• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"दीदी, आपका पेपर कितनी देर का है?" अर्जुन ने रास्ते मे स्कूटर चलाते हुए ऋतु दीदी से पूछा जो अपने भाई के पीछे चिपकी सी बैठी थी.

"3 घंटे का है. तू बता क्या करना है तुझे?" अपने हाथ को उसकी कमर पर फिरते हुए कहा

"कुछ नही मैं 3 घंटे क्या करूँगा ये सोच रहा था.?" अर्जुन की बात ऋतु को समझ आ गई थी जो सही भी थी.

"अच्छा तू एक काम करियो, मेरा पेपर है 9-12 और तू मुझे कॉलेज गेट पर उतार कर अगली मार्केट मे चला जइओ. वहाँ सुना है सिनिमा है 2-3 पास पास मे.

11:45 तक वापिस आ जाना." दीदी की बात उसको भी जच गई. फिर कुछ मस्ती मे जब उसने देखा की ये सड़क खाली है तो अपना हाथ पीछे कर उनका एक उभार सूट पे से ही सहला दिया.

"तू मार खाएगा. ऐसी हरकत सड़क पर नही करते.' ऋतु दीदी ने भी देख लिया था कि वहाँ कोई भी नही था फिर भी नाटक करते उन्होने ये बात कही.

"आप ना मेरी हो तो जो मेरा है उसके साथ मैं कुछ भी कही भी करू."

"अच्छा बाबा. लेकिन ना हम दोनो किसी परिवार से तो है जिसको सब जानते भी है. अब खुद सोच ले."

अर्जुन दीदी की बात से शांत हो गया.

"अकेले मे तू जो मर्ज़ी कर मेरे भाई. मैं तो खुद पूरी तेरी हूँ. " थोड़ा चिपक अपने दोनो दूध उसकी पीठ से लगाते ये कहा तो अर्जुन ने समझदारी से कहा. "हा वो जब सुबह आपको जगाने रूम मे गया था तभी से दिल मे था कि एक बार आपको गले लगाऊ , प्यार करू फिर आप ही देखो. ग़लती से सबर नही रहा."

"चल कोई बात नही अब तू मुझे उतार और आगे किसी से भी पूछ लिओ. बाइ" इतना बोलकर ऋतु दीदी कॉलेज के आगे उतर कर अंदर भाग गई और अर्जुन अगली मार्केट की तरफ बढ़ गया.

………………

"जलता बदन" ये पोस्टर एक सड़क किनारे बने शौचालय की दीवार पर चिपका था. और इस शीर्षक के साथ वैसे ही 5-6 पोस्टर से पूरी दीवार भरी हुई थी.

अर्जुन को तो इसका कोई अनुभव नही था तो लाल रंग की उस इमारत की तरफ चल दिया वो खुली पार्किंग मे स्कूटर खड़ा कर. मुश्किल सी 12-13 लोग टिकेट की खिड़की पर खड़े थे. सिनिमा के प्रवेश द्वार पर मूह पर कपड़ा लपेटे 2-3 लड़किया/औरते भी थी. अंदर से तो वो घबरा रहा था लेकिन सोचा चलो आज ये अनुभव भी ले लिया जाए. 100 का नोट भाड़ा दिया उसने छोटे सी सलाखो वाली की खिड़की के अंदर बैठे आदमी की तरफ. एक मरियल सा अधेड़, शायद मूह मे तम्बाकू या गुटखा दबाए उसकी ओऱ देखते हुए बोला, "हॉल या बाल्कनी? हॉल का 20 बाल्कनी का 50."

थोड़ा सयम्म से अर्जुन ने कहा, "बाल्कनी की एक."

"अंदर की तरफ ही दीवार पर लाल पिचकारी मार कर उसने एक बस टिकेट जैसी गुलाबी रसीद और 10-10 के 5 नोट उसकी और बढ़ा दिए. "अगला बोलो."

अर्जुन वहाँ से हट गया और जिधर की तरफ बाकी सब जा रहे थे वो भी पीछे चल दिया.
 
"आए टिकेट दिखाओ." एक ख़स्ताहाल लकड़ी के दरवाजे के अंदर जाते ही एक और मरियल सा अर्जुन के सामने आ गया. खाकी वर्दी जो उसके शरीर पे झूल सी रही थी, हाथ मे एक स्टील की बॅटरी जो उन दिनों चोवकिदार जैसे लोग भी रखते थे लिए खड़ा उस से बोला, "टिकेट दिखाओ भाई."

अर्जुन ने भी वो पर्ची सामने कर दी. "वो उपर की तरफ चले जाओ जहा लाइट दिखा रहा हूँ. दरवाजा खोल कर किसी भी सीट पर बैठ जाना." उसने हॉल के अंदर थोड़ी उचाई की तरफ जाती सीडीयो से लाइट मारते हुए एक बक्से नुमा कमरे की तरफ रोशनी रोक दी. पूरे हाल मे ठंडक सी थी अजीब से, और लकड़ी की एक के साथ एक जुड़ी कुर्सिया. कही पर गद्दी थी तो कही पर नही. वो ऐसे ही देखता हुआ उपर चढ़ गया. एक पतली सी गली थी जहा ये 4 बक्से नुमा कमरे एक कतार मे थे.

पहले वाले को छोड़कर वो अगले के दरवाजे को खोलने लगा. हल्का हाथ रखते ही वो खुल गया. अंदर 2 कतार थी कोई 6 सीट की. एक पिछली कतार की सीट जो दरवाजे से बिल्कुल दूर थी वो वहाँ बैठ गया. अच्छी सीट थी यहा पर तो. पीठ की तरफ भी और नीचे भी सोफा की तरह. कहा जाए तो सोफा ही थी वो तीन एक साथ फिर एक हटती बीच मे फिर तीन सीट.

घड़ी का रेडियम बता रहा था कि 9 बज चुके है. पूरा हाल अंधेरे मे डूब गया. कुछ ही देर मे बड़ी स्क्रीन पर हिन्दी के नंबर चलने लगे लेकिन अभी इतनी लाइट नही थी की सबकुछ दिखाई दे. उसका ध्यान सामने था और इधर दरवाजा खुला और एक जोड़ा हल्के से फुसफुसाता अंदर दाखिल हुआ. उन्हे अर्जुन नहीं दिखा.

"क्या कर रहे हो. ज़रा भी सबर नही है. कम से कम अंदर आकर बैठने तो दो." ये एक लड़की की आवाज़ थी. मतलब कोई जोड़ा आया था अंदर. और वो दोनो अर्जुन से जुड़ी तीन वाली सीट पर बैठ गये. दरवाजा अंदर से बंद होने की भी आवाज़ आई थी अर्जुन को. संकोच वश उसने नज़र सामने कर ली जहा कोई शादी का सीन चल रहा था और शायद ये दक्षिण भारत की हिन्दी मे बदली फिल्म थी.

कुछ पल बाद सीन बदल गया. अब लड़की बिस्तर पर बैठी थी. ये साँवली सी और थोड़ी भारी शरीर की लड़की कहो या औरत, थी. साथ मे ही उसको उन दोनो के कछर-पचर सुन्न रही थी. वो जोड़ा कुछ बोलते बोलते चूमा चाटी मे लगा था. पर्दे पर अब सीन ये था की एक मूछो वाला आदमी जो की दूल्हा था वो

लड़की का घूँघट उतार उसके उपर लेटा उसको चूम रहा था. "ऊओं आहह. तुम तो अप्सरा हो मेरी जान." मुचड़ आदमी जिसने अपनी कमीज़ निकाल दी थी और सिर्फ़ एक लूँगी मे था कुछ ऐसे बोला और उस लड़की की साड़ी जिसम से अलग थी. यहा बॉक्स के अंदर भी अब उम्म्म-आ की सिसकारिया चल रही थी. अर्जुन तो मज़े से दोहरा हुआ जा रहा था. उसने एक बार नज़र उन दोनो की तरफ की तो नज़र भी वही रुक गई. उन दोनो पे इतनी रोशनी गिर रही थी के कुछ हहद तक सॉफ दिख रहा था.

लड़की की चुन्नी उसकी बगल मे रखी थी और लड़का उसकी कमीज़ उपर कर लड़की को अपनी गोद मे लिटाए उसके दूध पी रहा था.

"सोनू मेरी जान ये तुम्हारे दूध कितने बड़े है. दिल करता है इन्हे ऐसे ही ख़ाता रहूं." वो ऐसे ही एक बार उपर उठा और फुसफुसाया जो अर्जुन को भी सुनाई दिया. दोनो मे से किसी का चेहरा नही दिख रहा था. फिल्म वाले पर्दे पर भी ऐसा हे कुछ चल रहा था, लेकिन वहाँ वो मुच्छड़ आदमी ब्रा के उपर से ही उस लड़की के खरबूजे चाट रहा था.

"थक्क थक्क." दरवाजे पर एक दस्तक हुई तो लड़की ने जल्दी से कमीज़ नीचे करी. लड़के ने उठकर चितकनी खोली तो सामने वही आदिमी था जो टिकेट देख रहा था सबकी. उसने अपनी टॉर्च की लाइट जलाई और उस लड़के के चेहरे पर मारी, फिर लड़की के. यहा उस लड़की के चेहरे पर लाइट गिरी वहाँ अर्जुन के दिमाग़ मे करेंट लगा. उसके मूह से दबी आवाज़ मे सिर्फ़ इतना ही निकला, "नुसरत" जो उस लड़की ने भी सुना और घबरा के वही जम्म सी गई.

इधर वो टिकेट वाला शायद बहस कर रहा था उस आदमी से. "आए ये सिनिमा है. फिल्म चाहे गंदी लगती हो लेकिन ये आयाशी का अड्डा नही है. निकलो इस रंडी को लेकर यहा से." उस आदमी की आवाज़ तेज थी जो सभी ने सुनी थी. साथ वाले बॉक्स से भी 2-3 लोग निकल आए थे और पूछने लगे क्या बात हुई है, जैसा की अमूमन खाली लोग करते ही है

"अर्रे मैने बताया ना भाई मेरे साथ नही है वो. मैं तो अकेला आया हूँ यहा." ये तो आदमी ही हिजड़ा निकला.

अर्जुन ने कुर्सी के किनारे पड़ी चुन्नी नुसरत की तरफ फेंकी. एक पल के लिए रुक कर उसने फिर वो अपने चेहरे से लपेट ली.

"मैने खुद देखा था तुम्हे लड़की साथ लाते हुए. पर्दे के सामने से हमारे आदमी ने देखा था तुम्हे कुछ करते हुए."

उसकी बात सुनकर तो अर्जुन को समझ आ गया की मामला कुछ और है.

"मैं सच बोल रहा हूँ भाई ये लड़की मेरे साथ नही है. मैं तो ######## कंपनी मे सेल्समन हूँ और आज ही इस शहर आया हूँ. अभी समय खाली था तो फिल्म देखने चला आया." उस आदमी की जान हलाक मे आ चुकी थी और उसने धीमे से कुछ पैसे अपनी जेब से निकाल कर उस मरियल आदमी की उपर जेब मे डाल दिए. कोई इशारा किया तो वो अपना बैग उठा के वहाँ से नौ दो गयरह हो गया.

"आए लड़की तू किसके साथ है? साली धंधा करती है." उसने इतना कहा तो 2 लोग और भी अंदर की तरफ आने लगे.

"कान के नीचे थप्पड़ खींच के मारूँगा तो समझ आ जाएगी लड़की से बात कैसे करते है." अर्जुन गुर्राता सा खड़ा हुआ. 6 फीट का तगड़ा जवान देख कर वो आदमी हड़बड़ा गया. "भाई.. ये तुम्हारे साथ है क्या?"

"मेरे साथ है तभी यहा बैठी है. चल निकल यहा से चुपचाप. पैसे दे कर फिल्म देख रहे है फ्री मे नही जो ड्रामा कर रहे हो."

"अर्रे ओह टिकेट वाले क्यो जवान जोड़े को परेशान कर रहा है भाई. कॉलेज वाले है सोच के पंगा लिया कर नही तो तेरा सिनिमा टॉड देंगे और तुझे भी."

ये वो आदमी बोला जो शुरू मे आवाज़ सुनकर साथ वाले बॉक्स से आया था. एक और ने सुर मे सुर मिलाया. "तू निकल रे. फिल्म की मा चोद के रख दी. अब मैं मारूँगा तेरे कान के नीचे."

वो मरियल सा आदमी दरवाजा बंद कर खिसक लिया बाहर. उसने सोचा था पैसे के साथ लड़की के उपर भी हाथ फिरा लेगा लेकिन यहा तो जान ही बच गई बहुत था.

अब बॉक्स मे दोनो चुप थे. फिर कुछ देर बाद अर्जुन ही बोला..

"तो ये पढ़ाई भी करती है आप?" नुसरत तो बस इतना सुनते ही ज़ोर ज़ोर से सुबकने लगी.

अर्जुन पहली बार किसी लड़की को रोने से नही रोक रहा था. पता नही क्यो. शायद उसको अच्छा नही लगा था ये सब देख कर.

"मुझ से ग़लती हो गई अर्जुन. मुझे माफ़ कर दो. मैं ऐसी लड़की नही हूँ जैसे तुम मुझे आज देख रहे हो?" उसने सुबक्ते हुए ही कहा.

"कौन था ये आदमी? और तुम एक ऐसे आदमी के साथ यहा तक आ गई.? किसी अच्छी जगह भी तो जा सकती थी अगर ये सब करना था?" अर्जुन आवाज़ धीरे लेकिन सख्ती से कर रहा था.

"मेरे बड़े जीजा है ये. कुछ दिन पहले इन्होने मेरे कमरे मे मुझे और आशा को देख लिया था एक साथ. उसके बाद से ही मुझे बोल रहे थे बाहर चलने के लिए नही तो मेरे मा-बाप को बोलने की धमकी दे रहे थे."

नुसरत ने इतना कहा तो अर्जुन ने सर पे हाथ रखा और फिर पूछा, "क्या कर रही थी तुम

दोनो जो ये ऐसी हरकत करने पर उतर आया."

"वो.. वो आशा मेरे साथ अकेले मे मस्ती कर रही थी. उस दिन स्टडी के लिए घर ही रुकी थी मेरे. जीजा ने खिड़की से झाँक कर देख लिया था." वो फिर रोने लगी.

"तुम जानती हो जैसे वो तुम्हे यहा अकेली छोड़ कर भाग गया उसके बाद तुम्हारे साथ क्या करते ये लोग." अर्जुन के प्रश्न से नुसरत हिल गई थी.

"वो मुझे ये बोलकर लाए थी की एक बार उनके साथ होटेल चल पडूँ. मैने मना किया तो फिर कहा के एक फिल्म देख लो मेरे साथ और सिर्फ़ वैसे ही करने देना जैसे अपनी सहेली के साथ कर रही थी. फिर कभी कुछ नही करूँगा या कहूँगा. और यहा छोड़ कर भाग गया." वो अर्जुन के सीने से लग कर रोने लगी थी.

"पहले तो मैं सोच रहा था कि अलका को सब असलियत बता दूँगा के देख लो कैसी सहेली है तुम्हारी. इस सब मे ऐसा नही के वो आदमी ही पूरी तरह ग़लत है. तुम्हे उसका विरोध वही करना चाहिए था जब तुम्हे उसने पहली बार ये सब कहा. लेकिन सुधर जाओ बस इतना कहूँगा. ग़लत सहने से अच्छा उसका विरोध करना है. आज यहा कोई तुम्हारी इज्जत नीलाम कर देता तो पूरे घर की बेइज़्ज़ती होती. लेकिन तुम उस दगाबाज के साथ बिना कुछ सोचे आ गई."

इस हंगामे के बीच मध्यांतर हो गया था. और रोशनी हो गई थी. 2-3 लड़के कोला-पानी-फुल्ले के पॅकेट बाल्टी मे रख कर बेच रहे थे हर सीट के पास जाते हुए. नीचे तो मुश्किल से 30 लोग थे और बॉक्स वाली जगह भी 5-6 ही फिल्म देखने आए थे. एक लड़के से 2 ठंडे की बॉटल लेकर अर्जुन ने वही रखी और उसको फिल्म के बाद उठा लेने को कहा. लड़का पैसे ले मुस्कुराता चला गया बाहर.

"चलो बाथरूम चलकर मूह सॉफ कर लो. अगर तुम्हे बाहर जाना है तो मैं छोड़ आता हूँ. मेरी मजबूरी है के अभी डेढ़ घंटा रुकना पड़ेगा यहा." इतना बोलकर वो गेट की तरफ बढ़ा और नुसरत उसके पीछे चल दी.
 
बाथरूम उस तरफ ही बना था जिस तरफ से मुड़ने के लिए जगह थी. अर्जुन बाहर खड़ा रहा और 5 मिनिट बाद नुसरत बाहर आ कर सीधा बॉक्स की ओर चल दी.

"तुम्हे घर नही जाना क्या?"

"घर पर 12 बजे तक का ही बोलकर निकली थी और इस वक्त घर नही जा सकती. जब तुम निकलोगे तो साथ निकल जाउन्गी." नुसरत अभी थोड़ा काबू मे थी.

"अच्छी बात है. ये लो कोला पी लो. मैं खुद नही पीता लेकिन सोचा कभी पी लेना चाहिए." नुसरत ने बॉटल ज़रूर हाथ मे पकड़ ली थी लेकिन वो

अभी तक सहमी हुई थी.

"देखो बात को यही ख़तम करो. ज़रूरी बात है के तुम ठीक हो. और किस्मत ही कह लो के मैं यहा था क्योंकि मैं इस से पहले सिनिमा नही आया कभी अकेले.

और तुम्हे भी किसी ने नही देखा." इतना कह कर एक बार फिर अर्जुन ने प्यार से सर सहला दिया और बॉटल वाला हाथ नुसरत के होंठो की तरफ उठा दिया.

"वो उसने मेरे चेहरे पर लाइट मारी थी." घबराते हुए नुसरत ने ये बात कही तो अर्जुन को हँसी आ गई. आधा चेहरा वहाँ से देखा होगा उसने. वो भी इतनी तेज पीली रोशनी मे तो क्या याद रहेगा. अब तुम फिर वापिस आओ तो पता नही." और हँसने लगा.

"वापिस तो क्या अब मैं मेरे घर से भी नही निकलने वाली." इतना बोलकर एक बार फिर वो अर्जुन से लिपट सी गई.

"तुम्हारा मैं किस मूह से शुक्रिया अदा करू अर्जुन? कहा मुझे तुमपर इतना गुस्सा आया था जब तुम उस दिन कॉलेज मे मुझे पूरी तरह से नज़र अंदाज कर चले गये थे और कहा आज तुमने ही मेरी इज़्ज़त बचाई. उस दिन इतना गुस्सा था मुझे तुम पर की जाने खुद को क्या समझते हो लेकिन मैं ही ग़लत थी."

सुबक्ते हुए ही उसने अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए. अर्जुन ने अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना दी. फिर कुछ देर मे दोनो सीधे होकर बैठ गये.

इतना देर रो लेने के बाद प्यास लग रही थी तो अब नुसरत धीरे धीरे कोला पी रही थी. पर्दे पर अब कोई नया ही सीन चालू था. एक जवान लड़का जो शायद उस घर का नौकर था वो घर के बाहर पानी डाल कर सफाई कर रहा था. नयी दुल्हन जिसकी शादी हुई थी आज वो घर के कपड़ो मे थी. आँगन मे उस लड़की का पैर फिसलता है और वो ज़मीन पर गिरी नज़र आती है.

"कन्हैया मुझे उठाओ."

वो लड़का जिसका नाम कन्हैया था वो भाग कर आता है और

"मालकिन" बोलकर उस लड़की को उठा ता है. कॅमरा अब सिर्फ़ उस लड़की की गुब्बारो पर था जो चोंच वाले ब्लाउस मे थे. अगले सीन मे दोनो कमरे मे थे और कन्हैया मालकिन को बिस्तर पर डाल देता है.

अर्जुन और नुसरत बस सीन देख रहे थे. दोनो एक ही सीट पर अगल बगल मे बैठ थे.

"कन्हिया जाने से पहले ज़रा मेरी कमर मे बाल्म लगा दे. लगता है कमाल लचक गई है कही से." वो लड़की होंठ काट ते हुए कहती है. ऐसे ही सीन मे आगे वो लड़का कोई

तेल रगड़ रहा था जवान मालकिन की कमर पर. सफेद पेटीकोट और ब्लाउस मे पीठ के बल लेटी वो सिसकारिया भर रही थी. शायद ये नकली ही थी क्योंकि आक्टिंगही कर रहे थे. अगले ही पल दोनो के होंठ एक दूसरे से चिपके और अब मालकिन कन्हैया की गोद मे दोनो टाँगे फै लाते हुए उसको चूम रही थी.

इधर नुसरत का तो बुरा हाल हो गया था लेकिन अर्जुन मुस्कुरा रहा था.

"बेशरम" इतना बोलकर नुसरत उसको नाटक सा करती मारने को हुई और खुद उसपर गिर गई.
 
दोनो जगह एक ही सीन चल रहा था. लेकिन इस बार अर्जुन के होंठ भी नुसरत के होंठो को बराबर चूस रहे थे. मज़े मे वो उसके उपर ही पसरी हुई थी.

फिल्म मे नौकर अब मालकिन की सफेद ब्रा मे से निकलते बड़ा बड़े साँवले दूध चूम रहा था और यहा अर्जुन नुसरत की गोलाइयाँ नाप रहा था. नुसरत ने खुदही अर्जुन का हाथ अपनी कमीज़ के अंदर कर दिया और दोनो एक लंबा किस करते गये. अब वहाँ सीन बदला तो यहा भी. अर्जुन की गोद मे नुसरत बैठी थी और वो उसकी कमीज़ उपर कर उसके मोटे दूध पी भी रहा था और दबा भी रहा था. सच मे ही नुसरत के चुन्चे खूब बड़े और कसे हुए थे. ज़्यादा मसले नही गये थे अभी.

सिनिमा के पर्दे पर भी अब वो मालकिन उपर से नंगी थी और लड़का अपना मूह उसके खरबूजो पर चला रहा था. लड़की बेड पर थी और वो बस सिसकिया ले रही थी. कन्हैया की कमर कमर के उपर से ही हिल रही थी. अपने दूध अर्जुन को पिलाती नुसरत ने हाथ उसकी पैंट मे डालना चाहा तो अर्जुन ने उसको थोड़ा पीछे खिसका खुद पैंट का बटन खोल दिया.

"ये क्या है?" नुसरत को तो बिल्कुल उम्मीद नही थी की किसी का ऐसा भी हो सकता है. उसने अपने दीदी-जीजा को देखा था. लेकिन जीजा का तो किसी मोमबत्ती जितना मोटा और 4-5 इंच का था. लेकिन ये डंडा तो उसकी मुट्ठी मे नही आ रहा था.

"मेरे पास तो यही है. खुद देख लो अगर छोटा है तो." अर्जुन ने शरारत से कहा और उसके निपल खींचते हुए वापिस होंठ चूसने लगा.

मस्ती मे नुसरत लंड को आगे पीछे करने लगी. "हम यहा नही कर सकते और नाही मैं ये ले पाउन्गी. लेकिन तुम्हे खाली कर देती हूँ." नुसरत ने अर्जुन को देखते हुए कहा.

"मुझे कैसे खाली कर दोगि?"

"वो सब बाद मे बताउन्गी लेकिन कही देखा था. तुम बस मेरे ये दबाते रहो."इतना बोलकर वो वापिस साथ मे चिपक कर बैठ गई. और अर्जुन उसके दूध दबाता रहा.

नुसरत ने अपना मूह लंड के उपर कर ढेर सारा थूक उसपर गिरा दिया और सुपाडे को चिकना करने लगी हाथ से.

अर्जुन पूरा उत्तेजित था और उसका लंड भी फूल कर फटने को हो चुका था.

नुसरत के हाथ तेज़ी से लंड पर चल रहे थे और दूसरे हाथ से वो उसके अंडकोष सहला रही थी. अर्जुन ने दूध दबाते हुए ही वापिस उसको चूमना शुरू कर दिया और एक हाथ सलवार से सीधा चूत पर ले गया. पूरी गीली थी नुसरत की चूत और कुछ बाल भी थे वहाँ.

अपनी उग्लिया चूत के छेद पर रगड़ते हुए वो नुसरत को भी मज़ा दे रहा था. इधर उसका हाथ थकने लगा लेकिन वो करती रही लंड को आगे पीछे.

"मैने भी कही कुछ देखा था. तुम करोगी वैसा?" अर्जुन ने कुछ सोचते हुए कहा तो सिर्फ़ उसने हा कहा.

"इसको मूह मे ले लो?"

नुसरत ने ना मे सर हिला दिया

और फिर से थोड़ा थूक गिरा गर अच्छे से मालिशा करने लगी. अर्जुन ने वापिस ध्यान उसके बड़े चुचो पर लगाया और उन्हे मसलने लगा. मज़े से नुसरत की सिसकारियाँ निकलने लगी और हाथ लंड पर ज़ोर से चलने लगा.

अब तो अर्जुन का भी समा बन गया था. जैसे ही नुसरत की चूत फिर से गीली हुई इधर अर्जुन

के लंड से पिचकारी उड़ती अगली सीट पर गई. 4-5 लंबी पिचकारिया मारने के बाद कुछ वीर्य नुसरत के हाथो पर भी लग गया.

"इन हाथों से तो अब कोई काम होने से रहा."अपनी कमीज़ नीचे करती हुई नुसरत रुमाल से हाथ सॉफ करने लगी. उसकी साँसे उखड़ी हुई थी. रु

माल अर्जुन की तरफ बढ़ाया तो अर्जुन ने सिर्फ़ ऐसे ही उसको देखा. नुसरत खुद उसका लंड सॉफ करने लगी और धीरे से बोली, "मैं तो चाहती हूँ के तुम मुझे चाहे मज़े से मार दो लेकिन ये जगह तुम्हारा अजगर लेने के लिए ठीक नही. अगली बार पक्का मूह से भी करूँगी और कभी अलका के सामने कुछ कहूँगी भी नही. थॅंक यू."

एक बार मूह चूम कर वो खड़ी होने लगी तो अर्जुन का भी ध्यान गया की फिल्म ख़तम हो चुकी है. नुसरत ने चेहरे पर चुन्नी लपेटी और वो दोनो वहाँ से निकल चले. बाहर आ कर अर्जुन ने नुसरत को रिक्शा करा दिया और कॉलेज की तरफ स्कूटर बढ़ा दिया. 11:45 हो चुके थे.
 
पवित्र मिलन

कॉलेज के सामने पहूँचकर अर्जुन ने समय देखा तो अभी भी 5 मिनिट थे लेकिन लड़किया बाहर आ रही थी. कुछ ही देर मे सर पर दुपट्टा किए ऋतु दीदी भी अपनी सहेलियो के साथ आती दिखी. ऋतु दीदी ने हाथ हिलाकर दूर खड़े अपने भाई को अपनी तरफ बुला लिया.

"ये लड़के को तू कैसे जानती है ऋतु?" एक सहेली ने ये बात की तो ऋतु ने उसकी तरफ प्रश्न भरी नज़रो से देखा.

"मुझे तो ये कोई चालू लड़का लगता है. मीनाक्षी उस दिन यही था ना कॅंटीन मे जो अलका के साथ भी था?" उस लड़की ने एक और साथ खड़ी लड़की से कहा

"हा है तो वही लड़का लेकिन कुछ भी कह पसंद तो मुझे भी है वो." वो खिलखिला उठी और ऋतु हल्का हँसने लगी.

"तू क्यू हंस रही है?"

"देख मेरे और अलका मे कुछ भी अलग नही है." उनको चक्कर मे उलझा छोड़ वो स्कूटर पर बैठ गई और जाते जाते आँख मार गई.

"यार इनका सही है. दोनो एक ही लड़के के साथ." वो लड़की अपनी सहेली से बोलती हुई सदमे सी हालत मे थी.

.

.

"दीदी, बड़ा मुस्कुरा रही हो. क्या बात है?"

"कुछ नही रे बस सहेलियों के साथ मज़ाक की बात थी." ऋतु दीदी इतना बोलकर थोड़ा आगे खिसक के चिपक सी गई अर्जुन से. वो उसको भी नही बताना चाहती थी उसके और अलका के बीच की बात..

"तो कौन सी फिल्म देखी तूने?" ऋतु दीदी के इस सवाल ने अर्जुन को एक बार तो सोचने पर मजबूर कर दिया फिर उसने संभालते हुए कहा, "वो वही वीडियो गेम की दुकान थी तो मैं गेम ही खेलने लगा. टाइम देख कर यहा आ गया." अर्जुन झूठ नही बोलता था लेकिन ऐसी फिल्म का नाम भी अपनी दीदी के सामने नही लेना चाहता था.

"अच्छा किया. वैसे अब का क्या प्रोग्राम है तेरा?" अपने भाई की कमर पर हाथ फेरते हुए ही ऋतु दीदी ने पूछा.

"घर जा कर आराम करूँगा. फिर फल खाने के बाद स्टेडियम. वहाँ से आने के बाद जो आप बोलो."

"ठीक है तो फिर आज की शाम मेरे साथ. अगले 3 दिन तक पेपर नही है. और अलका का भी परसो ही है."

"जैसा आप कहो, दीदी. मैं तो खुद चाहता हूँ आपके साथ और आसपास रहना."

अर्जुन की बात सुनकर ऋतु मुस्कुरा दी.

"क्यो रहना चाहता है मेरे पास?" शरारत से ये बात कही तो अर्जुन ने वैसे ही कहा, "अब आप हो ही इतनी खूबसूरत के दिल करता है आपको साथ मे ही रखू. कही जाने ना डू दूर आपको."

अर्जुन की बात सुनकर ऋतु दीदी ने उसकी गर्दन चूम ली पीछे से और फिर सीधी हो कर बैठ गई. ऐसे ही दोनो घर आ गये.

.

.//////////////////////////////////////////////////////

"तो जनाब का कार्यक्रम व्यस्त ही है छुट्टियों मे?" ये कॉल साहब थे जो आँगन मे रामेश्वर जी के साथ बैठे थे.

"ऐसा कुछ नही छोटे दादू. वो आज दीदी का पेपर था तो साथ गया था. स्कूटी नही आती ना उन्हे." आँगन मे बैठते हुए ही कहा

"प्रीति बेटा." उन्होने आवाज़ दी तो अंदर से प्रीति दौड़ती हुई सी आई. उसके हाथ मे कुछ लगा था शायद आटा.

"ऋतु को तुम सुबह स्कूटी सीखा दिया करो. सड़क तो हमारे घर के सामने खालीही होती है. जब हाथ बेहतर हो जाए तो पिछले ग्राउंड चले जाना. साइकल तो आती ही है उसको. ये लड़का अपना समय ऐसे कामो मे लगाएगा तो काम नही बनेगा. आराम भी देना है थोड़ा इसको."

"जी दादू. कल से सुबह मैं सीखा दिया करूँगी." इतना बोलकर वो वापिस अंदर चली गई.

"ले मेरे बच्चे. अब बता और क्या आराम दिया जाए?"

"और मुझे क्या आराम करके करना है?" अर्जुन ने इतना कहा तो अब रामेश्वर जी ने एक कार्ड उसके सामने कर दिया. "यूनिवर्सिटी लाइब्ररी कार्ड"

"ये तुम्हारा अगला ठिकाना है बेटा. सुबह 9:30 से 12 तक. और ये यही सामने ही तो है सेक्टर के. मुश्किल से 2 किमी. सब्जेक्ट्स की लिस्ट तुम्हे गुरुवार को दूँगा. 2 दिन कर लो आराम." कॉल साहब ने इतना कहा तो अर्जुन को उनकी मेहरबानी की वजह समझ आ गई.

"देखो जब समय है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए. फिर तुम्हे आगे पढ़ाई मे दिक्कत नही आएगी. जिस सब्जेक्ट पर पकड़ अच्छी बनेगी वही ले लेना. और शंकर से मैं बात कर लूँगा. तुम्हे सिर्फ़ दिए गये सब्जेक्ट्स मे से जो पसंद आए वही ग्यहरह कक्षा मे लेना. " कॉल साहब ने बड़े प्यार से समझाया.

"हंजी. मैं तयार हूँ." अर्जुन ने भी सकरातमक जवाब दिया.

"चल फिर जा कर आराम कर और फिर स्टेडियम भी जाना है." रामेश्वर जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा.

.

./////////////////////////////////////////////////
 
रसोईघर का तो नज़ारा ही आज अलग था. कौशल्या जी सब्जी चला रही थी और प्रीति रोटिया बैल भी रही थी और सेक भी. एक कढ़ाई प्लेट से ढँकी रखी थी साइड मे. प्रीति के गोरे चेहरे पर पसीना आया हुआ था जो उसकी मेहनत बता रहा था. बीच बीच मे दादीजी आते के गोले बना कर उसको दे रही थी.

"ये आपने सही किया दादी जी. एक कामवाली की सख़्त ज़रूरत थी घर मे." ऋतु दीदी ने व्यंग कसा तो प्रीति सिर्फ़ मुस्कुरा दी पलट कर.

"बेटा तू तेरी फिकर कर. कम से का ये काम तो सीख रही है तू क्या खिलाएगी अपने पति को?" उनकी बात सुनकर प्रीति के हाथ अपनी जगह रुक गये. और ये बात ऋतु दीदी ने भी देख ली.

"जो ये खिला देगी मैं भी वही खिला दूँगी." इतना कह कर ऋतु भी प्रीति के पास बैठ गई और दादी वहाँ से खड़ी हो गई रामेश्वर जी और पूरी जी को बुलाने के लिए. वो दोनो अंदर आए तो माधुरी दीदी टेबल पर प्लेट्स लगाने लगी और कोमल दीदी खाना परोसने लगी.

"अर्रे मेरी बच्चियाँ इतनी बड़ी कब हो गई." कॉल साहब ने दोनो की तरफ देखा जहा प्रीति रोटी सेक रही थी और ऋतु दीदी बेल रही थी.

"भाई साहब इनको कुछ काम करने दो अगले घर पता नही क्या गुल खिलाएँगी. "

कौशल्या जी की बात सुनकर कॉल साहब रामेश्वर जी की और देख मुस्कुरा दिए और वो भी हँसने लगे. इनकी बातें येही जाने. फिर ऐसे ही सबने खाना खाया और अंत मे प्रीति जब उठी तो पूरी भीग चुकी थी.

"चल बेटा तुम दोनो भी खाना खा लो. और उस नवाब को भी कोई बुला लाओ. दिन मे ही सोता रहता है."

"मैं बुला लाती हूँ दादीजी." प्रीति बिना सुने खुद उपर चढ़ गई दूसरी मज़िल पर. और देखा तो अर्जुन तकिये को बाहों मे लिए सोया पड़ा था.

"उठो और खाना खा लो. सब बुला रहे है." प्रीति पास बैठ कर जगाते हुए बोली तो अर्जुन ने नज़र उठाई और फिर उसको खींच लिया अपने ही उपर. "अच्छा तो फिर खिला दो." बड़ी मासूम श्कल बना कर उसने प्रीति को अपने उपर लिटाए हुए ही कहा.

"ऐसे कैसे खिला दूं? नीचे चलो और हिम्मत हो तो वहाँ कह देना फिर मैं भी खिला दूँगी." प्रीति ने इतराते हुए कहा तो अर्जुन ने प्रीति को थोड़ा झुका कर उसके लाल होंठ मूह मे ले लिए. कोई 10 सेकेंड बाद छोड़ा तो वो छाती पे हल्के से मारते हुए जाने लगी.

"सुनो. वो ये सब सिर्फ़ तुम्हारी महक की वजह से हुआ था. सोचा थोड़ी खुद पे लगा लू."

"धत्त. पागल कही के."

कुछ देर बाद अर्जुन नीचे आया तो ऋतु, अलका और माधुरी दीदी के साथ प्रीति खाना खाने लगी थी. कोमल दीदी खा चुकी थी.

"मुझे कोंन खिलाएगा?" अर्जुन की बात का इशारा समझ प्रीति तो मूह नीचे कर बैठ गई. अलका दीदी ने रोटी का टुकड़ा बनाया और हाथो से अर्जुन को खिलाया.

"अर्रे मैं हूँ ना. ऐसे ही खिलाउन्गी सारी उमर तू बोल बस." उनकी द्वियर्थी बात सुनकर ऋतु दीदी भी

प्रीति को कोहनी मारने लगी. माधुरी दीदी खाली प्लेट लेकर चली गई तब ऋतु दीदी बोली, "वैसे जिसने रोटी बनाई हो एक बार उसको भी मौका देना चाहिए"

"हा हा. क्यो नही." अर्जुन ने ये बात कही तो ऋतु दीदी अपनी जगह से उठ कर एक नीवाला अर्जुन को खिलाने लगी.

"रोटी मैने बनाई थी." प्रीति ने शरमाते हुए कहा.

"हा तो मैने तो पहले ही कहा था कि जिसने बनाई है वो भी खिला सकता है. मैने कब कहा के मैने बनाई है." अलका और ऋतु हँसने लगी.

शरमात हुए एक नीवाला प्रीति ने अपनी प्लेट से अर्जुन के मूह की तरफ बढ़ाया.

"ऐसे कोंन खिलाता है? मूह मे डाल न इसके"

अलका दीदी की बात सुनकर प्रीति ने डरते हुए नीवाला आगे किया लेकिन अर्जुन ने सिर्फ़ नीवाला खाया. वो प्रीति को सबके सामने आराम से खाने देना चाहता था.

"देख लिया. क्या हुआ?" फिर हंसते हुए सबने खाना खाया.

अर्जुन ने अलग से नही खाया था. बस 4-5 नीवाले खा कर वो उठ गया. "अच्छा अब तयार होता हूँ. आप लोग अपना काम कीजिए फिर शाम को मिलूँगा." तयार होकर अपने फलो की प्लेट खाने के बाद वो कुछ ही देर बाद स्टेडियम निकल चला.

……………………………..
 
"जिम से सीधा मेरे पास आना." कोच ने बलबीर के साथ जाते अर्जुन से कहा.

आज स्टेडियम मे बड़ी रौनक सी थी. शायद कोई प्रतियोगिता चल रही थी वहाँ.

दोनो जिम की तरफ चलने लगे तो बलबीर ने कहा, "आज बास्केटबाल के फाइनल्स चल रहे है. कुछ देर तक परिणाम आ जाएगा. जिम तो खाली मिलेगी.."

"अच्छी बात है ना भैया. आराम से कसरत करेंगे." अर्जुन की बात से बलबीर थोड़ा मायूस था. और हुआ भी कुछ ऐसा ही. मॅच तो लड़कियों के थे लेकिन यहा तो लड़के भी नही थे.

"ये क्या ये तो बिल्कुल खाली ही है." अर्जुन ने कहा तो बलबीर बोलही पड़ा. "भाई कोच साहब का बस चले तो हमारे आगे धागा ही बाँध दे. देख सब खेलो के विभाग आज छुट्टी पर है सिवाए बॉक्सिंग के." बलबीर की बात से अर्जुन को भी ध्यान आया के प्रीति भी तो नही आई.

दोनो ही कसरत करने लगे. आज वो भुजाओ (बाइसेप्स) की वर्ज़िश भी कर रहे थे. बलबीर कहने को पतला था लेकिन बाजू पर मछलिया पूरी निकलती थी.

"ये मेरे कब आएँगी ऐसी हे?"

"तेरे है तो सही भाई, लेकिन साइज़ ज़्यादा है तेरा तो थोड़ा टाइम लगेगा निखार आने मे. तब देखना यहा अपने विभाग मे सबसे बड़े डोले तेरे ही होंगे."

ऐसे ही दोनो पसीना बहाते रहे. कुछ देर बाद दोनो वापिस अपने मैदान मे थे.

"बलबीर, चलते हुए अभ्यास किया था ना तुमने?"

"जी कोच साहब कर चुका हूँ कोई 20-25 बार तो." उसकी आवाज़ से नाराज़गी झलक रही थी. कोच साहब भी भाँप गये.

"अच्छा तो आज तुमने ये पूरी पट्टी का एक चक्कर करना है फिर तुम दोनो आज़ाद आज के लिए."

इतना सुनते ही वो चहक उठा. उसने फिर अर्जुन को समझाया की कैसे चलते हुए ही पोज़िशन बदल बदल कर पॅंच करना है और लगातार चलना है. कही भी मुक्का धीमा या दिशाहीन नही जाना चाहिए. करके दिखाने के बाद दोनो स्टेडियम के किनारे बनी पट्टी पर अभ्यास करते चलने लगे. अर्जुन को इसमे मज़ा आ रहा था. उसके उलट बलबीर सिर्फ़ आधे मन से कर रहा था.

दोनो दूर निकल आए तो बलबीर बस ऐसे ही कर रहा था और इधर उधर देख रहा था. जैसे ही बॅस्केटबॉल के ग्राउंड के पास आए तो वहाँ बहुत सारी लड़किया और उनकी राज्यस्तरिय टीम के प्रतिनिधि आए हुए थे. सभी छोटी स्कर्ट और टाइट टीशर्ट मे अपने नंबर के हिसाब से प्रदर्शन दिखा रही थी.

अर्जुन सबसे बेख़बर बस हवा मे मुक्के चलाता, पैरो के तालमेल को ध्यान मे रखता किसी कुशल नर्तक की तरह चला जा रहा था. बलबीर कहाँ रह गया कुछ पताही नही था. लेकिन कोच साहब तो दूर से ही उसको देख कर मुस्कुरा रहे थे. "बलबीर तू 2 साल से है यहा और ये लड़का आज ही तेरे से आगे चल दिया. सही बात है शेर का बच्चा शेर और गीदड़ का गीदड़ ही रहेगा." अपने आप से कहते वो एक बार फिर अर्जुन को निहार कर पार्किंग से अपना स्कूटर ले चल दिए.

"भाई चल अब वहाँ चलते है." पीछे से लगभग भागता हुआ अर्जुन तक आया जो अब बस खड़ा साँस ले रहा था. बलबीर की बात मानते हुए वो उस तरफ चल दिया.

"कम ओंन मंजू 3 पैतरा दिखा तेरा." कोर्ट के बाहर से ही मंजुला की सहेलिया उसके नारे लगा रही थी. वो 6 फीट की लड़की भी कमाल ही खेलती थी

और आज भी ऐसा ही दिखा रही थी. फाइनल इम्तिहान मे 3 थ्रो हर लड़की को मिलने थे हरयाणा राज्य की टीम के सेलेक्षन मे और 5 लड़कियों मे से 2 ही सेलेक्ट होने वाली थी. सभी टक्कर की थी लेकिन 3 लड़किया अपने 2 थ्रो मे से 2 बास्केट डाल कर आगे थी बाकी 2 के सिर्फ़ एक ही डले थे. उन तीनो मे से एक का चूक गया क्योंकि अब दूरी भी बढ़ा दी गई थी जाली से खिलाड़ी की.

यही समय था जब बलबीर जैसे लड़के उनके जांघे निहार रहे थे और अर्जुन अपनी जगह से उठ कर चिल्ला दिया. ब्रेत, फोकस आंड शूट.. यू कॅन डू इट."

बॉल हाथ मे लिए मंजुला ने एक बार अपने इस नये प्रशनशक की तरफ देखा और मुस्कुराकर नज़र नीचे कर ली. आँखे बंद, खोली, निशाना साधा और सीधा जाली के अंदर. ये तो उसने भी नही सोचा था. ख़ुसी से उछल ही पड़ी वो. उसके बाद वाली लड़की ने ये मौका छोड़ दिया और मंजुला सर्वॉच अंक लेकर पहले स्थान पर रही. उसके साथ की दोनो लड़कियो को एक एक बार और चान्स मिला क्योंकि उनके अंक बराबर थे. लेकिन मंजुला वहाँ अपना नाम लिस्ट मे देखने के बाद बाहर निकल आई. कुछ देर बाद उसने कपड़े बदल लिए थे और अब वो चेहरा सॉफ करके दूर से अर्जुन को देख रही थी जो सिर्फ़ वहाँ बलबीर की वजह से बैठा था.

पानी पीने का बोलकर अर्जुन जान छुड़ा कर निकला वहाँ से. उसकी बॉटल बॉक्सिंग के मैदान मे थी.

"रुक तो सही ज़रा. कहा भगा जा रहा तू." पीछे से आती मंजुला को देख अर्जुन ने चाल बिल्कुल धीमी कर दी.

"बड़ा जोश है तेरे मे तो. मैं तो सोच रही थी तू बस सूखा पटाखा है. सबके सामने ही मंजू बोलने लगा." वो बोल तो रही थी जैसे वो अर्जुन को डांटना चाहती हो लेकिन आज उसके शब्द साथ नही दे रहे थे.

"वो क्या है ना मैं ज़्यादा घुमा फिरा के बात नही करता. आप एक अच्छी खिलाड़ी होने के साथ साथ एक अच्छी लड़की भी है. आपकी शुरुआत की डाँट मे नसीहत थी, मैने मान ली. लेकिन दोनो है तो यही एक ही स्टेडियम मे. फिर क्या गुस्सा और क्या नाराज़गी." अर्जुन ने ये बात बड़े आराम से कह दी और उस लड़की के पास कोई जवाब नही था.

"वो फिरंगी कोंन है? उसके साथ तू बाहर भी बात करता जा रहा था." मंजुला थोड़ा जज्बाती होकर बोली.

"दोस्त है मेरी, बचपन की 4 साल की उमर से साथ ही खेले है. घर भी साथ मे है." अर्जुन ने ये बात कही तो मंजुला कुछ देर सोचती रही फिर बोली, "इतना सॉफ दिल का होना भी नुकसान है यार."

अपनी पानी की बॉटल लेकर पहले उसने मंजू को पूछा तो उसने उपर से एक घूँट ली. कुछ पानी उसकी टीशर्ट के बीच की लाइन मे गिरा और कुछ ठोडी बूँद सी बन गया. उसकी तरफ देखते हुए अर्जुन ने एक घूँट ली.

"हॉस्टिल मे हो?"

"हाँ यार अब मेरे शहर से तो रोज आ जा नि सकती तो यही कॉलेज है और यही हॉस्टिल."

कही कोई नज़र नही आ रहा था. 5:30 पर ही स्टेडियम का ये भाग वीरान था. दोनो एक सीढी पर बैठे ऐसी ही बातें कर रहे थे की बॉटल का ढक्कन घुमाते हुए अर्जुन से वो छूट गया.

"संभाल के." कहती हुई मंजुला जाकर उस ढक्कन को उठाने लगी तो उसकी वी -शेप टी शर्ट से उसके उभार अंदर

तक अर्जुन को नुमाया हो गये. किसी टेन्निस बाल जीतने बड़े और एकदम सख़्त जान वो उभार आधे कप की टाइट ब्रा मे क़ैद थे. अपनी तरफ उसको यू देखता पा जब मंजू ने अपनी गर्दन से नीचे झाँका तो झत्ट सीधी हो गई.

"बता नही सकता था क्या?" उसने शरम और हल्के गुस्से से कहा. चेहरा भी लाल हो गया था.

"अगर बताता तो पक्का मार ख़ाता. क्या कहता?" अर्जुन ने हल्का मुस्कुरा कर कहा तो वो भी हल्के से मुस्कुरा दी.

"फिर भी देखना नही चाहिए था. ऐसी शिक्षा दी घर वालो ने." हल्का प्यार से झाड़ते हुए उसने बोला.

"घर वालो ने तो कहा के अच्छी चीज़ेही देखो. अब बताओ के वो क्या बुरे थे?" अर्जुन आज जैसे हाजिर जवाब हो रहा था वैसा तो वो कभी भी ना था.

"मुझे क्या पता." मंजू को कुछ ना सूझा तो कंधे उचका कर बस यही कहा.

"फिर आइन्दा मत कहना क्यो देख रहा था." उसने खड़े होते हुए कहा तो

वो हैरानी से उसकी तरफ देखने लगी जैसे बोल रही हो के नाराज़ हो गया क्या.

"अर्रे टांगे सीधी कर रहा हूँ. और मुझे जवाब नही मिला." अर्जुन की बात सुनकर मंजुला ने प्यार से उसका हाथ पकड़ अपने साथ बिठा लिया. "अर्रे हो चिकने घड़े. मैं यही बैठी हूँ देख. बुरा लगता तो जाने से पहले कान लाल करके जाती तेरा. कइयों के करे है मैने पूछ लिओ स्टेडियम मे किसी से भी. तू उन जैसा नही है. और जो तू इतनी देर से ये सब बोल रहा है मुझे भी पता है क्यो बोल रहा है. मैं अपना ध्यान सारा दिन की मेहनत से हटा के हल्की हो जाऊ." और अर्जुन की बाह उसने कस के थाम ली.

"मतलब अब तुम्हे भी पता चल गया मैं क्यो कर रहा था ये सब?" वो हैरान हो गया ये सुनकर. उसने सुना था कि खिलाड़ी की थकान किसी सर्प्राइज़ से ठीक की जा सकती है. जो उसके खेल से उलट हो और आरामदायक. वो बस मंजुला का मन और शरीर शांत कर रहा था.

"बेटा तू जहा अभी अड्मिशन लेके भरती हुआ है वहाँ की 4 साल सीनियर हूँ मैं. लेकिन तेरा तरीका अच्छा लगा मुझे. थोड़ी देर बैठ जा मेरे पास भी."

और वो बिल्कुल सट के बैठ गई थी अर्जुन से.

"अब ये जो मेरे हाथ को छू रहे है इनका क्या करू.?"

उसकी बात पर मंजू ने उसकी बाह अपनी तरफ खींची और यही ग़लती हो गई. बेध्यानी मे सीधा अर्जुन के होंठ उसके मूह से आ लगे. मंजुला अर्जुन से 2 साल बड़ी ज़रूर थी, मस्ती भी करती थी लेकिन इस सख़्त मिज़ाज हसीना के होंठो पर ये पहला अनुभव था. उपर से अर्जुन का तगड़ा शरीर उसके उपर ही आ गिरा. अपने आप ही मंजू की आँखे बंद और होंठ खुल गये. अर्जुन खुद को रोक सकता था लेकिन मंजू के अंदर एक तड़प थी जो वो चाह के भी उस से अलग ना हुआ. मंजुला को चूमना तो आता नही था लेकिन जब अर्जुन ने उसके होंठो पर अपनी कलाकारी दिखाई तो उसकी जीभ खुदसे ही अर्जुन के मूह मे समा गई. हाथ अर्जुन के सर पर, अलग ना हो पाए.
 
एक हाथ संभालने को अर्जुन ने जहा रखा वहाँ उसकी मुलायम और मांसल जाँघ थी. उन्माद मे खोने के लिए ये पल ही बहुत था.

"हा. ये क्या किया तूने." अपनी साँस संभालती मंजुला ने आश्चर्य से अर्जुन को देखा. वो मुस्कुरा रहा था. मंजुला खुद ही उसका एक हाथ अपनी छाती पर दबाए थी और उसकी एक बॉल अर्जुन के हाथो मे थी, बिल्कुल कसी सी. धीरे से हाथ अलग किया तो मंजू ने उठते ही एक चाँटा जड़ दिया अर्जुन के गाल पर और बिना पलट के देखे गायब हो गई.

"सब काम खुद किया. रोक भी रहा था तो खुद से ही अपनी छाती पकड़ा दी.. और जाते जाते इनाम भी करारा दे गई." अर्जुन बिना किसी भाव के वहाँ से उठ कर साइकल स्टॅंड की तरफ चल दिया. मंजुला अपनी सहेली को वहाँ से खींचती ले जा रही थी, जिसको भनक भी नही थी के क्या हुआ है आज.

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

दादाजी कही बाहर गये थे काम से और दादीजी भी मल्होत्रा जी के घर थी, शादी के बाद हालचाल लेने. 6 बजे से कुछ ही उपर समय था जब अर्जुन घर आया.

"मा, कहा हो?" उसने आवाज़ दी आँगन मे से ही .

उसकी आवाज़ सुनकर ऋतुही बाहर आई. "मा और ताई जी पड़ोस मे गये है. उनके बेटी हुई थी तो जागरण रखा है उन्होने. क्या काम था?"

"वो दूध.." उसने इतना ही कहा था कि ध्यान ऋतु दीदी की टीशर्ट की तरफ चला गया. शायद जल्दबाज़ी मे ब्रा पहनते टाइम एक कप पूरा उपर नही हुआ था और निपल टीशर्ट से उभर कर बाहर नज़र आ रहा था. ऋतु दीदी ने शरमाते हुए पीठ पलट कर बस एक तनी को सेट किया तो वो ठीक हो गया.

"तू बैठ मैं देती हूँ तुझे." वो चुपचाप मुस्कुराती हुई चूल्हे पर दूध गरम करने लगी.

"माधुरी और कोमल दीदी भी नही दिख रही" अर्जुन ने वही से कहा.

"वो दोनो, अलका और प्रीति सब दादाजी के साथ कॅंटीन गये है. वो कॉल अंकल ने कुछ समान लेना था तो ये सब भी चले गये."

"आप नही गई?" अर्जुन ने वैसे ही पूछा.

"हमारी कोई बात तय हुई थी अगर याद हो तो." शरमाती सी ऋतु दीदी दूध का गिलास लेकर जैसे ही अर्जुन के सामने रखने लगी तो अर्जुन ने हाथ पकड़ कर उन्हे अपनी गोद मे बिठा लिया.

"याद है तभी तो सबके बारे मे पूछ रहा था. मैं भी चाहता था कि आप फिर मुझे ना डाँटो के जगा तो देख लिया कर." उसने अपनी गोद मे शरमाती दीदी का चेहरा उपर करते हुए कॉलेज जाते समय की बात याद दिलाई.

"वो तो अभी भी है." हंसते हुए ऋतु दीदी ने बस इतना कहा था कि अर्जुन उन्हे वैसे ही बाहो मे ले खड़ा हो गया. "एक ऐसी जगह जहा आप ये ना कहो के कोई है, चलो खुद ही ले चलता हूँ." ऋतु दीदी के कुछ समझने से पहले ही वो उनकी टांगे अपनी कमर मे लपेटे और सीने से चिपकाए दूसरी मंज़िल पर चढ़ लिया. ऋतु दीदी ने अपना सर बस उसके कंधे पर टीका लिया था. संजीव भैया के बिस्तर पर लिटा कर खुद उनके उपर झुक सा गया वो.

"कभी कभी लगता है की कमरा बदल लू अपना. फिर सोचता हूँ अलका दीदी को भी नही निकाल सकता वहाँ से और तीनो को तो घरवाले रहने नही देंगे साथ."

उसकी बात गोर से सुन रही थी ऋतु दीदी. फिर आराम से उसने दीदी के माथे को चूमा और फिर उनकी बंद पॅल्को को. खुद बिस्तर मे उनकी बगल मे जा लेटा.

"इधर देखो ना दीदी." उसने इतना कहा तो दोनो भाई बेहन एक तरफ मूह कर के आँखों मे देख रहे थे. प्यार से अर्जुन ने दीदी के कान के पीछे उंगलिया फिराई और फिर आँखो के सामने आते उनके भूरे बाल भी पीछे कर दिए. "पता है जब आपके साथ होता हूँ तो ऐसा लगता है दिल तो यहा है लेकिन धड़कन आपकी तरफ से सुनाई देती है." और उनको अपने उपर ले लिया जहा अब दीदी का चेहरा ठीक उसके दिल पर टीका था.

"मेरी धड़कन तो तू ही है मेरे भाई." अब सबकुछ भुला कर ऋतु दीदी उसके चेहरे के हर हिस्से को चूमने लगी थी. जहा से वापिस छाती की तरफ आते हुए वो एक बार रुकी फिर उसकी टी शर्ट खींच कर अलग कर दी. अपने भाई की छाती के छोटे निपल जीभ सहलाते हुए बोली, "पता है तेरे साथ मुझे ऐसा लगता है की ये सब मैं खुद हूँ. जैसे सिर्फ़ 2 अलग शरीर और उनका मालिक एक ही है. मेरी हर साँस तेरी है अर्जुन और मैं चाहती हूँ तू इसपर अपनी निशानी लगा दे. मुझे आज रात इतना प्यार करे की फिर मेरी आत्मा से भी तेरे जिस्म की महक आने लगे. तभी ये 2 जिस्म एक होंगे. करेगा ना बोल?" एक बार फिर उसके होंठ चूम दोनो छातियो को मुट्ठी मे कस्ती वो एक अलगही दुनिया मे थी.

अर्जुन उसके साथ ही था. "आपको मैं दर्द नही देना चाहता हूँ. कभी भी नही तो फिर ये कैसे करू? मैं चाहता हूँ के आपको अपने मे समा लू. लेकिन बिना दर्द दिए मुमकिन नही है." अर्जुन अपनी खुली छाती से लिपटाए ऋतु दीदी की पीठ सहला रहा था.

"मैं रात को यहा आउन्गी. अगर तू चाहता है की मेरी ख्वाहिश पूरी हो तो वही करेगा. नही तो फिर मैं कभी तेरे पास नही आउन्गी. मुझे सब दर्द मजबूर है. लेकिन हर हाल मे एक बार मैं खुद तुझमे समाना चाहती हूँ."

ऋतु दीदी ने एक बार फिर खड़े हो कर उसके दोनो होंठ चूमे और बाहर निकल गई. अर्जुन वही लेटा कुछ सोचता रहा और 8 बजे नीचे चला आया. अब तक घर के सब लोग आ चुके थे. कर्नल पुरी और प्रीति घर चले गये थे. अलका दीदी कॅंटीन से लिया समान बड़े चाव से सबको दिखा रही थी और दादाजी और दादीजी खाना खा रहे थे. माधुरी दीदी ने आँखों से कुछ इशारा किया भी अर्जुन को लेकिन उसने ऐसे दिखाया जैसे वो बहुत थका हुआ हो.

कोशिश तो ललिता जी की भी थी उन्होने पूछा भी, "अर्जुन, आज तेरे भैया और ताऊ जी भी नही है तो तू नीचे सो जाना."

रेखा जी ने भी उनका पक्ष लेते हुए ही कहा की वो उनके कमरे मे भी सो सकता है.

"मा, वो आज थोड़ा ज़्यादा थक गया हूँ तो संजीव भैया के कमरे मे ही आराम करूँगा. और जल्दी आप खाना लगा दीजिए."

माधुरी दीदी और ललिता जी थोड़ा उदास हो गये लेकिन फिर उसकी बात समझ कर दोनो ने संतोष कर लिया. खाने के कुछ देर बाद तक सब सॉफ सफाई मे लगे थे और अलका भी अर्जुन के साथ बैठी यहा वहाँ की बातें कर रही थी. उसने कॅंटीन मे आज क्या क्या देखा, वहाँ कितना कुछ था और हर तरह के ब्रॅंड्स पर कितना डिसकाउंट मिल रहा था. लेकिन इस बीच ऋतु दीदी कही दिखाई ना दी. फिर अर्जुन भी दूध पीने के बाद उपर आ गया.

ड्रॉयिंग रूम मे टहलने के बाद बाथरूम मे घुस कर अच्छे से नहाया और सॉफ कपड़े पहन कर टेलीविजन चला कर सोफे पर ही लेट सा गया. शायद उसकी आँख भी लग गई थी. फिर दरवाजा खुला और ड्रॉयिंग रूम का दरवाजा अंदर से बंद हो गया. लाइट ऑफ और टेलीविजन भी बंद संजीव भैया के कमरे मे अब छोटा बल्ब जल रहा था जो नीले रंग की रोशनी दे रहा था.

"अर्जुन चल उठ और अंदर आजा." ऋतु दीदी ने उसके हिलाया और फिर अंदर चली गई. अर्जुन उठने के बाद एक बार फिर बाथरूम गया दाँत और मूह सॉफ किए और भैया के कमरे मे आ गया.

प्यार. अगर दिल और धड़कन एक हो जाए तो दिल मे जान आ जाती है. ऐसा ही तो सच्चा प्यार होता है. जहा ऐसे ही दो दिल मिलन करते है तो वो शारीरिक मिलन से कही परे एक अद्भुत आत्मं मिलन हो जाता है. यहा, समय, काम, वासना, दर्द कुछ महसूस नही होता. ऐसा मिलन सुख, परमसुख, अनुभूति, से होता हुआ एक दिव्यसागर तक पहुच जाता है. जिसका कोई तल नही होता और कोई सतह नही होती. परिपूर्णता का अहसाश होना तो प्रकाष्ठा है सच्चे प्यार की"

"यहा मेरी आवाज़ की तरफ." जैसे ही अर्जुन ने कमरे के अंदर कदम लिया बिस्तर के पासही ऋतु दीदी का अक्स खड़ा दिखा. उनकी बाहें फैली हुई थी और अर्जुन चलता हुआ उनके पास जा खड़ा हुआ. हल्के प्रकाश मे वो इस दुनिया से परे की कोई राजकुमारी सी थी. तंन पर सिर्फ़ एक कपड़ा था. जो घुटनो तक आ रहा था.

बाल खुले हुए महक रहे थे. जिस्म से आती खुसबु मे अर्जुन उनसे ऐसे जा लिपटा जैसे कोई सर्प चंदन के वृक्ष से लिपट जाता है. उनका समय यही रुक गया

इस पतली सी कपड़े की परत के नीचे कुछ भी ना था. और अर्जुन के शरीर पर भी सिर्फ़ एक ही वस्त्र था. उपर से सीना बिल्कुल ही सॉफ. उसकी बाहो मे सुख की साँस लेती ऋतु धीमे धीमे से उसके होंठो को चूमती छोड़ती फिर चूमती जैसे अठखेलिया सी कर रही थी. अपनी बाजुओ से उनकी दोनो जंघे पकड़ अर्जुन ने उन्हे उपर उठा लिया. कमर के गिर्द टाँगे लपेटे हुए उनके होंठ बस किसी संतरे की फांको से आपस मे जुड़े थे. कोई जल्दबाज़ी नही थी दोनो मे. पीठ पर सरकते ऋतु के हाथ अर्जुन के रोए खड़े किए जा रहे थे. वहाँ से उनको उठाए हुए ही अर्जुन ने बिस्तर के सीरे पर टाँगे रखते उनका बाकी हिस्सा बिस्तर पर बिछा दिया.
 
"अर्जुन, मैं चाहती हूँ के आज कोई रोक-टोक ना हो. जैसा तू चाहे और जैसा मैं चाहूँ." ऋतु दीदी के इतना बोलते ही अर्जुन ने उनकी पतली गर्दन को चूमना शुरू कर दिया. उसके हाथ उनकी जाँघो पर हुनर दिखा रहे थे. लंबी सुडोल टाँगो की त्वचा किसी शीशे से चिकनी थी जिनपर अर्जुन के हाथ रेंग रहे थे.

होंठ नीचे आए तो उस कपड़े के उपर से ही उसने सिर्फ़ ऋतु दीदी का निपल मूह मे हल्के से लेना शुरू कर दिया. आज तो वो भी अपनी औकात पे था. तना हुआ और बाहर को निकला. दोनो हाथ कमर को नाप रहे थे और मूह बारी बारी से उनके चुचक चूस रहा था. अर्जुन का सर अपने दोनो हाथो मे थामे ऋतु तो बस इस नशे से बाहर ही नही आना चाहती थी. अर्जुन अब उनके उरोज छोड़ कर अपनी जीब उनके पेट पर लाता नाभि पर रुक गया. मुलायम सा वो एक गुदाज छोटा सा गड्ढा इतना उत्तेजित कर गया ऋतु की कमर धनुष की तरह उपर हवा मे उठ गई जहा पाव अर्जुन के पैरो मे उलझे थे.

"आ अर्जुन देख कोई जगह ना बचे जहा तेरा नाम तेरा स्पर्श मेरे रोम रोम पर बाकी रह जाए.

अपनी बेहन, अपने प्यार की बात का आदर करते उसे होंठ उस कपड़े की सतह के उपर से ही पूरा पेट चूमकर जाँघो के जोड़ तक आ पहुचे. ऋतु तो शायद एक बार सोच भी लेती की यहा रुक जाना चाहिए लेकिन अर्जुन बस हर जगह अपनी छाप लगाने मे जुटा था. उस मखमली भाग पर उसके लब टकराए तो मज़े से ऋतु की आँखें बंद हो गई और गर्दन एक तरफ हो गई. उसका छोटा भाई उसके कौमार्य के उपर होंठो से प्यार कर रहा था.

अर्जुन ने सब भूलकर इतना प्यार दिया उन फूले हुए होंठो की वहाँ से भी बरसात हो गई. नीचे आते हुए दोनो जाँघो को अपनी जीभ और होंठ से प्यार करते अर्जुन ने उन दूध से सॉफ पैरो की उंगलियों को मूह मे भर लिया. हर उंगली का नमक पीता वो एक बार फिर से पूरा अपनी बड़ी बेहन की देह पर लेट गया.

"आपका सर्वस्व मेरा है मेरा आपका." इतना बोलकर उसने उन्हे पलटा दिया और फिर वही क्रिया शुरू कर दी. लेकिन शरीर से वो एक मात्र कपड़ा भी अब बिस्तर पर बेजार सा पड़ा था. ऋतु की चिकनी नंगी पीठ चूमता हुआ अर्जुन उसके हर हिस्से को जैसे जगा सा रहा था. एक मधुर मिलन से पहले जैसे समस्त शक्तिया जगाने की रसम सी थी. कुल्हो को अपने हाथो मे थाम उसने हर जगह होंठो की दबिश दी.

ऋतु ने बाजुओ से अर्जुन को पकड़ कर अपनी जगह लिटा दिया और उसके उपर खुद वही दोहराने लगी जो सब उसने किया था. अर्जुन के भी मूह से गहरी सीत्कार निकल गई जब उसकी छाती के निपल ऋतु ने चुभले. ऋतु के उरोज अब सख़्त हो चुके थे और जहा भी वो अर्जुन के शरीर से रगड़ खाती, दोनो को ही अलग सा मज़ा आ जाता.

पाजामा अब ज़मीन पर था और उन नाज़ुक गोरे हाथो मे विशाल लंड, ऋतु को उस से ज़रा भी डर नही लग रहा था. ऐसे ही थामे उसने अगले हिस्से को प्यार से चूमा और पूरे लंड पर जीभ चलाती गई. सुपाडा इतना फूल चुका था की अर्जुन ने भी इतना खून का प्रवाह अपने लंड मे पहले ना किया होगा.

"भाई, मेरे उपर आजा." वो ख़यालो मे ही था जब ऋतु दीदी ने एक सफेद कोरी चादर बिस्तर की चादर पर डाल दी और खुद जनम सी हालत मे उस पर लेट गई.

"दीदी, आप जहा बोलॉगी मैं रुक जाउन्गा. बस हिम्मत रखना."

"मेरी हिम्मत तू ही तो है."

अर्जुन ने दोनो हाथो से उनके गाल पकड़े और उपर आते हुए होंठो को पीने लगा. अब उसका निचला भाग ऋतु दीदी की टाँगो को चौड़ा कर उनपर पड़ा था.

एक चुचे को हाथ मे पकड़ दबाते हुए अर्जुन ने चूसना शुरू किया. "सीईइ.. आ अर्जुन. इन्हे काट ले.. " मज़े से दोहरी होती ऋतु ने अपने हाथो से ही दूसरा दबाना सुरू कर दिया.

अर्जुन को उनमे से कोई अमृत का स्वाद आ रहा था. 10 मिनिट तक दोनो पीने के बाद उसने बेड की दराज से एक ट्यूब निकाली और दो उंगलियो से ऋतु दीदी की चूत पर मलने लगा, ऋतु दीदी को तो ये पता भी ना था कि अर्जुन कुछ ऐसा करेगा." उसकी उंगली का पोरा भी दीदी की चूत मे जलन दे रहा था लेकिन वो बस मज़े मे सिसकती रही.. कुछ देर तक अच्छे से मालिश करने के बाद अर्जुन ने अपने लंड पर भी अच्छे से क्रीम लगाई.

"दीदी इसको पकड़ लो और अपने छेद पर चिपका के रखना." अर्जुन ने वापिस ऋतु दीदी के शरीर पर झुकने से पहले उन्हे समझाया. लंड और चूत आपस मे मिले तो दोनो के शरीर मे करेंट और मज़े की तरंग उठने लगी. ऋतु ने मजबूती से लंड अपनी छोटी सी चूत के छेद पर टीकाया हुआ था. छेद भी इतना छोटा था की लंड से पूरी

चूत ही लगभग ढकी हुई थी. उनके दोनो होंठो को अपने मूह मे दबाकर अर्जुन ने कुछ सोचने के बाद एक प्रचंड धक्का दे दिया. '"ऊओंम्मह............."

उसके मूह मे ऋतु दीदी की बस इतनी आवाज़ आई और उनके नाख़ून अर्जुन की पीठ मे आधे तक जा घुसे. लेकिन ऋतु ने भी अपने से अलग नही किया उसको.

नीचे चूत अपने जोड़ से चिर्र सी गई थी. झिल्ली के तो निशान भी शायद दिखते. खून की बारीक धार निकलती जाँघो को भिगोती कपड़े पर गिर रही थी.

4 इंच लंड चूत मे फसा हुआ था. कोई मोटा रब्बर का छल्ला जैसे लंड पर कस दिया हो. अपनी दीदी के होंठो को जैसे ही आज़ाद किया तो उनकी आँखो मे आँसू देख वो लंड निकालने ही वाला था.

"नही भाई. ये तो एक बार होना ही था. अब तू मुझे इतना प्यार दे के मैं ये दर्द क्या अपने सभी दर्द भूल जाऊ." इतना कह कर ऋतु दीदी अपनी भाई से वापिस लिपट गई.

"दीदी, अब आपको कोई दर्द नही दूँगा बस थोड़ा साथ देना." क्रीम को वापिस थोड़े बाहर निकाले लंड पर लगाने के बाद उसने हल्के हल्के धक्के देने शुरू किए
 
हर बार चूत और ज़ोर से चिपक रही थी लंड से. थोड़ी चिकनाहट होते ही अर्जुन ने फिर से उनके दूध पीने शुरू कर दिए.

"दीदी, आपके ये कितने सुंदर है ना.' महॉल को थोड़ा ठीक करने की कोशिश की तो ऋतु ने भी साथ दिया.

"क्या कहते है इनको"

"बूब्स. आपके पहले तो इतने सख़्त ना थे."

"आ भाई.. बस ऐसे ही करता रह.. ये सख़्त हुए है तुझे देख कर . इन्हे ढीला भी तुझे करेगा.. अया.." उनकी चूत चौड़ी तो खूब हो चुकी थी लेकिन इस 4 इंच के हिस्से को सहने लगी थी. "बस भाई ऐसे ही मेरे दोनो बूब्स... आहह दबाता जा.. और .. थोड़ा तेज़ी से कर.. " चूत से कामरस टपकने लगा था तो वहाँ भी घर्षण सही से हो रहा था..

अर्जुन ने थोड़े धक्के तेज किए और फिर एक बार सुपाडे तक लंड निकाल दीदी को गोद मे लिए बैठ गया. पूरा लंड उसने बाहर नही किया था बस उनको उपर उठा बिस्तर के किनारों से पाव लटका लिए नीचे. होंठो को मूह मे भरे ही उसने ऋतु दीदी का शरीर चूत के पानी से चिकने हुए लंड पर नीचे झटका दिया. दर्द की तेज लहर दोनो के ही योनांग पर पड़ी. लंड तो वही फँस गया था और एक बार फिर से खून बहता सा महसूस हुआ अर्जुन को जाँघ पर. उनको गोद मे लिए वो कूल्हे सहलाता और उनके माथे को चूमता रहा. दीदी इतनी मजबूत निकलेगी ये उसने सपने मे भी नही सोचा था. जहा मोटी और थोड़ी बड़ी चूत वाली माधुरी दीदी लंड लेते समय 6 इंच पर ही अचेत होने लगी थी, ललिता जी जो 3 बच्चे पैदा करने के बावजूद चीख पड़ी थी

लेकिन ऋतु सबसे दिलेर निकली. लंड जड़ तक फसा हुआ था. चूत किसी कटे पपीते की तरह फटी हुई लंड पर चिपकी हुई थी. लेकिन वो आँखों से सिर्फ़ मोती गिराती अपने भाई को चूम रही थी.

"आपके आँसू मेरे है दीदी." अर्जुन ने उनके कूल्हे सहलाते हुए आँखों को चाट लिया. फिर जोरदार चुंबन शुरू हुआ और अपने आप ही ऋतु दीदी ने कमर उठा कर 5=6 बार लंड पर दे मारी. ये इशारा था कि भाई तू कर.

अर्जुन ने वापिस उन्हे लिटाया और थोड़ी क्रीम आधे लंड पर लगा के फिर से हल्के धक्के देने शुरू कर दिए.

"आ भाई करता रह. रुक मत मुझे कुछ हो रहा है.. आ मेरे... अंदर कुछ उठ रहा..है.. आ करता रह" दर्द मे भी चरमोत्कर्ष पर जाती ऋतु सच मे

अलग थी. अर्जुन भी बड़े प्यार से चुदाई कर रहा था. "आ मैं गई भाई... पूरा अंदर डाल.. " खुद से चिपकाती वो 5-6 झटके खाने के बाद वापिस अर्जुन से लिपट गई.

वो भी कुछ देर रुका रहा और उनके निपल चुसता रहा.

अपने भाई का सर प्यार से सहलाती बस उसको अपने दूध मे खोए देख मुस्कुरा रही थी.

पीड़ा तो जैसे इस पल मे कही थी ही नही. अपनी दीदी को अब ठीक देख अर्जुन ने उनकी टाँगे अच्छे से खोल कर उपर उठा ली. लंड तीन चोथाई बाहर निकाल वो जड़ तक अंदर पेलने लगा था. चूत एक बार खुलकर झड़ने के बावजूद कसी सी लंड को पकड़ रही थी.

"दीदी, आपके अंदर तो अभी तक मेरे लंड की खाल फँस रही है. सुबह आपका हाल खराब हो जाएगा. आ." हरर धक्के पर किसी जानवर सा गुर्रा रहा था वो

ऋतु दीदी लगातार अपने कूल्हे उठा कर एक बार मे ही अपनी चूत को उसके लंड के लायक बनाने मे लगी थी.

"तू नीचे आजा भाई." उनकी बात मानते हुए जैसे ही पूरा लंड बाहर खींचा "फ़चाक" की आवाज़ से मोटा सुपाडा चूत के पानी और खून मे सना बाहर निकला

"आ. चल लाइट नीचे." दर्द मे भी हिम्मत बनाए वो अपने भाई की कमर के दोनो तरफ किसी घुड़सवार सी बैठ गई. गान्ड को उचका कर लंड के मूह पर चूत को रखा और "कच" से नीचे हो गई. आधा लंड तो उस झटके के साथ ही अंदर बैठ गया था.

"आ. रुक एक बार हिलना मत. " अपनी गान्ड को वही उठाए एक लंबी साँस लेकर फिर से खुद को लंड पर गिरा लिया. आ.. थोड़ी देर ऐसे ही चूत मे पूरा लंड लिए वो उसकी छाती पर लेटी रही. चूत तो सुन्न ही पड़ने लगी थी.

अर्जुन ने प्यार से उनके गाल सहलाते हुए कहा, "दीदी, अब से फिर कभी दर्द नही होगा." और सीने से लगा लिया. कुछ ही पल बाद उनकी गान्ड ऐसे लेते हुए ही लंड पर हिलने लगी तो अर्जुन भी उनके दोनो गुदाज चूतड़ पकड़ कर धक्के देने लगा.

"ज़ोर से कर अर्जुन.. पूरा अंदर तक. " दोनो मिलकर ही अपना अपना शरीर उस जोड़ पर पटक रहे थे. बैठ कर लंड पर उछलने से उनके चुन्चे भी हवा मे मटक रहे थे. अर्जुन ने दोनो को मुट्ठी मे भर दबाना सुरू कर दिया.

"मैं थकने लगी हूँ भाई. अब तू आजा."

"दीदी, घुटनो के बल हो जाओ." अर्जुन ने उन्हे बेड पर उतारते हुए कहा. खुद बिस्तर से नीचे खड़ा हो गया और उनकी चूत पर लंड टिकाते हुए फिर से जड़ तक अंदर ठोक दिया. हर धक्के से ऋतु दीदी की सिसकारिया गूँज रही थी..

"आ मेरे भाई .. अब अच्छा लग रहा है.. फाड़ दे सबकुछ. आ"

"दीदी, आपके कूल्हे देखो कितने नरम है और मुलायम भी.." उसका हर धक्का पट्ट पट्ट की आवाज़ करता ऋतु की गान्ड से टकरा रहा था. खाली कमरे मे ये मधुर संगीत इन दोनो को अब हवा मे उड़ाने लगा था. दोनो के शरीर अब अकड़ रहे थे. चूत संकुचन करने लगी थी और लंड फूलने. किसी एंजिन सी स्पीड मे सब कुछ भुला कर अर्जुन बस दीदी के हर अंग को हिला रहा था.

"अर्जुन.. मुझे थाम ले.. इतना कहती वो आगे बिस्तर पर लुढ़क गई लेकिन उनका शरीर लगातार बस झटके ख़ाता रहा. एक समय तो ऐसा लगा जैसे पेशाब ही कर दिया हो. और अर्जुन का भी ज़ोर जवाब दे गया. वो किसी शेर सा दहाड़ता लंड को बाहर निकाल उनकी पीठ पर ही झड़ने लगा. उसके अंडकोष सूख गये थे जैसे इतना वीर्य उड़ाया था की दीदी के बालो तक पिचकयारिया जा लगी थी. ऋतु दीदी उसके नीचे बेहोश पड़ी थी और अर्जुन मे जितनी बची खुचि हिम्मत थी उसे इकट्ठी कर के बस उन्हे अपने साथ वही छाती से चिपका कर लिटा लिया था.
 
Back
Top