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Romance आ अब लौट चले

ओल्डएज होंम में सभी मिल जुलकर नवरात्री की तैयारियों में लगे थे और दूसरी तरफ एक भयंकर साजिश की जा रही थी रवि ओर विकास दोनो बड़ी बहू के भाई निवास की बातों में आ गए , निवास के साथ मिलकर वे लोग घर के कागजात बनवाने लगे

नवरात्रि का पहला दिन था पूरे रीति रिवाजों के साथ माँ की मूर्ति की स्थापना हुई और धूमधाम से पूजा हुई जैसा कि सबने सोचा था वैसा ही हुआ आने वाले लोगो ने प्रशाद लिया , दानपात्र में पैसे दिए असलम के लगाए मनोरंजन वाले स्टाल पर सभी ने टिकट्स खरीदे भूख लगने पर सभी ने वहां से खरीदकर अपनी पसंद का खाना खाया ,, वहां एक मेले जैसा आयोजन हो गया था शाम तक भीड़ वैसे ही रही और रात की माँ की पूजा अर्चना के बाद सभी ओल्डएज होंम लौट आये दो लोग वही माँ के दरबार मे सो गए

सभी बरामदे में बैठकर सुस्ता रहे थे सुबह से अब उन्हें आराम मिला था अमर ने पानी पीकर मुंह पोछते हुए कहा - अगर भीड़ ऐसे ही रही तो हम जल्दी ही बाकी के पैसे जमा कर लेंगे

"हा अंकल आप सबने आज बहुत मेहनत की है , आप लोगो का ये अहसान मैं कभी नही भूलूंगा ",अनुज ने हाथ जोड़ते हुए कहा

"कैसी बात कर रहे हो बेटा ? हम लोगो ने कोई अहसान नही किया है ,, सुनिधि हमारी बेटी जैसी है और बेटी की गोद भराई का सामान उसके पीहर से आता है बस यही संमझ के इन्हें रख लो ",मोहन ने सारे पैसे अनुज को थमाते हुए कहा

अनुज ने पैसे रख दिये और नोकर से सबके लिए खाना लगाने को कहा खाने के बाद सभी सोने चले गए लेकिन अमर बाहर बरामदे में सीढ़ियों पर बैठा था , सुमित्रा ने देखा तो उसके पास चली आयी और कुछ दूर बैठकर कहा - क्या बात है तुम सोए नही ?

"नींद नही आ रही थी , अनुज ओर सुनिधि के लिए हम सब जीतना करे उतना कम होगा सुमि इन बच्चों ने हमे बिना किसी स्वार्थ के बहुत कुछ दिया है ",अमर ने कहा

"हम्म्म्म , तुम चिंता मत करो यहां आओ",सुमि ने सीढ़ियों पर पैर सीधे करके कहा

अमर ने उसकी ओर देखा तो सुमि ने उसे अपना सर गोद मे रखने को कहा अमर झिझका तो सुमि ने कहा - तुम कहते थे ना अमर हर प्रेमिका में एक माँ छुपी होती हैं ,, इस वक्त एक माँ तुम्हे बुला रही है प्रेमिका नही "

सुमि की बात सुनकर अमर ने अपना सर उसकी गोद मे रख दिया , सुमि उसका सर सहलाने लगी , एक सुखद अनुभूति वैसी ही जैसी वह बचपन मे अपनी माँ की गोद में सर रखकर महसूस किया करता था अमर कुछ देर शांत रहा और फिर कहने लगा - अपने वक्त में तुम एक बहुत अच्छी माँ रही होगी सुमि वो बच्चे बदनसीब होंगे जो तुम्हारा निस्वार्थ प्रेम नही देख पाए ""

"बीती बातों को याद करके सिर्फ खुद को तकलीफ पहुँचाई जा सकती हैं अमर , माँ बाप हमेशा बच्चों के लिए जीते है उनका भार अपने कंधों पर उठा लेते है लेकिन जैसे जैसे बच्चे बड़े होते है माँ बाप उनके लिए बोझ बन जाते है ये ओल्डएज होंम उन्ही बोझ का उदाहरण है !",सुमि ने कहा

"लेकिन वो ये भुल जाते है कि एक उम्र के बाद उन्हें भी उम्रदराज होना है ,, ओर तब ये सोचकर डर लगता है कि कही उनके बच्चे उनके साथ ऐसा ना करे",अमर ने कहा

सुमि खामोशी से उसके बालो में उंगलियां फिराती रही कुछ देर की खामोशी के बाद अमर ने कहा - लेकिन मैं खुश हूं सुमि की मैं यहां आया और मरने से पहले तुमसे ,,,,,,,,,,,,

"शशशश ऐसी बात मत कहो , अब किसी अपने का जाना देख नही पाऊंगी",सुमि ने अमर के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा

अमर ने उसका हाथ हटाया ओर कहा - मौत तो एक अटल सत्य है सुमि , ओर अब खुशी इस बात की है कि अपनी जिंदगी के आखरी दिनों में मैं तुम्हारे साथ हु

"ये वक्त हमेशा यादगार रहेगा अमर ",सुमि ने कहा

"सुमि कुछ सुनाने को कहु तो सुनाओगी",अमर ने कहा

सुमि मुस्कुराने लगी और कहा - इस उम्र में कहा ये सब

"सुनाओ ना , शायद उस से नींद आ जाये",अमर ने कहा

सुमि गुनगुनाने लगी - तुम हो कह दो तो आज की रात , चाँद डूबेगा नही

रात को रोक लो ,,

तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नही

रात को रोक लो

आज की रात है और जिंदगी बाकी तो नही

तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही , शिकवा नही , शिकवा नही , शिकवा नही

कुछ ही देर में अमर को नींद आ गयी सुमि ने भी खम्बे से सर लगा लिया ओर अमर के बालों में उंगली घुमाती रही चाँदनी रात के सन्नाटे में दोनो वही सीढियों पर सो रहे थे अनुज किसी काम से बाहर आया तो उन्हें वहां देखकर मुस्कुरा उठा अंदर गया और एक चद्दर लाकर दोनो को ओढा दी पीछे खड़ी सुनिधि सब देख रही थी अनुज उसके पास आया तो उसने कहा - क्या ये दोनों हमेशा के लिए साथ नही रह सकते ? एक दूसरे का साथ पाकर इनके चेहरे पर जो सुकून है वो आज तक किसी के चेहरे पर नही देखा मैंने ,,दोनो एक दूसरे से बिल्कुल अलग है लेकिन एक दूसरे के साथ है

"तुम सही कहती हो सुनिधि बस इन दोनों को किसी की नजर ना लगे ",अनुज ने कहा तो सुनिधि उसके सीने से लगी मुस्कुराती हुई उन दोनों को देखने लगी

क्रमशः
 
अमर की सुबह नींद खुली तो खुद को बरामदे में पाया बगल में ही सुमि खम्बे से सर लगाए सो रही थी अमर ने उसे उठाया और अंदर जाने को कहा नहा धोकर सभी पंडाल में पहुंचे और फिर अपने अपने कामों में लग गए आज दूसरा दिन था ओर भीड़ भी पहले दिन से ज्यादा थी दोपहर तक सभी अपने अपने कामों में लगे रहे दोपहर बाद सबने खाना खाया सिवाय अमर ओर सुमि के ,, अमर हिसाब किताब में लगा हुआ था सुमि ने देखा बर्तनों में सिर्फ एक व्यक्ति के खाने का सामान था उसने खाना थाली में लगाया तब तक अमर भी हाथ मुंह धोकर आ पहुंचा सुमि ने उसके सामने खाने की थाली रखी तो अमर ने कहा - तुमने खाया ?

"तुम खाओ , मैं बाद में खा लुंगी ",सुमि ने कहा

"बाद में क्यों अभी खाओ , जाओ अपने लिए भी थाली ले आओ",अमर ने निवाला तोड़कर कहां

"वो आज खाना कम बना था",सुमि ने कहा

"ओर तुमने सारा मेरी थाली में परोस दिया",अमर के हाथ से निवाला छूट गया

"मुझे अभी भूख नही है अमर तुम खाओ",सुमि ने सामने बैठते हुये कहा

अमर ने पास पड़ी खाली थाली में अपनी थाली से आधे चावल निकाले , चार रोटियों में से 2 सुमि के लिए रखी , दाल और सब्जी को भी आधा आधा करके दूसरी थाली में परोस दिया

थाली सुमि की ओर खिसका कर कहा - जब एक दूसरे का दर्द बांट सकते है तो फिर खाना क्यों नही ? खाओ !"

सुमि की आँखों मे आंसू भर आये लेकिन ये आंसू खुशी के आंसू थे दोनो ने खाना खाया और फिर अपने अपने कामो में लग गए दिन गुजरते जा रहे थे और रुपये भी जमा हो रहे थे सभी बहुत खुश थे इन कुछ दिनों में सुमि ओर अमर एक दूसरे का ख्याल रखते रखते ओर करीब आ चुके थे अपने अतीत को लेकर अब उनके मन मे कोई दर्द नही था बल्कि वो आने वाले वक़्त की खुशियां देख रहे थे

नवरात्र की आखरी रात थी , पूजा समाप्ति के बाद खाली पंडाल में बैठे अमर ओर बाकी सब सुस्ता रहे थे अनुज ओर सुनिधि भी वही थे सभी खुश थे और एक सुकून सबके चेहरे पर मौजूद था

नवरात्रि समापन के बाद अनुज ने पैसे जोड़े तो वो उनकी सोच से भी ज्यादा थे अनुज ने जो लोन लिया था उसकी दुगुनी रकम चुकाने के बाद भी उसके पास डेढ़ लाख बचे थे जिनमें से उसने ओल्डएज बुजुर्गों से लिये सभी लोगो के पैसे वापस कर दिये थे अमर को उसके जमा पैसे 4500 रुपये मिले थे उन्हें लेकर वह पास के ही बाजार आया वहां से उसने सुमि के लिए एक बनारसी साड़ी ओर एक जोडी चांदी की पायल खरीदी

शाम को घर आया तो बहुत खुश था क्योंकि कुछ दिन बाद ही सुमि का जन्मदिन था और अमर ये उसे तोहफे में देना चाहता था दो दिन बाद अनुज ने सबको इक्कठा किया और कहा - इस ओल्डएज होंम को बने 5 साल हो चुके है ओर इसी खुशी में कल एक छोटा सा प्रोग्राम है जिसके मुख्य अतिथि होंगे अमर अंकल ओर सुमित्रा जी"

सभी खुशी से तालिया बजाने लगे अमर को याद आया कल तो सुमि का जन्म दिन भी है वह बहुत खुश हुआ अनुज नेओल्डएज होंम में रहने वाले सभी लोगो के घर पर फोन किया और कल के प्रोग्राम में आने को कहा रवि ओर विकास को न्योता मिला तब बड़ी बहू का भाई भी वही था उसने खुशी से कहा - यही सबसे अच्छा मौका है , कल चलो वहां ओर खत्म कर दो इस कहानी को

"भैया कुछ होगा तो नही न , कही ये दोनों फंस जाए",बहन ने कहां

"फसेंगे तब ना जब वो बूढ़ा जिंदा रहेगा , कल का दिन उसकी जिंदगी का आखरी दिन होगा",उसने अपने नापाक इरादों को भांपते हुए कहा

अगले दिन ओल्डएज होंम में प्रोग्राम की सारी व्यवस्थाएं हो चुकी थी अमर ने सुमि को तोहफा दिया सुमि ने वह साड़ी पहन ली सभी लोगो के घरवाले आ रहै थे उन्हें देखकर सुमि ने अमर से कहा - मुझे नही लगता मेरी बेटी और बेटा आज आएंगे , मैं चलकर अंदर की व्यवस्था देख लेती हूं तुम रुको शायद तुम्हारे बच्चे आ जाये

सुमि वहां से चली गयी अमर को उसके लिए बहुत दुख हो रहा था कुछ देर बाद एक गाड़ी आकर रुकी उसमें से रवि विकास अपनी अपनी पत्नियों के साथ नीचे उतरे तीनो बच्चे भी साथ थे गाड़ी से उतरते ही तीनो दादाजी दादाजी कहते अमर की ओर दौड़े अमर भी उनसे लिपट गया और उन्हें गले लगा लिया

दोनो बेटे और बहू अमर के सामने आए अमर ने उन्हें देखा और जाने लगा तो विकास ने कहा - हम सबको माफ कर दीजिए पाप , मैं जानता हूं हम में से कोई भी आपकी माफी के लायक तो नही है लेकिन फिर भी हम सब अपने किए के लिए शर्मिंदा है

"क्या फिर से कोई नया ड्रामा है ये",अमर ने कहा

"नही पापा इस बार कोई ड्रामा नही है हमारी आंखे खुल चुकी है हमने आपको बहुत दुख दिए , बेइज्जत किया लेकिन बदले में आपने हमेशा हम सबको प्यार दिया , बस इसी ने हम सबका दिल पिघला दिया ,, हमे माफ कर दो पापा !",रवि ने अमर के हाथों को पकड़कर कहा

"हा पापाजी हम सबको माफ कर दीजिये",दोनो बहुओं ने अमर के पैरो में गिरते हुए कहा

"अरे अरे ये क्या कर रही हो तुम दोनो ? घर की लक्ष्मी ऐसे पैरो में , ना बेटी तुम्हे अपनी गलतियों का अहसास हुआ वही काफी है मैंने तुम सबको माफ किया आओ अंदर चलते है ",अमर ने दोनो बहुओं को उठाते हुए कहा

"पापा ये लो",विकास ने डिब्बा अमर की ओर बढ़ाकर कहा

"ये क्या है ?",अमर ने कहा

"आपको माँ के हाथ की बनी खीर बहुत पसंद हैं ना , माँ तो अब नही रही इसलिए हम चारो ने मिलकर इसे आपके लिए बनाया है ",विकास ने कहा

अमर ने सुना तो उसकी आंखों में आंसू भर आये , उसने सोचा भी नही था बच्चे इतना बदल जाएंगे उन्होंने मुस्कुराते हुए डिब्बा लिया और खोलकर सूंघते हुए कहा - अहम्म खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है तुम सब अंदर हॉल में चलो मैं आता हूं

सभी अंदर चले गए अमर खीर का डिब्बा लेकर ऑफिस की ओर आया और सुमि के पास आकर उसे अपने साथ बाहर बरामदे में ले आया

"क्या बात है अमर ?",सुमि ने कहा

"मेरे बच्चे मुझसे मिलने आये है सुमि ओर उन्होंने अपने किये के लिए मुझसे माफी भी मांगी है ओर ये देखो मेरे लिये अपने हाथों से बनाकर ये खीर भी लाये है",अमर ने खुशी से भरकर कहा

"मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रही है अमर",सुमि ने सोचते हुए कहा

"कैसी गड़बड़ ?",अमर ने कहा

"इस तरह अचानक उनका अच्छा बन जाना मेरे मन मे शक पैदा कर रहा है अमर ,, अगर उन्हें अपनी गलती का अहसास होता तो आज तुम यहाँ नही होते ",सुमित्रा ने कहा

"कैसी बाते कर रही हो सुमि ? बच्चे सच में बदल चुके है ! देखो मेरे लिए खीर लाये है",अमर ने कहा

"जरूर उन लोगो ने इस खीर में कुछ ना कुछ मिलाया है",सुमि ने कहा

"बस सुमि बहुत हो गया , तुम उनपे शक करती ही जा रही हो , कोई बच्चा भले अपने पिता के साथ इतना घिनोना काम क्यो करेंगे ?",अमर ने गुस्से से कहा

"मैं सच कह रही हु अमर , जैसा उन्होंने बर्ताव किया है उसे देखते हुए मैं उन पर भरोसा नही कर सकती आज से पहले तो वो लोग कभी कुछ नही लेकर आये फिर आज अचानक ",सुमि ने कहा

"मुझे अपने बच्चों पर भरोसा है",अमर ने कहा अमर की बात सुनकर सुमि ने उसके हाथ से खीर का डिब्बा लिया और कहा - अगर ऐसा ही है तो फिर इसे मैं खा लेती हूं ,, अगर तुम्हारे बच्चे सच्चे हुए तो मुझे कुछ नही होगा "

"ये क्या पागलपन है सुमि",अमर ने उसे रोकना चाहा लेकिन तब तक सुमि खीर के डिब्बे को मुंह से लगा चुकी थी उसने आधी खीर खाई ओर बाकी डिब्बा फेंक दिया ताकि अमर न खा सके उसकी आंखों में नमी उतर आई तो अमर ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर कहा - बच्चे सच मे बदल चुके है सुमि

सुमि ने अमर की आँखों में देखा और कहा",अगर वो बदल चुके है तो मुझे तुमसे हारने का जरा भी दुख नही होगा अमर"

अमर सुमि को वहां छोडकर अंदर चला गया ओर सुमि की नजर जमीन पर बिखरी खीर पर चली गयी

क्रमशः
 
सभी मुख्य हॉल में अपने अपने परिवारों के साथ बैठे थे अनुज ने स्टेज पर आकर सबका अभिवादन किया सुमित्रा ओर अमर मुख्य अतिथि थे इसलिए वही कुछ लोगो के साथ स्टेज पर बैठे थे अमर के घरवाले बिल्कुल सामने बैठे थे और मुस्कुरा रहे थे अनुज ने वर्षगांठ पर लेकर सबसे बातें की ओर फिर अमर से कहा - अंकल मैं चाहता हु आज आप हम सबसे कुछ शब्द कहे

अमर अपनी जगह से उठकर माइक के पास आया ओर अपना गला साफ करके कहने लगा - सबसे पहले तो मैं आप सबका तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हु की आप सब इस खुशी में शामिल हुए यहां मौजूद मैं सभी बच्चों से एक सवाल करना चाहता हु "ऐसी क्या मजबूरी थी कि आप लोगो ने अपने माँ बाप को यहां रहने के लिए भेज दिया ?"

अमर का सवाल सुनकर सभी खामोश हो गए कुछ की गर्दन झुक गयी तो कुछ इधर उधर झांकने लगे ये सब देखकर अमर ने कहा - शायद इसका जवाब आपके पास नही होगा एक दम्पति की जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल वो होता है जब उनके जीवन मे एक संतान आती है बड़े नाजो से वह दम्पति उसे पालता है पोस्ता है उसकी हर ख़्वाहिश पूरी करता है खुद भूखा रहकर अपने बच्चों को खिलाता है एक पिता दिन रात कड़ी मेहनत करता है ताकि उसके बच्चे सुख से रह सके उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाता है , बच्चे बड़े होते है तो उनके जिम्मेदार बनने में माँ बाप मदद करते है , उसकी शादी करा देते हैं और सोचते है कि हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हुए अपने लिए जिएँगे लेकिन वही बच्चे जिनके लिये उन्होने इतना कष्ठ उठाया उन्हें ऐसी जगहों पर भेज देते है (कहते कहते आंखे नम हो जाती है , आँखों के किनारे पोछकर आगे कहते है) जिन माँ बाप ने उन्हें जन्म दिया , अच्छी जिंदगी दी उन्ही माँ बाप की जिंदगी को ये जहनुम बना देते है माँ बाप अपने बच्चों से कुछ नही मांगते हमेशा यही चाहते है कि उनके बच्चे खुश रहे , आबाद रहे लेकिन वही बच्चे ये भूल जाते है कि एक दिन उन्हें भी माँ बाप बनना है और इस दौर से गुजरना है बच्चों के हिसाब से देखा जाए तो एक उम्र के बाद माँ बाप किसी काम के नही रहते है वे बच्चों पर बोझ बनने लगते है आज मैं बताता हूं उन बूढ़े माँ बाप का तुम्हारी जिंदगी में क्या रोल है ?

बूढ़े होने के बाद वो इतने सक्षम नही होते की घर के कामों में या बाहर के कामों में आपका हाथ बटा सके लेकिन ये बुजुर्ग आपके घर के सिक्योरिटी गार्ड होते है , इनके भरोसे आप अपना घर छोड़कर जा सकते है ये आपके घर के माली होते है , वो पौधे जिन्हें देखने तक कि आपको फुरसत नही होती उन्हें ये अपने बच्चों की तरह सींचते है बार बार आपको गलतियां करने से रोकते है इसलिए नही की उन्हें आपसे परेशानी है सिर्फ इसलिए क्योकि वो जानते है कि उन गलतियों से आपको भारी नुकसान हो सकता है आपके बच्चे जब आपके साथ खेलना चाहते है तब आप इतने व्यस्त होते है कि उनसे पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें महंगे खिलोने , मोबाईल हाथ मे पकड़ा देते है लेकिन वही ये बुजुर्ग उनके साथ खेलते भी है ओर उन्हें अच्छी शिक्षा भी देते है

हम्म्म्म बढ़ती उम्र के साथ बुजुर्गों की सोच ने समझने की शक्ति कम होने लगती है लेकिन फिर भी वो आपकी परेशानी आपके चेहरे से भांप लेते है लेकिन बच्चे कभी अपने माँ बाप की जरूरतों को नही समझ पाते एक फाइव स्टार होटल में खाना खाकर , वेटर को 500 रुपये टिप देना उन्हें मामूली लगता है लेकिन वही अपने पिता के टूटे चश्मे को सही कराने का खर्चा उन्हें फालतू लगता है एक बुज़ुर्ग अपने बच्चों से लजीज खाना या महंगे कपड़े नही चाहता है बल्कि इस उम्र मे वो अपने बच्चों का साथ ओर प्यार चाहता है लेकिन वो इतना बदनसीब हो जाता है कि उनके बच्चों के पास उनके लिए थोड़ा भी वक्त नही होता भगवान हर जगह नही हो सकते इसलिए उन्होंने माँ बाप बनाये , लेकिन भगवान के इन अवतार माँ बाप को ये बच्चे अपने पैरों की धूल संमझ लेते है

बचपन मे जब तुम चलते चलते लड़खड़ाते थे तो पिता तुम्हारी उंगली थामकर तुम्हे सहारा देते थे फिर आज जब बुढ़ापे में उनके कदम लड़खड़ाते है तो उनका हाथ पकड़कर उन्हें सहारा देने के बजाय उन्हें घर से निकाल देते है बचपन मे जहां माँ बाप ने मेहनत करके तुम्हे अच्छा खाना और अच्छा समान दिया तो फिर आज उन्ही माँ बाप के लिए तुम्हारे पास दो वक्त का खाना और एक जोड़ी कपड़ा क्यो नही है ??

माफ करना भावनाओ में बह गया ,, लेकिन मैं आज खुश हूं कि मेरे बच्चे यहां है अपनी गलतियों का इन्हें अहसास हुआ और ये आज यहां चले आये मैंने फैसला किया है कि मैं इन्हें वो संपति दे दूंगा जिनके ये हकदार है एक पिता होने के नाते मैं इनके लिए सब करना चाहता हु इन्हें हर सुख देना चाहता हु , इनके प्यार के सामने वो कागज के टुकड़े कुछ भी नही "

कहकर अमर रुक गया सामने बैठे उसके बेटों ने ये बात सुनी तो उनका दिल बैठ गया रवि ने फुसफुसाते हुए कहा - ये हमने क्या कर दिया भैया ? पापा हम सबसे इतना प्यार करते है और हमने उनके साथ ये सब किया हमसे बहुत बड़ी गलती हो गयी भैया ,बहुत बड़ी गलती हो गयी"

विकास की आँखों से आंसू बहने लगे अमर ने आगे कहना शुरू किया - अंत मे मैं अनुज ओर सुनिधि जी का शुक्रिया अदा करता हु जिन्होंने हम सबको ये छत दी , जीने की वजह दी सामने बैठे बच्चों से कहना चाहूंगा कि माँ बाप कभी बोझ नही होते है ,, इनके प्यार ओर साथ से आपकी जिंदगियां खुशियों से भर जाएगी बस जरूरत है इन्हें समझने की किसी को मेरी बातों सव ठेस पहुंची हो तो माफी चाहता हु "

अमर ने हाथ जोड़े ओर अपनी कुर्सी की ओर बढ़ गया वहां सामने बैठे सभी बुजुर्गों की आंखे नम थी और बच्चों के सर शर्म से झुके हुए थे उन सबको अपने किये का बहुत पछतावा था प्रोग्राम खत्म होने के बाद सभी खाना खाने लगे आज सभी बच्चे अपने अपने पेरेंट्स के साथ थे उन्हें अपने हाथों से खिला रहे थे कोई आँखों मे आंसू लिए अपने किये की माफी मांग रहा था तो कोई गले लग गीले शिकवे भुला रहा था खाने के बाद वहां आये सभी बच्चों ने अनुज से बात की ओर अपने अपने माँ बाप को घर ले जाने लगे अमर ये देखकर बहुत खुश था अनुज ओर सुनिधि भी बहुत खुश थे

सभी एक एक करके जा रहे थे अमर बरामदे में खड़ा था तभी उसके दोनो बेटे और बहू वहां आये विकास ने कहा - पापा वो खीर

"माफ करना बेटा इतने प्यार से तुम लोग मेरे लिए खीर लेकर आये और मैं उसे खा ही नही पाया",अमर ने कहा

विकास ओर रवि ने चैन की सांस ली और अमर का हाथ पकड़कर कहा - हम लोगो को माफ कर दो पापा हम सबने आप लोगो का बहुत दिल दुखाया है चलिए पापा घर चलिये वो घर जो आपका अपना है , हमे आप चाहिये वो घर नही

"हा पापा भैया सही कह रहे है , आज आपकी बातों ने हम सबकी आंखे खोल दीं चलिये पापा घर चलते है",रवि ने कहा

बेटों के प्यार देखकर अमर की आंखे भर आयी उसने कुछ दूर खड़ी सुमि को आवाज लगाकर अपने पास बुलाया और कहा - देखो सुमि मैंने कहा था ना मेरे बच्चे बदल गए है , ये मुझे घर ले जाना चाहते है मैं बहुत खुश हूं सुमि तुम खामखा इनपर शक कर रही थी "

हम्मममम्म - सुमि ने दर्दभरी मुस्कान के साथ कहा और अगले ही पल उसे उल्टी हुई और वह जमीं पर जा गिरी , उसके मुंह से खून निकला देखकर अमर हक्का बक्का रह गया
 
सुमि की बिगड़ती हालत देखकर अमर उसे हॉस्पिटल लेकर आया उनके पीछे पीछे अनुज सुनिधि ओर उनके बच्चे भी चले आये सभी एमरजेंसी वार्ड के बाहर खड़े थे अमर के तो जैसे प्राण ही निकल चुके थे एक जिंदगी में उसे कितनी मुश्किलें देखने को मिल रही थी डॉक्टर्स सुमि की जान बचाने में लगे थे कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आया ओर अमर से कहा - किसी मे उनके खाने में जहर मिलाया है , उनकी हालत अभी बहुत खराब है डॉक्टर्स कोशिश कर रहे है बाकी सब ऊपरवाले के हाथ में है

सुनकर अमर की हिम्मत टूट गयी और उसने मरे हुए स्वर में कहा - जहर ?

"हा जहर , लेकिन उनके खाने में जहर कहा से आया ,, वैसे ये पुलिस केस बनता है आप चाहे तो कम्प्लेंट कर सकते है ",डॉक्टर ने कहा

"कैसे भी करके उन्हें बचा लीजिए डॉक्टर",अनुज ने कहा

"हम पूरी कोशिश कर रहे है",कहते हुए डॉक्टर वापस अंदर चला गया अमर के शरीर मे तो जैसे जान ही नही रही थी वह सुन्न सा खड़ा था विकास और रवि अपनी अपनी पत्नियों के साथ वही खड़े थे डॉक्टर की बात सुनकर विकास अमर के पास आया ओर कहा - पापा

"खीर में जहर था ?",अमर ने सवाल किया

"पापा मैं आपको सब सच बताता हूं",विकास ने हकलाते हुए कहा

"खीर में जहर था या नही ?",अमर ने सख्ती से कहा

"आई एम सॉरी पापा , हम लोग बहक गए थे भरत की बातों में आकर हमने ऐसा कर दिया लेकिन वो खीर सुमित्रा आंटी खा लेगी हमे नही पता था",विकास ने रोते हुए कहा

"सटाक!!'',अमर ने खींचकर एक थप्पड विकास को मारा सारे माहौल में शांति छा गयी अमर ने दर्द से भरकर कहा - शर्म आती है मुझे तुम लोगो को अपना बेटा कहते हुए ,, अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए तुम लोग इतना गिर गए कि तुमने एक मासूम की जान ले लेने का पाप किया क्यों किया ऐसा ? अपने ही पिता को मारने की साजिश सिर्फ कुछ पैसों के लिए "

अनुज ने अमर को सम्हाला तो अमर बच्चों की तरह रो पड़ा और कहने लगा - देखो अनुज क्या किया है इन लोगो ने ? सुमि मुझसे कहती रही कि उसे इन लोगो पर यकीन नही है लेकिन मैं ही इनके प्यार में अंधा हो गया था आज इनकी वजह से वो इस हालत में है मैं इन लोगो को कभी माफ नही करूंगा कह दो इनसे कि मेरी नजरो से दूर हो जाये मुझे इनकी शक्ल तक नही देखनी है"

अमर की बात सुनकर दोनो बेटे उनके पैरों में आ गिरे ओर फूटफूट कर रोने लगे ! रवि ने रोते हुए कहा - हमसे बहुत बड़ा पाप हुआ है पापा , ऐसा पाप जो माफी के भी लायक नही है हम आपको समझ ही नही पाए थे हमारी वजह से आज ये सब हो रहा है हमे माफ कर दो पापा , हमें माफ कर दो !"

अमर ने पैरो से दोनो को छिटकते हुए कहा - माफ कर दु , तुम दोनो इंसान नही बल्कि हैवान हो ,, तुम्हे किसी की जान लेने का हक किसने दे दिया क्या पैसा इतना बड़ा है कि अपने ही पिता की जान लेने को आतुर हो जाओ तुम लोग"

रवि उठा और हाथ जोड़ते हुए कहा - हा पापा नही है हम इंसान कहलाने लायक ,,हमने जो किया है उसकी कोई माफी भी नही है सुमित्रा आंटी ,,,,,!!""

"सटाक!!",अमर ने एक तमांच रवि को मारते हुए कहा,"अपनी गंदी जबान से नाम मत लो उसका , अगर आज उसे कुछ हुआ तो मैं तुम दोनो को जिंदा नही छोडूंगा निकल जाओ यहां , दूर हो जाओ मेरी नजरो से

अमर की बात सुनकर दोनो भाई आंसू बहाते रहे , पश्चाताप की आग के दोनो सुलग रहै थे जब तक उन्हें अपने पिता का प्यार समझ आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी दोनो को खामोश देखकर उनकी पत्निया उनके पास आयी और बड़ी बहू ने विकास से कहा - चलो यहां से या ओर बेइज्जती करवानी बाकी है

बड़ी बहू को देखकर छोटी ने कहा - हुंह मरती है तो मर जाये हमारी बला से हमे क्या ? चलो यहां से बहुत सुन ली इनकी बकवास

रवि ओर विकास ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर दोनो ने अपनी अपनी पत्नियों को थप्पड़ जड़ दिया दोनो ये देखकर अवाक रह गयी और विकास ने बड़ी बहू से कहा - खबरदार जो एक ओर शब्द अपने मुंह से निकाला , बकवास ये नही बल्कि तुम दोनो कर रही हो

"काश ये हाथ बहुत पहले उठा देते तो आज हम लोगो को ये दिन नही देखना पडता देवता जैसे हमारे पिता के लिए हमारे मन मे जहर घोलने वाली तुम लोग थी",कहते हुए रवि ने जैसे ही दोबारा मारने के लिए हाथ उठाया तो अनुज ने आकर रोक लिया और कहा - औरत पर हाथ उठाना कहा कि मर्दानगी है

"ये औरत नही औरत के नाम पर कलंक है ,, इनकी बातों में आकर हम भाईयो ने अपने पिता को इतने दुख दिये दर्द दिए और ये आज भी इन्हें कोस रही है",रवि ने कहा

"लेकिन इन से ज्यादा कसूर तो तुम दोनो का है , इनके लिए तुम्हारे पिता ससुर थे लेकिन तुम्हारे तो पिता थे ना फिर तुम लोगो ने अपने मन मे इतनी नफरत क्यो बना ली ?",सुनीधि ने कहा

रवि ओर विकास दोनो ही चुपचाप सुनते रहे उनमे एक भी शब्द बोलने की हिम्मत नही बची थी अंदर ही अंदर उनका जुर्म उन्हें कुरेद रहा था

ये सब देखकर अमर को अपने सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ और वे खांसते हुए बेंच पर आ बैठे दोनो भाई उन्हें सम्हालने को जैसे ही आगे बढ़े अमर ने हाथ आगे कर उन्हें रोक दिया सुनीधि ने उन्हें बोतल से पानी पिलाया तो अपनी बुझी सी आवाज में वे कहने लगे - ये दोनों मेरे बच्चे नही है फिर भी इन दोनों ने मुझे हमेशा पिता का दर्जा दिया बिना किसी शिकायत के इन्होंने हम सबकी मन से सेवा की लेकिन तुम सब मेरे अपने होते हुए भी मेरे दुश्मन निकले जाओ चले जाओ यहां से मैं किसी से कुछ नही कहूंगा जानते हो क्यों क्योकि मैं नही चाहता कि दुनिया वालो का अपनी औलाद से भरोसा उठ जाए जाओ खुश रहो , आज से तुम्हारा पिता तुम सबके लिए मर चुका है !!"

अमर की बात सुनकर चारो वहां से मुंह लटकाए चले गए अमर की आँखों से आंसू बह निकले अनुज ओर सुनीधि उनके सामने आ बैठे और उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहने लगे ,"फिक्र मत कीजिये अंकल उन्हें कुछ नही होगा"

"ऊपरवाला भी कैसे कैसे खेल दिखाता है अनुज ? मेरे ही बच्चों ने आज मुझे इस जगह लाकर खड़ा कर दिया ",अमर ने रोते हुए कहा

"आप अकेले नही है अंकल , मैं आपके साथ हु सुनीधि आपके साथ है ओर हमारी सुमि आंटी वो भी आपके साथ है ",अनुज ने कहा ।

दोनो वही अमर के साथ बैठे रहे शाम होने को आई लेकिन सुमि की हालत में कोई सुधार नही हुआ कुछ देर बाद डॉक्टर ने आकर कहा कि सुमि खतरे से बाहर है सबकी जान में जान आयी सुनीधि ने अनुज से चाय लाने को कहा दोपहर से अमर ने कुछ खाया पिया नही था अनुज चाय ले आया सुनीधि के जिद करने पर अमर ने दो घूंट चाय पी ओर फिर अनुज से कहा - बेटा तुम ओर सुनीधि अब घर जाओ दोपहर से यही हो , थक गए होंगे घर जाकर आराम करो ओर फिर सुनीधि बिटिया का भी इस हाल में यहां रहना ठीक नही है जाओ तुम दोनो घर जाओ सुमि का ख्याल रखने के लिए मैं यहां हु "

"ठीक है अंकल किसी भी चीज की जरूरत हो आप मुझे फोन कर देना मैं तुरन्त आ जाऊंगा , ये मेरा फोन रखिये आप",अनुज ने अपना दूसरा छोटा फोन देकर कहा

"रात में मैं ओर अनुज आपके लिए खाना लेकर आ रहे है , अपना ख्याल रखियेगा",सुनीधि ने कहा

"अरे नही बेटा मुझे भूख नही है ",अमर ने कहा

"वो सब मैं जानु आप आंटी का ख्याल रखियेगा , हम लोग आते है",सुनीधि ने कहा

अमर ने सुना तो उसकी आंख में नमी उतर आई और उसने सुनीधि को अपने पास बुलाकर सीने से लगाते हुए कहा - भगवान तुम्हे खुश रखे , तुम दोनो बच्चों पर कभी कोई आंच ना आये

सुनीधि ओर अनुज मुस्कुराए ओर अमर से अपना ध्यान रखने का बोलकर चले गए डॉक्टर से परमिशन लेकर अमर सुमि को देखने icu में आया सुमि बेहोश लेटी थी उसकी हालत देखकर अमर को बहुत दुख हुआ वह उसके पास पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गया और सुमि का हाथ अपने हाथ मे लेकर कहने लगा

- मुझे माफ़ कर दो सुमि , मैंने तुम्हारी बात का भरोसा नही किया अपने बच्चों को समझने में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी सुमि , गलती हो गयी उन्होंने बहुत बुरा किया शायद मेरी परवरिश में ही कोई खोट रहा होगा जो आज उनके मन मे मुझे लेकर इतनी नफरत भर चुकी है उनकी नफरत ने आज तुम्हे किन हालातो में ला दीया इसके लिए मैं उन्हें कभी माफ नही करूगा सुमि कभी नहीं

जिंदगी में कभी ना हारने वाला अमर आज अपने बच्चों से हार गया सुमि अपने बच्चो से हार गया

तकलीफ के आंसू अमर की आँखों से गिरकर सूमि का हाथ भिगाने लगे लेकिन सुमि बेसुध पड़ी थी

क्रमशः
 
सुमि की हालत में कोई सुधार नही था नर्स के कहने पर अमर बाहर आकर बैठ गया शाम होने लगी अमर वही बेंच पर बैठे बैठे सो गया अनुज खाना लेकर आया था सुनीधि की तबियत खराब होंने से अनुज उसे ओल्डएज होंम ही छोड़ आया उसका ख्याल रखने के लिए बस दो नोकर थे बाकी सारे लोग अपने अपने घर जा चुके थे अनुज ने अमर को जगाया ओर खाना खिलाया काफी देर तक अनुज उनके साथ बैठा रहा और फिर अमर के कहने पर वापस ओल्डएज होंम चला आया अमर वही बेंच पर लेट गया सुबह आंख खुली तो डॉक्टर से सुमि के बारे में पूछा डॉक्टर ने मुस्कुरा के कहा - उन्हें कल रात ही होश आया गया था बस आप सो रहे थे इसलिए जगाया नही ,, आप जाकर मिल सकते है "

अमर की ख़ुशी का कोई ठिकाना नही था वह तुरंत icu में आया सुमि को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी वह उसके पास आकर बैठा ओर उसका हाथ थामकर कहा - अब कैसी तबियत है सुमि ?

"ठीक है",सुमि ने कहा

"ईश्वर का लाख लाख शुक्र है तुम्हे कुछ नही हुआ , मुझे माफ़ कर दो सुमि मैने तुम्हारी बात का भरोसा नही किया और तुम मेरे बेटों की साजिश का शिकार हो गई मैं उन्हें कभी माफ नही करूंगा सुमि कभी नही , वो लोग कभी खुश नही रहेंगे",अमर ने नफरत से कहा

"ऐसा मत कहो अमर",सुमि ने कहा

''नही सुमि मैंने आज तक उनकी हर गलती को माफ किया है लेकिन अब नहीं , उन्होंने नफरत की हद पार कर दी इस बार , मुझे मारने तक को तैयार हो गए",अमर ने दुख के साथ कहा

"अमर उन्होंने जो किया उसके लिए उन्हें शायद भगवान भी माफ ना करे लेकिन तुम कर देना , क्योकि माँ बाप की दी बद्दुआ बहुत बुरी होती है ",सुमि ने कहा

"सर इनकी दवाईयों का टाइम हो गया है",नर्स ने आकर कहा तो अमर ने दवाईयों का ट्रे लेकर कहा,"मैं दे देता हूं !"

"ठीक है सर ये दो टेबलेट देनी है , इसके थोड़ी देर बाद इन्हें ये सुप पिला दीजिएगा",नर्स ने कहा और वहां से चली गयी

अमर ने सुमि को दवा दी और वही बैठा रहा सुमि बोलना चाहती तो अमर उसे रोक देता कुछ देर बाद अपने हाथों से उसे सुप पिलाया और फिर icu से बाहर आ गया icu में ज्यादा देर रुकने की परमिशन नही थी

शाम तक सुमि को रूम में शिफ्ट कर दिया गया अनुज ओर सुनीधि भी रात का खाना लेकर आये अमर सुमि का काफी ख्याल रख रहे थे , उसे दवा देना खाना खिलाना , उसका ख्याल रखना सब वह अकेले ही कर रहा था और ये सब देखकर अनुज सुनीधि को बहुत अच्छा लग रहा था दो दिन बाद सुमि को डॉक्टर ने घर जाने की परमिशन दे दी डॉक्टर जब डिस्चार्ज फ़ाइल बना रहा था तो सुमि ने उस से कहा - मेरी जान बचाने के लिए शुक्रिया डॉक्टर !"

"शुक्रिया मुझे नही बल्कि अपने पति से कहिये , जिन्होंने दिन रात आपकी इतनी सेवा की ओर आपको पहले जैसे बना दिया हमने तो आपकी जान बचाई है लेकिन आपका ख्याल रखने में उन्ही का हाथ है आप बहुत किस्मत वाली है इस उम्र में जहाँ हमसफर साथ छोड देते है वही ये आपके पति हर वक़्त आपके साथ रहे मैंने दवा लिख दी है कोई भी परेशानी हो तो आप आकर मिल लेना ! टेक केयर",कहकर डॉक्टर चला गया लेकिन पीछे छोड़ गया हैरान सुमि को अमर के लिए उसके मन मे प्यार और इज्जत ओर बढ चुकी थी अनुज ने हॉस्पिटल का सारा बिल चुकाया ओर सबके साथ ओल्डएज होंम चला आया अगले दिन अमर ने अनुज से हमेशा के लिए वहां से जाने की बात कही तो अनुज ने कहा - क्यों अंकल ? क्या अब ये घर आपका नही है ?

"ऐसी बात नही है अनुज , इस शहर से अब मैं भर चुका है साथ ही यहां रहूंगा तो अपने बच्चों का किया भूल नही पाऊँगा सुमि को भी एक सहारे की जरूरत है और उसे क्या बल्कि मुझे भी इसलिए मैं सुमि को भी अपने साथ लेकर जा रहा हूँ ",अमर ने कहा

"लेकिन आप कहा जाएंगे अंकल ?",सुनीधि ने बैचैन होकर कहा

"भूल गए मेरा गांव , वहां का घर वहां अब भी हमारे रहने के लिए जगह है एक बार फिर सब शुरू से शुरू करेंगे",अमर ने मुस्कुराकर कहा

"लेकिन अंकल",अनुज ने कहना चाहा तो अमर ने उसके दोनो हाथों को थामकर कहा,"तुम दोनो ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है बेटा ,तुम्हे देने के लिए मेरे पास सिर्फ आशीर्वाद है हमेशा खुश रहो "

"लेकिन मुझे आपसे कुछ चाहिए !",सुनीधि ने कहा

"बताओ क्या चाहिए ?",अमर ने कहा

"आप ओर सुमि आंटी शादी कर लीजिये , आपने कहा ना कि उन्हें सहारे की जरूरत है तो एक औरत की जिंदगी में पति से बड़ा हमदर्द कोई नही होता बस इतनी सी बात मान लीजिए हम लोगो की , आप दोनो का प्यार पवित्र है और हमेशा पवित्र ही रहेगा !'",सुनीधि ने कहा तो अमर ने उसे सीने से लगाते हुए कहा,"पगली , हम लोग जरूर आएंगे तुमसे मिलने जब ये नन्ही सी जान इस दुनिया मे आएगी अपना खयाल रखना और खूब पौष्टिक खाना "

अनुज भी उनके गले लगा और कहा - आप दोनो भी अपना ख्याल रखना

अमर ने सुमि से अपने मन की बात कही तो सुमि ने मान लिया वो अमर को आज भी उतना ही चाहती थी कि उसे ना नही कह पाई दोनो ने शादी कर ली और अमर के गांव चले आये

कुछ ही महीनों में सब अच्छा हो गया अमर ने अपने आधे खेतो को बेचकर उसके पैसे से घर की मरम्मत करवाई ओर बाकी पैसों से एक डेयरी फार्म खोल लिया गांव के लोगो को उसमें रोजगार भी मिल गया और अमर का काम भी चल पड़ा सुमि ने भी घर के बाहर बगीचे में सब्जियां उगाना शुरू कर दिया गांव में वह सबको अपनी उगाई सब्जियां मुफ्त में ही बड़े प्यार से दे दिया करती अमर ओर सुमि के मृदुल स्वभाव के कारण सभी लोग उनका सम्मान करते थे और हर वक्त उनकी मदद के लिए तैयार रहते थे महीनों गुजर गए अमर शहर नही गया उम्र के आखरी पड़ाव में दोनो एक दूसरे के साथ थे और खुश थे

एक सुबह सुमि ने अमर से अपने साथ मंदिर चलने को कहा उसने मंदिर के बाहर बैठने वाले भूखों के लिये घर मे खाना बनाया ओर लेकर मंदिर चली आयी दर्शन करने के बाद अमर ओर सुमि दोनो सीढ़ियों पर बैठे उन गरीबो को खाने के पैकेट दे रहे थे जैसे ही अगला पैकेट देने के लिए अमर ने हाथ उठाया उसकी आंखें हैरानी से फैल गयी सामने विकास बैठा था फटेहाल , आंखे खाली , मुंह चिपका हुआ और शरीर बेजान ,, पास ही में रवि बैठा था अमर को वहां देख विकास ने मरे हुए स्वर में कहां - पापा आप यहां ?

सुमि ने उन्हें देखा तो दोनो को वहां से उठाकर मंदिर के बरामदे में ले आयी अमर भी उनके साथ चला आया सुमि ने उन्हें खाने को दिया तो दोनो खाने पर टूट पड़े , उन्हें खाते देखकर लग रहा था जैसे वे लोग काफी दिनों से भुखे है अमर ने देखा तो उनकी आंखों में आंसू भर आये सुमि ने दोनो से इस हालत के बारे में पूछा तो विकास ने बताया कि कैसे उसके साले ने धोखे से सारा पैसा और जायदाद हड़प ली उनकी कंगाली देखकर पत्निया अपने अपने बच्चों को लेकर चली गयी घर नोकरी पैसा रुतबा सब चला गया ओर दोनो दर दर की ठोंकरे खाते यहां वहां भटकते रहे

उनकी कहानी सुन सुमि को उनपर दया आ गयी उसने अमर से कहा कि वह उन्हें अपने साथ रख ले अमर ने कुछ नही कहा और वहां से चला गया सुमि दोनो को घर ले आई दोनो को रहने को जगह ओर खाने को दिया दोनो लड़के अपने किये से बहुत शर्मिंदा थे उन्होंने अमर के पैर पकड़ लिए ओर माफी मांगी अमर का भी दिल पिघल गया दोनो लड़के वही रहकर डेयरी पर काम करने लगे उन में आये बदलाव देखकर अमर भी हैरान था दोनो मेहनत से अपना काम करते , अमर की बात सुनते , उसकी सेवा करते , बिना अमर की इजाजत के कुछ नही करते डेयरी का सब हिसाब किताब अमर को सौंपते उन्हें इस तरह देखकर अमर को बहूत खुशी हुई उन्होंने दोनो बहुओं ओर बच्चों को भी अपने पास बुला लिया दोनो बहु भी अमर ओर सुमि के पैरों में आ गिरी ओर अपनी गलतियों की माफी मांगने लगी

अमर का उजड़ा हुआ घर फिर बस गया सभी हंसी खुशी रहने लगे पर ना जाने क्यों अमर को हमेशा एक कमी खलती रहती थी

एक शाम उसे खत मिला कि सुनीधि को बेटा हुआ है और उसके जन्मोत्सव में अमर ओर सुमि को बुलाया है अमर ओर सुमि ढेर सारे तोहफे लेकर वहां पहुंचे तो उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा ओल्डएज होंम के सभी सदस्य वहां मौजूद थे सब इस जन्मोत्सव में आये थे अमर ओर सुमि सबसे मिले सब अपने अपने बच्चों के साथ खुशी खुशी जी रहे थे

सबने अनुज ओर सुनीधि के बेटे को तोहफे ओर आशीर्वाद दिया कितने महीनों बाद सब साथ थे सबने जश्न मनाया खूब बातें हुई मोहन ओर जगन तो अमर को बहुत छेड रहे थे कि आखिर उसने सुमि से शादी कर ही ली अगली सुबह सभी एक एक करके वापस निकल गयी सबके बाद अमर ओर सुमि भी चले गए अनुज ओर सुनीधि अपने बच्चे को गोद मे लिए उदास से बरामदे की सीढ़ियों पर बैठे थे उन्हें बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था

चलते चलते अमर रुका तो सुमि ने कहा - क्या हुआ ?

"ऐसा लग रहा है जैसे कुछ छूट गया है , हमारी असली खुशी गांव में नही इस ओल्डएज होंम में है सुमि , उन बच्चों के साथ , उन हमउम्र दोस्तो के साथ आ सुमि लौट चलते है वापस अपनी उसी दुनिया मे ",अमर ने बैचैन होकर कहा

"चलो !",सुमि ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ अमर की ओर बढ़ा दिया और दोनो वापस लौट आये उन्हें देखते ही अनुज ओर सुनीधि के चेहरे की मुस्कान लौट आयी अमर ओर सुमि उनके पास चले आये कुछ देर बाद देखते है कि एक एक करके बाकी सभी सदस्य भी लौट आये अनुज ओर सुनीधि खुश भी थे और हैरान भी

"तुम सब लोग वापस क्यों चले आये ?",अमर ने कहा

"अब हम सब यही रहेंगे साथ साथ ",जगन ने मुस्कुराते हुए कहा

"हा भाई अमर क्योंकि जिंदगी का असली सुख अपनो के साथ है ",मोहन ने कहा

सभी मुस्कुरा उठे अनुज गेट के पास आया और ओल्डएज होंम का बोर्ड हटाकर फेंक दिया क्योंकि ये घर अब घर था , वृद्धाश्रम नही

समाप्त
 
(माँ बाप ईश्वर का दिया सबसे खूबसूरत तोहफा है , उन्हें कभी खुद से दूर ना करे , उनका सम्मान करें ख्याल रखे और उन्हें ढेर सारा प्यार करे यकीनन बदले में आपको कई गुना ज्यादा ही मिलेगा हमारे इस दुनिया मे होने की वजह वही है इसलिए कभी उनका दिल ना दुखाये ),

समाप्त
 
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