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दर्द ही दवा है
"भाई.. मुझे बाथरूम ले चल." अर्जुन जिसकी शायद अभी आँख लगी थी, ने अपनी बहन को अपने सीने पर सर उठाए देखा. चेहरा बस उस हल्की नीली
रोशनी मे नुमाया हो रहा था.
"हा चलो दीदी." अर्जुन ने अपने उपर से दीदी को आराम से पलट दिया और खुद बिस्तर से नीचे उतार कर उन्हे किसी छोटी बच्ची की तरह अपने हाथो मे उठा लिया.
"आ.." दीदी की कराह सुनकर उसने रुक कर फिर से उनकी तरफ देखा.
"कुछ नही हुआ है भाई बस शरीर थोड़ा अकड़ गया है. तू चल" और अर्जुन उन्हे लेकर वापिस ड्रॉयिंग रूम के साथ अंदर ही बने बाथरूम मे लेकर आ गया. दीवार पर लगे लाइट के खटके को दबाया तो पूरा बाथरूम रोशनी से भर उठा.
उसकी बाहो मे पड़ी ऋतु दीदी नंगी बस अपने भाई को ही देख रही थी. नज़र दीदी के चेहरे से नीचे गई तो गोरे फक्क चुचो पर लाल निशान बने हुए थे और निपल अभी तक कड़े थे. श्याद सूज गये थे ज़्यादा चुसाइ से. गोरी पतली कमर बिल्कुल अंदर धसी सी लग रही थी और उसके नीचे जहा बालो की मौजूदगी का कोई आभास ना था, उनकी चूत के दोनो होंठ फूल कर सूजे हुए थे. चूत की दरार पर खून किसी पपड़ी सा जमा था और छेद शायद अभी भी हल्का नम था. जहा कभी वो गोरी चूत किसी कनक के दाने सी थी आज वही फट कर सूज गई थी
"मेरे पाव नीचे रख ज़रा." थोड़ी शरमाती सकुचती वो बोली तो अर्जुन ने अपनी बाहो मे लिए ही उनका सिर्फ़ ज़मीन तक पहुँचाया था. वो अभी भी दीदी का पूरा वजन अपने ही हाथो मे लिए खड़ा था, वैसे ही जैसे दीदी थी. एकदम वस्त्रहीन.
"मुझे कमोड तक ले चल ऐसे ही." ऋतु दीदी हिम्मत से अपने पाव बाथरूम के कोने मे बने कमोड तक बढ़ाते हुए बोली. हर कदम चूत में जैसे एक भयंकर दर्द उत्पन्न कर रहा था. अर्जुन ने भी उन्हे आराम से पकड़ा हुआ था, कमर के भाग से. उनकी पीठ पर भी सफेद पपड़ी सी जमी थी और बालो मे भी. गोरे गोल-मटोल कूल्हे अब थोड़ा लाली लिए हुए थे जो हर कदम पर थरथरा से जाते. सहारा दे कर अर्जुन ने उन्हे वहाँ बिठाया तो एक बार फिर जोरदार सिसकारी निकल गई.
"आपको ज़्यादा दर्द है तो खड़े खड़े ही कर लीजिए." अर्जुन ने देखा की दीदी से बैठा बैठ भी नही जा रहा तो उसने उन्हे यही सलाह दी.
"नही रे. पड़े पड़े तो दर्द जाने से रहा. हिलूंगी तभी तो फिर ठीक रहूंगी."
साथ मे ही अर्जुन ने गेयिज़र का बटन भी दबा दिया जिसको दीदी ने भी देखा. और फिर एक बार उनके चेहरे पर दुनिया जहा का दर्द इकट्ठा हो गया.
"आ भाई." चूत से पहले तो सिर्फ़ कुछ बूंदेही टप की फिर चार-चार की आवाज़ से रुक रुक कर पेशाब गिरने लगा. शुरू की बूंदे एकदम लाल ही थी जिन्हे दोनो ने ही देख लिया था.
"वो अंदरही जम गया था ना थोड़ा खून तो इसके साथ ही बाहर आ गया." बस नीचे देखती ऋतु दीदी ने इतना ही कहा और कुछ देर वही बैठी रही. उन्हे आज अपना पेशाब भी किसी तेज़ाब सा लग रहा था चूत को जलाता सा.
"आप बस 2 मिनिट रुकिये." इतना कहकर वो अपने कमरे से एक सूती सॉफ टीशर्ट लेकर आया और पास मे रखी प्लास्टिक की बाल्टी पर बाथरूम मे टंगा अपना पाजामा किसी गद्दी की तरह बिछा, दीदी को उसपे बिठा दिया. ऋतु दीदी बस अपने भाई की हरकतों को देख रही थी जिसके चेहरा गंभीर था.
"थोड़ा फैला लीजिए ना इनको." अर्जुन ने उनकी जाँघो की तरफ इशारा किया तो ऋतु दीदी ने दर्द मे भी मुस्कुराते हुए अपनी गोरी जांघें फैला ली. चूत का छेद पूरा नुमाया हो रहा था. गरम पानी से एक डब्बा अच्छे से भरकर उसने उंगली डूबाई देखने के लिए की कितना गरम है. फिर हल्का ताज़ा पानी मिला कर सॉफ टीशर्ट का बीच वाला भाग अच्छे से गीला करके उनकी टाँगो के सामने बैठ गया फर्श पर.
"अगर दर्द हो तो बता देना दीदी. बस एक बार अच्छे से सॉफ कर दूं फिर आपको आराम मिल जाएगा." थोड़ी चिंता अभी थी उसके चेहरे पर.
"मुझे ये दर्द ख़तम करना है भाई. अभी तू कर जो तू कर रहा है. फिर मैं करूँगी जो मैने करना है."
दीदी की ये बात अर्जुन को समझ तो नही आई लेकिन वो बिना कुछ पूछे उस गीली टी शर्ट से उनकी चूत के बाहर जमे खून को सॉफ करने लगा.
हल्के हाथो से उसने दोनो होंठ और उनपर लगे सूखे खून के निशान बिल्कुल सॉफ कर दिए.
चूत के छेद के नीचे की तरफ भी सूजन और एक छोटा
सा चीरा लग गया था, लेकिन वहाँ से अब खून तो नही बह रहा था.
एक बार फिर उसने टीशर्ट को गरम पानी मे भिगोया और अब चूत के मूह से भीड़ा दिया. "आइईइ.... भाई ये तरीका सिर्फ़ दर्द दे रहा है." अपने हाथ की उंगलियों से उन्होने अर्जुन की कलाई मजबूती से पकड़ ली थी. चूत में जैसे और आग लग गई हो अर्जुन की इस हरकत से. लेकिन वो जानता था की चूत के होंठ और छेद जितना सूजे हुए है सुबह तक तो दीदी टाँग भी नही खोल पाएगी.
"बस 5 मिनिट दीदी." उसने वापिस ये बात कही और अपना काम करता रहा.
"अर्जुन. ये शावर चला दे."
दीदी की बात सुनकर वो एक पल रुका फिर उसको लगा के क्या पता नहा के दीदी को आराम आ जाए. उसने शावर का हॅंडल खोल दिया. बाल्टी पे बैठी हुई ऋतु दीदी पर फुहार सीधी गिर रही थी. उनके गरम शरीर मे इस ठंडी फुहार से एक नई जान से आने लगी. अर्जुन भी पूरा भीगा गया था 2 मिनिट मे
ही.
"भाई.. मुझे बाथरूम ले चल." अर्जुन जिसकी शायद अभी आँख लगी थी, ने अपनी बहन को अपने सीने पर सर उठाए देखा. चेहरा बस उस हल्की नीली
रोशनी मे नुमाया हो रहा था.
"हा चलो दीदी." अर्जुन ने अपने उपर से दीदी को आराम से पलट दिया और खुद बिस्तर से नीचे उतार कर उन्हे किसी छोटी बच्ची की तरह अपने हाथो मे उठा लिया.
"आ.." दीदी की कराह सुनकर उसने रुक कर फिर से उनकी तरफ देखा.
"कुछ नही हुआ है भाई बस शरीर थोड़ा अकड़ गया है. तू चल" और अर्जुन उन्हे लेकर वापिस ड्रॉयिंग रूम के साथ अंदर ही बने बाथरूम मे लेकर आ गया. दीवार पर लगे लाइट के खटके को दबाया तो पूरा बाथरूम रोशनी से भर उठा.
उसकी बाहो मे पड़ी ऋतु दीदी नंगी बस अपने भाई को ही देख रही थी. नज़र दीदी के चेहरे से नीचे गई तो गोरे फक्क चुचो पर लाल निशान बने हुए थे और निपल अभी तक कड़े थे. श्याद सूज गये थे ज़्यादा चुसाइ से. गोरी पतली कमर बिल्कुल अंदर धसी सी लग रही थी और उसके नीचे जहा बालो की मौजूदगी का कोई आभास ना था, उनकी चूत के दोनो होंठ फूल कर सूजे हुए थे. चूत की दरार पर खून किसी पपड़ी सा जमा था और छेद शायद अभी भी हल्का नम था. जहा कभी वो गोरी चूत किसी कनक के दाने सी थी आज वही फट कर सूज गई थी
"मेरे पाव नीचे रख ज़रा." थोड़ी शरमाती सकुचती वो बोली तो अर्जुन ने अपनी बाहो मे लिए ही उनका सिर्फ़ ज़मीन तक पहुँचाया था. वो अभी भी दीदी का पूरा वजन अपने ही हाथो मे लिए खड़ा था, वैसे ही जैसे दीदी थी. एकदम वस्त्रहीन.
"मुझे कमोड तक ले चल ऐसे ही." ऋतु दीदी हिम्मत से अपने पाव बाथरूम के कोने मे बने कमोड तक बढ़ाते हुए बोली. हर कदम चूत में जैसे एक भयंकर दर्द उत्पन्न कर रहा था. अर्जुन ने भी उन्हे आराम से पकड़ा हुआ था, कमर के भाग से. उनकी पीठ पर भी सफेद पपड़ी सी जमी थी और बालो मे भी. गोरे गोल-मटोल कूल्हे अब थोड़ा लाली लिए हुए थे जो हर कदम पर थरथरा से जाते. सहारा दे कर अर्जुन ने उन्हे वहाँ बिठाया तो एक बार फिर जोरदार सिसकारी निकल गई.
"आपको ज़्यादा दर्द है तो खड़े खड़े ही कर लीजिए." अर्जुन ने देखा की दीदी से बैठा बैठ भी नही जा रहा तो उसने उन्हे यही सलाह दी.
"नही रे. पड़े पड़े तो दर्द जाने से रहा. हिलूंगी तभी तो फिर ठीक रहूंगी."
साथ मे ही अर्जुन ने गेयिज़र का बटन भी दबा दिया जिसको दीदी ने भी देखा. और फिर एक बार उनके चेहरे पर दुनिया जहा का दर्द इकट्ठा हो गया.
"आ भाई." चूत से पहले तो सिर्फ़ कुछ बूंदेही टप की फिर चार-चार की आवाज़ से रुक रुक कर पेशाब गिरने लगा. शुरू की बूंदे एकदम लाल ही थी जिन्हे दोनो ने ही देख लिया था.
"वो अंदरही जम गया था ना थोड़ा खून तो इसके साथ ही बाहर आ गया." बस नीचे देखती ऋतु दीदी ने इतना ही कहा और कुछ देर वही बैठी रही. उन्हे आज अपना पेशाब भी किसी तेज़ाब सा लग रहा था चूत को जलाता सा.
"आप बस 2 मिनिट रुकिये." इतना कहकर वो अपने कमरे से एक सूती सॉफ टीशर्ट लेकर आया और पास मे रखी प्लास्टिक की बाल्टी पर बाथरूम मे टंगा अपना पाजामा किसी गद्दी की तरह बिछा, दीदी को उसपे बिठा दिया. ऋतु दीदी बस अपने भाई की हरकतों को देख रही थी जिसके चेहरा गंभीर था.
"थोड़ा फैला लीजिए ना इनको." अर्जुन ने उनकी जाँघो की तरफ इशारा किया तो ऋतु दीदी ने दर्द मे भी मुस्कुराते हुए अपनी गोरी जांघें फैला ली. चूत का छेद पूरा नुमाया हो रहा था. गरम पानी से एक डब्बा अच्छे से भरकर उसने उंगली डूबाई देखने के लिए की कितना गरम है. फिर हल्का ताज़ा पानी मिला कर सॉफ टीशर्ट का बीच वाला भाग अच्छे से गीला करके उनकी टाँगो के सामने बैठ गया फर्श पर.
"अगर दर्द हो तो बता देना दीदी. बस एक बार अच्छे से सॉफ कर दूं फिर आपको आराम मिल जाएगा." थोड़ी चिंता अभी थी उसके चेहरे पर.
"मुझे ये दर्द ख़तम करना है भाई. अभी तू कर जो तू कर रहा है. फिर मैं करूँगी जो मैने करना है."
दीदी की ये बात अर्जुन को समझ तो नही आई लेकिन वो बिना कुछ पूछे उस गीली टी शर्ट से उनकी चूत के बाहर जमे खून को सॉफ करने लगा.
हल्के हाथो से उसने दोनो होंठ और उनपर लगे सूखे खून के निशान बिल्कुल सॉफ कर दिए.
चूत के छेद के नीचे की तरफ भी सूजन और एक छोटा
सा चीरा लग गया था, लेकिन वहाँ से अब खून तो नही बह रहा था.
एक बार फिर उसने टीशर्ट को गरम पानी मे भिगोया और अब चूत के मूह से भीड़ा दिया. "आइईइ.... भाई ये तरीका सिर्फ़ दर्द दे रहा है." अपने हाथ की उंगलियों से उन्होने अर्जुन की कलाई मजबूती से पकड़ ली थी. चूत में जैसे और आग लग गई हो अर्जुन की इस हरकत से. लेकिन वो जानता था की चूत के होंठ और छेद जितना सूजे हुए है सुबह तक तो दीदी टाँग भी नही खोल पाएगी.
"बस 5 मिनिट दीदी." उसने वापिस ये बात कही और अपना काम करता रहा.
"अर्जुन. ये शावर चला दे."
दीदी की बात सुनकर वो एक पल रुका फिर उसको लगा के क्या पता नहा के दीदी को आराम आ जाए. उसने शावर का हॅंडल खोल दिया. बाल्टी पे बैठी हुई ऋतु दीदी पर फुहार सीधी गिर रही थी. उनके गरम शरीर मे इस ठंडी फुहार से एक नई जान से आने लगी. अर्जुन भी पूरा भीगा गया था 2 मिनिट मे
ही.