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प्रारंभ (शुरुआत)
पंडित जी को बागवानी का बहोत शॉक है. अपनी मेहनत से उन्होने 1000 गज के अपने घर मे 500 गज
जगह मे एक खूबसूरत बगीचा बनाया हुआ था जो पूरे घर को और आकर्षक बनाता था. गुलाब, गेन्दा,
चमेली, अशोक, अमरूद, पपीते, अंगूर ऑर पता नही कॉन कॉन से पौधे लगा रखे थे उन्होने. अपने
बच्चो की तरह ध्यान रखते थे वो अपने बगीचे का और उनका पूरा साथ देता था उनके दोनो पोते का.
अपने घर का नाम उन्होने रखा था "संसार" और वाकई मे ये एक संसार ही तो था जिसको उन्होने
अपनी संगिनी कौशल्या के साथ मिलकर बनाना शुरू किया था जब उनके बच्चे भी नही हुए थे. और
आज यही घर सिर्फ़ घर नही रहा था. आशियाना था ये एक भरे पूरे संस्कारी परिवार का. लेकिन
समय कब एक सा रहा है.
2 मंज़िल का ये घर सबके रहने के हिसाब से ही बनाया गया था. जैसे जैसे सदस्य बढ़ते गये
वैसे वैसे कमरे भी बनते गये. पहली मंज़िल पे सबसे आगे रामेश्वर जी की बैठक थी जहाँ
3 सोफे और एक दीवान सजे रहते थे. और कुछ कुर्सिया. उसके पीछे ही थे उनका ऑर कौशल्या जी का
कमरा जिसके साथ एक मंदिर कक्ष भी जुड़ा था. आँगन और बड़ी रसोई इनसे आगे और फिर आख़िर मे 4
कमरे और बने थे. एक कमरा था राजकुआर जी ऑर उनकी पत्नी का, उसके साथ मे उनकी दोनो बेटियो मधुरी ऑर अलका का,
तीसरा कमरा था कोमल और ऋतु का और सबसे आख़िर मे रेखा और शंकर का. शंकर तो महीने मे
कभी एक या 2 बार ही आते थे. सभी कमरे हवादार ऑर बेहद प्यार से सजाए गये थे.
दूसरी मंज़िल. यहाँ पे जाने के लिए 2 रास्ते थे. एक घर के मुख्य द्वार के पास बनी गोलाकार सीढ़ियो
से ऑर दूसरा पिछले आँगन मे बने बाथरूम के साथ बनी सीढ़ियो से. उपर तो कोई आँगन था नही
लेकिन वहाँ 2 पार्टीशन थे. सामने वाले भाग मे 2 कमरे, एक ड्रॉयिंग रूम, एक बाथरूम और एक रसोई जो अब स्टोर का ही काम करती थी. पिछले पोर्शन मे 2 कमरे और एक बाथरूम था. ये वाला हिस्सा अधिकतर बंद ही
रहता था. अगले हिस्से मे सीढ़ियो के सामने वाले कमरे मे संजीव सोता था और दूसरा कमरा था अर्जुन
का. जहाँ सिर्फ़ किताबें ऑर एक सिंगल बेड ही था. पूरे घर मे टीवी सिर्फ़ 2 ही थे. एक पहली मंज़िल
की बैठक मे और दूसरी मंज़िल के ड्रॉयिंग रूम मे. संजीव ने वही पे एक छोटी जिम भी बना रखी थी.
इतना संपन्न परिवार था रामेश्वर जी का लेकिन एक और खास बात थी कि पूरे घर मे कही भी ए.सी. नही
लगवाया गया था. हाँ 4 कूलर ज़रूर थे. ये वो दिन थे जब बिजली भी बहोत जाती थी और ज़्यादा इनवेर्टर
भी प्रचलन मे नही थे. गर्मियो मे बड़े लोग तो नीचे दोनो आँगन मे सो जाया करते थे ऑर बच्चे उपर
खुली छत पे.
आस-पड़ोस भी बड़ा शांत और हरा-भरा था. घर लगभग सभी बड़े थे तो दूर-दूर भी थे. लेकिन
इसके आसपास सभी सहूलियत भी थी. पार्क, थोड़ी दूर पे मार्केट, 3 बड़े स्कूल और एक कॉलेज भी था.
शहर का सबसे खुला सेक्टर था ये और शांतिपूर्ण भी.
चलिए वापिस कहानी पे चलते है.
अर्जुन नहा धो के आया और फिर पंडित जी के पास गया आशीर्वाद लेने. आज उसका आख़िरी इम्तिहान है
दसवी कक्षा का. और इसके बाद एक महीने का आराम.
रामेश्वर जी (आरएस)- मेरा शेर आज कुछ ज़्यादा ही सोया लगता है. बर्खुरदार इतनी मेहनत भी नही करो
कि बिस्तर पकड़ लो. साइन्स का पेपर है?
अर्जुन - क्या बाबा, आप ही तो बोलते हो जिनके सपने बड़े हो उन्हे ज़्यादा जागना चाहिए उन्हे पूरा करने
के लिए. बस ये पर्चा आज हो जाए फिर तो मैं आपके साथ रोज नये फूल उगाउन्गा हमारे बगीचे मे.
आरएस- क्यो नही बेटे. हम दोनो चलेंगे यूनिवर्सिटी और जो नई किसमे आई है वो लगाएँगे यहाँ.
फिर कौशल्या देवी ने अर्जुन को दही-शक्कर खिला के विदा किया. फिर अर्जुन अपनी माँ और ताई
जी के पाव छू आशीर्वाद ले निकल गया.
घर के पास ही उसके क्लासमेट संदीप का भी घर था. अर्जुन और संदीप साथ चल दिए स्कूल.
संदीप- भाई आज का क्या इरादा है? देख आख़िरी दिन है तेरे पास जवाब देने का. मैं तेरी जगह होता
तो कब का खिलाड़ी बन चुका होता.
अर्जुन- पागल है क्या? भाई अभी ये सब की उमर नही अपनी. और उपर से वो मुझे पसंद भी नही.
संदीप - देख मेरे भाई आकांक्षा पे पूरा स्कूल जान देता है और वो सिर्फ़ तुझे देखती है. सुना था
ना इंग्लीश वाले पेपर क टाइम राणा और कुलविंदर क्या बोले थे. "अर्जुन की जगह हम होते तो कब का पेल
दिया होता उस पर-कटी को". देख आज पेपर के बाद जब वो तुझे बुलाए तो कम से कम अकेले मे एक बार
मिल तो लिओ उस से. फिर चाहे जो दिल कर वो करिओ भाई.
अर्जुन- देख भाई ये जो भी है कुछ सही नही है. मैं तुझे मेरी ज़िंदगी का लक्ष्य समझा नही सकता
लेकिन जो तू मुझे सलाह दे रहा है ये उसमे विघ्न ज़रूर डाल सकती है. और रही बात सिर्फ़ मिलने की
तो चल मैं आज मिल लेता हूँ उस से.
(राणा और कुलविंदर स्कूल के सबसे बदनाम लड़के थे. और वो 2 साल सीनियर भी थे अर्जुन के. हर लड़की
इनको सिर्फ़ काम की देवी ही लगती थी. लेकिन दिल के सॉफ थे वो दोनो. सामने से किसी को कुछ नही कहते थे
लेकिन इनके खुद के फैलाए झूठे क़िस्सों ने इन्हे बदनाम किया हुआ था)
बातें करते हुए संदीप और अर्जुन स्कूल पहुँच गये. वहाँ पे खड़ी स्कूल बस से सभी स्टूडेंट्स को
उनके सेंटर पे लेके जाया जाता था. एक बस देख दोनो चढ़ गये लेकिन यही ग़लती हो गई. पूरी बस मे
सिर्फ़ 2 सीट खाली थी जिसमे से एक पे संदीप बैठ गया और दूसरी सीट जिसके साथ वाली सीट पे एक बेहद
ही खूबसूरत सी लड़की बैठी थी वो खाली थी. अर्जुन वही रुक गया बस के गेट पे. लेकिन तभी उनकी
स्कूल टीचर मिसेज़ वालिया की आवाज़ आई.
मिसेज़ वालिया - अर्जुन. खड़े क्यो हो. चलो बैठो वहाँ पे आकांक्षा के साइड मे.
अर्जुन - यस मॅम.
ये वही लड़की थी जिसके बारे मे संदीप बात कर रहा था. दूध सी गोरी, आँखों पर एक स्टाइलिश
नज़र का चश्मा, हल्के गुलाबी होंठ, भूरी आँखें. लड़की क्या साक्षात परी थी वो. और जो मुस्कान
उसके चेहरे पे आई मेडम की बात सुन के बेहद दिलकश. अर्जुन चुपचाप जा कर उसके बगल मे बैठ गया.
आकांक्षा- हाई (बेहद शालीनता से)
अर्जुन- हेलो आकांक्षा
आकांक्षा- नाराज़ हो. देखो उस दिन मैं हार गई थी खुद से और सबके सामने अपने प्यार का इज़हार कर दिया.
मैं और कुछ नही कहूँगी अर्जुन. तुम्हे मेरा प्यार क़बूल हो या नही. बस एक बार पेपर के बाद मुझे
5 मिनिट दे देना. और कुछ नही चाहिए.
अर्जुन- ठीक है. वापिस स्कूल आने के बाद.
ये दोनो जो भी बात कर रहे थे ये इतनी धीमे हो रही थी की शायद ही किसी को सुनाई दे. एग्ज़ॅम का सेंटर
15 किमी दूर था और अभी काफ़ी टाइम बाकी था. दोनो खामोश हो गये थे अब. बाकी स्टूडेंट्स कुछ डिसकस कर
रहे थे कुछ शोर मचा रहे थे. आज आख़िरी इम्तिहान जो था. आकांक्षा खिड़की से बाहर देख रही थी
अपनी ही विचारो मे गुम. अर्जुन, जो संयम और अनुशासन का पक्का था आज उसने पहली बार कनखियो से
उस लड़की की तरफ देखा. उसकी गुम्सुम सी भोली सूरत, सफेद रब्बर मे बँधे गर्दन तक आते बाल जिनमे
से कुछ आज़ाद होकर हवा से उड़ रहे थे. सफेद स्कूल शर्ट मे उसका गुलाबी चेहरा ऐसा लग रहा था
जैसे एक दूध पे रखा गुलाब हो.
"चलो चलो जल्दी करो सब. सब लाइन से एंट्री करेंगे", स्कूल टीचर की आवाज़ सुनाई दी अर्जुन को.
अर्जुन अपने ही मन मे, "ये क्या हुआ. आज एक मिनिट मे ही सेंटर पहुँच गये."