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Incest पापी परिवार की पापी वासना (Completed)

52 सन्तान सुख

ना! ना! ऐसा न करना मेरे लाल !", मिसेज शर्मा ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, "मुझे अपने मुंह में झड़ाने के बाद तो रात और बाकी होगी। फिर मैं चाहती हूँ कि तू अपने साड जैसे काले मुस्टन्डे लन्ड को लेकर मेरी चुतिया में ठूष दे, जिताना गहरा खुसता हो, मम्मी की चूत में घुसेड़ना !", टीना जी ने एक सैकन्ड को रुक कर अपने बेटे के उतावले नेत्रों के भीतर झाँक कर देखा। "फिर मेरे लाल, तू मुझे अच्छी तरह से चोदनाअ! बोल मुन्ने, चोदेगा ना मम्मी की चूत को ? देखें कितना दम है मेरे लौन्डे में, आज तेरा टेस्ट हो जाये, कितनी देर तक चोद सकता है। ठीक बात ?"

इस बात की कल्पना से ही जय का लिंग लम्बी कुलाचे भरने लगा। उसे सुबह अपनी माता की योनि के कसाव और ऊष्मा का स्मरण हुआ। मातृ-देह से संभोग करने की इच्छा उसके मन में अब बहुत प्रबल हो चुकी थी।

"मम्मी, आज तुझे चोदकर दिखा ही दूंगा, कि मैने अपनी माँ की छाती से दूध पिया है!", वो दम्भी स्वर में, अपने पूर्ण - लम्बवत्त लिंग को माँ के मुख की ओर झुकाता हुआ बोला, "तेरी चूत में इतना वीर्य भर दूंगा, कि मेरा बाप तेरी चूत से हफ़्तों तक वीर्य पियेगा।", टीना जी कंपकंपायीं, 'हरामी दीपक तो इतना बेशरम है, कि अगर मैं कहूं तो शायद पी भी जाये अपने ही बेटे का वीर्य अपनी ही पत्नि की चूत से!', ऐसा सोचते हुए उन्होंने अपनी उंगलियों के बीच में उसके लिंग के कठोर तनाव का अनुभव किया।

"आजा मेरे पहलवान ,", जय की माँ लम्बी साँसें भरती हुई बोलीं, "उतर जा मैदान में और दिखा दे माँ को कि उसके दूध में कितना जोर था !"

जय तुरन्त अपने घुटनों के बल बैठ कर उनकी जाँघों के बीच लपका। टीना जी अपने पुत्र के श्वास को अधिक व्याकुलता और व्यग्रता से चलता हुआ सुन रही थीं। किशोर जय बड़ी आतुरता से अपनी आँखों को माँ की चौड़ी पटी हुई योनि-गुहा के द्वार पर सेक रहा था। टीना जी को इस अश्लील और वासना-लिप्त दृइष्य को देख कर एक दुष्टता भरी चुलबुलाहट अनुभव हो रही थी। जिस प्रकार अपनी सारी लज्जा और मर्यादा को त्याग कर वे अपनी ही कोख से जने पुत्र को अपनी नग्न देह निहारने का अवसर दे रही थीं, वह उनकी कामोत्तेजना में ईंधन का काम कर रहा था। कामुकता उअर पाप भरे अनेक विचार उनके मस्तिष्क में कौंध रहे थे, जो उनके मन को और अधिक उत्कट वासना से भरते जा रहे थे। उन्होंने नीचे झुक अर अपने पुत्र की चिकनी युवा जाँघों के मध्य से निकल कर गगन चूमते विशाल लिंग को देखा और उसे अपनी काम-व्यग्र, क्षुधा - पीड़ीत योनि में आक्रामक वार करते हुए, उनके अपने नन्हे जय को खुद से संभोगरत मुद्रा में उनकी योनि को लिंग द्वारा खींचते-तानते हुए कल्पित किया।
 
इस बार टीना जी को उसकी बात समझ में आ गयी। उन्हें थोड़ी हैरानी अवश्य हो रही थी, कि उनका बेटा, उन्हीं के मुख से, सैक्स के विषय में उनके अन्तर्मन की सर्वाधिक गोपनीय कल्पनाओं का विस्तृत ब्यौरा सुनाने की इच्छा रखता था। पर अधिक हैरानी उन्हें इस बात की थी, कि वो भी उससे सब कुछ कह डालने के लिये उतावली थीं!
"मममममम! हाँ जय! मम्मी को ऐसे बड़ा मज़ा आता है! मेरी चूत को मसल , मेरे लाल ! अपनी उंगलियों से मम्मी की चूत को चोद। क्या तू मेरी चूत को अपनी उंगलियों पर कसता हुआ महसूस कर रहा है, मेरे बच्चे ?", टीना जी ने दाँत भींचते हुए पूछा। ।

"ओहहह, भोंसड़चोद, हाँ मम्मी!", जय कराहा, "आपकी चूत ऐसी टाइट और गरमागरम है, अब तो जी करता है कि बस अन्दर घुसेड़े अपना लन्ड और चोद डालें फिर एक बार !"

"चोद लेना, मम्मी की चूत कहाँ भगती है, उसकी माँ ने जय के सर की ओर बढ़ते हुए उत्तर दिया, "मैं चाहती हूं कि चोदने के पहले तू मेरी चूत को चाटे। बोल बेटा, चाटेगाअ ना अपनी प्यारी मम्मी की चूत ?"

"क्यों नहीं मम्मी!", जय ने गरमजोशी से उत्तर दिया। टीना जी ने प्रसन्नता से नोट किया कि उनके इस वार्तालाप के उपरांत उनके पुत्र के लिंग की मोटायी में अच्छी वृद्धि हो गयी थी। पुत्र - लिंग को हाथ में लेकर उन्होंने उसे दुलार-भरे ढंग से ऊपर और नीचे रगड़ा। । जय की आँखों में आँखें डाल कर उन्होंने अपना अश्लील वार्तालाप जारी रखा।

चल फिर, मैं चाहती हूँ कि तू अपनी जीब मम्मी की चूत में घुसेड़े।", वे नागिन जैसे फुफकारती हुई बोलीं, "जितनी अन्दर घुसती है, घुसेड़ना। घुसेड़कर चूसना। मेरी चूत के चोंचले को भी चूसना पुत्तर! जोर-जोर से चूसते रहना, जब तक मैं तेरे मुँह में झड़ न जाऊँ। तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया है, इतना करना तो तेरा फ़र्ज बनता है, है ना जानेमन ?" अपना कथन स्माप्त करते-करते उनकी योनि अब बेसब्री के मार निरंकुश होकर कंपकंपा रही थी।

बिलकुल मम्मी! तेरे दूध का बदला तो जरूर दूंगा। आप कहें तो पूरी रात आपकी गरम और रसीली चूत को चूसता रहूं", अपनी माँ के अश्लील और बेहया निर्देशों को सुनकर जय की आँखों में उत्साह के दीपक टिमटिमा रहे थे।
 
जय ने अपनी माँ को ऐसी भाषा का प्रयोग करते हुए पहले कभी नहीं सुना था, और टीना जी के यह बेशर्मी भरे वचन उसे और अधी उत्तेजित कर रहे थे। जरूर मम्मी की टाईट, रसीली योनि में फेंटती हुई उसकी उंगलियों का असर होगा। अगर इसी ढंग से मम्मी उससे बतें करती रहीं, तो वो तुरन्त ही मातृ-देह से संभोग के लिये तैयार हो जायेगा!

टीना जी के स्नायूओं में कामुकता के प्रवाह का मुख्य करण तो अपने हट्टे-कट्टे युवा पुत्र के साथ सैक्स-क्रीड़ा का वर्जित होना ही था। सगे पुत्र के साथ वर्जीत सैक्स , वो भी अपने ही किचन में! एक ऐसा रोमाँचकारी खतरा था इस करतूत में, जो उनके तड़पते बदन के रोम-रोम में एक के बाद एक थरथराहट कौन्धा रहा था।

"कहो ना, मम्मी! : जो भी कुछ मुझसे करवाना चाहती हो, कह दो। आपकी बातें सुनकर मेरा लन्ड फिर खड़ा होने लगा है !", जय ने आह भरी, और अपने हाथ को माँ की रस से सरोबर योनी की लम्बाई पर ऊपर से नीचे तक फेरता हुआ बोला। ।

"ओहहह! जियो मेरे लाल !", टीना जी चीखीं , अपनी उन्मत्तता में उन्होंने जय की बात ठीक से सुनी भी नहीं थी, " रगड़ मादचूद, मम्मी की चूत को प्यार से रगड़, जोर से मसल !"

उनके बेटे ने आज्ञा का पालन किय। टीना जी कुर्सी पर पीछे को पसर गयीं और अपने नितम्बों को कुर्सी के सिरे पर टिका दिया, इस मुद्रा में उनकी योनि जय की उंगलियों के आवाजाही के लिये पूर्ण रूप से प्रस्तुत हो गयी थी। इसके बाद उसकी माँ को कोई अतिरिक्त निर्देश देने की अवश्यकता नहीं पड़ी, जय अब अधीर हो गया था।

"तेरे साथ और क्या-क्या करूं, मम्मी ? झिझकती क्यों हो, बोल भी डालो ना अपने मन की बात !"

 
51 मातृ-दीक्षा

"ओहूह, हा! चोद्दी! ऐसे ही! चुसती रह, पीती जा मम्मी! कैसा लगा बेटे का वीर्य ?", वो कराहा।

टीना जैसे निगल - निगल कर किसी वैक्यूम - पम्प की तरह अपने पुत्र के लिंग से वीर्य - पान कर रही थीं, किशोर जय अपनी माँ के मुँह का क्रमवार कसाव अपने लिंग पर अनुभव कर रहा था। उनकी नंगी जाँघों और नितम्बों पर भी योनि द्रव की धाराएं अपनी चिपचिपी गर्माहट फैला रही थीं। वे भी अब अपनी कामसन्तुष्टि के कगार पर आकर कुर्सी पर बैठी-बैठी बदन को कसमसा रहीं थीं।

जब टीना जी ने अपने पुत्र के धीमे-धीमे फड़कते लिंग से वीर्य की अन्तिम बून्द चूस ली,

तब उनका बदन लुहार की भट्टी जैसा तपतपा रहा था। जय ने अपनी निगाहें उनकी निर्लज्जता से फैली हुई जाँघों के बीच फेरीं, और अपनी माँ की योनि की चमचमाती दरार को एकटक देखने लगा। वे अपनी टांगें चौड़ी फैलाये बैठी थीं, और जय ने सम्मोहित होकर सुर्ख लिसलिसे माँस को उत्तेजना के मारे फड़कते और कसते हुए देखा। वो टीना जी की योनि की भीगी हुई कोपलों को स्पष्ट रूप से मारे लालसा के सिकुड़ता देख रहा था। माता की कामुक देह के मोहपाश में बढ़ कर, जय ने उन्हें छूने के लिये अपना एक हाथ आगे बढ़ा दिया। जय की उंगलिया गीले मुलायम योनि-माँस में ऐसे घुसीं जैसे मक्खन की डलि में छुरी। ।

"मम्मी, तू तो गजब की गर्मा रही है !", वो हाँफ़ा। "मम्मी, तेरी चूत कितनी गरम और भीगी हुई है !",

टीना जी ने अपने मुख से अर्ध-कठोर लिंग को अलग करते हुए चेहरे को उठाकर आग्नेय नेत्रों से जय को देखा।
"गर्माऊगी क्यूं नहीं साले !", वे कराहीं, "मेरे लाडले बेटे का लन्ड जो आज नसीब हो रहा है! ::: अब झट-पट फिर से खड़ा करवा दे ना इसे, मेरे रँडुए पूत! जानता नहीं मम्मी की गरम-गरम चूत तेरे काले मोटे लन्ड से चुदने को कितनी बेसब्र है! अ अ अह अह, बेसरम, तेरी मादरचोद उंगलियाँ तो मुझे पागल कर देंगी !" ।
 
जय इन्द्रीय सुख के मारे कराहा, फिर अपनी माता के मुख के साथ योनि की भांति संभोग क्रिया करने लगा। वो अपने लिंग के शीर्ष को मिसेज शर्मा के उदर में निर्दयता से बलपूर्वक ठेलने लगा। । "उँहहगहह! मम्मी! चूस कस के! खा जा मेरे काले मोटे लन्ड को, मेरी भोंसड़ी वाली मम्मी! पुच::: पुच, साली चूस बेटे का लन्ड !" |

मिसेज़ शर्मा को अपने पुत्र की निर्लज्ज भाष बहुत प्यारी लगी, जिस तरह से वो देधड़क हो कर अपनी इच्छा व्यक्त कर रहा था, और उन्हें अपने कठोर युवा लिंग को चुसने का आदेश दे रहा था, मानो वो उसकी माँ नहीं बल्कि दो कौड़ी की रखैल हों।

"लन्ड पर थूक दे! हाँ! अब थूक को नीचे तक मल ! ऐसे! बस अब झड़ने वाला हूँ मम्मी, फिर छक कर पी जाना !"

"अब तक तो डैडी के लन्ड से पिया है, अब मेरे लन्ड को भि चख !"

"कैसे लार टपका रही है तू मम्मी! आऊच! काटती है कुतिया मम्मी, एक ही तो लन्ड है तेरे मादरचोद बेटे का !"

मिसेज शर्मा को तो इस गाली-गलौज का बड़ा मजा ले रही थीं! वे तो चाहती थी कि कामसूत्र की हर मुद्रा में अपने पुत्र के साथ संभोग करें, उनके मुँह में, योनि में, और तो और, गुदा में भी! इतनी कामोत्तेजित हो चली थीं कि मन तो करता था कि बदन का हर छिद्र किसी तरह पुत्र-लिंग से भर जावे, और उनका जवान बेटा प्रजण्ड साँड जैसे उनके साथ पाश्विकता से सैक्स करे। उनकि योनि में कामाग्नि सुलग रही थी, उसके नम, रोमदर होंठ वासना के मारे सूज कर फूल गये थे, और चोंचला एक टाईट गाँठ जैसा अकड़ गया था। जय के घुटनों की ठोकरों से टीना जी की योनि - कोपलें पर बराबर चोट हो रही थी, किन्तु उन्हें कोई वेदना नही अनुभव हो रही थी, इस समय उन्हें अपने पुत्र के गाढे, उबलते वीर्ये के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा था।

जय भी ऊँचे स्वर में कराह रहा था, और अपनी माँ का सर अपने दोनो हाथों में लिये हुआ अपने अण्डकोष के बीच से उठते हुए प्रचण्ड ज्वार-भाटे का अनुभव कर रहा था।

अहहह ! ओहहह ! मम्मी मैं झड़ने वाला हूँ ! पी जा रॉड! पी जा पुरा वीर्य! आहहऽ ! झड़ गया !" | मिसेज शर्मा अपनी बाहें उसके नंगे नितम्बों पर लिपटा कर कस के अपने बेटे से चिपक गयीं और जय और अधीक तीव्रता से अपना लिंग उनके मुँह में झटकाता गया। अपनी जिह्वा को टीना जी ने कस के अपने पुत्र के लिंग के तने पर लगा दी, और अपनी पूरी क्षमता से उसके फड़कते, झटकते युवा लिंग-माँस को चूसने लगीं। जब उसका वीर्य स्खलित हुआ तो जय का बदन सर से पाँव तक झकजोर गया, और उसके मुंह से एक जोरदार चीक निकली। वो अपने गरमा-गरम गाढ़े वीर्ये की बौछार के बाद बौछार फेंकता हुआ अप्नी माँ के मुँह को लबालब भरने लगा।

मिसेज शर्मा ने भी भूखों जैसे पुत्र-वीर्य की प्रत्येक बून्द को निगलकर अपने गले को तर किया। बड़ी कठिनाई से वे अपने बेटे के लिंग से स्फुटित होते हुए शक्तिशाली वीर्य - प्रवाह का मुक़ाबला कर पा रही थीं। वीर्य तो थमने का नाम ही नहिं ले रहा था, और जब उनका मुँह पूरा भर कर छलकने को आया, तो उनके पुत्र का थोड़ा सा मलाईदार वीर्य उनके भींचे हुए लाल-लाल होंठों के बीच से बाहर निकल कर बहने लगा।
 
50 मेरे पास माँ है!

"आहह, ह : हाँ। उहहह, ठ :: ठीक है डैडी! बस आया! ऊऊ अहहह !", उसके दाँत भींचे हुए मुँह से एक दुर्बल स्वर में आवाज निकली।

मिस्टर शर्मा ने देखकर ठहाका लगाया, चाहते तो थे कि कुछ देर रुक कर इस दृष्य का मजा लें, पर उनकी जिद्दी बेटी के इरादे कुछ अलग थे। सोनिया को तो बस फिर से अपने डैडी के लिंग का अनुभव अपनी योनि में छाहिये था, बस उसी क्ष्ण !

मिस्टर शर्मा और सोनिया जैसे ही बेडरूम को रवाना हुए, जय ने विह्वाल नेत्रों से नीचे माँ को देखा। वो अपनी माँ के माँस भरे लाल-लाल होंठों को तरलता से अपने चिपचिपे लिंग के तने पर फिसलता देख रहा था।

टीना बड़े चाव से अपने पुत्र के तरोताजा पुरुष हॉरमोनों को चख रही थी और उसके गरवोन्मुख युव लिंग का पसिने से तर जायाका उनकी योनि में उल्लास - लहरें प्रवाहित कर रहा था। आपे से बाहर होकर वे जय के लिंग के शीर्ष भाग को चूस रही थीं। साथ ही काले सर्पाकार लिंग को अपनी हथेली में पकड़ कर उसकी सम्पूर्ण लम्बाई पर रगड़-रगड़ कर अपने पुत्र को झड़ाने का जीजान प्रयत्न कर रही थीं। वे अपने पुत्र के गाढे, मलाईदार वीर्य के फ़ौव्वारों का अपने मुँह में फूटने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थीं। उनकी जिह्वा ने वज्र से कठोर लिंग के छिद्र से प्रचुरता से रिसते हुए पारदर्शी द्रव का नमकीन स्वाद चखा, वे जान गयीं कि जल्द ही पुत्र-वीर्य स्कलित होने वाला है।

टीना जी की चिपचिपी, रसीली योनि अब वासना के मारे फड़क रही थी। उन्हें तीव्र इच्छा हो रही थी कि उनका पुत्र अपने काले जवान लन्ड को उनके मुंह से निकाल कर उनकी योनि की गहनता में घुसा डाले। संभोग के लिये उनके गुप्तांग कितने तत्पर हो गये थे • पुत्र - संभोग की कैसी पाप लालसा थी उनके स्नायुओं मे! अपने द्रव - लथपथ नितम्बों को कुर्सी के सिरे तक सरका कर टीना जी ने अपनी योनी को बेटे कि घुटनों के ठीक ऊपर टेक दिया। फिर जैसे जय अपने घुटनों से रगड़-रगड़ कर उनके चोंचले को मसलने लगा तो वे भी पुत्र- प्रेमवश कराहने लगीं। | एक कशिश बरी निगाहों से वे ऊपर की ओर अपने पुत्र के चेहरे को देख रही थीं, पर जय ने अपनी आँखें कस के मुंद रही थीं। उसका सम्पूर्ण ध्यान केवल माँ के मुंह पर था जिसने उसके लिंग को जकड़ रखा था, और अपने अण्डकोष में उबलते हुए बोझ पर था जिसकी बून्द - बून्द पर उसकी मम्मी का नाम लिखा हुआ था!

जय के दोनो भारी अण्डकोष उसकी माँ की ठोड़ी पर उछलते हुए टकरा रहे थे। मिसेज शर्मा अपनी पूरी क्षमता से पुत्र के लिंग को अपने गले में जितना अन्दर चूस सकती थीं, चूस रही थीं। उन्होंने जय के कसे हुए नितम्बों को अपने दोनों हाथों में जकड़ रखा था। जय का लिंग इतना सूज गया था कि टीना जी लगभग उल्टी ही कर देतीं, पर अपने सैक्स अनुभव का उपयोग करते हुए वे उसे पूरा का पूर निगल गयीं। वे लिंग को अपने उदर में निगलती गयीं जब तक उनके होंठ बेटे के सुंघराले झाँटों पर दब नहीं गये।
 
बड़ी देर से जिन शब्दों को अपने पिता के मुँह से सुनना चाहती थी, उन्हें अब सुनकर वो मिष्तर शर्मा के बदन पर लिपट कर कंपकंपाई। । "ओहह, हाँ डैडी! चलिये, शुरू हो जायें, अब रहा नहीं जाता !", पिता की गोद से उठते हुए सोनिया ने चीखा। | मिस्टर शर्मा का कठोर लिंग एक जोरदार सुड़प - सपड़ की आवाज करता हुआ सोनिया की नवयुवा योनि से बाहर निकला। उनके पूर्ण लम्बवत्त लिंग के आकार को पहली बार देखकर सोनिया के मुँह से एक लम्बी आह निकली। डैडी के रोमदार पेड़ से निकल कर सीधा ऊपर को तना हुआ था, सोनिया की योनि की तरलता से सरोबर चमचमा रहा था, पूर 10 इन्च लम्बा, बाँस के लट्ट जैसा कठोर, और कोबरा नाग सा काला।

"बाप रे, डैडी! लन्ड है या पहलवान की मुग्दल ? मेरी चूत को फाड़े ही देता था आपका मुस्टन्डा लौड़ा !" ।

मिस्टर शर्मा ने खड़ा होकर अपने पुरुष -गरव-सूचक अंग को देखा, और उसके शक्तिशाली कड़ाव को स्वाहते हुए देखा। वैसे तो अनेक युवतियाँ उनके लिंग के दीर्घाकार की प्रशंसा कर चुकी थीं, परन्तु आज, अपनी सैक्सी जवान बेटी के साथ इसी लिंग द्वारा संभोग करने के उप्रान्त , उन्हें अपना लिंग आकार में दुगुना प्रतीत होता था!

तुझे चोदने के वास्ते तो कुछ पहलवानी दिखानी ही पड़ेगी, मेरी छम्मक छल्लो !", अपनी आवाज को और मर्दाना स्वर देते हुए उन्होंने चुटकी ली। प्रसन्नता से खिलखिलाते हुए सोनिया ने अपना एक हाथ बढ़ाकर अपनी छोटी सी उंगलियाँ पिता के लिंग पर लपेट दीं और लिंग के मोटे तने से पकड़ कर कींचने लगी।

"आजा मेरे रक्षस लन्ड! आके राजकुमारी को चोद, नन्ही राजकुमारी बड़े दिनों से चुदने के वास्ते तड़प रही है !", सोनिया खिलखिलाती हुई अपने डैडी को दरवाजे की ओर खींचने लगी।

"बिटिया, तेरे बिस्तर पर या मम्मि-डैडी के बिस्तर पर ?", मिष्तर शर्मा ने पीछे-पीछे आते हुए पूछा।

"आपके बिस्तर पर डैडि", मुँह फेरकर उसने उत्तर दिया, "तकि अगर मम्मी और जय भी बाद में हमारे साथ शामिल होना चाहें, तो वहाँ काफ़ी जगह है। और तो और, मम्मी के बिस्तर पर आपसे सैक्स करने का मजा ही कुछ और है।" ।

"सुनो भाज्ञवान, हम दोनों बेडरूम में जा रहे हैं!", पीछे मुड़ कर मिस्टर शर्मा बोले, * जब अपना काम निपटा लो तो तुम दोनों भी वहीं चले आना, ठीक है ना ?"

टीना जी ने ऊपर देखा और बस सिर हिलाकर ही अपनी सहमति प्रकट कर पायीं, चूंकि उनका मुँह तो लिंग से ठुसा पड़ा था। जय भी ठीक से उत्तर नहीं दे पाया। वो अपनी माँ के चूसते गले में तपते वीर्य की बौछारें उडेलने के कगार पर ही था।
 
49 गुड़िया का खेल

अपनी पुत्री की कामसन्तुष्टी की प्रचण्डता ने उन्हें भी चकित कर दिया था। सोनिया को दीवानेपन में झूमता और फुदकता देख कर वे हैरान से रह गये थे। साथ में सोनिया की योनि की माँसपेशियों की थीरकन थी, उनके लिंग पर योनि का क्रमवार कसाव और ढिलाव तो लगभक उनके अण्ड्कोष से वीर्य को खींच निकाले देता था। मिस्टर शर्मा ने अनुभव का प्रयोग करते हुए संयम बरता और निर्विघ्नता से अपनी संभोग क्रिया को जारी रखा। वे बड़ी दृढ़ता से अपनी पुत्री को उसके जीवन की अब तक की उत्कृष्टतम सैक्स क्रीड़ा की भेंट देना चाहते थे। सोनिया की योनि का बहाव और भी प्रचुर हो चला था, योनि-कोपलों से रिसकर पितृ लिंग पर बहते हुए द्रवों ने दोनों की जाँघों के मध्य - भाग को गर्मा-गरम, चिपचिपे योनि - मवाद से सरोबर कर दिया था।

मिस्टर शर्मा ने चेहरा उठा कर सोनिया के काले-काले नैनों में झाँका। दोनो नेत्र वासना और भावुकता के मिक्ष - भाव से विह्वल हो रहे थे।

"डैडी मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ !", वो बुदबुदायी, और उसने अपनी बाहें अपने पिता की गर्दन पर डाल दीं। मिस्टर शर्मा को अपने सीने पर सोनिया के निप्पलों के उभार का अनुभव हुआ, और उन्होंने अपने प्रिय बेटी को गले लगा लिया।

"मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं, गुलबदन। हद से ज्यादा।", मिस्टर शर्मा सोनिया के आधे खुले हुए मुँह को अपने मुँह से ढकते हुए बोले।

युगल प्रेमियों की तरह दोनों ने चुम्बन किया, अपनी जिह्वाओं को चाबुक की तरह चलाते हुए प्रस्पर मुँह में कैई प्रणय - दंगल लड़े। अपनि योनि में अभी भी पिता के भीमकाय पुरुषांग को समाये हुए, और पने मुँह में उनकी जिह्वा का प्रेमास्वादन करते हुए उसे एक जानी पहचानी गुदगुदाती हुई अनुभूति अपनी योनी के मध्य से पूरे बदन में फैलती हुई सी अनुभव हुई। अभी-अभी अपने जीवन के सर्वाधिक नीक्ष्ण कामसन्तुष्टी को प्राप्त करने के बावजूद उसे और सैक्स की इच्छा हो रही थी। उसकी स्थिति जैल से छूटे बन्दी जैसी थी जिसे प्रथम बार भरप्तेट आहार खा कर ऐसा लगता है कि उसकी भूख और अधिक बढ़ गयी है। अभी तो रात बाकी थी, उसे तो रात भर चूसना और चुदना था!

"मेरा मन नहीं भरा, डैडी! लगता है आपका लन्ड भी अभी भी बेचैन है!", कामुक किशोरी ने ललचाते स्वर में हँकारा, "मेरी चूत बाप के वीर्य की प्यासी है!"

मिस्टर शर्मा अपनी रूपवान पुत्री निर्लज्जता पर मुस्कुराये।
ओके, बिटिया। पर इस बार जरा तसल्ली से। इस दफ़ा मैण अपनी बेटी को कायदे से प्यार करना चाहता हूँ।"

"ठीक है डैडी! पर आप बोलिये कि 'चोदना चाहता हूँ, मुझे बुरा नहीं लगेगा"

"नहीं बिटिया! केवल चोदना ही नहीं। मैं तुझसे सैक्स करना चाहता हूँ, वो हर चीज जो स्त्री और पुरुष अपने जिस्मों के साथ कर सकते हैं। और शायद कुछ और भी।"
 
छप्पन छुरीं मतलब जो हफ़्ते के सातों दिन और आठों पहर यानि के कुल छप्पन बार चुदाई करे !" । "हाँ, फिर तो मैं छप्पन छुरीं ही हुई! ओहहह, चोदिये मुझे! कस के चोदिये ना, डैडी! मैं बस अब झड़ने ही वाली हूँ

सोनिया के छरहरे जवान बदन ने फुदकना और फड़कना जारी रखा। उसकी गर्दन ऐंठने लगी और नथुने फूलने लगे। माथा पसीने की बूंदों से तर था जिसके कारणवश उसके बाल माथे पर चिपक गये थे। पसीने की बून्दै एकट्टी होकर मोटी-मोटी धारों का रूप लेती हुईं उसके गालों पर से नीचे बहकर सोनिया के झूमते स्तनों के बीच की खाई में एकत्र हो गयी थीं।

उसके कहे बिना ही सोनिया के डैडी जान चुके थे वो संभोग के चरमानन्द को प्राप्त करने की कगार पर थी। कैसे उतावलेपन से उनके लिंग पर वो अपनी योनि को नीचे-ऊपर फुदका रही थी, और हर ठेले के साथ अपने द्रवों से सन पेड़ को उनके पेड़ पर रगड़ रही थी। मिस्टर शर्मा भी अपने पूरे सामर्थ्य से सैक्स क्रीड़ा में रत थे। उन्होंने कुर्सी पर पीछे को तनकर अपने कूल्हों को उचका रखा था और अपने लिंग से पुत्री की चौड़ी पटी हुई योनि में बड़े गहरे-गहरे वार कर रहे थे। सोनिया अपने बदन में अविश्वस्नीय आवेग से उमड़ती हुई कामसंतुष्टी का अनुभव करती हुई कराह - कराह कर अपने पिता के कन्धों को कुरेद रही थी। । "उह! अँगहहह! ऊऊऊह, डैडी! मैं झड़ रही हूँ !", अनायास ही वो चीखी, "ऊउ! बेटीचोद! चोद! ऊउँह कस के! जैसे ऊउँह मम्मी को चोदकर ऊऊह मुझे .. आह .:: ऊँह ::: मुझे पैदा किया था! डैडी! ओहहहह! आहा !"
 
मिस्टर शर्मा के हाथ अपनी पुत्री के कुम्हलाते नितम्बों पर व्यस्त थे। वे गोल-गोल मलाई से चिकने नितम्बों को दबा दबा कर गूंथ रहे थे और उनका हैंडल की तरह उपयोग करते हुए अपने रॉकेट से लिंग को उठा कर सोनिया की कामुकता से खुली हुई माँद में ठेल रहे थे। जब उसके पिता की उंगलियाँ उसके संवेदनशील नितम्ब - छिद्र पर से होकर उनके आक्रामक लिंग को निगलती युई योनि की कोपलों को सहलाने लगीं तो किशोरी सोनिया और अधिक व्यग्रता से कराहने और बलखाने लगी। मिस्टर शर्मा ने योनि के गरम द्रवों के प्रचुर प्रवाह का अनुभव किया जो उनके लिंग पर चिकनाहट उडेल कर अब उनकी टटोलती उंगलियों पर बहने लगा था। 'बस इसी की कमी थी।', उन्होंने सोचा, फिर अपनी लसलसी उंगलियों को सोनिया के नितम्बों के बीच फेरते हुए गरम-गरम मादा-द्रवों को उसकी गुलाबी गुदा पर प्यार से मलने लगे।

जब उसने अपने डैडी की उंगलियों का कठोर स्पर्श अपने छोटे से पृष्ठ द्वार पर अनुभव किया तो सोनिया ने उत्साह भरी एक आह भरी। एक पल के लिये तो उसकी गुदा की माँसपेशियों ने कुछ विरोध किया, फिर शीथील हो कर डैडी की मध्य उंगली को अपनी गुदा की चिकनी गहराईयों में निगल लिया। सोनिया को डैडी की लम्बी मोटी उंगली अपनी गुदा में दबती हुई बड़ी मस्ति दे रही थी, स्वयं की उंगली से कहीं बेहतर प्रतीत हो रही थी। सोनिया मस्ती से बिलबिलायी। । "ऊऊह, आह, डैडी! कितने गन्दे हैं आप, मेरी गाँड में उंगली करते हैं! मैं आपके साथ और भी गन्दे-गन्दे काम करूंगी, है ना डैडी ? आप मुझे गाँड में भी चोदेंगे ना! और आपको मेरी चूत भी चाटनी होगी! मैं आपके साथ हर तरह का सैक्स करना चाहती हूँ डैडी !" ।

मिस्टर शर्मा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अपनी बेटी के स्वभाव में अचानक आये इस परिवर्तन पर वे अचरज कर रहे थे। दिखने में तो मासूम गुड़िया जैसी भोली लगती थी, पर रंग-ढंग और बातचीत से बिलकुल रन्डी! कितना हसीन मिक्षण था ये!

सोनिया, तू तो एकदम छप्पन छुरीं निकली रे !" उहह! उहहहह! छ• छप्पन छुरीं यानि ?", वो उनकी गर्दन पर हाँफ़ रही थी।
 
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