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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

कविता- ये कैसे नियम बनाये हो तुम? हम नहाएंगे नहीं तो शरीर पर कितना गंदगी हो जाएगा। पसीना से बदन में नोचने लगेगा। ऊपर से गर्मी का महीना चल रहा है, हमारा तो हालात खराब हो जाएगा। कपड़े तो चलो नही पहनेंगे, पर बिना नहाए रहना बहुत दिक्कत हो जाएगा।
जय ने कविता के चूतड़ पर हल्का बिठ्ठू काट लिया। कविता चिहुंक उठी, उसके मुंह से आआहहहहहहह,
जय- तभी तो मज़ा आएगा, तुम नहीं नहाओगी तो तुम्हारे बदन में एक अजीब सी खुसबू पनपेगी, जब दोनों चुदाई करेंगे और बुर लण्ड का पानी एक दूसरे के बदन पर लगेगा, जो कि पसीने से मिलेगा तब तुम्हारे बदन से जो खुसबू आएगी, कितनी कामुक होगी। तुम्हारे बदन के हर हिस्से पर हम मूठ लगाएंगे। जब तुम नहीं नहाओगी तो वो तुम्हारे बदन पर डिओ जैसा काम करेगा। तुम चेहरा नहीं धो सकती हो, मेक अप कर सकती हो, पर सेंट या डिओ नहीं लगा सकती। बाल में सिर्फ कंघी करोगी, पर बाँधोगी नहीं। पसीना आये तो पोछना नहीं है, उसे ऐसे ही लगे रहने देना, हाँ पसीने को तुम सुखाने की कोशिश कर सकती हो, सिर्फ पंखे के नीचे जाके। तुम जब ऐसे रहोगी,तो फिर हम तुम्हारे बदन को चाटेंगे। ऊफ़्फ़फ़फ़ सोचके ही मज़ा आ रहा है
कविता अपने भाई को बस देखती रही, जिस बेशर्मी से वो ये सब बोल गया, उसके मन को भी रोमांचित करने लगा। कविता, क्या तुम भी नहीं नहाओगे?
जय- अगर तुम चाहो तो? कविता- दोनों ऐसे ही रहेंगे।
कविता ने फिर बोला, की तीसरा नियम तुमने बहुत सोच समझ के बनाया है, जब मन चाहे वो करोगे? शैतान कहीं का। जय मुस्कुराया और बोला, ऐसे ही IAS की तैयारी थोड़े ही करते हैं, कविता दीदी। कविता भी हंस पड़ी जोर से। उसकी बत्तीसी दिख रही थी। हीरे जैसे दांत थे कविता के। हंसते हुए उसकी चुच्चियाँ हिल रही थी, " क्या... क्या बोले, IAS की तैयारी, यही सब पूछते हैं क्या, UPSC की परीक्षा में, हाहाहाहा...... । कविता हंसती जा रही थी। जय भी हंसते हुए कविता को देखे जा रहा था। उसने अपनी दीदी को बहुत दिनों बाद ऐसे हंसते देखा था। उसने कविता के गाल में बने डिंपल को खूब निहारा। जय आखिर बोल उठा, " हंसो, हंसते हुए तुम कितनी सुंदर लगती हो, तुम्हारी हंसी तो जैसे कहीं खो गयी थी, बहुत दिनों बाद लौटी है। इस सुंदर चेहरे से ये हंसी खोने मत दो। तुम जब हंसती हो, तो हमारे चारों ओर खुशियां फैल जाती हैं।"
 
कविता की नींद खुली जब ज़ोर ज़ोर से घर के दरवाजे की घंटी लगातार बज रही थी। कविता ने घड़ी में देखा सुबह के 10 बज रहे थे। वो जय के सीने पर अपना सर रखके ही सोई थी। कविता की बांयी टांग जय के ऊपर थी। जय उसे बांहों में पकड़े सोया था। कविता को वो इस समय बहुत क्यूट लग रहा था। उसने उसकी छाती को चूमा, फिर उसके होंठों को चूमा। फिर उठके उसने अपनी मैक्सी पहन ली, और बालों को बांधते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ी। उसने दरवाज़ा खोला, तो सामने कूरियर वाला था। उसने पूछा- क्या मैडम इतनी देर से घंटी बजा रहा हूँ। ये जयकांत झा यहीं रहते हैं ना?
कविता- जी, क्या बात है?
कूरियर वाला- उनके नाम का कूरियर आया है। वो हैं घर पर?
कविता- जी वो सो रहे हैं। आप हमको दे दीजिए।
कूरियर वाला- वो आपके पति हैं क्या?
कविता गुस्से से - जी..... जी नहीं हम उसकी ब...
कूरियर वाला- अरे कोई बात नहीं मिया बीवी में झगड़ा होता रहता है, हे..... हे ये लीजिये आप ही रिसीव कीजिये। उसने कविता की ओर कलम और पेपर बढ़ा के कहा।
कविता ने उसे कुछ नही कहा बस दस्तखत कर दिया। वो पार्सल देकर चला गया। उसके जाते ही कविता की हंसी छूट गयी, उसकी बात सोचके। दरवाज़ा पर परा दूध का पैकेट उठायी और दरवाज़ा बन्द करके अंदर आ गयी। दूध फ्रिज में डालकर वो हॉल में आ गयी। उसने शीशे में खुदको देखा, सारा काजल निकल गया था और जय के लण्ड के पानी उसके चेहरे पर सूखे हुए थे। वो पपड़ी की तरह कड़क हो गए थे। कविता ने अपना चेहरा धोया, और टॉवल से पोछने लगी। उसे तब ख्याल आया कि कूरियर वाले ने भी ये देखा होगा। उसकी चेहरे पर शर्म के साथ हंसी छूट गयी। तभी उसे जय के बनाये नियम की याद आ गयी, कि उसे घर के अंदर बिना कपड़ों के नंगी होकर रहना है। उसने अपनी मैक्सी के बटन खोले और दोनों हाथ बाजुओं से निकाल दिए। मैक्सी सरसराती हुई उसके पैरों में गिर गयी। उसने फिर अपने हर अंग को देखा, पूरे बदन पर रात की चुदाई की कहानी का सारांश लिखा हुआ था। जय के दांतों के निशान उसकी चुच्चियों पर, गर्दन पर, उसके पेट पर, उसके चूतड़ों पर भी थे। कितना वाइल्ड सेक्स रहा था। कविता फिर ब्रश की और सीधा किचन में नास्ता बनाने लगी। जय ने उसे नहाने से भी तो मना किया था। कविता नंगी ही खाना बना रही थी। एक तो गर्मी उस पर से खाना बनाना वो पसीने से नहा गयी थी। उसके गर्दन से चल पसीना उसके पीठ के रास्ते उसकी गाँड़ में लुप्त हो जाता था। गले से टपक कर पसीना सीधे उसकी चुच्चियों के घुंडीयों पर से चू रहा था।बदन से पसीना टप टप कर चू रहा था। उसने जल्दी से खाना बना लिया और बाहर हॉल में आके पंखे के नीचे खड़ी हो गयी। उसे बहुत राहत मिली। थोड़ी देर में सारा पसीना सूख गया, पर हल्की बदबू रह गयी। उसने फिर चेहरे पर मेक अप किया, और अपने भाई को उठाने उसके कमरे में घुस गई। कविता अब खूबसूरत लग रही थी, क्योंकि उसने फ्रेश मेक अप किया था, काजल, मस्कारा, क्रीम, रूज़ सबसे सज चुकी थी। फिर अपने भाई के चेहरे के करीब अपना चेहरा लायी और उसके होंठों को चूमने लगी। फिर उसके माथे को चूमी। जय की नींद इस प्यार भरे चुम्मों ने उड़ा दी। अपनी दीदी का चांद सा चेहरा देखके उसके होंठो पर मुस्कुराहट छा गयी। उसने कविता को अपने ऊपर खींच लिया। कविता ने कोई विरोध नहीं किया। उसके बदन से पसीने की बदबू आ रही थी जो जय को खुसबू समान लग रही थी। कविता की चुच्चियाँ जय के सीने में चुभ रही थी। जय कविता की बड़ी गाँड़ को अपने हाथों से सहला रहा था।
कविता- बहुत थके लग रहे हो, रात इतनी मेहनत जो कि है इसलिए शायद।
जय- हाँ, थोड़ा सा पर, तुमको देखके सब थकान खत्म हो गया है।
कविता- हाँ, वो तो पता चल रहा है, ये जो तैनात होकर खड़ा हो गया है। कविता उसके लण्ड को पकड़ते हुए बोली।
 
जय अब कविता के गाँड़ को पूरी रफ्तार से चोद रहा था। वो उसके चुतरो को कसके दोनों हाथों से भींच रहा था। कविता की चुच्चियाँ भी धक्कों के साथ ज़ोर से हिल रही थी।
जय- क्या मस्त चीज़ होती है, औरत की गाँड़ चलती है तो मर्दों को लुभाने का काम करती है और चुदती है तो बुर से भी ज्यादा मज़ा देती है। लण्ड को पूरे गिरफ्त में ले लेती है ये गाँड़ महारानी। हमको औरत का यही हिस्सा मस्त लगता है।
कविता- इसका मज़ा तो हर औरत को लेना चाहिए, आखिर इसमें इतना मजा जो आ रहा है।
जय- सही कहा कविता रानी, तुमको भी ये बहुत अच्छा लग रहा है। मर्दों को औरतों की गाँड़ मारने में मजा आता है और औरतों को मरवाने में।
कविता- ऊफ़्फ़फ़फ़, आआहह सही कह रहे हो भैया, उम्म्म्म्ममम्ममम्म हम लगता है झड़ने वाले हैं, कितना मज़ा आ रहा है, हाय 10 मिनट में ही झड़ जाऊंगी। आआहह ऊउईईई झाड़ गई रे ओह्ह।
जय- हां दीदी तुम्हारी गाँड़ भी बहुत कसी हुई है। हम भी ज़्यादा देर नही टिक पाएंगे। पर तुम्हारी गाँड़ को अच्छे से चोद के फैला देंगे। आज के बाद तुम अपनी गाँड़ की साइज बढ़ते हुए महसूस करोगी। दीदीssss हम झड़ने वाले हैं, आआहह.... मुंह इधर करो अपना, तुमको मूठ पीना है ना।
कवीता- हाँ, भाई हमको मूठ पिलाओ अपना, तुम्हारा ताज़ा ताज़ा मूठ। हमको वही पीना है। अपनी प्यासी बहन को पिला दो ना।" कहते हुए कविता घुटनो पर बैठ गयी।और अपना मुंह खोलके बैठ गयी, जैसे कोई कुतिया खाने के लिए मुंह खोलके जीभ बाहर लटकाती है। जय ने कविता के खुले मुंह मे उसकी गाँड़ से निकला लण्ड दे दिया। कविता को जैसे इसीकी प्रतीक्षा थी। उसने लण्ड को बिना छुए, पहले उसे खूब चूसा, जिसमे उसकी गाँड़ का स्वाद भरा रस लगा हुआ था। उसे खुद की गाँड़ का रस खूब अच्छा लग रहा था। जय के लण्ड पर लगा उसकी गाँड़ का रस गाड़ियों में इस्तेमाल होनेवाले ग्रीज़ की तरह मुलायम और चिपचिपा था। कविता उसे पूरा मज़ा लेके चुस रही थी। जय ने देखा उसकी बहन बिल्कुल पोर्नस्टार्स की तरह बेहिचक, चूस रही है तो, उसने कविता के चेहरे पर ही मूठ निकाल दिया। जय ," आआहह आ गया दीदी ये लो, बुझाओ अपनी प्यास।"

कविता के खूबसूरत चेहरे पर, जय के लण्ड से निकल सफेद चिपचिपा मूठ पहले उसकी आँखों और पलको पर जा गिरा। अगला उसके होंठो पर, फिर, उसके गालों पर ढेर सारा मूठ चिपक गया। जय की जाँघे कांप रही थी। कविता उसके लण्ड को चूसकर उसमे बचा मूठ निकाल ली। फिर उसके लण्ड से अपने चेहरे पर फैला मूठ, पूरा रगड़ने लगी।
जय - ये क्या कर रही हो?
कविता- हम इसको पहले पूरे चेहरे पर मलेंगे, फिर इकठा करके पी लेंगे। चेहरे की खूबसूरती बढ़ती है मूठ लगाने से और पीकर भी।
जय हँसकर- अच्छा है, फिर तो पी जाओ।
कविता ने पूरा मूठ मलने के बाद इकठ्ठा किया और जितना मिला उसे मुंह मे रख ली। कविता अपना मुंह खोलके जय को दिखाने लगी। फिर अपने मुंह से बुलबुले बनाने लगी।
जय- तुम तो बिल्कुल पोर्नस्टार जैसे कर रही हो।
कविता एक घूंट में पूरा पी गयी, और बोली," हम किसी से कम थोड़े ही हैं। और खिलखिलाकर हंसने लगी।
जय- चल अपनी गाँड़ तो दिखाओ की क्या हाल है उसका?
कविता पीछे मुड़ गयी, और चूतड़ फैलाके दिखाई," हमको तो दिख नहीं रहा है, कैसी लग रही है हमारी चुदी हुई गाँड़, जय।
जय- वाह...... कितनी खूबसूरत लग रही है। चुदके पूरी खुल गयी है। अंदर का गुलाबी हिस्सा अभी दिख रहा है। हमारे लण्ड ने इसकी खूब खबर ले ली, 10 मिनट में ही। जय उसकी गाँड़ में उंगली घुसाके बोला।
कविता- एक तस्वीर ले लो, अच्छा रहेगा।
जय ने फौरन कैमरे से उसकी गाँड़ की तस्वीर ले ली। उसने कविता की गाँड़ को फैलाने को कहा, फिर कभी करवट लेके तो कभी पेट के बल लेटके तस्वीर निकली।
जय ने फिर कविता को बोला- खाना लगा दो। दीदी भूख लगी है।
कविता उठके बोली- अभी लगा देती हूँ। फिर बैंक भी जाना है, इस ढाई करोड़ को जमा भी तो करना है।
कविता गाँड़ मटकाते हुए, खाना लगाने चली गयी।
 
जय ने लौड़ा उसकी गाँड़ के प्रवेश द्वार पर रखके ज़ोर लगाया, तो सुपाडे का आधा हिस्सा ही घुसा। अभी सब ठीक था, कविता की गाँड़ की छेद जय के सुपाडे की आकार में चिपक कर खुल रही थी। जय ने फिर ज़ोर लगाया तो कविता की चीख इस बार दर्द के मारे फूट पड़ी। उसकी गाँड़ में जय का सुपाड़ा प्रवेश कर चुका था। पर वो चिल्लाए जा रही थी। ऊउईईई, ऊऊईईईईईईईई मा माआआआ हआईईईईई रे गाँड़ फट गईईईईई, उ उ ऊऊ हहदहम्ममम्म
जय उसकी पीठ को सहला रहा था, और उसे सांत्वना दी रहा था, " घबराओ मत दीदी थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा, बस थोड़ा बर्दाश्त करो।
कविता- बहुत दर्द हो रहा है, ऐसा लगता है गाँड़ फट गईईईईई है।
जय- अपनी गाँड़ को रिलैक्स करो, कसो मत, ढीला छोरो और सांस लो। कविता वैसा करने लगी जैसा जय बोल रहा था। थोड़ी देर बाद कविता को आराम मिला। जय ने पूछा- ठीक लग रहा है। कविता- हाँ, पहले से बेहतर अब ठीक है।
जय- देखो हम धीरे से पूरा लण्ड उतारेंगे, अब तुम्हारी गाँड़ में।
कविता- ठीक है, घुसाओ ना।

जय धीरे से प्रेशर बढ़ाता है, और धीरे से इंच भर उसकी गाँड़ में ठेलता है। कविता की गाँड़ की छेद, उसकी लण्ड की गोलाई के अनुसार ढल रही थी। इस बार उसे उतना दर्द नहीं महसूस हुआ। धीरे धीरे इंच दर इंच जय ने अपना लंड आखिरकार कविता की गाँड़ में उतार ही दिया। अब उसके आंड कविता की बुर से टकड़ा रहे थे। उसने कविता की गाँड़ में लगभग आठ इंच लंबी और तीन इंच मोटी जगह कब्ज़ा कर ली। जय अभी भी स्थिर था, वो हड़बड़ा नहीं रहा था। वो कविता के मूड में आने का वेट कर रहा था। कविता थोड़ी देर बाद पूरी तरीके से दर्दरहित होक मस्ती में आ गयी। उसने जय की ओर मुड़के बोला- जय अब तुम्हारा लण्ड गाँड़ से तालमेल बिठा चुका है। हमारे गाँड़ ने लण्ड को जगह दे दी है। तुम अब गाँड़ मारना शुरू करो।
जय- बिल्कुल दीदी, हम इसका वेट कर रहे थे कि कब तुम बोलोगी। आजके बाद देखना तुमको गाँड़ चुदाई में ही खूब मन लगेगा। तुम खुद गाँड़ मरवाने आओगी।
कविता- तो ठीक है, पर पहले गाँड़ मरवाने तो दो।
जय- ये लो। जय ने गलके हल्के धक्के लगाने शुरू किए। कविता आगे को भागी तो जय ने उसे पकड़ लिया, और खींच लिया। और फिर धक्के मारने लगा। कविता की गाँड़ जय के लण्ड को पूरा अंदर ले रही थी। कविता बीच बीच में, ऊफ़्फ़फ़, हाय ऊउईईई जैसी आवाज़ें निकाल रही थी। कविता को अब मस्ती पूरी तरह चढ़ गई थी। वो अब अपनी कमर पीछे करके धक्के ले रही थी। उसके चूत्तर भी खूब मटक रहे थे, जय के धक्कों से।
जय- अब बोलो दीदी खूब मजा आ रहा है ना, कैसा लग रहा है गाँड़ में अपने भाई का लौड़ा?
कविता- हमको पता नहीं था कि गाँड़ मरवाने में इतना मज़ा आता है, हमारे राजा भैया। क्या बात है, ऊफ़्फ़फ़?
जय- दरअसल गाँड़ में नर्व एन्डिंग्स होती है जिस वजह से गाँड़ बहुत सेंसिटिव होती है। इसलिए इसमें बुर चुदाई से भी ज़्यादा मज़ा आता है। तुमको इसीलिए अच्छा लग रहा है, हमारी रानी दीदी।
कविता- ओह्ह, अच्छा तुमको तो सब पता है। अपनी बहन की गाँड़ मारने का भी तो मज़ा दुगना होता है ना। कविता खिलखिलाकर बोली।
जय धक्के लगाते हुए बोला- वो तो है ही, तुमको भी तो मज़ा आ रहा है ना अपने छोटे भाई से गाँड़ मरवाने में।" उसकी आवाज़ में धक्के मारने की वजह से कंपन थी।
 
जय लेट गया, और कविता उसके चेहरे के दोनों तरफ टांगे रखके, उसके मुंह पर अपनी पहाड़ जैसे गाँड़ टिका दिया। जय की नाक कविता के गाँड़ के छेद और मुंह उसकी बुर पर टिक गए। जय ने कविता को अपने चूत्तर हल्के ऊपर उठाने का इशारा किया। कविता जैसे उठी, जय ने बोला अब अपनी
गाँड़ को हमारे मुंह पर रगड़ो। कविता बोली," ठीक है, पर वजन तो ज़्यादा नही है। तुम जब गाँड़ में जीभ घसाके चूस रहे थे, तब बड़ा मजा आ रहा था।
जय ने उसकी गाँड़ में उंगली घुसा दी, " अभी और मज़ा आएगा तुमको, जब गाँड़ हिला हिलाके रगड़ोगी। तुम्हारे बुर और गाँड़ को एक साथ मज़ा आएगा।
कविता ने फिर गाँड़ आगे पीछे हिला हिलाके जय के चेहरे में रगड़ने लगी। कविता को इसमें सच में बड़ा आनंद आ रहा था। जय के मुंह पर रिसती हुई बुर और भूरी गाँड़ भी टकड़ा रही थी। कविता के आनंद का ठिकाना ना था।
वो जोर ज़ोर से सीत्कारे मार रही थी। बुर की लंबी चिराई जब जय के नाक को रगड़ खाती हुई, उसके मुंह से टकराती तो जय उसे चूसने लगता। फिर गाँड़ की बारी आ जाती। जिसमे जय की उंगली पहले से घुसी थी, और जय उसके सामने आते ही उंगली निकाल देता और गाँड़ चूसने लगता। फिर जैसे ही गाँड़ पीछे होती तो उसमें उंगली घुसा देता। फिर बुर की चुसाई होती। कविता ये बड़े आराम से कर रही थी। उसे इसमें बहुत मज़ा जो आ रहा था। ऐसे ही दोनों आहें और सीत्कारें भरते हुए इस आसन में आनंद के गोतें लगा रहे थे। थोड़ी देर इस तरह चुसाई के बाद जय का लौड़ा कड़क हो उठा था, और कविता भी बेहद कामुक हो उठी थी।
जय ने कविता को उठने का इशारा किया, कविता अपने बालों को दोनों हाथों से उठाते हुए खड़ी हुई । उसकी आंखों में चुदने की प्यास साफ झलक रही थी।
जय - कविता दीदी, तुम सोफे पर झुक जाओ। हम तुम्हारे गाँड़ पर तेल लगाते हैं।
कविता- जो हुकुम मेरे आका। और अपनी गाँड़ को उठाके बाहर निकाली। उसने सोफे का किनारा पकड़ रखा था। जय ने फौरन तेल की बोतल लेकर उसकी गाँड़ और अपने लण्ड पर आधी बोतल खाली कर दी। जय ने खूब सारा तेल कविता की गाँड़ के छेद और बोतल के आगे का हिस्सा संकडा होने की वजह से उसमें घुसाके उसके अंदर डाल दिया। उसने लण्ड पर भी ढेर सारा तेल लगाया था। फिर उसने कविता की गाँड़ में एक साथ दो उंगलिया घुसा दी, ताकि तेल अंदर की त्वचा पर भी अच्छे से लग जाये। अंदर तेल लगने की वजह से जय की उंगलियां आराम से अंदर बाहर कर रही थी।
जय- तुमको दर्द तो नहीं हो रहा है?
कविता- नहीं, अभी नहीं हो रहा है।

जय ने तीसरी फिर चौथी उंगली घुसा दी। कविता को दर्द महसूस हुआ," ऊईईईई माआआआ दर्द हो रहा है।
जय ने और तेल डाला, फिर धीरे से आगे पीछे करके तेल को गाँड़ के अंदर तक पहुंचाया। कविता की गाँड़ तब रिलैक्स हुई।
जय - अब तुम अपनी गाँड़ मरवाने के लिए तैयार हो, दीदी।
कविता- हां भाई, गाँड़ में तुम्हारी चारो उंगलियां हमको महसूस हो रही है। और दर्द भी ना के बराबर है। लगता है तुम्हारा लौड़ा अब गाँड़ में घुस जाएगा।
जय- तो तैयार रहो, दीदी, अब तक बुर की सवारी की थी लण्ड ने अब तुम्हारी गाँड़ की सवारी करेगा।
जय ने उंगलियां निकाल ली, तो कविता ने जय की ओर देखके बोला," तुमने कहा था कि हमारी गाँड़ का टेस्ट तुमको बड़ा अच्छा लगता है। हम भी टेस्ट करे ले क्या?
जय- नेकी और पूछ पूछ, ये लो दीदी चखो अपनी गाँड़ का स्वाद। ताज़ी ताज़ी उंगलियाँ, तुम्हारी गाँड़ की भट्टी से।
कविता ने जय की एक उंगली चाटी, और जीभ पर उस टेस्ट को महसूस किया। कविता ने फिर दूसरी चखी, और इस तरह सब चाट गयी। कविता फिर बोली- गाँड़ का स्वाद इतना बुरा भी नही है। इसे चूसने में मज़ा आ रहा है।
जय- ये कुछ भी नहीं है, तुमको और मज़ा आएगा, जब तुमको इसकी आदत लग जायेगी। तुम बस किसी भी चीज़ में हिचकिचाना नहीं। जो भी करने का मन हो बोल देना।
फिर जय उसके गाँड़ पर लौड़ा को सेट कर दिया। " तुम तैयार हो दीदी, घुसा दूं लौड़ा। जय बोला।
कविता- तैयार हूं डालो अब।
 
कविता अपने भाई की बाहों में कोई आधा घंटा बैठी उसकी छाती पर सर रखके आराम कर रही थी। कविता की बारी थी अपना वादा निभाने की।उसने अपनी गाँड़ के छेद में उंगली घुसाई। बड़ी दिक्कत से उसकी गाँड़ में उंगली घुसी। उसने दूसरे हाथ से जय के फूले लण्ड को पकड़ा, और जय की ओर देखा। अपनी उंगली गाँड़ से निकालके उसको दिखाते हुए बोली," जय, ये तो बहुत दिक्कत से इतना ही घुसा, तुम अपना लौड़ा कैसे घुसओगे?
जय उसकी उंगली को मुंह मे रख के चूसने लगा। कविता ने अपनी उंगली निकालनी चाही, पर जय उसकी कलाई पकड़के उसे हटाने नहीं दिया।
जय जब पूरा चूस चुका, तब बोला- क्या स्वाद है तुम्हारी गाँड़ का, बिल्कुल मीठी और स्वादिष्ट है।
कविता- छी, तुम कैसे चूस लिए। वहां से हम हगते हैं। गन्दी जगह है ना वो तो।
जय- अरे मेरी भोली दीदी, तुम्हारी कोई भी चीज़ हमको गंदी नहीं लगती। हम तो तुम्हारी पाद को भी खुसबू समझते हैं।
कविता - तुम ना पागल हो। कोई किसी की पाद का कैसे दीवाना हो सकता है।
जय कविता की गाँड़ को टटोलते हुए बोला," तुम हो ही इस पागलपन और दीवानगी के लायक। हम तुमको अब बताएंगे, जाओ तेल लेके आओ।
कविता- तुमको जो अच्छा लगे वो करो, हम तुमको कभी नहीं रोकेंगे। आज हमारे पिछले दरवाज़े में घुसा के ही मानोगे ना। कहकर हंसते हुए उसकी गोद से उठ गई। थोड़ी देर में वो नारियल तेल लेके वापिस आयी। वो बैठने लगी तो जय ने उसे खड़े रहने को बोला।

जय- अपनी गाँड़ हमारे चेहरे के सामने लाओ, और अपने चूतड़ों को फैलाओ।
कविता जय के कहने पर वैसे ही खड़ी हो गयी। उसने कविता के चुतरो पर तीन चार थप्पड़ मारे। कविता हर थप्पड़ पर - ईशशशश कर उठती।
जय ने कविता की गाँड़ की दरार में ढेर सारा थूक डाला। वो थूक उसकी गाँड़ की दरार को गीली करते हुए में किसी नदी की तरह चूते हुए उसकी गाँड़ की छेद को गीला करने लगी। कविता उसको अपने हाथों से वहां थूक मलने लगी। जय ने उसके हाथ को वहां से हटा दिया, और अपना मुंह उसकी गाँड़ की घाटी में घुसा दिया। उसका पूरा चेहरा कविता की गाँड़ की दरार में खो गया। कविता अपने भाई के चेहरे पर गाँड़ का दबाव बढ़ाने लगी। जय के चेहरे पर गाँड़ को रगड़ने लगी। जय के मुंह से आआहह निकल रही थी, पर गाँड़ की वादियों में उसकी आहें, गूँ.. गूँ में बदल गयी थी। कविता की चुच्चियाँ कड़क हो चुकी थी, बुर से पानी निकल रहा था।
जय ने उसकी गाँड़ की छेद को अपनी जीभ से छेड़ने लगा।गाँड़ की सिंकुड़ी हुई छेद उसके मुंह मे समा जा रही थी। उसकी गाँड़ के छेद को अपनी जीभ से खोलने की कोशिश कर रहा था। धीरे धीरे गीला होने की वजह से जीभ ने थोड़ी जगह बना ली, और कविता के गाँड़ में आधा इंच प्रवेश पा लिया। जय उस जगह को चाटने लगा। चाटने क्या लगा मानो उसकी सफाई करने लगा। कविता को अपनी गाँड़ में अजीब सा आनंद महसूस हो रहा था।
कविता सिर्फ उफ़्फ़फ़फ़फ़फ़, आह आह कर रही थी। गाँड़ चटवाने में इतना आनंद मिलता है ये उसे पता नहीं था। जय तो मानो जैसे कविता की गाँड़ खा जाना चाहता था। जय ने उसे इसी तरह खड़ा रखा, और दस मिनट तक यूँही चूसता रहा। कविता ने फिर मस्ती में अपनी गाँड़ को जय के चेहरे पर दांये बायें हिलाकर रगड़ा।
फिर उसने कविता को कहा- दीदी, हम लेटते हैं। तुम हमारे मुंह पर बैठके अपनी गाँड़ को रगड़ना।
 
उधर माया के घर-
तो ये बात थी दीदी। तुम ही बोलो हम कुच्छो गलत बोले थे। उसपर हमको दो थप्पड़ मारे काल रात में।" माया सुबकते हुए बोली।
ममता तुमने फिर क्या किया? शशीजी को पलट के कुछ कहा तो नहीं?
माया- नहीं दीदी, माँ के संस्कार हमको याद हैं, कैसे भी हैं पति हैं जो करेंगे ठीक ही।
ममता- चुप हो जा तूने बिल्कुल ठीक किया, रात को आने दो देवरजी को तब देखेंगे। पर उन्होंने ऐसा कुछ किया, ये हमको पता ही नहीं चला। खैर कंचन को बुला ले, साथ में खाना खाएंगे।
माया ने कंचन को आवाज़ लगाई- कंचन, अरे देखो ना कौन आया है? तेरी मौसी आयी है। आजा।
कंचन दरवाज़ा खोली और दौड़ के पास आई, ममता मौसी कैसी है तुम? कब आयी?
ममता ने उसे गले लगा लिया, और आंखों से उसके आंसू जाने लगे। मन ही मन बोली- अरे पगली, हम तुम्हारी मौसी नहीं माँ हैं।
ममता- सुबह आये हैं। तुम कहां गयी थी?
कंचन- ट्यूशन गए थे।
माया- पढाई में मन ही नही लगता है इसका तो, कब पास करेगी भगवान जाने। शादी की उम्र हो गयी है, फिर भी सहेलियों के साथ घूमती फिरती है।
ममता- चुप कर, पास हो जाएगी। हाँ पर सयानी हो गयी है। बेटी तुम्हारे लिए सलवार सूट लाये हैं।
कंचन- सच, जैसा हम बोले थे वैसा ना। दिखाओ ना मौसी।
ममता- अरे पहले खा लो।
कंचन- नहीं पहले देखेंगे।
ममता- बहुत ज़िद्दी है, जा सूटकेस में रखा है।
ममता और माया एक दूसरे को देखके मुस्कुराई, कंचन अपने कपड़े देखने चली गयी।दोनों इधर खाना खाने लगी।
कंचन ने सारे कपड़े उठाये और अपने कमरे में चली गयी। ममता और माया भी खाना खाकर आराम करने चली गयी।
 
कविता- हमारे राजा भैया कितना मज़ा आ रहा है, खूब चोदो ऊउईईई आहहहहहह ज़ोर से चोदो ना। आह और ज़ोर से। और ज़ोर से
जय कविता के कहने पर अपनी स्पीड बढ़ाते जा रहा था। कविता मस्ती में चुदवा रही थी। इस तरह जय कविता की गाँड़ में भी उंगली तेज़ी से कर रहा था। दोनों एक दूसरे को खुश करने में लगे थे। जय ने कविता की गाँड़ से उंगली निकालके सूंघने लगा। जय ने जैसे ही उसे सूँघा मानो पागल हो उठा और खूब ज़ोरों से धक्के मारने लगा। कविता की गाँड़ की खुसबू उसे दीवाना कर गयी थी। कविता जय के बढ़े तेज धक्कों से अति कामुक हो उठी, और अपने बुर पर उसका बस ना चला। बुर धीरे से कविता को चरम सुख की ओर ले जा रही थी। जय के धक्कों से बुर के अंदर का लावा फूटने लगा। और कविता चीखते हुए झड़ गयी। जय ने महसूस किया कि बुर जैसे लण्ड को निचोड़ रही हो। उसके लण्ड पर बुर का सारा रस निकल गया, पर जय ने किसी तरह लण्ड को झड़ने से रोक ही लिया।
कविता फर्श पर ढेर हो गयी, जैसे उसके शरीर मे कुछ बाकी ही ना रहा हो। जय भी कविता के ऊपर लेट कर थोड़ी देर शांत होकर लेट गया। वो जानता था कि कविता की गाँड़ मारने में जल्दी करेगा तो ज्यादा देर तजीक नही पायेगा। कविता मुस्कुराते हुए लेटी हुई थी। जय उसके बालों को सहला रहा था। कुछ देर तक ऐसे लेटने के बाद जय उठा और फर्श पर ही बैठ गया। कविता में उठने की हिम्मत ही नही थी। जय ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया। कविता ने आंखे आधी खोली और जय को देखा, हल्का मुस्कुराई। जय - क्या बात है थक गई क्या?
कविता- उम्म्म्ममम्म.... थोड़ा सा, पर तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे, टेंशन ना लो।
जय- हमको कोई हड़बड़ी नहीं है, कविता दीदी।
कविता- कितने प्यारे हो तुम जय, अपनी बहन का कितना ध्यान है।
 
जय ने कविता को फिर फर्श पर कुतिया की तरह दोनों हाथ और घुटनों पर आने को कहा," हहम्म, वाह क्या लग रही हो। अपनी पीठ झुकाओ और पीछे चूतड़ को और उठाओ।
कविता ने वैसा ही किया, इन सब के दौरान दोनों बहुत उत्तेजना में आ चुके थे। कविता करीब 15 मिनट तक जय जैसे बताता गया वैसे पोज़ देती रही। फिर कविता को ये बर्दाश्त के बाहर होने लगा।
कविता ने जय से कहा," जय, प्लीज अब ना तड़पाओ, हमारे बुर से देखो कितना पानी चू रहा है। अपनी दीदी को इतना चुदासी कर दिए हो। हमारे अंदर लण्ड की प्यास बढ़ती जा रही है। अगर तुम नही डालोगे ना अब तो जबरदस्ती उठके बैठ जाएंगे तुम्हारे लण्ड पर। कविता मदहोश आंखों और कामुक स्वर में बोली।
जय- अच्छा, आ जाओ ये काम अभी पूरा नहीं हुआ है। तुम्हारी और तस्वीरें लेनी है। बाद में लेंगे और भी मज़ेदार तरीके से। अभी प्यास बुझा लो।
कविता कुतिया की हालत में थी, उसने जय की ओर घूमके अपने चूतड़ों पर एक कसके थप्पड़ मारा, और बोली," दे दो अपना लौड़ा बुर में, भाई रे।
जय भी घुटनो पर आके कविता के चुतरो के पीछे आ गया, जिससे उसका लण्ड कविता के बुर से टकरा रहा था। जय ने अपने लण्ड पर थूका, और पूरा मल दिया। फिर उसने कविता के बुर पर थूका, जिसकी जरूरत नही थी क्योंकि वो पहले से ही काफी चिकनी हो चुकी थी। कविता के बुर का रंग शरीर के रंग से गहरा साँवला था, बेहद हल्के बाल होने की वजह से और भी मस्त लग रहा था। उसकी बुर चमचमा रही थी। जय ने उसकी बुर की फांकों को अलग किया, तो अंदर से गुलाबी दिखने लगा। जय ने बुर पर अपने लौड़े का शिश्न छुआ दिया। कविता की सिसकी निकल गयी। जय ने फिर उसे हटा लिया, और आगे करके फिर से छुवाया। कविता पीछे मुड़के बोली, " हटा क्यों लिया ? जय हँसके बोला- दो ही दिन में लण्ड की आदत लग गयी है, क्या बात है?
कविता- शैतान कहीं के, दीदी को तड़पा रहे हो। अरे डालो ना ।
जय- जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, डार्लिंग दीदी। और लण्ड को धीरे से कविता की बुर में घुसाने लगा। कविता को अपने बुर में प्रवेश करते लण्ड का एहसास बड़ा ही आनंददायक लगने लगा। उसकी मुंह से लंबी आह निकली," आआहहहह।
जय ने लण्ड को अभी आधा ही घुसाया था, उसे अपनी बहन की बुर में लण्ड घुसाने में स्वर्ग से आनंद लग रहा था। बुर अंदर से गर्म थी, जैसे लण्ड के स्वागत के लिए बुर ने तैयारी कर रखी हो। बुर को लण्ड का पूरा पूरा एहसास हो रहा था, जय ने जैसे ही लण्ड को पूरा उतारा, की कविता उन्माद में बोली," ऊफ़्फ़फ़फ़, कितना भरा भरा महसूस हो रहा है, आआहह। ये लण्ड आज थोड़ा बड़ा लग रहा है।
जय- लण्ड तो वही है, पर आज जो तुमने मॉडल की तरह फोटोज़ खिंचवाई है ना, उससे और कड़क हो गया है।
कविता- पता नहीं, जो भी हो लण्ड से बुर पूरा भर चुका है।
जय ने कविता के बालों का गुच्छा कसके पकड़ लिया, और धक्के मारने लगा। कविता भी अपनी कमर से पीछे धक्के लगा रही थी। जय कविता को अभी प्यार से धक्के लगा रहा था। जय की नज़र कविता के गाँड़ की छेद पर गयी। उसने कविता से बिना बताए अपनी एक उंगली उसकी गाँड़ में घुसा दिया।
जय- ऊफ़्फ़फ़ ये गाँड़ कितनी टाइट है, काश हम इसमें लौड़ा घुसा पाते।
कविता की आवाज़ में धक्कों की वजह से कंपन थी," हमको पता था कि तुम इसकी डिमांड करोगे, आजकल मर्द औरतों की बुर के साथ गाँड़ जरूर चोदते हैं। ये आजकल चुदाई का नया स्वरूप है। बुर के साथ गाँड़ कंप्लीमेंट्री चाहिए सबको। तुम भी लेना, हम मना नहीं करेंगे, पर पहले बुर की चुदाई हो जाये।
जय- ये तुमने ठीक कहा, बुर का लण्ड पर पहला हक़ है। हम भी पहले इसकी खूब चुदाई करेंगे, फिर तुम्हारी गाँड़ मारेंगे।
 
जय जो ये सब सुनते हुए कविता के चेहरे और गले पर चूम रहा था बोला," हाँ, पता नहीं माँ क्यों बार बार हर साल किसी ना किसी वजह से गांव चली जाती है। तुम तो शायद कभी नहीं जाती। खैर छोड़ो, करोड़पति तो बन गए, अब तुम अपना पति बना लो दीदी।
कविता हँस के बोली," हम तो तुमको पति मान लिए हैं। तन मन और धन से। पर......
जय- पर क्या कविता दीदी?
कविता उसकी आँखों में झांकते हुए बोली- क्या हम दोनों शादी के बंधन में बंध पाएंगे। क्या ऐसा कभी हो पायेगा? अब माँ को डीडी के बारे में पता चलेगा, तो कहीं मेरी शादी ना कर दे? शादी हो जाएगी तो हम तुमसे दूर हो जाएंगे। तुमसे दूर अब हम रह नहीं सकते।

जय उसके होंठो को चूम के बोला- ससससस........ हम तुमको कभी खुद से दूर नही होने देंगे। तुम हमारी हो, तुमको हम कहीं नहीं जाने देंगे। तुम हमारे लिए जन्मी हो। इस घर मे अब तक तुम हमारी दीदी बनके थी, आगे भी रहोगी, बस एक जिम्मेदारी बढ़ेगी की अब दीदी के साथ तुम बीवी की ज़िम्मेदारी भी निभाओगी। तुम्हारी शादी हमसे होगी, नहीं तो नहीं होगी।
और कविता को चूमने लगता है। कविता अपने भाई के बातों से छलकते आत्मविश्वास से प्रभावित हो चुकी थी। उसने भी जय के सर को पकड़ लिया और चूमने लगी। जय कविता के ऊपर लेटा था। कविता ने एक हाथ से जय के लण्ड को पकड़ लिया और सहलाने लगी।
जय ने कविता की आंखों में देखा, वो मदहोश हो चुकी थी। जय ने कविता को खड़े होने को कहा, और खुद उठके बैठ गया। उसने कविता के नाभि को चूमा, और उसमें जीभ घुसाके चाटने लगा। कविता खड़ी खड़ी आहें भर रही थी। वो अपने दोनों हाथ जय के कंधों पर रखी हुई थी। उसकी आंखें बंद थी, और भौएँ कामुकता से तनी हुई थी। जय ने कविता के बुर में उंगलिया घुसा रखी थी। वो कविता के बुर में तेजी से उंगलियां अंदर बाहर कर रहा था। कविता की आवाज़ें, कमरे में दीवारों को तोड़ना चाहती थी, ऊफ़्फ़फ़, आआहहहहहहहहहह.......।
जय- दीदी, इस समय क्या मस्त लग रही हो, तुम। मन कर रहा है, तुमको हमेशा ऐसे ही देखें, रुको कैमरा लेके आते हैं।
कविता जय को रोकते हुए बोली, " जय, नहीं अभी नहीं,प्लीज बाद में इस वक़्त तो हमको तुम्हारा लौड़ा चाहिए। हम बहुत चुदासी हो गए हैं। उफ़्फ़फ़फ़फ़फ़, कितना अच्छा लग रहा है, लौड़ा डालोगे तो और मज़ा आएगा। हाय........
जय- तुम्हारा यही एक्सप्रेशन तो चाहिए, कविता रानी। बस तुरंत आ जाऊंगा और जितना चाहोगी उतना पेलूँगा तुमको। जय ने उसकी बुर से उंगली निकाली और चाट गया। कविता चुदासी थी, वो अपने अंग अंग को खुद ही सहला रही थी। जय फौरन अपने माँ के कमरे में गया, और अलमीरा से कैमरा ले आया। कविता खड़ी खड़ी अपने बुर को मल रही थी। जय ने उसको बिना बताए कुछ फ़ोटो ली उसी अवस्था में। फिर उसने कविता को सोफे पर छत की ओर देखते हुए लेटने को कहा।
कविता सोफे पर लेट गयी, जय ने उसे सर सोफे के हैंडल पर रखने को बोला, बालों को समेटकर बाहर लटका दिए। फिर, कविता एक हाथ से अपने बुर को फैलाई और दूसरा हाथ की पहली उंगली मुंह मे दबा ली ।
परफेक्ट, जय बोला।
कविता - जय तुम अभी लण्ड दो ना हमको, प्लीज बाद में तुम अलग से फोटोज ले लेना। जैसा तुम कहोगे वैसे करेंगे।
जय- इसमें कोई शक नही है, कविता डार्लिंग पर तुम्हारे चेहरे पर अभी जो चुदने की प्राकृतिक लालसा है, तुम जितनी चुदासी हो रही है, लण्ड लेने के लिए जो तुम्हारे मन की प्यास है, ये बहुमूल्य भाव तुम्हारे चेहरे पर किसी गहने की तरह तुम्हारी अंदर की औरत को निखार रही है।
कहते हुए जय ने 4 5 तस्वीरें क्लिक की। कविता अपनी बुर को रगड़ते हुए भिन्न मुद्राओं में तस्वीर खिंचवा रही थी। जय उसकी नग्नता को तस्वीरों में कैद कर रहा था।
उसने कविता को करवट लेकर लिटाया जिससे उसकी गाँड़ जय के सामने आ गए। कविता ने जय का इशारा पाकर चूतड़ों को फैलाया। उसने कुछ और तस्वीरें ली।
फिर कविता फर्श पर घुटनो के बल बैठ गयी, और दोनों हाथों से अपनी चुच्चियों को पकड़के, जीभ बाहर निकाल ली। जय खुश होकर फोटो लेता रहा। जय ने फिर बोला," दीदी अपने बालों को हाथों से पकड़के ऊपर उठा लो, और कैमरे की तरफ देखो, हाँ .... थोड़ा सर को झुकाओ और हाँ और चुदासी लाओ चेहरा पर, हहम्मम्म सही।
कविता ने वैसे करके पूछा - ठीक है, ये।
 
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