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Guest
ओल्डएज होंम में सभी मिल जुलकर नवरात्री की तैयारियों में लगे थे और दूसरी तरफ एक भयंकर साजिश की जा रही थी रवि ओर विकास दोनो बड़ी बहू के भाई निवास की बातों में आ गए , निवास के साथ मिलकर वे लोग घर के कागजात बनवाने लगे
नवरात्रि का पहला दिन था पूरे रीति रिवाजों के साथ माँ की मूर्ति की स्थापना हुई और धूमधाम से पूजा हुई जैसा कि सबने सोचा था वैसा ही हुआ आने वाले लोगो ने प्रशाद लिया , दानपात्र में पैसे दिए असलम के लगाए मनोरंजन वाले स्टाल पर सभी ने टिकट्स खरीदे भूख लगने पर सभी ने वहां से खरीदकर अपनी पसंद का खाना खाया ,, वहां एक मेले जैसा आयोजन हो गया था शाम तक भीड़ वैसे ही रही और रात की माँ की पूजा अर्चना के बाद सभी ओल्डएज होंम लौट आये दो लोग वही माँ के दरबार मे सो गए
सभी बरामदे में बैठकर सुस्ता रहे थे सुबह से अब उन्हें आराम मिला था अमर ने पानी पीकर मुंह पोछते हुए कहा - अगर भीड़ ऐसे ही रही तो हम जल्दी ही बाकी के पैसे जमा कर लेंगे
"हा अंकल आप सबने आज बहुत मेहनत की है , आप लोगो का ये अहसान मैं कभी नही भूलूंगा ",अनुज ने हाथ जोड़ते हुए कहा
"कैसी बात कर रहे हो बेटा ? हम लोगो ने कोई अहसान नही किया है ,, सुनिधि हमारी बेटी जैसी है और बेटी की गोद भराई का सामान उसके पीहर से आता है बस यही संमझ के इन्हें रख लो ",मोहन ने सारे पैसे अनुज को थमाते हुए कहा
अनुज ने पैसे रख दिये और नोकर से सबके लिए खाना लगाने को कहा खाने के बाद सभी सोने चले गए लेकिन अमर बाहर बरामदे में सीढ़ियों पर बैठा था , सुमित्रा ने देखा तो उसके पास चली आयी और कुछ दूर बैठकर कहा - क्या बात है तुम सोए नही ?
"नींद नही आ रही थी , अनुज ओर सुनिधि के लिए हम सब जीतना करे उतना कम होगा सुमि इन बच्चों ने हमे बिना किसी स्वार्थ के बहुत कुछ दिया है ",अमर ने कहा
"हम्म्म्म , तुम चिंता मत करो यहां आओ",सुमि ने सीढ़ियों पर पैर सीधे करके कहा
अमर ने उसकी ओर देखा तो सुमि ने उसे अपना सर गोद मे रखने को कहा अमर झिझका तो सुमि ने कहा - तुम कहते थे ना अमर हर प्रेमिका में एक माँ छुपी होती हैं ,, इस वक्त एक माँ तुम्हे बुला रही है प्रेमिका नही "
सुमि की बात सुनकर अमर ने अपना सर उसकी गोद मे रख दिया , सुमि उसका सर सहलाने लगी , एक सुखद अनुभूति वैसी ही जैसी वह बचपन मे अपनी माँ की गोद में सर रखकर महसूस किया करता था अमर कुछ देर शांत रहा और फिर कहने लगा - अपने वक्त में तुम एक बहुत अच्छी माँ रही होगी सुमि वो बच्चे बदनसीब होंगे जो तुम्हारा निस्वार्थ प्रेम नही देख पाए ""
"बीती बातों को याद करके सिर्फ खुद को तकलीफ पहुँचाई जा सकती हैं अमर , माँ बाप हमेशा बच्चों के लिए जीते है उनका भार अपने कंधों पर उठा लेते है लेकिन जैसे जैसे बच्चे बड़े होते है माँ बाप उनके लिए बोझ बन जाते है ये ओल्डएज होंम उन्ही बोझ का उदाहरण है !",सुमि ने कहा
"लेकिन वो ये भुल जाते है कि एक उम्र के बाद उन्हें भी उम्रदराज होना है ,, ओर तब ये सोचकर डर लगता है कि कही उनके बच्चे उनके साथ ऐसा ना करे",अमर ने कहा
सुमि खामोशी से उसके बालो में उंगलियां फिराती रही कुछ देर की खामोशी के बाद अमर ने कहा - लेकिन मैं खुश हूं सुमि की मैं यहां आया और मरने से पहले तुमसे ,,,,,,,,,,,,
"शशशश ऐसी बात मत कहो , अब किसी अपने का जाना देख नही पाऊंगी",सुमि ने अमर के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा
अमर ने उसका हाथ हटाया ओर कहा - मौत तो एक अटल सत्य है सुमि , ओर अब खुशी इस बात की है कि अपनी जिंदगी के आखरी दिनों में मैं तुम्हारे साथ हु
"ये वक्त हमेशा यादगार रहेगा अमर ",सुमि ने कहा
"सुमि कुछ सुनाने को कहु तो सुनाओगी",अमर ने कहा
सुमि मुस्कुराने लगी और कहा - इस उम्र में कहा ये सब
"सुनाओ ना , शायद उस से नींद आ जाये",अमर ने कहा
सुमि गुनगुनाने लगी - तुम हो कह दो तो आज की रात , चाँद डूबेगा नही
रात को रोक लो ,,
तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नही
रात को रोक लो
आज की रात है और जिंदगी बाकी तो नही
तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही , शिकवा नही , शिकवा नही , शिकवा नही
कुछ ही देर में अमर को नींद आ गयी सुमि ने भी खम्बे से सर लगा लिया ओर अमर के बालों में उंगली घुमाती रही चाँदनी रात के सन्नाटे में दोनो वही सीढियों पर सो रहे थे अनुज किसी काम से बाहर आया तो उन्हें वहां देखकर मुस्कुरा उठा अंदर गया और एक चद्दर लाकर दोनो को ओढा दी पीछे खड़ी सुनिधि सब देख रही थी अनुज उसके पास आया तो उसने कहा - क्या ये दोनों हमेशा के लिए साथ नही रह सकते ? एक दूसरे का साथ पाकर इनके चेहरे पर जो सुकून है वो आज तक किसी के चेहरे पर नही देखा मैंने ,,दोनो एक दूसरे से बिल्कुल अलग है लेकिन एक दूसरे के साथ है
"तुम सही कहती हो सुनिधि बस इन दोनों को किसी की नजर ना लगे ",अनुज ने कहा तो सुनिधि उसके सीने से लगी मुस्कुराती हुई उन दोनों को देखने लगी
क्रमशः
नवरात्रि का पहला दिन था पूरे रीति रिवाजों के साथ माँ की मूर्ति की स्थापना हुई और धूमधाम से पूजा हुई जैसा कि सबने सोचा था वैसा ही हुआ आने वाले लोगो ने प्रशाद लिया , दानपात्र में पैसे दिए असलम के लगाए मनोरंजन वाले स्टाल पर सभी ने टिकट्स खरीदे भूख लगने पर सभी ने वहां से खरीदकर अपनी पसंद का खाना खाया ,, वहां एक मेले जैसा आयोजन हो गया था शाम तक भीड़ वैसे ही रही और रात की माँ की पूजा अर्चना के बाद सभी ओल्डएज होंम लौट आये दो लोग वही माँ के दरबार मे सो गए
सभी बरामदे में बैठकर सुस्ता रहे थे सुबह से अब उन्हें आराम मिला था अमर ने पानी पीकर मुंह पोछते हुए कहा - अगर भीड़ ऐसे ही रही तो हम जल्दी ही बाकी के पैसे जमा कर लेंगे
"हा अंकल आप सबने आज बहुत मेहनत की है , आप लोगो का ये अहसान मैं कभी नही भूलूंगा ",अनुज ने हाथ जोड़ते हुए कहा
"कैसी बात कर रहे हो बेटा ? हम लोगो ने कोई अहसान नही किया है ,, सुनिधि हमारी बेटी जैसी है और बेटी की गोद भराई का सामान उसके पीहर से आता है बस यही संमझ के इन्हें रख लो ",मोहन ने सारे पैसे अनुज को थमाते हुए कहा
अनुज ने पैसे रख दिये और नोकर से सबके लिए खाना लगाने को कहा खाने के बाद सभी सोने चले गए लेकिन अमर बाहर बरामदे में सीढ़ियों पर बैठा था , सुमित्रा ने देखा तो उसके पास चली आयी और कुछ दूर बैठकर कहा - क्या बात है तुम सोए नही ?
"नींद नही आ रही थी , अनुज ओर सुनिधि के लिए हम सब जीतना करे उतना कम होगा सुमि इन बच्चों ने हमे बिना किसी स्वार्थ के बहुत कुछ दिया है ",अमर ने कहा
"हम्म्म्म , तुम चिंता मत करो यहां आओ",सुमि ने सीढ़ियों पर पैर सीधे करके कहा
अमर ने उसकी ओर देखा तो सुमि ने उसे अपना सर गोद मे रखने को कहा अमर झिझका तो सुमि ने कहा - तुम कहते थे ना अमर हर प्रेमिका में एक माँ छुपी होती हैं ,, इस वक्त एक माँ तुम्हे बुला रही है प्रेमिका नही "
सुमि की बात सुनकर अमर ने अपना सर उसकी गोद मे रख दिया , सुमि उसका सर सहलाने लगी , एक सुखद अनुभूति वैसी ही जैसी वह बचपन मे अपनी माँ की गोद में सर रखकर महसूस किया करता था अमर कुछ देर शांत रहा और फिर कहने लगा - अपने वक्त में तुम एक बहुत अच्छी माँ रही होगी सुमि वो बच्चे बदनसीब होंगे जो तुम्हारा निस्वार्थ प्रेम नही देख पाए ""
"बीती बातों को याद करके सिर्फ खुद को तकलीफ पहुँचाई जा सकती हैं अमर , माँ बाप हमेशा बच्चों के लिए जीते है उनका भार अपने कंधों पर उठा लेते है लेकिन जैसे जैसे बच्चे बड़े होते है माँ बाप उनके लिए बोझ बन जाते है ये ओल्डएज होंम उन्ही बोझ का उदाहरण है !",सुमि ने कहा
"लेकिन वो ये भुल जाते है कि एक उम्र के बाद उन्हें भी उम्रदराज होना है ,, ओर तब ये सोचकर डर लगता है कि कही उनके बच्चे उनके साथ ऐसा ना करे",अमर ने कहा
सुमि खामोशी से उसके बालो में उंगलियां फिराती रही कुछ देर की खामोशी के बाद अमर ने कहा - लेकिन मैं खुश हूं सुमि की मैं यहां आया और मरने से पहले तुमसे ,,,,,,,,,,,,
"शशशश ऐसी बात मत कहो , अब किसी अपने का जाना देख नही पाऊंगी",सुमि ने अमर के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा
अमर ने उसका हाथ हटाया ओर कहा - मौत तो एक अटल सत्य है सुमि , ओर अब खुशी इस बात की है कि अपनी जिंदगी के आखरी दिनों में मैं तुम्हारे साथ हु
"ये वक्त हमेशा यादगार रहेगा अमर ",सुमि ने कहा
"सुमि कुछ सुनाने को कहु तो सुनाओगी",अमर ने कहा
सुमि मुस्कुराने लगी और कहा - इस उम्र में कहा ये सब
"सुनाओ ना , शायद उस से नींद आ जाये",अमर ने कहा
सुमि गुनगुनाने लगी - तुम हो कह दो तो आज की रात , चाँद डूबेगा नही
रात को रोक लो ,,
तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नही
रात को रोक लो
आज की रात है और जिंदगी बाकी तो नही
तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही , शिकवा नही , शिकवा नही , शिकवा नही
कुछ ही देर में अमर को नींद आ गयी सुमि ने भी खम्बे से सर लगा लिया ओर अमर के बालों में उंगली घुमाती रही चाँदनी रात के सन्नाटे में दोनो वही सीढियों पर सो रहे थे अनुज किसी काम से बाहर आया तो उन्हें वहां देखकर मुस्कुरा उठा अंदर गया और एक चद्दर लाकर दोनो को ओढा दी पीछे खड़ी सुनिधि सब देख रही थी अनुज उसके पास आया तो उसने कहा - क्या ये दोनों हमेशा के लिए साथ नही रह सकते ? एक दूसरे का साथ पाकर इनके चेहरे पर जो सुकून है वो आज तक किसी के चेहरे पर नही देखा मैंने ,,दोनो एक दूसरे से बिल्कुल अलग है लेकिन एक दूसरे के साथ है
"तुम सही कहती हो सुनिधि बस इन दोनों को किसी की नजर ना लगे ",अनुज ने कहा तो सुनिधि उसके सीने से लगी मुस्कुराती हुई उन दोनों को देखने लगी
क्रमशः