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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

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"आगे से कोई कभी तुम्हे कुछ न्ही कहेगा. मैं साथ ही चलूँगा अब से तुम्हारे." अर्जुन वापिस स्कूटी स्टार्ट करता प्रीति को अपने साथ ले चल दिया

"बहनचोद पता नहीं क्या ख़ाता है साला. थोबड़ा ही हिला दिया."कुलविंदर स्कूटर चलाता पीछे बैठे राणा से बोला जो अपनी नाक पे रुमाल रखे था. दोनो की हालत सॉफ बता रही थी की तबियत से गाल लाल किए गये उनके.

"वो छोड़ भाई बस याद रखियो आगे से इस मोहल्ले मे आशिकी नहीं करनी. साला जानवर है रे ये लड़का. पता ना चला कब दीवार से चिपका दिया. हाथ भी बहनचोद तबियत से मारे." राणा की आवाज़ मे उसका दर्द सॉफ पता चल रहा था.

"भाई बंदी भी उसकी, पोलीस भी उसकी और हमारी सिर्फ़ ठुकाई. ऐसा बलात्कार तो कभी ना हुआ. आता ही नहीं इस तरफ तो मैं. झुग्गी वालीही देख लिया करेंगे."

दोनो दोस्त आज अपने से पिछली क्लास के लड़के से मार खा कर असहाए से अपने मोहल्ले मे निकल लिए थे.

"तुम चलो जब प्रॅक्टीस हो जाए तो मुझे बुला लेना. नही तो मैं पहले आया तो यही मिलूँगा." स्टॅंड पर स्कूटी लगाते अर्जुन ने प्रीति से कहा और एक बार उसके सर पे हाथ फेर कर आगे चल दिया.

"कोंन है ये हीरो, प्रीति?" एक चुलबुली सी गोरी लंबी लड़की प्रीति के कंधे पर हाथ रख उसके साथ चलती बोली.

"तुझे क्या लगता है, डिम्पी?" अपनी सहेली से ही हंसते हुए उसने सवाल कर दिया.

"तेरा भाई या रिश्तेदार ही होना चाहिए नही तो मेरा दिल टूट जाएगा." नौटंकी करती इस लड़की ने आँख मारते कहा तो प्रीति भी उसके लहजे मे ही बोली, "हाए मेरी बेस्ट फ्रेंड का आज दिल टूटही गया. हाहहाहा."

"कमीनी सच सच बता. तेरा इंटेरेस्ट नही है ना वो? लड़का एक नज़र मे पसंद आ गया है." डिम्पी अब भी पलट के देखने की कोशिश मे थी लेकिन अर्जुन तो जा चुका था.

"सच बोल रही हूँ तेरे से क्या छुपाना. मेरे दिल पर बस उसका ही नाम है जब से होश संभाला है." गहरे प्यार से कही बात सुनकर डिम्पी को भी अहसास हो गया था कि दोनो मे प्यार तो पक्का है.

"लेकिन वो तो कृशन कन्हैया दिखता है." छेड़ते हुए ये बात कही तो प्रीति ने वैसे ही कहा.

"हा तो वो तो है हे. अब मैने कॉन्सा उसपे नकेल डाल रखी है. गोपियाँ जितनी चाहे हो लेकिन राधा-रुक्मणी तो मैं ही हूँ." इतराते हुए बात कहकर दोनो अपना बैग खोल कर प्रॅक्टीस मे लग गई बाकी सभी के साथ.

……………..

"तेरे हाथ पे ये खून कैसा है?" बलबीर ने कपड़े बदलते समय अर्जुन के हाथ को देख कर कहा.

"कुछ नही भाई. वो सड़क पर किसी के चोट लग गई थी. उठाते समय मेरे हाथ पे वही लग गया." पास मे लगे नल से हाथ धोते उसने जवाब दिया.

दोनो जिम मे अभ्यास करके वापिस कोच के पास आए तो अर्जुन ने उनके पाव छुए. "आज कीट पर 1-2 की लय मे सीधे मुक्को का अभ्यास करना है. 2 मिनिट के बाद दोनो अपनी बारी लेंगे. बलबीर, 10 सेट होने के बाद तुम इसको घास पर उठक बैठक कारवाओगे साथ मे ही लचकता का अभ्यास भी." जोगिंदर जी ने अर्जुन के शरीर को देखते हुए सब बताया तो बलबीर भी सर हिलाता अर्जुन को ले गया.

जिस जगह लोहे की रेलिंग और जंजीर से बॉक्सिंग कीट लटकी थी ये जगह खुले मे थी और सामने ही बॅस्केटबॉल और हॅंडबॉल के कोर्ट थे. बलबीर अर्जुन को सब समझा कर बस वहाँ खेल रही लड़कियों को देखता रहा. मुश्किल से उसने 3 सेटही किए थे और इधर अर्जुन की बाजू और छाती पर पसीने की बूंदे चमकने लगी थी. ये बनियान जैसी टीशर्ट ज़्यादा खुली थी तो उसकी मासपेशिया, छाती सब नज़र आ रहा था. शरीर के हिलने पर वहाँ फड़कती एक एक मांसपेशी अर्जुन के शरीर को निखार रही थी.

"भाई अब बस करो देखना ये सब. लौट आओ वर्तमान मे भी. उनमे से कोई इधर नही देख रही." अर्जुन ने मज़ाक करते हुए कहा तो बलबीर मूह लटकाए 2 रब्बर की दरियाँ वही बिछाने लगा.

"भाई देख भी रही होंगी तो वो तुझेही देखेंगी. मैं तो यहा बस अपनी आँखें ही ठंडी कर लेता हूँ. तू लेट यहा." इतना बोलकर वो फिर से अर्जुन को सब समझने लगा. कैसे पाव उठाने और घुटने मौडने है. कैसे दोनो हाथ सर के पीछे कर के कमर उपर उठानी है. फिर अर्जुन भी निर्देश अनुसार ये कसरत करता रहा.

"देख रही है उस चिकने को. उमर ज़्यादा नही लगती लेकिन शरीर और चेहरा देख. मेरा निशाना बस अब यही है." बॅस्केटबॉल कोर्ट पे खड़ी एक आधुनिक सी दिखती ये लड़की अर्जुन को देख कर आहे भर रही थी.

" नहीं आता हाथ तेरे वो भूल जा. ये मेडम भी आजकल उसके चक्कर मे है." ये सुमन थी जो मंजुला की और इशारा करते हुए उस लड़की से बोली जिसपर मंजू ने कोई प्रतिक्रिया ना दी.

"मंजू, मेरे को तो कोई ऐतराज नही है के तू इसको पटए या प्यार करे. लेकिन बस दिल मे एक इक्षा जाग गई है के इसके नीचे ज़रूर आउन्गी यार." ऐसे बोलते हुए इस लड़की ने मंजू को आँख मारते हुए कहा तो जहा पहले मंजू को थोड़ा गुस्सा आ रहा था अब थोड़ी हँसी आ गई थी.

"नीचे तो आ जाएगी पर ज़िंदा रहेगी या नही वो भगवानही बता सकता है चाँदनी." मंजू को याद आ गया था कि दिन मे कहा हाथ लगाया था.

"ऐसा क्या लगा रे इसके जो जान ही ले लेगा. और तूने कहा देखा?" तीनो अब कोर्ट पर ही बैठ गई थी.

"अर्रे ऐसा कुछ नही है. थोड़ी बहुत बात है मेरी इसके साथ. शरीफ लड़का है लेकिन वो बॉक्सिंग हाल के पीछे कपड़े बदल रहा था ये जब मैं इधर आई. बस

नज़र बाद गई तो मैं बिना रुके इधरही आई फिर."

"क्या बात कर रही है यार. तेरे अंदाज़ा तो बता फिर भी." चाँदनी थोड़े हैरानी वाले भाव से बोली तो सुमन भी मंजू को गोर से देखने लगी

"देख इतना तो पक्का है और क़स्सी के डंडे से मोटा." अपने हाथ को फैलाते हुए उसने कलाई से 2-3 इंच नीचे तक इशारा करते बताया तो वो दोनो भी सोच मे पड़ गई.

"मज़ाक?" चाँदनी ने के बात फिर से उसको कहा.

"मैं मज़ाक क्यो करने लगी. अब तो मुझे डर लगने लगा है. नही तो खुद सोच मेरी चीज़ पे कोई हाथ रखे और मैं चुप रहूं. ये लड़का पसंद है मुझे लेकिन इसकी और भी पसंद है. सिंपल सी बात है अगर दिल करे तो ट्राइ कर लिओ मैं तो बातों से काम चला लूँगी." और एक बार फिर हंस पड़ी.

"देख तू तो जानती ही है यार. वो रमण तो किसी काम का नही और मैने उसको भगा भी दिया. पैसे वाला था लेकिन वो मेरे पास भी बहुत है. लेकिन जैसा तू कह रही है ऐसी चीज़ एक बार देखनी बनती है. रमण का इतना था." दोनो की तरफ अपनी हथेली के बीच उंगली रख वो बोली तो तीनो हँसने लगी.

"यार तेरा तो मतलब कौमार्य भी अच्छी तरह नही खुला." सुमन, जो शायद खेली खाई थी उसने ये बात कही तो चाँदनी ने हा मे सर हिला दिया. "3 बार तो उपर रखते खाली हो गया था वो. और बाकी 4-5 बार मतलब 2 मिनिट ज़्यादा से ज़्यादा. उस से अच्छा तो तेरे केशव और जग्गी है." ये बात चाँदनी ने सुमन से कही थी.

"अब तो वो भी किसी काम के नही लेकिन हा तेरे वाले से ठीक ही है 5 मिनिट साथ देते है." मंजुला इन दोनो की बातें सुनती वहाँ अर्जुन को निहार रही थी. कैसे आज उसने मंजू के जिस्म मे आग भरी थी. सिर्फ़ दूध दबा के ही उसका स्खलन करवा दिया था. है तो खिलाड़ी.

"कहा खो गई? तेरी भी ओपनिंग करवा दूं किसी को बोलकर?" चाँदनी ने हिलाते हुए मंजू से कहा तो वो मस्ती से उसकी गान्ड पर चपत लगती बोली, "मेरी बंदही ठीक है तू तेरा सोच. ग़लती से उसके हाथ लग गई तो फिर टांगे 3 दिन तो खुली रहेंगी."
 
"कहा खो गई? तेरी भी ओपनिंग करवा दूं किसी को बोलकर?" चाँदनी ने हिलाते हुए मंजू से कहा तो वो मस्ती से उसकी गान्ड पर चपत लगती बोली, "मेरी बंदही ठीक है तू तेरा सोच. ग़लती से उसके हाथ लग गई तो फिर टांगे 3 दिन तो खुली रहेंगी."

ये मस्ती मज़ाक करती रही उधर अर्जुन भी फारिग हो कर स्टॅंड की ओर चल दिया. प्रीति अभी आई नही थी.

"ये है डिम्पी और डिम्पी ये है अर्जुन." अर्जुन टहल रहा था कि प्रीति के साथ एक उसके अनुपात की ही गोरी सी लड़की आई और अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया.

"हेलो, अर्जुन शर्मा. प्लेषर टूमीट यू मिस डिम्पी." उसने हल्के हाथो से हाथ मिला कर छोड़ दिया तो डिम्पी ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

"बॉक्सर हो?" डिम्पी के सवाल से अर्जुन हंस दिया. "नही. सिर्फ़ सीखता हूँ. फिलहाल बॉक्सिंग पर ही ध्यान है."

"ओह लेकिन शरीर भी वैसा ही है. किसी रेस्लर जैसा आक्च्युयली." अब वो टीशर्ट पाजामे मे था लेकिन ये भी छाती पर कसी हुई थी तो प्रीति नि हल्के से अपनी सहेली को हाथ मारा.

"शुरू से ही ऐसा है. अब इसको ठीक करने मे लगा हूँ. पहलवान लगना बुरा तो नही है.?" लहज़ा बिल्कुल नरम था उसका

"तुम्हारा चेहरा मासूम है और शरीर उसके ऑपोसिट. बट यू लुक रियली गुड. ओके. फिर मिलते है.बाइ" एक बार फिर हाथ मिला कर वो प्रीति को भी बाइ कह निकल गई.

"चले मेडम?'अर्जुन ने प्रीति को हिलाया तो वो भी हँसती हुई हामी भर के स्कूटी पर बैठ गई. अब उसके दोनो पाव अलग अलग थे सीट पर बैठने के बाद.

"आराम से चलाओ. जल्दी है क्या जाने की?" प्रीति पीछे से छिपकती हुई बोल रही थी. "जल्दी नही है लेकिन पता नही शायद आज तुम्हारी नियत ठीक नही. सोच रहा हूँ घर जल्दी पहुच कर इज़्ज़तही बचा लू." अर्जुन ने खिलवाड़ करते कहा. उसको भी प्रीति के ठोस उभार पीठ पर मज़ा दे रहे थे.

"आज बचा लो फिर जल्दी ही तुम मेरे नीचे होगे मिस्टर." बड़े विश्वास से प्रीति की कही बात सुनकर अर्जुन हैरान हो गया.

"मतलब."?

"मतलब सॉफ है. हम तुम एक कमरे मे बंद हो .. ता ना ना ना.. " मस्ती भरा जवाब सुनकर भी अर्जुन को शांति नही मिली.

"बुद्धू हो तुम. अब तुम्हारे घर वाले जा रहे है गाँव. और 2 दिन के लिए मेरे दादू भी जा रहे है देहरादून, बुआ के पास. तो तुम कहा जाओगे." एक बार फिर से अर्जुन को पीछे से जकड़ते उसने प्यार जताया तो अर्जुन को सब समझ आ गया. वो हल्का मुस्कुराता बस घर की ओर ही चलता रहा. सेक्टर के बाहर एक बार स्कूटी रुकवा कर प्रीति वापिस लड़कियों की तरह बैठी और बैठने से पहले अर्जुन का गाल चूमती बोली. "कल भी साथ ही चलेंगे" वो बस हंस दिया.

घर पर वैसे ही शांति थी जैसी आम तौर पर रहती थी. अंदर आकर पसीना सूखने लगा तो देखा दादी रसोईघर मे अलग अलग बर्तन मे कुछ डाल रही थी.

ये शायद वही समान था जो लेकर आया था दिन मे. माधुरी दीदी ने उसको दूध के लिए पूछा तो पीछे से ही उनकी माता ललिता जी आवाज़ आई. "इसको नहा लेने दे फिर दूध मैं खुद दे दूँगी. तू माजी के साथ थोड़ा काम करवा दे क्योंकि बाकी काम तो सब बंद हो गया है अब रसोई मे तेरे लिए." उनके चेहरे पर शांति सी थी और माधुरी दीदी जा बैठी कौशल्या देवी की बगल मे. अर्जुन ने तौलिया उठाया और नहाने चल दिया. इधर ललिता जी दूध तैयार करने लगी थी और रेखा जी ऋतु और अलका को साथ लेकर मल्होत्रा जी के घर गई हुई थी. उस दिन के बाद से ऋतु आज पहली बार उस तरफ गई थी. ना जाती तो शायद वो जवाब भी ना दे पाती.

शरीर को अच्छे से सॉफ करके अर्जुन सिर्फ़ पाजामा पहने बाहर आया तो ललिता जी गिलास देते हुए कहा, "कमरे की सॉफ-सफाई कब की थी मुन्ना? और बिस्तर अलमारी?"

"ताईजी कोई 5 दिन हुए होंगे." अर्जुन समझ गया था कि ताईजी ने ऐसा क्यो कहा है. "चल मेरे साथ फिर. हम लोग चले जाएँगे फिर तो होने से रहा वो सॉफ."

"हा बहूँ, इसका कमरा और बाथरूम दोनो सॉफ कर और इसको भी सीखा ये सब. कल को कभी बाहर आना जाना होगा तो वहाँ तो इतने गुलाम मिलने से रहे." कौशल्या देवी ने ये बात कही क्योंकि उन्हे भी पता था की अर्जुन तो बिस्तर झड़ने वाला भी नही. और कपड़े हर जगह बिखरे होंगे. दोनो ताई-भतीजा उपर चल दिए. गिलास हाथ मे ही था.

"वैसे दादी ने कहा है बाथरूम सॉफ करने के लिए तो पहले वही चलते है ताईजी ." अर्जुन ने जैसे कुछ सोच कर कही थी ये बात तो ललिता जी भी हामी भरती उपर आ गई. दोनो दरवाजो के पल्ले लगा कर वो अंदर आए तो बदन की गर्मी से परेशान ललिता जी पीछे से ही लिपट गई अर्जुन से. उसने खुद को घूमते हुए अपनी ताईजी को गोद मे उठा लिया. 60-65 किलो की मांसल ललिता जी भी अपने भतीजे के पौरुष और ताक़त को देख कर प्रभावित थी. ऐसे ही वो उन्हे उठाकर बाथरूम के अंदर ले आया जहा ऋतु दीदी से उसने प्रेम-मिलन किया था. पाँच फीट से थोड़ी उँचाई की ताईजी एकदम यौवन से भरपूर लदी हुई औरत थी.

गोल आकर्षक चेहरा, विशालकाए मोटे दूध जो आगे माधुरी दीदी को भी इन्ही से मिले थे फिर गोल मांसल मुलायम पेट और सबसे ख़ास उनके बड़े कूल्हे जो घर मे सबसे भारी और गदराए हुए थे. दोनो को पता था कि समय ज़्यादा नही है तो अंदर आते ही अर्जुन ताईजी पर झुक कर उनके होंठ पीता उनकी सारी शरीर से अलग करने लगा. ललिता जी भी अपने ब्लाउज के हुक्क खोलती उसको फर्श पर फेंक सारी और पेटीकोट को ढीला करने लगी. अर्जुन के बड़े हाथ उनके मोटे उभारों को दबा रहे थे और मूह उनके होंठ गाल को चूम रहा था. जब उनके शरीर पर सिर्फ़ ये 2 सफेद कपड़ेही रह गये तो ललिता जी अर्जुन का पाजामा खींच कर नीचे सरकाया. अपने पैरो से ही अर्जुन ने उसको अलग कर दिया.

"ये तो सचमुचही भयंकर है रे मुन्ना." जैसे ही उन्होने उसके फनफनाते लंड को देख वो उसको दोनो हाथो मे जकड़ती सी उपर नीचे करने लगी. इधर अर्जुन ने भी पीछे से उनकी बड़ी ब्रा खोल दी जो अपने आप से ही उनकी बाहो मे झूल गई. एक बार लंड छोड़कर ललिता जे ने अपनी मोटी मांसल जाँघो और गान्ड की दरार मे फाँसी कच्छी भी उतार फेंकी और फिर वापिस लंड पकड़ कर उसपे अपना थूक गिरकर आगे पीछे करने लगी.
 
"ताईजी आपके ये कितने बड़े है ना. जैसे 5 किलो के खरुबूजे हो." उनके नंगे और बड़े बड़े दोनो दूध को किसी ग्वाले सा दबाता मसलता अर्जुन जैसे अपनी गदराई ताई के थनो से दूधही निकालने लगा था.. "हाए बेटा.. सब तेरा ही है.. आ.. मसल ज़ोर से इनको. जैसे तेरा दिल करे"

जब लंड अच्छे से चिकना हो गया तो अब उसका सुपाडा और भी ख़तरनाक लग रहा था. ताईजी की चूत तो शायद आज ही उन्होने कोरी की थी. हल्का गुलाबी भाग थोड़ा नज़र आ रहा था जिसके किनारे थोड़े साँवले लेकिन बाहर पूरी गोरी थी. दोनो मोटी जांघें आपस मे बिल्कुल सटी हुई थी.

"ताईजी आप ऐसे खड़ी हो जाओ." अर्जुन ने ललिता जी को दीवार के उपर दोनो हाथ रख के धकेलने की मुद्रा बनाने को कहा. वो भी अनुसरण करती अपने टाँगे फैलाए खड़ी हो गई. पहली बार अर्जुन ने उनकी बड़ी, गोल और ऐसी मज़े मे थिरकती गान्ड देखी तो वो उसकी दरार मे हाथ फेरता उनका जाएजा लेने लगा. दरार इतनी गहरी थी उंगली के 2 पोर अंदर धँस रहे थे.

ललिता जी की चूत गीली हो रही थी तो उन्होने अपनी कमर झटकी. "कर कुछ या ऐसे ही सहलाता रहेगा."

उनकी आवाज़ मे भारीपन सा था और उनकी हालत देख कर अर्जुन हल्का सा उनपर झुका और टाँगों के बीच मे से अपना लंड उनकी चूत की खुली फांको पर रगड़ने सा लगा.

"आह बस अब अंदर कर दे रे." उसके लंड की गर्मी उनकी आग बढ़ा ही रही थी. अर्जुन ने अपने लंड को जड़ से पकड़ते हुए उनकी चूत पर मजबूती से टीका कर अपने कूल्हे ज़ोर से आगे की तरफ धकेल दिए.

"आई. मॅर गई रे. बस. कुछ देर आ रुक." 3 बच्चे निकालने के बाद भी चूत जैसे वापिस बंद ही हो चुकी थी जो आज फिर से इस भीषण लंड के सुपाडे

ने खोल दी थी.

"ताईजी . आपकी तो टपने लग रही है. मेरा तो अंदरही फँस गया जैसे."अपना आधा लंड अंदर गुसाए अर्जुन एक हाथ से उनके कूल्हे को दबाता

दूसरे से उनके लटकते मोटे दूध को मसलने लगा था. चूत किसी गुलाबी डोरी की तरह लिपटी थी लंड के इर्दगिर्द .

"तेरा ये औजार तो मेरी जैसी औरत की भी चीखे निकाल देता है रे." गान्ड पीछे को लंड पर मारती ललिता जी अब थोड़ी सहने की हालत मे आ गई थी.

अर्जुन उतने ही लंड को खींच कर धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा. शुरू मे तो चूत की अंदर की खाल भी बाहर को साथ निकलती. जैसे जैसे लंड ने गति पकड़ी उनकी चूत भी अच्छे से जगह देने लगी अर्जुन के मोटे लंड को. दोनो कुल्हो को थोड़ा उपर खींचते हुए अर्जुन ने एक करारा झटका दिया तो उसके अंडकोष ताईजी की गद्देदार गान्ड से टकरा गया और ललिता जी की आँखो मे हल्की नमी आ गई.

"कमीने.. मॅर जाउन्गी ऐसे.. आ. एक बार मे पूराही ठोक दिया.. आ मा."

दोनो अब एक दूसरे से चिपक से गये थे लेकिन उनकी गान्ड का उभार अर्जुन को उत्तेजित करता रहा तो उसने लंबे और धीमे धक्के लगाने शुरू कर दिए.

"मैं गई रे आ.. आ आ.. मुन्ना रुक रे.. कोई 15-20ही लंबे धक्को मे चूत पूरी भीग गई थी उनकी और शरीर अकड़ गया था.

कुछ देर अर्जुन उनसे ऐसे ही चिपका रहा और पीछे खड़ा दोनो मोटे बॉब्बे दबाता रहा. लंड की तो परछाइ भी ऐसे नज़र नही आ रही थी. 2 मिनिट के बाद किसी घुड़सवार सा वो बिना ललिता जी की परवाह किए उनकी चूत को चौड़ा करने मे लग गया.

"ताई बहुत मजेदार हो आप. आ देखे कैसे जा रहा है आपके अंदर." ललिता जी कस के छोड़ते हुए उसने उन्हे शीसे मे दिखाया.

बाहर को निकली मोटी मटके जैसे गान्ड के नीचे किसी बाँस के डंडे सा अर्जुन का लंड ललिताजी को अपने अंदर बाहर होता दिखा. कैसे उनके दूध के मटके हर धक्के पर हिल रहे थे. वो तो ये दृश्य देख कर मंत्रमुग्ध सी अपनी चूत कुटवाने लगी. होश तब आया जब अर्जुन ने उनकी चूत रस से भीगी अपनी उंगली उनकी गान्ड के छेद पर दबाई.

"अर्रे वहाँ नही बेटा. आ. आगे ही करता रह.. मेरा पिछवाड़ा तेरा डंडा झेल नही पाएगा. आ." इतना ही बोल पाई थी की लंड जड़ तक अंदर बिठाए अर्जुन ने अपनी तर्जनी उंगली गान्ड के सुराख मे पेल दी और एक पल रुक कर उसको आगे पीछे करने लगा.

ललिता जी को चूत में तूफान सा आता महसूस हुआ और फिर 3-4 धक्को के बाद ही उनकी टांगे काँपने लगी. अर्जुन ने भी उनके पानी को अपने लंड पर महसूस कर लिया था. "पच" की आवाज़ से लंड बाहर था और ललिता जी नीचे बैठी थी.

"रुक जा रे. जान निकाल दी तूने तो. ये कहा से सीखा जो अभी किया?" उनकी चूत गान्ड पर हुए हमले से झड् गई थी.

"पता नही ताईजी , बस ये प्यारी लगी तो मैने अंदर उंगली डाल दी." और वो उन्हे ऐसे ही नंगे बदन उठाकर कमरे मे ले आया. एक घर फिर वो किसी घोड़ी की तरह बिस्तर पेर थी और अर्जुन बिस्तर से नीचे खड़ा उनकी गान्ड को फैलाकर अपना लंड चूत पर रखने लगा.

"एक बार मे ही डाल देना रे." ताईजी की बात पूरी भी नही हुई थी की जड़ तक लंड अंदर था. अगले 7-8 मिनिट बस सिसकारिया ही गूँजती रही थी कमरे मे और उनकी गान्ड और चुचे दबाता अर्जुन अपनी ताईजी की बच्चेदानी तक सुरंग को खोलता रहा. चूत में इतना तेज संकुचन हुआ की अर्जुन का लंड उसमे फ़स के फूलने लगा और ताईजी की हिलती गान्ड के 2-3 झटको ने लंड को भी खाली करना शुरू कर दिया.

"आ ताईजी .. मेरा भी आ.. आपके अंदर." इतना बोलकर वो उनकी गान्ड के उपर ढहता चूत में वीर्य की बारिश करने लगा था. 5-6 गहरी पिचकारियों ने इतना चूत को भर दिया था कि किसी सफेद धार सा उसका रस चूत से बाहर निकलने लगा. दोनो होंठ फैले हुए इस अद्भुत चुदाई का वर्णन कर रहे थे. मोटे दूध के उपर उनके निपल तो किसी छोटे काले अंगूर से कड़े और सख़्त हो चुके थे.

"सच बोलती हूँ रे. ऐसा सुख सिर्फ़ तूने ही मुझे दिया है. एक बार मे ही ऐसा लगता है के अब कभी चूत लंड ना माँगेगी लेकिन सुबह फिर इसकी खुजली होने लगेगी ये याद करते ही." अपने आप को हिम्मत देती सी ताईजी बिस्तर से खड़ी हुई और टांगे फैला कर चलती बाथरूम मे गई.

अर्जुन लेटा हुआ उनकी फैली गान्ड देख रहा था.

"अगली बार यही करूँगा." मन मे खुद से कहता वो भी उठ खड़ा हुआ कपड़े पहन ने के लिए. बाथरूम मे ताईजी के सामने ही उसने पाजामा पहना तो वो उसको बाहर जाने को कहने लगी.

"मुझे पेशाब करना है, तू बाहर जा." वो नही गया तो उसके सामने ही बैठ कर मूतने लगी थी की जलन से एक मादक सी आह निकल गई.

"कितना बेशरम हो गया है रे. अब अपनी ताई को मूतने भी अकेले नही देगा." रुक रुक कर निकलता पेशाब भी उनको मज़ा दे रहा था.

"ताईजी अगली बार मैं वहाँ करूँगा, पीछे." अर्जुन ने अपने पाजामे को नीचे कर साबुन अच्छे से धोया फिर मूह और हाथ भी और बाहर आ गया.

ललिता जी उसकी बात सुनकर बस मुस्कुरा दी. गान्ड उनके पति ने खूब मारी थी. लेकिन पिछले 13-14 साल मे तो जैसे राजकुमार जी का अब उनकी गान्ड मे ढंग से बैठ नही पाया था. 7 साल से वो सुनी ही थी.

"पिछवाड़ा खुल गया तो फिर चलने बैठने से भी जाउन्गी मैं." खुद से कहती वो बाहर आई और उसके कमरे को जल्दी जल्दी ठीक करने लगी. एक घंटा होने को आया था उन्हे उपर आए हुए. 10 मिनिट मे ही सब ठीक कर वो नीचे चल दी. टांगे अभी भी फैला कर ही चल रही थी वो लेकिन ज़्यादा पता नही चल पा रहा था सारी की वजह से.

इधर अर्जुन बिस्तर पेर लेट गया था क्योंकि मेहनत कुछ ज़्यादाही हो गई थी.

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