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Romance एक एहसास complete

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रोहन के आस्ट्रेलिया जाने के पश्चात् निर्मला देवी को लगा था कि अब उसके दु:ख भरे दिन कट गए हैं मगर आज उसकी जवान बेटी को उससे छीन लिया गया था| वह उसके पति की आखिरी निशानी थी| उसके हृदय में शूल सा उठ रहा था| उसे किसी तरह धैर्य नहीं होता| उस घोर आत्मवेदना की दशा में रह रहकर निर्मला देवी को सीमा की यादे सताने लगी|

सीमा ने बडी आकर्षक रूप पाया था| बेहद खूबसूरत थी|पूर्ण चन्द्रर्मा के आकार का खूबसूरत चेहरा| खिला रूप-गोरा खिलता तरूणई युक्त शरीर| रक्तिम होंठ जब मुस्कुराते तो उसके दोनों भरे गालों में नन्हे-नन्हे गड़ड़े पड़ जाते| उसके सौंदर्य में एक आश्चर्यजनक बात थी| उसका स्वभाव सीधा व व्यवहार शिष्ट था| उसे प्यार करना मुश्किल था, वह तो पूजने के योग्य थी| उसके चेहरे पर हमेशा एक बडी लुभावनी आत्मिकता की दीप्ति रहती थी| उसकी आंखे जिनमें लाज, गंभीरता और पवित्रता झलकती थी| उसकी एक-एक चितवन, एक-एक क्रिया एक-एक बात उसके हृदय की पवित्रता और सच्चाई का असर दिल पर पैदा करती थी|

निर्मला देवी दिन भर मातम मनाती रही उसे कोइ अपना मददगार दिखाई न दिया| कहीं आशा की झलक न थी| अगर भगवान की निश्चित की हुइ मॄत्यु ने सीमा को उससे छीना होता तो शायद वह सब्र कर लेती मगर सीमा की भयानक मौत के बारे में सोचकर वह रोती रही तड़पती रही| पड़ोस की नर्म दिल स्त्रिया आकर उसकी बेबसी पर दो बूद आंसू गिराकर चली जाती|

निर्मला देवी इतनी विवल थी कि दिन में कइ बार मूर्छित भी हुई| न घर से निकली, न चुल्हा जलाया, न हाथ मुंह धोया| पड़ोस की स्त्रियां उसे बार-बार आकर कहती ‘बहन, उठो, मुंह हाथ धोओ, कुछ खाओ पियो| कब तक इस तरह पडी रहोगी मगर निर्मला देवी के कंठ में आंसुओं का ऐसा वेग उठता कि उसे रोकने में सारी देह कांप उठती| उसे अपना जीवन मरूस्थल सा लगने लगा|

सूरज के ढ़लने के साथ साथ निर्मला देवी के जीवन का सूर्य भी अस्त हो गया|

प्रदीप की गाड़ी पुलिस स्टेशन के अहाते में पहुंच गई| गाड़ी से उतरकर वह सीधे इंस्पेक्टर गुप्ता के केबिन में प्रवेश कर गया|

इंस्पेक्टर गुप्ता ने एक कोरे कागज पर प्रदीप का बयान लिखना शुरू किया| प्रदीप बोलता गया और इंस्पेक्टर गुप्ता साथ-साथ लिखते चले गये|

रिपोर्ट तैयार करने के बाद वे प्रदीप से बोले अब आप जा सकते हैं मिस्टर प्रदीप… आगे का काम अब हमारा है|’’

प्रदीप उठ गया व हाथ जोड़कर बाहर निकल गया|

टेबल पर रखा फोन बज उठा|

“हैलो कैथल पुलिस स्टेशन’’

“जय हिन्द सर… मैं इंस्पेक्टर गुप्ता बोल रहा हूँ’’|

“जय हिन्द मिस्टर गुप्ता… सीमा हत्याकांड़ का केस कहां तक पहुंचा’’|

“सर… मामले की छानबीन में पुलिस के साथ स्पेशल स्टाफ को भी लगाया गया है| जांच की जा रही है और हमने कुछ सबुत बरामद किए हैं| जिनको फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है| जो इस हत्याकांड़ की गुत्थी को सुलझाने में मददगार हो सकते हैं|

साथ ही हमने लड़की की मां से भी पुछताछ की जिससे एक अहम बात सामने आई है कि लड़की की मां को किशन ने सीमा को पार्टी में ले जाने के लिए बहुत मिन्नतें करके मनाया था|
 
“शाबाश मिस्टर गुप्ता… मुझे आपसे यही उम्मीद थी”|

“सर… हमने इस हत्याकांड़ को सुलझाने के लिए लगभग सभी पर्याप्त सबूत जुटा लिए हैं|

“कैरी आन मिस्टर गुप्ता…शाबाश”

फोन रखकर इंस्पेक्टर गुप्ता अपनी कुर्सी से उठकर खडे हुए फिर मेज पर रखा काला ड़ण्ड़ा उठाकर उस ओर बढ़ गये जहाँ सलाखंो में किशन कैद था| सर्च लाईटस की रोशनी से किशन की आँखे बुरी तरह चौधिया रही थी| उसे एक आरामकुर्सी पर रस्सियों से बाधा गया था तथा उसके चेहरे पर सर्च लाईटस की रोशनी ड़ाली गई थी| जिससे उसका सारा शरीर पसीने से भीगा हुआ था, चेहरा भी पसीने से नहा रहा था| चेहरे से दर्द झलक रहा था साथ ही साथ वह बार-बार कहता जा रहा था कि मैने खून नही किया और न हि मुझे इस बारे में कुछ जानकारी है… मैं निर्दोष हूँ|

इंस्पेक्टर गुप्ता चेहरे पर मुस्कुराहट लिए किशन के समीप पहुंचे| वह ड़ण्ड़े के एक कोने से अपना दाहिना गाल रगड़ रहे थे अचानक उन्होने अपना गाल रगड़ना बन्द कर दिया फिर आँख मारकर उन्होने वहा उपस्थित कांस्टेबलो को बाहर जाने का ईशारा किया|

एक-एक करके सारे कांस्टेबल सलाखो से बाहर निकल गये| फिर दरवाजा बन्द हो गया| दरवाजा बन्द होते ही इंस्पैक्टर गुप्ता ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखे किशन के चेहरे पर गाड़ दी चन्द क्षणों तक वह उसे घूरते रहे|

किशन अब भी गहरी गहरी सांसे ले रहा था| उसके हाथ आराम कुर्सी की पुश्तगाह के साथ रस्सी से बधे हुए थे|

इस्पैक्टर गुप्ता ने अपना छोटा सा काला ड़ण्ड़ा एक तरफ रखा| फिर झुककर किशन के हाथ खोल दिये| इस काम से निपटकर उन्होने जेब से एक रूमाल निकाला और किशन को देते हुए बोले इससे पसीना पोछा जाता है बच्चू... लो पोछ लो|

किशन ने हड़बड़ाकर इंस्पैक्टर गुप्ता को देखा फिर रूमाल लिया और पसीना पोछने लगा|

च्युइंगम चबाते और मुस्कुराते हुए इंस्पैक्टर गुप्ता ने किशन को अपने विशेष अंदाज में देखा फिर वह बोले मिस्टर किशन आपने समाचार पत्रों में पढ़ा होगा कि फलां को फांसी दे दी गइ फलां को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया| “लेकिन आपने अपनी आंखों से किसी कोे फांसी पर चढ़ते हुए नहीं देखा होगा” कहकर इंस्पैक्टर ओ• पी• गुप्ता किशन के सामने धीरे -धीरे टहलने लगे—फिर टहलते-टहलते वह रूककर बोले “अगर देखा भी होगा तो किसी सिनेमाघर में फिल्म के परदे पर… लेकिन वहां सिर्फ ड़्रामेबाजी होती है, असलियत कुछ अलग ही होती है| जब किसी को फांसी पर लटकाया जाता है ना… तो गर्दन लम्बी हो जाती है… आंखे बाहर उबल पड़ती है और हर खूनी को करीब-करीब यही सजा मिलती है| तुझे भी यही सजा मिलेगी|

“मै जानता हूँ इंस्पैक्टर साहब” किशन ने शान्त स्वर में कहा|

जब यह जानते हो तो झूठ क्यो बोलते हो कि सीमा का खून तुमने नहीं किया, इसका मतलब तुने उसका खून किया है

“नहीं “ किशन चीखकर बोला… मैं फिर कहता हूँ सर कि सीमा का खून मैने नहीं किया|

“तुमने किया है मिस्टर किशन… हमने प्रदीप, राधिका और उनके साथ-साथ उस पार्टी में उपस्थित सभी लोगों से पुछताछ कर ली है| सबका यही कहना है सीमा तुम्हारे साथ पार्टी से निकली थी| यह इस बात पक्का सबूत है कि सीमा की हत्या आप ही ने की है

“नहीं मैने उसकी हत्या नहीं की इंस्पैक्टर साहब… मैने उसकी हत्या नहीं की”|

“अगर तुने हत्या नहीं की तो फिर किसने की” इंस्पैक्टर गुप्ता ने च्यूइगम चबाते हुए कहा|

“मुझे नहीं पता… किशन एक गहरी सांस खींचते हुए बोला— क्योकि उस समय मैं शराब के नशे में चूर था… जब मुझे होश आया तो कत्ल हो चुका था…”

“और आप उस कत्ल की रिपोर्ट लिखवाने सीधे पुलिस स्टेशन आ गये ताकि आप पुलिस को यह साबित कर दें कि वाकइ में कत्ल किसी और ने किया है,” इंस्पैक्टर गुप्ता ने होठांे पर म्ुस्कान लाते हुए कहा… फिर कुछ सीरियस होकर बोले मिस्टर किशन यह मुजरिम की बहुत पुरानी चाल है| फांसी से बचने के लिए हर खूनी यही चाल चलता है|

“म म्म्म् मैं कुछ नहीं जानता इंस्पैक्टर साहब, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि मैं बेकसूर हूंं मैने उसकी हत्या नहीं की” किशन का स्वर हड़बड़ाया हुआ था|
 
मिस्टर किशन इंस्पैक्टर गुप्ता कनपटियों के नजदीक अपने सफेद बालों की तरफ इशारा करते हुए बोले यह बाल मैने धूप में बैठकर सफेद नहीं किये| इंस्पैक्टर की ट्रैनिंग में हमे सबसे पहले चेहरे के भाव पढ़ना सिखाया जाता है तेरा चेहरा यह कहता है कि तूने सीमा का खून किया है

“इंस्पैक्टर साहब आपकी आंखे धोखा खा रही है… मैने सीमा का खून नहीं किया”|

मुझे सच उगल्वाना आता है मिस्टर किशन चाहूं तो मैं इस समय भी सच उगलवा सकता हूँ कहकर गुस्से में भरे हुए इंस्पैक्टर गुप्ता ने अपना छोटा सा काला ड़ण्ड़ा उठाया फिर उसके अगले सिरे से हौले -हौले किशन की छाती ठोकते हुए बोले “लेकिन अभी नहीं वक्त आने पर तुम स्वंय ही बता दोगे” कहकर इंस्पेकटर गुप्ता मुड़े और सलाखों से बाहर निकल गये|

शहर के सबसे चर्चित हत्याकांड़ मामले में नया मोड़, तब आया, जब पुलिस को सीमा की कुछ अश्लील तस्वीरें मिली| इस खबर ने तो शहर में सनसनी फैला दी थी|

समाचार पत्रों में दिये गये किशन के परिचय ने उसे सबकी नजरों में चढ़ा दिया| सारे शहर में इस मुकदमें के चर्चे थे| मुकदमा शुरु होने के समय हजारों आदमियों की भीड़ हो जाती थी| लोगों के इस खिंचाव का मुख्य कारण यह था कि कच्ची उम्र के नवयुवक पर इतनी भयानक हत्या का आरोप|

सरकारी वकील ने अपनी दलीलांे से अदालत की कार्यवाही शुरु की|

इसके बाद बहुत से गवाह पेश हुए जो उस रात प्रदीप की पार्टी में मौजूद थे, जिनमें अधिकांश शहर की जानी मानी हस्तियां थी| उन्होंने बयान किया कि हमने सीमा को किशन के साथ जाते देखा था| किन्तु आज एक एहम गवाह अदालत में मौजूद नहीं थी| वह थी राधिका| वकील की गुजारिश पर अदालत ने एक सप्ताह में फैसला सुनाने का हुक्म दिया|

किशन को अब अपनी हार में कोइ सन्देह न था|

मगर उसे अब भी रोशनी की एक आखिरी किरण दिख रही थी वह थी राधिका की उसके पक्ष में गवाही| उनका मन कहता था कि राधिका उसके पक्ष में गवाही देगी|

किशन को अदालत आज फैसला सुनाएगी| उसे मालूम है, अच्छी तरह सेे मालूम है कि आज कयामत का दिन है| जज साहब के आदेश पर अदालत की कार्यवाही शुरू हुइ| राधिका को कठगरे में बुलाया गया|

राधिका को कठगरे में अपने सामने देखकर किशन को कुछ आश्वासन मिला… मुझे यकीन था तुम इस मुसीबत के समय में मेरी मदद करने के लिए जरूर आओगी…

“हां, मैं तुम्हारी मदद के लिए ही तो आयी हूंं ” “राधिका ने किशन की तरफ लाल–लाल आखें निकालकर कहा – अगर तुम्हे बीच चौराहे पर किसी छुरी से काट दिया जाये तब भी तुम्हारी सजा तुम्हारे गुनाहों के लिए पर्याप्त न होगी” राधिका ने घॄणा से कहा किशन, मैं तुमको एक शरीफ और गैरतवाला इन्सान समझती थी, तुमने बेवफाई की… इसका मलाल मुझे जरुर था मगर मैने सपनें में भी यह न सोचा था कि तुम इतने बेशर्म हो कि इतना नीच काम करके भी तुम मुझसे मदद मांगोगे|

किशन ने तेज होकर कहा- तुम मुझे बेशर्म… और मैं बेगैरत हूँ |

राधिका – बेशक बेगैरत ही नहींं सौदेबाज, मक्कार, पापी, सब कुछ...| ये अल्फाज बहुत घिनौने है लेकिन मेरे गुस्से के इजहार के लिए काफी नहींं|

राधिका का यह जुमला उसके जिगर में चुभ गया, जिन होठों से हमेशा महोब्बत और प्यार की बाते सुनी हो उन्ही से ऐसे जहरीले शबइतना बुरा ना करो कि जो आत्मा आपके भीतर है,

वो आत्मा आपके सामने आकर बोले, ये गलत है|

राधिका भगवान के लिए मुझे इस मुसीबत से बचाओ, मैं तुम्हारे पैरो पड़ता हूँ , तुम मुझे जहर दे दो, खंजर से गर्दन काट लो लेकिन यह बदनामी सहने की मुझमें हिम्मत नहींं| उन दिलजोइयों को याद करों, हमारी मोहब्बत को याद करो, उसी के सदके इस वक्त मुझे इस मुसीबत से बचाओ|

राधिका – हमारी मोहब्बत…सौन्दर्य, आचरण की पवित्रता या मर्दानगी का जौहर ये ही वे गुण हैं जिन पर मोहब्बत न्यौछावर होती है| अब तुम मुझे बताओ तुम में इनमें से कौनसा गुण हैर् प्यार करना तो दूर की बात है मैं तुम्हें अपने पैरों की धूल के बराबर भी नहीं समझती|

“तुम तो धोखा मत दो…” कहते-कहते वह कठगरे में घुटनो पर बैठ गया|

किशन बहुत असहाय नजर आने लगा था|

किशन – मैने पढ़ा था किप्रेम अमर होता है इसकी कोइ सीमा नहीं होती| मुझे आश्चर्य होता था जब कोइ कहता कि सच्चे प्यार का एक कतरा भी प्रमी को बेसुध कर सकता है| आपका तो पता नहीं मगर मेरा प्यार वह था, जो मिलन में भी वियोग के मजे लेता है और वियोग में भी हरा-भरा रहता है, फिर क्यों मेरा प्यार दुनियादारी के एक झोंके को भी बर्दाश्त नहींं कर सका|

लेकिन किशन की दयनीय दशा और उसके ये विचार भी राधिका की घॄणा को न जीत सके|

'तुम्हे अपनी सफाई में कुछ ओर कहना है“ जज ने उससे पूछा|

'क्यों समय नष्ट करते हैं जज साहब… आपको चाहिए कि मुझे जल्दी से जल्दी सजा सुनाएं” किशन ने बहुत आदर से कहा|

किशन के ये वाक्य सुनकर जज ने अर्थपूर्ण ढ़ंग से इंस्पैक्टर गुप्ता की ओर देखा|

“देखो अगर अपनी भलाई चाहते हो तो जितना पूछा जाए उतने का ही उत्तर दो” इंस्पैक्टर गुप्ता ने कहा|

इंस्पैक्टर गुप्ता की इस घुड़की का असर ये हुआ के किशन ने बिल्कुल ही मौन धारण कर लिया वैसे इस स्थिति में चुप्पी ही उसके पास एकमात्र हथियार था| इसलिए अब वह एक अभेद्य दीवार बन गया, जिस पर गोली, पथराव, धक्का-मुक्की कुछ भी प्रभाव न ड़ालता, इंस्पैक्टर गुप्ता, सरकारी वकील व जज साहब उस दीवार से अपना सिर तो फोड़ सकते थे, लहूलुहान हो सकते थे मगर उत्तर तब भी न मिलता, भला दीवार क्या उत्तर देती|
 
किशन को सबसे कठोर दंड़ मिला “फांसी”| यद्यपि फैसला लोगों के अनुमान के अनुसार ही था, तथापि जज के मुँह से उसे सुन कर लोगों में हलचल सी मच गई|

हिन्दी फिल्मो की तरह जब किशन को सजा सुनाने के पश्चात् सिपाही अपने साथ अदालत से बाहर ले जा रहे थे तब प्रदीप उसके पास आकर बोला यार किशन इस जन्म में तो अपना साथ शायद इतना ही था| खैर ऊपरवाले ने चाहा तो अगले जन्म में हम फिर दोस्त बनेंगे और हां अगर हो सके तो अगले जन्म में किसी लड़की के लिए किसी से पंगा मत लेना… लाल–लाल आखों से घूरते हुए प्रदीप पीछे हट गया और किशन दांत पीसकर रह गया|

सोनिया देवी जो हर तारीख पर कचहरी जाती| एक कोने में बैठी सारी कार्यवाही देखा करती थी| सजा सुनाने के बाद जब किशन उसके सामने आया और वह माता को प्रणाम करके सिपाहियों के साथ चला तो वह मूर्छित होकर गिर पड़ी|

“मां…” चीखते हुए किशन सोनिया देवी की तरफ दौड़ा|

सोनिया देवी को बेहोश होकर गिरता देख सिपाही ने किशन की हथकड़ी ढ़ीली छोड़ दी थी|

“मां… मां… आंखे खोल मां” सोनिया देवी को हिलाते हुए वह बोला|

“सोनिया देवी ने धीरे से आंखे खोली ओर बोली- भाग जा बेटा … भाग जा… अगर तुझे फांसी हो गइ तो फिर तेरी बेगुनाही कभी साबित नहीं हो सकेगी और तुम्हारे खानदान के नाम पर से ये धब्बा कभी नहीं मिट पायेगा… जा बेटा… भाग जा…”|

किशन को भी मां की बात समझ में आ गई और झटके से हथकड़ी को सिपाही के हाथों से छुड़ाकर गोली की रफ्तार से भीड़ की आड़ लेकर भाग गया|

किशन को एक अखबार विक्रेता नजर आया| उसके मन में अखबार देखने की तीव्र इच्छा जागॄत हुई| जबरदस्त बेचैनी के साथ उसने अखबार विक्रेता से एक अखबार खरीदा|

अखबार विक्रेता साइकिल दौडाता चला गया| इधर अखबार के मुख्य पॄष्ठ पर नजर पड़ते ही किशन का दिल धक्क से किसी गंेद के समान उछलकर कंठ में आ अटका| उसका सारा शरीर पसीने से भरभरा उठा| आंखों के सामने अंधेरा छा गया और यह सच है कि चलना तो दूर अपनी टांगों पर खडा हो पाना भी उसके लिए असंभव हो गया था, वह वहीं फुटपाथ पर बैठ गया| उसकी ऐसी अवस्था अखबार में अपने फोटो को देखकर हूई थी| उस फोटो को देखकर जिसके नीचे लिखा था इस हत्यारे से विशेष रूप से युवा लड़कियों को दूर रहना चाहिए क्योंकि यह एक खूंखार दरिंदा है जो उनके साथ दुष्कर्म करने के बाद उन्हें बेरहमी से कत्ल कर देता है|

उफ्फ अखबार ने ऐसा खतरनाक परिचय दिया है मुझे… कुछ ही देर में ये अखबार पूरे कैथल शहर और उसके आस-पास के इलाके में फैल जाएंगे| शाम तक लगभग सारे भारत में हर व्यक्ति इस फोटो को घूर रहा होगा| वह समझ चुका था अब वह किसी भी सार्वजनिक जगह पर सुरक्षित नहीं है| अत: उसे जल्दी से किसी ऐसे स्थान पर पहुच जाना चाहिए जहां उसके अलावा कभी कोइ न आ सके|

यहां आस-पास ऐसा कौन सा स्थान हो सकता है, बौखलाकर उसने अपने चारों तरफ देखा| वह सड़क पर भागता चला गया उसे किसी ऐसे स्थान की तलाश थी जहां दुनिया के हर व्यक्ति की नजर से बच सके हालांंकि ऐसा कोइ स्थान उसकी समझ में नहींं आ रहा था फिर भी पागलों की तरह वह भागता रहा|

भागते हुए अचानक ही उसकी दॄष्टि एक ऐसे मकान पर पडी जो मकान नहींं सिर्फ मलबे का ढ़ेर नजर आ रहा था| यह एक पुराना मकान था, जो अपनी उम्र पूरी करने के बाद गिर चुका था और किसी वजह से जिसके मालिक ने मलबा हटाकर सका पुन: निर्माण नहींं कराया था| मलबे के ढ़ेर से दबा होने के बावजूद भारी मुख्य द्वार अभी गिरा नहींं था| द्वार पर एक बहुत पुराना ताला भी झूल रहा था, किन्तु उसका कोइ महत्व नहींं था क्यांेकि साइड़ मंे से कोइ भी मलबे के ऊपर से गुजरकर अन्दर जा सकता था| इस तरफ मलबे का एक छोटा सा पहाड़, बन गया था| वह भागता हांफता मलबे पर चढ़, गया और दूसरी तरफ मलबे के ढ़ेर से नीचे उतर गया| खन्ड़हर को देखने से पता चल रहा था कि अपने समय में मकान काफी बड़, रहा होगा| चारों तरफ मलबा ही मलबा पडा था दाएं कोने में एक ऐसा कमरा था जिसकी आधी दीवारें खडी थीं छत का एक कोना भी जाने कैसे लटका रह गया था| उस गन्दे कोने में एक व्यक्ति के लेटने जितनी जगह पर उसकी नजर पडी | इस कोने में छिपे व्यक्ति को कोइ इस कमरे में आए बिना नहींं देख सकता था अत: किशन को छिपने के लिए यही स्थान उपयुक्त लगा| कपडो की परवाह किए बिना वह धम्म से उस कोने में जा गिरा| मलबे के ढ़ेर पर बैठा वह दो गन्दी और आधी दीवारों से पीठ टिकाए बुरी तरह हांफ रहा था स्वयं को नियन्त्रित करने में उसे काफी समय लगा|
 
थोड़ा संभलने के बाद उसने अखबार में छपा खुद से संबंधित समाचार पढा |

बडे-बडे शब्दों में हैड़िंग बनाया गया था “सनसनीखेज हत्याकांड़”|

तात्पर्य यह है कि पूरा समाचार पढ़ने के बाद उसकी घबराहट चरम सीमा पर पहुच गई| उस दीवार के सहारे बैठे-बैठे जैसे ही उसने आखे बंद की सीमा का चेहरा उसके सामने घुमने लगा| उसकी आखउसने भी दी होगी गालीयां तो मुझे, कभी जिसके लिए भगवान था मै,

आज एक धोखे ने बना दिया पत्थर मुझे, वरना तो कभी इन्सान था मै|

इस शोक पूर्ण घटना के कइ दिन बाद जबकि दु:खी दिल सम्भलने लगे थे, एक रोज खबर हुई कि रोहन आस्ट्रेलिया से आ गया है| औरतों को आंसू बहाने के लिए दिल पर जोर ड़ालने की जरूरत नहीं होती, मगर रोहन को सामने पाकर तो हर किसी के आंसू बहने लगते थे|

रोहन की आखों में आंसू भरे हुए थे, लेकिन चेहरे पर मर्दान दॄढ़ता और समर्पण का रंग स्पष्ट था| इस दु:ख की बाढ़ में भी शान्ति की नैया उसके दिल को ड़ूबने से बचाये हुए थी|

इस दॄश्य ने सबको चकित ही नहींं बल्कि स्तम्भित कर दिया| संभावनाओं की सीमाए कितनी ही व्यापक हों ऐसी हृदय-द्रावक स्थिति में होश-हवास और इत्मीनान को कायम रखना उन सीमाओं से परे है| लेकिन इस दॄष्टि से रोहन पुरूष नहींं, महापुरूष था| किसी ने उसे समझाते हुए कहा - बेटा, अब संतोष की परीक्षा का अवसर है|

तब उसने दॄढ़ता से उत्तर दिया—हाँ सब इश्वर की इच्छा है|

रोहन का यह तपस्वियों जैसा धैर्य और इश्वरेच्छा पर भरोसा अपनी आँखों से देखने पर भी कुछ लोगों के दिल में संदेह बाकी था| मुमकिन है, जब तक चोट ताजी है सब्र का बाध कायम रहे| लेकिन उसकी बुनियादें हिल गई हैं, उसमें दरारें पड़ गई हैं| वह अब ज्यादा देर तक दु:ख और शोक की लहरों का मुकाबला नहींं कर सकता|

किसी भी इन्सान के लिए संसार की कोइ अन्य दुर्घटना इतनी हृदय विदारक, इतनी निर्मम, इतनी कठोर नहीं हो सकती— संतोष, दॄढ़ता, धैर्य और इश्वर पर भरोसा… यह सब उस आँधी के समाने घास-फूस से ज्यादा नहींं| धार्मिक विश्वास तो क्या, अध्यात्म तक उसके सामने सिर झुका देता है| उसके झोंके आस्था और निष्ठा की जड़ें हिला देते हैं| लेकिन लोगों का यह अनुमान गलत निकला| रोहन ने धीरज को हाथ से न जाने दिया| वह बदस्तूर जिन्दगी के कामों में लग गया| कुछ लोग अकेलेपन में जहां उसके विचारों के सिवा अन्य कोइ न होता था उसकी एक-एक क्रिया को, एक-एक बात को गौर से देखते और परखते| लेकिन उस हालत में भी उसके चेहरे पर वही पुरूषोचित धैर्य था| शिकवे-शिकायत का एक शब्द भी उसकी जबान पर नहींं आता था|

शाम का वक्त था| सुनील, कुलदीप व रोहन तीनों टहलते हुए नदी की तरफ निकल गये कि एक घर के नजदीक से गुजरते हुए रेडियो पर प्रसारित समाचारों को सुनने के लिय तीनों ही रूक गये|

नम्स्कार… ये आकाशवाणी है… अब आप विपिन वर्मा से समाचार सुनिये…

पहले एक नजर आज के मुख्य समाचारों पर … आस्ट्रेलिया मे एक और भारतीय छात्र पर हमला… भारतीय पुरूष हाकी टीम ने तमाम नाकामियों और विवादों को पीछे छोड लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया और बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 527 अंको की तेजी के साथ हुआ बंद…

सुनिल - यार रोहन इन आस्ट्रेलिया वालों को भारतीयों से परेशानी क्या है, आखिर ऐसा करने से इनको क्या मिलता है|

रोहन - सुनिल भाई उनको परेशानी भारतीयों से नही है बल्कि वहां कुछ लोग आदतन अपराधी है| शायद आपको नही पता कि ब्रिटिश शासन काल में विशिष्ट रूप से आइरिश अपराधियों को राजनैतिक अपराधों या सामाजिक विद्रोहियों को आस्ट्रेलिया मे निर्वासित किया जाता था| इसलिये वहां कुछ लोग अपने पैदाइशी कमीनेपन से मजबुर हैं|

कुलदीप - यार फिर तो भारत सरकार को अपने यहां से कुछ कमीनों को आस्ट्रेलिया भेजना चाहिये, कसम से अगर ऐसा हो जाए तो एक-दो साल में ही इस विश्व मे सबसे शरीफ लोग आस्ट्रेलिया मे मिलेंगें|

बात करते-करते तीनों नदीं के पास पहुंच गये| नदी कहीं सुनहरी, कहीं नीली, कहीं काली, किसी थके हुए मुसाफिर की तरह धीरे-धीरे बह रही थी| कुछ दूर जाकर तीनो एक टीले पर बैठ गये लेकिन बातचीत करने को जी न चाहता था| नदी के मौन प्रवाह ने उनको भी अपने विचारों में ड़ुबो दिया| सुनील को ऐसा मालूम हुआ कि सीमा नदी की लहरों की गोद में बैठी मुस्करा रही है| वह चौंक पडा ओर अपने आँसूओं को छिपाने के लिए नदी में मुंह धोने लगा|

रोहन ने कहा भाई, दिल को मजबूत करो| इस तरह कुढ़ोगे तो मर जाओगे|

सुनील ने जवाब दिया इश्वर ने जितना संयम तुम्हें दिया है, उसमें से थोड़ा सा मुझे भी दे दो, मेरे दिल में इतनी ताकत कहां है भाई|

रोहन मुस्कुराकर उसे ताकने लगा|

मैंने किताबों में तो दॄढ़ता और संतोष की बहुत सी कहानिया पढ़ी हैं मगर सच मानों कि तुम जैसा दॄढ़, कठिनाइयों में सीधा खड़, रहने वाला आदमी आज तक मेरी नजर से नहींं गुजरा था| मैं यह न कहूगा कि तुम्हारे दिल में दर्द नहींं है| उसे मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ| फिर इस ज्ञानियों जैसे संतोष और शान्ति का रहस्य क्या है|

रोहन कुछ सोच-विचार में पड़ गया और जमीन की तरफ ताकते हुए बोला—यह कोइ रहस्य नहींं, मैं तो अपना कर्ज चुका रहा हूंं|

“कर्ज… “ कुलदीप ने हैरानी से पूछा|

“हां भाई कर्ज… पिता की मॄत्यु के पश्चात् जो मुसीबतें मेरे परिवार पर आयी थी उस समय अगर आपके पिता जी ने व मोहल्ले वालों ने हमारा साथ न दिया होता तो शायद मेरा परिवार बहुत पहले खत्जब कोइ किसी दूसरे के बच्चों को इतने लाड़, प्यार से पालता है तो उनके बीच में केवल प्रेम का सम्बन्ध रह जाता है| इस सम्बन्ध में अधिकार या सामाजिक नियम कोइ मायने नहींं रखते| प्रेम को कोइ किसी कानुनी दस्तावेज के द्वारा प्रमाणित नहींं कर सकता ओर न ही स्वयं प्रेम की यह अभिव्यक्ति होती है| प्रेम केवल और केवल प्रगाढ़ ही हो सकता है क्योंकि यही इसका रूप है| प्रेम का बदला केवल प्रेम है|
 
ये क्या हुआ, मैं तो सोचता ही रह गया,

चाल मेरा दोस्त, कयामत की चल गया|

ये एक धोखा खाये हुए दिल के शब्द थे| एक के बाद एक सब लोग किशन का साथ छोड़ चुके थे| उसके लिए अपने घर के दरवाजे भी बंद हो चुके थे| इसलिए उसने एक मन्दिर में शरण लेने के लिए मन्दिर के बाबा को अपनी आप बीती सुनाई|

बाबा ने सम्मान की दॄष्टि से देखकर कहा— बेटा तुम भगवान के घर में उनकी शरण में आए हो तो मैं कौन होता हूँ तुम्हे रोकने वाला, जब तक भगवान चाहेंगे तुम यहां रह सकते हो|

“बस बाबा मुझे कुछ ही दिन का वक्त चाहिए… भगवान की कॄपा रही तो मैं जल्द ही उस शैतान को बर्बाद कर दूंगा|

‘इश्वर का नाम न लो, इश्वर ऐसे मौके के लिए नहींं है| इश्वर की मदद उस वक्त मांगो, जब किसी का कोइ जोर न चले ओर दिल कमजोर हो… मगर जिसकी बांहों में बल, मन में विकल्प, बुद्धि में शक्ति और साहस हो, वो इश्वर का आशर्य ले यह शोभा नहीं देता - बेटा किशन तुम बस इतना ख्याल रखना तुम्हारे कदम सच्चाई के रास्ते से भटकने न पायें क्योंकिं सत्य का विश्वास साहस का मंत्र है|सच्चाई को कुछ समय के लिये कष्ट सहना पड सकता है मगर जीत हमेशा सच्चाइ की ही होगी… बेटा आशावादी नहीं बल्कि कर्मयोगी बनो…

“बाबा मैं आशावादी कैसे… म्म्म् मैं किस से आशा करूंगा बाबा, मेरा साथ तो मेरे अपनो ने… बाबा मैने सुना था कि इन्सान के बुरे वक्त में जमाना दुश्मन बन जाता है मगर मेरा साथ तो उसने भी छोड़ दिया जिसने साथ जीनेमरने की कसमें खाइ थी” राधिका को याद करते हुए उसकी आखें भर आई|

उसे धीरज बंधाते हुए बाबा ने कहा “बेटा इतना जान लोयूं रोज रोज महोब्बत का इम्तिहान नहीं होता,

मगर जब होता है, तो फिर आसान नहीं होता|

“बाबा… मैं तो इस इम्तिहान से गुजर जाऊंगा मगर मैं उसे माफ नहीं करूँगा| नफरत की जो आग उन लोगों ने मेरे मन में भरी है उसी से मैं उनकी दुनिया तबाह कर दूंगा| अब मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य है इस धोखे का बदला लेना| मेरा दिल फफोलों से भर चुका है और अब इसमे अच्छी भावनाओं के लिए जगह नहीं है| मैं इस अत्याचार का बदला लेकर अपना जन्म सफल समझूंगा| जिस तरह मै खून के आसूं रोया हूँ उसी भांति मैं भी उन्हे रूलाऊंगा|

“नहीं बेटा तुम गलत सोच रहे हो… बेटा औरत का दिल उसके दिमाग पर राज करता है| नारी का हृदय कोमल होता है लेकिन केवल अनुकूल दशा में जिस दशा में पुरूष दूसरों को दबाता है, स्त्री शील और विनय की देवी हो जाती है| लेकिन जब कोइ उसकें किसी प्रिय के सर्वनाश का कारण बन गया हो, उसके प्रति स्त्री की घॄणा ओर क्रोध पुरूष से कम नहींं होती बस अंतर इतना ही होता है कि पुरूष शस्त्रों से काम लेता है, स्त्री कौशल से|

इसलिए तुम्हे राधिका की नफरत के पीछे के रहस्य का पता लगाना होगा| वैसे भी उसे नफरत करने से तुम्हे क्या हासिल होगा… अगर तुम खुद को बेगुनाह साबित करना चाहते हो तो तुम्हे उसे अपने प्यार का एहसास कराना होगा”|

“मगर बाबा… उसे मेरी किसी बात पर भरोसा नहीं है,”

“बेटा जब इश्क का असर होता है तब हुस्न अपनी नजाकत भी भूल जाता है,” |

बाबा की बात सुनकर किशन ने फैसला कर लिया जब तक वह राधिका को अपने प्यार का एहसास नहीं करा देगा वह चैन से नहीं बैठेगा

अगर न भुला दी उसे नजाकत उसकी,

तो मेरे इश्क में दम नहीं|

अगर न भुला दी उसे हदें उसकी,

तो मेरे इश्क में दम नहीं|

अगर उसे याद रहा अपना कोइ मेरे सिवा,

तो मेरे इश्क में दम नहीं|

जिसके लिए मैने खो दिया अपनो को,

अगर अब उसे भी अपना न बना सका,

तो मेरे इश्क में दम नहीं…

तो मेरे इश्क में दम नहीं|

“बेटा… अगर तुम अब भी ऐसा सोचते हो तो फिर तुमने प्यार नहीं किया क्योंकि जिससे प्रेम हो गया, उससे द्वेष नहींं हो सकता, चाहे वह हमारे साथ कितना ही अन्याय क्यों न करे| जहां प्रेमिका प्रेमी के हाथों कत्ल हो, वहां समझ लीजिए कि प्रेम न था, केवल विषय लालसा थी|
 
“बेटा… अगर तुम अब भी ऐसा सोचते हो तो फिर तुमने प्यार नहीं किया क्योंकि जिससे प्रेम हो गया, उससे द्वेष नहींं हो सकता, चाहे वह हमारे साथ कितना ही अन्याय क्यों न करे| जहां प्रेमिका प्रेमी के हाथों कत्ल हो, वहां समझ लीजिए कि प्रेम न था, केवल विषय लालसा थी|

बाबा के इन विचारों ने किशन के क्रोध को पराजित कर दिया| वैसे किशन का दिल अब भी राधिका की तरफ खिचंता था कभी – कभी तो बेअख्तियार ही उसका जी चाहता कि उसके पैरों पड़े और कहे – मेरे दिलदार, ये बेरहमी क्यो | लेकिन बुरा हो इस स्वाभिमान का जो दीवार बनकर उसके रास्ते में खडा हो जाता था|

किशन ने बाबा की ओर पूर्ण-पूर्ण नेत्रों से देखकर कहा—बाबा मेरा मार्ग दर्शन कीजिये इस अवस्था में मैं कुछ भी नहीं सोच पा रहा हूँ|

“बेटा इस दुनिया के बैंक में जो जैसे कर्मो का बैलेंस जमा करता है उसे भगवान उसी आधार पर फल देते हैं तुम जमीं पर रहने वालों पर रहम करो भगवान तुम पर रहम करेगा| इस वक्त तुम्हारे लिए सबसे जरूरी है मन को शांत रखो ओर बाकी सब उपरवाले पर छोड़ दो”

“मगर कैसे बाबा… आप ही बताओ मैं क्या करू”

“ध्यान लगाओ बेटा… भगवान के नाम का सहारा बस ऐसी परिस्थितियों में ही लेना चाहिए”

आखें बंद करके किशन ध्यान लगाकर बैठ गया उसके मन को कुछ पल का शुकुन मिला मगर एक बार फिर उसका मन उसके अतीत की यादों को बुला लाया| उसका चेहरा कठोर होता चला गया| दांत पीसते हुए किशन ने आखें खोल दी|

“क्या हुआ बेटा|

“बाबा-एक नाम है जो मुझे करार दे जाता है,

एक नाम है जो बेकरार कर जाता है|

बाबा… जब तक वो शैतान जिन्दा है, मेरे पहलू में एक कांटा खटकता रहेगा, मेरी छाती पर सांप लौटता रहेगा| मुझे उस सांप का सिर कुचलना ही होगा, जब तक मैं अपनी आंखों से उसकी धज्जियां बिखरते न देखूंगा| मेरी आत्मा को संतोष न होगा| अब परिणाम कुछ भी हो मुझे परवाह नहींं, मगर मैं उस हरामी को नर्क में दाखिल करके ही दम लूंगा|

जब इन्सान कुछ अच्छा करना चाहे मगर बुरा होता रहे, तब चाहे वो कितना भी बड़ा नास्तिक हो, वो भाग्य और भगवान दोनोंं को मानता है|

सुबह-सुबह किशन ने साधू का भेष बनाया ओर राधिका के मौहल्ले में जाकर लगभग हर घर के बाहर भिक्षा के लिए आवाज लगाई “अलक निरंजन”| एक घर के दरवाजे के सामने जाकर वह रूक गया| उसके दिल की धड़कन बढ़ गई जिन्हे नियंत्रित करने में उसे कुछ समय लगा|

किशन ने आवाज लगायी “अलक निरंजन”|

दरवाजा खुला… राधिका को सामने पाकर वह सोचने लगा ये वक्त भी कितना बलवान है आज मैं खुद नहीं चाहता वो मुझे पहचानें—कभी जिनके सामने से मैं बस इसलिए गुजरता था कि एक बार उनकी नजर तो मुझपे पड़े… वक्त की नजाकत को समझते हुए वह बोला…

“हे देवी बाबा को बहुत भूख लगी है कुछ खाने को ला दो”

“क्षमा करें महाराज अभी तो घर में खाने के लिए कुछ नहीं है,” हाथ जोड़कर राधिका ने कहा

“कोइ बात नहीं देवी … जैसी प्रभु की इच्छा… “

“जरा रूको बाबा … मैं किसी महात्मा को अपने दर से खाली हाथ भेजने की गुस्ताखी नहीं कर सकती- आप थोड़ा इन्तजार कीजिये मैं आपके खाने के लिए कुछ बना देती हूंं|

“ठीक है देवी मैं यहीं बैठकर इन्तजार करता हूँ|

राधिका अन्दर चली गई ओर कुछ देर बाद अचार के साथ दो रोटीयां लेकर आयी|

तनिक रुककर उसने राधिका की खामोशी की नब्ज टटोलने के लिए कहा

“देवी मुझे इस घर में किसी अनहोनी का आभास हो रहा है,” |

“बाबा अनहोनी के लिए इस घर में बचा ही क्या है… जीजा जी के मरने के बाद हम पर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा था| जीजा जी के मौत के पश्चात् शीतल दीदी ने भी आत्महत्या कर ली और इस दोहरे सदमे ने मेरे माता पिता को भी मुझसे छीन लिया… अब तो इन हालातों से दिल पर जो कुछ बीतती है वह दिल में ही सहती हूँ ओर जब न सहा जायेगा तो संसार से विदा हो जाऊंगीं|” वह सिसकने लगी थी|

“जीजा जी की मौत… बहन… और माता पिता की मौत… राधिका के मुख से ये शब्द सुनकर किशन को गहरा धक्का लगा मगर उससे भी बड़ा झटका उसे तब लगा जब सामने की दीवार पर लगी तस्वीर पर उसकी नजर पड़ी वह फटी-फटी आखों से उस तस्वीर को घूरे जा रहा था| उस तस्वीर में शीतल दुल्हन के लिबास में थी तथा उसके साथ दुल्हे की पोशाक में संजय था| जिस पर लिखा था “संजय वैड़स शीतल””| किशन की उलझन सातवें आसमान पर थी क्योकिं तस्वीर में जो लड़की शीतल थी वह हू ब हू राधिका जैसी दिखती थी|

“मगर यह सब हुआ कैसे“ एकाएक वह पूछ बैठा|

“क्या बताऊं बाबा मेरे जीवन में इतनी जल्दी इतने बड़े बदलाव की तो मुझे उम्मीद भी न थी… ये तस्वीर मेरी हमशक्ल बहन शीतल और मेरे जीजा संजय की है| शीतल किसी और से प्यार करती थी मगर फिर भी मेरे घरवालों ने जबरदस्ती उसकी शादी संजय से कर दी| धीरे-धीरे शीतल ने हालात से समझौता कर लिया और इस शादी को अपनी किस्मत और अपने माता पिता का आशीर्वाद समझकर अपने अरमानों का गला घोंट दिया था|

लेकिन शादी के महीने भर के भीतर उसकी जिंदगी क्या से क्या हो गई इतने अरसे में तो पति पत्नी एक दूजे को ढ़ंग से पहचान भी नहींं पाते और मेरी बहन विधवा … आगे के शब्द राधिका के गले में फंसकर रह गये| गला रूंध गया| वह फफक पड़ी थी|

किशन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई घर की हालत खस्ता नजर आ रही थी| हर चीज से आर्थिक संकट जैसे बाहर झांक रहा था| राधिका के साथ कमरे में आया तो एकाएक उसकी नजर सुरेन्द्र पाल सिंह पर पड़ी… वह उन्हें देखता ही रह गया… बूढ़ा चेहरा … भीगी आंखें … कांपता स्वर … कहां गया इनका तेज–तर्रार, दबंग व्यक्तित्व| सुरेन्द्र पाल सिंह की आंखों में पहले जैसी चमक दिखाई नहींं दे रही थी| थोड़ी–थोड़ी देर बाद बुझी–बुझी आंखों से साधु की ओर देख लेता था, मगर उनके चेहरे के भावों से ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह ठीक से देख नहीं पा रहा हो|
 
सुरेन्द्र पाल सिंह होठों से कुछ बुदबुदाए जा रहे थे जो किशन समझ नहींं पा रहा था| थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद उसकी आंखें भर आती थी| वे बहुत असहाय से लग रहे थे| उसके चेहरे पर एक उदासी सी छायी रहती जिससे हृदय छलनी होता था और रोना आता था|

किशन खाना छोड़कर सुरेन्द्र पाल सिंह को हैरानी से देख रहा था|

"बाबा, इनकी आंखों की रोशनी चली गई है… और बेटे की मौत के सदमे से इनकी दिमागी हालत भी बिगड़ गई है इसलिए ऐसे ही कुछ भी बड़बड़ाते रहते हैं|" राधिका ने बताया|

“मगर यह सब हुआ कैसे“ उसने फिर पूछा|

“बाबा इस समाज… इस खौखले रिति रिवाजों वाली दुनिया में प्यार करने वालों के दुश्मनों की कमी नहीं है… मेरे जीजा जी किसी दूसरी लड़की से प्यार करते थे, मगर उनके साथ भी वही शीतल वाली कहानी हुई… जबरदस्ती उनकी शादी मेरी बहन से कर दी गई| परन्तु जोर जबरदस्ती के बनाये गये बन्धन किसी को सदा के लिए नहीं बांध सकते| एक दिन संजय ने जहर खा लिया| घर में जो कुछ जमा पुंजी थी वह सब उसे बचाने की कोशिश मे खर्च हो गई| बस बाबा संजय के साथ-साथ इस घर की तरक्की की हर उम्मीद का भी दम निकल गया… मगर बाबा जो इस सब के लिए जिम्मेदार है मैने उससे बदला ले लिया है अब जबकि वह ऐसे हालात मे है जहां सिर्फ मैं उसकी मदद कर स्कती हू लेकिन मै ऐसा करूंगी नहीं… अब वह भी नरक की आग में जलेगा| बाबा मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं अपने इरादांे पर कायम रह सकूं|

राधिका की बातें सुनकर किशन को किसी पुस्तक से पढ़े हुए शब्द याद आ गये जो कइन्सान सूर्य और चन्द्रमा के भीतर का रहस्यों का भी पता लगा सकता है किन्तु जब एक औरत किसी को उलझाने पे आये तो उसको समझ पाना किसी के बस की बात नहीं”

“देवी शत्रु की हानि इन्सान को अपने लाभ से भी अधिक प्रिय होती है, मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है परन्तु बहुत कम लोग ऐसे खुशनसीब होते हैं जिनको सच्चा प्यार मिलता है| जहांं तक मैं समझ रहा हू तुमने अपने क्रोध के वशीभूत होकर अपनी व अपने प्रियतम दोनों की जिन्दगी बर्बाद कर ली है| क्योंकिं किसी ऐसे शख्श से नफरत करने के लिए जो उसके सर्वनाश का कारण हो किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं होती| ऐसा केवल वही कह सकता है, जो अपने उस दुश्मन के लिए दिल से मजबुर हो ओर ऐसी परिस्थिती मे दिल को मजबुर या कमजोर बनाने का काम केवल मोहब्बत कर सकती है| महोब्बत बैर से कहीं ज्यादा पाक होती है ये उस दामन में मुंह छिपाने से भी परहेज नहींं करती जो उसके अजीजों के खून से सना हुआ है|”

“बाबा…

भगवान के लिए मुझे ये इल्जाम न दो,

मुझे उससे प्यार है, ये मुझसे सहा न जाएगा|

यह कहते-कहते राधिका की आँखों में आंसुओं की बाढ़ आ गई| मैने क्या गलत किया बाबा… यदि कोइ हमारी चीज छीन ले तो हमारा धर्म है कि उससे यथाशक्ति लड़ें| हार कर बैठना तो कायरों का काम ह मैने बस वही किया जो मुझे करना चाहिए था| मेरे शत्रु को उसके कुकृत्य का दंड़ देकर इश्वर ने भी मेरा सही होना व अपना न्याय सिद्ध किया है|

किशन उठ खड़ा हुआ| उसकी आखों से नफरत का पर्दा हट गया| उसे राधिका की बेवफाई का रहस्य समझ आ गया और बरबस ही उसकी आंखों से भी आंसू की चंद बूंदें टपक पडी| शर्म और अपमान की एक ठंड़ी लहर शिराओं में रेंग गई|

“जब मैं मान-मर्यादा से ही हाथ धो बैठा तो अब इस समाज में नीच बन कैसे जीऊंगा” इसी विचार के साथ वह उठकर चल दिया| उसने आत्म−बलिदान से इस कष्ट का निवारण करने का दॄढ़ संकल्प कर लिया| वह उस दशा में पहुच गया था जब सारी आशाएं मॄत्यु पर ही अवलम्बित हो जाती है| उसे मॄत्यु का अब जरा भी भय न था|

एक घर के नजदीक से गुजरते हुए इस गीत के बोल उसके कानों में पउजड़ा मेरा नशीब, हाथ मेरे खाली,तू सलामत रहे, अल्लाह है वाल्ली,

उजड़ा मेरा नशीब, हाथ मेरे खाली,तू सलामत रहे, अल्लाह है वाल्ली,

दिल पे क्या गुजरे,

वो शख्श जो हारा है|

भीगी पलकों पर, नाम तूम्हारा है,

बीच भंवर कश्ती बड़ी दूर किनारा है …

कैसा तड़पा देने वाला गीत था और कैसी दर्द भरी रसीली आवाज थी बब्बु मान की|

संगीत में कल्पनाओं को जगाने की बडी शक्ति होती है| वह मनुष्य को भौतिक संसार से उठाकर कल्पना लोक में पहुंचा देता है| किशन इस गीत से इतना प्रभावित हुआ कि जरा देर के लिए उसे ख्याल न रहा कि वह कहां है| दिल और दिमाग में बस वही राग गूँज रहा था| दिल की हालत में एक ज़बरदस्त इन्कलाब हो रहा था, उसके मन ने उसे धिक्कारा और इस जिल्लत ने उसकी बदला लेने की इच्छा को भी खत्म कर दिया| अब उसे गुस्सा न था, गम न था, उसे बस मौत की आरजू थी, सिर्फ, एक चेतना बाकी थी और वह अपमान की चेतना थी| उसने एक ठण्ड़ी सांस ली| दर्द उमड़, आया| आसुओं से गला फंस गया, जबान से सिर्फ इतना निकलये मै कैसे सहूंगा, कि मैं बेवफा हूँ ,

जब अपनी जगह सच्चा मेरा प्यार है|

अगर वो ही नहीं मेरे नसीब मे,

फिर चाहे भगवान भी करे वादा,

अब मुझको हर खुशी देने का,

तब भी मुझे जीने से इन्कार है,

ये मै कैसे सहूंगा, कि मैं बेवफा हूँ ,

जब अपनी जगह सच्चा मेरा प्यार है|

किशन की आखों से आंसू गिरने लगे|

दीवार फांदकर किशन चुपके से अपने घर में घुस गया| वह तेजी से एक कमरे की ओर बढ़ गया जहां एक कोने में एक बड़ी सी कैन रखी थी| जिसका प्रयोग खेतों में खरपतवार को नष्ट करने के लिए किया जाता है| उस कैन पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था ''जहर''|
 
किशन ने हाथ बढ़ाकर कांपती हुई अंगुलियों से उसे उठाया और दीवार के सहारे बैठ गया, फिर कुछ सोचते हुए उसने कैन का ढ़क्कन खोला और कैन को मुंह सें लगाकर आधी खाली कर दी| वह अभी उस कैन को फेंक भी नहीं पाया था कि उसकी आखों के सामने तारे झिलमिला गये| कुछ देर वह कटी मछली की भांति तड़पता रहा, फिर बेहोश होकर फर्श पर लेट गया|

कुछ क्षण बाद कुलदीप ने उस कमरे में प्रवेश किया तो किशन के हाथ में जहर की कैन देखकर वह चौंक गया| उसने तेजी के साथ आगे बढ़कर उसके हाथ से वह कैन छीन ली-फिर घबराते हुए स्वर में बोला “किशन..यह क्या किया तूने ... जहर खाने से पहले क्या तुझे अपने माता पिता का जरा भी ख्याल नहीं आया| उनके दिये हुए जीवन को तुम यूं ही व्यर्थ में नष्ट कर दोगे ... जिन्होने हर पल तुम्हारे लिए खुशियां मांगी तुम उनको जीवन भर का रोना दे जाओगे”|

मेरा ऐसा कोइ इरादा नहीं था भाई, मैंने तो बस अपनी जीवन लीला खत्म करने के लिए जहर खाया है… भाई मैं क्या करता मेरे पास कोइ रास्ता भी तो नहीं बचा था…”|

“कोइ रास्ता नहीं बचा था तो तुमने ये कौन सा रास्ता चुन लिया… आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं होता, अगर ऐसा होता तो संजय की आत्महत्या के पश्चात् सब ठीक क्यों नहींंप्रकृति, समय और धैर्य ये तीन हर समस्या का हल और हर दर्द की दवा हैं|

मेरे भाई जीते जी सब कुछ संभव है जिस तरह कुछ ही समय में तुम्हारे लिए सब रास्ते बंद हो गये थे, उसी तरह जिन्दा रहोगे तो रास्ते खुल भी जायेंगे, आत्महत्या किसी भी हालात में जिन्दगी के किसी भी सवाल का सही जवाब नहीं हो सकता| सुख व दु:ख जिंदगी की किताब के दो पन्ने हैं| जो इन दोनोंं पन्नो को पढ़ता है वही जिंदगी का सही मतलब समझता है”|

“नहीं भाई मुझे मर ही जाना चाहिए था… मैने सबको दु:ख दिया… राधिका… इतना बोलने के साथ ही किशन की आखें बंद होती चली गई|

“ओह… राधिका…मेरे भाई तुम राधिका के लिए दुखी हो लेकिन उसके लिए तो तुम किसी भी पल मर सकते हो, और शायद उसे तुम्हारे होने या न होने से कोइ फर्क न पड़े मगर क्या तुम्हे उनके लिए नहीं जीना चाहिए जो तुमसे बहुत प्यार करते हैं, और जिनको तुम्हारे होने या न होने से बहुत फर्क पड़ता है|

किशन कुछ बोल रहा था मगर अब उसके शब्द कुलदीप को समझ नहीं आ रहे थे| वह समझ गया जहर का असर होना शुरू हो गया है|

“मै तुझे मरने नहीं दुंगा मेरे भाई ” कुलदीप पागलों की तरह चीखते हुआ बोला | वह किशन को उठाकर तेजी से कमरे से बाहर निकला| कुछ ही देर में यह खबर मोहल्ले में आग की तरह फैल गई| किशन की हालत को देखकर तो अब उसका बचना मुश्किल लग रहा था…|

कुछ ही देर में एम्बुलैंस आ गई| कुलदीप ने किशन को उठाकर एम्बुलैंस में लिटा दिया| सुनील व रोहन भी कुलदीप के साथ एम्बुलैंस में किशन के समीप बैठ गये| उनके बैठते ही एम्बुलैंस अस्पताल की और चल दी|

करीब पन्द्रह मिनट बाद एम्बुलैंस हास्पिटल पहूंंची| गाड़ी का दरवाजा खोलकर सुनील रोहन व कुलदीप नीचे उतर गये| किशन को एम्बुलैंस से उतारकर स्ट्रैचर पर लिटाकर एमरजैंसी वार्ड़ में ले जाकर ड़ाक्टरों ने किशन का उपचार करना शुरू कर दिया|

माता-पिता के प्रेम में कठोरता होती है, लेकिन मॄदुलता से मिली हुई| श्रीहरिनारायण रात भर बिस्तर पर पड़े तड़पते रहे, सोचते रहे, खुद को समझाने की कोशिश करते रहे मगर महसूस हुआ कि लाख प्रयत्न करके भी वह अपने पुत्र से कटे नहींं हैं| आज उनके प्रेम में करूण थी, पर वह कठोरता न थी, यह आत्मीयता का गुप्त संदेश है| स्वस्थ अग की परवाह कौन करता है| लेकिन जब उसी अंग पर चोट लग जाती है तो उसे ठेस और घक्के से बचाने का यत्न किया जाता है| श्रीहरिनारायण को भी किशन के बारे में सोचकर अपने शरीर का एक अग कटने जैसा दु:ख महसूस हो रहा था, उनके भीतर एक लावा सा फट पडा था| वह ज़ोर-ज़ोर से रोना व चीखना चाहते थे| उनके बिस्तर पर जैसे अनगिनत काटें उग आए हों और श्रीहरिनारायण भीष्म पितामह की तरह उस पर पड़े अपने पुत्र की मॄत्र्यु शैय्या देख रहे थे|
 
कितना सुंदर, कितना शरीफ बालक था| सारा मोहल्ला उस पर जान देता था| अपने-बेगाने सभी उसे प्यार करते थे यहां तक कि उसके अध्यापक तक उस पर जान छिड़कते थे| कभी उसकी कोइ शिकायत सुनने में नहींं आयी| ऐसे बालक की माता होने पर सब सोनिया देवी को बधाई देते थे| आज उसका कलेजा टूकड़े-टूकड़े हो कर बिखर रहा था और वह तड़प रही थी| यदि अपने प्राण देकर भी वह किशन को बचा सकती तो इस समय अपना धन्य भागकितने आश्चर्य और शर्म की बात है कि इतने बड़े संसार में आज तक माँ–बाप की सेवा करने वालों में श्रवण कुमार को छोड़कर किसी का नाम जहन में नहीं आता| इसके विपरीत आत्महत्या करके माता पिता को दुःख देने वाले नौजवानों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है|जब देखता हूँ बुरा हाल किसी आशिक का,

तब हाल फिर मेरा भी कुछ ठीक नहीं रहता|

सांयकाल रोहन कुलदीप से मिलने आया|

“हमें कुछ करना चाहिए… अब किशन अपनी बेगुनाही का इससे बड़ा क्या सबूत दे सकता है… कहते हैं मरते समय इन्सान झूठ नहीं बोलता और किशन की जबान पर बार-बार यही शब्द दोहराये थे कि वह निर्दोष है" रोहन ने कहा

"मेरा मन भी यही कहता है कि वह निर्दोश है, मगर मै ये दावे के साथ नहीं कह सकता क्योंकि मुझे अपने भाई पर भरोसा है मगर शराब पर नहीं और अगर एक पल के लिए सब बातें भुलाकर ये मान भी लें कि किशन निर्दोश है, तब भी हम ये साबित कैसे करें, सारे सबूत और गवाह उसके खिलाफ हैं,” बड़े ही बेबस लहजे में कुलदीप ने कहा|

“ये प्रदीप और राधिका कौन है जिनका नाम किशन बार-बार ले रहा था”

“भाई पूरा मामला तो मुझे भी नहीं पता मगर सागर बता रहा था कि राधिका से किशन की दोस्ती थी और प्रदीप के साथ एक बार उसका झगडा हुआ था मगर बाद मे उसके साथ भी किशन की दोस्ती हो गई थी”

“तब तो हो न हो इन दोनों मे से किसी एक का हाथ इसमे जरूर मिलेगा… मुझे शक है ये सब साजिश उस लडकी राधिका की है वरना कोइ ऐसे हालात मे अपने प्रेमी का साथ नहीं छोड सकती… मुझे उसके घर का पता चाहिए… अब मै सच्चाई का पता लगाये बिना चैन से नहीं बैठुंगा”|

“भाई मुझे तो उसके घर का पता मालुम नहीं है मगर शायद सागर हमंे बता सकता है|”

सागर से राधिका के घर का पता लेकर दोनोंं ने बहुत देर सलाह-मशविरा किया| राधिका व किशन के बारे मंे सागर से पूरा मामला जान लेने के पश्चात रोहन ने कुलदीप को अपना फैसला सुना दिया कि अगर किशन को कुछ हो गया तो उसकी चिता के साथ असली गुनहगारों की चिता भी जलेगी और अगर वह ऐसा करने मे नाकाम रहा तो फिर खुद उसकी चिता किशन की चिता के साथ जलेगी|

आधी रात का वक्त था| अंधेरी रात थी और काफी बेचैन इन्तजारी के बाद रोहन अपने जज्बात के साथ नंगी तलवार पहलू में छिपाये, अपने जिगर के भड़कते हुए शोलों को राधिका के खून से बुझाने के लिए आया हुआ है| आसमान में सितारे जगमगा रहे हैं और रोहन बदला लेने के नशे में राधिका के सोने के कमरे में जा चुका है|

कमरे में एक नाइट लैंप जल रहा था| जिसकी भेद भरी रोशनी में राधिका सो रही थी|

रोहन तलवार लेकर दबे पांव उसके पास पहुँचा| एक बार राधिका को आँख भर देखा| लेकिन राधिका को देखने के बाद उसके हाथ न उठ सके| जिसके साथ अपना घर बसाने के सपने देखें हो उसकी गर्दन पर छुरी चलाते हुए उसका हृदय द्रवित हो गया| उसकी आंखें भीग गयीं, दिल में हसरत भरी यादों का एक तूफान उठ गयाएक दिन असर देखना मेरे इश्क में होगा,

एक दिन हशर देखना मेरे इश्क में होगा|

कभी मिले तो बस इतना कहना उपरवाले से,

परेशां न हो, इन्तहां ये मेरे सबर की भी नहीं,

अगर अब भी बाकी जुल्म कुछ उसका होगा,

एक दिन असर देखना मेरे इश्क में होगा,

एक दिन हशर देखना मेरे इश्क में होगा|

हाँ, वही मोहिनी सूरत थी और वही इच्छाओं को जगाने वाली ताजगी| वही चेहरा जिसे एक बार देखकर भूलना असंभव था| वही गोरी बाहें जो कभी उसके गले का हार बनती थीं, वही फूल जैसे गाल जो उसकी प्रेम भरी आँखों के सामने लाल हो जाते थे| इन्हीं गोरी-गोरी कलाइयों में उसने कंगन पहनाने का वादा किया था|

हाँ, वही गुलाब के से होंठ, जो कभी उसकी मोहब्बत में फूल की तरह खिल जाते थे| जिनसे मोहब्बत की सुहानी महक उड़ती थी, और यह वही सीना है जिसमें कभी उसकी मोहब्बत और वफा का जलवा था, जो कभी उसकी मोहब्बत का घर था|

रोहन अपने अतीत में खोया हुआ था मगर उसके स्वाभिमान ने उसे ललकारा, जो आँखें उसके लिए अमॄत के छलकते हुए प्याले थीं आज वही आंखें उसके दिल में आग और तूफान पैदा कर रही थी|रूप उसी वक्त तक राहत और खुशी देता है जब तक उसके भीतर औरत की वफा की रूह हरकत कर रही हो वर्ना यह एक तकलीफ देने चाली चीज़ है, ज़हर है जो बस इसी क़ाबिल होती है कि वह हमारी निगाहों से दूर रहे|
 
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