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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

ज्योति ने झुक कर जैसे ही अर्जुन की चैन खोलनी चाही.. "ट्रिंग ट्रिंग.. बाहर बेल बजी."

उसने जल्दी से अपना टॉप पहना और बिना चेहर ठीक किए गेट खोला..

"आरू यहा आया है क्या?" ये थी कोमल दीदी

"हा वो टीवी देख रहा है. बुलाती हू.. अर्जुन कोमल दीदी बुला रही है."

ड्रामा क्वीन... अर्जुन अपनी शर्ट पहन के बाहर आ चुका था.

कोमल कोई बच्ची नही थी. उसने देख लिया था ज्योति की हालत को.. उसके नंगे पेट और अस्त-व्यस्त सलवार को..

लेकिन उसको अर्जुन पर बिल्कुल शक नही हुआ. वो तो छोटा बच्चा जो है.
 
अपडेट 5

वासना/प्यार और भैया का उपहार

दोपहर के 4 बज रहे थे और बैठक मे रामेश्वर जी के पास राजकुमार जी और अर्जुन कुर्सी पे बैठे थे.

रामेश्वर जी- राजकुमार कल समय निकाल कर अर्जुन को अपने साथ साइकल दिलवाने ले जाना. और जो इसको पसंद

हो वही लेने देना.

राजकुमार जी - बिल्कुल ले जाउन्गा. और जैसी साइकल ये लेना चाहे ले लेगा बाबा.

अर्जुन बीच में ही बोल उठा. "साइकल क्यो? बाबा आपने बोला था मुझे दसवी के बाद संजीव भैया वाला

स्कूटर मिल जाएगा. तो फिर अब ये साइकल कहा से आ गई?

रमेश्वेर जी ने हंसते हुए बोला, "बेटा, स्कूटर तो है ही तुम्हारा लेकिन उसका तुम क्या करोगे? हा लेकिन

साइकल इसलिए क्योंकि गुरुवार से तुम्हे स्टेडियम जाना पड़ेगा रोज शाम को 2-3 घंटे. मैने वहाँ सब बात

कर ली और मैं तो चाहता था कि वो तुम्हे कल से ही बुला ले. लेकिन कोई प्रतियोगिता चल रही है वहाँ

इसलिए अभी 3 दिन और तुम मौज मार लो. और हा, साइकल ऐसी लेना जो तुम्हे समय से वहाँ पहुचा सके. 10

किमी है स्टेडियम यहा से."

"बाबा ये तो ग़लत बात है. मैं स्कूटर भी तो लेके जा सकता हू ना स्टेडियम. और समय भी बचेगा

ऐसे मे." बुझे मन से वो बोला

"जोगिंदर जी ने बेटा मुझे सख्ती से ये बात कही है. जिस से तुम्हारी कसरत पहले ही हो जाए और बॉक्सिंग

पे ज़्यादा अच्छी तरह ध्यान दे सको.. मुझे स्कूटर से कोई ऐतराज नही लेकिन ये सब तुम्हारे भले के लिए

ही तो कर रहा हू. और हाँ, इस सब मे तुम्हारा सुबह का रुटीन वैसा ही रहेगा. स्टेडियम शाम को 4-6 बजे

रहना है." बड़े प्यार से उन्होने ये बात कही तो अर्जुन को भी समझ आ गया के दादा जी की बात सही है

"और तुम राजकुमार, अपनी मा से पैसे ले लेना. ये साइकल मेरी तरफ से तोहफा है मेरे प्यारे बच्चे को."

"जी पिता जी."

"अर्जुन.. अर्जुन बेटा जा छत पे कोमल के साथ जाकर आचार के मर्तबान उठा ला. और हा जो साबुत मिर्च

सूखने रखी है चटाई पे उनको भी ज़रा हिला देना." कौशल्या जी ने दूसरे कमरे से आवाज़ देते हुआ कहा.

"चल जा बेटा नही तो थानेदार्नी की आवाज़ फिर से आएगी. और हा ये 3 दिन खूब आराम कर कुछ नही कहूँगा

लेकिन फिर तेरी एक नही सुनूँगा." रामेश्वर जी ने टेबल से अख़बार उठाते हुए कहा तो अर्जुन भी चल दिया.

"कोमल दीदी कहा हो?" आँगन मे पहुच के अर्जुन ने अपनी बड़ी बेहन को आवाज़ लगाई. और तभी कोमल अपनी मा

के कमरे से बाहर आकर उसके सामने खड़ी हो गई.

"क्यों चिल्ला रहा है भाई.? यही तो हू, मैं कहा जाती हू कही बाहर", कटाक्ष के साथ उसने अर्जुन को छेड़ा

"वो दादी जी ने बोला है छत पर चलने को. आचार के मर्तबान लेकर आने है ओर मिर्च भी देखने को कहा".

"अच्छा -अच्छा चल." कोमल ने कहा

जब अर्जुन ने कोमल को आवाज़ दी थी तब कोमल अपनी मा से सर की मालिश करवा रही थी. उसने एक पुराना सा

खुले गले का सूट और एक वैसी हे खुली सलवार पहनी थी. शरीर भी एकदम मांसल था तो वो पुराना

पतला सा कपड़ा भी ग़ज़ब ढा रहा था. दोनो भाई बेहन चल दिए तीसरी मंज़िल पे.

"चल थोड़ा सा हिला इन मर्तबान को." कोमल ने अर्जुन को मर्तबान की तरफ इशारा करते हुए कहा.

इतनी सीढ़िया चढ़ने की वजह से उसकी सास फूली पड़ी थी. लेकिन अर्जुन बिल्कुल ठीक था क्योंकि वो तो रोज

ही 10 किमी दौड़ लगाता था. लेकिन जैसे ही उसने अपनी बेहन की तरफ देखा उसके होश उड गये. हुआ यू की इतना

उपर आने की वजह से कोमल के माथे पे कुछ पसीना आ गया था जिसे वो अपने सूट को उठा कर पोंछ रही

थी. उसके लिए ये कोई नई बात नही थी क्योंकि अर्जुन तो उसके लिए आज भी एक बच्चा था. लेकिन अब अर्जुन

वो पुराना अर्जुन कहा रहा था कल रात के बाद से.

अर्जुन ने देखा अपनी बड़ी बेहन के मखमली पेट को और गहरी नाभि को जो बेहद दिलकश लग रही थी. और

उसकी त्वचा पे कुछ नमी सी भी थी. ये दृश्य इतना मनमोहक था कि उसको कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था.
 
"अब खड़ा क्या है? चल इनको पकड़ के हिला तभी तेल सही से जाएगा आचार मे.."

"हाँ... हाँ करता हू." कहकर अर्जुन ने वो 10-10 किलो के मर्तबान पकड़ कर हिलाए. लेकिन उसका सारा ध्यान

तो अपनी बेहन पे ही था. सूरज की मध्यम रोशनी मे उसका चमकता हुआ रक्तिम चेहर, बड़ी बड़ी आँखें

जैसी कोई काला हीरा हो. बड़े और गुलाबी होंठ.. ये सब देखते देखते उसके पेंट मे तनाव आने लगा.

"अच्छा अब यहा सामने आ और जैसे मैं कर रही हू वैसे तू भी कर. ये मिर्चे सही से फैलानी है." इतना

बोलकर कोमल झुक गई चटाई पे अपने दोनो पैर मोड़ कर. और ये नज़ारा तो कही ज़्यादा जानलेवा था अर्जुन

के लिए. ऐसे झुकने से कोमल के दोनो ठोस गुब्बारे लगभग एक तिहाई उसके सूट से बाहर झाँक रहे थे.

देख के ही पता लग रहा था कि वो कोमल की तरह ही कोमल और तने हुए थे. उसके दाएँ उभार के ठीक

उपर एक बड़ा सा भूरा तिल था जो और भी क़यामत बना रहा था इस मंज़र को.

अर्जुन को काम ना करते देख कोमल ने सर उठाया तो देखा उसके भाई का ध्यान किधर है. एक पल के लिए

वो चोंक गई लेकिन फिर बिना अपनी स्थिति को ठीक किए उसने ज़रा ज़ोर से उसको आवाज़ दी. अर्जुन बिना कुछ

कहे अपने दोनो हाथों से मिर्चे फैलाने लगा.

"बस ये हो गया अब एक घंटे बाद मिर्च उठा लेंगे. चल 2 मर्तबान तू उठा और एक मैं लेके चलती हू." इतना

बोलकर कोमल ने एक मर्तबान उठाया और अर्जुन को थमा दिया जो उसने अपने दाएँ हाथ मे अपनी छाती से चिपका

लिया. फिर दूसरा थामने लगी तो उसका दाया उभार पूरी तरह से अर्जुन के बाए हाथ पे फिसल गया. कोमल

के मूह से एक धीमी आ निकल गई. पर अर्जुन ने कुछ भी जाहिर नही किया.

कोमल आगे चल रही थी और पीछे अर्जुन. उसकी नज़रे अपनी बेहन के बड़े बड़े पुष्ट नितंबों पे ही गढ़ी थी.

उनकी थिरकन देख के अब अर्जुन के मन में हलचल कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी.

"ये क्या कर रहा हू मैं. ये दीदी है मेरी. " इतना सोचते ही वो खुद पर शर्मिंदा सा होने लगा. और दोनो भाई

बेहन नीचे पहुँच गये. समान रसोई घर मे रखने के बाद अर्जुन उपर वाले ड्रॉयिंग रूम मे जा कर बैठ

गया. उसका दिल कुछ ज़्यादा ही अशांत हो रहा था. आज एक हे दिन मे उसकी नज़रे कितनी बदल गई थी. ये क्या था?

संजीव भाई की बात याद आई तो उसे ये लगा के ये भी शायद प्यार हे है. लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?

"क्या कर रहा है छोटे?" संजीव भैया अंदर आते ही उस से बोले.

"कुछ नही भैया. आप कहाँ थे. आज तो मैं बोर हो गया. और आपने बोला था कल कुछ लेकिन आप भूल गये."

अर्जुन ने सवालो की बौछार शुरू कर दी भाई से मिलते ही.

"अर्रे बस कर भाई. मुझे सब याद है तभी तो बाहर गया था. चल कपड़े बदल हम दोनो को अभी ज़रूरी

जाना है कही." इतना बोलकर वो अपने कमरे मे चले गये. और अर्जुन भी कपड़े बदलने चला गया. 10 मिनिट

बाद दोनो भाई स्कूटर पे निकल दिए पुराने शहर की तरफ. दोनो ही चुप थे. शाम होने लगी थी. थोड़ा

दूर आते ही संजीव ने एक पनवाड़ी के सामने स्कूटर रोका और गोल्ड फ्लेक का एक पॅकेट लिया. पास ही एक मेडिकल

स्टोर था. वो अर्जुन को वही रुकने का बोल कर स्टोर मे चले गये. बाहर आकर स्कूटर स्टार्ट किया और एक

बार फिर दोनो चल दिए. 20-25 मिनिट के बाद दोनो भाई एम सी क्वॉर्टर्स के एक क्वॉर्टर के बाहर खड़े थे.

"ये हम कहा आए है भैया? आपका कोई दोस्त रहता है क्या यहा?"

"हा कुछ ऐसा हे." संजीव ने स्कूटर को डबल स्टॅंड पर लगाते हुए जवाब दिया और चल दिया घर के भीतर.

अर्जुन भी भाई के पीछे ही चल दिया. घर के अंदर लगी बेल बजाई तो एक 35-36 साल की महिला ने जाली

वाला दरवाजा खोल उनका स्वागत किया. ये एक 2 कमरे का छोटा सा क्वॉर्टर था. सब कुछ बहुत ही करीने से सज़ा

था. एक छोटी सी रसोई थी वही सामने.

"क्या पेश करू जनाब की खातिर मे?" बड़ी अदा से वो महिला संजीव की गोद मे बैठ ते हुए बोली.

"मालती, ये है मेरा छोटा भाई. लेकिन ये बड़ा हो रहा है तो सोचा तुमसे कुछ ट्रैनिंग ही दिला दूँ." कहते

हुए संजीव ने उसकी एक चूची दबा दी.
 
"क्या पेश करू जनाब की खातिर मे?" बड़ी अदा से वो महिला संजीव की गोद मे बैठ ते हुए बोली.

"मालती, ये है मेरा छोटा भाई. लेकिन ये बड़ा हो रहा है तो सोचा तुमसे कुछ ट्रैनिंग ही दिला दूँ." कहते

हुए संजीव ने उसकी एक चूची दबा दी.

अर्जुन ये सब देख बड़ा हैरान हुआ. उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके भैया एक ही दिन मे उसके

लिए ये सब कर रहे है. फिर उसका ध्यान गया उस औरत पे. साँवली और पतली सी थी वो. हल्के से छाती पे

उभार, एकदम सपाट कमर और नीचे थोड़े बाहर को निकले हुए नितंब. कुल मिलकर एक साधारण सी औरत थी.

"डार्लिंग तो कहाँ से शुरू करे?" भैया की इस आवाज़ से अर्जुन का ध्यान हटा तो देखा भाई ने उसकी चुचि

दबाई हुई थी और मालती पेंट के उपर से उनका लिंग सहला रही थी.

"फर्स्ट टाइम है तो पहले तुम स्टार्ट करो और फिर इसका नंबर आएगा. देखते है इसका एंजिन कितना दमदार है."

मुस्कुराती हुई मालती ने संजीव की शर्ट खोल दी और संजीव ने भी फुर्ती से उसको नंगा करना शुरू कर दिया.

2 ही मिनिट के बाद वो दोनो एकदम नंगे खड़े थे. मालती अपने चूतड़ मटकाती हुई दूसरे कमरे की तरफ चल

दी और संजीव उसके पीछे और सम्मोहित सा अर्जुन भी.

"पहले ज़रा गीला तो कर दे मेरी जान, ऐसे मज़ा नही आएगा." कहते हुए संजीव ने अपना खड़ा लिंग मालती

के होंठो की तरफ कर दिया और उसने भी पलक झपकते ही पूरा लिंग उतार लिया अपने गले मे. बड़ी अदा से

वो संजीव के पूरे लिंग को अपने होंठो से निचोड़ रही थी और वही संजीव उसके बड़े निपल खींच रहा

था. 5 मिनिट बाद स्थिति अलग थी. मालती बेड पे टांगे खोले पड़ी थी और संजीव अपने लिंग पे कॉंडम

चढ़ा रहा था.

"ये गुब्बारा क्यो लगा रहे हो भैया?" मासूमियत से अर्जुन ने अपने भाई से पूछा.

"भाई ये निरोध है. अगर माल अंदर गिरा दिया तो बच्चा भी पैदा हो सकता है. और कोई बीमारी भी लग

सकती है. ये सेफ सेक्स के लिए होता है."

अब अर्जुन का ध्यान गया मालती की योनि पे जहाँ काले घुंघराले बालो के नीचे एक लाल सा छेद था और

उसके बाहर लटके हुए 2 होंठ. पहली बार वो एक असली योनि देख रहा था. अब उसका भी लिंग अंगड़ाई ले

चुका था.

"तो खेल शुरू करे जानेमन?" संजीव ने मालती की टाँगे उठाते हुआ पूछा.

"मैं तो कब से तड़प रही यार. घुसा दे पूरा एक ही बार मे. और तू वहाँ क्यो खड़ा हा, इधर आ." मालती

ने अर्जुन को पास बुलाया.

यहा संजीव ने एक जोरदार झटका मारा और उसका पूरा लिंग समा गया उस लाल से चीरे मे. मालती के मूह

से एक आनंद भरी आह निकली. और उसने पेंट के उपर से ही अर्जुन का लिंग पकड़ लिया. यहा संजीव पूरे जोश

मे अपने कूल्हे हिला रहा था और उसका लिंग मालती की योनि से अंदर बाहर हो रहा था. और मालती ने अर्जुन

की ज़िप खोल के उसका लिंग पकड़ लिया था. जो अब पूरे आकार मे सर उठाए खड़ा था. आनंद से उसकी आँखें

बंद हो चुकी थी. कुछ गीला सा महसूस हुआ अपने लिंग पे तो देखा के उसका लिंग मुण्ड, जो एक बड़े अंडे के

आकार का था वो मालती के मूह मे था. वो तो इस एहसास से ही मरा जा रहा था. क्या है ये सब? स्वर्ग

शायद यही है.

खुद बा खुद ही उसकी कमर हिलने लगी और जब उसका ध्यान हटा तो देखा के उसने कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से

कमर हिला दी थी ओर मालती अब खांस रही थी.

"क्या हुआ? अच्छा लगा मेरे छोटे भाई का हथियार?", भैया ने मालती को ताना मारा और ज़ोर से पेलने लगे

मालती ने भी अर्जुन के हाथ पकड़ के अपनी चुचियों पर रख दिए थे.

"इनको ज़ोर से मसल बेटा. खींच ले ये निप्पल और लाल कर दे इन चुचियो को", मालती और पता नही क्या

बोलती जा रही थी. इधर एकदम से भैया हट गये और वो गुबारे मे उनका वीर्य जमा हुआ था.

"चल छोटे आजा यहा और ये निरोध पहन." भैया ने अर्जुन को पास बुलाया और एक नया निरोध पकड़ा दिया

उसके हाथ मे.

"इधर ला मैं पहनाती हू इसको. देखु इसका भी जोश कैसा है. तू तो कभी 10 मिनिट टीका नही." मालती

थोड़ा अजीब लहजे मे बोली संजीव भैया से और फिर रब्बर की तरह अर्जुन के लिंग पे निरोध चढ़ाने लगी.

"इसको यहा रख और बहुत आराम से अंदर डाल. पूरा मत डाल दियो बहनचोद." वासना की आग मे जलती मालती

के मूह से गाली निकल गई. अर्जुन को बुरा लगा सुनकर तो वो वहाँ से हटने लगा.

"अरे मुन्ना गुस्सा हो गया? चल नही बोलती तुझे कुछ. आजा और कर दे चढ़ाई. वैसे गंदी बातें करने

से संभोग का मज़ा दौगुना हो जाता है मेरे शेर." उसने फुसलाया अर्जुन को तो अर्जुन ने अपना लिंगमुण्ड टीका

दिया मालती की खुली हुई चूत पर.
 
साँस भर के उसने धक्का मारा तो लिंग फिसल गया. मालती ने हंसते हुए एक हाथ से उसका लिंग पकड़ा और

अपने छेद पर लगा दिया.\

"चल अब मार धक्का." उसने इतना ही बोला था कि अर्जुन ने एक करारा झटका मार दिया. लगभग तीन चोथाई

लिंग एक ही बार मे अंदर. उसे ऐसा लगा जैसे उसके लिंग को किसी गरम मुट्ठी ने दबा दिया हो और वहाँ

मालती के मूह से एक मज़े के चीख निकल गई..

"हाए रे क्या जानदार डंडा है तेरा. जान ही निकाल दी एक बार तो. ज़रा रुक सांस लेने दे फिर पूरा डाल

दियो." मालती ने मज़े की आवाज़ मे बोला और फिर से उसके हाथ अपने चुचियो पर रख दिए. यहा अर्जुन ने

महसूस किया के उसके स्तन एकदम मुलायम है लेकिन उनमे वो मज़ा नही था जो ज्योति के पकड़ने मे आया था.

और ये तो पूरे उसकी मुट्ठी मे आ गये थे. ज्योति के इतने बड़े और सख़्त थे की दोनो हाथ मे भी एक पूरा

ना आए. ये सब सोचते सोचते उसने पूरा ज़ोर लगाकर धक्का मार दिया.

"उईईईईईईईईईईई माआआआआआआआआ.." ये झटका मालती को उसकी बच्चेदानी तक महसूस हुआ और उसका जिस्म

अकड़ गया.

"रुक जा थोड़ा, इतनी भी क्या जल्दी है तुझे मेरी चूत का भोसड़ा बनाने की." मालती ज़ोर से बोली

अर्जुन को तो ये भाषा समझ आ नही रही थी. लेकिन वो रुक गया और बेमन से मालती की छोटी छोटी

चूचिया दबाने लगा.

"चल आधा निकाल फिर डाल और ऐसे ही कर." मालती ने आदेश दिया अर्जुन को तो वो भी किसी मशीन की

तरह शुरू हो गया. कुछ ही देर मे मालती फिर से अकड़ गई तो उसकी चूत और गीली हो गई. अब अर्जुन

खुद बा खुद तेज तेज धक्के लगाने लगा बिना रुके. हर धक्का मालती की चूत के आख़िरी हिस्से से टकरा रहा

था और पूरे कमरे मे थपथप की आवाज़ गूँज रही थी. इतने में ही मालती ने उसका लिंग अपनी चूत से

बाहर निकाल दिया. अर्जुन हैरान सा उसको देखने लगा तो मालती बेड पे घुटनो के बल हो गई और अपने चूतड़

अर्जुन की तरफ कर दिए.

"चल अब यहा से कर."

अर्जुन को कुछ समझ नही आया तो उसने अपना लिंग मालती की गुदद्वार से भिड़ा दिया.

"कमीने वहाँ अभी नही. उसके नीचे डाल. पहली बार में ही गान्ड मारने चला है." वो बिदकते हुए बोली

तो अर्जुन ने अपना लिंग नीचे किया ही था की मालती ने अपने चूतड़ खुद पीछे धकेल दिए और लिंग सतक

से अंदर हो गया. खुद से ही अर्जुन ने उसकी कमर पकड़ ली और शुरू हो गया.

स्वचालित पिस्टन की तरह उसका पूरा लिंग अंदर बाहर हो रहा था. पूरा निरोध चिकनाई से चमक रहा था. एक बार फिर से मालती का शरीर अकड़ गया लेकिन अर्जुन किसी नशेड़ी की तरह ताबड़तोड़ धक्के लगाता रहा. कोई 20 मिनिट बाद

उसका शरीर मालती के चुतड़ों से जा चिपका और अर्जुन का शरीर रह रह के थिरकने लगा..

"ये कैसा नशा सा है भगवान." आनंद से आखें भिंचे अर्जुन अपना पानी निरोध मे खाली करने लगा.

2 मिनिट लगातार पिचकारिया मारने के बाद जब वो हटा तब भी उसका लिंग कुछ ड्द तक खड़ा था.

"बड़ा भयंकर लड़का है यार तू तो." मंत्रमुग्ध सी मालती पलट ते हुए अर्जुन से बोली. उसकी पहले से

फैली हुई चूत अब और भी फैल चुकी थी और उसकी चूत से बहता पानी उसकी जाँघ तक आ चुका था.

"हो गया भाई तेरा?" संजीव कमरे के अंदर सिगरेट पीता हुआ आया तो देखा के अब अर्जुन कुछ शर्मा

रहा था.

"क्या चोदा है तेरे भाई ने मुझे संजीव. इसने तो मुझे मेरी मा याद दिला दी. आगे चल के बड़ा

खिलाड़ी बनेगा तेरा भाई. साला अंदर जलन मचा दी इसके लौडे ने तो मेरी चूत के." बोलती हुई वो

कपड़े पहन ने लगी. अर्जुन भी अब अपने कपड़े पहन रहा था.

"चल छोटे आज थोड़ा ज़्यादा ही टाइम हो गया. घर भी चलना है." ये बोलते हुए संजीव ने अपनी जेब से

100-100 के 5 नोट निकाले और मालती को दे दिए.

"अगली बार जब तू आएगा तो तेरे भाई को भी लेते आना. इसके पैसे नही लूँगी मैं." अर्जुन को आँख

मारती मालती ने ये बात कही संजीव से तो वो बिना कुछ बोले बाहर निकल गया. अर्जुन कुछ हैरान

सा भाई के पीछे चल दिया.

"क्या हुआ भैया? कुछ काम आ गया क्या आपको?", अर्जुन ने भाई से पूछा जो अब स्कूटर चला रहा था.

"नही भाई. थोड़ा बुरा लगा बस के मैं तुझे सिखाने के चक्कर मे इस औरत के पास ले आया. लेकिन याद

रख ये सिर्फ़ तेरे लिए एक पाठ ही था. मालती मेरी ही कंपनी मे काम करती है लेकिन पैसे के बदले

मे जिस्म का मज़ा भी देती है. ज़िंदगी मे एक बात गाँठ मार ले के कभी भी किसी ऐसी औरत के चक्कर

मे नही पड़ना जो पैसे के बदले जिस्म का सौदा करे. आज जो भी हुआ बस यही भूल जा और अपनी ज़िंदगी

संवार." संजीव ने ये बात किसी गहरी सोच मे डूब के कही थी अपने छोटे भाई से. कुछ तो ज़रूर था

यहा जो शायद वो अभी बताना नही चाहता था. लेकिन अपने भाई को उसने एक बड़ी सलाह ज़रूर दे दी थी.

लेकिन क्या अर्जुन ये सलाह मानेगा? आज तो पहली बार उसने एक परम सुख प्राप्त किया था. बेशक मालती

कोई सुंदरी नही थी लेकिन आज उसके लंड ने एक चूत का मज़ा चख लिया था. क्या ये अपनी गर्मी संभाल

पाएगा या मालती का अगला शिकार बनेगा.....
 
अपडेट 6

मधुर रात-माधुरी के साथ

आज फिर जब दोनो भाई घर पहुचे तो खाने का समय चल रहा था. रामेश्वर जी तो भोजन ग्रहण

कर अपने कमरे मे जा चुके थे और राजकुमार जी भी वहाँ नही थे.

"आज तो भैया बचा लेना प्लीज़.", अर्जुन ने अपने भैया को धीमी आवाज़ मे कहा

"चिंता मत कर छोटे. मैं देख लूँगा बस तू हाथ मूह धो और चल खाना खाते है." संजीव ने अपने

छोटे भाई के सर पे हाथ फेर कर बड़े प्यार से कहा.

"मुन्ना चल आजा बैठ मैं खाना लगाती हू तेरा." ललिता जी ने बड़े प्यार से अर्जुन को पुकारा. उनकी

आवाज़ सुनकर सभी की गर्दन अर्जुन की तरफ मूड गई जो आँगन मे लगे नलके से हाथ धो रहा था.

" कहाँ था बेटा इतनी देर तक? तेरे दादा जी कई बार पूछ चुके. एक बार मिल लिओ खाने के बाद." ये

आवाज़ थी रेखा जी की. आख़िर मा थी वो तो चिंता जायज़ थी उनकी

"चाची वो आज मैं आपके मुन्ना को स्विम्मिंग क्लब दिखाने ले गया था. गर्मी की छुट्टियों मे इसको वहाँ

दाखिल करवाना है ना. फिर थोड़ा मेरे दोस्त के घर बैठ गये थे वही पास मे." संजीव ने अपनी चाची

को बताया.

"बहुत अच्छी बात है बेटा. तू साथ था तो मुझे कोई परवाह नही. सबसे ज़्यादा प्यार तो तू ही करता है

इस से. लेकिन बस दिल घबराता है ज़रा क्योंकि अभी ज़्यादा कुछ पता भी तो नही इसको दिन-दुनिया का." रेखा

जी ने सहानुभूति से अर्जुन को देखते हुए कहा. इतनी ही देर मे अलका ने 2 थाली परोस दी टेबल पर. कोमल

और माधुरी भी वही चुपचाप बैठी खाना खा रही थी. शायद दोनो ही अपनी अपनी सोच मे कही खोई थी.

"भाई वो कल मेरे कॉलेज चल पड़ोगे मेरे साथ?", रोटी रखते हुए अलका ने संजीव से कहा.

"क्यो गुड़िया, कल क्या है कॉलेज मे?, संजीव ने बिना नज़र उठाए ही जवाब दिया.

"भाई कल एग्ज़ॅम फीस जमा करवानी है और प्रॅक्टिकल सबमिशन है. ऋतु का तो कल कॉलेज है नही तो

मैं अकेले कैसे जाउन्गी?", अलका ने बड़ी उम्मीद से अपने भाई की तरफ देखते हुए कहा.

घर मे एक क़ानून और भी था. कोई भी लड़की अकेली कही नही जाती थी. कॉलेज भी साथ में ही भेजा जाता

था. माधुरी और कोमल जब कॉलेज जाती थी तो खुद राजकुमार जी या संजीव ही उन्हे छोड़ने जाते थे.

क्योंकि दोनो ही अकेले अकेले ही कॉलेज गई थी. फिर ऋतु और अलका की उमर एक समान थी और क्लास भी तो

ये दोनो एक साथ ही जाती थी. एक रिक्शा कौशल्या जी ने पक्का किया हुआ था इनके लिए. लेकिन दोनो के सब्जेक्ट

अलग थे तो अलका और ऋतु के इम्तिहान आगे पीछे थे और पेपर के बीच काफ़ी गॅप था. इसलिए रिक्शा अब

बंद करवा दिया था.

"कोई बात नही कल तुझे छोटा ले जाएगा कॉलेज. इसी बहाने ये भी देख लेगा कॉलेज कैसा होता है.

और मुझे कल स्कूटर भी नही चाहिए तो मैं पापा के साथ ही ऑफीस चला जाउन्गा." संजीव भैया

की बात सुनकर अर्जुन का चेहरा खिल गया जिसे देख सभी हँसने लगे.

"थॅंक यू भैया." चहकते हुए वो भैया से बोला जो अब अपना खाना खा कर उठ चुके थे. संजीव

रात को कम ही खाना ख़ाता था. और कभी कभी तो ख़ाता भी नही था. वो आगे बिना कुछ कहे चल

दिया उपर अपने कमरे मे.

"अर्जुन, बेटा तू छत से समान ले आया था?" ये आवाज़ थी कौशल्या देवी की.. जिसे सुनकर अर्जुन के

कान खड़े हो गये थे.

"दादी बस खाना ख़तम कर के ले आता हू. आज भैया के साथ बाहर गया था तो लेट हो गया." उसने

वही से जवाब दिया और कोमल की तरफ हाथ जोड़ दिए.

"अच्छा ठीक है. और आज तेरे बाबा की मालिश तेरे ताऊ जी ने कर दी है. मिर्चे नीचे लाने के बाद

सो जाना. सुबह तुझे जल्दी उठना होता है बेटा." अब आवाज़ ज़रा स्नेह से भरी थी.

"जी दादी. जै श्री कृष्णा." और दादी ने भी यही दोहराया और कमरे की लाइट बंद हो गई.

"दीदी, मेरा खाना हो गया. चलो मिर्चे ले आते है नीचे ." अर्जुन ने

कोमल से गुहार लगाई..

"मैं कही नही जा रही. तू माधुरी दीदी को ले जा अपने साथ." झूठे बर्तन उठाते हुए कोमल

ने कहा

"आजा भाई मैं चलती हू तेरे साथ. ये तो है ही सद्डू." इतना बोलकर माधुरी अपनी जगह से खड़ी

हुई और पसीना पोछते हुए अर्जुन के साथ चल दी.

घर मे दूसरी मंज़िल पे पिछली तरफ कुछ ज़्यादा रोशनी नही थी. पहली मंज़िल की ही लाइट से ही

हल्का उजाला हो रहा था. क्योंकि इस तरफ से संजीव और अर्जुन ज़्यादातर दरवाजा बंद रखते थे

और वो घर के सामने वाले रास्ते से ही उपर आते जाते थे. लेकिन तीसरी मंज़िल का रास्ता यही

से घूम कर जाता था. जैसे ही दोनो ने दूसरी मंज़िल पार की, ये सीढ़िया दीवार जैसे बनी हुई थी

सबसे उपर जाने के लिए और कुछ "एल" के आकार मे थी. माधुरी आगे थी और वो जैसे ही उन सीढ़ियों

पे मूडी तो एकदम पलट कर अर्जुन के गले लग गई ज़ोर से.

"बंडररर..." इतना बोल वो वही चिपक गई अर्जुन की चौड़ी छाती से.

यहा घुपप अंधेरा था तो कुछ दिखा ही नहीं दोनो को और अर्जुन को अपनी बड़ी बेहन की ठोस चुचि

अपने सीने मे धँसती महसूस हुई. "आ ह.." हल्के से उसके मूह से आनंद भरी सीत्कार निकल ही गई

और उसके दोनो हाथ माधुरी के बड़े बड़े नितंबों से थोड़ा उपर जकड़ गये.

"कुछ भी नही है दीदी. शायद वैसे ही कोई साया होगा लाइट की वजह से." उसने धीमे से अपनी

दीदी के कान मे कहा और माधुरी की पीठ को सहलाने लगा. अपने कान पे अर्जुन की गरम साँस

महसूस करके एक बार तो माधुरी की भी धड़कन तेज़ हो गई थी. उन्माद मे आकर उसने और

ज़ोर से अपने स्तन दबा दिए उसकी छाती मे. अर्जुन को भी ऐसा लगा जैसे दीदी के ये भारी

भरकम गोले नंगे हो और उसके पेंट मे फिर से तनाव होने लगा. जो माधुरी की योनि से ज़रा

उपर उसकी नाभि पे गर्मी दे रहा था.

"तू आगे चल. और देख क्या है." काँपती हुई आवाज़ मे माधुरी ने अलग होते हुए अपने छोटे

भाई से कहा तो अर्जुन एक बार फिर अपनी छाती से उसका यौवन दबाता हुआ आगे हो चला.

"अच्छा आओ. मैं देखता हू कॉन्सा बंदर था." इतना बोल वो उपर आ गया जहा एकदम ठंडी हवा

ने उन दोनो का स्वागत किया. नीचे जहा थोड़ा उमस का सा वातावरण था यहा एकदम ताज़ा हवा चल रही

थी. तारे आकाश मे टिमटिमा रहे थे.

"वाह दीदी, यहा उपर कितना खुला खुला है ना? मज़ा आ गया उपर आकर." अर्जुन ने चहकते हुए कहा

"छत पे आकर या मेरे उपर आकर मज़ा आया तुझे." माधुरी ने बड़ी धीमी आवाज़ ये बात कही थी

और खुद ही उसका हाथ अपनी योनि सहला गया था. 25 साल की हो चुकी थी और बेचारी अभी भी कुँवारी

थी. ऐसा नही था कि रामेश्वर जी या माधुरी के पिता लड़का नही देख रहे थे. लेकिन उनको अपनी

बेटी के योग्य वर नही मिल रहा था. उपर से वो मांगलिक भी थी.
 
"कुछ कहा दीदी आपने?" अर्जुन ने मुड़ते हुए पूछा

"हा भाई देख तो कितना ठंडा मौसम है. कितनी प्यारी हवा चल रही है. और ये आसमान कितना

दिलकश है. नीचे कमरे मे तो घुटन सी लगती है." माधुरी ने थोड़ा बहकी हुई सी आवाज़ मे

कहा. लेकिन अर्जुन को इसका ज़रा एहसास नही था कि उसकी दीदी को क्या हुआ है. वो भी हाँ में हाँ

मिला के बोला, "सही कहा दीदी. आज तो मैं अपना गद्दा उपर ही लगाउन्गा. नींद भी जल्दी खुल जाएगी."

बातें करते करते दोनो ने एक चादर पर मिर्चे इकट्ठी करी और गाँठ लगा के नीचे चलने लगे.

"मैं भी पूछती हू अलका से उपर सोने के लिए. तू हम दोनो के गद्दे भी उठा लाएगा क्या भाई?" माधुरी

ने ये बात जब कही तो उसमे हल्की विवशता भी थी.

"क्यो नही. 2 क्या मैं तो 4 गद्दे भी ले आउन्गा. आप ताई जी को बोल देना बस." ऐसे ही वो दोनो नीचे

आ गये.

"मा आज मैं उपर सो रहा हू. एक चद्दर दे दो एक्सट्रा. गद्दा और तकिया मेरे कमरे से ले लूँगा मैं.

बिछाने की चद्दर भी. उपर थोड़ा मौसम ठंडा है तो ओढ़ने के लिए सूती चद्दर दे दो." अर्जुन

ने अपनी मा रेखा को प्यार से कहा तो वो भी मुस्कुराते हुए अपने कमरे मे चली गई अपने बेटे के

लिए चद्दर लेने.

वहाँ ललिता जी को भी माधुरी ने मना लिया उपर सोने के लिए लेकिन अलका ने मना

कर दिया था. वो आज ऋतु के कमरे मे सोने गई थी और कोमल चल दी माधुरी के साथ उपर.

कुछ देर मे अर्जुन भी पहुँच गया सर पे 3 गद्दे लादे हुए और कांख मे तकिये -चद्दर दबाए.

वो छत पे जाते ही बैठ गया और माधुरी और कोमल लग गई बिस्तर लगाने.

छत काफ़ी खुली थी और आसपास घर भी ज़्यादा नही थे. अभी इतना गरम मौसम भी नही था

के और लोग भी अपनी छत पर सोने लगते. बस यही तीन थे. अर्जुन इसलिए क्योंकि उसका मन था,

माधुरी को भी ख़ूले आकाश के नीचे सोने का दिल था, कोमल बस अपनी बेहन के साथ गप्पे मारने

के लिए उपर आ गई सोने.

गद्दे कुछ इस तरह बिछाए थे की एक तरफ अर्जुन, उसके साथ मे माधुरी और सबसे आख़िर मे कोमल.

वैसे भी सबसे ज़्यादा डर माधुरी को ही लगता था तो वो बीच मे सोने का बोल आ बैठी अपनी जगह

कोमल और अर्जुन भी ये जानते थे. दोनो लगे हँसने.

"हंस लो तुम दोनो. जब कोई बंदर आएगा तो सबसे पहले किनारे वाले को ही पकड़ेगा." वो बुरा मूह बनाती

हुई दोनो से बोली.

"हा हा.. बीच मे तो जैसे काँटे लगे है जो बंदर नही आ सकते." कोमल ने थोड़ा चिड़ाया अपनी बेहन

को. ये दोनो बहने पक्की सहेलियाँ भी थी. और वैसे इस शहर मे बंदारो का भी बड़ा दखल था. लेकिन

ज़्यादातर वो आबादी से दूर ही रहते थे.

अर्जुन ने अपने सर के नीचे तकिया लगाया और पसर गया गद्दे पे. चद्दर नही ली थी उसने. दोनो लड़किया

हो गई शुरू बातें करना. उन्हे पता था अर्जुन जल्दी ही सो जाता है.

"कोमल, यार देख क्या ज़िंदगी है हमारी. कॉलेज के बाद तो बस घर के अंदर ही क़ैद है.. ना कही आना

ना कही जाना." माधुरी ने अपना दुखड़ा रोया.

"सही कहा दीदी. सुबह उठो और घर की सफाई करो. फिर कपड़े धोने.. कभी दोपहर को खाना बनाना तो

कभी रात को. ज़्यादा से ज़्यादा महीने मे 2-3 फिल्म टीवी पे देख लेते है. या संगीत सुन लिया." कोमल ने भी

हाँ में हाँ मिलाई.

बेचारी दोनो जवानी की मारी संस्कारो की वजह से वो बातें नही कर पाती थी जो शायद स्कूल की हर

लड़की आजकल अपनी सहेली से कर लेती है. ऐसे ही बतलाते एक घंटा बीत गया और उन्हे अर्जुन के सोने

की खबर लगी.

"देखो इसको. कितनी जल्दी नींद पकड़ता है. आसपास का कोई होश ही नहीं रहता ज़रा भी" माधुरी ने

कोमल को अर्जुन की तरफ इशारा किया.

"टाइम भी 12 हो चुका है दीदी. इसकी क्या ग़लती. हमें तो 6 बजे उठना होता है और ये 5 बजे से पहले

ही घर से निकल जाता है कसरत के लिए. और मुझे यहा ठंड लग रही है. मैं चली नीचे. आज मा

के कमरे मे सोउंगी." इतना बोलकर कोमल सिर्फ़ तकिया उठा निकल गई वहाँ से.

चल ठीक है मैं भी लगी सोने." इतना बोल माधुरी ने भी अपने शरीर पे चद्दर

कर ली. ये वाली चद्दर डबल साइज़ थी. क्योंकि वो माधुरी और कोमल दोनो के लिए ही थी.

5 मिनिट बाद ही माधुरी फिर उठी और अपने हाथ पीछे ले जाकर अपनी ब्रा के हुक्क खोल दिए जो पता

नही कब से उसके यौवन कलश को कसे हुए थी.

"अब चैन आया. हाए." इतना बोल वो घुस गई अपनी चद्दर मे.

मुश्किल से ही एक घंटा बीता होगा के अर्जुन की चद्दर जो उसके पैरो मे रखी थी वो हवा से थोड़ी दूर

खिसक गई. वो नींद में ही हाथ चलाने लगा. जैसे ही उसकी पकड़ मे चद्दर आई उसने अपने उपर खींच

लिया उसको. ये चद्दर थी जो माधुरी ने ओढ़ रखी थी. लेकिन ज़्यादा बड़ी थी तो अर्जुन भी अंदर घुस गया

ठंड थोड़ी ज़्यादा थी लेकिन जब दोनो के शरीर साथ चिपक गये तो दोनो के ही बदन हल्के गरम हो गये.

कुछ ही पल बाद माधुरी ने अपना एक पैर अर्जुन के पैर के उपर डाल दिया और अपना चेहरा दुबका लिया उसकी

बाहो के अंदर. ये सब बाहर की हल्की ठंड और दोनो के एक ही चद्दर के अंदर होने की वजह से ही हुआ था.

अन्यथा दोनो ही गहरी नींद मे थे. और अब तो और भी सकूँ था. तकरीबन 3-3:30 पर अर्जुन की नींद हल्की

से टूट गई. उसने माधुरी दीदी को अपने जिस्म से चिपका हुआ देखा तो आँखे खुल गई.

स्वयं ही उसके हाथ दीदी के मांसल पिछवाड़े पे पहुँच गये. उस एहसास से एक मज़े की लहर दौड़ गई अर्जुन

के दिल के अंदर तक. एकदम गुदाज़ और नरम पिछवाड़ा था माधुरी का. और साइज़ भी इतना बड़ा जैसे कोई छोटा

मटका. धीरे धीरे अर्जुन अपनी दीदी के पुष्ट उभार सहला रहा था और उसका लिंग पाजामे मे सर उठा रहा था.

हिम्मत कर के उसने अपना हाथ दीदी के पेट पे रख दिया जहाँ से सूट अस्त-व्यस्त था. मखमली रेशम थी वो

जगह. अपनी उंगलियों से वो हर इंच को सहलाने लगा और उसका हाथ खुद बा खुद उपर जाने लगा.

ये थोड़ा खुला हुआ पुराना सलवार कमीज़ था जो सोने के टाइम आरामदायक रहता है. बड़े आराम से अर्जुन का

हाथ वहाँ तक पहुच गया जहा एक और कपड़ा था. ये थी उसकी दीदी की ब्रा, लेकिन ये भी उसकी उंगलियों को रोक

ना सकी क्योंकि वो तो पहले से ही खुली हुई थी. अब जहा अर्जुन का हाथ लगा उसके शरीर का तापमान बुखार

जैसे हो गया. सुडोल, मुलायम और उन्नत वक्ष की शुरुआत पे उसका हाथ पहुच गया था.

माधुरी नींद की भी बहुत पक्की थी. सारा दिन जो बेचारी इतना काम करती थी कि 7 घंटे निश्चिंत सोती थी.

अर्जुन ने इस बाद का फायेदा उठाते हुए कमीज़ के अंदर से ही अपना पूरा हाथ उस स्तन पे रख दिया. और यही

उसके लिंग ने एक जोरदार ठुमका लगाया और जा चिपका कपड़े के उपर से ही माधुरी की योनि से. धीरे धीरे

अर्जुन ने अपने हाथ को हरकत देनी शुरू करी.कभी वो सिर्फ़ सहलाता तो कभी थोड़ा दबाता. दीदी का स्तन इतना

बड़ा था कि जितना उसके हाथ मे था उतना ही हाथ की दोनो तरफ था. तभी उसका हाथ लगा एक छोटे से बटन

पे. जो हल्का कठोर था और काले चने जितना था. अर्जुन ने उसको अपने अंगूठे और एक उंगली से पकड़ कर

सहलाना शुरू किया तो वो धीरे धीरे सख़्त होने लगा. और उसको महसूस हुआ जैसे दीदी का पूरा स्तन

और कठोर हो रहा हो. मज़े की इंतिहा मे उसकी कमर भी हल्की चलने लगी. कमीज़ कमर से काफ़ी उपर आ चुका

था. अर्जुन ने हिम्मत से उसको और उपर किया तो एक तरफ का वक्ष 2/3 बाहर आ गया, चुचक के साथ.

काम के नशे मे उसने अपने होंठ लगा दिए माधुरी के चुचक से ओर लगा उसे होंठो से चुबलने.
 
कभी आराम से तो कभी थोड़ा अंदर खींच के. कमर अभी भी घर्षणकर रही थी दीदी की योनि पे. इस नशे मे उसने

एक बार तो जितना मूह मे आ सकता था उतना स्तन पकड़ लिया मूह से लेकिन यही उसका दाँत थोड़ा चुभ गया उस

मुलायम स्तन पे और माधुरी की नींद खुल गई. अर्जुन तो लगा रहा सब कुछ भूलकर अपनी बेहन के निप्पल

चूसने मे. बिना दीदी की परवाह किए. माधुरी को एक बार तो हैरानी हुई लेकिन फिर वो भी चुपचाप लेती

रही मज़े.

"देखु तो सही ये और क्या करता है." माधुरी ने खुद पे काबू किया और अर्जुन को करने दिया अपना काम

उसकी योनि भी गीली हो चुकी थी लेकिन अर्जुन को अभी इस सब का ज्ञान नही था. होता तो वो कब का चढ़

चुका होता अपनी बड़ी दीदी के उपर.

अब अर्जुन ने स्तन से मूह हटाया और अपने हाथ से उन्हे हल्का दबाते हुए दबा कर घिसने लगा अपने लिंग को

दीदी की गरम योनि पर. थोड़ी ज्या दा ही खुमारी मे उसने अपना हाथ दीदी के बड़े कूल्हे पे रख कर उन्हे अपने

से और ज़ोर से चिपका लिया. अब तो माधुरी को अपनी फूली हुई योनि की दरार के बीच मे अर्जुन का गरम लिंग

महसूस होने लगा था. उसकी भी साँसें भारी हो चली थी.

"अगर नीचे कच्छी ना पहनी होती तो इसने तो सलवार समेत अंदर डाल देना थे ये डंडा मेरे." मज़े मे

सोचते हुए माधुरी ने भी अपनी हल्की सी टाँग चौड़ी कर दी थी. जिसका एहसास तो अर्जुन को ना हुआ लेकिन

अब वो अच्छे से रगड़ रहा था अपना हथियार अपनी दीदी क काम-बिंदु पर. और फिर अर्जुन के शरीर ने झटका

खाया और उसका पूरा पाजामा खुद के वीर्य से खराब हो गया. और यही पे माधुरी की भी कच्छी गीली हो

कर उसके जिस्म से चिपक चुकी थी.

अर्जुन वहाँ से उठा और दूसरी मंज़िल पे अपने कमरे मे आ गया. पाजामा बदला तो टाइम देखा. 5:15. मतलब

उसका ये कार्यक्रम 2 घंटे से चल रहा था. रन्निंग शूस पहन बिना कुछ बोले वो निकल गया दौड़ लगाने.

और रोमांचक अनुभव के बाद माधुरी डूब गई गहरी नींद मे.
 
अपडेट 7

दीदी का कॉलेज

आज अर्जुन का दिल नही किया ज़्यादा दौड़ लगाने का. वो 3 किमी तक दौड़ लगाने के बाद अगले सेक्टर मे बने एक

पार्क मे बैठ गया एक पेड़ के नीचे. यहा बड़ा सकूँन सा था क्योंकि इस जगह अभी ज़्यादा घर नही बने थे.

और हर तरफ अच्छी ख़ासी हरियाली और खाली सड़क थी. हल्के पीले और सफेद फूल हर तरफ बिखरे थे.

सड़क के

तो दोनो तरफ एक चौड़ी पट्टी सी बनी हुई थी इन फूलो से और ऐसा ही हाल था कुछ पार्क के अंदर.

जाती हुई सर्दिया, एकदम शांत वातावरण और दूर दूर तक कोई नही था वहाँ. अर्जुन भी कुछ पल के लिए खो

सा गया था इस आलोकिक दृश्य मे लेकिन फिर भी उस के दिल की किसी कोने मे एक बेचैनी भी थी.

"आज जो भी हुआ वो नही होना चाहिए था. माधुरी दीदी मेरे बारे मे क्या सोचेंगी? और कही उन्हे पता

लग गया और उन्होने घर पे किसी को बता दियो तो?" खुद से उलझा हुआ वो मॅन मे ये सब सोच रहा था.

"आगे से ध्यान दूँगा के मैं हर हाल मे खुद को नियंत्रण मे रखू. और अगर दीदी ने गुस्सा किया तो पूरी

कोशिश करूँगा के उन्हे मना लू के वो मुझे माफ़ कर दे. लेकिन कितना हसीन चेहरा है ना माधुरी दीदी का

इतना खूबसूरत भी कोई कैसे हो सकता है?", जैसे ही उसका ध्यान फिर से भटकने लगा, अर्जुन अपनी जगह से

खड़ा हुआ और चल दिया वापिस घर की तरफ. 6 बजे वो घर के बाहर वाले आँगन मे खड़ा था जहा उसके दादा

जी ज़मीन पर दरी पर बैठ कर अख़बार पढ़ रहे थे.

"आ गया मेरा शेर? लगता है आज कुछ ज़्यादा ही थक गया है. 2 दिन का अंतराल हो गया था बेटा तेरे नियम

मे.", कहते हुए रामेश्वर जी ने उसको अपने पास ही नीचे बिठाया और अर्जुन वही बैठ के अपने जूते खोलने लगा.

"रुक बेटा मैं बस तुलसी मे जल अर्पण कर दूँ फिर देती हू तुझे दूध. इतने तू अपनी साँसे दुरुस्त कर." कौशल्या

देवी हाथ मे तांबे का लौटा लिए बगीचे मे जाते हुए ये बात कहती गई.

रामेश्वर जी और कौशल्या देवी अपने नियम के बड़े पक्के थे. 5:30 बजे तक दोनो नहा धो कर पूजा पाठ से भी

फारिग हो जाते थे. आज सोमवार था तो कौशल्या जी की पूजा थोड़ी ज़्यादा लंबी चली थी.

वो वापिस आई तो देखा उनका पोता सिर्फ़ अपने पाजामे मे बैठा था और पसीना सूखा रहा था. उनके पतिदेव एक

कटोरी मे सरसों का तेल डाल रहे थे पास मे रखी शीशी से.

"चल अपने पंजे यहा कर.", बोलकर रामेश्वर जी ने अर्जुन का बाया पंजा एक हाथ से पकड़ लिया और दूसरे हाथ

से उसके तलवे और उंगलियो पर तेल मसलने लगे.

मैं खुद कर लूँगा बाबा. आप रहने दे", अर्जुन बोला लेकिन पंडित जी तो लगे रहे और इतने दोनो पंजो को मलते

रहे जीतने उनकी बीवी दूध ना ले आई एक लौटा भर के.

"तेरे हाथ देखे है कभी? कितने नाज़ुक है. इनसे तू कैसे रगड़ सकता है अपने पंजे? और मेरे हाथ देख ज़रा"

बोलते हुए पंडित जी ने जैसा ही अपना हाथ रखा अर्जुन की हथेली पे तो अर्जुन भी हैरान हो गया. उनके हाथ

पत्थर जैसे सख़्त थे और उंगलिया भी मोटी थी. और जब उसने अपने ही हाथ को देखा तो वो तो बिल्कुल एक आम

नरम हाथ था. लंबाई ज़रूर अपने दादा के हाथ से एक इंच ज़्यादा थी लेकिन दादा जी का हाथ उसको इतना भारी लग

रहा था जैसे कोई 2 किल्लो का बट्टा हो.

"बड़े ही भारी और सख़्त हाथ है दादा जी आपके. ऐसे कैसे?"

"इन्होने किया ही क्या है सारी ज़िंदगी सिवाए चोर मुजरिमो की ठुकाइ करने के और कसरत करने के. ये तो अब

थोड़ा पूजा पाठ करने लगे. और अभी भी तो बगीचे मे क़ास्सी- खुरपि चलाने से नही हट ते." तंजिया लहजे

मे कौशल्या देवी ने कहा अर्जुन को दूध का गिलास देते हुए. और वही पंडित जी मुस्कुराए जा रहे थे.

ऐसी मीठी नोक-झोंक इन दोनो मे उमर के इस पड़ाव मे भी बनी हुई थी. जिसे अर्जुन रोज ही देखता था और

मुस्कुराता था. आज भी वो जब ऐसा कर रहा था तो उसकी दादी जी उठ खड़ी हुई वहाँ से शरम और हल्के

गुस्से से पंडित जी को देखते हुए. और एक बार फिर दोनो दादा पोता हंस दिए.

दूध ख़तम कर अर्जुन ने फूल-पौधो को पानी दिया बाहर ही लगे रब्बर के पाइप से. फिर आँगन मे रस्सी

पे लटके अपने तौलिए को ले घुस गया वही बने बाथरूम मे. 20 मिनिट बाद दूसरी मंज़िल पे अपने कमरे मे

वो कपड़े पहन चुका था. समय देखा तो 7:30 और उसने अपने भैया संजीव को उठाया. ये रोज का ही काम था.

भैया को उठा के वो पिछली सीढ़ियो से नीचे आया और सीधा अपनी मा रेखा जी से मिला. अपनी के पाव छुए

और मा ने भी उसके माथे को चूम वही बिता लिए उसको रसोई मे. और अपने हाथ से एक प्लेट लगाई और

गरमा गरम परान्ठे मक्खन और लस्सी के साथ दिए.

अर्जुन रोज सुबह अपनी मा के पास ही बैठ खार नाश्ता करता था. यही वो समय होता था जब वो अपनी मा से

बातें करता था. ललिता जी भी अपने पतिदेव के लिए खाना लगा रही थी और कोमल अपने ताऊ जी और भैया

का टिफिन लगा रही थी.

"इतना बड़ा हो गया है और आज भी अपनी मा के पल्लू मे घुसा रहता हा." ये आवाज़ थी ऋतु की जो हाथ मे

चाय का कप लिए अंदर आई. एक सफेद टॉप और हल्का नीला पाजामा पहना था उसने. एकदम किसी सफेद गुलाब सी

दिखती थी वो.

"हा तो ये तो है हाई मेरा छोटा सा मुन्ना." मा ने ये कहते हुए स्नेह से एक बार अर्जुन के सर पे हाथ फिराया

और वापिस लग गई रोटी बेलने मे. और अर्जुन ने भी शोखी से बोला, "दीदी आपको जलन होती है क्या मा के

मुझे इतना प्यार करने से?"

"6 फुट का लंबा पेड़ जैसा हो गया है और मा अभी भी इसको मुन्ना बोलती है. वैसे बात तो सही है दिमाग़

तो नीरा ही जड़ है." हँसती हुई वो निकल गई बाहर और इन दोनो की ये हँसी ठिठोले देख ललिता जी और

रेखा दोनो मुस्कुराने लगी. लेकिन अर्जुन का ध्यान तो बाहर जाती हुई ऋतु की तरफ जम्म गया था. उसका

पाजामा जो फँसा हुआ था नितंबों की दरार मे. किसी हिरनी के जैसे पल भर मे आँखों से ओझल हो गई

तो अर्जुन भी कुछ सोचता खड़ा हो गया था अपनी जगह से.

"ताई जी अलका दीदी कहाँ है? वो आज उनके कॉलेज जाना है ना तो मैं ही लेके जाउन्गा उनको." ये बोलते हुए

उसने अपनी ताई जी पर निगाह डाली.

"जा बुला ले उसको. वो राजकुमारी तो अपने कमरे में ही है एक घंटे से. पता नही कितना शृंगार करेगी."

" टक - टक ", अर्जुन ने अलका/माधुरी दीदी के कमरे का दरवाजा बाहर से ही बजाया.

"कौन है?"

"दीदी, तयार हो गई हो तो चलो फिर कॉलेज. बाद मे मुझे भी ताऊ जी के साथ मार्केट जाना है." अर्जुन

बाहर से ही चिल्लाया.
 
"आ गई बाबा. और वैसे भी दरवाजा खुला ही है. चल अंदर आजा मैं इतने अपनी प्रॅक्टिकल फाइल्स ले लू."

बोलते हुए अलका खुद को आईने के सामने निहार रही थी और तभी अर्जुन भी अंदर आ गया. जहा उसका स्वागत

इस मनमोहक दृश्य ने किया. 5'9" लंबी अलका ने एक नीला पंजाबी सूट और सफेद पाजामी पहनी हुई थी. कमीज़

पूरी तरह से उसके शरीर से चिपका हुआ था. जहा उसके वक्ष पूरा सर उठाए थे वही कमीज़ के निचले

हिस्से पे उसके बाहर को निकले कूल्हे अलग ही कहर बरपा रहे थे. अर्जुन की तो साँस ही अटक गई ये देख

कर. उसका ध्यान जब टूटा जब उसकी बेहन ने अपनी कमर तक आती चोटी को सही किया और दुपट्टा लेते हुए

बोली, "क्या हुआ तुझे? तेरी सेहत तो ठीक है जो चुपचाप खड़ा है?"

"हाँ.. हा मुझे क्या होना है? बिल्कुल फिट खड़ा हू आपके सामने. लेकिन आप तो दीदी एकदम अप्सरा लग रही हो"

आज पहली बार उसके मूह से अपनी किसी बेहन के लिए तारीफ के शब्द निकले थे और उसको खुद नही पता था

के उसने क्या कहा है. अलका थी ही इतनी हसीन. पतली कमर, पहाड़ जैसी छातियाँ, उभरे गोलाकार नितंब,

लाल सुर्ख होंठ, कमर तक लंबे भूरे बाल और बड़ी बड़ी भूरी आँखें. यू तो अर्जुन की चारो ही

बहने नायाब हुस्न से भरी हुई थी लेकिन एक अलका ही थी जो सब पे भारी थी.

"चल चल जल्दी यहा से. कॉलेज को लेट हो रहे है. बाद मे कर लेना तारीफ मेरी." थोड़ा रोब से बोलते हुए

उसने अपने फाइल उठाई तो अर्जुन सहम सा गया और बाहर की तरफ चल दिया. वही अलका भी मूह नीचे कर मंद

मंद मुस्कुरा रही थी इस अपने छोटे भाई पे.

"दीदी आप ध्यान से बैठना. कही गड्ढा वॅड्डा आया तो गिर जाओ." अर्जुन जो स्कूटर स्टार्ट कर चुका था अपनी

बेहन अलका से बोला जब वो बैठने लगी. ये लंबी सीट वाला एल एम एल स्कूटर था, जिसपे अलका अपने दोनो पैर एक

ही तरफ कर बैठ चुकी थी. उसने एक हाथ मे अपनी फाइल्स और छोटा सा पर्स पकड़ा हुआ था. और दूसरा हाथ

अर्जुन के दाएँ कंधे पे था. दुपट्टा अब उसके सर के उपर से आता हुआ सीने को ढके हुए था. शायद ये भी

एक संस्कार का ही हिस्सा था कि घर की कोई भी लड़की बिना सर ढके घर से बाहर नही निकलती थी.

"बस तू स्कूटर चलाने पे ध्यान दे भाई. मैं गिरी तो तुझे भी ले गिरूंगी." खिल खिलाती हुई अलका बोली और

वो दोनो निकल दिए विमन कॉलेज की तरफ. ये कोई 4-5 किमी था घर से और शहर के सुरक्षित हिस्से मे था.

इस कॉलेज का आस पास के कही शहरो मे नाम था क्योंकि यहा लगभग सभी विषय उपलब्ध थे. और पुलिस

चेक पोस्ट भी थे कॉलेज मे दाखिल होने वाले सभी रास्तो पर, बेलगाम मजनुओ की खैर खबर लेने के लिए.

कॉलेज से थोड़ी दूर पहले ही सड़क कुछ ज़्यादा ही टूटी हुई थी. शायद कुछ निर्माण चल रहा था वहाँ तो

स्कूटर ने हल्के से झटके खाए. अलका ने अपने एक हाथ से अर्जुन की कमर को कस कर पकड़ लिया. अब उसका एक साइड

को पूरा स्तन अर्जुन की पीठ से चिपका हुआ तो और वो तो मज़े में ही आ गया अपनी बेहन के इस तरह चिपकने

से.

"ध्यान से चला छोटे यहा थोड़ी ज़्यादा ही सड़क खराब है." बोलते हुए अलका ने खुद को और आगे कर लिया

बार बार छोटे गड्ढे के आने से अब उसकी पीठ पे अलका दीदी के लगभग दोनो ही नारियल घिस रहे थे.

ना चाहते हुए भी अर्जुन के शरीर मे कंपन्न होने लगी थी. ऐसे ही मज़े के दौर से होते हुए वो कब कॉलेज

के गेट के सामने पहुँच गये पता ही नही चला. और जब अर्जुन ने ब्रेक लगाई तब जाकर अलका का ध्यान

टूटा. वो अभी तक अपने छोटे भाई की पीठ से चिपकी हुई थी.

"चलो दीदी आप जाओ, मैं यही बाहर आपका इंतजार करता हू." अर्जुन ने कॉलेज की दीवार क साथ स्कूटर का

स्टॅंड लगाते हुए कहा.

"बड़ा आया इंतजार करने वाला. सीधी तरह चल मेरे साथ अंदर और हा मेरी सहेलियाँ भी होंगी वहाँ तो

थोड़ा अच्छे बच्चे जैसा व्यहवहाँर करना." बोलकर उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा और ले गई उसको खींचते हुए

कॉलेज के अंदर. वैसे तो ये महिला महाविद्याल य था लेकिन यहा पे पढ़ने वाली लड़कियों के संबंधी भी

अंदर आ जा सकते थे. बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पे ही अलका ने सुरक्षाकर्मी को अर्जुन की एंट्री करवाई अपने

भाई के नाम से और वो दोनो चल दिए अंदर.

अर्जुन तो आज पहली ही बार किसी कॉलेज मे आया था. एक बार

पहले वो कॉलेज तक आया ज़रूर था लेकिन बाहर से ऋतु को लेकर चला गया था. आज जब वो यहा अंदर

आया तो हैरान ही रह गया. हर तरफ सिर्फ़ लड़कियाँ ही लड़कियाँ थी और यहा कोई 10 बिल्डिंग थी जो एक

दूसरे से थोड़ी दूर दूर थी. सभी अलग अलग विषय के हिसाब से थी. और चहल पहल भी सिर्फ़ 2 बिल्डिंग्स

में ही थी. एक तो जहा वो अभी आए थे. और एक उनसे कुछ ही दूरी पे थी. जहा हर तरफ हसीनाओं के झुंड

खड़े थे.

"चल पहले अकाउंट्स डिपार्टमेंट का काम निपटा लेते है." अलका की आवाज़ से अर्जुन का ध्यान वापिस अपनी बड़ी

बेहन पर आया जो अभी तक उसका हाथ थामे थी. यहा खुली रोशनी मे खड़ी वो पूरे कॉलेज की लड़कियो

को पानी भरने पे मजबूर किए थी. अर्जुन को खुद पे गर्व महसूस हो रहा था जब उसने आसपास देखा के

कई जोड़े आँखों के उन्ही दोनो को देख रहे है. अलका उनकी परवाह किए बिना अर्जुन को लेकर चल दी वही पास

मे बने गलियारे मे जहा हर दरवाजे के बाहर एक तख़्ती लगी थी. 3 कमरो के बाद आया "अकाउंट्स एंड अड्मिशन"

का कमरा. वहाँ कुछ ज़्यादा भीड़ नही थी क्योनि कॉलेज 8 बजे शुरू हो जाता था और आज ज़्यादातर स्टूडेंट्स का

अवकाश था. अलका का खिड़की पे 6 नंबर था. उन्हे यहा 10-15 मिनिट तो लगने ही थे. अर्जुन ने ये देख बात

शुरुआत की.

"दीदी अपनी फाइल आप मुझे पकड़ा दीजिए.", उसने अपना हाथ फाइल्स पर रखते हुआ कहा

अलका ने शून्य भाव से देखते हुए अपनी फाइल उसको थमा दी. और अर्जुन भी समझ गया के कुछ तो हुआ है.

अलका ने उसके मन को भाँप लिया और उसके करीब आकर धीमे से कान मे बोली, "यहा तू मुझे दीदी मत बोल.

सिर्फ़ अलका बोल या कुछ भी."

अर्जुन तो अपनी दीदी की साँसों की गर्मी से सुन्न हो गया था जो सीधा उसके कान

की लौ पर महसूस हुई. वो कुछ ना बोला और सिर्फ़ अलका को उपर से नीचे एक बार देखा और फिर यहा वहाँ देखने

लगा. अलका अपने भाई की इस अदा पर मुस्कुरा उठी और उसने भी अपना ध्यान सामने की तरफ कर दिया.
 
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