• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest क्या ये गलत है ? (completed)

"ममता तुमने ठीक समझा। ये जय का बच्चा है, जो तुम्हारे पेट मे होगा। तुम दोनों के प्यार की निशानी। जय तुमको बहुत जल्दी फिर से माँ बना देगा, पर इस बार अपनी नहीं, बल्कि अपने बच्चे की। तुम भी तो यही चाहती हो। लेकिन इसके लिए तुमको कविता को समझाना होगा। और अगर तुम उनके रिश्ते को स्वीकार लोगों, तो फिर कविता इन दिनों में बहुत खयाल भी रखेगी। ये बच्चा तुम तीनों के रिश्ते के लिए अहम होगा। तुमने अगर ज़्यादा वक़्त लगाया तो, शायद तुम माँ ना बन पाओ। क्योंकि तुम्हारी उम्र भी ढल रही है। तुम चाहो तो, इसको इस साल हक़ीक़त में बदल सकती हो।"
ममता- पर.....
" पर वर क्या? तुम खुद सोचो कि इससे हसीन मौका अब नही आएगा। हा... हा.. हा"
और वो गायब हो गयी। ममता सोच में पड़ गयी।

" आखिर अगर बच्चे खुश हैं, तो इसीमें हम भी खुश हैं। वो दोनों हमेशा हमारे पास ही रहेंगे। अगर कविता की शादी दूसरे से हो जाएगी, और हम जय के साथ रहेंगे शुरू में तो ठीक रहेगा। पर हमारे मरने के बाद जय अकेला हो जाएगा। हम अपना सुख तो भोग लेंगे, पर जय की जवानी की प्यास अधूरी रह जायेगी। उधर कविता की भी चिंता लगी रहेगी। ये ठीक रहेगा अगर कविता जय की बीवी बैंकर इसी घर मे रहे, वो उसका खूब ख्याल रखेगी। दोनों के बीच प्यार भी गहरा है। हम माँ होकर उन दोनों के बीच की दीवार नहीं बन सकते। उन दोनों नहीं हजम तीनों को एक होकर इस घर में रहना होगा।"
ये सोच ममता की नज़र घड़ी पर गयी, इस वक़्त शाम के सात बजे रहे थे। वो करीब 6 घंटो से सो रही थी। तभी उसको बुर से कुछ रिसता हुआ प्रतीत हुआ। उसने छुवा तो देखा कि खून लगा था। उसकी माहवारी शुरू हो गयी थी। वो बाथरूम गयी, और पैंटी बदली। फिर पैड लगाया और साफ सुथरी पैंटी पहन ली। मन मे खुश थी कि उसकी माहवारी चल रही है, क्योंकि बहुत जल्द नौ महीनों के लिए बंद हो जाएगी।
वो बेधड़क जय के कमरे की ओर बढ़ रही थी।
जय और कविता कमरे में बैठे एक दूसरे से बातें कर रहे थे। कविता बोल रही थी," तुम बहुत भाग्यशाली हो जो ममता दीदी का प्यार तुमको मिला। वो तुम्हारा बहुत ध्यान रखेगी। ऐसी औरतें बहुत कम होती हैं।"
ममता घुसते ही बोली," तुम्हारे जैसी लड़की भी तो कम होती हैं, जो अपने होने वाले पति को एक अधेड़ महिला के साथ बाटने को तैयार हो। आजकल ऐसी लड़कियां कहाँ करती है!
जय और कविता खड़े हो गए," माँ आओ ना। बैठो।"
ममता कविता के गाल पर हाथ फेरती हुई बोलती है," अरे हमारी बच्ची, हमारा बात का बुरा मत मानना। हमने जो कहा था, गुस्से में। तुम दोनों अगर आपस में खुश हो तो एक माँ होने के नाते उसी में हमारी भी खुशी है।"
और आप जय साहब हम दोनों को संभाल लेंगे ना। दो बीवी में परेशान तो नहीं होंगे।"
कविता- मतलब?
जय- ममता मान गयी है, कविता। याहू........ चाहे कोई मुझे जंगली कहे, केहनो दो जी कहता रहे...
ममता और कविता- हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं हम क्या करें। जय ने दोनों माँ बेटी को दांये बाएं गले से लगा लिया। तीनों फिर ज़ोर से बोले," याहू......"
तीनो खूब हँस रहे थे। जय के एक बगल उसकी माँ और दूसरी तरफ उसकी दीदी थी, जो कि अब उसकी प्रेमिकाएं बन चुकी थी।
 
तभी जय आ गया और बोला," ये सब क्या चल रहा है? आपस मे लड़ाई बंद करो। चुपचाप होकर दोनों बैठ जाओ। ये बिल्लियों की तरह लड़ना बंद करो।"
कविता के मुंह से निकला," देखो ना ये क्या बोल रही है?"
जय खुद शॉक में था," माँ, सच बताओ। कह दो की ये सब झूठ है। तुम हमारी माँ हो और अमरकांत हमारे बाबूजी।"
ममता- हम तुम्हारी माँ हैं, पर अमरकांत नही शशीजी तुम दोनों के पिता हैं।
कविता- नहीं, उसने तो हमको, वहां से निकाल दिया था। कोई बाप ऐसा नहीं कर सकता।
ममता- 2.55 करोड़ का चेक भेज सकता है ना। तुम दोनों को वो बहुत याद करते हैं। गांव में लोगों को शक हो गया था, कि तुम दोनों उनके बच्चे हो। तुम दोनों को यहां भेजने के बाद भी, अपनी वसीयत में तुमलोगों को ही उत्तराधिकारी बनाये हैं।
कविता- अच्छा मतलब वो सब एक ड्रामा था। फिर भी हम अमरकांत झा को ही बाप मानेंगे। उस आदमी के प्रति अब हमारे दिल मे कोई इज़्ज़त नहीं।
जय- हम दोनों उसकी औलाद हैं। पर उससे ये सच्चाई नहीं बदलती की हम और कविता एक दूसरे से प्यार करते हैं। हमारे भूतकाल से हमारे वर्तमान पर कोई प्रभाव नहीं पर सकता। हम तुमको भी बहुत प्यार करते हैं ममता। तुम दोनों ही हमारे जीवन की सच्चाई हो।
जय दोनों के बीच बैठते हुए बोला," ममता, तुम अब शशिकांत का चैप्टर यहीं बंद करो। तुम अब हमारी हो और कविता तुम भी। अबसे उस आदमी को कोई जिक्र नहीं होगा। हम तुम दोनों का बात सुनें हैं। माँ, कविता सब सच बोल रही है। इसको सजा मत दो, जो कुछ किया है, हम दोनों ने साथ मे किया है। हम ही इसकी जवानी को लूटे हैं। ये बेचारी तो, सोच सोचकर मरी जा रही थी। बाद में हम इसको बताए कि, प्यार तो अंधा होता है। जैसे तुम्हारा और हमारा है। हम तुम दोनों को बेहद चाहते हैं और तुम दोनों को हमेशा के लिए अपनी बनाकर रखना चाहते हैं।
ममता- कैसे होगा माँ बेटी, एक ही मर्द के साथ। ये अजीब है।
कविता- इन्हीं अजीब बातों में तो मज़ा है।
जय- सही बोल रही है, कविता। ममता तुम शुरू में भी झिझकी थी, हम दोनों के बीच जब खजुराहो में संबंध बने थे। अब इसको भी स्वीकार करो। देखो कविता में तुमको एक अच्छी बेटी के साथ साथ बहु भी मिलेगी। और हम तुम्हारे बेटे भी और जमाई भी। तुम्हारी नज़र में कविता से अछि लड़की नहीं हो सकती और हमसे अच्छा लड़का नहीं। क्यों ना हम इसी घर मे अपनी छोटी सी दुनिया बसा लें। जहां तुमको नाती पोते एक साथ मिले।
ममता- हमको अभी कुछ समझ नहीं आ रहा। हम अभी कुछ नहीं कह सकते। अब हमारा सर दर्द कर रहा है। हम आराम करने जा रहे हैं।
जय- कविता जाओ, अपनी सासू माँ का सर दबा दो।
ममता- उसकी कोई जरूरत नहीं है। और अभी हमने इसको अपनी बहू नहीं स्वीकार किया है। तो ये अभी हमारी बेटी ही है।
जय- ठीक है जैसा तुमको सही लगे। लेकिन उम्मीद है कि तुम हमारे प्यार को समझोगी।
ममता अपने कमरे में चली गयी। जय और कविता एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले, जय के कमरे में चले गए। अब शायद इस घर मे पहले से कुछ नहीं था। कम से कम घर के सारे राज़ पर्दे से बाहर आ चुके थे।
ममता अपने कमरे में लेटी थी, तभी उसे एक चिर परिचित आवाज़ सुनाई दी। सामने उसका अक्स फिर खड़ा था। इस बार वो एक सुहागन की तरह सजी थी।
ममता- तुम फिर आ गयी?
" हाँ, ममता हम तो ऐसे ही आते हैं। जब भी तुम्हारे मन मे कोई द्वंद्व होगा, तुम हमको अपने सामने पाओगी। कैसी लग रही हूँ, इस लाल जोड़े में? अच्छी है ना। तुम खुद को भी तो ऐसे ही देखना चाहती हो। जय की सुहागन बन इस घर को नया चिराग देना चाहती हो।"
ममता- हां, सही कहा। पर कविता हमारी बेटी भी जय को प्यार करती है। ये अजीब लग रहा है हमको। हम माँ बेटी कैसे घर के एकलौते मर्द को अपना पति बना ले?
" हहम्मम्म, लेकिन इसमें हर्ज क्या है? जय तो तुमको दिलो जान से प्यार करता है। वो कविता को प्यार करता भी है, तो इसमें तुम्हारा कोई नुकसान नही है। क्योंकि कविता तुम्हारी इज़्ज़त करती है। वो तुम्हारे और जय के बीच कभी कोई दीवार नहीं बनेगी। ज़रा सोचो उसीने जय और तुमको खजुराहो भेजा और तुम दोनों करीब आये। कौन लड़की ऐसा करती है? याद है तुमको उस रात जब हम मिले थे, तो हजम सफेद कपड़ों में थे। पर आज इस लाल जोड़े में सिर्फ कविता की वजह से है। तुम सुहागन होकर भी सूनी मांग लेकर घूम रही हो। जय के नाम की सिंदूर क्यों नहीं लगाती हो? तुमको डर लगता था। पर अब इस घर में तुम ये कर पाओगी अगर तुम उन दोनों के रिश्ते को मंजूरी दे दो। दोनों तुमको बहुत खुश रखेंगे। और ये देखो।"
ममता के अक्स ने अपनी साड़ी पेट से उठायी तो, उसका पेट फूला हुआ था, जैसे सात आठ महीने का बच्चा हो। ममता वो देखी और पूछ उठी," ये जय का बच्चा है।"
 
कविता- क्यों माँ, हम सच बोल रहे है ना? जब तुम ऐसी हो तो अपनी बेटी से क्या उम्मीद करती हो। हम तो स्वीकारते हैं, की जय के साथ हम चुदाई किये है। पर तुम तो पता नहीं किस किस का बिस्तर गरम की हो। हम इस घर का इज़्ज़त बाहर नहीं उछाले हैं। और तुम ही तो कहती हो कि बाहर, की बिरयानी खाने से अच्छा घर की दाल खाओ। और यहां तो शाही बिरयानी घर मे थी। किसी चीज़ का डर भी नहीं था। घर की चीज़ घर मे ही रहेगी।
ममता नज़रें चुरा रही थी। कविता उसके करीब आयी और बोली," क्या हुआ शर्म आ रही है। शर्माओ मत, क्योंकि हम दोनों की किस्मत इस घर के मर्द के साथ जुड़ी हुई है। हम तुम्हारे और जय के रिश्ते को स्वीकारते हैं, बदले में तुमको भी इस रिश्ते को स्वीकारना होगा।
ममता - चुप हो जा बेशर्म लड़की, अपनी माँ से ऐसी बात करती हो। सौ रंडियाँ मरी होगी, तो तू पैदा हुई होगी। भोंसड़ीवाली शर्म को अपने भाई के लण्ड पर राखी पर छोड़ दी हो क्या। और उसे मारने के लिए फिर हाथ उठायी। इस बार कविता ने उसका हाथ रोक लिया।
कविता- बस बहुत हो गया। तबसे तुमको माँ बोल रहे हैं, इसलिए चढ़ रही हो। साली कुतिया, बेटे को मादरचोद बनाई हो। खुद को तो शर्म आती नही। और एक बात ज्यादा आग है ना तो तुम सड़क पर जाकर धंधा कर लो, क्योंकि हम तो जय के साथ ही रहेंगे उसके कमरे में।
ममता के अंदर आग लग गयी और वो चिल्ला कर बोली," हम जय को बहुत प्यार करते हैं। हम दोनों शादी कर चुके हैं।
कविता- वो हमको प्यार करता है समझी। और उसने हमारी मांग भी भड़ी है। हम दोनों ही उसकी बीवियां हैं।
ममता- झूठ बोलती है हरामज़्यादी, बुरचोदी छिनरी कहीं की।
कविता- तुम तो सब अपना आंख से देखी हो, चुद्दक्कड़ बुढ़िया।
ममता- अरे भाईचोदी, बुर में आग लगी थी, तो भाई का लण्ड ही ले ली।
कविता- भाई का ही लिए हैं, ना कि तुम्हारे जैसे बेटे का। मादरचोद बना दी हो बेटे को। खूब पसंद है उसका लौड़ा। बुर तो पहले से ही भोंसड़ा होगा, कुआँ बनवाएगी क्या?
ममता- पसंद है तो, डायन कहीं की। और हम बुर का भोंसड़ा बनवाये या गाँड़ का गड्ढा। ये जय और हमारा मामला है।
कविता- डायन हम नहीं तुम हो। बेटे से पेलवती हो और खुद को सती सावित्री समझती है। हरामी कुत्ती साली।
ममता- अरे हराम की जनी तुम हो, हम नहीं।हम तो अपने बाप की पैदाइश हैं। तुम दोनों को तो पता भी नहीं है कि तुम्हारा बाप कौन है?
कविता- जा जा कुछ भी बक रही है।
ममता- जानना चाहती है, तुम दोनों शशिकांत की औलाद हो। तेरे बाप का तो खड़ा भी नहीं होता था। शशिकांत के साथ तेरी दादी ने हमको बच्चा पैदा करवाया। वो कंचन भी हमारी बेटी ही है। हम दोनों के तीन बच्चे हुए। माया ने कंचन को हमसे बचपन मे ही मांग लिया था। जिस शशिकांत को गाली देती है ना, उसीकी बेटी हो तुम। क्या हुआ? सांप सूंघ गया क्या? तुमलोगों ने साबित कर दिया कि हराम की औलाद, आखिर हरामी ही निकलती है। हो भले ही एक बाप के, पर हो तो हरामी ही ना। अब जिन बच्चों की नींव ही नाजायज रिश्ते पर पड़ी हो, वे तो ऐसी हरक़तें करेंगे ही।
कविता- कुछ भी मत बोल, अनाप शनाप बकती जा रही हो। वो हमारा बाप नहीं हो सकता। हमारा बाप अमरकांत झा हैं।
ममता को तब समझ आया कि वो क्या बोल गई, उसने सोचा कि उसे ये बात कविता को नहीं बतानी चाहिए थी। पर अब वो शब्द मुंह से निकल निकल चुके थे, और वापिस आ नहीं सकते थे।
 
सत्य- अब अपनी बीवियों से पूछिए, जाइये आपका इंतजार कर रही हैं। इन दोनों का ख्याल रखियेगा। हमको इज़ाज़त दीजिये। काफी लेट हो गया है। हम कल आते हैं।" और वो पलटकर जाने लगा।
जय- आप हमको आप आप क्यों बोल रहे हैं?
सत्य- साला हैं हम, आप हमारी बड़ी दीदी के पति। तो फिर आपको आप ही बोलेंगे ना।" मुस्कुराके बोला " ये दरवाज़ा बंद कर लीजिए।" और वो दरवाज़ा सटाकर चला गया। बाहर गाड़ी चालू होने की आवाज़ हुई और वो डोर होती चली गई।
जय अचंभित था, की आखिर ये सब कौसे हुआ? उसने दरवाज़ा बंद किया। और अपने सवालों के जवाब ढूंढने, अपनी सुहागरात की सेज की ओर जाने लगा। इस सवाल का जवाब उसकी दो नई नवेली दुल्हन के पास था। उसके कदम दरवाज़े के पास पहुंचे। और उसने दरवाज़ा खोला। उसकी आँखों के सामने एक दिलकश नज़ारा था।
 
उधर सत्यप्रकाश ने पंडितजी, को दक्षिणा दी और विदा किया। फिर माया ममता और कविता को अलग की और जय को देख बोली," जीजाजी, कैसे पटा लिया, हमारी दीदी और उनकी बेटी को। आप तो कमाल कर दिये। एक औरत और उसकी बेटी दोनों को अपना लिए। और ज़रा देखिए ना, इन दोनों के चेहरे की खुशी। आज से पहले कोई भी औरत, सौतन बनने पर खुश नही होती थी। आपने दोनों पर जादू कर दिया है। वैसे इतनी आसानी से नहीं मिलेगी दोनों, क्योंकि हम आपकी साली हैं, कुछ लेंगे तभी इनको आपसे मिलवाएंगे।"
जय- क्या मौसी, आपको यहां देख हम पहले ही चौंके हुए हैं। आप हमारी टांग खिंचाई कर रही हैं। अब जब सब आपको पता ही है, तो ये लीजिए 10000 रु।
माया- ये हुई ना बात, पर अभी हम मौसी नहीं, आपकी साली हैं। और हम इतने में एक बीवी देंगे। चलेगा आपको?
जय- ये लीजिए और 10000 रु अब तो ये दोनों हमारी हुई।
माया- हाँ, अब हुई ना बात। अब आप चाहे तो मौसी के आशीर्वाद ले सकते हैं।
जय ने उसके पैर छुवे और कविता ने भी। माया ने दोनों का माथा चूमा और आशीर्वाद दिया। फिर सत्यप्रकाश ने भी उनको आशीर्वाद दिया। रात के 11 बज चुके थे। सत्यप्रकाश ने कहा," चलिए विदाई का समय हो गया है। आइए"
सत्यप्रकाश गाड़ी ले आया और जय भी पीछे गाड़ी में बैठ गया। माया दोनों को लेकर पीछे से आ रही थी। जय उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। इतिहास में शायद पहली बार हो रहा था कि माँ और बेटी एक साथ एक ही पति की बीवियाँ बनकर उसके साथ खुशी खुशी जा रही थी, और वो उनका अपना सगा बेटा और भाई था। माया और ममता की आंखों में आंसू थे, ठीक वैसे ही जब अमरकांत उसको दुल्हन बनाके ले जा रहा था, और आज उसी का बेटा फिर से उसे दुल्हन बनाके ले जा रहा था। कविता भी ये देख रो रही थी। तीनों एक दूसरे से लिपटी थी। फिर आखिकार कविता और ममता कार में जय के अगल बगल बैठ गयी। फिर सत्यप्रकाश उनको वहां से नए घर की ओर ले चला। तीनों पीछे की सीट पर बैठे थे। कोई 1 घंटे में वे नए घर पर पहुंच गए। घर तो जैसे दीवाली की रात जैसे सजा था। सत्यप्रकाश कार से उतरा और घर का दरवाजा खोला। अंदर जाकर उसने, रीति रिवाज की तैयारी जो कि पूरी थी, उसका समान ले आया। वहां पर दोनों ममता और कविता ने घर के बाहर हाथों के छाप लगाए। फिर वैसा ही बैडरूम और किचन में भी किया। दोनों फिर बैडरूम में चली गयी। और जय के हाथों में चाभी देकर सत्यप्रकाश बोला," ये लीजिए घर की चाबी। आपलोग अब यहां निश्चिन्त होकर रहिए। हम रोज़ 5 बजे शाम में आएंगे और रात का खाना पहुंचाएंगे। सुबह और दोपहर का खाना आपलोगों के पास पहुंच जाया करेगा। हमने पास से ही बोल दिया है। और किसी चीज़ की जरूरत पड़े तो हमको जरूर बताइएगा।"
जय- मामाजी, ये सब क्या हुआ कैसे हुआ हमको कुछ समझ मे नहीं आया?
 
कमरे के अंदर गोल्डन पीले रंग की एल ई डी लाइट चारों ओर जल रही थी। पूरा कमरा फूलों से सजा हुआ था। अन्दर कमरे में किंग साइज बिस्तर लगा हुआ था। पूरा बिस्तर गुलाब की पंखुड़ियों से सजा हुआ था। पलंग के हर ओर फूलों का गुलदस्ता लगा हुआ था। कमरे में बेहद आकर्षक सुगंधित इत्र की खुशबू माहौल को बेहद मनमोहक बना रही थी। जय ने देखा कि उसकी माँ ममता और बहन कविता दोनों उसकी दुल्हन बन उस सेज पर उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही हैं। आज इसी सेज पर एक बेटा अपनी माँ और बहन के साथ सुहागरात मनाने वाला था। जय को आता देख ममता और कविता दोनों बिस्तर से उतर गई, और जय की ओर चल दी। दोनों अपना लहँगा उठाये चल रही थी। पैरों में पायल होने की वजह से दोनों के चलने पर छम छम कर आवाज़ आ रही थी। दोनों के पैरों में मेहन्दी लगी हुई थी, और नाखून लाल रंग की नेल पोलिस से रंगे थे। दोनों उसके नज़दीक आई और फिर उसके पैरों में गिर गयी। दोनों ने उसके पैर पकड़ उसके चरणों को चूम लिया। कविता- आज हम दोनों को अपना करके, आपने हमको खूब मान दिया है। और हम चाहते हैं कि, आप हम दोनों को अपने चरणों में स्थान दें, ताकि आपकी खूब सेवा करें तन मन और धन से।
ममता- आपकी अर्धांगिनी हैं हम दोनों। आप ही हमको पूरा करेंगे। हम दोनों आपकी हर छोटी छोटी बात का ख्याल रखेंगी। ताकि आपका ख्याल रखने में हम चूक ना जाएं। ये जीवन हमारा अब आपके इन कदमों में न्योछावर है।
जय- तुम दोनों को क्या हो गया है? हम चाहते हैं कि, हमारे बीच वही रिश्ता रहे, जो शादी के पहले था। तुम दोनों हमारी माँ बहन रह कर हमारा बिस्तर में बीवी की तरह ख्याल रखो। पहले तो ये आप आप बोलना बंद करो। तुम दोनों चाहो तो घर के बाहर हमको आप आप बोल सकती हो। पर घर के अंदर तुम दोनों हमारी दीदी और माँ हो, और बिस्तर पर भी वही बनी रहोगी। तुम दोनों की जगह हमारे पैरों में नहीं हमारे दिल में है।" जय ने ममता और कविता को उठाकर कहा।
ममता- ठीक है, जय हम तुम्हारी माँ ही बनकर तुम्हारे साथ रहेंगे और कविता भी तुम्हारी बहन बनकर ही रहेगी। पर तुम नाराज़ मत हो हमसे।" दोनों कविता और ममता जय को अपने साथ बिस्तर पर ले गयी। जय की ओर गिलास बढ़ाकर कविता बोली," ये लो जय दूध पी लो। आज की रात पत्नियां अपने पति को दूध पिलाकर करती हैं। तुम्हारे लिए माँ ने स्पेशल केसर का दूध बनाया है।"
जय बिस्तर पर बीच में बैठा था, पीछे मसलन लगी थी। ममता और कविता दोनों उसके आजू बाजू बैठी थी। दोनों माँ बेटी अपने हाथ में दूध का गिलास पकड़े हुए थी। दोनों जय से चिपककर बारी बारी से जय को दूध पिला रही थी। जय कभी ममता के गिलास से तो कभी कविता के हाथ से दूध पी रहा था।
जय दोनों को कमर से पकड़ कर बोला," अच्छा, ये बताओ तुम दोनों को एक साथ शादी का विचार कैसे आया? और मामा को कैसे पटाया? माया मौसी कैसे और कब यहां आई? वो कैसे मान गयी? ये सब कैसे हुआ?
कविता- शांत हो जाओ, इतने सवाल एक साथ करोगे तो हम जवाब कैसे देंगे।
ममता- ये बताओ हम दोनों कैसी लग रहीं हैं? अपनी बीवियों की कुछ तारीफ भी करो आज की रात।
जय- तुम दोनों तो एक दम लॉलीपाप लग रही हो। एक दम रसगुल्ला। दोनों का आज खूब रस चूसेंगे। ये बताओ कि तुम तो पहले कविता दीदी के सामने नंगी नहीं होना चाहती थी। पर अब उसके साथ सुहागरात मनाओगी। ये कैसे हुआ? जय दूध का एक घूंट लेकर बोला। अब तक वो दूध आधा पी चुका था। ममता और कविता ने गिलास को टेबल पर रख दिया और उसके और नज़दीक आ गयी। दोनों एक साथ बोली," अभी हम सब बताएंगे, तुम बस मज़े लो।" फिर दोनों माँ बेटी एक दूसरे के होंठों को चूमने लगी। दोनों बहुत ही कामुक अंदाज़ में एक दूसरे को पकड़कर चूम रही थी। कभी जीभ चूसती तो कभी होंठों को। दोनों ने तिरछी नज़रों से जय को देखा, जय उनको देखके आधा हिल गया। क्या सीन था, जो उसने ब्लू फिल्मों में देखा था। सामूहिक चुदाई से पहले लड़कियां एक दूसरे को किस करती हैं। यहां उसकी माँ और बहन एक दूसरे के साथ कर रही थी। जय ने उनको रोका नहीं, बल्कि उनकी चुनरी को उतार दिया और बिस्तर के नीचे फेंक दिया। दोनों अब सिर्फ लहँगा और चोली में थी। दोनों एक दूसरे को कसके पकड़ सहला रही थी। ममता और कविता ने किस करते हुए, एक दूसरे के चोली के धागे खोल दिये। चोली पीछे से पूरी बैकलेस थी, और उन दोनों ने ब्रा नहीं पहनी थी। जय ने उन दोनों के बाल खोल दिये। थोड़ी देर बाद उनकी किस टूटी और जय के गाल पर किस करके बोली," अच्छा लगा।"
जय- बहुत अच्छा।
 
कविता- माँ, ये तुम्हारा बेटा, तुम्हारा खूब ख्याल रखेगा। तुम अब प्यासी नही रहोगी। तुमने जो इतने साल बगैर ठीक से चुदे गुजारे हैं, उसकी कमी पूरी कर लो। इस चुदाई का पूरा आनंद लो। ये तुम्हारा अधिकार है।"
ममता- हाँ बेटी, अब तो हमको कोई डर नहीं है। सब कुछ हमलोगों के सामने ही हो रहा है। आआहह...... लण्ड की प्यास तो अब तुम भी समझ गयी हो। एक औरत को अगर ठीक से चोदने वाला मिल जाये ऊऊईईईई....., तो वो आधी खुशी वैसे ही पा लेती है। ये अब तुम भी समझ जाओगी। ऊहहहहहह.....
कविता ममता की बुर के ऊपर हिस्से को मसल रही थी। दोनों बीच बीच में आपस मे किस भी कर रही थी। जय उन दोनों की कामुक बातें सुन रहा था, और माँ बेटी से सौतन बनी, दोनों औरतें, अपने पति के सामने आपस में प्यार भी कर रही थी। दोनों एक दूसरे को सहलाते हुए, ऐसी ही बातें कर रही थी। तभी ममता के अंदर का लावा फूट पड़ा। वो शायद पहली बार इस तरह इतनी जल्दी झड़ी थी। शायद ये अपनी बेटी के सामने, बेशर्मों की तरह बेटे से चुदने का असर था। वो लंबी चीख और आह भरते हुए, झड़ी। कविता उसे सहला रही थी। जय ने अपना लण्ड निकाला और कविता को कुत्ती बनाकर उसके बुर में लण्ड उतार दिया। कविता इस एहसास से अभिभूत हो उठी। पिछले 10 दिनों से बुर में बिना लण्ड लिए, वो जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी। जय का लण्ड घुसते ही वो पागल हो उठी। जैसे किसी प्यासे को रेगिस्तान में पानी का दरिया मिल गया होगा। जय उसके कमरबंद को पकड़े हुए, उसकी चुदाई कर रहा था। ममता जय के पास आकर उसे चूम रही थी। दोनों की जीभ आपस में टकड़ा रहे थे।
ममता- अब हम समझ गए हैं, तुम हम दोनों के लिए ही जन्मे हो। तुमको हम इसी लिए जन्म दिए, ताकि तुम बड़े होकर हमको और हमारी बेटी को अपनी रखैल बनाकर चोदोगे। ये तो विधि का विधान है, की सौभाग्य से तुम हमारे कोख से पैदा हुए, नहीं तो तुमको हम दोनों कहाँ खोजते।
जय- हाँ, माँ तेरी बुर से पैदा हुआ हैं, ताकि इसी बुर को एक दिन चोदे। अपनी सगी बहन को तुम्हारे ही सामने, चोदे और तुमको दादी और नानी एक साथ बनाये।
कविता- आआहह, ओह्ह अपनी दीदी को अपनी रांड बना लो। छिनार हैं हम दोनों। हमारे घर की सब औरतें छिनार है। हम, माँ, मौसी, नानी सब वैसे ही हैं।
जय- तुम सबको हम अपने बिस्तर की रानी बनाएंगे। तुमलोगों को कभी भी सेक्स की भूख नहीं सताएगी।
ममता- जिस घर में तुम जैसा मर्द हो, उस घर में औरतें कभी प्यासी नहीं रह सकती। ये तो हमारा नसीब है कि, तुम हमको मिले हो।अब तो इस घर में माँ बेटी तुम्हारी दासी बनके रहेंगी। तुम जैसे चाहोगे, जब चाहोगे हम हाज़िर हो जाएंगी।
जय- माँ, तेरी बेटी और तुम हमेशा खुद को तैयार रखना। ये सेक्स की जो आंधी शुरू हुई है, ये कब रुकेगी ये अभी कहना मुश्किल है।

ममता जय के लण्ड पर थूक लगाकर कविता के बुर से अंदर बाहर होते लण्ड को जीभ लगाकर चाटने लगती है। वो जय के आंड़ को भी चाट रही थी। कविता लगातार हो रही चुदाई से खुद को संभाल ना पाई और कांपते हुए झड़ गयी। वो करीब दो बार झड़ी। पर जय का लण्ड अभी भी खड़ा था, और अभी तक गिरने का नाम भी नहीं ले रहा था। दोनों माँ बेटी ने एक दूसरे को खूब किस कर रही थी। जय बिस्तर पर लेट गया और ममता, उसके ऊपर चढ़ गई। वो जय के लण्ड को अपने बुर में घुसा ली, और खुद उछल उछल कर चुदवाने लगी। ममता अपने खुले बाल अपने हाथों से पकड़े हुए, जय की ओर घूमकर चुदवा रही थी। जय उसकी कमर पकडे हुए था। तब कविता उसके मुंह पर आकर अपना बुर उसके होंठों से छुवाने लगी। जय अपनी लपलपाती जीभ से उसकी बुर चाटने लगा। कविता की कमरबंद के आगे का छोटा झूमर उसके बुर तक लटका था, ठीक वैसे ही ममता के बुर पर भी एक झूमर लटका था। उसके हिलने से हल्की रुनझुन जैसी आवाज़ें आ रही थी। कविता के बुर का एहसास होते ही जय ने कविता को अपने मुंह पर बैठा लिया। कविता अपना बुर उसके मुंह पर रगड़ने लगी। दोनों माँ बेटी आमने सामने बेटे के लण्ड और भाई के मुंह से चुदाई का अनोखा आनंद उठा रहे थे। कविता की भी कमर हिलने लगी थी। और ममता तो अब आहें भर भरकर उछल रही थी। धीरे धीरे उत्तेजना फिर बढ़ रही थी। ममता के चूतड़ों पर जय ने कसके सात आठ चाटें मारे। पर ये उसके लिए और उत्साहवर्धक थे। ममता खुद ही, अपने चुच्चियों को मसल रही थी। कविता अपने चूतड़ों पर खुद ही थप्पड़ मार रही थी। वो ममता के कंधों पर हाथ रखे हुए थी। और फिर अचानक दोनों आपस मे किस करने लगी कामोन्माद में आकर। दोनों जैसे एक दूसरे को नोचना चाहती हो। दोनों खूब उछल उछल रही थी। तभी दोनों एक साथ झड़ी। जय के मुंह में कविता का बुर का रस बह गया। और उसका लण्ड ममता के बुर के रस से। पर जय इस बात से हैरान था कि वो अब तक कैसे नहीं झड़ा।
 
दोनों माँ बेटी, जय के आजु बाजू लेट गए। जय कविता से कुछ पूछने ही वाला था, की तभी कविता बोली," हम बाथरूम से आते हैं। हमको पेसाब लगा हुआ है।"
जय ममता की ओर घुमा,और पूछा," हम अभी तक नहीं झड़े हैं।और सेक्स की भूख बढ़ ही रही है, ऐसा क्यों?
ममता- दूध में हमने कुछ आयुर्वेदिक औषधि मिलाई थी। इसलिए आज तुम्हारा बहुत देर बाद निकलेगा। आज पूरी रात कोई नहीं सोएगा। ना तुम ना हम और ना कविता।
 
ममता उधर खूब चुच्चियाँ दबाकर, चुदवाने में मशगूल थी। लण्ड का एहसास बड़े दिनों बाद मिला था। उसके होंठ दांतो तले आ गए। वो पूरी तरह सेक्स की चाह में, चुदवा रही थी। जय उसे चोदे जा रहा था।जय की कमर लगातार ममता की बुर में धक्कों के साथ, हिल रही थी। ममता की भी कमर हिल रही थी। कविता उससे लिपटी हुई थी। कविता ममता के बाल सहलाते हुए पूछी," माँ, बेटे का लण्ड लेकर कैसा लग रहा है। बेटा ठीक से चोद रहा है ना?
ममता जय के धक्कों की वजह से ऊपर नीचे हो रही थी, कविता के गाल सहलाते हुए कांपती आवाज़ में बोली," बहुत अच्छा लग रहा है, जब बेटे का लण्ड माँ की बुर में घुसा हुआ है। जो बागबान फल उगाता है, उसे तो उसे चखना चाहिए।"
जय- माँ ये बात तो शाहजहाँ ने अपनी सगी बेटी के लिए कहा था। और तुम अपने बेटे के लिए कह रही हो।"
कविता- तुम्हारा इतिहास का रिवीजन हो रहा है। IAS बनोगे ना।
तीनों हंसे और फिर चुदाई के खेल में लग गए। एक माँ अपने बेटे से अपनी बेटी के सामने निश्चिन्त और निश्फिकर हो चुदवा रही थी। जय को ममता के चेहरे का भाव, उसकी हिलती चूचियाँ बार बार और जोर लगाने को प्रेरित कर रही थी। ममता के कांख के बाल साफ थे, जो हाथ उठाने की वजह से साफ दिख रहे थे। चूचियों पर निप्पल के आसपास गोलाकार डिज़ाइन में लगी मेहन्दी, मस्त लग रही थी। ममता की चुच्चियों को हाथों में दबाकर, पकड़ बनाये हुए थे। ममता, किसी नवयुवती की तरह चुदवाते हुए, जय के लण्ड के एहसास को महसूस कर रही थी। वो उस एहसास से मचल रही थी।
ममता- बेटा, चोद और चोद अपनी,रंडी माँ को, जो अब तेरी दुल्हन भी है। इस दुल्हन का हर अरमान अपने बेटे से पति हुए, यानी तुझसे ही पूरा होगा। हम इस दुनिया का सबसे बड़ा सुख भोग रहे हैं। एक भूखी शेरनी, अपने बच्चे को खा जाती है और एक चुदाई की प्यासी औरत, अपने बेटे का लण्ड लेकर उस प्यास को बुझा सकती है। यही इस दुनिया की रीत है, आखिकार सही आदमी सही जगह पहुंच ही जाता है।
 
Back
Top