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साफ़ था की डॉली के ऊपर मेरी किसी भी बात का असर नहीं पड़ने वाला था तो मैंने सोच लिया की इसे अब सब सच बता दूंगा. "ये सभी किताबें बातें हैं! तुझे नहीं पता की असल जिंदगी में प्यार करने वालों के साथ क्या होता है?!" ये कहते हुए मैंने उसे उसकी माँ और उनके प्रेमी के साथ गाँव वालों ने क्या किया था सब सुना दिया और इसे सुनने के बाद वो एक दम सन्न रह गई और उसके चेहरे से साफ़ पता चल गया था की उसके पास इसका कोई भी जवाब नहीं हे.
अगले दस मिनट तक वो भूत बनी खड़ी रही और इधर मेरी नजर मेरी बाइक पर गई जो नीचे पड़ी थी.उसकी इंडिकेटर लाइट टूट गई थी जिसे देख मुझे और गुस्सा आने लगा. मैंने गुस्से से डॉली को बाइक पर बैठने को कहा और इस बार उसने एक ही बार में मेरी बात सुनी और डरी-सहमी सी वो पीछे आ कर बैठ गई. मैंने फटा-फ़ट बाइक दौड़ाई और घर के दरवाजे पर उसे छोड़ा और वहीँ से बाइक घुमा के वापस शहर लौट आया.
शहर आते-आते शाम हो गई और जैसे ही घर में घुसा पिताजी का फोन आया तो मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की बॉस ने कुछ जरुरी काम दिया था इसलिए जल्दी वापस आ गया.उस रात दो बजे तक माल फूँका और दिमाग में रह-रह के डॉली की बातें गूँज रही थी!
एक हफ्ता बीत गया.शुक्रवार के दिन माँ का फ़ोन आया और उन्होंने जो बताया वो सुन के मेरे पाँव-तले जमीन खिसक गई. मैंने बॉस से अर्जेंट छुट्टी माँगी ये कह के की माँ बीमार हैं और मैं वहाँ से धड़-धडाते हुए बाइक चलते हुए घर पहुँचा! भागता हुआ घर में घुसा और सीधा डॉली के कमरे में घुसा तो वो जैसे अध्-मरी वहाँ पड़ी थी. उसके कपड़ों से बू आ रही थी और जब मैंने उसे उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ा तो पता चला की उसका पूरा जिस्म भट्टी की तरह तप रहा था. मैंने पानी की बूँदें उसके चहेरे पर छिडकी तो भी उसकी आँखें नहीं खुली. मैं भागता हुआ नीचे आया तो आँगन में माँ बेचैन खड़ी मिली. उन्होंने बताया की घर पर कोई नहीं है सिवाय उनके और डॉली के. सब किसी ने किसी काम से बाहर गए हैं, बीते ६ दिन से डॉली ने कुछ खाया नहीं है, ना ही वो अपने कमरे से बाहर निकली थी. १-२ दिन तो सबको लगा की बुखार है अपने आप उतर जायेगा पर उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया!
ये सुन के तो मेरी हालत और ख़राब हो गई और मैं घर से भागता हुआ निकला और बाइक स्टार्ट की और भगाते हुए बाजार पहुँचा और वहाँ जाके डॉक्टर से मिन्नत कर के उसे घर ले के आया. उसने डॉली का चेक-उप किया और मुझे तुरंत ड्रिप चढाने को कहा और अपने पैड पर बहुत सारी चीजें लिख दीं जिसे मैं दुबारा बाजार से ले के आया. मेरे सामने डॉक्टर ने डॉली को ड्रिप लगाईं और मुझे खडी हिदायत देते हुए समझाया की ड्रिप कैसे निकालना हे. उनकी बातें सुन के तो मेरी और फ़ट गई की ये मैं कैसे करूँगा!
पहली बोतल तो करीब डेढ़ घंटे में चढ़ी पर उसके बाद वाली चढ़ने में ३ घंटे लगे! मैं सारा टाइम डॉली के कमरे में बैठा था और मेरी नजरे उसके मुख पर टिकी थीं और मन कह रहा था की अब वो आँखें खोलेगी! माँ ने खाने के लिए मुझे नीचे बुलाया पर मैं खाना ऊपर ले के आगया और उसे ढक के रख दिया. रात के एक बजे डॉली की आँख खुली और मैंने तुरंत भाग के उसके बिस्तर के पास घुटने टेक कर उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा; "ये क्या हालत बना ली तूने?" उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आई और उसने पानी पीने का इशारा किया. मैंने उसे सहारा देके बैठाया और पानी पिलाया फिर उससे खाने को कहा तो उसने ना में गर्दन हिला दी. "देख तू पहले खाना खा ले, उसके बाद हम इत्मीनान से बात करते हैं." पर वो अब भी मना करने लगी. "अच्छा... तू जो कहेगी वो मैं करूँगा ... बस तू खाना खा ले! देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ! मैं तुझे इस हालत में नहीं देख सकता!" ये सुन के वो फिर से मुस्कुराई और बैठने की लिए कोशिश करने लगी और मैंने उसे सहारा दे के बैठाया और फिर अपने हाथ से खाना खिलाया और फिर दवाई दे के लिटा दिया.
मैं सारी रात उसी के सिरहाने बैठा रहा और जागता रहा. सुबह के ४ बजे उसका बुखार कम हुआ और उसने अपना हाथ मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया और सोने लगी. सुबह ८ बजे पिताजी और ताऊ जी शादी से लौटे और तब तक मैं डॉली के कमरे में बैठा ऊंघ रहा था. मुझे उसके सिरहाने बैठा देख वो दोनों बहुत गुस्सा हुए और जोर से गरजे; "उतरा नहीं इसका बुखार अभी तक?" ताऊ जी ने बहुत गुस्से में कहा. "ऐसा हुआ क्या था इसे? एक हफ्ते से खाना पीना बंद कर रखा है?" पिताजी ने गुस्से से कहा. "वो पिताजी.... दरअसल पेपर ... आखरी वाला अच्छा नहीं गया था! इसलिए डरी हुई है! कल मैं डॉक्टर को लेके आया था उन्होंने दवाई दी है, जल्दी अच्छी हो जायेगी." मैंने डॉली का बचाव किया. थोड़ी देर बाद ताई जी और माँ भी ऊपर आ गए और मुझे डॉली के सिरहाने बैठे उसके सर पर हाथ फेरते हुए देख के ताई जी बोली; "तूने सर पर चढ़ा रखा है इसे! अब तू अपना काम धंधा छोड़ के इसके पास बैठा है! ये नौकरी आखिर तूने की ही क्यों थी?"
"नौकरी छूट गई तो अच्छा ही होगा, आखिर ताऊ जी भी तो ये ही चाहते हैं!" मैंने उनके ताने का जवाब देते हुए कहा. ताई जी ने मुझे घूर के देखा और फिर नीचे जाने लगी. इधर माँ ने आके मेरे गाल पर एक चपत लगा दी और कहा; "बहुत जुबान निकल आई है तेरी!" इतना कह के वो भी नीचे चलीं गई. डॉली ये सब आंखें मीचे सुन रही थी. माँ के नीचे पहुँचते ही डॉली ने आँख खोली और कहा; "अब भी सबुत चाहिए आपको?" मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. "मैं कुछ समझा नहीं?"
डॉली : "मेरी बीमारी सुनते ही आप अपना सारा काम छोड़ के मेरे सिरहाने बैठे हो! सबसे मेरा बीच-बचाव कर रहे हो! दवा-दारू के लिए भाग दौड़ कर रहे हो, और तो और कल रात से एक पल के लिए भी सोये नहीं! अगर ये प्यार नहीं है तो क्या है?"
मैं: पगली! मैं तुझे कैसे समझाऊँ? मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है!
डॉली : आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लो छुपाने की, पर मेरा दिल कहता है की आप मुझसे प्यार करते हो.
मैं:अच्छा ... चल एक पल को मैं ये मान भी लूँ की मैं तुझसे प्यार करता हूँ, पर आगे क्या?
डॉली : शादी!!! (उसकी आँखें चमक उठी थी.)
मैं: इतना आसान नहीं है पागल! ये दुनिया... ये समाज ... ये नहीं हो सकता! ये नहीं हो सकता. (ये कहता हुए मेरी आँखें भीग आईं थीं और मैंने अपना सर झुका लिया.)
डॉली : कुछ भी नामुमकिन नहीं है! हम घर से भाग जायेंगे, किसी नई जगह अपना संसार बनाएंगे| (उसने मेरे सर को उठाते हुए आशावादी होते हुए कहा.)
मैं: नहीं... तू समझ नहीं रही.... ये सब लोग हम दोनों को मौत के घाट उतार देंगे. मैं अपनी चिंता तो नहीं करता पर तू……….. प्लीज मेरी बात मान और ये भूत अपने सर से उतार दे. (मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा पर मेरी बात उस पर रत्ती भर भी असर नहीं दिखा रही थी.)
डॉली : ऐसा कुछ नहीं होगा! आप विश्वास करो मुझ पर, कोई भी हमें नहीं ढूंढ पायेगा.
मैं: ये नामुमकिन है! तेरी माँ को इन्होने ६ दिन में ढूंढ निकाला था और तब ना तो मोबाइल फ़ोन थे ना ही इंटरनेट. आज के जमाने में मोबाइल, इंटरनेट, जीपीएस सब कुछ है.इन्हें हमें ढूंढने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
डॉली : बस एक मौका .... एक मौका मुझे दे दो की मैं आपके मन में मेरे लिए प्यार पैदा कर सकूँ! वादा करती हूँ की अगर मैं नाकामयाब हुई तो फिर कभी आपको दुबारा नहीं कहूँगी की मैं आपसे प्यार करती हूँ और वही करुँगी जो आप कहोगे.
मैं: ठीक है ... पर अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार पैदा नहीं हुआ तो तुम्हें मुझे भूलना होगा और समय आने पर एक अच्छे से लड़के से शादी करनी होगी!
डॉली : मंजूर है...... पर मेरी भी एक शर्त है! आप मुझसे झूठ नहीं बोलोगे!
मैं: कैसा झूठ?
डॉली : वो समय आने पर आपको पता चल जायेगा. पर अभी आपको मेरे सर पर हाथ रख के कसम खानी होगी.
मैं: मैं कसम खाता हूँ की मैं कभी भी तुमसे झूठ नहीं कहूँगा! अब तू आराम कर ... मैं थोड़ा नहा लेता हु.
ये कहते हुए मैंने एक जोरदार अंगड़ाई ली और फिर नीचे आके ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाया और तब जा के मुझे तारो तजा महसूस हुआ. दोपहर के बारह बज गए थे और भाभी ने मुझे आवाज देके रसोई में बुलाया; "ये लो राज जी, जा के अपनी चाहिती को खिला दो." ये कहते हुए उन्होंने एक थाली में खाना भर के मेरी ओर बढ़ा दी! मैंने चुप-चाप थाली उठाई और बिना कुछ बोले वापस ऊपर आ गया.डॉली जाग चुकी थी और भाभी की बात सुन के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे उठा के बिठाया और वो दिवार से टेक लगा के बैठ गई पर वो प्यारी सी मुस्कान उसके होठों पर अब भी थी! "बड़ी हँसी आ रही है तुझे?" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा. जवाब में उसने कुछ नहीं कहा और शर्माने लगी. मैंने दाल-चावल का एक कोर उसे खिलाने के लिए अपनी उँगलियों को उसके होठों के सामने लाया तो उसने बड़ी नज़ाकत से अपने होठों को खोला और पहला कोर खाया "आपके हाथ से खाना आज तो और भी स्वाद लग रहा हे."
"अच्छा? पहली बार तो नहीं खिला रहा मैं तुझे खाना!" मैंने उसे उस के बचपन के वाक्य याद दिलाये! "याद है.... पर अब बात कुछ और हे." और ये कह के वो फिर से मुस्कुराने लगी. उसकी बात सुन के मैं झेंप गया और उससे नजरें चुराने लगा. अब आगे बढ़ के डॉली ने भी थाली से एक कोर लिया और मुझे खिलाने के लिए अपनी उँगलियाँ मेरी और बढ़ा दी. मैंने भी उसके हाथ से एक कोर खाया और उसे रोक दिया ये कह के; "बस! पहले तू खा ले फिर मैं खा लुंगा."
"नहीं... आप मुझे एक कोर खिलाओ और मैं आपको एक कोर खिलाऊँगी!" उसने बड़े प्यार से मेरी बात का विरोध किया. "तू बहुत जिद्दी हो गई है!" मैंने उसे उल्हना देते हुए कहा. "अब आपकी चहेती हूँ तो थोड़ा तो जिद्दी बन ही जाऊंगी." उसने भाभी की बात प्यार से दोहराई.मैंने आगे कुछ नहीं कहा और हम एक दूसरे को इसी तरह खाना खिलाते रहे. खाने के बाद मैंने उसे दवाई दे के लिटा दिया और मैं नीचे जाने को हुआ तो वो बोली; "आप भी यहीं लेट जाओ." मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और थोड़ा गुस्से से कहा: "आशु..." बस वो मेरी बात समझ गई की ऐसा करने से घरवाले कुछ गलत सोचेंगे. डॉली के बगल वाला कमरा मेरा ही था तो मैं उसमें जा के अपने बिस्तर पर पड़ गया और सो गया.
अगले दस मिनट तक वो भूत बनी खड़ी रही और इधर मेरी नजर मेरी बाइक पर गई जो नीचे पड़ी थी.उसकी इंडिकेटर लाइट टूट गई थी जिसे देख मुझे और गुस्सा आने लगा. मैंने गुस्से से डॉली को बाइक पर बैठने को कहा और इस बार उसने एक ही बार में मेरी बात सुनी और डरी-सहमी सी वो पीछे आ कर बैठ गई. मैंने फटा-फ़ट बाइक दौड़ाई और घर के दरवाजे पर उसे छोड़ा और वहीँ से बाइक घुमा के वापस शहर लौट आया.
शहर आते-आते शाम हो गई और जैसे ही घर में घुसा पिताजी का फोन आया तो मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की बॉस ने कुछ जरुरी काम दिया था इसलिए जल्दी वापस आ गया.उस रात दो बजे तक माल फूँका और दिमाग में रह-रह के डॉली की बातें गूँज रही थी!
एक हफ्ता बीत गया.शुक्रवार के दिन माँ का फ़ोन आया और उन्होंने जो बताया वो सुन के मेरे पाँव-तले जमीन खिसक गई. मैंने बॉस से अर्जेंट छुट्टी माँगी ये कह के की माँ बीमार हैं और मैं वहाँ से धड़-धडाते हुए बाइक चलते हुए घर पहुँचा! भागता हुआ घर में घुसा और सीधा डॉली के कमरे में घुसा तो वो जैसे अध्-मरी वहाँ पड़ी थी. उसके कपड़ों से बू आ रही थी और जब मैंने उसे उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ा तो पता चला की उसका पूरा जिस्म भट्टी की तरह तप रहा था. मैंने पानी की बूँदें उसके चहेरे पर छिडकी तो भी उसकी आँखें नहीं खुली. मैं भागता हुआ नीचे आया तो आँगन में माँ बेचैन खड़ी मिली. उन्होंने बताया की घर पर कोई नहीं है सिवाय उनके और डॉली के. सब किसी ने किसी काम से बाहर गए हैं, बीते ६ दिन से डॉली ने कुछ खाया नहीं है, ना ही वो अपने कमरे से बाहर निकली थी. १-२ दिन तो सबको लगा की बुखार है अपने आप उतर जायेगा पर उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया!
ये सुन के तो मेरी हालत और ख़राब हो गई और मैं घर से भागता हुआ निकला और बाइक स्टार्ट की और भगाते हुए बाजार पहुँचा और वहाँ जाके डॉक्टर से मिन्नत कर के उसे घर ले के आया. उसने डॉली का चेक-उप किया और मुझे तुरंत ड्रिप चढाने को कहा और अपने पैड पर बहुत सारी चीजें लिख दीं जिसे मैं दुबारा बाजार से ले के आया. मेरे सामने डॉक्टर ने डॉली को ड्रिप लगाईं और मुझे खडी हिदायत देते हुए समझाया की ड्रिप कैसे निकालना हे. उनकी बातें सुन के तो मेरी और फ़ट गई की ये मैं कैसे करूँगा!
पहली बोतल तो करीब डेढ़ घंटे में चढ़ी पर उसके बाद वाली चढ़ने में ३ घंटे लगे! मैं सारा टाइम डॉली के कमरे में बैठा था और मेरी नजरे उसके मुख पर टिकी थीं और मन कह रहा था की अब वो आँखें खोलेगी! माँ ने खाने के लिए मुझे नीचे बुलाया पर मैं खाना ऊपर ले के आगया और उसे ढक के रख दिया. रात के एक बजे डॉली की आँख खुली और मैंने तुरंत भाग के उसके बिस्तर के पास घुटने टेक कर उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा; "ये क्या हालत बना ली तूने?" उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आई और उसने पानी पीने का इशारा किया. मैंने उसे सहारा देके बैठाया और पानी पिलाया फिर उससे खाने को कहा तो उसने ना में गर्दन हिला दी. "देख तू पहले खाना खा ले, उसके बाद हम इत्मीनान से बात करते हैं." पर वो अब भी मना करने लगी. "अच्छा... तू जो कहेगी वो मैं करूँगा ... बस तू खाना खा ले! देख मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ! मैं तुझे इस हालत में नहीं देख सकता!" ये सुन के वो फिर से मुस्कुराई और बैठने की लिए कोशिश करने लगी और मैंने उसे सहारा दे के बैठाया और फिर अपने हाथ से खाना खिलाया और फिर दवाई दे के लिटा दिया.
मैं सारी रात उसी के सिरहाने बैठा रहा और जागता रहा. सुबह के ४ बजे उसका बुखार कम हुआ और उसने अपना हाथ मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया और सोने लगी. सुबह ८ बजे पिताजी और ताऊ जी शादी से लौटे और तब तक मैं डॉली के कमरे में बैठा ऊंघ रहा था. मुझे उसके सिरहाने बैठा देख वो दोनों बहुत गुस्सा हुए और जोर से गरजे; "उतरा नहीं इसका बुखार अभी तक?" ताऊ जी ने बहुत गुस्से में कहा. "ऐसा हुआ क्या था इसे? एक हफ्ते से खाना पीना बंद कर रखा है?" पिताजी ने गुस्से से कहा. "वो पिताजी.... दरअसल पेपर ... आखरी वाला अच्छा नहीं गया था! इसलिए डरी हुई है! कल मैं डॉक्टर को लेके आया था उन्होंने दवाई दी है, जल्दी अच्छी हो जायेगी." मैंने डॉली का बचाव किया. थोड़ी देर बाद ताई जी और माँ भी ऊपर आ गए और मुझे डॉली के सिरहाने बैठे उसके सर पर हाथ फेरते हुए देख के ताई जी बोली; "तूने सर पर चढ़ा रखा है इसे! अब तू अपना काम धंधा छोड़ के इसके पास बैठा है! ये नौकरी आखिर तूने की ही क्यों थी?"
"नौकरी छूट गई तो अच्छा ही होगा, आखिर ताऊ जी भी तो ये ही चाहते हैं!" मैंने उनके ताने का जवाब देते हुए कहा. ताई जी ने मुझे घूर के देखा और फिर नीचे जाने लगी. इधर माँ ने आके मेरे गाल पर एक चपत लगा दी और कहा; "बहुत जुबान निकल आई है तेरी!" इतना कह के वो भी नीचे चलीं गई. डॉली ये सब आंखें मीचे सुन रही थी. माँ के नीचे पहुँचते ही डॉली ने आँख खोली और कहा; "अब भी सबुत चाहिए आपको?" मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. "मैं कुछ समझा नहीं?"
डॉली : "मेरी बीमारी सुनते ही आप अपना सारा काम छोड़ के मेरे सिरहाने बैठे हो! सबसे मेरा बीच-बचाव कर रहे हो! दवा-दारू के लिए भाग दौड़ कर रहे हो, और तो और कल रात से एक पल के लिए भी सोये नहीं! अगर ये प्यार नहीं है तो क्या है?"
मैं: पगली! मैं तुझे कैसे समझाऊँ? मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है!
डॉली : आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लो छुपाने की, पर मेरा दिल कहता है की आप मुझसे प्यार करते हो.
मैं:अच्छा ... चल एक पल को मैं ये मान भी लूँ की मैं तुझसे प्यार करता हूँ, पर आगे क्या?
डॉली : शादी!!! (उसकी आँखें चमक उठी थी.)
मैं: इतना आसान नहीं है पागल! ये दुनिया... ये समाज ... ये नहीं हो सकता! ये नहीं हो सकता. (ये कहता हुए मेरी आँखें भीग आईं थीं और मैंने अपना सर झुका लिया.)
डॉली : कुछ भी नामुमकिन नहीं है! हम घर से भाग जायेंगे, किसी नई जगह अपना संसार बनाएंगे| (उसने मेरे सर को उठाते हुए आशावादी होते हुए कहा.)
मैं: नहीं... तू समझ नहीं रही.... ये सब लोग हम दोनों को मौत के घाट उतार देंगे. मैं अपनी चिंता तो नहीं करता पर तू……….. प्लीज मेरी बात मान और ये भूत अपने सर से उतार दे. (मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा पर मेरी बात उस पर रत्ती भर भी असर नहीं दिखा रही थी.)
डॉली : ऐसा कुछ नहीं होगा! आप विश्वास करो मुझ पर, कोई भी हमें नहीं ढूंढ पायेगा.
मैं: ये नामुमकिन है! तेरी माँ को इन्होने ६ दिन में ढूंढ निकाला था और तब ना तो मोबाइल फ़ोन थे ना ही इंटरनेट. आज के जमाने में मोबाइल, इंटरनेट, जीपीएस सब कुछ है.इन्हें हमें ढूंढने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
डॉली : बस एक मौका .... एक मौका मुझे दे दो की मैं आपके मन में मेरे लिए प्यार पैदा कर सकूँ! वादा करती हूँ की अगर मैं नाकामयाब हुई तो फिर कभी आपको दुबारा नहीं कहूँगी की मैं आपसे प्यार करती हूँ और वही करुँगी जो आप कहोगे.
मैं: ठीक है ... पर अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए प्यार पैदा नहीं हुआ तो तुम्हें मुझे भूलना होगा और समय आने पर एक अच्छे से लड़के से शादी करनी होगी!
डॉली : मंजूर है...... पर मेरी भी एक शर्त है! आप मुझसे झूठ नहीं बोलोगे!
मैं: कैसा झूठ?
डॉली : वो समय आने पर आपको पता चल जायेगा. पर अभी आपको मेरे सर पर हाथ रख के कसम खानी होगी.
मैं: मैं कसम खाता हूँ की मैं कभी भी तुमसे झूठ नहीं कहूँगा! अब तू आराम कर ... मैं थोड़ा नहा लेता हु.
ये कहते हुए मैंने एक जोरदार अंगड़ाई ली और फिर नीचे आके ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाया और तब जा के मुझे तारो तजा महसूस हुआ. दोपहर के बारह बज गए थे और भाभी ने मुझे आवाज देके रसोई में बुलाया; "ये लो राज जी, जा के अपनी चाहिती को खिला दो." ये कहते हुए उन्होंने एक थाली में खाना भर के मेरी ओर बढ़ा दी! मैंने चुप-चाप थाली उठाई और बिना कुछ बोले वापस ऊपर आ गया.डॉली जाग चुकी थी और भाभी की बात सुन के मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे उठा के बिठाया और वो दिवार से टेक लगा के बैठ गई पर वो प्यारी सी मुस्कान उसके होठों पर अब भी थी! "बड़ी हँसी आ रही है तुझे?" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा. जवाब में उसने कुछ नहीं कहा और शर्माने लगी. मैंने दाल-चावल का एक कोर उसे खिलाने के लिए अपनी उँगलियों को उसके होठों के सामने लाया तो उसने बड़ी नज़ाकत से अपने होठों को खोला और पहला कोर खाया "आपके हाथ से खाना आज तो और भी स्वाद लग रहा हे."
"अच्छा? पहली बार तो नहीं खिला रहा मैं तुझे खाना!" मैंने उसे उस के बचपन के वाक्य याद दिलाये! "याद है.... पर अब बात कुछ और हे." और ये कह के वो फिर से मुस्कुराने लगी. उसकी बात सुन के मैं झेंप गया और उससे नजरें चुराने लगा. अब आगे बढ़ के डॉली ने भी थाली से एक कोर लिया और मुझे खिलाने के लिए अपनी उँगलियाँ मेरी और बढ़ा दी. मैंने भी उसके हाथ से एक कोर खाया और उसे रोक दिया ये कह के; "बस! पहले तू खा ले फिर मैं खा लुंगा."
"नहीं... आप मुझे एक कोर खिलाओ और मैं आपको एक कोर खिलाऊँगी!" उसने बड़े प्यार से मेरी बात का विरोध किया. "तू बहुत जिद्दी हो गई है!" मैंने उसे उल्हना देते हुए कहा. "अब आपकी चहेती हूँ तो थोड़ा तो जिद्दी बन ही जाऊंगी." उसने भाभी की बात प्यार से दोहराई.मैंने आगे कुछ नहीं कहा और हम एक दूसरे को इसी तरह खाना खिलाते रहे. खाने के बाद मैंने उसे दवाई दे के लिटा दिया और मैं नीचे जाने को हुआ तो वो बोली; "आप भी यहीं लेट जाओ." मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और थोड़ा गुस्से से कहा: "आशु..." बस वो मेरी बात समझ गई की ऐसा करने से घरवाले कुछ गलत सोचेंगे. डॉली के बगल वाला कमरा मेरा ही था तो मैं उसमें जा के अपने बिस्तर पर पड़ गया और सो गया.