• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest लंड के कारनामे - फॅमिली सागा

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
गाँव में पहुँच कर मुझे एक अलग तरह की हवा की खुशबू आ रही थी, हो भी क्यों न, आस-पास के खेतो से आती मिटटी की खुशबू और पेड़ो और पोधो पर लगे फल-फुल तरह-२ की खुशबू बिखेरकर मौसम को बड़ा मजेदार बना रहे थे.

दादाजी का घर गाँव के बीचो-बीच था, और काफी बड़ा था, उनके बड़े से घर में 3 कमरे नीचे और दो ऊपर थे, घर के पीछे वाला हिस्सा गाये और मुर्गियों के लिए रखा हुआ था.

दरवाजा खडकाने के थोड़ी ही देर बाद एक चालीस साल की औरत ने दरवाजा खोला

दादाजी : "आओ बेटा...ये दुलारी है , घर और गायों की देखभाल के लिए.. और दुलारी ये है मेरा पोता और पोती..मेरे दिल्ली वाले बड़े बेटे के बच्चे.."

दुलारी : "हाय..दैया...कितने बड़े हो गए है...पांच साल पहले देखा था इन्हें...लालाजी तुम भी न, पहले बता तो देते की बच्चे भी आ रहे है, कमरा साफ़ करवा देती..अब कैसे करेंगे..कहाँ सोयेंगे ये दोनों..."

दादाजी : "अरी , तू फिकर मत मर, आज ये मेरे कमरे में सो जायेंगे, तो इनके कमरे सुबह साफ़ कर देना..चल अब खाना लगा , बड़ी भूख लगी है.."

हम सभी अन्दर आये, दादाजी का कमरा काफी बड़ा था, बीच में एक बड़ा सा लकड़ी का बेड था और कोने में काफी जगह थी, जहाँ आराम से सोया जा सकता था...

हमने खाना खाया.

दादाजी : "अरी दुलारी..रूपा कहा है..सो गयी क्या.."

दुलारी : " हा लालाजी..कहो तो उठा दू.."

दादाजी : "नहीं रहने दे..ये बच्चे मिलने को उतावले हो रहे थे बस.."

दादाजी मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिए..

मैं भी दादाजी की बात सुनकर , ऋतू की तरफ देखकर, मुस्कुराने लगा.

मैंने नीचे बिस्तर लगा लिया, काफी थक गया था..ऋतू भी मेरे पास आकर सो गयी, पर थके होने की वजह से सिर्फ एक दो किस करी और लिपट कर सो गए.

*****

सुबह मेरी नींद 6 बजे खुल गयी..ऋतू मेरे पास नहीं थी..मैंने ऊपर पलंग पर देखा, वो दादाजी के साथ लिपट कर सो रही थी..और वो भी पूरी नंगी..

यानी रात को मेरे सोने के बाद उसकी चूत में खुजली हुई होगी..और वो दादाजी से चुदकर सो गयी होगी.

मेरी नींद तो खुल ही चुकी थी, मैंने सोचा की सुबह-२ गाँव की सेर करी जाए, और ये सोचकर मैं बाहर निकल गया.

हमारे दादाजी का काफी बड़ा आम का बगीचा है, और आम का सीजन अभी चल ही रहा है, इसलिए काफी ज्यादा आम लगे हुए थे.

मैं बगीचे में टहलने लगा.

मैंने देखा एक लड़की बगीचे के आम इकठ्ठा कर रही है..

मैं : "ऐ..क्या कर रही है तू.."

और जैसे ही वो मेरी तरफ पलती, मैं आँख झपकाना भूल गया..इतनी सुन्दर लड़की, हमारे गाँव में हो सकती है, मैंने कल्पना भी नहीं की थी..

मैं : "ऐ...आम चुरा रही है क्या.."

लड़की : "तू कोन होता है पूछने वाला.."

मैं : "मैं यहाँ के मालिक का पोता हु..अशोक नाम है मेरा."

लड़की (ख़ुशी से..) : अरे आशु साब...आप..मैंने तो आपको पहचाना ही नहीं...अम्मा ने बताया तो था सुबह की आप और ऋतू दीदी भी आये है, लालाजी के साथ, ...कैसे हो आप...मुझे भूल गए क्या..मैं रूपा..वो दुलारी काकी की बेटी..."

मैं : "अरे रूपा तू...कितनी सुन्दर हो गयी है तू अब..."

मेरी बात सुनकर वो शर्मा कर रह गयी.. और मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए उसके हुस्न का रसपान करना शुरू कर दिया.

उसने लाल रंग का घाघरा और सफ़ेद रंग का टॉप पहना हुआ था, कमर वाला हिस्सा अन्दर की और, बाकी ऊपर से छाती और नीचे से गांड दोनों बाहर की और निकले हुए थे.

उसके होंठो के ऊपर एक मोटा सा तिल था, जिसके बारे मैं ये सोचकर की इसे चूसने में कितना मजा आएगा, मेरा मुंह भर आया..

रूपा : "क्या देख रहे हो साब...मुझे माफ़ कर दो...मैंने आपको उल्टा सीधा बोल दिया...वैसे मैं ये आम इकठ्ठा कर रही थी.. रोज रात को जो आम नीचे गिरते हैं, वो वहां कोठरी में जमा कर देती हु, और शाम को मण्डी वाले आकर ले जाते हैं...लालाजी के पास सारा हिस्साब रोज पहुंचा देती हु मैं...आप पूछ लेना उनसे..

मैं : "अरे नहीं...मैं भी शायद तुम्हे गलत समझ बैठा था..वैसे तुमसे मिलकर अच्छा लगा."

रूपा : "चलो फिर इसी बात पर आम पार्टी हो जाए...आपको याद है न की हम पहले कितने आम खाया करते थे."

मैं याद करने लगा, रूपा और मैं, आम इकठ्ठा करके, उन्हें खाते थे और फिर पास के तालाब में जाकर नहाते थे..बड़े मजे के दिन थे वो भी.

मैं : "हाँ याद है रूपा...चल शुरू करते हैं.."

रूपा ने पास की चारपाई पर पके हुए आम का ढेर लगा दिया और हम दोनों पानी से धोकर, आम खाने लगे..जो जितने ज्यादा आम खायेगा, वही जीतेगा, यही होता था पहले तो..

मैं आम खाता जा रहा था और मेरी नजर रूपा के पके हुए आमो पर थी...यानी उसके मोटे-ताजे मुम्मो पर..जिन पर आम का रस गिरकर अपना गीलापन छोड़ रहा था..मन तो कर रहा था की इसी चारपाई पर उसे लिटा दू और उसके आम चूस लू..

पर वो अल्हड सी लड़की मेरी कामुक नजरो से बेखबर, आम चूसने में लगी हुई थी, मानो ये आम चुसो प्रतियोगता जीतकर वो गोल्ड मेडल लेना चाहती हो.. और आखिर में वो जीत ही गयी..

रूपा : "हुररेईsssssssssssssssss........................... मैं जीत गयी..."

मैं मुस्कुरा कर रह गया.

मेरी नजर अभी भी उसके आम रस से सने हुए टॉप पर थी..

उसने मेरी नजरो का पीछा किया और कपडे पर आम गिरा देखकर वो बोली : "हाय दैय्या...मर गयी...अम्मा मारेगी आज भी..कल भी डांट पड़ी थी, कह रही थी की इतनी बड़ी हो गयी है, पर आम खाने की अक्ल अभी तक नहीं आई."

मैं : "चलो फिर, तालाब में जाकर साफ़ कर लो इसे.."

रूपा : "हाँ चलो...जल्दी चलो."

वो उठ कर तालाब की तरफ भागने लगी.. मैं भी उसके पीछे की और चल दिया.

तालाब हमारे बगीचे के साथ ही है, उसके दूसरी तरफ घना जंगल शुरू हो जाता है.
 
तालाब में पहुँचते ही रूपा ने बिना किसी झिझक के अपना टॉप उतार दिया..नीचे उसने ब्रा तो नहीं पर कपडे की बनियान सी पहनी हुई थी..जिसमे उसके दोनों खरबूजे समा पाने में असमर्थ से थे. वो अपने टॉप को पानी में धोने बैठ गयी, घाघरे को उसने ऊपर तक उठा कर लपेट लिया और नीचे बैठ कर उसे धोने लगी, उसकी कसी हुई पिंडलिया , जिनपर एक भी बाल नहीं था, पानी में भीग कर चमकने लगी.

रूपा ने अपने टॉप को सुखाने के लिए पेड़ के ऊपर टांग दिया.

उसकी हरकतों से पता चल रहा था की वो शरीर से तो जवान हो चुकी है पर दिमाग से वो अभी तक अल्हड सी, नासमझ है..इसलिए मेरे सामने ही उसने बिना किसी झिझक के अपना टॉप उतार दिया,

उसके गले से झांकते हुए मोटे-ताजे फलो को देखकर मैं उनकी नरमी का अंदाजा लगाने में व्यस्त था..मैंने सोच लिया की आज इसके साथ मजे ले ही लिए जाए, जितना लेट करूँगा, नुक्सान मेरा ही होगा..मैंने कुछ सोचकर अपने कपडे उतारने शुरू कर दिए..

रूपा : "लगता है आपको पुराने दिन याद आ गए, जब हम सभी यहीं नहाया करते थे...है न साब..."

मैं : "हाँ..और आज इतने सालो के बाद मैं फिर से नहा कर अपनी यादो को ताजा करना चाहता हु.."

मैंने एक-एक करके सारे कपडे उतार दिए..और अंत में अपना अंडरवीयर भी...

मैंने तिरछी नजरो से रूपा की तरफ देखा..वो पहले तो मुझे नंगा होते देखकर मुस्कुराती रही...पर जब मैंने अपना अंडरवीयर उतारा तो उसकी साँसे रुक सी गयी...उसे शायद उम्मीद नहीं थी की मैं पूरा नंगा होकर नहाऊंगा, जैसे मैं पहले नहाता था.. पानी के अन्दर जाकर मैंने तेरना शुरू कर दिया...और फिर वापिस आकर मैंने अन्दर से ही रूपा से कहा..

"अरे रूपा, तू नहीं आ रही क्या...चल न..आ जा.."

अब वो बेचारी धरम संकट में थी, उसने पहले तो बड़े चाव से बोल दिया था नहाने के लिए, पर मुझे नंगा नहाते देखकर, वो दुविधा में थी की वो ऐसे ही आये या नंगी होकर..

रूपा : "नहीं..आप नहा लो साब...मैं अभी नहीं..."

मैं : "अरे शर्माती क्यों है तू...यहाँ मेरे अलावा कौन है...चल जल्दी से आ जा..बड़ा मजा आ रहा है यहाँ..." कोई और चारा न देख उसने झिझकते हुए अपने कपडे उतारने शुरू किये..घाघरा उतारकर उसने एक कोने में रख दिया..और फिर अपनी बनियान भी उतार डाली..और आखिर में अपनी चड्डी भी..

भगवान् कसम...ऐसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी थी...इतनी सुन्दर, जवानी कूट-2 कर भरी हुई थी उसमे... वो पानी के अन्दर आई...और मेरे पास आकर खड़ी हो गयी.

रूपा : "साब...देखो अम्मा को मत बताना...उन्होंने पहले भी मुझे कई बार बिना कपडे के..और दुसरो के साथ नहाने को मना किया है..."

मैं : "तो फिर मेरे साथ क्यों नहा रही है अब.."

रूपा : "आपकी बात और है..मुझे तो ये सब अच्छा लगता है..और जब आपने शर्म नहीं की तो फिर मैं क्यों शरमाऊँ.."

मैंने उसके मुंह पर पानी फेंकना शुरू कर दिया. वो भी किलकारी मारकर मेरे साथ पानी में खेलने लगी..

मैंने उसे इधर उधर से छुना शुरू कर दिया..जिसका उसने कोई विरोध नहीं किया...और मैंने हिम्मत करके उसके पीछे से जाकर, उसे पकड़ लिया, मेरा तना हुआ लंड उसकी जांघो के बीच से होता हुआ आगे की तरफ निकल आया.. उसके मुंह से एक सिसकारी सी निकल गयी..

मैं : "अब बोल....अब कहाँ जायेगी..."

वो मेरे हाथो से छुटने का असफल प्रयास कर रही थी...पर हर झटके से मेरे हाथ फिसल कर कभी उसकी चूत के ऊपर तो कभी उसके उभारों से टकरा जाते...जिसकी वजह से उसकी लड़ने की शक्ति कमजोर सी पड़ जाती..

मैंने हिम्मत करके उसके एक चुचे को अपने हाथो में पकड़ा और मसल दिया. रूपा की चीख निकल गयी..वो मुड़ी और मैंने उसके होंठो पर एक जोरदार किस्स करते हुए उसकी चूत के अन्दर हाथ डालने की कोशिश करने लगा...

रूपा ने मुझे धक्का दिया और मैं तालाब के किनारे की दलदल वाली मिटटी के ऊपर पीठ के बल गिर गया..

रूपा मेरे सामने पूरी नंगी खड़ी थी, उसकी छाती तेज सांस लेने की वजह से ऊपर नीचे हो रही थी.

रूपा : "साब...बड़े बदमाश हो गए हो तुम तो...मुझे सब मालुम है की तुम क्या कर रहे थे...इतनी भी नासमझ नहीं है ये रूपा.."

मैं : "क्यों, तुझे अच्छा नहीं लगा क्या..."

रूपा : "मुझे अच्छा नहीं लगा...!! ये सब के लिए तो मैं ना जाने कब से तड़प रही थी...मेरी सहेली है एक, कम्मो, वो सब बताती है मुझे, और करने को भी उकसाती है... वो तो अम्मा ने मेरे ऊपर ना जाने कितने पहरे लगा रखे हैं...वर्ना गाँव का हर इंसान, बुड्डे से लेकर जवान तक, मेरे पीछे घूमते हैं...मेरी भी इतनी इच्छा होती है, मजे करने की, पर गाँव छोटा है साब, अम्मा का मैं ही सहारा हु, बदनाम होकर हम दोनों कहाँ जायेंगे..बस इसलिए अपने आप पर काबू रखा हुआ है...पर आज नहीं रुक सकती मैं..आज नहीं... और ये कहते हुए उसने मेरे ऊपर छलांग लगा दी. मेरा सर सिर्फ तालाब के पानी के किनारे पर होने की वजह से बाहर था, बाकी का हिस्सा दलदल वाले पानी के अन्दर था..वो मेरे ऊपर आई और मेरे होंठो के ऊपर झुककर उन्हें चूसने लगी... उसके मुंह से अभी भी आम की खुशबू आ रही थी...मैंने उसके दोनों आम को पकड़ा और उन्हें मसलते हुए, मुंह के जरिये उनकी खुशबू लेता हुआ, उसके नर्म और मुलायम होंठो को चूसने लगा.

"ओह्ह्ह ह्ह्ह् साब्ब ..........अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ......पहली बार आज मेरी छाती को किसी ने छुआ है....चूस डालो इन्हें आज...आम की तरह चुसो मेरी छातियों को...खा जाओ....ना.....अह्ह्हह्ह्ह्ह......"

मेरे मुंह पर उसकी ठोस चूचीयाँ किसी गेंद की भाँती दबाव डाल रही थी...उसके दोनों निप्पल बड़े ही टेस्टी थे...मुझे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था की पहले ही दिन मुझे रूपा के रूप का खजाना लुटने को मिल गया...मैं भी अपना मुंह खोलकर पुरे मजे लेकर, उसे चूसने और चाटने में लगा हुआ था. मैंने पलटकर उसे नीचे कर दिया...दलदली मिटटी के ऊपर आते ही उसने मेरी कमर के चारो तरफ अपनी नंगी टाँगे लपेट दी... मैंने उसके दोनों हाथ नीचे दबाकर उसकी गर्दन को चुसना शुरू कर दिया..वो मेरे नीचे पानी के अन्दर मछली की तरह तड़प रही थी...

मेरा लंड उसकी चूत के ऊपर ठोकरे मार रहा था...और वो भी अपनी चूत ऊपर करके मेरे लंड को निगलने के लिए उत्साहित सी हो रही थी... मैंने उसकी चूत के ऊपर अपना लंड टिकाया ..वो थोड़ी देर के लिए मचलना भूल गयी...पर जैसे ही मैंने उसके अन्दर थोडा लंड का दबाव डाला..वो फिर से मचलने लगी...

"अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ...बाबु .....आराम से....जरा....कोरी है अभी मेरी चूत.....अह्ह्ह्ह"

पर मैं नहीं रुका..मैंने अपना लंड निकाला और एक तेज शोट मारा, अब मेरा लंड उसकी झिल्ली को फाड़ता हुआ अन्दर तक चला गया... मेरे लंड पर गर्म खून का एहसास होते ही मुझे पता चल गया की उसकी चूत फट चुकी है..मैं मन ही मन गिनती करने लगा की मैंने आज तक कितनी कुंवारी छुते फाड़ी है...पर ये वक़्त इन सब हिसाब किताब का नहीं था...

मैंने नीचे की और देखा, मेरे लंड के आस पास का पानी लाल रंग का हो चूका था, उसकी चूत से निकलता खून बाहर आने लगा था... वो अपनी आँखे बंद किये मेरे अगले धक्के का इन्तजार कर रही थी..और जब मैंने अगला धक्का मारा तो मेरा पूरा लंड उसकी चूत के अन्दर तक जाकर गड़ सा गया...और फिर मैंने उसे बाहर खींचा और फिर अन्दर...इसी तरह से लगभग 10 -15 धक्को के बाद मेरा लंड पानी की वजह से, बड़े आराम से उसकी चूत के अन्दर बाहर निकलने लगा...

अब वो भी मजे ले लेकर मुझसे चुदवा रही थी..

"अह्ह्ह्हह्ह ओह्ह्ह्हह्ह आशु साब.....मजा आ गया.....मम्म.....कम्मो ठीक कहती थी....इतना मजा आता है चुदाई में......अब तो रोज मजे लुंगी....अह्ह्हह्ह .....अह्ह्हह्ह.......और जोर से मारो....मेरी कुंवारी चूत को....अह्ह्ह्ह......ओह्ह्ह्ह साब........" और पहली बार चुदने की वजह से वो ज्यादा उत्तेजित होकर जल्दी ही झड़ने लगी...

मैंने अपना लंड आखिरी वक़्त में बाहर निकाल लिया... मैं उसकी चूत में झड़कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था... और मैंने अपने लंड को पकड़कर उसके चेहरे को भिगोना शुरू कर दिया...जिसे उसने मंद मंद मुस्कुराकर, अपने पर गिरते हुए महसूस किया...

पानी में थोड़ी देर तक पड़े रहने के बाद मैं साफ़ होकर बाहर आया और वहीँ एक चट्टान पर बैठ गया..वो भी मेरे पीछे आई, उसकी चाल में एक अजीब सी मादकता आ चुकी थी..वो भी मेरी गोद में आकर बैठ गयी.

मैं : "तुम्हे बुरा तो नहीं लगा न...हम इतने सालो के बाद आज मिले हैं , और पहले ही दिन मैंने..."

रूपा ने मेरे होंठो पर ऊँगली रख दी..

रूपा : " देखो साब...बचपन में हमने बच्चो वाले खेल खेले..और आज जवानी में हमने जवानों वाले खेले..तो इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है...मुझे तो आपका शुक्रिया करना चाहिए..इतने मजे आते है इस खेल में, मुझे आज एहसास हुआ..अब आप देखना, जब तक यहाँ हो, मैं कैसे मजे देती हु आपको..."

मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया..

उसके बाद हमने कपडे पहने और वापिस घर की तरफ चल दिए...

*****
 
घर मे आते ही दुलारी काकी ने जब रूपा को मेरे साथ देखा और हम दोनो के भीगे कपड़े देखे तो सब समझ गयी,

दुलारी : "अरी करमजलि, तू पागल है क्या.., अपने साथ आशु बाबू को भी नहला लाई तालाब मे..कुछ तो ख़याल किया कर..मैने कितनी बार कहा है की......"

तभी मैं बीच में बोल पड़ा : " अरे काकी ...तुम इसे क्यो डांट रही हो..मैने ही इसे कहा था नहाने को..ये तो मना कर रही थी..चलो अब ये सब छोड़ो, मुझे बहुत जोरो से भूख लगी है, नाश्ते मे क्या बनाया है.."

दुलारी : "आप बैठो, मैं बनाती हू, आज आपको आलू प्याज के परोंठे खिलाउंगी , दही के साथ.."

तभी दादाजी और ऋतु भी आ गये.

दादाजी : "अरी दुलारी..तूने अभी तक नाश्ता नही बनाया..टाइम देख कितना हो गया है..और हा..इसके बाद मेरे साथ खेतो मे भी चलना, वहाँ जो माल की कटाई हुई है, उसका हिसाब देखना है मुझे."

दुलारी : "ठीक है लालाजी..आप नाश्ता करो, फिर चलते हैं.."

हम सबने नाश्ता किया. मैं बीच-2 में रूपा को देखे जा रहा था और मेरी इस हरकत को ऋतु नोट कर रही थी .

ऋतु (मेरे कान मे फुसफुसते हुए) : "भाई..क्या बात है..रूपा की जवानी पर बड़ी गंदी नज़र है आपकी..."

मैं भी धीरे से उसके कान मे बोला : "इसकी जवानी तो आज सुबह ही मेरे लंड पर कुर्बान हो चुकी है...अब तो अगले मेच की तेयारी है.."

ऋतु ने हेरत भारी नज़रों से मुझे देखा..मानो उसे मुझपर विश्वास ही ना हो..पर मेरी आँखों मे मेरी बात की सच्चाई देखकर उसे भी विश्वास हो गया क्योंकि वो जानती थी की मैं सब कुछ कर सकता हूँ..

तभी ऋतु मेरे कान मे फुसफुसाई : "भाई..वो देखो दादाजी को..कैसे दुलारी काकी को देखे जा रहे है..मुझे लगता है उनकी भी गंदी नज़र है काकी पर.." और सच मे, दादाजी की वासना से भरी हुई नज़रे दुलारी को सबके सामने चोदने मे लगी हुई थी..वो जब खाना खाने के लिए मुँह खोलते तो ऐसा लगता मानो दुलारी का मुम्मा खा रहे हो..

उनकी नज़र सामने ज़मीन पर बैठी हुई दुलारी की मस्त और चोडी गांड़ पर थी, जिसे देखकर मेरा भी लंड एक बार फिर से हुंकारने लगा.

मैं : "दादाजी..आप कहो तो हम भी चले क्या आपके साथ खेतो मे.."

दादाजी : "हां हां क्यों नही..चलो तुम भी..तुम्हे अपने खेतों का हिसाब भी दिखाता हूँ, देखना कोई गड़बड़ तो नही चल रही ना.."

दुलारी : "अरे लालाजी..मेरे रहते कोई गड़बड़ हुई है आज तक, पिछले दस सालो से मैं तुम्हारे हर हिसाब-किताब पर नज़र रखती हू..पड़ी लिखी इतनी नही हू, पर ये सब समझती हू.."

और ये बात सच भी थी..दुलारी काकी शायद 8th तक पड़ी लिखी थी..पर फिर भी सारे खेतो और बगीचो का हिसाब किताब वो बेख़ुबी रखती थी..

हम सबने नाश्ता किया और उसके बाद दादाजी के ट्रेक्टर में बैठकर खेतो की तरफ चल दिए..रूपा घर पर ही रुकी, दोपहर का खाना बनाने के लिए.

मैं दादाजी के साथ आगे बैठा था और ऋतु और दुलारी काकी पीछे ट्रॉली मे थी.

मैने मौका देखकर दादाजी के कान मे कहा : "दादाजी..आप दुलारी काकी को बड़े प्यार से देख रहे थे..चाहते क्या हो आख़िर.."!!

दादाजी (मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखते हुए) : "बेटा..अब जब तुम लोगो की वजह से मेरा शेर जाग ही चुका है तो इसे हर कोई अपना ही शिकार लगता है...और मेरे घर मे तो एक नही दो-दो शिकार है.."

उनका इशारा दुलारी के साथ-2 रूपा की तरफ भी था.

मैं : "अरे दादाजी...मैने तो दूसरे का शिकार कर भी लिया...आप क्यो इतना सोचने मे टाइम वेस्ट कर रहे हैं..दबोच लो साली को..मना थोड़े ही करेगी वो.."

मैने रूपा को चोद दिया, ये सुनकर दादाजी मुझे हेरत से देखने लगे..उन्हे भी शायद ऋतु की तरह मुझपर विश्वास नही हो रहा था..

दादाजी : "अच्छा जी..बड़ा ही तेज है तू इन कामो मे..वैसे सोच तो मैं भी रहा हू...आज देखता हू..खेतो मे..अगर मान गयी तो साली की चूत वहीं फाड़ दूँगा मैं.."

मैं : "अरे नही दादाजी..आप भी ना ठेठ गाँव वाले की तरह हो..ये औरते प्यार की भूखी होती है..इन्हे भी चुदाई मे मज़ा आता है..इन्हे आराम से, दिखा कर..ललचा कर..प्यार दिखा कर अपने काबू मे लाओ..फिर देखना, कितने मज़े देती है ये.."

दादाजी : "तू ठीक कहता है आशु..चल ठीक है..तू ही बता फिर मैं कैसे और क्या करूँ की ये दुलारी आज मेरे उपर बिछ सी जाए.."

मैने कुछ सोचकर उन्हे प्लान समझाया..वो मेरा प्लान सुनकर खुश हो गये..होते भी क्यो ना, मैं अब इस तरह के प्लान बनाने मे एक्सपर्ट जो हो चुका था...

हम सभी खेत में पहुंचे, खेतो के पास एक कमरा था , जिसे दादाजी ने चाबी से खोला, अन्दर दो चारपाई और एक लकड़ी की अलमारी थी, जिसमे ताला लगा था, दुलारी काकी ने अंदर से एक डायरी निकाली और उसमे से हिसाब देखकर दादाजी को समझाने लगी..

दादाजी की नज़रे डायरी से ज़्यादा दुलारी की मदर डेरी पर थी..जिनमे से दूध के कंटेनर ब्लाउज़ फाड़कर बाहर आने को बेताब थे..

दुलारि क़ो भी शायद दादाजी ने "नेक" इरादो का आभास हो गया था...पर दादाजी के नेचर की वजह से वो उनपर कोई शक नही कर पा रही थी....मैने दादाजी को इशारा किया और मैं ऋतु के साथ बाहर की और निकल गया.

मैं : "दादाजी...आप अपना काम करो..मैं ऋतु के साथ पूरे खेत देखकर आता हू..."

दादाजी : "ठीक है बेटा.."

और हम बाहर निकल कर कमरे के दूसरी तरफ आये , और लकड़ी की खिड़की के एक छेद से अंदर की तरफ देखने लगे. .

दादाजी हिसाब समझने के बाद दुलारी से बोले : "दुलारी..तुने तो सच में सारा हिसाब अच्छी तरह से संभाल रखा है... और बेंक में सब पैसे भी सही ढंग से जमा करवा रखे है...मुझे बड़ी ख़ुशी हुई आज...इसलिए मैं तेरी पगार आज से डबल करता हु..."

दुलारी (ख़ुशी से) : " अरे वह लालाजी...बड़ी मेहरबानी है आपकी...वैसे तो मुझे पैसो की ज्यादा जरुरत नहीं है...पर आप तो जानते हो की रूपा जवान हो गयी है..उसकी शादी ब्याह पर भी खर्चा करना है..बस उसी के लिए पैसे जोडती रहती हु..वर्ना सारा खर्चा तो वैसे भी आप ही उठाते है..."

दादाजी : "अरी तू उसकी शादी की फिकर मत कर, बड़ी धूम धाम से उसकी शादी करेंगे...अभी तो उसके खेलने खाने के दिन है..और वैसे भी तू कोनसा अभी सास बनने के लायक है..अभी भी तू किसी भी नयी दुल्हन जैसी लगती है.."
 
दादाजी की इतनी खुली बात सुनकर दुलारी को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ..और उसके गाल शर्म से लाल सुर्ख हो गए..

दुलारी : "अरे लालाजी...आज कैसी बाते कर रहे हो...लगता है शहर की हवा लग गयी है तुम्हे..."

दादाजी : "शहर में क्या-२ होता है..तुझे क्या मालुम पगली..पर हां, मैं इतना जरुर जानता हु की मैंने अपनी जिन्दगी के पिछले 10 साल ऐसे ही बर्बाद कर दिए.. पर बस अब और नहीं...जिन्दगी का क्या भरोसा..आज है, कल नहीं, इसलिए जितने मजे लेने है, आज ही ले लो बस..."

दुलारी , दादाजी की बात सुनकर उनके पास आई और उनके मुंह पर अपने कोमल हाथ रखकर बोली : "शुभ-२ बोलो लाला...आपको तो मेरी भी उम्र लग जाए..ऐसी बात मत करना आज के बाद..वर्ना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.."

दादाजी ने दुलारी की आँखों में पता नहीं क्या देखा, उन्होंने, उसके हाथो पर अपने हाथ रख दिए..और उसकी उँगलियों को चूम लिया... दुलारी के पुरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया...उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया : "लालाजी...ये क्या..."

दादाजी ने जब उसे घबराकर पीछे होते देखा तो उन्होंने अपराध भाव जैसा चेहरा बनाते हुए, दुलारी से मुंह फेर लिया.. दुलारी को लगा की शायद दादाजी उससे नाराज हो गए हैं..वो उन्हें अपना भगवान् मानती थी शायद इसलिए उनसे ऐसी उम्मीद नहीं की थी उसने.. वो थोड़ी देर तक सोचती रही और फिर कुछ सोचकर अपनी आँखे बंद की और एक गहरी सांस लेकर दादाजी से बोली :

"लालाजी..मैं समझती हुँ...जब से मालकिन गयी है, आपने किसी की तरफ आँख उठा कर नहीं देखा..पर आपके मन में क्या चल रहा है, ये किसी ने जानने की कोशिश नहीं की.. मेरा पति भी जब छोड़कर भाग गया था तो सिर्फ आपने मुझे सहारा दिया था और गाँव वालो के मुंह भी आपने ही बंद किये थे.. मुझे पता है की अपने शरीर को वो सुख न मिले तो कैसा लगता है...वही हाल आपका भी था लालाजी... पर अब लगता है की आपसे सबर नहीं हो पा रहा है... और मैं पिछले दस सालो से आपकी दासी बनकर रह रही हु...अगर आपकी यही इच्छा है तो मैं आज भी आपको मना नहीं करुँगी...आपको जो करना है, कर लो.."

ये कहते हुए दुलारी घूमकर दादाजी के सामने आ गयी और अपना दुप्पट्टा निकाल कर चारपाई पर फेंक दिया..और उसके दोनों मुम्मे, कुरते में फंसे हुए से, दादाजी की आँखों के सामने उजागर हो गए.

दादाजी : "नहीं दुलारी..तू मुझे गलत समझ रही है, मैं तुझे दासी की तरह नहीं..रानी की तरह रखना चाहता हु...तेरे से ब्याह करना चाहता हु मैं..."

दादाजी की बात सुनकर दुलारी के साथ-२ मेरा और ऋतू का भी मुंह खुला का खुला रह गया..ये बुढ़ापे में दादाजी को शादी की क्या सूझी...!!

दादाजी ने कुछ देर तक चुप रहने के बाद कहा : "पर तू तो जानती है...ये गाँव वाले इस तरह के रिश्ते को नहीं मानेंगे...और तुझे आगे चलकर रूपा का ब्याह भी करना है..."

दुलारी : "मैं जानती हु लालाजी...पर आपने मेरे बारे में इतना सोचा, मेरे लिए वो ही बहुत है...आप नहीं जानते की आपने मुझे कितनी बड़ी ख़ुशी दी है...

आपने ये बात करके मुझे खरीद लिया है...मेरे नीरस से जीवन में आज पहली बार बहार सी आई है...आप फिकर मत करो...कुछ रिश्तो को नाम देने की जरुरत नहीं होती लाला..

आज से और अभी से मेरा तन मन आपका है...आप जो भी कहेंगे मैं किसी नोकर की तरह नहीं, बल्कि आपकी पत्नी की तरह मानूंगी...और बाहर वालो के लिए मैं वही रहूंगी...आपकी दासी.." ये बोलते-२ उसकी आँखों से आंसू बहने लगे थे... और उसने आगे बढकर दादाजी को अपने गले से लगा लिया...दादाजी का कद दुलारी से लगभग २ फूट ज्यादा था...वो उनके कंधे से भी नीचे आ रही थी...दादाजी की धोती से झांकता हुआ उनका हथियार दुलारी के पेट से टकरा रहा था...

दादाजी ने दुलारी के चेहरे को ऊपर किया और उसके होंठो को चूमने लगे...दादाजी के चूमने भर से दुलारी उनके हाथो में पिघलने सी लगी...वो लटक सी गयी उनकी बाहों में... दादाजी ने उसके कुरते के ऊपर से ही उसके दोनों मुम्मो को पकड़ा और उन्हें मसल दिया..

दुलारी : "धीरे दबाओ लाला...पिछले कई सालो से इन्हें किसी ने छुआ भी नहीं है...आराम से..अह्ह्ह्ह.."

पर दादाजी को तो आप जानते ही हैं...उन्होंने जब सोनी की चुदाई की थी तब तो कितने जंगली से हो गए थे, ठीक वैसे ही वो आज हो रहे थे... सोनी की चूत में तो कई लंड जाकर उसे चौडा़ कर चुके थे पर उसके बावजूद दादाजी ने उसकी चूत का जो कबाड़ा किया था..बेचारी लंगडाती हुई गयी थी उनके कमरे से...और शायद उनके लंड को याद करके वो दिल्ली में अभी भी तड़प रही होगी...

आज भी दादाजी के तेवर वैसे ही थे...जो हाल सोनी का हुआ था, वोही आज दुलारी का होने वाला था...ये मुझे और ऋतू को अच्छी तरह से मालुम था... दादाजी ने दुलारी की बातो पर कोई ध्यान नहीं दिया...और उसके कुरते के ऊपर से ही उनके मुम्मे दबाते हुए उन्होंने उसे फाड़ना शुरू कर दिया...
 
दुलारी मुंह फाड़े उनका वहशिपन देख रही थी...पर किसी दासी की तरह से उनका कोई विरोध भी नहीं कर रही थी...दादाजी ने उसके कपडे तार-२ कर दिए...और अब दुलारी उनके सामने पूरी नंगी खड़ी थी...

मोटे-२ स्तन थे उसके...और काले रंग के मोटे-२ निप्पल ...जो तन कर जामुन की तरह से चमक रहे थे ..थोड़े लटक जरुर गए थे...पर इतने भी नहीं .. नीचे सपाट पेट था और उसके नीचे उनकी गाँव वाली चूत...जिसपर दुनिया भर के बाल थे...लगता था की दुलारी ने उन्हें बरसो से नहीं काटा... काटती भी किसके लिए, खैर..दादाजी ने दुलारी को ऊपर से नीचे तक देखा...पर दुलारी की नजरे तो दादाजी के लंड को देखकर हैरत से फटी जा रही थी...जो धोती में तम्बू बना कर खड़ा हुआ था...

दादाजी ने अपनी धोती और उसके बाद अपना कच्छा एक झटके में उतार फेंका...और उनके लंड को देखते ही दुलारी के मुंह से चीख ही निकल गयी...

दुलारी : "हाय दैय्या...ये क्या है...लाला..तुने तो अजगर पाला हुआ है अपनी टांगो के बीच..."

उसकी चूत शायद ये सोचकर की अब यही अजगर उसकी चूत में जाएगा...रसीले पानी से सराबोर होने लगी थी.उसकी नजरो में गुलाबीपन सा तैरने लगा था... वो दादाजी के लंड को बड़ी भूखी नजरो से देख रही थी...दादाजी ने अपने ऊपर के कपडे भी उतार दिए और उनके कसरती बदन को देखकर दुलारी के मुंह से एक सिसकारी सी निकल गयी...

दुलारी : "स्सस्सस्स....लाला...आज अपने "लंड के कारनामें" दिखा दे इस दुलारी को...आज रहम मत करना मेरी चूत पर...चल लाला...चोद मुझे...सालो हो गए, किसी का लंड लिए हुए..."

दादाजी ने फुफकारते हुए लंड के साथ दुलारी को उठाया और उसे चारपाई पर पटक दिया...दुलारी ने अपनी दोनों टाँगे पकड़ी और हवा में उठा दी.. बीच में उनकी झांटो से भरी हुई रसीली चूत थी...दादाजी ने उसपर अपने अजगर का मुंह लगाया और उसपर दबाव डालकर अन्दर करने लगे...

पर असली अजगर का काम दुलारी की चूत ने किया ..वो दादाजी के लंड को अपने अन्दर निगलने लगी...और दादाजी के लंड के हर हिस्से के अन्दर जाने से वो जोर से चीखे मारकर उनके लंड का अपनी चूत में शानदार स्वागत कर रही थी...

"आआअह्ह्ह लाला......कितना मोटा है तेरा लंड....अह्ह्हह्ह्ह्ह .....फाड़ डाली तुने तो दुलारी की चूत.....अह्ह्ह्ह.....और डाल.....रहम मत कर...अज्ज्ज मेरे ऊपर ...अह्ह्ह्हह्ह.....लाला....डाल दे अपना मोटा लंड मेरी चूत में अज्ज्ज.....ओह्ह्हह्ह्ह्ह ..... लाला....हाँ....लाला...."

दादाजी तो अपने लंड की किसी हेमर मशीन की तरह उसकी चूत में ड्रिल करने में लगे हुए थे....और जल्दी ही उनकी ड्रिलिंग पूरी हुई...और उन्होंने दुलारी की चूत में एक बड़ा सा छेद कर दिया...

लंड के पुरे अन्दर तक जाने में लगभग 5 मिनट लगे थे...दुलारी की साँसे रुकी हुई थी...मुंह और टाँगे खुली हुई थी...दोनों हाथो से उन्होंने चारपाई को पकड़ा हुआ था...दादाजी कुछ देर तक रुके..और फिर धीरे-२ धक्के मारने लगे...

"अह्ह्ह्हह्ह लाला.......अह्ह्ह्हह्ह ......म्मम्मम्म.....मजा आ गया....लाला....कितना मोटा और लम्बा है तेरा लंड...अह्ह्ह्ह......अब ठीक है....तेज मार अब....चोद मुझे लाला.....जोर से चोद..."

फिर तो दादाजी ने चारपाई के पायों को भी बजवा दिया ...हर धक्के से चारपाई टूटने जैसी हालत में हो जाती थी... वो झुके और उन्होंने दुलारी के प्यारे और दुलारे मुम्मो को चूसा और लंड के धक्के मारकर उनकी चूत का बेंड बजाना शुरू रखा...

"अह्ह्हह्ह ऊओह्ह्ह .....म्मम्मम ...लाला......चोद.....और तेज....ये दुलारी आज से तेरी है....जब चाहे चोदना...मुझे.....रात भर...दिन भर....सुबह...दोपहर....रात....आः...पूरा दिन चोदना...." और दुलारी की प्यार भरी बाते सुनते हुए दादाजी के लंड ने कब रस छोड़ना शुरू कर दिया , शायद उन्हें भी पता नहीं चला.....

दुलारी को अपनी चूत में बाढ़ का एहसास हुआ...और उसकी चूत ने भी तीसरी बार अपना पानी छोड़कर अपने लालाजी का साथ दिया...

दादाजी ने अपना लंड बाहर निकाला...वो पूरा सफ़ेद रंग के पानी से नहाया हुआ था...जिसे दुलारी ने बड़े प्यार से अपने मुंह में भरा और चूसकर साफ़ कर दिया..

मैंने ऋतू को इशारा किया और हम दोनों अन्दर की तरफ चल दिए..

ऋतू भागती हुई मुझसे आगे चल रही थी, मानो उसे अन्दर जाने की मुझसे ज्यादा जल्दी हो...

उसने एक झटके से दरवाजा खोल दिया..और सामने नंगी लेटी हुई दुलारी हमें देखते ही डर गयी .और अपने कपडे ढ़ुढते हुए जो हाथ लगा उसे अपनी छाती के ऊपर डाल कर अपना नंगापन छुपा लिया.

दादाजी उसकी ये हालत देखकर हंसने लगे..उन्होंने अपने नंगे शरीर को छुपाने की कोई कोशिश नहीं की.

दुलारी : "ये...ये क्या लाला...ये अन्दर कैसे आ गए...हे भगवान्....अब क्या होगा..." वो अपना मुंह नीचे करके सुबकने सी लगी, उसे लगा की दादाजी से चुदाई करवाकर उसने अपनी इज्जत खो दी है हम बच्चो के सामने.

ऋतू को अब और सबर नहीं हो पा रहा था..उसने लॉन्ग स्किर्ट पहनी हुई थी..उसे नीचे से पकड़कर उसने ऊपर उठाया..और उतार दिया, नीचे उसने सिर्फ पेंटी पहनी हुई थी, ऊपर ब्रा नहीं थी..उसके सफ़ेद रंग और पिंक निप्पल वाले मुम्मे उछल कर सबके सामने आ गए...और वो उछल कर दादाजी के ऊपर चढ़ गयी.

दुलारी ने जब ये देखा तो फटी आँखों से कभी मुझे और कभी दादाजी के ऊपर चढी़ हुई ऋतू को देखती..दादाजी ने हाथ नीचे करके उसकी पेंटी को पकड़ा और उसे तार-२ करके फेंक दिया..नीचे से उसकी शराबी चूत दादाजी के हलब्बी लंड से कुश्ती लड़ने को तैयार थी.. मैं धीरे से दुलारी के पीछे गया अपनी पेंट उतारी और अंडरवीयर भी, और उसके दोनों तरफ पैर फेलाकर बैठ गया.

वो हैरानी से दादाजी और ऋतू का प्यार देखने में इतनी व्यस्त थी की उसे मेरे पीछे आने का एहसास ही नहीं हुआ. मैंने हाथ आगे करके उसके हाथों के ऊपर रख दिए, जिनसे वो अपनी लाज छुपा कर बैठी हुई थी. जैसे ही मैंने अपना हाथ लगाया, वो चोंक उठी .

दुलारी : "अरे लल्ला....ये क्या कर रहे हो....और ये क्या हो रहा है...ऋतू बिटिया और लालाजी...यानि उसके दादा...तुम्हारी बहन के साथ...मतलब..." वो हैरान परेशान सी बोलती जा रही थी.

मैंने दुलारी के हाथो के ऊपर अपने हाथ बड़े प्यार से रखे और कहा : "हाँ काकी...ये दोनों पहले भी ये सब कई बार कर चुके हैं...
 
इन्फेक्ट हमारे घर में सभी एक दुसरे के साथ ये चुदाई वगेरह कर लेते हैं...इस बार दादाजी जब आये तो वो भी नहीं रह पाए ये सब देखकर... और इसका परिणाम तुम्हारे सामने है...तुम्हे भी चोद डाला दादाजी ने...मैंने और ऋतू ने सब देखा, वहां खिड़की से..बड़े मजे दिए दादाजी ने तुम्हे...है न...बोलो..."

दुलारी मेरी बात सुनकर शर्मा सी गयी...मेरा हाथ खिसककर उसके मोटे मुम्मो के ऊपर आ गया..

दुलारी : " तभी मैं कहूँ...लाला को हुआ क्या है...शहर में ऐसा क्या हो गया की उसने मुझ बुढ़िया को आते ही मसल डाला...ऐसा तो मैंने लाला को पिछले दस सालो में नहीं देखा.."

मैंने दुलारी के मुम्मे हलके-२ दबाने शुरू कर दिए.

मैं : "कोन कहता है काकी की तू बुड्डी हो गयी है...मैंने देखा था तुझे अभी...वहां से...बड़ा ही कसा हुआ बदन है तेरा...और खासकर तेरे ये दोनों...पंछी.." कहते हुए मैंने वो कपडा खींच दिया और दुलारी काकी के दोनों कबूतरों का गला दबा दिया.

दुलारी : "आयीस्स्स्सस्स्स्स....ये क्या करते हो लल्ला.....तुम्हे तो मैंने अपनी गोद में खिलाया है...."

मैं : "अब मेरी बारी है काकी.....तुम्हे अपनी गोद में खिलाने की..."

और ये कहते हुए मैंने दुलारी काकी को अपने हाथो में उठाया और उन्हें अपनी गोद में खींच लिया...वो कुछ समझ पाती इससे पहले ही उनकी भीगी हुई सी चूत मेरे लंड के ऊपर थी...

दादाजी के लंड ने मेरा काम आसान कर दिया था..चूत को चौडा़ करके..और मेरे लंड का सुपाड़ा सीधा उनकी चूत के ऊपर फिट बैठ गया.. दादाजी का लंड भी अपना बिल ढून्ढ चूका था..ऋतू ने दादाजी की छाती के ऊपर हाथ रखे और सी सी करते हुए उनके लंड की कुर्सी पर बैठ गयी और उनके नाग को अपनी चूत के बिल में जगह दे दी....

दुलारी ने ऋतू की सिसकारी सुनी तो उसकी तरफ देखा...तब तक मैंने भी उन्हें अपने लंड पर खींचा और अपने लंड़ को उसकी चूत की बोतल में उतारता चला गया..

"आआआआआह्ह्ह........स्स्स्सस्स्स्स.......दैय्य्या....रे.......बबुआ.......ई का.......किया तुने...... स्स्स्सस्स्स्स अह्ह्ह्हह्ह ...." दुलारी मेरे लंड को निगलती हुई बुदबुदा रही थी....

दादाजी ने आगे उठकर ऋतू के मुम्मे अपने मुंह में भरे और उन्हें किसी बच्चे की तरह चूसते हुए अपने लंड के धक्के उसकी चूत में लगाने लगे..

ऋतू दादाजी के सर के बाल पकड़कर उन्हें अपनी छाती से दबाकर चिल्लाती जा रही थी..." अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह दादाजी....अह्ह्ह्ह....ऊऊऊओ .....म्मम्म...कितना अन्दर तक जाता है आपका....... जोर से करो न दादाजी........और जोर से...प्लीस.....आह्ह्ह्ह....ओह्ह्ह या.....ओ या........हाँ......ऐसे ही.....येस्स....येस्सस्सस्स... ..येस्स्सस्स्स्सस्स्स.... .अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ....म्मम्मम.... " और ऋतू की चूत में से गाड़ा शहद निकलकर दादाजी के लंड का अभिषेक करने लगा.

पर दादाजी तो आज वियाग्रा खाकर आये थे जैसे...दुलारी काकी की चूत का बेंड बजाने के बाद अब वो कमसिन सी ऋतू की चूत में लंड पेलकर उसे तडपा रहे थे...

ऋतू तो निढाल सी होकर उनके लंड पर कब से कुर्बान हो चुकी थी पर दादाजी के लंड से निकलने वाले धक्के उसकी चूत में एक नए ओर्गास्म का निर्माण कर रहे थे.. और जल्दी ही वो जैसे नींद से जागी और फिर से दादाजी के धक्को का मजा लेते हुए चिल्लाने लगी..

"दादाजी.....मार डाला आपने तो आज.....अह्ह्हह्ह.....ओह्ह्हह्ह माय गोड.... म्मम्मम........ अह्ह्हह्ह........ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ ओफ्फ्फ्फ़ उफ्फ्फ...." ऋतू की हालत पतली होती जा रही थी.

मेरा लंड भी इंच इंच करके दुलारी की चूत के अन्दर तक समां गया...थोडा रुकने के बाद मैंने आगे हाथ करके दुलारी के खरबूजे अपने हाथो में पकडे और उन्हें दबाने लगा.. दुलारी भी अपनी गांड को मेरे लंड के ऊपर घुमा घुमा कर मजे ले रही थी...उसने शायद कल्पना भी नहीं की थी की उसकी जिन्दगी में इतने सालो के बाद एक ही दिन में दो-दो लंड उसकी चूत की सेवा करेंगे... पर वो कहते है न की ऊपर वाले के घर में देर है अंधेर नहीं, और वो जब भी देता है छप्पर फाड़ कर देता है...आज वोही हाल दुलारी का भी था...

पहले तो दादाजी के देत्याकार लंड ने उनकी चूत की लंका में हलचल मचाई और अब मेरा लंड जाकर उसी लंका में आग लगाने का काम कर रहा था...

दुलारी : " हाय......भागवान .......अह्ह्ह्ह......मार्र्र्र.....गयी रे......क्या खाते हो तुम दादा-पोता....साले कितना अच्छा चोदते हो ....अहह.........रुक बबुआ....रुक....."

मैं रुका तो काकी ने मुझे पीछे हाथ करके जमीन पर लेटने को कहा...मैं लेट गया...काकी ने एक पैर मेरे पेट से घुमा कर अपना चेहरा मेरी तरफ किया...मेरा लंड उनकी चूत के अन्दर पूरा घूम सा गया..उनकी सिसकारी सी निकल पड़ी....अपनी चूत में ऐसा घर्षण पाकर....फिर से वेसा ही सेंसेशन पाने के लिए वो फिर से मेरे पेरो की तरफ घूम गयी.....और फिर से उनके मुह से वही मादक सिसकारी निकल गयी..... लगता था की मेरा लंड पूरा जाकर उनके गर्भाशय से टकरा रहा था और घुमने की वजह से मेरा सुपाडा एक अलग ही एहसास दे रहा था उन्हें अन्दर ही अन्दर और साथ ही चूत की दीवारों पर भी लंड के घर्षण का अलग ही मजा मिल पा रहा था...और फिर से वही मजा लेने के लिए दुलारी फिर से मेरी तरफ घूम गयी..उन्हें इस तरह से लंड को अपनी चूत में घुमाने में मजा आ रहा था...
 
पर बार-२ घुमने में उन्हें काफी परेशानी हो रही थी..उन्होंने आस पास देखा और अपनी साडी उठा ली..मुझे कुछ समझ नहीं आया की वो करना क्या चाहती है.. उन्होंने साडी के एक छोर का गोला बनाया और ऊपर की तरफ घुमा कर फेंका...वो कमरे के के ऊपर की बीम के ऊपर से होता हुआ वापिस नीचे आ गया...

काकी ने पास पड़ा हुआ चार फूट का एक डंडा उठाया और साडी के दोनों सिरे एक -२ कोने पर बाँध दिए...और झुला सा बना दिया..जो उनके सर से लगभग दो फूट की ऊँचाई पर झूल रहा था..

मेरी समझ में अब भी कुछ नहीं आ रहा था की चुदाई के वक़्त काकी को ये झुला बनाने की क्या सूझी....पर उसके बाद जो दुलारी ने किया उसे देखकर मैं दंग रह गया.. उन्होंने डंडे को बीच से पकड़ा और फिर से उसी तरह से घूमना शुरू कर दिया..

मेरा लंड उनकी चूत के अन्दर ही था और वो मेरे ऊपर बैठ कर, ऊपर हाथ करके डंडा पकडे हुए, घुमती जा रही थी, वो जैसे-२ घुमती जाती, साडी छोटी होकर ऊपर की तरफ सिमटती जा रही थी...जिसकी वजह से उनकी चूत ऊपर की तरफ जाती हुई महसूस हो रही थी...

लगभग 6 -7 चक्कर लगाने के बाद उनकी चूत मेरे लंड से निकलने के कगार पर आ पहुंची...और ऊपर की तरफ साडी भी इकठ्ठा होकर एक तनाव सा बना रही थी...जिसे काकी ने अपने पेरों जमीन पर रखकर रोका हुआ था... और जब उन्होंने देखा की मेरा लंड उनकी चूत से निकलने ही वाला है तो उन्होंने अपने दोनों पैर उठा कर घुटने अपनी छाती से चिपका लिए...और साडी में बना हुआ घुमावदार तनाव उनके शरीर को किसी लट्टू की तरह घुमाता हुआ मेरे लंड के ऊपर तेजी से बिठाने लगा....

मेरी तो हालत ही खराब हो गयी...वो जिस तेजी से घूमकर वापिस मेरे लंड पर आ रही थी, मुझे लगा की मेरे लंड में कोई फ्रेक्चर न हो जाए... पर दुलारी की चूत के अन्दर इतना रस निकल रहा था जिसकी वजह से न तो उन्हें और ना ही मुझे कोई तकलीफ हुई...और वो घुमती हुई सी...चिल्लाती हुई सी... मेरे लंड पर वापिस धप्प से आकर बैठ गयी....

"अह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ...ओह्ह्ह्हह्ह्हह्ह ......अ.......अ.....अ...आआअ.........आआ......म्मम्मम्मम......ह्ह्हह्ह्ह्ह ह्ह्ह ,......."

मैं दुलारी के दिमाग की दाद दिए बिना नहीं रह सका...उसने अपनी चूत को ऊपर तक ले जाकर मेरे लंड पर छोड़ दिया और घुमती हुई सी, ड्रिल होती हुई मेरे लंड पर वापिस कब्ज़ा कर लिया था..

वो मेरे ऊपर पड़ी हुई हांफ रही थी...शायद वो झड चुकी थी...मेरे चेहरे पर उनके बाल फेले हुए थे...वो ऊपर उठी और मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराने लगी...

वो बिलकुल अपनी बेटी जैसी मुस्कुरा रही थी...मासूमियत से भरी थी उनकी मुस्कान...मैंने आगे बढ़ कर दुलारी के होंठ चूस लिए...बिलकुल ठन्डे थे वो होंठ...बर्फ जैसे ...पर बड़े ही मीठे थे वो...गाँव का मीठापन छुपा था उनमे... मैं तो उन्हें चूसता रहा और नीचे से धक्के मारता रहा...और जल्दी ही मेरे लंड का ज्वालामुखी दुलारी की चूत की पहाड़ियों के अन्दर फूट पड़ा...और हम दोनों एक दुसरे के मुंह को चूसते हुए..चाटते हुए...सिसकारी मारते हुए झड़ते हुऐ...चिपक कर एक दुसरे के ऊपर लेटे रहे.

दादाजी ने अब ऋतू को घोड़ी बना दिया था...और अपना लंड वापिस पीछे से लेजाकर उसकी चूत में डालने लगे...पर जब उन्होंने गोल सा...चमकता हुआ सा...सुनहरे रंग का गांड का छेद दिखाई दिया तो उनकी नीयत बदल गयी...और उन्होंने अपने हाथ में थूक लगाकर लंड के सुपाडे पर फिराई और उसे टिका दिया ऋतू की गांड के छेद पर...

ऋतू ने जब दादाजी को पार्टी बदलते देखा तो वो कुनमुनाने लगी...उसे गांड मरवाने में भी मजा आता था पर दादाजी के लंड से गांड मरवाना यानी अपनी ऐसी तैसी करवाना...पर वो कुछ कर नहीं सकती थी...

उसने अपनी चूत के ऊपर अपना पंजा रखा और उसे जोरो से घिसने लगी...पीछे से दादाजी ने अपना घोडा ऋतू की गांड के अस्तबल में डाल दिया.. गांड के अन्दर जाते ही दादू का घोडा हिनहिनाने लगा और ऋतू भी दादाजी के लंड को अन्दर डालकर मजे से अपनी गांड के धक्के पीछे की तरफ फेंकने लगी.

"अह्ह्हह्ह्ह्ह ओग्ग ओह्ह्हह्ह दादाजी......क्या कर दिया.......अह्ह्ह्हह्ह ...आपका लंड तो अभी भी .....मुझे पहली बार जितना दर्द देता है.....यहाँ.....अह्ह्हह्ह.......अह्ह्ह्ह ........."

दादाजी हँसते रहे और उसकी गांड मारते रहे....उसकी गांड के छेद का कसाव इतना तेज था उनके लंड के चारो तरफ की दादाजी जल्दी ही मैदान में धराशायी हो गए और उनके लंड ने अपना माल ऋतू की गांड के छेद में छोड़ दिया..

ऋतू की पीठ पर झुककर उन्होंने उसके दोनों मुम्मे पकड़ लिए और उन्हें दबाते हुए , उसके कंधे चुमते हुए...उसके साथ चिपटे रहे...

हम चारों ने एक दुसरे को देखा और मुस्कुरा दिए..

सच कहूँ यहाँ गाँव में आकर मुझे चुदाई करने में ज्यादा मजा आ रहा था..

इस तरह दुलारी और उसकी बेटी रूपा के साथ-2 ऋतु की चुदाई करते हुए गाँव में दादाजी और मैनें 10-12 दिन तक खुब मजे़ उठाये।

हमारी छुट्टियाँ खत्म होने वाली थी तो मैंने और ऋतु ने दादाजी से विदा ली और शहर वापस लौट आये..

शहर आकर भी चूदाई का सिलसिला चलता रहा ..

अन्नू ,सोनी , ऋतु और मम्मी को मैं और पापा साथ साथ मिलकर चोदते रहे...

~समाप्त~
 
Back
Top