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सीमा का यह लहजा राधिका को रास न आया “सॉरी” बोलकर वह बाहर चली गई|
किशन उसे रोकना चाहता था मगर वह कुछ बोल न पाया| बस मन ही मन अभी कुछ शुकून आया था इस मन को,
और अभी आप जाने की बात करते हो|
इसके बाद कुछ देर तक किशन और सीमा की बातें होती रही| मगर किशन का मन तो इस वक्त बाहर बैठा हुआ था| उसे इन बातों में कोइ दिलचस्पी न थी|
“भैया मेरे लिए जो आपने किया है… आप तो मेरे लिए भगवान जैसे हों”|
“भगवान जैसे…” शब्द सुनकर किशन खुश हो गया| मन ही मन वह सोचने लगा “क्या किसी की मदद करने से इन्सान भगवान बन सकता है| अब तो मैं हमेशा सबकी मदद किया करूंगा| वह बोला सीमा छोड़ो इन बातों को… बहन की रक्षा करना तो भाइ का फर्ज होता है| तुम किसी बात की चिंता मत करो रोहन यहां नहीं है तो क्या हुआ| किसी भी परेशानी को तुम तक पहुंचने से पहले मुझसे निपटना पड़ेगा|
सीमा बाहर आई तो देखा राधिका मुँह फुलाये बैठी थी|
“अब आप अन्दर जाकर जो चाहो मजाक करो| मैं आप दोनोंं को ड़िस्ट्रब नहीं करूंगी” ऐसा कहते हुए सीमा ने राधिका को भीतर धकेल दिया|
राधिका अन्दर आयी तो किशन ने मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया|
राधिका ने उसकी मुस्कान का जवाब “बाए” बोलकर दिया|
“राधिका जी… फिर कब मिलेंगें” किशन ने कातर निगाहों से देखते हुए पूछा|
“मै आपसे फिर क्यों मिलूंगी” राधिका ने बड़ी नजाकत से जवाब दिया
किशन ने उसके इस सवाल का जवाब कुछ इस अन्दाज में दिया - राधिका जी आजगाली दोगे सह लूंगा, सैंड़िल मारोगे सह लूंगा,मगर आज आप ना कहोगे, तो सह ना सकूंगा|
“अच्छा जी… तो सैंड़ल खाने की हिम्मत अभी बाकी है,”
फिर मुस्कुराकर वह बोली देखेंगे…|
अब तो किशन को दर्द का बिल्कुल भी एहसास नहीं था|
अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े वह ख्यालों से ही अपने मन को बहलाने लगबहुत जल्द होगा, उनसे सामना ऐ दिल,
होश हमें ना होगा, खुद संभलना ऐ दिल|
किशन राधिका से हुई अपनी पहली मुलाकात की यादों में खो गया|
कुछ दिन पहले जब किशन स्कूल से आ रहा था| राधिका भी उसके पीछे-पीछे स्कूल से आ रही थी| राधिका हरे रंग की टी-शर्ट और जींस में थी| वह चलते-चलते कोइ किताब पढ़ रही थी| यूं राधिका उसकी सुन्दरता की वजह से किशन को पहली नजर में ही भा गई थी| उसपे उसकी भूरी-भूरी आखों ने तो उसे घायल ही कर दिया था| राधिका किशन की इस हालत से बिल्कुल अनजान अपनी किताब पढ़नें में मग्न थी| उसे देखकर किशन ने सोचा “क्यों न इस किताबी कीड़े को परेशान किया जाए”| इसी इरादे से वह धीरे-धीरे चलने लगा| जैसे ही राधिका उसके नजदीक पहुंची, आकाश की ओर देखता हुआ वह एकदम रूक गया|
राधिका उससे टकरा गई जिससे उसके हाथ से किताब भी गिर गई|
“स…स…सॉरी” हड़बड़ाकर वह बोली ओर किताब उठाकर आगे बढ़ गई|
किशन के लिए तो यह सब एक सोची समझी शरारत थी| उसने तो बस एक बहाना ढूंंढ़ा था राधिका को परेशान करने का|
बस बहाना मिलते ही वह शुरू हो गयाहरे-हरे रामा| हरे-हरे रामा | रामा-रामा ये हरे-हरे,
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|
न चलें ये देखकर इधर-उधर,
न जाने है इनका ध्यान किधर,
खेलें हमसे टक्कर-टक्कर,
और ये खेल भी तो बस रामा-रामा|
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|
जितनी हसीन - उतनी ही जालिम,
जुल्म करके ये हम पर हँस ते हैं,
यूं जालिम लाखों है मगर,
ये भूरी आँखे है ना, ये तो बस रामा-रामा
हरे-हरे रामा| हरे-हरे रामा | रामा-रामा ये हरे-हरे,
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|
किशन उसे रोकना चाहता था मगर वह कुछ बोल न पाया| बस मन ही मन अभी कुछ शुकून आया था इस मन को,
और अभी आप जाने की बात करते हो|
इसके बाद कुछ देर तक किशन और सीमा की बातें होती रही| मगर किशन का मन तो इस वक्त बाहर बैठा हुआ था| उसे इन बातों में कोइ दिलचस्पी न थी|
“भैया मेरे लिए जो आपने किया है… आप तो मेरे लिए भगवान जैसे हों”|
“भगवान जैसे…” शब्द सुनकर किशन खुश हो गया| मन ही मन वह सोचने लगा “क्या किसी की मदद करने से इन्सान भगवान बन सकता है| अब तो मैं हमेशा सबकी मदद किया करूंगा| वह बोला सीमा छोड़ो इन बातों को… बहन की रक्षा करना तो भाइ का फर्ज होता है| तुम किसी बात की चिंता मत करो रोहन यहां नहीं है तो क्या हुआ| किसी भी परेशानी को तुम तक पहुंचने से पहले मुझसे निपटना पड़ेगा|
सीमा बाहर आई तो देखा राधिका मुँह फुलाये बैठी थी|
“अब आप अन्दर जाकर जो चाहो मजाक करो| मैं आप दोनोंं को ड़िस्ट्रब नहीं करूंगी” ऐसा कहते हुए सीमा ने राधिका को भीतर धकेल दिया|
राधिका अन्दर आयी तो किशन ने मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया|
राधिका ने उसकी मुस्कान का जवाब “बाए” बोलकर दिया|
“राधिका जी… फिर कब मिलेंगें” किशन ने कातर निगाहों से देखते हुए पूछा|
“मै आपसे फिर क्यों मिलूंगी” राधिका ने बड़ी नजाकत से जवाब दिया
किशन ने उसके इस सवाल का जवाब कुछ इस अन्दाज में दिया - राधिका जी आजगाली दोगे सह लूंगा, सैंड़िल मारोगे सह लूंगा,मगर आज आप ना कहोगे, तो सह ना सकूंगा|
“अच्छा जी… तो सैंड़ल खाने की हिम्मत अभी बाकी है,”
फिर मुस्कुराकर वह बोली देखेंगे…|
अब तो किशन को दर्द का बिल्कुल भी एहसास नहीं था|
अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े वह ख्यालों से ही अपने मन को बहलाने लगबहुत जल्द होगा, उनसे सामना ऐ दिल,
होश हमें ना होगा, खुद संभलना ऐ दिल|
किशन राधिका से हुई अपनी पहली मुलाकात की यादों में खो गया|
कुछ दिन पहले जब किशन स्कूल से आ रहा था| राधिका भी उसके पीछे-पीछे स्कूल से आ रही थी| राधिका हरे रंग की टी-शर्ट और जींस में थी| वह चलते-चलते कोइ किताब पढ़ रही थी| यूं राधिका उसकी सुन्दरता की वजह से किशन को पहली नजर में ही भा गई थी| उसपे उसकी भूरी-भूरी आखों ने तो उसे घायल ही कर दिया था| राधिका किशन की इस हालत से बिल्कुल अनजान अपनी किताब पढ़नें में मग्न थी| उसे देखकर किशन ने सोचा “क्यों न इस किताबी कीड़े को परेशान किया जाए”| इसी इरादे से वह धीरे-धीरे चलने लगा| जैसे ही राधिका उसके नजदीक पहुंची, आकाश की ओर देखता हुआ वह एकदम रूक गया|
राधिका उससे टकरा गई जिससे उसके हाथ से किताब भी गिर गई|
“स…स…सॉरी” हड़बड़ाकर वह बोली ओर किताब उठाकर आगे बढ़ गई|
किशन के लिए तो यह सब एक सोची समझी शरारत थी| उसने तो बस एक बहाना ढूंंढ़ा था राधिका को परेशान करने का|
बस बहाना मिलते ही वह शुरू हो गयाहरे-हरे रामा| हरे-हरे रामा | रामा-रामा ये हरे-हरे,
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|
न चलें ये देखकर इधर-उधर,
न जाने है इनका ध्यान किधर,
खेलें हमसे टक्कर-टक्कर,
और ये खेल भी तो बस रामा-रामा|
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|
जितनी हसीन - उतनी ही जालिम,
जुल्म करके ये हम पर हँस ते हैं,
यूं जालिम लाखों है मगर,
ये भूरी आँखे है ना, ये तो बस रामा-रामा
हरे-हरे रामा| हरे-हरे रामा | रामा-रामा ये हरे-हरे,
अरे भाई ये जो हरे-हरे हैं ना, ये तो बस रामा-रामा|