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Nanad ki training--ननद की ट्रैनिंग compleet



लेकिन वो प्लान भी फेल हो गया. उसके जीजा जीत ( जिन्होने मेरे चढाने पे उसे शादी के समय कस के चोद के उसकी , चूत का उद्घाटन किया था और बहोत ही मस्त थे) और बहन लाली, ( गुड्डी की सबसे बडी बहन....अगर आपने नन्द की ट्रेनिंग पढी हो तो ये सब आपको मालूम होगा)....देर रात को आने वाले थे. लेकिन जब हम उसके घर पहुंचे तो वो लोग पहुंचे हुये थे.

मेरे नन्दोई ने पहुंचते ही मुझे बांहों में भर लिया....लेकिन अबकी वो थोडे कम चंचल लग रहे थे....क्यों क्या हुआ...मैने पूछा तो उन्होने बताया की यहां आने से पहले उनकी बीबी ने कुछ सखत पाबंदी लगा दी...शायद उन्हे कुछ् शक हो गया की जब वो शादी में आये थे तो उन्होने गुड्डी के साथ...तो बोलना रंग खेलने तक तो ठीक है लेकिन यहां वहां छूने पे भी पाबंदी और इससे आगे तो कुछ सोच भी नहीं सकते....कूवारी लडकी है अगर कहीं उंच नीच हो गया....अपनी बीबी की आवाज की नकल करते वो बोले।

अरे जीजू इत्ती सी बात...मैने उन्हे हिम्मत बंधाई. याद है पिछली बार जब आप शादी में आये थे...आप खुद कह रहे थे ना की आप की ये साल्ली....हाथ भी नहीं रखने देती थी....लेकिन मैं ने वो चक्कर चलाया की खुद उसने आप का हाथ पकड के अपने १७ साल के जोबन पे रख दिया था ...५-६ महीने पहले की ही तो बात है...और आप से एक नहीं दो दो बार...बिना किसी ना नुकुर...के ...तो आखिर आपकी बीबी भी तो ...उसी की बहन हैं मेरी ननद हैं....और ननदों को नचाना भाभी को नहीं तो और किसे आयेगा।

अरे मैने सोचा था, की अबकी साल्ली के साथ खूब जम के होली खेलूंगा, पहली होली में तो बिदक गयी थी लेकिन अबकी भरे आंगन में सबके सामने....क्या मस्त माल है औ कया मटकते हुये चूतड हैं....तब तक गु्ड्डी हमारे सामने से आंगन से गुजर रही थी...अपने जीजू को दिखा के उसने दोनो जोबन कस के उभार दिये और जीभ निकाल के चिढाया. पीछे से उनकॊ दिखा के चूतड भी मटका दिये...।

मन करता है गांड मार लूं साल्ली की....नन्दोई जी बोली लेकिन अपने बीबी की बात सोच के मन मसोस के रह गये.।

अरे गांड भी मारिये साल्ली की और गांड का मसाला भी चखाइये भी अपनी साल्ली को...बस अपनी इस सलहज पे भरोसा रखिये और हां होली में सलहज का हक साली से कम नहीं होता...पिछली बार तो उस कंवारी साल्ली के चक्कर में मैने छोड दिया था....अबकी मैं नहीं छोडने वाली अपन हक. और मैने दोनो जांघों के बीच कस के उनके तन्नये खडे खूंटे पे रगड दिया।

एक दम...मुस्करा के वो बोले।

तब तक राजीव वहां आ गये. जीत जीजू...अल्पना पे फिदा थे लेकिन शादी के समय तो उनका पूरा समय गुड्डी के साथ ही बीता और अल्पी भी अपने नये बने जीजू राजीव के साथ...जीत ने उनसे पूछा,

क्यों साल्ले...तेरी उस पंजाबी साल्ली की क्या हाल है।

मस्त है जीजा....वो बोले।

लगता है ननदॊइ जी का जी आपकी साली पे आ गया है....क्यों नहीं आप दोनो साली अदल बदल कर लेते...मैने चिढाया।

अरे क्या अदल बदल की बात हो रही है....ये मेरी बडी ननद और जीट ननदोई जी की पत्नी....लाली थीं...मुझसे उमर में २-३ साल ही बडी होंगीं, लेकिन खूब गदराइ, भरे बदन की बडे बडे चूतड...।

अरे ननद जी....जो आफर मैने आपको पिछली बार दिया था...सैंया से सैंया बदलने का...होली का मौका भी है....मैं नंदोई जी के साथ और आप मेरे सैंया के साथ ....साथ में मेरे दो चार देवर फ्री...क्यों मंजूर।

ना बाबा ना....तुम मेरे सैया को भी रखॊ....और अपने सैंया कॊ भॊ...दोनो ओर से ...आखिर छोटी भाभी हो.....मेरी ओर से होली गिफ्ट .....वो भी कम नहीं थीं. उन्होने दहला लगाया।

ना....मुझसे ये नहीं होगा....आखिर आप का काम कैसे चलेगा...और उपर से होली का मौसम....मुझसे तो एक रात नहीं रहा जाता....अरे स्वाद बद्ल लीजिये....और मेरे सैंया का आपके सैंया से कम नहीं है कहिये तो आप के सामने दोनो का नाप के दिखा दूं....बचपन में जो आपने पकडा पकडी की होगी तो जरूर छोटा रहा होगा लेकिन अब....मैने तुरुप का पत्ता जडा।

अरे मुझे तो शक है तब तक नाउन की नयी बहू बसंती...( जो बहू होने के नाते भाभियों के साथ ही रहती थी और ननदों को खुल के गाली देती थी) भी मैदान में आ गई की लाली बीबी....कहीं होली में गली के गदहों का देख के उन्ही के साथ तो नहीं...बडी ताकत है तुम्हारी ननद रानी।

तय ये हुआ की वो, गुड्डी, और जीत कल दोपहर में हम लोगों के यहां आयेंगें।

रात भर मैं सोचती रही की लाली के शक के बाव्जूद क्या चक्कर चलाउं....की जीत और इन का दोनो का काम हो जाये.

जीत को मैने समझा दिया थी...मिल बांट के खाने को....लाली को अपने ‘सीधे साधे भाइ’ पे तो शक होगा नहीं इसलिये उन के साथ वो गुड्डी को छोडने को तैयार भी हो जायेंगी...और मैने राजीव को भी...सालीयों की अदला बदली के लिये तैयार कर लिया....तो मिल के खाओगे तो ज्यादा मजा आयेगा.....वो बिचारा ननदोइ मान भी गया।

मर्द बेचारे होते ही बुद्ढू हैं और खास कर जहां चूत का चक्कर हो..।

और साथ ही साथ अगर मेरी उस ननद को एक साथ दो मर्दों का शौक लग गया तो जो बची खुची शरम है वो भी खतम हो जायेगी और जब वो होली के बाद हम लोगों के साथ चलेगी तो....फिर उसके साथ जो कुछ होने वाला है उसके लिये....तो एक तीर से तीन शिकार...।

लेकिन लाली को वहां से ह्टाना जरूरी था....उसके सामने जीत की कुछ हिम्मत नहीं पड सकती थी....वो भी शरमाते और गुड्डी भी...।

पर उसका भी रास्ता मैने निकाल लिया...।

अगले दिन आईं मेरी ननद लाली, गुड्डी और जीत।

पतली शिफान की गुलाबी साडी और मैचिंग ब्लाउज में उनका भरा बदन और गदराया लग रह। खूब देह से चिपकी...ब्लाउज से छलकते भरे भरे जोबन...।

बांहों में भर के उन्हे चिढाती मैं बोली, बीबी जी....लगता है रात भर ननदोई जी ने चढाई की जो सुबह देर से उठीं और आने में..।

बात काट के मुझे भी वो कस के भींच के मेरे कान में बोलीं,

अरे तो क्या मेरे भाई ने छोडा होगा मेरी इस मस्त भाभी को।

उन्हे छोड के एक बार मैने फिर उपर से निहारा....वास्तब में असली मजा औरतों को इस उमर में ही आता है...गोरे चिकने गाल, कटाव खूब भरे भरे खेले खाये उभार, भरे हुये कुल्हे...और उपर से कामदार साडी...और लाल चोली कट ब्लाउज,।

सच में मैं गारंटी के साथ कहती हूं नजर न लगे आपको....आज जिस जिस मर्द ने देखा होगा ना आपको....सबका खडा हो गया होगा....इन्क्ल्युडिंग आपके गली के गधों के...वैसे ननद रानी मेरे पास होता ना तो मैं तो यहीं अभी ..।

वो सच में शरमा सी गयीं लेकिन मैं छोडने वाली नहीं थी...और मेरे ख्याल से आपके भाई का भी आपको देख के.....मैने फिर छेडा। पर वो भी..।

अरे तेरे ननदोई का तो एक दम खडा है और वो आज आये भी हैं इसलिये की सलहज कॊ अपनी पिचकारी का दम दिखायेंगें।

वो तो मैं देखूंगी ही छोडूंगी थोडी आखिर छोटी सलहज हूं और होली का मौका है ...और फिर मैने गूड्डी की ओर देखा....।

सफेद शर्ट और स्ट्राईप्ड स्कर्ट में वो भी गजब की लग रही थी...हल्का सा मेक अप....मैने उसे भी बांहों में ले के कस के भींच लिया पर तब तक मेरे नन्दोई जीत की आवाज आई,

अरे भाभी मेरा नम्बर कब लगेगा....अपकी ननदें तो बडी लकी हैं...।

और गुड्डी को छोड के मैने अपने बेताब नंदोई को बांहों में बांध लिया।

भाभी मेरा कुछ....वो बिचारे परेशान ...और निगाहें साली के मस्त उभारों पे गडी...।

देखूंगी....हो सकता है...मैं उनकॊ और परेशान कर रही थी...लेकिन ननदोई जी मेरी एक शर्त है..।

अरे आपकी शर्त मंजूर हैं बस एक घंटे के लिये अकेले में ये साल्ली मिल जाय ना..।

एक क्या पूरे तीन घंटे का सो करिये....लेकिन आज जीजा साले मिल के इस साल्ली की ऐसी सैंड विच बनाइये की चल ना पाये....आगे पीछे दोनो ओर से...मैने और आग लगाई।

एक्दम ...वो बोले और कस के अपना ८ इंच का खूंटा मेरी जांघों के बीच में..।

मैं जो खास डबल भांग वाली गुझिया बना के लाई थी वो ठंडाई के साथ ले आई।

मेरी बडी ननद लाली को पूरा शक था...।

 


देखॊ मैं भांग वांग....कहीं इसमें कुछ पडा तो नहीं हैं....वो चिहुंक के बोली।

अरे नहीं आप को तो मालूम है मैं कूछ खुद नहीं ...और उन्होने एक

पहले तो नन्दोई जी के ही पैरों में घुंघरु बांधे गये। साडी ब्लाउज में गजब के लग रहे थे। खूब ठुमके दिखाये उन्होने। उसके बाद हम लोग...।

होली का सदा बहार गीत.. .रंग बरसे भीगे चुनर वाली...रंग बरसे.
..और शुरु मैने ही किया...खूब अदा से ...।

अरे सोने के थाली में जेवना परोसों अरे...( और फिर मैने लाइन थोडी बदल दी और ननदोई जी के गोद में जा के बैठ गई)

अरे सोने के थाली में जुबना परोसों अरे जोबना परोंसों...( और दोनॊ हाथॊ से अपने दोनो उभार उठा के सीधे ननदोई जी के होठों पे लगा दिया)

अरे जेवे ननद जी का यार बलम तरसै...बलम तरसैं...ननदोई जी को दोनों हाथॊ से पकड के उनकी ओर देख के..।

फिर ननद जी का नम्बर आया तो उन्होने..।

पान इलाची का बीडा लगायों गाया और खिलाया भी अपने सैंया कॊ भी और भैया को भी।

लेकिन मजा आया गुड्डी के साथ ...उसने बडी अदा से छोटे छोटे चूतड ,मटकाते हुये ठुमके लगाये...और गाया..।



अरे बेला चुन चुन सेजियां सेजियां लगाई, अरे सेजियां लगाई..।


मैं सोच रही थी की देखें वो किसका नाम लेती ही लेकिन पहले तो उसने अपने जीजू कॊ खूब ललचाया रिझाया फिर मेरे सैंया की गोद में बैठ के लाइन पूरी की,



अरे सोवे गोरी का यार जीजा तरसैं...अरे सोवे मेरा यार..।


ननदोई जी ने मुझे चैलेंजे किया, अरे होली के गाने हों और जोगीडा ना हो कबीर ना हो...ये फिल्मी विल्मी तो ठीक है...।

मैने पहले तो थोडा नखडा किया फिर लेकिन शर्त रखी की सब साथ साथ गायेंगे खास के नन्दोई जी और वो ढोलक भी बजायेंगे...।

उन्होने ढोलक पकडी और लाली ननद जी ने मंजीरे,

मैने गाना शुरु किया और गुड्डी भी साथ दे रही थी..।

अरे होली में नंदोई जी की बहना का सब कोइ सुना हाल अरे होली में,

अरे एक तो उनकी चोली पकडे दूसरा पकडे गाल,

अरे हेमा जी का अरे हेमा जी का तिसरा धईले माल...अरे होली में..।

कबीरा सा रा सा रा..।

हो जोगी जी हां जॊगी जी

ननदोई जी की बहना तो पक्की हईं छिनाल..।

कोइ उनकी चूंची दबलस कोई कटले गाल,

तीन तीन यारन से चुद्व्वायें तबीयत भई निहाल..।

जोगीडा सा रा सा रा

अरे हम्ररे खेत में गन्ना है और खेत में घूंची,

लाली छिनारिया रोज दबवाये भैया से दोनों चूंची,

जोगीडा सा रा सा रा...अरे देख चली जा..।

चारो ओर लगा पताका और लगी है झंडी,

गुड्डी ननद हैं मशहूर कालीन गंज में रंडी...।

चुदवावै सारी रात....जोगीडा सा रा रा ओह सारा.।

ओह जोगी जी हां जॊगी जी,

अरे कहां से देखो पानी बहता कहां पे हो गया लासा...अरे

अरे लाली ननद की लाली ननद की बुर से पानी बहता

और गुड्डी की बुर हो गई लासा..।

एक ओर से सैंया चोदे एक ओर से भैया..।

यारों की लाइन लगी है

....जरा सा देख तमाशा

जोगीडा सा रा सा रा.। .।


और इस गाने के साथ मैं और गुड्डी जम के अबीर गुलाल उडा रहे थे और एक बार फिर से सूखे रंगों की होली शुरु हो गई।
 


बेचारे जीत नन्दोइ जी को तो हम लोगों ने इस हालत में छोडा नहीं था की वो ड्राइव कर पाते, इसलिये ये ही लाली, जीत और गुड्डी को छोडने गये। उसके बाद से उन्हे अल्पी और क्म्मॊ को ले के शापिंग पे जाना था।

मैं बेड रूम में जा के लेट गई। डबल होली में, ननद और ननदोइ दोनों के साथ मजा तो बहोत आया लेकिन मैं थोडी थक गई थी।

जब हम लोग दूबे भाभी के यहां होली खेल रहे थे और यहां गुड्डी की रगडाइ हो थी, वो सब कैमरे में रिकार्ड करवा लिया था कैसे अपने भैया और जीजू के साथ , एक साथ। मैनें देखना शुरु किया, थोडा फास्ट फारवर्ड कर के , थोडा रोक रोक के। वो सीन बहोत जोरदार था जब मेरी ननद रानी, वो किशोर किसी एक्स्पर्ट की तरह दो दो लंड को एक साथ....जीत का लंड उसने मुंह में लिया था और अपने भैया का मुठीया रही थी। और फिर दोनों लंड को ...बारी बारी से ...जीभ निकाल के जैसे कॊइ लडकी एक साथ दो दो लालीपाप चाटे...उसकी जीभ लपट झपट के पहले मेरे सैंया के सुपाडे के चारो ओर ...और फिर ननदोइ जी के ...उसके जवान होठ गप्प से सुपाडे को होंठॊ में भर लेते, दबा देते, भींच लेते...और जीभ पी होल को छॆडती...और जिस तरह से प्यार से उसकी बडी बडी कजरारी आंखे...चेहरा उठा के वो देखती...जब चूसते चूसते गाल थक जाते तो अपने टेनिस बाल साइज के छोटे छोटे कडे जोबन के बीच दबा के लंड को रगडती...अकेली उस लडकी ने दोनों मदों की हालत खराब कर रखी थी। चल मैं सोच रही थी...३ दिन की बात और है। नरसों होली है और उसके अगले दिन सुबह ही इस बुलबुल को ले के हम फुर हो जायेंगें। साल भर की कोचिंग में नाम लिखवाना है उसका, लेकिन असली कोचिंग तो उसे मैं दूंगी। लंड की कोई कमी नहीं होगी..एक साथ दो तीन...हरदम उसकी चूत से वीर्य बहता रहेगा।

आज दूबे भाभी ने क्या कया करम नहीं किए लाली ननद के और उसके बाद वो एक दम सुधर गईं। कहां तो वो ननदोई जी को गुड्डी पे हाथ नहीं डालने दे रही थीं और कहां उनके सामने उनकी छोटी बहन ने अपने जीजू का लंड न सिर्फ चूसा, बल्की उनसे कहलवाया भी। और उनके भैया के सामने नंगा करके मैने क्या कुश्ती लडी...अरे होली में ये सब ना हो तो मजा कया है। तब तक वो सीन आ गया जिसमें गुड्डी की सैंड विच बनी। एक एक बार दोनों से चुद चुकी थी वो। दोनों का लंड चाट चाट के फिर उसने खडा कर दिया था। और अबकी उसके भैया ने लेट के उसे अपने उपर ले लिया...खूब मजे से वो छिनार उनका इतना मोटा लंड घोंट गई....खैर चिल्लाती भी कैसे उसके मुंह में उसके जीजा लंड पेल रहे थे और दोनों हाथों से उसके कंधे को पकड के राजीव के लंड के उपर उसे कस के दबा भी रहे थे।

राजीव भी उसकी पतली कमर को पकड के पूरी ताकत से उसे अपनी ओर खींच रहे थे और इंच इंच कर के उस छिनाल ने वो लंड घॊंट ही लिया। पी र्कैसे आराम से खुद ही उपर नीचे कर के ...चूत में दो बार की चुदाइ का माल भरा था..इस लिये खूब सटासट जा रहा था। नन्दोई जी मेरे सैंया को आंख मारी और उन्होने पूरी ताकत से खींच के उसे अपनी ओर कर लिया। पीछे से नन्दोई जी गांड सहला रहे थे....कितने दिनों से वो उसकी इस छोटी छोटी कसी गांड के दीवाने थे...और उसे पता तो चल ही गया होगा खास कर जब उन्होने थूक लगा के उसकी गांड की दरार पे उंगली रगडनी चालू कर दी। खूब क्रींम लगाया उन्होने अपने सुपाडे में ...नन्दोई जी का खूब मोटा है लेकिन राजीव से १८ होगा...इसी लिये मैने राजीव को मना किया था...उनका तो मेरी मुट्ठी इतना होगा।

 


मैने प्लान बना रखा था जब ये हम लोगों के साथ रहेगी....मैं अपने उपर लेके अपनी चूंची उसके मुंह में घुसेड के राजीव से उसकी गांड मरवाउंगी, अपने सामने...और सिर्फ थूक लगा के। अरे गांड मारी जाय ननद की और चीख चिल्लाहट ना हो दर्द ना हो...तो क्या मजा। चीख तो वो अभी भी रही थी, लेकिन राजीव ने उसके मुंह में जीभ डाल के उसे बंद कर दिया। नन्दोई जी भी सुफाडा ठेल के रुक गये। वो गांड पटकती रही छटपटाती रही, लेकिन एक बार गांड के छल्ले को लंड पार कर ले ना फिर तो...उसके बाद धीरे धीरे आधा लंड...नीचे से राजीव धक्का दे रहे थे और उपर से ....कभी बारी बारी से कभी साथ साथ...वो चीख रही थी, सिसक रही थी...उसके बाद दो बार और चुदी वो। और राजीव उसके भैया जब उसके मुंह में झडे तो साल्ली....पूरा गटक गई। एक बूंद भी बाहर नहीं। और मैं कब सो गई पता नहीं।

अगले दिन दिया आइ, गुड्डी और अल्पी की सहेली। मैने बताया था ना की ननद की ट्रेनिंग में...गुड्डी की सहेली जो अपने सगे भाई से फंसी थी और जिसको देख के राजीव का टन टना गया था और उसकी भी गीली हो गई थी।

खूब गदराइ, गोरी, जब से चूंचिया उठान शुरु हुआ था नौवें -दसवें क्लास से ही दबवा मिजवा रही थी। इसलिये खूब भरे भरे....( अरे जोबन तो आते ही हैं मर्दों के लिये फालतू में लडकियां इतना बचा छुपा के रखती हैं, मेरी एक भाभी कहती थीं), शोख धानी शलवार, कुर्ता।

गुड्डी आई है क्या...उसने पूछा। लेकिन उसकी चपल आंख टेबल पे पडी प्लेट में गुलाल अबीर पे थी ( होली शुरु हो चुकी थी, इस लिये मैं प्लेट में गुलाल अबीर जरूर रखती थी और नीचे छुपा के पक्के रंग)।

पहले तू ये बता की तू सहेली किसकी है फिर मैं रिश्ता तय कर के आगे बरताव करुं। हंस के मैं बोली। अल्पी को मेरी बहन बनने की और राजीव को जीजू बना के, उनके साथ उसके मजे लेने की खबर उसकी सारी सहेलियों को लग चुकी थी।

देखिये भाभी ...गुड्डी मेरी पक्की सहेली है इसलिये आपको तो मैं भाभी ही कहुंगी और मेरा आपका तो रिश्ता पहले दिन से ही ननद भाभी का है, लेकिन अल्पी मेरी अच्छी सहेली है और जो उसके जीजू वो मेरे जीजू...और जो उसका हक जीजू पे वो मेरा...खास तौर से फागुन में तो जीजा साली का ...मुस्करा के वो बोली।

तो फिर भाभी से ...थोडा सा लगवा लो...हाथ में गुलाल ले के उसके गोरे गदराये गालों की ओर बढी।

ना ना भाभी ...आज नहीं होली के दिन..। होली के दिन आप चाहे जितना डालियेगा मैं मना नहीं करुंगी। उसने नखडा बनाया।

अरे चल जरा सा बस सगुन के लिये...और मैने थोडा सा गुलाल गाल में लगा दिया। देख कितना सुंदर लगता है तेरे गोरे गाल पे ये गुलाल...और फिर मैने एक चुटकी माथे पे भी लगा दिया और फिर दुबारा गाल पे लगा के अबकी कस के मीज दिया। कितने मुलायम गाल हैं, इनके और नन्दोई जी के हाथ आ गये तो कच कचा के काटे बिना छोडेंगे नहीं, और कस कस के मसलेंगें।

झुक के प्लेट से उसने भी अबीर उठा ली...थोडा मैं भी तो लगा दू और मेरे चेहरे पे लगाने लगी।

गाल से मेरा हाथ गले पे आ गया। हल्का सा गुलाल मैने वहां भी लगा दिया।

वो मेरा इरादा सम्झ गई और जोर से उसने दोनो हाथ गले के पास ला के मेरा हाथ रोकने की कोशिश की, नहीं भाभी वहां नहीं।

क्यों वहां कोई खास चीज है क्या और उसके रोकते रोकते....मैं बहोत ननदों से होली खेल चुकी थी...मेरा हाथा सीधे उसके कबूतर पे..।

क्या मस्त उभार थे, इस उमर में भी आल्मोस्ट मेरी साइज के...खूब कडे...मेरे हाथ पहले उसके उरोज के उपर के हिस्से पे...एक बार होली में जब हाथ ब्रा के अंदर घुस जाय तो निकालना मुश्किल होता है....और थोडी देर में ही मेरा हाथ कस कस के मींज रहा था, दबा रहा था, चल तेरे जीजू जबतक नहीं आते भाभी से ही काम चला मैने चिढाया.।

धत्त भाभी...मैने ऐसा तो नहीं कहा था...बस हो गया प्लीज ....हाथ ....निकाल....ओह ..ओह..।

चल तू भी क्या याद करेगी किस सीधी भाभी से पाला पडा था और मैने हाथ ब्रा से तो निकाल लिया लेकिन उस हाथ से उसका कुर्ता पूरी तरह फैला के रखा और दूसरे हाथ से बडी प्लेट का गुलाल उठा के ( उसमें पक्का सूखा लाल रंग भी मिला हुआ था) सीधे उसके कुर्ते के अंदर...ब्रा ....ब्रा के अंदर लाल...लाल। अ

अरे एक गलती हो गई...ननद की मांग तो भरी ही नहीं...और ढेर सारा गुलाल ...उसकी मांग में...अब चल तेरी मांग मैने भरी है, तो सुहाग रात भी मैं मनाउंगी मैने चिढाया।

भाभी अब मुझे भी तो लगाने दीजिये...वो बोली।

एक् दम बोल कहो कहां लगाना है और मैने खुद आंचल हटा दिया, मेरे लो कट ब्लाउज से....वो गाल ...गले से होते हुए मेरे उभार तक..।

और मौके का फायदा उठा के मैने उसके कुर्ते के सारे बटब खॊल दिये...ब्रा साफ साफ दिख रही थी। गुलाल से रंगी...।

 


मैने तेरे एक कबूतर पे तो गुलाल लगाया दूसरे पे नहीं ...और मैने अबकी खुल के अंदर हाथ डाल के उसका दूसरा जोबन पकड लिया।

मेरा दूसरा हाथ उसके शलवार के नाडे पे था।

१० मिनट के अंदर हम दोनों के कपडे दूर पडे थे,,,अबीर गुलाल से लथ पथ...हम दोनो सिक्स्टी नाइन की पोज में....मेरी जीभ उसकी जांघॊं के बीच में और उसकी मेरी ...जैसे अखाडे में लड रहे पहलवानों की देह धूल मिट्टी में लिपटी रह्ती है...उसी तरह गुलाल अबीर में लिपटी हम ननद भौजाइ, एक किशोरी एक तरुणी..।

गुलाल से सने मेरे दोनों हाथ अभी भी उसके चूतड रंग रहे थे और जीभ....कभी उसकी लेबिया को फ्लिक करती, कभी क्लिट को...।

और दिया उमर में कम भले हो लेकिन अनुभव में कम नहीं लग रही थी। उसके भी हाथ, उंगलिया, जीभ मेरे तन मन को रंग रहे थे।

हम दोनों एक दूसरे को किनारे पे पहुंचाते पहुंचाते रुक जाते...और फिर से शुरु हो जाते।

तभी मुझे जीत और इनकी आवाज सुनाई पडी...।

आ जाओ तुम दोनों के लिये गिफ्ट है ...मैने हंस के दावत दी।

और राजी्व ने तो जब से पहली बार दिया को देखा था तब से...उनका उसके लिये तन्नाया था। वो मेरे सर की ओर आये । एक हाथ से मैने दिया की लेबिया कस के फैलाई और राजीव का बीयर कैन ऐसा मोटा लंड पकड के उसकी चूत में लगा दिया। राजीव ने कस के उसके दोनों किशोर चूतड पकडे और पूरी ताकत से एक बार में अपना हलब्बी लौंडा पेल दिया।

उईईईईईईईईईईईई माआआआआं......हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

पीछे से नन्दोई जी ने अपना लंड मेरी चूत में पेल दिया था। फिर तो दोनों ने हम दोनों की एक साथ हचक हचक के वो चुदाइ की...सिक्स्टी नाइन करते चुदवाने का ये मेरा पहला मौका था.।

मैं राजीव के मोटे लंड को दिया की चूत में रगडते, फैलाते घुसते देख रही थी.।

मेरी जीभ अब भी चुप नहीं थी....वो अब राजीव के मोटॆ चिकने लंड को चाट रही थी जब तक वो दिया की कसी चूत में कच कचा के घुसता...और जब पूरा लंड दिया की चूत में होता तो मेरे होंठ कस के उसकी क्लिट को चूसते, भींचते और हल्के से काट लेते.।

दिया की जीभ भी यही बदमाशियां कर रही थी। मैं मजे से एक साथ ननद और ननदोइ का मजा लूट रही थी होली में...और आधे घंटे की नान स्टाप चुदाइ के बाद हम चारों एक साथ झडे।

जब दिया उठी तो उसने एक खुश खबरी दी...अल्पी और गुड्डी के क्लास की आज फेयर वेल थी और उसकी तीन सहेलियां आ रही थी होली खेलने, मधु, शिखा और नीतू।

चलो तैयार हो जाओ तुम दोनॊं...मैने उनसे और ननदोई जी से कहा।

एक दम फटा फट...और दोनो गायब हो गये।

थोडी देर में तूफान की तरह तीनों दाखिल हुयीं।

जैसे गुलाल और अबीर के इंद्र धनुष आ गयें हो लाल गुलाबी पीले धानी चुनरियां दुपटे...और दिया भी उनके साथ शामिल हो गई।

मधु टाप और जीन्स में, शिखा चुनरी और चोली में और नीतू स्कूल के सफेद ब्लाउज और स्कर्ट में....।

रंग, गुलाल से लैस हाथों में पहले से रंग लगाये..।

ब्रज में आज मची होरी ब्रज में...।

अपने अपने घर से निकरीं कोई सांवर कोई गोरी रे...।

कोइ जोबन ...कोइ उमर की थोरी रे..।

और ये और जीत भी सफेद कुर्ते पाजामें में बेकाबू हो रहे थे।

हे नहीं मैने उन सबों के अरमानों पे पानी फेर दिया, चलो पहले एक दो मेरे साथ किचेन में हेल्प कराओ और हां रंग वंग सब पीछे....पहले मैं अपनी ननदों कॊ खिला पिला लूंगी फिर होळी और ....उन लडकियों से मैने पूछा, तुम लोग तो सिर्फ ननदोइ जी से खेलोगी ये तो तुम्हारे भाई लगेंगें।

नहींंंंंंंंंंंं अब समवेत स्वर में चिल्लाइं। अल्पी के जीजू तो हमारे भी जीजू।

 


गुड्डी तो मुझे मालूम था की नहीं आयेगी। उसकी बडी बहन लाली ने तय किया था की वो आज ही होली का सब काम खतम कर लेंगी और कल सिर्फ औरतों लडकियों की होली...और उसमें वो लेसबियन कुश्ती ...भी होनी थी ....मेरी और लाली की...तो कल तो टाइम मिलता नहीं...पर अल्पी...मेरे पूछे बिना नीतू बोली, भाभी वो थोडी थकी थकी लग रही थी...फिर उसको भी घर जल्दी लौटना था। मैं समझ गई कल इन्होने वो हचक के उसे चोदा था ....होली थी ...छोटी साली थी और फिर कल की गुड्डी के घर होने वाली होली में मेरी असिस्टेंट तो वहॊ थी। तो उसे भी होली का सब काम आज ही निपटाना था।

किचेन में ढेर सारी गरम गुझिया बना के मैं और नीतू बाहर आये तो वहां दिया, शिखा और मधु ने सब इंतजाम कर दिया था। घर के पिछवाडॆ एक छोटा सा पांड जैसा था, छाती तक पानी होगा, मैने पहले ही टेसू डाल के उसे रंगीन कर दिया था चारों ओर दहकते हुये पलाश के पेड, बौराये हुये आम.। खूब घने पेड आउर चारों ओर दीवार भी....मैने अपनी ननदों को सब समझा दिया...यहां तक की ट्रिक भी बता दिया...जीत मेरे ननदोइ और उनके जीजा...उन्हे गुद गुदी बहोत लगती है और ये ...ये तो बस दो चार लड्कियां रिक्वेस्ट कर लें चुप चाप रंग लगवा लेंगें...उन्हे मैने ढेर सारे रंग भी दिये। तब तक जीत और ये भी आ गये मैने सब को जबर्न गुझिया खिलाई और ठंडाई पिलाई...ये कहने की बात नहीं...की सबमें डबल भांग मिली हुई थी। और बोला,

चलिये सबसे पहले इतनी सुंदर सेक्सी ननदें आई हैं रंग खेलने इसलिये पहले आप दोनों चुप चाप रंग लगवा लें...एक एक पे दो...दो...उन के मुलायम किशोर हाथों से गालों सीने पे रंग लगवाने में उन दोनों को भी मजा आ रहा था। लेकिन होली में कोइ रुल थोडी चलता है पहले तो मधु के के टाप में जीत ने हाथ डाला और फिर फिर शिखा की चोली में इन्होने घात लगाई। और वो सब साल्लीयां आई भी तो इसीलिये आई थीं। और फिर तालाब में पहले नीतू..और फिर जो जाके निकलती वो दूसरे को भी। ....शिखा थोडा नखडा कर रही थी...लेकिन सबने मिल के एक साथ उसे हाथ पांव पकड के पानी में...और जब वो सारी निकलीं तो...देह से चिपके टाप, चोली, चूतडों के बीच में धंसी शलवार, लहंगा...सब कुछ दिखता है....तब तक इन्होने मेरी ओर इशारा किया और जब तक मैं सम्हलूं...चारों हाथ पैर ननदो के कब्जे में थे और मैं पानी में....दो ने मिल के मेरी साडी खींची और दो ने सीधे ब्लाउज फाड दिया। मुझे लगा की जीत या कम से कम ये तो मेरी सहायता के लिये उत्रेंगे लेकिन ये बाहर खडे खडे खी खी करते रहे...खैर मैने अकले ही किसी का टाप किसी का ब्लाउज...और हम सब थोडी देर में आल्मोस्ट टापलेस थे और उसके बाद उन दोनों का नम्बर था।

अब तक भांग का असर पूरी तरह चढ गया था...फिर तो किसी के पैंटी मे हाथ था तो किसी के ब्रा में और मैने भी एक साथ दो दो ननदों की रगडाइ शुरु कर दी।

सालियां ४ और जीजा दो फिर भी अब अक उन के कपडे बचे हैं कैसी साली हो तुम सब....और फिर चीर हरण पूरा हो गया।

हे इतनी मस्त सालियांं और अभी तक ...बिना चुदे कोई गई तो...अरे लंड का रंग नहीं लगा तो फिर क्या जीजा साली की होली....मैने ललकारा....फिर तो वो बो होल्ड्स बार्ड होली शुरु हुई...।

जो उन दोनों से बचती उसे मैं पकड लेती...।

तीन चार घंटे तक चली होली....तिजहरिया में वो वापस गई<

अगले दिन गुड्डी के घर` सिर्फ औरतों की होली...सारी ननद भाभीयां...१४ से ४४ तक....और दरवाजा ना सिर्फ अंदर से बंद बल्की बाहर से भी ताला मारा हुआ...और आस पास कोइ मर्द ना होने से...आज औअर्तें लडकियां कुछ ज्यादा ही बौरा गईं थी। भांग,ठंडाइ का भी इसमें कम हाथ नहीं था। जोगीडा सा रा सा रा...कबीर गालियों से आंगन गूंज रहा था। कुच बडी उमर की भौजाइयां तो फ्राक में छोटे छोटे टिकोरे वाली ननदों को देख के रोक नहीं पा रहीं थीं.रंग, अबीर गुलाल तो एक बहाना था। असली होली तो देह की हो रही थी.....मन की जो भी कुत्सित बातें थी जो सोच भी नहीं सकते थे...वो सब बाहर आ रही थीं। कहते हैं ना होली साल भर का मैल साफ करने का त्योहार है, तन का भी मन का भी...तो बस वो हो रहा था। कीचड साफ करने का पर्व है ये इसीलिये तो शायद कई जगह कीचड से भी होली खेली जाती है..और वहां भी कीचड की भी होली हुई।

 


पहले तो माथे गालों पे गुलाल, फिर गले पे फिर हाथ सरकते स्ररकते थोडा नीचे...।

नहीं नहीं भाभी वहां नहीं....रोकना , जबरद्स्ती...।

अरे होली में तो ये सगुन होता है....।

उंह..उंह....नहीं नहीं..।

अरे क्यों क्या ये जगह अपने भैया केलिये रिजर्व की है क्या या शाम को किसी यार ने टाइम दिया है...फिर कचाक से पूरा हाथ...अंदर..।

और ननदें भी क्यों छोडने लगी भौजाइयों को...।

क्यों भाभी भैया ऐसे ही दबाते हैं क्या....अरे भैया से तो रात भर दबाती मिजवाती हैं हमारा जरा सा हाथ लगते ही बिचक रही हैं..।

अरे ननद रानी आप भी तो बचपन से मिजवाती होंगी अपने भैया से...तभी तो नींबू से बडके अनार हो गये...आपको तो पता ही होगा और फिर भाभी के हाथ में ननद के...अरे ऐसे ...नही ऐसे दबाते हैऔर निपल खींच के इसे भी तो..।

तब तक कोई और भौजाई, शलवार में हाथ डाल के...बिन्नो बडा छिपा के माल रखा है...अरे आज जरा होली के दिन तो अपनी बुल बुल को बाहर निकालो....और उस के बाद साडी साया...चोली ब्लाउज सब रंग से सराबोर और उस के बाद पकड पकड के रगडा रगडी...।

मेरी और लाली भौजी की भी होली की कुश्ती शुरु हुयी।

पहला राउंड उनके हाथ रहा, मेरी साडी उन्होने खींच के उतार ली और ये जो वो जा, देखते देखते सब ननदों में चिथडे चिथडॆ हो बट गयी।

लेकिन मैने हाथ उनके ब्लाउज पे मारा...और थोडी देर में वो टाप लेस थी। ब्लाउज में हाथ डाल के होली खेलते समय मैने उनके ब्रा के हुक पहले से ही खॊल दिये थे.बेचारी जब तक अपने जोबन छुपाती, साडी भी गई और दोनों हाथों में पक्के रंग लगा के मैने कस के उनकी चूंचीया मसली रगडी...जाके अपने भैया से रगड रगड के छुडवाना...कोइ भाभी बोलीं।

टाप लेस तो थोडी देर में मैं भी हो गई। फिर पहले तो खडे खडे,,,फिर पैर फंसा के उनहोने मुझे गिरा दिया और फिर ना सिर्फ रंग बल्की कीचड, सब कुछ....अपनी ३६ डी चूंचीयों से मेरी चूंचीयां रगडती....लेकिन जब वो मेरी चूंचीयों का मजा ले रही थी मैने हाथ जांघो मे बीच कर सीधे साये का नाडा खॊल दिया और जैसे ही वो उठी, पकड के खींच दियां और वो सिर्फ पैंटी में।

पहला राउंड एक दूसरे के सारे कपडॆ उतारने तक चलना था और पैंटी उतारना बहोत मुश्किल हो रहा था। जब हाथ थक गये तो मैने होंठों का सहारा लिया...पहले तो उसके उपर से जम के होंठ रगडे। मुझे मालूम था की उनके चूत पे होंठों का क्या असर होता है। ये सिक्रेट मुझे ननदोइ जी ने खुद बताया था। और साथ में दांत लगा के मैने पैंटी में थोडी चीर लगा दी पिर पहले तो दो उंगली डाल के , फिर हाथ से उसे तार तार कर दिया और दोनों हाथों मे लहरा के अपनी जीत का ऐलान कर दिया। यही नहीं, पीछे से उन्हे पकड के...उनकी टांगों के बीच अपनी टांगे डाल के अच्छी तरह फैला दिया। उनकी पैंटी के अंदर मैने जो लाल पीला बैंगनी रंग लगाया था वो सब का सब साफ साफ दिख रहा था...और मेरी उंगलियों ने उनकी बुर को फैला के सबको दर्शन करा दिये..।

अरे देखॊ देखॊ..ये वही चूत है जिसके लिये शहर के सारे लडके परेशान रहते थे...एक ने आ के देखते हुये कहा तो दूसरी बोली लेकिन लाली बिन्नो ने किसी का दिल नहीं दुखाया सबको खुश किया। और उसके बाद गुलाल, रंग सीधे बाल्टी...।

लेकिन लेज कुश्ती का अंत नहीं था अभी तो...फिर सेकेंड राउंड शुरु हुआ...और चारॊं ओर से ननदों भाभीयों का शोर...।

अरे चोद दे ननद साली को गली के गदहों कुत्तॊ से चुदवाती है आज पता चलेगा..।

अरे क्या बोलती हो भाभी....रोज तो हमारे भैया से चुदवाती हो। इस शहर का लंड इतना पसंद था तभी तो मां बाप ने भेजा यहां चुदवाने को...और तुम तो तुम तुम्हारी बहने भी अपने जीजा के लंड के लिये बेताब रहती हैं...ननदें क्यों चुप रहती। अरे इनकी बहने तो बहने....भाई भी साले गांडू हैं।

ये राउंड बहोत मुश्किल हो रहा था...मैं उन्हे नीचे नहीं ला पा रही थी। लेकिन तभी मुझे गुद गुदी की याद आई...और थोडी देर में मैं उपर थी...दोनों टागों के बीच मेरी चूत उनके चूत पे घिस्सा मार रही थी। फिर दो उंगलियों के बीच दबा के कस के मैने पिंच किया...उनकी क्लिट...और दांतों से उनके निपल कच कचा के काट लिये....इस तिहरे हमले से १० मिनट में उन्होने चें बोल दिया.फिर तो वो हल्ला बोला भाभीयों ने ननदों पे ...कोइ नहीं बचा।

और मैं भी अपनी ननद कॊ क्यों छॊडती.पिछली बार तो मैं घर पे भूल गई थी पर आज मेरी असिस्टेंट अल्पी पहले से तैयार थी...१० इंच का स्ट्रैप आन डिल्डॊ...और फिर तो लाली ननद की वो घचाघच चुदाई मैने की की वो अपनी स्कूल में चुदाई भी भूल गई।

क्यों ननद रानी याद है ना हारने वाली को सारे मुहल्ले के मर्दों से चुदवाना पडेगा...जोर से मैने पूछा।

हां...सारी भाभीयां एक साथ बोलीं..।

और उसमें मेरे सैंयां भी आते हैं...हल्के से मैने कान में कहा।

अब हार गयी हूं तो और कस के धक्का नीचे से लगाती बोलीं तो शर्त तो माननी पडेगी।

और फिर तो उंगली, फिस्टिंग...कया नहीं हो रहा था...और दूबे भाभी के यहां हुआ वो तो बस ट्रेलर था...मैने भी लाली ननद के बाद अपनी कमसिन ननदों को नहीं छोडा..सब कुछ किया करवाया। इसके बाद तो मर्दों से चुदवाना उनके लिये बच्चों का खेल होगा।

और अगले दिन होली के दिन....जब होली के पहले ...ये मस्ती थी...मुहल्ले भर के भाभियों ने तो इनको पकडा ही अल्पी की सहेलियों ने भी....और फिर मुह्ल्ले के लडके भी आ गये और सारे देवरों ने कुछ भी नहीं छोडा....दिन भर चली होली। कीचड पेंट वार्निश और कोई लडका नहीं होगा जिसके पैंट में मैने हाथ न डाला हो या गांड में उंगली ना की हो...और लडकों ने सबने मेरे जोबन का रस लूटा...और ननदों कॊ भी...यहां तक की बशे में चूर इन्हे इनकी भाभीयां पकड लाई और मैने और दूबे भाभी ने लाली को पकड के झुका रखा था...और पीछे से अल्पी ने पकड के अपने जीजा का लंड सीधे उनकी बहन की बुर में...।

शाम को कम्मो का भी नम्बर लग गया। हम लोग उसके यहां गये...अल्पी नहीं थीं। उसकी मम्मी बोली की अपने सहेलियों के यहां गई और सब के यहां हो के तुम लोगों के यहां पहूंचेगी ३-४ घंटे बाद। कम्मॊ जिद करने लगी की मैं जीजा की साथ जाउंगी। मैं बोल के ले आई और फिर घर पहुंच के..।

मैने अपनी चूंची उस कमसिन के मुंह में डाल दी थी और टांग उठा के ...होली के नशे में हम तीनों थे। थोडा चीखी चिल्लाई पर...पहली बार में तो आधा लेकिन अगली बार में पूरा घोंट लिया।

अगले दिन जैसा तय था गुड्डी को ले के हम वापस आ गये।

उस के साथ क्या हुआ ये कहानी फिर कभी....।

लेकिन जैसी होली हम सब की हुई इस २१ की वैसी होली आप सब की हो ....सारे जीजा, देवर और नन्दोइयों की और

सारी सालियों सलहजों भाभीयों की।

समाप्त

 
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