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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

ममता का पूरा चेहरा और बाल भीग चुके थे। उसके कंधों और चुच्चियों से जय का गरमा गरम मूत बह रहा था। ममता की आंखें अभी बंद थी। उसने चेहरा अलग हटाया और आंखों को अपने हाथों से पोछा। फिर कनखियों से देखा तो जय अपना लण्ड हाथ मे पकड़कर उसके ऊपर मूत रहा था। वो मुस्कुरा रहा था।

तभी ममता बोली," जय ये क्या कर दिया तुमने, हमही पर मूत दिए। हमको पेशाब करवाने लाये थे और तुम हम पर पेशाब कर रहे हो। अरे हटाओ ना लण्ड अपना, हम पर मूतने में तुमको मज़ा आ रहा है। देखो हम पूरे गीले हो गए हैं।"
जय ने देखा कि ममता का मुंह खुला हुआ है तो, उसके मुंह में लण्ड से निशाना लगाकर ममता के मुँह में मूतने लगा। जय की मूत की पीली धार सीधा ममता की जीभ से टकराई। ममता का मुंह तुरंत मूत से भर गया, उसने उसे उगल दिया। जय ये सब देख हंसता रहा, फिर बोला," अरे इसीमें तो मज़ा आता है, हमको।

तुम अभी बहुत अच्छी लग रही हो माँ। हमारे ख्याल से हर औरत को ये ज़रूर करना चाहिए। अपने मर्द के मूत/ पेशाब से नहाना चाहिए और उसका मूत भी अमृत समझकर पीना चाहिए। ये औरत के समर्पण को दर्शाता है। हां, भले ही थोड़ा सा अजीब लग सकता है, और पहली बार में ये सब कर भी नहीं सकती। पर जिनकी आत्माएं एक हो जाये, उनके लिए ये तो कुछ भी नहीं। और अपनी पत्नी से तो इसकी कामना कर ही सकते हैं।

सेक्स का ये एक घिनौना और गंदा रूप है, पर तुमको इसमें खुदको ढालना होगा। तुमको तो इसके भी आगे बढ़ना है। तुमको पूरी निर्लज्ज होना पड़ेगा और इन चीज़ों के परहेज से बचना होगा।"
जय के लण्ड से पेशाब गिरना बंद हो चुका था। ममता खड़ी हो गयी और अपने चेहरे को पोछने के लिए आगे बढ़ने लगी। उसके बाल गीले हो चुके थे, चेहरा भी गीला था। चुचकों पर मूत की बूंदे मोतियों की तरह लटककर चू रही थी। उसका साया भी थोड़ा सा गीला हो चुका था।
जय ने उसे देखा और अपनी बांहों में पकड़ लिया। ममता बोली," जय हमको छोड़ो ना, धोने दो देखो पूरा पेशाब से गीला कर दिए हो। हमको बहुत शर्म आ रहा है। पूरा बदबू है।"
 
ममता- तुम कैसी बात करते हो जय? हम पेशाब कैसे पी सकते हैं। छी बहुत गंदा है। तुम हमारा मूत पी सकते हो क्या?
जय- हम तो तुम्हारा हर चीज़ पी जाएंगे। मूत क्या चीज़ है।
ममता बांहों में कसमसाती हुई," झूठ, तुम पी नही पाओगे। बहुत गंदा स्वाद होता है।"
जय- और अगर पी लिए तो?
ममता- तो हम भी तुम्हारा पेशाब बेहिचक पियेंगे।
जय- पक्का ना?
ममता- पक्का।
जय- तुमको बदबू आ रहा है। एक मिनट रुको।" जय ने ममता का साया उठाया और मूत से गीले बुर को पूरे मुंह में भर लिया। और जीभ से पूरे बुर को चाटा। ममता की खट्टी और खारे पेशाब का स्वाद उसके मुंह में समा गया। पर जय को वो चासनी जैसी लगी। वो चाट रहा था और ममता इस पूरे प्रक्रिया के दौरान उसको बोले जा रही थी," जय ये क्या कर रहे हो? गंदा है वो , हमारा मूत क्यों पी रहे हो? हालांकि वो ये बोल रही थी। पर उसे जय के जीभ से टकराते बुर के दाने का एहसास पागल कर रहा था।

इस वजह से उसके बुर से और मूत निकल गया। जय उसे बिना किसी झिझक के पी गया। वो जय की ओर देखी। जय और उसकी आंखें टकराई। फिर जय ने उसको छोड़ा और कहा," माँ, तुम्हारी कोई भी चीज़ गंदी नहीं। ये तो तुम्हारे अंदर था। हम तुमको प्यार करते हैं।"
ममता उसे देखी तो उसे एहसास हुआ कि जय उसको कितना चाहता है, की उसके मूत को भी पानी की ही तरह पी गया। ममता ने उसे चूम लिया और बोली," बेटा सैयांजी, तुम तो बहुत ही अच्छे हो, पर हम कैसे हैं कि तुम्हारा दिल दुखाये। कैसा लगा अपनी माँ की मूत का स्वाद?
जय- मस्त बिल्कुल चासनी थी।"
ममता- चल हट.... वैसे तुम्हारे मूत का स्वाद तो खारा था।
जय- कोई बात नहीं, कुछ दिन में तुमको इसकी आदत हो जाएगी। बाद में खूब पियोगी।

तभी पीछे से आवाज़ आई" भाई, हमारे मूत का स्वाद चखना चाहोगे, हमको मूत लगी है।" जय और ममता आलिंगन में थे दोनों ने देखा, तो कविता मुस्कुराते हुए खड़ी थी। ममता के सामने ही वो बेबाक होकर बोली थी। जय ने कहा," तुम्हारी पैंटी से तो तुम्हारे बुर और मूत का स्वाद खूब चखा है, पर आज तुम्हारा ताज़ा पेशाब पिऊंगा। आ जाओ।" कविता उसके पास आ गयी। जय घुटनो पर बैठ गया और कविता अपना साया उठाके बुर को उसके मुंह पर सेट की। ममता वहीं पास में खड़ी थी। कविता के बुर से सिटी की तरह आवाज़ गुनगुनायी फिर उसके मूत्रद्वार से पेशाब की पतली धार निकली। वो सीधा जय के नाक से टकराई।
 
कविता फिर बुर को पीछे की तो धार उसके मुंह मे गिरने लगी। कविता की आंखें बंद थी। वो भी बहुत देर से नहीं मूती थी। जय उसके मूत को बेहिचक पीने लगा। कमरे में भीगी फुआर की महक आ रही थी। जो कि कविता की मूत की थी। कोई तीन चार मिनट मूतने के बाद कविता ने आंखें खोली तो देखा, जय का सीना, पेट, जाँघे और लण्ड सब गीला हो चुका है। जय ने उसका बहुत मूत पिया भी था। जय उठा तो उसने कविता से कहा," दीदी तुम मां के बदन को चाटो, अभी अभी हम मां को मूत से नहलाये हैं।" ममता बोल उठी," नहीं अभी नहीं बाद में।" शायद उसको शर्म आ रही थी।

कविता," जय मां तो शर्मा रही है। माँ अब हमको इसकी आदत लगा लेनी चाहिए। क्योंकि ये सब तो चलता ही रहेगा।" ये बोलकर कविता ममता को पकड़ उसको चूमने लगी। दोनों के होंठ एक दूसरे में उलझ गए। ममता के पूरे बदन से जय के पेशाब की गंध आ रही थी। उसके मुंह से वही गंध कविता खूब मज़े से सूंघते हुए उसको चाट रही थी। मूत का खारा स्वाद उसकी जुबान पर घर कर गया। फिर वो ममता के पूरे चेहरे को चाटने लगी। इसके बाद कविता ममता के गर्दन को चूमते हुए उसकी उन्नत चुच्चियों को चूसने लगी। पीली पेशाब की बूंदे उसके प्यासे होंठों पर ओस की बूंदों की तरह गीला कर रही थी। ममता उसे रोक नहीं रही थी, बल्कि और उत्तेजित हो चुकी थी। दोनों एक दूसरे को जकड़े हुए थी। जय उन दोनों को देखकर खुश और उत्तेजित होने लगा।
जय- तुमदोनों को ऐसे देख बहुत अच्छा लगता है।" जय अपना लण्ड पकड़कर बोला," अभी और पेशाब है, पियोगी।"
कविता जय की ओर देखकर बोली," तुम्हारा पेशाब हमारे लिए अमृत ही है। तुम भी तो हमारा पेशाब पिये हो। तो हमदोनों भी पियेंगे। क्यों माँ??
ममता- अभी अभी तो शर्त हारे हैं। पूरा तो करना पड़ेगा? जय ने हमारा मूत पिया है अब हमको भी बेहिचक इसका मूत पीकर इसकी हर इच्छा पूरी करनी होगी।" ये कहते हुए वो दोनों घुटनों पर बैठ गयी। वो दोनों मुस्कुरा रही थी। दोनों उसके सामने अपना मुंह खोलके इंतज़ार करने लगी। जय उन दोनों को देख हंसा फिर बोला," दोनों चिपकी रही तो पिलाने में आसानी होगी।" जय के लण्ड से मूत की धार फूट पड़ी। जय उन दोनों के मुंह पर मूत की पीली धार बरसाने लगा। दोनों औरतें चेहरे पर गरम मूत की धार के एहसास से " ऊऊऊ" बोल उठी। जय," बताओ कैसा लग रहा है दीदी?
कविता अपने चेहरे से मुंह मे गिरते पेशाब का स्वाद लेते हुए बोली," खट्टा और खारा है, नमकीन है। अभी तो इतना अच्छा नहीं लग रहा है। पीते पीते आदत लग जायेगा। मूठ भी तो पीते पीते ही अच्छा लगता है।" बोलते बोलते उसे उबकाई आ गयी। जय उसे देखकर हँसने लगा।
 
जय- माँ तुमको तो साथ चलना ही पड़ेगा, नहीं तो मज़ा नहीं आएगा।
कविता- माँ, तुमको जाने की इच्छा नहीं है क्या?
ममता- नहीं कविता, तुमलोग हो आओ।
जय- पर तुम नहीं जाओगी, तो हम भी नहीं जाएंगे।
कविता- अरे झगड़ो मत, इसका फैसला हो जाएगा। पहले खाना खाते हैं। ममता जाओ खाना लगाओ।
ममता हंसते हुए बोली- जी ठीक है दीदी। अभी लाते हैं।
कहकर वो चली गयी। उसके जाते ही कविता नशे में उठकर जय के पास आ गयी और बोली," जय क्यों ना हम दोनों ही चलें। मां को यहीं छोड़ देते हैं। ताकि हम तुमको अच्छे से प्यार कर सकें। तुम जो बोलोगे हम सब करेंगे। तुम्हारा हर गंदा से गंदा फरमाइश पूरा करेंगे। वो रहेगी तो हम पर ध्यान ठीक से नहीं दे पाओगे।"
जय कविता की ओर देखा और बोला," साली आ गयी ना औकात पर। यही करना था, तो क्यों मां को अपनी सौतन बनाई। हम तुमको उतना ही चाहते हैं जितना मां को। तुमदोनो हमारे लिए बराबर हो। तुमने सिर्फ हमारे साथ कसमें खाई हैं, पर हम तो तुम दोनों के साथ सात फेरे लिए हैं। चलोगी तो दोनों हमारे साथ। हमको तुमदोनों के साथ हनीमून मनाना है।"

कविता हंस पड़ी," अरे भैया हम तो मज़ाक कर रहे थे। हमदोनों ही तुम्हारे साथ चलेंगी। तुम्हारा पूरा मनोरंजन करेंगे। तुम्हारा प्यार हम दोनों माँ बेटी के लिए कितना गहरा है, ये आज पता चल गया। मां हमारी सौतन बाद में बनी, उससे पहले तुम्हारी छोटी पत्नी है।"
जय- कविता ऐसा मज़ाक कभी मत करना।
तभी ममता खाना लेकर आई," दीदी इनको छोड़ोगी। तभी तो खाओगी।"
तीनों बियर पी चुके थे, और खाना खाने लगे। कविता खाना परोस रही थी। तब ममता बोली," जय को अच्छे से खिलाओ।"
जय- तुमभी अच्छे से खाओ।
खाने खाने के दौरान जय ममता और कविता को और खाने के लिए बोलता रहा।
थाली वाली वैसे ही छोड़कर सब उठ गए। तीनों फिर कमरे में चले आये। कमरे का दरवाजा बंद होने से पहले दोनों की ब्रा कमरे के बाहर फेंक दी गयी।
 
जय को वो दोनों रगड़कर नहला रही थी। दोनों का साया उनसे गीला होकर चिपक गया था। उनकी गाँड़ उनकी जांघ सबका उभार साफ पता चल रहा था। गाँड़ की दरार में साया घुस गया था। जय उनको हर संभव जगह स्पर्श कर रहा था। कभी उनकी चुच्चियों को दबाता तो कभी गाँड़ को। जब उन्होंने जय को नहला दिया तो फिर दोनों ने एक दूजे को पकड़ लिया और एक दूसरे को रगड़ने लगी। तभी अचानक दोनों चुम्मा में उलझ पड़ी। उफ्फ क्या दृश्य था। दो औरतें जिनकी चुच्चियाँ नंगी थी, साया घुटनो तक उठा हुआ था और गीला होकर बदन से चिपक गया था। पूरे बदन से पानी चू रहा था। और दोनों चुम्बन करते हुए जय को कनखियों से देख रही थी। जय का लण्ड ये देख खड़ा हो गया। ममता और कविता भी कामुक हो चुकी थी। जय के लण्ड को पकड़कर कविता हिलाने लगी। उसने शावर बंद कर दिया और दोनों को टॉवल दे दिया। ममता ने टॉवल से जय को पोछा फिर कविता को। कविता ने ममता को पोछा। दोनों ने अपना साया बाथरूम में ही खोल दिया। अपनी कमर हिलाकर साया को नीचे सरकाया। वो धडाक से नीचे गिर गया।

दोनों माँ बेटी पूरी तरह नग्न थे। फिर दोनों उसी अवस्था में जय से चिपककर बाथरूम से बाहर आई। जय उनके चूतड़ों को सहलाते मसलते हुए मज़े ले रहा था। दोनों जय को सोफे पर बिठा कमरे में चली गयी। वहां उन दोनों ने फिर से श्रृंगार किया और अपनी नग्नता को सिर्फ टॉवल से ढके थी। जय ने तभी सत्यप्रकाश को फ़ोन किया यानी उसका मामा जो अब साला था। उधर से माया की हंसी ठिठोली की आवाज़ आ रही थी। जय बोला," सुनो बे साले एक कार्टून बियर की बोतल भेजवा दो।" सत्य बोला," जी जीजाजी 10 मिनट में पहुंच जाएगा।"
उसने फिर फोन काट दिया। 10 मिनट के भीतर एक लड़का पूरा कार्टून लेकर आ गया। जय ने वो ले लिया और बियर को फ्रिज में डाल दिया। उसकी दोनों पत्नियों ने सिर्फ साया और ब्रा पहनी हुई थी। जय ने उनको अपनी तरफ बुलाया। ममता उसके पास पहुंची बोली," कुछ खाओगे नहीं ताक़त कैसे आएगी? दो दो बीवियां चोदना है तुमको। हम खाना लगाते हैं। कविता बोली," उसके पहले बियर पियेंगे हमलोग। क्यों जय?
जय- बिल्कुल, खाने से पहले बियर पियेंगे, फिर खाएंगे।"
कविता- माँ हम बियर लेकर आते हैं, तुम चखना लेकर आओ।" दोनों काम पर लग गयी और थोड़े ही देर में बियर और चखने से टेबल सज गयी। ममता ने कभी पी नही थी, इसलिए वो चियर्स का मतलब समझ नहीं पाई। तीनों ने एक एक सिप लिया। कविता और ममता का मुंह पीने के साथ ही वैसे बन गया जैसे, मूत पीने से हो गया था। दोनों ने एक साथ चखना उठाकर मुंह में डाला।
ममता- इससे अच्छा तो मूत पीना है।"
जय- धीरे धीरे पियो अच्छा लगेगा।" थोड़ी देर बाद तीनों आधी आधी बोतल पी चुके थे। और अब उनपर मस्ती चढ़ रही थी। ममता और कविता को तो अब हल्का नशा भी हो गया था।
कविता- माँ, हम तीनों एक साथ हनीमून मनाने चले। हम तो गोआ जाएंगे। तुम्हारा कहां मन है, और तुम भी बताओ जय।
जय- ठीक है, कविता दीदी। बहुत मस्त जगह है।
ममता- हमको क्या पता? हम कहां जाएंगे। तुम दोनों सोच लो और हो आयो। तुम दोनों जवान हो जाकर मजा करो।
 
वो खुद भी मुस्कुराई। उसकी आँखों में पानी आ गया था। लेकिन फिर दुबारा हिम्मत करके पेशाब की पीली धार के नीचे आ गयी। जय ने उसे अपने पेशाब से माथे से लेकर घुटनों तक भिगो दिया। उसकी सख्त जवान चुच्चियाँ तन कर खड़ी थी। बाल गीले हो चुके थे। उसके खुले मुंह से पेशाब भरकर तेजी से चू रहा था। दूसरी ओर ममता घुटनों पर बैठी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। कविता के बदन से छींटे उड़कर उससे टकरा रही थी। तभी जय ने पेशाब की धार ममता के गोरे मुखड़े पर मारी। उसकी आंखें अनायास बंद हो गयी और पूरे चेहरे पर जय का बदबूदार पेशाब फैल गया। तभी कविता ने जय का लण्ड पकड़ लिया, जो अब तक वो पकड़े था। उसने जय का हाथ हटा दिया जैसे कह रही हो कि आप क्यों तकलीफ करते हैं। और खुद उसकी आँखों में देखकर लण्ड को ऊपर नीचे करके ममता को भिगोने लगी। ममता हिम्मत करके करीब एक डेढ़ कप पेशाब पी गयी होगी। इस बार भी उसे कई बार उबकाई आई लेकिन वो बेचारी डटी रही। जय उन दोनों को इस स्थिति में देख बहुत संतुष्ट था। दोनों ने बहुत ही अभूतपूर्व प्रयास किया था। कविता - कैसा है माँ, इसका स्वाद?
ममता- बिल्कुल वैसा जैसा तुमने कहा। बारिश में भीगी हुई कच्ची फुआर की खुशबू है। बचपन से लेकर आजतक ऐसा ही पेशाब करता है ये। बचपन में भी हमको गीला कर देता था, अब बड़ा होकर तो नहलायेगा अपने मूत से।" बोलकर वो हंस पड़ी। जय और कविता भी हसने लगे।
जय- तुम दोनों को इसकी आदत लगाने के लिए बियर पीनी चाहिए। बियर का स्वाद बिल्कुल अच्छा नहीं होता।"
ममता- तुम कबसे बियर पीने लगा? तुम तो दारू हाथ नहीं लगाते?
जय- हम आज भी दारू नहीं पीते हैं, माँ। वो तो दोस्तों ने एक बार पिलाया था। हमको बहुत खराब लगा था।"
कविता- फिर ठीक है, हमलोग आज ही बियर पियेंगे देखते हैं, कैसा लगता है।"
ममता- लेकिन जय तुम मत पीना, दारू बेहद खराब चीज़ है।
कविता- अरे मां, बियर में दारू उतना नहीं होता है। उसे पीने में कोई खतरा नहीं है।"
ममता- ना एक ही बेटा है हमको वो भी ये सब करेगा। ना ना।
कविता- बेटा तुम्हारा अब हम दोनों का पति है, माँ। तुम कब तक इसको समझाती रहोगी। ये बड़ा हो चुका है। सही गलत समझता है।"
ममता- ठीक है पहले हम पियेंगे, तभी जय पियेगा।"
कविता- सब साथ में पियेंगे, ये हमारा फैसला है भूलना मत हम तुमसे बड़े हैं। हम जय की पहली बीवी हैं और तुम दूसरी।
जय उन दोनों को देख मुस्कुराया। अब तीनों बाथरूम में भीग चुके थे। पूरे कमरे में पेशाब की महक आ रही थी। जय ने फैसला लिया कि अभी उन तीनों को नहा लेना चाहिए। जय ने शावर ऑन किया और तीनों उसमें भीगने लगे। जय उन दोनों को बांहों में भर चुका था। इस वक़्त वो शाहरुख और कविता और ममता करिश्मा और माधुरी लग रही थी, बिल्कुल दिल तो पागल है जैसे। दोनों उससे चिपकी हुई थी।
 
नशे में दोनों माँ बेटी मस्त हो रही थी। उनको तो पता भी नहीं चला कि कब जय ने उनकी ब्रा उतार दी और चुच्चियों को नंगा कर दिया। उनके बदन पर सिर्फ साया था। ममता का भरा पूरा शरीर, खुले बाल, चाल में उछाल, मस्ती से डोलता उसका पूरा बदन जय के लण्ड में तनाव लाने के लिए काफी था। दूसरी ओर उसकी माँ की जवान प्रतिबिम्ब उसकी सगी बड़ी बहन कविता बिल्कुल लापरवाह होकर जय को चूमती जा रही थी। अपनी नंगी चुच्चियों को खुद से निचोड़कर जय को पिलाने के लिए बेताब थी।

जय कविता के भूरे चुचकों को एक एक करके चूस रहा था। दूसरी ओर ममता के बड़े चुच्चियों को हाथों से मसल रहा था। कविता के चूचक खजूर के बीज की तरह तने हुए थे। कविता जय के सर को पकड़ अपने चुच्चियों में समा लेना चाहती थी। वो जय के माथे को चूम रही थी। जय की लार से चुच्चियाँ काफी गीली हो चुकी थी।

कविता- भैया, तुम जब हमारे चूचियों को चूसते हो, तो बदन में उमंग तैरने लगता है। हम औरतों को भगवान ने बच्चों को दूध पिलाने के लिए चुच्चियाँ दी है, पर जब मर्द सेक्स के दौरान इनको मसलकर दूध पीते हैं, तो बुर में चुदने की प्यास उठ जाती है। बुर से पानी अनायास बहने लगता है। तुम भी तो हमारे दूध को पियोगे ही, जब हम तुम्हारे बच्चे की माँ बनेंगे। इस्सस.... काटते क्यों हो..... आप.....
ममता- इसने हमारा दूध पिया है, और आज बियर पिलाकर, हमारा बुर का पानी पियेगा। क्यों है ना? तुम बड़े ही मादरचोद बेटा हो।

जय जोश में था, पर उनकी ओर देखकर हंसा, और ममता को अपने पास खींच लिया," अब तो तुमदोनो और मस्त होकर चुदवाओगी। दोनों का सेक्स का प्यास चुच्चियों को मसलने से बढ़ता है। इधर आना रंडी कहीं की।"
जय भी थोड़ा नशे में था, उसने कविता और ममता के चेहरों को एक साथ चिपका दिया और उनके होंठों को एक साथ चूमने लगा। उनके होंठ जय के जबरदस्त चुम्बन से कांपने लगे। जय ने उनका साया उठाना चाहा, पर वो जल्दी से उठ नहीं रहा था। शायद नशे की वजह से वो ठीक से खींच नहीं पाया। उसने बगल से कैंची ली, और ममता के साये को घुटनों के पास से काटकर अलग कर दिया। अब ममता के घुटनों से ऊपर के हिस्से ही ढके थे। मतलब ममता की जाँघे, दूसरी ओर कविता ने अपना साया उतार दिया, और अपने भाई की तरह बिल्कुल नंगी हो गयी। जय ने कविता को उसके गाँड़ पर सहलाते हुए 3 4 थप्पड़ मारे। हर थप्पड़ के बाद कविता, आउच बोलती पर उसको रोकती नहीं थी।
जय उसकी ओर देख बोला- क्यों रे रंडी, क्या चाहती है तुम?
 
रवि- तुम हमसे बहुत छोटी हो। तुम्हारे अंदर सेक्स की जो भूख है, उसको सिर्फ एक मर्द ही शांत कर सकता है। शशि तुमको चोदता तो होगा, पर तुमको वो एहसास नहीं मिलता होगा। हमारे जाने के बाद तुमको, कोई ना कोई तो चाहिए।
माया- आप बार बार अपने जाने की बात क्यों कर रहें हैं। आप हमारे साथ ही रहेंगे। कुछ नहीं होगा आपको।" माया सजे गाल सहलाते हुए बोली।
रवि- तुम वादा करो बस।
माया- आप सो जाइये, रात बहुत हो गयी है। आपको आराम की जरूरत है। हम कल बात करेंगे।" माया ये कह कर बिस्तर से उठी और अपनी साड़ी फर्श से उठने लगी।

रवि उसका हाथ पकड़ बोला," आज रात यहीं सो जाओ। हमको अपने बांहों में सुलाओ। माया मुस्कुरा पड़ी। उसने घड़ी की ओर देखा रात के 2 बज रहे थे। दो घंटे का समय था उसके पास। वो उसके पास लेट गयी और, उसे अपने नंगे सीने से लगाके, थपकियाँ देकर सुलाने लगी। जैसे माँ अपने बच्चे को सुलाती है। पर रवि को नींद नहीं आ रही थी। उसने माया से फिर कहा," प्लीज वादा करो ना।" माया बोली," अरे हमारे राजाजी आप आराम से सोइये अभी।" रवि बे जवाब दिया," जब तक तुम वादा नहीं करती, तब तक हमको नींद नहीं आएगी। प्लीज कह दो।"
माया ," ऊफ़्फ़, आप भी जिद्दी हैं। ठीक है वादा, अब खुश। अब सो जाइये।"
फिर रविकांत और माया आपस में सो गए। पर रविकांत शायद अब कभी नहीं उठने वाले था।
सुबह के चार बजे, माया उठी। उसने देखा भोर होनेवाली थी। वो झटपट उठी, और पहले अपने कपड़े पहन ली। साड़ी ब्लाउज सब पहनकर, वो सोते हुये रवि का माथा चूमने नीचे झुकी और बोली," हम जा रहे हैं।" और उसको चूम ली। सामान्यतः ऐसे करने पर रविकांत जग जाता था। पर आज ने कोई हरकत नहीं की। माया को लगा वो नाटक कर रहा है। इसलिए उसने उसके होंठों पर चुम्मा दिया। पर फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने महसूस किया कि उसकी सांसें नहीं चल रही है। उसने उसके चेहरे को हिलाया तो, वो लुढ़क गया। वो अवाक रह गयी। ये तय था, की वो मर चुका था। वो वहां से रोते हुए चली गयी।
कुछ देर बाद घर के आंगन में उसकी लाश थी। ममता और कविता फूट फूट कर रो रहे थे। कंचन भी रोये जा रही थी। माया के आंसू तो सूख से गए थे। सिर्फ ममता ही समझ सकती थी, उसका ये हाल। पर वो खुद ही कहाँ संभल पाई थी।

वो दिन याद करके माया के आंसू बहने लगे। वो रोते जा रही थी। फिर बोली," आपको दिया हुआ वादा हम आज भी पूरा कर रहे हैं। खुद को ज़िंदा रखे हुए हैं, बस आपके लिए। हमको प्यार दुबारा मिला तो, अपने भाई में ही।" तब तक वो अकेले, ही खिड़की से लगे चांद में रविकांत का चेहरा जाते हुए देख रही थी।

आपके जाने के बाद, हम रोज जलते हैं और शशिकांत के साथ होते हुए भी, उसके साथ सोते हुए भी, हम उससे बदला लेने की सोचते थे। आपकी मृत्यु का जिम्मेदार वही है, हम उससे बदला जरूर लेंगे। और हमारा भाई सत्य हमारी मदद करेगा उसको ही हथियार बनाएंगे।"
माया वैसे ही खड़ी बाहर निहार रही थी।
 
माया- आप नामर्द नहीं है, जेठजी। आपका लौड़ा हमारा बुर को पेल रहा है।
आपको, औरत का दूध पीना चाहिए। उससे आपको ताक़त मिलेगा। अपनी बहू का दूध पियेंगे। चूस कर देखिए, आपके लिए चुच्ची में दूध है कि नहीं। काश हम आपको, अपना दूध पिला पाते। आपके सिवा किसी और का बच्चा हमारे पेट में पलेगा नहीं। हम माँ बनेंगे, तो सिर्फ आपके बच्चे का। हमको माँ बना दीजिए।
माया की ये बात सुनकर, रवि का रुकना मुश्किल था। वो बोल उठा," माया हमारा चूने वाला है।" माया बोली," इसीलिए तो हम ऊपर चढ़े हैं ताकि हम आपके साथ ही झड़े। माया तेज़ी से कमर हिलाने लगी। और दोनों एक साथ झड़ गए। दोनों बिस्तर पर निढाल हो गए। माया के बुर में ही रवि ने मूठ गिराया था, पर माया के माँ बनने की संभावना बिलकल नही थी। माया उसके ऊपर ही लेटी थी। दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर ऐसे लेटने के बाद। माया बिस्तर से उठी और अपने जेठ के लिए पानी लाने गयी। वो नंगी ही कमरे में रखी पानी की सुराही से पानी ले आई। रवि उठकर बिस्टेर के सिरहाने पीठ टिकाकर, बैठ गया। माया उसकी ठुड्ढी पकड़ पानी पिलाने लगी। फिर वो उसकी छाती से चिपककर, उसके बगल में उसी तरह लेट गयी। तूफान थम चुका था। उसने रवि की ओर देखा,फिर बोली," क्या सोच रहें हैं आप?
रवि," तुमको हम माँ नहीं बना पाए।तुम्हारी इच्छा पूरा नहीं कर पाएंगे।"
माया- आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। हम आपकी प्रेमिका बने, यही बहुत है।
रवि- ना तो तुमको बीवी ही बना पाए?
माया- अगर आप हमको रखैल समझते हैं, तो भी हम खुश हैं। मांग में सिंदूर हम रोज सिर्फ आपजे नाम से लगाते हैं। और इसमें सिर्फ आपका ही नाम रहेगा।"
रवि- ये तो तुम्हारा बड़प्पन है। माया क्या हम तुमसे कुछ मांगे तो दोगी?
माया- दिल जान सब तो आपको दे चुके हैं, और क्या दे सकते हैं आपको।
रवि- मज़ाक नहीं, वादा करो ना दोगी।
माया- आपकी कसम खाते हैं, आपकी खुशी के लिए सब मंज़ूर है।
रवि- तो हमसे वादा करो, अगर हमको कुछ हो गया, तो तुम जियोगी हमारे प्यार की खातिर। और इस दौरान तुमको प्यार करनेवाला, अगर कोई मिलेगा तो तुम उसके साथ खुशी खुशी रहोगी। हम जानते हैं कि तुम शशि की पहली पसंद नहीं हो। उसको ममता पसंद है। इसलिए हमारे बाद तुमको अगर कोई चाहनेवाला मिले, तो तुमको हमारी कसम है, तुम पीछे मत हटना।"
माया- ये क्या बोल रहे हैं आप ? हम सिर्फ आपके हैं। इस तन पर इस आत्मा पर सिर्फ आपका हक़ है।ये हमसे नहीं हो पायेगा। आपने हमको धर्मसंकट में डाल दिया है।
 
माया की बुर के फांक के बीच रवि की जीभ, जब टकराती तो, उसके मुंह से आआहह निकल जाती। माया को ये एहसास पागल कर जाता था। फिर तो वो अपना बुर उसके चेहरे पर मलने लगी। उसकी कमर में एक चाल सी थी। रवि ने माया के बुर को अपने थूक से पूरा गीला कर दिया था। वो कभी कभी बीच में दांत भी गड़ा देता था। माया छटपटाती, पर अपने जेठ को कुछ नहीं, बोलती थी। उसे अपने साथ इतनी छेड़खानी अच्छी लगती थी। माया अपने बाल खोलने के लिए हाथ ऊपर की, और क्लिप निकाल दिया। उसकी जुल्फें, काली घटाओं सी रात में अंधेरा कर गयी। रवि ने बुर चाटने के साथ साथ उसकी नाजुक गाँड़ में उंगली, घुसा दी। गाँड़ में उंगली घुसना और बुर चटाई से, माया मदमस्त हो रही थी। माया की गाँड़, में रवि को उंगली करने में, बहुत मज़ा आता था। माया उसकी ओर देखी," आप नहीं, सुधरेंगे ना। हमको इस तरह गाँड़ में उंगली करना आपको बहुत पसंद है।"
रवि- तुम्हारी गाँड़ है, बड़ी मस्त। इसको छेड़े बिना कैसे रह सकते हैं।
थोड़ी देर उसकी बुर चाटने के बाद, माया खुद उसके लण्ड पर बैठ गयी और लौड़ा, बुर में घुसाने लगी। रवि का लण्ड कड़क था, पर उतना नहीं। माया सब जानती थी। इसलिए वो, अपनी गाँड़, रवि की ओर कर दी और बोली," हमारे गाँड़ में खूब उंगली कीजिये। हमको अपना लौड़ा चूसने दीजिए। तब आपका और सख्त हो जायेगा। देखिए ना हमारी नंगी गाँड़ को। कितने चिकने चूतड़ है, मुलायम सेब की तरह। आपके लिए। " वो लण्ड को और कड़क होता महसूस की। फिर लण्ड चूसने लगी। रवि माया के गाँड़ में उंगली करते हुए, उसके नंगे चूतड़ों पर काटने के निशान भी छोड़ रहा था। उसकी उंगली माया की तंग, सिंकुड़ी, कसी हुई गाँड़ में रास्ता बनाके पूरी तरह भीतर घुस गई। माया की गाँड़, से वो खिलवाड़ कर रहा था। तभी उसने दूसरी उंगली भी घुसा दी। माया के मुंह में लण्ड की वजह से सिर्फ," हहम्ममम्म..... बोल पाई। पर वो पीछे नहीं हटी। वो अपनी बुर भी सहला रही थी साथ में। थोड़ी ही देर में, बुर में लौड़ा घुसाने के लिए वो परेशान हो गयी। लौड़ा को चूसना छोड़, उसकी ओर उठके लपकी।
माया- आपके घोड़े को एक सवारी की जरूरत है। और चढ़ गयी अपना साया उठाकर। बुर की फांकों को फैलाकर लण्ड का सुपाड़ा अपनी बुर में माखन की तरह उतारती चली गयी। वो फिर झुककर, अपने जेठजी, की आंखों में देखते हुए, कमर हिलाकर, चुदने लगी। माया की चुच्चियाँ उसके जेठ के सीने से टकड़ाकर और कड़क और चूसने योग्य हो गयी थी। माया ने रवि को अपने मस्त मस्त चुच्चियों को उसके मुंह में घुसाने लगी। वो हंस रही थी। दोनों मज़े ले रहे थे।
 
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