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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

माया- हाँ, आइस्ता बोलिये। दरवाजा खोलिए।
रवि ने दरवाजा खोला। माया अंदर घुस गई और फौरन दरवाजा बंद कर दिया। फिर रविकांत की ओर पलटी। रवि- तुमको यहां नहीं आना चाहिए था।" माया उसके सर को पकड़ लेती है और चुम्मों कि बौछार करने लगती है। रवि ने उसको नहीं रोका। हालांकि, वो रिश्ते में उसका जेठ था, पर पहले उसका प्रेमी था। माया ने पहले, रवि को बच्चे की तरह चेहरे को टटोला, फिर उसके कंधों को। फिर बोली," आप ठीक है ना। हमको आपकी चिंता हो रही थी।" रविकांत मुड़कर बिस्तर की ओर जाने लगा। तो माया ने उसका हाथ थाम लिया और बोली," आपने हमारे सवाल का जवाब नहीं दिया।" रविकांत ने उसकी ओर देखा और कमर में हाथ डालते हुए बोला," आओ ना।"
दोनों बिस्तर की ओर चल दिये। बिस्तर पर रवि बैठ गया और माया सामने खड़ी हो गयी।
माया उसके चेहरे पर हाथ फेडते हुए बोली," आप बहुत उदास हैं। हमसे आपका उदासी देखा नहीं जाता है। आपको उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।"
रवि- चलो, इस घर में कोई तो है, जो हमारा इतना ध्यान रखता है।
माया- हम आपके भाई की बीवी बाद में हैं, और आपकी प्रेमिका पहले। आपका सुख हमारा सुख है, और आपका दुख हमारा।" ये बोलकर वो उसके बगल में बैठ गयी। रवि उसकी ओर देख बोला," थक गए हैं हम, माया । इस समाज से लड़ते लड़ते, लोगों को मनवाते मनवाते की ये तीनों बच्चे, हमारे हैं और उनका बाप रविकांत है। और घर में ये बात सबको पता होते हुए, भी इसकी चर्चा नहीं हुई थी। पर आज वो भी हो गया। अब तो भगवान बस मुक्ति दे दे इस जीवन से बस.....।"
माया- छी.... क्या बोलते हैं आप। आप बाप नहीं बन सके तो क्या हुआ?? बाप का फर्ज तो निभा रहे हैं। वो आपका खून, भले ही ना हो पर आप कर्म से उनके बाप हो। आइए हमारे बांहों में आइए।" कहकर माया ने रविकांत को अपने बांहे फैलाकर आने का इशारा किया। रवि उसकी ब्लाउज से झांकती, अधनंगी चुच्चियों पर सर रख दिया। माया ने उसको एक मां की तरह सांत्वना दी।" आप नपुंशक नहीं है, आपका तो लण्ड खड़ा होता है, आपका स्पर्म काउंट बस कम है। और इसलिए आप दीदी को बच्चा नहीं दे पाए। आप हमारे नज़र में मर्द है, नामर्द नहीं। काश हम आपकी पत्नी बनते। प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच हमेशा से भगवान समाज के रूप में दीवार खड़ा कर देते हैं। दोनों का मिलन जल्दी नहीं होता या होता ही नहीं। फिर भी दोनों समाज के बंधनों को तोड़कर, मिलते रहते हैं। जैसे हम और आप इस वक़्त हैं। समाज ने हमको आपसे जेठ का रिश्ता जोड़ दिया है। पर ना तो हमने और ना कभी आपने इस रिश्ते को मान दिया है। हम तो आपकी प्रेमिका बैंकर सारा जीवन बिताना चाहते थे। पर आपने ही हमको अपने पास रखने जे लिए, अपने छोटे भाई से शादी करने को कहा। आपके साथ और आपके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए हमने ये भी कर लिया। पर आपको इस तरह देखते हैं तो, लगता है कि आपका सारा दुख हमको मिल जाये।"
रवि ने उसकी ओर देखा तो, माया ने उसके माथे को चूम लिया। रवि ने उसको पकड़कर उसके होंठ पर अपने होंठ रगड़ने लगा, ऐसा करते हुए उसने माया को बिस्तर के बीच ले आया। माया उसका भरपूर साथ दे रही थी। उसके होंठ और जीभ रवि के होंठों के साथ पकड़म पकड़ाई का खेल खेलने लगे। दोनों एक दूसरे में लीन थे, चुम्बन का कोई अंत ही नज़र नहीं आ रहा था। माया रवि को अपने ऊपर खींच रही थी, अपने बांहों से पकड़ उसको अपने अंदर समा लेना चाहती थी। रवि माया के होंठों पर बुरी तरह टूट चुका था। वो, उसके अधरों के यौवन का रसपान कर रहा था। कभी वो नीचे होता तो कभी माया। दोनों किसी बिछड़े प्यासे प्रेमी युगल की तरह, खो गए थे। तभी माया ने शशि के कपड़े उतार दिए, और खुदकी, ब्लाउज उतारने लगी। रवि ने उसका ब्लाउज उतारने में उसकी मदद की और, माया के सुडौल चुच्चियों को आज़ाद कर दिया। उसने माया की साड़ी को कमर से पकड़ा और उसका सूक्ष्म चीरहरण कर साड़ी को उसके जिस्म से अलग कर दिया। माया अब सिर्फ साया में थी। साया को खोलने की बजाय, उसने साया उठा लिया, और पैंटी, उताड़ फेंक दी। फिर रवि के मुंह के पास आकर, अपनी बुर को उसके मुंह पर रगड़ने लगी। रवि को बुर चाटना बड़ा अच्छा लगता था, माया की बुर से बेहिसाब नमकीन पानी चू रहा था। वो कमर हिलाकर, बुर रगड़ रही थी। रवि उसके चूतड़ थामे हुआ था।
 
कमरे की बत्तियां बंद थी और बाहर चांदनी अपनी चादर फैलाये थी। माया का बदन भी उस चांदनी में नहा गया। उसकी जुल्फें हवा के साथ लहरा रही थी। माया चांद को लगातार निहारे जा रही थी। निहारते हुए अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसके होंठ कांपने लगे। उसने अपनी बांहे फैलाई जैसे किसीको गले लगाना चाहती हो। कांपते हुए होंठों से उसके मुंह से शब्द निकले," र.. रवी... हमको माफ कर दीजिएगा, आज हम फिर आपके प्यार को अपने शारीरिक भूख के आगे नीचा दिखाए।"
तभी रविकांत की रूह जो उसकी बांहों में थी, बोल उठी," माया, आंखें खोलो। हमने कभी तुमको इसके लिए गुनहगार नहीं ठहराया है। तुम हमारे ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब थी। तुम्हारा प्यार हमारे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सौगात था। और ये क्या कम है कि आज भी हमारे जाने के बाद, तुम उस प्यार के दिये को अपने मन मंदिर में जलाए हुए हो। तुम्हारे साथ बिताए हर लम्हा, इस दूसरी दुनिया में भी हमारे साथ रहते हैं।"
माया उसकी ओर देख बोली," लेकिन, आपने जो हमारे साथ किया वो ठीक नहीं किया। हमको, यहां छोड़ गए, आपके बिना जीने के लिए। आपसे अलग एक पल भी सदी के समान होता है और अब तो आठ साल बीत चुके हैं। आपको क्या पता कि कैसे काटे हैं हम। आपका साथ पाने के लिए हम आपके भाई से शादी तक कर लिए।"
रवि- माया, तुम भी जानती हो कि रिश्ता तुम्हारे लिए ही भेजा था, पर तुम्हारे बाबूजी को ममता की शादी की जल्दी थी। उन्होंने जोर देकर हमारी शादी करवा दी। रही बात तुम्हारा साथ, छोड़ने की बात तो वो हम जीते जी तो क्या, मरने के बाद भी नहीं छोड़े हैं। ज़िंदगी और मौत तो भगवान के हाथ की बात है, उस पर किसका बस है। अगर तुम ज़िंदा हो तो इसके पीछे भी वजह होगी। शशि बेचारे को क्या पता, की उसकी बीवी उसके बड़े भाई की प्रेमिका थी।
माया गुस्से से बोली- बेचारा मत बोलिये उसे, उसीकी वजह से आज आप और हम साथ नहीं है। ये जानकर की आप बाप नहीं बन सकते, उसने हम दोनों बहनों को रख लिया। आपकी माँ की वजह से ये सब हुआ। वो तो चली गयी। और हम दोनों बहनों को सौतन बना गयी। आपकी मौत भी उसीके कारण हुई है।
रवि- नहीं, ऐसी बात नहीं है।

माया- झूठ मत बोलिये, आप हमेशा से उसको बचाते आये हैं। उस रात जब वो दारू पीकर आया और आपसे नदी के पास की ज़मीन के लिए बहस हुई। तब उसने आपको क्या कुछ नहीं कहा, आपको नपुंशक, वंशहीन और ना जाने क्या क्या बोला। आपकी आंखों का दर्द उस दिन सिर्फ हमको दिखा था। वो रात आपके साथ हमारी आखरी रात थी। सोए तो आपके साथ थे, पर उठे तो आपकी लाश के साथ। ब्रेन हैमरेज हो गया था आपको।" ये कहते कहते वो फफक फफक कर रोने लगी।
रवि- वो रात भूले नहीं भुलाती। "

और दोनों जैसे खो गए उस रात में......
बिस्तर पर माया शशिकांत के साथ लेटी थी। शशिकांत दारू पीकर सो चुका था। उसने उसको हिलाकर एक बार जांच की। फिर हौले से बिस्तर से उतरी। रात के अंधेरे में माया चोरी छिपे कमरे का दरवाजा खोलती है। कमरे की कुंडी बाहर से बंद करती है, और दांये बांए देखती है। वो धीरे धीरे चुपके से उस कमरे की ओर बढ़ती है, जहां रविकांत सोया था। ममता और बच्चे दूसरे कमरे में सोए थे। चूंकि उस रात लड़ाई जो हुई थी। माया दरवाज़े पर पहुंचकर गेट खटखटाई। अंदर से रवि बोला," माया क्या तुम हो??"
 
माया सत्य के गोद में निर्वस्त्र बैठी थी। सत्य माया के सीने पर सर दबाए था, जिससे माया की स्पंज समान चुच्चियाँ दबी हुई थी। माया उसके सर को पकड़ अपने सीने से लगाये हुए थी। सत्य किसी बच्चे की तरह उससे चिपका था। अगर माया की चुच्ची में दूध होता, तो शायद माया उसे पिला भी देती। माया की मस्त चूतड़ों पर सत्य के पंजे कब्ज़ा जमाये थे। दोनों की सांसे भी टकड़ा रही थी। माया के बाल बिखरे हुए थे, और अव्यवस्थित होने के कारण वो और सुंदर लग रही थी। चुदाई के बाद कमरे में एक औपचारिक खामोशी थी, क्योंकि कामक्रीड़ा में दोनों थक चुके थे। सत्य माया की बांहों में खोया था। माया उसको सीने से लगाये, कुछ सोच रही थी। उसके जीवन में सत्य तीसरा मर्द था। थोड़ी देर बाद, माया को सत्य के खर्राटे की आवाज़ आई। वो उसे बांहों में लिए उसी तरह बिस्तर पर लेट गयी। सत्य की नींद हल्की खुली तो, वो उसे " ससससस.... ससससस " बोलकर थपकी देते हुए सुला दी। इस क्रम में माया उसके बगल में वैसे ही लेट गयी, जैसा भगवान ने उसे पैदा किया था। सत्य भी नंगा ही सो गया। उसके सोते ही माया बिस्तर से उठी और नंगी ही खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी। अभी अभी हुई चुदाई से उसके कामपिपासी नंगे बदन पर पसीने की बूंदे, समुंदर की प्यारी हवा के टकराने से विलीन हो रही थी। उसने, अपने चेहरे को खिड़की से बाहर निकाला, और पलकें उठाकर, चांद को निहारने लगी, जैसे किसीको ढूंढ रही हो
 
उधर, माया अपना साया उठाके, सत्य से बुर के बाल साफ करवा रही थी। सत्य, उसकी झांठों को बिल्कुल साफ कर दिया। माया की बुर सालों बाद झांठों कि कैद से आज़ाद हुई थी।
सत्य- अब तुमको बिकिनी पहनना चाहिए। अब तुम्हारी बुर पर बालों का गुच्छेदार पहरा नहीं है।
माया लजाते हुए बोली," हम बिकिनी पहनेंगे। सत्य तुम क्या बोल रहे हो?
सत्य- सच कह रहे हैं, ये देखो तुम्हारे लिए लाए हैं। उसने अलमारी से निकाल दिखाया। पीले रंग की, बेहद छोटी बिकिनी थी। " कल तुमको समुद्र किनारे, इसीमें चलना है।"
माया उसको देख बोली," ये तो बहुत छोटी है, इसमें तो सब दिख जाएगा। गाँड़ तो पूरा नंगा ही रहेगा, और चुच्ची का निप्पल ही किसी तरह ढकेगा। और बुर तो, बड़ी मुश्किल से ढकेगा। इससे अच्छा तो हम नंगी होकर चले जायेंगे।"
सत्य- तो वैसे ही चलो, क्या दिक्कत है।
माया उसके सीने पर हाथ मारते हुए बोली," क्या बोलते हो भैया? अपनी दीदी को गोआ में नंगे घुमाओगे।"
सत्य- अरे दीदी, यहां आएं हैं तो लहँगा चोली, साड़ी साया सब छोड़ो। जैसा देश वैसा भेष। यहां हर दूसरी लड़की, ऐसे ही बीच पर घूमती है। सब अपने में मस्त रहते हैं। कोई तुम पर ध्यान भी नहीं देगा, सिवाय हमारे।
माया- अच्छा, ज़रा देखे तो, कैसे ध्यान दोगे।
और सत्य माया के साये को उठा उसकी जांघों के बीच बुर को जीभ से चाटने लगा। माया सिसकारियां मारने लगी।
 
करीब एक घंटे बाद सब लंच पर मिले। कविता ने टॉप और डेनिम शॉर्ट्स पहना हुआ था। जबकि माया और ममता साड़ी में थी। तीनों मस्त लग रही थी। जय और सत्य बस अपनी किस्मत पर खुश थे। सबने खाना खाया और उस दिन कहीं बाहर का ट्रिप नहीं था, तो सब वापिस कमरों में चले गए। कमरे में आकर सब सो गए, क्योंकि रात में सब बहुत व्यस्त होने वाले थे।
एक ओर जहां माया और सत्य एक दूसरे की बांहों में सोए थे, वहीं दूसरी ओर ममता और कविता जय को अपने बीच लेकर सोईं हुई थी। शाम के तकरीबन सात बजे उनकी नींद खुली। अब सब फ्रेश हुए और आपस में बातें करने लगे। ममता बाथरूम में थी। जय और कविता बाहर कॉफ़ी पी रहे थे। कविता उसे देख बोली," जय तुमको कॉफ़ी अच्छी लग रही है?
जय- हां, क्यों अच्छी तो है??
कविता- तुम चाहो तो और अच्छी बन सकती है??
जय- कैसे??
कविता उसके सामने आ गयी और हंसते हुए, अपनी टॉप उतार दी और अपनी नंगी चुच्चियाँ दिखाते हुए बोली," अपनी दीदी की चुच्चियों की चुस्कियां लोगे तो और मज़ा आएगा।"
जय ने उसके शॉर्ट्स पैंटी के साथ जांघों तक कर दिया और बोला," कॉफी के साथ, दीदी के रसीली बुर का नमकीन पानी मिलेगा तो और मज़ा आएगा।" और बुर को उंगलियों से टटोलकर, उसके बुर का पानी चख लिया। कविता तो यही चाहती थी, वो तो बेशर्मों की तरह खुलकर चुदवाने आई थी। उसने खुदको पूरा नंगा कर लिया, फिर जय को अपना बुर फैलाकर दिखाते हुए बोली," बहन की बुर हाज़िर है, अपने चोदू भाई के लिए। यहीं चूसोगे, की हमको उठाके बिस्तर तक ले जाओगे।" जय ने कविता की ओर देखा, कविता की मांग में उसका सिंदूर था, बाल खुले हुए थे और उसके कमर तक लहरा रहे थे। आंखों में चुदने की प्यास, कांपते होंठ उसके छलकते जाम की तरह होंठों का सहारा ढूंढ रहे थे। गले में चुच्ची की गलियों में लटकता चमकता मंगलसूत्र। सुहागन होकर उसका ये रूप जय को पागल कर गया। उसने कविता को अपनी गोद में उठाया, कविता ने उसके चेहरे को पकड़ चूम लिया। जय के हाथ कविता के चूतड़ों पर टिके थे। जय ने बिस्तर पर कविता को पटक दिया और कविता मचलकर उसके गले में बांहे डाले थी। दोनों इस स्थिति में एक दूसरे को देख रहे थे। तभी ममता ने दरवाजा खोला, उसने सामने उन दोनों को देखा, तो देखती रह गयी। दोनों युवा नवविवाहित युगल को देख उसको सुकून मिला। आखिर हनीमून युवा लोगों के लिए है। उसने देखा, कविता बेहद खुश थी। और हो भी क्यों ना, उसके जीवन में शादी का पहला अनुभव था। अब तक तो, वो भी अधेड़ होकर, उनके साथ, खूब मज़े कर रही थी। पर उसे लगा कि ये वक़्त उन दोनों का है। उसने दरवाजा वापिस बंद कर दिया। उसने मन ही मन सोचा, कविता कितनी महान है, अपने भाई के लिए पहले शादी नहीं की, फिर जब शादी कर ली तो अपना सुहाग भी बांट लिया। यहां तक कि सुहागरात की सेज पर, जहां हर लड़की, अकेले ही पति के साथ विवाहित जीवन की पहली रात, गुजारती है, उसपर भी ममता अपनी बेटी के साथ थी। वो तो ये सब पहले भी कर चुकी थी, पर कविता को ये मौका, कभी नहीं मिला, की वो अकेले,जय के साथ वक़्त गुजारे। शादी को पूरे 15 दिन हो चुके थे। ममता की आंखों में आंसू आ गए, उसके मुंह से बस इतना निकला," हमरी बच्ची.......जुग जुग जियो।"
 
जय कमरे से बाहर आया, तो देखा ममता फोन पर बात कर चुकी थी और ठीक है, बोलकर फोन काट दी। जय ने उसकी ओर देखा, और पूछा," कौन था?"
ममता- तेरी मौसी बोलें या साली। वो लोग भी हमारे साथ गोआ चलेंगे और वहीं हनीमून मनाएंगे।
कविता- अच्छा, लेकिन ऐसा हुआ तो हमलोग एन्जॉय कैसे करेंगे। उनलोगों को कोई और जगह जाना चाहिए था। वो लोग भी खुलके मज़ा कर पाते।
जय- कोई बात नहीं, तुम दोनों तो हमारे साथ रहोगी और दिन में साथ घूमेंगे रात को तो हम तीनों अलग और वो अलग। कोई टेंशन नहीं है।
कविता- हां ये भी ठीक है। चलो मौसी भी साथ में रहेगी, तो इतना बुरा भी नहीं है।
फिर सब तैयार हुए। थोड़ी देर बाद घर के बाहर हॉर्न सुनाई दी। सब बाहर आये सामान के साथ, तो देखा सत्य और माया कैब में थे। सब सामान रख तीनों कार में सवार हुए। बैठने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी। पर सब किसी तरह एयरपोर्ट पहुँच गए। फिर अगले तीन घंटों में सब पणजी एयरपोर्ट पर थे। जहां उनके रिसोर्ट की गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। सब उसमें सवार होकर रिसोर्ट पहुंचे। तीनों औरतें आपस में हंसी मजाक कर रही थी। उनके खिलखिलाने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। जय और सत्य उनको देख सुकून महसूस कर रहे थे। जय ने ममता को होटल के रजिस्टर में बहन लिखा। और कविता को अपनी बीवी बताया। सत्य और माया तो खुद को पति पत्नी ही बताया।

सबने निर्णय लिया कि पहले नहाया जाय और फिर इकट्ठे लंच करेंगे। सब अपने अपने कमरों में चल दिये। सत्य और माया दोनों एक साथ बाथरूम में घुस गए। पलभर के अंदर माया और सत्य नग्न होकर बाथ टब में घुस गए। माया सत्य के ऊपर लेटी थी। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। माया के तन बदन पर सत्य के हाथ रेंग रहे थे, और उसकी छाती पर माया उंगलियों से जलेबियाँ बना रही थी।
माया- सत्य, हम कोई बुरी औरत तो नहीं है। कल तक तुम्हारा हमारा भाई बहन का रिश्ता था, पर अब दोनों प्रेमी प्रेमिका हो चुके हैं। क्या ये सही है?
सत्य- तुम्हारा दिल क्या कहता है? क्या हमारे प्यार में तुमको कोई खोट नज़र आता है दीदी? क्या पिछले कुछ दिनों से तुम्हारे हमारे बीच जो रिश्ता उभरा है, वो एक धोखा या छलावा है? क्या प्रेमी प्रेमिका का रिश्ता पवित्र नहीं? तुम्हारे मन मंदिर में ना जाने किसकी तस्वीर लगी है, पर हमारे अंदर शुरू से तुम्हारी प्रतिमा रखी है। अपने दिल से पूछो दीदी, क्या तुम पहले खुश थी, या अब हो? इस पल को महसूस करो, इसमें तुम्हारे और हमारे सिवा बस हमारा प्यार है। और तुम्हारी ये बढ़ती दिल की धड़कन हमारे प्यार की दस्तक है। दरवाज़े खोल दो, देखो कौन आया है, दिल में। झांको अपने मन में देखो कौन है। एक बार देखो अगर हम दिखें तो समझना तुम्हारा प्यार हमारे लिए है।
माया ने आंखें बंद की, फिर थोड़ी देर बाद मुस्कुराते हुए, आंखें खोली। वो भले ही मुस्कुराई पर आंखों में आंसू छलक उठे थे।
सत्य- कोई दिखा??
माया सर हिलाके बोली," ह्हम्म"।
सत्य- कौन??
माया मुस्कुराई और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिए। दोनों का चुम्बन बेहद गहरा और लंबा था। फिर बाथरूम के अंदर माया की आँहें जोर पकड़ने लगी।
 
माया- अभी मज़ा लो स्कूल टीचर का, बाद में गुरु दक्षिणा भी लेंगे तुमसे।आह आआहह.... आआहह.... हहम्ममम्म.. ससस..तत्त यय...हमारा छूटने वाला है, आआहह.... हाय्य.... ऊफ़्फ़...ओह्ह। माया की कमर अकड़ने लगी। उसके हाथ सत्य के चेहरे को स्तनों में समा लेना चाहते थे। सत्य माया को कसके जकड़े हुए थे। माया के बुर के पानी से सत्य के लण्ड का अभिषेक हो गया। सत्य भी इस एहसास को झेल नहीं पाया और बोल उठा," माया दीदी, हमारा भी छूटने वाला है।" माया ये सुनकर, झट से फर्श पर घुटनों के बल बैठ गयी और सत्य के लण्ड से निकलते मूठ की धार के सामने अपना खूबसूरत चेहरा रख दिया। मूठ की पहली धार, सीधे उसकी मांग पर गिरी, फिर माथे तक चिपक गयी। अगली धार बांयी आंख के पलकों से टकराई और गालों से चिपक गयी। अगली धार माया के गुलाबी होंठों से चिपक गयी। इस तरह 6 7 मूठ की धार से उसका चेहरा गीला हो गया। माया जीभ निकाल सब चाट गयी। फिर बोली, अपने लण्ड की दुल्हन बना दिये हो, मूठ से मांग भरकर।" सत्य हंस पड़ा।

" आहहहहह, चोदो चोदो बस चोदते रहो, हमारी प्यास बुझा, दो जय। अपनी दीदी को वो सुख दो, जो शादी के बाद तुम्हारा जीजा, हमको देता। अब तो तुम खुद ही अपने जीजा हो। अपनी दीदी के सुहाग।" कविता जय के नीचे मचलते हुए बोली। जय कविता के ऊपर, लेटा, उसके बुर में लण्ड घुसाए था। कविता बेशर्मों, की तरह बड़बड़ाये जा रही थी। जय उसके हाथों को दबा रखा, था। कविता की कांख जो कि थोड़ी साँवली थी, साफ दिख रही थी।
जय- कविता दीदी, तुम फिक्र ना करो। हम अपने जीजा होनेका फ़र्ज़ भी पूरा करेंगे। तुमको बहुत पेलेंगे। तुम्हारे साथ, अब तो सारी जिंदगी, ऐसे ही कटेगी। कभी तुम हमारे ऊपर, कभी हम तुम्हारे ऊपर। चोदम चोदाई, का ये खेल बचपन के छुप्पम छुपाई की तरह खेलेंगे।"
कविता- ओह्ह, तुम क्या जानो, उस खेल में वो मज़ा नहीं, जो इस खेल में है।
जय- हमारी रंडी दीदी, ये जो तुम्हारा बेबाकपन है ना ये हमको बहुत पसंद आता है।
कविता- अब जल्दी करो ना। माँ, आ गयी तो बोलेगी की उनके बिना ही शुरू हो गए।
जय- ह्हम्म, तो क्या हुआ? वो भी तो हमारी रंडी है। तुम माँ बेटी भी ना हद हो। इतने दिनों से एक साथ चुदवा रही हो फिर भी एक दूसरे से शर्माती ही हो।
कविता- राजा भैया, ये रिश्ता ही ऐसा है क्या करे। पर जब हम दोनों अभी लगे हैं तो इस काम को पूरा कर लें। आआहह.....आहठह...
कविता अब झड़ने वाली थी। कविता की बुर के अंदर समुंदर का तूफान उठने लगा। जय ने भी अपने अंदर के तूफान को नहीं रोका और दोनों एक साथ एक दूसरे की बांहों में झड़ गए। कविता जय के सीने में अपना, मुंह छुपाए थी। थोड़ी देर बाद जय का लण्ड अपने आप निकल गया। और बुर से मूठ की धार बह गई। वो दोनों इस बात से अनजान थे कि ममता उनको देख रही थी।
" कविता, आई लव यू,। जय उसको बांहों में भरकर माथा चूमते हुए बोला।जय के सीने से चिपकी कविता उसकी छाती चूमकर बोली," आई लव यू,।
 
उधर सत्य माया को अपनी घोड़ी बनाके, उसकी सवारी कर रहा था। सजे बाल सत्य के लिए लगाम थे। सत्य का लण्ड, माया की बुर में नई गहराईयां, तलाश रहा था। माया एक हाथ से दीवार पकड़े थी और एक हाथ से अपने दाहिने चूतड़ को पकड़े थी। सत्य के आंड़ जब उससे टकराते तो माया को और अच्छा लगता था। माया, की बुर में तेजी से अंदर बाहर घुसता लौड़ा, कभी कभी चिकनाई की वजह से बाहर फिसल जाता। माया तुरंत लण्ड पकड़, उसको बुर में घुसा लेती। सत्य उसको इस पर चूतड़ पर थप्पड़ जमा देता था। पर ये माया को और मस्त कर देती थी। माया खुद गाँड़ हिलाकर, लण्ड बुर में लेने के लिए उल्टे धक्के मार रही थी। सत्य लण्ड निकाल उसके चूतड़ों पर पटकता और फिर बुर में पेल देता। माया को थोड़ी देर बाद सत्य ने उठने को कहा और, खुद बिस्तर पर किनारे बैठ गया। माया अपना साया कमर तक उठाये, उसके गोद में उसकी ओर मुड़कर बैठ गयी। माया ने मुंह से थूक हाथ पर निकाला, और लण्ड पर बेहिचक मल दी। सत्य ने लण्ड माया के बुर में फिर घुसा दिया। माया सत्य के चेहरे को अपने भारी स्तनों के बीच चिपकाए हुए थी। सत्य भी उसकी बांहों में बेफिक्र हो कुछ देर ऐसे ही रहा।
सत्य- दीदी, हमको ऐसे ही प्यार दो। हम तुम्हारे प्यार के प्यासे हैं।
माया- हम अब तुम्हारे हैं, सत्य। हमको भी तुमसे बहुत प्यार चाहिए।
माया हौले हौले, अपनी गाँड़ उठाके बुर में लण्ड को लेने लगी। सत्य माया की कमर पकड़े, उसके चुच्चियों और गर्दन पर चुम्मे की बौछार कर रहा था। माया अपने हाथ उसके कंधों पर टिकाए हुए थी। तभी माया का मोबाइल, बजा, माया के मुंह से निकला," कौन कमबख्त है,? उसने देखा," ममता का फोन था। उसने लण्ड पर उछलते हुए, ही फोन उठाया।

माया- हेलो।
ममता- माया सुनो हमको कुछ बात करना है।
माया हांफते हुए- दीदी, बाद में प्लीज हम बाद में कॉल करेंगे।
ममता- ओह्ह अच्छा, ठीक है, समझ गए। हमारे प्यारे भाई तुमको खूब पेल रहे हैं। कोई बात नहीं खूब मजा करो।
सत्य- क्या बोल रही थी दीदी?
माया- कुछ बात करना था उनको, हम बोल दिए बाद में।
सत्य- क्यों?? क्या बात हो गया?
माया सत्य को चूम ली और बोली," पहले जो काम कर रहे हैं, उसको पूरा करो ना। अपनी इस दीदी को जमकर चोदो।"
सत्य- माया दीदी, उसका चिंता क्यों करती हो?? अभी तो शुरुवात है, रातभर पेलेंगे तुमको।
माया- जरूर पेलना, हम भी पेलवाएँगे, तुम्हारी दुल्हन नहीं बने हैं तो क्या?, तुम्हारी रंडी हैं। और रंडियों को अपने मालिक का लण्ड लेकर, खुश होना चाहिए और पेलवाते रहना चाहिए।
सत्य- तुम जैसी स्कूल टीचर, ऐसा मस्त ज्ञान देती हो तो मज़ा आता है।
 
दूसरी ओर जय, कविता की बुर चुसाई, करते हुए उठा, जहां उसकी सांसें उखड़ने लगी थी। कविता की गुलाबी बुर जय के थूक, लार से भीग चुकी थी। कविता अपने भाई को देख बोली," हमारे पास आओ, जय। जय उसके पास गया तो कविता ने उसका पैंट खोल, उसका लौड़ा, बाहर निकाला और उसपर अपने थूक का लौंदा गिराया। फिर हाथों से मिलाई, और लण्ड के फूले सुपाड़े को पुच पुच कर चूमने लगी। फिर जय की ओर देख, बोली," भाई, ये मस्त लौड़ा, जिस लड़की को मिलता वो, खुश रहती। हम खुशनसीब हैं, की ये हमारे नसीब आया है।" ये बोल वो लण्ड चूसने लगी। जय की आंखें उसके लण्ड पर महसूस होते, कविता की मुंह की गर्मी से अनायास बंद हो गयी। कविता उसके सुपाड़े, के आगे और निचले हिस्से पर अपनी जीभ रगड़ती हुई, लण्ड को चूसने में व्यस्त थी। जय कविता के खुले, बाल को सहला रहा था। कविता उसकी आंड़ भी सहला रही थी। जय अब धीरे धीरे कविता के मुंह में धक्के मारने लगा। कविता, मुंह थोड़ा और फैला, उसका स्वागत करने लगी। इस क्रम में उसके मुंह से लार भी धागों की तरह होंठों से लटकने लगी।
बिस्तर गीला हो रहा था। पर इससे किसको फर्क पड़ता था। जय के धक्के, बढ़ते ही जा रहे थे। कविता की आंखों में अब पानी आना शुरू हो चुका था। जय का लण्ड फिसलकर उसके गालों से टकड़ा जाता था। ऐसा एक दो बार हुआ, तो दोनों हसने लगे। जय ने कविता के खुले मुंह में थूक दिया, जो सीधे उसके जीभ पर गिरा। कविता उसे पी गयी।
जय- यू आर माय व्होर, माय स्लट। ओह्ह दीदी, हमारे लण्ड को तुम्हारा, ये रंडीपना, एक दम मस्त कर देता है।
कविता बिल्कुल चुदास स्वर में बोली," तुम्हारी रंडी ही तो है हम, बस तुम्हारी। हमको तुम्हारे, लिए ही तो भगवान ने बनाया है, तुम्हारी बहन बनाकर, तुम्हारे पास रखा और अब बहन से बीवी हो गए।"
जय- तो फिर, हमको भी तो पति बना लिया, भाई से। और पति को पत्नी का सबकुछ चाहिए।
कविता मचलते हुए," ले लो, सब ले लो जो चाहिए। बीवी हैं, पति की हर इच्छा पूरा करेंगे।
जय- अरे, इस लण्ड को बुर चाहिए। अपना बुर में इसको जाने दो।"
कविता- बुर तो इसको लेने के लिए पहले से पागल है। घुसा दो।"

जय कविता के पीछे चिपक कर लेट गया और दोनों करवट लिए हुए एक दूसरे से चिपके थे। जय कविता के कंधों को चूम रहा था। कविता उसका लण्ड पकड़ अपनी जाँघे, फैलाकर बुर में लण्ड घुसा रही थी। दोनों चंदन और सांप की तरह लिपटे थे। जय के दोनों हाथ कविता के दोनों स्तनों को मसल रहा था। बुर में लण्ड घुसते ही जय का कमर अपने आप हरकत करने लगा। कविता जय के माथे को थामे थी। दोनों चुदाई के दौरान चुम्बन भी कर रहे थे। इस तरह दोनों के बीच एक रोमांस से भरपूर, चुदाई चल रहा था। दोनों अभी वाइल्ड सेक्स नहीं बल्कि, बेहद कोमल अंदाज़ में काम वासना को शांत कर रहे थे। हालांकि इतने दिनों में जय ने कविता को कितनी बार नहीं चोदा, पर आज हनीमून की पहली चुदाई का एहसास ही दूसरा था। दोनों एक दूसरे के आलिंगन में जैसे दुनिया को भूल गए थे। कविता की आँहें, और जय के कमर के प्रहार से कविता के चूतड़ों से थप थप की आवाज़, कामोत्सर्जन की चिंगारियों को आग बना दिया था। दोनों पसीने से लतपथ, ऐ सी को निकम्मा साबित कर रहे थे।
 
अब तक तो, वो भी अधेड़ होकर, उनके साथ, खूब मज़े कर रही थी। पर उसे लगा कि ये वक़्त उन दोनों का है। उसने दरवाजा वापिस बंद कर दिया। उसने मन ही मन सोचा, कविता कितनी महान है, अपने भाई के लिए पहले शादी नहीं की, फिर जब शादी कर ली तो अपना सुहाग भी बांट लिया। यहां तक कि सुहागरात की सेज पर, जहां हर लड़की, अकेले ही पति के साथ विवाहित जीवन की पहली रात, गुजारती है, उसपर भी ममता अपनी बेटी के साथ थी। वो तो ये सब पहले भी कर चुकी थी, पर कविता को ये मौका, कभी नहीं मिला, की वो अकेले,जय के साथ वक़्त गुजारे। शादी को पूरे 15 दिन हो चुके थे। ममता की आंखों में आंसू आ गए, उसके मुंह से बस इतना निकला," हमरी बच्ची.......जुग जुग जियो।"

उधर, माया अपना साया उठाके, सत्य से बुर के बाल साफ करवा रही थी। सत्य, उसकी झांठों को बिल्कुल साफ कर दिया। माया की बुर सालों बाद झांठों कि कैद से आज़ाद हुई थी।
सत्य- अब तुमको बिकिनी पहनना चाहिए। अब तुम्हारी बुर पर बालों का गुच्छेदार पहरा नहीं है।
माया लजाते हुए बोली," हम बिकिनी पहनेंगे। सत्य तुम क्या बोल रहे हो?
सत्य- सच कह रहे हैं, ये देखो तुम्हारे लिए लाए हैं। उसने अलमारी से निकाल दिखाया। पीले रंग की, बेहद छोटी बिकिनी थी। " कल तुमको समुद्र किनारे, इसीमें चलना है।"
माया उसको देख बोली," ये तो बहुत छोटी है, इसमें तो सब दिख जाएगा। गाँड़ तो पूरा नंगा ही रहेगा, और चुच्ची का निप्पल ही किसी तरह ढकेगा। और बुर तो, बड़ी मुश्किल से ढकेगा। इससे अच्छा तो हम नंगी होकर चले जायेंगे।"
सत्य- तो वैसे ही चलो, क्या दिक्कत है।
माया उसके सीने पर हाथ मारते हुए बोली," क्या बोलते हो भैया? अपनी दीदी को गोआ में नंगे घुमाओगे।"
सत्य- अरे दीदी, यहां आएं हैं तो लहँगा चोली, साड़ी साया सब छोड़ो। जैसा देश वैसा भेष। यहां हर दूसरी लड़की, ऐसे ही बीच पर घूमती है। सब अपने में मस्त रहते हैं। कोई तुम पर ध्यान भी नहीं देगा, सिवाय हमारे।
माया- अच्छा, ज़रा देखे तो, कैसे ध्यान दोगे।
और सत्य माया के साये को उठा उसकी जांघों के बीच बुर को जीभ से चाटने लगा। माया सिसकारियां मारने लगी।
 
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