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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

नीचे सब लोग अलका को बधाई दे रहे थे तॉहफो के साथ तो अर्जुन ने भी हॅपी बर्तडे बोला. उसकी आवाज़ सुनकर अलका ने शरमाते हुए थॅंक यू कहा. हल्का फूलका नाश्ता किया तो दादी जी ने सबके गुलाल से तिलक किया. रामेश्वर जी अपने दोस्त कॉलोनल पूरी के घर जा चुके थे. उनको रंगो से परहेज था लेकिन बच्चों को खेलने की आज़ादी थी. शंकर जी भी अपने बड़े भाई को लेकर निकाल दिए अपनी दोस्त मंडली की और. जाने से पहले वो ललिता जी और रेखा को गुलाल से रंग गये थे. फिर सभी बहनो ने भी संजीव भैया और अर्जुन को रंग माला. संजीव भैया तो उतनी देर मे ही चल दिए घर से बाहर अपने दोस्तो के पास होली खेलने लेकिन अभी तक अर्जुन ने रंग को हाथ नही लगाया था. दादी जी, ताइजी और मा जैसे ही बाहर वाले आँगन मे गई जहाँ पड़ोस की महिलाए आई हुई थी होली खेलने, अर्जुन ने अपनी दोनो मुट्ठी रंग से भारी और कोमल को पीछे से जकड़ कर दोनो गालो, गले और सर को रंगो से भर दिया. कोमल इसके लिए तयार नही थी. जैसे ही वो संभली अर्जुन ने पास मे रखी पक्के रंग से भरी पानी की बाल्टी उसके सर पे उलट दी. पूरा सूट पक्के लाल रंग से सन्न गया था और कोमल भी.

"अर्जुन के बच्चे.." उसने इतना ही बोला था के अर्जुन भाग गया दूसरी मंज़िल पर. कोमल से पहले माधुरी भागी अर्जुन को पकड़ने लेकिन जैसे ही वो दूसरी मंज़िल पर पहुचि अर्जुन ने एक बाल्टी उनके उपर भी उडेल दी. जब तक वो संभलती उनका चेहरा पीले और हरे रंगसे सना हुआ था. और अर्जुन वापिस भाग कर नीचे आँगन मे आ गया.

माधुरी ने कोमल और अलका के साथ मिलकर प्लान बनाया था अर्जुन को रगड़ने का लेकिन अर्जुन पहले ही तैयारी करके बैठा था. जगह जगह रंग से भरी बाल्टी और रंग छुपा कर.

उसने सब तरफ देखा लेकिन अलका नही दिखी. कोमल मूह पर पानी डाल रही थी क्योंकि ज़्यादा ही रंग पुत गया था. और इतने मे ही अर्जुन को अलका दीदी रसोईघर के पास वाले खंबे के पीछे छुपी दिखी. वो चुपके से एक बाल्टी लेकर उनके पीछे जा खड़ा हुआ. जैसे ही अलका दीदी पलटी अर्जुन ने ये बाल्टी भी उडेल दी उनके उपर और जेब से 2 मुट्ठी रंग लेकर पूरे चेहरे के साथ साथ गले और उस से नीचे भी चिपका दिया.

"तू इसको पकड़ अलका. मैं बताती हू इस किशन कन्हैया को." माधुरी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई. वो सीढ़ियो पर खड़ी थी और उनका पूरा सूट शरीर से चिपका हुआ था. कामदेवी लग रही थी वो इस रूप मे भी. कुछ यही हाल था अलका और कोमल का. लेकिन अर्जुन अभी खेलने के ही मूड मे था. तीनो बहनो के सूट गीले थे और वो फर्श पर दौड़ भी नही सकती थी. फिसलने के डर से.

" हिम्मत है तो कोई भी छू के दिखाओ. जिसने भी मेरे मूह पर रंग लगा दिया मैं उसकी एक विश पूरी करूँगा.", अर्जुन ने थोड़ा

चिल्ला कर ये बात कही थी. आँगन काफ़ी बड़ा था और उपर से रसोईघर के सामने बने 3 खंबो का अर्जुन बखूबी फायेदा उठा रहा था. तीनो बहने असहाय सी नज़र आ रही थी की अगला सीन देख कर सभी रुक ही गई अपनी जगह पर.

"बड़ा आया खिलाड़ी. देख अब तू भाग कर दिखा.", ऋतु पता नही कहाँ से प्रकट हुई और उसने अर्जुन को पीछे से पकड़ कर एक हाथ

मे भरे हुए रंग से पूरी तरह रंग दिया. वो वही जड़ हो गया. होश आया तो उसकी छुपाई हुई रंगो की 2 बाल्टी उसके उपर गिर चूकि थी. और अब वो बुरी तरह घिर चुका था.

"ऋतु इसको छोड़ना मत.", इतना बोलकर माधुरी दीदी ने दो पॅकेट रंग लेकर अर्जुन को सर से

लेकर पाव तक अच्छे से रगड़ा. उसकी टीशर्ट उठा के पूरी छाती और पेट पर भी रंग लगाया. कोमल ने भी थोड़ा रंग लगाया लेकिन अलका ने थोड़ा सा लाल गुलाल अर्जुन के गाल पे लगाया और दूर खड़ी हो गई.

कोमल ने अब ऋतु को पकड़ लिया जो कब से सूखी ही थी. "दीदी नही मैं होली नही खेलती प्लीज़." वो चिल्लाई लेकिन कोमल ने उसकी एक ना सुनीऔर पूरे चेहरे पे पीला रंग भर दिया. माधुरी ने भी यही किया और अलका ने एक बाल्टी पानी डाल दिया उसके उपर.

"ये आपने ठीक नही किया दीदी.", वो बेचारी बस रो ही पड़ी थी.

"जब खेलती नही तो अर्जुन को क्यो पकड़ के रंगा तूने?", कोमल ने ये बात कही तो वो चुप्प हो गई और थोड़ी देर बाद बोली, "वो उसने शर्त लगाई थी ना के बदले मे वो एक विश पूरी करेगा तो इसलिए."

"अर्जुन चल तू भी ले ले इस से बदला.", कोमल ने ये बात कही तो पहली बार अर्जुन ने ऋतु दीदी को देखा. उसकी टीशर्ट बुरी तरह से चिपकी हुई थी और चूचियों के निपल भी नुमाया हो रहे थे. इन सब को अनदेखा कर वो धीरे धीरे आगे बढ़ा तो ऋतु की धड़कन तेज़ हो गई.

दोनो ही एक दूसरे की आँखों मे ही देख रहे थे. ऋतु आँखों से ही अपने छोटे भाई को रुकने की प्रार्थना कर रही थी लेकिन अर्जुन अब उस से बस कुछ ही इंच दूर खड़ा था.

"हॅपी होली दीदी." इतना बोलकर उसने एक चुटकी गुलाल ऋतु के गाल से लगा दिया. "और हा आप मुझसे अब कुछ भी

माँग सकती हो, मैं मना नही करूँगा आपकी किसी भी विश को." इतना बोलकर वो घर से बाहर चल दिया. इधर ऋतु की आँखों मे आँसू आ गये थे जो उसके सर से टपकते पानी की वजह से किसी को नही दिखाई दिए. बाकी तीनो बहने भी बाहर आँगन मे चली गई क्योंकि अलका की सहेलियाँ भी आने वाली थी.

ऋतु बाथरूम मे लगे शावर के नीचे खड़ी थी और सारा रंग उतार कर फर्श से बहता हुआ जा रहा था. उसका दिल भारी हो रहा था यही सोचकर के ये क्या हो रहा है. जितना वो अर्जुन को खुद से दूर करती है वो क्यो उसके दिल मे और गहरा होता जाता है. उसका हाथ अपने गाल के उस हिस्से पे गया जहाँ अर्जुन ने रंग लगाया था. ऋतु को महसूस हुआ के हाथ गाल पे लगा था लेकिन छू उसकी आत्मा को गया. गीली ही वो अपने कमरे मे चली गई थी.

"आजा तेरा ही इंतजार था." जैसे ही अर्जुन बाहर निकला ज्योति ने उसके उपर रंग डाल दिया. अर्जुन ने भी बड़े प्यार से ज्योति के गालो पे रंग लगाया और फिर संदीप से गले मिलकर बधाई दी. ज्योति अर्जुन के घर मे चली गई और संदीप अर्जुन को लेकर घूमने चले दिया. ऐसे ही दोनो पास की मार्केट मे चले गये. हर तरफ सड़क पर रंग फैले थे. लोग स्कूटर्स के साइलेनसर उतार कर घर के बाहर खड़े लोगो पर पानी के गुब्बारे और अंडे फेंकते जा रहे थे. दोनो ने वही खुली एक दुकान से जीरा लेमन की बॉटल पी और फिर घूमते हुए एक पार्क मे बैठ गये. कुछ जान पहचान वालो ने उनको रंग लगाया और उन्होने उनको. एक घंटे बाद दोनो वापिस घर की और चल दिए.

संदीप के गाँव से रिश्तेदार भी आए हुए थे. संदीप क घर के बाहर से ही अर्जुन वापिस अपने घर की और चल दिया. अब आँगन का नज़ारा बदल गया था. नुसरत, आशा, अलका, कोमल, माधुरी दीदी और 5-6 देखी हुई लड़किया एक दूसरी को खूब रंग रही थी. नुसरत और आशा ने जैसे ही अर्जुन को देखा वो उसकी और चल दी.

"वाह हीरो तू तो बड़ा दिलेर है. अपनी माशूका के घर ही आ गया होली खेलने." आशा ने ये बात बड़ी धीरे से कही थी फिर उन दोनोने अर्जुन को बड़े प्यार से रंग लगाना शुरू किया. मूह पे, गले पे, छाती पे फिर बचा हुआ उसके सर पे डाल दिया. अर्जुन ने भी दोनो के गाल पर थोड़ा थोड़ा रंग लगा दिया.

"कभी अकेले मिलना फिर पक्का रंग लगाउन्गी." नुसरत ने अपने बड़े दूध अर्जुन की छाती से रगड़ते हुए ये बात उसके कान मे कही थी.

"यही ऑफर मेरी तरफ से भी ओपन है." इतना बोलकर आशा ने भी आँख मार दी. अर्जुन मुस्कुरा दिया

लेकिन इस बीच एक जोड़ी आँखें उसको बड़े ध्यान से देख रही थी दूसरी मंज़िल की जाली वाली खिड़की से. अर्जुन ने देख के अनदेखा किया और अंदर चल दिया. बाथरूम मे जाकर रगड़ के अपना चेहरा और हाथ धोए. रसोई से पानी की बॉटल लेकर पानी पिया और उपर चल दिया.
 
अपने कमरे मे जाकर उसने अपनी खराब शर्ट उतारीफिर पेंट भी, और एक सॉफ टीशर्ट पेंट निकाली और बाथरूम मे जाकर नहाया. और सीधा

तीसरी मंज़िल पर चला गया. ऋतु दीदी संजीव भैया के कमरे से उसकी सारी हरकत देख रही थी. वो भी कुछ देर बाद उपर चल दी.

अर्जुन छत पर पिछली दीवार के पास खड़ा था, जहाँ घर के पीछे का भाग था. घना जंगल सा था वहाँ सरकारी ज़मीन पर.

"मुझे माफ़ कर्दे मेरे भाई. मैने तुझे बड़ा दुख पहुँचाया है." उसके पीछे जा कर ऋतु लिपट कर रो पड़ी. अर्जुन घूम गया लेकिन

वैसे ही खड़ा रहा.

"जब तू बोरडिंग चला गया तो मेरे तो जैसे सब अरमान ही टूट गये थे. और फिर जब भी तू आया कभी मेरे पास नही रहा. हर रात

मेरे साथ सोया था और एक ही बार मे मुझे अकेला छोड़ गया." वो बोलती रही और अर्जुन से लिपटी रोती रही.

"मेरी जिंदगी हमेशा से ही तेरे साथ थी. तुझे मैने कभी अकेला नही छोड़ा था लेकिन तू मुझे 9 साल के लिए छोड़ गया. फिर क्यो बात

करती मैं तेरे साथ.? एक बार भी तूने मुझसे प्यार से बात नही करी. मेरा प्यार इतना कमजोर था क्या?" उसके आँसुओ की रफ़्तार और तेज

हो चुकी थी और फिर अचानक उसकी आवाज़ बंद हो गई थी. अर्जुन ने पहली बार पिछले 9 साल मे आज उसको अपनी बाहो मे भर लिया था. उसका

छोटा भाई अब इतना बड़ा हो गया था की उसको बाहो मे भर अपने सीने मे छुपा रहा था. अर्जुन की आँखों से भी आँसू छलक आए और

जैसे ही ये ऋतु को महसूस हुआ उसने अपना चेहरा उपर करके अपने भाई को देखा. जिसकी आँखों मे उसके लिए सिर्फ़ प्यार ही था. और उस से

बिछड़ने का दर्द भी. ऋतु सहम सी गई अपने छोटे भाई के हालत देख. और उसके चेहरे को अपनी छाती से लगा लिया. जब आँसू बह गये

तो एक बार फिर दोनो ने एक दूसरे को देखा और इस बार अर्जुन ने अपनी बड़ी बहन को अपनी बाहों मे उपर उठा लिया. "आप मेरी जान हो दीदी.

मैं खुद को भूल सकता हू लेकिन आपको हल्की सी भी पीड़ा होती है तो मेरी रूह तड़प उठती है. आप जिंदगी भाई भी मुझे ताने दो

तो भी मुझे बुरा नही लगेगा. प्यार मे ज़रूरी तो नही के हाँसिल हो ही जाए." अर्जुन ने जब इतना कहा तो ऋतु ने अपने हाथ उसके कंधे

पर रख उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए. अर्जुन अभी भी ऋतु को उपर उठाए था. वो अपने भाई को पागलो की तरह चूम रही थी.

आख़िर यही तो था उसका पहला प्यार. और जब सब धूल गया तो दोनो अलग हुए. अर्जुन ने बड़े प्यार से अपनी बहन को नीचे उतारा तो एक बार और ऋतु उसके गले लगी और गाल चूमकर नीचे भाग गई.

अर्जुन जब घर के सामने की तरफ आया तो देखा कि अब नज़ारा बेहद हसीन हो गया था. किसी स्वर्ण मृगनी के जैसी अलका दीदी और ऋतु दीदी

सबपे रंग फेंक रही थी और ढोल की थाप पर नाच रही थी. और अर्जुन बस मुस्कुरा दिया उनको देख कर.
 
माधुरी मिलन

दोपहर 2 बजे तक सब लोग घर के अंदर आ चुके थे होली खेल कर. घर की औरतों ने नहा धो कर सॉफ कपड़े पहन लिए थे और

अब वो रसोई मे लग गई थी. कोमल दीदी बाहर वाले बाथरूम मे अपना रंग उतारते हुए नहा रही थी और अंदर वाले बाथरूम मे अलका दीदी

और उनकी सहेलियाँ थी. ऋतु दीदी ने अभी आँगन मे लगे नलके पर ही जितना हो सका उतना रंग उतारा और उनके साथ आशा थी. रेखा जी ने आशा और नुसरत के लिए भी कपड़े निकाल कर आँगन मे लगी तार पर डाल दिए थे.

माधुरी दीदी उपर के बाथरूम मे जाने का बोलकर दूसरी मंज़िल पर पहुच गई. ड्रॉयिंग रूम मे बैठे अर्जुन को एक दिलकश सी स्माइल देती

वो उसके सामने ही बाथरूम मे घुस गई. दरवाजा खुला ही था और अर्जुन को पानी गिरने की आवाज़ आई. सब तरफ देख कर उसने मुख्य दरवाजा

बंद किया और वो भी घुस गया बाथरूम के अंदर. दृश्य इतना कामुक था का अर्जुन का लंड एक सेकेंड मे अपनी औकात पर आ गया. माधुरी

दीदी का कमीज़ फर्श पर गिरा हुआ था और वो एक पुरानी ब्रा पहने हुए शावर के नीचे झुकी हुई थी. अर्जुन ने पीछे से जाकर दीदी की गान्ड

पर अपनी कमर भिडाते हुए दोनो मोटे दूध पकड़ लिए. माधुरी दीदी ने भी कोई कोशिश ना की अर्जुन को हटाने की. धीरे धीरे उसने अपना

दीदी की नंगी कमर और गर्दन पर घुमाना शुरू कर दिया. माधुरी दीदी ने भी दोनो हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल अपने फुटबॉल जैसे

बूब्स आज़ाद कर दिए. "साबुन लगा कर मसल भाई. इनपे भी काफ़ी रंग लगा है." बेहद कामुक आवाज़ मे उन्होने ये बात कही तो अर्जुन ने

अपनी टीशर्ट और पेंट वही गिरा दी और दोनो हाथो मे साबुन रगड़ उनके मुलायम बड़े चुचे मसलने लगा. "आ भाई प्यार से कर ज़्यादा ज़ोर

से नही", इतना बोलकर वो खुद भी अपनी गान्ड उसके खड़े लंड पर रगड़ने लगी. "दीदी कितने बड़े और मोटे मोटे बूब्स है आपकी." इतना बोलकर

अर्जुन ने दीदी को अपनी तरफ घुमा लिया और नीचे झुक कर उनके एक पपीते को मज़े से पीने लगा. उसका दूसरा हाथ दीदी की गीली गान्ड को

महसूस कर रहा था. "इसको भी उतार दे भाई.", अपनी दीदी की बात सुनकर उसने सलवार भी एक झटके मे उनके तन से अलग कर दी. अब अर्जुन

मोटे दूध को पीते हुए अपने दोनो हाथो से उनकी गान्ड की दरारों को भी फैला रहा था. उसको उन्हे दबाने मे अलग ही मज़ा आ रहा था.

अब माधुरी दीदी ने भी अर्जुन की छाती पर साबुन रगड़ना शुरू किया और फिर अपने हाथ उसके कचे के अंदर डाल उसका खड़ा लंड सहलाने

लगी. "भाई तेरा ये डंडा कितना बड़ा और गरम है. हाए देख कैसे अकड़ रहा है मेरे हाथो मे." इतना बोलकर वो उसके लंड को

दोनो मुठीॉ मे भर के दबाने लगी.

"दीदी आपकी वो भी तो कुछ गरम नही." बोलते हुए अर्जुन ने उनकी कच्छी जो गान्ड की दरार मे

बुरी तरह से फासी हुई थी बाहर निकाल के नीचे कर दी.
 
"दीदी आपकी वो भी तो कुछ गरम नही." बोलते हुए अर्जुन ने उनकी कच्छी जो गान्ड की दरार मे

बुरी तरह से फासी हुई थी बाहर निकाल के नीचे कर दी.

"वाह दीदी. आपने चूत कब सॉफ की?" वो तो उस चिकनी फूली हुई चूत में ही खो गया

"भाई मैं तो कल ही तुझे ये दिखाने वाली थी लेकिन चल आज सही." इतना बोलकर माधुरी दीदी ने भी अर्जुन का लंड कच्छे से आज़ाद

कर दिया. अर्जुन का लंड इस समय पूरे दैत्याकार रूप मे खड़ा था. उसके लाल सुपाडे का आकर बड़े टमाटर सा हो चुका था और पूरे लंड पर नसे उभर आई थी..

"दीदी देखो ये कैसे तड़प रहा है आपके लिए.", इतना बोलकर अर्जुन ने माधुरी दीदी को बाहों मे भरकर पागलो की तरह चूमना

शुरू कर दिया. उनके दोनो बड़े चूचे अब अर्जुन की छाती से रगड़ रहे थे. और उन पर लगे भूरे निपल अर्जुन को छाती मे धस्ते

महसूस हुए. उसका लंड भी दीदी के पेट पर रगड़ रहा था. क्योंकि वो कुछ ज़्यादा लंबा था अपनी दीदी से.

"आप नीचे लेट जाओ.", इतना बोलकर अर्जुन ने माधुरी दीदी को वही फर्श पर लिटा दिया और उनके उपर लेट गया. पानी अभी भी चल रहा

था. अपने दोनो हाथो मे उनके मोटे बूब्स दबाते हुए वो दीदी के होंठ कुचलने लगा और अपना लंड उनकी चिकनी चूत पर रगड़ने लगा.

"भाई देख अभी टाइम ज़्यादा नही है तू एक काम कर मैं खड़ी होती हू और तू पीछे आ." ये बोलकर माधुरी दीदी दीवार के सहारे खड़ी हुई

और झुक कर अपनी बड़ी गान्ड बाहर निकाल ली. अर्जुन जैसे ही उनके पीछे आया उन्होने अपने हाथ से उसका मोटा लंड अपने चुतड़ों की दरार

से निकालते हुए चूत की फांको के बीच लगा लिया. अर्जुन भी समझ गया के अब क्या करना है. माधुरी दीदी की मोटी चिकनी जाँघो मे उस

लंड टाइट फसा था. "चल अब आगे पीछे कर. बस ध्यान राखिॉ ये अंदर ना जाए. वो काम हम रात मे करेंगे." दीदी की बात ख़तम

होते ही अर्जुन ने धक्के मारने शुरू कर दिए. दीदी को दीवार से चिपकाए उसने उनके दोनो बूब्स पकड़ कर निचोड़ना शुरू किया. कभी वो

उनके निपल खींचता कभी गान्ड को फैला कर तेज धक्के लगाते हुए उनकी गर्दन चूमता. उसका लंड चूत की फांको मे कसा हुआ आगे पीछे

हो रहा था. बिलुल असली चुदाई जैसा महसूस हो रहा था. एक बार उसने पूरा लंड पीछे खींचा और फिर धक्का दिया तो लंडा जा टकराया चूत के छेद से और दीदी की चीख निकलते रह गई. "पागल है क्या?" दीदी ने बोला और वापिस गान्ड बाहर निकाल उसके हाथ अपने चुचो पे

रख लिए. अर्जुन फिर मस्ती मे झटके लगाने लगा. उसको तो ये सपना सा लग रहा था. दिन के समय, घर के बाथरूम मे, अपनी इस गदराई

बड़ी बहन की गान्ड क नीचे लंड फसाए उसके मोटे दूध दबाना. उसका जोश बढ़ता ही जा रहा था और माधुरी दीदी की चूत भी रिसने

लगी थी अब उसके हाथ दीदी के बूब्स पर कुछ ज़्यादा ही कस गये थे और धक्के भी तेज हो गये थे.

"आ ... आ .. भाइईइ.. आराम से.. मैं गैइइ...." दीदी झड़ने लगी थी लेकिन अर्जुन तो तूफ़ानी गति से लगा रहा और 20-25 तेज

धक्को के बाद उसकी पिचकारि भी छूटने लगी.. कुछ दीदी की चूत के बाहर गिरी कुछ सामने की दीवार पर.

माधुरी दीदी ने उसके एक बार खुद से चिपका कर उसके होंठ अच्छे से चूमे और बाहर निकाल दिया. मुस्कुराती हुई दीदी के चेहरे पे

अब अलग ही नूर आ गया था. खुद को सॉफ कर कपड़े पहन वो नीचे चल दी. कुछ देर बाद अर्जुन भी वही बैठा था. आशा और नुसरत

जा चुकी थी.

"ले बेटा तू शुरू कर." ललित जी ने उसकी प्लेट लगाई तो ऋतु भी अर्जुन की बगल मे आ बैठी.
 
"ले बेटा तू शुरू कर." ललित जी ने उसकी प्लेट लगाई तो ऋतु भी अर्जुन की बगल मे आ बैठी.

"मैं भाई की प्लेट मे ही खाउन्गी."इतना बोलकर उसने अर्जुन के साथ ही खाना शुरू कर दिया.

सब हैरत से उन दोनो को देख रहे थे और अर्जुन अपनी बड़ी दीदी को अपने हाथो से खिला रहा था. रेखा जी तो ये देख कर बस भगवान

का शुक्रिया अदा कर रही थी. अर्जुन के दूसरी तरफ जब अलका आकर बैठी तो अर्जुन एक बुर्की बनाकर उसके भी मूह मे डालने लगा लेकिन शरम से अलका ने छोटा सा मूह खोला.

"आपने नही खाना मेरे हाथ से?"

अर्जुन की बात सुनते ही अलका ने एक झटके मे उसका हाथ अपने मूह मे ले लिया. "अऔच. पहले तो खाती नही हो फिर उंगली भी काट ली.", अर्जुन ने छेड़ा तो अलका किसी नव-व्याहता की तरह शर्मा गई.

"अब इसको क्या हुआ है?", ऋतु ने ये बात कह तो दी लेकिन कुछ कुछ उसको भी समझ आ गया था. फिर वो अलका की तरफ देख एक इशारे मे मुस्कुराइ तो अब अलका ने शरम से नज़रे ही झुका ली थी.

"वाह मेरी बन्नो.", ऋतु ने बड़ी धीमी आवाज़ मे ये बात कही जिसे सिर्फ़ अर्जुन और अलका ने ही सुना था. अब बारी अर्जुन की थी नज़र झुकाने की क्योंकि अलका तो इतना सुनकर वहाँ से उठ रेखा जी के पास ही बैठ गई थी. अर्जुन ने फिर से ऋतु दीदी को खिलाया तो उन्हे खुद के लिए भी अर्जुन की नज़र मे वही दिखा जो अलका के लिए था.

"अब बस भाई मेरा पेट भर गया." इतना बोलकर उठते हुए ऋतु दीदी ने अलका की तरफ देखते हुए अर्जुन की उंगली चूस ली. ऋतु अपने कमरे मे गई ही थी की अलका भी खाने की थाली ले उसके पीछे चल पड़ी.

अर्जुन कुछ देर बाद खाना ख़तम कर उपर चला गया अपने कमरे मे आराम करने. जैसे ही वो वहाँ दाखिल हुआ ड्रॉयिंग रूम मे कोमल दीदी

बैठी टेलीविजन पर गाने देख रही थी. अर्जुन भी जाकर उनकी बगल मे बैठ गया. कोमल ने उसको देखा फिर टेलीविजन की तरफ देख

मुस्कुराने लगी.

"कल से देख रहा हू आप बात नही कर रही." अर्जुन ने जब इतना कहा तो कोमल ने फिर उसको देखा और फिर नज़र फेर ली.

"क्या बात करू?", और फिर कोमल मंद मंद मुस्कुराने लगी. अर्जुन ने बड़े प्यार से उनका चेहरा अपनी तरफ घुमाया तो वो बिना ज़ोर दिए उसकी ओर घूम गई. दोनो एक दूसरे को देखते रहे फिर मिल गये दोनो के लब एक दूसरे से. अर्जुन ऐसे ही कोमल दीदी को झुकाए उनके उपरलेट गया सोफे पर ही. दोनो बड़े ही इतमीनान से एक दूसरे को चूम रहे थे कोई जल्दी नही थी उनको. कोमल ही थी जिसके चूचे माधुरी को टक्कर देते थे लेकिन अभी इन दोनो का ध्यान कामवासना से परे ही था. कुछ 2 मिनिट बाद अर्जुन ने ये चुंबन तोड़ा और उपर से उठ गया.

मैं चला सोने दीदी आंड थॅंक यू फॉर दिस स्वीट ट्रीट. कोमल भी प्रतिउत्तर मे बस मुस्कुरा दी.

शंकर जी लगभग 5 बजे आए थे और फिर सबसे मिलकर और अर्जुन को सोया देख वापिस निकल गये अपनी नौकरी वाले शहर. ताऊ जी भी सोचुके थे घर आने के बाद. घर मे ज़्यादातर लोग आराम कर रहे थे लेकिन ये 2 हुस्न की देविया कमरे मे बंद गुफ्तगू कर रही थी.

"अब मुझे सब बता. और कुछ भी छुपाया तो फिर तू मुझे जानती है.", ऋतु ने अपने पाव पे तकिया रख बैठे हुए ही वही लेती अलका

से कहा. एक ऑर्डर की तरह लेकिन आवाज़ बिल्कुल मंद थी.

"यार देख तुझसे मैने आजतक कुछ नही छुपाया लेकिन पता नही तू समझेगी भी या नही.", अलका ने थोड़े चिंतित स्वर मे बात कही

"तू बस पूरी बात बता मेरे समझने ना समझने की बात भूल जा.", अब ऋतु ने थोड़ा प्यार से कहा. अलका को डर था के कही ऋतु उसके

प्यार को रुसवा ना कर दे.

"देख ऋतु जबसे मैं बड़ी हुई हू मुझे कभी लड़को मे इंटेरेस्ट नही था. फिर कॉलेज मे लड़कियों के कई किस्से सुने थे के उसके बॉयफ्रेंड ने

ये किया, वो किया. किसी को धोका दिया तो किसी को अपने दोस्तो के साथ ही सुला दिया. इन सब बातों से मेरे दिल मे डर बैठ गया था."

"जो पूछा ये वो बात नही है." ऋतु ने थोड़ा तुनक कर बोला

"पूरी बात सुनेगी या फिर मैं चली जाऊ?", पहली बार अलका ने उसको गुस्सा दिखाया था तो ऋतु भी शांत हो गई.

"अब सुन. जब हर तरफ मैने देखा की लड़के सिर्फ़ एक ही चीज़ देखते है हर लड़की मे तो मैने मूड बना लिया के कभी बॉयफ्रेंड नही

बनाउन्गी. फिर क्लास मे कुछ लड़कियों ने मेरा मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया. के बाहर से इतनी सुंदर है लेकिन शायद अंदर ही कुछ कमी होगी जो इसका का बॉयफ्रेंड नही है. कुछ ने तो ये भी कहना शुरू कर दिया के मुझे लड़किया ही पसंद है. चल मान भी लू की मुझे तू पसंद है. तेरा साथ मेरे लिए एक वरदान जैसा है. लेकिन इसका ये तो मतलब नही हुआ के मुझमे कुछ कमी है. ऐसी बातें हर रोज होने लगी. फिर अभी 2 दिन पहले मैं अर्जुन को ले गई अपने कॉलेज, एग्ज़ॅम फीस डेपॉज़िट करवाने और फाइल सब्मिट करवाने. वहाँ सभी लड़किया बस अर्जुन को ही देख रही थी लेकिन उसने किसी की तरफ नही देखा. मैने अपनी 2 फ्रेंड्स को भी इशारा किया अर्जुन को छेड़ने के लिए लेकिन अर्जुन ने उनको भी नज़रअंदाज कर दिया. जब वो मेरा हाथ पकड़ कर कॅंटीन ले जा रहा था तब सभी लड़किया मुझे जलन से देख रही थी. लेकिन अर्जुन सिर्फ़ मेरे साथ था. वहाँ भी उसने मुझे कुर्सी से उठने ना दिया, बिल भी खुद दिया एक अच्छे लवर की तरह."
 
कुछ रुक कर अलका ने फिर बात आगे बढ़ाई जो ऋतु अब शांति से सुन रही थी. उसकी दिलचस्पी और बढ़ चुकी थी. "जब मेरी फ्रेंड्स

ने मेरे बर्तडे का ज़िक्र किया और उसको मेरा बॉयफ्रेंड कहके पुकारा तो उसने कुछ नही कहा. घर आने से पहले मुझे लेकर मॉडेल टाउन चल दिया.

अपनी पसंद से मुझे ऐसे कपड़े दिलाए जो सिर्फ़ मैं टीवी पर देखती थी और वो सब बातें करी जो हर प्रेमी करता है. मेरा इतना ख़याल

रखा की अगर गले मे रोटी भी फसी तो पीठ सहलाते हुए सबके सामने मुझे अपने हाथो से पानी पिलाया. और सबसे बड़ी बात जो उसने

एक असली प्रेमी की तरह की वो की अपने दिलाए कपड़े सबसे पहले उसको दिखाऊ और वो भी 12 बजे रात को. ताकि वो सबसे पहले मुझे विश करे. यहा तक की उसने सजीव भैया को भी रात मे बाहर भेज दिया." आख़िरी बात उसने अपनी तरफ से ही कही थी. इतना सब सुनकर तो ऋतु की आँखें फटी रह गई. उसको यकीन ही नहीं था के उसका छोटा भाई ऐसा कुछ भी कर सकता है. अलका ने फिर आगे बात बढ़ाई

"और जब मैं उसके पास रात को गई तो किसी राजकुमारी सा एहसास दिलाया उसने मुझे. उसके होंठ जब मेरे लबो पे जुड़े तो मुझे एहसास

हुआ के मर्द का प्यार क्या होता है."

"ओये. क्या तूने सबकुछ कर लिया उसके साथ?", ऋतु ने हैरान होते हुए पूछा.

"चुप कर पागल कही की. मैने कहा ना के ये प्यार है. मैं उपर से नंगी थी उसके सामने लेकिन उसने मुझे सिर्फ़ प्यार किया. कोई ज़बरदस्ती

नही की. उसमे कोई वासना नही थी, सिर्फ़ प्यार था. जब उसने मेरे गाल को सहलाया तभी मेरी रूह उसमे समा चुकी थी. कोई नंगी लड़की

को नही छोड़ता अगर वो उसके बिस्तर पर पड़ी हो. लेकिन देख उसका प्यार की सिर्फ़ प्यार से चूमने के अलावा उसने कुछ किया ही नहीं. सिर्फ़ हम दोनो थे वहाँ और सारा घर सोया हुआ था. लेकिन अर्जुन ने मेरी इज़्ज़त की. और वो अगर उस समय मेरे साथ कुछ भी करता तो मैं उसको एक बार भी नही रोकती लेकिन उसका प्यार बहते हुए पानी की तरह सॉफ है." ये सब कहते कहते अलका की रुलाई फुट पड़ी थी लेकिन अब उसको ऋतु ने अपनी बाहो मे भर लिया था.

"अर्रे पगली रो मत तू. मैने कहा था ना के मुझे तो सिर्फ़ सब सुन ना है. और मेरी तरफ देख और बिल्कुल भी बूरा मत मानिओ मेरी बात का. मुझे तेरे और अर्जुन के रिश्ते से कोई हर्ज नही. उल्टा मैं तो खुश हू के तूने सही इंसान को चुना है अपने पहले प्यार के रूप मे. लेकिन इसमे भी एक पेंच है. ये प्यार भी बराबर बाँटेगा.",

ऋतु ने इतना कहा ही था के अलका ने दोनो हाथो से उसका सर पकड़ के उसके होंठो को चूम लिया. "मुझे शुरू से पता है तेरा भी प्यार वही है जो मेरा है. जो तू उस से दूर रहने का दिखावा करती थी ना वो सिर्फ़ एक नाराज़गी थी. उस से जिसे तू सबसे ज़्यादा प्यार करती है. लेकिन मैने तेरे लिए अर्जुन की आँखों मे सिर्फ़ ओर सिर्फ़ प्यार ही देखा है. शायद मुझ से भी ज़्यादा.", इतना बोलकर वो वही लिपट गई एक दूसरे से.

"वैसे एक बात तो बता तूने कभी मुझे तो अपने कपड़े उतार के नही दिखाए.", अब ऋतु ने अलका की टाँग खींचते हुए कहा

"क्योंकि तेरे पास भी वही है ना जो मेरे पास है. लेकिन उसके पास जो है ना वो तो बसस्स्स्स्सस्स." इतना बोलकर दोनो खिलखिला पड़ी. और एक दूसरे से लिपट कर लेट गई. मान बिल्कुल हल्का हो चुका था दोनो का. और रिश्ता ज़्यादा मजबूत हो गया था. प्यार जो एक ही इंसान से हुआ था.

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रात को सब हल्का फूलका खा कर अपने कमरो मे आ गये थे. अर्जुन रामेश्वर जी के पाव दबा रहा था और कौशल्या जी भी सो चुकी थी.

संजीव आज रात भी बाहर था क्योंकि अगले दिन उसको दूसरे शहर मे कंपनी का काम था. कोमल आज अपनी मा के कमरे मे लेटी थी क्योंकि

रेखा जी को हल्का बुखार था. ऋतु और अलका भी सो चुकी थी दिन भर की थकान से. अपने दादा जी सोते ही अर्जुन भी सीढ़िया चढ़ दूसरी मंज़िल पर चल दिया.

"बड़ी देर लगा दी सनम आते आते", अर्जुन ने जब ये लाइन सुनी तो देखा कि माधुरी दीदी हाथ मे चद्दर और तकिये लेके खड़ी थी .

उसने मुस्कुराते हुए अपने कमरे से गद्दा उठाया और चल दिए छत पर. नीचे वापिस आकर सजीव भैया के बेड से एक और गद्दा लेकर वापिस उपर आ गया. दोनो चुप थे. माधुरी दीदी ने दोनो गद्दे बिछाए और उनपे एक पुरानी चद्दर बिछा दी. फिर 3 तकिये गद्दो के उपर रख वो नीचे चली गई. अर्जुन वही बैठ उनका इंतजार कर रहा था. कोई 15 मिनिट बाद वो आई तो उनके हाथ मे कुछ था और अब शरीर पे

एक ढीली मॅक्सी पहनी हुई थी. मतलब वो नहा कर आई थी और सलवार कमीज़ उतार दिया था. उनके एक हाथ मे कटोरी और दूसरे मे एक छोटी

बॉटल थी. जैसे ही वो गद्दे पर बैठी अर्जुन की साँस बड़ी अद्भुत खुश्बू से भर उठी. "वाह." इतना बोलकर वो दीदी की गर्दन से आती

महक को सुंगने लगा. माधुरी दीदी के गीले बाल भी महक रहे थे.

"दीदी लगता है आज मार ही डालगी.", इतना बोलते ही उसने माधुरी दीदी के गाल चूम लिए. अब दीदी ने भी उसको अपने से लगा के उसकी गर्दन

पर चुंबन की झड़ी लगा दी. उनका पूरा शरीर महक रहा था. खाल इतनी मुलायम हो रखी थी जैसे मलाई हो. अर्जुन होल होल दीदी की

बाहों को सहलाने लगा और गर्दन से लेकर होंठो तक धीरे धीरे चूम रहा था. माधुरी दीदी ने पूर्ण समर्पण कर दिया और लेट गई गद्दे

पे. चाँद की रोशनी मे उनके उभार मॅक्सी मे से हिलते दिख रहे थे. अर्जुन ने अपनी कमीज़ उतार कर रख दी और सिर्फ़ पाजामे मे उनके उपर आ

गया. दोनो बेसूध हो एक दूसरे को चूमने लगे.

"भाई आज कोई रोक नही है तुझ पर. आज अपनी दीदी को इतना प्यार दे की कभी भूल ना पाऊ." इतना बोलकर मधुरी दीदी फिर लिपर गई अर्जुन से

उनके हाथ अपने भाई की पीठ सहला रहे थे, हो बिल्कुल चिकनी और सख़्त थी. जब अर्जुन थोड़ा उपर उठा तो दीदी ने अर्जुन की चेस्ट पर जीब

लगा दी और उसकी छाती को चूमने लगी. "दीदी ये क्या कर रही हो. मुझे बर्दाश्त नही हो रहा." मज़े के सैलाब मे उड़ते हुए अर्जुन को जब

कुछ नही सूझा तो उसने कपड़े के उपर से दीदी के गुब्बारे दबा लिए जो अंदर बिल्कुल आज़ाद थे. निप्पल फूल चुके थे और तने हुए थे.

अर्जुन ने दोनो निपल अपने दोनो हाथो की एक उंगली और अंगूठे के बीच कस लिए.

"आ भाई. आज इतना दर्द दे की फिर कभी दर्द ना हो. खींच इन्हे और खूब दबा . इनकी सारी अकड़ ख़तम कर दे."इतना बोल माधुरी दीदी

पाजामे के उपर से ही अर्जुन का लंड सहलाने लगी. और दोनो के होंठ कुश्ती करने लगे आपस मे. सहलाते हुए ही दीदी ने अर्जुन का पाजामा खोल

दिया. उसका लंड किसी स्प्रिंग की तरह सीधा आ ल्गा उनकी ठोडी से. "कितना सुंदर है ये तेरा लंड मेरे भाई. और कितना बड़ा. पता नही क्या

होगा लेकिन आज ये तेरी दीदी को चाहिए." इतना बोलकर वो अपने एक हाथ से अर्जुन की कमर थाम दूसरे हाथ से उसका लंड सहलाने लगी. मुट्ठी

मे पूरा लंड समा नही रहा था. और उसका टॉप तो उस से भी कही ज़्यादा मोटा था.

"दीदी, खड़ी हो जाओ.", इतना बोल कर अर्जुन सीधा हुआ और अपनी दीदी को खड़ा कर उनकी मॅक्सी उतार कर गद्दे पे फेंक दी. एक कपड़े के नीचे माधुरी

दीदी पूरी नंगी थी. उनकी सुडोल मोटी जांघे आपस मे चिपकी हुई थी जिस से उनकी चूत दिखाई नही दे रही थी. गदराई कमर, और उस से उपर 2 बड़े पहाड़ से चूचे. अर्जुन ये नज़ारा देख अपनी दीदी से खड़े खड़े ही चिपक गया. उसका लंड दीदी की नाभि पर ठोकर मार रहा

था उत्तेजना इतनी ज़्यादा थी की रह रह के लंड मे झटके लग रहे थे. माधुरी दीदी सरकते हुए नीचे बैठ गई और एक बार फिर अर्जुन के

लंड को सहलाने लगी. फिर उन्होने वो छोटी बॉटल उठाई और उसमे से लोशन निकाल लंड की मालिश करने लगी. अर्जुन मज़े से बहाल हो रहा

था. "दीदी, आप लाते जाओ ना." इतना बोलकर उसने अपनी दीदी को लिटा दिया

"अर्जुन बॉटल से लोशन लेकर तू भी मेरी चूत की थोड़ी मालिश कर जैसे तेरे लंड की मैं कर रही हू", दीदी ने कहा तो अर्जुन ने ढेर

सारा लोशन लेकर उनकी टाँगे फैलाई और चूत के उपर उंगली से लगाने लगा. चूत फूलकर ब्रेड जैसी हो रही थी. उसमे से दीदी का कामरस

भी बह रहा था. फिर अर्जुन ने दो उंगलिया चूत की दरार मे घुमाई और उन्हे चिकना करने लगा. बचा हुआ लोशन उसने दीदी के दोनो

बड़े गुब्बारो मे मसल दिया. "चल भाई अब मेरे उपर आजा और जैसे मैं कहु वैसे ही करना. देख तेरा बहुत बड़ा है कोई ग़लती नहीं."

दीदी की आवाज़ मे थोड़ा डर सा था लेकिन हिम्मत भी थी.

अर्जुन उनके पूरे शरीर पर छा सा गया था. घुटने ज़मीन पर रख दीदी की फैली हुई टाँगो के बीच उसने अपने लंड का टोपा

दीदी के चूत पर रगड़ना शुरू किया और अपने दोनो हाथो से उनके पपीते आटे की तरह घूठने लगा. इस दोहरी मार से माधुरी दीदी

की सिसकारिया निकलने लगी और उन्होने अपने हाथ से अर्जुन का लंड छेद पर टीका लिया. "भाई मेरे होंठ अपने होंठो मे दबा ले और जैसे ही

मैं इशारा दूँ तू धक्का मार दियो.", ये बात बड़ी हिम्मत से कही उन्होने तो अर्जुन ने भी सर हिला दिया. दीदी अपने हाथ से ही उसका लंड चूत

की लकीर मे रगड़ रही थी. फिर एकदम चूत के छेद पर लंड का सुपाडा टीका दोनो ने होंठ से होंठ जोड़ दिए.

दीदी ने अर्जुन की गान्ड पर हल्की चपत से इशारा किया तो एक करारा धक्का लगा दिया अर्जुन ने. ना चाहते हुए भी एक तेज चीख उनके मूह से निकल

गई जो ज़्यादा तो अर्जुन के मुँह मे दबी रही पर फिर भी कुछ बाहर निकल ही गई. "आआअहह मैं मररररर गैिईई" और वो अपनी गर्दन

इधर उधर हिलाने लगी. अर्जुन ऐसे ही रुक गया था. उसके लंड का सुपाडा पूरा अंदर जा चुका था और कुछ गरम तरल सा लंड पे महसूस

हुआ. अर्जुन को ज्योति के साथ किया सेक्स याद आ गया और वो झुक कर दीदी के बूब्स चूसने लगा और सर को सहलाने लगा. उसका लंड चूत मे

फँस चुका था. कुछ 5 मिनिट बाद दीदी शांत हुई. "भाई थोड़ा धीमे से लगा इस बार.' एक बार फिर अर्जुन ने दीदी के होंठ दबाए और पहले

जितना ही तेज धक्का मारा. लंड सभी रुकावटें तोड़ता 6 इंच तक जाकर बैठ गया था चूत में. इस बार दोनो की चीख निकल गई थी. दीदी

की टाइट चूत ने उसका लंड छिल दिया था और लंड का टांका पूरी तरह से टूट गया था.

"दीदी बस हो गया."उसने गाल थपथपाते हुए कहा और उनके दूध रगड़ने लगा. माधुरी दीदी की तो बस जान निकलनी बाकी रह गई थी.

ऐसे ही चुचे दबाते चूस्ते अर्जुन ने उनका दर्द कम करने की कोशिश की जो सफल भी रही.

"देख अब बिल्कुल धीरे धीरे अंदर बाहर कारिओ और जितना गया है उतना ही डाल कर छोड़ मुझे.", दीदी ने इतना बोला और अर्जुन लंड बाहर

खींचने लगा. लंड के साथ चूत की दीवारे भी बाहर खींचने लगी. दीदी के शरीर मे फिर दर्द की लेहा दौड़ गई. लेकिन अर्जुन ने अब

दिल मजबूत करके धीरे धीरे लंडा थोड़ा थोड़ा अंदर बाहर करना शुरू किया. उनकी चूत मे भी संकुचन होने लगा था. इतने दर्द के बाद

भी वो उत्तेजित हो रही थी और उसका सबूत था पानी छोड़ती उनकी चूत. अज़ून ने बॉटल से ही थोड़ा लोशन बाहर निकले लंड पर गिराया और

फिर अंदर बाहर करने लगा.

पाँच मिनिट की इस धीमी चुदाई से कुछ राहत मिली माधुरी को अब उसके चूतड़ भी उपर उठने लगे. ये देख अर्जुन ने भी थोड़ा ज़्यादा लंड

बाहर निकल कर अंदर करना शुरू कर दिया.
 
पाँच मिनिट की इस धीमी चुदाई से कुछ राहत मिली माधुरी को अब उसके चूतड़ भी उपर उठने लगे. ये देख अर्जुन ने भी थोड़ा ज़्यादा लंड

बाहर निकल कर अंदर करना शुरू कर दिया.

"हा भाई बस ऐसे ही .. अया ऐसे ही कर मेरे भाई. मैं निहाल हो गई तेरे जैसा भाई पाकर. कितने प्यार से चुदाई कर रहा है." और ऐसे सिसकारिया गूंजने लगी छत पर. अर्जुन की टांगे थकने लगी तो उसने थोड़ा तेज रफ़्तार से चुदाई शुरू कर दी. अब वो लंड को सुपाडे तक निकालता और उतना ही अंदर ठोक देता. साथ ही साथ वो उनके चूचे भी बेदर्दी से मसल रहा था काट रहा था.

"आ दीदी. कितनी प्यारी चूत है आपकी. अंदर से एकदम गरम जेल्ली जैसी. मेरा लंड फसा फसा जा रहा है."

"भाई रुक तू थक गया होगा." माधुरी को एहसास हो गया था के अर्जुन के घुटने दर्द करने लगे होंगे. और तकिया उसकी तरफ सरकाया.

अर्जुन ने एक तकिया अपने घुटनो के नीचे रखा और दो तकिये दीदी की गान्ड के नीचे सरका दिए. अब चूत उपर उठ गई थी. अर्जुन ने अब दीदी की जाँघो को थोड़ा उँचा किया और दीदी के होंठ मूह मे लेकर आख़िरी जोरदार धक्का दे मारा. लंड सीधा बच्चेदानी से जा लगा.

और फिर बिना रुके वो धक्के मारता रहा. अब दीदी की गु गु की आवाज़ और दोनो की जाँघो से पट पट की आवाज़ निकल रही थी. 5 मिनिट तक अर्जुन किसी घोड़े के तरह उनकी चूत को पेलता रहा फिर झुक कर उनके होंठ छोड़ दूध पीने लगा.

"तू तो पागल ही हो गया था भाई. जान निकल जाती. पता है अभी तू रुका है फिर भी पेट तक दर्द हो रहा है. "

"दीदी ऐसे तो ये दर्द कभी ख़तम ना होता. इसलिए एक बार ऐसा करना ज़रूरी लगा मुझे." मुट्ठी मे चुचे दबाता अर्जुन बोला

तो दीदी के आँखें बंद हो गई. "दीदी, आप घुटनो पे आ जाओ ना.", और इसके साथ ही उसका लंड चूत से बाहर आ गया. सोडा की बॉटल खुलने पर जैसी आवाज़ आती है वैसी आवाज़ आई चूत से. माधुरी भी हिम्मत वाली थी. जल्दी ही अपने घुटनो पर हो भाई की लिए गधी बन गई. अर्जुन ने लंड के सुपाडे पर थोड़ा लोशन और लगाया और निशाने पर सटाकर पेल दिया.

"आ भाई दर्द होता है धीरे नही डाल सकता था."

"दीदी अभी पूरा कहाँ गया है थोड़ा बाहर है. और आपकी ये मखमली गान्ड कितनी बड़ी है." कहते हुए अर्जुन ने गान्ड पकड़ के बचा खुचा लंड भी पेल दिया चूत के अंदर.

"आह भाई बस अब मत रुक. ज़ोर लगा के पेल अपनी बहन को फाड़ दे इस चूत को .. बड़ा तंग किया है इसने मुझे.", अर्जुन भी अब सटासट पेले जा रहा था पीछे से. हाथ बढ़ा के उसने दीदी के बूब्स पकड़ रखे थे. सीन ऐसा था जैसे किसी दुधारू अमेरिकन गाय पर कोई जंगली सांड़ चढ़ा हुआ हो. हर धक्के पर लंड चूत की अंतिम गहराई तक जा रहा था. और ये तीसरी बार दीदी की चूत मे संकुचन हुआ था. पहली दो बार तो दर्द के कारण वो झाड़ते झाड़ते रह गई थी लेकिन अब जिस रफ़्तार से अर्जुन चुदाई कर रहा था दीदी बेहोशी की हालत मे जा रही थी

आख़िरी धक्के ताबड़तोड़ लग रहे थे और दीदी की चूत ने फ़ौवारा छोड़ना शुरू कर दिया. अर्जुन ने भी जड़ तक लंड फसा कर दीदी की चूत को अपने वीर्य से भरना शुरू कर दिया. करीब 1 मिनिट तक उसका लंड पिचकारिया मारता रहा और वो उनके उपर ही गिर गया. कुछ देर बाद लंड खुद से ही बाहर निकल गया. दीदी तो मूर्छित अवस्था मे थी और अर्जुन उनपे लुढ़का हुआ था.
 
"उठ मेरे उपर से भाई." कुछ देर बाद दीदी की आवाज़ से वो साइड मे लुढ़क गया.

"मुझे नीचे ले चल रे. सफाई करनी है. मुझसे खड़ा नही हुआ जा रहा." अपना पेट पकड़ती माधुरी दीदी ने अर्जुन से कहा तो उसने अपनी बहन को किसी बची की तरह गोद मे उठा लिया और अपने कमरे मे ले आया. लाइट जलते ही अर्जुन दीदी की हालत देख कर सहम गया.

"आ देख कैसे फाड़ी है तूने मेरी. दीदी ने चूत की तरफ इशारा किया तो अर्जुन को फटी हुई खून और वीर्य से भरी चूत दिखी. जो

सुबह किसी माखन की डली सी थी. जगह जगह उसके दाँत के निशा ने थे. चूचे लाल पड गये थे. अर्जुन ने गीले कपड़े से दीदी की चूत सॉफ की और उसपे फ्रिज से निकाल के बरफ रगड़ ने लगा. चूत सुन्न्हो गई तो दीदी का दर्द कुछ कम हुआ.

"भाई देख ज़रा भैया के कमरे मे मेडिकल बॉक्स होगा ज़रा.", इतना बोलकर दीदी सोफे पर लेट सी गई और अर्जुन भाग के साथ वाले कमरे से मेडिसिन बॉक्स ले आया, जो हमेशा भैया के बेड के साथ वाली मज़े पर रहता था. दीदी ने जबतक दवा ली, अर्जुन बाथरूम से उनका सलवार कमीज़ उठा लाया. बड़े प्यार से उसने पहले पाजामा पहनाया और फिर उनके उपर कमीज़ डाला. माधुरी दीदी भी अपने छोटे भाई का इतना प्यार देख भावुक हो गई.

"चल अब परेशान मत हो. 2 दिन तक सब ठीक हो जाएगा. एक बार तो होना ही था ये दर्द.", महॉल को हल्का करते हुए जब माधुरी दीदी ने ये बात कही तो अर्जुन ने उन्हे वापिस उठा लिया और उपर ले चला. पहले दीदी को लिटाया और फिर उनको अपनी बाहो मे भर खुद भी लेट गया.

दीदी ने प्यार से एक गीला चुंबन उसके होंठो पर किया और किसी छोटे बच्चे सी उसकी बाहो मे सिमटी सो गई. इस सब मे रात के 2 बज गये थे.
 
समर्पण

अलका की नींद आज समय से पहले ही खुल गई थी. उसने करवट बदली तो ऋतु को अपनी तरफ मूह कर के लेटा पाया. वो इस समय बिल्कुल किसी छोटी बच्ची की तरह घुटने मोड़ के सोई हुई थी. अलका ने बेड के किनारे रखी छोटी घड़ी की तरफ देखा तो पाया अभी 4 ही बजे है. वो ऋतु की तरफ खिसकी और उसको कस के वापिस लेट गई. ऋतु के शरीर से निकलती गर्मी ने उसको जैसे कुछ आराम दिया. फिर ऐसे ही अलका ने पलके बंद कर ली. बाहर अभी अंधेरा ही छाया हुआ था. इधर छत पर भी माधुरी दीदी अर्जुन से बिल्कुल चिपक कर सो रही थी. उनका चेहरा भी शांत और मासूम था इस पल मे. हल्की ठंड थी तो दोनो भाई बहन के जिस्म जैसे एक हो रखे थे. अर्जुन की आँख चिड़ियो के शोर से खुली

शायद कही पास मे बिजली के खंबे की तार टूटी थी. आँखें खोली तो अपनी बड़ी बहन को अपनी छाती से चिपका पाया. कुछ सोच कर उसने अपनी जगह एक तकिया रखा और बड़े आराम से चद्दर से बाहर आकर वापिस दीदी पर चद्दर उढ़ा दी. पास मे पड़ी एक और चद्दर भी उनपे ड़ाल कर वो नीचे आकर फ्रेश हुआ और तयार होकर समय से पहले ही दौड़ने चल दिया. अभी तो रामेश्वर जी भी नही उठे थे.

बीती रात को याद करके वो बस धीमी गति से भाग रहा था. सिर्फ़ 2 घंटे की नींद लेने के बावजूद आज उसका शरीर खुद उसको उर्जा से भरपूर लग रहा था. और एक बात हुई आज. अर्जुन जहाँ रोज आबादी से दूर नये सेक्टर की तरफ दौड़ लगाने जाता था, आज वो अपने ही सेक्टर की मैंन सड़क के किनारे दौड़ लगा रहा था. कुछ आगे चलने पर उसने देखा कि कुछ बुजुर्ग एक पार्क मे बैठे व्यायाम और योगा कर रहे थे.

एक 5-6 लोगो का झूंड हास्य-योग कर रहा था. जहाँ वो लोग ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे. बड़े बड़े वृक्षो पर बैठे पंचियो की चहचाहत इस वातावरण को और मधुर बना रही थी. अर्जुन पार्क के अंदर चला गया और किनारे बने फुटपाथ पर फिर से दौड़ लगाने लगा. लगभग 800 गज लंबाई के इस बाग के 4 चक्कर लगा वो वापिस घर की और निकल चला. अब काफ़ी लोग आने लगे थे वहाँ तो उसके भी टाइम का अंदाज़ा हो गया था. आसमान हल्का नीला सफेद हो चला था. जैसे ही घर मे दाखिल हुआ तो देखा की दादाजी नहा कर बैठक से अंदर जा रहे थे.

वो भी सीधा उपर चल दिया बिना कोई आवाज़ किए. अपने कमरे मे जूते उतार कर उसने कपड़े बदल कर घर की चप्पल पहनी और तीसरी मंज़िल पर पहुच गया. माधुरी दीदी कपड़े की गठरी की तरह चद्दर के अंदर सिमटी हुई थी. फिर उसका ध्यान गया नीचे बिछे गद्दे पर.

उल्टे ' वी " के आकार मे एक फुट के करीब गहरा लाल-भूरा धब्बा बना हुआ था वहाँ उस पुरानी चद्दर पर. ये देखते ही अर्जुन को माधुरी दीदी की चुदाई से फटी हुई चूत याद आ गई. उसने दीदी के मूह से कपड़ा हटा कर अपना हाथ उनके माथे पर रखा, जो बुरी तरह तप रहा था.

"दीदी, उठिए और आप नीचे चल कर आराम कीजिए. देखो आपको तेज बुखार है.", उसने प्यार से माधुरी दीदी को जगाया. अपनी बड़ी बड़ी आँखों से माधुरी ने अपने छोटे भाई को अपने पास बैठे देखा. उनकी आँखें भी कुछ लाल हो रखी थी, शायद चुदाई के दर्द और नींद की कमी से.

"भाई तू कब उठा?", इतना बोलकर जैसे ही उठने की कोशिस करी पूरे शरीर मे दर्द की तेज लहर दौड़ गई.

"आराम से दीदी. कोई जल्दी नही है. और मैं एक घंटा पहले ही उठ गया था. और अभी सब सो ही रहे है तो आप भी नीचे अपने कमरे मे ही सो जाओ. ये सब मैं उठा लूँगा यहा से. चलो मैं ले चलता हू आपको नीचे.", इतना बोलकर अर्जुन ने दीदी को दोनो बाजू पकड़ के आराम से खड़ा किया तो हिम्मत कर के वो भी खड़ी हो गई.

2 कदम चली तो फिर रुक गई. "हाए भाई ऐसा लग रहा है जैसे अंदर से चूत कट गई है."

"आप रूको." इतना बोलकर उसने बड़े आराम से दीदी को अपनी बाहो मे लिया और धीरे धीरे सीडीया उतरता नीचे चल दिया.

दूसरी मंज़िल से नीचे देखा तो ताऊ जी, कोमल और मा के कमरे के किवाड़ अभी बंद ही थे. उसी तरह माधुरी को उठाए वो नीचे आया और उन्हे उनके कमरे मे ले जाकर लिटा दिया. फिर माथा चूमकर, "आप अभी आराम करो और अगर कोई पूछे तो बोल देना दर्द की वजह से बुखार आ गया है और रात को पाव स्लिप हो गया था."

"आई लव यू सो मच भाई", अर्जुन के गले मे अपनी बाहों का हार डाल मधुरी दीदी ने एक तगड़ा चुंबन किया और फिर लेट गई. अर्जुन बाहर जाते हुए उनका दरवाजा ढलका गया.

छत पर जाकर सभी समान अपनी जगह रख वो खून से सनी चद्दर छुपा कर वो नीचे वापिस आ गया. ऋतु दीदी के कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ देख थोड़ा हैरान हुआ. "इतनी जल्दी तो ये कभी नही उठती. और अभी थोड़ी देर पहले तो ये भी बंद ही था." मन मे सोचता हुआ अर्जुन उस कमरे की तरफ चल दिया. हल्का दरवाजा खोला तो देखा अलका दीदी बेड से टेक लगाए कुछ सोच रही है और उनके हाथ मे पानी का गिलास था.

"कुछ खो गया है क्या दीदी?", अर्जुन की आवाज़ ने अलका की तंद्रा भंग की तो वो उसको देख कर मुस्कुरा उठी. पास मे ऋतु वैसे ही लेटी थी जैसे पहले थी.

"कुछ नही भाई. कल शाम को ज़्यादा ही सो लिया था फिर रात भी तो थोड़ा जल्दी उठ गई थी."

"फिर तो मेरे से ही ग़लती हो गई. आपको भी अपने साथ ही पार्क ले जाता. दिन शायद और हसीन हो जाता मेरा.", ये कहकर अर्जुन भी दोनो बहने के बीच लेट गया सीधा.

"कुछ भी बोलता है भाई.", वापिस शरम ने आ घेरा था उन्हे. और अर्जुन को मौका मिल गया था उन्हे छेड़ने का.

"वैसे एक बात कहूं दीदी, आप ना मेरे साथ सोया करो. क्या पता मुझे और मेरे इस दिल को भी थोड़ा सकूँन मिल जाए.", और अलका के पेट पर हाथ रख दिया

अब अलका दीदी ने भी कुछ नही कहा और झुक कर खुद ही पहले अर्जुन का गाल चूमा फिर उसके होंठ. अलका दीदी के खुले बालो से उसका पूरा चेहरा ढक गया था. दोनो प्यार से एक दूसरे के होंठ चूस रहे थे कभी उपर वाला तो कभी नीचे वाला. और यहा ऋतु ने अपना हाथ अर्जुन के छाती पर रखा और चिपक गई उस से. अलका और अर्जुन दोनो कुछ देर बाद अलग हो चुके थे. वो वही बैठी बस मुस्कुरा रही थी. अर्जुन अब ना उठ सकता था और ना हिल सकता था.

ऋतु कोई खास सपना देख रही थी जो एकदम उसने अपनी एक लात उठा कर सीधे लेटे अर्जुन के उपर रख दी. अपना मूह उसकी गर्दन पे. अर्जुन दम साधें लेटा रहा.

"बुरा फसा आज अलका दीदी के चक्कर मे. अब ऋतु दीदी उठ गई तो मेरे पास कोई जवाब नही होगा के यहा उनके बिस्तर पर मैं क्या कर रहा हू." अर्जुन यही सोच रहा था और उसके चेहरे पे फैले इस हल्के से डर को अलका देख कर हँसने लगी. यहा ऋतु शायद यही नींद मे अलका समझकर अर्जुन के उपर आधी लेट चुकी थी. दोनो की होंठ हल्के हल्के चू रहे थे. ऋतु दीदी की उंगलिया अर्जुन की बाहो पर कसी और नींद मे ही उन्होने अर्जुन के होंठ अपने होंठ से पकड़ लिए. लेकिन जैसे ही हाथ छाती पर आया तो वो बिल्कुल सख़्त जगह थी. ऋतु ने आधी सी नींद मे अपनी आँखें खोली तो नीचे अर्जुन को पाया. और इसको सपना समझ फिर से उसके होंठ चूमने लगी. ऋतु दीदी ने अंदर कोई ब्रा तो पहनी नही थी. उनके बूब्स की चूहन से अर्जुन का लंड भी सख़्त होकर ऋतु की जाँघ से उपर टकराने लगा. एक बार फिर आँखें खोली तो नीचे अर्जुन और उसके बराबर मे हँसती हुई अलका को पाया.

ऋतु को जब कुछ समझ मे आया तो वो शरम और घबराहट से विपरीत दिशा मे पलट गई. बिना ही उन दोनो की तरफ देखे अलका से पूछा, "ये यहा कब आया?"

"तू ही तो रात को इसके साथ कमरे मे आई थी. और फिर पूरी रात तू इसके उपर सोती रही. देख ये आज अपनी दौड़ लगाने भी नही जा पाया.",

अलका ने सीरीयस होकर कहा. "और तो और मुझे तो ठीक से सोने भी नही दिया तूने. और ये तो रात से गूंगा हुआ लेटा है तेरे साथ.", अभी चाची या मा आ जाती कमरे मे तो बस हो गया था ना हमारा काम". अलका ने और मिर्च मसाला लगाया

ऋतु की तो आँखें भीग ही गई ये सब सोच कर. नींद मे कभी कभी चलने की समस्या थी उसको. ये ज़्यादा पढ़ने और देर रात तक जागने से उसको लगी थी.
 
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