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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

ये बहुत बड़ी जिम थी एक ऑडिटोरियम जैसी जगह मे. और इसके 2 भाग थे, लड़को का और लड़कियों का. तकरीबन 100 लोग थे फिर भी जिम आधी खाली ही दिख रही थी.

"थोड़ा हाथ पैर हिला ले जबतक मैं मशीन रोकता हू. नही तो नंबर नही आएगा." अर्जुन भी बलबीर की बात सुनकर स्ट्रक्तचिंग करने लगा और कुछ पुषप भी लगाए. इतने मे ही मशीन पर से बलबीर नि आवाज़ लगाई. "भाई यहा आजा."

ये एक 15 प्लेट वाली कसरत की मशीन थी जिसके उपर एक रोड लटक रही थी और ठीक नीचे एक गद्दी वाला स्टूल रखा था.

"देख छोटे भाई ये किल्ली यहा ऐसे फिट करनी है, जितना तू वजन उठा सके और फिर ऐसे उपर नीचे करना है धीरे धीरे रोड को दोनो सीरे से पकड़ कर." अर्जुन को ये सब पता था लेकिन उसने सिर्फ़ हा मे गर्दन हिलाई. पहले बलबीर ने 20 बार दोहराया फिर अर्जुन ने. जब बलबीर दूसरी बार कसरत कर रहा था तो अर्जुन ने पाया की उनसे कुछ 10 कदम मशीन के पीछे से 2 लड़किया उसको ही देख रही थी. वो दोनो ही खड़ी होकर बाजू की कसरत कर रही थी और उसकी तरफ बेशर्मी से देख रही थी. "चल अब तेरी बारी."

ऐसे ही उन्होने कुछ और कसरत की फिर वापिस कोच के पास आ गये. "पानी पी कर 2 मिनिट साँस लेना. फिर बलबीर तुम्हे बताएगा की अपना मुक्का दुरुस्त कैसे करना है. कोच वापिस प्रॅक्टीस कर रहे खिलाड़िओ के बीच चले गये. किसी किसी ने लाल या नीले रंग के सेफ्टी गार्ड भी मूह पर लगाए हुए थे. ये दोनो अब एक कोने मे थे और बलबीर अर्जुन को समझा रहा था के कंधे का प्रयोग सही से कैसे करना है मुक्का चलाते वक्त. और हवा मे प्रॅक्टीस करवाने लगा.

तकरीबन 20 मिनिट बाद बलबीर ने उसको और भी बहुत कुछ बताया की कैसे क्या करना होता है और क्या नही. और जोगिंदर जी ने दूर से ही बस करने का इशारा दिया.

"आराम करना घर जा कर. सुबह दौड़ कम ही लगाना क्योंकि शरीर कसरत के बाद आराम माँगता है. कल भी यही करना है तुम्हे." जोगिंदर जी कह रहे थे तो कुछ लड़के आए उनके पैर स्पर्श करने लगे लाइन से. उन्होने भी सभी को आशीर्वाद दिया. अर्जुन ये सब ध्यान से देख रहा था. फिर हाथ जोड़कर उसने भी आज्ञा ली और साइकल स्टॅंड की तरफ़ चल दिया.

"नया है क्या यहा?" अर्जुन ताला खोल रहा था साइकल का और उस से 3 साइकल दूर अपनी साइकल स्टॅंड से बाहर निकलती लड़की ने उस से पूछा.

"जी. आज पहला दिन था मेरा बॉक्सिंग का यहा." उसने भी साइकल बाहर निकाल ली. ये लड़की अर्जुन के बराबर ही कद की थी. उभरी सख़्त टांगे, लड़कियों से हल्का

चौड़ा सीना जिसपे शायद मुट्ठी से कुछ बड़े ही उभार थे. साँवली लेकिन अच्छे नैन नक्श वाली लड़की थी वो.

"सीनियर हू तेरी यहा स्टेडियम मे. बॅस्केटबॉल, हरयाणा और नाम है मेरा मंजुला."

चल अब उसने अपना सुर एकदम बदल कर कहा तो अर्जुन भी बिना उसकी तरफ देखे साइकल के पैदल बढ़ा निकल गया.

उस लड़की के पीछे आती दूसरी लड़की ने कहा, "किसी को तो छोड़ दे मंजू. ये भी डरा दिया तूने बेवजह."

अर्रे ना सुमन. ये लड़का अलग है. अगर कल दिखा तो थोड़ा नर्मी से बात करूँगी." आँख मारते हुए वो हंस दी.
 
शहर से गुज़रते हुए अर्जुन सब तरफ देखता जा रहा था. साइकल भी हल्की स्पीड मे थी. हर तरफ दुकाने, गाड़िया और ट्रॅफिक था. कही जोड़ी मे लड़का लड़की फुटपाथ पर चल रहे थे तो कही मोटरसाइकल पर. ये सब देखता वो अपने सेक्टर से गुजरा. सुबह वाला पार्क अब बच्चों और महिलाओं से भरा था. लोगबग सैर कर रहे थे, बच्चे खेल रहे थे. 20 मिनिट बाद वो अपने घर था. आज का एक्सपीरियेन्स उसके लिए बिल्कुल अलग था. जैसे की एक नई दुनिया.

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"चल पहले जा कर नहा ले बेटा. मैं तेरे लिए दूध तयार करती हू.", दादी जी ने अर्जुन को मज़े पर बैठे देख कहा.

"हा दादी जी अब पसीना सूख गया तो जा रहा हू नहाने." उठकर वो अंदर वाले बाथरूम मे ही घुस गया तौलिया लेकर.

ये बाथरूम बाहर वाले से लगभग दुगना बड़ा था और इसमे हर तरह के शेंपू साबुन रखे थे, एक बड़ा शीशा भी लगा था हाथ धोने की जगह.

दरवाजे के पीछे तौलिया रखते हुए उसको कुछ कपड़े टाँगे दिखे. ये शायद ललिता जी और ऋतु दीदी के थे. काली मॅक्सी और सफेद टीशर्ट. अर्जुन ने ध्यान से देखा तो मॅक्सी के नीचे कपड़े के अलग पट्टी भी लटक रही थी. उसने मॅक्सी हटाई तो नीचे एक सफेद रंग की सूती ब्रा थी. उसके कप थोड़े बड़े और एलास्टिक ढीला सा था. हुक्क के पास कुछ लिखा था "38- डी ". "ओह ये है ताईजी का साइज़." ना जाने उसको क्या हुआ उसने अपना मूह ब्रा के कप से सटा दिया. बड़ी अच्छी सी महक आ रही थी उसमे से. हल्की पसीने और गुलाब जैसी.

अर्जुन के लंड मे तनाव आने लगा. वापिस वही रखकर वो शावर के नीचे खड़ा हो गया और दीवार पे लगी स्लॅब से एक साबुन उठा पूरे शरीर पर मलने लगा. ये साबुन भी अलग थी और अब पूरा बाथरूम वैसी ही

खुशुबू से महकने लगा जैसी ब्रा से आ रही थी. अर्जुन ने उस साबुन को अपने लंड पे भी रगड़ा जो आधा खड़ा हो चुका था. अभी नहाते हुए कुछ ही देर हुई थी की कोई दरवाजा पीटने लगा.

"आ रहा हू भाई. 2 मिनिट बस हो गया मेरा नहाना." फिर कोई आवाज़ ना आई. नाहकार सिर्फ़ तौलिया लपेट वो बाहर आया तो ताईजी खड़ी थी.

"वो बेटा मुझे बाथरूम जाना था.", उसके उपरी नंगे जिस्म को एक बार अच्छे से देख ललिता जी अंदर घुस गई. कुछ देर बाद सॉफ पाजामा टी शर्ट पहनकर अर्जुन वापिस रसोईघर मे आ बैठा और दूध पीने लगा. उसकी मा रेखाजी भी वही बर्तन धो रही थी.

"मुन्ना, तू आज अपनी ताईजी के कमरे मे सो जाना. तेरे ताऊ जी तो अभी कुछ दिन होंगे नही और संजीव भी 2 दिन कम से कम नही आने वाला. और एक बार सोने से पहले अपनी ताई की पीठ पे तिल के तेल से मालिश कर दियो. बेचारी ना आराम से बैठ पा रही है ना चल.", दादी जी ने चावल सॉफ करते हुए कहा.

"हा सो जाउन्गा बस कल 5 बजे से पहले मत उठाना दादी मुझे. वो कोच सर ने कहा है के सुबह दौड़ लगाना शुरू करना है जिस से शाम को शरीर मेहनत के लिए तयार रहे."

"मैं ललिता को बोल दूँगी. वो उठ जाती है इस टाइम पर."

"ठीक है दादी." अर्जुन वही बैठा रहा. कभी अपनी मा से बात करता तो कभी दादी से. जब माधुरी दीदी अंदर आई तो दादी जी और अर्जुन बाहर चल दिए. रोटी मे अभी टाइम था थोड़ा और वैसे भी अर्जुन दादा दादी के बाद ही ख़ाता था तो वो उपर टेलीविजन देखने लगा.
 
"ओये हीरो, कहाँ था सारा दिन?, ये ऋतु दीदी थी जो सुबह से अपने कमरे मे एग्ज़ॅम्स की तैयारी कर रही थी.

"आज से वो बॉक्सिंग सीखने जा रहा हू तो 3 घंटे तो वही हो गये. और दीदी आप ही तो कमरे मे बैठी पढ़ रही थी."

"हा भाई मंडे को मेरा एग्ज़ॅम है ना तो उसमे ही बिज़ी थी. अलका का कल है." सोफे पर अर्जुन के साथ बैठकर वो बातें करने लगी

ऐसे ही कुछ देर बाद दोनो साथ मे नीचे आ गये जहाँ अलका उनका इंतजार कर रही थी.

"कल मेरे साथ जाना है. याद है ना?" अलका ने फिर अर्जुन को याद दिलाया

"हा अच्छे से याद है. लेकिन कल स्कूटी सीखने नही जाना. परसो चलेंगे. कल सिर्फ़ पेपर." अर्जुन ने भी खाना शुरू करते हुए कहा

"भाई तू टाइम से सो जाना." माधुरी दीदी ने ये बात कही लेकिन उनका मतलब ना समझ अर्जुन ने जब बताया के वो आज ताईजी के साथ सोएगा तो माधुरी दीदी के साथ साथ कोमल दीदी का भी चेहरा एक पल के लिए उदास हो गया.

"अच्छी बात है. मा का ध्यान रखियो और अगर उन्हे कुछ ज़रूरत हो तो मुझे बुला लेना.", सफाई से बात बदल दी उन्होने.

थोड़ी देर अपने दादाजी के पैर की मालिश की और उन्हे अपने आज के दिन के बारे मे बता कर वो उपर आया. रात को कच्छा नही पहनता था पाजामे के अंदर तो वही उतारने आया था. दाँत सॉफ किए और आधा घंटा वही सामान्य ज्ञान की किताब पढ़ने के बाद नीचे आया. सब अपने कमरे मे जा चुके थे. रसोईघर मे मा खाने के बाद के बर्तर सॉफ कर रही थी तो वो वही आ गया.

"मा, आप सुबह से लगी हुई हो. लाओ मैं सॉफ कर देता हू आप आराम करो." अपनी मा को इतना काम करते देख वो बर्तनो के पास ही आ गया.

"बस बेटा इतना भी कोई ज़्यादा काम नही है. हो ही गया है. और ये सब काम मैं अपने बेटे से तो नही कराउन्गी." उन्होने एक प्यारी से हँसी से अर्जुन को जवाब दिया.

"मा, वैसे आपकी ज़िंदगी कितनी व्यस्त है ना. सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक काम ही काम. कोई आराम नही है. कभी बुरा नही लगता."

अपने बेटे को इतनी फिकर करता देख रेखा जी को बड़ी खुशी हुई. "बेटा दिन मे खाली समय मे आराम भी तो कर लेती हू. तेरी चारों दीदी भी तो मेरी मदद करती है. और तेरी ताईजी तो मुझे कुछ ज़्यादा काम करने ही नहीं देती अपने सामने. हा जब तेरी बीवी आ जाएगी तब मैं आराम कर लूँगी"

और अर्जुन को देख मुस्कुराने लगी. उन्हे अपने बेटे के साथ अच्छा लग रहा था. ऐसा बहुत कम होता था के वो कभी ऐसे बातें करते थे. शायद पिछले एक साल मे 5-6 बार. दोनो का अपना व्यस्त समय रहता था. रेखा को बहुत बार ऐसा लगता था के जो प्यार उसको अपने बेटे को देना चाहिए था वो कभी दे ही नहीं पाई थी. और कभी कभी उसको ये सब सोचकर दिल मे कसक सी होती थी की वो अपने बेटे की अच्छी मा नही बन पाई.

"मा मैं शादी नही करूँगा. आप दीदी लोगो की शादी कर देना फिर मैं अकेला ही रहूँगा. आपका सारा प्यार फिर मुझे ही तो मिलेगा."

इस बात ने रेखा की दुखती रग पर हाथ रख दिया. एक ही पल मे चेहरे की खुशी की जगह आँखों की नमी ने ले ली थी. अर्जुन को अजीब सी घबराहट हुई जब मा के हाथ बर्तन सॉफ करते रुक गये और चेहरा भी नीचे हो गया.

"क्या हुआ मा?" अपनी मा को उसने पलटाया तो उनका वो खूबसूरत चेहरा आँसुओ से भीगा हुआ था. "आप रो क्यू रही हो मा? मैने अगर कुछ ग़लत कहा हो तो प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए ना. लेकिन आपको रोते देख मुझे दर्द हो रहा है."

बेटे की इतनी बात सुनते ही रेखा जी ने उसको अपने सीने से लगा लिया. "नही मुन्ना तू कभी कुछ ग़लत कह ही नहीं सकता रे. मैं ही अभागन हू जिसने तेरा बचपन तक ठीक से नही देखा. और आज भी जब सोचती हू के

तेरे हिस्से का प्यार तुझे दूँ तो खुद को मजबूर मानती हू."

"मा कौन कहता है के मुझे प्यार नही मिला? सुबह आपको देखने के बाद ही तो मेरा दिन सही मायने मे शुरू होता है. और रही बात मेरे बोरडिंग की, तो वो फ़ैसला आपने तो नही किया था ना मा. मेरे जाने का सबसे ज़्यादा दुख आपको ही था. क्या ये प्यार नही है आपका?"

बेटे की इतनी समझदारी देख रेखा नि उसको एक बार फिर सीने से चिपका कर उसका माथा चूम लिया. अर्जुन ने अपने हाथ से मा का चेहरा सॉफ किया.

"वैसे आप जब मुस्कुराती हो तो दिव्या भारती लगती हो बिल्कुल."

अपने बेटे की ये बात सुनकर खोई हुई मुस्कान वापिस आ गई थी उनके चेहरे पर

"चल अब सो जा जाकर. तेरी ताईजी भी इंतजार कर रही होंगी. मेरा काम भी हो ही गया बस."

"जब संजीव भीयया वापिस आ जाएँगे फिर मैं आपके साथ सोउँगा मा. 10 साल हो गये सुकून से सोए हुए मुझे."

"हा बेटा मैं भी यही तो चाहती हू बस सोचती थी कि तुझे अब आदत नही रही होगी. तू अभी भी मेरे लिए मेरा मुन्ना ही तो है."

"हाहाहा. मा ये मुन्ना अब 6 फीट का हो गया. चलो गुडनाइट."

बेटे को बाहर जाते हुए रेखा जी देखती रही. सही बात तो थी उसकी. छोटा सा मुन्ना अब अपने बाप से भी लंबा हो चुका था. फिर खुद ही सर झटकती

काम मे लग गई.
 
"आ गया बेटा तू? चल लेट जा." कमरे मे आते ही बिस्तर पर लेटी उसकी ताईजी ने उसको इशारे से अपनी दूसरी तरफ बुलाया.

"पहले आपकी मालिश फिर मैं सोउँगा. नही तो नही."

"बेटा अब मैं ठीक हू बिल्कुल. तू आराम कर वैसे भी तू थका होगा." ललिता जी ने सोचते सोचते ये बात कही थी.

"ऐसा तो कुछ किया नही मैने जिस से थकान हुई हो. आप मुझे बस तेल बताओ कहाँ रखा है."

"वो वहाँ ड्रेसिंग के ऊपर रखा है बेटा. देख अगर तू थका हुआ है तो रहने दे. वैसे भी मैं ठीक हू.", ललिता जी ने फिर कहा लेकिन अर्जुन ने तेल की शीशी उठाई और उनके करीब आ बैठा. ताईजी ने अभी एक हल्की सारी पहनी हुई थी जो की वो कभी भी सोते हुए नही पहनती थी.

ज़्यादातर वो रात मे पेटीकोट/ब्लाउस या सलवार/कमीज़ पहनती थी. जब ताऊ जी घर होते तो कभी कभी मॅक्सी भी.

"चलिए उल्टी लेट जाइए." हुकुम सा दिया अर्जुन ने तो करवट के बल लेटी हुई ललिता जी पेट के बल हो गई. उनकी गान्ड पूरी उभरी हुई थी. ब्लाउस और पेटीकोट के बीच कमर बिल्कुल सॉफ थी. अर्जुन ने थोड़ा तेल अपने हाथो मे लगाया ही था कि वो बोला,"ताईजी ये सारी हल्के रंग की है कही तेल लगने से खराब ना हो जाए."

कुछ सोचने के बाद ललिता जी ने कहा, "बेटा सोच तो मैं भी यही रही थी, लेकिन फिर मुझे लगा कि ये अच्छा नही लगेगा."

"ओफफो. आप भी ना. चलिए चेंज कर लीजिए मैं वेट करता हू."

"तू दरवाजा लगा दे और ज़ीरो को बल्ब जला दे. ये बड़ी लाइट बंद कर मैं सारी बदलती हू.", अर्जुन ने वैसा ही किया और चिटकनी चड़ा दी दरवाजे की

फिर ट्यूब लाइट बंद कर के बल्ब ओं कर दिया. ये ज़ीरो का सफेद बल्ब था जिसकी रोशनी ज़्यादा नही थी लेकिन फिर भी कुछ हद तक सॉफ दिख जाता था.

जैसे ही स्विचबोर्ड से मूह घुमाया तो ताईजी को बिना साड़ी के बिस्तर पर जाते देखा. उनका पेटीकोट बिल्कुल फसा हुआ था पीछे से कुल्हो पर. शायद उनके कूल्हे माधुरी दीदी से भी बड़े था. इतनी देर मे ही उसके कान गरम हो गये थे. वो धीरे से चलता हुआ बेड पे वही आकर बैठ गया और ताईजी के चेहरे की तरफ देखा जो उन्होने तकिये पर रखा हुआ था और मूह दूसरी तरफ था. फिर से तेल हाथो पर लगा कर उसने झीजकते हुए ताई जी की कमर पर हाथ रखे. हल्के हाथो से वो उनकी कमर पर मालिश करने लगा. ताईजी की कमर पर ढलान सी थी. ब्लाउस के पास से हाथ जब नीचे आते तो ये ढलान पता लगती फिर जहाँ पेटीकोट का नाडा था वहाँ एकदम से उपर उठान थी. उनके कूल्हे कुछ ज़्यादा ही बाहर को निकले थे.

"वो बेटा ध्यान रखना के कही ब्लाउस खराब ना हो जाए. ये उस साड़ी के साथ का ही है." ताई जी की आवाज़ से वो वापिस होश मे आया.

"कोशिश तो कर रहा हू ताई जी लेकिन नीचे यहा ये आपका स्कर्ट कमर पे आया हुआ है और आपका ब्लाउस इतना लंबा है के कुछ हिस्सा कमर पे है."

"हाहाहा. बेटा ये स्कर्ट नही पेटीकोट है. और अब बूढ़ी हो गई हू तो ब्लाउस तो ऐसे ही पहनुँगी. हा रेखा जितनी जवान रहती तो शायद मैं भी थोड़ा ध्यान रखती अपना."

ये बात उन्होने अजीब लहजे मे कही थी. और अर्जुन को कुछ ज़्यादा समझ नही आया तो उसने ऐसे ही जवाब दे दिया.

"ताई जी आप कहाँ से बूढ़ी हो गई? आप तो खुद अभी माधुरी दीदी की बहन लगती हो. शायद आप अपने आप पर अब ध्यान नही देती."

"किसके लिए ध्यान दूँ रे अब?" बड़ी हल्की आवाज़ मे कही ये बात उसके कान मे सही तरह से नही गई थी.

"कुछ कहा ताई जी आपने?"

"वो बेटा थोड़ा ब्लाउस उपर सरका दे. और पेटीकोट भी. तिल का तेल है लग गया तो फिर दाग नही जाएँगे."

फिर अर्जुन ने जैसे ही ब्लाउस उपर करना चाहा तो वो तो बुरी तरह फसा हुआ था.

"रुक ज़रा." ललिता जी ने अपना सीना उपर किया और नीचे के दो हुक्क खोल दिए. कमर के पास जहाँ पेटीकोट का नाडा था वो ढीला कर दिया.

"ले बेटा अब कर दे उपर और नीचे." फिर से ये बात द्वि- अर्थी कही थी उन्होने. कुछ तो चल रहा था आज उनके मन मे. और अर्जुन नेउनका ब्लाउस अच्छे से उपरकर दिया पीठ तक और जैसे ही पेटीकोट को उपर करने लगा उसकी उंगली ललिता जी की गान्ड की दरार से छु गई.
 
"ष्ह. " उनके मूह से निकली ये हल्की सी सिसकारी अर्जुन को भी सुनाई दी. "क्या यही दर्द है ताई जी?"

"हा बेटा ज़्यादा दर्द तो यही है बस बता नहीं पा रही थी. तू एक काम कर मेरे दोनो तरफ टाँग कर ले और फिर अच्छे से रगड़ कर मालिश कर दे. अपना ज़्यादा बोझ मत डालियो मुझ पर." अर्जुन का ध्यान अपनी ताईजी की बात पर गया तो वो चहक कर उपर आ गया.

"एक और काम कर ये तेरा शर्ट भी उतार दे नही तो पसीना आएगा तो दुर्गंध आएगी."

"ठीक है ताई जी." और टीशर्ट उतार कर वो अपने घुटने चाची की दोनो तरफ गान्ड के उपर से टीका कर उनकी मालिश करने लगा. हाथ उपर जाते तो उसका लंड गान्ड की दरार मे आगे की तरफ जाता और हाथ नीचे आते तो पीछे. कुछ ही देर मे उसका लंड अपनी औकात पर आ गया था. और अब आगे होते समय उसका शरीर थोड़ा झुकता तो लंड का दबाव ललिता जो को अपनी गान्ड पर कपड़े के उपर से ही पता लग रहा था.

"इतना भी छोटा नही रहा ये अब." वो मन मे यही सोच रही थी. वैसे तो दिन मे ही सफाई के समय उसका उभार दिख गया था. और उसका ही नतीजा था ये कमर दर्द का नाटक. उनकी आग जो राजकुमार जी पिछले 5 साल मे कम करने की जगह भड़का चुके थे, एक ख़तरनाक हद तक. जिसका नतीजा ये था की आज वो इसमे जलती हुई पहली बार सही ग़लत भूल चुकी थी.

अर्जुन का दिमाग़ भी लंड जैसा हो चुका था, मोटा और खाली. अब उसका लंड ज़्यादा घिस रहा था और हाथ कम.

"बेटा यहा की तो हो गई है." इतना बोलकर ललिता जी चुप हो गई. उनकी गान्ड की दरार अब पेटीकोट से कुछ बाहर निकल आई थी.

"आपकी टाँग मे भी दर्द था ना ताईजी ?", अर्जुन का मन अभी भरा नही था. उपर से उसका लंड आज तीसरी बार खड़ा हुआ तो और हल्का दर्द भी करने लगा था.

"हा बेटा दर्द तो है लेकिन कही तुझे बुरा ना लगे वहाँ मालिश करने मे." ललिता जी ने गंभीरता से कहा. और अपना अगला दाव खेल दिया

"मुझको तो अच्छा लगेगा आपकी सेवा करके. आप बस बताओ और बाकी मैं कर लूँगा."

"वो बेटा थोड़ा दर्द यहा दोनो बाजू के नीचे है और दाईं जाँघ की नस पर." उन्होने इतना कहकर वापिस सर तकिये पर टीका लिया.

"मैं हाथ रखता हू आप बता देना कहाँ दर्द है. लेकिन बाह के नीचे तो आपका ब्लाउस है ना. आप इसको उतार कर कोई बनियान पहन लो."

"बेटा बनियान तेरे ताऊ जी की तो मुझे आएगी नही तू एक काम कर लाइट बंद कर दे मैं ब्लाउस उतार देती हू."

अर्जुन ने ज़ीरो बल्ब भी बुझा दिया और वापिस आने लगा. अंधेरा छाया था अब कमरे मे तो अंदाज़े से वो बिस्तर तक आया तो उसका हाथ अंधेरे मे किसी मुलायम चीज़ से टकराया.

"एक मिनिट बेटा बस."

ललिता जी को अर्जुन का हाथ अपनी ब्रा के उपर निकले उभार पर सुखद एहसास दे गया. वो वापिस लेट गई थी. अर्जुन ने टटोलते हुए अपने हाथ फिर चलाए तो उसके हाथ ताईजी की गान्ड पर लगे. बिना कोई बात किए वो वापिस पुरानी जगह बैठ गया.

"ताईजी तेल पता नही कहा रख दिया."

"कोई बात नही बेटा, वैसे भी हाथो मे बहुत लगा होगा. तू बस मालिश कर."

अर्जुन ने अपने दोनो हाथ कमर की साइड से ले जाते हुए आगे बढ़ाए तो ब्रा की पट्टी दोनो तरफ महसूस हुई. "ये तो अभी भी बीच मे आ रही है ताईजी "

"रुक बेटा मैं हुक्क खोल देती हू वैसे भी अंधेरा तो है." और उन्होने पीछे हाथ करके ब्रा खोल दी जो उनकी छाती की नीचे पड़ी थी अब. यहा अर्जुन के हाथ उनकी मखमली गुदाज शरीर पर चलने लगे थे. उल्टा लेटने से उनके बड़े चुचे थोड़े बाहर को आ चुके थे जिनपे उसकी उंगलिया रगड़ खा रही थी. और झुकने से उसका मोटा लंड बार बार उनकी गान्ड की दरार मे धंसता. दोनो चुप थे लेकिन मज़ा बराबर आ रहा था. नीचे दबे हुए निपल भी सख़्त होने लगे थे. इतनी कामुक मालिश पूरे जीवन मे ललिता जी को नसीब नही हुई थी. अर्जुन भी अब जोश मे कभी उनके थोड़े से बाहर निकले चुचो पर हाथ रोक देता था और उनकी गान्ड की गर्मी लंड पर महसूस कर मज़े ले रहा था.

किसी सयाने बंदे ने एक बात खूब कही है, "लंड और पानी अपनी जगह बना लेते है. घोड़ा और लॉडा दोनो बिना सिखाए ही दौड़ सकते है."

यहा कुछ ऐसा ही हो रहा था. पेटीकोट तो अब आधा गान्ड से खिसक गया था और ललिता जी ने नीचे कच्छी नही पहनी हुई थी. जब अर्जुन का लंड नंगी दरार मे रगड़ ख़ाता तो ललिता जी को ऐसा लगता जैसे उसका लंड भी नंगा ही है.

दोनो कुछ नही बोल रहे थे. अब अर्जुन उनके बाहर को निकले चुचो के हिस्सो को भी दबा रहा था. दोनो किसी और ही दुनिया मे थे. लेकिन ललिता जी ने फिर से कमान अपने हाथ मे ले ली. "बेटा एक बार उठ मैं सीधी हो जाऊ तू फिर जाँघ की मालिश कर के सो जाना."

अर्जुन उठा तो वो पलट कर सीधी हो गई ब्रा नीचे ही दबी थी तो अब उनके मोटे मोटे बूब्स खुली हवा मे साँस ले रहे थे. अर्जुन ने फिर जैसे ही पेतकोट पर हाथ रखा जाँघ दबाने के लिए

उन्होने फिर वही बात कही,"बेटा कपड़े के अंदर से दबा".

अर्जुन के हाथ अपनी ताईजी की मोटी सुडोल जाँघो से टकराए तो लंड पत्थर ही हो गया था.

इतनी मुलायम और मोटी जाँघ थी के एक बार तो हाथ ही फिसल गया. "बेटा यहा से उपर की तरफ थोड़ा ज़ोर लगा कर." उत्तेजना ललिता जी पर भी हावी हो चुकी थी. इतनी देर से जो ये मस्ती चल रही थी वो अब ऐसी जगह आ चुकी थी की आगे बढ़े और दूरिया ख़तम.

अर्जुन तो नासमझ था लेकिन अब ललिता भी चूत से सोच रही थी, जो आज कई साल बाद ऐसे रस बहा रही थी. उसके हाथ मोटी जाँघो को मसलते हुए उपर जाते और फिर वैसे ही नीचे आ जाते. थोड़ी देर बाद जब हाथ आसानी से चलने लगे तो और उपर जाने लगे. अर्जुन की उंगली किसी मुलायम सी जगह से टकराई तो उसको पता चल गया के ये कौन सी जगह थी. और ताईजी की सिसकी निकल गई. उनको कुछ ना कहता देख वो बार बार अपने हाथ को उस जगह पर ले जाने लगा.

चूत के दोनो होंठ मोटे रस भरे थे लेकिन उनके यहा भी बाल नही थे. अर्जुन को इतना खुलकर मज़े लेते देख ललिता जी ने उसका हाथ पकड़ अपने उपर खींच लिया. वो भी बिना ऐतराज उनके उपर छा गया. ललिता जी के सारे संस्कार चूत की आग मे जल चुके थे और वो अर्जुन के होंठ अपने मूह मे लेकर चूसने लगी. इतना तगड़ा किस तो अर्जुन ने पहले कभी नही किया था. उसकी ताईजी खुद से ही उसकी जीभ और होंठ अपने मूह मे लेकर चूस रही थी. उनका पूरा जिस्म तप रहा था और अपने नीचे उनके नंगे चूचे देख कर अर्जुन भी लगा उन्हे मज़े से भींचने..

"दबा बेटा और ज़ोर से दबा इन्हे. बहुत दर्द दिया है इन्होने आज इनकी सारी अकड़ निकाल दे. आ खा जा इन्हे." उसको चूमना छोड़ वो खुद अपने दूध उसके मूह मे डालने लगी. पेटीकोट तो घुटनो पर पड़ा था और चूत नंगी. ललिता जी ने अपने हाथ से खुद चूत को रगड़ना शुरू कर दिया.

"बहुत सताया है रे इस निगोडी ने. जीना हराम कर रखा है बेटा मेरा. सारी रात जलती रहती हू और तेरे ताऊ जी बस इस आग को जला कर चले जाते है. आज तू मुझे निराश मत करिओ." अर्जुन को बोलते हुए उन्होने अपनी 2 उंगलिया चूत में घुसा दी जो पहले ही रो रही थी. दूसरे हाथ को जैसे ही उन्होने उसके पाजामे के उपर रखा , लंड पकड़ते ही उनको झटका लगा. लेकिन उनका हाथ फिर कस गया उस तगड़े लंड पर.

"इतनी सी उमर मे तू पूरा घोड़ा हो गया है मेरे बेटे." अर्जुन के हथियार से प्रभावित हो चुकी थी पूरी तरह. और ये भी सोच रही थी की ये इतनी देर से खड़ा रहने के बाद भी झड़ा नही था. उन्होने उसका पाजामा खोला तो अर्जुन ने करवट लेकर पूरा उतार दिया. और अब पेटीकोट भी वहाँ से गायब था. वो वापिस अपनी ताईजी के उपर लेट गया और उनके दूध चुस्कने लगा. ललिता जी की नज़रों मे तो वो नादान था तो उन्होने खुद कमान अपने हाथ मे ली.

"रुक बेटा आज तुझे सब सिखाती हू अच्छे से.", उसको नीचे लिटा वो उसकी कमर पर झुक गई. अर्जुन को करेंट सा लगा जब ताईजी ने उसके लंड के सुपाडे को चूम कर मूह मे भर लिया. उसने ऐसा बस संदीप के घर उस किताब मे देखा था.

"कितना मोटा है रे तेरा. अंदर ही नहीं जा रहा." मूह से निकाल कर वो पूरे लंड को जीभ से चाटने लगी. बीच बीच मे उसको थूक से गीला भी कर रही थी.
 
"रुक बेटा आज तुझे सब सिखाती हू अच्छे से.", उसको नीचे लिटा वो उसकी कमर पर झुक गई. अर्जुन को करेंट सा लगा जब ताईजी ने उसके लंड के सुपाडे को चूम कर मूह मे भर लिया. उसने ऐसा बस संदीप के घर उस किताब मे देखा था.

"कितना मोटा है रे तेरा. अंदर ही नहीं जा रहा." मूह से निकाल कर वो पूरे लंड को जीभ से चाटने लगी. बीच बीच मे उसको थूक से गीला भी कर रही थी.

"चल बेटा मैं नीचे लेट ती हू तू मेरी टाँगों के बीच आ." अर्जुन ने वैसा ही किया. "देख जब मैं कहूं तो आगे को धक्का दियो. और हा रुकने को कहूं तो रुक जइओ. तेरे ताऊ जी का इस से 5 उंगल छोटा है और मोटाई तो आधी होगी." उनको पता था की आज चूत का फटना तय है लेकिन वो तयार थी.

अपने हाथ से उन्होने उसका गीला लॉडा अपनी चूत के मूह पर रखा. थोड़ा घिसने के बाद खुद ही छेद पर दबाया. "देख मुझे दर्द होगा. लेकिन आधा डालने तक रुकना नही."और अपनी ब्रा मूह मे दबा ली. "हाँ" की आवाज़ सुनते ही अर्जुन ने अपनी कमर को एक प्रचंड धक्का दिया और उसका लंड सुपाडे सहित 3 इंच अंदर. चूत इतनी कस गई थी के सुपाडा हल्का छिल गया था. माधुरी दीदी को तो चोदते समय दोनो के अंग लोशन से चिकने थे. और यहा सिर्फ़ लंड पे थोड़ा सा थूक लगा था. ललिता जी की चीख किसी तरह ब्रा मे ही दबी रह गई. अर्जुन ने बिना समय गवाए एक और झटका दे दिया. 2 इंच लंड और अंदर चला गया. लेकिन अब ललिता जी अपना सर पटक रही थी. उनके पति का लंड इस जगह तक ही गया था लेकिन अर्जुन के लंड ने इस तंग गली को हाइवे बना दिया था. वो ताईजी के उपर झुक कर उनके होंठ पीने लगा. साथ ही साथ उनके बूब्स दबाने लगा. निपल को कस कर खींचने से चूत का दर्द कम होने लगा क्योंकि अब निपल भी दर्द करने लगे थे. थोड़ी देर मे उनकी साँस दुरुस्त हुई तो ब्रा को निकाल दिया मूह से. "तेरा लंड सच मे घोड़े का है रे. फाड़ ही डाली तूने तो मेरी, अब इसमे तेरे ताऊ जी का तो पता भी नही चलेगा. चल अब अपनी कमर हिला, लेकिनआराम से."

इतना तो अर्जुन को पता ही था. शुरू मे वो हल्के हल्के और छोटे धक्के दे रहा था. चूत की खाल खिच रही थी हर धक्के के साथ.

"हा बेटा ऐसे ही. अब अच्छा लग रहा है. दर्द के साथ ये मज़ा. आहह... मेरे लाल ऐसे ही करता रह."

"ताईजी ये क्या मज़ा दिला दिया आपने. मुझ से रुका नही जा रहा." इतना बोलकर अर्जुन ने आधे लंड से ही तेज धक्के देने शुरू कर दिए.

अब बंद कमरे मे ललिता जी की आवाज़ गूँज रही थी. "हाए राम. थोड़ा धीरे कर बेटा.. ऐसे तो पूरी फट जाएगीइिईई.. आ माआ...... मार दिया रे.. हा बेटा कर

लगा ऐसे ही धक्के." अब उनकी भी ताल मिलने लगी थी अर्जुन के साथ. झटके खाते हुए ही उनके हाथ तेल की शीशी लग गई. "बेटा रुक. ये ले और अपना लंड थोड़ा सा अंदर रख कर बाकी हिस्से पर तेल लगा ले." उन्होने वो शीशी अर्जुन को पकड़ा दी. और यही ग़लती हो गई उनसे.

तेल अच्छे से लगते ही अर्जुन ने एक करारा झटका दे मारा और लंड चूत को किसी कपड़े की तरह फाड़ता हुआ अंदर जा धसा.

"ऊई मा रे.. मर गई मैं कमीने कुत्ते.. फाड़ डाली तूने तो." उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े और चूत ठंडी पड गई दर्द की वजह से. लेकिन कसावट की वजह से लंड अंदर और फूलने लगा

अर्जुन ने अब ताईजी की परवाह ना करते हुए धक्के लगाने शुरू कर दिए. हर धक्के के साथ वो उनके बूब्स को नोच रहा था और होंठ काट रहा था.

लंड जड़ तक अंदर जा रहा था और उसके अंडकोष ताईजी की गान्ड से लग रहे थे. "आ कितनी गरम है आपकी अंदर से. मेरा लंड जैसे जल रहा है

ताईजी ." ताईजी की चूत ज़्यादा ही फूली हुई थी. ऐसी गद्देदार चूत का मज़ा सबसे ज़्यादा था. इतनी तो माधुरी दीदी की भी नही थी.

"बेटा अब फाड़ तो दी है बस जान ना निकाल दियो. हाए राम ... ग़लती हो गई.. आ थोड़ा धीरे से कर बेटा... तेरी ताई की जान निकल रही है."

लेकिन अर्जुन तो सुपाडे तक लंड खींचता और फिर पूरा ठोक देता. जब ताईजी को मज़ा आने ही लगा था कि वो रुक गया.

"अर्रे क्या हुआ बेटा?"

"ताईजी रुक कर करते है ना. ऐसे तो पीठ दर्द करने लगी."

"बेटा तू एक बार लंड निकाल बाहर." जैसे ही लंड बाहर आया ताईजी को लगा जैसे अंदर से जान भी निकल गई हो. वो जल्दी से घोड़ी की तरह हो गई अपनी बड़ी गान्ड बाहर निकाल कर बिस्तर के किनारे और अर्जुन को पीछे खड़े होने को कहा ज़मीन पर. "अब यहा से लंड ज़रा निशाने पे लगा बेटा

ऐसे तेरी पीठ दर्द नही करेगी." उसने वैसा ही किया. यहा से तो लंड और भी कासके अंदर जा लगा. एक ही झटके मे अर्जुन का लंड पूरा अंदर

अब कमरे मे बस ताईजी की सिसकारिया और उनकी गान्ड पर पड़ते धक्को से निकलती पट्ट पट्ट की आवाज़ गूँज रही थी. अर्जुन के लिए ये अब तक की

सबसे मस्त चुदाई थी. कभी वो उनकी मोट्ती गान्ड को दबाता तो कभी लटकते ढूढ़ पकड़ के खींचता. "आ बेटा मैं तो गई रे... " इतने मे

ताईजी का सर बेड से टिक गया. वो एक के बाद एक 5-6 बार लगातार झड़ी थी. इतने सालो से सूखी पड़ी उनकी चूत मे आज बाढ़ आ चुकी थी.

मज़े से दोहरी होती वो बेहोश सी हो गई. और इस सबमे उनकी गान्ड उपर उठ गई थी. अर्जुन फिर से चोदने लगा उनकी गान्ड को उपर उठा कर. लंड अब इतना अंदर तक जा रहा था जितना कभी नही गया था. 5 मिनिट बाद ताईजी फिर से सिसकने लगी.. "बस कर रे बेटा. अब तो चूत भी दुखने

लगी है. भगवान बचा ले इसके हबशी लंड से... एक करारा झटका मार के वो ताईजी की गान्ड से चिपक कर झड़ने लगा. उसके मूह से हाँफने

की आवाज़ निकल रही थी. "हाँ... "और इतनी पिचकारियाया छोड़ी उसके लंड ने की चूत भर गई और उठी गान्ड से भी उसका पानी बाहर निकलने लगा.

"धम्म" की आवाज़ से वो बिस्तर पर लुढ़क गया और ताईजी भी. रात के 1 बज चुके थे. उनकी चुदाई मालिश के बाद पूरे एक घंटे चली थी.

ललिता जी का शरीर भी साथ छोड़ गया तो वो भी नंगी ही सो गई बस सोने से पहले उन्होने अर्जुन को बिस्तर पर सही से खींच लिया और अपने सीने से चिपका पसर गई.
 
उन्माद के बाद जिग्यासा

गला सूखने की वजह से नींद टूट गई लेकिन अपनी छाती पे एक हाथ महसूस हुआ तो थोड़ी देर अर्जुन ध्यान से समझने की कोशिश करने लगा.

"रात मैं ताईजी के साथ था और फिर वो सब हुआ. आ मज़े से शायद मैं गिर ही गया था." सब याद कर वो आराम से ताईजी का हाथ बिस्तर पर रख उठ खड़ा हुआ. आराम से चिटकनी खोली, वापिस दरवाजा ढाला बाहर से और रसोईघर मे फ्रिज की ओर चल दिया. अभी भी अंधेरा था और आँगन मे अच्छी ठंडक थी, ताजी हवा की वजह से. पानी निकाल कर वही बाहर मे खड़े होकर पीया और बॉटल मज़े पर रख कर वापिस अंदर

आ कर ज़ीरो का बल्ब जलाया. 4 बजने मे अभी 10 मिनिट बाकी थे और घर पे सबसे पहले उठने वाले रामेश्वर जी भी 4:30 के बाद ही उठते थे.

अब कमरे मे इतनी रोशनी थी के सब दिख रहा था. वापिस बिस्तर पर आया तो अब ताईजी को ध्यान से देखने लगा. थोड़ा गोलाई लिया हुआ चेहरा,

भरे हुए गाल, मोटे होंठ, गोरी और मांसल गर्दन. कुल मिलकर उनका चेहरा इस उमर मे भी आकर्षक था. नज़र गर्दन से नीचे गई जहाँ वो उल्टी लेटी थी और एक बाजू अभी वही थी जहाँ कुछ देर पहले अर्जुन सोया हुआ था. हल्के चौड़े कंधे, मुलायम पीठ के नीचे पहाड़ जैसे उठे हुए कूल्हे, जो घर का काम करने की वजह से अभी तक अच्छे आकार में थे, कही कोई ढीलापन ना था. उनके नीचे चिकनी और आपस मे जुड़ी जांघे

उनके इस शरीर को और कमौत्तेजक बना रही थी. गोरी गोल पिंडलिया और छोटे खूबसूरत पाव. तकरीबन 5 फीट से कुछ उपर लंबाई होगी. उनको देखते देखते वो साथ मे लेट गया. बाह के नीचे से उनका बाया बड़ा चुचा बाहर निकला हुआ था और उसका निपल बिस्तर की तरफ छुपा हुआ था.

"वाह कितने मुलायम है ये. और अब तो नरम है, रात की तरह कठोर नही लग रहे." धीरे से उसने अपना हाथ लगभग आधे चूचे पर फिराया.

फिर अपना बाया हाथ नीचे लेजा कर बिस्तर पर टीके भाग को हथेली मे ले लिया. ललिता जी गहरी नींद मे थी और अर्जुन अब उनके चूचे को अच्छे से अपने हाथ लेकर मसल रहा था. वो बड़ा सा नरम माँस का गोला अर्जुन को वापिस वही ले जा रहा था जहाँ रात को वो बेहोश हुआ था. हल्के हल्के मसलने से अब उनका बड़ा सा भूरा निपल फूल कर सख़्त होने लगा और ताईजी ने मस्ती मे एक अंगड़ाई ली. अब वो सीधी बिस्तर पर लेटी थी और उनके विशाल पहाड़ो पर लगे मटर के दाने जीतने निपल छत की तरफ देख रहे थे. अर्जुन ने झुक कर दाएँ वाला जो उसकी तरफ हो गया था उसको अपने मूह मे हल्के से लिया और दूसरे वाले को अपनी मुट्ठी मे भरने की कोशिश करने लगा. ये इतना बड़ा था की उसका हाथ जितना उपर था, चूचा दोनो तरफ से उतना बाहर था. शरीर पर सिर्फ़ पाजामा था जो उसने बूब से हटाकर नीचे सरका दिया. अब वो बिना बोझ दिए ताईजी के उपर आ गया लेकिन दंड पेलने जैसी स्थिति मे. सिर्फ़ उसके पंजे बिस्तर पर थे और कोहनिया दोनो उभारों की बाहर की तरफ. ताईजी की जांघे आपस मे सटी थी.

"ऐसा स्वाद मूह मे आ रहा है जैसे कोई रस सा निकल रहा हो इनमे से." दोनो उभारों को प्यार से पीते हुए उसने मन मे ये बात कही. अपनी एक टाँग ताईजी की दोनो टाँगों के बीच ले जाकर उसने उनको जाँघो को अलग करने की कोशिश कर ने लगा.

सफल भी हो गया वो, अब ताईजी की टांगे थोड़ी दूर हो गई थी. चूचे पीना छोड़ वो घुटनो पर बैठ कर उनकी चूत को देखने लगा जो रात के अंधेरे मे दिखी नही थी.

"ताईजी की चूत कितनी फूली हुई है.", दोनो मोटे होंठ और उनके बीच लाल रंग का छेद उसको सही से दिख रहा था. रात की चुदाई से बाहर तक वो लाल दिख रही थी और शायद इतना बड़ा लंड खाने से ही डबल रोटी जैसे फूल गई थी. अपने हाथ से खड़ा लंड उसने चूत के चीरे पर फिराया तो नींद मे ही ताईजी के चेहरे पर मज़े के भाव आ गये. 4-5 बार आराम से सुपाडा उस लकीर मे फिराने के बाद अर्जुन ने नीचे की और झुकते हुए अपने होंठ अपनी ताईजी के होंठो पर रख दिए, थोड़े मजबूती से.

इधर ताई जी शायद ऐसा ही मजेदार सपना देख रही थी, उन्होने भी अब नींद मे ही अर्जुन के मूह मे जीभ घुमानी शुरू कर दी. अगले ही पल उनकी आँखें खुल गई और साँस रुकती सी महसूस हुई. उनकी आँखो के

सामने अर्जुन का चेहरा था और चूत में उसका खूँटा गढ़ चुका था. उनकी तरफ आराम से देखते हुए अर्जुन ने फिर एक धक्का दिया और जितना लंडा अंदर घुस चुका था उसी से ताईजी को चोदने लगा. ललिता जी को पहले तो कुछ समझ नही आया सिवाए फैल चुकी चूत और उसमे हुए दर्द से

फिर उन्होने अपनी आँखे बंद कर ली और अर्जुन के आधे लंड से ही चुदने के मज़े लेने लगी. अंदर से चूत पूरी गीली थी और लंड सख्ती से फिसल रहा था. एक बार फिर ज़ोर से उनके पपीते पकड़ कर ऐसा धक्का लगाया की जड़ तक लंड अंदर.

इतने बड़े लंड से ललिता जी पहली बार सिर्फ़ 4 घंटे पहले ही चुदी थी और उनकी चूत अभी उभर भी नही पाई थी की अर्जुन के लंड ने फिर से उसको फाड़ना शुरू कर दिया था.

"कितना बेदर्द है रे तू. तुझे मुझ पर ज़रा तरस नही आया जो सोती हुई मुझे ऐसे रंडी की तरह चोदने लगा.", कराहती हुई ताईजी ने पहली बार इतने गंदे लफ़जो मे बात करी थी. वो गाँव से थी तो उन्हे इन सबका पता ज़रूर था लेकिन इस परिवार मे कभी उन्होने किसी से ऐसी बात तो दूर उँची आवाज़ भी नही सुनी थी.
 
"कितना बेदर्द है रे तू. तुझे मुझ पर ज़रा तरस नही आया जो सोती हुई मुझे ऐसे रंडी की तरह चोदने लगा.", कराहती हुई ताईजी ने पहली बार इतने गंदे लफ़जो मे बात करी थी. वो गाँव से थी तो उन्हे इन सबका पता ज़रूर था लेकिन इस परिवार मे कभी उन्होने किसी से ऐसी बात तो दूर उँची आवाज़ भी नही सुनी थी.

"वो ताईजी जब मैं उठा तो आप सोई हुई इतनी प्यारी लग रही थी. रात को आपका जिस्म देख नही पाया था और अब देखने के बाद रुका नही गया."

उसकी ऐसी बात सुनकर ललिता जी को एक बार तो अपने भतीजे पर बड़ा प्यार आया और खुद की तारीफ सुनकर खुशी भी हुई, लेकिन फिर वापिस हल्के गुस्से और दर्द से कहा, "तो मतलब मुझे नंगी देखकर कही भी छोड़ देगा?"

"क्या करू ताईजी अब आपने ऐसा मज़ा दिया है तो फिर रुका ही नहीं गया." अर्जुन अब उन्हे धीरे से चोद था वो भी ज़्यादा लंड अंदर बाहर किए.

"चल फिर जल्दी से अपना काम ख़तम कर." ताई जी ने बात ख़तम करते ही तेज सिसकी ली और इधर अर्जुन वापिस बुरी तरह से उनकी चुदाई मे लग गया.

"हाए ताईजी ये आपने क्या सीखा दिया. इतना मज़ा है ने इसमे के कभी ज़िंदगी मे ऐसा मज़ा नही मिला. और ये आपके दूध हिलते हुए कितने सुंदर लगतेहै."

"हाए.. मेरी जान निकाल रहा है और बेशर्मी से ऐसी बातें भी कर रहा है. बातें मत कर, ये मज़ा अब वापिस कभी नही मिलेगा." इतराती और सिसकती ललिता जी ने अपने हाथ अर्जुन के चुतड़ों पर रखे और उपर हो अपनी छातियाँ उसके बदन से चिपका चुदाई का मजा लेने लगी.

"अब तो मैं जब भी आप अकेली मिलोगि यही करूँगा."

गान्ड तक उसके अखरोट टकरा रहे थे और चूत किसी नदी की तरह बाहर तक पानी निकाल रही थी. दोनो की सिसकारियो से कमरा गूँज रहा था.

ऐसे ही 20-22 मिनिट तक चोदने के बाद अर्जुन ने उनकी दोनो टाँगे उठा कर लंड जड़ तक अंदर भर दिया. उसके सुपाडे से गुज़रता हुआ गरम लावा सीधा ललिताजी की बच्चेदानी मे उतरने लगा.

"हाए मा. कितना भरेगा मेरी चूत को? इस उमर मे मा बन गई तो ज़िंदगी खराब हो जाएगी." अपने उपर झड़कर गिरे हुए अपने भतीजे के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उन्होने चिंता जताई.

"क्या एक ही बार मे आप मा बन जाओगी?"

"हो सकता है बन भी जाऊ. लेकिन अभी मेरा मासिक 4 दिन पहले ख़तम हुआ है तो उम्मीद कम है. पर याद रखना आगे से अंदर नही डालेगा."

"ठीक है मेरी प्यारी ताईजी . और अब पता चल गया के आगे से आप मुझे रोकॉगी नही." उनके होंठ चूमने के बाद आँख मारकर वो उठ के पाजामा पहन बाहर भाग गया.

"बदमाश. पूरी चूत को फाड़ गया. लेकिन इतना मज़ा भी तो दे गया." दर्द मे मुस्कुराती हुई ललिता जी ने अपनी फटी हुई चूत से भतीजे का गाढ़ा वीर्य बहता देखा तो चेहरे पर चमक आ गई. इतना दर्द तो पहली चुदाई मे भी नही आया था लेकिन मज़ा भी पहली चुदाई से ज़्यादा आज 27 साल बाद मिला था. अपनी ब्रा से छूट सॉफ कर फिर लेट गई वो बिस्तर पर और अर्जुन तयार होकर पार्क की तरफ चल दिया. 5 बज चुके थे.

माधुरी दीदी उठी और बाथरूम से फ्री होकर अपने और अलका के लिए कॉफी बनाने लगी, जिसका आज इम्तिहान था. जितनी बार वो पेशाब करती उनका दिल उतना ही चुदाई के लिए तड़प्ता. रसोईघर मे भी उन्होने अपनी चूत को पाजामे पर से सहलाया और सीसीया गई. "जल्दी कुछ करना पड़ेगा नही तो मरने जैसी हालत हो जाएगी. अब सहा नही जाता रे अर्जुन एक बार फिर से दीदी को जी भर के प्यार कर दे."मन मे सोचती हुई भी वो अर्जुन को पुकार रही थी.

"दीदी बन गई कॉफी?" अलक की आवाज़ आई जो अंदर आ गई थी.

"हा तू अंदर चल मैं लेके आ गई बस 2 मिनिट मे." वापिस मुड़कर अलका को देखा जो एक गुलाबी टीशर्ट और पाजामे मे थी. उसके उभार भी बड़ी दीदी पर ही जा रहे थे. लेकिन लंबाई ज़्यादा और पतली कमर और तीखे नैन नक्श उसको बिल्कुल अलग दिखाते थे. थोड़ी देर बाद दोनो अपने कमरे मे बैठी कॉफी पी रही थी और रेखा जी आँगन की सफाई कर रही थी. रेखा जी सुबह की चाय अपनी जेठानी ललिता जी के साथ पीती थी लेकिन वो अभी तक कमरे से बाहर नही आई थी.

"दीदी, आप उठ गई तो मैं चाय बनाऊ?" वही से उन्होने ललिता जी को आवाज़ दी जो अभी वैसे ही लेटी थी.

"हा रेखा मैं आती हू अभी बाहर." जैसे तैसे हिम्मत कर वो उठी और शरीर पर कपड़े पहन जैसे ही नीचे पैर रखा, उनकी चूत से लेकर पेट तक दर्द और मज़े की लहर दौड़ गई. "ये मरवा देगा मुझे. ग़लती कर दी जो इस घोड़े के नीचे आई. लेकिन हाए कितना मजबूत है और इतना लंबा टिकता है. अभी ही हाल है तो 2-3 साल बाद तो मेरा पेट फाड़ देगा." धीरे से बाहर निकलती हुई वो सोचती रही. हर कदम पर उनकी सिसकी निकल रही थी. टांगे थोड़ी फैल गई थी. कमोड पर बैठी तो चूत से निकलते पेशाब ने तो घी मे आग का काम कर दिया.

उनकी सिसकी इतनी तेज निकली की रेखा ने भी सुन ली थी. "दीदी, क्या हुआ? अभी भी दर्द है क्या?" चिंतित रेखा ने वही से आवाज़ लगाई.

"नही रे. वो तो बस थोड़ा झटका आ गया था कमर मे बैठ ते हुए." तेरे बेटे ने भुर्ता बना दिया इस चूत का क्या ये बताऊ तुझे. ऐसा लग रहा है जैसे चूत के अंदर तक छिल दिया हो."

हल्के हल्के कदमो से चलती वो कुर्सी पर बैठ गई. चाय भी बन गई थी तो रेखा 2 कप लेकर वही उनके पास आ बैठ गई.

"रेखा एक दर्द की गोली तो ला ज़रा. चाय के साथ ले लेती हू नही तो सारा दिन खराब हो जाएगा."

दवाई लेकर कुछ देर वही बैठी रही वो. इतने मे रेखा जी नहा कर कपड़े बदलने वापिस कमरे मे चली गई थी. किसी को पास ना देख कर वो उठकर अपने कमरे की तरफ चलने लगी और उनकी खराब किस्मत.

"मा तुम ऐसे क्यो चल रही हो.? दर्द तो कमर मे था लेकिन आपकी टांगे फैली हुई है?" अलका की बात सुनकर ललिता जी के पैर वही रुक गये.

"अर्रे बेटा वो तेरी मम्मी का पैर आज बाथरूम मे मूड गया था. मैने दवा दे दी है कुछ देर मे वापिस ठीक हो जाएगा." कमरे से बाहर आती रेखा जी ने उसको पूरी बात बताई. अलका फिर बाथरूम मे घुस गई. वो संतुष्ट नही थी चाची के जवाब से.

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पार्क के 2 चक्कर लगाने के बाद आज अर्जुन उन बुजुर्ग मंडली से थोड़ी दूर वही घास पर बैठ गया. 5 लोग हास्य-योग कर रहे थे और एक अकेले शीर्षासन की मुद्रा मे सर घास पे और पाव उपर कर खड़े थे. उनकी नज़र भी इस नये मेहमान पर रुक गई थी. अपना आसन 30 सेकेंड करने के बाद वो खड़े होकर वही अर्जुन के पास आ गये.

"दूसरी बार देख रहा हूँ तुम्हे यहा. हम जैसे बूढ़े लोगो को देख कर क्या मिलेगा. जवान हो तो वैसा ही करो जो जवान लोग करते है. आगे वाले हिस्से मे कई हम उम्र लड़किया दिखेंगी तुम्हे." वो जैसे अर्जुन को टटोल रहे थे. तकरीबन 6'2" कद और चेहरे पे लाली चाय थी. बाल बर्फ से सफेद लेकिन शरीर किसी 40 साल के तंदुरुस्त व्यक्ति सा था.

"वो ऐसा है ना अंकल की मैने एक बुक पढ़ी थी प्राणायाम और योग का महत्व, उसमे जैसा कुछ लिखा था आप लोग भी वैसा ही कुछ कर रहे थे.

बस यही देख मैं आप लोगो की तरफ चला आया. मुझे माफ़ कीजिए अगर मैने यहा आकर आप लोगो को डिस्टर्ब किया हो." वो विस्तार से आने का कारण बता उठने लगा तो उस बुजुर्ग ने उसके कंधे को थपका कर वापिस नीचे बैठने का इशारा किया और खुद भी उसके सामने बैठ गया.

"समझदार और काफ़ी जिग्यासा वाले नौजवान हो. सेहत भी अच्छी है तुम्हारी. देख कर अच्छा लगा के तुम सीखने वाले बच्चे हो. क्या नाम है?"

"जी अर्जुन शर्मा. अब कक्षा ग्यारह मे जाउन्गा. और क्या आप मुझे कुछ बताएँगे इस सब के बारे मे? मैं किसी को ज़्यादा जानता नही हू?"

परिचय देकर अपनी जिग्यासा उसने इन व्यक्ति को कही.

"बेटा मेरा नाम आचार्य परमोद शास्त्री है और मैं 3 साल पहले इस शहर मे आया हू. तकरीबन 46 साल से मैं योगा, हत-योग और प्राणायाम सीख और सिखाता आ रहा हू. तुम्हे अभी ये सब विस्तार से नही जान ना चाहिए. लेकिन मुझे लगता है के शायद कुछ तुम्हारे काम का थोड़ा बहुत मैं तुम्हे बता सकता हू."

"अच्छी बात है, सर. मैं भी अभी कुछ हद तक ही सीखना चाहता हू क्योंकि अगले महीने से स्कूल भी शुरू हो जाएँगे और टाइम भी कम मिलेगा.

परमोद जी उसकी ऐसी भोली बात सुनकर हंस दिए क्योंकि उन्हो ने बात जैसे कही थी अर्जुन को वैसी समझ नही आई थी. कम उमर का होने का शायद ये ही नुकसान था.

"बेटा ध्यान से सुनो. योग मतलब जोड़ (+). जो ये शरीर है हमारे चलने से चलता है, लेटने से लेट जाता है लेकिन ये सब तो हरेक इंसान कर लेता है. परंतु जो योग है ये एक शरीर और उसकी आत्मा या कह सकते हो दिमाग़ का तालमेल है. दोनो के जुड़ने से तुम कुछ अलग हाँसिल कर सकते हो. अच्छा यहा देखो फिर शायद समझ जाओगे." जब उन्हे लगा के ये बातें इस नन्हे दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर ना डाल दे उन्होने उसको बताने से दिखाना उचित समझा. अपना एक हाथ बैठे हुए उन्होने पाँव की चौकड़ी से अंदर करते हुए ज़मीन पर रखा और पूरा शरीर धीरे धीरे ज़मीन से उपर सिर्फ़ उस एक हाथ पर संतुलित हो गया. इतने पर ही वो नही रुके और फिर दोनो टाँगों को ज़मीन के समानांतर हवा मे कर दिया.

"वाह. ये सब आपने कैसे किया. " अर्जुन अचंभित सा उनकी इस मुद्रा को देखता और कभी उनके शांत चेहरे को.

"ये दिमाग़ है ना हम इसके काबू मे रहते है. जब ये कहता है भूख लग रही है तो हम खा लेते है, जब सोने को बोलता है तो सो जाते है. और यही हम को रोकता है इस शरीर के सारे राज जान ने से. एक बार इसको काबू कर लिया बेटा तो तुम फिर सबकुछ हाँसिल कर सकते हो." फिर कुछ रुक कर कहा, "अभी इतना कुछ नही करने की ज़रूरत है तुम्हे. सिर्फ़ अपने खाली समय मे कोशिश करो ध्यान लगाने की. अपनी आँखें बंद कर आसपास की सब आवाज़, शोर को सुनो. धीरे धीरे वही ध्यान लगाओ. जब ऐसा लगे की सब शांत हो गया है तो कुछ देर उस मुद्रा मे रहने की कोशिश करना. सब सीखने मे समय लगेगा. और यहा बैठ कर ताजी हवा मे ज़्यादा से ज़्यादा ऑक्सिजन अपने फेफ्डो मे भरना भी एक अच्छे शरीर के लिए बहुत सही कसरत है."

अब हम कल मिलेंगे, नमस्कार."

"नमस्कार और थॅंक यू वेरी मच."
 
"चल भाई जल्दी चल आज पहला पेपर है." लाल सूट मे किसी गुलाब सी अलका ने अर्जुन को कुर्सी से उठाया और वो भी मुस्कुराता हुआ उनके पीछे चल दिया

"वैसे दीदी इम्तिहान आपका और सज़ा मुझे. ये क्या बात हुई?", अर्जुन को वहाँ रुकना भी था इतनी देर जबतक पेपर ख़तम नही होना था.

"सज़ा के बाद ही तो फिर मज़ा मिलता है." इठलाती हुई वो चुन्नी सर पर कर जा लगी अर्जुन की पीठ से और स्कूटर चल दिया कॉलेज की तरफ.

"वैसे आज कुछ और प्लान है क्या आपका पेपर के बाद?", अर्जुन स्कूटर चलाते हुए भी अलका दीदी मे खोया था. आज तो उसका दिल कर रहा था की बस उनको बाहो मे भर ले सारी दुनिया से बचा कर.

"क्यो? ऐसा तो कुछ नही है. पेपर ही देना है फिर वापिस घर." ये बात भी अलका दीदी ने छेड़ते हुए कही

"ठीक है."

"ओह तो बॉयफ्रेंड को बुरा लग गया? वैसे मैं सोच रही थी के पेपर के बाद तेरे साथ ढेर सारी बातें करूँगी. लेकिन अगर तेरे दिल मे मेरे लिए जगह नही है तो फिर मैं क्या कर सकती हू." अपने छोटे भाई को मनाते हुए अलका उसके पेट पर हाथ फेरने लगी.

थोड़ी देर मे दोनो कॉलेज मे थे. अर्जुन वही पार्क मे बैठ गया और दीदी सामने वाली बिल्डिंग मे चली गई.

आज पार्क लगभग खाली था. शायद एक ही क्लास का पेपर था. पिछली बार के विपरीत इस बार तो कॅंटीन की तरफ भी सन्नाटा ही पसरा था. कुछ 40-45 मिनिट बाद एक जानी पहचानी आवाज़ सुनाई दी. "हीरो आज यहा अकेले अकेले." ये नुसरत थी जो एक बिल्कुल ही तंग सूट पहने उसके पास आ गई थी.

"आज आपका पेपर नही है क्या?", उसने उपर से नीचे तक नुसरत को देखने के बाद पूछा. नुसरत ने भी अर्जुन की आँखों की हरकत देख ली थी.

"अर्रे ये सब्जेक्ट मेरा ऑप्षनल था तो पास होने लायक करके बाहर आ गई. बाकी सब तो अभी डेढ़-2 घंटे तक नही आने वाली." फिर वही बैठ कर पूछा, "कॅंटीन चलेगा मेरे साथ? यहा कुछ करने को है नही तो चल आज मैं तुझे जूस पिलाती हू." अपने होंठ चबाती अगले पल वो उठ खड़ी हुई तो अर्जुन भी साथ हो लिया. पूरी कॅंटीन ही उजाड़ पड़ी थी. काउंटर पर भी एक लड़का था जो शायद समान ठीक कर रहा था.

नुसरत ने बिल्कुल आख़िर की टेबल चुनी और अर्जुन को अंदर धकेलते सी हुई उसके साथ ही बैठ गई. "क्या लेगा बता. आज तेरी सेवा मैं करूँगी."

अर्जुन कुछ ज़्यादा सोच नही पा रहा था. ये ग़लत हो रहा है या सही लेकिन अगले ही पल उसने धीमे से कहा, "एक्सक्यूस मी. हॅव टू गो वॉशरूम. डोंट माइंड"

बोलकर वो बाहर की तरफ निकला और नुसरत ने अपने अनार उसकी कमर से रगड़ दिए. ऐसे ही वो कॅंटीन के गेट के साथ बने वॉशरूम मे गया और अपना मूह पानी से धो कर बाहर आया. रुमाल से सॉफ करते हुए काउंटर पर जा कर उसने एक जूस और एक कोला लिया. वापिस वही आकर बैठ कर नुसरत की तरफ कोला की बॉटल कर दी. अब दोनो आमने सामने थे. नुसरत अर्जुन के इस रवैये से हैरान और चुप थी. वो भी 2 घूँट लेने के बाद वॉशरूम चली गई और यहा अर्जुन ने जूस ख़तम किया और कॉलेज के बाहर आकर खड़ा हो गया. आधे घंटे बाद उसको अलका दीदी बाकी सब लड़कियो के साथ ही बाहर आती दिखी.

आशा और नुसरत भी उनके साथ ही थी.

"तू बाहर क्यू आकर खड़ा हो गया? अंदर मैं तुझे सब तरफ देख कर आई हू."

"वो वहाँ ज़्यादा कुछ करने को था नही तो मैने सोचा के बाहर ही घूम लू. ये जगह भी कुछ खास बुरी नही है." उसने अपना ध्यान सिर्फ़ अलका दीदी पर ही रखा और वही नुसरत और आशा उसको एकटक देख रही थी.

"चलो यहा से मुझे कही ज़रूरी काम भी जाना है." जब अर्जुन को लगा की इस से पहले की नुसरत कोई बात शुरू करे वो यहा से चल दे यही बेहतर रहेगा.

"ठीक है. चल. बाइ नुसरत-बाइ आशा." इतना बोलकर अलका दीदी भी ताज्जुब से उसके पीछे बैठ गई.

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"किसी ने कुछ कहा क्या?"

"अपनी उस फ्रेंड को बोल देना के मुझ से थोड़ा दूर रहे. जिस तरह से वो मुझे देखती है और पास आने की कोशिश करती है मुझे ज़रा भी पसंद नही."

भाई की ये थोड़ी गुस्से मे कही बात अलका ने सुनकर दोनो हाथ उसकी कमर मे डालकर पीछे से ही उसके गाल को चूम लिया.

"और अगर ये सब मैं करू तो क्या तू मुझे भी दूर करेगा?"

"आप तो मेरी जान हो दीदी. और मैं खुद ये चाहता हू के आप ही मेरे साथ ये करो."

"वैसे अर्जुन, वो इतनी भी बुरी नही है." अपनी बाहें थोड़ा और कसते हुए अलका दीदी ने जब ये बात कही तो अर्जुन ने अब थोड़े हल्के मूड मे जवाब दिया

"मैने आपको ये तो नही कहा के वो बुरी है. बस एक सीमा होती है किसी भी चीज़ की. और ये हर इंसान के लिए अलग होती है. आपका तो मेरी जान पर भी हक़ है लेकिन वो आपकी दोस्त है बस यही मैं मानता हू."

"अच्छा बाबा अब गुस्सा मत कर और मुझे किसी ऐसी जगह ले चल जहाँ सिर्फ़ हम दोनो हो और आराम से बातें कर सके."

उनकी ये मीठी बात सुनकर अर्जुन ने स्कूटर नये सेक्टर की तरफ जाने वाली बाहर की सड़क पर ले लिया. 15 मिनिट बाद एक पेड़ के नीचे स्कूटर डबल स्टॅंड पर लगा था और अलका दीदी सीट पर बैठी थी. अर्जुन उनके सामने खड़ा था बिल्कुल पास. यहा इस वक़्त तो दूर तक कोई परिंदा भी नही था लेकिन पेड़ होने से धूप उन दोनो पर नही गिर रही थी.

"वैसे जगह अच्छी लेकर आया है तू. यहा कब आया?"

"वो रोज सुबह आता हू ना दौड़ लगाने तो यही तक आता हू. और मुझे लगा कि इस से शांत कौन सी जगह होगी."

अलका बड़े प्यार से अर्जुन को देख रही थी जिसका सर बिल्कुल उसके मूह के उपर था. अर्जुन भी खड़े हुए दीदी को ही देख रहा था. उनके बाल एक रब्बर बॅंड के नीचे बिल्कुल सीधे थे और खुले होने के बावजूद सलीके से बिल्कुल पीठ की सीध मे थे. लाल सूट इतना टाइट था की उनके उभार ज़्यादा बाहर निकले थे और पेट बिल्कुल अंदर लग रहा था.

उपर वाला होंठ देख अर्जुन ने दीदी का सर दोनो हाथो मे थाम हल्के से दोनो होंठो मे लेकर चूम लिया.

"ये क्या हरकत थी?" ऐसे खुले मे अपने भाई द्वारा चूमने से दीदी थोड़ा घबरा गई लेकिन उन्हे उसकी हिम्मत और प्यार देख कर अच्छा भी लगा.

"दीदी यहा आओ आप." इतना कहकर वो उन्हे पेड़ के पीछे बने पेड़ो के बड़े से झुंड के बीच ले गया. तकरीबन 15-16 सफेदे के सीधे लंबे और मोटे पेड़ एक साथ थोड़े से हिस्से मे लगे थे. आसपास छाया दार पेड़ भी थे जो इन सफेदो के सामने थे.

अर्जुन ने दीदी को एक पेड़ से सटा दिया.

"यहा से तो हमें कोई नही देखेगा ना?" अभी इतना ही कहा था उसने की दीदी ने उसको ऐसे खड़े हुए ही अपने पर खींच लिया. और बेहद जोश से उसके पूरे चेहरे को चूमने के बाद अब वो उसके होंठ चूमने लगी. अर्जुन का एक हाथ खुद ही अपने एक उभार पर रख दिया. दोनो जैसे दुनिया भुला कर एक दूसरे का मुखरस पीने लगे.

ये चुंबन इतना गहरा और लंबा था कि कब अर्जुन के हाथ सलवार के अंदर जा अलका दीदी के चूतड़ मसलने लगे

उन्हे पता ही ना चला. इधर अलका दीदी के हाथ भी टीशर्ट के अंदर से अर्जुन की पीठ को दबाते हुए उसको अपने सीने से भीच रही थी. जब साँस उखड़ने लगी तो दोनो अलग हुए लेकिन अर्जुन के हाथ वही थे. और अब तो वो हल्के हल्के से गान्ड की दरार मे दोनो हाथ डाल कर अलग अलग हिस्से को टटोल रहा था दबा रहा था. उसका लंड अलका दीदी की चूत से थोड़ा उपर ठोकर मार रहा था.

सलवार थोड़ी खुली थी नीचे से तो हाथ चुतड़ों से नीचे जाकर चूत के अंतिम सिरे तक आ गये. यहा दीदी की कच्छी जो पीछे से गान्ड की दरार मे फसी थी ठीक चूत के उपर थी.

"आ भाई मत कर यहा. अभी ये ठीक नही है.", अलका दीदी तो कब से चाहती थी के अर्जुन उन्हे दबाए, कपड़े उतार के उन्हे चूमे, चूमे और जी भर के प्यार करे. लेकिन एक तो ये वैसी जगह नही थी और दूसरा वो चाहती थी की उनकी चुदाई आराम से हो और बिस्तर पर हो ना की किसी सुनसान जंगल सी जगह जहाँ लेटने की जगह भी ना हो.

"मैं तो बस हाथ लगा कर देख रहा था कि आपकी वहाँ से कैसी है. उस दिन आपने मेरे किया था जैसे." और फिर एक बार दोनो एक लंबे चुंबन मे उलझ गये. अलग होने के बाद साँसें दुरुस्त कर दोनो स्कूटर पर बैठ गये. अलका दीदी ने अपना सूट भी ठीक किया जो अर्जुन के मसलने से थोड़ा अपनी जगह से उठ गया था.

"अब चले दीदी?" और उनकी हाँ सुनते ही दोनो घर चल दिए..
 
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