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Romance एक एहसास complete

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स्वाभिमान और तर्क में सवाल-जवाब हो रहा था कि अचानक राधिका ने करवट बदली| रोहन ने फौरन तलवार उठायी मगर राधिका की आँखें खुल गई| वह घबराकर उठ बैठी परन्तु भय की चरम सीमा तो साहस ही होती है| हिम्मत करके वह बोली क् क्…क… कौन| ”

“मैं हूँ रोहन” रोहन ने अपनी झेंप को गुस्से के पर्दे में छिपाकर कहा|

“कौन रोहन… चले जाओ यहां से वरना मैं शोर मचा दूंगी”

“कौन रोहन… हां… तुम नाम बदलकर किशन को फंसा सकती हो शीतल मगर शायद तुम भूल गई कि आखिर मजीत हमेशा सच्चाई की होती है… इसलिए तुम्हारा पर्दा-फाश करने के लिए ऊपरवाले ने मुझे भेज दिया है,”

“रोहन … मैं शीतल नहीं बल्कि उसकी छोटी बहन राधिका हूँ और तुम किस झूठ सच की बात करते हो… किशन के साथ जो कुछ हुआ है या होगा उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है,”

“झूठ बोल रही हो तुम… म्म्म्मै ये साबित नहीं कर सकता लेकिन अगर किशन को कुछ हो गया तो कसम पैदा करने वाले की मैं तुम्हे जिंदा नहीं छोड़ूंगा” दांत पीसते हुए रोहन ने कहा|

“कुछ हो गया मतलब… क्या हुआ किशन को"|

"किशन हास्पीटलाइज्ड़ है उसने जहर खा लिया है| वह पुलिस की कैद से भाग गया था मगर अपनी जान बचाने के लिए नहीं बल्कि अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए… क्योंकि अगर वह जान बचाने के लिए भागा होता तो उसे लौटकर घर आने की और जहर खाने की जरूरत नहीं थी… वैसे भी मरते हुए इन्सान झूठ नहीं बोलता… और उसने बार-बार कहा वह बेगुनाह है"|

"क्या… हे भगवान" वह सिर पकड़ कर बैठ गई| इसका मतलब उसके साथ बहुत गलत हुआ

… रोहन मैं जानती हूँ कि तुम मेरे खून के प्यासे हो, लेकिन पहले मेरी बात सुन लो|

“मै राधिका हूँ शीतल की छोटी बहन… शीतल तो अब इस दुनिया में भी नहीं है,” दीवार पर लगी शीतल की तस्वीर की ओर ईशारा करते हुए राधिका ने कहा|

राधिका के मुख से ये शब्द सुनकर रोहन के मस्तिष्क को गहरा झटका लगा| उसके सारे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई और उसकी कांपती नजर तस्वीर पर जा पड़ी| शीतल की तस्वीर पर फुलों की माला देखकर रोहन का दिल कांप उठा, जबान तालू से जा चिपकी|

राधिका ने रोहन को शीतल के बारे में वह सब कुछ बताया जो रोहन के आस्ट्रेलिया जाने के पश्चात् हुआ था|

रोहन की आँखें भर आई| उसका मन अब भी सच्चाई मानने के लिए पूर्णतया तैयार न था|

तस्वीर को उतारकर अपने कलेजे से लगाता हुआ वह कह अरे जालिम तू बेवफाइ न करती अगर,

तो जुदाइ एक जन्म की, कोइ बड़ा गम न था|

“तुम इतनी खुदगर्ज कैसे हो गई … मुझे कोइ गम न होता के तुम किसी दूजे के नाम का सिन्दूर लगाये मुझे दिखती, किसी दूजे के नाम का मगंलसुत्र ड़ालती… अगर मैं तुम्हें खुश पाता तो तुम नहीं जानती तुम्हे खुश देखकर मैं कितना खुश होता| मगर तुमने आत्महत्या करके मेरे प्यार को हरा दिया… तुमने मुझे यूं अकेला छोडकर जो बेवफाइ की है वह मेरे प्यार का, मेरे भरोसे का कत्ल है| तुम्हारे साथ जो हुआ वह बेशक दर्द भरा था मगर क्या तुम्हे अपने रोहन पर इतना भरोसा नहीं होना चाहिए था कि वह तुम्हे किसी भी हाल मे अपना लेगा” रोहन विचारों के बीहड़ ज़गंल में भटक रहा था, कि राधिका की आवाज सुनकर उसकी तंद्रा भंग हुई|

“मै जानती हूँ आप मेरी बहन शीतल से प्यार करते थे, मगर मुझे मालूम न था कि सीमा आपकी बहन है| किशन का वह लड़का होना भी जिसके साथ संजय का झगड़ा हुआ था मेरे लिए केवल एक संयोग था| मुझे तो यह सब बातें तब मालुम पड़ी जब सीमा की हत्या के बाद इन्सपैक्टर गुप्ता मुझसे मिले थे| लेकिन जब मुझे यह पता चला कि किशन ही वह शख्श है जिसने संजय को अपने प्यार को पाने में कामयाब नहीं होने दिया तो मेरे मन व बुद्धी के हर तर्क ने उसे मेरे परिवार की बर्बादी के लिए जिम्मेदार पाया| मेरा गुस्सा और घॄणा उसकी सच्चाई को पहचान न सके और मैंने जरूरत के समय किशन का साथ नहीं दिया| मगर सीमा के साथ जो भी हुआ वह चाहे प्रदीप ने किया हो या किशन ने मुझे उसके बारे में कोइ खबर नहीं, अगर अब भी आपको लगता है कि मैं खतावार हूँ तो आप जो सजा देना चाहें मैं भुगतने को तैयार हूँ|
 
राधिका की बातें सुनकर रोहन के हृदय में एक विचित्र करूणा उत्पन्न हुई| उसका वह क्रोध न जाने कहां गायब हलतीफेबाजी की तरह हिंसा भी हमारा ध्यान आकर्षित करती है| ओर अगर हिंसा बदले की भावना से प्रेरित हो तो हमारा मन कमजोर और पीड़ित के साथ हो जाता हैं, तब उसकी हिंसा भी हमें जायज लगने लगती है|

“इसका क्या अपराध है|यह प्रश्न आकस्मिक रूप से रोहन के हृदय में पैदा हुआ| इस समय मैं भी तो अपने दोस्त के लिए उतना ही विकल, उतना ही अधीर, उतना ही आतूर हूँ जितनी यह रही होगी| जिस तरह मैं अपने दिल से मजबूर हूँ, जो राधिका ने किया अगर वह गलत थी तो अब मैं भी तो वही कर रहा हूँ| ऐसे मेे मुझे इससे बदला लेने का क्या अधिकार है| रोहन अपने ही मन से तर्क वितर्क में उलझा था|

राधिका भी सिर झुकाये खड़ी थीलज्जा, याचना और झुका हुआ सिर, यह गुस्से और प्रतिशोध के जानी दुश्मन हैं|

आप यक़ीन मानो… राधिका के इन शब्दों ने रोहन की तंद्रा भंग की... अगर प्रदीप गुनहगार है तो मैं अगले 24 घंटों में उसे आपके कदमों में लाकर ड़ाल दूंगी|

अपने ही दिल से फैसला करो आप मुझे मारकर भी वो सुकून हासिल नहीं कर पाओगे जो सच्चाई सामने आने से मिलेगा|

“मगर अब आप मेरी मदद क्यों कर रही हो” रोहन उदास स्वर में बोला|

“मैने अब तक जो किया था वो शीतल दीदी के प्यार से विवश होकर किया था और अब जो करने को बोल रही हूँ वो मैं अपने प्यार के लिए करूंगी| मैं सच्चे दिल से कहती हूँ अगर एक बार मैं ये सुन लुं कि किशन बेगुनाह है फिर चाहे उसके लिए मेरी जान ही क्यों न चली जाये| तब मुझे कोइ गम न होगा|

बेबस सा होकर बिना कुछ बोले ही रोहन वहां से चला गया|

राधिका ने किशन के अहित का संकल्प करके उसका साथ नहीं दिया था और अब उसकी मनोकामना पूरी हो रही थी तब उसे खुशी से फूला न समाना चाहिए था, लेकिन ऐसा न था उसे दिल के किसी कोने में घोर पीडा हो रही थी| जैसी पीडा उसे अपने अपनो के लिए हुई थी| वह किशन को रूलाना चाहती थी मगर वह खुद रोती जा रही थी|औरत का मन दया का सागर है| जिसके स्वच्छ और निर्मल स्त्रोत को विपत्ति की क्रुर लीलाएं भी मैला नहींं कर सकतीं| इसीलिए औरत को देवी कहा जाता है|

प्रदीप को शरारत भरी नजरो से देखकर राधिका बोली- प्रदीप मैं तुम्हें बधाई देने आई हूँ … आज हमारा दुश्मन हस्पताल में अपनी अन्तिम सांसे गिन रहा है|

“कौन किशन… | ”

“हाँ… किशन”

“मगर आप तो किशन से प्यार…” प्रदीप वाक्य पूरा न कर सका|

"हाँ… हाँ… मैं उससे प्यार करती थी और आज मैं शर्मिंदा हूँ कि मैने ऐसे घिनौने आदमी से प्यार किया था… हे भगवान मैं मर क्यों नहीं जाती, प्रदीप तन की खूबसूरती असली खूबसूरती नहीं होती, बल्कि खूबसूरत वह होता है जो दिल का साफ होता है|”

“मगर ऐसे इन्सान को खो देने का गम क्या इतना होना चाहिए, कि आप भगवान से मॄत्यु की मांग कर रही हैं… क्या ऐसा नहींं हो सकता आप उस शख्श को बिल्कुल भुला दें और अपनी जिन्दगी फिर खुशी से जियें|

“मगर कोइ कैसे…”

“राधिका जी एक साथी की चाह मुझे भी उतनी ही है जितनी आपकोººº हो सकता है इश्वर हमें एक साथ जीवन बिताने का मौका देना चाहता है| इश्वर ने हम दोनोंं के लिए यह रास्ता छोडा है जिस पर हम साथ चल सकते हैं|''प्रदीप ने राधिका के सम्मुख प्रस्ताव रखा|

राधिका सोच रही थी कि बकरा स्वयं शेरनी के सामने आ रहा है| कंधे पर हाथ के स्पर्श से वह पलटी ''वोºººवो मै…'' मुश्किल से दो शब्द कह पायी|

''चलिए कोइ बात नहीं… आपका जवाब ना है तब भी हम अच्छे दोस्त तो बन सकते हैं,”

“मैंने मना थोड़ी किया था… अब कोइ लड़की अपने मंुह से कैसे हाँ बोल दे" राधिका ने शरमाने का प्रयास किया|

"तो मतलब हाँ…” प्रदीप सोफे से उछलते हुए बोला| उछलने वाली बात ही थी|

प्रदीप ने कहा - अच्छा इजाज़त दी है तो इन्कार न करना| एक बार मुझे अपनी बांहों में ले लो| यह मेरी आखिरी विनती है|

राधिका के चेहरे पर एक सुहानी मुस्कुराहट दिखायी दी और मतवाली आँखों में खुशी की लाली झलकने लगी| बोली-आज कैसा मुबारक दिन है कि दिल की सब आरजुएं पूरी हो रही हैं|

“लेकिन कम्बख्त मेरी आरजुएं कभी पूरी नहींं होती…” प्रदीप इतना ही बोल पाया था कि राधिका ने उसके होठों पर उगली रख दी, ''कुछ मत कहो… इस बात का ज़िक्र भी मत करो|

''ठीक है जैसा तुम कहती हो, वैसा ही करूंगा लेकिन एक बार अपने हाथों को मेरी गर्दन का हार बना दो| एक बार… सिर्फ, एक बार मुझे कलेजे से लगाकर बाहों में भींच लो” यह कहकर प्रदीप ने बाहें खोल दी|

राधिका ने भी आगे बढ़कर प्रदीप के गले में बाहें ड़ाल दी और उसके सीने से लिपट गई| दोनोंं आलिंगन पाश में बंध गए| जैसे एक सागर दूसरे सागर में उतर रहा हो| यही मौका था प्रदीप के लिए – उसंने राधिका को बाहों में जकड़ लिया| राधिका की देह एक बार कांपी, फिर स्थिर हो गई| राधिका के साथ आलिंगन में बधे प्रदीप के लिए यह अदभुत उल्लास का पर्व था| इस समय उस पर एक मदहोशी छायी हुई थी|

“इस सीने से लिपटकर मोहब्बत की शराब के बगैर नहींं रहा जाता| आज एक बार फिर उल्फत की शराब के दौर चलने दो” प्रदीप ने कहा|
 
बस फिर क्या था राधिका भी तो यही चाहती थी… अंगूरी शराब के दौर चले और प्रदीप ने मस्त होकर प्याले पर प्याले खाली कर दिए| कुछ देर बाद मस्ती की कैफियत पैदा हुर्इ| अब प्रदीप का अपनी बातों पर व हरकतों पर अख्तियार न रहा| वह नशे में बड़बड़ाने लगा तुम नहीं जानती राधिका मैंने इस प्यार के लिए कैसी-कैसी परिशानियां उठाई| लड़कियां मेरी शक्ल से नफरत करती हैं… म्म्म्म्मैं सीमा को पसंद करता था और उसके एक इशारे पर अपना यह सिर उसके पैरों पर रख सकता था, सारी सम्पत्ति उसके चरणों पर अर्पित कर सकता था| मगर मेरी बदनसीबी देखो मुझे इन्हीं हाथों से उसका कत्ल करना पड़ा|

प्रदीप ने खुद ही सारे राज राधिका के सामने खोलकर रख दिये और चित लेट गया|

राधिका ने प्रदीप की यह सब बातें एक spy camera pen की सहायता से रिकार्ड कर ली|

प्रदीप कई घण्टे तक बेसुध पडा रहा| वह चौंककर होश में आया| मस्तिष्क में सैंकड़ों विचार चकरा गये| चेहरे पर हवाइयां उड़ गई| उसने उठना चाहा लेकिन उसके हाथ-पैर मजबूत बंधे हुए थे| उसने भौंचक्क होकर ईधर-उधर देखा|

रोहन व राधिका उसके पीछे खड़े थे| प्रदीप को माहौल समझते देर न लगी| उसका नशा फुर्र हो गया| वह राधिका को देखकर गुस्से से बोला - क्या तुम मेरे साथ दग़ा करोगी|

राधिका ने जवाब दिया - हाँ कुत्ते, इन्सान थोड़ा खोकर बहुत कुछ सीखता है| तुमने इज्जत और आबरू सब कुछ खोकर भी कुछ न सीखा| तुम मर्द थे| तुम्हारी दुश्मनी किशन से थी| तुम्हें उसके मुक़ाबले में अपनी ताकत का जौहर दिखाना था| स्त्री को तो हर धर्म में निर्दोष समझा गया है| लेकिन तुमने एक कमजोर लड़की पर दग़ा का वार किया, अब तुम्हारी जिन्दगी एक लड़की की मुट्ठी में है| मैं एक लहमे में तुम्हें मसल सकती हूँ मगर तुम ऐसी मौत के हक़दारएक मर्द के लिए ग़ैरत की मौत बेग़ैरत जिन्दगी से अच्छी है|

“आक… थू…” राधिका ने प्रदीप के मंुह पर थूक दिया|

रोहन ने भी अपने दर्द भरे दिल से प्रदीप को दुतकारा… साले हरामी … जब कोइ मर्द जिसे भगवान ने बहादुरी और हौसला दिया हो… एक कमजोर और बेबस लड़की के साथ फरेब करे तो उसे मर्द कहलाने तक का हक़ नहीदग़ा और फरेब जैसे हथियार औरतों के लिए होते हैं क्योंकि वे कमजोर होती है|

अपने को अपमानित महसूस कर प्रदीप ने रोहन को ललकारा- धोखे से मेरे हाथ बांधकर तू कौन सी मर्दानगी दिखा रहा है अगर एक बाप की औलाद है तो एक बार मेरे हाथ खोल, फिर देखते हैं मर्द कौन है|

“अबे कुत्ते की औलाद, राजपूत खानदान में पैदा हो जाने से कोइ सूरमा नहींं हो जाता और न ही नाम के पीछे ‘सिंह’ की दुम लगा देने से किसी में बहादुरी आती है ” प्रदीप के हाथ खोलते हुए रोहन ने कहा|

दोनोंं के बीच घमासान छिड़ गया| कुछ देर के दांव पेंच के पश्चात् रोहन ने प्रदीप को उठाकर पटक दिया और सीने पर सवार होकर पीटने लगा| इस वक्त रोहन बहुत खूखंर लग रहा था| फिर उठकर रोहन ने प्रदीप की गर्दन पकड़कर जोर से धक्का दिया| प्रदीप दो-तीन कदम पर औंधे मुह गिरा| उसकी आंखों के सामने अंधेरी आने लगी| उसके कपड़े तार–तार हो गए थे| होंठों से खून निकल कर ठुड़्ड़ी तक बह आया था|

रोहन अभी भी फाड़ खाने वाली नजरों से प्रदीप को घूर रहा था|

एकाएक प्रदीप के चेहरे पर चमक उभर आयी क्योंकिं उसके गैंग के लोगों का एक दल आ पहूंचा| पासा पलट गया था| राधिका ने सहमी हुई आंखों और धड़कते हुए दिल से उनकी ओर देखा मगर अगले ही पल रोहन का साथ देने के लिए कुलदीप भी आ पहुंचा| जिसे देखकर राधिका के चेहरे पर फिर वही आत्मविश्वास लौट आया|

“रोहन… छोड़ना नहीं सालों को…'' का जयकारा बोलकर कुलदीप भी रोहन के साथ प्रदीप के दल से भिड़ गया| कुलदीप व रोहन दोनों ही फिल्मों के नायकों की तरह खलनायक दल पर भारी पड़ रहे थे कि अब सुनील भी मोहल्ले के कुछ लोगों के साथ आ पहुंचा| सभी ने कन्धे पर लाठी रखी थी| जिसे देखकर प्रदीप और उसके दोस्त घबरा गये|

सभी ने अपने ड़ंड़े संभाले मगर इसके पहले कि वे किसी पर हाथ चलायें प्रदीप के सब गुन्ड़े फुर्र हो गये| कोइ इधर से भागा, कोइ उधर से| भगदड़ मच गई| दस मिनट में वहां प्रदीप के गैंग का एक भी आदमी न रहा|

अब बस कुलदीप और प्रदीप के बीच मलयुद्ध छिड़ने वाला था| कुलदीप किसी भूखे शेर की तरह अपने शिकार प्रदीप की तरफ बढ़ गया| उसकी आखों में खून उतर आया था| कुलदीप के मुकाबले प्रदीप अधिक शक्तिशाली था मगर कुलदीप दिल का कच्चा न था और आज तो उसके सिर पर अपने भाई की दूर्दशा व खानदान की बेइज्जती का बदला लेने का जुनून सवार था| दोनों एक दूसरे को कुश्ती के दांव पेचों से पठकनिया देते रहे| आखिर कुलदीप का जोश प्रदीप की ताकत पर भारी पड़ा| उसके बाएं हाथ का एक घूंसा कुछ ऐसे भीषण ढ़ंग से प्रदीप के चेहरे पर पड़ा कि एक लम्बी ड़कार निकालता हुआ वह दूर जा गिरा| जीवन में शायद पहली बार प्रदीप ने इतनी बुरी मार खायी थी| कुलदीप के सामने आज उसका हर दांव निष्फल रहा| परिणाम यह निकला कि प्रदीप लहुलुहान होकर धम्म से जमीन पर गिर पड़ा|

प्रदीप को अर्ध मूर्छित अवस्था में ही अस्पताल ले जाकर नसबन्दी का सफल आप्रेशन कराया गया| जिसके लिए बाद में उसे एक हजार रूपये नकद तथा एक कम्बल इनाम भी मिला| इसके बाद उसका मुँह काला करके गधे पर बैठाकर पूरे इलाके में घुमाया व बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया|

सभी लोग खुश थे|

किशन को होश आया उसने अपने चारों तरफ अंधेरा देखा| उसने पाया कि यह जगह उसके सोने का कमरा नहींं था| उसने एक बार माँ कहकर पुकारा किन्तु अंधेरे में कोइ उत्तर नहींं आया| उसे अपनी छाती में दर्द उठना व सांस का रूकना याद आया| वह उठ बैठा मगर उसने खड़ा होने में असमर्थता महसूस की और पलंग पर गिर पड़ा| उसने हांफते हुए पुकारा “माँ … मेरे पास आओ माँ… मुझे लगता है मैं मरने वाला हूँ ”| उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया ऐसे जैसे किसी लिखे हुए कागज के ऊपर स्याही फैल गई हो| उस क्षण किशन की सारी स्मरणशक्ति व चेतना को भी उसके जीवन की किताब के अक्षरों में भेद करना असंभव हो गया| उस समय उसको यह भी याद नहींं रहा कि उसकी माँ ने उसे अपनी ममता भरी आवाज से उसको आखिरी बार बेटा कहकर पुकारा था, या यह उसको प्रेम की दवा की आखिरी पुड़िया मिली थी जो उसकी इस संसार से मॄत्यु की अनजानी यात्रा पर देखभाल करेगी|

किशन को बचपन से लेकर अब तक की खास बातें एक-एक करके याद आने लगी| एक पल में उसको स्कूल के दोस्त, खेल का मैदान व अपने चिर परिचित चेहरों की कतार दिखाई दी| उसे याद आया कैसे संजय की आत्महत्या के पश्चात् उसके परिवार का विनाश हो गया था| उसकी आँखों के सामने संजय के माता-पिता के बेबस चेहरे घूमने लगे| अब उसे आत्महत्या के परिणाम की भयावहता का अहसास होने लगा था| उसकी देह ठंड़ी हो रही थी| मुंह पर वह नीलापन आ रहा था जिसे देखकर कलेजा हिल जाता है और आँखों से आँसूं बहने लगते हैं|

किशन की आँखें ठहर गइ थी जिसे देखकर सोनिया देवी चीख पड़ी| किशन को मॄत घोषित करने से पहले ड़ाक्टरो ने उसे बचाने की अपनी अन्तिम कोशिश की… इस समय वहां मौजूद किसी भी शख्श को उसके बचने की आशा न थी मगर शायद मौत को धोखा देने में मजा आता है| वह उस वक्त कभी नहींं आती जब लोग उसकी राह देखते होते हैं| जब रोगी कुछ संभल जाता है, उठने बैठने लगता है, सबको विश्वास हो जाता है कि संकट टल गया, उस वक्त घात में बैठी हुइ मौत सिर पर आ जाती है| यही उसकी निष्ठुर लीला है| जैसे अब किसी को भी किशन के जीवित बचने की आशा न थी तो उसने किशन को अपना शिकार नहीं बनाया|

जी हाँ… यह संभव है कि कभी-कभी एक शरीर जो कि मॄत प्रतीत होता है| असल में जीवित होता है किन्तु सुषुप्तावस्था में या अचेतन होता है जो कुछ समय बाद फिर से जीवित हो सकता है| सच में किशन मरा नहींं था| किसी कारणवश वह भी मॄतप्राय: या अचेतन हो गया था किन्तु अब फिर से ठीक हो गया था| किशन को न जाने किसके आशीर्वाद या दुआ से वरदान स्वरूप विधाता ने उसका जीवन लौटा दिया था|
 
श्रीहरिनारायण ने रोहन को सामुहिक घोषणा करके अपने परिवार का सदस्य बनाते हुए, उसे अपना चौथा बेटा मान लिया| रोहन को उसके साथ हुई अन्होनी के लिए उसके मोहल्ले और शहर वासियों के साथ-साथ सारे देशवासियों की सहानुभुति व स्नेह तो मिला ही था| उसके धैर्य और बहादुरी के लिए उसे राजकीय सम्मकष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं| जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे विजयी होते हैं| यह संसार रोहन जैसे मर्दों के लिये है| जिस दु:ख को हम सुनना भी नहीं चाहते, रोहन उसे भोग रहा था फिर भी वह अपनी माता के अधूरे सपने को पूरा करने के लिये दोबारा आस्ट्रेलिया गया|

दूसरों का सम्मान करना एक शिष्ट आचरण है और दूसरों से सम्मान पाना एक नशा| उम्र का एक पडाव ऐसा आता है जब हर व्यक्ति चाहता है समाज मे उसका अपना एक अलग व्यक्तित्व, अलग पहचान हो तथा लोग उसे सम्मान की दॄष्टि से देखें| लेकिन बहुत से ऐसे नौजवान हैं जो आत्महत्या करके अपने माता-पिता की आत्मा व उनकी सामजिक प्रतिष्ठा को छलनी कर जाते है| एक बेटे के लिए इससे बड़ा कोइ कलंक न होगा कि उसके बूढ़े और कमजोर माता-पिता को अपना जीवन निर्वाह करने के लिए लोगो के सामने भीख मांगने के लिए उन हाथों को फैलाना पड़े, जिनके सहारे कभी उसने चलना सीखा|

विधाता ने किशन को इस कलंक से बचा लिया, जिसका एहसास उसे बखूबी था|

कई दिन हो गए लेकिन वह राघिका से बात तक न कर सका था लेकिन अब वह उसके बिना भी अपने परिवार के लिए हंसी खुशी जीने लगा| इस वक्त वह कुलदीप व सुनील के साथ दुकान पर बैठा गप्पे हांक रहा था| अचानक सागर वहां आया और किशन को बाहर बुलाया|

“भाई राधिका ने आपके लिये पत्र भेजा है” सागर ने एक कागज किशन की ओर बढा दिया|

राधिका का नाम सुनते ही उसके दिल की धड़कन अनायास बढ़ गई‚ आंखे सजल हो गयीं|

किशन ने पत्र पढना शुरू किया –

प्रियतम,

मुझे क्षमा कर देना| मैने आप पर भरोसा न करके आपके प्यार का जो अपमान किया‚ उसके बाद मैं खुद को आपकी दासी बनने के योग्य भी नहींं समप्रेम की स्मॄति में प्रेम के भोग से कही अधिक माधुर्य और सागर है| आपने मुझे प्रेम का वह स्वरुप दिखाया, जिसकी मैं इस जीवन में आशा भी न करती थी| मेरे लिए इतना ही बहुत है| मैं जब तक जीऊगी, आपके प्रेम में मग्न रहूगी| लेकिन आपने आत्महत्या का प्रयास करके जो गलती की उसके सामने मेरी गलती कुछ भी नहीं| जीवन में भले ही कितनी ही उलझनें, कितनी ही तकलीफें, कितने ही दु:ख और कितने ही सुख हों हमेशा हौंसले और सकारात्मक सोच के साथ जीना चाहिये फिर प्यार तो समर्पण है, त्याग है, तपस्या है, जो आपने चाहने वाले पर सब कुछ न्योछावर कर देता है| प्यार हमेशा प्रेरणादायी होता है अगर हालात ऐसे हो भी गये थे कि हमें अलग-अलग जीना पडता, तब भी सब कुछ वैसा ही चलते रहना चाहिए था जैसा आपके परिवार और आपके लिये शुभ होता, आपको कुछ ऐसा करके दिखाना चाहिये था जिससे मै तडप जाती कि मैने किसे खो दिया और आपके चाहने वालों को खुशी होती| जो प्यार साधना के तप को झेल चुका हो, उसे तो सारी कायनात मिलकर भी नहीं हरा सकती| परन्तु कभी–कभी हालात ऐसे हो जाते है जब दो प्रेमियों के मिलन की आवश्यकता को समझना या समझाना मुश्किल हो जाता है| तब समस्त जीवन बल्कि बहुत सी ज़िन्दगियों की बलि देने से अच्छा है| एक आदर्श की बलि दे देना|

इसीलिए मै आपसे दूर जा रही हूँ लेकिन मैं फिर आऊगी और हम फिर मिलेंगें, परन्तु केवल उसी दशा में जब तुम एक कामयाब इन्सान बन जाओगे| यही मेरे लौटने की एकमात्र शर्त है| मैं तुम्हारी हूँ और सदा तुम्हारी रहूगीººº|

तुम्हारी ,

राधिका
 
किशन राघिका से अलग होने की कल्पना से ही काँप उठा| वह राघिका से इतना जुड़ गया था कि उससे अलग वह अपना अस्तित्व ही स्वीकार नहीं कर पा रहा था| किशन ने खत अपने दिल के करीब जेब में रख लिया-मिलना तो हमें हर हाल में है,

देखना है, नसीब मिलाता कैसे है|

"अरे किशन, किस सोच में पड गए यार" किशन को सोच में पडा देख सुनील ने पूछा|

अनायास उसके दिल की धड़कन बढ़ गई, जिस स्थिति से वह बचना चाहता था वही उसके सामने आ गई| किशन कुछ भी नहीं बोल पाया|

''क्यों किशन, किसका खत है| '' कुलदीप ने पूछा|

''भैया‚ वह राधिका वह अच्छी लड़की है|'' सागर से बताये बिना न रहा गया|

''क्या कहा राधिका| ''

“जी भैया”

“क्या यह खत तुझे राधिका ने दिया है| ”

“जी हाँ भैया‚ शायद वह आज ही यह शहर छोडकर जा रही है|”

“शहर छोडकर उसे जाने कौन देगा‚ किशन मेरा भाई‚ मेरी जान है और मेरी जान की जान को मै जाने नहीं दूंगा” कहते हुए कुलदीप उठ गया|

“कुलदीप… रूक जाओ… कोइ जरूरत नहीं उस लडकी को रोकने की” सुनील ने कहा|

“यार सुनील ये तुम बोल रहे हो‚ क्या तुम्हारे लिये किशन की खुशी कोइ मायने नहीं रखती”

“किशन उस लडकी के बिना भी खुश है” सुनील ने कठोर शब्दों मे कहा|

“ठीक से देखो फिर बोलना…” कुलदीप ने किशन की उदासी भांप ली थी|

कुछ देर की बहस के बाद वे लोग बाहर आए| सुनील ने जेब से चाबी निकाल कर बाईक स्टार्ट की और पीछे देखने लगा| किशन भीतरी खुशी से उछलता हुआ सुनील के पीछे बैठ गया| उसे लगा उसकी प्रेम कहानी का अंत भी किसी हिन्दी फिल्म की तरह होगा, जिसमे वह नायक की तरह जाकर राधिका को रोक लेगा लेकिन कुलदीप ने किशन को बाईक पर से उतरने का इशारा करके उसे दुकान पर बैठने को कहा तथा वह खुद सुनिल के साथ चला गया|

किशन उदास था| वह केबिन में आकर बैठा ही था कि काउंटर पर रखे फोन की घंटी बजी| रिसिवर उठाया|

"हैलो, इज इट किशन| "

लगा, कानों में किसी ने मिश्री–सी घोल दी हो| बेहद मीठी आवाज,

"जी मैडम आपने सही पहचाना मगर आप हैं कौन”

“अच्छा जी‚ जिसका नमक खाया आज तुम उसी को नहीं पहचानते”

“न्न्न्नमक… क्क्क् कौन हो तुम| ”

“मै रितू बोल रही हूँ ”

“कौन रितू| ”

“जिसके लंच को तुम नाश्ते मे खा जाते थे‚ मै वही रितू हूँ ”

“रांग नम्बर|" कहकर किशन ने फोन रख दिया|

फोन डिस्कनेक्ट होते ही किशन इस सोच में पड गया कि आज अचानक रितू का फोन कैसे आ टपका… वह अभी इस बारे मे सोच ही रहा था कि फिर वही मिश्रीवाला फोन बजा- वही मिठास, वही चाशनी घुली कानों में लेकिन इस बार आवाज कुछ अलग लगी|

"हैलो, जी क्या यह श्रीहरिनारायण घी वालों का नम्बर है| "

"जी मैडम कहिये मै आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ”

“आप कुलदीप जी बोल रहे हैं| ”

“जी नहीं, मै उनका छोटा भाई किशन बोल रहा हूँ ”

“किशन… कुछ सुना हुआ सा लगता है… हा… याद आया तुम वलुच्चे लफंगे बदमाश हो ना जिसने मुझे मेरे घर पर आकर प्रपोज किया था”

“क्क्क्कौन हो तुम| ”

“मै सुलेखा बोल रही हूँ ”

“कौन सुलेखा| ”

“रांग नम्बर" कहकर एक बार फिर किशन ने फोन रख दिया|

“ये हो क्या रहा है” किशन माथे पर हाथ रखकर बैठ गया| हालांकि वह सुरीली आवाज काफी देर तक कानों में गंूजती रही, लेकिन राधिका के बारे मे सोचने की वजह से यह बात जल्दी ही उसके दिमाग से उतर गई|

अचानक उसे किसी के उसके सामने होने का एहसास हुआ| राधिका को सामने पाकर वह जाने क्यों खुद को सहज नहीं पा रहा था|

वह एकदम उसके सामने खड़ी थी|

एकाएक यह विचार किशन के दिमाग मे कौंध गया – अरे यह सब मैने राधिका को ही तो बताया था|

“तो यह सब आपकी शरारत थी” किशन मुस्कुराया|

वह खिलखिलाई| लगा, सच्चे मोतियों की माला का धागा टूट गया हो और उसके मोती साफ–सुथरे फर्श पर प्यारी–सी आवाज करते हुए बिखर गए हों|

"आपकी आवाज में गजब की मिठास है|" किशन ने कहा

आज राधिका ने बनने संवरने में कोइ कसर नहीं छोड रखी थी|

किशन ने उसे गौर से देखा तो ठगा–सा खडा रह गया|

"हाँ, कहिए, मैने फोन पर आपकी बात पूरी बात नहीं सुनी"

"कुछ नहीं, सिर्फ एक अच्छे इन्सान को धन्यवाद देना चाह रही थी|"

"अच्छा इन्सान… इतनी जल्दी ये अच्छा इन्सान बन गया… जब हम गये थे तब तक तो ये इतना अच्छा नहीं था” मुस्कुराते हुए सुनिल ने कहा|

कुलदीप‚ सुनील व सागर को देखकर किशन समझ गया कि यह इन सबकी सोची समझी शरारत थी|

सब लोग बहुत खुश थे|
 
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