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Romance एक एहसास complete

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“एक एहसास”

“एक एहसास” कहानी है “! शान्ति नगर” में रहने वाले एक मध्यम वर्गीय परिवार की| एक संयुक्त परिवार की तरह रहने वाले इस मोहल्ले में गली के सिरे से देखने पर गली के दोनों तरफ कुछ खूबसूरत कोठियों का सिलसिला दिखायी पड़ेगा| उस सिलसिले से थोड़ा हटकर गली में एक दो म्ंजिला मकान भी है जिसके बाहर लगी नेम प्लेट पर लिखा है श्रीहरिनारायण “माजरा नन्दकरण” वाले|

यह कहानी उसी घर में रहने वाले श्रीहरिनारायण व उसके परिवार की है| श्रीहरिनारायण की पत्नी का नाम है सोनिया देवी| उनके तीन पुत्र हैं| बड़े पुत्र का नाम कुलदीप उससे छोटा किशन और सबसे छोटे का नाम सागर हैं| कुलदीप की उम्र बाइस वर्ष, किशन अठारह वर्ष और सागर की उम्र लगभग बारह वर्ष हैं|

कुलदीप ने दो वर्ष पहले बी∙ए∙ की पढ़ाई पुरी करने के बाद पढ़ना छोड़ दिया और अब वह अपना दूध का कारोबार संभालता है| किशन सरस्वती स्कूल में बाहरवीं कक्षा का छात्र है तथा सागर नगर के स्थानीय “गायत्री मिड़ल स्कूल” में छठी कक्षा में पढ़ता है|

एक तरफ कुलदीप जिसका कद करीब छह फुट का है वह हष्ट-पुष्ट तथा अच्छे शरीर का मालिक है, और मानसिक तौर पर भी परिपक्व है| वहीं दूसरी तरफ किशन का कद 5’6” तथा साधारण कद काठी के शरीर के साथ-साथ दब्बु किस्म का लड़का है| उसके चरित्र में अभी तक बाल भाव ही प्रधान है, उसमें वही उत्सुकता, वही चंचलता, वही विनोदप्रियता विद्यमान है जो बचपन में होती हैं|

किशन के साथ एक अजीब संयोग होता है कि जब-जब वह बहुत खुश होता है उसकी पिटाइ अवश्य ह

राधिका : कहानी की नायिका|

रोहन : किशन का दोस्त|

शीतल : रोहन की प्रेमिका|

सीमा : रोहन की बहन|

सुनील : किशन का दोस्त|

ट्रिंग … ट्रिंग … ट्रिंग … ट्रिंग … फोन की घंटी बजती सुनाइ दे रही थी|

“हैलो” दूसरी तरफ से बड़ी ही मधुर आवाज आई|

“हैलो शीतल… ”

“… हैलो” कुछ देर की खामोशी के बाद फिर आवाज आई|

“शीतल मैं रोहन……” इतना बोलकर रोहन भी खामोश हो गया|

“कौन रोहन और अभी सुबह के 3:00 बजे है, ये फोन करने का कौन सा टाईम है”

“वो शीतल म्म्ममैं आज आस्ट्रेलिया जा … बात को बीच में ही काटते हुए दूसरी तरफ से आवाज आई“ यहां कोइ शीतल नहीं रहती और आप आस्ट्रेलिया जाओ या कुए में गिर जाओ… मगर दोबारा यहां फोन मत करना”|

“जी…” रोहन अभी इतना ही बोल पाया था कि दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया|

सौफे पर बैठते हुए वह बड़बड़ाया “इसका नाम तो डाकू रानी चम्पी बाई या पुतली बाई होना चाहिए था… न जाने इसका नाम “शीतल” किसने रख दिया | ”

“कुछ देर के लिए कमरे में खामोशी रही| फिर रोहन ने फोन का रिसीवर उठाकर रिड़ायल का बटन दबा दिया”

ट्रिंग … ट्रिंग …

“हैलो शीतल मेरी बात तो सुनो… ”

“मै शीतल नहीं हूँ … आप प्लीज दोबारा फोन मत करना”

मगर रोहन तो इस आवाज को अच्छी तरह पहचानता था| वह बोला मै जिनकी खामोशी तक को पहचानता हूँ क्या मुझे उनकी आवाज को पहचानने मे धोखा हो सकता है|

“एक बार कहा ना… मैं शीतल नहीं हूँ ”|

रोहन ने भी हार न मानते हुए शायराना अंदाज में शीतल को मनाना जारी रहाए जान ले लेगी ये अदा, यूं अपने ही नाम से मुकरने की,

ओर कसम से कसम खा ले रे जालिम, कभी न सुधरने की|

रोहन से इस अंदाज में अपनी तारीफ सुनकर शीतल खुश हो गई| अब उसने गुस्सा भुलाकर नखरे भरी नाराजगी शुरू कर दी|

“आज हमारी याद कैसे आ गइ यूं ही चले जाते आखिर हम आपके हैं कौन | ”

“सॉरी यार कुछ घरेलू परेशानियां के चलते वक्त नहीं निकाल पाया मगर अब जो थोड़ा सा समय है उसे तो बेवजह झगड़े में बर्बाद मत करो”
 
“अच्छा जी… अब मैं बेवजह झगड़ा कर रही हूं… आपको याद हो तो आज आपने तीन दिन बाद फोन किया है और अब भी मुझसे बात करना आपको समय की बर्बादी लगती है तो फिर ठीक है… मैं फोन रख देती हूं”

“अरे नहीं… रूको… यार ऐसी बात नहीं है‚ असल में मेरे जाने के बाद माँ और सीमा कितनी अकेली हो जायेंगी यही सोचकर मैं थोड़ा परेशान हूँ ”|

“आपने तो कभी अपने घरवालों से भी नहीं मिलवाया… थोड़ी बहुत जान पहचान होती तो कभी कभार मैं भी आ सकती थी” शीतल ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा|

“नाराज क्यों होती हो… थोड़ा इन्तजार करो… आपको हमेशा के लिए इस घर में आना है”|

“वो तो ठीक है … मगर ये तो बताओ कितना इन्तजार करना होगा”|

शीतल की बातों में इकरार की झलक पाकर रोहन का चेहरा खिल उठा|

मुस्कुराते हुए उसने कहा “बस दो साल”|

“दो… साल… दो साल… आपको थोड़ा सा वक्त लगता होगा‚ मगर मैं तो दो साल के इन्तजार में मर ही जाऊगीं” शीतल के मुख से एकदम निकल गया|

ये शब्द सुनकर तो रोहन की खुशी का कोई ठिकाना न रहा| उस खुशी की लहर में उसने शीतल को शायराना अन्दाज में छेड़ते हवो कहती है मर जाऊंगी, मगर दो साल इन्तजार न होगा,

कोई समझाओ यारो, तब इन्तजार एक जन्म का होगा|

“ला मुझे दे रिसीवर मैं समझाता हूँ ”रोहन के पीछे खड़े किशन (जो अभी-अभी सुनील के साथ आया था) ने रिसीवर छीनने की कोशिश करते हुए कहा मगर रोहन ने उसे धकेलकर सौफे पर बैठा दिया”

रोहन फिर से शीतल के साथ बातों में मशगुल हो गया|

“ये कौन बोल रहा था”

“है एक कार्टून नेटवर्क ”

“क्या … कार्टून नेटवर्क … ये कौन है ” शीतल ने आश्चर्य से पूछा|

“इसके बारे में फिर कभी बताऊंगा फिलहाल इतना जान लो इसका नाम किशन है और आज दिल्ली तक ये मेरे साथ जा रहा है,” |

बातों-बातों में वक्त कैसे गुजरा दोनों को कुछ पता ही न चला| अगर बस चलता तो शायद वे इन बातों के सिलसिले को कभी रूकने न देते| परन्तु अब समय रोहन को अधिक बातों की इजाजत नहीं दे रहा था|

“अच्छा शीतल अब मुझे जाना होगा” मजबूर सा होकर रोहन ने कहा|

“ओके जी बाए… अपना ख्याल रखना” एक गहरी सांस लेकर मगर बड़ी ही मधुर आवाज में शीतल ने कहा|

“ओके बाए… आप भी अपना ख्याल रखना” कहने के बाद रोहन ने फोन रख दिया|

“रोहन भाई अब जल्दी करो 4:00 बज गये हैं| अगर समय से पहुंचना है तो हमे 4:40 वाली बस ही पकड़नी होगी” बाहर से दरवाजा खटखटाते हुए सुनील ने आवाज दी|

रोहन ने माँ से आशीर्वाद लिया और फिर तीनो किशन,रोहन और सुनील बस स्टैंड़ पहुंचे| वहां से दिल्ली के लिए बस पकड़ी जो सुबह 8 बजकर 20 मिनट पर दिल्ली अन्तर्राज्यीय बस अड्डे पहुंच गई| वहां से तीनो ने ऐयरपोर्ट के लिए बस पकड़ ली| सुबह जल्दी उठने की वजह से रोहन व सुनील दोनों को नींद आ रही थी| सफर भी लगभग 2 घंटो का था इसलिए दोनों ही सो गये| पहली बार दिल्ली आने पर किशन आज बहुत खुश था इसलिए नींद उससे कोसों दूर थी| बस की लगभग आधी सीटें खाली थी लेकिन दिल्ली दर्शन की ख्वाहिश दिल में लिए किशन महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर बैठा, क्योंकि वहां से बाहर का नजारा ज्यादा स्पष्ट था| वह खिड़की से बाहर झांकता हुआ दिल्ली की ऊंची-ऊंची इमारतों के दॄश्य का नजारा देख रहा था| कुछ देर पश्चात् एक लड़की के लिए उसे खिडकी के साथ वाली सीट छोड़नी पड़ी ओर उसी सीट पर लड़की के बराबर में बैठना पड़ा| अब वह बाहर के दॄश्य का उतना आनन्द नहीं ले पा रहा था| इसलिए उसे खिडकी के साथ वाली सीट छोड़ने का दु:ख था|

कुछ देर बाद किशन का ध्यान लड़की की तरफ गया| जो खिड़की से आने वाली हवा के कारण अपने उड़ते हुए बालों से परेशान थी| उसे देखकर किशन को एक शरारत सूझी| उसने खिड़की का शीशा थोड़ा सा ओर खोल दिया| अब लड़की पहले से भी ज्यादा परेशान हो गइ|

लड़की की तरफ देखेवो तो परेशां थी, अपनी उड़ती हुइ जुल्फों से पहले ही,हाए फिर क्युं, मैने ये खिड़की थोड़ी सी ओर खोल दी|

लड़की ने किशन को गुस्से से देखा लेकिन बिना कुछ बोले वह मुंह फेरकर बैठ गई|

मगर किशन को इतने से आराम कहां वह शायद कुछ ओर ही चाहता था|

“जरा सी खिड़की खोलकर देखें क्या होता है,” बोलते हुए उसने खिड़की जरा ओर खोल दी| इस बार लडकी गुस्सा करने की बजाय बिल्कुल बेपरवाह होकर खिडकी के सामने कुछ इस तरह बैठ गई के उसके बाल उड़कर किशन के चेहरे तक जाने लगे|

किशन परेशान हो गया|

“ऊं हूँ… खिड़की जरा सी क्या खोल दी… अब मैं भी परेशान हो गया उनकी जुल्फों से” बोलकर उसने खिड़की बंद करने के लिए हाथ बढ़ाकर लड़की को देखा जो उसे गुस्से से यूं घूर रही थी जैसे वह उसे कहना चाहती हो “अब बस करो वरना कयामत होगी”| लड़की के इस तेवर को देखकर किशन ने लड़की को परेशान करने की बजाए चुप बैठने में ही अपनी भलाई समझी|

थोडी देर बाद एक दूसरी महिला सवारी बस मे चढ़ी| जिसके लिए किशन को अपनी सीट छोड़कर खड़ा होना पड़ा| नौकरीपेशा लोगों के लिए यह दफ्तर जाने का वक्त था इसलिए भीड़ बढ़ती ही जा रही थी| देखते ही देखते बस खचाखच भर गई| अब हालत ऐसी थी कि किसी को ठीक से खड़े रहने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी| भीड़ से परेशान किशन ने देखा एक लड़की बस में चढ़ी तथा ड़्राइवर के पास ही बस के बोनट पर बैठ गई| बोनट पर अब भी काफी जगह खाली थी| उसने सोचा क्यों न वह भी जाकर बोनट पर आराम से बैठ जाये| इसी इरादे के साथ आगे जाने के लिए किशन ने अपने से आगे खड़ी एक औरत जिसका रंग बिल्कुल काला था, से साइड़ मांगी| परन्तु काली औरत ने उसकी बात को अनसुना कर दिया|

“आंटी प्लीज थोड़ी साइड़ दे दीजिये मुझे आगे जाना है,” किशन ने फिर कहा
 
औरत ने घूरते हुए रास्ता छोड़ दिया| भीड़ को चीरता हुआ किशन बोनट के पास पहुंच गया| लेकिन उसकी सारी मेहनत तब व्यर्थ हो गइ जब बोनट पर बैठते ही ड़्राइवर ने उसे ड़ांटकर उठा दिया| वह बहुत निराश हुआ| उसने सोचा—“भीड़ में खड़ा ही रहना है तो क्यों न वापिस जाकर अपने दोस्तों के पास खड़ा हो जाऊं ”

भीड़ में से गुजरते हुए किशन दोबारा उसी काली औरत तक पहुंच गया

“आंटी प्लीज थोड़ी साइड़ देना”

काली औरत का चेहरा अब बिल्कुल लाल हो गया… गुर्राकर वह बोली “बदतमीज अगर तुमने दोबारा मुझसे बात की तो मैं तेरा मुंह नौच लूंगी”

“मगर आंटी मैनें कुछ गलत तो नहीं बोला आपको” किशन ने भोलेपन के साथ कहा|

“कार्टून… कहीं का” बड़बड़ाती हुर्इ औरत उसे घूरने लगी|

किशन समझ नहीं पाया काली औरत उसकी किस गलती से नाराज हुर्इ| इसलिए एक बार फिर प्यार से बोला “अगर मुझसे कोइ गलती हुर्इ है तो मुझे माफ कर दो आंटी जी”|

“कुत्ते कमीने पागल लुच्चे लफंगे बदमाश” मुझे छेड़ रहा है,” औरत चिल्लाकर बोली|

“मुझे छेड़ रहा है…” शब्द सुनकर तो किशन के होश ही उड़ गये|

“क्या हुआ बहन जी” एक यात्री ने पूछा जो देखने में किसी पहलवान जैसा था|

“भाइ साहब देखो न ये बेशर्म मुझे छेड़ रहा है,”

“झूठी आंटी…” बोलकर किशन उस यात्री की तरफ देखकर बोला “सर ये आंटी झूठ बोल रही हैं| मैने तो इनसे बस थोड़ी सी साइड़ मांगी थी” मगर आदमी ने किशन की एक न सुनी और उसका गला पकड़कर उसे अपनी तरफ खींच लिया| इससे पहले किशन कुछ सोच पाता तब तक एक अन्य यात्री भी उसकी तरफ लपक लिया”

दूसरे आदमी को भी अपनी तरफ बढ़ता देखकर किशन घबरा गया| वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा “बचाओ… सुनील… रोहन… बचाओ…”

शोर सुनकर रोहन की आँख खुल गई और खुली की खुली रह गई| जब उसने देखा दो आदमी मिलकर किशन को बुरी तरह मार रहे हैं|

“अरे भाई क्या बात है| क्यों मार रहे हो इसे| ” रोहन ने किशन को छुड़ाते हुए कहा|

“ये बदमाश इस बहन जी को छेड़ रहा था” पहले आदमी ने जवाब दिया|

सारा किस्सा सुनकर रोहन गुस्से में बोला “किशन… साहब क्या बोल रहे है तुमने क्या बदतमिजी की आंटी के… ”

“चटाक… आंटी शब्द सुनते ही काली औरत ने रोहन को जोर से चांटा मार दिया”

“तुमको मैं आंटी दिखती हूँ ” काली औरत गुस्से में बड़बड़ाई

“अभी रोहन अपने गाल पर हाथ रखकर आश्चर्यचकित खड़ा था कि सुनील भी जाग गया”

“क्या हुआ” सुनील ने रोहन को हैरत से देखते हुए पूछा

“मैनें गलती से इस गुड़िया को आंटी बोल दिया और इसने पता नहीं क्या किया ” किशन की ओर इशारा करते हुए रोहन ने कहा|

सुनील ने प्रशनवाचक भावों भरे चेहरे से किशन को देखा जैसे बिना बोले ही वह पूछ रहा हो “अबे क्या किया तुमने ”

“मैने थोड़ी सी साइड़ मांगी थी इनसे…” बेचार सा बनकर किशन ने बताया

“सुनील ने औरत को देखा तो हैरान रह गया— तुम इसे गुड़िया क्यों… सुनील अभी इतना ही बोल पाया था कि रोहन ने उसके मुंह पर हाथ रखकर उसे चुप करा दिया|

रोहन उसके कान के पास फुसफुसाया मैं जानता हूँ यह किसी भी ऐंगल से गुड़िया नहीं लगती बल्कि 50-55 साल की बुढ़िया है और शायद 90% चुड़ैलें भी इससे ज्यादा सुन्दर होगी| लेकिन मेरे दोस्त तुम वो गलती मत करो जो हमने की”|

“सुनील सारी कहानी समझ गया मौके की नजाकत को समझते हुए हाथ जोड़कर वह बोला “बेटी इन दोनों को अपनी गलती का एहसास हो चुका है… मैं इनकी तरफ से आपसे माफी मांगता हूँ … आप इनको अपने छोटे…बड़े भाई...सॉरी मेरा मतलब ताऊ जी समझकर माफ कर दो”|

“अंकल जी आप बोल रहे है इसलिए छोड़ रही हूँ नहीं तो आज मैं इसको पुलिस के हवाले कर देती” किशन की तरफ देखकर दांत पीसते हुए औरत बडबडायी|

“चलो माफी मांगो बिटिया से ” ड़ांटने के से अंदाज में सुनील ने कहा|

“रोहन तथा किशन दोनों ने माफी मांगी”|

औरत के चेहरे का रंग अब पहले की तरह ही “सदाबहार ब्लैक” हो गया”|
 
“यार सुनील दिल्ली ने तो अच्छा स्वागत किया पहले ही दिन मार पड़ गइ” काली औरत के बस से उतरने के बाद किशन ने धीरे से कहा|

“दु:खी क्यों होता है तुझे तो खुश होना चाहिए दिल्ली में तुझे एक नया नाम मिल गया आज से तेरा नाम “KKPLLB”KKPLLB” … मतलब” किशन ने आश्चर्य के साथ पूछा|

“रोहन क्या कहा था उस लाडली बिटिया ने “ये कुत्ता कमीना पागल लुच्चा लफंगा बदमाश मुझे छेड़ रहा है,”मगर रोहन ने कोइ जवाब नहीं दिया तो किशन बोला “हाँ..यही कहा था तो”

“बस यही मतलब हैकुत्ता कमीना पागल लुच्चा लफंगा बदमाश”|

“यार घर से लड़ाइ करके आइ होगी… मैने तो बस थोड़ा रास्ता ही मांगा था”

“बेवकूफ अभी तक तेरी समझ में नहीं आया… तूने उसे आंटी कहा इसलिए यह सब हुआ” रोहन ने गुस्से में कहा|

“दिल्ली में किसी आंटी को आंटी बोलने का मतलब छेडना होता है क्या”

“यार… चुप हो जा क्यों दिमाग खराब कर रहा है,” रोहन की बातों में बेरूखी थी|

किशन उसकी मनोदशा को समझकर चुप हो गया|

बस एयरपोर्ट पहुँच गई|

सुनील ने रोहन को जीवन में कामयाबी की शुभकामनायें दी|

“भाइ मेरे जाने के बाद माँ और सीमा का ख्याल रखना… तुम लोगों का अहसान रहेगा मुझ पर” सुनील के कंधे पर हाथ रखकर यह बोलते हुए रोहन की आंखें भर आई|

“कमीने… दोस्त बोलता है और ऐहसान की बात करता है| तू बिल्कुल फिक्र मत कर” सुनील ने उसे गले लगाकर कहा|

किशन अभी तक चुपचाप खड़ा था|

“आज तेरा कौन सा बटन दब गया जो अब तक चुप है,” रोहन ने उसे मनाने के लहजे में कहा

“तुमने ही तो कहा था चुप रहने को” नाराजगी जाहिर करते हुए किशन ने कहा

“अच्छा भाई अब मैं ही बोल रहा हूँ खुश रहा कर”

“ओके तो भाभी जी का फोन नम्बर बता दो… फिर मैं खुश रहूंगा”|

“किशन तू फिर शुरू हो गया…Grow up yaar”

“सॉरी भाई… माफ करें मगर अब मुझ पर गुस्सा होने की बजाये जाकर सीट रोक लो, ये दिल्ली है अगर कहीं जहाज में भी भीड़ हो गई तो आस्ट्रेलिया तक खड़े होकर जाना पड़ेगा” इस भावुक घड़ी में रोहन को हंसाने के इरादे से किशन ने घड़ी दिखाते हुए कहा”|

“अच्छा भाई तुम लोगों को इतनी जल्दी है तो मैं चला जाता हूँ”|

दोनों से गले मिलने के बाद रोहन अपनी मंजिल की ओर चल दिया| कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा तो किशन व सुनील भी मुड़कर उसे देख रहे थे|

एक-दूसरे को देखकर तीनो मुस्कुराये|

एकदम से किशन बोला “अरे रोहन भाई जरा सुनो जहाज में किसी को आंटी मत बोलना” इस पर एक बार फिर तीनो मुस्कुराये| तीनो ने एक-दूसरे को हाथ हिलाकर अलविदा कहा|
 
दिल्ली आने से पहले तो किशन व सुनील ने सोचा था कि वे सारा दिन दिल्ली घुमेंगें मगर इस यात्रा में उनको वह मजा नहीं आया, जिसकी दोनों ने कल्पना की थी| काली औरत वाली घटना ने उनका मूड़ खराब कर दिया था|

उन्होने एयरपोर्ट से सीधे दिल्ली अन्तर्राज्यीय बस अड्डे के लिए बस पकड़ ली तथा वहां से सीधे अपने शहर “कैथल” के लिए|

रात के सन्नाटे को चीरती हंसी की गूंज से सारे मोहल्ले को पता चल गया कि किशन व उसके दोस्त स्कूल ग्राउंड़ में एकत्रित हो गये है| ये हंसी सुनील द्वारा बस में किशन के काली औरत के साथ हुए वाक्या बताये जाने पर थी| इन सबके लिए यह बस आज की बात नहीं थी बचपन से ही ये सब दोस्त शाम को बिजली गुल हो जाने के बाद स्कूल ग्राउंड़, में जमा हो जाते, फिर शुरू होता हंसी–मजाक, किस्से–कहानियां सुनने–सुनाने का सिलसिला, जो देर रात तक जारी रहता| जब उनकी आंखें झपकने लगतीं, जबान साथ छोड़ देती, तभी वे सोने का नाम लेते थे| एक तरह से बिजली जाने के बाद इस स्कूल ग्राउंड़ में एकदूसरे का मजाक बनाकर ठहाके लगाना इनकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया था| हर रात 9:00 बजे से लगभग दो घंटो के लिए बिजली का कट होता और ये सभी बिजली गुल हो जाने के बाद स्कूल ग्राउंड़ में आकर टाइम पास करते थे|

आज कुछ देर रोहन के बारे में बातें होती रही फिर सब अपने दोस्त के साथ अपनी-अपनी यादों में खो गये| अब रोज की तरह न तो उनके कहकहे गूंज रहे थे ओर न ही उनके बीच एक–दूसरे को किस्से सुनाने की होड़ थी| खामोशी को तोड़ते हुये किशन का एक दोस्त बोला यार किशन आज तो सब चुपचाप बैठ गये, इस तरह तो एक घंटा बिताना भी मुश्किल हो जायेगा| जब तक बिजली नहीं आती तुम ही अपनी “लांडी” शायरी में कुछ सुना दो|

किशन को शायरी का बहुत शौक था मगर उसकी ज्यादातर बातों का मतलब किसी को भी समझ नहीं आता था| इसलिए सब उसकी शायरी को “लांडी” शायरी बोलते थे| लेकिन वह खुद भी हर किसी को अपनी शायरी सुनाने के लिए बेताब रहता था| किसी के जरा सा भी कहने पर वह शुरू हो जाता था| जैसे कि कह दो जमाने वालों से, बिछालें जितने कांटे और शोले बिछानें हों मेरी राह मे,

मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता, मैं तो आ रहा हू “EICHER TRACTOR” पर बैठ के|

“अरे वाह किशन क्या बात है ऐसे ही तड़कते भड़कते दो चार ओर आने दो”

“जरूर भाई… दोस्तो जरा गौर फरमाइये” बोलकर किशन फिर शुरू हो गहमने ख्वाब में भी तो नहीं देखा, उनको जी भर के कभी,

जब भी ख्वाब आया, पिंच करके देखा ओर नींद खुल गइ|

“वाह क्या बात है किशन आज तो तुम छा गये यार”

“शुक्रिया… तो फिर सुनिये अर्ज किया है,”

कुछ ऐसा रिश्ता जुड़ गया, मेरी रूह का उसकी रूह से,जैसे वो होता है न, किसी सड़े हुए टमाटर का बदबू से|

अ…इइइइइ…अरे बस कर जालिम… अब क्या मार ही डालोगे|

“अरे भाई अब शुरू हो गया हू तो दोचार तो ओर सुनने पडेंगें

ऐ रब मुझपर भी कुछ रहम कर दे, के नींद आए न उनको रातों मे,

पल भर को न मिले शुकुन उसे, असर कुछ ऐसा कर दे मेरी बातों मे|

इधर किशन का शेर पूरा हुआ के बिजली आ गई|

“भाई किशन तेरा तो पता नहीं मगर रब ने हम बच्चों पर तो रहम कर दिया जो तेरी शायरी से बचा लिया” सागर के बोलते ही सब हस पड़े|तेरे पास आ के मेरा वक्त गुजर जाता है,

दो घडी के लिए गम जाने किधर जाता है|

तू वही है जिसे इस दिल ने सदाएं दी है,

तू वही है जिसे इस दिल ने सदाएं दी है,

तू वही है जिसे नजरों ने दुआएं दी है,

तू वही है जिसे नजरों ने दुआएं दी है,

तू वही है के जो दिल लेके मुकर जाता है,
 
दो घडी के लिए गम जाने किधर जाता है,

तेरे पास आ के मेरा वक्त गुजर जाता है|

यह सुनील के मोबाइल की रिंगटोन थी| अब जबकि बिजली आ चुकी थी तो यह उसके घर का बुलावा था| सब लोग अपने-अपने घर को चल दिये मगर किशन वहीं बैठा रहा|

“क्या हुआ भाई “ उसके पास बैठते हुए सागर ने पूछा|

ये तो सच है मेरे भाई, आज गरदिश में हैं मेरे सितारे मगर,

एक दिन होगा, जब कोइ आख न सह सकेगी चमक इनकी|

किशन की आखें भर आई|

भाई की आंखों में आसूं देखे तो सागर को एहसास हुआ उसे सबके सामने किशन का मजाक नहीं बनाना चाहिए था| बड़ी मासूमियत से वह बोला “मुझे माफ कर दो भाई मैं बहुत बुरा हूं मैने आपको दु:ख दिया”|

सागर की मासूमियत देखकर किशन हस पडा…आज रूलाने के लिए बुरा क्यों कहूं ,

याद है कभी-कभी हसाता भी तो है तू|

“मुझे तेरी कोइ बात बुरी नहीं लगती… तू तो मेरा छोटा भाई है… मगर जब कोइ दूसरा मुझ पर हँसता है तब मै दु:खी हो जाता हू| सोचता हू अगर मै बाबू जी की उम्मीदों पर खरा न उतरा तो उनको कितना दु:ख होगा| मैं अपने मा-बाप के दु:ख का कारण नहीं बनना चाहता|

मैं खुद को साबित करके रहूंगा म्म्म्मै… बोलते हुए किशन अटक गया ओर सागर को समझाने के लिए हाथों को घूमाकर इशारा करने लगा “U Know …U Know …U Know that”|

“हां… हां… भाई मैं समझ गया… चलो अब घर चलते है,” सागर ने हँसकर कहा|

चलते-चलते सागर ने कहा - भाई कुछ दिन से मेरे मन में एक बात है| मैने एक-दो बार रोहन को भी बताना चाहा था, मगर बता नहीं पाया|

“कोई परेशानी है क्या अपने भाई को नहीं बतायेगा तो किसे बतायेगा” सागर के कंधे पर हाथ रखकर अपनापन जताते हुए किशन ने कहा|

“भाइ… बात ये है कुछ दिन से एक लड़का सीमा को परेशान करता है,” |

“कौन है वो” किशन का लहजा कुछ गंभीर था,

“भाई उसका नाम संजय है, वह सुभाष नगर का रहने वाला है,”

“मगर यह सब तुझे कैसे मालुम हुआ”

“पिछले कुछ दिनो से हमारे स्कूल जाने के वक्त संजय अपनी गली के मोड़ पर चाय की दुकान के बाहर बैठा रहता है ओर जब सीमा स्कूल जाती हैं, तब वह उसका पीछा करता है| सीमा उसे देखते ही परेशान हो जाती है| सीमा उससे कभी बात नहीं करती मगर संजय रास्ते भर कुछ न कुछ बोलता ही रहता है|

“क्या बोलता है…” किशन के शब्दों में कठोरता थी|

“भाई ज्यादातर तो सीमा उसकी सहेलियों के साथ जाती है, और मैं अपने दोस्तों के साथ| इसलिए मैं उसकी बातें ठीक से नहीं सुन पाता मगर कल मैं उनसे ज्यादा दूर नहीं था| वह अपने एक दोस्त के साथ था, उसने सीमा को देखते हुए कहा था लाल रंग के कभी हम भी न थे कायल इस कदर,

जब तक न देखा हमने ये इस जालिम के बदन पर|

उस वक्त सीमा ने लाल रंग का सुट पहन रखा था| तब सीमा ने संजय को धमकी भी दी थी मगर संजय पर इसका कोई असर नहीं हुआ| आज भी वह उसे तंग करता रहा|

इसलिए मुझे लगा मुझे इसके बारे में आपको बता देना चाहिए|

“तुमने बहुत अच्छा किया जो मुझे बता दिया बल्कि इस बारे में तुझे रोहन को ही बता देना चाहिए था खैर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा कल सुबह मैं तुम्हारे साथ चलूंगा| तुम मुझे बस संजय को एक बार दूर से ही दिखा देना| उसके बाद मैं उसे संभाल लूंगा चल अब चल के सो जा सुबह स्कूल भी जाना है,”|

अगली सुबह सागर को साथ लेकर किशन उसी चाय की दुकान पर पहुंचा| जहां बैठकर संजय सीमा का इन्तजार किया करता था| किशन ने सागर को समझाया कि उसे कुछ भी बोलकर बताने की जरूरत नहीं है, बल्कि जब संजय आयेगा तब तुम उठकर घर की तरफ चल देना… मैं समझ जाऊगा”|

दोनों संजय का इन्तजार करने लगे|

कुछ देर बाद संजय जिसकी उम्र लगभग 18-19 साल, कद लगभग 5’8” होगा, वहां आया| एक चाय का आर्ड़र देकर वह एक कुर्सी पर बैठ गया| संजय के बैठते ही सागर उठकर घर की तरफ चल दिया|
 
“तो ये है संजय…” किशन ने उसे गौर से देखते हुए सोचा मगर अभी वह संजय से बात करने की हिम्मत भी नहीं कर पाया था कि संजय का एक दोस्त भी वहां आ टपका| जिसका कद करीब छ: फुट था| उसके होंठ मोटे चेहरा चौड़ा सपाट और कठोर था| उसकी आंखे बड़ी-बड़ी तथा अजीब से अन्दाज में खुली रहती थीं| वह शक्ल से किसी गुण्ड़े या बदमाश जैसा नजर आता था| यह लड़का किशन को खुद के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकतवर लगा इसलिए वह उनसे झगड़ा करने की हिम्मत नहीं कर पाया|

किशन ने दुकान के मालिक से संजय व उसके दोस्त बारे में पता किया| जैसा कि दूसरे लड़के के चेहरे से ही जाहिर हो रहा था चायवाले ने भी उसे बदमाश टाइप का लड़का बताया| उसका नाम प्रदीप मिन्हास था|

दुकानदार से संजय और प्रदीप के बारे में जानकारी लेकर किशन घर आया| उसने सागर से कहा मैं आज कुलदीप के साथ जाकर संजय को समझा दूंगा, और अगर इसके बाद भी वो सीमा को तंग करे तो तुम मुझे बता देना|

किशन ने कुलदीप व सुनील को पूरे मामले से अवगत कराया|

दोनों उस पर गरज पड़े|

गुस्से से आग बबूला होकर कुलदीप बोला - इतिहास गवाह “एक भाई से बढ़कर बहन का ख्याल भगवान भी नहीं रख सकता, लेकिन अगर भाई तेरे जैसे होने लगे तो बहुत जल्द ये मिसाल बदल जायेगी”|

“मुझे ये समझ नहीं आता वो लड़का तुम्हारे सामने था ओर तुम… अगर कोइ हमसे ताकतवर है ओर वो हमारी बहु–बेटियों को तंग करेगा तो क्या सहते रहेंगें” दांत पीसते हुए सुनील ने कहा|

“मुझे बस इतना बता संजय कहां मिलेगा मैं देखता हू वो कितना ताकतवर है,” किशन को गुस्से में घूरते हुए कुलदीप ने पूछा|

“मुझे माफ कर दो भाई मुझसे गलती हो गई… ” दोनों के गुस्से से बचने के लिए किशन बोला

“तू बस इतना बता संजय इस वक्त कहां मिलेगा” कुलदीप ने फिर गुस्से मे पूछा|

“अभी तो वो स्कूल में होगा भाई ऐसा करते हैं कल सुबह हम उसे वहीं दुकान पर पकड़ लेंगे” किशन हड़बड़ाकर बोला|

“हाँ जैसे आज सुबह पकड़ा था सुनील… स्कूल की छुट्टी होने वाली है,” घड़ी देखते हुए कुलदीप ने सुनील को इशारा किया|

“भाई मुझे भी अपने साथ ले चलो… मुझे अपनी गलती का एहसास हो चुका है मैं आपके सामने उसे मारूगा”|

“तुझे तो वहां ले जाना ही पड़ेगा क्योंकिं हम दोनों को तो उसकी पहचान ही नहीं है,” सुनील ने उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा|

स्कूल की छुट्टी के वक्त तीनो किशन, कुलदीप और सुनील स्कूल के बाहर संजय का इन्तजार करने लगे| छुट्टी के बाद संजय अपने एक दोस्त के साथ स्कूल से बाहर निकला|

“भाई वो रहा संजय” किशन ने उसे देखते ही कहा|

सुनील और कुलदीप दोनों ही जानते थे किशन झगड़े से बहुत डरता है मगर फिर भी दोनों बोले “किशन अब सही मौका है अपनी बात को सही साबित करने का”|

“कौन सी बात भाई |

“वही जो यहां आने से पहले तुमने कही थी कि तू हमारे सामने संजय को मारेगा” किशन को संजय की तरफ धक्का देते हुए सुनील ने कहा|

किशन धीरे-धीरे संजय की ओर बढ़ गया मगर वह उसे टोकने की हिम्मत नहीं कर पाया|

“जा न … मार उसको नहीं तो मैं तुझे मार दूंगा” कुलदीप ने कहा|

“भाई अ… अभी तो वो दो हैं इसके दोस्त को जाने दो फिर मैं इसे मारूंगा”

किशन ने बहाना बनाया मगर उसका ये बहाना भी ज्यादा देर तक उसका साथ न निभा सका| कुछ दूर जाने के बाद एक चौराहे पर संजय का वह दोस्त अलग रास्ते चला गया| अब संजय अकेला रह गया था|

“ले चला गया उसका दोस्त चल अब जा मार उसको”|

“हैलो दोस्त जरा रूकना” किशन ने पीछे से आवाज लगाई|

संजय रूक गया|

किशन हिम्मत करके संजय के सामने खड़ा हो गया तथा कुलदीप व सुनील संजय के पीछे|

“तुम सीमा को क्यों परेशान करते हो” किशन ने कांपती आवाज में पूछा|

“तुमसे मतलब” संजय ने अकड़कर कहा

“मतलब है तभी पूछ रहा हूँ ,… तुम उससे दूर रहो”

“अबे ऐ… मै सीमा को चाहता हूँ अगर इसमे तुझे कोइ परेशानी है तो जल्दी बोल” संजय के लहजे में अब भी वही अकड़ थी|

“तुम मेरी परेशानी की छोड़ो अगर आज के बाद तुमने सीमा को परेशान किया तो तुझे बहुत परेशानी होगी” किशन ने भी कुछ गंभीर होते हुए कहा|

“बस… बहुत सुन ली तेरी बकवास, अब मेरी बात सुन तू इस मामले में न पड़े तो तेरे लिए बेहतर होगा” संजय ने फिर उसी अक्कड़ के साथ कहा|
 
“संजय तू मेरी बात मान… तू सीमा को परेशान करना बंद कर दे वरना… ” सुनील को देखते हुए किशन ने कहा| वह सुनील की तरफ कुछ इस तरह देख रहा था, जैसे वह कहना चाहता हो “मै तो इसे हर तरह से समझाना चाहता हूँ , मगर इस पर तो मेरी किसी बात का कोइ असर ही नहीं है अब मैं क्या करू | ”

“वरना क्या… क्या कर लेगा तू | ”

किशन को कुछ समझ नहीं आया अब वह क्या कहे|

मासूम निगाहों से किशन कुलदीप की ओर देखने लगा|

“चल अब मेरा वक्त बर्बाद मत कर तुझे जो करना है कर ले” बोलकर संजय आगे बढ गया|

संजय अभी मुश्किल से दो-चार कदम ही चला था कि सुनील ने उसका रास्ता रोक लिया|

“तू एक बात बता अगर मैं तेरी बहन को तंग करता तो तू क्या करता” सुनील ने कहा

“हम तो काट दिया करते हैं,” संजय ने उसका कालर पकड़कर कहा|

संजय के इतना बोलते ही कुलदीप व सुनील दोनों ने उसे मारना शुरू कर दिया| किशन के लिए किसी के साथ झगड़ा करने का यह पहला मौका था| इसलिए वह घबराया हुआ था| मगर जब उसने कुलदीप व सुनील को संजय को मारते देखा तो न जाने कैसे उसमे भी हिम्मत आ गई| लगे हाथ उसने भी दो चार हाथ छोड़ दिये| साथ ही कुलदीप की नजरों में बहादुर बनने के लिए वह संजय को मारते वक्त जोर-जोर से गालियां देने लगा| अगले 4-5 मिनटों में ही तीनो ने मार-मार कर संजय की हालत खराब कर दी| फिर तीनो वहां से भाग गये| लेकिन अब किशन इन दोनों से आगे था| आज उसने जिन्दगी में पहली बार किसी की पिटाई की थी इसलिए वह बहुत खुश था|

रात को बिजली गुल हो जाने के बाद सब दोस्त स्कूल ग्राऊड़ में आये तो किशन ने अपने दोस्तो की टोली में अपनी बहादुरी का बखान बढ़ा-चढ़ा कर किया|

एक दिन स्कूल के पश्चात् सीमा किशन से मिलने आई वह बहुत घबरायी हुइ थी|

“बहुत परेशान लग रही हो सीमा क्या बात है ” किशन ने पूछा|

“भैया आज सुबह प्रदीप मिला था वह आपके बारे में पूछ रहा था| उसका कहना है, आपने और आपके दोस्तों ने मिलकर संजय को बुरी तरह मारा है,” |

“प्रदीप कौन ” किशन ने अनजान सा बनकर पूछा|

“भैया प्रदीप… संजय का दोस्त है,” |

“ओहो… संजय का दोस्त है… हसते हुए किशन ने बताया “सही बोल रहा था वो प्रदीप… मैने ही मारा है संजय को… लगता है, इस प्रदीप को भी वही दवाइ देनी पड़ेगी जो संजय को दी है| इसके अलावा क्या बोल रहा था वो संजय का दोस्त|

“आपके बारे में पूछ रहा था”

“मेरे बारे में… क्या पूछ रहा था” किशन हड़बड़ा गया

“यही के आप कब ओर कहां अकेले मिल सकते हैं,” सीमा ने चिंतित स्वर में बताया

“उसने मेरे बारे में ही क्यों पूछा” वह सोच ही रहा था कि सीमा बोली “भाई ये प्रदीप सड़कछाप गुंड़े टाइप का लड़का लगता है आप इससे बचके रहना|

किशन ने सीमा के सामने अपनी परेशानी छिपाते हुए उसे निश्चिन्त रहने को कहा मगर सच तो यह था कि उसकी आखों के सामने प्रदीप का भयानक चेहरा घुमने लगा था| किशन यह सोचकर बहुत डर गया था, कि अब जब कभी उसका सामना प्रदीप से होगा तो उसकी भी पिटाइ होगी”|

उसके लिए यह अजीब तनाव वाला वक्त था| भयभीत, असुरक्षित सा वह अपने कमरे में पड़ा रहता| पिटाई के डर से वह इतना आहत था, कि उसने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया| यहा तक कि उसके घरवाले कभी उसेे किसी काम के लिए बाजार जाने को बोलते तब भी वह या तो उनको टाल देता था या फिर किसी दूसरे को भेज दिया करता| किशन अन्दर ही अन्दर घुटता जा रहा था| डर के मारे उसकी हालत खराब थी| उसे डरावने सपने आने लगे| जब उसे इस समस्या का कोइ उपाय नहीं सुझा तब उसने सोचा “क्यों न चलकर भाई से कह दूं| यह सोचकर वह उठा और जाकर कुलदीप के सामने खड़ा हो गया जो साथ के कमरे में बैठा खाना खा रहा था|

सहसा किशन को सामने देखकर कुलदीप चौंक पड़ा| उसका उतरा हुआ चेहरा, सजल आंखे और कुंठित मुख देखा तो कुछ चिंतित होकर पूछा−क्या बात है किशन, तबीयत तो ठीक है| |

किशन — भाई मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ पर डरता हूँ कि आप मेरा मजाक न उड़ायें|

“क्या बात है बता तो सही”|

“भाई मैं सो नहीं पा रहा हूँ मुझे डरावने सपने आते है,” |

“जरा बता तो तुझे कैसे-कैसे सपने आते हैं,” कुलदीप ने उसे पास बैठाते हुए पूछा

“भाई आज ही मुझे सपने में एक सुनसान रास्ते पर संजय का दोस्त प्रदीप मेरे पीछे तलवार लेकर भागता हुआ दिखाइ दिया| वह बोल रहा था भाग कुत्ते भाग मैं भी देखता हूँ आज तुझे कौन बचायेगा| मैं उस सुनसान रास्ते पर भागता रहा| जब मैं भाग-भाग कर थक गया तो मैं एक पेड़ के पीछे छुपकर आराम करने लगा| अचानक प्रदीप मेरे सामने आ गया और तलवार फेंककर वह किसी खूनी दरिन्दे की तरह मेरी तरफ बढ़ने लगा| फिर देखते ही देखते वह मच्छर बनकर मुझे खा गया|

किशन की बात सुनकर कुलदीप पागलों की तरह हँसने लगा हे भगवान… अबे तुझे सोते हुए किसी मच्छर ने काट लिया होगा| इसीलिए तुझे ऐसा सपना आया तू एक काम कर आज के बाद तू कछुआ छाप लगाकर सोया कर फिर तुझे ऐसे भयानक सपने नहीं आएंगे|

कुलदीप उसे समझाकर दरवाजे से बाहर निकला ही था के एकाएक वह पलटा और बोला “अरे किशन सुन तू जमीन पर मत सोना कहीं शाम को घर आऊ तो पता चले तुझे चींटी खा गई“| ठहाका लगाकर हंसते हुए कुलदीप बाहर चला गया “सपने भी बिल्कुल अपने जैसे देखता है,”
 
किशन ने इसका कोइ उत्तर नहीं दिया| आंखे डबडबा आयीं, कंठावरोध के कारण मुंह तक न खोल सका| चुपके से आकर अपने कमरे में लेट गया| अब उसकी परेशानी ओर भी बढ़ गई क्योंकि यह सोचकर कि कोइ उसकी परेशानी नहीं समझेगा, बल्कि सब उसका मजाक ही उड़ायेंगे| वह इस बारे में अब किसी से भी बात नहीं करना चाहता था मगर वह यह भी नहीं समझ पा रहा था कि वह इस परेशानी से कैसे छुटकारा पाए|

प्रदीप का डर उसे दिन रात सताने लगा| वह इस डर को ज्यादा दिन छिपा भी न सका| एक रात जब वह सो रहा था तब अचानक नींद में बड़बड़ाने लगा “मुझे मत मारो-मुझे मत मारो”| ये शब्द जब कुलदीप के कान तक पहुचे तब वह समझा किशन ने उसे जो डरावने सपनों की बात कही थी वह बिल्कुल सच थी| उसे एहसास हुआ कि उसे किशन की बात को हंसी में टालने की बजाये उसे समझाना चाहिए था|

सुबह ही कुलदीप ने किशन को अपने पास बुलाकर बड़े प्यार से पूछा “किशन क्या बात है| आजकल तुम कुछ गुमसुम से रहते हो”|

“नहीं तो भाई कोइ परेशानी नहीं है”|

बार-बार पूछने पर भी जब किशन ने अपना जवाब नहीं बदला तो कुलदीप गुस्से से उस पर चिल्लाया “तुझे कोइ परेशानी नहीं है तो फिर रात को क्यों चिल्ला रहा था मुझे मत मारो- मुझे मत मारो”| किशन सिर झुकाये चुप खड़ा रहा| उसकी आँखो से आसू टपक रहे थे|

“बेवकूफ इस तरह डरेगा तो तू उसके मारे बगैर भी मर जायेगा लड़ाई झगड़े तो होते ही रहते है इसमे डरने की क्या बात है,…”|

लेकिन किशन अब ओर भी ज्यादा सुबक-सुबक कर रोने लगा|

जब कुलदीप ने देखा किशन पर उसकी बातों का कोइ असर नहीं हो रहा है तब उसने पूरी बात अपने पिता श्रीहरिनारायण को बताई|

श्रीहरिनारायण ने किशन को अपने पास बिठाया औखुद की चाहत इन्सानियत की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैे| एक बात हमेशा याद रखना जीवन और मॄत्यु भगवान के हाथ में होती है, कोइ भी जीव न तो इसमे एक भी पल जोड़ सकता है और न हि एक भी पल घटा सकता है| जीव चाहे कहीं भी हो मॄत्यु अपने निर्धारित समय पर आकर रहेगी इसलिए मॄत्यु से इतना डरना उचित नहीं है अगर कोइ व्यक्ति तुम्हारे देश, समाज या परिवार को किसी भी प्रकार से नुकसान पहुंचा रहा हो तो उसे कभी बर्दास्त न करो बल्कि उस समय यथाशक्ति लड़ना ही हमारा परम कर्तव्य होता है|

इन बातों से किशन को कुछ हिम्मत मिली… “आखिर कब तब प्रदीप से छिपकर वह घर बैठा रहेगा” सोचकर उसने अपना मन मजबूत कर लिया| आज कई दिनों के बाद वह कुछ सामान्य महसूस कर रहा था| वह खुश था मगर इसी की वजह से उसे डर भी लग रहा था क्योकिं जब-2 वह खुश होता था उसकी जिन्दगी में कोइ न कोइ परेशानी जरूर आती थी और आजकल तो उसे परेशानी का अंदेशा पहले से ही था|

दिन गुजरते गये| सब बातें भूलाकर किशन अब पहले की तरह जीने लगा था| अब तक वैसा कुछ भी नहीं हुआ जो कुछ सोचकर वह इतना डर रहा था| वह अपने आप पर मन ही मन हँस पडबड़ा नासमझ हूँ यारो,न जाने मैं ये कैसे समझा|

एक शाम कुलदीप ने किशन को कुछ सामान लाने के लिए बाजार भेजा| किशन अपने छोटे भाई सागर को सामान पकड़ने के लिए अपने साथ लेकर चल दिया| न जाने किन ख्यालों में खोया हुआ अपनी मोटरसाइकिल को हवा से बातें कराता हुआ वह बाजार की तरफ बढ़ता जा रहा था| एक दुकान के सामने जाकर उसने मोटरसाइकिल रोक दी| अचानक प्रदीप अपने एक दोस्त के साथ उसके सामने आ गया| ताकत के हिसाब से तो प्रदीप अकेला ही उसकी पिटाई के लिए काफी था मगर शायद किशन की किस्मत कोइ कसर नहीं छोड़ना चाहती थी| इसलिए उसने प्रदीप के दोस्त को भी प्रदीप के साथ भेज दिया था| किशन मोटरसाइकिल पर बैठा-बैठा काँप रहा था|

“क्या बात है भाई आप ठीक तो है| ” सागर ने पूछा

किशन कोइ जवाब न दे सका| इससे पहले के वह बचने का कोई उपाय सोच पाता प्रदीप ने उससे बिना कोइ सवाल- जवाब किये एक जोरदार थप्पड़ जड़ा| किशन का शरीर बिल्कुल सुन्न पड़ गया| वह किसी पत्थर की भांति ऐसे बैठा रहा जैसे उसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा हो| फिर प्रदीप ने अपने दोस्त के साथ मिलकर उसको मोटरसाइकिल से उतारकर पीटना शुरू कर दिया| उन दोनों ने मिलकर उसकी जमकर पिटाइ की| बुरी तरह पिटने के बाद प्रदीप के एक जोरदार घंुसे के प्रहार से किशन के लिए सब कुछ घूमने लगा| वह लड़खड़ाकर सड़क पर गिर गया| बेहोश होने से पहले उसने वो मंजर देखा जब बीच बाजार लोग उसे पिटते हुए देख रहे थे और सागर उसे पिटते हुए देखकर मोटरसाइकिल पर बैठा-बैठा रो रहा था| उसके बाद क्या हुआ किशन को कुछ पता नहीं था|
 
इसके बाद का वॄतांत सागर ने ही उसे बताया था| प्रदीप और उसके दोस्त के जाने के पश्चात् एक भले आदमी ने सागर से उनके घर का फोन नम्बर पूछा था| तब सागर ने उस आदमी को कुलदीप का फोन नम्बर बताया ओर कुलदीप उसे अस्पताल लाया था|

आह… आह… म्म्मै कहाँ हूँ … अस्पताल के एक बेड़ पर पड़ा-पड़ा किशन कराह रहा था| उसे होश में आता देखकर कुलदीप तथा उसके बाबू जी की आंखों में एक चमक उभर आई|

पिटाई के समय तो किशन को कुछ भी महसूस नहीं हुआ था| मगर अब उसके शरीर के सभी अग उसे अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे|

किशन का हाथ अपने हाथ मे लेकर कुलदीप बोला “ तू चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा और प्रदीप को तो मै ऐसा सबक सिखाऊंगा…”

“कुलदीप बेटा तुम शान्त रहो” उसकी बात काटते हुए श्रीहरिनारायण ने कहा|

उसे समझाते हुए श्रीहरिनारायण नलड़ाई झगड़ा किसी बात का हल नहीं होता| पहले तो तुम लोगों को संजय के साथ ही मारपीट नहीं करनी चाहिए थी अगर उसने तुम्हारी बात नहीं भी मानी थी तब भी उसको मारने की बजाय पहले उसके माता पिता से बात करनी चाहिए थी| बेटा गुंड़ागर्दी में जिन्दगी ज्यादा दिन की नहीं होती| तुम यहीं से सोच लो कुछ दिन पहले तुमने उनको मारा था आज उन लोगों ने तुमको मारा है और अगर अब तुम उनको मारोगे तो फिर वो तुमको मारेंगे| इस तरह तो ये किस्सा कभी खत्म ही नहीं होगा… बेटा शरीर का कोइ भी अग इस जन्म में दोबारा नहीं मिल सकता, इसलिए जहां तक संभव हो अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए|

किशन शरीर के अंगों की अहमियत अच्छी तरह जान चुका था इसलिए उसने हाँ में सिर हिला दिया| श्रीहरिनारायण ने कहा— अब तुम लोगो को प्रदीप या संजय किसी से कोइ बात करने की जरूरत नहीं है| मैं समझौता करने के लिए उनके माता-पिता से बात करूगां| अपने पिता की यह बात किशन कोे बहुत अच्छी लगी उसे लगा अब ये मामला सुलझ जायेगा| उसका मन किया कि वह ठीक से बैठकर अपने बाबू जी की बातें सुने| लेकिन जैसे ही उसने बैठने की कोशिश की उसे चक्कर आने लगे| मन ही मन प्रदीप को कोसते हुए वह बेहोश हो गयबुरा हो रे साले मुझे पीटने वाले तेरा,

मुझे तो बैठे-बैठे भी चक्कर आ रहे हैं|

“भाई सीमा आई है,” सागर ने किशन को जगाते हुए कहा| सीमा के साथ उसकी एक सहेली भी थी| जिसे देखकर किशन अपनी सारी पीड़ा भूल गया| किसी कवि की कल्पना से भी अधिक सुन्दर थी वह| किशन उसे पसंद करता था| उसका मन बार-बार उसे कह रहा था कि आज वह उसे बता दे कइ बार लौटा हूं आपकी राहों से,

अपने मन की बात, मन ही में लेकर|

किशन उसके चेहरे से अपनी नजर नहीं हटा पा रहा था| एकटक बस उसे ही देखे जा रहा था| मानो वह अपनी पलके झपकना ही भूल गया हो| कुछ क्षण के लिए वह उसे इसी तरह निहारता रहा अचानक सीमा की आवाज सुनकर वह हड़बड़ा गया| जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो”|

“भैया मैं जा रही हूंं” बोलते हुए सीमा बाहर जाने लगी|

“अरे मगर सीमा तुमने बताया नहीं… कोइ परेशानी है क्या” किशन ने सीमा से पूछा|

“नहीं भैया मैं तो बस आपका हाल-चाल जानने के लिए आइ थीं”अपनी सहेली की ओर देखते हुए सीमा ने कहा|

“हाल तो तुम देख ही रही हो सीमा और चाल देखकर शायद अभी कुछ दिन लोग मुझे लंगड़ा समझें| किशन के इतना बोलते ही सीमा की सहेली हँस पड़ी|

किशन चेहरे सेे उसे पहचानता था मगर उसका नाम वह नहीं जानता था| वह तो अब तक उसे भूरी आखों वाली कहा करता था| उसका नाम जानने के लिए उसने सीमा से पूछा “सीमा ये मोहतरमा कौन हैं जो हमारी खुशियों में शामिल होने आई हैं|

सीमा ने दोनों का परिचय कराया| उसका नाम राधिका था|

“राधिका जी आपकी हसीं तो बहुत प्यारी है मगर आपको किसी ऐसे इन्सान के सामने नहीं हँसना चाहिए जिसे हँसते हुए सारे शरीर में दर्द होता हो”|

“सॉरी किशन जी… मगर मुझे आपकी बात सुनकर एक कहावत याद आ गई थी| इसलिए मैं अपनी हंसी को नहीं रोक पायी” राधिका ने कहा|

“कहावत… कैसी कहावत”

“किशन जी हलवे के बारे में कहा जाता है कि मजा तो बस हलवा खाने में ही आता है जो गले में से ऐसे उतरता है जैसे कोइ लंगड़ा सीढ़ीयों में से उतरता हो| इसके अलावा आज सुबह एक लंगड़े को मंदिर की सीढ़ीयों से उतरते हुए देखा था| बस इसीलिए मुझे हँसी आ गई|

“न जाने ये कैसे-2 उदाहरण देगी” यही सोचकर किशन ने बात बदलते हुए सीमा से पूछा “सीमा तुम बताओ… तुमको कोइ परेशानी तो नहीं है ना”|

“नहीं भैया अब तक तो कोइ परेशानी नहीं हुई… भैया समझ नहीं आता मैं कैसे आपका शुक्रिया अदा करूं| ”

“शुक्रिया किस बात का”

“भैया मुझे पता है आज आप इस हालत में मेरी वजह से हैं,”सीमा ने अपनापन जताते हुए कहा

“तुम्हारी वजह से… मैं तो समझी थी लड़कियां छेड़ते हुए पिटे होगें” राधिका तुरन्त बोली “राधिका… प्लीज कुछ देर के लिए चुप बैठो” सीमा ने सख्त लहजे में कहा|
 
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