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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"मेरा लड्डू". इतना बोलकर कौशल्या जी ने बेटे का माथा चूमा और फिर रेखा जी ने अपने ससुर, सास और पति को पानी दिया.

बार बार शंकर जी अपने बेटे को ही देख रहे थे. और बेटा तो एकटक उन्हे देख रहा था. उसको बाप के प्यार का एहसास

आज पहली बार हुआ. वो सब भूल गया जो भी उसने बोरडिंग स्कूल मे सहा था.

"मा, मुन्ना तो मुझसे भी लंबा हो गया इतनी जल्दी. पापा ने बहुत मेहनत करी लगती है इस्पे." उनके शब्दो मे प्रशंसा

थी.

"बेटा तेरे पिताजी तो अभी बहुत कुछ सोचे बैठे है. वो सब छोड़ चल पहले खाना खा नही तो तू फिर भाग जाएगा अपने

दोस्तो के पास."

यूही वो तीनो लोग बातें करते खाना खाने लगे और राजकुमार जी भी उनसे आ मिले. दोनो भाई गरम्जोशी से मिले और फिर

एक घंटे तक यही सब होता रहा. अर्जुन कबका सबकी नज़र बचा कर अपनी साइकल लेकर संदीप के घर निकल गया.

सबके रसोई से चले जाने के बाद शंकर जी भी उठ खड़े हुए और चल दिए अपने कमरे मे जहाँ रेखा जी कपड़े तह लगा

रही थी. उन्होने पीछे से ही उनको अपनी बाहों मे कस लिया और रेखा के चेहरे पे शरम की लाली छा गई. और इस दौरान कमरे की कड़ी बंद कर दी थी उन्होने.

वही माधुरी अपने कमरे मे बैठी थी जहाँ ऋतु और कोमल भी थे. अलका दूसरे कमरे मे पढ़ाई कर रही थी. वैसे तो

चारो बहने आपस मे सब बातें कर लेती थी. लेकिन इन्होने कभी भी सेक्स के विषय पर बात नही की थी. माधुरी किसी

भी तरह ये सब डिसकस करना चाहती थी तो उसने बात शुरू के.

माधुरी- यार कोमल तेरे सब्जेक्ट्स क्या थे डिग्री मे?

कोमल- दीदी फिज़िक्स, केमिस्ट्री, बाइयालजी और इंग्लीश. वैसे क्या बात है? कुछ पूछना है क्या?

माधुरी- हा यार लेकिन बात थोड़ी पर्सनल है तो किसी और से पूछ नही सकती तो याद आया तेरे पास तो साइन्स था.

कोमल- दीदी आप तो मेरी बेस्ट फ्रेंड हो. आप बेझिझक कुछ भी पूछ सकती हो.

अब इन दोनो की बात सुनकर ऋतु ने अपनी किताब साइड मे रख दी और उनकी तरफ मूह करके बैठ गई.

माधुरी- यार दादा जी कोई लड़का देख रहे है मेरे लिए, मा से पता चला. लेकिन यार मुझे तो इसके बारे मे ज़्यादा

कुछ पता नही की आगे क्या होता है. (चेहरे पे शरम फैल गई ये सब कहते हुए जो दोनो बहनो से छुपी ना रही)

ऋतु- अर्रे दीदी आप यहा बैठो मेरे पास. मैं करती हू आपकी प्राब्लम का सल्यूशन. (आँखें मट्काते हुए उसने कहा)

माधुरी- यार मेरी 2 सहेलियों की शादी हो चुकी है और 3 साल मे एक के तो 2 बच्चे भी हो गये. और दोनो कहती है

के बस पति तो उनको ज़रूरत का समान समझता है. इसका क्या मतलब है. और यार ये भी कहा उन्होने की जान निकल जाती है

(इतना बोलकर माधुरी ने आँखें नीचे कर ली)
 
ऋतु- दीदी ये सब अनपढ़ लोगो की बातें है. आप जिस सब्जेक्ट की बात कर रही है उसको सेक्स बोला जाता है. और ये एक

इंपॉर्टेंट लेसन है अच्छी लाइफ का. बुक्स के अकॉरडिंग तो जो भी है वो सिर्फ़ रिप्रोडक्षन और सेक्स ऑर्गन्स के बारे में ही होता.

माधुरी- लेकिन ये सब तो मैने भी पढ़ा है. मैं प्रॅक्टिकल की बात कर रही हू.

ऋतु- दीदी सुनो तो. देखो हेल्थि सेक्स लाइफ के लिए सबसे इंपॉर्टेंट होता है दोनो के बीच प्यार और अंडरस्टॅंडिंग.

फिर सेक्स से पहले फोरप्ले.

माधुरी- कॉन्सा प्ले? (नासमझ होने का दिखावा करते हुए)

ऋतु- ओहो दीदी पूरा सुनो नही तो मैं नही बोलती

माधुरी/कोमल एक साथ- अर्रे नही नही चल तू बता

ऋतु- वाह कोमल दीदी आप भी. हाहाहा. चलो सुनो. फोरप्ले मतलब होता है की दोनो पार्ट्नर्स का एक दूसरे के शरीर से

पूरा प्यार करना. जैसे किस्सिंग, स्मूछिंग, ब्रेस्ट्स रब्बिंग, जेनिटल्स सकिंग.. मतलब मैं ऑर्गन्स को सहलाना, चूसना

और चाटना एट्सेटरा. जिस से वेजाइना मे फ्लूयिड्स ऋण होने लगे और पेनिस अपनी फुल शेप मे आ सके. वहाँ के हेयर भी टाइम से क्लीन करना ज़रूरी होता है, जिस से इन्फेक्षन ना हो और बेड स्मेल ना आए. फोरप्ले के और भी फ़ायदे होते है.

जैसे सेक्स ड्यूरेशन का इनक्रीस होना. जब अच्छे से फोरप्ले हो जाए तब ही इंटरकोर्स करना चाहिए. लाइक पेनिस को वेजाइना मे डालने मे परेशानी नही होती और दोनो को मज़ा आता है.

ऋतु ने इतना सब बोलकर अपने कंधे थोड़े उपर उठाए जैसे वो सब जानती हो कामकला के बारे मे.

कोमल- लेकिन तूने दीदी की असली बात का जवाब तो दिया नही. लड़की को दर्द क्यो होता है?

ऋतु- देखो दीदी सभी लड़कियों की वर्जिनिटी का सिंबल उनका हाइमेन होता है जो एक तरह का माँस का परदा होता है हमारी

वेजाइना के अंदर. फर्स्ट टाइम पेनिस इनसर्ट होने से ये टूट जाता है तो ब्लड निकलता है. सिर्फ़ तभी दर्द होता है या अगर

वेजाइना मे फ्लूईड ना बने तब पेन होता है रफ स्किन की वजह से. उसके लिए लोग जेल्ली, आयिल्स या क्रीम यूज करते है.

माधुरी- यार ये भी बता दे के क्या सभी लड़कियों की वेजाइना और लड़को के पेनिस एक जैसे होते है?

ऋतु- हाहहः.. दीदी ये कैसा सवाल है? सभी उंगलिया कभी बराबर होती है. देखो आपके ब्रेस्ट्स कितने हेवी है, कोमल

दीदी के भी हेवी है लेकिन आपसे कम. और मेरे आप सब से छोटे. ऐसे ही बाकी पार्ट्स भी. लड़को के एस्पेशली इंडियन्स मे

आवरेज साइज़ होता है 4-6 इंच और लड़कियों की वेजाइना की डेप्त होती है 6-8 इंच. उसके पीछे यूट्रस जिसको बच्चेदानी बोलते है.

वैसे पेनिस की विड्त भी अलग होती है. कोई मोटा, कोई पतला किसी का सिर्फ़ हेड मोटा होता है. ऐसे ही वेजाइना भी होती है. किसी की फ्लफी, किसी की स्लिम और किसी की ज़्यादा ही टाइट हिप बोन्स की वजह से. लंबी हाइट वाली लड़की की वेजाइनल डेप्त भी ज़्यादा होती है या फिर जिसके हिप्स हेवी हो. (और एक लंबी सांस लेते हुए अपनी बात ख़तम करती है)

माधुरी- यार और किसी का अगर 7-8 इंच लंबा और कलाई जितना मोटा हो तो वो तो जान ही निकाल देता होगा?

ऋतु हंसते हुए, "क्या दीदी आपने ऐसा देख लिया क्या कही? वैसे अपने यहा ऐसा होना एक्सट्रीम्ली रेर है. बट जिसको भी ऐसा

हज़्बेंड मिलेगा उसकी तो बस ज़िंदगी मज़े मे गुज़रेगी. यू नो, "बिग्गर ईज़ बेटर".. हाहहाहा.. (और वो अपनी दोनो बड़ी

बहनो की शकल देखने लगी मुस्कुराते हुए)
 
कोमल- ना बाबा. मैं तो इस सब से दूर ही सही. जब शादी होगी तब की तब सोचेंगे. और वो उठकर बाहर आ गई.

ऋतु- दीदी आप किस सोच मे गुम हो? देखो हम पक्के फ्रेंड्स है ना तो आप कुछ भी शेर कर सकती हो.

माधुरी- यार क्या तूने कभी ऐसा किया है या देखा है? और तुझे इतना कैसे पता? तेरी तो आने वाली ज़िंदगी बड़ी

अच्छी होने वाली है. अपने पति को खुश रखेगी तू.

ऋतु- अर्रे दीदी ऐसा कहा मेरा नसीब. वो तो लाइब्ररी मे एक बार कामसुत्र का इंग्लीश वर्षन रीड किया था. तभी पता

लगा के लव मेकिंग या सेक्स क्या होता है. फॉरिन कंट्रीज़ मे तो सेक्स एडीक्शन कंपल्सरी है. बस हम ही बॅक्वर्ड सोच

वाले है. मेरी कुछ क्लासमेट्स तो अपने बॉयफ्रेंड्स 'स के साथ सेक्स कर चुकी है और कुछ तो मास्टरबेशन करती है. वो भी कभी कभी अपने एक्सपीरियेन्स शेर करती है. बुत मैं ये सब उसके ही साथ करूँगी जिस से सॅचा प्यार होगा. फिर चा ही शादी हो या ना.

माधुरी- सही कह रही है तू मेरी बहन. मुझे ही देख इस सब्जेक्ट मे तो बिल्कुल नील हू और 25 की उमर हो चली है. लेकिन

आज तूने मेरी बड़ी हेल्प करी है.

ऋतु- अर्रे दीदी आप बोलो तो अपने कपड़े उतार दूँ. इतना बोलकर वो खिलखिला पड़ी ..

माधुरी- चल बदमाश कही की. और फिर वो भी हंसते हुए बाहर चल दी जहाँ उसकी दादी, मा और चाची होली पूजन की तैयारी

मे लगी थी. वो भी उनकी मदद करने लगी. शंकर जी तक कर अपने कमरे मे सो रहे थे.

दूसरी तरफ जब अर्जुन अपने दोस्त संदीप के घर पहुचा तो संदीप उसको लेकर अपने कमरे मे आ गया. धरमपाल जी बाहर गये थे किसी काम से जो शाम को आने वाले थे. और संदीप की माता जी पड़ोस के घर मे गई थी होली पूजन की तैयारी करने. जहाँ से सभी महिलाए पास के ग्राउंड मे जाने वाली थी होलिका दहाँ के लिए. मतलब इस समय घर पर सिर्फ़ ज्योति, संदीप और अर्जुन थे. ज्योति अपने कमरे मे कुछ कर रही थी तो वो दोनो भी टीवी पे वीडियो गेम लगा कर खेल रहे थे और बातें कर रहे थे.

अर्जुन ने बात शुरू की, "यार संदीप क्या तूने कभी सेक्स किया है?"

संदीप अपने दोस्त की बात सुनकर मुस्कुराते हुआ बोला, "भाई मुझे देख कर लगता है के मैने ऐसा कुछ किया होगा कभी. हा तू ही तो आकांक्षा के साथ कर सकता है."

"नही नही भाई. मेरा मतलब था कि तू क्या जानता है इसके बारे मे?" अर्जुन थोड़ा शांत रहने का दिखावा करते हुए बोला

"देख भाई ये जो सेक्स है ना इसमे ज़िंदगी का मज़ा है. मैं तो कभी कभी कुलविंदर से कोई सेक्सी किताब लेकर अपने हाथ से हिला लेता हू. या फिर जब टाइम मिलता है तो हम वो जो सन्नी है किरण वाला अपने स्कूल के पास, उसके घर मे वीसीआर लगा कर नीली फिल्म देख कर साथ में ही मूठ लगा लेते है. भाई बड़ा मज़ा आता है. तूने कभी मूठ लगाई है क्या?"

अर्जुन, "नही भाई मुझे ये सब नही पता लेकिन किसी दिन चलूँगा ज़रूर तेरे साथ सन्नी के घर."

"भाई किसी दिन क्यो, मैं अभी तुझे एक गरमा गरम चीज़ दिखाता हू", इतना बोलकर उसने अपने स्कूल के बस्ते से एक अख़बार चढ़ि किताब निकाली और दोनो दोस्त साथ मे बैठ कर देखने लगे. वीडियो गेम तो वही रोक दी थी उन्होने.

"भाई ये क्या है?" जैसे ही संदीप ने पहला पन्न खोला एक फिरंगी लड़की बिल्कुल नंगी थी और उसके मूह मे एक हबशी का बड़ा लंड था.

"भाई ये लॉडा चूस रही है. अपने देश मे ऐसा बहुत कम ही होता है. और इतने बड़े लंड भी आफ्रिका, अमेरिका के कालीओ के होते है." इतना बता कर उसने अगला पन्ना पलटा तो वहाँ 2 चित्र थे. एक मे वही फिरंगी लड़की उस हबशी का काला लंड अपनी चूत मे लिए थी और उसकी गोरी चूत फैली हुई थी. दूसरे चित्रा मे उसकी गान्ड मे आधा लंड था और उसके बड़े चुचे हवा मे झूल रहे थे.
 
"भाई ये क्या है? ये तो वहाँ भी डलवा रही है." अर्जुन ने उस फोटो पे हाथ रख कर पूछा जैसे की वो उसको छु ही लेगा.

"भाई ये भी एक मज़ा है. बाहर की लड़किया खास कर जिनकी गान्ड मोटी होती है वो लॉडा गान्ड मे लेती है मज़े से. और लड़के को भी इसमे बहुत मज़ा आता है क्योंकि ये चूत से भी टाइट होती है." संदीप इतना बोलकर अपना लंड सहलाने लगा. ऐसे ही 2-3 पन्ने पलटने के बाद जब संदीप का जोश ज़्यादा बढ़ गया तो उसने अपना लंड बाहर निकाल लिया और आगे पीछे करने लगा. अर्जुन भी उसको देखने लगा. संदीप का लंड मुश्किल से 5 इंच का था और 2 उंगलिओ से थोड़ा कम ही मोटा था. अर्जुन ने अब पन्ना उल्टा तो ये नज़ारा देख उसको भी जोश आ गया. वहाँ एक बड़ी डबल पेज फोटो थी. वो फिरंगी लड़की एक काले के लंड पर बैठी थी पीछे से दूसरे हबशी ने उसकी गान्ड मे डाल रखा था और एक उसका मूह चोद रहा था. ये नज़ारा देख उसने भी अपना लंड बाहर निकाल लिया.

"बाप रे.... ये क्या है बे?" उसका लंड देख संदीप का तो मूह खुल्ला ही रह गया

"भाई वही है जो तेरे पास है." अर्जुन ने हंसते हुए जवाब दिया तो संदीप उसके लंड से अपनी तुलना करने लगा

फिर उन्होने वापिस हिलाने पे ध्यान लगाया तो एक ही पन्ना पलटा था कि संदीप के लंड ने उल्टी कर दी और वो मज़े से वही लेट गया. अर्जुन को ऐसे मज़ा नही आ रहा था तो उसने वापिस अंदर डाल लिया. संदीप ने कागज से अपना 2 बूँद वीर्य सॉफ किया और किताब को वापिस बस्ते मे छुपा दिया. दोनो अंजान थे के कोई उनपे खिड़की से नज़र रखे था काफ़ी देर से.

तभी ज्योति की आवाज़ आई

"संदीप, कमरे मे क्या कर रहा है? तुझे मम्मी बुला रही है निर्मला आंटी के घर." इतना बोलकर ज्योति ने दरवाजा पीटा तो

अर्जुन ने गेम खेलने का नाटक शुरू कर दिया और संदीप ने दरवाजा खोला.

"अर्जुन तू यही रुक मैं ज़रा मा से मिलकर आता हू." इतना बोलकर वो मैं दरवाजे से बाहर दौड़ गया. और ज्योति ने चिटकनी

लगा दी उसके बाहर जाते ही.

"कौन सी गेम खेल रहे थे तुम दोनो?" वो ज़रा हैरत से बोली लेकिन अर्जुन स्पष्ट सा बोला," क्यो दिख नही रहा?" उसने ज्योति की गतिविधि भाँप ली थी और दरवाजे की चिटकनी लगाना भी देख लिया था.

"वाह मेरे शेर. तू तो एक ही बार मे बड़ा हो गया. क्यो अपने हाथ से मज़ा नही आ रहा था?" इतना बोलकर वो वही अर्जुन की

गोद मे आ बैठी. अर्जुन ने भी बिना देर किए उसके पपीते पकड़े और होंठो से होंठ मिला दिए. उसका लंड जो अभी भी खड़ा

था ज्योति को अपने चूतड़ की दरार मे चुभता महसूस हुआ तो वो भी अपनी कमर हिलाने लगी.

"तेरा दोस्त नही आता 2 घंटे से पहले. वो गया मा के साथ अगले पार्क मे समान लेकर." इतना बोलकर वो लिपट गई अमर बेल

की तरह अर्जुन के तगड़े शरीर से. अर्जुन ने भी एक झटके मे उसकी टी शर्ट खींच के फेंक दी एक तरफ और देखने लगा उसके

साँवले लेकिन कठोर बड़े बूब्स जो एक पुरानी सफेद ब्रा मे क़ैद थे. "वाह ये तो बड़े प्यारे है." इतना बोलकर उसने दोनो

हाथो से उन्हे पकड़ कर किसी हॉर्न की तरह दबाना शुरू कर दिया.

ज्योति की तो गर्दन पीछे लुढ़क गई इतने जोरदार हमले से.

"दीदी, खोल दो नो इन बेचारो को." उसने हाथ हटाकर ज्योति से गुहार लगाई.

ज्योति ने भी बिना कुछ कहे एक झटके मे उतार फेंकी वो ब्रा. अब उसके मुलायम बड़े बूब्स आज़ाद थे.

"दीदी इनका साइज़ क्या है? बड़े गोल मटोल है."

"34-सी. और अब ज़्यादा बोल मत बस मुझे संतुष्ट कर दे" इतना बोलकर उसने अर्जुन की टी शर्ट भी उतार दी.

इधर अर्जुन के मूह और हाथ ने उसकी कठोर चुचियो को ढीला करना शुरू कर दिया था. वो जितना मूह मे आ सकता था उतना

हिस्सा पकड़ कर पी रहा था और दूसरे वाले को अच्छे से दबा रहा था . ज्योति के निपल भी कड़े हो चुके थे. उसने अर्जुन

को अपनी तरफ खींचा और लगी चूसने उसके होंठ. अब दोनो की नंगी छाती आपस मे रगड़ कर करेंट पैदा कर रही थी.
 
"कमीने आग लगा दी तूने मेरे इस बदन मे. अब तू ही बुझा नही तो तेरे घर आकर चुदवा लूँगी मैं." काम के नशे मे ज्योति कुछ भी बोले जा रही थी तो अर्जुन ने उसको अपनी बाजुओ मे उठा लिया और बेड पर पटक दिया. एलास्टिक वाली सलवार अगले ही पल ज़मीन पे थी और नीचे ज्योति की नंगी बिना बालो वाली गुलाबी चूत उसकी आँखों के सामने थी.

"वाह दीदी क्या चूत है. कभी कोई लंड लिया है क्या पहले?" अर्जुन ने अपनी उंगली ज्योति की चूत पर फिरात हुए पूछा तो

ज्योति ने ना मे गर्दन हिलाई. "बस कभी कभी उंगली करती हू और 2-3 बार मोमबत्ती ट्राइ करी है." शरमाती हुई ज्योति ने

जवाब दिया.

उसका खजाना अर्जुन क सामने खुला जो पड़ा था.

इतना सुनकर अर्जुन ने भी अपनी पेंट उतार दी और बाहर निकाल लिया अपने शेर पिंजरे से. इस समय तो उसका लंड और भी ख़तरनाक लग रहा था. पिछले एक घंटे से जो उत्तेजित था वो.

एक बार फिर उसने ज्योति के बूब्स को मसलना शुरू किया और अपना लंड चूत के ऊपेर घिसने लगा. ज्योति का तो मूह ही बंद हो गया था इतना भयंकर लंड देख लेकिन थी वो लड़की भी ज़िद्दी. उसकी चूत जब अच्छी तरह से गीली हो गई तो ज्योति ने खुद अर्जुन का लंड पकड़ कर टीका दिया चूत के मूह पे.

अर्जुन ने भी एक मध्यम गति का धक्का लगा दिया. दोनो के मूह से हल्की कराह निकल गई. उसका टोपा ज्योति की टाइट चूत में बैठ गया था और इसके साथ ही अर्जुन के लंड का टांका भी खुल गया था. लेकिन ज्योति थोड़ी अनुभवी थी. खेल को उसने अपने कंट्रोल मे लिया.

"एक मिनिट रुक जा. मेरे चुचे दबा और पी थोड़ी देर." अर्जुन ने वैसा ही किया. उसने उतना ही लंड डाले ज्योति की दूध निचोड़ने शुरू कर दिए. वो भी अर्जुन के चूतड़ सहला रही थी. जैसे ही थोड़ा अच्छा महसूस होने लगा उसने अर्जुन को कहा,"चल अब आराम से एक धक्का मार और फिर रुक जाइओ"

अर्जुन ने भी अपनी कमर को साध के एक मजबूत धक्का लगा दिया. लेकिन इस बार उसका मूह ज्योति के होंठ दबाए हुए था.

"आ मा मॅर गई रे...."ये आवाज़ किसी तरह फिर भी बाहर निकल ही गई. अर्जुन का खूँटा आधा गढ़ा हुआ था ज्योति की चूत में. और अब वो उसके चारो तरफ मजबूती से लिपटी गई थी रब्बर के जैसे.

"इस से ज़्यादा ना ले पाउन्गी रे मैं तेरा. पूरा छेद भर दिया तेरे लंड ने." ज्योति ने ये बात कही तो अर्जुन ने देखा की उसकी आँखों से आँसू और चूत, जहाँ उसका लॉडा फसा हुआ था वहाँ से खून की कुछ बूंदे बाहर आ रही थी.

"नही डालूँगा इस से ज़्यादा. अगर कहती हो तो ये भी निकाल लेता हू. बहुत दर्द हो रहा है? अर्जुन का दिल पसीज गया

"पहले दर्द देता है और अब जब मलम की बारी आई तो भागने लगा. चल अब आराम से थोड़ा बाहर निकाल और फिर वापिस डाल. धीरे धीरे." ज्योति ने अपने चेहरे पे छोटी सी मुस्कान लाते हुए कहा. उसको भी पता था कि अर्जुन बड़ा सीधा और सॉफ दिल लड़का है. यही सोच कर तो वो इसके नीचे आ गई थी.

अर्जुन ने फिर 3 इंच के करीब निकाला, टोपा अंदर ही रहने दिया और फिर उतना वापिस पेल दिया. अपनी कोहनिया उसने बेड पे टीका ली थी और शुरू कर दिए हल्के धक्के देने. हर धक्के के साथ उसका लंड ज्योति की चूत की दीवारो से रगड़ता हुआ अंदर जा रहा था.

" आह मेरे सोहने भाई. थोड़ा तेज कर लेकिन इतने ही लंड से." ज्योति की सिसकारिया बढ़ती जा रही थी और अर्जुन भी जोश से लगा हुआ था. वो अब तकरीबन 5 इंच तक लंड अंदर बाहर कर रहा था.

ज्योति की चुचियों पे उसके हाथ और दाँत के निशान बन चुके थे. होंठ भी अच्छे से चबा डाले थे. 15 मिनिट के बाद ज्योति की चूत ने एक और बार पानी बहा दिया था और इस बार ये पानी बेड तक आ पहुँचा था. लेकिन अर्जुन लगा रहा अब तो वो उसकी आवाज़ भी नही सुन रहा था. ताबड़तोड़ धक्के मारते मारते 5 मिनिट के बाद उसके लॉड ने भी ज्योति की चूत में पानी खाली करना शुरू कर दिया. तकरीबन 5-6 पिचकारियाँ मारने के बाद अर्जुन ने अपना लंड जैसे ही बाहर निकाला "पुक्क" की आवाज़ हुई और ज्योति दर्द और मज़े से दोहरी हो चुकी थी..

"हाए मा. बड़ा बेदर्द है रे तू. मेरी चूत ही फाड़ दी रे. " जैसे ही उसकी नज़र अपनी चूत पे गई तो देखा के छेद 2 रुपये के सिक्के जितना खुल्ला पड़ा था और उसमे से अर्जुन और उसका खुद का पानी बाहर आ रहा था. जाँघो पे खून लगा था.

"दीदी लंड तो मेरा भी छिल गया है." हंसते हुए अर्जुन बाथरूम मे चला गया और अपना लंड धोकर कपड़े पहन ने लगा. ज्योति अभी भी बेड पे बैठी थी. अर्जुन ने उसको जैसे ही उठया वो लड़खड़ा गई. ऱूको. इतना बोलकर उसने ज्योति को अपनी बाहों मे उठाया और बाथरूम मे ले आया. ज्योति ने टुन्टी का सहारा लेकर अपनी चूत सॉफ की और बाहर आकर कपड़े पहने.

"बड़ा बेदर्द है रे तू. मैं तो तुझे बच्चा समझती थी. तूने तो मेरी चूत का ही सत्यानाश कर दिया. अब बाहर जा और फ्रिड्ज पे रखा दवा का डब्बा लेकर आ. " बेड पे बैठ गई इतना बोलकर ज्योति और अर्जुन डब्बा और पानी लेकर आ गया.

"ये लो दीदी", अर्जुन ने उसको दिया तो ज्योति ने एक पेनकिलर निकाल के खाई और वही लेट गई.

"चल अब तू जा. मैं संभाल लूँगी सब." ज्योति ने जैसे ही इतना कहा अर्जुन ने झुक कर उसके होंठ एक बार फिर चूम लिए और चूंची दबा के भाग लिया बाहर. अपनी साइकल लेकर आ गया वापिस घर जहाँ इस समय शांति पसरी हुई थी.
 
अपडेट - 10

प्यार और परिवार

घर की सभी महिलाए पड़ोस वाले गुप्ता जी के घर गई हुई थी जहाँ होली की कथा सुनाई जा रही थी. दोपहर का 1

बज रहा था और इस समय रामेश्वर जी भोजन करने के बाद अपने कमरे मे नींद ले रही था. ऋतु और अलका एक साथ

बीती पधारी भी कर रही थी और कुछ खुसुर फुसुर भी.

कोमल का भी फाइनल का इम्तिहान था तो वो दूसरी मंज़िल वाले ड्रॉयिंग रूम, जहाँ इस समय कोई नही था बैठी हुई इत्मीनान से नोट्स बना रही थी. संजीव भी गुप्ता जी के ही घर पर था क्योंकि उसको वही से दादी जी और घर की बाकी महिलाओं के साथ पूजा का समान लेकर होलिका स्थान पर जाना था. गुप्ता जी का बेटा अरुण संजीव का अच्छा मित्र था तो वो दोनो अलग कमरे मे बैठे गप्पे हांक रहे थे.

और यहा घर पर माधुरी भीतर वाले आँगन मे बने बाथरूम मे स्टूल पर बैठी किसी बात को सोच मुस्कुरा रही थी. "हाए राम. ये ऋतु भी ना, क्या ज़रूरत थी मुझे ये सब देने की", खुद से बातें करती हुई वो अपनी योनि पर उग्ग आए जंगल को सहलाते हुए उनपे क्रीम लगा रही थी. पूरा शरीर दमक रहा था उसका और पूरी योनि के इर्द-गिर्द सफेद क्रीम लगी थी. ऐसे बैठे होने से उसके दूध अपने आप सख़्त हो रहे थे और उनपर चिपके हुए वो भूरे रंग के निप्पल नंगे होने के एहसास भर से तीर की तरह तीखे हो चुके थे. पूरे शरीर पर रोए खड़े हो गये थे.
 
माधुरी के शरीर मे भी एक बात कमाल की थी. उसके किसी भी हिस्से पर कही कोई बाल नही था. ना हाथो पर और

ना ही कही जाँघ, पिंडलियो या चुतड़ों पर. सिर्फ़ चूत के उपर एक उल्टा वी के आकर का जंगल थे और ऐसे ही बड़े हल्के

से बाल चूत के चारो तरफ. "ऋतु ने बोला था कि 10 मिनिट लगा कर रखना है फिर कपड़े से सॉफ करके धोना है",

यही याद आते ही माधुरी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अगले ही पल उसकी साँसों की रफ़्तार बढ़ गई. "हाए अभी भी

ऐसा लग रहा है जैसे वो पागल अपना डंडा घिस रहा हो मेरी मुनिया पर.", ऐसा एहसास होते ही उसकी चूत से एक ओस

की बूँद बाहर निकल आई और चूत के मुहाने पर रुक गई. और उसके मूह से हल्की सिसकारी निकल गई , " आह्ह्ह्ह पागल कर दिया है इस लड़के ने तो. और क्या हालत कर दी है मेरी." खुद से बातें करते हुए जब माधुरी की नज़र सामने लगे

शीशे पर पड़ी तो उसने देखा छोटे छोटे नीले निशान उसके निप्पलो के आसपास बने हुए, लाल लाल खरोंच के निशान

और सूजे हुए दोनो निपल जो अब पहले से कही बड़े दिख रहे थी. जैसे ही उसने अपने निपल को छूआ, वो चूत पर रुकी

शबनम की बूँद फर्श पर जा गिरी. "ऊई मा." फिर जब उसने ध्यान दिया के क्रीम सूखने लगी है तो पास मे रखे गीले

कपड़े से उसने उपर से नीचे तक रगड़ के पोंछ दिया. "वाह." माधुरी के मूह से अपनी चूत देख कर यही निकला बस.

जहाँ पहले जंगल था वो जगह अब ऐसे दमक रही थी जैसे कोई बाल वहाँ उगा ही ना था. और उसकी चूत के दोनो मोटे

होंठ अब सॉफ गोरे और पहले से ज़्यादा फूले दिख रहे थे. कुछ सोच कर वो शरमाई और सारा कचरा एक पॉलितेन मे

डाल दिया. चूत को ठंडे पानी से ढोने के पाउडर लगाया और कपड़े पहन चल दी अपने कमरे मे कोई गाना गुनगुनाते हुए.

अर्जुन जैसे ही घर पहुचा बिना किसी को देखे सीधे अपने कमरे की तरफ दौड़ लिया. जाते ही टी शर्ट उतार फेंकी और

बनियान पहन कर ड्रॉयिंग रूम मे घुस गया. सामने का नज़ारा देख पैर वही जम्म गये. कोमल दुनिया से बेख़बर छाती

के बल लेटी सी अपने नोट्स बना रही थी और उसके गोरे गोरे उभार कमीज़ से नुमाया हो रहे थे. पाजामी के उपर से कमीज़

कमर पर चढ़ी हुई थी और उसका भाई पिछवाड़ा सलवार से चिपका हुआ बड़ा दिलकश नज़ारा दे रहा था.

"दीदी आप यहा." अर्जुन ने खुद को संभालते हुए कोमल को पुकारा

"ओह. हा भाई वो क्या है ना नीचे शोर हो रहा था. मेरे कमरे मे ऋतु और अलका क़ब्ज़ा कर के बैठी थी. पापा अपने कमरे

मे सो रहे है तो मैं यहा चली आई. अगर तुझे कुछ काम है तो मैं उठ जाती हू.", बिना हीले ही कोमल दीदी ने अर्जुन

को सब बता दिया.

"अर्रे नही दीदी. आपका ही तो है ये भी. मैं तो बोर हो रहा था तो सोचा टेलिविषन ही देख लेता हू. लेकिन आप कर लो

पढ़ाई मैं कही और बैठ जाउन्गा." इतना बोलकर जैसे ही वो मुड़ा तो कोमल ने उसको रोक लिया.

"चल आजा यहा मेरे पास बैठ. मेरा काम भी हो ही गया है. कभी मेरे भी साथ समय बिता लिया कर." और वो सीधी हो गई.

"आप ही सारा दिन घर के काम या पढ़ाई मे लगी होती हो. मैं तो हमेशा यही होता हू अकेला." मासूम सा चेहरा बनता हुआ

वो सोफे पे आ बैठा और कोमल ने भी लेते हुए अपना सर छोटे भाई की गोद मे रख लिया टेलिविषन की तरफ मूह करके.

"कुछ अच्छा सा लगा ना भाई. क्रिकेट मत लगा बस.", बड़े लाड से उसने ये बात कही तो अर्जुन ने रिमोट का बटन दबाया

और फिर ह्बो चॅनेल पर रोक दिया. यहा एक रोमॅंटिक मोविए आ रही थी जो अभी शुरू हुई थी. अर्जुन इंग्लीश फिल्म भी इसलिए

देखता था की उसकी इंग्लीश पर पकड़ बनी रहे. और कोमल जो की खुद फाइनल एअर मे थी उसको भी इंग्लीश की अच्छी समझ थी.
 
दोनो भाई बहन फिल्म देख रहे थे और अर्जुन अपने हाथ से बहन का सर सहला रहा था. दूसरा हाथ उसका वैसे ही दीदी की

कमर से उपर रखा था. फिल्म काफ़ी अच्छी थी तो कोमल तो उसमें ही खो गई. अर्जुन की एक पल नज़र हटी तो उसका ध्यान

अपनी दीदी की कमर पर गया, जहाँ से कमीज़ उपर सरक चुका था. एक बार अपनी बहन की सपाट चिकनी कमर देख कर उसने वहाँ से नज़र हटाई और अपनी दीदी का चेहरा देखने लगा. बिल्कुल मासूम सा चेहरा था कोमल का और त्वचा ऐसी बेदाग के कही कोई तिल भी नही. आँखों पे चस्मा लगा हुआ था जो की काफ़ी जँचता था और छोटा पवर का था वो. उपर वाला होंठ

थोड़ा उठा हुआ नाक की दिशा मे एकदम गुलाब जैसा. सीधी प्यारी नाक और बादाम जैसा चेहरा. कोमल के चेहरे पे एक अलग

ही नूर था. ना तो उसपे ऋतु जैसी चंचलता थी, ना ही अलका जैसा बचपना. एक अलग ही सकूँन से भरा चेहरा था उसका.

आज पहली बार अर्जुन ने अपनी इस बड़ी दीदी को इतने ध्यान से देखा था और वो उसमें ही खो गया था. अब उसके मन मे कोई काम विचार या वासना नही थी, सिर्फ़ एक एहसास था कि ये पल बस यही रुक जाए. उसका दिल रुक रुक कर धड़क रहा था और काफ़ी देर से बनी इस खामोशी को देख कोमल ने सिर्फ़ अपनी नज़र हिलाई, गर्दन नही. अपने भाई को खुद के चेहरे मे खोया देख एक बार तो उसको अजीब लगा लेकिन जैसे ही उसने अर्जुन की आँखों को देखा वो खुद भी शांत हो गई. अर्जुन भाव-शून्य सा खोया था और उसको कुछ पता नही चला. बस उसकी दीदी के गाल हल्के गुलाबी हो गये थे. कोमल के होंठ धनुषाकार हो चुके थे. लाज शरम, और सिर्फ़ इस विचार से की उसका भाई कितने वत्सल्य से उसको देख रहा है.

हिम्मत कर के कोमल ने इस बार नज़र घुमाई और अपने भाई का चेहरा देखने लगी जैसे वो देख रहा था. बड़ी गहरी भूरी

आँखें, घुँगराले कुंडली बाल, चेहरे पे एक तेज जिसको कोई नज़र अंदाज ना कर सके, हल्के भूरे-गुलाबी होंठ जिनके उपर

अभी मूच के अंकुर बस निकलने ही लगे थे, तराशा हुआ चेहरा. और बस यही दोनो की नज़र एक हो गई.

अपनी दीदी की गहरी आँखों की तरफ अर्जुन झुकता ही चला गया और कोमल के हाथ खुद बा खुद भाई की गर्दन को घेर कर

आपस मे जुड़ गये. दोनो एक दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे. टेलिविषन पर फिल्म ख़तम हो चुकी थी लेकिन यहा शुरू

हो चुकी थी. कोमल ने खुद से ही अपने लबों को अर्जुन के लबों से मिला दिया. इस चुंबन मे लेश-मात्र भी वासना ना थी.

अर्जुन ने अपने होंठो से कोमल का उपर वाला होंठ चुभलेया तो उसकी आँखें सुकून से बंद हो गई. गर्दन पर पकड़ और

मजबूत. जैसे वो कह रही हो के भाई मुझको खुद से अलग मत करना. अर्जुन ने भी अब कोमल के दोनो होंठ अलग कर अपनी

जीभ से उसकी जीभ को छू लिया था और एक हाथ के अंगूठे से उसके गरम हो रहे नाज़ुक गाल को सहला रहा था. गीले होंठ

एक बार फिर जोरदार तरीके से चिपक गये और जब अलग हुए तो अर्जुन की गर्दन सोफे की टेक पर लुढ़क गई और कोमल अपने भाई की गोद मे आँखें बंद किए निढाल मूर्छित सी पड़ी थी.

वो उठी और जब उसने देखा के उसका भाई अभी भी साँसे दुरुस्त कर रहा है तो एक बार फिर कोमल ने झुक कर अपने भाई के होंठो पे प्यार से एक छोटा सा चुंबन दिया और अपनी किताबें लेकर नीचे चली गई, एक नई उर्जा और प्यार से भरी.

"ऐसा जाड़ो तो मुझे सेक्स करते वक्त भी नही हुआ. और मेरी नज़र को कुछ भी दिखाई क्यू नही दिया?" सोचते हुए वो अपने बेड

पर निढाल होकर नींद के आगोश मे चल दिया.

.

.

इधर ऋतु और अलका के कमरे मे.

ऋतु- यार सोचा है कुछ कल जनमदिन के बारे मे?

अलका - क्या सोचना है वही सुबह उठकर पूजा करनी है दादी जी के साथ. उपर से फाग है तो रंग खेलेंगे और शाम को

जैसे हर साल होता है वैसे ही मेरी पसंद का खाना बनेगा और जो दादा जी दान-पुण्य करवाएँगे. नया क्या होगा? जनमदिन

तो एप्रिल मे बनता है.

ऋतु (सोच के लहजे मे)- हा यार जनमदिन तो दादा जी अर्जुन का ही मनाते है. देखा नही जब वो 8 साल नही था तब भी बड़ी

धूम धाम से मनाते थे, जैसा खुद उनका ही जानम हुआ हो उस दिन. लेकिन प्यार तो वो तुझे ही करते है सबसे ज़्यादा उसके बाद.

अलका- अर्रे ये देख के तो मुझे कही ज़्यादा खुशी होती है. छोटा भाई है हमारा और प्यार तो सभी करते है उस से. जहाँ

तक मुझे याद है तो तू ही सारा दिन उसको गोद मे लिए छोटा काका- छोटा काका करती रहती थी बचपन. कितनी बार तो उसके रोने से तू ही रोने लग जाती थी कि देखो काके को क्या हुआ.. और खिलखिलाने लग पड़ी

ऋतु मुस्कुराते हुए बोली," यार बचपन कितना प्यारा था ना और अब देख ये पिताजी के चक्कर मे 12 घंटे तो किताबो मे निकल जाते है." किसी तरह अर्जुन क टॉपिक को उसने बदल दिया. जब भी उसके सामने अर्जुन का चेहरा आता था वो खुद ही नज़र हटा लेती थी.
 
जाने क्या था उसके दिल मे जो अपने भाई से 8 साल दूर होने के बाद घर कर गया था.

अलका ने बात आगे बढ़ाई," वैसे तू मुझे क्या दे रही है? चाचा जी ने तो 2 कंगन बनवाए है मेरे लिए सोने के. चाची जी

ने एक नया फूलकारी वाला सूट, माधुरी डिक्सिट जैसा. पापा तो कल ही देंगे लेकिन दादा जी ने बॅंक मे अकाउंट खुलवा दिया है और 50,000 जमा किए मेरे नाम से." बिस्तर पर दोनो आमने सामने लेटी थी झुकी हुई सी.

"यार तेरा सही है. इतना कुछ मिला है तो मैं सोच रही थी कि तू ही उपहार देदे मुझे." बोलकर ऋतु खिलखिला उठी. सबके सामने हिट्लर सी रहने वाली ऋतु सिर्फ़ अलका, शंकर जी और अपने दादी जी के साथ ही खुलकर बात करती थी. दादी तो खुद हिट्लर थी तो उनको अपनी यही ग़ुस्सेल पोती पसंद थी और पिताजी भी ऐसे ही थे. लेकिन अलका और ऋतु बचपन से एक साथ रही थी और अलका का विपरीत स्वाभाव ही था कि ये दोनो एक दूसरे से जान तक जुड़ी थी.

"हा तो तुझे पता ही है मैं कॉन्सा कंगन पहनती हू. तेरे ही है वो और जो भी संजीव भैया देंगे वो भी तुझे ही मिलेगा.",

अलका ने प्यार से उसकी ठोडी उपर उठा के बोला तो ऋतु ने कुछ ना कहा बस हल्के से चूंटि काट दी अलका के झाँकते हुए उभारों पर.

"आह.. कमीनी", इतना बोलकर दोनो मुस्कुरा दी.."तू कभी नही सुधरेगी ना? जब देखो तुझे यही दिखता है." अलका ने झूठे गुस्से से कहा तो ऋतु ने पलट वॉर किया, "दिखती है तभी तो दिखते है मेरी जान. वैसे कुछ भी के अलका तुझे देखती हो तो ऐसा लगता है के मैं तो कुछ भी नही तेरे सामने. भगवान ने तुझे ना जैसे अपने स्वर्ग के लिए ही बनाया था और भेज दिया यहा." इतना बोलकर एक बार फिर उसने अलका के उभार पकड़ लिया.

"क्या करती है पागल कुछ भी बोलती है. तू शायद ये भूल रही है तू क्या चीज़ है यार. पिछले साल याद है ना फ्रेशर टाइम

क्या हुआ था? लड़के पुलिस की लाठियाँ खाने से भी हटे नही थे तुझे सारी मे देख कर." अलका ने ऋतु का हाथ हटाने के कोई

कोशिश नही की, उल्टा खुद भी उसके गले से नीचे हाथ फेरने लगी.

"इतना खूसूरत होने का फायेदा ही क्या हम दोनो का जो शादी तक रहना ही जैल मे है. और फिर शादी के बाद पता नही कैसा घर माहॉल मिले." दार्शनिक अंदाज मे अपनी बात कहते हुए ऋतु अब अपना पूरा हाथ अलका की कमीज़ मे घुसाए उसका एक चूचा दबा रही थी..

"स्शह.. बस कर यार. तेरा तो पता नही लेकिन मैं तो जिंदगी जीने मे यकीन करती हू. काट ता तो कुत्ता भी है और हम पढ़े

लिखे इंसान है." अपनी चूची के दबाए जाने से मज़े मे आती अलका ने भी ऋतु का निपल खींच लिया और उसकी भी सिसकी फूट गई

"मत आग लगा कमिनी. पछताएगी."इतना बोलकर ऋतु उपर आ गई अलका के लेकिन अपना पूरा वजन नही डाला. "और क्या कह रही है के तू जिंदगी जीने मे यकीन करती है? कोई शहज़ादा तो नही आ गया तेरे सपने मे?" इतना बोलकर इस बार ऋतु ने अपने दोनो हाथ अलका की कमीज़ मे घुसा दिए और पूरा कमीज़ उल्टा दिया गले तक.

"ओये अभी मत कर. तेरा ये मस्ती करना दोनो को भारी पड़ जाएगा किसी दिन." अलका बोल तो रही थी लेकिन खुद उसने भी ऋतु की टी शर्ट मे दोनो हाथ घुसा दिए थे. "और कोई शहज़ादा वहजादा नही आया सपने मे. अब जो भी आएगा सामने ही आएगा. और प्यार होना है तो होकर ही रहेगा. शादी जहाँ मर्ज़ी हो.", इतना बोलकर उसने भी ऋतु की ब्रा उलट दी.

"वाह मेरी भगत सिंग. क्रांति की बातें कर रही है." ऋतु ने अब अलका के दोनो चुचे जो की बिल्कुल सर उठाए खड़े थे, एकदम गोरे और लालिमा लिए हुए अपने दोनो हाथो से सहलाने दबाने शुरू कर दिए. उनपर उगे नुकीले हल्के भूरे निप्पल कड़े होकर सुलग ने लगे थे. वही ऋतु के एकदम सफेद चूचे जो किसी भी प्रकार से अलका से कम ना थे वो भी अकड़ने लगे. उनपे हल्की नीली रेज सॉफ दिख रही थी.

अलका ने उन्हे मसलते हुए कहा,"देख मेरी जान कल को किसी अजनबी से शादी करके घर तो बसाना ही है. फिर वहाँ ही रोना पड़ा या हँसना तो उस से पहले जीना कोई गुनाह तो है नही.", इतना कहकर उसने ऋतु का एक पूरा चूचा चूसना शुरू कर दिया और ऋतु भी अलका का सर सहलाने लगी..

"सही कह रही है मेरी जान तू. यहा सब आराम है लेकिन क्या फायेदा इन सुख सुविधा का जहाँ अपनी मर्ज़ी से बाहर ही ना जा सके."

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अगले 10 मिनिट तक दोनो ही एक दूसरे को ऐसे ही गरम करती रही जोकि ये महीने मे 2-3 बार करती ही थी जब भी अकेली होती थी.

दोनो के तन पर सिर्फ़ पाजामा ही था और ऐसा प्रतीत होता था कि 2 अप्सराएँ एक दूसरी से नागिन की तरह लिपटी है. और तभी दरवाजे पे " टक - टक "

"कौन है?", ऋतु ने पास रखी टी शर्ट पहनते हुए कहा और अलका को उसकी कमीज़ पकड़ाई. दोनो ने बिना ब्रा के ही वो पहन लिए.

"अर्रे ऋतु दरवाजा तो खोल. मुझे बुक्स रखनी है और मैं चाय बना रही हू तू दादा जी और पापा को उठा दे. 4 बज रहे है.

बाकी सब भी पूजा से आने वाले होंगे." कोमल ने इतना बोला था कि दरवाजा खुल गया. वो अंदर आई अपनी किताबें रखकर सीधा बाहर चली गई. और ये दोनो मुस्कुराती हुई अपनी अपनी ब्रा पहन कर, कपड़े ठीक कर ऋतु चली गई शंकर जी को उठाने औरअलका अपने दादा जी को.
 
दूसरी तरफ संदीप और उसकी माता जी भी पूजा से फारिग होकर घर आ गये थे. वापिस आने मे उनको कोई 3 घंटे तो लग ही गये थे. घर मे घुसते ही रजनी जी की नज़र पड़ी बेड पर लेटी हुई ज्योति पर फर्श पर रखे जाला उतारने वाले ब्रश पर.

"बेटी, क्या हुआ? ये कॉन्सा समय है सोने का?", रजनी जी ने बड़े प्यार से ज्योति के सर पर हाथ फेरते हुए उसको उठाया.

"वो मा मैं दीवार से मकड़ी के जाले निकाल रही थी कि टेबल सरक गया और मैं नीचे गिर गई. लगता है जाँघ की नस चढ़ गई कोई और पाँव भी दुख रहा था.", ज्योति ने बड़ी सफाई से झूठ बोला रॉनी सूरत बना कर.

"क्या पड़ी थी बेटा ये सब काम तुझे करने की? इसके लिए ये संदीप और तेरे पिताजी है ना. अब देख त्योहार के दिन तुझे चोट लग गई." उन्होने भावुकता से उसका माथा सहलाया. "तुझे तो बुखार भी आ गया है बेटा. संदीप, ज़रा दावा का डब्बा और पानी लेकर आ यहा."

संदीप ने अपनी मा के हाथ मे डब्बा पकड़ाया तो रजनी जी ने उसमे से क्रोसिन दवा निकाल कर अपनी बेटी को खिलाई और पानी दिया.

"मा मैने दर्द की दवा खा ली थी. रात तक ठीक हो जाउन्गी मैं. आप चिंता मत करो और पापा को मत बताना कुछ भी." ज्योति

की बात सुनकर रजनी जी को हँसी आ गई. "चल बेटी तू आराम कर मैं रसोई मे जा रही हू कल के लिए पकवान और गुझिया भी

बनानी है." एक बार फिर प्यार से हाथ फेर कर रजनी जी चल दी रसोईघर मे और संदीप अपनी दीदी के पैरो की तरफ बैठ

गया. "दीदी मैं वापिस आकर कर ही देता. देखो अब आप तो बीमार पड़ गई. कल फाग कौन खेलेगा?" उसने थोड़ा जज्बाती होकर ये बात कही अपनी दीदी से. संदीप और ज्योति मे आपस मे प्यार तो बहुत था लेकिन इन दोनो मे एक सीमा थी जिसकी दोनो इज़्ज़त करते थे.

"अर्रे 3-4 घंटे की तो बात है भाई. देख फिर कल जमकर रंग लगाएँगे सबको." उसने भी प्यार से जवाब दिया

"अच्छा दीदी, वो अर्जुन कब गया था घर.? वो मैने उसको रुकने का बोला था और मुझे ही देर हो गई."

अर्जुन का नाम सुनकर ही ज्योति की चूत कुलबुला गई. हाए रे कितना जालिम है तेरा दोस्त और उसका लंड. तेरी बहन को बेड पे लिटा कर खुद मज़े कर रहा है. ज्योति ने ये मन में ही सोचा.

"भाई वो तो 10 मिनिट इंतज़ार करके ही वापिस चला गया था. मैं बाहर सफाई कर रही थी तब.? बड़ी सफाई से एक और झूठ

बोला ज्योति ने और उसकी दुखती हुई चूत में खारिश शुरू हो गई.

"अच्छा दीदी आप आराम करो मैं रसोई मे मम्मी के मदद करता हू." इतना बोलकर वो उठ गया वहाँ से और ज्योति ने अपनी चूत को कस कर सहला दिया. "अगली बार तेरा पूरा मूह खुलवाउन्गी उसके लौडे से", अपनी मुनिया को बोल हंसते हुए ज्योति ने भी पलके बंद कर ली.

"अच्छा मा अभी तो मैं काम से जा रहा हू, देर रात तक आउन्गा तो आपसे कल सुबह ही मिलूँगा." शंकर जी ने चाय ख़तम करते हुए एक छोटा सा डब्बा रामेश्वर जी को दिया और पास मे बैठी अपनी मा कौशल्या जी के हाथ मे एक शगुन का लिफ़ाफ़ा थमा दिया. "आंड फॉर माइ स्वीट लिट्ल प्रिन्सेस, हियर ईज़ आ स्माल लिट्ल बर्तडे प्रेज़ेंट." रेखा जी के हाथ से एक चमकदार छोटा सा डब्बा उन्होने लेकर अलका का दिया और उसका माथा चूम लिया. "थॅंक'स आ बंच चाचा जी." उसने भी उनके गले लगकर अपना प्यार जताया.

"भाई कभी हमें भी ले जा करो अपनी कॅषुयल मीटिंग्स मे", रामेश्वर जी ने ठहाका लगते हुए कहा तो शंकर जी अपने पिता की बात पर मुस्कुरा दिए और जाते जाते आँखों से ही अपनी पत्नी रेखा जी को कुछ इशारा कर गये जिसे देखकर वो शरमाती हुई

वापिस रसोई की तरफ चल दी जहाँ ललिता जी और कोमल मीठी पूरियाँ बना रहे थे, माधुरी गुझिया बेल रही थी.
 
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