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Incest अनैतिक संबंध

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लिंग धीरे-धीरे पूरा अंदर चला गया और आशु की बच्चेदानी से टकराया. अब मेरे लिंग को आराम मिल रहा था और मैं कुछ देर ऐसे ही आशु पर पड़ा रहा. इसी टाइम में आशु की योनी ने भी खुद को मेरे लिंग के नितुसार एडजस्ट कर लिया. दो मिनट बाद ही मेरे लिंग में ताक़त आ गई और मैंने धक्के मारने शुरू कर दिये. आज मेरे धक्कों में पहले के मुक़ाबले बहुत तीव्रता थी और हर धक्के के साथ आशु के स्तन हिल रहे थे. आशु ने अपने दोनों हाथों के नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिए थे जिससे मेरी गति और तेज हो चली थी. दस मिनट तक मैंने कस कर आशु को निचोड़ डाला था और हम दोनों ही पसीने से तर थे.पर दोनों में से कोई भी अभी तक झडा नहीं था. मैं बिना अपना लिंग आशु की योनी से निकाले आशु के बगल में लेट गया और उसे अपने ऊपर खींच लिया. आशु ने अपने हाथों से अपने बाल बांधे और तेजी से मेरे लिंग पर उछलने लगी. पाँच मिनट में वो तक गई और मेरे सीने पर सर रख कर साँस लेने लग गई. पर उसके रूकते ही जैसे मेरे लिंग ने उसकी योनी में फड़कना शुरू कर दिया था. मैंने अपने दोनों कूल्हे हवा में उठाये और नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिये. आशु के स्तन थोड़े लटक गए थे और वो मेरे हर धक्के के साथ हिल रहे थे. पाँच मिनट से ज्यादा मैं भी इस पोजीशन पर नहीं टिक पाया और तक कर अपने कूल्हे नीचे टिका दिये. हैरानी की बात ये थी की आशु और मैं दोनों अब भी टिके थे!

अब मैने आशु को अपने ऊपर से धकेल के दूसरी तरफ फेंक दिया और मैं बिस्तर से उठ खड़ा हुआ. जिस तरफ आशु के पाँव थे मैं उस तरफ पहुँचा और उसके पाँव पकड़ के उसे नीचे की तरफ खिंचा. आशु उठ के बैठ गई और उसकी नजरों के सामने मेरा लिंग लहरा रहा था. लिंग थोड़ा चमक रहा था क्योंकि उस पर आशु के योनी का रस लगा हुआ था. मुझे आगे आशु को कुछ कहना नहीं पड़ा और उसने गप्प से मेरा लिंग अपने मुँह में भर लिया. कुछ ही सेकंड में उसने अपने मुँह में थूक इकठ्ठा कर लिया और मेरा पूरा लिंग उसके गर्म थूक से नहा गया.आशु ने धीरे-धीरे मेरे लिंग को निगलना शुरू कर दिया. उसके मुँह की गर्माहट मेरे लिंग में हो रहे दर्द को आराम दे रही थी और मेरे हाथ अपने हाथ उसके सर पर आ चुका था.. धीरे-धीरे आशु मेरा पूरा लिंग अपने मुँह में ले गई और ये देख कर मेरी आँखों के आगे सुकून से भरा अँधेरा छा गया.अब आशु ने धीरे-धीरे अपने मुँह को मेरे लिंग पर आगे-पीछे करना शुरू कर दिया. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था और मैं आँखें बंद किये इस मजे का आनंद ले रहा था. मुझे तो अपनी कमर भी नहीं हिलानी पड रही थी क्योंकि आशु इतनी शिद्दत से मेरे लिंग को चूस रही थी. पाँच मिनट तक मैं उसके मुँह का आनंद अपने लिंग पर लेता रहा. फिर मैंने खुद ही लिंग बाहर निकाला और आशु को ऊँगली के इशारे से पलटने को कहा. आशु पलंग के ऊपर अपने घुटने मोड़ कर घोड़ी बन गई! मैंने अपने दाहिने हाथ की चार उँगलियों पर खूब सारा थूक निकाला और आशु की योनी में सारी उँगलियाँ एक साथ घुसा दि.आशु की योनी अंदर से गीली हो चुकी थी और मैंने अपने दोनों हाथों से आशु के दोनों नितंबो को पकड़ के एक दूसरे से दूर किया और उसकी योनी के छेद पर अपना लिंग टिका दिया. मैंने एक जोरदसार शॉट मारा और पूरा लिंग अंदर तक चीरता हुआ चला गया; "आह...हहहह…ममम...आअअ अ अ अ अ अ अ अ अह्ह्म्म मम ममममम" कर के आशु करहाने लगी. उसकी करहाने की आवाज सुन के मुझे थोड़ा होश आया और मैंने दायीं तरफ टेढ़ा हो कर उसके चेहरे की तरफ देखा तो वो गर्दन नीचे झुका कर सिसक रही थी.

मेरा लिंग तो पहले ही पूरा का पूरा उसकी योनी में समां चूका था तो मैंने उसकी पीठ पर झुक कर उसके दोनों स्तनों को पकड़ लिया और अपने दोनों हाथ से मींजने लगा. मेरा ऐसा करने से दस सेकंड में ही आशु का दर्द कम हो गया और उसने अपने कूल्हों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया. मैं उसका सिग्नल समझ गया और अपना लिंग धीरे से बाहर निकाला और फिर धीरे से अंदर पेल दिया. २-३ मिनट तक मैं ऐसे ही धीरे-धीरे धक्के मारता रहा पर आशु ने खुद कहा; "जानू!....स.स.स.स.स.स.स... तेज...और तेज!" उसकी बात मानते हुए मैंने अपनी रेल गाडी तेज कर दी और लिंग तेजी से अंदर पेलना शुरू कर दिया. मेरे धक्कों की रफ़्तार बहुत तेज हो गई थी; "अ.स.स.स.स.स्सा..अ.अ.अ.अ.हहह...नं.म.म.." की आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी थी. १० मिनट की ताबड़तोड़ ठुकाई और अब आशु की हालत खराब होने लगी थी. उसकी टांगें कांपने लगी थी और मेरे अगले धक्के के साथ ही वो बिस्तर पर पस्त हो कर गिर पडी. मेरा लिंग उसकी योनी से फिसल कर बाहर आ गया था पर लिंग की कसावट कम नहीं हुई थी. मैं बिस्तर वापस चढ़ा और आशु को पलट कर सीधा किया, वो बुरी तरह हाँफ रही थी पर झड़ी वो भी नहीं थी. पर मेरा लिंग इतना अकड़ चूका था की उसका दर्द कम ही नहीं हो रहा था. मैं आशु की टांगें चौड़ी की और अपना लिंग फिर से उसकी योनी में पेल दिया. अपनी कमर को फुल स्पीड से आगे-पीछे कर रहा था. मेरा लिंग तो जैसे आशु की योनी में अपनी जगह बना चूका था और बड़ी आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था. अगले २० मिनट मैंने आशु की फुल स्पीड ठुकाई की, आशु के मुँह से तो जैसे शब्द निकलने ही बंद हो गए थे. वो मेरे हर झटके के साथ बस हिल भर रही थी. २० मिनट बाद आशु के अंदर का ज्वालमुखी फटा; "आह..हहह...ननन...मममम..." करहाते हुए वो उठ के मेरे सीने से चिपक गई ताकि मैं और झटके ना मारु. पूरे एक मिनट तक वो चिपकी रही मुझसे और उसकी योनी से सारा रस बिस्तर पर टपक रहा था. पसीने से तरबतर हम दोनों एक दूसरे से चिपटे रहे, झड़ने के एक मिनट बाद आशु धड़ाम से वापस गिर गई. पर मेरे लिंग को चैन नहीं मिला था. मैंने इतनी तेजी से झटके मारने शुरू किये की पूरा पलंग हिलने लगा था और १० मिनट बाद मैं भी उस की योनी में झड़ गया और पस्त हो कर बगल में गिर गया.साँस इतनी तेज चल रही थी की पूछो मत, पसीने से हाल बुरा था और बेचारी आशु में तो जान ही नहीं बची थी वो तो बेसुध हो चुकी थी.
 
घडी में ३:३० बजे थे, मतलब हम करीबन १ घंटे भर से ताबड़तोड़ संभोग कर रहे थे! अब तो इतनी भी जान नहीं थी की उठ के अपना लिंग साफ़ कर सकू. आँखें कब बंद हुईं और कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला. सुबह ११ बजे नींद खुली जब भूख से पेट में 'गुर्रर' होने लगी. मैं उठा पर सर बहुत भारी था और आँखें तो जैसे खुल ही नहीं रही थी. मैंने उठ के आशु को देखा तो वो अब भी दोनों टांगें चौड़ी कर के पड़ी थी जैसे रात को मैंने उसे आखरी बार देखा था. मैंने उसका साँस चेक किया तो पाया की वो जिन्दा है!

मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेट गया, अपनी उँगलियों से आशु के बाएँ गाल को सहलाने लगा. उँगलियाँ सहलाते हुए मैं उसकी गर्दन तक ले आया और फिर धीरे-धीरे उस के स्तनों के ऊपर. आशु के दोनों स्तन लाल थे, मैंने आगे बढ़ कर आशु के दाएँ स्तन को मुंह में ले लिया और धीरे-धीरे प्यार से उसे चूसने लगा. मैं बहुत आहिस्ते-आहिस्ते आशु के स्तन को निचोड़ कर पी रहा था और अब आशु के जिस्म में हरकत शुरू हो गई थी. "उम्..ममम...हम्म्म...अह्ह..!!!" कराहते हुए उसने अपने दाएँ हाथ को मेरे सर पर रख दिया और अपनी उँगलियाँ मेरे बालों में फिरानी शुरू कर दी. मैं रूका और आशु की तरफ देखने लगा, उसकी आँखें अभी भी बंद थी. मैं ऊपर की तरफ आया और उसकी पलकों को धीरे से चूम लिया. फिर नीचे को आया और उसके अध् खुले अधरों को चूम लिया, तब जा कर आशु की आँख धीरे-धीरे खुली. आशु बहुत धीरे से बुदबुदाते हुए बोली; "जानू!" मुझे तो ऐसा लगा जैसे उसमें शक्ति ही नहीं बची कुछ बोलने की. मैं अपने बाएं कान को उसके होठों के पास ले गया, तब आशु बुदबुदाते हुए बोली; "जानू! सर दुःख रहा है! बदन टूट रहा हे." मैं समझ गया की मुझे क्या करना हे. मैं उठ के खड़ा हुआ और आशु को अपनी गोद में उठाया और उसे बाथरूम में ले आया. कमोड पर आशु को बिठाया और गर्म पानी का शावर चालु किया. जैसे ही गर्म पानी की बूँदें हमारे शरीर पर पड़ीं, जिस्म को चैन आया. आशु अब भी आँखें बंद किये हुए गर्दन पीछे किये हुए बैठी थी. पानी की बूँदें उसके चेहरे से होती हुई उसके स्तन पर गिर रही थी. धीरे-धीरे आशु की आँखें खुलीं और मुझे खुद को इस तरह देखते हुए वो शर्मा गई और मुस्कुराते हुए दूसरी तरफ मुँह कर लिया. मैंने अपने दाहिने हाथ से आशु की ठुड्डी को पकड़ के अपनी तरफ घुमाया, आशु ने अपनी आँखें मूँद ली थी और मुझे उस पर बहुत प्यार आ रहा था.

शर्म भी इक तरह की चोरी है…

वो बदन को चुराए बैठे हैं…

ये शेर सुन कर आशु ने आँखें खोलीं और बैठे-बैठे ही मेरी कमर को अपने हाथ से थाम लिया. "अच्छा मेरी जानेमन! अब आपको कैसा लग रहा है?" मैंने आशु से पूछा तो वो मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हुई और बोली; "बेहतर लग रहा हे." मैंने साबुन उठाया और अपने और आशु के ऊपर वाले बदन पर लगाया, नीचे लगाने के लिए जब मैं झुका तो उसने मुझे रोक लिया और खुद अपने और मेरी टांगों में साबुन लगाया. फिर उसने साबुन से मेरे लिंग को साफ़ किया और फिर अपनी योनी को.

अच्छे से नाहा-धो कर हम दोनों बाहर आये और अब काफी तरो-ताजा महसूस कर रहे थे. आशु की नजर जब बिस्तर पर पड़ी तो उसे जैसे रात का एक-एक वाक्य याद आ गया और वो खुद हैरानी से मुझे देखने लगी. उसे और मुझे खुद यक़ीन नहीं हो रहा था की कल रात को हम दोनों को आखिर हुआ क्या था जो हम संभोग के लिए इस तरह पागल हो गए थे.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैंने दरवाजा खोला तो बाहर निशा और अक्षय खड़े थे. हालाँकि मैंने उनका रास्ता रोका हुआ था पर फिर भी निशा मजाक-मजाक में मुझे अंदर की तरफ धकेलते हुए अंदर आ गई और बिस्तर की हालत देख कर अपने दाएँ हाथ से अपने माथे को पीटा.पीछे से अक्षय भी अंदर आ गया और मेरी पीठ थपथपाने लगा. मैं हैरानी से उसकी तरफ देख रहा था की तभी निशा बोली; "राज जी! आप तो सच्ची बड़े बेदर्दी हो! मेरी फूल सी दोस्त की रात भर में हालत ख़राब कर दी आपने?"

"इसका क्रेडिट मुझे जाता है?" अक्षय बड़े गर्व से बोला और हम तीनों उसकी तरफ देखने लगे.

"क्या मतलब?" निशा बोली.

"मैंने बारटेंडर से रोमांस ऑन दा रॉक्स बनाने को कहा था. उसने हमारी ड्रिंक्स में वायग्रा डाल दी थी." उसने हँसते हुए कहा, अब ये सुन कर तो मैंने अपना सर पीट लिया और मैं सोफे पर बैठ गया."मेरी और आपकी ड्रिंक्स में तो डबल डोज था!" उसने ठहाका मारते हुए कहा.

"तेरा दिमाग ख़राब है हरामी!" मैंने उसे डाँटते हुए कहा. "बावला हो गया है क्या? वियाग्रा कभी ड्रिंक्स के साथ लेते हैं? वो भी डबल डोज़?" मैंने उसे गुस्सा करते हुए कहा.

"सॉरी ब्रो! मैं तो बस मजे के लिए...."

"अबे काहे के मजे? तेरे मजे के चक्कर में बेचारी आशु बेहोश हो गई थी! साले उसे कुछ हो जाता न तो सोच नहीं सकता की मैं तेरा क्या हाल करता!" मैंने सोफे से उठते हुए अक्षय को आँखें दिखाते हुए कहा. तभी निशा मेरे पास आई और हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए बोली; "राज जी! माफ़ कर दो! मैं इसकी तरफ से आपसे माफ़ी मांगती हु." अब चूँकि आज उसका जन्मदिन था तो मैंने बस हाँ में गर्दन हिलाई और आशु की तरफ देखा जो डर के मारे गर्दन झुका कर खड़ी थी.

मैं चल कर आशु के पास पहुँचा और उसे गले लगा लिया, उसे बुरा लग रहा था की उसने ऐसे नासमझ दोस्त बनाये जिस के कारन आज मुझे इतना गुस्सा आया. "सॉरी राज जी! मेरा कोई गलत मकसद नहीं था.....आई एम एक्स्ट्रेमली सॉरी!” आशु की वजह से मैंने बात को ज्यादा नहीं खींचा और उसे माफ़ कर दिया. “लेट्स ऑर्डर सम ब्लॅक कॉफी; दिस हेडएक इज किलिंग मी!” सब ने ब्लैक कॉफ़ी के लिए हाँमि भरी और मैंने साथ में आलू के परांठे भी मंगाए.अब चूँकि हमारा कमरा पहले से ही तहस-नहस था तो हम अपना खाना ले कर निशा वाले कमरे में चले गये. उनका कमरा हमारे कमरे के ठीक उलट था. वहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक था. लग ही नहीं रहा था की वहाँ कोई ठुकाई हुई है! खेर मैंने इस बारे में कुछ नहीं कहा और सोफे पर बैठ के नाश्ता करने लगा. आशु ने टी.वी. पर गाने लगा दिए और हम चुप-चाप बैठ के खाने लगे. खाने के बाद नितु मैडम का फ़ोन आया और मैं उनका कॉल लेने के लिए बाहर चला गया.आज मैडम का मूड बिलकुल ऑफ था और वो काफी मायूस लग रही थी. मैंने पूछा भी पर उन्होंने टाल दिया और बात घुमा दी. मैंने उन्हें कुछ मेल फॉरवर्ड किये और एक लास्ट मेल में उन्हें सीसी करते हुए अंदर आया. मेरी नजर अब भी फ़ोन में थी और जब मैं अंदर घुसा तो निशा बोली; "क्या राज जी? यहाँ भी काम? यहाँ तो हम एन्जॉय करने आये हैं."

"ऑफिस का एक प्रोजेक्ट है, बीच में छोड़ के आया हूँ और ऊपर से आशु भी यहीं है! इसलिए कुछ मेल्स फॉरवर्ड करने थे!" मैंने कहा और फ़ोन जेब में रख कर वापस बैठ गया."तो आज कहाँ का प्रोग्राम है?" निशा ने मुझसे पुछा?

"यहाँ पर किले हैं देखने के लिए, जंतर मंतर है और हाँ जल महल भी हे." मैंने कहा तो निशा बोली; "किले देखने कल चलेंगे! कल रात की थकावट अब भी हे." हम तैयार हो के निकले और पहले जंतर-मंतर गये. आगे-आगे मैं और आशु थे एक दूसरे का हाथ थामे और पीछे अक्षय और निशा. अचानक से निशा आई और आशु के कंधे पर हाथ रख कर उसे मेरे से दूर ले गई. दोनों एक तरफ जा कर सेल्फी खींचने लगी. मैं अकेला था तो मैं चुपचाप चल रहा था और वहाँ जो कुछ लिखा था उसे पढ़ रहा था. तभी पीछे से अक्षय आ गया और मुझे कंपनी देते हुए वो भी पढ़ने लगा. दोनों लडकियां फोटो खींचते हुए बातें कर रहीं थी और मैं और अक्षय बेंच पर चुपचाप बैठे थे.

निशा: डॉली ....तू और मैं बेस्ट फ्रेंड्स हैं ना?

आशु: हाँ पर क्यों पुछा?

निशा: देख तू ने मेरे लिए इतना कुछ किया, अपने बॉयफ्रेंड के साथ यहाँ मेरा बर्थडे सेलिब्रेट करने आई और....और वो भी कितना अंडरस्टैंडिंग है! तेरी कितनी केयर करता है, तुझे कितना प्यार करता है!

आशु: क्यों अक्षय तुझे प्यार नहीं करता?

निशा: वो तो साला बावला है! कल देख कितना अच्छा मौका था. हरामखोर ने दो-दो वायग्रा खाईं पर साले ने कुछ किया ही नहीं?! कुत्ता मेरे से पहले ही झड़ गया और मैं बेचारी तड़पती रही! जब दुबारा इसका खड़ा हुआ तब मुझे उठाने आया तो मैंने भी इसकी नितंब पर लात मार दी, भोसड़ी का लिंग हिला कर सो गया रात को! पर तेरे तो मजे हैं! पूरी रात राज जी ने तेरी जी तोड़ कुटाई की! तेरा तो जीवन धन्य हो गया! काश की मुझे भी कोई ऐसा मिला होता!

आशु: अब मैं हूँ तो नसीब वाली पर तू मेरी किस्मत को नजर मत लगा! तू ऐसा कर छोड़ दे इस लड़के को!

निशा: वही तो नहीं कर सकती ना! ये साला बहुत पैसे वाला है और ऊपर से मेरे कण्ट्रोल में है, मेरी उँगलियों पर नाचता है ये!

इतना कह कर निशा कुछ सोचने लगी और फिर बोली;

निशा: सुन? ..... आज मेरा बर्थडे है....मैं अगर तुझसे कुछ माँगू तो तू मना तो नहीं करेगी?

आशु: यार मेरे पास है ही क्या तुझे देने को?

निशा: नहीं तू दे सकती हे.

आशु: अच्छा? चल बोल क्या चाहिए मेरी दोस्त को? (आशु ने निशा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.)

निशा: मुझे बस आज की रात राज जी के साथ गुजारनी हे.

ये सुनते ही आशु के जिस्म में आग लग गई. उसने जो हाथ अभी तक निशा के कंधे पर रखा था वो झटके से हटाया और उसे जोर से धक्का देते हुए बोली;

आशु: तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की?

निशा: देख प्लीज...तू...

आशु: (बीच में बात काटते हुए) मुझे कुछ नहीं सुनना, तेरी गन्दी नियत मुझे आज पता चल गई. आज के बाद मुझे कभी अपनी शक्ल मत दिखाइओ और खबरदार जो तू उनके आस-पास भी भटकी तो, जान ले लूँगी तेरी!

निशा: अरे सुन तो सही....

पर आशु रुकी नहीं और मुझे ढूंढते हुए तेजी से एग्जिट गेट पर पहुँच गई. मैं और अक्षय वहीँ खड़े थे और बात कर रहे थे. मेरी नजर अब तक आशु पर नहीं पड़ी थी;

अक्षय: ब्रो... हेल्प मी .... निशा मुझसे पटती ही नहीं! कल रात भी मैंने उसी के चक्कर में सब को वायग्रा खिलाई थी पर हरमजादी ने मुझे रात में छूने भी नहीं दिया. कुछ तो बताओ मैं क्या करूँ?

मैं: देख ... पहली बात तो ये जो तू अमेरिकन एक्सेंट बकता है इसे बंद कर, तू कतई इसमें बावला लगता है! देसी है देसी बन! उसे ये तेरा अमेरिकन गैंगस्टर लुक नहीं चाहिए... मॉडर्न होना ठीक है पर इतना भी नहीं की गधा दिखो.

अभ हमारी इतनी ही बात हुई थी की रोती-बिलखती आशु मेरे पास आई और मैं उसे इस तरह रोता हुआ देख समझ नहीं पाया की वो रो क्यों रही है; "चलो आप! हम अभी घर जा रहे हैं." इतना कह कर वो मुझे खींच कर बाहर ले आई. मैंने कई बार उससे पूछा की बात क्या है पर वो कुछ नहीं बोली और हम सीधा होटल पहुंचे. कमरे में घुसते ही उसने सामान समेटना शुरू कर दिया. "जान! बताओ तो सही हुआ क्या?" मैंने आशु से प्यार से पूछा.

ये सुनते ही आशु गुस्से में बोली; "वो कुतिया कह रही थी की उसे आपके साथ सोना है!" ये सुनते ही मुझे भी बहुत गुस्सा आया और इससे पहले की मैं कुछ बोलता आशु ही बोल पड़ी; "गलती सारी मेरी ही थी. मुझे भी पता नहीं किस कुत्ते ने काटा था की मैंने इसे अपना दोस्त बनाया.आपने इतना समझाया था की दोस्त चुन कर बनाना और मुझे यही कामिनी मिली. ये तो गनीमत है की मैंने इसे हमारे बारे में कुछ भी सच नहीं बताया वरना ये तो मुझे आज ब्लैकमेल कर के आपके साथ सब कर लेती. अच्छा हुआ जो मुझे इस हरामजादी के रंग पहले ही पता चल गये." इतना कहते हुए आशु पलंग पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा कर रोने लगी. मैं आशु के सामने घुटनों के बल खड़ा हुआ और उसे चुप कराया."बस मेरी जान! चलो कपडे पैक करो हम अभी चेकआउट करते हैं." हम अभी लॉबी में पहुँचे थे की वहाँ अक्षय और निशा मिल गये. निशा ने अक्षय से कुछ भी नहीं कहा था. मेरे हाथ में बैग देखते ही वो समझ गई की क्या माजरा हे. उसने फिर से आशु को रोकने की कोशिश की, इधर मैं रिसेप्शन पर अपने रूम का चेकआउट करवा रहा था. "क्या हुआ ब्रो?" अक्षय ने पूछा.

"गो अँड आस्क निशा!" मैंने कहा.

"शी इज नॉट टेलींग मी शीट!" उसने जवाब दिया पर मैं आगे कुछ नहीं बोला और अपने रूम की सारी पेमेंट कर दी. उधर निशा ने आशु का हाथ पकड़ा हुआ था और उसे रोक रही थी; "यार बात तो सुन!" निशा ने मिन्नत करते हुए कहा. आशु ने बड़े जोर से उसका हाथ झटक दिया और बोली; "स्टे अवे फ्रॉम मी!" इतना कह कर वो तेजी से चल के मेरे पास आई. रिसेप्शन पर जो कोई था वो सब उन दोनों को ही देख रहे थे. बाहर से ऑटो किया और हम बस स्टैंड पहुँचे पर पूरे रास्ते आशु ने मेरा हाथ थामा हुआ था. उसका सर मेरे कंधे पर था. बस स्टैंड पहुँच कर पता चला की अगली बस एक घंटे बाद की है, अब भूख लग आई थी पर आशु बहुत-बहुत उदास थी. जब मैंने उससे कहा की मैं कुछ खाने को लाता हूँ तो वो इस कदर घबरा गई जैसे मैं उसे छोड़के निशा के पास जा रहा हु. आशु मेरे सीने पर सर रख कर बैठी रही और मैं बस उसके सर पर हाथ फेरता रहा. बस आई और हम दोनों बैठ गए, आशु ने अपना फ़ोन निकाला और निशा और अक्षय का नंबर ब्लॉक कर दिया. उसके साथ खींची हर फोटो को उसने डिलीट कर दिया. ऐसा करने से उसे ऐसा लग रहा था मानो की उसने निशा को अपनी जिंदगी से निकाल फेंका हे.

बस आधे रास्ते पहुँची थी. रात के ८ बजे थे तो मैं आशु को अपने साथ ले कर नीचे उतरा और उसे खाने को कुछ कहा. उसके लिए मैंने परांठे मंगाए और मैंने बस एक चिप्स का पैकेट लिया. खाना खा कर हम वापस अपनी सीट पर बैठ गए, आशु ने अपना सर मेरे सेने पर रख दिया था और अपनी बाहें मेरी कमर के इर्द-गिर्द कस ली थी.

मैं: जान! क्यों परेशान हो आप? मैं आपके पास हूँ ना?

आशु: आपको खो देने से डर लगता हे.

मैं: ऐसा कभी नहीं होगा.

अब मुझे कैसे भी कर के आशु की बेचैनी मिटानी थी;

मैं: अच्छा एक बात तो बताओ आप ये रिंग हमेशा पहने रहते हो?

आशु: सिर्फ हॉस्टल के अंदर नहीं पहनती वरना आंटी जी पूछती.

आशु ने बड़े बेमन से जवाब दिया.

मैं: हाई! .... जान! अच्छा एक बात बताओ?

आशु: हम्म

मैं: शादी कब करनी है?

ये सुनते ही आशु की आँखें चमक उठीं और वो मेरी तरफ आस भरी नजरों से देखने लगी.

आशु: आप .... सच?

मैं: मैंने आपको प्रोपोज़ कर दिया और तो और हम दोनों ...यू नो ... बहुत क्लोज आ चुके हैं तो अब बस शादी करना ही रह गया हे.

आशु: (खुश होते हुए) मेरे फर्स्ट ईयर के पेपर हो जाएँ फिर.

मैंने आशु के माथे को चूम लिया और अब आशु की खुशियाँ लौट आईं थी. मैंने आशु से उसका दिल खुश करने को कह तो दिया था पर ये डगर बहुत कठिन थी. मेरे दिमाग बस यही सोच रहा था की कहीं से मुझे कोई ट्रांसफर का ऑप्शन मिल जाए ताकि मैं आशु का कॉलेज कॉरेस्पोंडेंस/ ओपन में ट्रांसफर कर दूँ जिससे उसकी पढ़ाई बर्बाद ना हो. आखरी ऑप्शन ये था की मैं उसकी पढ़ाई छुड़ा दूँ और जब हम दोनों शादी कर के सेटल हो जाएँ तब वो फिर से अपनी पढ़ाई शुरू करे, पर उसमें दिक्कत ये थी की उसे फर्स्ट ईयर से शुरू करना पडता. यही सब सोचते हुए मैं जगा रहा और रात के सन्नाटे में गाड़ियों को दौड़ते हुए देखता रहा.

रात २ बजे बस ने हमें लखनऊ उतारा, मैंने कैब बुक की और हम घर आ गये. मैंने सामान रखा और आशु बाथरूम में घुस गई. इधर मुझे भूख लग रही थी तो मैंने मैगी बनाई और तभी आशु बाहर आ गई. "मैं भी खाऊँगी!" कहते हुए आशु ने मुझे पीछे से कस कर जकड़ लिया. उसने अभी मेरी एक टी-शर्ट पहनी थी और नीचे एक पैंटी थी बस! मैंने अभी कपडे नहीं उतारे थे, आशु ने पीछे से खड़े-खड़े ही मेरी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिये. फिर वो अपना हाथ नीचे ले गई और मेरी पैंट की बेल्ट खोलने लगी. धीरे-धीरे उसे भी खोल दिया. अब उसने ज़िप खोली और फिर बटन खोला. पैंट सरक कर नीचे जा गिरी, मैं आशु का ये उतावलापन देख रहा था और मुस्कुरा रहा था. आखरी में उसने मेरी कमीज भी निकाल दी और अब बस एक बनियान और कच्छा ही बचा था. उसका ये उतावलापन मेरे अंदर भी आग लगा चूका था. मैंने गैस बंद की और आशु को गोद में उठा कर उसे बिस्तर पर लिटाया.अपनी बनियान निकाल फेंकी और आशु के ऊपर छा गया.आशु ने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को पकड़ा और मेरे होठों को अपने होठों से मिला दिया. मैंने अपनी जीभ उसके मुह में प्रवेश कराई थी की उसने मुझे धक्का दिया और खुद मेरे पेट पर बैठ गई. अपने निचले होंठ और जीभ के साथ उसने मेरे ऊपर वाले होंठ को अपने मुँह भर लिया. इधर मैंने उसकी टी-शर्ट के अंदर हाथ डाल दिया और उसके स्तनों को धीरे-धीरे मींजने लगा. वो मुलायम एहसास आज मुझे पहली बार इतना सुखदाई लग रहा था. मन कर रहा था की कस कर उन्हें दबोच लूँ और उमेठ लूँ पर आज मैं अपने प्यार को दर्द नहीं प्यार देना चाहता था. दो मिनट में ही आशु की योनी गीली हो गई और मुझे उसका गीलापन अपने पेट पर उसकी पैंटी से महसूस होने लगा. वो अब भी बिना रुके मेरे होठों का रस पान करने में व्यस्त थी. उसके हाथों का दबाव मेरे चेहरे पर बढ़ने लगा था. मैंने आशु को धीरे-धीरे अपने मुँह से दूर करना चाहा पर वो तो जैसे मेरे होठों को छोड़ना ही नहीं चाहती थी. बड़ी मुश्किल से मैंने उससे अपने होंठ छुड़ाए और उसकी आँखों में देखा तो मुझे एक ललक नजर आई. उस ललक को देख मेरा मन बेकाबू होने लगा और इधर आशु के जिस्म में तो संभोग की आग दहक चुकी थी. उसने खड़े हो कर अपनी पैंटी निकाल फेंकी और धीरे-धीरे मेरे लिंग पर बैठने लगी. पहले के मुकाबले आज लिंग धीरे-धीरे अंदर फिसलता जा रहा था. आशु जरा भी नहीं झिझकी और धीरे-धीरे और पूरा का पूरा लिंग उसने अपनी योनी में उतार लिया. शायद कल की जबरदस्त ठुकाई के बाद उसकी योनी मेरे लिंग की आदि हो चुकी थी! पूरा लिंग जड़ तक समां चूका था और आशु बस गर्दन पीछे किये चुप-चाप बैठी थी. दस सेकंड बाद उसने अपनी कमर को घूमना शुरू कर दिया. अब ये मेरे लिए पहली बार था. अंदर से ऐसा लग रहा था जैसे मेरा लिंग आशु की योनी की दीवारों से हर जगह से टकरा रहा हे. फिर पांच सेकंड बाद आशु ने अपनी कमर को उलटी दिशा मे घुमाना शुरू कर दिया. मुझे अब इसमें भी मजा आने लगा था. फिर आशु रुकी और मेरा दोनों हाथ पकड़ के सहारा लिया और उकडून हो कर बैठ गई और मेरे लिंग पर उठक-बैठक शुरू कर दी. लिंग पूरा बाहर आता, बस टिप ही अंदर रहती और फिर आशु झटके से नीचे बैठती जिससे पूरा का पूरा लिंग एक बार में सट से अंदर घुसता.पर बेचारी दो मिनट भी उठक-बैठक नहीं कर पाई और मेरी छाती पर सर रख कर लेट गई. मैंने अपने दोनों हाथो को उसकी कमर पर कसा और अपने कूल्हे हवा में उठाये और जोर-जोर से धक्के नीचे से लगाने शुरू कर दिये. "ससस..आह...हहह.ह.ह.ह.हह.ह.मम..म..उन्हक!" आशु की आवाजें कमरे में गूंजने लगी. जब आशु मेरे लिंग पर उठक-बैठक कर रही थी तब उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी क्योंकि वो बहुत धीरे-धीरे कर रही थी पर अभी जब मैंने तेजी से उसकी योनी ठुकाई की तो वो सिस्याने लगी थी. पांच मिनट तक पिस्टन की तरह मेरा लिंग आशु की योनी में अंदर-बाहर होने लगा था. आशु ने अपने दाँतों को मेरी कालर बोन में धंसा दिया था. मैंने आसन बदला और आशु के नीचे ले आया और खुद पलंग से नीचे उतर कर खड़ा हो गया.मैंने आशु को खींचा उसकी दोनों टांगों के बीच खड़ा हुआ और आशु की कमर बिलकुल बेड के किनारे तक ले आया. फिर धीरे से अपना लिंग उसकी योनी से भिड़ा दिया और धीरे-धीरे अंदर दबाने लगा. लिंग पूरा का पूरा अंदर चला गया और मैं आशु के ऊपर झुक गया.उसके होठों को चूमा और उसकी आँखों में देखने लगा पर पता नहीं कैसे आशु समझ गई की मैं क्या चाहता हु. "जानू! फुल स्पीड!" इतना कह कर वो मुस्कुरा दी और उसकी ये बात मेरे लिए उस हरी झंडी की तरह थी जो किसी रेस कार को दिखाई जाती हे. उसके बाद तो मैंने जो ताक़त लगा कर आशु की योनी में लिंग अंदर-बाहर पेला की उसका पूरा जिस्म हिल गया था. आशु के हाथ बिस्तर को पकड़ना चाहते थे की कहीं वो गिर ना जाये पर मेरी रफ़्तार इतनी तेज थी की वो कुछ पकड़ ही नहीं पाई और अगले दस मिनट बाद पहले वो झड़ी और फिर मैं.

झड़ते ही मैं आशु पर जा गिरा और उसने अपनी टांगों को मेरी कमर पर कस लिया, साथ ही अपने हाथों से मेरी गर्दन को लॉक कर दिया. कल रात के बाद ये दूसरा मौका था जब आशु ने मेरा साथ इतनी देर तक दिया था. करीब पाँच मिनट बाद जब दोनों की साँसे दुरुस्त हुईं तो हम अलग हुए और अलग होते ही लिंग आशु की योनी से फिसल आया. लिंग के साथ ही आशु के योनी में जमी मलाई भी नीचे टपकने लगी. मैं भी आशु की बगल में उसी की तरह टांगें लटकाये हुए लेट गया.पहले आशु उठी और जा कर बाथरूम में मुँह-हाथ धो कर आई और फिर मैं उठा. हमने किचन काउंटर पर खड़े-खड़े ही सूख कर अकड़ चुकी मैगी खाई. आशु ने बर्तन धोने चाहे तो मैंने उसे मना कर दिया. उसने फर्श पर से हमारी मलाई साफ़ की और हम दोनों बिस्तर पर लेट गये. सुबह के ४ बजे थे और अब नींद बहुत जोर से आ रही थी. मैं और आशु एक दूसरे से चिपक कर सो गये.

सुबह के ६ बजे आशु बाथरूम जाने को उठी और मेरी भी नींद तभी खुली पर मन नहीं किया की उठूँ. इसलिए मैं सीधा हो कर लेट गया, जब आशु बाथरूम से निकली तो उसकी नजर मेरे मुरझाये हुए लिंग पर पडी. वो बिस्तर पर चढ़ी और मेरी टांगों के पास बैठ गई. मेरी आँख लग गई थी पर जैसे ही आशु ने मेरे लिंग को अपने मुँह में लिया मैं चौंक कर उठा और आशु को देखा तो वो आज बड़ी शिद्दत से मेरे लिंग को चूस रही थी. मेरे सुपाडे को वो ऐसे चूस रही थी जैसे की वो कोई टॉफी हो. अपनी जीभ से वो मेरे पूरे सुपाडे को चाट रही थी और उसके ऐसा करने से मेरे जिस्म के सारे रोएं खड़े हो चुका था.. मैंने अपने हाथों को आशु के सर पर रख दिया और उसे नीचे दबाने लगा. आशु समझ गई और उसने मेरे लिंग को धीरे-धीरे अपने मुँह में उतारना शुरू कर दिया. ५ सेकंड में ही मेरा पूरा लिंग उसके मुँह में उतर गया और आशु ऐसे ही रुकी रही. मेरी तो हालत खराब हो गई. उसकी गर्म सांसें और मुँह की गर्माहट मेरे लिंग को आराम दे रही थी. अब आशु घुटनों के बल बैठी और अपने मुँह को मेरे लिंग के ऊपर अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया. वो जब मुँह नीचे लाती तो लिंग जड़ तक उसके गले में उतर जाता और फिर जब वो अपने मुँह को ऊपर उठाती तो बिलकुल सुपाडे के अंत तक अपने होठों को ले जाती. उसकी इस चुसाई के आगे मैं बस पॉँच मिनट ही टिक पाया और अपना गाढ़ा-गाढ़ा वीर्य उसके मुँह में उगल दिया. मुझे हैरानी तो तब हुई जब वो मेरा सारा का सारा वीर्य पी गई और मैं आँखें फाड़े उसे देख रहा था. वो मुझे देख कर मुस्कुराई और फिर बाथरूम चली गई. मैं उठ कर बैठ गया और दिवार से टेक लगा कर बैठ गया, सुबह से आशु के इस बर्ताव से मेरे जिस्म में खलबली मच चुकी थी. आशु ठीक वैसे ही संभोग में मेरा साथ दे रही थी जैसा मैं चाहता था. जब आशु मुँह धो कर आई तो मेरी जाँघ पर सर रख कर लेट गई;
 
मैं: जान! एक बात तो बताओ? ये सब कहाँ से सीखा आपने?

आशु: (जान बुझ कर अनजान बनते हूये.) क्या?

मैं: (उसकी शरारत समझते हूये.) ये जो आपने गुड मॉर्निंग कराई अभी मेरी वो? और जो आप इतनी देर तक मेरे साथ टिके रहे वो? आपका संभोग में खुल कर पार्टिसिपेट करना वो सब?

आशु: लास्ट टाइम आपने मुझे डाँटा था ना, तो मुझे एहसास हुआ की अगर मैं आपको खुश न रख सकूँ तो लानत है मेरे खुद को आपकी पत्नी कहने पर. इसलिए उस कुतिया से मैंने बात की और उसे कहा की मैं अपने बॉयफ्रेंड को खुश नहीं कर पाती.तो उसने मुझे बहुत सारी अश्लील वीडियो दिखाई, इतनी तो शायद आपने नहीं देखि होगी!

ये सब बताते हुए आशु बहुत उत्साहित थी और मैं उसके इस भोलेपन को देख मुस्कुरा रहा था.

आशु: बाकी रहा मेरा वो सेल्फ कण्ट्रोल....तो उसके लिए मैंने बहुत एफर्ट किये! मस्टरबैशन बंद किया... थोड़ा योग भी किया...

ये कहते हुए वो हँसने लगी और मेरी भी हँसी निकल गई. सच्ची आशु बहुत ही भोलेपन से बात करती थी...

आशु: मैंने न....वो.... किंकी वाली वीडियो भी देखि.... बहुत मजा आया.... पर वो सब शादी के बाद!

इतने कह कर वो शर्मा गई और मेरी नाभि से अपना चेहरा छुपा लिया और कस के लीपट गई. मैं उसके सर पर हाथ फेरने लगा और हम दोनों ऐसे ही सो गये. हम ११ बजे उठे और अब बड़ी जोर से भूख लगी थी. मैंने आशु से पूछा की क्या वो भुर्जी खायेगी तो उसने हाँ कहा और नहाने चली गई. अब चूँकि उसने कभी अंडा पकाया नहीं था इसलिए मैंने ही भुर्जी बनाई. जब आशु नहा कर आई तो पूरे कमरे में भुर्जी की खुशबु भर गई थी. आशु ने अभ भी मेरी एक टी-शर्ट पहनी हुई थी और नीचे अपनी पैंटी. वो चल कर मेरे पास आई और मैंने उसे ब्रेड से एक कौर खिलाया. पहला कौर खाते ही उसकी आँखें चौड़ी हो गईं और वो बोली; "वाव!!!" उसकी ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी. "मैंने उस दिन कहा था ना की मेरे हाथ की भुर्जी खाओगी तो याद करोगी!" मैंने आशु को वो दिन याद दिलाया. "आज से आप जो कहोगे वो हर बात सागरंगी." आशु ने कान पकड़ते हुए कहा. फिर हमने डट के भुर्जी खाई और लैपटॉप में मूवी देखने लगे.

शाम हुई तो आशु ने चाय बनाई और मैं उसे ले कर छत पर आ गया.छत पर टंकियों के पीछे थोड़ी जगह थी जहाँ मैं हमेशा बैठा करता था. वहाँ से सारा शहर दिखता था और रात होने के बाद तो घरों की छोटी-छोटी टिमटिमाती रौशनी देख के मैं वहीँ चुप-चाप बैठ जाय करता था.अंधेरा होना शुरू हुआ था और हम दोनों वहाँ बैठे थे, आशु का सर मेरे कंधे पर था और वो भी चुप-चाप थी. "हम बैंगलोर में भी ऐसा ही घर लेंगे जहाँ से सारा शहर दिखता हो. एक बालकनी जिसमें छोटे-छोटे फूल होंगे, रोज वहीँ बैठ कर हम चाय पीयेंग.| जब कभी लाइट नहीं होगी तो हम वहीँ सो जाएंगे, एक छोटा सा डाइनिंग टेबल जहाँ रोज सुबह मैं आपको नाश्ता ख़िलाऊँगी, हमारा बैडरूम जिसमें एक रोशनदान हो और सुबह की पहली किरण आती हो. हमारे प्यार की निशानी के लिए एक पालना... " आशु बैठे-बैठे हमारे आने वाले जीवन के बारे में सब सोच चुकी थी और सब कुछ प्लान कर चुकी थी.

"वैसे तुम्हे लड़का चाहिए या लड़की?" मैंने पूछा.

"लड़का... और आपको?" आशु ने मुझसे पूछा.

"लड़की.. जिसका नाम होगा 'साक्षी'." मैंने गर्व से कहा.

"और लड़के का नाम?"

"अनुज"

"आपने तो सब पहले से ही सोच रखा है?" आशु ने खुश होते हुए कहा.

हम दोनों वहीँ बैठे रहे और जब रात के नौ बजे तब नीचे आये. आशु ने रात का खाना बनाया और ठीक ग्यारह बजे हम खाना खाने बैठ गये. आशु मुझे अपने हाथ से खिला रही थी. पर जब मैंने उसे खिलाना चाहा तो उसने १-२ कौर ही खाये. खाने के बाद उसने बर्तन धोये और हम लैपटॉप पर मूवी देखने लगे. मूवी में एक हॉट सीन आया और उसे देख कर आशु गर्म होने लगी. उसका हाथ अपने आप ही मेरे लिंग पर आ गया और वो मेरे बरमूडा के ऊपर से ही उसे मसलने लगी. आशु के छूने से ही मेरे जिस्म में जैसे हलचल शुरू हो चुकी थी. पहले तो मैं खुद को अच्छे से कण्ट्रोल कर लिया करता था पर पिछले दो दिनों से मेरा खुद पर काबू छूटने लगा था. मैंने लैपटॉप पर मूवी बंद कर दी और गाना चला दिया; "दिल ये बेचैन वे!" आशु मुस्कुरा दी और मुझे नीचे धकेल कर मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे होठों को अपने मुँह में ले कर चूसने लगी. आज वो बहुत धीरे-धीरे मेरे होठों को चूस रही थी और इधर मेरी धड़कनें बेकाबू होने लगी थी. मुझसे आशु का ये स्लो ट्रीटमेंट बरदाश्त नहीं हो रहा था. इसलिए मैंने उसे पलट कर अपने नीचे किया. फिर नीचे को बढ़ने लगा पर आशु ने मुझे नीचे नहीं जाने दिया. उसने ना में गर्दन हिलाई और मुझे उसकी योनी को चूसने नहीं दिया. मेरा बरमूडा उसने नीचे किया पर पूरा निकाला नहीं, लिंग हाथ में पकड़ उसने अपनी पैंटी सामने से थोड़ा सरकाई और मेरे लिंग पकड़ कर उसने अपनी योनी से स्पर्श करा दिया. मैंने अपनी कमर पीछे को की और धीरे से एक झटका मारा और मेरा सुपाड़ा आशु की योनी में दाखिल हो गया.आशु ने अपने दोनों हाथों से मेरे कन्धों को पकड़ लिया, मैंने फिर से कमर पीछे की और अपना लिंग जितना अंदर डाला था वो बाहर निकाल कर फिर से अंदर पेल दिया. इस बार लिंग आधा अंदर चला गया, आशु के मुँह से सिसकारी निकली; "सससससस स.स..आअह!!!" मैंने एक आखरी झटका मारा और पूरा लिंग अंदर चला गया ठीक उसी समय गाने की लाइन आई;

सावन ने आज तो, मुझको भिगो दिया...

हाय मेरी लाज ने, मुझको डुबो दिया...

सावन ने आज तो, मुझको भिगो दिया...

हाय मेरी लाज ने, मुझको डुबो दिया...

ऐसी लगी झड़ी, सोचूँ मैं ये खड़ी...

कुछ मैंने खो दिया. क्या मैंने खो दिया...

चुप क्यूँ है बोल तू...

संग मेरे डोल तू...

मेरी चाल से चाल मिला...

ताल से ताल मिला...

ताल से ताल मिला...

इस दौरान में बस आशु को टकटकी बांधे देखता रहा और ऐसा महसूस करने लगा जैसे वो अपने दिल की बात कह रही हो. आशु ने जब नीचे से अपनी कमर हिलाई तब जा कर मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार पकडी. कुछ ही देर में मेरे हिस्से की लाइन आ गई;

माना अनजान है, तू मेरे वास्ते...

माना अनजान हूँ, मैं तेरे वास्ते...

मैं तुझको जान लूं, तू मुझको जान ले....

आ दिल के पास आ, इस दिल के रास्ते...

जो तेरा हाल है...

वो मेरा हाल है...

इस हाल से हाल मिला...

ताल से ताल मिला हो, हो, हो...

इन लाइन्स को सुन आशु बस मुस्कुरा दी और मैंने इस बार बहुत तेज गति से उसकी योनी में लिंग पेलना शुरू कर दिया. अगले दस मिनट तक एक जोरदार तूफ़ान उठा जिसने हम दोनों के जिस्मों को निचोड़ना शुरू कर दिया और जब वो तूफ़ान थमा तो हम दोनों एक साथ झड़ गये. आशु की योनी एक बार फिर मेरे वीर्य से भर गई और मैं उस पर से हट कर दूसरी तरफ लेट गया.आशु ने मेरी तरफ करवट की और अपना दायाँ हाथ मेरे सीने पर रख कर सो गई. नींद तो मुझे भी आने लगी थी और फिर एक खुमारी सी छाई जिससे मैं भी चैन से सो गया.

आज शनिवार का दिन था. सुबह मैं जल्दी उठ गया पर आशु अब भी मुझसे चिपकी हुई थी. मैंने घडी देखि तो सुबह के ६ बजे थे.मैंने धीरे से अपने आप को आशु से छुड़ाना चाहा तो आशु भी जाग गई. "सॉरी जान!" मैंने उसे जगाने के लिए माफ़ी मांगी तो मुस्कुराने लगी. उसकी मुस्कराहट देख मेरी मॉर्निंग और भी गुड हो गई. मैंने उसके माथे को चूमा और उठ के बाथरूम में घुस गया.जब वापस आया तो आशु चाय बना रही थी. चाय छान कर उसने मुझे बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए दी और फिर खुद बाथरूम चली गई. फ्रेश हो कर आई तो मैं अब भी कप थामे उसके आने का इंतजार कर रहा था. वो भी समझ गई और हम दोनों अपनी-अपनी चाय लिए खिड़की के पास खड़े हो गये. आशु मेरे आगे थी. और हम दोनों के दाहिने हाथों में हमारे कप थे. मेरा बायाँ हाथ आशु के पेट पर था और आशु ने भी अपने बाएँ हाथ से मेरे हाथ को पकड़ रखा था. "काश की हम हर रोज इसी तरह खड़ा हो कर चाय पीते?" आशु बोली, मैंने आशु के सर को पीछे से चूम लिया. "वो दिन भी आयेगा." मैंने जवाब दिया तो आशु ने उत्सुकता वश पूछा; "कब?" अब मैं इसका जवाब नहीं जानता था पर फिर भी मैंने आशु को आस बंधाते हुए कहा; "जल्द" इसके आगे उसने और कुछ नहीं कहा और हम दोनों इसी तरह खड़े खिड़की से बाहर पेड़ों को देखते रहे. आज बरसों बाद मुझे सुबह की ठंडी हवा सुकून दे रही थी.

कुछ देर ऐसे ही खड़े रहने के बाद मुझे याद आया की हमें तो गाँव भी जाना है? "आशु... आज गाँव चलें?" मैंने आशु से संकुचाते हुए पूछा. तो वो मेरी तरफ पलटी और ऐसे देखने लगी जैसे की मैंने उससे कहा हो की मैं सरहद पर जा रहा हूँ?! "घर वालों को शक न हो इसलिए कह रहा हु." मैंने आशु के दाएँ गाल पर आई उसकी लट को ऊँगली से हटाते हुए कहा. "आपसे दूर जाने को मन नहीं करता." आशु ने सर झुकाते हुए कहा. मैंने आशु को कस कर अपने सीने से लगा लिया; "मेरी जानेमन! बस कुछ दिनों की तो बात हे. फिर मैं आपके साथ आज का दिन और कल का दिन वहीँ रुकूँगा और सोमवार को मैं वापस आ जाऊंगा."

"और मेरा क्या? मुझे कब 'भिगाणे' आओगे?" आशु ने मेरे सीने से अलग होते हुए शर्माते हुए पूछा. पर जब उसने 'भिगाणे' शब्द का इस्तेमाल किया तो मेरे चहरे पर मुस्कुराहट आ गई.

"बुधवार को अपनी दुल्हनिया को भिगाणे आएंगे उसके साजना." मेरा जवाब सुन आशु बुरी तरह शर्मा गई और कस कर मेरे सीने से चिपक गई.

"एक बात पूछूँ? अगर सब कुछ नार्मल होता, आई मीन ... की हम एक परिवार के ना होते, तो आप मेरा हाथ घरवालों से कैसे माँगते?" आशु का सवाल सुन में कुछ सोच में पड़ गया.फिर मुझे कुछ याद आया और मैंने फ़ोन में एक वीडियो प्ले की, फिर आशु के सामने अपने एक घुटने पर बैठ गया;

स्याटर्डे मॉर्निंग जम्प आऊट ऑफ बेड अँड पुट ऑन माई बेस्ट स्युट...

गोट इन माई कारअँड रेस लाईक अ जेट, ऑल दीं वे टू यू

नौक ऑन योवर डूऑर विद हार्ट इन माई ह्यांड

टू आस्क यू अ क्वशन

"कौज आई नो दॅट यू आर अन ओल्ड फॅशन मेन हा... हा... हा..."

"कॅन आई ह्याव योवर डॉटर फॉर दीं रेस्ट ऑफ माई लाइफ?" से येस.....से येस...!!!

कौज आई निड टू नो

यू से आई विल्ल नेवर गेट योवर ब्लेसिंग टील दीं डे आई डाई

"टफ लक माई फ्रेंड .... बट दीं आंसर इज नो!"

व्हाय यू गोटा बी सो रूढ?

डोन्ट यू नो आई एम ह्यूमन टू

व्हाय यू गोटा बी सो रूढ

आई एम गोना म्यारी हर एनी वे

म्यारी हर एनी वे

हा नो मॅटर व्हॉट यूसे

अँड वुई विलबी अ फॅमिली

ये सुनते ही आशु खिलखिला कर हँस पडी. पर गाने की जब अगली लाइन्स आईं तो आशु आँखें फाड़े मुझे देखने लगी;

आई हेट टू डू दिस, यू लिव्ह नो चॉइस

आई कान्ट लिव्ह वीदाऊट हर

लव मी ऑर हेट मी वी विल् बी बॉय

स्टँडिंग एट दॅट अल्टर

ऑर वी विल् रन अवे

टू अनादर ग्यालेक्सी यू नो

यू नो शी इज इन लव विदमी

शी विल् गो एनीव्हेअर आई गो

कॅन आई ह्याव योवर डॉटर फॉर दीं रेस्ट ऑफ माई लाइफ? से येस, से येस

'कौज आई निड टू नो

यू से आई विल्ल नेवर गेट योवर ब्लेसिंग टील दीं डे I डाई

टफ लक माई फ्रेंड कौज दीं आंसर इज स्टील नो!

व्हाय यू गोटा बी सो रूढ?

डोन्ट यू नो आई एम ह्यूमन टू

व्हाय यू गोटा बी सो रूढ

आई एम गोना म्यारी हरएनी वे

म्यारी दॅट गर्ल, म्यारी हरएनी वे

म्यारी दॅट गर्ल,हा नो मॅटर व्हॉट यूसे

म्यारी दॅट गर्ल, अँड वुई विलबी अ फॅमिली…..

ये सुन कर आशु ने मुझे गले लगा लिया, मेरा मुँह उसके पेट पर था और उसका हाथ मेरे बालों में था. "मैं सच में बहुत खुशकिस्मत हूँ की मुझे आपके जितना चाहने वाला मिला." आशु ने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा.
 
कुछ देर बाद हम नाश्ता कर के तैयार हुए और मेरी प्यारी बुलेट रानी पर सवार हो कर गाँव की तरफ निकल लिए. ठीक दोपहर के खाने पर पहुँचे और हमें वहाँ देख कर किसी को कुछ ख़ास ख़ुशी नहीं हुई. "तुम दोनों को शहर की हवा लग गई हे." ताऊजी ने गुस्से में गरजते हुए कहा. कुछ देर पहले मेरी जान जो बहुत खुश थी वो अचानक ही सहम गई. "आशु...तू अंदर जा." मैंने आशु को अंदर भेजा. "उसे क्यों अंदर भेज रहा है?" ताऊ जी ने गरजते हुए कहा.

"ऑफिस में वर्क लोड इतना बढ़ गया है की मैं ही गाँव नहीं आ पा रहा था तो वो बेचारी अकेले तो गाँव आ नहीं सकती ना?" मैंने अपनी सफाई दी.

"आग लगे तेरी नौकरी को." ताई जी ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा.

"तुझे कहा था न की छोड़ दे ये नौकरी और खेती संभाल, पर नहीं तुझे तो उड़ना हे." पिताजी ने भी आगे आते हुए ताना मारा. मेरा गुस्सा अब फूटने को था पर तभी नितु मैडम का फ़ोन आया; "मॅडम मैं आपको दो मिनट में कॉल करता हु." अभी मैंने कॉल काटा भी नहीं था की ताऊजी चिल्ला कर बोले; "मिनट भर हुआ नहीं घर में घुसे और तेरे फ़ोन आने चालु हो गए? ऐसी कौन सी तनख्वा देते है तुझे?" मैडम ने सब सुन लिया था और खुद ही फ़ोन काट दिया. अब घर में तो कोई नहीं जानता था की मेरी तनख्वा बढ़ गई है इसलिए मैं बस अपने गुस्से पर काबू करना चाहता था.

"मैं पूछती हूँ तुझे कमी क्या है इस घर में? सब कुछ तो है हमारे पास.सारी उम्र बैठ कर खा सकता है, फिर क्यों तू दूसरों के यहाँ नौकरी करता है?" माँ ने कहा.

"बस बहु बहुत हो गया इसका! इसी साल तेरी शादी कर देते हैं." ताऊ जी ने अपना फरमान सुनाते हुए कहा.

"आपने वादा किया था ताऊ जी!" मैंने उन्हें उनका वादा याद दिलाया.

"तूने तीन साल मांगे थे और वो इस साल पूरे होते हे. अगले साल जनवरी में ही तेरी शादी होगी और ये मैं तुझसे पूछ नहीं रहा बल्कि बता रहा हु." ताऊ जी ने आखरी फैसला सुना दिया. अब मुझे कुछ तो बहाना मारना था ताकि इस शादी की लटक रही तलवार से अपनी गर्दन बचा सकू.

मैं: मुझे शहर में घर लेना है!

मैं बस इतना कह कर चुप हो गया और मेरी बात सुन के सब के सब आँखें फाड़े मुझे देखने लगे.

ताऊ जी: क्या?

मैं: मैं शादी के बाद यहाँ रहना नहीं चाहता. मैं नहीं चाहता की मेरा बच्चा उसी स्कूल में जमीन पर बैठ के पढ़े जहाँ मैं पढ़ा था! यहाँ अगर इंसान बीमार हो जाए तो इलाज के लिए एक घंटे दूर बाजार जाना पड़ता हे. न इंटरनेट है न ही ठीक से बिजली आती है, ऐसी जगह मैं अपनी नै जिंदगी शुरू नहीं करना चाहता. शहर में सब सुख सुविधा है, पर यहाँ सिर्फ बीहड़ हे. घर में अगर बाइक न हो तो कहीं भी जाने के लिए सड़क तक पैदल जाना पड़ता है....

ताऊ जी: (बात काटते हुए) ये क्या बोल रहा है तू?

मैं: ताऊ जी, अपने परिवार के बारे में सोचना गलत तो नहीं? आज कल की नई पीढ़ी इस तरह बंध कर नहीं रह सकती. अगर हम गरीब होते और ये सुख-सुविधा नहीं खरीद सकते तो मैं आपसे कुछ नहीं कहता पर हम गरीब तो नहीं?

मेरी बात सुन कर ताऊ जी चुप हो गए पर ताई जी तमतमाते हुए बोलीं;

ताई जी: तो तू क्या चाहता है हम सब खेती-किसानी बेच के तेरे साथ शहर चलें?

मैं: बिलकुल नहीं... मैं बस इतना चाहता हूँ की मैं शहर में अपना घर ले सकूँ, अपनी बीवी-बच्चों के साथ वहां रह सकूँ और उन्हें वो सब सुख सुवुधा दूँ जिसके लिए मुझे घर से दूर जाना पड़ा था.

माँ: तो तू शादी के बाद वहीँ रहेगा? हमें छोड़ के?

मैं: नहीं माँ! बच्चों की छुट्टियों में मैं यहाँ आता रहूँगा और आप सब भी हमसे मिलने वहीँ आ कर मेरे घर में रहना.

ताऊ जी: बस बहुत हो गया! बता कितने पैसे चाहिए तुझे? १० लाख? २० लाख? छोटे (मेरे पिताजी) वो नहर वाली जमीन....

मैं: (बात काटते हुए) ५५ लाख चाहिए मुझे!

ये सुन कर तो ताऊ जी सन्न रह गए!

मैं: मैं आपसे ये पैसे मांग नहीं रहा. मैं अपने पैसों से घर लेना चाहता हूँ, मेरी अपनी मेहनत की कमाई से!

ताऊ जी: अच्छा? तेरी वो चुल्लू भर कमाई से घर खरीदने की सोचेगा तो जिंदगी भर नहीं खरीद पाएगा.

मैं: ताऊ जी मुझे बस दो साल का समय लगेगा ताकि मैं कुछ पैसे जोड़ लूँ, उसके बाद बाकी सारा पैसा में लोन लुंगा.

ताऊ जी: क्या?

पिताजी: तेरा दिमाग ख़राब हो गया है?

मैं: नहीं... मुझे अपने पाँव पर खड़ा होना हे.

पिताजी: तो ये सब जो जमीन जायदाद है वो किसकी है?

मैं: मेरी तो नहीं? मैंने उसे कमाया नहीं है! मुझे मेरे पैसे का घर चाहिए!

पिताजी और ताऊ जी आगे कुछ नहीं बोले.

मैं: मैं शादी से मना नहीं कर रहा, बस आपसे दो साल का समय और माँग रहा हु.

ताऊ जी: ठीक है! पर ये आखरी बार है जब हम तुझे समय दे रहे हैं, अगली बार तू हमें कुछ नहीं बोलेगा और कोई बहाना नहीं करेगा.

मैं: जी

इतना कह कर ताऊ जी और सब खाना खाने बैठ गये. उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे की उन्हें मेरे ऊपर गर्व है की मैं खुद कुछ बनना चाहता हु. खाना खाने के समय मैं बस आशु को देख रहा था जो सर झुकाये बेमन से खाना खा रही थी. मेरा मन तो किया की मैं उसे जा के अपने हाथ से खाना खिलाऊँ पर मजबूर था! खाना खा कर मैं अपने कमरे में आ गया और लैपटॉप पर कुछ ढूँढ रहा था. तभी आशु मेरे सामने से अपने कमरे की तरफ बिना कुछ बोले चली गई. मैं उठा और जा के देखा तो वो जमीन पर बैठी सर झुका कर रो रही थी. उसे रोता हुआ देख दिल दुख मैंने जा के जमीन से उसे उठा कर बिस्तर पर बिठाया, आशु आ कर मेरे सीने से लग गई और रोने लगी. "बस-बस! कोई शादी नहीं हो रही! मुझे जो भी बहाना सूझा वो मैंने बना दिया और देख सब मान भी गए, फिर क्यों रो रही है?" मैंने आशु के आँसूँ पोछते हुए पूछा. पर उसके मन में डर बैठ गया था जिसे निकालने के लिए मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. घर पर सभी लोगों की मौजूदगी थी और ऐसे में हम दोनों का इस तरह चिपके रहना मुसीबत खड़ी कर सकता था. मैंने एक आखरी कोशिश की; "तुझे मुझ पर भरोसा है?" आशु ने हाँ में सर हिलाया. "तो बस मुझ पर भरोसा रख, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने वाला. इन लोगों ने ज्यादा जोर-जबरदस्ती की तो हम उसी वक़्त भाग जायेंगे." अब ये सुन कर आशु को तसल्ली हुई और उसका रोना बंद हुआ. मैंने आशु के माथे को चूमा और बाहर आ गया.फिर याद आया की मैंने मैडम को फ़ोन करना है तो उन्हें कॉल मिला कर मैं छत पर आ गया.घंटी बजती रही पर मैडम ने फ़ोन नहीं उठाया, मुझे लगा शायद बीजी होंगी इसलिए मैंने कॉल काटा और घर से बाहर टहलने को निकल गया.जब शाम को वापस आया तो आशु अब सामन्य दिखी, सब ने बैठ के चाय पी और उस पूरे दौरान मैं चुप रहा. कुछ देर बाद ताऊ जी बोले; "तूने वहाँ कोई जमीन देखि है?"

"जी ...देखि है... करीब २५० गज हे." मैंने झूठ बोला.

"कितने की है?" ताऊ जी ने चाय का घूँट पीते हुए पूछा.

"जी...वो... ३५ लाख की हे. घर बनवाई और बाकी के काम जोड़-जाड कर १५ लाख ऊपर से लगेगा." मैंने बात बनाते हुए कहा. वो चुप हो गए और चाय पी कर पिताजी को अपने साथ ले कर चले गये. आंगन में बस मैं, ताई जी, माँ और भाभी ही बचे थे, आशु रसोई में बर्तन धो रही थी.

"आशु तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है?" मैंने पुछा तो वो रसोई से बाहर आई और बोली; "ठीक चल रही हे." फिर मैंने उसे एकाउंट्स की किताब लेने को कहा तो वो चुप-चाप ऊपर के कमरे से अपनी किताब ले आई. मैं उसे जानबूझ कर सब के सामने पढ़ाने लगा ताकि सब को लगे की हम दोनों शहर में एक दूसरे से नहीं मिलते.

आखिर ताई जी ने पूछ ही लिया; "इतना भी क्या काम रहता है तुझे की तुझसे अपनी प्यारी भतीजी से मिला नहीं जाता?"

"बैंगलोर का एक प्रोजेक्ट है, उसकी वजह से रविवार को भी ऑफिस जाता हु. इसलिए टाइम नहीं मिलता की आशु के हॉस्टल जा सकू." मैंने जवाब दिया तो ताई जी चुप हो गई. कुछ देर पढ़ने के बाद आशु खुद ही खाना बनाए की तैयारी करने लगी. मुझे इत्मीनान हो गया की आशु पढ़ाई भी करती है ना की सारा टाइम मुझे खुश करने के लिए अश्लील फिल्मे देखती हे.

रात को खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था की आशु आ गई. उसके हाथ में एक कटोरी थी और कटोरी में गुड़! "आपने मुझसे एक वादा किया था न?" उसने पुछा पर मैं सोच में पड़ गया की वो कौनसे वादे की बात कर रही हे. "सिगरेट और शराब नहीं पीने का?" जब आशु ने ये कहा तब मुझे याद आया और मैंने हाँ में सर हिलाया. "तो आज से सब बंद! प्रॉमिस मी???" आशु ने कहा तो मैंने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा; "आई प्रॉमिस की आज से शराब या सिगरेट को हाथ नहीं लगाऊँगा." आशु मुस्कुराई और नीचे चली गई.

कुछ देर बाद जय आया और माँ ने मुझे नीचे बुलाया. उसके घर पर पतुरिया का प्रोग्राम था और वो मुझे बुलाने आया था. "चल यार घर पर प्रोग्राम है और तू यहाँ घर पर बैठा है? कम से कम मुझे बता तो देता की तू आया हुआ है?" मुझे माँ को कुछ कहने की जरुरत ही नहीं पड़ी और मैं उसके साथ चला गया.वहाँ पहुँच कर सबसे आगे की चारपाई पर हम दोनों बैठ गए और गाना-बजाना चल रहा था. सारे गाने डबल मीनिंग वाले थे और वहाँ खड़े लौंडे सब चिल्ला रहे थे और पैसे उड़ा रहे थे. वो औरत नाचती हुई आई और मुझे खींच के स्टेज पर ले जाने लगी तो मैंने उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ा लिया और जय को आगे कर दिया. जय ने अपने मुँह में एक ५०० का नोट दबाया और अपनी गर्दन उसके मुँह के आगे कर दी, उस औरत ने अपने होठों से जय के मुँह से वो नोट छुड़ाया और जय उसे अपनी बाँहों में कस कर नाचने लगा. वो जानती थी की यही मालिक है इसलिए वो उसे ज्यादा से ज्यादा खुश कर रही थी. कभी अपनी कमर यहाँ लचकाती तो कभी वहाँ.. उसने अपने वक्षो से दुपट्टा उतारा और जय की तरफ फेंक दिया. उसकी बड़ी-बड़ी स्तनो की घाटी साफ़-साफ़ नजर आ रही थी और हो-हल्ला शुरू हो गया था. इसी तरह मैं वहाँ बैठा रहा और रात १ बजे तक ये प्रोग्राम चलता रहा. इस पूरे दौरान मैं आशु के बारे में सोच रहा था और मेरा लिंग बिलकुल अकड़ चूका था. जब प्रोग्राम खत्म हुआ तो जय ने गांजा भर के चिलम मेरी तरफ बढाई. उस चिलम को देखते ही मेरा मन करने लगा की एक कश मार लूँ पर आशु को वादा जो किया था इसलिए मैंने उसे मना कर दिया.

"ओह हरामी! तू इसे मना कर रहा है? तबियत तो ठीक है ना तेरी?" जय ने पूछा.

"ना यार ...मन नहीं है!" इतना कह कर मैं घर जाने को उठ खड़ा हुआ.

दरवाजा खटखटाया तो भाभी ने दरवाजा खोला; "देख आये पतुरिया का नाच?" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा, पर मैंने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गया.आशु सो चुकी थी पर मुझे आज उसके बिना नींद नहीं आ रही थी. मन कर रहा था की जा कर उसके जिस्म से चिपक जाऊँ पर डरता था की घर में काण्ड ना हो जाये. पूरी रात बस करवटों में निकल गई और सुबह ऊँघता हुआ उठा. आशु ने जब मुझे देखा तो प्यार से बोली; "जानू! नींद नहीं आई आपको?" मैंने ना में गर्दन हिलाई और कहा; "कैसे आती? मेरी जानेमन मुझसे दूर थी!" ये सुनते ही वो शर्मा गई और मुझे गले लगना चाहा पर तभी भाभी आ गई; "और सो लो थोड़ा? पतुरिया को याद कर-कर के सोये तो होंगे नहीं?" ये सुनते ही आशु गुस्सा हो गई; "भाभी थोड़ी तो शर्म किया करो?! देखती नहीं आशु खड़ी है?" मैंने उन्हें झाड़ते हुए कहा.

"बच्ची थोड़े ही है?" उन्होंने कहा और वहा से चली गई. आशु भी उनके पीछे-पीछे जाने लगी. मैने दौड़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने कमरे में खींच लिया. "मेरे होते हुए आप पतुरिया देखने गए?" आशु ने गुस्से से कहा.

"जान! मुझे नहीं पता था की वो कहाँ बुला रहा है? यक़ीन मानो मैंने कुछ नहीं किया ना ही उसे छुआ, वो मुझे खींच कर ले जा रही थी पर मैंने जय को आगे कर दी. उसने तो मुझे चिलम भी ऑफर की थी पर मैंने तुम्हारे वादे की खातिर उसे मना कर दिया." मैंने आशु से ऐसे कहा जैसे की एक छोटा बच्चा अपनी सफाई देता हे. ये सुन कर आशु खिलखिला कर हँस पड़ी और मेरे दोनों गाल पकड़ के खींचते हुए बोली; "आई नो ...आई वाज जोकिंग!!!" हँसती-खेलती हुई वो नीचे चली गई. मैं भी नहा धो कर अपना लैपटॉप ले कर नीचे आ गया और आंगन में बैठ कुछ पी. पी. टी. पर काम करने लगा. अम्मा और माँ मुझे काम करता हुआ देख रहे थे और पहला ताना माँ ने ही मारा; "दो दिन के लिए घर आया है, कम से कम यहाँ तो इस डिब्बे को बंद कर दे!"

अब इससे पहले ताई जी मुझे ताना मारें मैंने लैपटॉप बंद किया और उनके पास जा कर बैठ गया.माँ और ताई जी बैठीं मटर छील रही थीं और मैं भी वहीँ बैठ गया और मटर छीलने लगा. मुझे देख कर भाभी जोर से हँस पड़ीं और उनकी देखा-देखि सब हँस पडे.

"क्या हुआ? आपने ही कहा था की डिब्बा बंद कर दो, तो सोचा की आपकी मदद ही कर दू." ये सुन कर ताई जी बोलीं; "ये काम करने को नहीं बोला. ये बता वहाँ तू अकेला खाना कैसे बनाता है?"
 
मैं पहले तो थोड़ा हैरान हुआ क्योंकि आज तक कभी मुझसे इस तरह की बात नहीं की गई थी. "रात को सात बजे तक पहुँचता हूँ, फिर कुकर में चावल और स्टील वाले में दाल डाल कर गैस पर चढ़ा देता हु. एक साथ दोनों तैयार हो जाते हैं, फिर चॉपर में प्याज-टमाटर और हरी मिर्च डाल कर के ५-७ बार खींचता हूँ और फटफट तड़का मारा... खाना तैयार...जब ज्यादा लेट हो जाता हूँ तो बाहर से मँगा लेता हु." मैंने कहा.

"ये चापर क्या होता है?" माँ ने पुछा तो मैंने उन्हें बता दिया; "एक कटोरी जैसे बर्तन होता है उसमें दो ब्लेड लगे होते हैं, उसके ऊपर एक हैंडल होता है और उसे खींचने से नीचे ब्लेड घूमता हे. अगली बार आऊँगा तब आपको ला कर दिखा देता हु." तभी आशु बोल पड़ी; "आज आप ही खाना बना कर खिला दो सब को!" पर ताई जी को ये बात नहीं जचि और वो आशु पर बिगड़ पड़ीं; "पागल हो गई तू? इतने महीनों बाद आया है और तू इससे चूल्हा-चौका करवाएगी?" आशु ने अपना सर झुका लिया.

"ताई जी, आज तो आपको ऐसा खाना खिलाऊंगा की आप उँगलियाँ चाट जाओगे!" मैंने जोश में आते हुए आशु का बचाव किया. मैंने हाथ-मुँह धोये और रसोई में घुस गया, सबसे पहले मैंने फ़ोन में गाना लगाया: "ना जा न जा" और आशु का हाथ सब के सामने पकड़ा और उसके दाहिने हाथ की ऊँगली पकड़ कर उसे गोल घुमा दिया. आशु इस सबसे बेखबर थी और मेरे अचानक उसे गोल घुमाने से वो गोल घूम गई.

उस एक पल के लिए मैं सब कुछ भूल गया था. मुझे बस आशु के उदास चेहरे को खुशियों से भरना था. आशु डांस करने में बहुत झिझक रही थी पर मैं ही उसे जबरदस्ती नचा रहा था. चूँकि वहाँ सिवाय औरतों के कोई नहीं था तो इसलिए कोई कुछ बोला नही. जब गाना खत्म हुआ तो ताई जी बोलीं; "देख रही है छोटी (माँ) तू, गाँव में जिस लड़के की आवाज नहीं निकलती थी वो शहर जा आकर नाचने भी लगा हे." मैंने आशु की तरफ एक टमाटर उछाला जिसे उसने बड़ी मुश्किल से पकड़ा और मैंने उसे काट के देने को कहा. तभी भाभी बोल पड़ी; "देखो ना चची कितने बेशर्म हो गया है राज , आशु को नचा रहा है!" अब ये बात मुझे बहुत चुभी; "अपनी माँ और ताई जी के सामने नचा रहा हूँ बाहर सड़क पर तो नहीं नचा रहा." ये सुन कर भाभी का मुँह बन गया और माँ कहने लगी; "कोई बात नहीं बहु, कम से कम इसके आने से घर में थोड़ी रौनक तो आ गई."

"तू एक बात बता राज , तू अपनी भाभी से चिढ़ा क्यों रहता है?" ताई जी ने पूछा.

"ताई जी ये जब देखो आशु के पीछे पड़ीं रहती हैं, मैंने आज तक इन्हें कभी हँस कर आशु से बात करते नहीं देखा. हमेशा उसे ताना मरती रहतीं हैं, उससे प्यार से बात करें तो मैं भी इनसे हँस कर बात करू. अगर उसे नचा सकता हूँ तो इनको भी थोड़ा नचा दूंगा." मैंने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए कहा. फिर मैं खाना बनाने में लग गया और सारा सब्जी काटने का काम आशु से करवाया; "अगर सारी चोप्पिंग मुझसे करानी थी तो खाना मैं ही बना लेती.' आशु ने प्यार से मुझे ताना मारते हुए कहा.

"खाना तो बना लेती पर मेरे हाथ का स्वाद कैसे आता?" मैंने आशु को आँख मारते हुए कहा. जब सब दोपहर को खाने बैठे तो खाना वाक़ई में सब को पसंद आया पर पिताजी और ताऊ जी ने कुछ कहा नहीं, हाँ बस ताई जी और माँ ने खाने की तारीफ की थी. भाभी बोलीं; "चलो भाई एक बात तो तय हुई, शादी के बाद राज अपनी लुगाई को खुश बहुत रखेगा." ये सुन आशु मुस्कुराई जैसे खुद पर फक्र कर रही हो.

शाम होने तक मैं सभी के पास बैठा रहा.७ बजे अचानक लाइट चली गई और फ़ोन की बैटरी भी डिस्चार्ज हो गई.लैपटॉप को भी मैं चार्जर पर लगाना ही भूल गया था. इसी बीच रात का खाना भी मैंने ही बनाया. इस बार पिताजी बोल ही पड़े; "घर में तू तीसरा आदमी है जिसे खाना बनाना आता हे. याद है भाईसाहब जब हम छोटे होते थे तब खेतों में आलू का भरता बनाते थे."

ताऊजी मुस्कुराये और उन्होंने अपने बचपन की कहानी सुनाई; "मैं और तेरा बाप माँ के गुजरने के बाद चूल्हा-चौका संभालते थे. कभी-कभी कहते में पहरिदारी करनी होती थी तो घर से रोटी बना कर ले जाते और खेत में कांडों की आग में आलू भूनते और फिर उसमें घर का नून मिला कर रोटी के संग खाते थे." सब के सब उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहा थे, नारायण भैया ने तो आज तक रसोई में घुस के एक गिलास पानी तक नहीं लिया था.

खाना खा कर मैं और आशु छत पर बैठे थे क्योंकि लाइट अभी तक नहीं आइ थी. तभी सब अपने-अपने बिस्तर ले कर ऊपर आ गये. एक कोने में सारे आदमी लेट गए और दूसरे कोने में सारी औरतें लेट गई. मेरा बड़ा मन कर रहा था की आशु को कस कर अपनी बाहों में प्यार करूँ पर सब के रहते ये नामुमकिन था. करवटें बदलते हुए सो गया और सुबह जल्दी उठ गया.पांच बजे नाहा धो कर तैयार होगया.ठीक ६ बजे में निकलने लगा क्योंकि मुझे सीधा ऑफिस जाना था तो आशु ने मेरे लिए दोपहर का खाना पैक कर दिया. बुधवार को आशु को 'भिगाणे' का वादा कर मैं घर से निकला, आँखों में उसकी वही हँसती हुई तस्वीर थी. सीधा उसी ढाबे पर रुका और अपना फ़ोन चार्जिंग पर लगाया क्योंकि घर में लाइट तो आई नहीं थी. चाय पी कर वहाँ से निकला, घडी में ९ बजे थे की मैडम के ताबड़तोड़ कॉल आने लगे. मैंने बाइक साइड खड़ी की और फ़ोन चेक किया तो मैडम के कल से अभी तक ५० कॉल आये थे. इससे पहले की मैं कॉल करता उनका ही फ़ोन आ गया; "राज जी!!!! आप कहाँ हो?" उन्होंने घबराते हुए कहा. "मॅडम रास्ते में हूँ..." आगे मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही मैडम ने कहा: "आप सीधा फॅमिली कोर्ट आना, कोर्ट नंबर ५!!!" इतना कह कर उन्होंने फ़ोन काट दिया. ये सुन कर मैं परेशान हो गया की भला उन्होंने मुझे कोर्ट क्यों बुलाया है? मैने उन्हें दुबारा कॉल मिलाया तो फ़ोन स्विच ऑफ बता रहा था. अब मरते क्या न करते मैं कोर्ट की तरफ चल दिया.

बेमन से फॅमिली कोर्ट पहुंचा और मन में हो रही उथल-पुथल को काबू करते हुए मैं कोर्ट नंबर ५ ढूँढने लगा. बहुत पूछने पर पता चला ये तो मेडिएशन वाला कोर्ट है, और उसके बाहर ही मुझे सर और नितु मैडम दिखे. दोनों के घरवाले और वकील वहाँ खड़े थे और सब मुझे ही देख रहे थे. मुझे तो समझ ही नहीं आया की में क्या कहूँ और किसके पास जाऊँ? ये तो मैं समझ ही चूका था की दोनों यहाँ डाइवोर्स के लिए आये हैं पर जाऊँ किसके पास? तभी नितु मैडम मेरे पास आईं और मुझे अपने माँ-पिताजी से मिलवाया; "डैड ये हैं राज जी." मैंने हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्ते की और साथ ही उनकी वाइफ मतलब नितु मैडम की माँ को भी नमस्ते कहा पर दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला. इधर सर के घरवाले मुझे बड़ी कोफ़्त की नजर से देख रहे थे और कुछ बोलने ही वाले थे की अंदर कमरे में सब को बुलाया गया.मैडम ने मुझे भी अपने साथ बुलाया.

अंदर एक लम्बा सा कॉन्फ्रेंस टेबल था. जिसके एक तरफ दो लोग बैठे थे, शायद वो मीडिएटर थे. उनके दाहिने तरफ सर, उनका वकील और उनके परिवार वाले बैठ गए, दूसरी तरफ मैडम, उनकी वकील और उनके माता-पिता बैठ गए, मैं लास्ट वाली कुर्सी पर बैठ गया.सबसे पहले सर के वकील ने मेरी तरफ ऊँगली करते हुए कहा; "ये लड़का जिसका नाम राज है, इसका मेरी मुवकिल की पत्नी से नाजायज संबंध हे." ये सुनते ही मेरे जिस्म में आग लग गई और मैं एक दम से उठ खड़ा हुआ और जोर से बोला; "ये क्या बकवास है? आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर ऐसा गन्दा इल्जाम लगाने की?" मेरी आवाज सुन कर नितु मैडम की वकील बोल पड़ी; "राज .. प्लीज आप चुप हो जाओ." मैं बाहर जाने लगा तो मैडम ने दबे होठों से 'प्लीज' कहा इसलिए मैं गुस्से में बैठ गया."सिर्फ यही नहीं ये लड़का इनके (नितु मैडम) साथ मुंबई भी गया था. वो भी अकेला!" सर का वकील बोला अब ये तो मेरे लिए सुनना मुश्किल था इसलिए मैं तमतमाते हुए बोला; "मुंबई जाने का प्लान इन्होने (सर ने) ही बनाया था और टिकट्स अपनी और मेरे नाम की बुक की थीं, जब मैं स्टेशन पहुंचा तो वहां जा के पता चला की इनकी जगह मॅडम जा रहीं हे. इसमें मैं क्या करता?" मेरा जवाब सुनते ही सर मुझे घूर के देखने लगे और ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ; "क्या घूर रहा है? आई एम नॉट योवर इम्प्लोयी एनीमोर! आई क्वीट!!!” "राज ...प्लीज चुप हो जाओ!" मैडम की वकील ने मिन्नत करते हुए कहा.

"बहुत पर निकल आये हैं तेरे? तू क्या क्वीट करेगा. मैं तुझे निकालता हूँ जॉब से और देखता हूँ कैसे तुझे कोई जॉब देगा." सर ने मुझे धमकाते हुए कहा.

"तू मुझे निकालेगा? मेरी जॉब में रोडे अटकाएगा? रुक तू बताता हूँ तुझे! जाता हूँ मैं इनकम टैक्स ऑफिस और बताता हूँ जो तू रस्तोगी से फ़र्ज़ी बिल भरवाता है, अपने ही क्लाइंट्स को ओवरचार्ज करता हे. एक-एक का रिकॉर्ड है मेरे पास.... और जो तू ने इन्वेस्टर्स से अपनी मनमानी कंपनी में पैसे लगवाया है न... उन्हें भी मैं जा के बता के आता हु. ना तू मुझे इसी कोर्ट के चक्कर काटता हुआ मिला ना तो बताइओ." मैंने सर को करारा जवाब दिया जिससे उनकी बोलती बंद हो गई.

मैडम की वकील साहिबा उठीं और मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे चुप-चाप बैठने को कहा. अब तो उन्हें बोलने के लिए और भी पॉइंट मिल गया था.

सर के वकील ने कुछ फोटोज जज साहब को दिखाईं, ये फोटोज वो थी जब मैंने मैडम को उस दिन बाइक पर जी. एस. टी. ऑफिस तक छोड़ा था और हम जब गलौटी कबाब खा रहे थे. जज साहब ने वो तसवीरें मैडम के वकील को दिखाईं और वो तसवीरें मैडम ने भी देखि. "इससे क्या साबित होता है? क्या एक लड़का एक लड़की को लिफ्ट नहीं दे सकता? या उसके साथ कुछ खा नहीं सकता?" मैडम की वकील ने पूछा.

"अपनी मैडम को कौन लिफ्ट देता है? और ऑफिस अवर में चाट कौन खाता है?" सर के वकील ने पूछा.

"तो कानून की कौन सी किताब में लिखा है की आप बॉस की बीवी को लिफ्ट नहीं दे सकते? चाट खाने का भी कोई टाइम-टेबल होता है? कैसी छोटी सोच रखते हैं आप?" वकील साहिबा ने पूछा.

"उस दिन मैंने ही राज जी से कहा था की वो मुझे जी. एस. टी.ऑफिस छोड़ दें और चूँकि लंच टाइम हो गया था तो हम 'कबाब' खा रहे थे. मुझे नहीं पता था की कुमार (सर) ने मेरे पीछे जासूस छोड़ रखे हैं!" मैडम ने सफाई दी. इसी बीच मैंने टेबल पर से एक कोरा कागज उठाया और अपना रेसिग्नेशन लेटर लिखने लगा;

डेट: २१/०९/२०१९

मिस्टर कुमार,

आई एम राईटींग यू टू इंफॉर्म ऑफ माई रेजीगनेशन इफेक्टिव इमेडीयटली. दीं टाइम स्पेंट वर्किंग फॉर यू ह्याज बिन अ कोलोजल वेस्ट ऑफ माई टाइम.योवर बिजिनेस इज दीं मोस्ट करप्ट अँड फ्रोड कंपनी आई कॅन इम्याजिन, अँड इट इज अब्सुलेटली अमेझिंग दॅट इट कंटीन्युअस टू ह्यांग ऑन!प्लीज सेंड माई फायनल पेचेक एट माई होम अड्रेस .

युआर एक्स एमप्लोई

राज

मैडम की वकील साहिबा कुछ कहने ही वालीं थीं की मैंने अपना रेसिग्नेशन लेटर सर की तरफ सरका दिया. सब के सब उसी कागज की तरफ देखने लगे. मैंने अपने पेन का कैप बंद किया और अपनी जेब में रख लिया. "ये क्या है?" सर के वकील ने जानबूझ कर पूछा.

"मेरा रेसिग्नेशन लेटर!" मैंने जवाब दिया तो सब के सब मुड़ के मेरी तरफ देखने लगे.

"ये तुम बाद में भी तो दे सकते हो?" सर का वकील बोला.

"मैं दुबारा इनकी शक्ल नहीं देखना चाहता, इसलिए यहीं दे रहा हु. मेरी फाइनल पेमेंट का चेक मुझे भिजवा दीजियेगा" मैंने सर की तरफ देखते हुए कहा.

"मिस्टर राज बीह्याव योवरसेल्फ!" जज साहब ने मुझे चेतावनी देते हुए कहा और मैं भी चुप हो गया.

"देख रहे है जज साहब, इस लड़के को रत्ती भर भी तमीज नहीं की कोर्ट में कैसे बेहवे किया जाता है!" सर के वकील ने तंज कस्ते हुए कहा.

"ये उसका रोज का काम नहीं है, पहली बार आया है कोर्ट में" मैडम के वकील साहिबा ने मेरा बचाव करते हुए कहा.

"जज साहब मैं आपका ध्यान इन कॉल लिस्ट्स की तरफ लाना चाहती हु." ये कहते हुए उन्होंने जज साहब को एक कॉल लिस्ट की कॉपी दी और दूसरी कॉपी उन्होंने सर के वकील की तरफ बढ़ा दी. "इसमें जो नंबर मार्क कर रखा है ये किसका है? किस्से ये घंटों तक बातें करते हैं?" वकील साहिबा ने पूछा.

"वो...क..कुछ बिज़नेस रिलेटेड कॉल था." सर ने हिचकते हुए जवाब दिया. ये सुन कर मैडम बरस पड़ीं; "झूठ तो बोलो मत! रात के एक बजे कौन इतनी लम्बी-लम्बी बातें करता है? जज साहब ये नंबर इनकी 'प्रियतमा' का हे. जिसका नाम है यास्मिन! शादी से पहले का इनका प्यार!" अब ये सुनते ही दोनों परिवारों की आँखें चौड़ी हो गई. वकील साहिबा ने फाइल से यास्मिन की पिक्चर निकाल कर सर से पुछा की ये कौन है? उन्होंने बस उस लड़की को पहचाना पर अपने रिश्ते से साफ़ मना करते रहे. "इस नंबर पर कॉल करो और हम सब से बात कराओ" जज साहब ने सर को डराया तो उन्होंने बात कबुली की वो यास्मिन से बात करते हैं पर उनके वकील ने सर का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात नहीं कबूली.

"जज साहब! हमारी शादी को ४ साल हो चुके हैं, पर इन चार सालों में एक पल के लिए भी मुझे इनका साथ या प्यार नहीं मिला. मिलता भी कैसे? इनके मन मंदिर में तो यास्मिन बसी थी. शादी की रात ही इन्होने मुझे अपने और यास्मिन के बारे में बताया. उस दिन से ले कर आज तक प्यार के दो पल मुझे नसीब नहीं हुए, ऐसा नहीं है की मैंने कोई कोशिश नहीं की! पर ये हमेशा ही मुझसे दूर रहते थे, हमेशा फ़ोन पर या ऑफिस के काम में बिजी रहते.मुझे भी इन्होने जबरदस्ती ऑफिस में बुलाना शुरू कर दिया और काम में बिजी कर दिया ताकि मेरा ध्यान इन पर ना जाये. वो लड़की यास्मिन... उसने आज तक इनके लिए शादी नहीं की और मुझे पूरा यक़ीन है की इन दोनों एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर है क्योंकि ...... क्योंकी ....!!!" ये कहते हुए मैडम रो पड़ीं.

पर अभी मैडम की बात पूरी नहीं हुई थी उन्होंने गुस्से से चिल्लाते हुए सर से कहा; "तुम्हारा मन इतना मैला है की तुमने दो दोस्तों की दोस्ती को गाली दी है! मैं और राज जी बस अच्छे दोस्त हैं और दोस्ती कोई जुर्म नहीं!" जज साहब ने उन्हें शांत होने को कहा और पानी पीने को कहा.

"जज साहब हमारी माँग बस ये है की एक तो आप प्लीज राज जी का नाम इस केस से क्लिअर कर दीजिये क्योंकि उनके खिलाफ कुमार के पास कोई भी कनकलूसिव एवीडन्स नहीं हे. दूसरा मेरी मुवकिल को उचित मुआवजा मिले, वो चार साल जो इन्होने मेंटल टोरचर सहा है और ऑफिस में जो काम किया है उसके एवज में! तीसरा आप प्लीज इस डाइवोर्स को जल्द से जल्द फाइनल कीजिये क्योंकि मेरी मुवकिल बहुत ही भावूक स्थिती में हे. बस इससे ज्यादा हमारी और कोई माँग नहीं हे." मैडम की वकील साहिबा ने कहा.

"देखिये राज का नाम तो हम क्लिअर कर देते हैं पर इतनी जल्दी हम मुआवजे का फैसला नहीं कर सकते, पहले तो ये यास्मिन को यहाँ ले कर आइये उसके बाद हम फैसला करेंगे." जज साहब ने अपना फैसला सुनाया और अगली डेट दे दी.
 
सब के सब बाहर आगये पर मेरा तो खून खोल रहा था पर खुद को काबू कर के मैं अकेला खड़ा था और बस खुंदक भरी नजरों से सर को देख रहा था. मैं अगर कुछ भी बोलता या कहता तो मैडम के लिए बात बिगड़ सकती थी. तभी सर की माँ मेरे पास आईं; "तू ने हमारे परिवार की खुशियों में आग लगाईं हे." इससे पहले मैं कुछ जवाब देता मैडम ने तेजी से मेरे पास आईं और उन पर बरस पड़ीं; "कुछ नहीं किया इन्होने, आप को अपने बेटे की गलती नजर नहीं आती? मैंने जो अंदर कहा वो आपको समझ में नहीं आया ना? आपके बेटे ने शादी के बाद से मुझे छुआ तक नहीं है, यक़ीन नहीं आता तो चलो कौन सा टेस्ट करवाना है मेरा करवा लो!" मैडम गुस्से में चिल्लाते हुए बोलीं और ये सुन कर सर की माँ का सर झुक गया और वो कुछ नहीं बोली. इधर मैडम के आँसूँ निकल आये थे मैंने आगे बढ़ कर उन्हें संभालना चाहा पर उनके माता-पिता आगे आ गये और उनके कंधे पर हाथ रख कर उनको चुप करने लगे. मैडम ने मेरे हाथों को नोटिस कर लिया था जो उन्हें संभालने को आगे बढे थे पर वो कुछ बोलीं नहीं, क्योंकि उनका कुछ भी कहना या करना उनका केस बिगाड़ सकता था.

मैडम ने अपने आँसु पोछे; "सॉरी राज ! मेरी वजह से तुम्हें कोर्ट तक आना पडा. पिछली हियरिंग में जज साहब ने मेडिएशन के लिए बुलाया था और कुमार के वकील ने तुम्हारा नाम लिया था इसलिए तुम्हें परेशान किया."

"इट्स ओके मॅडम!!! जस्ट लेट मीनो इफ यू निड माई हेल्प." अब मैं इससे ज्यादा और क्या कहता इसलिए मैं बस वहाँ से चल दिया. मैं कुछ दूर आया था की मुझे अक्षय मिल गया.अक्षय कोर्ट में किसी वकील के पास असिस्टेंट था. उसने मुझसे वहाँ आने का कारन पुछा तो मैंने ये कह कर बात टाल दी की वो मैडम का केस था. इतना कह कर मैं बाहर आ गया.अब मुझ पर नई जॉब ढूँढने का प्रेशर बन गया था. मैं सीधा घर आया और पहले बैठ कर चैन से सांस ली और सोचने लगा की आगे क्या करूँ? बैंक कितने पैसे बचे हैं ये चेक किया और फिर हिसाब लगाने लगा की कितने दिन इन पैसों से गुजारा होगा. शुक्र है की मेरी बुलेट की इ एम आई खत्म हो चुकी थी! मैं इंटरनेट पर जॉब सर्च करने लगा. इधर मेरे पास जो आशु का फ़ोन था वो बज उठा. आशु जब भी गाँव जाती थी तो अपना फ़ोन मुझे दे देती थी ताकि वहाँ किसी को पता ना चल जाये. ये किसी और का नहीं बल्कि निशा का फ़ोन था. पर मेरे उठाने से पहले ही वो स्विच ऑफ हो गया.आशु जाने से पहले फ़ोन स्विच ऑफ करना भूल गई थी इसलिए बैटरी डिस्चार्ज हो गई. तब मुझे याद आया की मुझे आशु के ये सब बता देना चाहिए पर बताऊँ कैसे? मैंने माँ के फ़ोन पर कॉल किया तो उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया. अब मैं और कुछ भी नहीं कर सकता था. न ही घर पर बता सकता था की मैं जॉब छोड़ रहा हूँ वरना वो सब मुझे घर बिठा देते. वो पूरा दिन मैं बस ऑनलाइन जॉब ढूँढता रहा और ऑनलाइन अपने रिज्यूमे पोस्ट करता रहा. रात में एक लिस्ट बनायीं जहाँ सुबह इंटरव्यू के लिए जाना था. टेंशन एक दम से मेरे ऊपर सवार हुआ की मन किया की एक सिगरेट पी लूँ पर आशु को किया हुआ वादा याद आ गया.ब्रेड-बटर खा कर सो गया.

सुबह जल्दी से तैयार हो गया.राम नगर में एक छोटे ऑफिस के लिए निकला. वहाँ पहुँच कर देखा तो दो कमरों का एक ऑफिस जहाँ सैलरी के नाम पर मुझे बस दस हजार मिलने थे. अब ८,०००/- का रेंट भरने के बाद बचता क्या ख़ाक! वहाँ से मायूस लौटा और बिस्तर पर लेट गया.अगले दिन उठा और कुछ प्लेसमेंट एजेंसी गया और वहाँ अपने रिज्यूमे दिया और फिर वापस आया, पर अब दिल बेचैन होने लगा था. आशु की बहुत याद आ रही थी और साथ ही ये एहसास हुआ की शादी के बाद मेरी जिम्मेदारियाँ और भी बढ़ जाएँगी. ये सोच-सोच कर मैं टेंशन में डूब गया, गुम-सुम बैठा मायूस हो गया.दिल ने बहुत हिम्मत बटोरी और होंसला दिया की इस तरह हार मान ली तो आशु का क्या होगा. मुझे पॉजिटिव रहना चाहिए इसी जोश से मैं उठा और नाहा-धो कर तैयार हो गया और आशु को लेने घर के निकल पडा.

घर पहुँचते-पहुँचते रात हो गई. ठीक दस बजे मेरी बुलेट की आवाज सुन कर आशु दौड़ी-दौड़ी आई और उसने दरवाजा खोला. उसे देखते ही मेरी सारी टेंशन्स फुर्र हो गईं.मैंने आँखों के इशारे से उससे पुछा की सब कहाँ हैं तो उसने कहा की सब सो गये. मैंने तुरंत बाइक दिवार के सहारे खड़ी की और जा कर आशु को अपने सीने से लगा लिया. आशु भी कस कर मुझसे लिपट गई; "आपको बहुत मिस किया मैंने!" आशु ने खुसफुसाते हुए कहा. "मैंने भी...." बस इससे ज्यादा कहने को मन नहीं किया. हम अलग हुए और मैंने जा कर बाइक को स्टैंड पर लगाया और लॉक कर के अंदर आया. आशु ने दरवाजा बंद किया और बिना कहे ही खाना परोस कर ले आई. वो जानती थी की मैंने खाना नहीं खाया है, मैंने आंगन में पड़ी चारपाई खींची और रसोई के पास ले आया. आशु कुर्सी पर बैठी थी और मैं चारपाई पर बैठा था. खाने में आशु ने मेरे पसंद के दाल-चावल और करेले बनाये थे. वो अपने हाथों से मुझे खिलाने लगी. मुझे खिलाने में उसे जो आनंद आ रहा था ठीक वैसे ही आनंद मुझे उसके हाथ से खाने में आ रहा था. "तुमने खाया?" मैंने पुछा तो आशु ने बस सर हाँ में हिलाया. मैं समझ गया था की घर में सब के डर के मारे उसने खाना खा लिया होगा. पूरा खाना खा कर आशु बर्तन रखने गई तो थोड़ी आवाज हुई जिससे ताई जी उठ गईं और मुझे आंगन में बैठा देख कर पूछने लगी; "तू कब आया?" मैंने बताया की अभी २० मिनट हुए आये हूये. उन्होंने आशु को आवाज मारी और आशु रसोई से निकली; "लड़के को खाना दे." तो मैंने खुद ही कहा; "खाना खा लिया ताई जी." ये सुन कर ताई जी बोलीं; "चलो इतनी तो अक्ल आ गई इसमें (आशु में).चल अब आराम कर." इतना कह कर ताई जी सोने चली गईं.

मे और आशु नजरें बचाते हुए हाथ में हाथ डाले ऊपर आ गये. चूँकि मेरा कमरा पहले आता था तो मैं ने आशु को पकड़ के अंदर खींच लिया. मेरे कुछ कहने या करने से पहले ही आशु अपने पंजों के बल खड़ी हुई और मेरे होठों को चूम लिया. मैंने अपने दोनों होठों से आशु के निचले होंठ को मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा. अभी हम किस करते हुए दो मिनट ही हुए की मुझे लगा की कोई आ रहा है तो मैं और आशु दोनों अलग हो गए पर प्यास हमारे चेहरे से झलक रही थी. बेमन से आशु अपने कमरे में गई.मैं भी बिना कपडे बदले बिस्तर पर लेट गया.नींद थी की आने का नाम ही ले रही थी. मैं आधे घंटे बाद उठा और आशु के कमरे के बाहर खड़ा हो गया.पर कमरा अंदर से बंद था. एक बार को तो मन किया की दरवाजा खटखटाऊँ पर फिर रूक गया ये सोच कर की आशु ने दिन भर बहुत काम किया होगा और बेचारी थक कर सो रही होगी. मैं छत पर चला गया और एक किनारे जमीन पर बैठ गया और रात के सन्नाटे में सर झुकाये सोचने लगा. रात बड़े काँटों भरी निकली ...

सुबह की पहली किरण के साथ ही मैं उठ गया और नीचे आकर फ्रेश हो गया.नहाने के समय मैं सोच रहा था की मैं आशु को ये सब कैसे बताऊँ? वो ये सुन कर परेशान हो जाती पर उससे छुपाना भी ठीक नहीं था. सात बजे तक मैंने और घर के सभी लोगों ने खाना खा लिया था और हम दोनों शहर के लिए निकल पडे. हमेशा की तरह घर से कुछ दूर आते ही आशु मुझसे चिपक कर बैठ गई और अपने ख़्वाबों की दुनिया में खो गई. हमेशा ही की तरह हम उस ढाबे पर रुके और चाय पीने बैठ गये. तब मैंने आशु को सारी बातें बता दी और वो अवाक सी मेरी बातें सुनती रही. मेरे जॉब छोड़ने के डिसिजन से वो सहमत थी पर नये जॉब मिलने के बारे में सोच वो भी काफी टेंशन में थी. "जान! छोडो ये टेंशन ओके? अब ये बताओ की आज शाम का क्या प्लान है?" मैंने बात घुमाते हुए कहा पर आशु का मन जैसे उचाट हो गया था.

फिर कुछ सोचते हुए बोली; "आपके पास अभी कितने पैसे हैं बैंक में?"

"३५,०००/-" मैंने कहा.

"ठीक है, आज से फ़िज़ूल खर्चे बंद! बाहर से खाना-खाना बंद, आप को बनाने में दिक्कत होती है तो मुझे कहो मैं आ कर बना दिया करूँगी.बाइक पर घूमना बंद! मुझसे मिलने आओगे तो बस से आना! मेरे लिए आप कोई भी खरीदारी नहीं करोगे! जब तक आपको अच्छी जॉब नहीं मिलती तब तक ये राशनिंग चलेगी." आशु ने किसी घरवाली की तरह अपना हुक्म सुना दिया. मैंने भी मुस्कुराते हुए सर झुका कर उसकी हर बात मान ली. चाय पी कर हम उठे और वापस शहर की तरफ चल दिये. पहले आशु को कॉलेज ड्राप किया और फिर घर आ गया.घर में घुसा ही था की मैडम का फ़ोन आ गया.उन्होंने मुझे मिलने के लिए एक कैफ़े में बुलाया और साथ अपना लैपटॉप भी लाने को कहा. मैंने अपना लैपटॉप बैग उठाया और पैदल ही चल दिया. वो कैफ़े मेरे घर से करीब २० मिनट दूर था तो सोचा पैदल ही चलु. वहाँ पहुँचा तो मैडम ने हाथ हिला कर मुझे एक टेबल पर बुलाया. मेरे बैठते ही उन्होंने मेरे लिए एक कॉफ़ी आर्डर कर दी. "वो डेड लाइन नजदीक आ रही है और अब तो कोई है भी नहीं मेरी मदद करने वाला, तो प्लीज मेरी मदद कर दो."

"ओके मॅडम!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो मैडम बोलीं; "अब काहे की मॅडम?! अब ना तो मैं बॉस हूँ और न तुम एम्प्लोयी, मैंने यहाँ तुम्हें फ्रेंड के नाते बुलाया हे. कॉल मी नितु!" अब ये सुन कर तो मैं चुप हो गया और मैडम मेरी झिझक भाँप गईं; "कम ऑन यार!"

"इतने सालों से आपको मॅडम कह रहा हूँ की आपको नितु कहना अजीब लग रहा है!" मैंने कहा.

"पर अब इस फॉर्मेलिटी का क्या फायदा? हम अच्छे दोस्त हैं और वही काफी है, ख़ामख़ा उसमें फॉर्मेलिटी दिखाना भी तो ठीक नहीं?!"

"ठीक है नितु जी!" मैंने बड़ी मुश्किल से शर्माते हुए कहा.

"नितु जी नहीं...सिर्फ नितु! और मैं भी अब से तुम्हें राज कहूँगी! और प्लीज अब से मेरे साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करना." मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा.

दोपहर तक हम दोनों वहीँ कैफ़े में बैठे रहे और काम करते रहे. दोपहर को खाने के समय नितु ने ग्रिल्ड सैंडविच और कॉफ़ी मंगाई और अब बस प्रेजेंटेशन का काम बचा था. मैं चलने को हुआ तो नितु ने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया; " तुम्हें पता है, डाइवोर्स को ले कर किसी ने भी मुझे सपोर्ट नहीं किया. मेरे अपने मोम-डैड ने भी ये कहा की जैसे चल रहा है वैसे चलने दे! बस एक तुम थे जिसने मुझे उस दिन सपोर्ट किया. मेरे लिए तुम कोर्ट तक आये और वहाँ तुम पर कितना घिनोना इल्जाम भी लगाया गया .... यू एवन क्वीट योवर जॉब बिकाज ऑफ मी!" इतना कह नितु रोने लगीं तो मैंने उन्हें सांत्वना देने के लिए उनके कंधे को छुआ और धीरे से दबा कर उन्हें ढाँढस बंधाने लगा. "अगर अब भी रोना ही है तो डाइवोर्स के लिए क्यों लड़ रहे हो? रो तो आप पहले भी रहे थे ना?" ये सुन कर उन्होंने अपने आँसु पोछे और मेरी तरफ एक रीकमंडेशन लेटर बढ़ा दिया. मैंने उसे पढ़ा और उनसे पूछ बैठा; "आपने ये कब...आपकी अपनी कंपनी?"

"उस दिन जब तुम मुझे जी. एस. टी. ऑफिस छोड़ने गए थे उस दिन मैं अपनी कंपनी के जी. एस. टी. नंबर के लिए अप्लाई किया था. कुमार के साथ काम कर के इतना तो सीख ही गई थी की पैसे की क्या एहमियत होती है और इस प्रोजेक्ट ने मुझे काफी सेल्फ कॉन्फिडन्स दे दिया. अब तुम अपने रिज्यूमे में मेरी कंपनी का नाम लिख दो और ये रीकमंडेशन लेटर शायद तुम्हारे काम आ जाये."

"थैंक यू!!!" मैं बस इतना ही कह पाया.

"काहे का थैंक यू? जॉब मिलने के बाद पार्टी चाहिए!" नितु ने हँसते हुए कहा. मैं भी हँस दिया और फिर वहाँ से सीधा आशु से मिलने कॉलेज निकला.

आशु गुस्से से लाल बाहर निकली और उसके पीछे ही निशा भी आती हुई दिखाई दी. गेट पर पहुँच कर आशु मेरे पास आई और निशा दूसरी तरफ जाने लगी तभी आशु चिल्लाते हुए उससे बोली; "दुबारा मेरे आस-पास भी दिखाई दी ना तो तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगी!" ये सुन कर मैं हैरान था की अब इन दोनों को क्या हो गया उस दिन का गुस्सा अब तक निकल रहा है?! "क्या हुआ?" मैंने आशु से पूछा. "ये हरामजादी मुझसे हमदर्दी करने के लिए आई और बोली की आपका नितु मैडम से अफेयर चल रहा है और आपके कारन उनका डाइवोर्स हो रहा हे. कुतिया ...कलमुही हरमजादी!" अब ये सुन कर मैं समझ गया की ये लगाईं-बुझाई सब अक्षय की हे. "बस अभी शांत हो जा...कल बताता हूँ मैं इसे!" मैंने आशु को शांत किया. उस ले कर चाय की एक दूकान पर आ गया और उसे चाय पिलाई ताकि उसका गुस्सा शांत हो. फिर मैंने उसे आज के बारे में सब बताया. जो बात मुझे महसूस हुई वो ये थी की उसे नितु बिलकुल पसंद नहीं, क्योंकि आशु के नितुसार मन ही मन वो ही मेरी नौकरी छोड़ने के लिए जिम्मेदार थी. मैं भी चुप रहा क्योंकि मैं खुद नहीं जानता था की जो हो रहा है वो किसका कसूर है! नितु को डाइवोर्स चाहिए था वो तो ठीक है पर मेरा नाम उसमें क्यों घसींटा गया? ना तो मैंने उनसे दोस्ती करने की पहल की थी ना ही उनके नजदीक जाने की कोई कोशिश की थी. खेर आशु से कुछ बातें कर मैंने उसे हॉस्टल छोड़ा और खुद घर लौटा और खाना बनाने की तैयारी कर रहा था. पर एक तरह की बेचैनी थी. आशु के साथ को मिस कर रहा था.

दो दिन बीते और इन दो दिनों में मेरा और आशु का मिलना बदस्तूर जारी रहा. रात को आशु फ़ोन कर के पूछती की कल सुबह आप कहाँ इंटरव्यू देने जा रहे हो और अगले दिन सुबह मुझे बेस्ट ऑफ लक विश करती, दोपहर को ये पूछती की इंटरव्यू कैसा रहा और शाम को हम मिलते.शुक्रवार को जब मैं उससे मिल कर लौटा तो रात को आशु का फ़ोन आया और मुझसे उसने शनिवार का प्लान पूछा. पर उस दिन मेरा कोई इंटरव्यू नहीं था इसलिए मैं घर पर ही रहने वाला था. मुझसे शाम का मिलने का वादा लिया और आशु खाना खाने चली गई. मैं भी अपना खाना बनाने में लग गया.बीते कुछ दिनों में कम से कम मैं खाना ढंग से खा रहा था. वरना तो रोज कच्चा-पक्का बना कर खा लिया करता था. बस एक बात थी. रात में बड़ी बेचैनी रहती थी!

अगली सुबह मैं देर से उठा क्योंकि रात भर नींद ही नहीं आई. सुबह के दस बज होंगे की दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं उठा और दरवाजा खोला. अभी ठीक से देख भी नहीं पाया था की आशु एक दम से अंदर आई और मेरे सीने से कस कर लिपट गई. उसके गर्म एहसास ने मेरी नींद भगा दी और मैं भी उसे कस कर गले लगा कर उसके सर को चूमने लगा. आखिर आशु मुझसे अलग हुई और दरवाजा बंद किया; "आप बैठो मैं चाय बनाती हु." ये कह कर वो चाय बनाने लगी. चाय के साथ-साथ वो पोहा भी ले कर आई, ये पोहा उसने नाश्ते में न खा कर मेरे लिए लाई थी. "तो कोई कॉल आया?" आशु ने पुछा, उसका मतलब था की मैंने जहाँ-जहाँ इंटरव्यू दिए हैं वहां से कोई कॉल आया. "नहीं.... हाँ एक ऑफर आया हे." ये सुनते ही आशु खुश हो गई. "कितनी पे है?" उसने उत्साह से पूछा.

"३५के ... मतलब ३५,०००/-" अब मेरे मुँह से ये सुन कर आशु की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. पर जब मैंने आगे; "पर यहाँ नहीं बरैली जाना होगा!" कहा तो वो उदास हो गई. "मेरी जान! मैं नहीं जा रहा अपनी जानेमन को छोड़ कर." मेरी बात से उसे तसल्ली हुई पर ख़ुशी नही. "चले जाओ ना! ३५ के... कम नहीं होते!" आशु ने अपने मन को मारते हुए कहा. "सच में चला जाऊँ?" मैंने थोड़ा मस्ती करने के इरादे से कहा, आशु ने बस जवाब में सर हिला दिया. "पक्का?" मैंने फिर मस्ती करते हुए पूछा. "हाँ!!!! कौन सा हमेशा के लिए जाना है? २ साल की ही तो बात है, फिर तो हम दोनों शादी कर लेंगे." आशु ने बेमन से जवाब दिया और पूरी कोशिश की कि अपने मुँह पर नकली मुखौटा लगा ले.आशु उस समय मेरे सामने कुर्सी पर बैठी थी और मैं उसके सामने पलंग पर बैठा था. मैं उठा और जा के आशु को पीछे से अपने बाजुओं से जकड़ लिया और आशु के कान में होले से खुसफुसाया; "तुम्हें पता है पिछले कुछ दिनों से मुझे तुम्हारी 'लत' पड़ गई हे. रात को बस तुम्हें ही याद करता रहता हूँ और तुम्हारी ही कमी महसूस करता हूँ, करवटें बदलता रहता हु. ऐसा क्या जादू कर दिया तुमने मुझ पर?" ये कहते हुए मैंने आशु के दाएँ गाल को चूम लिया. आशु उठ खड़ी हुई, मुझे बिस्तर तक खींच कर ले गई और मुझे अपने ऊपर झटके से खींच लिया. हम दोनों ही बिस्तर पर जा गिरे, नीचे आशु और उसके ऊपर मैं. हम दोनों ही की आँखों में प्यास झलक रही थी. मैंने आशु की होठों को अपनी गिरफ्त में लिया और उनको चूसने लगा और इधर आशु के दोनों हाथ मेरी टी-शर्ट उतारने के लिए मेरी पीठ पर चल रहे थे. तभी अचानक से नितु का फ़ोन बज उठा, मैंने आशु को होठों को छोड़ा और स्क्रीन पर किसका नाम है ये देखा. मैंने कॉल साइलेंट किया और आशु की आँखों में देखा तो उसमें एक चिंगारी नजर आई. आशु ने करवट ले कर मुझे अपने बगल में गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर चढ़ गई. उसने बहुत तेजी से मेरे होठों पर हमला किया और उसे चूसने लगी. आज उसका मुझे किस करना बहुत आक्रामक था. मैं अपने दोनों हाथों से आशु का चेहरा थामना था पर आशु बार-बार अपनी गर्दन कुछ इस तरह हिला रही थी की मैं उसे थामने में असफल हो रहा था. उसका निशाने पर मेरे होंठ जिसे आज वो चूस के निचोड़ लेना चाहती थी. फिर अगले आशु मुझ पर से उतरी और अपने पटिआला का नाडा खोला और वो सरक कर नीचे जा गिरा, फिर उसने अपनी पैंटी निकाली और फटाफट मेरे लोअर को खींचा और उसे बिना पूरा निकाले बस लिंग को बाहर निकाला. मैं उसे ये सब करता हुआ देख रहा था. वो फिर से मेरे ऊपर चढ़ गई और मेरे लिंग को पकड़ के अपनी योनी पर टिकाया.धीरे-धीरे वो उस पर अपना वजन डालते हुए उसे अपनी योनी में समा ने लगी. दर्द की लकीरें उसके माथे पर छाईं थीं पर आशु अपने होठों को दबा के दर्द को अपने मुँह में होते नीचे आ रही थी. जैसे ही पूरा लिंग अंदर पहुँचा की आशु की आँखें दर्द से बंद हो गईं, उसने अपने दोनों होठों अब भी अपने मुँह में दबा रखे थे और अपनी चीख मुँह में दफन कर चुकी थी. लगभग मिनट भर लगा उसे मेरे लिंग को अपनी योनी में एडजस्ट करने में और फिर अपने दोनों हाथ मेरी छाती पर टिका आशु ने ऊपर-नीचे होना शुरू किया.
 
अगले पल ही उसकी स्पीड तेज हो चुकी थी और उसकी योनी अंदर ही अंदर मेरे लिंग को जैसे चूसने लगी थी. मैं आशु की योनी का दबाव अपने लिंग पर साफ़ महसूस कर रहा था. मेरा पूरा जिस्म एक दम से गर्म हो गया था मानो जैसे की उसकी योनी मेरे लिंग के जरिये मेरी आत्मा को चूस रही हो. पाँच मिनट तक आशु जितना हो सके उतनी तेजी से मेरे लिंग पर कूद रही थी और मे उसे निचोड़ रही था. फिर अगले ही पल वो मुझ पर लेट गई और अपना सर मेरी छाती पर रख दिया. मैंने उसे नीचे किया, अपने घुटने बिस्तर पर टिकाये और तेजी से कमर हिलाना शुरू कर दिया. हर धक्के के साथ मेरी स्पीड बढ़ने लगी. आशु ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया और मेरी आँखों में देखने लगी. आज मैं पहली बार उसकी आँखों में एक आग देख पा रहा था. मुझे ऐसे लगने लगा जैसे वो यही आग मेरे जिस्म लगाना चाहती हो. आशु बिना पलकें झपके मेरी आँखों में देख रही थी. उसके मुँह से कोई सिसकारी नहीं निकल रही थी बस एक टक वो मेरी आँखों में झाँकने में लगी थी. हर धक्के के साथ उसका जिस्म हिल रहा था और नीचे उसकी योनी भी पूरी प्रतिक्रिया दे रही थी पर आशु की आँखें मेरी आँखों में गड़ी थी. पाँच मिनट होने को आये थे और अब आशु छूटने की कगार पर थी. तभी उसने अपनी पकड़ मेरे चेहरे पर खडी कर दी और मेरी आँखों में गुस्से से चिल्लाती हुई बोली; “यू आर ब्लडी माईन!” इतना कहते हुए वो झड़ गई. उसके हाथों से मेरा चेहरा आजाद हुआ और इधर आखरी झटका मारता हुआ मैं भी उसकी योनी में झड़ गया और आशु के ऊपर से लुढ़क कर बगल में गिर गया.

सासें दुरुस्त होने तक मेरे दिमाग बस आशु के वो शब्द ही घूम रहे थे, मैं समझ गया था की उसके मन में अब भी मुझे ले कर इनसिक्युरीटी थी! पर मेरे कुछ कहने से पहले ही आशु मेरी तरफ पलटी और अपना सर मेरी छाती पर रखते हुए बोली; "जानू...." पर मैं ने उसकी बात काट दी और उसे खुद से दूर धकेला और उसके ऊपर आ गया.अब मेरी आँखों में भी वही आग थी जो कुछ पल उसकी आँखों में थी. "एक बार बोलूँगा उसे ध्यान से सुन और अपनी दिल और दिमाग में बिठा ले! मैं सिर्फ तेरा हूँ और तू सिर्फ मेरी है, हमारे बीच कोई नहीं आ सकता! समझ आया? आज के बाद फिर कभी तूने इनसिक्युअर फील किया ना तो खायेगी मेरे हाथ से!" मैंने गुस्से से अपने दाँत पीसते हुए कहा और जवाब में आशु ने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दीं और मैंने उसे एक जोरदार किस किया! ये किस इस बात को दर्शा रहा था की मेरा उसके लिए प्यार अटूट है और चाहे कुछ भी होजाये ये प्यार कभी कम नहीं होगा. किस कर के में आशु के ऊपर से हटा और बाथरूम चला गया, मुँह-हाथ धो कर बाहर आया तो आशु खिड़की के सामने अपनी दोनों टांगें अपनी छाती से मोड बैठी बाहर देख रही थी. मैं उसके साथ खड़ा हो कर बाहर देखने लगा और आशु ने अपने बाएँ हाथ को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट कर मुझे अपने और नजदीक खींच लिया. “गो वॉश योवरसेल्फ!” मैंने कहा तो आशु उठी और मेरे सीने पर किस करके बाथरूम चली गई और मैं बाएँ हाथ से खिड़की को पकडे बाहर देखने लगा. आशु पीछे से आई और अपने गीले हाथों को मेरी छाती को जकड़ते हुए मुझसे सट कर खड़ी हो गई. मैं उसे अपने साथ बिस्तर पर ले गया और खींच कर उसे अपना ऊपर गिरा लिया, और हम ऐसे ही लेटे रहे. पूरी रात जिसने बड़ी मुश्किल से काटी हो उसके लिए तो ये पल खुशियों से भरा होगा. मुझे कब नींद आ गई कुछ होश नहीं रहा जब उठा तो कमरे में देसी घी की खुशबु फैली हुई थी. दाल रोटी खा कर हम दोनों खिड़की के सामने जमीन पर बैठे थे. आशु अपनी पीठ मेरे सीने से लगा कर बैठी थी;

आशु: आप वो बरैली वाली जॉब कर लो.

मैं: जान! आप जानते हो बरैली यहाँ से पाँच घंटे दूर है! फिर हम रोज-रोज नहीं मिल पाएंगे, सिर्फ एक रविवार ही मिलेगा और उस दिन भी घर जाना पड़ गया तो?

आशु: थोड़ा एडजस्ट कर लेते हैं?

मैं: जान! एक आध दिन की बात नहीं है? यहाँ पर जॉब ओपनिंग कब खुलेगी कुछ पता नहीं है? और ये बताओ तब तक मेरे बिना आप रह लोगे?

आशु ये सुन कर खामोश हो गई!

मैं: मैं तो नहीं रह सकता आपके बिना. पता है पिछले कुछ दिनों से मेरा क्या हाल है आपके बिना? दिन तो जैसे-तैसे गुजर जाता है पर रात है की कमबख्त खत्म ही नहीं होती. मेरा दिल आपके जिस्म की गर्माहट पाने के लिए बेचैन रहता हे. क्या जादू कर दिया तुमने मुझ पर?

आशु: ये मेरे प्यार का भूत है जो आपके जिस्म से चिपका हुआ है!

आशु ने हँसते हुए कहा. पर कुछ देर चुप रहने के बाद वो मुस्कुराते हुए बोली;

आशु: जानू दशेहरा आने वाला हे.

मैं: हाँ तो?

आशु: फिर करवाचौथ आएगा....

इतना कह के आशु चुप हो गई और उसके पेट में तितलियाँ उड़ने लगी. मैं समझ गया की उसका मतलब क्या है;

मैं: तो क्या चाहिए मेरी जानू को करवाचौथ पर? (मैंने आशु को कस कर अपनी बाहों में जकड़ते हुए कहा.)

आशु: बस आप!

मैं: मैं तो तुम्हारा हो चूका हूँ ना?

आशु: वो पूरा दिन मैं आपके साथ बिताऊँगी और उस दीं उपवास भी रखुंगी.

मैं: जो हुक्म बेगम साहिबा!

ये सुनते ही आशु खिलखिला कर हँस पडी. उसकी ये खिलखिलाती हँसी मुझे बहुत पसंद थी और में आँख मूंदें उसकी इस हँसी को अपनी रूह में उतारने लगा. पर अगले ही पल वो चुप हो गई और मेरी तरफ आलथी-पालथी मार के बैठ गई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली;

आशु: आई एम सॉरी जानू! मैंने उस टाइम आपको ..... वो सब कहा!

मैं: हम्म्म... कोई बात नही. आई नो तू मुझे ले कर कितना पजेसिव है बट तेरी इनसिक्युरीटी मुझे बहुत गुस्सा दिलाती हे.

आशु: मैं क्या करूँ? बहुत मुश्किल से मैंने अपनी इस इनसिक्युरीटी को काबू किया था पर कुतिया (निशा) की वजह से सब कुछ खराब हो गया! मुझे आप पर भरोसा है पर मुझे ये डर लगता है की नितु मैडम आपको मुझसे छीन लेगी. अब तो आपने उन्हें नितु भी कहना शुरू कर दिया! आपको पता है मुझे कितनी जलन होती है जब आप उसे नितु कहते हो? प्लीज मेरे लिए उससे मिलना बंद कर दो? मैंने आप से जो भी माँगा है आपने वो दिया है, प्लीज ये एक आखरी बार... प्लीज... मैं आगे से आपसे कुछ नहीं माँगूगी.

आशु ने रोते-रोते सब कहा और फिर आकर मेरे सीने से लग गई और रोती रही.

मैं: नितु के साथ बस एक आखरी प्रेजेंटेशन बाकी है उसके बाद वो अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते.

आशु: उसके बाद आप उससे नहीं मिलोगे ना?

मैं: नहीं

आशु: शुक्रिया!

तब जा कर आशु का रोना बंद हो गया.जब सुबह आशु ने मुझसे 'यू आर ब्लडी माईन!' कहा था मैं तब ही समझ चूका था की उसकी इनसिक्युरीटी कभी खत्म नहीं होगी. मैं चाहे उसे कितना भी समझा लूँ वो नहीं समझेगी और फिर कहीं वो कुछ उल्टा-सीधा न कर दे इसलिए मैंने उसकी बात मान ली थी. इतना प्यार करता था आशु से की उसके लिए एक दोस्ती कुर्बान करने जा रहा था! शाम को ठीक ६ बजे मैंने आशु को उसके हॉस्टल छोड़ा और घर आ गया.घर घुसते ही नितु का फ़ोन आ गया, उन्होंने मुझे प्रेजेंटेशन देने के लिए समय माँगा.मंडे का दिन फाइनल प्रेजेंटेशन था और उन्होंने मुझे ठीक ग्यारह बजे उसी कैफ़े में बुलाया. इधर मेरी मेल पर मुझे एक इंटरव्यू के लिए मंडे को बारह बजे बुलाया गया.इसलिए मैंने नितु को फ़ोन कर के प्रेजेंटेशन १० बजे रीशेड्युल करवाई और वो मान भी गई.

अगले दिन रविवार था. मैं जानता था की आशु आज भी आएगी, मैं जल्दी उठा और नहा-धो के तैयार हो गया और उसका इंतजार करने लगा. ठीक दस बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मैंने भाग कर दरवाजा खोला. सामने वही आशु का खिल-खिलाता चेहरा और उसके हाथ में एक थैली जिसमें अंडे थे! आशु सबसे पहले मेरे गले लगी और फिर हम ऐसे ही गले लगे हुए अंदर आये और दरवाजा बंद किया. फिर आशु ने अंडे संभाल कर किचन काउंटर पर रख दिए; "आज आप मुझे ऑमलेट बनाना सिखाओगे!" उसने बड़ी अदा से कहा. मैंने आशु को पलटा और उसका मुँह किचन काउंटर की तरफ किया, इशारे से उसे प्याज उठाने को कहा और इस मौके का फायदा उठा कर उसकी कमर से होते हुए उसके पेट पर अपने हाथों को लॉक कर के अपने जिस्म से चिपका लिया. आशु की गर्दन को चूमते हुए मैंने उसे प्याज छीलने को कहा, फिर उसके गर्दन की दायीं तरफ चूमा और उसे प्याज काटने को कहा. प्याज काटते समय दोनों ही की आँखें भर आईं थीं! आँखों से जब पानी आने लगा तो हम दोनों हँस दिए और मैंने आशु को अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया. जैसे ही मैं जाने को मुड़ा तो आशु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली: "मुझे छोड़ कर कहाँ जा रहे हो आप?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा; "अपनी जानेमन को छोड़ कर कहा जाऊँगा?!" तो वो बोली; "जैसे पकड़ के खड़े थे वैसे ही खड़े रहो!" अब उसका आदेश मैं कैसे मना कर सकता था. मैं फिर से आशु के पीछे चिपक कर खड़ा हो गया और अपने हाथ फिर से उसके पेट पर लॉक कर लिए. प्याज कट गए थे अब मैंने उसे हरी मिर्च काटने को कहा; "कितनी मिर्च काटूँ?" आशु ने पुछा तो मैंने उसके दाएँ गाल से अपने गाल मिला दिए और कहा; "पिछले कुछ दिनों से जितनी तू स्पाइसीहो गई है उतनी मिर्च काट!" ये सुन कर आशु धीरे से हँस पड़ी और उसने ३ मिर्चें काटी. अब बारी थी अंडे तोड़ने की जो आशु को बिलकुल नहीं आता था. मैंने पास ही पड़ी कटोरी खींची और स्पून स्टैंड से एक फोर्क निकाला. फिर मैंने पीछे खड़े-खड़े आशु को अंडा कैसे तोडना है वो सिखाया.फोर्क से धीरे से 'टक' कर के अंडे के बीचों बीच मारा और फिर अपने दोनों अंगूठों की मदद से अंडा तोड़ के कटोरी में डाल दिया. जब अंडे की जर्दी वाला हिस्सा आशु ने देखा तो उसके मुँह में पानी आ गया."जान! अभी ये कच्चा है, स्मेल आएगी पाक जाने दो फिर खाना." फिर आशु को अंडा फटने को कहा. पास ही पड़े कपडे से मैंने अपने हाथ पोंछें और फिर से आशु को पेट पर अपने हाथों को लॉक किया.
 
अब मैने आशु की गर्दन के हर हिस्से को चूमना शुरू कर दिया. हर बार मेरे गीले होंठ उसे छूटे तो वो सिंहर जाती और उसके मुँह से सिसकारी फूटने लगती. अंडा फिट गया था अब उसमें प्याज और मिर्च मिला के आशु ने पुछा की अब और इसमें क्या डालना है. मैंने उसे नमक डालने को कहा तो वो पूछने लगी की कितना डालूँ तो इसके जवाब में मैंने आशु के दाएँ गाल को पाने मुँह में भर उसे चूसा और छोड़ दिया. "बस इतना डाल!" आशु शर्मा गई और उसने थोड़ा नमक डाला मैंने ऊपर शेल्फ पर पड़ी ऑरेगैनो सीज़निंग उठाई और एक चुटकी उसमें डाल दी. अब मैंने आशु को अपनी गिरफ्त से आजाद किया और गैस जलाई और उस पर फ्राइंग पैन रखा. आशु साइड में खड़ी मुझे देखने लगी. फिर मैंने उससे मख्हन लाने को कहा और वो फ्रिज से मक्खन ले आई. मक्खन फ्राइंग पैन में डाला तो वो तुरंत ही पिघल गया, अब मैंने आशु से कहा की वो गौर से देखे, तो आशु किचन काउंटर पर बैठ गई. अंडे वाला घोल मैंने जैसे ही डाला उसकी खुशबु पूरे घर में फैलने लगी. जब पलटने की बारी आई तो मैंने फ्राइंग पैन को हैंडल से पकड़ा और उसे आगे-पीछे हिलाने लगा. फिर एक झटका दे कर मैंने पूरा ऑमलेट पलटा, थोड़ा बहुत छिटक कर नीचे गिर गया पर आशु इस प्रोफेशनल तरीके को देख खुश हो गई और उसे भी सिखाने को कहने लगी. ऑमलेट बन कर तैयार था; "पर ये तो मैं ही खा जाऊँगी? आप क्या खाओगे?" आशु ने किसी छोटे बच्चे की तरह कहा. "फ्रेंच टोस्ट खाओगी?" मैंने आशु से पूछा.

"वो क्या होता है?" आशु ने ऑमलेट की एक बाईट लेते हुए कहा. मैंने उसे ब्रेड और दूध ले के आने को कहा. आशु सब ले कर आ गई और फिर से काउंटर पर बैठ कर ऑमलेट खाने लगी. मैंने दूध और अंडे को मिक्स किया और उसमें हलकी सी चीनी और नमक-मिर्च मिला कर ब्रेड उसमें डूबा कर फ्राइंग पैन पर डाला मीठी सी सुगंध आते ही आशु आँखें बंद कर के सूंघने लगी. "वाव!!!" ये कहते हुए उसकी आँखें चमक उठी! आधा ऑमलेट उसने मेरे लिए छोड़ दिया और मुँह में पानी भरे वो टोस्ट के बनने का इंतजार करने लगी.

टोस्ट रेडी होते ही मैंने उसे दिया तो उसने जल्दी-जल्दी से उस की एक बाईट ली; "मममम.....!!!" फिर उसने मेरे कंधे को पकड़ के अपने पास खींचा और मेरे दाएँ गाल को चूम लिया. "इतना अच्छा खाना बनाते हो आप? फिर बेकार में बाहर से क्यों खाना? आज से आप ही खाना बनाओगे!" आशु ने कहा.

"तुम साथ हो इसलिए इतना अच्छा खाना बन रहा है!" मैंने अगला टोस्ट फ्राइंग पैन में डालते हुए कहा.

"सच? तो शादी के बाद भी आप ही खाना बनोगे ना?" आशु ने मुझे ऑमलेट खिलाते हुए कहा.

"व्हाय नॉट?!!!"

"अच्छा जानू एक बात पूछूँ?"

"हाँ जी पूछो!" मैंने बहुत प्यार से कहा.

"मुझे ये प्रेगनेंसी वाली गोलियां कब तक खानी है?"

"जब तक हम शादी हो कर सेटल नहीं हो जाते तब टक!" मैंने एक और टोस्ट आशु की प्लेट में रखते हुए कहा.

"पर शादी के कितने महीने बाद?" आशु ने अपनी ऊँगली दाँतों तले दबाते हुए कहा. मैंने गैस बंद की और दोनों हाथों से उसके दोनों गाल खींचते हुए पुछा; "बहुत जल्दी है तुझे माँ बनने की?"

"हम्म...उससे ज्यादा जल्दी आपको पापा बनाने की है!"

"जब तक चीजें सेटल नहीं होती तब तक तो कुछ नहीं! आई नो .... पेनफुल है... बट कोई और चारा भी नहीं! घर से भाग कर नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नही." इसके आगे मैं कुछ नहीं बोलै क्योंकि फिर आशु का मन खराब हो जाता. उसने भी आगे कुछ नहीं कहा, शायद वो समझ गई थी की बिना नौकरी के अभी ये हाल है तो शादी के बाद तो मेरी जिमेदारी बढ़ जाएगी! खेर हमने किचन में ही खड़े-खड़े नाश्ता किया और फिर कमरे में आ कर बैठ गये. मैंने आशु को चाय बनाने को कहा और मैं बाथरूम में घुस गया.तभी अचानक दरवाजे पर नॉक हुई और इससे पहले की मैं बाथरूम से निकल कर दरवाजा खोलता आशु ने ही दरवाजा खोल दिया.

सामने मोहित और प्रफुल खड़े थे और उन्हें देखते ही आशु की सिटी-पिट्टी गुल हो गई. वो दोनों भी एक दूसरे को हैरानी से देखने लगे? इतने में मैं बाथरूम से बाहर आया और उन दोनों को अपने सामने दरवाजे पर खड़ा पाया और मुँह से दबी हुई आवाज में निकला; "ओह शीट!" आशु ने दोनों को नमस्ते कही और अंदर आने को कहा. दोनों अंदर आये तो आशु ने अपनई जीभ दांतों तले दबाई और होंठ हिलाते हुए मुझे सॉरी कहा. इधर मोहित और प्रफुल मुझे देख कर हँस रहे थे, हाथ मिला कर हम गले मिले और दोनों बैठ गये. प्रफुल ने मेरी तरफ एक कागज़ का एनवेलप बढ़ाया, मैंने वो खोल कर देखा तो उसमें मेरी सैलरी का चेक था.

"ये सर ने दिया है!" प्रफुल ने कहा और मैंने भी वो एनवेलप देख कर टेबल पर रख दिया.

"और बताओ क्या हाल-चाल?" मैंने पूछा.

"सब बढ़िया, पर तूने क्यों जॉब छोड़ दी?" मोहित ने पूछा.

"कुमार ने कुछ बोला नहीं?" मैंने पुछा तो दोनों ने ना में सर हिलाया.

मैं बस मुस्कुराया और कहा; "यार ...उस साले की वजह से छोड़ी!" मैंने बात को हलके में लेते हुए कहा. इधर आशु पलट कर किचन में जाने लगी तो प्रफुल ने मजाक करते हुए पुछा; "अरे डॉली जी! आप यहाँ कैसे?" आशु पलटी और शर्म से उसके गाल लाल थे! वो बस मुस्कुराने लगी और मेरी तरफ देखने लगी.

"यार जैसे तुम दोनों को मेरी जॉब का पता चला और तुम मुझसे मिलने आ गए वैसे ही जब 'इनको' पता चला की मैंने जॉब छोड़ दी है तो मुझे मिलने आ गईं!"

"अच्छा???" मोहित ने मेरी टांग खींचते हुए कहा. "पर हमें तो तेरा घर पता था. डॉली जी को कैसे पता चला?" मोहित ने अपनी खिंचाई जारी रखी.

"वो...एक दिन देख लिया था 'इन्होने' मुझे." मैंने फिर से सफाई दी.

"अबे जा साले!" प्रफुल ने कहा.

"नहीं प्रफुल जी ... वो मेरी एक फ्रेंड यहीं नजदीक रहती है ...उसी से मिलने एक दिन आई थी... तब मैंने ... 'इन्हें'...मतलब राज जी को देखा!" आशु ने जैसे-तैसे बात संभालते हुए कहा.

"इन्हें ??? क्या बात है?" मोहित ने अब आशु को चिढ़ाने के लिए कहा और ये सुन हम तीनों हँस पड़े और आशु ने शर्म से गर्दन झुका ली.

"शादी-वादी तो नहीं कर लिए हो?" प्रफुल ने मजाक-मजाक में कहा और हम तीनों हँसने लगे.

"यार शादी करते तो तुम दोनों को नहीं बताते? गवाही तो तुम दोनों ही देते!" मैंने आशु का बचाव करते हुए कहा पर ये सुन कर पूरे कमरे में हँसी गूंजने लगी. आशु भी अब हमारे साथ हँसने लगी थी और अब सारी बात खुल ही चुकी थी तो उसे एक्सेप्ट करने के अलावा किया भी क्या जा सकता था. मोहित और प्रफुल भले ही मेरे कलिग थे पर दिल के बहुत अच्छे थे. ऑफिस में कभी भी हमारे बीच किसी भी तरह की होड़ या तीखी बहस नहीं होती थी. कलिग कम और अच्छे दोस्त ज्यादा थे मेरे! आखिर आशु किचन में जा के सब के लिए चाय बनाने लगी.

"तो कब से चल रहा है ये?" मोहित ने पूछा.

"यार जब पहली बार आशु को देखा तो बस.....हाय!" मैंने आवाज ऊँचीं कर के कहा ताकि आशु सुन ले.

"चल अच्छी बात है यार! काँग्राचूलेशन!!!" मोहित ने कहा.

"भाई हमें तो कॉन्फिडेंस में ले लेता! हम कौनसा किसी को बता देते?" प्रफुल ने मुझे मेरी गलती की याद दिलाई.

"यार बताने वाला हुआ था और फिर ये सब हो गया." मैंने कहा इतने में आशु चाय बना कर ले आई और उसने मोहित और प्रफुल को दी.

"पर तूने जॉब छोड़ी क्यों?" प्रफुल ने जोर दे कर पुछा पर मैं इस टॉपिक को अवॉयड कर रहा हे.

"आपके बॉस ने इन पर इल्जाम लगा दिया की इनका उनकी बीवी के साथ नाजायज संबंध है!" आशु ने तपाक से बोला और ये सुन दोनों उसे आँखें फाड़े देखने लगे.

"क्या बकवास है ये?" मोहित ने कहा.

"तेरा और मैडम के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर? पागल हो गया है क्या वो साला?" प्रफुल बोला.

"कोर्ट में केस है और जब ये बात उस दिन इन्हें पता चली तो इन्होने उसी वक़्त अपना रेसिग्नेशन दे दिया." आशु बोली.

"ये तो बहुत बड़ी चिरांद निकला!" प्रफुल ने सर पीटते हुए कहा.

"प्रफुल जी आपके बॉस ने खुद गर्लफ्रेंड फंसा रखी है और इल्जाम इन पर लगाते हैं." आशु ने चाय का कप रखते हुए कहा. ये सुन कर दोनों सन्न थे! "आप दोनों अपना ध्यान रखना कहीं वो आपको ही न फँसा दे! सब कुछ पहले से प्लान था. पहले वो मुंबई के ट्रिप का बहाना, फिर वो राखी की शादी का काण्ड और फिर बाकी की रही सही कस्र नितु मैडम ने पूरी कर दी!" आशु ने गुस्से से कहा.

"आशु ....मैडम ने क्या किया?" मोहित ने पुछा, तो मैं समझ गया की आशु अब उस दिन होटल की सारी बात बक देगी. इसलिए मैंने ही बात संभाली;

"कुछ दिन पहले मैडम ने मुझसे लिफ्ट मांगी थी. उन्हें जी. एस. टी. ऑफिस जाना था. वहाँ से उन्होंने कहा की कबाब खाते हैं, अब कुमार ने हमारे पीछे जासूस छोड़ रखे थे जिसने हमें देख लिया और फोटो खींच ली."
 
मेरी बात सुन कर दोनों हैरान थे और उन्हें कहीं भी मेरी गलती नहीं लगी. खेर थोड़ा हँसी मजाक हुआ और चाय पी कर वो दोनों निकलने को हूये.

"अच्छा भाभी जी! चलते हैं, ये तो शुक्र है की आप यहाँ थे वरना ये साला तो कभी हमें चाय तक नहीं पूछता." प्रफुल ने मजाक करते हुए कहा. उसके मुँह से 'भाभी जी' सुन कर आशु की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था.

"चल भाई लव बर्ड्स को अकेला छोड़ देते हैं वरना मन ही मन दोनों गाली देते होंगे!" मोहित ने भी टांग खींचते हुए कहा. मैं दोनों के गले मिला और उन्हें छोड़ने नीचे उतरा. नीचे आ कर तो दोनों ने मेरी जम कर खिंचाई की ये बोल-बोल कर की लड़की पटा ली और हमें बताया भी नही. उन्हें छोड़ कर मैं ऊपर आया तो आशु चाय के बर्तन धो रही थी. मैंने दरवाजा बंद कर आशु को फिर पीछे से अपनी बाहों में भर लिया. "जानू! ये भाभी शब्द सुनने में बहुत अच्छा लगता हे." आशु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा. मेरे हाथ आशु के सीने तक पहुँच गए और उसके स्तन मेरी मुट्ठी में आ गये. मैंने उन्हें धीरे-धीरे मसलना शुरू कर दिया. "अब तो जल्दी से मुझे अपने दोस्तों की भाभी बना दो ना?" आशु ने कसमसाते हुए कहा.

"पहले तुम्हें ढंग से बीवी तो बना लु." मैंने आशु की गर्दन पर धीरे से काटा. "ससससस...आह!हह..!!!" इस आवाज के साथ ही आशु ने जल्दी से हाथ धोये और मेरी तरफ पलट गई. "आप ना? बहुत शरारती हो!" ये कहते हुए आशु मुझसे चिपट गई. मैंने आशु को अपनी गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटा दिया. मैं उसके ऊपर आ कर उसे किस करने वाला था की आशु ने अपने सीधे हाथ की ऊँगली मेरे होंठों पर रख दी. "सॉरी जान! आज सुबह से मेरे पीरियड्स शुरू हो गए!| आशु ने मायूस होते हुए कहा. मैंने झुक कर उसकी नाक से अपनी नाक लड़ाई और उसके माथे को चूमा. मैं उठा और फ्रिज से डेरी मिल्क चॉकलेट निकाली और उसे दी. "ये क्यों? आशु ने पूछा. "यार मैंने इंटरनेट पर पढ़ा था की पीरियड्स के टाइम लड़कियों को चॉकलेट और आइस-क्रीम बहुत पसंद होती हे."

"अच्छा? और क्या-क्या पढ़ा आपने?"

"ये ही की इन दिनों लड़कियां बहुत चिड़चिड़ी हो जाती हैं." मैंने आशु को चिढ़ाते हुए कहा.

"मैं कब हुई चिड़चिड़ी?" ये कह कर आशु मुझसे रूठ गई और दूसरी तरफ मुँह कर लिया. मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के अपनी तरफ घुमाई और कहा; "हो गई ना नाराज?" ये सुन कर आशु मुस्कुरा दी.

"आपने कब से ये सब पढ़ना शुरू कर दिया? पीरियड्स मुझे पहली बार थोड़े ही हुए हैं?" आशु ने चॉकलेट की बाईट लेते हुए कहा.

"बाप बनना है तो इन चीजों का ख्याल तो रखना ही होगा ना? पहले मैं इतना इंटरेस्ट नहीं लेता था पर जब से घर बैठा हूँ तो रात को यही सब पढता रहता हु." मैंने कहा.

"प्रेगनेंसी मैं हैंडल कर लूँगी! आप बाकी सब देखो?" आशु ने पूरे आत्मविश्वास से कहा.

"बाकी सब भी देख रहा हु." ये कहते हुए मैंने अपनी डायरी निकाली और उसमें मैंने बैंगलोर में सेटल होने से जुडी सारी चीजें लिखी थी. नए घर बसाने का सारा जिक्र था उसमें, बर्तन-भांडे से ले कर परदे, बेडशीट सब कुछ. अपने लैपटॉप पर मैंने प्रॉपर्टी वाले जो लिंक बुकमार्क कर रखे तो वो सब मैं आशु की दिखाने लगा. घर का ३६० डिग्री व्यू था और मैं आशु को सब बता रहा था की कौन सा हमारा कमरा होगा और कौन सा किचन होगा. किस फ्लैट का कितना भाड़ा है और कितना डिपाजिट लगेगा सब कुछ लिखा था. आशु मेरी सारी प्लानिंग देख कर हैरान थी और ये सब सुन कर उसकी आँखें भर आई. "हे!!! क्या हुआ जान?" मैंने आशु के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए कहा. "आज मुझे मेरे सपनों का संसार दिखाई दिया.... शुक्रिया!!!" मैंने आशु को अपने सीने से लगा लिया और उसे रोने नहीं दिया. "अच्छा दशहरे की छुट्टियाँ कब से हैं?" मैंने बात बदलते हुए कहा ताकि आशु का ध्यान हटे और वो और न रोये.

"नेक्स्ट टू नेक्स्ट वीक से! फ्रायडे अगर छुट्टी कर लूँ तो फिर सीधा मंडे को कॉलेज ज्वाइन करुंगी." आशु ने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा. दशहरे का कुछ ख़ास प्लान नहीं था बस घर जाना था. हालाँकि आशु मना कर रही थी घर जाने से और कह रही थी की दशहरे हम शेहर में एक साथ मनाते है पर मैंने उसे समझाया की ऐसे घर नहीं जाने से वो लोग कभी भी यहाँ टपक सकते हैं और फिर सारा रायता फ़ैल जायेगा. आशु को बात समझ आ गई और उसने बात मान ली. दोपहर को खाना मैंने और आशु ने मिल कर बनाया और हमारी मस्ती चलती रही, मैं आशु को और वो मुझे बार-बार छूती रहती. खाना खा कर मैंने उसे कल की प्रेजेंटेशन के बारे में याद दिलाया तो उसने फिर से मुझे याद दिलाते हुए कहा; "कल लास्ट टाइम है!" मैंने बस हाँ में सर हिलाया और फिर ५ बजे उसे हॉस्टल छोड़ आया. घर आ कर दोपहर का खाना गर्म कर खाया, आशु से कुछ देर चैट की और फिर ‘प्यासा’ ही सो गया!

अगली सुबह मैं उठ कर तैयार हुआ और सबसे पहले कैफ़े पहुँचा और वहां नितु पहले से ही मेरा इंतजार कर रही थी. हम बिलकुल कोने में बैठे थे ताकि प्रेजेंटेशन के दौरान कोई हमें डिस्टर्ब न दे. वीडियो कॉल पर प्रेजेंटेशन शुरू हुआ और जल्दी ही सारा काम निपट गया.नितु ने प्रेजेंटेशन के बाद थैंक यू कहा और साथ ही ये भी बताया की वो कल बैंगलोर जा रहीं हे. मैंने उसने आगे और कुछ नहीं पुछा और जल्दी-जल्दी सीधा इंटरव्यू के लिए निकल गया.इंटरव्यू सक्सेसफुल नहीं था क्योंकि वहाँ कोई अपनी जान-पहचान निकाल लाया था! मैं हारा हुआ घर आया और लेट गया, मन में यही बात आ रही थी की ५ दिन में तू ने हार मान ली तो इतनी बड़ी लड़ाई कैसे लड़ेगा? आँखें बंद किये हुए कुछ देर लेटा रहा और फिर अचानक से मुझे भगवान् का ख्याल आया. जब कोई रास्ता दिखाई नहीं देता तो एक भगवान् के घर का ही रास्ता दिखाई देने लगता है, में उठा और मंदिर जा पहुंचा. वहां बैठे-बैठे मन ही मन में मैंने अपने दिल की सारी बात भगवान् से कह दी, कोई जवाब तो नहीं मिला पर मन हल्का हो गया.ऐसा लगने लगा जैसे की कोई कह रहा हो की कोशिश करता रह कभी न कभी तो कामयाबी मिल जायेगी. मंदिर की शान्ति से मन काबू में आने लगा था इसलिए शाम तक मैं मंदिर में ही बैठा रहा.

ठीक ४ बजे मैं आशु के कॉलेज के लिए निकला, जब आशु ने मेरे मस्तक पर टिका देखा तो वो असमंजस में पड़ गई और फिर एक दम से उदास हो गई. हम चलते-चलते एक पार्क में पहुँचे और तब मैंने बात शुरू की; "क्या हुआ? अभी तो तेरे मुँह खिला-खिला था. अचानक से उदास कैसे हो गई?" आशु ने गर्दन झुकाये हुए कहा; "आपने नितु से शादी कर ली ना?" ये सुन कर मैं बहुत तेज ठहाका मार के हँसने लगा. उसके इस बचपने पर मुझे बहुत हँसी आ रही थी और उधर आशु मुझे हँसता हुआ देख कर हैरान थी. आशु गुस्से में मुड़ के जाने लगी तो मैंने पहले बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी काबू में की और आशु के सामने जा के खड़ा हो गया."तू पागल हो गई है क्या? मैं नितु से शादी क्यों करूँगा? प्यार तो मैं तुझसे करता हूँ! मैं मंदिर गया था..." इसके आगे मैंने आशु से कुछ नहीं कहा और उसके चेहरे को हाथों में थामे उसकी आँखों में देखने लगा. आशु भी मेरी आँखों में सच देख पा रही थी और उसे यक़ीन हो गया था की मैं झूठ नहीं बोल रहा. वो आके मेरे सीने से लग गई. और मैं उसके सर पर हाथ फेरता रहा.

कुछ देर में जब उसके जज्बात उसके काबू में आये तो उसने पुछा; "आप मंदिर क्यों गए थे?" अब मैं इस बात को उससे छुपाना चाहता था की मैं मंदिर इसलिए गया था क्योंकि मैं इंटरव्यू के बाद हारा हुआ महसूस कर रहा था. "बस ऐसे ही!" मैंने बात को वहीँ खत्म कर दिया. "आपका इंटरव्यू कैसा था?" आशु ने अपने बैग से टिफ़िन निकालते हुए कहा. "नॉट गुड! किसी का आलरेडी जुगाड़ फिट था!" मैंने आशु से नजर चुराते हुए कहा. आशु अब सब समझ गई थी की मैं क्यों मंदिर गया था. उसने मेरे ठुड्डी पखडी और अपनी तरफ घुमाई और मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोली; "मैं हूँ ना आपके पास, तो क्यों चिंता करते हो?" उसका ये कहना ही मेरे लिए बहुत था. मेरा आत्मविश्वास अब दुगना हो गया था और माहौल हल्का करने के लिए मैंने थोड़ा हँसी-मजाक शुरू कर दिया. वो पूरा हफ्ता मैं या तो इंटरव्यू देने के लिए ऑफिसेस के चक्कर काटा या फिर जॉब कंसल्टेंसी वालों के यहाँ जाता था. जहाँ कहीं जॉब मिली भी तो पाय इतनी नहीं थी जितनी मैं चाहता था. पर फिर मुझे कुछ-कुछ समझ आने लगा, दिवाली आने में १ महीना रह गया था तो ऐसे मैं कौन सा मालिक एक एक्स्ट्रा आदमी को हायर कर बोनस देना चाहेगा, इसीलिए व्याकन्सी कम निकल रहीं हे. मैंने ये सोच कर संतोष कर लिया की दिवाली के बाद तो नौकरी मिल ही जायेगी.

मंगलवार का दिन था और आशु सुबह-सुबह ही आ धमकी! मैं तो पहले से ही जानता था की वो आने वाली है इसलिए मैं खिड़की के सामने बैठा चाय पी रहा था. दरवाजा खुला था. इसलिए आशु चुपके से अंदर आई और मेरी आँखों पर अपने कोमल हाथ रख दिए ये सोच कर की मैं कहूँगा की कौन है? मैं तो पहले से ही जानता था की ये आशु है क्योंकि उसकी परफ्यूम की जानी-पहचानी महक मुझे पहले ही आ गई थी. अब समय था उसे जलाने का; "अरे कल्पना भाभी?!" मैंने जान बूझ कर ये नाम लिया, ये नाम किसी और का नहीं बल्कि मेरे मकान मालिक अंकल की बहु का नाम था. ये सुनते ही आशु गुस्से से तमतमा गई और उसने मेरी आँखों से हाथ हटाए और मेरे सामने गुस्से से खड़ी हो गई; "कल्पना भाभी के साथ आपका चक्कर है? वो आपके घर में कभी भी बिना बता घुस आती है और आपको ऐसे छूती है? ये सारी औरतें आपके पीछे क्यों पड़ीं हैं? एक नितु मैडम कम थी जो ये कल्पना भाभी भी आपके पीछे पड़ गईं? और आप.... आप बोल नहीं सकते की आप किसी से प्यार करते हो? मैं....मैं....."

"अरे..अरे..अरे... यार मजाक कर रहा था. तू क्यों इतनी जल्दी भड़क जाती है?" मैंने आशु को मनाते हुए कहा.

"भड़कूं नहीं? आपके मुँह से किसी भी लड़की का नाम सुनते ही मेरे जिस्म में आग लग जाती है! आपको मजाक करने के लिए कोई और टॉपिक नहीं मिलता?" आशु ने गुस्से से कहा.

'अच्छा सॉरी! आज के बाद ऐसा कभी मजाक नहीं करूँगा!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा. मेरे ऐसा करने से आशु का दिल एक दम से पिघल गया और वो आ कर मुझसे चिपक गई.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं और आशु अलग हुए और एक दूसरे को देखने लगे. मैं दरवाजे के पास आया और मैजिक ऑय से देखा तो बाहर सुमन खड़ी थी. मैंने इशारे से आशु को बाथरूम में छुपने को कहा. जैसे ही आशु अंदर घुसी और बाथरूम का दरवाजा सटाया मैंने मैन डोर खोला. "बड़ी देर लगा दी दरवाजा खोलने में? कोई लड़की-वड़की छुपा रखी है?" सुमनं ने हँसते हुए कहा.

"नंगा था ... कपड़े पहन रहा था." मैंने भी उसी तरह से जवाब दिया.

"तो मुझसे कैसी शर्म?" सुमन ने फिर से मुझे छेड़ते हुए कहा.

"ओ मैडम जी! आपने कब देख लिया मुझे नंगा?" मैंने थोड़ा हैरानी से कहा.

''अरे मजाक कर रही थी! काहे सीरियस हो जाते हो आप?"

"यही मजाक करना आता है? कउनो और मजाक नहीं कर सकती?" मैं जानता था की आशु अंदर बाथरूम से हमारी सारी बात सुन रही है इसलिए अभी कुछ देर पहले कही उसकी बात उसे सुनाते हुए मैंने कहा. इधर सुमन खिलखिला कर हँस रही थी. कारन ये की हम दोनों कई बार एक दूसरे से इसी तरह देहाती भाषा में बात करते थे!

"चलो जल्दी से तैयार हो जाओ?"

"क्यों?" मैंने पुछा और यही सवाल आशु के मन में भी चल रहा था.

"माँ ने बुलाया है आपको, लंच पर"

"क्यों आज कोई ख़ास दिन है?" मैंने पूछा.

"वो..आज ...मेरा बर्थडे है!" सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अरे सॉरी यार! हैप्पी बर्थडे! सॉरी मैं भूल गया था!" मैंने माफ़ी माँगते हुए उसे विश किया.

"मेरा बर्थडे याद करके रखते हो?"

मे :यार कॉलेज के कुछ 'ख़ास' लोगों का जन्मदिन याद हे." मेरे ये कहने के बाद मुझे एहसास हुआ की आशु ये सब सुन रही होगी और अभी मुझसे फिर लड़ेगी इसलिए मैंने अपनी इस बात में आगे बात जोड़ दी; "जैसे छोटू, सिद्धू भैया और मेरे ऑफिस के कलिग के"

"पर विश तो कभी किया नहीं?" सुमन ने सवाल किया.
 
"कैसे करता? मेरे पास नंबर तो था नहीं, बाकियों को व्हाटस ऍप पर विश कर दिया करता था." मैंने अपनी सफाई दी, जबकि मेरा उसका बर्थडे याद रखने का कारन मेरा उसके लिए प्यार था जो मैं उससे फर्स्ट ईयर में किया करता था. पर जब मुझे जय ने आशु की माँ वाले काण्ड के बारे में बताया था तब से मैंने खुद को जैसे-तैसे समझा लिया था की मैं सुमन से प्यार नहीं कर सकता. फिर आशु मिल गई और मेरे मन में सुमन के प्यार की कब्र बन गई.

"चलो कोई बात नहीं, इस बार तो विश कर दिया आपने. चलो चलते हैं... (कुछ सोचते हुए) अच्छा एक बात बताओ डॉली सुबह बोल के गई थी की कॉलेज जा रही है पर मुझे तो वो वहाँ मिली नहीं! आपको पता है कहाँ गई है?" मोहनी ने पूछा. मैं जानता था की आशु मेरे ही बाथरूम में छुपी है पर ये मैं उसे कैसे बता सकता था.

"पता नहीं... कहीं दोस्तों के साथ बंक तो नहीं कर रही?" मैंने अनजान बनते हुए कहा.

"हो सकता है, उसके पास फ़ोन भी नहीं की उसे कॉल कर के बुला लु. आप अपने घर में कह दो ना की उसे एक फ़ोन दिलवा दें ताकि कभी जरुरत हो तो उसे कॉल कर लु."

"आ जाएगी जहाँ भी होगी, लंच तक! आप ऐसा करो आप चलो मुझे एक जरुरी काम है वो निपटा कर मैं आता हु." मैंने बहाना मारा ताकि सुमन निकले.

"ठीक है पर लेट मत होना." इतना कह कर वो चली गई. मैंने दरवाजा बंद किया और आशु फिर से गुस्से में बाहर आई और अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर मुझे घूरने लगी.

"सॉरी बाबा ...सॉरी!!!' मैंने कान पकड़ते हुए कहा पर उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ, वो किचन में घुसी और चम्मच और गिलास उठा के फेंकने शुरू कर दिये. "अरे यार ...सॉरी! ...सॉरी!!!!" पर उसने बर्तन मेरी ओर फेकने जारी रखे, हैरानी की बात है की एक भी बर्तन मुझे लगा नही. मैं धीरे-धीरे उसके नजदीक पहुँचा तभी उसके हाथ में बेलन आ गया.मुझे मारने के लिए उसने बेलन उठाया की तभी कुछ सोचने लगी ओर वो वापस किचन काउंटर पर छोड़ दिया ओर मेरे पास आ कर प्यार से अपने मुक्के मेरे सीने में मारने शरू कर दिये.

अउ..अउ..अउ..आह!" मैंने झूठ-मूठ का करहाना शुरू किया पर वो रुकी नही. मैंने उसे गोद में उठाया ओर पलंग पर ले आया, पर उसने मेरी छाती पर अब भी मुक्के मारने चालु रखे.मैंने दोनों हाथों से उसके दोनों हाथों को पकड़ कर अलग-अलग किया ओर उसके ऊपर झुक कर उसके होठों को चूमा, तब जा कर उसका गुस्सा शांत हुआ. "बाबू! ये बहुत पुरानी बात है, कॉलेज फर्स्ट ईयर की! पर जब से तुमसे प्यार हुआ मैं सब कुछ भूल गया था. तुम्हारी कसम! अब प्लीज गुस्सा थूक दो!" मैंने बहुत प्यार से कहा ओर आशु के हाथ छोड़ दिये. मैं उसके ऊपर से उठने लगा तो आशु ने मेरे टी-शर्ट के कालर को पकड़ा ओर अपने ऊपर खींच लिया; "ज्यादा न पुरानी बातें याद ना किया कीजिये, नहीं सच कर रही हूँ जान दे दूंगी मैं!"

"अरे बाप रे बाप! ई व्यवस्था!" मैंने भोजपुरी में कहा तो आशु की हँसी छूट गई. "अच्छा जान! चलो उठो ओर चलें आपके हॉस्टल!"

हम दोनों उठे और मैंने कपडे बदले और दोनों बस से हॉस्टल पहुंचे. चौराहे पर पहुँच कर मैंने आशु से जाने को कहा और मैं मार्किट की तरफ निकल गया.जन्मदिन पर खाली हाथ जाना सही नहीं लगा, अब अगर तौह्फे के लिए फूल लिए तो आशु जान खा जाएगी इसलिए मैंने एक महंगा पेन खरीदा और उसे गिफ्ट-व्रैप करा कर हॉस्टल पहुंचा. आशु ने दरवाजा खोला और हँसते हुए 'नमस्ते' कहा. अब आखिर सब के समने ये भी तो जताना था की हम दोनों एक साथ नहीं थे! मैंने आंटी जी के पाँव छुए और उन्होंने मुझे बैठे को कहा. वो भी मेरे पास ही बैठ गईं और घर के हाल-चाल पूछने लगी. "और बताओ जॉब कैसी चल रही है?" आंटी जी ने पुछा, मैंने बात को गोलमोल करना चाहा की तभी आशु बोल पड़ी; "आंटी जी जॉब तो छोड़ दी इन्होने!" अब ये सुनते ही आंटी जी मेरी तरफ देखने लगीं; "वो आंटी जी वर्क लोड बहुत बढ़ गया था ऊपर से सैलरी ढंग की देते नहीं थे!" मैंने झूठ बोला और आंटी ने मेरी बात मान भी ली. "सही किया बेटा, मेरे हिसाब से तो सरकारी नौकरी ही बढ़िया हे. काम कम और सैलरी ज्यादा!" मैं ये सुन कर मुस्कुरा दिया क्योंकि मेरी ऐसी आदत थी नहीं, मुझे तो मेरी मेहनत की कमाई हुई रोटी ही भाति थी!

कुछ देर बाद सुमन आ गई और मैंने उसे उसका तौहफा दिया तो उसने झट से तौहफा ले लिया. आंटी जी ने बड़ा कहा की बेटा क्या जरुरत थी तो मैंने बस इतना ही कहा की आंटी जी बस एक पेन ही तो है, वो बात अलग है की वो पेन पार्कर का था! आशु शांत रही और कुछ नहीं बोली, अब मैं चलने को हुआ तो सुमन कहने लगी की वो मुझे ड्राप कर देगी. मैंने बहुत मना किया पर आंटी जी ने भी कहा की कोई नहीं छोड़ आ. मैं उसकी स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों हाथों से पीछे के हैंडल को पकड़ लिया. हम रेड लाइट पर रुके तो सुमन पीछे मुड़ी और बोली; थैंक यू!" मैंने बस इट्स ऑल राईट कहा और तभी ग्रीन लाइट हो गई. फिर पूरे रस्ते वो कुछ न कुछ बोलती रही, उसे अब भी पता नहीं था की मैंने जॉब छोड़ दी हे. जब घर आया तो सुमन बोली; "सॉरी इस बार आपको घर का खाना खिलाया! नेक्स्ट टाइम मैं पार्टी दूँगी!"

"कोई नहीं!" मैं बाय बोल कर जाने लगा तो वो खुद ही बोलने लगी; "माँ ना... सच्ची बहुत रोक-टोक रखती है मुझ पर! ऑफिस से घर और घर से ऑफिस, जरा सी लेट हो जाऊँ तो जान खा जाती है मेरी. मैंने कहा मैं बाहर ट्रीट दूँगी तो कहने लगी किसको ट्रीट देनी है? अब अगर ऑफिस वालों का नाम लेती तो वो मना कर देती इसलिए मैंने आपका नाम ले लिया. आपका नाम सुनते ही उन्होंने कहा की राज को यहीं बुला ले बहुत दिनों से उससे मुलाक़ात नहीं हुई, इसलिए आप को आज के लंच का न्योता दिया. इतनी रोक-टोक तो वो डॉली पर भी नहीं रखती!"

"उनकी गलती नहीं है, ये जो आपका मुँहफट पना है न इसी के चलते वो ऐसा करती हे. रही आशु की बात तो वो हमेशा ही शांत रहती है, कम बोलती है और अपने काम से काम रखती है और कुछ-कुछ मेरी वजह से भी आंटी जी उस पर फिदा हैं, इसलिए उसे ज्यादा रोकती-टोकती नहीं!" मैंने आंटी की तरफदारी की.

"अच्छा तो मैं भी डॉली की तरह गाय बन जाऊँ?" सुमन ने हँसते हुए कहा.

"नहीं बन सकती! वो बनी ही अलग मिटटी के सांचे की है और फिर ऊपर वाले ने ही वो साँचा तोड़ दिया!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा. मैंने आशु की तारीफ कुछ इस ढंग से की ताकि सुमन उसे समझ ही न पाए की मैंने तारीफ की है या उसका मजाक उड़ाया हे. मैं ऊपर आ गया और मोहनी अपनी स्कूटी मोड़ के चली गई. कुछ देर बाद आशु का मैसेज आया पर उसने गिफ्ट के बारे में कुछ नहीं कहा. वो समझ गई थी की मैंने वो गिफ्ट बस खानापूरी के लिए दिया था. थोड़ी इधर-उधर की बातें हुईं फिर मैं घर के कुछ काम करने लगा.

वो दिन बस ऐसे ही निकल गया और फिर आया रविवार और मैं नाहा-धो के पूजा कर के तैयार था. आशु भी समय से आ गई और आते ही मेरे सीने से चिपक गई. पर आज मैंने उसे नहीं छुआ और वो तुरंत ये बदलाव ताड़ गई. "क्या हुआ? नाराज हो?" उसने मेरी ठुड्डी पकड़ते हुए कहा. नहीं तो.... आज से व्रत हैं!" ये सुनते ही आशु मुझसे छिटक कर खडी हो गई और अपनी जीभ दाँतों तले दबा कर सॉरी बोली. दरअसल मैं हर साल नवरात्रों में व्रत रखता था और पूरे रखता था. "तब तो मैं आपको छू भी नहीं सकती?!" आशु ने पूछा. "दिल साफ़ हो तो छू सकती हो, पर वासना भरी हो तो नहीं!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो जवाब में आशु बोली; "आपको देखते ही मेरे जिस्म में आग लग जाती हे. उसे बूझाने ही तो मैं आपके करीब आती हूँ, पर हाय रे मेरी किस्मत! आप तो विश्वामित्र बन गए पर कोई बात नहीं ये मेनका आपकी तपस्या भंग अवश्य कर देगी!"

"बड़ा ज्ञान है तुझे? पर मेरे साथ ऐसा कुछ करने की कोशिश भी मत करना. मार खायेगी मेरे से!" मैंने आशु को चेतावनी दी. उसने बस हाँ में गर्दन हिलाई, वो जानती थी की व्रत के दिनों में मैं बहुत सख्त नियमों का प्लान करता हु. हालाँकि मेरे लिए भी इस बार बहुत मुश्किल था आशु के सामने होते हुए उससे दूर रहना. अब उस दिन चूँकि मैं कुछ खाने वाला नहीं था तो आशु ने भी कुछ खाने से मना कर दिया. मैंने फिर भी उसके लिए फ्रूट चाट बना दी और दोनों बिस्तर पर बैठे मूवी देखते रहे. वो पूरा हफ्ता वही रूटीन चलता रहा, जॉब ढूँढना, शाम को आशु से मिलना और फिर घर आ कर सो जाना. बुधवार को ही घर से बुलावा आ गया और गुरूवार की शाम मैं और आशु गाँव चले गये. घर में सब जानते थे की मेरा व्रत है तो माँ ने मेरे लिए दूध बनाया था जिसे पी कर मैं सो गया.शनिवार को घर में पूजा हुई और मेरा व्रत पूर्ण हुआ, फिर दबा के हलवा-पूरी खाई.

शाम को मैं छत पर बैठा था की आशु आ गई; "अच्छा अब तो आपको छूने की इज्जाजत है मुझे?"

"घर में सब मौजूद हैं तो ज्यादा मेरे पास भटकना भी मत" मैंने कहा तो आशु मुँह फुला कर चली गई. मैं जानता था की मुझे उसे कैसे मनाना है पर आज नहीं कल!
 
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