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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

जय- लण्ड पर बंधी तुम्हारी राखी आज तुम्हारी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा रही है। जिस राखी को भाई हाथ पर पहन कर बहनों की रक्षा करते हैं, आज एक बहन ने उसी राखी को भाई के लण्ड पर बांध, रिश्तों की मर्यादा ताक पर रख, उस लण्ड से खूब चुद रही है। हा... हा हा.....हा...
कविता- उम्म्ममम्ममम्म... जय तुमको मज़ा नहीं आया क्या? अपनी सगी बड़ी बहन को राखी के दिन इतनी बुरी तरह चोदे हो तो।हम तो तुम्हारे लिए घर की इज़्ज़त, मान मर्यादा, रिश्तों की परवाह किये बगैर खुदको तुम्हारे हवाले कर दिए जान।
जय- तुम तो आज हमारा दिल जीत ली हो कविता रानी। आज तो मन कर रहा है, माँ से तुम्हारा हाथ मांग ले और तुमको हमेशा के लिए इस समाज की रिवाज़ के खिलाफ बीवी बना ले।
कविता - मांग लो ना माँ से हमको, किसने रोका है। माँ अब मना नहीं कर पायेगी। वो फिर से सुहागन बनकर घूमना चाहती है। तुम उसके सुहाग हो और हमारे भी। हम दोनों माँ बेटी को अपना लो, और इस घर में दोनों को पत्नी बनाकर रखो। हमको कोई एतराज़ नहीं है।
जय- तुम ठीक कह रही हो। वक़्त आ गया है, कि अब हम इस घर के मुखिया बने और तुम दोनों की जिम्मेदारी पति बनके उठाये। तुमको पता है, ममता को बच्चा चाहिए। और उसकी उम्र भी हो गयी है। जल्द ही उसकी कोख भरनी होगी, और उसके लिए हम तीनों के बीच शर्म की दीवार गिरानी होगी।
कविता जय को चुम्मा लिए जा रही थी। इस वक़्त शाम के 7 बज रहे थे। तभी आसमान में काले घने बादल आ गए। बिल्कुल अंधेरा सा हो गया। कविता जय के जिस्म से चिपकी हुई थी। बाहर आंधी तूफान जोर से चलने लगे। जय और कविता दोनों उठ बैठे। बिजली ज़ोर से कड़क उठी, तो कविता सहम कर जय के सीने से चिपक गयी। जय उसके चेहरे को उठाके चूमने वाला था, कि ममता का फोन आ गया। ममता ," जय हम अभी नहीं आ पाएंगे। बहुत जोर की बारिश हो रही है। तुम दोनों ठीक से रहना। सत्य हमको सुबह आफिस के समय ले आएगा।"
जय- ठीक है, तुम अपना ध्यान रखना।"
कविता आंखों से इशारा करते हुए पूछी," क्या हुआ? क्या बोल रही थी माँ?
जय- वो सुबह तक नहीं आएगी।
कविता- ओह्ह, तो फिर वो मामाजी के यहां आज रात रुकेगी।
जय कविता के होंठों को छूकर बोला," तुम तो आज की रात का फायदा उठाओगी ना?
कविता- इस रक्षाबंधन के दिन बहन भाई के साथ सुहागरात मनाएगी।" उसकी आँखों मे एक शैतानी प्यास और होंठों पर नटखट हंसी थी। वो जय को लिटाकर फिर उसके ऊपर चढ़ गई। और चादर ओढ़ ली। उस रात दोनों ने 4 से 5 बार चुदाई की। और सुबह 5 बजे सोए। दोनों एक दूसरे की बाहों में नंगे ही सोए थे। कविता की सुबह जब आंख खुली, तो बाहर से तेज धूप आ रही थी। उसने आंख मलते हुए घड़ी देखी तो 10 बज चुके थे। उसका पूरा बदन टूट रहा था। वो उठी पर चल नही पा रही थी। किसी तरह दीवार पकड़ते हुए बाथरूम पहुंचना चाहती थी। तभी वो गिर पड़ी और साथ मे कुर्सी भी गिर पड़ी। जय की नींद गिरने की आवाज़ से खुल गयी। जय ने कविता को पड़े हुए देखा, तो उठकर कविता को सहारा देकर उठाया। पर वो ठीक से चल नही पा रही थी। जय ने ये देखा तो कविता को अपनी गोद मे उठा लिया, जैसे फिल्मों में हीरो हीरोइन को उठा लेता है। जय," बहुत दर्द हो रहा है क्या कविता दीदी? कविता उसके गालों को सहला कर बोली," नहीं, ये तो कल रात जो तुमने हमको जी भरके प्यार किया है ना उसी का असर है। ये दर्द बहुत मीठा है। इसकी आदत पड़ जाएगी।" और उसको चूम ली। जय फिर उसको बाथरूम तक ले गया, और गोद से उताड़ दिया।वो बाथरूम के अंदर चली गयी। खुद को आईने में देखा। उसके गर्दन और गालों पर लव बाइट्स थे। फिर उसने पूरे शरीर मे कई जगह जय के काटने के निशान पाए। चूतड़, पेट, कमर, चुच्ची सब जगह। वो ये देख, मुस्कुराई। उसकी बुर और गाँड़ चुद चुदकर दुख रही थी। वो हिम्मत जुटाकर फ्रेश होने लगी। तभी घर की घंटी बजी। ये और कोई नही ममता थी। कविता बाथरूम में थी, तो उसने सुना नही। जय ने एक तौलिया पहन लिया और दरवाज़ा खोला, सामने ममता थी। वो एक सेकंड के लिए अवाक रह गया, उसने सोचा ही नहीं, की ममता हो सकती है। फिर खुदको संभालते हुए बोला," मामाजी कहां है?
ममता- वो तो हमको नीचे छोड़ के चला गया। कविता ऑफिस गयी क्या?
जय- पता नहीं, शायद बाथरूम में है। क्यों?
ममता उसको गले लगाके बोली," जब वो सामने नहीं तो, हम तुम्हारी माँ नहीं, बल्कि पत्नी हैं।" और जय को चूमने लगी।
जय - दरवाज़ा तो बंद कर लो।"
ममता- तुमको दरवाज़ा का पड़ा है, थोड़ा हमारा चेहरा को देखो, हमारे प्यासे होंठ, मुरझाई आंखें, जो तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रहे हैं। और ममता जय के सीने को किस करते हुए नीचे आने लगी, और उसका तौलिया उतारने लगी। तभी जय ने ममता को बोला," फिर तो हमको अपनी पत्नी की प्यास बुझानी होगी। चलो हमारे कमरे में।" मन ही मन वो किसी तरह ममता को हॉल से कमरे में ले जाना चाहता था। ममता के होंठों को किस करते हुए, अपने कमरे में ले गया।
 
वहां ममता का पल्लू, ब्लाउज और ब्रा तुरंत फर्श पर गिर गए। जय ममता को बेतहाशा चूम रहा था। और ममता भी छोटे समय मे मज़े ले लेना चाहती थी। क्या कहने इस घरके की जय की बहन छुड़ाकर बक़तरूम में थी, और जय अब अपनी माँ को प्यार कर रहा था। ममता जय के खड़े लण्ड को तौलिए के ऊपर से सहला रही थी। ममता बिना देर किए, घुटनो पर बैठ गयी, और तौलिया हटा दी। जय का लण्ड खड़ा था, पर उसपर राखी बंधी देख ममता आश्चर्य में पड़ गयी। वो जय की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कुछ बोलने ही वाली थी कि, बाथरूम का दरवाजा खुला और कविता नंगी ही बाहर आ गयी। कविता ने महसूस किया कि जय अपने कमरे में कुछ कर रहा है। वो वहीं नंगी पहुंच गई, क्योंकि उसे पता नहीं था, की ममता आ चुकी है और वो अभी उस कमरे में जय का लण्ड चूस रही है। कविता कमरे में घुसी, तो ममता जय का लण्ड पकड़ खुद अधनंगी हुई घुटनो पर बैठी है। जय पूरा नंगा, कविता पूरी नंगी और ममता अधनंगी। ममता और कविता ने अपनी आंखें हाथों से ढक ली। दोनों के मुंह से एक चीख निकल गयी।

अब आगे क्या होगा? कैसे ये रिश्ता आगे बढ़ेगा? देखते हैं आगे।
 
एक खामोशी थी कमरे में, ठीक वैसे जैसे तूफान के आने से पहले होती है। ये तूफान या तो सब उजाड़ देगा या फिर इनकी ज़िंदगी और रिश्ते हमेशा के लिए बदल जाएंगे। ममता अपनी साड़ी से चुच्चियाँ ढक अपनी ब्लाउज और ब्रा फर्श से उठाने लगी। कविता बुत बनी खड़ी थी अपने मुंह को छुपाए। जय ने खुदको छोड़ पहले कविता को तौलिये से ढकने बढ़ चला। वो खुद पूरा नंगा था। जय ने कविता को ढक दिया और कविता ने फौरन उस तौलिये को लपेट लिया। ममता अभी अपनी ब्रा छोड़ ब्लाउज पहनने की कोशिश कर रही थी। पर वो जल्दबाज़ी में ठीक से पहन ही नही पा रही थी। कविता और ममता एक दूसरे की ओर नहीं देख रहीं थी। जय ने अपनी बॉक्सर जल्दी से पहन ली। ममता ने जल्दबाज़ी में अपनी ब्लाउज फाड़ ली। वो फिर कमरे से निकलकर अपने कमरे में ब्लाउज पहनने चली गयी। ममता जैसे गयी कविता भी निकलना चाहती थी, पर जय ने उसके हाथ को पकड़ लिया। कविता जय की ओर देखकर बोली," जय अभी हमको जाने दो, प्लीज।" वो लगभग भीख मांगते हुए बोली। जय," क्या हुआ दीदी डर गयी? बस हो गया,कल तक तो बोल रही थी कि माँ से हम तुमको मांग ले। कविता की आंखों में आंसू आ गए थे," हां, हम डर गए हैं। पता नहीं अब क्या होगा? कहीं हम तुमको खो ना बैठे?

जय- अभी तो शुरुवात हुई है ज़माने से लड़ने की, तुम्हारा प्यार इतना कमजोर नहीं हो सकता कि, अभी से डगमगाने लगे। अरे दीदी तुम साथ रहोगी तभी तो इस ज़माने से हम दोनों के लिए लड़ेंगे। ये रास्ता आसान नहीं होगा, ये तो तुमको भी पता था।
कविता- पर...
जय- पर वर कुछ नहीं तुम हमारे साथ निडर होकर रहो।"
जय उसे अपनी ओर खींच लिया और गले से लगा लिया। कविता उसके गाल सहलाते हुए बोली," पर जय कैसे होगा? तुम खुद सोचो एक बहन अपनी माँ से खुद के सगे भाई से शादी की बात कैसे करेगी? इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए।
जय- अरे कविता दीदी, तुम वो बहादुर लड़की हो,जिसने हमको और माँ को तब संभाला जब पिताजी नहीं थे। तुमसे ज्यादा बहादुर लड़की हम नहीं देखे हैं। अगर ये हिम्मत तुममें नहीं हो सकती, तो इस दुनिया में कोई लड़की ऐसा नहीं कर सकती।" जय के इन शब्दों से कविता का भरोसा बढ़ा, और उसकी आँखों में देख दृढ़ निश्चय के साथ बोली,"हम थोड़ा देर के लिए घबरा गए थे। हमको माफ कर दो। भगवान जानते हैं कि हम तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकते हैं जानू भैया। खुद खत्म हो जाएंगे, पर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे।"
"लेकिन अभी हमको कपड़े बदलने दो। क्योंकि अब हमको लड़ाई के साथ साथ माँ को इस रिश्ते के लिए मनाना भी है और उनको भी इसमें शामिल करना होगा।" कविता ये बोलते हुए दरवाज़े से निकल गयी। वो अपने कमरे में पहुंची और शलवार सूट पहनने लगी। उसने जैसे ही कपड़े पहने,की हॉल से ममता ने कविता को आवाज़ लगाई।
कविता....कविता... बाहर आओ।"
कविता बाल खुले, पीला सूट पहनकर बाहर आई। जय अपने कमरे से सब देख रहा था। ममता नाइटी पहनी थी, मैरून रंग का। कविता बाहर आकर, सीधा ममता के पास गई," बोलो माँ।"
ममता- क्या कर रही थी, तुम नंगी होकर जय के कमरे में। कबसे चल रहा है ये सब? हम घर पर नहीं रहते तो तुम दोनों आपस में ही....। अरे भाई बहन हो तुम दोनों, और ये घिनौना काम करते हो। अरे निर्लज... कहीं की।
कविता- माँ, हम आराम से बात करते हैं, आओ कमरे में चले। हम सब समझाते हैं तुमको।तुम गुस्सा मत हो।
 
ममता- क्या समझाएगी हमको। अरे हमारी आधी उम्र निकल गयी, समझ तो तेरी गंदगी से भरी पड़ी है। ऐसी कुलक्षिणी बेटी हुई है, की अपने सगे भाई से चुदवाती है। ज्यादे आग लगी थी, जवानी में शादी तक बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।
कविता - माँ, यहां नहीं, प्लीज कमरे में चलो वहां बात करते हैं। यहां ठीक नहीं है।
ममता- आये हाये भाई के सामने नंगी घूम रही थी, तो ठीक था अब बात करना भी ठीक नहीं लग रहा। बेशर्म कहीं की राखी लण्ड पर नहीं कलाई पर बांधी जाती है। सारे जहां में भाई ही मिल था, रंगरेलियाँ मनाने। भाई बहन के पवित्र रिश्ते को कलंकित कर दिए हो दोनों। जो भाई तुम्हारे मंडप को सजता तुम, उसके साथ बिस्तर सजा ली। तुम दोनों को अंदाजा भी है, की क्या किया है तुम लोगों ने। सच कहते हैं, लड़की की जल्दी शादी कर देनी चाहिए, काम से कम मुंह तो काला नहीं करवाएगी। ठहर जा तेरी शादी इसी महीने कर दूंगी। अबसे तुम, अपने मामा के पास जाकर रहोगी, जब तक तुम्हारी शादी नही हो जाए। कम से कम अपने भाई के साथ ये काम तो नहीं करोगी, बेशर्म लड़की।
कविता- खुद तुमको शर्म आता है। जो हमको बेशर्म बोल रही हो।
ममता," क्या कहा?
कविता- वही जो तुम सुनी हो। हमको शर्म मत सिखाओ। खुद तो अपने बेटे का लण्ड चूस रही थी। माँ होकर बेटे के साथ ऐसा रिश्ता तुम बना सकती हो, तो भाई बहन के बीच रिश्ता बन गया तो तुमको मिर्ची काहे लग गया। हम जय को बहुत चाहते हैं। और उससे ही शादी करेंगे। रही बात शादी की तुम को अंदाज़ नहीं था, कि हमारा उम्र कितना हो गया है। हमारी उम्र की लड़कियों के दो दो बच्चे हो गए हैं। और हमारे नसीब में ये सब तो दूर, ज़िंदगी की परेशानियां, ही लिखी थी। हर लड़की चाहती है समय से उसकी शादी हो, बच्चे हो। उसके कुछ अरमान होते हैं। पर हम तो घर की खातिर अपने अरमान भुला बैठे। ये भूल ही गए थे कि हम एक लड़की भी हैं। ना किसी से मिलना, ना किसी से बात करना। पिछले कितने सालों से यही कर रही थे हम। तुम भी स्वार्थी निकली, घर चलाने के चक्कर मे भूल गयी कि लड़की की शादी समय पर की जाती है। नहीं तो जवानी में कदम बहक जाते हैं। फिर जय ने हमको आखिर ये एहसास दिलाया कि हम एक लड़की भी हैं। जो खुद को जिम्मेदारियों में खो चुकी है। तुम खुद तो शादी 18 साल मे की थी, पर यहां तो 26 हो गया है। कब तक खुद को संभालते। बाहर किसी और के साथ ये सब करते तो तुम्हारा नाम होता क्या? अरे और बेइज़्ज़ती होता। और मुंह मत खुलवाओ हमारा। तुम क्या क्या गुल खिलाई हो, हमको सब पता है।
ममता अवाक थी," तुम पगला गयी हो क्या? तुमको तो .... ये बोलकर वो कविता को मारने के लिए आगे बढ़ी। और दो थप्पड़ मारा। कविता के गाल लाल हो गए।
ममता- तुझ जैसी बेटी से अच्छा होता कि बांझन होती। ये दिन तो नहीं देखना पड़ता। तू तो एक नंबर की रंडी निकली, छिनाल कहीं की।
कविता गाल सहलाते हुए- जैसी माँ वैसी बेटी। तुम हमसे बड़ी रांड हो जो तीन तीन मर्दों से चुदवाई हो। पहले बाबूजी से फिर, उस हरामी चाचा से और अब अपने बेटे से। तुम तो एक मिशाल हो रंडीपन के इतिहास में।
ममता- चुप कर छिनाल, तुझे कुछ पता नहीं है। उसकी वजह कुछ और थी।
कविता- तुम जैसी औरत वजहें ढूंढती है। देखो हमको सब पता है। हमने ही तुमको और जय को खजुराहो भेजा था। क्योंकि वो तुमको पसंद करता था। तुम भी एक प्यासी विधवा थी। जय ने वहां तुम्हारे अंदर की दबी प्यास उजागर कर दी। तुम दोनों ने वहाँ मंदिर कम घूमे, और हनीमून ज्यादा मनाया है। तुम उसके साथ शादी कर चुकी हो, ये हमको पता है। हमको इससे कोई एतराज़ नहीं। लेकिन फिर हमें पता चला कि हर साल तुम गांव बहाने से क्यों जाती थी। उस हरामी शशिकांत चाचा से चुदवाने। कंचन ने तुम दोनों को देख लिया था, जिसकी खबर उसने हमको दी और हम जय को बता दिए। पर उसने तुमको ये बात तुमको चोदने के बाद बताई। क्योंकि वो तुमको हासिल नहीं पाना चाहता था। इतना अच्छा लड़का है वो।
ममता चुपचाप खड़ी थी। उसने अपनी ज़िंदगी में किसीके मुँह से इतने कड़े शब्द नहीं सुने थे। और आज अपनी ही बेटी उसको सब सुना रही थी, और ये सारी बातें, सच थी।
 
सत्यप्रकाश- इन्हें इस बात की जानकारी नहीं है पंडितजी।
जय- किस बात की जानकारी?
पंडितजी- इस बात की। और एक तरफ हाथों से इशारा किया। वो वही कमरा था, जिस कमरे से कविता आई थी। जय ने पलट कर देखा, तो माया ममता को पकड़े आ रही थी। ममता भी शादी के जोड़े में थी। जय की आंखें खुली की खुली रह गयी।
जिस तरह सुबह होने पर धरती दुल्हन की तरह सजती है, जिस तरह रात होने पर चांद और सितारे धरती का चांदनी से श्रृंगार करते हैं ठीक उसी तरह ममता का श्रृंगार और आवरण उसको धरती की ही तरह सुंदर बना रहा था। उस अधेड़ उम्र में भी वो, किसी नवयौवना सी लग रही थी। आंखें बिल्कुल हिरणी सी काजल से सजी थी। होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से थे। उसने भी पूरा ब्राइडल मेक अप किया था। दोनों माँ बेटी ने एक सा जोड़ा पहना था। वही आभूषण कानों, नाक, हाथ, पैर, सब वही था। कमर में दोनों माँ बेटी ने कमरबंद पहना हुआ था। गले में सोने का हार भी था, जो कि बेहद खूबसूरत लग रहा था। ममता धीरे धीरे अपने मोतियों से दांत मुस्कुराते हुए बिखेड़ रही थी। जय उसमे इतना खो गया था कि, उसे होश ही नहीं था।
पंडितजी- जजमान, कहाँ खो गए? आपकी ही होनेवाली है ये भी। बहुत कम लोग हैं, जो आप जितने भाग्यशाली होते हैं। एक साथ दो लड़कियों से शादी सबकी नहीं होती।
जय और ममता अब मंडप में बैठ गए और एक दूसरे का हाथ थामे हुए थे। कविता भी वहीं बैठ रश्मो रिवाज़ में मदद कर रही थी। सत्यप्रकाश ने फिर ममता का कन्यादान किया। ममता की मांग भरी और फिर उसके साथ सात फेरे लिए। जय और ममता के आंखों में खजुराहो का दृश्य जाग उठा। दोनों अपनी पहली शादी, के तर्ज पर एक दूसरे का हाथ थाम, फेरे ले रहे थे। आखिरकार विवाह संपन्न हुआ। जय की आज दो दो शादी थी। पंडितजी को लेट हो रहा था, वो बोले," जजमान, बहुत विलंभ हो रहा है, मुझे रवाना करें। भोजन हम करेंगे नहीं, हमारी दक्षिणा दे दे।"
तीनों जय, ममता और कविता ने एक साथ पंडितजी के पैर छुवे। पंडितजी ने आशीर्वाद दिया," अखण्ड सौभाग्यवती भव:। पुत्र रत्न प्राप्ति भव:। आप दोनों जल्द से जल्द इनके बच्चों की माँ बने और कुशल गृहणी का कर्तव्य निभाये।" पति के पैर छुइये और खुदको समर्पित कीजिये।"
ममता और कविता ने जय के क़दमों में बैठकर उसके पैर छुए, और होंठों से चूम लिया। जय ने दोनों को उठाया और गले से लगा लिया।"
 
जय और वो अंदर गए। सारी प्रक्रिया पूरी हुई। जय के दिमाग मे सत्यप्रकाश की बातें कौंध रही थी। दोनों माँ बेटी ने जय से नार्मल बातें ही की। फिर वो सब वहां से चली गयी।
फिर शादी का दिन आ गया। और जय को उसके घर से लेने सत्यप्रकाश नई गाड़ी लेकर आये। गाड़ी फूलों से सजी थी। ये जय का इस घर मे आखरी दिन था। सत्य ने जय को फूलों का गुलदस्ता दिया और बोला," आइए दामादजी, चलिए।" जय गाड़ी में बैठा और उत्सुकता से अपनी बारात जो वो खुद ही था लेकर निकल गया। कुछ 45 मिनट लगे वहां पहुंचने में। जय को तो ये सदियों सा लग रहा था। जब गाड़ी गेट पर खड़ी हुई तो, सत्य गाड़ी से निकला। जय ने देखा कि वहां माया खड़ी थी। माया भी सजी धजी थी। उसने जय की आरती उतारी। उसको तिलक लगाया। फिर सत्यप्रकाश उसको गोद मे उठाकर अंदर घर में ले गया। वहां बस माया और सत्यप्रकाश नज़र आ रहे थे। ममता कहीं दिख नहीं रही थी। जय आश्चर्यचकित था, की माया मौसी को भी सब पता चल गया है। तभी पंडितजी आ गए। जय और सबने उनके पैर छुए। शादी शुरू हुई। जय अब तक मंडप में अकेला बैठा था। तब पंडितजी ने बोला," कन्या को बुलाइए।
तब जय की नज़र दरवाज़े पर गयी तो, कविता दुल्हन के जोड़े में बिल्कुल गुड़िया सी लग रही थी। लाल रंग का लहंगा, और बैकलेस चोली थी। माथे, में टीका, नाक में नथिया, कानों में झुमके, हाथों में कंगन, पैरों में पायल, हाथों में मेहन्दी, पैरों में भी मेहन्दी लगी थी, चेहरे पर पूरा ब्राइडल मेक अप था। मुस्कुराते हुए, वो मंडप में पहुंची तो, जय ने अपना हाथ बढ़ाया, कविता उसकी ओर देख मुस्कुराई और उसका हाथ थाम लिया। जय ने उसे अपने बगल में बिठा लिया।
पंडितजी सत्यप्रकाश की ओर देख कर बोले," उनको भी साथ में बुला लीजिए। एक साथ हो जाएगा।"
सत्य- पंडितजी, पहले ये वाला कीजिये, फिर वो होगा। आपको पैसे तो दे ही रहे हैं। है कि नहीं।"
पंडितजी मुस्कुराए बोले ठीक है, जैसा आप कहे।"
जय को उनकी बातें समझ नहीं आ रही थी। पता नही कोई और शादी कर रहा है क्या?
पंडितजी, फिर मंत्र पढ़ने लगे। और शादी आगे बढ़ने लगी। इसी क्रम में जय ने कविता की मांग भड़ी, उसके साथ फेरे लिए। सत्यप्रकाश ने कविता का कन्यादान भी किया। जाय आश्चर्य में था कि आखिर ममता है, कहाँ?
और शादी भी सम्पन्न हो गयी। जय और कविता उठकर मंडप से जाने लगे, तो पंडित ने जय को रोक लिया," अरे आप कहाँ चले। आपको तो अभी 2 घंटे और बैठना है। "
जय को कुछ समझ नहीं आया। उसका शून्य चेहरा देख पंडितजी, बोले," अरे ऐसे क्यों देख रहे हैं। सत्यप्रकाशजी ने बताया था कि, आप दोनों बहनों से शादी कर रहे हैं।"
 
जय खुद को बिजी रखने लगा। सत्यप्रकाश भी अगले दिन जय के साथ घर घूम और उसने अपनी मुहर लगा दी। जय घर की खरीददारी, और अपने लिए शादी की मार्केटिंग करने लगा। ममता और कविता उधर अपनी मार्केटिंग खुद कर रहे थे। किसी तरह दिन निकले और रजिस्ट्री का दिन आ गया। चुकी रजिस्ट्री, कविता और ममता के नाम थी तो सत्य के साथ, वो दोनों सीधे रजिस्ट्री ऑफिस पहुंचे। जय और सरदारजी पहले से इंतज़ार कर रहे थे। जय ने जब दोनों को देखा तो मुँह से निकला," उफ़्फ़फ़"।
कविता और ममता की फिटनेस काफी इम्प्रूव हो गयी थी। ममता ने भी वजन कम किया था। कविता जीन्स और टॉप में थी, उसके उभार बहुत सही लग रहे थे। ममता ने रेड कलर की सारी पहनी थी। उसे समझ नही आ रहा था, की किसको देखे। उसने पहले ममता को निहारा, ममता के पेट की चर्बी में कमी आयी थी। चेहरे पर भी सुधार था। वो गोगल लगाए हुए थी। उसके चेहरा देखने से साफ पता चल रहा था, की ब्यूटी पार्लर से आ रही है। एक दम ग्लोइंग चेहरा शायद उसने फेसिअल वगैरह कराया था। बाल भी डिज़ाइनर स्टाइल में कटे हुए थे। भौएँ भी बनी हुई थी। होंठों पर लाल लिपस्टिक, पैरों में सैंडल। उसने कभी ममता को इस रूप में नहीं देखा था। उसकी माँ शायद ही उसके सामने ब्यूटी पार्लर गयी थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि ममता एक हफ्ते में इतनी खूबसूरत लगने लगेगी। दूसरी तरफ उसकी बहन कविता थी, जिसको शायद ही उसने कभी जीन्स में देखा था। वो तो हमेशा शलवार सूट में रहती थी। उसने अपने गॉगल्स सर पर टिकाए थे। होंठों पर पिंक लिपस्टिक, आंखों में गहरा काला काजल। वो भी ब्यूटी पार्लर से सीधे रैंप पर मॉडल की तरह आ रही थी। पैरों में काली सैंडल थी। कानो में बड़े मैटेलिक रंग के गोल झुमके। दोनों की केमिस्ट्री भी पहले से अलग थी। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों सहेलियां हो। दोनों बिल्कुल मस्त लग रही थी।
"भाईसाहब, चले। सरदारजी ने जय को कंधे से हिलाकर कहा। मुझे और भी काम हैगा।"
दोनों मुस्कुराई और फिर सब अंदर चले गए। रजिस्ट्री होते होते चार घंटे लग गए। फिर भी अभी एक अंतिम प्रक्रिया बाकी थी। दोनों मा बेटी एक दूसरे से बात कर रहे थे। जय उनको देख रहा था। तभी सत्य उसके पास आया और बोला," क्या बात है, जीजाजी सब चीज़ ठीक जा रहा है, आपके लिए तो, दो बीवियां ये घर। क्या किस्मत है आपकी।"
जय- अरे नहीं ये सब तो.... एक..एक मिनट आपने हमको जीजाजी बोला। आप क्या बोल रहे हैं?
सत्य- अरे जीजाजी, आपका साला हैं हम, हमको सब पता है, कविता के साथ ममता दीदी को खजुराहो में ... ऐं... ऐं. ऐं। और हसने लगा।
तभी उन लोगों को अंदर बुलाने लगे।
सत्य- शादी वाले दिन सब पता चल जाएगा।
 
ममता- सब होगा। तुम दोनों का रिश्ता हम स्वीकार किये ना। ये भी तो असंभव था। लेकिन हुआ ना! तुम दोनों के बीच भी बहन का रिश्ता प्रेमी प्रेमिका का हो गया। हुआ ना! और हम दोनों माँ बेटे से पति पत्नी हो गए। हुआ ना! तुम दोनों वो सब हमपर छोड़ दो। "
कविता और जय आश्चर्य में थे।
उस रात जय अकेले ही सोया। और अगले दिन तीनों घर देखने गए। वो किसी सरदार का घर था। जय ने कविता को अपनी बीवी और ममता को कविता की बड़ी बहन बताया। उसे जल्द ही पैसों की जरूरत थी। वो तीन बी एच के था, आगे और पीछे दोनों तरफ लॉन था। टेरेस भी काफी बड़ा था। वो घर सड़क से लगभग 100 मी अंदर था। चारो तरफ लंबे लंबे पेड़ लगे हुए था। घर के आसपास अभी कोई दूसरा घर नहीं था। छत से सड़क दिखती थी। तीनों की अय्याशी के लिए ये घर एक दम परफेक्ट था। जय ने तो मन मे सोच लिया था कि किसको कहां कैसे कैसे चोदेगा। ममता और कविता भी मुस्कुरा रही थी, शायद वो दोनों भी नटखटी बातें सोच रही थी। फिर वो लोग वहां से चले आये, रजिस्ट्री का दिन तय हो गया आठवें दिन। जय फिर उन दोनों को मंदिर ले गया, वहां उन्होंने ने दर्शन किये। फिर मंदिर के अंदर पुजारी जी से शादी का दिन निकलवाया। पुजारीजी ने पूर्णिमा का दिन शुभ बताया, जो कि रजिस्ट्री के दो दिन बाद कि थी। वहां पंडितजी को एडवांस पैसे देकर शादी वाले दिन आने को कहा गया। पंडितजी ने हामी भर दी।
शाम के तीन बजे उन दोनों को जय सत्यप्रकाश के यहां छोड़ने गया। पर उसका चेहरा उदास था, क्योंकि अब उसको दसवें दिन ही, अपनी बीवियां नसीब होंगी।
जय वहां कुछ देर रुका और फिर निकल गया। सत्यप्रकाश को पता थी कि दोनों आ रहे हैं, इसलिए उसने चाभी पड़ोस में दे रखी थी।
उधर जय घर पहुंचा, तो उसे घर काटने को दौड़ा। उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। जय ने कविता को फोन लगाया, पर वो फोन नहीं उठाई शायद काम मे बिजी रही होगी। उसकी आंख कब लगी उसको पता ही नहीं चला।
शाम सात बजे, कविता ने फोन किया, तो उसकी आंख खुली।
कविता- हेलो जानू।
जय- अरे दीदी, कहां थी तुम? कितना फ़ोन किये, तुमको।
कविता- काम कर रही थी। नाराज़ हो?
जय- नाराज़ नहीं, उदास हैं। तुम्हारी याद आ रही है।
कविता- हमारा हाल भी, वैसा ही है। मन कर रहा है कि कब तुम्हारे पास आ जाये। लेकिन इतने दिन दूर रहेंगे तो, शादी वाले दिन का मज़ा डबल हो जाएगा।
जय- ये दस दिन, कैसे काटेंगे। तुमलोगों के बगैर।
कविता- काटने तो पड़ेंगे। आज के बाद शायद हम फोन नहीं कर पाएंगे। माँ ने हमारा और अपना फोन शादी तक स्विच ऑफ करने बोला है। आई लव यू जान। उम्म्म्म्मममः
और फोन कट गया।
 
ममता ने फिर घड़ी देखी तो शाम के 7 बज चुके थे। वो उठकर खाना पकाने जाने लेगी। तो जय ने पूछा," कहां चली?
ममता- खाना पकाने।
जय- आज खाना बाहर से मंगवा लेते हैं। आज तो मस्ती की रात होगी। हम तीनों साथ रहेंगे और मज़े करेंगे।
ममता- हम एक बात बोलना चाहते हैं। भले ही हम दोनों माँ बेटी के बीच रिश्ते बदल गए हैं, पर अभी हम कविता के सामने नंगी होकर चुदाई नहीं कर पाएंगे। इसमें थोड़ा समय लगेगा। आखिर है तो वो हमारी बेटी ना। हम आपको निराश नहीं करना चाहते, आप हमारी स्थिति को समझिए। प्लीज हमको थोड़ा समय दीजिये।
जय- ये क्या कह रही हो तुम? अब तो सब साफ हो गया है। फिर तुमको क्या तकलीफ है।
कविता- जय माँ ठीक कह रही है। हम जानते हैं ये इतना आसान नहीं होगा, की एक माँ अपनी बेटी के सामने अपने ही बेटे से चुदवाए। ये रिश्ता बना ये तो ठीक है, पर अभी तीनों का एक साथ सामूहिक चुदाई में संलग्न होने में समय लगेगा। हम माँ की बात से सहमत हैं।
जय- ठीक है। तो तुम दोनों में से आज की रात हमारे साथ सोएगी। क्योंकि शादी तो तुम दोनों से किये हैं।
ममता ने कविता को उठाया और बोली," आज की रात तो आपको अकेले सोना होगा क्योंकि, कविता की अभी ठीक से शादी नहीं हुई है आपके साथ। और हमको माहवारी आई है। आज की रात और कविता से शादी के दिन तक अब आपको अकेले रहना होगा।"
जय- ये क्या ज़ुल्म कर रही हो? दो दो बीवियां होते हुए अकेले सोना पड़ेगा।
ममता- कविता से दूर रहोगे कुछ दिन, तब तो आपको सुहागरात के दिन मज़ा आएगा।" कहकर ममता हंसी।
जय- लेकिन जब तुम नहीं रहोगी, तब तो हम इसको चोद लेंगे।
ममता- वो नहीं कर पाओगे, क्योंकि कविता कल से अपने मामा के पास रहेगी और अब शादी के दिन ही यहां आएगी। हम दोनों कुछ दिन वहां रहेंगी।
जय- पर मामा से क्या कहोगी? की तुम दोनों वहां क्यों रहने गयी हो? और शादी के बारे में तो उनको बताना ही पड़ेगा ना?
ममता- इसमें क्या बात है, क्या कोई बहन कुछ दिनों के लिए अपने भाई के यहां नहीं रह सकती? रही बात शादी की तो हम उसको समझ देंगे। और फिर कविता का कन्यादान भी उसीको करना पड़ेगा।
कविता- मामा कैसे मानेंगे माँ, इस रिश्ते के लिए। उनको भनक पड़ेगी तो पूरा भूकंप आया जाएगा। हमको नहीं लगता कि वो मंजूरी देंगे। और तुम तो कह रही हो कि उनसे हमारा कन्यादान करवाओगी। ये असंभव है।"
 
जय ने ममता को होंठों पर चूमा फिर कविता को भी वैसे ही चूमा। फिर ममता ने उसके गाल पर चुम्मा लिया और फिर कविता ने।
जय- आज तुम दोनों ने हमको बहुत बड़ी खुशी दी है। ममता और कविता तुम दोनों हमारी बीवी हो। ममता हमको तुम्हारे बीते हुए कल में कोई दिलचस्पी नहीं है, तुमने जो भी किया वो सब बीत गया। अबसे तुम एक नई शुरुवात करोगी। इस घर की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। कविता, तुमको तो शुरू से ही, ममता और हमारे रिश्ते से कोई दिक्कत नहीं है। कल हमलोग नए घर देखने जाएंगे और घर फाइनल करने के बाद, हम तुमसे मंदिर में शादी करेंगे। और वहाँ, पर हम तीनों सुख से रहेंगे।"
कविता- हमको तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि तुम मान गयी हो माँ।
ममता- माँ नहीं, अबसे दीदी बुलाओ। अब हम दोनों माँ बेटी नहीं, बहनें हैं। वैसे भी जब बेटी जवान हो जाती है तो वो सहेली बन जाती है।
कविता- सच कहा दीदी। लेकिन जिस दिन शादी होगी उस दिन हमारी सासू माँ बनेंगी या माँ।
ममता- अपनी फूल सी बच्ची को विदाकर माँ का फर्ज पूरा करेंगे। फिर तुम्हारा स्वागत कर सासू माँ। और उसके बाद दोनों इसी घर की बहुएं बन कर रहेगी।
कविता- जय कहीं ये सपना तो नहीं ?
ममता- ये क्या कर रही हो? चलो शादी तक नाम से बुला लो, फिर इनका नाम कभी मत लेना। औरतों को अपने पति का नाम नहीं लेना चाहिए।
जय ने ठीक उसी वक़्त कविता के गाँड़ पर चिकोटी काट ली। कविता- इससशशश, बिट्ठु काहे काट लिए? आहह। कविता चूतड़ सहलाते हुए बोली।
जय- तुमको सपने से जगाने के लिए कविता दीदी।" फिर ममता की ओर मुड़ा और बोला," दीदी की माँ और सासु माँ दोनों बनोगी, हमको दामाद नहीं बनाओगी।हमको भी ससुराल का मज़ा चाहिए ना।" जय मज़ाक में मुंह बनाकर बोला।
ममता हंसते हुए बोली," अरे बेटाजी, आप तो सैयांजी और दामादजी दोनों हैं। लेकिन ससुराल का मज़ा तो साली हो तभी आता है।
जय- तुम हो ना। वैसे भी तुम दोनों माँ बेटी कम, और बहनें ज्यादा लगती हो।"
ममता- बातें खूब बनाते हैं, आप भी ना।आप कुछ घर लेने की बात कर रहे थे।
जय- हां हम और कविता वही देख रहे थे, लैपटॉप पर। हमदोनों ने एक घर देखा है। यहाँ से 12 कि मी दूर है। मेट्रो, हॉस्पिटल, मार्किट सब पास में हैं। पचासी लाख में मिल रहा है। कल हम तीनों देखने जाएंगे। वहां फिर कोई अच्छा दिन देख चले जायेंगे।
जय ने उन दोनों को अपने आस पास बिठाया। दोनों उससे चिपकी हुई थी। फिर उसने ममता को लैपटॉप पर वो घर दिखाया। ममता को भी घर पसंद आया।
ममता- पर आप सत्यप्रकाश से सलाह ले लेना। ये घर की बात है। और सत्य यहां बहुत दिनों से है।
जय- ठीक है।
 
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