़ोन कर दिया की गाँव में कुछ काम है इसलिए मैं उसे कल हॉस्टल छोड़ दूंगा. फिर खाने के मैगी ली और सारा सामान ले कर मैं कमरे में आया. आशु खड़ी हो कर पीछे वाली खिड़की से बाहर कुछ देख रही थी. मुझे देखते ही वो बोली; "मुझे हॉस्टल कब छोड़ोगे?" मैंने आशु का हाथ पकड़ा और उसे खींच के पलंग के पास ले आया और बोला: "आज की रात और कल की दोपहर आप मेरे साथ गुजारोगे!" ये सुन के आशु बोली: "क्यों?"

"आपने कहा था ना आप का मन मेरे बिना नहीं लगता तो मैंने सोचा की क्यों न आपको इतना प्यार करूँ की आपको मेरी कमी कभी महसूस न हो."

ये सुन कर आशु ने मेरी तरफ पीठ कर दी और बोली; "मैं जानती हूँ ये आप सिर्फ मुझे खुश करने के लिए कर रहे हो. आपको ऐसा कुछ भी करने की जरुरत नहीं जिसके लिए आपका मन गवाही ना देता हो."

मैं ने आशु को पीछे से अपनी बाँहों में जकड़ा और उसके कान में फुसफुसाता हुआ बोला; "दिल से कह रहा हु." इतना कह कर मैंने उसे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया और झुक कर आशु के होठों को चूम लिया. मेरे होंठ के स्पर्श से उसकी सारी कठोरता खत्म हो गई और उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द डाल दी और मेरे किस का जवाब देने लगी. मैंने अपने होंठ खोले के अपनी जीभ से उसके होठों को रगड़ा और फिर अपने दोनों होठों के भीतर उसके नीचे होंठ को भर के चूसने लगा. तभी आशु ने धीरे से मुझे खुद से दूर किया और बोली; "आप .... मुझे धोका तो नहीं दोगे ना?" मैंने ना में सर हिलाया. "पर एक शर्त है! वादा करो की तुम पढ़ाई में ध्यान लगाओगी."
 
"वादा करती हूँ जानू! पढ़ाई को ले कर आपके पास कोई शिकायत नहीं आयेगी." इतना कह के आशु ने अपनी बाहें फिर से मेरी गर्दन पर जकड़ दी और मुझे खींच के अपने ऊपर झुका लिया और अपनी जीभ से मेरी जीभ को छूने व चूसने लगी. उसके हाथ मेरी पीठ पर घूम रहे थे पर मेरे हाथ अभी भी मेरे वजन को संभाले हुए थे. मैं उठा और आशु की आँखों में देखते हुए अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा और वो भी उठ बैठी पर पलंग पर घुटनों के बल बैठ के मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों से थामा और फिर से मेरे होठों को बारी-बारी से चूसने लगी. मैंने अपनी कमीज उतारी पर आशु ने एक पल के लिए भी मेरे होठों को अपने मुँह से आजाद नहीं किया.

मैंने ही अपने होठों को उससे छुड़ाया और कहा; "जान कपडे तो उतारो" ये सुनते ही उसके गाल शर्म से लाल हो गये. मैं समझ गया की वो क्यों शर्मा रही हे. मैंने खुद उसके सूट को उतारने के लिए हाथ आगे बढाए तो उसकी नजरें झुक गई. मैंने धीरे से उसका सूट उतरा और आशु ने इसमें मेरा पूरा सहयोग दिया. अब वो मेरे सामने सिर्फ एक ब्रा में थी और शर्म से अब भी उसकी नजरें झुकी हुई थी. मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊपर की और उसके गुलाबी होठों को चूमा और धीरे-धीरे उसे फिर से लिटा दिया और उसके ऊपर आ कर उसके होठों को चूसने लगा. उसका निचला होंठ बहुत फूला हुआ था. और हो भी क्यों ना पिछले कुछ महीनों से मैं जो उसका रसपान कर रहा था.लिंग पूरे जोश में आ कर बाहर आने को बेताब थे पर आशु को तो जैसे किस करने से फुरसत ही नहीं थी. मैं भी कोई जल्दी नहीं दिखाना चाहता था इसलिए हम दोनों पिछले पंधरा मिनट से बस एक दूसरे को होठों को चूस और चाट ही रह थे. शायद आशु को भी मेरे लिंग का एहसास होने लगा तो उसके हाथ अपने आप ही मेरे लिंग पर आ गए और वो धीर-धीरे से उसे सहलाने लगी. लिंग को मिल रहे स्पर्श से उसमें तनाव बढ़ता ही जा रहा था और अब पैंट में कैद होने से दर्द हो रहा था. मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ को सरका कर आशु की पायजामे के नाड़े पर रख दिया और अपनी उँगलियों से नाड़े का छोर ढूंढने लगा. आशु भी मेरी उँगलियों को अपनी नाभि के आस पास महसूस करने लगी थी और उसका जो हाथ अभी तक लिंग को सहला रहा था वो अब मेरी बनियान के अंदर जा घुसा था और जैसे कुछ ढूंढ रहा था. आखिर मुझे नाड़े का छोर मिल ही गया और मैंने उसे धीरे-धीरे खींचना शुरू कर दिया. आखिर कार वो खुल गया और आशु की पजामी अब ढीली हो चुकी थी. मैंने अपना हाथ धीरे-धीरे अंदर सरकना शुरू कर दिया और इधर आशु के जिस्म में सिहरन शुरू हो गई थी. फिर मैं एक पल के लिए रुक गया और आशु के होठों को अपने होठों की पकड़ से आजाद करते हुए कहा; "जान! पहली बार बहुत दर्द होगा! मुझे कम पर तुम्हें बहुत ज्यादा होगा, खून भी निकलेगा!" ये सुन कर आशु थोड़ा डर गई.

"आपसे दूर रहने के दर्द से तो कम होगा ना?" ये कह कर उसने मुझे अपनी सहमति दी और मैंने मुस्कुरा कर उसके माथे को चूमा. मेरा हाथ उसकी पैंटी पर आ चूका था और मुझे उसके ऊपर से ही उस की योनी की गर्मी महसूस होने लगी थी. मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली को आशु की पैंटी के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया जिसके परिणाम स्वरुप आशु की सीत्कार निकल गई. आनंद से उसकी आँखें बंद हो चली थी. मैंने अब अपना हाथ उसकी पैंटी से बाहर निकाला और उसकी पजामी को पकड़ कर नीचे सरकाने लगा पर अब भी आशु ने अपनी आँख नहीं खोली थी. पजामी तो निकाल दी मैंने पर आशु की गुलाबी रंग की पैंटी ने मेरा मन मोह लिया. उसे देखते ही मन ही नहीं कर रहा था की उसे निकालूँ, ऊपर से आशु की माँसल जांघें मेरे लिंग में कोहराम मचाने लगी थी. मैंने नीचे झुक कर आशु की नाभि के नीचे चूम लिया और अपने दोनों हाथों की उँगलियों को उसकी पैंटी में फँसा कर के उसे निकाल दिया और अब जो मेरे सामने थी उसे देख तो मेरा कलेजा धक कर के रह गया.एक दम गुलाबी और चिकनी योनी! उसके गुलाबी पट बंद थे और योनी की रक्षा कर रहे थे, उन्हें देखते ही मेरे मुँह में पानी आ गया! मैं उनपर झुक कर उन्हें चूमना चाहता था पर जैसे ही मेरी गर्म साँस आशु को अपने योनी पर महसूस हुई उसने ने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थामा और अपने ऊपर आने को कहा. "जानू वो सब बाद में! पहले आप….." उसने बात अधूरी छोड़ दी पर मैं समझ गया की उसे संभोग करना है ना की फोरप्ले! "जान… फोरप्ले अगर नहीं किया तो बहुत दर्द होगा. तुम बस रिलैक्स करो और इतने बरसों से जो मैं वीडियो देख कर जो ज्ञान अर्जित किया है उसे इस्तेमाल करने दो."

मेरी बात सुन कर हम दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई. तभी मैंने गौर किया की आशु की ब्रा तो मैंने निकाली ही नही. अब ये ऐसा काम था जो मैंने कभी किया नहीं था और ना ही इसके बारे में कोई ज्ञान मुझे वीडियो देखने से मिला था. मैंने आशु का हाथ पकड़ के उसे उठा के बिठाया और उसके होठों को चूसने लगा और अपने हाथ उसके पीछे ले जाकर ब्रा के हुक ढूंढने लगा. जब उँगलियों ने उन्हें ढूंढा तो ये दिक्कत थी की उन्हें खोलने के लिए उसका सिरा कहाँ है? आशु मेरी ये नादानी समझ गई और उसने मेरे होठों से अपने होंठ छुड़ाए और अपने दोनों हाथ पीछे ले जा कर ब्रा के हुक खोल दिये. ब्रा ढीली हो गई पर अभी भी आशु के जिस्म से चिपकी हुई थी. मैंने धीरे से आशु की ब्रा को उसके सुनहरे जिस्म से अलग किया और पलंग से नीचे गिरा दिया. अपनी ब्रा को नीचे गिरते देख आशु कसमसाने लगी थी. मेरी नजर जब उसकी छाती पर पड़ी तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई. आशु के कोमल वक्ष मुझे उसे छूने को कह रहे थे, वो गुलाबी अरेओला ....सससस.....हाय! मैंने थोड़ा सा झुक कर आशु के बाएं वक्ष को अपने होठों से छुआ और अपनी जीभ से उसके छोटे से प्यार से स्तनाग्र को छेड़ा तो आशु के मुँह सिसकारी निकल पडी. मैंने आशु के चेहरे पर देखा तो उसकी गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई थी और आँखें बंद थी.

मैं उठ कर खड़ा हुआ और अपनी बेल्ट खोली और फिर पैंट के हुक खोलते ही वो नीचे जा गिरी, मेरे कच्छे पर बने उभार को आशु टकटकी बांधे देखती रही. मैं पलंग से उतरा और अपनी पैंट कुर्सी पर फेंकी और बैग से कुछ निकाल कर वापस आशु के पास आ गया.जब मैं लौटा तो आशु मुझे थोड़ी डरी सी दिखी; "क्या हुआ जान?!" मैंने उसके दाएं गाल को छूते हुए कहा. "आप उठ कर गए तो मुझे लगा आप मुझे छोड़के जा रहे हो!" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो गई.

"जान मैं तो बस ये लेने गया था." ये कहते हुए मैंने उसे कंडोम दिखाया. पहले तो आशु को समझ ही नहीं आया की मेरे हाथ में आखिर है क्या फिर जब उसने डिब्बे पे लिखा पढ़ा तो वो नाराज होते हुए बोली; "नहीं! आप इसे यूज़ नहीं करोगे! ये हमारा.... पहलीबार है.... और मुझे फील करना है....सब कुछ! मैं बाद में गर्भनिरोधक गोली ले लुंगी." ये कहते हुए उसने मेरे हाथ से कंडोम का डिब्बा छीन लिया और दूर फेंक दिया. मैंने आगे उससे बहस करना ठीक नहीं समझा उल्टा मैं फिर से आशु के ऊपर आ गया और आशु की नाभि पर अपने होंठ रखे और आशु के मुँह से फिर से "सससस...'' आवाज निकली. अगला चुम्बन मैंने आशु की गुलाबी योनी की फाँकों पर किया तो उसके पूरे जिस्म में करंट दौड़ गया और उसके मुँह से फिर से सीत्कार फूट पडी. मैंने अपनी जीभ से आशु की योनी की फाँकों को कुरेदना शुरू कर दिया. ऐसा लगा मानो जीभ की नोक अपने लिए अंदर जाने का रास्ता बना रही हो. पर योनी के गुलाबी होंठ खुल ही नहीं रहे थे, तो मैंने जितना हो सके उतना मुँह खोला और आशु की योनी के ऊपर रख दिया. अपनी जीभ से मैंने फाँकों को जोर से कुरेदना शुरू कर दिया. आखिर फाँकों को मुझ पर तरस आ गया और अंगड़ाई लेते हुए मुझे योनी का छेद दिखाई दिया. बस फिर क्या था मैंने उस अध्खुली फाँक को अपने मुँह में भर के मैं चूसने लगा. इधर आशु पर इसका बहुत मादक असर हुआ और उसके मुँह से बस सिसकारियाँ ही सिसकारियाँ फूटने लगी....."स्स्सस्स्स्स...स्स्सस्स्स्स.... ससससस आए ससससस हहहह स्स्सस्स्स्स!!!" आशु की सिसकारियाँ मेरे लिए प्रोत्साहन का काम कर रही थी और मैंने अपनी पूरी जीभ से योनी के द्वार को चाटना...चूसना...कुरेदना...शुरू कर दिया.

आशु के दोनों हाथ मेरे सर के ऊपर थे और वो मेरे बालों में अपने हाथ फिराने लगी. अब मैंने अपने दोनों हाथ की उँगलियों से आशु के योनी के द्वार को खोला और अपनी जीभ जितनी हो सके उतनी अंदर डाल दी. जैसे ही जीभ अंदर घुसी आशु चिहुँक पड़ी; "सीईई ...!!!!" मैंने अपनी जीभ से आशु की योनी ठुकाई शुरू कर दी और मेरे इस प्रहार से उसकी हालत ख़राब होने लगी थी. वो बार-बार मेरे सर का दबाव अपनी योनी पर बढ़ाती जा रही थी. "सससससस...ीसीसीसीसीसिस..... सीईई..... सीईई.... ईईई .... आआह्ह्हह्ह्ह्ह!!!" करते हुए वो झड़ गई और हाँफते हुए निढाल हो कर रह गई. उसका सारा रस मैंने अपनी जीभ से चाट-चाट कर पी लिया था! आखिर मैं भी उसके ऊपर से उठ कर उसकी बगल में लेट गया.पिछले पाँच मिनट से मुँह खोल कर आशु की योनी चाटने से मुँह दर्द करने लगा था.

दो मिनट बाद जब आशु की सांसें नार्मल हुई तो वो करवट ले कर मेरी छाती पर अपना सर रख कर लेट गई. "जानू! आज मुझे पता चला की चरम सुख क्या होता है! थैंक यू!!!!" मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि उसे तो तृप्ति मिल गई थी पर मैं तो अभी भी प्यासा था. आशु शायद समझ गई तो उसका हाथ मेरे लिंग पर आ गया और वो उसे सहलाने लगी. अपने मुँह को खोल आशु ने मेरे दाएं स्तनाग्र को मुँह में भर लिया जैसे शिकायत कर रही हो की क्यों मैंने अभी तक उसके स्तनों को प्यार नहीं किया? मैंने आशु के दाएं गाल को अपनी उँगलियों से सहलाया और उसके मुँह से अपने स्तनाग्र को छुड़ाया और उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "जान......." मेरा बस इतना कहना था की वो मेरी बात समझ गई और मुझे उसके चेहरे पर डर की रेखा दिखने लगी. "डर लग रहा है?!" मैंने पूछा तो जवाब में आशु ने बस हाँ में सर हिला दिया. "मैं पूरी कोशिश करूँगा की मेरी जान को कम से कम दर्द हो." सबसे पहले मैंने अपना कच्छा उतारा और आशु की टांगों को खोल कर उनके बीच घुटने मोड़ कर बैठ गया.मेरे फनफनाते हुए लिंग को आशु एक टक बांधे घूर रही थी. जैसे की सोच रही हो की ये दानव मेरी छोटी सी योनी में कैसे घुसेगा?! मैंने बहुत सारा थूक अपने लिंग पर चुपेड़ा और उसे धीरे से आशु की योनी के होठों पर छुआया. इतने भर से ही उसने अपनी आँखें कस के भीँचलि जैसे की उसे बहुत दर्द हुआ हो! इसलिए मैं बिना लिंग अंदर डाले उसके ऊपर छा गया और उसके होठों को एक बार चूमा, तब जाके उसकी आँखें खुली. मैं समझ गया की लिंग अंदर डालने से पहले मुझे आशु को थोड़ा उत्तेजित करना होगा. इसलिए मैं उसके जिस्म को चूमता हुआ उसके स्तनों पर आ गया और गप्प से उसके दाएं स्तन को अपने मुँह में भर लिया और अपनी जीभ से उसके स्तनाग्र से छेडने लगा. अपने दाएं हाथ से मैंने आशु के बाएं स्तन को धीरे से दबाना शुरू कर दिया. अपनी उँगलियों से मैं आशु के बाएं स्तनाग्र को दबाने लगा और उसके दाएं स्तनाग्र को तो मैं ऐसे चूसने लगा था जैसे उस में से दूध निकल रहा हो. पाँच मिनट की चुसाई के बाद मैंने आशु के बाएं स्तन को भी ऐसे ही चूसा उसके छोटे से स्तनाग्र को मैं दांतों से खींच रहा था और बीच-बीच में काट भी रहा था. आशु बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गई थी और अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरा लिंग पकड़ के अपनी योनी की तरफ खींचने में लगी थी. मैंने जब उसके बाएं वक्ष को छोड़ा तो देखा उसके दोनों स्तन लाल हो चुका था. और उनपर मेरे दांतों के निशाँ साफ़ नजर आ रहे थे. मैंने और समय गँवाय बिना अपना लिंग उसकी योनी के द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेला. मेरे लिंग की चमड़ी चूँकि अभी भी बंद थी तो लिंग अंदर नहीं गया पर इससे आशु को दर्द बहुत हुआ और उसने अपनी सर को बायीं तरफ झटक दिया. मैंने सोचा की बिना दम लगाए तो लिंग अंदर जायेगा नहीं इसलिए मैंने अपनी कमर को पीछे किया और एक झटका मार के लिंग अंदर डाला.मेरी इस हरकत से मेरी और आशु दोनों की जान पर बन आई! मेरे लिंग की चमड़ी एकदम से खुली और जलन से मेरी नितंब फ़ट गई और उधर आशु के मुँह से जोरदार चींख निकली!

"आआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.....मममममअअअअअ.....!!!" दर्द से दोनों का बुरा हाल था. मन तो कर रहा था की लिंग बाहर निकाल के लेट जाऊँ पर ये जानता था की अगलीबार और दर्द होगा. इसलिए मैंने आशु के होठों को अपने मुँह में भर लिया और उसकी पीड़ा उसके गले में ही रोक दी. आशु ने दर्द के मारे अपने नाखून मेरी नग्न पीठ में धंसा दिए और उनमें से खून भी निकल आया. नीचे लिंग में दर्द और पीठ में जलन से मैं तड़प उठा. मैं इसी तरह से आशु के ऊपर अपना वजन दाल आकर लेटा रहा और उसके होठों को चुस्ता रहा और उसके मुँह में अपनी जीभ घूमाता रहा. करीब पाँच मिनट हुए और आशु ने अपने नाखून मेरी पीठ से निकाल दिए और अपने हाथ वापस पलंग पर रख दिये. उसी वक़्त मुझे मेरे लिंग पर गर्म पानी का एहसास हुआ, मतलब की आशु झड़ चुकी थी और वो निढाल होकर बिना कुछ बोले ही बिस्तर पर लाश की तरह पड़ी थी. मैंने आशु के होठों को छोड़ा और आशु के चेहरे की तरफ देखने लगा, आशु की आँखें बंद थी और उसके मस्तक पर पसीने की बूँदें थी. मैंने आशु के गाल को चूमा और उसे पुकारा; "जान!" तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म..." निकला|
 
"बहुत दर्द हो रहा है?" मैंने उसके माथे को चूमते हुए पूछा तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म" निकला और दर्द की एक लकीर चेहरे पर आ गई. मेरा दिल भी उसके दर्द को महसूस कर रहा था इसलिए मैं आशु के ऊपर से हटने लगा, की तभी उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन में डाल के हटने नहीं दिया. "जान... आपको दर्द हो रहा है! रूक जाते हैं!" मैंने चिंता जताते हुए कहा. "नहीं...." वो बस इतना ही बोल पाई और मुझे अपने ऊपर से हटने नहीं दिया. मैंने आशु के माथे फिर से चूम लिया और उसने अपनी गर्दन ऊँची कर के अपने होंठ मेरे सामने कर दिए जैसे कह रही हो की आप गलत जगह को चूम रहे हो. मैंने आशु के होठों को चूसना शरू कर दिया. इसका असर अब आशु पर दिखने लगा था और जिस्म में अब हरकत होने लगी थी. उसका दर्द कुछ कम होने लगा था और उसकी उँगलियाँ अब मेरे सर के बालों में घूमने लगी थी. मैंने उसके होठों को छोड़ा और आशु के चेहरे पर देखा तो उसने अपनी आँख खोली और उसकी आँखें मुझे नम दिखाई दे रही थी. उसकी मूक सहमति से मैंने अपने लिंग को धीरे से बाहर निकाला और फिर धीरे से अंदर किया तो आशु की कमर कांपने लगी और उसने कस के मुझे अपने आलिंगन में जकड लिया. उसकी दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपट चुकी थी और उनके दबाव से ये साफ़ था की आशु अब भी पूरी तरह तैयार नहीं हे. पर मेरा सब्र अब जवाब देने लगा था. मेरे लिंग में अब तनाव बहुत बढ़ चूका था ऊपर से चमड़ी खींचने की वजह से लिंग में दर्द अभी था. मैंने फिर से आशु की तरफ देखा तो उसकी आँखें अब भी दर्द के मारे मीच राखी थी. "जान! प्लीज!!!!" मेरा इतना कहाँ था की उसने आँखें बंद किये हुए ही हाँ में गर्दन हिला दी. मैंने धीरे से अपनी कमर को पीछे खींचा और धीरे उसे अंदर-बाहर करने लगा. आशु की योनी की गर्माहट बढ़ रही थी और उस गर्माहट से मेरे लिंग को काफी आराम मिल रहा था. इसी तरह धीरे-धीरे करते हुए करीब दस मिनट हुए होंगे की मेरा ज्वालामुखी फूटने को तैयार था और मैं उसे बाहर खींचने वाला था की आशु ने कस के अपने जिस्म को मेरे जिस्म से चिपका लिया और मुझे ऐसा करने नहीं दिया और हम दोनों ही साथ-साथ झड़े! झड़ते ही मैं पस्त हो कर आशु के ऊपर गिरा और उसका भी हाल ख़राब ही था. करीब पाँच मिनट बाद मैं उसके ऊपर से उठ के उसकी बगल में लेट गया और अपने लिंग और उसकी योनी की तरफ देखा. दोनों ही खून और हमारे कामरस से सने थे, खून तो काफी निकला था और दोनों ही की यौन अंग सूझ चुका था.. मेरे लिंग के सुपडे के इर्द-गिर्द सूजन थी तो आशु की योनी मुझे सूजी हुई दिख रही थी. दस मिनट बाद में उठा और बाथरूम जा कर अपने लिंग को पानी से हलके हाथ से धोया और वापस आकर जमीन पर नंगा ही बैठ गया.जमीन की ढंडक चप से नितंबो को ठंडा कर गई. मैं दिवार का सहारा ले कर दोनों टांगें खोल कर बैठ गया.आशु की तरफ देखा तो वो अब भी सो रही थी और इधर मेरे पेट में आवाजें आने लगी थी. इसलिए में उठा और बैग से मैगी का पैकेट निकाला और बनाने लगा. मैगी की खुशबु से आशु की नींद खुल गई और उसने धीरे से आकर मुझे पीछे से अपनी बाँहों में जकड लिया. उसका नंगा जिस्म मेरी नग्न पीठ पर मह्सूस होते ही मैं पीछे मुड़ा और आशु के होंठों को चूम लिया. मैंने नोटिस किया की उसके होंठ भी थोड़े सूजे लग रहे थे.

आशु: जानू! आप क्यों बना रहे हो, मुझे बोल दिया होता तो मैं बना देती.

मैं: आज मैंने अपनी जान को बहुत दर्द दिया है, इसलिए सोचा आज मैं ही तुम्हें अपने हाथ से बना हुआ कुछ खिला दू.

आशु: दर्द तो आपको भी हुआ होगा ना? पर सच कहूँ तो आज अपने मुझे दुनिया भर की ख़ुशी एक साथ दे दी है! इसलिए आज तो मुझे आपकी सेवा करनी है, आखिर आज से आप मेरे पति जो हो गए हो!

मैं: चलो मुँह-हाथ धो कर आओ.

आशु हँसते हुए बाथरूम में चली गई और मैंने मॅगी एक ही प्लेट में परोस ली और प्लेट ले कर जैसे ही बिस्तर की तरफ घुमा की मुझे उस पर खून और हमारे कामरस का घोल पड़ा हुआ मिला. मैंने प्लेट टेबल पर रखी और चादर को बिस्तर से हटाया पर तब तक अभूत देर हो चुकी थी. मेरा गद्दा भी बीच में से लहू-लुहान हो चूका था! मैंने पंखा तेज चालु किया और जमीन पर ही प्लेट ले कर बैठ गया.आशु जब बाथरूम से आई तो मुझे नीचे बैठा देख हैरान हुई पर इससे पहले वो कुछ बोलती उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी और वहां खून देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई.

"हाय! इतना सारा खून! कुछ बचा भी मेरे जिस्म में या सब निकल गया?" ये सुन कर मुझे हँसी आ गई और मुझे हँसता देख आशु भी खिलखिलाकर हँस पडी. आशु भी मेरे सामने ही नग्न फर्श पर बैठ गई और ठन्डे फर्श की चपत जब उसके नितंबो पर लगी तो वो 'आह' कर के फिर हँसने लगी. हमने मैगी खाई और फिर आशु बर्तन उठा कर किचन में रखने चली गई और मैं उठ कर बाथरूम में हाथ-मुँह धोने चला गया.मैंने बाथरूम से ही आशु को आवाज दे कर दूसरी चादर बिछाने को कहा. आशु ने जैसे ही अलमारी से चादर निकाली उसे मेरी गांजे की पुड़िया दिखाई दे गई. उसे जरा भी देर नहीं लगी ये समझते हुए की ये गांजा है. जैसे ही मैं बाथरूम से निकला वो मुझे पुड़िया दिखाते हुए बोली; "ये क्या है?" उसके हाथ में पुड़िया देखते ही मेरी हवा खिसक गई. अब उससे झूठ तो बोल नहीं सकता था.

मैं: वो....गा...गांजा है! (मैंने सर झुकाये हुए कहा.)

आशु: आप गांजा पीते हो? (उसने हैरानी से पूछा.)

मैं: कभी-कभी...

आशु: क्यों पीते हो? (उसने गुस्सा करते हुए पूछा.)

मैं: वो... वो... कभी...टेंशन होती है तो.... थोड़ा....

आशु: टेंशन तो दुनियाभर में सब को है, तो क्या सब ये पीते हैं?

मैं: सॉरी!

आशु: कब से पी रहे हो आप?

मैं: कॉलेज...के ...

आशु: और इसके लिए पैसे कहाँ से आते थे?

मैं: वो... टूशन....देता... था...तो....

आशु: तो इस काम के लिए आप कॉलेज के दिनों में जॉब करते थे?

मैं:हाँ ...

आशु: मुझे कभी कुछ बताया क्यों नहीं? अगर आपको कोई बिमारी लग जाती तो?

मैं: सॉरी....मैं...मैं....

आशु: आज के बाद आप कभी भी इसे हाथ नहीं लगाओगे! समझे?

मैं: हाँ ...

आशु: खाओ मेरी कसम? (आशु मेरे पास आई और मेरा हाथ अपने सर पर रख कर मेरे जवाब का इंतजार करने लगी.)

मैं: मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ... आज के बाद कभी इसे हाथ नहीं लगाऊँगा!

ये सुन कर आशु ने वो पुड़िया कूड़े में फेंक दी और नाराज हो कर बिस्तर पर दूसरी चादर बिछाने लगी. मैं अपने हाथ बांधे सर झुकाये उसे देखता रहा. जब चादर बिछ गई तो आशु मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई और मेरी आँख में देखते हुए बोली; "और क्या-क्या शौक हैं आपके?"

"जी...कभी-कभी दारु भी पीता हूँ!" ये सुनते ही आशु की आँखें चौड़ी हो गईं और उसका गुस्सा फिर से लौट आया.

"मतलब अपनी जान देने की पूरी तैयारी कर रखी है आपने? आपको कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? ये कभी सोचा आपने?" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो आईं थी.

"अरे जानू... मैं कोई रोज-रोज थोड़ी ही पीता हूँ? वो तो कभी कभार किसी पार्टी में या किसी के बर्थडे पर! चलो आई प्रॉमिस आज के बाद ये सब बंद! अब तो मुस्कुरा दो मेरी जान!" ये सुन कर आशु को तसल्ली हुई और उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई. घडी में २:३० बजे थे, पेट भरा था और संभोग से दिल भी भरा हुआ था तो अब बारी थी सोने की. मैंने हम दोनों के पहनने के लिए अलमारी से दो टी-शर्ट निकाली तो आशु कहने लगी; "क्या जरुरत है? हम दोनों ही तो हैं यहाँ!" तो मैंने टी-शर्ट वापस अंदर रख दी और हम दोनों एक दूसरे के आगोश में लेट गये.

मैं: जान! अब भी दर्द हो रहा है?

आशु: हम्म्म...थोड़ा-थोड़ा ... और आपको?

मैं: थोड़ा...

आशु का हाथ अपने आप ही मेरे लिंग पर आ गया और वो अपनी उँगलियों से उसे सहलाने लगी. ठुकाई की थकावट आशु पर असर दिखाने लगी थी आँखें बोझिल होने लगी और वो सो गई. पर मेरा मन अब भी प्यासा था. अब उसे उठाने का मन नहीं किया और इधर नींद में उसने अपने को और कस कर मेरे जिस्म से चिपका लिया और सो गई. मैं उसके दाएं गाल को सहलाता हुआ कब सो गया पता ही नहीं चला. जब आँख खुली तो साँझ हो चुकी थी और घडी सात बजा रही थी. मैं उठा तो आशु भी उठ गई और अपनी बाहें खोल कर उसने अंगड़ाई ली. आशु के स्तन अंगड़ाई लेने से आगे को निकल आये और मुझसे कण्ट्रोल नहीं हुआ तो मैंने उसके दाएं स्तन को चूम लिया. आशु की 'सीईई' निकल गई और उसने अपने दोनों हाथों से मेरे सर को अपने स्तन पर दबा दिया. मैंने अपनी जीभ से उसके पूरे स्तन को चाटा और उससे अलग हो कर खड़ा हो कर अंगड़ाई लेने लगा. मेरा मुँह ठीक आशु के सामने था और अभी आशु के स्तनपान के बाद लिंग खड़ा हो गया था जो अंगड़ाई लेते समय आशु के सामने बिलकुल सीधा खड़ा था और उसे अपने पास बुला रहा था. मैंने जब आशु की तरफ देखा तो पाया वो मंत्रमुग्ध सी मेरे ही लिंग को देख रही थी. मैंने एक चुटकी बजा कर उसकी तन्द्रा को भंग किया और जैसे वो किसी ख्यालों की दुनिया से बाहर आई हो वैसे मुझे देख कर मुस्कुरा दी. मैंने उसे अपना तौलिया दिया और नहाने को कहा तो उसने अदा के साथ वो तौलिया लिया और मेरा हाथ पकड़ के अंदर बाथरूम में खींच के ले जाने लगी. "जान! वहाँ इतनी जगह नहीं है की हम दोनों एक साथ नहा सके."

"जगह बन जाएगी, आप आओ तो सही." उसने फिर से मेरा हाथ खींचा और मैं भी उसके साथ अंदर घुस गया.उसने इशारे से मुझे कमोड पर बैठने को कहा, खुद शावर का मुँह मेरी तरफ कर के चालु किया और आ कर मेरी गोद में बैठ गई. लिंग आशु के योनी के सम्पर्क में आते ही अकड़ के खड़े हो गये.पानी की बूंदें आशु के जिस्म पर ज्यादा और मेरे ऊपर कम पढ़ रही थी. आशु टकटकी बंधे मुझे देखे जा रही थी की तभी पानी की एक धार आशु के बालों से बहती हुई ठीक उसके निचले होंठ पर आ गई. आशु के गुलाबी होंठ उस पानी से पूरी तरह भीग पाते उससे पहले ही मैंने उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसा. आशु की उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी थी और उसके भीतर भी आग दहकने लगी थी. मेरे लिंग ने भी नीचे से धीरे-धीरे उसकी योनी पर थाप देना शुरू कर दिया था. आशु ने अपने होठों को मेरे होठों की गिरफ्त से छुड़ाया और सिधी खडी हो गयी. उसने मेरे लिंग को अपनी योनी के नीचे सेट किया और धीरे-धीरे अपनी योनी को मेरे लिंग पर दबाने लगी पर जैसे ही थोड़ा सूपड़ा अंदर गया उसे दर्द होने लगा. दरअसल उसकी योनी अभी अंदर से सूखी थी इसलिए वो फिर से खडी हो गई और अपने दाहिने हाथ में ढेर सारा थूक उसने योनी और मेरे लिंग के सुपाड़ी पर अच्छे से लगा दिया और फिर धीरे-धीरे मेरे लिंग पर अपनी योनी को रगडणे लगी. इस बार लिंग अंदर जाने लगा पर दर्द तो उसे अभी भी हो रहा था. वासना हम दोनों ही के अंदर भड़क चुकी थी और मुझसे उसका ये 'स्लो ट्रीटमेंट' बर्दाश्त नहीं हो रहा था. इसलिए मैंने भी नीचे से कमर को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाना शुरू कर दिया ताकि लिंग जल्दी से अंदर चला जाये. लिंग अभी आधा ही अंदर गया था की वो दर्द के मारे रूक गई और मेरी हालत तो ऐसे हो गई हो जैसे किसी ने गला दबा कर साँस रोक दी हो.

आशु की योनी ने कस के लिंग को जकड लिया और जैसे वो उसे अंदर जाने से रोक रही हो और लिंग था जो और अंदर जाना चाहता था. "जान?!" मैंने आशु से मिन्नत करते हुए कहा तो उसने हाँ में गर्दन हिला कर मुझे खुद ही आगे बढ़ने की इज्जाजत दे दी. मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँ की आशु को ज्यादा दर्द न हो पर ये कमबख्त जिस्म वासना से जल रहा था इसलिए मैंने कुछ ज्यादा ही जोर से लिंग अंदर पेल दिया और आशु की एक जोरदार चीख निकली; "आअह", उसने अपनी गर्दन दर्द के मारे पीछे की तरफ झटक दी. मैंने अपने दोनों हाथों को उसकी नग्न पीठ पर फिराया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया. दर्द के मारे उसकी आँख बंद हो चुकी थी और आंसुओं की लकीर बह निकली थी. पर लिंग इधर योनी की गर्मी में पिघलने लगा था.मेरी कमर ने अपने आप ही आशु को ऊपर झटका देना शुरू कर दिया. आशु ने कस कर मेरे सर को अपनी छाती से दबा लिया और अपने हाथों को लॉक कर दिया जिससे मेरा सर हिल भी नहीं सकता था. दो-चार सेकंड बाद जब साँस लेने में दिक्कत होने लगी तो हाथों ने आशु की पीठ पर चलना शुरू किया और जैसे ही उँगलियों में उसके बाल आये तो मैंने उन्हें पीछे की तरफ खिंचा. आशु की गर्दन पीछे की तरफ खींच गई और उसकी गिरफ्त मेरे सर के इर्द-गिर्द ढीली पडी. मैंने उसके बालों को अपनी ऊँगली से ढीला छोड़ा तब आशु ने अपनी आँखें खोली और मेरी आँखों में देख कर उसे जैसे होश आया हो. इधर मेरी कमर फिर से नीचे से धक्के देने लगी पर आशु ऊपर ज्यादा नहीं उठ रही थी. जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो उसने खुद ही मेरे लिंग पर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया. "ससससीई" कहते हुए उसने अपनी गति बढ़ा दी थी. माने अपने दोनों हाथों को उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस रखा था की कहीं वो गिर ना जाये. आशु पर अब ठुकाई की खुमारी चढ़ने लगी थी और उसने अपने दोनों हाथों को अपने बालों में अदा के साथ फिराना शुरू कर दिया था. ऐसा करने से उसके स्तन उभर के बाहर आ गए थे और उन्हें देख मेरा सब्र जवाब देने लगा था.

पाँच मिनट के बाद आशु ने पानी बहाना शुरू कर दिया और वो थककर मेरे सीने से लगने को आई. पर मैंने उसके दाहिने स्तन को पकड़ लिया और चूसने लगा. आशु ने मेरे सर को फिर से अपने स्तन पर दबाना शुरू कर दिया. उसकी उँगलियाँ फिर से मेरे सर पर रास्ता बनाने लगी और मैंने बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को चूसना और काटना शुरू कर दिया. मेरा लिंग अब अकड़ कर चीखने लगा था और आशु तो जैसे थक कर अपना सारा वजन मुझ पर डाल कर पड़ी थी और अपने स्तनों को चुसवा कर मजे ले रही थी. मैंने अपने दोनों हाथों से आशु की कमर को कस कर पकड़ा और मैं उठ खड़ा हो गया और उसे दिवार से सटा कर अपने लिंग को जोर से अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया. आशु की दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द टाइट हो चुकी थी और वो मेरे और दिवार के बीच दबी हुई थी. मेरी रफ़्तार बहुत तेज थी. इतनी तेज की आशु एक बार फिर झड़ गई और उसने फिर से मुझे कस कर अपने से चिपका लिया पर मैंने अपने धक्के चालु रखे और अगले ही क्षण मैंने अपना सारा गाढ़ा रस उसकी योनी में बहा दिया और उसके ऊपर ही लुढ़क गया.शावर से आ रहे ठन्डे पानी मेरे सर पर पड़ रहा था जिसके कारण जिस्म ज्यादा थका नहीं था. मिनट भर बाद मैंने आशु की आँखों में देखा तो मुझे उसकी आँखों में संतुष्टि नजर आई, उसने धीरे से अपने पैरों को नीचे फर्श पर टिकाया और मैं उससे दूर हुआ. पर अगले ही पल उसने मेरा हाथ थामा और अपने पंजों पर खड़े हो कर मेरे होठों को चूम लिया और मुस्कुरा दी. फिर हम साथ नहाये, उसने मुझे और मैंने उसे साबुन लगाया और फिर शावर के नीचे नहा के हम दोनों बाहर आये. अब तो बड़ी जोर से भूख लगी थी इसलिए मैंने खाना आर्डर करना चाहा तो आशु ने मना कर दिया और खुद ही बिना कपडे पहने किचन में खाना बनाने लगी. मैंने ही एक टी-शर्ट निकाल कर उसे दी;

मैं: जान इसे पहन लो.

आशु: क्यों? मुझे बिना कपडे के देखना आपको पसंद नहीं?

मैं: तुम्हें ऐसे देख कर मेरा ईमान डोल रहा हे.

आशु: हाय! सच्ची?

मैं: हाँजी!

आशु: डोलने दो! मैं तो आपकी ही हु. (आशु ने मुझे आँख मारते हुए कहा.)

आशु ने मेरी बात नहीं मानी खाना बनाने में लगी रही पर मेरा मन कहाँ मानने वाला था. मैं भी उसके पीछे सट के खड़ा हो गया और अपने दोनों हाथों को उसकी कमर से ले जाते हुए उसकी नाभि के ऊपर कस दिया. उसकी सुराही सी गर्दन मुझे चूमने के लिए बुला रही थी. मेरे दहकते होठों ने जैसे ही छुआ की आशु के मुँह से मादक सी सिसकारी निकल गई. "सससस...sssss .... आप जान ले कर रहोगे मेरी!" उसने मेरे हाथों को खोल कर आजाद होने की एक नाकाम कोशिश की पर मैं कहाँ मानने वाला था. मैं उसी तरह उसे अपनी बाँहों में कैसे हुए अपनी कमर को दाएँ-बाएँ हिलाने लगा और धीरे-धीरे नाचने लगा. आशु भी मेरा साथ देने लगी और उसने शेल्फ पर रखे अपने फ़ोन पर गाना चला दिया.

"तुझको मैं रख लूँ वहाँ

जहाँ पे कहीं है मेरा यकीं

मैं जो तेरा ना हुआ

किसी का नहीं

किसी का नहीं"

गाना सुनते-सुनते हम थिरकते रहे और आशु साथ-साथ खाना भी बनाती रही. रात नौ बजे तक मैं यूँ ही उसके जिस्म से अटखेलियाँ करता रहा और वो कसमसा कर रह जाती. आखिर खाना बना और आशु ने एक ही थाली में दोनों के लिए खाना परोसा और मुझे फर्श पर ही बैठने को कहा. मैं फर्श पर दिवार से सर लगा कर बैठा था. वो थाली पकडे मेरे सामने बैठ गई और मुझे अपने हाथ से कोर खिलाने लगी. मैंने भी उसे अपने हाथ से खिलाना शुरू कर दिया. खाना खा कर दोनों ही पलंग पर लेट गये. नींद तो आने वाली थी नहीं तो आशु ने कहा की उसे अश्लील मूवी देखनी है इसलिए मैंने उसे एक मूवी फ़ोन में चला कर दी. मैं दिवार का सहारा ले कर बैठा था और वो मेरे सीने पर सर रख कर बैठी थी. उस मूवी में लड़की के स्तन बहुत बड़े थे जिन्हें देख आशु को अपने स्तनों के अकार से निराशा हुई. उसके स्तनों का साइज छोटा था और अब चूँकि मैं उसकी निराशा ताड़ गया था इसलिए मैंने मूवी रोक दी. "क्या हुआ जान?" तो उसने जवाब में अपना सर झुका लिया और अपने स्तनों को देखते हुए बोली; "आपको तो बड़े...... पसंद हैं.... और मेरे.... तो छोटे!" उसने अटक-अटक कर कहा. "मैंने तुमसे प्यार तुम्हारे इनके (उसके स्तनों को छूते हुए) लिए नहीं किया."

"सच?" उसकी आँखें चमक उठी. "इन लड़कियों के बड़े इसलिए होते हैं क्योंकि इन्होने सर्जरी कराई हे." इतना कह के मैंने उसे थोड़ा ज्ञान बाँटा, पर सर्जरी का नाम सुन के जैसे वो हैरान हो गई. उसने फ़ोन साइड में रखा और और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं भी कराऊँ?"

"बेबी! आपको ऐसा कुछ भी कराने की कोई जरुरत नहीं है! मैंने आपसे कहा ना की मैं आपसे प्यार करता हु. भगवान ने आपको जैसा भी बनाया है सुन्दर बनाया है और ये सर्जरी वगैरह करके इसकी सुंदरता ख़राब मत करो." मेरा जवाब सुन कर वो संतुष्ट हो गई. उसे विश्वास होगया की मेरा प्यार सिर्फ उसके जिस्म तक सीमित नहीं हे.
 
मैंने फिर से आशु को अपने आगोश में ले लिया और हम दोनों लेट गये. मैं पीठ के बल लेटा था और आशु मेरी तरफ करवट किये हुए थी. उसका बायाँ हाथ मेरी छाती पर था और वो मेरी शेव की हुई छाती पर अपनी उँगलियाँ चला रही थी. तभी उसने अपनी बायीं टांग उठा कर मेरे लिंग पर रख दी और अचानक ही उसके मुँह से दर्द भरी 'आह' निकल गई. "क्या हुआ जान?!" मैंने चिंता जताते हुए उससे पूछा तो उसने मुस्कुरा कर ना में गर्दन हिला दी. मैं उठ बैठा और लाइट जला कर उसकी योनी की तरफ देखा तो पाया की वो बाहर से सूज गई हे. उसके कोमल पट सूजे हुए दिखे. जिस लड़की से मैं इतना प्यार करता हूँ, आज उसी को मैंने इतना दर्द दे दिया वो भी सिर्फ अपनी वासना में जल कर? ग्लानि से मेरा सर झुक गया तो आशु उठ बैठी और मेरे सर को अपने दोनों हाथों में थाम के ऊपर उठाया और बोली; "आपको क्या हुआ?"

"सॉरी! मेरी वजह से तुम्हें इतना दर्द हो रहा हे." इतना कह के मैंने शर्म से सर फिर झुका लिया. उसने फिर से मेरा सर ऊपर किया और मेरी आँखों में आँखें डाले बोलने लगी;"जानू! ये तो बस १-२ दिन में ठीक हो जायेगा, आप खामखा अपने को दोष ना दो."

"ठीक है! अब तुम्हें दर्द दिया है तो दवा भी मैं ही करुंगा." इतना कह कर मैं उठा और किचन में पानी गर्म करने लगा.

आशु: आप क्या कर रहे हो?

मैं: पानी गर्म कर रहा हूँ, उससे सेक देने से आराम मिलेगा

आशु: रहने दो ना,आप मेरे पास लेटो.

मैं: आ रहा हु.

पानी थोड़ा गर्म हो चूका था. मैंने एक छोटा तौलिया लिया और रुई का एक टुकड़ा ले कर मैं वापस पलंग पर लौट आया. तौलिये को मैंने आशु की कमर के नीचे रख दिया ताकि पानी से बिस्तर गिला न हो जाये और फिर रुई को गर्म पानी में भिगो कर आशु के योनी की सिकाई करने लगा. इस सिकाई से उसे बहुत आराम मिला और उसने की बार मुझे रोका, ये कह के की उसे आराम मिल गया पर मैं फिर भी करीब दस मिनट तक उसकी योनी की सिकाई करता रहा. "बस बहुत हो गई सिकाई, अब मेरे पास आओ." ये कहते हुए आशु ने अपनी बाहें खोल दीं और मैंने बर्तन नीचे रखा, उसे अपनी बाहों में भर कर लेट गया.हम इसी तरह सो गए पर रात के ग्यारह बजे होंगे की आशु चौंक कर उठ गई और हाँफने लगी. "क्या हुआ जान? कोई बुरा सपना देखा?" मैंने आशु से पूछा तो जवाब में वो कुछ नहीं बोली बल्कि अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक कर रोने लगी. मैंने उसके दोनों हाथों को उसके चेहरे से हटाया और उसके माथे पर चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया. करीब दो मिनट बाद उसका रोना बंद हुआ और उसने सुबकते हुए जो कहा उसे सुन मेरे होश उड़ गए; "आप.... मैंने ... बहुत बूरा....सपना...." आशु ने सुबकते हुए कहा. मैं तुरंत उससे अलग हुआ, कमरे की लाइट जलाई और उसके लिए पानी ले कर आया. पानी पीने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और बोली;

आशु: मैंने सपना देखा की माँ मुझसे बदला लेने के लिए आपके साथ संभोग कर रही हे.

मैं: (चौंकते हुए) क्या? क्या बकवास कर रही है? तेरी माँ मतलब मेरी भाभी और भला हम दोनों ऐसा!? छी!

आशु: आपको नहीं पता पर एक रात मैं और माँ छत पर सो रहे थे. वो नींद में आपका नाम बड़बड़ा रही थी और तकिये को अपने से चिपकाए हुए कसमसा रही थी.

मैं: ये नहीं हो सकता?! पर .... पर ... हमारे बीच तो सीधे मुँह बात भी नहीं होती. तो संभोग......

आशु: मुझे नहीं पता.

इतना कह कर आशु फिर से रोने लगी. "ऐसा कभी नहीं होगा! मैं तुझसे प्यार करता हूँ और भाभी मेरे साथ कभी भी वो सब करने में कामयाब नहीं होगी." मैंने आशु को फिर से अपने गले लगा लिया और उसकी पीठ सहला कर उसे चुप कराने लगा.आशु का सुबकना कम हुआ तो हम दोनों लेट गए पर अगले ही पल वो मुझसे कस के चिपक गई. जैसे की उसे डर हो के सच में कोई मुझे उससे चुरा लेगा. इधर मेरे दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी की भाभी भला मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच सकती हैं? मैंने तो कभी भाभी को इस नजर से नहीं देखा? हम दोनों के बीच तो कभी सीधे मुँह बात भी नहीं हुई? तभी मुझे जय की बात याद आई जब उसने भाभी को 'माल' कहा था. क्या भाभी के गैर मर्दों के साथ रिश्ते हैं? ये सभी सोचते-सोचते दिमाग जोर से चलने लगा था. अब अगर आशु नहीं होती तो मैं गांजा पीता और इस टेंशन से बाहर निकल जाता. पर अब तो उसे वादा कर चूका था तो तोड़ता कैसे? इसलिए ऐसे ही चुप-चाप बिस्तर पर पड़ा रहा. न जाने कैसे शायद आशु ने मेरी चिंता भाँप ली और उसने अपनी गर्दन मेरे बाजू पर से उठाई और मेरे होठों को चूम लिया. उसके इस चुंबन से मेरा ध्यान भाभी से हटा, पर ये बहुत छोटा सा चुंबन था. शायद आज की दमदार संभोग के बाद वो काफी थक चुकी थी. मेरे आगोश में आते ही उसकी आँख लग गई और वो चैन की नींद सो गई. इधर आशु के जिस्म की भीनी खुशबु और उसे आज सकूँ से प्यार करने के बाद मैं भी सो गया.

रात के एक बजे थे.खिड़की से आ रही चांदनी की रौशनी कमरे में फैली हुई थी की तभी आशु बाथरूम से आई तो उसने पाया की मेरा लिंग एक दम कड़क हो चूका है और छत की तरफ मुँह कर के सीधा खड़ा है और फुँफकार रहा हे. दरअसल मैं उस समय कोई हसीन सपना देख रहा था जिस कारन लिंग अकड़ चुका था.. पता नहीं उसे क्या सूजी की वो मेरी टांगों के बीच आ गई और घुटने मोड़ के बैठ गई. मेरे लिंग को निहारते हुए वो ऊपर झुकी और धीरे-धीरे अपना मुँह खोले हुए वो नीचे आने लगी. सबसे पहले उसने अपनी जीभ की नोक से मेरे लिंग को छुआ और मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए मेरी तरफ देखने लगी. जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने अपने मुँह को थोड़ा खोला और आधा सुपाड़ा अपने मुँह में भर के चूसा| ''सससससस''' नींद में ही मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई. उसने धीरे-धीरे पूरा सुपाड़ा अपने मुँह के भीतर ले लिया और रुक गई. "ससस...अह्ह्ह..." अब आशु से और नीचे जाय नहीं रहा था तो उसने आधा सूपड़ा ही अपने मुँह के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया. इधर मैं नींद में था और मेरे सपने में भी ठीक वही हो रहा तह जो असल में आशु मेरे साथ कर रही थी. पर आशु को अभी ठीक से लिंग चूसना नहीं आया था. उसके मुँह में होते हुए भी मेरा लिंग अभी तक सूखा था. जबकि उसे तो अभी तक अपने थूक और लार से मेरे लिंग को गीला कर देना चाहिए था. पूरे दस मिनट तक वो बेचारी बस इसी तरह अपने होठों से मेरे लिंग को अपने मुँह में दबाये हुए ऊपर-नीचे करती रही और अंत में जब मेरा गर्म पानी निकला तो मेरी आँख खुली.आशु को देख मैं हैरान रह गया.मेरा सारा रस उसके मुँह में भर गया था और वो भागती हुई बाथरूम में गई उसे थूकने. मैं अपनी पीठ सिरहाने से लगा कर बैठ गया और जैसे ही आशु बाहर आई उसकी नजरें झुक गई. तो जान! ये क्या हो रहा था? आपके साथ तो मैं बिना कपडे के भी नहीं सो सकता?!" मैंने आशु को छेड़ते हुए कहा. वो एक दम से शर्मा गई और पलंग पर आ कर मेरे सीने पर सर रख कर बैठ गई. "वो न..... जब मैं उठी तो..... आपका वो...... मुझे देख रहा था!" आशु ने शर्माते हुए मेरे लिंग की तरफ ऊँगली करते हुए कहा.

मैं: देख रहा था मतलब? इसकी आँख थोड़े ही है?

आशु: ही..ही...ही... पता नहीं पर उसे देखते ही मैं .... जैसे मैं अपने आप ही ..... (इसके आगे वो कुछ बोल नहीं पाई और शर्मा के मेरे सीने में छुप गई.)

मैं: चलो अब सो जाओ वरना अभी थोड़ी देर में फिर से आपको देखने लगेगा.ये सुनते ही आशु के गाल लाल हो गए और हम दोनों फिर से एक दूसरे की बाहों में लेट गए और चैन से सो गये.

सुबह मेरी नींद चाय की खुशबु सूंघ कर खुली और मैंने उठ के देखा तो आशु किचन में चाय छान रही थी. मैं पीछे से उसके जिस्म से सट कर खड़ा हो गया और अपनी बाँहों को उसके नंगे पेट पर लोच करते हुए उसकी गर्दन पर चूमा. "गुड मॉर्निंग जान!"

"सससस....आज तो वाकई मेरी मॉर्निंग गुड हो गई." आशु ने सिसकते हुए कहा.

आशु: काश की रोज आप मुझे ऐसे ही गुड मॉर्निंग करते?

मैं: बस जान.... कुछ दिन और

आशु: कुछ साल ...दिन नही.

मैं: ये साल भी इसी तरह प्यार करते हुए निकल जायेंगे.

आशु: तभी तो ज़िंदा हु.

इतना कह कर आशु मेरी तरफ मुड़ी और अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होंठों को चूम लिया. मैंने अपनी दोनों हाथों से उसकी कमर को जकड़ लिया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया.

मैंने घडी देखि तो नौ बज गए थे और मुझे ११ बजे आशु को हॉस्टल छोड़ना था तो मैंने उससे नाश्ते के लिए पूछा. आशु उस समय बाथरूम में थी और उसने अंदर से ही कहा की वो बनायेगी. जब आशु बाहर आई तो वो अब भी नग्न ही थी;

मैं: जान अब तो कपडे पहन लो?

आशु: क्यों? (हैरानी से)

मैं: हॉस्टल नहीं जाना?

ये सुनते ही आशु का चेहरा उतर गया और उसका सर झुक गया.मुझसे उसकी ये उदासी सही नहीं गई तो मैंने जा कर उसे अपने गले से लगा लिया और उसके सर को चूमा.

आशु: आज के दिन और रुक जाऊँ? (उसने रुनवासी होते हुए कहा.)

मैं: जान! समझा करो?! देखो आपको कॉलेज भी तो जाना है?

आशु: आप उसकी चिंता मत करो मैं सारी पढ़ाई कवर अप कर लुंगी.

मैं: और मेरे ऑफिस का क्या? आज की मुझे छुट्टी नहीं मिली.

आशु के आँख में फिर से आँसूँ आ गए थे. अब मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटाया और मैं भी उसकी बगल में लेट गया.

मैं: अच्छा तू बता मैं ऐसा क्या करूँ की तुम्हारे मुख पर ख़ुशी लौट आये?

आशु: आज का दिन हम साथ रहे.

मैं: जान वो पॉसिबल नहीं है, वरना मैं आपको मना क्यों करता?

आशु फिर से उदास होने लगी तो मैंने ही उसका मन हल्का करने की सोची;

मैं: अच्छा मैं अगर तुम्हें अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाऊँ तब तो खुश हो जाओगी ना?

आशु: (उत्सुकता दिखाते हुए) क्या?

मैं: भुर्जी खाओगी?

आशु: छी.... छी...आप अंडा खाते हो? घर में किसी को पता चल गया न तो आपको घर से निकाल देंगे!

मैं: मेरे हाथ की भुर्जी खा के तो देखो!

आशु: ना बाबा ना! मुझे नहीं करना अपना धर्म भ्रष्ट.

मैं: ठीक है फिर बनाओ जो बनाना हे. इतना कह कर मैं बाथरूम में घुस गया और नहाने लगा. नाहा-धो के जब तक मैं ऑफिस के लिए तैयार हुआ तब तक आशु ने प्याज के परांठे बना के तैयार कर दिये. पर उसने अभी तक कपडे नहीं पहने थे, मुझे भी दिल्लगी सूझी और मैं ने उसे फिर से पीछे से पकड़ लिया और उसकी गर्दन को चूमने लगा.

आशु: इतना प्यार करते हो फिर भी एक दिन की छुट्टी नहीं ले सकते. शादी से पहले ये हाल है, शादी के बाद तो मुझे टाइम ही नहीं दोगे.

मैं: शादी के बाद तो तुम्हें अपनी पलकों अपर बिठा कर रखुंगा. मजाल है की तुम से कोई काम कह दूँ!

आशु: सच?

मैं: मुच्!

हमने ख़ुशी-ख़ुशी नाश्ता खाया और वही नाश्ता आशु ने पैक भी कर दिया. फिर मैंने उसे पहले उसके कॉलेज छोड़ा और उसके हॉस्टल फ़ोन भी कर दिया की आशु कॉलेज में हे. फ़टाफ़ट ऑफिस पहुँचा और काम में लग गया.शाम को फिर वही ४ बजे निकला, आशु के कॉलेज पहुँचा और मुझे वहाँ देख कर वो चौंक गई. वो भाग कर गेट से बाहर आई और बाइक पर पीछे बैठ गई. हमने चाय पी और फिर उसे हॉस्टल के गेट पर छोडा.
 
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