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Incest पापी परिवार की पापी वासना complete

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जय को तो जैसे साँप सूंघ गया हो, जिस बात की वो स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता था, आज भाग्य ने उसी स्थिति में ला खड़ा किया था। उसे तो अब भी आँखो देखी पर विश्वास नहीं हो रहा था, केवल वहाँ खड़ा मूर्खतापूर्वक रजनी जी के कसैल और ठोस स्तनों को अपने मुंह से कुछ ही इन्च की दूरी पर देख रहा था। उसे उनकी बिकीनी से ढकी योनि से उत्पन्न होती आग्नेय ऊष्मा का पूरा-पूरा आभास हो रहा था।

क्या बात है, जानेमन ?” जय ने कंठ में घूट लिया, और किसी तरह वह प्रश्न पूछने की हिम्मत जुटायी जो उसके युवा मस्तिष्क में तब से कौन्ध रहा था, जब उसने उन्हें आईने के सामने खड़ा हस्तमैथुन करते देखा था।

“मैं आपको चोदना चाहता हूँ, आँटी,”, उसने आह भरी, “मैं आपकी सैक्सी गरम चूत को चोदना चाहता हूँ

| रजनी जी ने केवल मुस्कुरा भर दिया, और उसके सर को नीचे की ओर खींच कर अपने डोलते स्तनों पर दबा लिया।

“उसका भी मौक़ा आयेगा, जानेमन !”, जब जय के होठों का स्पर्श उनके ज्वलन्त निप्पलों पर हुआ, तो वे कराह उठीं 4 ... बस थोड़ा सा इंतजार बेटा !”

 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
88 पानी में जवानी



उधर स्विमिंग पूल में, टीना जी राज के हाथ को थामकर पानी से बाहर निकलीं और उस नौजवान को अपने पीछे खींचती हुई चल पड़ीं।

“आप दोनों किधर चले मम्मी ?” सोनिया मुस्कुरायी थी।

बेटा मैं अंदर जा रही हैं। राज चाय-नमकीन परोसने में मेरी मदद करेगा। चाहो तो तुम भी हमारे साथ आ जाओ ?”

“अभी नहीं मम्मी, मैं जाकर देखती हूँ जय और रजनी आँटी जैकूजी में क्या खिचड़ी पका रहे हैं।”

टीना जी को जय को लगभग घसीटते हुए अंदर ले जाते देख , सोनिया ने उनकी दिशा में अर्थपूर्ण मुस्कान दी।

* खूब समझती हूँ आपका चाय-नमकीन !', राज के हाथों को अपनी माँ के कसैल नितम्बों को उनकी बिकीनी की जाँघिया के ऊपर से दबाते हुए देखकर उसने सोचा। सोनिया जैकूजी की दिशा में यह पता लगाने चली कि रजनी जी ने उसके भाई के साथ कितनी प्रगति कर ली थी। |

मिस्टर शर्मा और डॉली ने स्विमिंग पूल में ही रहना उपयुक्त समझा, और जब उन्हें एकांत का अहसास हुआ, तो उनके बीच मर्यादा की बची-खुची सीमायें भी लुप्त हो गयीं। मिस्टर शर्मा उसे गोद में उठाकर अपने हाथों को बेतहाशा उसकी किशोर देह के प्रत्येक भाग पर फेरने लगे, और हर क्षण उसकी कामोत्तेजना को बढ़ाते चले गये।

“ऊहह , छोड़िये ना शर्मा अंकल, कोई देख लेगा!”, सोनिया ने अदृढ़ विरोध प्रकट किया था, और साथ ही अपने तप्त योनि स्थल को उनके टटोलते हाथ पर दबाने लगी।

“आ भी जाओ मेरी जान ! इनकार मत करो डॉली बेटा! मुझे मालूम है तेरी चूत कब से सैक्स के लिये तरस रही है !” । | डॉली ने अपना एक हाथ उनके ट्रैक के भीतर घुसाकर उनके लिंग को कस के हथेली में दबोचा, और अपनी उंगलियों के बीच उस फूले हुए वासना उद्रिक्त अंग की सशक्त फड़कनों का अनुभव करने लगी। ।

“हाँ, आप सच कहते हैं! मैं इस लन्ड की प्यासी हूँ, अंकल ! ::: मुझे आपका लन्ड चाहिये! ::: पर ... पर टीना आँटी ?” भर्राये स्वर में डॉली ने कहा और समाज की बनायी कृत्रिम सीमाओं को लांघ कर अपनी वासना की भूख को स्वीकर लिया। उत्तर में मिस्टर शर्मा ने अपने एक हाथ को उसकी बिकीनी जाँघिया के इलास्टिक में डालकर उसके योनि स्थल पर फेरा। | फिर उसकी फिसलन भरी टाइट मांद में एक उंगली को घुसाकर मिस्टर शर्मा ने उसके सुन्दर मुख को देखा, और उसकी काजल से सजी, हरे रंग की गोल-गोल आँखों में उसकी तीव्र कामेच्छा को भाँपा।।

“देखा नहीं, तुम्हारी टीना आँटी किस स्पीड से राज को इधर से घसीट कर ले गयी थीं, मुझे पक्का मालूम है कि उसने अपने लिये तुम्हारे भाई के लन्ड को रिजर्व कर लिया होगा,” उन्होंने फंकार कर कहा, और अपनी उंगली को हौले हौले उसकी जकड़ती योनि के भीतर मसलने लगे,

“कसम से मेरी जान! ::: तेरी चूत गजब की गर्माने लगी है !” ।

“ओह, शर्मा अंकल !”, डॉली अपनी योनि को उनकी खोदती उंगली पर मसलते हुए कराहने लगी। “चोद मुझे ! • • • इसी वक़्त! • • • • यहीं पर, शर्मा अंकल! :: यहीं पानी में ही मुझे चोद ले !” ।

अपनी देह की वासना के शिकार पड़ोसी नितांत बेसब्री से एक दूसरे के वस्त्रों को उतारने लगे, और मिस्टर शर्मा आत्मीयता से किशोरी डॉली का चुम्बन लेने लगे। जब दोनो एकदम नग्न हो गये, तो मिस्टर शर्मा उसे स्विमिंग पूल के किनारे पर ले गये और उसे ऊपर उठा लिया। डॉली ने अपनी टाँगों को उठाकर भली भांति फैला दिया ताकि वे आसानी से उसकी योनि में लिंग को प्रविष्ट करा सकें। संध्या की रोमांचक सरगर्मियों के उपरांत, डॉली की योनि में प्रचुर चिकनाहट उत्पन्न हो चुकी थी और वो सर्वथा सम्भोग क्रीड़ा के लिये प्रशस्त थी। मिस्टर शर्मा का लिंग उसकी पटी हुई योनि कोपलों को इस सरलता से भेद ग्या, जैसे मक्खन में गरम चाकू उतर जाता है। | अपनी योनि में लिंग के अचानक और उत्कृष्ट रूप से प्रविष्ट होने के कारण डॉली ने कंठ की गहराई से एक कराह निकाली, और यौनक्रीड़ा में अपने नवीनतम सहभागी के नितम्बों पर अपनी लम्बी , सुडौल टाँगों को सहारे के लिये बाँध लिया। उसने घुटने मोड़ रखे थे और वो अपनी जाँघों को चौड़ी फैलाये हुए थी। मिस्टर शर्मा का लिंग उनकी ठूसी हुई योनि के भीतर गतिशील हो गया था, तीव्र और सशक्त लय से भीतर फिर बाहर कूद-कूद कर यौनक्रिया कर रहा था।

“ओहहहह, ऐ भगवान! कैसा मस्त लन्ड है! ::: ओह, मुझे चोदो शर्मा अंकल ! आँह, मुझे चोदो !”

डॉली जोर से चीखी और अपनी पीठ को तानने लगी। मिस्टर शर्मा ने उसके भरपूर कूल्हों को पकड़ा और अतिरिक्त शक्ति लगाकर ठेलने लगे। डॉली की तपती और आतुर योनि के अद्भुत कसाव के मारे वे रोमांचित हो रहे थे।

“डॉली बेटी, बड़े दिन बाद हाथ आयी है तेरी ये कमसिन चूत !”, मिस्टर शर्मा गुर्राये, और दरिन्दगी से अपने विशालकाय लिंग को किशोरी की योनि में ठेलने लगे। इस टाइट चूत को ऐसा चोदूंगा, ऐसा चोदूंगा कि तुझे नानी याद आ जायेगी! ::: आज की तारीख याद कर ले, आज की चुदाई तुझे जमाने तक याद रहेगी, मेरी जानेमन !”

डॉली अब भी सहारे के लिये स्विमिंग पूल के किनारे को थामे हुए थी, और मिस्टर शर्मा अपने इस्पात से कठोर लिंग को उसके भीतर पटके जा रहे थे, हर झटके के साथ वह शिलास्तम्भ उसके चोंचले पर घिसता जा रहा था। उसके स्तन हिचकोले खाते हुए फुदक रहे थे, और जब भी वे अंदर को ठेलते , उसकी कमर निरंकुशता से झूमती बलखाती जाती थी। मिस्टर शर्मा ने डॉली कि नितम्बों को पानी की स्तह से हलका सा ऊपर उठा रखा था, उन्होंने उसके नितम्बों के चिकने और कसैल माँस को अतिरिक्त बलसंवर्धन के वास्ते कस के जकड़ा हुआ था। उनका स्थूलकाय लिंग उसकी योनि को गहनता से भेदे हुए था, और हर ठेले के साथ योनि के कोष्ठ को खींच -तान रहा था। डॉली को अपनी योनि पूरी तरह से भरी हुई अनुभव होती थी, परन्तु फिर भी, हर ठेले के साथ, वो मिस्टर शर्मा के रौद्र बलवान लिंग के हर फड़कते इन्च को अपने अंदर समा लेने का यथेष्ट प्रयत्न कर रही थी।

“और अंदर! • और अंदर, अंकल! अँहहह! अपने मोटे काले लन्ड को मेरी चूत में और अंदर घुसा, बेटीचोद !”, डॉली चीखी थी। वो अनियंत्रित वासना के मारे चीख-बिलख रही थी, अपने पिता की उमर के पड़ोसी अंकल को उसके साथ आनन्ददायक अश्लीलता भरी हरकतें करने के लिये उकसा रही थी।

“ऊ ऊ ऊह! ऊपर वाले, कैसा शैतान लन्ड है! ::: अहहहह, चोद मुझे, बड़वे! ::: दम लगा के चोद, और बहा दे अपना वीर्य मेरी चूत में ! ::: म्म्म्म! झड़ा दे मुझे बेटीचोद! ::: मेरी चूत को अपने काले लन्ड से चोद-चोद कर झड़ा दे साले! ऊह, शर्मा अंकल, मुझे चोदो ::: मेरी चूत को चोदो ::: मेरी गाँड चोदो ::: मेरे मुँह में चोदो! .... ऊपर वाले, मेरे हर छेद में चोदो.. चोद, चोद के बेहोश कर दे मुझे !” मिस्टर शर्मा मुस्कुराये। ऐसा ही करने का इरादा था उनका।।

 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
89 एक आह्वाहन



इस दौरान, जैकूजी में जय रजनी जी के डोलते स्तनों को चूसने में व्यस्त था। उनके कोमल दूधिया थनों को अपने मुँह में लेकर चूसता हुआ जय उस कामोत्तेजीत स्त्री के मुख से अनेक आनंदभरी कराहें निकलती सुन रहा था। जय रजनी जी के अकड़े निप्पलों को एक एक कर के अपने तप्त आतुर होठों के बीच खींच रहा था। रजनी जी ने उसके लिंग को उसकी ट्रेक के भीतर से बाहर निकाल लिया था, और उसकी भीकर लम्बाई पर अपनी मुष्टि को ऊपर नीचे रगड़ रही थीं। उनका अन्य हाथ स्वयं उनकी बिकीनी की जाँघिया के अंदर था, और अपनी शीग्रता से नम होती योनि के द्वार को मल रहा था।

“ऊ ऊ ऊहह, जय! कैसा मादरचोद लन्ड पाया है बे! ::: मोटा और मजबूत !” जय ने रजनी जी के हाथों को अपने अण्डकोष पर लिपटते हुए अनुभव किया, जिसपर उन्होंने हलके से दबाव डला, तो वो उनके वक्षस्थल में मुंह लगाकर कराह पड़ा। * • • • और इन गोल-गोल नाटे टट्टों में भी खूब माल जमा कर रखा है! बोल बे , जब इन टट्टों से अपनी माँ की चूत में वीर्य उडेलता है तो तेरी मम्मी को तो खूब मजा आता होगा, है ना जय ?”

जय ने दबी आवाज में स्वीकृति भरी, जिस प्रकार से उसके सामने खड़ी यह सौंदर्यवती महिला उससे वार्तालाप कर रही थी, उसके कारणवश जय का लिंग आक्रामक शैली में फड़क रहा था। उसके लिंग का कठोर सिरा उनके नग्न पेट पर तत्परता से दबाव डाल रहा था। रजनी जी ने उसके सर को अपने पसीने से चमचमाते स्तनों पर से उठाकर अलग किया। उन्होंने जैकूजी के किनारे पर पीठ टेकी और अपने कूल्हों को इस प्रकार ऊपर उठाया कि उनका बिकीनी से ढका पेड़ पानी की सतह से बस जरा सा ऊपर रह गया था।

उतार दे इसे, जानेमन !”, वे फंकार कर बोलीं, ८ ... और हाँ, अपने दाँतों से उतारना !” जय बुलबुलाते पानी में घुटनों के बल बैठ गया और अपने हाथों को रजनी जी की बिकीनी की जाँघिया के इलास्टिक के दोनो सिरों के अंदर अटका दिया। रजनी जी ने उसके सर को अपने उठे हुए पेड़ पर नीचे दबाया,

और वासना के मारे कराहते कंपकंपाते हुए उसकी जवान ठोड़ी के स्पर्श को अपने प्रजननांगों पर अनुभव किया। जय ने अपने दाँतों के भीतर उनकी जाँघिया को दबोचकर खींचा :: : उसके दाँत और उंगलिया रजनी जी के बलिष्ठ कूल्हों पर से उस भीगे सूक्ष्माकार वस्त्र को हौले-हौले सरका कर उतारने लगे।

जैसे ही उसकी फटी रोमांचित आँखों के समक्ष रजनी जी की योनि प्रकट हुई, जय ने उनके यौनांगों से निकलती सुगन्धि का एक झोंका सुंघा, उनके कामोत्तेजित जवलन्त योनि मार्ग की सुगन्ध जय के नथुनों में फैल गयी। उसने लम्बा श्वास लेकर रजनी जी की मादक सुरभि को अंदर लिया, और बिकीनी की जाँघिया को उनकी लम्बी छरहरी टाँगों पर से नीचे उतार खींचा और वस्त्र के उस छोटे से टुकड़े को अपने कन्धों के ऊपर से पीछे फेंक दिया, जिसके बाद उसके मुख के ऐन सामने उनकी अनावृत योनि प्रस्तुत रूप में ताक रही थी।

“ओहहह, जय! तेरी गरम-गरम साँसे मेरी चूत पर बड़ी अच्छी लगती हैं, बेटा !”, रजनी जी ने आह भरी, और अपनी जाँघों को उसके स्वागतात्मक मुद्रा में चौड़ा फैला दिया। जय ने नीचे देखकर अपनी सुन्दर पड़ोसन की नग्न योनि को अपनी आँखों के सामने खुलता हुआ देखा। कैसा विलक्षण दृष्य था, एक खिलते पुष्प के समान, उनकी फली - फूली, रोम मण्डित योनि कोपलें खुलकर अपने अंदर की चमचमाती लालिम लिसलिसाहट की झांकी प्रस्तुत की।

 
“पसन्द आयी, जय बेटा ?”, वे कराहीं और अपनी उंगली को गुलाबी, दवलिप्त मांद पर फेरा। लड़के ने केवल मूक होकर सर हिलाया, उसकी आँखें रजनी जी की चूती योनि से केवल कुछ इन्च की दूरी पर ही थीं। रजनी जी ने अपने कोमल योनि रोमों को मांद से हटा कर अलग किया और उंगलियों से पाट कर योनि कोपलों को चौड़ा खोल दिया। उनका चोंचला बाहर को निकला हुआ था, और वे कामुकतापूर्वक मुस्कुराती हुई उसके किनारों पर अपनी उंगलियाँ फेर रही थीं।

“देख खानदानी चूत ,”, वे कामुक शैली में बोलीं, “कैसी लिसलिसी चिकनी चूत है मेरी, जिस लन्ड के नसीब हो जाये, उसे जन्नत का लुफ्त देती है, समझा मेरे काफ़िर आशिक़ !”

जय ने अब उनके नितम्बों को पकड़ कर ऊपर उठा रखा था, जबकि उनकी टाँगें अत्यंत चौड़ी होकर फैली हई थीं, और उनके कामतत्पर प्रजननांगों को उसकी उतावली निगाओं की दिशा में ऊपर उठाये हुए थीं। अपनी नाक से कुछ ही इन्च नीचे वो उनकी सुलगती योनि की उष्मा का आभास कर पा सकता था। रजनी जी ने उसके आकर्षक नवयुवा मुख पर भूख के भाव को देखा और निश्चय किया कि अब और प्रतीक्षा उनके बस में नहीं थी। वासना भरी आकांक्षा से भरी कराह निकाल कर उन्होंने नीचे को हाथ बढ़ाया और लड़के के सर को दोनो हाथों के बीच दबोच लिया और अपनी खुली योनि पर खींच कर दबा लिया।

“चाट मुझे !”, वे अपने कामाग्नि से उत्पीड़ित योनि स्थल पर उसके होठों के स्पर्श को पाकर कराहीं।

“प्लीज, मेरी चूत को चाट! .... देख तो मेरा हरामजादा बदन कैसा तप रहा! ... मेरी चूत को तेरी जीभ की जरूरत है बेटा!”

जय का मुख उनकी तप्त योनि मांद पर दबा पड़ा था, और उसकी पहले की बौखलाहट अब असीम आनन्द में परिवर्तित हो चुकी थी। जैसे रजनी जी ने अपने योनि स्थल को उसके मुख पर मसलना प्रारम्भ किया, जय के होंठ खुल गये, और वो अपनी जिह्वा को उनके स्वादिष्ट गुलाबी योनि के भीतर घुमा-घुमा कर चाटने लगा। जैसे लड़के का मुँह उनकी रिसती, रोमयुक्त योनि के चटखारे लेने लगा, वे चीख पड़ी, उन्माद के मारे चीख-चीख कर अपनी सूजी हुई योनि-कोपलों और अकड़े चोंचले पर उसकी निपुणता से घिसती जिह्वा द्वारा आनन्दप्राप्ति करने लगीं।

ऊह ऊहह, हाँ बेटा! :: चाट मेरी चूत , जय! :... चोद मेरी चूत को अपनी जीभ से मेरे बड़वे आशिक़ !”

हाय रे बेरहम, इस प्रेम से चूत चाटेगा तो मुझे तो लत ही पड़ जायेगी! आह अँह अँह :: : आँह :: : अँह फिर तेरी रखैल बनकर यहीं पड़ी रहूंगी जिंदगी भर ! अँह • अँह ::अँहहह • अँहह ...• आँह”

जय भी उनके पेड़ में घुसकर कराह रहा था, और अपने खुले हुए, चूसते मुख को कस के उनकी टपकती मांद पर लगाये हुए, जीह्मा को बड़ी तीव्र गती से अंदर और बाहर फेर रहा था; उसका ऊपरी होंठ लगातार उनके उदिक्त चोंचले को मसलता जा रहा था। रजनी जी की कंपकंपाती देह पाश्विकता से फुदकती जाती थी, वे उसके सर को अपनी फैली योनि पर बार-बार मारती हुई, उसके चेहरे को अपनी योनि से प्रचुरता से प्रवाहित होते द्रवों पर लथेड़ती जा रही थीं। बेजोड़ स्वाद था उनकी योनि का, लगभग उसकी माँ और बहन जैसा ही, लेकिन एक अनूठे रूप से अलग सा कुछ और भी था। उन मादक द्रवों को वो चाट कर पूरा साफ़ कर गया, ‘सुड़प्प - सड़ाप्प' की अश्लील आवाजें निकालता हुआ वो उनकी योनि से उत्पन्न होती अन्तिम बून्द को चूस गया ... और जिस उत्साह से वो चूसता जाता, उसी प्रबलता से उस कामुक स्त्री की योनि से यौन-द्रवों का प्रवाह होता रहता।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
90 यौवन का संचार

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, रजनी जी अपने कंठ के भीतर ही भीतर किसी लाचार घायल प्राणी के जैसे कराह और बिलबिला रही थीं, जैसे जय उनकी कुलबुलाती काँपती योनि को चूसता और चाटता जाता था, वे इस रीति में सिसक-सिसक कर अपने दैहिक आनन्द की अभिव्यक्ति कर रही थीं।

ओहहह, मजा आ गया !”, वे चिल्लायिं, ... बड़वे की जीभ से चटकर मजा आ गया! चूस मुझे माँ के बड़वे ! : : चाट मुझे, जय! मेरी भीगी लिसलिसी चूत को चाट मादरचोद :: :: ऊ ऊ ऊ ऊ, शाबाश , चाट ले .. चोंचले को भी चाट ::: अपने बाप का लन्ड समझ कर चूस मेरे चोंचले कोः : ' या ऊपर वाले! और अंदर घुसा माँ के बड़वे! ::: मुझे चोद अपनी जीब से, बेटा! ... आँह ... ऊहह ऊपर वाले तेरे लन्ड को बरकत दे ... बेटा तेरी माँ के बदन पर ग्राहक खूब पैसे लुटायें! अँह ::: ऊँह :: अँह अँह अँहहह” जब जय के होठों ने उनके चोंचले को अपने बीच में लपेटकर उसके चूसते गरम मुँह में चूस कर खींचा, तो रजनी जी की सम्पूर्ण देह स्पंदित होकर थरथराने लगी।

“ओह, ऊपर वाले! • चः ‘चोद! :: शाबाश, मेरा चोंचला, बेटा! : चूस इस हराम की जड़ को! शाबाश ऐसे ही! माँ के बड़वे, चोंचले को ऐसे चूस रहा है, जैसे तेरी माँ के ग्राहक का लौड़ा हो, ..• अँहहह ... ऊँह ::: अँह :: अँह अँह अँहहह ... बोल साले , ' अँह ... चुदने के बाद तेरी माँ तुझसे अपने ग्राहकों का लन्ड इसी तरह से चुसवाकर फिर खड़ा करवाती है ?? आँह • आँह मादरचोद !”

रजनी जी कामोन्माद में बेसुध होकर इस अपनी अति विकृत मनोवृत्ति से पनपी हुई ऐसी अने बातें कहे जा रही थीं! नवयुवक जय के मैथुन कौशल होंठ और जिह्वा उन्हें पागल करे देते थे' :: अपनी कामोत्तेजित योनि पर उसका मुख मैथुन इतना प्रभावकारी था, कि अब उन्हें किसी भी सैकन्ड चरम यौनानन्द प्राप्त होने वाला था।

“या ऊपर वाले, जय! ::: मैं झड़ने वाली हूँ जानेमन! ::: मैं तेरे मादरचोद मुँह में झड़ने वाली हूँ! अँहहहह! तू आँटी को अपने मुँह में झड़ाना चाहता है, है ना बेटा, बोल ?”

रजनी जी उसके सर के ऊपर ऐसा तीव्र दबाव डाल रही थीं, कि जय लाख चेष्टा करता तो भी अपने मुख को उनके पेड़ में से मुक्त करा कर उनके प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं था। उसने स्वीकृति के रूप में केवल अपना सर भर हिलाया। उसने अपने मुंह को रजनी जी के मोटे-मोटे रोमयुक्त योनि कोपलों पर अब भी कस के चिपटा रखा था।

“चल मेरे पट्ठे, तैयार होजा पहलवान !”, वे चीखीं, “आ आँहह! दम लगाकर चूस, जय! आँटी की चूत को पूरा जोर लगाकर चूस! चूस मेरी चूत को अपने मुंह में, बेटा, और फिर देख मेरी चूत तुझे कैसे जन्नत का मजा चखाती है ! | रजनी जी ने अपने पेड़ को उसके चेहरे पर फुदका - फुदका कर दबाया और जय अपने खुले होठों को उनकी योनि पर चिपकाये हुए चूसता रहा, अपनी जिह्वा द्वारा उनके चोंचले पर क्रमवार दंश करता रहा, और अन्त में उसके टटोलते सिरे को उनकी टाइट भीगी योनि की गहनता में भोंक डाला।

रजनी जी को उसी क्षण परम यौनानन्द की प्राप्ति हो गयी! । “ओहहह! ऊपर वाले! ::: अहहह, अहहह, अहहहहह! :: : ऊपर वाले, शाबाश ! ::: ऊँह ऊ ऊहहह! मैं झड़ रही हूँ जय! :: : चूस इसे , माँ के बड़वे ! :: : चूस निकाल मेरी चूत से! ::: एक एक बून्द को चाट कर पी जा! :: आहहहह आँहह आँहहह ::: आँहहह ::: अपनी माँ के चूत चाटने वाले मादरचोद बड़वे !”

 


रजनी जी के स्नायुओं में जबरदस्त विस्फोट हुआ, वे रॉकेट जैसी झड़ी थीं। उनके कूल्हे एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ उचक रहे थे, और उनकी योनि को उनके युवा प्रेमी के मुख पर बार-बार कुचले जा रहे थे। जय दोनो हाथों के प्रयोग से किसी तरह उनके तूफ़ानी अंदाज में फटकते नितम्बों पर अपनी पकड़ बनाये रहा, और अत्यंत कठिनायी से अपने मुख को रजनी जी की कुलबुलाती योनि पर दबा कर चस्पाये रहा। परन्तु जय ने उनके योनि द्रवों की एक भी बून्द को व्यय न होने दिया, उसे पौष्टिक बलवर्धक पराग मानकर निगलता ही चला गया था वो।

सहसा, वो अपने सर को एक बाजू से दूसरी बाजू हिलाने लगा, और उनके योनि द्वार को फैला कर खोल दिया, जिससे उसका पूरा चेहरा उनकी कसमसाती योनि में नाक से लेकर ठोड़ी तक गड़ गया। रजनी जी को सम्पूर्ण जीवन में इस प्रकार का अनुभव कभी नहीं हुआ था, यौनानन्द ऐसा तीव्र था, के वे लगभग मूर्छित ही हो गयीं। | कामानन्द की चरम शिखर के समय वे श्वास लेने को छटपटा रही थीं, तभी उनके कुत्सित अन्तःकरण में अचानक एक बेसरपैर का विचार कौंध उठा। ‘साला अंदर घुसा हुआ साँस ले कैसे पा रहा है ?'

उनकी विचित्र कुंठा पल भर में ही विलुप्त हो गयी, उनके अंग-अंग में उमड़ते काम उन्माद की लहरों में कहीं गायब हो गयी। उस क्षण तो रजनी जी को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि जय साँस ले पा रहा था भी या नहीं, बशर्ते वो उनके फड़कते चोंचले को चूसना न थामे। उनके विचारों में केवल एक ही विशय का प्राधिपत्य था, जय का मुंह और जिह्वा उनकी विकराल रूप से उत्तेजित योनि में कैसा अविश्वस्नीय आनन्द संचरित कर रहे थे। उनका मुख खुला और रजनी जी हर्ष के मारे चीख पड़ीं।

आहहह आँहहह ऊँह आँहैंह! ओह मादरचोद! ओह, मेरे ऊपर वाले!::ओहहहह! ओहहहहह ! ऊ ऊहह ऊहहह !” ।

अपनी हर गतिविधि से लड़के का मुँह उनकी कंपकंपाती योनि को रोमांच के नये शिखर पर उड़ा ले जाता था, और हर बार वे यौनानन्द की नयी सीमा को लांघ कर असीम संतुष्टि का अनुभव करती जाती थीं।

जैसे अनेक छोटे ऑरगैस्म उनके उचकते पेड़ में से उत्पन्न होकर अंग अंग में संचरित होते जाते, जय को रजनी जी की देह अनेकों बार अकड़ कर थरथराती हुई प्रतीत होती। रजनी जी पीठ को ताने हुए बड़ी कठिनाई से जैकूजी के किनारे का सहारे लिये अपनी स्थिति बनायी हुई थी। वे अपनी योनि को जय के चटोरे मुंह पर, और अपने आगे को उभरे हुए स्तनों को उसके हाथों में दबाये हुए, अपने बदन में थमती हुई अंतिम यौन तृप्ति की अनुभूतियों का आस्वादन कर रही थीं।

अह म्म्म! ओह, बेटा, मजा आ गया!”, रजनी जी ने आह भरी, और अपने पेडू को उसके चेहरे से नीचे हटाया। अपनी टाँगों को उसके तन के दोनो तरफ़ चौड़ा पसार कर, रजनी जी ने अपनी योनि को उसके सीने पर नीचे फिसलने दिया, जब तक उनके नितम्ब जय की जंघाओं पर नहीं बैठ गये, वे उसके ठोस लिंग को दोनो बदनों के बीच में फंसा कर, उनके गुप्तांगों पर आतुरता से दस्तक करता हुआ अनुभव कर पा रही थीं।

किशोर जय एकटक रजनी जी के तमतमाये हुए चेहरे को देख रहा था। उनकी सूरत में उसे एक विशेष अनूठापन दीखता था, फिर अचानक जय को यह ज्ञान हुआ कि यौन तृप्ति का अद्वितीय तेज उनके मुख को ज्योतिर्मय कर उनके नैन-नक्श से यौवन का विलक्षण प्रकाश बिखेर दे रहा था।

बहुत खूब , रजनी आंटी, बहुत खूब!”, वह धीमे स्वर में बोला।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
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