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Guest
अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचते ही बॉस ने मुझे बताया की हमें शाम की ट्रैन से मुंबई जाना हे. ये सुनते ही मैं हैरान हो गया; “सर पर महालक्ष्मी ट्रेडर्स की जी. एस. टी. रिटर्न पेंडिंग है!"
"तू उसकी चिंता मत कर वो अंजू (बॉस की बीवी) देख लेगी." बॉस ने अपनी बीवी की तरफ देखते हुए कहा. ये सुन कर मैडम का मुँह बन गया और इससे पहले मैं कुछ बोलता की तभी आशु का फ़ोन आ गया और मैं केबिन से बाहर आ गया.
मैं: अच्छा हुआ तुमने फ़ोन किया. मुझे तुम्हें एक बात बतानी थी. मुझे बॉस के साथ आज रात की गाडी से मुंबई जाना हे.
आशु: (चौंकते हुए) क्या? पर इतनी अचानक क्यों? और.... और कब आ रहे हो आप?
मैं: वो पता नहीं... शायद शनिवार-रविवार....
ये सुन कर वो उदास हो गई और एक दम से खामोश हो गई.
मैं: जान! हम फ़ोन पर वीडियो कॉल करेंगे... ओके?
आशु: हम्म...प्लीज जल्दी आना.
आशु बहुत उदास हो गई थी और इधर मैं भी मजबूर था की उसे इतने दिन उससे नहीं मिल पाउंगा. मैं आ कर अपने डेस्क पर बैठ गया और मायूसी मेरे चेहरे से साफ़ झलक रही थी. थोड़ी देर बाद जब नितु मैडम मेरे पास फाइल लेने आईं तो मेरी मायूसी को ताड़ गई. "क्या हुआ राज ?" अब मैं उठ के खड़ा हुआ और नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाके उनसे बोला; "वो मैडम ... दरअसल सर ने अचानक जाने का प्लान बना दिया. अब घर वाले ..." आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "चलो इस बार चले जाओ, अगली बार से मैं इन्हें बोल दूँगी की तुम्हें एडवांस में बता दें. अच्छा आज तुम घर जल्दी चले जाना और अपने कपडे-लत्ते ले कर सीधा स्टेशन आ जाना." तभी पीछे से सर बोल पड़े; "अरे पहले ही ये जल्दी निकल जाता है और कितना जल्दी भेजोगे?" सर ने ताना मारा. "सर क्या करें इतनी सैलरी में गुजरा नहीं होता. इसलिए पार्ट टाइम टूशन देता हु." ये सुनते ही मैडम और सर का मुँह खुला का खुला रह गया.सर अपना इतना सा मुँह ले कर वापस चले गए और मैडम भी उनके पीछे-पीछे सर झुकाये चली गई. खेर जैसे ही ३ बजे मैं सर के कमरे में घुसा और उनसे जाने की नितुमति मांगी. "इतना जल्दी क्यों? अभी तो तीन ही बजे हैं?" सर ने टोका पर मेरा जवाब पहले से ही तैयार था. "सर कपडे-लत्ते धोने हैं, गंदे छोड़ कर गया तो वापस आ कर क्या पहनूँगा?" ये सुनते ही मैडम मुस्कुराने लगी क्योंकि सर को मेरे इस जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी. "ठीक है...तीन दिन के कपडे पैक कर लेना और गाडी ८ बजे की है, लेट मत होना." मैंने हाँ में सर हिलाया और बाहर आ कर सीधा आशु को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं क्योंकि उसका लेक्चर चल रहा था. मैं सीधा उसके कॉलेज की तरफ चल दिया और रेड लाइट पर बाइक रोक कर उसे कॉल करने लगा. जैसे ही उसने उठाया मैंने उसे तुरंत बाहर मिलने बुलाया और वो दौड़ती हुई रेड लाइट तक आ गई.
बिना देर किये उसने रेड लाइट पर खड़ी सभी गाडी वालों के सामने मुझे गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगी. मैंने अब भी हेलमेट लगा रखा था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुप कराने लगा. "जान... मैं कुछ दिन के लिए जा रहा हु. सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ की वापस नहीं आऊँगा?! मैं इस रविवार आ रहा हूँ... फिर हम दोनों पिक्चर जायेंगे?" मेरे इस सवाल का जवाब उसने बस 'हम्म' कर के दिया. मैंने उसे पीछे बैठने को कहा और उसे अपने घर ले आया, वो थोड़ा हैरान थी की मैं उसे घर क्यों ले आया पर मैंने सोचा की कम से कम मेरे साथ अकेली रहेगी तो खुल कर बात करेगी. वो कमरे में उसी खिड़की के पास जा कर बैठ गई और मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसकी गोद में सर रख दिया. आशु ने मेरे सर को सहलाना शुरू कर दिया और बोली;
आशु: रविवार पक्का आओगे ना?
मैं: हाँ ... अब ये बताओ क्या लाऊँ अपनी जानेमन के लिए?
आशु: बस आप आ जाना, वही काफी है मेरे लिए.
उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर उठ के मेरे कपडे पैक करने लगी. मैंने पीछे से जा कर उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया. मेरे जिस्म का एहसास होते ही जैसे वो सिंहर उठी. मैंने आशु की नग्न गर्दन पर अपने होंठ रखे तो उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जा कर जकड़ लिया. हालाँकि उसका मुँह अब भी सामने की तरफ था और उसकी पीठ मेरे सीने से चुपकी हुई थी. आगे कुछ करने से पहले ही मेरे फ़ोन की घंटी बज उठी और मैं आशु से थोड़ा दूर हो गया.जैसे ही मैं फ़ोन ले कर पलटा और 'हेल्लो' बोला की तभी आशु ने मुझे पीछे से आ कर जकड़ लिया. उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ा की उसके जिस्म में जल रही आग मेरी पीठ सेंकने लगी. "सर मैं आपको अभी थोड़ी देर में फ़ोन करता हूँ, अभी मैं ड्राइव कर रहा हु." इतना कह कर मैंने फ़ोन पलंग पर फेंक दिया और आशु की तरफ घूम गया.उसे बगलों से पकड़ कर मैंने उसे जैसे गोद में उठा लिया. आशु ने भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लिया और मेरे होठों को चूसने लगी. मैंने अपने दोनों हाथों को उसके कूल्हों के ऊपर रख दिया ताकि वो फिसल कर नीचे न गिर जाये. आशु मुझे बेतहाशा चुम रही थी और मैं भी उसके इस प्यार का जवाब प्यार से ही दे रहा था. मैं आशु को इसी तरह गोद में उठाये कमरे में घूम रहा था और वो मेरे होठों को चूसे जा रही थी. शायद वो ये उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अब पलंग पर लेटाऊंगा, पर मेरा मन बस उसके साथ यही खेल खेलना चाहता था.
आशु: जानू...मैं आपसे कुछ माँगूँ तो मन तो नहीं करोगे ना? (आशु ने चूमना बंद किया और पलकें झुका कर मुझ से पूछा.)
मैं: जान! मेरी जान भी मांगोंगे तो भी मना नहीं करुंगा. हुक्म करो!
आशु: जाने से पहले आज एक बार... (इसके आगे वो बोल नहीं पाई और शर्म से उसने अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया.)
मैं: अच्छा जी??? तो आपको एक बार और मेरा प्यार चाहिए???
ये सुन कर आशु बुरी तरह झेंप गई और अपने चेहरे को मेरी छाती में छुपा लिया. अब अपनी जानेमन को कैसे मना करूँ?
मैंने आशु को गोद में उठाये हुए ही उसे एक खिड़की के साथ वाली दिवार के साथ लगा दिया. आशु ने अपने हाथ जो मेरी पीठ के इर्द-गिर्द लपेटे हुए थे वो खोल दिए और सामने ला कर अपने पाजामे का नाडा खोला. मैंने भी अपने पैंट की ज़िप खोली और फनफनाता हुआ लिंग बाहर निकाला. आशु ने मौका पाते ही अपनी दो उँगलियाँ अपने मुँह में डाली और उन्हें अपने थूक से गीला कर अपनी योनी में डाल दिया. मैंने भी अपने लिंग पर थूक लगा के धीरे-धीरे आशु की योनी में पेलने लगा. अभी केवल सुपाड़ा ही गया होगा की आशु ने खुद को मेरे जिस्म से कस कर दबा लिया, जैसे वो चाहती ही ना हो की मैं अंदर और लिंग डालु. दर्द से उसके माथे पर शिकन पड़ गई थी. इसलिए मैं ने उसे थोड़ा समय देते हुए उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया. जैसे ही मैंने अपनी जीभ आशु के मुँह में पिरोई की उसने अपने बदन का दबाव कम किया और मैं ने भी धीरे-धीरे लिंग को अंदर पेलना शुरू किया. आशु ने मेरी जीभ की चुसाई शुरू कर दी थी और नीचे से मैंने धीरे-धीरे लिंग अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया था. पाँच मिनट हुए और आशु का फव्वारा छूट गया और उसने मुझे फिर से कस कर खुद से चिपटा लिया. पाँच मिनट तक वो मेरे सीने से चिपकी रही और अपनी उखड़ी साँसों पर काबू करने लगी. मैंने उसके सर को चूमा तो उसने मेरी आँखों में देखा और मुझे मूक नितुमति दी. मैंने धीरे-धीरे लिंग को अंदर बाहर करना चालू किया और धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा. आशु की योनी अंदर से बहुत गीली थी इसलिए लिंग अब फिसलता हुआ अंदर जा रहा था. दस मिनट और फिर हम दोनों एक साथ झड़ गये. आशु ने फिर से मुझे कस कर जकड़ लिया और बुरी तरह हाँफने लगी. उसे देख कर एक पल को तो मैं डर गया की कहीं उसे कुछ हो ना जाये. मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और कुर्सी पर बिठाया और उसके लिए पानी ले आया. पानी का एक घूँट पीते ही उसे खाँसी आ गई तो मैंने उसकी पीठ थप-थापाके उस की खाँसी रुक वाई."क्या हुआ जान? तुम इतना हाँफ क्यों रही हो? कहीं ये आई-पिल का कोई रिएक्शन तो नहीं?" मैंने चिंता जताते हुए पूछा.
"ओह्ह नो! वो तो मैं लेना ही भूल गई!" आशु ने अपना सर पीटते हुए कहा.
"पागल है क्या? वो गोली तुझे ७२ घंटों में लेनी थी! कहाँ है वो दवाई?" मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तो उसने अपने बैग की तरफ इशारा किया. मैंने उसका बैग उसे ला कर दिया और वो उसे खंगाल कर देखने लगी और आखिर उसे गोलियों का पत्ता मिल गया और मैंने उसे पानी दिया पीने को.पर मेरी हालत अब ख़राब थी क्योंकि उसे ७२ घंटों से कुछ ज्यादा समय हो चूका था. अगर गर्भ ठहर गया तो??? मैं डर के मारे कमरे में एक कोने पर जमीन पर ही बैठ गया.आशु उठी अपने कपडे ठीक किये और मेरे पास आ गई और मेरी बगल में बैठ गई. "कुछ नहीं होगा जानू! आप घबराओ मत!" उसने अपने बाएं हाथ को मेरे कंधे से ले जाते हुए खुद को मुझसे चिपका लिया.
"तू उसकी चिंता मत कर वो अंजू (बॉस की बीवी) देख लेगी." बॉस ने अपनी बीवी की तरफ देखते हुए कहा. ये सुन कर मैडम का मुँह बन गया और इससे पहले मैं कुछ बोलता की तभी आशु का फ़ोन आ गया और मैं केबिन से बाहर आ गया.
मैं: अच्छा हुआ तुमने फ़ोन किया. मुझे तुम्हें एक बात बतानी थी. मुझे बॉस के साथ आज रात की गाडी से मुंबई जाना हे.
आशु: (चौंकते हुए) क्या? पर इतनी अचानक क्यों? और.... और कब आ रहे हो आप?
मैं: वो पता नहीं... शायद शनिवार-रविवार....
ये सुन कर वो उदास हो गई और एक दम से खामोश हो गई.
मैं: जान! हम फ़ोन पर वीडियो कॉल करेंगे... ओके?
आशु: हम्म...प्लीज जल्दी आना.
आशु बहुत उदास हो गई थी और इधर मैं भी मजबूर था की उसे इतने दिन उससे नहीं मिल पाउंगा. मैं आ कर अपने डेस्क पर बैठ गया और मायूसी मेरे चेहरे से साफ़ झलक रही थी. थोड़ी देर बाद जब नितु मैडम मेरे पास फाइल लेने आईं तो मेरी मायूसी को ताड़ गई. "क्या हुआ राज ?" अब मैं उठ के खड़ा हुआ और नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाके उनसे बोला; "वो मैडम ... दरअसल सर ने अचानक जाने का प्लान बना दिया. अब घर वाले ..." आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "चलो इस बार चले जाओ, अगली बार से मैं इन्हें बोल दूँगी की तुम्हें एडवांस में बता दें. अच्छा आज तुम घर जल्दी चले जाना और अपने कपडे-लत्ते ले कर सीधा स्टेशन आ जाना." तभी पीछे से सर बोल पड़े; "अरे पहले ही ये जल्दी निकल जाता है और कितना जल्दी भेजोगे?" सर ने ताना मारा. "सर क्या करें इतनी सैलरी में गुजरा नहीं होता. इसलिए पार्ट टाइम टूशन देता हु." ये सुनते ही मैडम और सर का मुँह खुला का खुला रह गया.सर अपना इतना सा मुँह ले कर वापस चले गए और मैडम भी उनके पीछे-पीछे सर झुकाये चली गई. खेर जैसे ही ३ बजे मैं सर के कमरे में घुसा और उनसे जाने की नितुमति मांगी. "इतना जल्दी क्यों? अभी तो तीन ही बजे हैं?" सर ने टोका पर मेरा जवाब पहले से ही तैयार था. "सर कपडे-लत्ते धोने हैं, गंदे छोड़ कर गया तो वापस आ कर क्या पहनूँगा?" ये सुनते ही मैडम मुस्कुराने लगी क्योंकि सर को मेरे इस जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी. "ठीक है...तीन दिन के कपडे पैक कर लेना और गाडी ८ बजे की है, लेट मत होना." मैंने हाँ में सर हिलाया और बाहर आ कर सीधा आशु को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं क्योंकि उसका लेक्चर चल रहा था. मैं सीधा उसके कॉलेज की तरफ चल दिया और रेड लाइट पर बाइक रोक कर उसे कॉल करने लगा. जैसे ही उसने उठाया मैंने उसे तुरंत बाहर मिलने बुलाया और वो दौड़ती हुई रेड लाइट तक आ गई.
बिना देर किये उसने रेड लाइट पर खड़ी सभी गाडी वालों के सामने मुझे गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगी. मैंने अब भी हेलमेट लगा रखा था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुप कराने लगा. "जान... मैं कुछ दिन के लिए जा रहा हु. सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ की वापस नहीं आऊँगा?! मैं इस रविवार आ रहा हूँ... फिर हम दोनों पिक्चर जायेंगे?" मेरे इस सवाल का जवाब उसने बस 'हम्म' कर के दिया. मैंने उसे पीछे बैठने को कहा और उसे अपने घर ले आया, वो थोड़ा हैरान थी की मैं उसे घर क्यों ले आया पर मैंने सोचा की कम से कम मेरे साथ अकेली रहेगी तो खुल कर बात करेगी. वो कमरे में उसी खिड़की के पास जा कर बैठ गई और मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसकी गोद में सर रख दिया. आशु ने मेरे सर को सहलाना शुरू कर दिया और बोली;
आशु: रविवार पक्का आओगे ना?
मैं: हाँ ... अब ये बताओ क्या लाऊँ अपनी जानेमन के लिए?
आशु: बस आप आ जाना, वही काफी है मेरे लिए.
उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर उठ के मेरे कपडे पैक करने लगी. मैंने पीछे से जा कर उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया. मेरे जिस्म का एहसास होते ही जैसे वो सिंहर उठी. मैंने आशु की नग्न गर्दन पर अपने होंठ रखे तो उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जा कर जकड़ लिया. हालाँकि उसका मुँह अब भी सामने की तरफ था और उसकी पीठ मेरे सीने से चुपकी हुई थी. आगे कुछ करने से पहले ही मेरे फ़ोन की घंटी बज उठी और मैं आशु से थोड़ा दूर हो गया.जैसे ही मैं फ़ोन ले कर पलटा और 'हेल्लो' बोला की तभी आशु ने मुझे पीछे से आ कर जकड़ लिया. उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ा की उसके जिस्म में जल रही आग मेरी पीठ सेंकने लगी. "सर मैं आपको अभी थोड़ी देर में फ़ोन करता हूँ, अभी मैं ड्राइव कर रहा हु." इतना कह कर मैंने फ़ोन पलंग पर फेंक दिया और आशु की तरफ घूम गया.उसे बगलों से पकड़ कर मैंने उसे जैसे गोद में उठा लिया. आशु ने भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लिया और मेरे होठों को चूसने लगी. मैंने अपने दोनों हाथों को उसके कूल्हों के ऊपर रख दिया ताकि वो फिसल कर नीचे न गिर जाये. आशु मुझे बेतहाशा चुम रही थी और मैं भी उसके इस प्यार का जवाब प्यार से ही दे रहा था. मैं आशु को इसी तरह गोद में उठाये कमरे में घूम रहा था और वो मेरे होठों को चूसे जा रही थी. शायद वो ये उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अब पलंग पर लेटाऊंगा, पर मेरा मन बस उसके साथ यही खेल खेलना चाहता था.
आशु: जानू...मैं आपसे कुछ माँगूँ तो मन तो नहीं करोगे ना? (आशु ने चूमना बंद किया और पलकें झुका कर मुझ से पूछा.)
मैं: जान! मेरी जान भी मांगोंगे तो भी मना नहीं करुंगा. हुक्म करो!
आशु: जाने से पहले आज एक बार... (इसके आगे वो बोल नहीं पाई और शर्म से उसने अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया.)
मैं: अच्छा जी??? तो आपको एक बार और मेरा प्यार चाहिए???
ये सुन कर आशु बुरी तरह झेंप गई और अपने चेहरे को मेरी छाती में छुपा लिया. अब अपनी जानेमन को कैसे मना करूँ?
मैंने आशु को गोद में उठाये हुए ही उसे एक खिड़की के साथ वाली दिवार के साथ लगा दिया. आशु ने अपने हाथ जो मेरी पीठ के इर्द-गिर्द लपेटे हुए थे वो खोल दिए और सामने ला कर अपने पाजामे का नाडा खोला. मैंने भी अपने पैंट की ज़िप खोली और फनफनाता हुआ लिंग बाहर निकाला. आशु ने मौका पाते ही अपनी दो उँगलियाँ अपने मुँह में डाली और उन्हें अपने थूक से गीला कर अपनी योनी में डाल दिया. मैंने भी अपने लिंग पर थूक लगा के धीरे-धीरे आशु की योनी में पेलने लगा. अभी केवल सुपाड़ा ही गया होगा की आशु ने खुद को मेरे जिस्म से कस कर दबा लिया, जैसे वो चाहती ही ना हो की मैं अंदर और लिंग डालु. दर्द से उसके माथे पर शिकन पड़ गई थी. इसलिए मैं ने उसे थोड़ा समय देते हुए उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया. जैसे ही मैंने अपनी जीभ आशु के मुँह में पिरोई की उसने अपने बदन का दबाव कम किया और मैं ने भी धीरे-धीरे लिंग को अंदर पेलना शुरू किया. आशु ने मेरी जीभ की चुसाई शुरू कर दी थी और नीचे से मैंने धीरे-धीरे लिंग अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया था. पाँच मिनट हुए और आशु का फव्वारा छूट गया और उसने मुझे फिर से कस कर खुद से चिपटा लिया. पाँच मिनट तक वो मेरे सीने से चिपकी रही और अपनी उखड़ी साँसों पर काबू करने लगी. मैंने उसके सर को चूमा तो उसने मेरी आँखों में देखा और मुझे मूक नितुमति दी. मैंने धीरे-धीरे लिंग को अंदर बाहर करना चालू किया और धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा. आशु की योनी अंदर से बहुत गीली थी इसलिए लिंग अब फिसलता हुआ अंदर जा रहा था. दस मिनट और फिर हम दोनों एक साथ झड़ गये. आशु ने फिर से मुझे कस कर जकड़ लिया और बुरी तरह हाँफने लगी. उसे देख कर एक पल को तो मैं डर गया की कहीं उसे कुछ हो ना जाये. मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और कुर्सी पर बिठाया और उसके लिए पानी ले आया. पानी का एक घूँट पीते ही उसे खाँसी आ गई तो मैंने उसकी पीठ थप-थापाके उस की खाँसी रुक वाई."क्या हुआ जान? तुम इतना हाँफ क्यों रही हो? कहीं ये आई-पिल का कोई रिएक्शन तो नहीं?" मैंने चिंता जताते हुए पूछा.
"ओह्ह नो! वो तो मैं लेना ही भूल गई!" आशु ने अपना सर पीटते हुए कहा.
"पागल है क्या? वो गोली तुझे ७२ घंटों में लेनी थी! कहाँ है वो दवाई?" मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तो उसने अपने बैग की तरफ इशारा किया. मैंने उसका बैग उसे ला कर दिया और वो उसे खंगाल कर देखने लगी और आखिर उसे गोलियों का पत्ता मिल गया और मैंने उसे पानी दिया पीने को.पर मेरी हालत अब ख़राब थी क्योंकि उसे ७२ घंटों से कुछ ज्यादा समय हो चूका था. अगर गर्भ ठहर गया तो??? मैं डर के मारे कमरे में एक कोने पर जमीन पर ही बैठ गया.आशु उठी अपने कपडे ठीक किये और मेरे पास आ गई और मेरी बगल में बैठ गई. "कुछ नहीं होगा जानू! आप घबराओ मत!" उसने अपने बाएं हाथ को मेरे कंधे से ले जाते हुए खुद को मुझसे चिपका लिया.