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दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने झुक कर उनके होंठ चूमे और कपड़े पहन लिए. दीदी ने भी जैसे तैसे कपड़े पहने और अर्जुन को जाता देख वापिस वही लेट गई.
……………………………………..
अभी शरीर बिल्कुल हल्का महसूस हो रहा था और अर्जुन को उम्मीद थी की आज फिर पार्क मे प्रीति आएगी और वो उसके साथ बात करेगा. कुछ देर बाद वो पार्क के अंदर था. आज भी बुजुर्ग मंडली वही थी जिन्होने मुस्कुरा कर अर्जुन का अभिवादन किया और उसने भी भागते हुए ही प्रतिउत्तर मे गर्दन हिला दी. पता ही
नही चला कब वो 5 चक्कर पूरे कर चुका था. थकान ज़रा भी नही थी लेकिन आचार्य जी को अकेले टहलते देख उनकी तरफ हल्के कदमो से बढ़ गया.
"नमस्कार सर."
"कैसे हो बेटा. सब कुशल मंगल?" उन्होने ये बात कही तो अर्जुन ने सिर्फ़ हा मे सर हिलाया.
"ये वृक्षो को देख रहे हो. कितने दयालु होते है ये. हम इंसानो को ज़िंदगी भर फल, छाया, जीवदायिनी हवा और फिर मरने के उपरांत लकड़ी देते है.
हम सिर्फ़ इनको एक बार पानी देकर अपना कर्तव्य पूरा समझ बस इनसे ही आशा करते रहते है."
"आचार्य जी वृक्ष हमें प्यार देते है और हमारी वासना उनके प्रति जीवन भर रहती है." अर्जुन ने उनके पिछले पाठ को आज उनकी बात से जोड़ दिया था.
"सही बात कही बेटा." उन्होने नंगे पाव ही घास पर चलते हुए अर्जुन के कंधे पर हाथ रख लिया और एक फुलो से लदी डाल दिखाने लगे.
"ये खूबसूरत फूल देख रहे हो बेटा. यहा देखो तितलियाँ और मधुमाखिया मंडराती है लेकिन किसी नीम या बबुल के पेड़ पर तुमने कभी उन्हे देखा है?"
"नही सर. उनको फुलो से पराग लेना होता है जो उनका भोजन और जीवन का आधार रहता है." अर्जुन की ये ख़ास बात थी की हर विषय को महत्व से समझा था उसने. सिर्फ़ रट् मार कर प्रथम आने वाला लड़का नही था.
"बहुत खूब बात कही. अब इस बात को इंसान की जिंदगी से जोड़कर देखो. और बताओ क्या समझे."
अर्जुन ने काफ़ी देर इस बात पर विचार किया. उसको बात समझ आ रही थी लेकिन सही शब्द नही मिल पा रहे थे.
"ज़्यादा मत सोचो बेटा. जिसको ज़रूरत होती है वो उसके पास ही जाता है जो उसको पूरा कर सकता है. लेकिन फरक है एक पहले वाली बात और इस बात मे. एक मधुमखी पराग लेने के बावजूद फूल को नुकसान नही देती. वो बदले मे उसके नन्हे बीज ज़मीन पर बिखेर उन पेड़ो का विस्तार करती है. आज का पाठ यही
है. निस्वार्थ प्रेम करो इन वृक्षो की तरह. और अगर तुम्हे लगता है की इस प्रेम मे तुम्हे सामने वाली से लेना पड़े तो इतना ज़रूर करना की उनके चरित्र का अच्छा विस्तार हो, आत्मा को सुकून मिले और तुम उनकी अपेक्षा पर खरे उतरो. स्वार्थ प्यार को ही नहीं उस व्यक्ति को भी ख़तम कर देता है. जब एक घड़ा पानी चाहिए होता है तो सिर्फ़ उतना ही लेना चाहिए. अन्यथा तुमने तो सुना होगा की ज़्यादा के चक्कर मे नदी की दीवार देह जाती है तो खेत और नदी का वो भाग दोनो बर्बाद हो जाते है." कहते हुए वो वहाँ से आगे बढ़ चले और अर्जुन उनके साथ चलता रहा.
"कोई प्रश्न चल रहा है दिमाग़ मे बेटा?" उन्होने उसको चुप देखा तो पूछ लिया
"सर, एक सवाल परेशान कर रहा है कुछ दिनों से."
"बेटा मैं तो अंतर्यामी हूँ नही. और जीतने समस्या बताई ना जाए तो उसका हाल नही होगा." मुस्कुरा दिए
"अगर ज़िंदगी मे पहले कुछ भी घटा हो लेकिन फिर समय बीत जाए और तब तक सब ठीक हो तो क्या उन पुरानी बातो पर विचार कर के कुछ हाँसिल होगा?"
"तुम क्या चाहते हो?" उन्होने पलट कर सवाल कर दिया.
"मैं सिर्फ़ सच और उस सब बात के पीछे का कारण जान ना चाहता हूँ."
"सच क्या होता है बेटा? सच और झूठ जैसा कुछ नही होता अमूमन. एक इंसान किसी बात को अलग तरीके से कहता है. लेकिन दूसरे ने अगर वो वैसा नही पढ़ा हो तो वो उसको झूठ कहेगा. दोनो मे से कोंन सॅचा कोंन झूठ उसको फिर लोगो का मत (वोट) साबित करता है. लेकिन क्या यही सब सच है? जिसने तुम्हारे अतीत मे जो भी किया हो उसके पीछे कुछ मकसद रहा होगा. ज़रूरी नही के हर व्यक्ति जो तुम्हे दुख दे वो तुम्हारा दुश्मन हो और जो तुम्हारे साथ हर वक्त मीठी बातें करे वो दोस्त. ऐसी बातें मन को विचलित करती है, इसको काबू करना सीखो. अतीत से सिर्फ़ मीठी यादें ही लेना सही है और या फिर ग़लतियो से सीखना."
अर्जुन अब निरुत्तर था. वो भी तो अब जो सब कुछ हुआ उसको बदल नही सकता था. और जो भी ज़िंदगी मे उसके पिता ने किया था उसके साथ वो भी तो किसी बात को ध्यान मे रख कर किया होगा. संजीव भैया ने भी कहा था कि जब मैं पैदा हुआ तो उनको मुझमे उम्मीद नज़र आई थी. आज यही सब है जो मैं इतने अच्छे से पढ़ पा रहा हूँ और ये शरीर जो पैदा होने पर रोगी था वो आज स्वस्थ है.
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अभी शरीर बिल्कुल हल्का महसूस हो रहा था और अर्जुन को उम्मीद थी की आज फिर पार्क मे प्रीति आएगी और वो उसके साथ बात करेगा. कुछ देर बाद वो पार्क के अंदर था. आज भी बुजुर्ग मंडली वही थी जिन्होने मुस्कुरा कर अर्जुन का अभिवादन किया और उसने भी भागते हुए ही प्रतिउत्तर मे गर्दन हिला दी. पता ही
नही चला कब वो 5 चक्कर पूरे कर चुका था. थकान ज़रा भी नही थी लेकिन आचार्य जी को अकेले टहलते देख उनकी तरफ हल्के कदमो से बढ़ गया.
"नमस्कार सर."
"कैसे हो बेटा. सब कुशल मंगल?" उन्होने ये बात कही तो अर्जुन ने सिर्फ़ हा मे सर हिलाया.
"ये वृक्षो को देख रहे हो. कितने दयालु होते है ये. हम इंसानो को ज़िंदगी भर फल, छाया, जीवदायिनी हवा और फिर मरने के उपरांत लकड़ी देते है.
हम सिर्फ़ इनको एक बार पानी देकर अपना कर्तव्य पूरा समझ बस इनसे ही आशा करते रहते है."
"आचार्य जी वृक्ष हमें प्यार देते है और हमारी वासना उनके प्रति जीवन भर रहती है." अर्जुन ने उनके पिछले पाठ को आज उनकी बात से जोड़ दिया था.
"सही बात कही बेटा." उन्होने नंगे पाव ही घास पर चलते हुए अर्जुन के कंधे पर हाथ रख लिया और एक फुलो से लदी डाल दिखाने लगे.
"ये खूबसूरत फूल देख रहे हो बेटा. यहा देखो तितलियाँ और मधुमाखिया मंडराती है लेकिन किसी नीम या बबुल के पेड़ पर तुमने कभी उन्हे देखा है?"
"नही सर. उनको फुलो से पराग लेना होता है जो उनका भोजन और जीवन का आधार रहता है." अर्जुन की ये ख़ास बात थी की हर विषय को महत्व से समझा था उसने. सिर्फ़ रट् मार कर प्रथम आने वाला लड़का नही था.
"बहुत खूब बात कही. अब इस बात को इंसान की जिंदगी से जोड़कर देखो. और बताओ क्या समझे."
अर्जुन ने काफ़ी देर इस बात पर विचार किया. उसको बात समझ आ रही थी लेकिन सही शब्द नही मिल पा रहे थे.
"ज़्यादा मत सोचो बेटा. जिसको ज़रूरत होती है वो उसके पास ही जाता है जो उसको पूरा कर सकता है. लेकिन फरक है एक पहले वाली बात और इस बात मे. एक मधुमखी पराग लेने के बावजूद फूल को नुकसान नही देती. वो बदले मे उसके नन्हे बीज ज़मीन पर बिखेर उन पेड़ो का विस्तार करती है. आज का पाठ यही
है. निस्वार्थ प्रेम करो इन वृक्षो की तरह. और अगर तुम्हे लगता है की इस प्रेम मे तुम्हे सामने वाली से लेना पड़े तो इतना ज़रूर करना की उनके चरित्र का अच्छा विस्तार हो, आत्मा को सुकून मिले और तुम उनकी अपेक्षा पर खरे उतरो. स्वार्थ प्यार को ही नहीं उस व्यक्ति को भी ख़तम कर देता है. जब एक घड़ा पानी चाहिए होता है तो सिर्फ़ उतना ही लेना चाहिए. अन्यथा तुमने तो सुना होगा की ज़्यादा के चक्कर मे नदी की दीवार देह जाती है तो खेत और नदी का वो भाग दोनो बर्बाद हो जाते है." कहते हुए वो वहाँ से आगे बढ़ चले और अर्जुन उनके साथ चलता रहा.
"कोई प्रश्न चल रहा है दिमाग़ मे बेटा?" उन्होने उसको चुप देखा तो पूछ लिया
"सर, एक सवाल परेशान कर रहा है कुछ दिनों से."
"बेटा मैं तो अंतर्यामी हूँ नही. और जीतने समस्या बताई ना जाए तो उसका हाल नही होगा." मुस्कुरा दिए
"अगर ज़िंदगी मे पहले कुछ भी घटा हो लेकिन फिर समय बीत जाए और तब तक सब ठीक हो तो क्या उन पुरानी बातो पर विचार कर के कुछ हाँसिल होगा?"
"तुम क्या चाहते हो?" उन्होने पलट कर सवाल कर दिया.
"मैं सिर्फ़ सच और उस सब बात के पीछे का कारण जान ना चाहता हूँ."
"सच क्या होता है बेटा? सच और झूठ जैसा कुछ नही होता अमूमन. एक इंसान किसी बात को अलग तरीके से कहता है. लेकिन दूसरे ने अगर वो वैसा नही पढ़ा हो तो वो उसको झूठ कहेगा. दोनो मे से कोंन सॅचा कोंन झूठ उसको फिर लोगो का मत (वोट) साबित करता है. लेकिन क्या यही सब सच है? जिसने तुम्हारे अतीत मे जो भी किया हो उसके पीछे कुछ मकसद रहा होगा. ज़रूरी नही के हर व्यक्ति जो तुम्हे दुख दे वो तुम्हारा दुश्मन हो और जो तुम्हारे साथ हर वक्त मीठी बातें करे वो दोस्त. ऐसी बातें मन को विचलित करती है, इसको काबू करना सीखो. अतीत से सिर्फ़ मीठी यादें ही लेना सही है और या फिर ग़लतियो से सीखना."
अर्जुन अब निरुत्तर था. वो भी तो अब जो सब कुछ हुआ उसको बदल नही सकता था. और जो भी ज़िंदगी मे उसके पिता ने किया था उसके साथ वो भी तो किसी बात को ध्यान मे रख कर किया होगा. संजीव भैया ने भी कहा था कि जब मैं पैदा हुआ तो उनको मुझमे उम्मीद नज़र आई थी. आज यही सब है जो मैं इतने अच्छे से पढ़ पा रहा हूँ और ये शरीर जो पैदा होने पर रोगी था वो आज स्वस्थ है.