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Romance दंगा

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प्यार के दुश्मन हज़ार होते हैं. प्यार को दुनिया की नज़र भी लग जाती है. बहुत खुश थे आलिया और राज एक दूसरे का प्यार भरा खत पा कर. आलिया के पाँव ज़मीन पर नही थम रहे थे. राज भी खुशी से झूम रहा था.

सनडे को लेने जाना था राज को आलिया को. आने जाने की टिकट उसने बुक करा ली थी. अभी २ दिन बाकी थे. उसने सोचा क्यों ना आलिया के आने से पहले अपने पापा के कारोबार को संभाल लिया जाए. वही बचा था अब इक लौता वारिस उसे ही सब संभालना था. आलिया की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए ये ज़रूरी भी था.

बहुत बड़ा कपड़े का व्यापार था राज के पापा कालिदास त्रिवेदी का. बिना देख रेख के वो यू ही नुकसान में जा रहा था. दंगो के बाद राज ने सुध ही नही ली व्यापार की. लेकिन अब उसे ज़िम्मेदारी का अहसास हो चला था. आलिया की खातिर उसे उस बीखरे हुवे व्यापार को फिर से खड़ा करना था. प्यार कई बार ज़िम्मेदारी भी सीखा देता है.

राज सुबह सवेरे ही घर से निकल पड़ा. सभी कर्मचारी राज को देख कर बहुत खुश हुवे. सभी परेशान थे कि फॅक्टरी अगर यू ही चलती रही तो जल्दी बंद हो जाएगी और उनका रोज़गार छिन जाएगा. राज ने सभी को भरोसा दिलाया कि वो फिर से फॅक्टरी को पहले वाली स्थिती में ले आएगा.

पूरा दिन राज ने फॅक्टरी में ही बिताया. किसी बिगड़े काम को ठीक करने के लिए अक्सर एक सच्चे पर्यास की ज़रूरत होती है. उसके बाद सब कुछ खुद-ब-खुद ठीक होता चला जाता है. ऐसा ही कुछ हो रहा था कालिदास त्रिवेदी की उस फॅक्टरी में. राज के आने से उम्मीद की एक किरण जाग उठी थी सभी के मन में. जो कि एक बहुत बड़ी बात होती है.

काफ़ी दिनो बाद कुछ काम हुवा फॅक्टरी में. राज बहुत खुश था. फॅक्टरी में रहा राज मगर हर वक्त उसके जहन में आलिया का चेहरा घूमता रहा.

शाम को वो खुशी खुशी घर लौट रहा था. अंजान था कि कई बार खुशी को किसी की नज़र भी लग जाती है. जब वो अपने घर पहुँचा तो पाया कि कुछ गुंडे टाइप के लोग आलिया के टूटे-फूटे घर के बाहर खड़े हैं. वो उन्हे इग्नोर करके अपने घर में घुसने लगता है. मगर उसे कुछ ऐसा सुनाई देता है कि उसके कदम घर के बाहर ही थम जाते हैं.

“यार जो भी हो. क्या मस्त आइटम थी वो जरीना. मैं तो दंगो के दौरान बस उसे ही ढूंड रहा था. एक से एक लड़की को ठोका उस दौरान पर आलिया जैसी कोई नही थी उनमे. पता नही कहा छुप गयी थी साली. उसकी छोटी बहन की तो अच्छे से ली थी हमने.”

“हो सकता है वो घर पर ना हो कही बाहर गयी हो.”

“हो सकता है? पर यार उसकी लेने की तम्माना दिल में ही रह गयी. अफ क्या चीज़ थी साली. ऐसे दंगो में ही तो ऐसा माल हाथ आता है. वो भी निकल गया हाथ से.”

राज तो आग बाबूला हो गया ये सुन कर. प्रेमी कभी अपनी प्रेमिका के खिलाफ ऐसी बाते नही सुन सकता. भिड़ गया राज उन लोगो से बीना सोचे समझे. जो आदमी सबसे ज़्यादा बोल रहा था वो उस पर टूट पड़ा.

“बहुत बकवास कर रहा है. तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बाते करने की” राज ने उसे ज़मीन पर गिरा कर उस पर घूँसो की बोचार कर दी. मगर वो पांच थे और राज अकेला था. जल्दी ही उसे काबू कर लिया गया. ये कोई हिन्दी मूवी का सीन नही था जहा कि हीरो पांच तो क्या दस लोगो को भी धूल चटा देता है. ये रियल लाइफ का द्रिश्य था.

दो लोगो ने राज को पकड़ लिया और एक ने चाकू निकाल कर कहा, “क्यों बे ज़्यादा चर्बी चढ़ि है तुझे. हम कौन सा तेरी मा बहन के बारे में बोल रहे थे. उन लोगो के बारे में बोल रहे थे जो हमारे दुश्मन हैं. धर्मी हो कर धर्मी पर ही हाथ उठाते हो वो भी हमारे दुश्मनो की खातिर. तुम्हारे जैसे लोगो ने ही धरम को कायर बना रखा है.”

“कायरता खुद करते हो और पाठ मुझे पढ़ा रहे हो. छोड़ो मुझे और एक-एक करके सामने आओ. खून पी जाऊंगा मैं तुम लोगो का.”

“सत्तू मार साले के पेट में चाकू और चीर दे पेट साले का. ज़रूर इसी ने छुपाया होगा आलिया को. इसके घर में देखते हैं. क्या पता जो दंगो के दौरान नही मिली अब मिल जाए…हे…हे.”

“उसके बारे में एक शब्द भी और कहा तो मुझसे बुरा कोई नही होगा.” राज छटपटाया. मगर दो लोगो ने उसे मजबूती से पकड़ रखा था.

किसी तरह से राज ने दोनो को एक तरफ धकेला और टूट पड़ा उस गुंडे पर जिसके हाथ में चाकू था. होश खो बैठा था राज. होता है प्यार में ऐसा भी कभी. मगर ये ज़्यादा देर नही चला. फिर से उसे जकड़ लिया गया.

और फिर वो हुवा जिसके बारे में राज ने सोचा भी नही था. चाकू के इतने वार हुवे उसके पेट पर की खून की नादिया बह गयी वहा. राज को तडपता छोड़ वो गुंडे भाग गये वहा से.

राज की फॅक्टरी का एक कर्मचारी, कमलेश राज से कुछ पेपर्स पर साइन लेने उसके घर पहुँचा तो उसने राज को वहा खून से लथपथ पाया. तुरंत किसी तरह एम्बुलांस बुलाई उसने और राज को हॉस्पिटल ले जाया गया.

बहुत सीरीयस हालत में था वो. ऑपरेशन किया डॉक्टर्स ने मगर बचने की उम्मीद कम ही बता रहे थे. खून बहुत बह गया था. चाकू के इतने वार हुवे थे कि पेट छलनी छलनी हो रखा था उसका. बड़ी देर लगी ऑपरेशन में भी. ऑपरेशन के बाद राज को आई.सी.यू में रख दिया गया. उसे होश नही आया था. सनडे आ गया मगर अभी भी वो कोमा में ही था. राज के बारे में सुन कर मुंबई से उसके चाचा, चाची मिलने आए. कालिदास त्रिवेदी की मौत के वक्त नही आ पाए थे वो क्योंकि माहोल ठीक नही था. चाचा का नाम था रामदास त्रिवेदी और चाची का नाम था कमला देवी.

“डॉक्टर साहिब कब तक रहेगा कोमा में राज.” रघुनाथ ने पूछा.

“कुछ नही कह सकते. हम जो कर सकते थे हमने किया. अब सब भगवान के उपर है.” डॉक्टर कह कर चला गया.

आज के दिन राज को आलिया को लेने दिल्ली जाना था. मगर वो तो कोमा में पड़ा था. उसे होश ही नही था कि आलिया तड़प रही होगी राज के लिए. या फिर होश था उसे मगर कुछ कर नही सकता था. कोमा चीज़ ही कुछ ऐसी है. बेसहाय बना देती है इंसान को.

आलिया तो सुबह से ही बेचैन थी. बेसब्री से इंतेज़ार कर रही थी राज का. उसे मौसी को बिना कुछ कहे घर से निकलना था, राज के पीछे पीछे. बस एक बार दिख जाए राज गली में. आँखे बिछाए बैठी थी वो. छत की बाल्कनी में खड़ी हो गयी सुबह सवेरे ही.

“क्या बात है बेटा आज सुबह जल्दी उठ गयी.” मौसी ने आवाज़ लगाई आलिया को.

आलिया मौसी की आवाज़ सुन कर चौंक गयी, “सलाम वालेकुम मौसी.”

“सलाम वालेकुम बेटा. क्या बात है आज सुबह सुबह यहा खड़ी हो. सब ख़ैरियत तो है.”

“हां मौसी सब ख़ैरियत है. बस वैसे ही खड़ी थी.”

“तुमसे कोई मिलने आ रहा है आज.” मौसी ने कहा.

“कौन?”

“सलीम नाम है उसका. यही पड़ोस में रहता है. अच्छा लड़का है. तेरे बारे में बताया मैने उसे. बहुत दुख हुवा उसे सुन कर तुम्हारे बारे में.

मिलना चाहता है तुम से. आ जाओ नीचे वो आता ही होगा. बहुत अहसान है उसके हम पर. उस से मिलोगी तो अच्छा लगेगा हमें.”

“ठीक है मौसी मैं आती हूँ आप चलिए.” आलिया ने कहा.

मौसी सोच में पड़ गयी कि आख़िर क्या है बाल्कनी में ऐसा आज जो आलिया वहा से हटना नही चाहती. मौसी के जाने के बाद आलिया ने फिर से झाँक कर देखा गली में मगर उसे कोई दीखाई नही दिया. “शायद बाद में आएगा राज. अभी तो सारा दिन पड़ा है. मिल आती हूँ पहले इस सलीम से.”

आलिया जब सीढ़ियाँ उतर कर आई तो उसने पाया की सलीम उसका इंतेज़ार कर रहा था.

“तो आप हैं आलिया खान. खुदा कसम बहुत खूबसूरत हैं आप. हमारी नज़र ना लग जाए आपको.” सलीम ने आलिया को देखते ही कहा.

“आओ बेटी बैठो. यही है सलीम. बहुत काबिल लड़का है. जब भी कोई काम बोलती हूँ इसे वो ये झट से कर देता है.”

“ये तो आपकी जर्रा नवाज़ी है खाला. हम इतने काबिल भी नही हैं. सब खुदा की रहम है.”

“नही सलीम तुम सच में बहुत काबिल हो. अच्छा तुम दोनो बाते करो मैं चाय लेकर आती हूँ.”

आलिया मौसी को रोकना चाहती थी पर कुछ कह नही पाई.

“लगता है आपको खुशी नही हुई हमसे मिल कर. आप कहें तो हम चले जाते हैं.” सलीम ने कहा.

“जी नही आप हमें ग़लत ना समझे. हम थोड़ा परेशान हैं.” आलिया ने कहा.

“समझ सकते हैं हम आपकी परेशानी. हम बेख़बर नही हैं आपकी परेशानी से. खाला हमें सब कुछ बता चुकी हैं. हम यहा आपका गम बाटने आयें हैं.” सलीम ने कहा.

“बहुत बहुत शुक्रिया आपका मगर हम उस बारे में बात नही करना चाहते.”

“समझ सकते हैं हम. गुज़रे दौर की बाते जख़्मो को और हवा ही देती हैं. हम आपसे माफी चाहेंगे अगर हमने आपके जख़्मो को कुरेद दिया हो तो. हमें ज़रा भी इल्म नही था कि इन बातो का जिकर नही होना चाहिए. हम तो बस आपका गम हल्का करना चाहते थे.”

“आपसे इज़ाज़त चाहूँगी. मुझे जाना होगा.”

“रोकेंगे नही आपको. मगर आप बैठेंगी तो हमें अच्छा लगेगा. आपसे ही मिलने आयें हैं हम.”

आलिया बहुत बेचैन हो रही थी ये जान-ने के लिए कि राज आया की नही. उसके चेहरे पर ये बेचैनी सॉफ झलक रही थी.

“आप हमें कुछ बेचैन सी लग रही हैं. सब ख़ैरियत तो है.” सलीम ने कहा.

“सब ख़ैरियत है आप हमारी फिकर ना करें.” आलिया थोड़ा गुस्से में बोल गयी.

तभी मौसी चाय ले आई. आलिया वहा से उठी और बोली, “मौसी मैं अभी आती हूँ.”

“चाय ठंडी हो जाएगी बेटा.”

आलिया को कुछ नही सुन-ना था. उसे तो बस उपर आ कर बाल्कनी से झाँक कर देखना था कि राज आया है कि नही. दौड़ कर आई वो उपर और दिल में राज को देखने की बेचैनी लिए उसने चारो तरफ देखा गली में. मगर उसे कोई नज़र नही आया. थक हार कर वो वापिस आ गयी.

“चाय ठंडी हो गयी, ऐसा क्या ज़रूरी काम था उपर.” मौसी ने पूछा.

“शायद आलिया को चाय पसंद नही है.” सलीम ने कहा.

“बहुत पसंद है इसे चाय. पता नही आजकल क्या हो गया है इसे.”

“खाला आलिया गम के ऐसे दौर से गुज़री है कि इंसान की रूह काँप जाए. इंसान का खो जाना लाजमी है. अब इज़ाज़त चाहूँगा खाला. कुछ ज़रूरी काम है मुझे. फिर मिलेंगे. खुदा हाफ़िज़!”

“खुदा हाफ़िज़ बेटा. आते रहना.”

“खुदा हाफ़िज़ आलिया जी. हम फिर मिलेंगे.” सलीम ने मुस्कुराते हुवे कहा.

“खुदा हाफ़िज़…” आलिया ने जवाब दिया.

“हमारी यही दुवा है कि अल्ला का रहम हो आप पर और आप इस गम के दौर से जल्द निकल आयें बाहर. हम इस खुबसुरत से चेहरे पर जल्द से जल्द मुस्कान देखना चाहते हैं.” सलीम ने कहा.

आलिया ने कुछ नही कहा. उसका ध्यान ही नही था सलीम की बात पर. वो तो राज के ख़यालो में खोई थी.

“आलिया जी हम आपको दुवा दे रहें हैं और आप कबूल नही कर रहीं. क्या हमसे कोई गुस्ताख़ी हुई है.”

आलिया को होश आया और वो झट से बोली, “शुक्रिया आपका. बहुत बहुत शुक्रिया.”
 
सलीम चला गया वहा से. सलीम के जाने के बाद मौसी बोली, “अच्छा लड़का है. बहुत मेहनती है. बहुत अहसान है इसके हम पर. बहुत पसंद आई तुम उसे. जब तुम उपर गयी थी तो तुम्हारा हाथ माँग रहा था. सलीम से अच्छा शोहार नही मिलेगा तुम्हे.”

“मौसी आप सोच भी कैसे सकती हैं ऐसा.” आलिया के ये बात ना-गवारा गुज़री.

“बेटा तेरे अब्बा और अम्मी के बाद अब मैं ही हूँ तेरी अपनी. इतना सोचने का हक़ तो शायद मुझे है ही. तुझे ये सुझाव पसंद नही तो ना सही मगर फिर भी गौर करना इस पर. सलीम बहुत ही अच्छा लड़का है. अच्छे से जानती हूँ मैं उसे. तुम्हारे लिए उस से बेहतर शोहर नही मिल सकता. उसे तुम पसंद भी आ गयी हो. बाकी तुम्हारी मर्ज़ी है. तुम्हारा निकाह तुम्हारी मर्ज़ी से ही होगा.”

आलिया ने कुछ नही कहा और आ गयी सीढ़ियाँ चढ़ कर उपर बाल्कनी में. राज वहा हो तो दीखे. आँखे नम हो गयी इस बार उसकी.

“क्यों तडपा रहे हो मुझे राज. मर जाऊंगी मैं इस तड़प में. प्लीज़ जल्दी आ जाओ. मैं और इंतेज़ार नही कर सकती.”

सुबह से दोपहर हुई और दोपहर से शाम. शाम से रात भी हो गयी. आलिया की आँखे पथरा गयी राह देखते-देखते. बहुत रोई वो बार-बार. आँखे लाल हो गयी उसकी. उसे क्या पता था कि जिसे वो ढूंड रही है वो इस वक्त कोमा में है और शायद गहरी नींद में उसे अपने पास बुला रहा है.

अनोखा बंधन था ये सच में. प्यार इस जनम का नही बल्कि काई जन्मों का लग रहा था. रात तो हो गयी थी पर पता नही क्यों उम्मीद नही छोड़ी थी आलिया ने. प्यार हमेशा उम्मीद की किरण जगाए रखता है इंसान में. रात को भी वो कईं बार आई बाल्कनी में चुपचाप दबे पाँव. मगर हर बार निराशा ही हाथ लगी. बहुत मुश्किल से जाती थी वो वापिस अपने कमरे में. मन करता नही था उसका बाल्कनी से हटने का मगर वो वहा ज़्यादा देर नही रुक सकती थी. दिन में मौसी काई बार पूछ चुकी थी कि क्या कर रही हो बार बार बाल्कनी में. आलिया नही चाहती थी कि किसी को भी पता चले उसके और राज के बारे में. उनका प्यार जितना गुमनाम रहे उतना ही अच्छा. जितना लोगो को पता चलेगा उतनी ही मुसीबत बढ़ेगी. राज की चिट्ठी उसने बहुत ध्यान से छुपा कर रखी थी. फाड़ नही सकती थी उसको. अनमोल प्यार जो था उस चिट्ठी में. ऐसा प्यार जो कि उसे अपनी जींदगी से भी ज़्यादा प्यारा था. होता है ऐसा भी...प्यार अपनी जींदगी से भी ज़्यादा अनमोल हो जाता है.

आलिया वापिस आकर गिर गयी अपने बिस्तर पर. थाम नही पाई अपनी आँखो को और वो बह गयी फिर से.

“कहा रह गये तुम राज. क्यों नही आ पाए तुम. ऐसा क्या हो गया कि तुमने मुझे यू तडपता छोड दिया. अगर मैं मर गयी तड़प-तड़प कर तो देखना बहुत पछताओगे तुम. मेरे जितना प्यार कोई नही कर सकता तुम्हे. क्यों राज क्यों…….क्यों नही आ पाए तुम.” और बोलते बोलते रो पड़ी आलिया फिर से.

“कभी कितनी नफ़रत करती थी तुमसे और आज ये हालत है तुम्हारे कारण. एक पल भी जीना नही चाहती तुम्हारे बिना. याद है तुम्हे वो दिन जब तुम कीचड़ उछाल कर चले गये थे मेरे उपर.

मैं कॉलेज से मार्केट चली गयी थी राधा और किंजल के साथ. वापसी में बारिश शुरू हो गयी. शुक्र है छाता था मेरे पास. बचते-बचाते चल रही थी पानी की बूँदो से. नयी जीन्स पहन रखी थी मैने. घर के नज़दीक ही थी मैं. तुम ना जाने कहा से आए अचानक बाइक पर और कीचड़ उछाल दिया मेरे उपर. जीन्स तो मिट्टी से लथपथ हुई ही, मेरे चेहरे पर भी कीचड़ के छींटे डाल दिए तुमने.

तुम रुक गये ये देख कर. तुम्हे लगा कोई और है. छाते के कारण शायद तुम मुझे पहचान नही पाए थे. आगे बाइक खड़ी करके नज़रे झुकाए हुवे. मैने तो तुम्हे पहचान ही लिया था. मन कर रहा था कि ईंट उठा कर मारु तुम्हारे सर पर.

“मिस्टर राज क्या समझते हो तुम खुद को. देख कर नही चल सकते क्या. मेरी नयी जीन्स खराब कर दी तुमने.” मैने गुस्से में रीअॅक्ट किया.तुम तो मुझे देखते ही मूड गये वापिस. इतनी कर्टासी भी नही दीखाई की कम से कम सॉरी ही बोल दो. चल दिए मूह फेर कर जैसे कि सब मेरी ही ग़लती हो. अपनी बाइक पर बैठ गये जा कर और किक मार कर बोले, “मेरी मम्मी से पैसे ले लेना. नयी खरीद लेना. ज़्यादा बकवास करने की ज़रूरत नही है.”

“अपने पैसे अपने पास रखो मिस्टर. पैसो की कमी नही है मुझे. स्टुपिड…...” मैं चिल्ला कर बोली.

“तो खरीद लो ना नयी जा कर. मेरा दिमाग़ क्यों खा रही हो.” चले गये तुम बोल कर.

बहुत गुस्सा आया था तुम्हारे उपर. मन कर रहा था कि तुम्हारी जान ले लूँ. और आज ये दिन है कि तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकती हूँ. कितना अजीब होता है प्यार. हम दोनो ऐसे अनमोल प्यार के बंधन में बँध जाएँगे सोचा भी नही था मैने. आ जाओ राज और मेरे लिए एक नयी जीन्स लेते आना. ड्यू है तुम्हारे उपर. वही पहन कर चलूंगी मैं तुम्हारे साथ. तुम बस लेते आओ. या फिर रहने दो जीन्स को….तुम आ जाओ राज प्लीज़….मैं बीखर गयी हूँ पूरी तरह. एक तुम ही तो हो जिसके लिए जीना चाहती हूँ. तुम भी इस तरह तडपाओगे तो क्या होगा मेरा. प्लीज़ आ जाओ.”

आलिया से रहा नही गया और वो फिर से उठ कर चल दी बाल्कनी की तरफ. रात के ३ बज रहे थे. मगर उसकी उम्मीद टूटी नही थी अभी. चारो तरफ देखा आलिया ने बाल्कनी से झाँक कर. गली में कुत्ते भोंक रहे थे. “ये कुत्ते कही और क्यों नही चले जाते. राज को ना काट लें कहीं ये.”

राज का कही अता पता नही था पर आलिया राज के लिए कुत्तो से परेशान हो रही थी. बहुत परवाह रहती है प्यार में एक दूसरे की.

वापिस आना ही पड़ा आलिया को. “क्या पता कल आए राज. क्या पता ट्रेन लेट हो गयी हो. या फिर हो सकता है कोई ज़रूरी काम आन पड़ा हो. वो आएगा ज़रूर मुझे यकीन है. बस जल्दी आ जाए तो अच्छा है वरना पता नही जी पाउंगी या नही.”

दुबारा नही उठी आलिया बाल्कनी में जाने के लिए. थक हार कर उसकी आँख लग गयी थी. सो गयी बेचारी तड़प-तड़प कर. आँखे भारी हो रखी थी. नींद आना लाज़मी था.

राज अभी भी कोमा में था. आस पास क्या हो रहा था उसे कुछ नही पता था. लेकिन प्यार का कुछ ऐसा चमत्कार था कि वो थोड़ा-थोड़ा सोच पा रहा था. कुछ केसेस हुवे हैं ऐसे कोमा के जिनमे इंसान सोच पाता है. मगर ये थिंकिंग दिमाग़ की बहुत गहराई में होती है. प्यार भी तो कही गहरा छुपा रहता है इंसान के अंदर. शायद वही ये सोचने समझने की ताक़त छुपी रहती है.

“आलिया मैं आ रहा हूँ तैयार रहना.” ये विचार खुद-ब-खुद आ गया राज के दिमाग़ में. शायद आलिया से मिलने की तड़प बहुत गहराई तक समा गयी थी उसके अस्तित्व में.

राज को पता भी नही था कि सनडे बीत चुका है और आलिया का उसके इंतेज़ार में बुरा हाल है. कोमा में था राज जान नही सकता था ये बात. उसका अस्तित्व दिन दुनिया से बहुत परे था जहा टाइम और दिन नही होता. एक गहरी नींद होती है कोमा जहा कुछ उभर आता है अचानक. जैसे की आलिया के लिए जीन्स ले जाने का विचार अचानक ही आ गया. पता नही कैसे.

शायद प्यार में बहुत गहराई से जुड़े थे आलिया और राज वरना राज को जीन्स का ख्याल आना मुमकिन नही था. राज मन ही मन मुस्कुराया, “बहुत चिल्लाई थी तुम उस दिन. पूरी जीन्स कीचड़ के रंग में रंग गयी थी. कितना गुस्सा था तुम्हारे चेहरे पर. ला दूँगा नयी जीन्स. मुझे पता है कि ड्यू है जीन्स मुझ पर.”

“जरीना! उठो…आज इतनी देर तक कैसे सो रही हो.” मौसी ने आवाज़ लगाई. खूब दरवाजा पीटा उन्होने. पर आलिया का कोई जवाब नही आया.

मौसी की आवाज़ सुन कर उनका बेटा अकरम वहा आ गया और बोला, “अम्मी क्या हुवा?”

“११ बज गये हैं और ये लड़की उठी नही अभी तक.” मौसी ने कहा.

“सोने दो ना अम्मी तुम हमेशा दूसरो की नींद खराब करती हो.” अकरम ने कहा

“आलिया इतनी देर तक कभी नही सोती. कल कुछ ज़्यादा ही परेशान लग रही थी. मुझे तो चिंता हो रही है.”

“क्या हुवा अकरम की अम्मी. इतना हंगामा क्यों मचा रखा है.” अकरम के अब्बा ने पूछा. उनका नाम मन्सूर था.

“आलिया दरवाजा नही खोल रही. पता नही क्या बात है.” मौसी ने चिंता जनक शब्दो में कहा.

सलीम किसी काम से घर आया था. वो भी उन लोगो की बाते सुन कर वहा आ गया और बोला, “खाला क्या बात है. सब ख़ैरियत तो है.”

“पता नही सलीम बेटा. आलिया दरवाजा नही खोल रही. ११ बज रहे हैं. मुझे तो चिंता हो रही है. कल बहुत बेचैन सी लग रही थी. बार-बार बाल्कनी के चक्कर लगा रही थी. पता नही क्या बात है. कुछ बताती भी तो नही है. अपने आप में खोई रहती है.”

“गहरी नींद में सोई है शायद.” सलीम भी ज़ोर-ज़ोर से दरवाजा खड़काता है.

पर आलिया का कोई जवाब नही आता.

“खाला आप हटिए. दरवाजा तोड देते हैं.” सलीम ने कहा.

“हां सलीम भाई ठीक कहा, तोड देते हैं दरवाजा.” अकरम ने कहा.

“हां बेटा कुछ करो…मुझे तो बहुत डर लग रहा है.” मौसी घबरा रही थी.

सलीम और अकरम दरवाजे को धक्का मारते हैं. दरवाजा २-३ धक्के मारने पर खुल जाता है.

पहले मौसी अंदर आती है क्योंकि जवान लड़की थी कमरे में. मौसी अंदर आकर पाती है कि आलिया पाँव सीकोडे पड़ी है. वो उसे हिलाती है पर वो कुछ रेस्पॉंड नही करती. “ये तो बेहोश पड़ी है शायद.”

मौसी बाहर आती है और सलीम से कहती है, “बेटा वो तो बेहोश पड़ी है अंदर. डॉक्टर को बुलाओ जल्दी.”

सलीम फ़ौरन डॉक्टर को लेकर आता है. डॉक्टर आलिया को एग्ज़ॅमिन करता है और बोलता है, “सब कुछ नॉर्मल है. शायद किसी सदमें में है. क्या कुछ ऐसा हुवा है इसके साथ जिस से इसके दिल को गहरा झटका लगे.”

“हुवा तो बहुत कुछ है डॉक्टर साहिब अब क्या बतायें. आप कोई दवाई दे दीजिए.” मौसी ने कहा.

“मैं इंजेक्शन दे रहा हूँ. कुछ ही देर में इसे होश आ जाएगा. आप इन्हे खुश रखने की कोशिश करें.” डॉक्टर ने कहा.

डॉक्टर आलिया को इंजेक्शन दे कर चला गया. अकरम और उसके अब्बा भी वहा से चले गये. उन्हे अपने काम के लिए निकलना था. सलीम और मौसी वही बैठ गये दो कुर्सी ले कर.

“कुछ तो है ऐसा जो ये हमसे छुपा रही है.” मौसी ने कहा.

“खाला वक्त लगेगा उसके जख़्मो को भरने में. कुछ वक्त दीजिए उसे.” सलीम ने कहा.

“वक्त तो ठीक है, पर ये हर वक्त खोई-खोई रहती है.”

“खाला आपने आलिया से कुछ बात की हमारे बारे में” सलीम ने पूछा.

“की थी बेटा. अभी उसने कुछ बताया नही है पर तुम फिकर ना करो आलिया तुम्हारी ही बीवी बनेगी. मैं हूँ ना.”

“खाला अगर ऐसा हो गया तो खुद को ख़ुसनसीब समझूंगा. पहली बार मुझे कोई पसंद आया है.” सलीम ने कहा.

“तुम्हारे बहुत अहसान हैं बेटा. इतना तो तुम्हारे लिए कर ही सकती हूँ. आलिया ना नही बोलेगी मुझे यकीन है इस बात का. और तुमसे अच्छा शोहार नही मिलेगा उसे.”

“खाला हम चाहते हैं कि जितनी जल्दी ये निकाह हो जाए अच्छा रहेगा. हम आलिया को बहुत खुश रखेंगे.” सलीम ने कहा.

“मालूम है बेटा. कोशिश करूँगी कि तुम दोनो का निकाह जल्दी हो जाए. मेरे सर से भी ज़िम्मेदारी का बोझ हटेगा. उमर हो चली है मेरी. जींदगी का क्या भरोसा. जीतनी जल्दी आलिया का घर बस जाए अच्छा है. तुम्हारे हाथ में उसका हाथ दे कर मैं भी निश्चिंत रहूंगी.” मौसी ने कहा.

डॉक्टर के इंजेक्शन के बाद कुछ ही देर में आलिया को होश आ गया.

“राज!” आलिया चिल्ला कर बोली और बिस्तर पर उठ कर बैठ गयी. तब उसकी मौसी और सलीम वही थे.

सलीम और आलिया की मौसी तो हैरान रह गये.

“राज? कौन राज जरीना” सलीम ने हैरानी में पूछा.

आलिया को होश आया कि वो क्या बोल गयी. “मैं सपना देख रही थी शायद.”
 
आलिया का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. वो अच्छे से जानती थी कि किसी को भी वहा राज और उसके बारे में पता चला तो बहुत मुसीबत हो जाएगी. अकरम के अब्बा और अकरम ने खुद फरिदा को इसलिये मार दिया था क्योंकि वो एक धर्मी लड़के से प्यार कर बैठी थी. अकरम की छोटी बहन थी फरिदा. ऐसे माहोल में आलिया का डरना लाजमी था. कोई नही था वहा ऐसा जो कि आलिया और राज के रिश्ते को समझता. इसलिये उसे हर हाल में अपने प्यार को छुपा कर रखना था.

“क्या हुवा था बेटा…पता है तुम बेहोश पड़ी थी यहा. डॉक्टर ने इंजेक्शन दिया तुम्हे तब होश में आई तुम. ऐसी कौन सी बात है अब जो कि तुम्हे अंदर ही अंदर खाए जा रही है. कल बार बार बाल्कनी में घूम रही थी. मैने तुझे रात को भी देखा बाल्कनी में जाते हुवे. पर तुझे टोका नही. कुछ बताओगी अपनी मौसी को ताकि मैं कुछ कर पाव तुम्हारे लिए”

आलिया अजीब मुश्किल में पड़ गयी, बोले भी तो क्या बोले. चुप रही बस. अब कैसे कहे कि वो राज को ढूंड रही थी. कुछ और कहने को उसे सूझ नही रहा था. जब दिल प्यार में डूबा हो तो दिमाग़ अक्सर कम चलता है.

“बेटा मैं कुछ पूछ रही हूँ कुछ बताओगी मुझे.” मौसी ने फिर पूछा.

“रहने दीजिए खाला. आलिया का जब मन होगा बता देगी.” सलीम ने कहा.

लेकिन कहते हैं कि इश्क़ छुपाए नही छुपता. आलिया के तकिये के पास राज की चिट्ठी पड़ी थी. मौसी की नज़र पड़ गयी उस चिट्ठी पर. वो आगे बढ़ी और उठा ली वो चिट्ठी. आलिया का ध्यान ही नही था इस बात पर कि तकिये के पास चिट्ठी पड़ी है. प्यार में ध्यान व्यान सब गुम हो जाता है शायद. जब उसने मौसी के हाथ में राज की चिट्ठी देखी तो वो चिल्लाई, “मौसी ये मेरी पर्सनल चिट्ठी है. मुझे वापिस दे दो.”

“सलीम बेटा पढ़ना ज़रा इसमे क्या लिखा है. मुझे तो पढ़ना नही आता.” मौसी ने कहा.

“नही सलीम ये मेरी पर्सनल है. कोई नही पढ़ेगा इसे.” आलिया ने कहा.

सलीम ने चिट्ठी पकड़ तो ली पर दुविधा में पड़ गया वो कि क्या करे क्या ना करे. मौसी कह रही थी पढ़ो और आलिया कह रही थी मत पढ़ो.

“पढ़ो बेटा. शायद आलिया की परेशानी का सबब इस चिट्ठी में मिल जाए. ये तो कुछ बताती है नही.”

सलीम ने चिट्ठी हाथ में ली और मन ही मन पढ़नी शुरू की. जब वो चिट्ठी पढ़ कर हटा तो उसके चेहरे पर तनाव था.

“मौसी बाहर आईए बहुत गंभीर बात है.” सलीम ने कहा.

“मेरा खत मुझे वापिस दे दो.” आलिया ने भावुक आवाज़ में कहा. वो वैसे ही राज के ना आने से परेशान थी और अब ये नयी मुसीबत आन खड़ी हुई थी.

सलीम ने राज का खत अपनी जेब में डाल लिया और मौसी को साथ लेकर बाहर की ओर चल दिया.

आलिया उठी बिस्तर से और चिल्लाई, “मेरा खत है वो कहा ले जा रहे हो. पागल हो क्या तुम. वापिस दो मुझे वो.”

सलीम ने बाहर आकर बाहर से कुण्डी लगा दी दरवाजे की. आलिया अंदर से दरवाजा पीट-ती रही. “मेरा खत मुझे वापिस दे दो प्लीज़…….” आँसू आ गये आलिया की आँखो में बोलते बोलते.

सलीम पूरा खत पढ़ कर मौसी को सुनाता है.

“देखा खाला ये कारण है इसकी परेशानी का. इसे अपने अम्मी, अब्बा और बहन के मरने का कोई गम नही है. बल्कि एक काफ़िर के कारण परेशान है ये. वो लेने आने वाला था कल आलिया को यहा. तभी ये बाल्कनी में घूम रही थी. हमें तो यकीन ही नही हो रहा. हमें लगा ये अपनो को खोने के कारण गम में है. पर नही ये तो इश्क़ फर्मा रही है वो भी एक फजीर और काफ़िर से.”

“अकरम और उसके अब्बा को पता चला तो फरिदा की तरह काट डालेंगे इसे भी. ये लड़की ऐसा करेगी हमने सोचा भी नही था. उन लोगो ने क़त्ले आम किया हमारी क़ौम का और ये उनसे प्यार कर रही है. शरम आनी चाहिए इसे.”

“मौसी मेरा खत मुझे वापिस दे दो. वो मेरी जींदगी है प्लीज़………” आलिया ने अंदर से रोते हुवे चिल्ला कर कहा.

“अगर ये राज यहा आया तो हम उसे जींदा नही छोड़ेंगे खाला.” सलीम ने कहा.

“बेटा क्या तुम ये सब जान-ने के बाद भी आलिया से शादी करोगे.” मौसी ने पूछा.

“हम शायद मोहब्बत करने लगे हैं आलिया से. हम उसी से शादी करेंगे चाहे कुछ हो जाए.” सलीम ने कहा.

“बेटा तुम शादी की तैयारी करो बस अब फिर. ज़्यादा देर करनी ठीक नही है.” मौसी ने कहा.

“मैं तो तैयार हूँ खाला. आप चाहे आज करवा दो शादी.”

“ठीक है बस एक हफ्ते का वक्त दो हमें.”

“ठीक है खाला…आपको किसी भी बात की चिंता करने की ज़रूरत नही है. हम सब इंतजाम कर देंगे.”

“वो तो हम जानते ही हैं.”

आलिया सुन रही थी सब कुछ अंदर. इतनी भावुक हो रही थी कि कुछ पूछो मत. कुछ भी नही बोल पा रही थी. गिर गयी रोते-रोते वही ज़मीन पर और बोली, “अब तो आ जाओ राज. या अब भी नही आओगे. प्लीज़…………………………..”

------------------- एक साल बाद--------------------------

राज ने धीरे से आँखे खोली. कोई नही था आस पास उसके. उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो कहा है और क्यों है. कोमा से उठने के बाद अक्सर ऐसा होता है.

“जरीना…आलिया कहा है? मैं यहा कैसे.” सबसे पहले उसे यही सूझा.

राज अभी गहरी नींद से जागा था. दिमाग़ एक साल तक गहरी नींद में था. वापिस नॉर्मल होने में वक्त तो लगता ही है.

राज उठ कर बैठ गया बिस्तर पर. रामदास त्रिवेदी ने देख लिया उसे बैठे हुवे. उनकी खुशी का ठीकाना नही रहा.

“बेटा तुम्हे होश आ गया. अरे सुनती हो राज को होश आ गया.” रामदास त्रिवेदी ने अपनी पत्नी को आवाज़ दी. वो भागी भागी आई.

“चाचा जी आप.”

“हां बेटा. हम तुम्हे अपने साथ मुंबई ले आए थे. वहा गुजरात में हम तुम्हे अकेला नही छोड़ सकते थे.” रामदास त्रिवेदी ने कहा.

“मेरा सर बहुत भारी है.” राज ने सर पर हाथ रख कर कहा.

“सर पर भी मारा था उन कमिनो ने. तुम्हे कुछ याद है कौन थे वो.”

राज सोच में पड़ गया. उसे कुछ धुन्द्ला धुन्द्ला याद आ रहा था.

“चलो छोड़ो वो सब. ज़्यादा ज़ोर मत डालो दिमाग़ पर. आ जाएगा सब कुछ याद खुद ही. हम तो उम्मीद छोड़ चुके थे बेटा. तुम्हे आज होश में देख कर जो खुशी मिली है उसे मैं शब्दो में नही कह सकता.” रामदास त्रिवेदी ने कहा.

राज को ये ध्यान भी नही था कि वो एक साल बाद होश में आया है. कोमा से उठे व्यक्ति के लिए समय और वक्त का ज्ञान असंभव है. लेकिन राज को इतना ध्यान ज़रूर था कि उसे सनडे को आलिया को लेने जाना है. उसे क्या पता था की जिस सनडे को उसे आलिया को लेने जाना था वो कब का बीत चुका है और जींदगी एक साल आगे बढ़ चुकी है.

"चाचा जी आज दिन क्या है"

"आज शनिवार है बेटा... क्यों."

"शनिवार... मुझे चलना होगा. मुझे कल हर हाल में दिल्ली पहुँचना है." राज धीरे से बड़बड़ाया और उठने की कोशिश करने लगा.

रामदास त्रिवेदी समझ नही पाया कि राज ने क्या कहा. उन्होने राज के कंधे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा क्या बोल रहे थे तुम. और अभी जल्दबाज़ी मत करो उठने की. एक साल बाद होश आया है तुम्हे. शरीर में जंग लग चुका है.थोड़ा वक्त दो अपने शरीर को."

ये सुनते ही राज भोंचका रह गया. उसका सर घूमने लगा. उसे विश्वास नही हो रहा था अपने कानो पर.

"एक साल बाद होश आया...ये कैसे हो सकता है." राज ये मानने के लिए बिल्कुल तैयार नही था.

"हां बेटा तुम कोमा में थे. एक साल बाद उठे हो तुम आज. भगवान का लाख लाख शुक्र है कि तुम्हे होश आ गया." रामदास त्रिवेदी ने कहा.

राज के दिमाग़ की हालत ऐसी नही थी को वो कुछ भी समझ पाए. उसे तो बस इतना पता था कि आज अगर शनिवार है तो कल उसे आलिया को लेने दिल्ली जाना है. वो अभी भी बीते कल में जी रहा था. मगर जींदगी उसके चारो और बहुत आगे निकल गयी थी.

राज इतना स्तब्ध था कि कुछ भी नही बोल पाया. उसकी नज़र जब दीवार पर टाँगे कॅलंडर पर गयी तो उसकी आँखे भर आई. २००३ का कॅलंडर था वो.

"चाचा जी कौन सा महीना है."

"२० एप्रिल २००३ है आज बेटा. तुम परेशान मत हो, सब ठीक है. तुम्हारी फॅक्टरी ठीक चल रही है. कोई चिंता की बात नही है."

राज की तो हालत खराब हो गयी. ऐसा लग रहा था जैसे की वो फिर से बेहोश हो जाएगा. "एक साल बीत गया. आलिया ने बहुत इंतेज़ार किया होगा मेरा. बहुत रोई होगी मेरे इंतेज़ार में वो. मैं क्यों नही जा पाया...क्यों....हे भगवान क्यों किया ऐसा हमारे साथ." राज चिंता में पड़ गया.

रामदास त्रिवेदी नही जानता था कि राज के मन में क्या चल रहा है. राज की हालत वैसे उठने लायक नही थी मगर फिर भी वो उठ गया किसी तरह बिस्तर से और बोला, “चाचा जी मुझे दिल्ली जाना है तुरंत.”

प्यार की तड़प और बेचैनी शायद ताक़त भर देती है इंसान के शरीर में. वरना राज नही उठ सकता था.

"क्या बात है बेटा, कुछ बताओ तो सही, तुम बहुत परेशान लग रहे हो."

"मुझे बहुत ही ज़रूरी काम है चाचा जी. मुझे हर हाल में दिल्ली जाना है." राज किसी को कुछ नही बताना चाहता था. बात ही कुछ ऐसी थी. वैसे भी अगर वो बताता भी तो शायद ही कोई समझ पाता उसकी बात को.

"राज डॉक्टर को फोन किया है मैने वो आता ही होगा. अगर डॉक्टर सफ़र की इज़ाज़त दे तो तुम बेशक जा सकते हो." रामदास त्रिवेदी ने कहा.

"डॉक्टर चाहे कुछ भी कहे मुझे जाना ही होगा." राज ने कहा.

"बेटा ऐसी क्या बात है जो की तुम तुरंत जाना चाहते हो." रघुनाथ ने पूछा.

तभी डॉक्टर आ गया.

"लो डॉक्टर साहिब आ गये." रघुनाथ ने कहा.

"बड़ी खुशी हुई मुझे आपको होश में देख कर मिस्टर राज." डॉक्टर ने कहा.

डॉक्टर राज का चेकअप करने के बाद बोला, "सब कुछ ठीक है अब. चिंता की कोई बात नही है. लेकिन अभी आराम कीजिए."

डॉक्टर के जाने के बाद राज ने जाने की बात नही की. उसे पता था कि चाचा जी उसे नही जाने देंगे. मगर उसे हर हाल में दिल्ली के लिए निकलना था. वो लेट गया वापिस बिस्तर पर चाचा जी को दीखाने के लिए. शाम घिर आई थी. राज रात को आराम से निकल सकता था. उसने अपना पर्स चेक किया. ज़्यादा पैसे नही थे उसमे. शुक्र है एटीएम कार्ड था उसमे.

रात को सबके सोने के बाद राज चुपचाप घर से निकल दिया. एक टॅक्सी पकड़ी उसने एयर पोर्ट के लिए. रास्ते में उसने एक एटीएम से पैसे निकलवाए. एक शोरुम से उसने नये कपड़े भी खरीद लिए, क्योंकि जिन कपड़ो में वो था वो मैले लग रहे थे. ना जाने क्यों उसकी नज़र एक जीन्स पर पड़ी और वो उसने खरीद ली. “आलिया को पसंद आएगी ये जीन्स.” शोरुम के ट्राइयल रूम में ही उसने कपड़े चेंज कर लिए. उसने खुद जीन्स ही खरीदी थी और खूब जच रही थी उस पर.

टिकट आसानी से मिल गयी उसे. सुबह ४ बजे की फ्लाइट थी. राज बोरडिंग पास लेकर सेक्यूरिटी चेक कराने के बाद बैठ गया बोरडिंग के इंतेज़ार में बैठा सोच रहा था.

“कैसी होगी मेरी जरीना, क्या बीती होगी उस पर उस सनडे को. काश मैं अपने गुस्से को शांत रख पाता तो ये नौबत ना आती. मगर मेरी जगह कोई भी होता तो ऐसा ही करता. मुझे माफ़ करदो जरीना, तुम्हारा गुनहगार हूँ मैं. आ रहा हूँ अब तुम्हारे पास. जैसे ही होश आया मुझे मैं निकल पड़ा हूँ तुम्हारे लिए. पता नही किस हाल में हो तुम. तुम ठीक तो हो ना आलिया ?” आँखे नम हो गयी राज की ये सब सोच कर.

“अगर मैं कोमा में नही होता तो बिल्कुल आता मैं आलिया चाहे पट्टीया बँधी होती चारो और मेरे ...पर आता में ज़रूर.” राज बहुत भावुक हो रहा था.

स्वाभिक भी था. जब प्यार राज और आलिया के प्यार जैसा हो तो भावुक हो जाना सावभाविक है.
 
बोरडिंग की अनाउन्स्मेंट हुई तो राज फ़ौरन उठ गया. ये अहसास कि वो अपनी आलिया के पास जा रहा है उसके चेहरे पर रोनक आ गई.

२ घंटे में वो मुंबई से दिल्ली पहुँच गया. मगर अभी सुबह के ६ ही बजे थे. “उसी होटेल में चलता हूँ जिसमे आलिया के साथ ठहरा था.”

आ गया राज टॅक्सी लेकर उसी होटेल में और रिक्वेस्ट करने पर रूम नो ११४ ही मिल गया उसे. सुबह के ७ बज चुके थे. फ्रेश हो कर ब्रेकफास्ट किया उसने. कब ९ बज गये पता ही नही चला. रूम से चेक आउट नही किया उसने. “एक बार यही वापिस आ कर उस दिन की लड़ाई को याद करेंगे. कितने तडपे थे हम दोनो एक दूसरे से लड़ कर.”

चल दिया राज आलिया से मिलने की उम्मीद दिल में लेकर उसकी मौसी के घर की ओर. दिल में एक अजीब सी तड़प और बेचैनी थी उसके जिसे शब्दो में नही कहा जा सकता. प्यार करने वाले इस तड़प को बखूबी समझ सकते हैं.

राज को याद था अड्रेस आलिया की मौसी का. ठीक १०:३० पर वो आलिया की मौसी के घर के बाहर था. दरवाजा खड़काया उसने. मौसी ने दरवाजा खोला.

“किस से मिलना है आपको.” मौसी ने कहा.

“मुझे आलिया से मिलना है, प्लीज़ बुला दीजिए उसे.”

मौसी तो हैरान रह गयी ये सुन कर, “क्या तुम राज हो?”

“जी हां मैं राज हूँ.”

मौसी के चेहरे पर डर के भाव उभर आए. उन्होने बाहर दायें..बायें झाँक कर देखा और राज को अंदर खींच लिया.

“किसी और से तो आलिया के बारे में नही पूछा तुमने.”

“नही मैं सीधा यहीं आया हूँ.” राज ने हैरानी में कहा.

“कितने दिनो बाद आए हो. कैसी मोहबत थी तुम्हारे दिल में आलिया के लिए. बहुत तड़पती थी वो तुम्हारे लिए और तुम आज आए हो, एक साल बाद.”

“आलिया कहा है, उसे बुला दीजिए प्लीज़.” राज गिड़गिडया

मौसी कुछ बोलने की बजाए खुद फूट-फूट कर रोने लगी. “वही तो पता नही चल रहा कि कहा है मेरी बच्ची.”

“आप ये क्या कह रही हैं.”

“सच कह रही हूँ बेटा, कुछ नही पता कि वो कहा है, कैसी है, किस हाल में है.”

राज तो सुन ही नही सका ये सब. बहुत बेचैन हो गया वो और बोला, “ये सब कैसे हुवा, क्या आप बताएँगी.”

“पहले तुम ये बताओ कि तुम्हे आज अचानक याद कैसे आ गयी आलिया की. चिट्ठी में तो तुमने उसे ले जाने को लिखा था. सारा दिन वो बाल्कनी में आ-आ कर पागलो की तरह तुम्हे ढूंड रही थी. क्यों किया तुमने ऐसा मेरी बच्ची के साथ.”

“मैं कोमा में था, नही आ सकता था..अगर होश होता मुझे तो कोई ताक़त मुझे नही रोक सकती थी यहा आने से.” राज मौसी को पूरी बात सुनाता है.

“अल्लाह रहम करे तुम दोनो की महोब्बत पर. मैं तो समझ ही नही पाई थी शुरू में तुम दोनो के प्यार को. ज़बरदस्ती शादी करवा रही थी आलिया की सलीम से.”

“सलीम…कौन सलीम.” राज ने हैरानी में पूछा.

“सलीम एक ऐसा बाहरूपिया है जिसे समझने में मैने बहुत बड़ी भूल की थी. सुनो तुम्हे सब बताती हूँ तभी तुम पूरी बात समझ पाओगे.”

“तुम्हारे बारे में पता चलने के बाद, मैने तो आलिया को एक कमरे में बंद कर दिया था. एक हफ्ते के अंदर शादी कर देना चाहती थी आलिया की सलीम के साथ. आलिया बहुत दरखास्त करती थी मुझसे की मेरी बात सुन लो एक बार. पर मैने उसकी एक नही सुनी. पर एक रात जब मैं उसे खाना देने गयी तो वो फूट-फूट कर रोने लगी और सुबक्ते हुवे बोली, “मौसी थोड़ा सा ज़हर दे दो मुझे. मैं जीना नही चाहती. मैं राज से बहुत प्यार करती हूँ. मैं उसके सिवा किसी और से शादी नही कर सकती. मेरा शरीर और मेरी रूह राज की है मौसी. अगर मेरे साथ ज़बरदस्ती की गयी तो मैं जान दे दूँगी अपनी. पर मैं किसी भी हालत में सलीम शी शादी नही करूँगी. ऐसा होने से पहले मैं अपनी जान दे दूँगी.”

मेरा तो दिल बैठ गया ये सब सुन कर. मैने दरवाजा खोला और आलिया के पास आकर उस से पूछा, “आख़िर क्या कारण है की तुम उस काफ़िर के लिए अपनी जान भी देने को तैयार हो.”

“प्यार करती हूँ मैं राज से. वो भी मुझे बहुत प्यार करता है. उसके कारण ही जींदा हूँ मैं वरना मर जाती कब की. उसी ने मुझे दंगो से बचाया और उसी ने मुझे जीने की चाह दी. वरना मैं कब की खुद को ख़तम कर चुकी होती.” आलिया ने सुबक्ते हुवे पूरी कहानी सुनाई मुझे

मैने कहा, “हाई रब्बा कितना बड़ा गुनाह करने जा रहे थे हम. मेरी बच्ची मुझे माफ़ करदे. नही होगी तुम्हारी शादी सलीम से. लेकिन ये बात अपने तक ही रखना. अकरम और उसके अब्बा को भनक भी नही लगनी चाहिए इस सब की.”

“मौसी मेरा वो खत मुझे वापिस दिलवा दो.”

“दिलवा दूँगी….सलीम अच्छा लड़का है वो दे देगा चुपचाप वो खत. पर एक बात बताओ तुम्हारा राज तो आया नही तुम्हे लेने. उसे तो आना चाहिए था अगर इतनी महोब्बत थी तुमसे.”

“ज़रूर कोई बात रही होगी मौसी वरना राज ज़रूर आता. बहुत प्यार करता है वो मुझे. मुझे जाने दो मौसी. अगर वो नही आ पाया तो मैं चली जाती हूँ. मैं नही रह सकती उसके बिना” आलिया रोने लगी थी ये बोलते हुवे

मुझे वो बिल्कुल दीवानी लग रही थी. मैने कहा, “तुम कैसे जाओगी अकेले और मैं साथ चल नही सकती. क्या करूँ.”

“मैं चली जाऊंगी मौसी…मुझे जाने दो…यहा मैं और रही तो घुट-घुट कर मर जाऊंगी.”

“टिकट भी तो करवाना पड़ेगा. मैं करती हूँ कुछ. कल या परसो का टिकट करवा देती हूँ. तुम चिंता मत करो. खाना खाओ चुपचाप मैं टिकट का इंतजाम करती हूँ.”

मैने २ दिन बाद का टिकट करवा दिया आलिया का किसी को बोल कर. सलीम कही गया हुवा था इसलिये उस से वो खत नही ले पाई मैं. पता नही कैसे उसे भनक लग गयी की आलिया गुजरात जा रही है और वो उस दिन सुबह आ धमका यहाँ जिस दिन आलिया को दोपहर को निकलना था.

“खाला ये सब क्या हो रहा है मेरी पीठ पीछे.”

“क्या हुवा सलीम मैं कुछ समझी नही.”

“हमें पता चला है कि आलिया आज गुजरात जा रही है. क्या मैं पूछ सकता हूँ कि मेरी होने वाली बीवी मुझसे पूछे बिना गुजरात क्यों जा रही है.”

मुझे बहुत गुस्सा आया उसके ऐसे बर्ताव पर, मैं बोली, “अभी वो बीवी हुई नही है तुम्हारी सलीम. और मैने ये शादी ना करने का फ़ैसला लिया है. आलिया को तुम पसंद नही हो.”

“हां-हां उसे तो वो काफ़िर पसंद है. ये हमारे प्यार की बेज़्जती है खाला और हम ये कतयि बर्दाश्त नही करेंगे.”

मैने पहली बार सलीम को ऐसे रूप में देखा था. वो मुझसे पूछे बिना ही सीधा आलिया के कमरे की तरफ चल दिया.

मैने उसे टोका, “सलीम रूको कहा जा रहे हो.”

“आप बीच में ना पड़े खाला ये मेरे और आलिया के बीच की बात है.”

“रूको यही…तुम होते कौन हो ऐसा बोलने वाले.” मैं चिल्लाई

पर सलीम पहुँच गया आलिया के पास और जब मैं वहा पहुँची तो उसने आलिया के बाल पकड़ रखे थे. दर्द से कराह रही थी मेरी बच्ची. सलीम उस वक्त एक शैतान लग रहा था मुझे.

मैने छुड़ाने की कोशिश की पर मुझे धक्का दे दिया सलीम ने. सर पर मेरे बहुत गहरी चोट लगी. ये तो आलिया ने हिम्मत दीखाई. उसके हाथ के करीब ही एक फुलदान रखी थी. उसने उठा कर वो सलीम के सर पर दे मारी. सलीम गिर गया नीचे. हम दोनो तुरंत बाहर आ गये और बाहर से कुण्डी लगा दी.

“आलिया तुम अभी निकल जाओ यहा से. अकरम और उसके अब्बा को पता चल गया तो और ज़्यादा मुसीबत हो जाएगी. तुझे तो पता ही है कि किस तरह से फरिदा को काट डाला था उन दोनो ने. इस से पहले कि बात और ज़्यादा बिगड़े तुम चली जाओ यहा से और अपनी जींदगी में खुश रहो.

“मेरा वो खत खाला.”

“खत से ज़्यादा ज़रूरी तुम्हारा यहा से निकलना है. ये सलीम दरवाजा तोड देगा जल्दी ही. तुम जाओ मेरी बच्ची और खुश रहो. बस यही दुवा कर सकती हूँ मैं तुम्हारे लिए. इस से ज़्यादा और कुछ नही कर सकती तुम्हारे लिए.”

मैने आलिया को पैसे भी दे दिए ताकि सफ़र में कोई दिक्कत ना हो.

मगर आलिया को निकले अभी १० मिनिट ही हुवे थे कि सलीम भी दरवाजा तोड कर बाहर आ गया.

“खाला आपने ये अच्छा नही किया. हम आपको कभी माफ़ नही करेंगे. मैं भी देखता हूँ कि कैसे पहुँचती है आलिया गुजरात. अगर वो मेरी नही हुई तो किसी की भी नही होगी.” सलीम निकल गया घर से अनाप सनाप बकते हुवे. उसका सही चरित्र तो मुझे उस दिन ही पता चला था. अच्छा हुवा जो मैने अपनी भूल सुधार ली.

मगर बेटा उस दिन के बाद ना आलिया का कुछ पता है ना सलीम का. उस दिन से आज तक कुछ खबर नही है आलिया की. ना ही सलीम का कुछ अता पता है.

“हे भगवान इतना कुछ हो गया आलिया के साथ और मैं वहा पड़ा हुवा सोता रहा. इस से अच्छा तो भगवान मुझे मार ही देते.”

“अल्लाह रहम करे तुम दोनो की महोब्बत पर. मुझसे जो बन पड़ा मैने किया. इस से ज़्यादा कुछ नही कर सकती थी मैं.”

मौसी की बाते सुन कर राज तो बिखर सा गया. समझ नही पा रहा था कि कैसे रीअॅक्ट करे. आलिया के साथ क्या बीती होगी ये सोच-सोच कर उसका दिमाग़ घूम रहा था.

“क्या आपने पोलीस में कंप्लेंट की आलिया की गुमशुदगी की?” राज ने भावुक आवाज़ में पूछा.

“की थी बेटा की थी. पर कुछ फायदा नही हुवा. मैं गुजरात भी गयी थी उसे ढूँडने. मुझे लगा था कि वो गुजरात में ही होगी तुम्हारे साथ. पर तुम्हारे घर तो ताला लगा था. हमारी जान-पहचान के जो लोग हैं वहा सब से मिली मैं. पता नही क्यों यही अंदेसा होता है कि कुछ अनहोनी हुई है उसके साथ.”

“नही…नही ऐसा नही हो सकता. मेरी आलिया को कुछ नही हो सकता. भगवान इतने निर्दयी नही हो सकते.” राज पागलो की तरह बोला. बात ही कुछ ऐसी थी.

“हां बेटा उम्मीद तो मैं भी यही रखती हूँ कि आलिया ठीक होगी ज़हा भी होगी.”

“बहुत…बहुत धन्यवाद आपका जो आपने इतना कुछ किया आलिया के लिए. क्या आप सलीम के घर का पता बता सकती हैं.” राज ने भावुक हो कर कहा.

“वहा मत जाना और यहा आस पास किसी से बात भी मत करना. तुम्हारी जान पे बन आएगी. चुपचाप यहा से जाओ बेटा. यहा तुम दोनो के प्यार को कोई नही समझ सकता.” मौसी ने कहा.

“फिर भी बता दीजिए, क्या पता कोई सुराग मिल जाए आलिया के बारे में.”

“ठीक है बेटा, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.” मौसी ने कहा.

आलिया की मौसी ने राज को सलीम का अड्रेस बता दिया और बोली, “संभाल कर रहना बेटा. तुमसे कोई नाता नही है..फिर भी पता नही क्यों तुम्हारी चिंता हो रही है.”

“यही इंसानियत है…आप नेक दिल हैं इसलिये.. मुझे आलिया की तलाश करना है. मुझे यकीन है कि वो जहा भी होगी सही-सलामत होगी. भगवान ऐसा अनर्थ नही कर सकते हमारे साथ. धन्यवाद आपका जो आपने हमारे लिए इतना कुछ किया.”

“काश कुछ और भी कर पाती बेटा. जाओ अपना ख्याल रखना.”

राज ने मौसी के पाँव छुवे और चल दिया भारी मन से वहा से. बहुत ही व्यथित था मन उसका.

राज मौसी के घर से सीधा सलीम के घर पहुँचा. उसने घर का दरवाजा खड़काया तो एक लड़की ने दरवाजा खोला. “क्या सलीम का घर यही है.”

“जी हां कहिए…क्या काम है.” लड़की ने कहा. लड़की का नाम हिना था. वो सलीम की छोटी बहन थी.

“देखो मैं घुमा फिरा कर बात नही करूँगा.”

“किसी ने कहा भी नही जनाब आपसे कि घुमा-फिरा कर कहें. क्या काम है जल्दी बतायें. बहुत काम रहते हैं मुझे” हिना ने कहा.

“मेरा नाम राज है. मैं आलिया की तलाश कर रहा हूँ. उसी सिलसिले में आया हूँ यहा.” राज ने कहा.

हिना को तो गुस्सा आ गया ये सुन के, “तो तुम हो राज.” हिना ने गला पकड़ लिया राज का. “बताओ मेरे भैया कहा हैं वरना जान से मार दूँगी.”

“कौन है हिना…किसके साथ लड़ रही हो.” अंदर से हिना की अम्मी ने आवाज़ दी.

“देखो…मुझे कुछ नही पता सलीम के बारे में. मगर अगर तुम्हे पता है तो बता दो वरना.” राज ने कहा.

“वरना क्या कर लोगे तुम…तुम्हे जिंदा नही छोड़ूँगी मैं. बताओ कहा हैं मेरे भाई.”

“छोडो मुझे…पागल हो गयी हो क्या…छोडो.” हिना ने राज के गले को कस के पकड़ रखा था. जब हिना नही मानी तो थक हार कर राज को उसे धक्का देना पड़ा और वो दूर ज़मीन पर जा कर गिरी. उसका सर ज़मीन से टकराने के कारण हल्का सा खून निकल आया उसके माथे से.

राज ये देख कर विचलित हो गया और आगे बढ़ कर हिना को उठाया, “माफ़ करना…मैं यहा लड़ाई करने नही आया हूँ. आलिया को ढूंड रहा हूँ मैं. अपनी आलिया को. मुझे नही पता सलीम कहा है. मैं आलिया की तलाश में यहा आया हूँ. वैसे तुम मुझे कैसे जानती हो.”

“भैया की पॅंट की जेब से मिला था खत तुम्हारा जो कि तुमने आलिया के लिए लिखा था. तुम दोनो का प्यार अच्छा लगा मगर तुम दोनो के प्यार के कारण मेरे भैया ला-पता हैं. मुझे तुम दोनो का ही हाथ लगता था इस सब में. इसलिये गुस्सा कर रही थी तुम्हारे उपर.”

“कल होश आया था मुझे. कोमा में था मैं एक साल से. आलिया को लेने नही आ सका था इस कारण. आज उसकी मौसी के घर गया तो पता चला कि वो गायब है एक साल से. पूछो मत क्या गुज़री है दिल पे. मुझे आलिया की मौसी ने बताया की सलीम भी उसी दिन से गायब है. वो गया भी था आलिया के पीछे ही. बस अपनी आलिया को ढूंड रहा हूँ मैं. उसी की तलाश मुझे यहा ले आई. माफ़ करना मुझे…मेरा कोई इरादा नही था आपको चोट पहुँचाने का.”

“आप भी मुझे माफ़ कर दीजिए. बहुत दुखी हूँ अपने भाई जान के कारण. इसलिये आप पर बरस पड़ी. जब से भैया लापता हुवे हैं, इस घर में मातम है. अम्मी बिस्तर पर पड़ी है…अब्बा भी गुजर गये ६ महीने पहले. सब कुछ बिखर गया हमारा. तभी गुस्सा था मुझे तुम दोनो से. मन होता था कि मिल जाओ तुम दोनो एक बार, तो वो हाल करूँ तुम दोनो का की भूल जाओगे सब कुछ.”

“मैं समझ सकता हूँ तुम्हारे ज़ज्बात.” राज ने भावुक हो कर कहा

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“हिना…”

“हिना…क्या कुछ भी ऐसा बता सकती हो जो कि मुझे काम आ सके.”

“मुझे खुद कुछ नही पता. जितना आपको पता है उतना ही मुझे पता है. तुम आलिया को ढूंड रहे हो.अगर मेरे भैया की भी कुछ खबर लगे तो हमें बता देना. बहुत मेहरबानी होगी आपकी.”

“बिल्कुल ये भी क्या कहने की बात है. चलता हूँ मैं….”

“चाय पी कर जायें आप तो अच्छा होगा.”

“नही ..नही तकल्लूफ की कोई ज़रूरत नही है.” राज ने कहा.

“जिस दिन वो खत मिला मुझे भैया की जेब से तो समझाना चाहती थी उन्हे. मुझे लग गया था कि उनकी और आलिया की शादी ठीक नही रहेगी. मगर उस दिन लौटे ही नही घर भैया. और आज तक उनका कुछ आता-पता नही है.” रो पड़ी हिना बोलते-बोलते.

“मैं समझ रहा हूँ तुम्हारे दुख को. मैं भी आलिया के लिए उतना ही परेशान हूँ, जितना की तुम सलीम के लिए.”

“तुम रूको मैं चाय लाती हूँ.”

“चाय की जगह अगर वो खत दे दो तो महरबानी होगी. आलिया के लिए है वो. बस उसी का हक़ है उस पर.”

“ला ही रही थी मैं. मैं उसे रख कर क्या करूँगी.” हिना ने कहा.

हिना चाय के साथ-साथ राज का लिखा हुवा खत भी ले आई.

“शुक्रिया आपका इस खत के लिए. चाय नही पी पाऊंगा. कुछ मन नही है अभी. प्लीज़ बुरा मत मान-ना.” राज ने कहा.

“मैं टूट पड़ी थी आप पर जैसे ही आप आए. अगर चाय पी कर जाएँगे तो दिल को सुकून मिलेगा की आपने मुझे माफ़ कर दिया.” हिना के कहा.

“ठीक है आपकी खातिर पी लेता हूँ.” राज ने कहा और चाय का कप उठा लिया ट्रे से.

राज ने चुपचाप चाय पी और हिना का शुक्रिया करके वहा से चल दिया. उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि आख़िर कहा गायब हो गये आलिया और सलीम.

राज पूरा दिन वही आस पास घूमता रहा. होटेल जाने का मन ही नही हुवा उसका.
 
शाम को वापिस आकर बिस्तर पर गिर गया वो. “हे भगवान ये कैसी सज़ा दी है आपने हमें. क्या हम दोनो के साथ ऐसा करना ज़रूरी था. एक बार क्या बीछड़े दुबारा मिलना नामुमकिन सा लग रहा है. अगर हमें प्यार के रिश्ते में बाँधने के बाद यही सब करना था तो इस से अच्छा यही होता की आप हमें मार डालते. अब कहा ढूंडू आलिया को. ” आँखे भर आई आँसुओ से ये बोलते हुवे राज की.

राज को वो दिन याद आ गया जब वो आलिया के साथ उसी रूम में रुका था. कितने खुश थे वो दोनो. वो प्यार और तकरार उसे बार-बार याद आ रहा था. आलिया का बिस्तर को हथियाना अनायास ही उसके होंटो पर मुस्कान बिखेर गया और और वो हंसते हंसते रो पड़ा, “कहा हो तुम जरीना…कहा हो. ”

राज उठा फ़ौरन और उसने अपने घर चलने का फ़ैसला किया. होटेल से चेक आउट करके वो सीधा दिल्ली के एयर पोर्ट पहुँचा और गुजरात के लिए टिकट खरीदी. रात १० बजे की फ्लाइट थी. वो १२ बजे पहुँच गया वापिस अपने शहर. बहुत ही दुखी मन से बढ़ रहा था अपने घर की तरफ. एयर पोर्ट से उसने एक टॅक्सी ले ली थी. जब टॅक्सी ने उसे उसके घर के बाहर छोडा तो वो भावुक हो गया, “कैसे जाऊ इस घर में, तुम्हारे बिना, जरीना…कहा हो तुम.”

राज टॅक्सी वाले को भाड़ा देना भी भूल गया. टॅक्सी से उतर कर घर की तरफ चल दिया.

“सर २०० रुपये हुवे.”

“ओह हां…मैं भूल गया सॉरी.” राज ने २०० रुपये निकाल कर टॅक्सी वाले को दे दिए.

“राज ने दरवाजा खोल कर लाइट जलाई तो हैरान रह गया. दरवाजे के पास ही बहुत सारे खत पड़े थे. उसने तुरंर एक खत उठाया…खत आलिया का था. राज की आँखे चमक उठी आलिया का खत देख कर. उसने सारे खत देखे उठा के. हर खत के पीछे एक ही नाम लिखा था, जरीना.

२२.०४.२००३

राज ने सारे खत डेट वाइज़ सेट किए और बैठ गया सोफे पर. घर में हर तरफ धूल मिट्टी बिखरी पड़ी थी. मगर उसका ध्यान सिर्फ़ आलिया की चिट्ठियो पर था. उसने सोफे को अच्छे से झाड़ कर खत रख दिए और पहला खत पढ़ना शुरू किया. खत ८ एप्रिल २००२ की डेट का था.

“ मेरे प्यारे राज,

तुम नही आ पाए दिल्ली मुझे लेने. क्या पूछ सकती हूँ कि क्यों नही आ पाए. चलो छोड़ो कोई लड़ाई नही करना चाहती तुमसे. एक लड़ाई के बाद ही ये हाल है दूसरी लड़ाई हुई तो पता नही क्या होगा. कोई बात नही मेरे राज. मैं खुद आ गयी हूँ गुजरात. पर ये क्या राज तुम्हारा कुछ अता-पता ही नही है. कहा हो तुम राज. क्या मुझसे कोई भूल हो गयी है जो की मुझे अकेला तड़पने को छोड गये हो.तुम्हे नही पता किन मुश्किलों का सामना करके पहुँची हूँ मैं गुजरात. और यहाँ कुछ समझ नही आ रहा कि कहाँ जाऊ. तुम्हारे सिवा कोई भी तो नही है मेरा. अब क्या करूँ राज कुछ समझ नही आ रहा.

परेशान हूँ तुम्हारे लिए. कुछ तो बात ज़रूर होगी वरना तुम मुझे लेने ज़रूर आते. मैं अकेली आई हूँ और बहुत मुश्किल से आई हूँ. तुम मिलोगे तो तुम्हे बताऊंगी. अभी तुम्हे ढूंड रही हूँ हर तरफ. पर तुम्हारा कुछ पता नही चल रहा. तुम्हारे घर के आस पास कुछ पूछने की हिम्मत नही हुई. सुना है कि माहोल अभी भी तनाव भरा है. मुझे डर लग रहा है राज.

मगर सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कहा जाऊ अब. तुम्हारे घर ताला लगा है. चाबी होती मेरे पास तो घुस जाती खोल कर चुपचाप. वो घर मेरा ही तो है ना राज. हमारा घर है..जहा हम एक महीना साथ रहे थे. वहीं तो हमारे दिलों में प्यार जागा था. हम दोनो का प्यारा घर है वो, प्यार की यादों में डूबा हुवा घर.

हमारे घर के पास जो मार्केट है वही गुजराती रेस्टोरेंट में बैठ कर लिख रही हूँ ये सब. समझ नही आ रहा कि कहा जाऊ अब. तुम अगर वापिस आओ तो मेरा खत पढ़ कर तुरंत अपने कॉलेज आ जाना. वही कॅंटीन में मिलूंगी मैं. इंतेज़ार करूँगी तुम्हारा प्लीज़ जल्दी आना…मुझे और कितना तडपाओगे तुम. खुद तो नही आए मुझे लेने अब मैं आ गयी हूँ तो पता नही कहा हो. तुम मिलो एक बार खूब लड़ूँगी तुमसे. पर इस बार लड़ाई करके दूर नही जाऊंगी तुमसे. बहुत भूल हुई थी मुझसे उस दिन. बिना सोचे समझे मौसी के घर आ गयी थी. मुझे होटेल जाना चाहिए था. उस एक ग़लती की वजह से आज तक हम मिल नही पाए. अब और पता नही कितना इंतेज़ार करना पड़ेगा. खत मिलते ही आ जाना कॉलेज देर मत करना बहुत बेचैन हूँ मैं तुमसे मिलने के लिए. इतनी बेचैन की तुम अंदाज़ा भी नही लगा सकते. जल्दी आना प्लीज़………..

तुम्हारे इंतेज़ार में

तुम्हारी जरीना.”

आलिया के लिखे हर बोल से राज के तन-बदन में हलचल हो रही थी. आँखे छलक उठती थी उसकी हर एक बोल को पढ़ कर. उस खत से एक बार फिर ये बात क्लियर हो रही थी उसे कि आलिया जितना प्यार कोई नही कर सकता उसे.

“ओह…जरीना, कितना अनमोल प्यार है तुम्हारा मेरे लिए. तुम्हारा गुनहगार बन गया हूँ. जिस वक्त तुम्हे मेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी मैं यहा नही था. मैं कितना बेकार फील कर रहा हूँ कह नही सकता. काश मैं होता यहा उस दिन तो अपनी पलके बिछा कर स्वागत करता तुम्हारा. बहुत बेबस महसूस कर रहा हूँ मैं ये सब पढ़ कर. देखता हूँ अगले खत में क्या है.” राज ने अपने आँसुओ को पोंछते हुवे कहा.

राज ने अगला खत उठाया. खत ९ एप्रिल २००२ को लिखा गया था.

“आलिया ने खुद यहा आकर ये खत डाले हैं. पोस्ट ऑफीस की कोई स्टॅम्प या टिकट नही है. देखता हूँ इसमे क्या लिखा है आलिया ने.” राज ने कहा और पढ़ना शुरू किया.

“ मेरे प्यारे राज,

आख़िर बात क्या है राज. कुछ समझ में नही आ रहा. तुम ठीक तो हो ना. कही से भी कोई खबर नही मिल रही तुम्हारी. सारा दिन मैं बैठी रही कॉलेज की कॅंटीन में तुम्हारे इंतेज़ार में. आख़िर क्यों तडपा रहे हो मुझे इतना तुम. तुम्हारे कुछ दोस्तो से भी बात की मैने. पर किसी को कुछ नही पता तुम्हारे बारे में.

तुम कितने निर्दयी निकले राज. अगर कही जाना ही था तुम्हे तो कम से कम कोई मेसेज तो छोड़ जाते मेरे लिए. मैने लिखा था ना तुम्हे कि अगर तुम नही आए मुझे लेने तो मैं खुद आ जाऊंगी. आ गयी हूँ मैं खुद ही. पर अब आ कर सर छुपाने के लिए जगह को तरस रही हूँ. कॉलेज में हॉस्टेल भी नही मिल रहा. मेरे पास कोई भी सबूत नही है कि मैं इस कॉलेज की स्टूडेंट हूँ. सब कुछ तो जल चुका है दंगो में. अब कैसे समझाऊ इन लोगो को. एक दिन के लिए भी कोई कमरा देने को तैयार नही है. अब कहा जाऊ राज कुछ समझ नही आ रहा. मुझे बहुत डर लग रहा है. कल भी कॉलेज में ही मिलूंगी तुम्हे यही कॅंटीन में. देखती हूँ कुछ आज की कहा रुकु. अजीब मुसीबत में डाल दिया है तुमने मुझे. मन तो कर रहा है की ताला तोड़ कर घुस जाऊ मैं घर में. मेरा भी हक़ है उस पर. पर वहा माहोल ठीक नही है और लोगो ने देख लिया तो मुसीबत हो जाएगी. वैसे भी तुम्हारे बिना मुझे वहा डर ही लगेगा.

वैसे कितनी अजीब बात हो रही है. कभी मैं तुम्हे देखना भी पसंद नही करती थी इस कॉलेज में और आज आँखे बस तुम्हे ही खोज रही हैं. और इसी बात का फायदा उठा कर तुम मुझे सता रहे हो. मज़ाक कर रही हूँ. मज़ाक में दर्द भी है थोड़ा सा. परेशान जो हूँ. मुझे पता है ज़रूर कोई मजबूरी होगी तुम्हारी राज वरना तुम ज़रूर आते. ये चिट्ठी भी डाल दूँगी तुम्हारे घर में. डर लगता है वहा जाते हुवे. अपने जले हुवे घर को देख कर अम्मी, अब्बा और फातिमा की याद आती है बहुत. डर लगता है बहुत जब अपने घर को देखती हूँ. पर कोई चारा भी तो नही. ये खत खुद ही डालना होगा तुम्हारे घर में. जहा भी हो जल्दी आ जाओ और देखो की मैं किस हाल में हूँ.

तुम्हारी जरीना.”

राज फूट पड़ा इस बार. रोकना मुश्किल हो रहा था, “क्यों मेरे भगवान क्यों किया ऐसा हमारे साथ. प्यार करने वालो के साथ ऐसा हरगिज़ नही होना चाहिए. मैं क्यों नही था यहा…..देखता हूँ आगे क्या किया आलिया ने.”

राज ने तीसरा खत उठाया. “१६ एप्रिल २००२, पूरे एक हफ्ते बाद लिखी आलिया ने ये.” राज हैरत में पड़ गया कि क्या हुवा होगा आलिया के साथ इस एक हफ्ते के दौरान. राज ने पढ़ना शुरू किया.

“ मेरे प्यारे राज,

मिल गया है आसरा मुझे चिंता की कोई बात नही है. चिंता की बात बस ये है कि तुम्हारा अभी भी कुछ अता-पता नही है. रोज एक बार ज़रूर जाती हूँ घर तुम्हारे. वही मनहूस ताला टंगा रहता है. तुम्हारी फॅक्टरी भी गयी थी मैं तुम्हे ढूँडने. बड़ी मुश्किल से पता किया था अड्रेस उसका. मगर वहा अच्छा व्यवहार नही हुवा मेरे साथ. कुछ लोग मुझे छेड़ने लगे वहा. मैने एक व्यक्ति से पूछा भी तुम्हारे बारे में मगर उसे भी कुछ नही पता था. ज़्यादा देर नही रुक पाई वहा. बहुत ही बेकार माहोल है राज वहा. कुछ करना इस बारे में तुम. जिस तरह से लोग घूर रहे थे मुझे, मुझे बहुत ही डर लग रहा था. एक उम्मीद ले कर गयी थी फॅक्टरी तुम्हारी और भयबीत हो कर लौटी वहा से.

मैं अब एक छोटे से स्कूल में पढ़ा रही हूँ. उस दिन कॉलेज से तुम्हारे घर आई शाम को तो अब्दुल चाचा मिल गये मुझे. तुमने भी देखा होगा उन्हे कयि बार हमारे घर आते-जाते हुवे. उन्होने भी अपना सब कुछ खो दिया दंगो में. उनकी दो बेटियों की इज़्ज़त लूटी गयी उन्ही के सामने और उनके बेटे का सर काट दिया गया उन्ही के सामने. उन्हे भी मार डालते वो लोग शुकर है पोलीस आ गयी थी वक्त पर.

अब्दुल चाचा एक स्कूल चला रहे हैं जिसमे की अनाथ बच्चो को शिक्षा दी जा रही है. बहुत बच्चे अनाथ किए इन दंगो ने राज. कोई ५० बच्चे हैं स्कूल में. मुझे देख कर अब्दुल चाचा ने मुझे रिक्वेस्ट की, कि मैं उनके साथ जुड़ जाऊ क्योंकि उन्हे टीचर की ज़रूरत है. मेरे लिए इस से अच्छी बात नही हो सकती थी. स्कूल में ही रहने को कमरा मिल गया. और एक नेक काम करने का मौका दिया अल्लाह ने मुझे. बहुत अच्छा लगा मुझे इस स्कूल से जुड़ कर. मगर अब एक ही चिंता है. तुम पता नही कहा हो, किस हाल में हो. समझ में नही आ रहा कि किस से पता करूँ. जो भी कर सकती थी सब किया मैने, मगर कही भी कुछ पता नही चल रहा तुम्हारे बारे में. अब बहुत ही ज़्यादा चिंता हो रही है तुम्हारी. अगर घर आओ तो सीधे स्कूल आ जाना. मैं वही मिलूंगी. स्कूल बिल्कुल बस स्टॅंड के पास जो मस्ज़िद है उसके पास है. किसी से भी पूछ लेना की अब्दुल चाचा का स्कूल कौन सा है…सब बता देंगे.

कॉलेज छोड़ दिया है मैने राज. तुम्हारे बिना वहा जाकर करूँगी भी क्या. तुम आओगे तो फिर से जॉईन कर लेंगे हम दोनो. मगर अकेले नही जाऊंगी वहा. अब्दुल चाचा कहते रहते हैं कि कॉलेज जाओ…मगर मैं हरगिज़ नही जाऊंगी. राज अब इंतेहा हो चुकी है….प्लीज़ आ जाओ अब और कितना तडपाओगे तुम. मर ही ना जाऊ कही मैं तुम्हारे इंतेज़ार में. प्लीज़…………….

तुम्हारी जरीना.”

राज ने आखरी खत छोड कर सारे खत पढ़ लिए. हर खत में आलिया ने अपनी तड़प और बेचैनी को बखूबी लिख रखा था. वो डीटेल में स्कूल की आक्टिविटीज भी लिख रही थी. फाइनली राज ने आखरी खत उठाया. वो १.०४.२००३ को लिखा हुवा था. राज ने वो भी पढ़ना शुरू किया.

“ मेरे प्यारे राज,

धीरे-धीरे एक साल बीत गया और तुम्हारा अभी भी कुछ अता-पता नही है. सच कह रही हूँ बहुत चिंता हो रही है तुम्हारी. लेकिन मैं क्या करूँ कुछ समझ में नही आ रहा. रोज की तरह आज भी गयी थी घर. वही ताला टंगा मिला आज भी. उस ताले ने मेरी जींदगी बर्बाद कर दी है राज. एक साल से देख रही हूँ उस ताले को. रोज खूब भला बुरा कह कर आती हूँ उस ताले को.

वैसे बच्चो को खूब शिक्षा देती हूँ मैं कि उम्मीद का दामन नही छोडना चाहिए, मगर खुद मैं बीखर चुकी हूँ. कोई भी उम्मीद नही है जींदगी में. अगर जिंदा हूँ तो इन बच्चो की खातिर. मन लगाए रखते हैं मेरा ये. इन्हें पढ़ाने में वक्त बीत जाता है.

इतने खत लिख दिए हैं तुम्हे, जब तुम आओगे तो पढ़ते पढ़ते थक जाओगे. हां मुझे हल्की सी उम्मीद है अभी भी कि तुम ज़रूर आओगे. ये लिखते वक्त आँसू गिर रहे हैं इस काग़ज़ पर. पढ़ते वक्त तुम्हे अक्षर कुछ धुन्द्ले लगेंगे. अपने आँसू भी भेज रही हूँ इस खत के साथ उन्हे भी पढ़ना और अंदाज़ा लगाना कि किस कदर तडपी हूँ मैं तुम्हारे लिए. बस और नही लिख पाउंगी अब.

तुम्हारी जरीना”

राज बेचैन हो गया अब. आँसुओ की बरसात हो रही थी उसकी आँखो से. आँसू गम और खुशी दोनो रंगो में डूबे हुवे थे. गम था इस बात का कि, बहुत तडपी आलिया उसके लिए और खुशी थी इस बात की, कि अब वो अपनी आलिया से मिलने जा रहा था. उनके प्यार का इंतेहाँ अब ख़तम होने जा रहा था.

खत पढ़ते-पढ़ते आधी रात हो गयी थी. वो बेचैन हो रहा था अब्दुल चाचा के स्कूल जाने के लिए. और वो बस बिना सोचे समझे निकलने ही वाला था कि उसकी निगाह घर की हालत पर पड़ी, “शरम करो राज, देखो कितना गंदा हो रखा है घर. चारो तरफ धूल…मिट्टी बिखरी पड़ी है. आलिया देखेगी तो क्या कहेगी. पहले उसके स्वागत में ये घर तो चमका लो…फिर ले कर आना आलिया को.”

बस फिर क्या था राज पागलो की तरह जुट गया घर की सफाई में. घर के हर कोने को चमकाने में लग गया वो. रात के ३ बजे लगा था सफाई में और सफाई करते-करते सुबह के ७ बज गये. एक पल को भी नही रुका राज. बस लगा रहा घर को चमकाने में. आख़िर उसकी जान से प्यारी आलिया जो आ रही थी.

“मैं आ रहा हूँ आलिया आ रहा हूँ मैं. बस अब हम और नही तड़पेंगे एक दूसरे के लिए. बहुत कुछ सहा तुमने इस प्यार के लिए. मेरे लिए तो तुम ही भगवान बन गयी हो. जब प्यार ही भगवान होता है तो तुम्हे ये उपाधि दी जा सकती है क्योंकि इतना गहरा प्यार शायद ही कोई किसी को करता होगा. धन्य हो गया हूँ मैं तुम्हे अपनी ज़ींदगी में पाकर. मैं बस नहा लूँ…कही तुम कहो की बदबू आ रही है मुझसे. बस कुछ ही देर में हम मिलने वाले हैं, बहुत लंबे इंतेज़ार के बाद. मैं आ रहा हूँ आलिया बस आ रहा हूँ………
 
२२.०४.२००३. ९:०० सुबह

अपनी प्रेमिका से मिलने के अहसास में डूब गया था राज. पाँव नही टिक रहे थे उसके ज़मीन पर. तन-बदन में एक अजीब सी सेन्सेशन हो रही थी. मीठा मीठा सा अहसास हर वक्त उसे घेरे हुवे था. तड़प और बेचैनी भी उतनी ही थी.ये अहसास हर उस इंसान ने महसूस किए होंगे जिसने कभी प्यार किया होगा. अपने प्यार से मिलने की तड़प हर प्रेमी के अंदर कुछ ऐसा ही अहसास जगाती है.

राज नहा कर बाहर आया तो उसे समझ नही आया की क्या पहने. बेचैनी कुछ इस कदर हावी थी उसके उपर की कुछ डिसाइड करना मुश्किल हो रहा था. उसने आल्मिरा से ब्लू जीन्स निकाली और पहन ली. उसके उपर उसने वाइट शर्ट पहन ली.

“एक बार खूब तारीफ़ की थी आलिया ने इस कॉंबिनेशन की. मैं नहा कर ये कपड़े पहन कर निकला था तो वो तुरंत बोली थी, ‘अरे वाह राज, ब्लू जीन्स और वाइट शर्ट कितनी प्यारी लग रही है तुम्हारे उपर.’

राज ने खुद को शीसे में देखा और बोला, “तुम दूर से देखते ही पहचान जाओगी मुझे इन कपड़ो में. आ रहा हूँ जरीना…अब और दूर नही रहेंगे हम.”

बालों को खूब ध्यान से सँवारा राज ने. चेहरे पर अच्छे से क्रीम रगड़ ली. कोई कमी नही छोड़ना चाहता था. ये भी प्यार ही है. आप जिसे प्यार करते हैं उसके सामने सुंदर दीखने की चाहत सब में होती है.

“काश बाइक होती तो रात को भी आ सकता था तुम्हारे पास जरीना. बाइक उस दिन फॅक्टरी ही छोड आया था. चलो कोई बात नही जरीना. घर की सफाई कर दी है तुम्हारे स्वागत में. अपना दिल बिछा दिया है घर के दरवाजे पर. जब तुम प्रवेश करोगी यहा तो घर का कोना कोना महक उठेगा. तुम्हे नही पता जरीना. घर के ताले के कारण तुम ही नही तडपी…बल्कि ये घर भी तडपा तुम्हारे लिए. जब मैं इस घर में घुसा तो इस घर की तड़प महसूस की तुम्हारे लिए. बिल्कुल आलिया तुम्हारा ही तो घर है ये. हमारा घर है जहा हर कोने में हमारा प्यार बसा है. और सुकून की बात ये है की यहा अब सुख शांति है. हम दोनो चैन से रहेंगे इस घर में.”

राज होंटो पर मुस्कान लिए घर से बाहर निकला. वो ऐसी मुस्कान थी जिस में प्यार ही प्यार बसा था. उसके घर के बिल्कुल सामने कमलेश मोदी रहते थे. उन्होने राज को देख लिया. तुरंत भाग कर आए उसके पास और बोले, “अरे राज बेटा, कहा थे तुम. सब कुशल मंगल तो है. दीखाई नही दीए काफ़ी दिन से.”

“क्या आपको नही पता कि मुझ पर हमला हुवा था. मेरे घर के बाहर ही.”

“नही बेटा मुझे तो कुछ नही पता. कब हुवा ये सब.”

“एक साल पहले हुवा था.” राज ने मोदी को पूरी बात बताई. मगर राज ने जानबूझ कर ये नही बताया कि झगड़ा आलिया के कारण हुवा था.

“ओह बहुत दुख हुवा जान कर. दरअसल उन दिनो माहोल बहुत खराब था बेटा. शाम ढलते ही घरो में घुस जाते थे हम सभी. तभी शायद किसी को पता नही चला तुम्हारे बारे में. शुक्र है कि अब सब सुख शांति है यहा. बहुत बुरा वक्त देखा है हम सभी ने यहा वडोदरा में.”

“मुझे जल्दी कही जाना है अंकल बाद में मिलते हैं.” राज ने कहा.

“हां बिल्कुल बेटा. अच्छा लगा तुम्हे इतने दिनो बाद देख कर. मिलते हैं तस्सली से तुम हो आओ. हां पर एक बात बतानी थी तुम्हे.”

“हां बोलिए.”

“अब्दुल खान की जो बेटी थी जरीना…उसे अक्सर देखा मैने तुम्हारे घर में कुछ डालते हुवे. वैसे अच्छा लगा उसे जींदा देख कर. उसका पूरा परिवार तो ख़तम हो गया था. बस वही बची है. कुछ दिन पहले मैने उस से बात करनी चाही मगर वो मेरे आवाज़ देने पर भाग गयी.”

“ह्म्म वो डर गयी होगी अंकल…”

“वैसे तुम दोनो परिवारों में तो बिल्कुल नही बनती थी. उसका तुम्हारे घर में कुछ डालना मुझे अजीब लगा.”

“बाद में बात करूँगा अंकल. अभी बहुत जल्दी में हूँ.” राज एक मिनिट भी रुकने को तैयार नही था. तड़प ही कुछ ऐसी थी.

राज ने गली से बाहर आ कर एक ऑटो पकड़ा और चल दिया अब्दुल चाचा के स्कूल की तरफ. जैसे-जैसे स्कूल नज़दीक आ रहा था वैसे-वैसे उसकी बेचैनी बढ़ रही थी. “आखरी खत १.०४.२००३ को लिखा था उसने. १ से लेकर २१ तक कोई खत नही डाला उसने. नॉर्मली उसने हर हफ्ते एक खत डाला है. मेरी आलिया ठीक तो है ना भगवान. अब और कोई प्रॉब्लेम नही चाहिए मुझे अपनी जींदगी में. मुझे पता है आप इतने निर्दयी नही हो सकते. मगर फिर भी ना जाने क्यों दिल घबरा रहा है” अनायास ही ख्याल आ गया था राज को इन बातों का. दिल घबराने लगा था उसका.

ऑटो वाले ने उतार दिया राज को मस्ज़िद के बाहर. “कितने पैसे हुवे भैया.”

“५० रुपये.”

राज ने पर्स निकाल कर उसे ५० रुपये पकड़ाए और उस से पूछा, “क्या आपको अब्दुल चाचा के स्कूल का पता है कि वो कहा हैं.”

“मुझे ऐसे किसी स्कूल का नही पता. किसी और से पूछ लीजिए.” ऑटो वाले ने कहा और चला गया वहा से.

राज ने चारो तरफ नज़र दौड़ाई. कोई स्कूल नज़र नही आया उसे वहा. ना कोई स्कूल का बोर्ड था ना ही बच्चो का शोर. वह मस्ज़िद के पास गया और उसके बाहर खड़े एक व्यक्ति से पूछा, “भाई ये अब्दुल चाचा का स्कूल कहा है.”

“स्कूल तो मस्ज़िद के पिछली तरफ है. मगर अभी वो बंद है.”

“बंद है, क्यों बंद है भाई.”

“मुझे नही पता इस बारे में.” वो आदमी बोल कर वहा से चला गया.

राज को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. वो तुरंत गया मस्ज़िद के पीछे. एक मैदान था वहा जिसके चारो तरफ चार दीवारी थी. ८ कमरे बने थे वहा. मगर सभी पर ताले टँगे थे एक को छोड कर.”

राज तुरंत मुख्य द्वार खोल कर अंदर आया. कोई भी दीखाई नही दे रहा था. एक कमरा जो खुला था वो तुरंत उसकी और बढ़ा. अंदर एक कुर्सी पर एक बुजुर्ग बैठा था. उसके सामने एक टेबल रखी हुई थी.

“एकस्क्युज मी क्या ये अब्दुल चाचा का ही स्कूल है.”

“हां बिल्कुल वही स्कूल है. क्या काम है तुम्हे बेटा.”

“मुझे आलिया से मिलना है…क्या आप बता सकते हैं कि वो कहा है.”

वो बुजुर्ग तुरंत अपनी कुर्सी से उठा और बोला, “कही तुम राज तो नही”

“जी हां मैं राज ही हूँ. आप कैसे जानते हैं मुझे.”

उस बुजुर्ग ने तुरंत आगे बढ़ कर राज को गले लगा लिया और बोला, “अल्लाह का शुक्र है कि तुम आ गये. बेटा बहुत खुशी हुई तुम्हे देख कर. मैं ही हूँ अब्दुल चाचा और मैं ही चला रहा हूँ ये स्कूल.”

“आलिया कहा हैं…मुझे प्लीज़ उस से मिलवा दीजिए.”

“५ दिन इंतेज़ार करना होगा तुम्हे बेटा. आलिया मसूरी गयी हुई है बच्चो को लेकर. २० दिन का टूर बनाया था बच्चो के लिए.”

“मसूरी!.” राज उदास हो गया. मगर मन ही मन खुश था कि सब कुशल मंगल है.

“हां बेटा…५ दिन बाद लौट आएगी वहा से. वो तो जाना ही नही चाहती थी. बड़ी मुश्किल से भेजा उसे.”

“आपने बताया नही कि आप कैसे जानते हैं मुझे.”

“आलिया तो गुमसुम रहती थी बेटा. बताती नही थी कुछ. मगर रोज निकल जाती थी स्कूल से ये कह कर कि कुछ काम है. चिंता रहती थी मुझे उसकी. एक दिन गया उसके पीछे चुपचाप. गया तो पाया कि वो तुम्हारे घर जाती है चिट्ठी डालने. बहुत पूछने पर बताया उसने. बता कर बोली कि नही बताना चाहती थी क्योंकि कोई समझेगा नही. बेटा तुम दोनो के बारे में सुन कर यही लगा कि इंसानियत की मिसाल हो तुम दोनो. जो तुमने आलिया के लिए किया वो कोई आम इंसान नही कर सकता.”

“मसूरी में कहा रुके हैं वो लोग.” राज ने पूछा

“क्या तुम जाना चाहते हो वहा.”

“जी हां जाए बिना कोई चारा नही है. हम दोनो कुछ ऐसी हालत में हैं कि मिले बिना गुज़ारा नही है. आपको शायद ये पागल पन लगेगा मगर हमारी हालत ही कुछ ऐसी हो रही है.”

“समझ सकता हूँ बेटा. आलिया नही बताती मुझे तो कभी नही समझ पाता.”

अब्दुल चाचा ने उस जगह का अड्रेस दे दिया जहा आलिया बच्चो के साथ रुकी हुई थी.

“अच्छा मैं चलता हूँ चाचा जी. आपने मेरी अनुपस्थिति में आलिया के लिए जो भी किया उसके लिए बहुत आभारी हूँ.”

“कैसी बात करते हो बेटा. मैने कुछ नही किया. बल्कि उसके आने से स्कूल चलाने में बहुत मदद मिली मुझे. बच्चे उसके कंट्रोल में रहते हैं. बस उसी की सुनते हैं. बिल्कुल एक आइडीयल टीचर बन गयी है जरीना. बहुत मदद मिली मुझे उसके आने से.”

“ठीक है चाचा जी मैं चलता हूँ.”

“मसूरी जाओगे तुम अब.”

“जी हां और कोई चारा नही है.” राज ने कहा और वहा से चल दिया.

राज स्कूल से घर आया और एक बॅग पॅक किया. उसमें उसने कुछ कपड़े रख लिए. ज़रूरत का और समान भी रख लिया और निकल दिया वडोदरा एयर पोर्ट के लिए. दिल्ली की फ्लाइट ली उसने. शाम के ५ बजे दिल्ली पहुँच गया वो. दिल्ली से उसने मसूरी के लिए टॅक्सी की. रात के २ बजे पहुँचा वो मसूरी. उस टाइम आलिया के पास जाने का कोई मतलब नही था. और रात को अड्रेस ढूँडने में भी दिक्कत थी. टॅक्सी वाले ने साफ बोल दिया था कि वो लाइब्ररी पॉइंट पर छोड देगा. मसूरी का ज़्यादा कुछ नही पता था ड्राइवर को. लाइब्ररी पॉइंट पर बहुत सारे होटेल्स थे. रुक गया राज एक होटेल में.

बहुत थक गया था लंबे सफ़र से राज. कोमा से उठने के बाद वो बस इधर उधर भाग दौड़ में लगा था. आराम किया ही कहा था उसने. बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ गयी राज को.

“तुम आ गये राज…कितनी देर कर दी तुमने. मैं अगर मर जाती तो” आलिया मुस्कुराई.

“जरीना! ऐसा मत कहो” उठा गया राज सपने से. उसने लाइट जलाई और देखा की सुबह के ५ बज रहे हैं.

“पहली बार सपने में आई तुम जरीना. धन्य हो गया मैं अपने भगवान को सपने में देख कर. अब हक़ीक़त में देखने का भी वक्त आ गया है जरीना. आज हम हर हाल में मिल कर रहेंगे.” राज फ़ौरन उठ गया बिस्तर से.

नहा धो कर सादे ६ बजे तक तैयार भी हो गया और निकल पड़ा होटेल से. उसने एक टॅक्सी पकड़ी लाइब्ररी पॉइंट से और निकल पड़ा केंप्टी फॉल्स की तरफ. उसके नज़दीक ही एक कस्बे में रुकी थी जरीना.

७ बजे पहुँच गया वो उस जगह पर. बच्चो के शोर से उसके दिल को तस्सल्ली मिली की वो सही जगह पहुँच गया है. बच्चो की आवाज़ गूँज रही थी हर तरफ. आवाज़ की तरफ उसके पाँव खींचे चले गये. एक बहुत बड़ा घर था, जिसके बाहर बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे.

एक बुजुर्ग बैठा था कुर्सी पर और २ लड़कियाँ बच्चो को संभालने की कोशिश कर रही थी. एक का नाम जहारा था और दूसरी का नाम मलाला था. बच्चे अपने स्वाभाव के अनुसार इधर उधर भाग रहे थे. राज को आलिया कही नज़र नही आ रही थी. राज हर तरफ घूर-घूर कर देख रहा था.

जहारा की नज़र राज पर पड़ी तो वो उसके पास आई “क्या काम है आपको. कब से देख रही हूँ घूर-घूर कर देखे जा रहे हैं. बच्चो को अगवा करने का इरादा है क्या आपका.”

“नही आप मुझे ग़लत समझ रहे हैं. मैं दरअसल आलिया को ढूंड रहा था. कहा है वो”

“आलिया को ढूंड रहे थे ? क्यों ढूंड रहे थे आलिया को. क्या काम है उस से.”

“मेरा नाम राज है और मैं गुजरात से आया हूँ. प्लीज़ जल्दी से उसे बुला दीजिए”

“तुम राज हो?”

“हां क्यों? आपको कोई शक है.”

“नही…हैरान हूँ आपको देख कर. आलिया को बहुत तडपाया आपने.”

“क्या आप आलिया को बुला सकती हैं.”

“धीरे बोलो. यहा किसी और को आलिया और तुम्हारे बारे में नही पता. मंदिर गयी है वो आज. कुछ दिनो से सोच रही थी जाने को. कह रही थी कि मंदिर में भी फरियाद लगा दू राज के लिए. क्या पता वो आ जाए वापिस मेरे पास.”

“कहा है ये मंदिर.”

“पास में ही है. आप शायद दूसरे रास्ते से आए हैं वरना आलिया रास्ते में ही मिल जाती आपको. बस अभी थोड़ी देर पहले ही निकली थी जरीना. थोड़ी देर पहले आते तो मिल ही जाती आपको.”

“जहारा कौन है ये” उनको उस बुजुर्ग की आवाज़ आई जो कुर्सी पर बैठा था. उसका नाम सईद था.

“जाओ तुम अब. आलिया से बाहर मंदिर में ही मिल लो. सईद चाचा को पता चला तो तूफान मचा देंगे.”

“थॅंक यू वेरी मच. मैं निकलता हूँ.”

राज मंदिर की तरफ दौड़ा. रास्ता समझ नही आ रहा था उसे. लोगो से पूछता-पूछता पहुँच ही गया मंदिर. भोले नाथ का मंदिर था वो. जब राज वहा पहुँचा तो आलिया सीढ़ियाँ चढ़ रही थी मंदिर की. राज देखते ही झूम उठा आलिया को. इस कदर खुश हुवा कि एक आदमी से टकरा गया. “ओह सॉरी भाई…माफ़ करना.”

“क्या माफ़ करना देख कर चला करो यार, मेरा प्रसाद गिरा दिया.”

“माफ़ करना भाई…मगर प्रसाद बेकार नही जाएगा. चींटियाँ खा लेंगी उसे और इसका पुन्य आपको ही मिलेगा.”

“हां ठीक है ठीक है ज़्यादा लेक्चर मत दो मुझे.”

वो आदमी बड़बड़ाता हुवा आगे बढ़ गया. राज फ़ौरन मंदिर की सीढ़ियों की तरफ दौड़ा. सीढ़ियाँ चढ़ कर वो उपर आया तो देखा कि आलिया कुछ असमंजस में है. वो इधर उधर देख रही थी कि क्या करे. पहली बार मंदिर आई थी वो. कैसे जान सकती थी कि मंदिर में जा कर करना क्या क्या होता है. एक लेडी ने जब मंदिर की घंटी बजाई तो उसने भी उसकी देखा देखी मंदिर की घंटी बजा दी.

राज ये सब देख कर पीछे ही रुक गया. आलिया को देख कर मध्यम-मध्यम मुस्कुरा रहा था. आलिया बस उस लेडी को देख कर सब कर रही थी जिसको देख कर उसने घंटी बजाई थी. जब वो लेडी भगवान के आगे हाथ जोड़ कर आँख मीच कर खड़ी हुई तो आलिया भी ये देख कर आँख मीच कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी. राज ये सब देख कर लोटपोट हो रहा था. मंदिर का पुजारी भी आलिया को देख कर मुस्कुरा रहा था. समझ गया था वो भी कि ये लड़की पहली बार मंदिर आई है.

मगर जब आलिया ने आँखे मीची तो उसे पता था कि क्या करना है. उसने मन ही मन में कहा, “हे भगवान. मुझे नहीं पता की आपकी पूजा कैसे की जाती है. कुछ भी नही जानती हूँ आपके बारे में. कुछ नही पता कि कैसे दुवा करूँ राज के लिए आपके सामने. यहा बस एक फरियाद ले कर आई हूँ. अपने अल्लाह को भी ये फरियाद कर चुकी हूँ पर अभी तक कुछ हासिल नही हुवा. सोचा कि आपके आगे भी फरियाद कर दूं. आप तो राज के भगवान हो. वो आपको मानता है. बहुत प्यार करती हूँ मैं राज से. वो भी मुझे बहुत प्यार करता है. एक छोटी सी लड़ाई हुई थी हमारी और उसके बाद हम मिल नही पाए आज तक. राज का कुछ पता भी नही चल रहा है कि वो है कहा. अगर आप उसके बारे में जानते हैं तो प्लीज़ उसे भेज दीजिए मेरे पास. मेरे लिए राज के बिना जीना मुश्किल है. सच कह रही हूँ भगवान अगर राज नही आया तो मैं मर जाऊंगी. और इल्ज़ाम मेरे अल्लाह पर भी आएगा और आप पर भी आएगा. हम क्यों जुदा हैं समझ नही आता जबकि बहुत प्यार करते हैं हम दोनो. कुछ कीजिएगा हमारे लिए भगवान. प्लीज़….”

आलिया ने जब आँखे खोली तो वो चोंक गयी. उसे समझ नही आया कि ये ख्वाब है या हक़ीक़त. राज बिल्कुल उसके सामने खड़ा था हाथ जोड़ कर आँखे बंद किए हुवे. उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो क्या करे.

राज ने जब आँखे खोली तो आलिया की आँखे टपक रही थी. “तुम्हारा राज तुम्हारे सामने है जरीना. जो सज़ा देना चाहो दे दो.”

“क्यों किया तुमने ऐसा राज क्यों किया. क्या कोई करता है ऐसा जैसा तुमने किया मेरे साथ” आलिया फूट-फूट कर रोने लगी.

राज ने आलिया का हाथ पकड़ा और बोला, “आओ एक तरफ चलते हैं. सुबह का वक्त है काफ़ी लोग आ रहे हैं मंदिर में.”

“मेरा हाथ छोडो तुम. नही करनी है कोई भी बात तुमसे.” आलिया राज का हाथ झटक कर वहा से भाग गयी और मंदिर की सीढ़ियाँ उतर कर मंदिर के सामने बने एक पेड़ का सहारा ले कर खड़ी हो गयी. सूबक रही थी बुरी तरह.

राज भी तुरंत आ गया उसके पीछे और उसके कंधे पर हाथ रख कर बोला, “क्या बिल्कुल माफ़ नही करोगी अपने राज को.”

“माफ़ तो करना ही पड़ेगा तुम्हे. कोई भी चारा नही है मेरे पास. इसी बात का तो फायदा उठाया तुमने.”

“बहुत गुस्से में हो...”

“गुस्सा नही आएगा क्या?”

“अच्छा एक काम करो…देखो सामने एक बड़ा पत्थर पड़ा है. उठाओ और दे मारो मेरे सर पर. जैसे घर पर गमला मारा था वैसे ही मारो”

“मैं मार भी सकती हूँ अभी. तुम्हे पता नही कि क्या कुछ सहा है मैने तुम्हारे पीछे. सब कुछ सहा सिर्फ़ तुम्हारे लिए. और तुम बिना बताए ना जाने कहा चले गये.”

“तुम्हे क्या लगता है कि मैं बेवजह तुम्हे अकेला छोड कर कही चला जाऊंगा.”

“हां मानती हूँ कि कोई वजह तो ज़रूर रही होगी. पर क्या इतनी बड़ी वजह थी कि तुम एक साल से गायब हो. कोई भी नही जानता था कि तुम कहा चले गये.”

“मैं कोमा में था जरीना.”

“क्या कोमा में!” आलिया हैरान रह गयी और मूड कर राज की तरफ देखा. उसे राज की आँखो में आँसू दीखाई दिए.

“हां मैं कोमा में था. वरना तो कोई भी ताक़त मुझे तुमसे दूर नही रख सकती थी.”

आलिया लिपट गयी राज से और बोली, “कैसे हुवा ये सब राज. किसने किया.”

“कुछ लोग तुम्हारे बारे में भला बुरा कह रहे थे. सुना नही गया मुझसे और मैं उन लोगो से भिड़ गया.” राज ने आलिया को पूरी बात बताई.

“बस होश आते ही निकल पड़ा मैं तुम्हारी तलाश में. देखो मसूरी की हसीन वादियों में छुपी बैठी थी मेरी जरीना.”

“राज दुबारा मत करना ऐसी लड़ाई किसी से. किसी के बोलने से क्या हो जाता है. देखो कितना तडपी हूँ मैं तुम्हारे लिए. अगर मैं तड़प-तड़प कर मर जाती तो. फिर तुम क्या करते.”

“चुप रहो…ऐसा नही बोलते. वैसे अच्छा लगा तुम्हे मंदिर में देख कर. मैं भी तुम्हारी मस्ज़िद जाऊंगा.”
 
“अगर पता होता कि मंदिर में फरियाद करने से तुम मिल जाओगे तो कब की चली आती यहा. कुछ दिन पहले अचानक ही ख्याल आया मंदिर जाने का. पर डर रही थी की मंदिर से कोई निकाल ना दे. मुझे पता भी नही था कि मंदिर में जा कर करना क्या है. मगर आज हिम्मत करके आ ही गयी. और देखो तुम मिल गये मंदिर में.”

“किसी इंसान के चेहरे पर नही लिखा होता कि वो किस धरम का है. भगवान का मंदिर हर किसी के लिए है.” राज ने कहा

राज ने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और आलिया के हाथ में रख दी.

“ये क्या है राज?”

“उसी मनहूस ताले की चाबी है जिसके कारण तुम अपने ही घर में नही घुस पाई. आओ घर चलते हैं जरीना. अपने घर चलते हैं. वो घर तड़प रहा है तुम्हारे लिए. अपने हाथ से खोलना उस मनहूस ताले को.”

आलिया ने अपनी आँखो के आँसू पोंछे और बोली, “थोड़ा सा वक्त दो मुझे बस. बच्चो से मिल लूँ एक बार. अचानक उनसे मिले बिना चली गयी तो खूब हल्ला करेंगे. संभाले नही संभलेंगे किसी से.”

“ठीक है तुम मिल आओ. मैं प्लेन की टिकट बुक करा लेता हूँ.”

“वाउ…क्या हम प्लेन से जाएँगे.” आलिया झूम उठी. उसने कभी प्लेन से यात्रा नही की थी.

“हां बिल्कुल. तुम्हारे चक्कर में प्लेन में ही घूम रहा हूँ आजकल. कब तक आ सकती हो फ्री हो कर.”

“बस २ घंटे दो मुझे…मैं यही आ जाऊंगी मंदिर में फिर हम साथ चलेंगे.”

“वैसे यही घूमते हम एक साथ. मगर अभी बस तुम्हारे साथ घर जा कर ढेर सारी बाते करने का मन है. फिर कभी आएँगे मसूरी में.”

“हां वैसे भी अभी यहा सईद चाचा है साथ में. उन्होने देख लिया तो तूफान मचा देंगे. अभी यहा से चलते हैं. हमारा घर ही हमारे लिए मसूरी है…है ना राज.”

“बिल्कुल मेरी जान…बिल्कुल”

“तुम्हारी जान बन गयी मैं अब?”

“और नही तो क्या. तुम्हारा प्यार ना होता तो शायद कभी नही उठ पाता कोमा से. तुम्हारे प्यार ने ही मुझे गहरी नींद से जगाया है. वरना तो कोमा में बरसो पड़े रहते हैं लोग.”

एक लंबी जुदाई के बाद जब दो प्रेमी मिलते हैं तो उन्हे अपना प्यार पहले से भी और ज़्यादा गहरा महसूस होता है. जुदाई प्रेमियों को अक्सर उनके प्यार की गहराई दीखा देती है. ऐसा क्यों होता है शायद कोई नही जानता हां पर अक्सर ऐसा होता ज़रूर है.

राज और आलिया जुदाई में इतने तडपे थे कि उन्हे उनका प्यार समुंदर से भी ज़्यादा गहरा लग रहा था. उन दोनो के पाँव नही टिक रहे थे ज़मीन पर. होता है अक्सर ऐसा भी. प्यार इंसान को हवा में उड़ा देता है, पाँव ज़मीन पर नही टिक पाते फिर उसके.

आलिया वापिस पहुँची बच्चो से मिलने तो जहारा उसका हाथ पकड़ कर एक तरफ ले गयी.

"आज बहुत रोनक है तेरे चेहरे पे?" जहारा ने कहा.

"मेरा राज, मेरे पास वापिस आ गया है. मेरी जींदगी का सबसे बड़ा दिन है आज."

"वैसे वो था कहा इतने दिन"

"राज कोमा में था जहारा और मैं बदनसीब ऐसे वक्त में उसके पास नही थी." आलिया उसे पूरी कहानी सुनाती है.

"ओह...कितना बुरा हुवा था उसके साथ"

"हां और मुझ अभागी को पता भी नही था" आलिया की आँखे नम हो गयी बोलते हुवे.

"अब क्या करने का इरादा है तुम दोनो का."

"हम साथ रहेंगे अब बस. जहारा बस मैं बच्चो से मिलने आई हूँ. २ घंटे बाद मुझे वापिस पहुँचना है. हम अपने घर जा रहे हैं जहारा. वही घर जहा मैं रोज अपनी चिट्ठियाँ डाल कर आती थी."

"सईद चाचा को क्या कहेंगे जरीना. सुबह से कई बार पूछ चुके हैं तुम्हारे बारे में.

"मेरी मदद करो जहारा. मुझे हर हाल में २ घंटे में राज से मिलना है."

"बिना शादी के ही साथ जा रही हो राज के?"

आलिया मुस्कुराई और बोली," उसका साथ ही मेरी जींदगी है

जहारा. शादी भी कर लेंगे हम. पहले हम घर जाएँगे फिर तैय करेंगे कि आगे क्या करना है."

"चल तू ज़्यादा देर मत कर बच्चो से मिल और चुपचाप निकल जा. मैं सईद चाचा को संभाल लूँगी."

राज ने एक एजेंट से दिल्ली से वडोदरा की टिकट बुक करवा ली. अगले दिन सुबह १० बजे की टिकट मिली. मसूरी से दिल्ली जाने के लिए उसने टॅक्सी का इंतजाम कर लिया. सारे अरेंज्मेंट करने के बाद ठीक २ घंटे बाद वो मंदिर पहुँच गया.

राज थोड़ा पहले पहुँच गया. वो मंदिर के बाहर उसी पेड़ से कंधा लगा कर खड़ा हो गया जहा वो २ घंटे पहले आलिया के साथ खड़ा था.

जब उसने आलिया को आते देखा तो एक प्यार सी हँसी बिखर गयी उसके होंटो पे. उसकी निगाहे बस आलिया पर ही फिक्स हो गयी.

आलिया राज को अपनी तरफ एक-तक देखते हुवे शर्मा गयी. नज़रे झुकानी पड़ गयी उसे राज के कारण. जब वो पास आई तो राज से बोली, "ऐसे क्यों देख रहे थे मुझे"

"क्यों क्या मैं अपनी जान को देख नही सकता?"

"देख सकते हो पर टकटकी लगा कर देखता है क्या कोई." आलिया ने कहा.

"मैं तो अपनी आलिया को ऐसे ही देखूँगा" राज ने कहा.

"इस बॅग में क्या है?" आलिया की नज़र राज की पीठ पर टँगे बॅग पर गयी.

"है कुछ समान. हाथ आगे करो"

"क्यों क्या बात है. और तुमने क्या छुपा रखा है अपने हाथ में पीछे"

"हाथ करो ना आगे आलिया प्लीज़"

"अच्छा लो बाबा" आलिया ने हाथ आगे कर दिए.

राज ने एक पॉलिथीन बॅग आलिया के हाथ पर रख दिया.

"क्या है ये?"

"खोल कर देखो" राज ने मुस्कुराते हुवे कहा.

"वाउ जीन्स...तुम मेरे लिए जीन्स लाए." आलिया की आँखे चमक उठी.

"हां, पसंद है ना तुम्हे बहुत. यही पहन कर चलना"

"लेकिन इसके उपर क्या पहनूँगी मैं."

"उसका भी इंतजाम है." राज ने अपनी पीठ से बॅग उतारा और उसे खोल कर एक ब्लू कलर का टॉप आलिया को थमा दिया.

"वाउ...तुम्हारी चाय्स तो बहुत अच्छी है."

"जीन्स मुंबई में खरीदी थी. टॉप यही से लिया." राज ने कहा.

"पर पहनूँगी कहा ये कपड़े. कोई जगह तो होनी चाहिए."

"ओह...इस बात पर ध्यान नही दिया मैने. जीस होटेल में रुका था वहा से चेक आउट भी कर लिया."

"चलो कोई बात नही. मुझे जल्दी ले चलो घर. मैं तड़प रही हूँ उस ताले को खोलने के लिए."

"यहा से हम दिल्ली जाएँगे. एक टॅक्सी बुक करा ली है. रात दिल्ली में उसी होटेल में रुकेंगे जहा पीछले साल रुके थे. कल सुबह १० बजे की फ्लाइट है."

"ह्म्म ठीक है."

"चलें मेरी जान. लेट हो रहे हैं"

"हां चलो...पर टॅक्सी कहा है."

"टॅक्सी थोड़ी दूर खड़ी है. यहा तक नही आ सकती थी. आओ चलें." राज ने आलिया का हाथ थाम लिया.

"मेरा हाथ क्यों पकड़ लिया. छोडो कोई देख लेगा." आलिया ने कहा.

"देख लेने दो. अपनी जान का हाथ थामा है किसी गैर का नही."

"एक बात सुन लो. ये जीन्स उस जीन्स के बदले में है जो तुमने मेरे उपर कीचड़ उछाल कर गंदी कर दी थी. अभी बस हिसाब बराबर हुवा है."

"पता है मुझे. उस दिन के कारण जीन्स ड्यू थी मुझ पर. तुम कहोगी तो हमारी फॅक्टरी में सिर्फ़ तुम्हारे लिए जीन्स बनेगी."

"अच्छा" आलिया ने हंसते हुवे पूछा.

"हां." राज ने भी हंसते हुवे कहा.

कुछ ही देर में वो टॅक्सी तक पहुँच गये और बैठ गये एक दूसरे के साथ.

"आलिया एक ज़रूरी बात थी. कब से दिमाग़ में घूम रही है. पर तुमसे बाते करते हुवे इतना खो जाता हूँ कि वो बात ध्यान से निकल जाती है."

"बोलो राज."

"मैं कोमा से उठ कर तुम्हारी मौसी के घर गया तो उन्होने बताया कि तुम गायब हो. सलीम का भी कुछ आता पता नही किसी को. क्या बताओगी मुझे कि क्या हुवा था उस दिन. और सलीम कहा है?"

"राज घर चल कर बात करें" आलिया ने कहा.

राज समझ गया कि आलिया ड्राइवर के सामने बात नही करना चाहती.

टॅक्सी प्यार में डूबे दो दीवानो को लिए दिल्ली की ओर बढ़ रही थी. रास्ते में एक ढाबा दीखाई दिया तो राज ने ड्राइवर से कहा," भैया रोक दो इस ढाबे पर."

ड्राइवर ने ढाबे पर कार रोक दी.

"आओ आलिया कुछ खा लेते हैं."

"हां बिल्कुल...मुझे बहुत भूक लगी है."

बैठ गये एक टेबल पर राज और जरीना.

"चिकन कढ़ाई खाएँगे आज हम दोनो."

"क्या पागल हो गये हो तुम. मैं नही खाऊंगी. मैने लिखा था ना तुम्हे कि मैने नॉन-वेज छोड दिया है"

"हां तो मैने भी तो बताया था कि मैने नॉन-वेज शुरू कर दिया है."

"राज प्लीज़. कोई ज़रूरत नही है तुम्हे ये सब करने की. अब खाने के उपर कोई बहस नही चाहती मैं. उस दिन की लड़ाई के बाद आज मिले हैं हम. कुछ सीखना चाहिए हमें इन बातो से."

"मज़ाक कर रहा हूँ जान.हां अब हम इस बात पर लड़ाई नही करेंगे. अच्छा तुम ऑर्डर दो."

आलिया ने मिक्स वेज और दाल मखनि ऑर्डर कर दी.

"आलिया जब तक खाना आए तब तक तुम मेरे सवाल का जवाब दे सकती हो."

आलिया ने आस पास नज़र दौड़ाई.

"चिंता मत करो कोई नही सुनेगा हमारी बातें." राज ने कहा.

"सुनो फिर" आलिया ने कहा.

आलिया के शब्दो में:-

"मैं मौसी के घर से निकल कर छुपते-छुपाते रेलवे पहुँच गयी. मुझे बहुत डर लग रहा था. मुझे सलीम का डर था. जब ट्रेन आई तो चुपचाप चढ़ गयी मैं. मुझे लगा ख़तरा टल गया है. मैं टॉयलेट करने के लिए उठी. सोचा फ्रेश हो कर आराम से सो जाऊंगी अपनी सीट पर. लेकिन जब मैं टॉयलेट पहुँची तो मेरे होश उड़ गये. सलीम खड़ा था वहा. वो शायद दूसरे डिब्बे से आया था. मुझे देखते ही वो आग बाबूला हो गया.

"मेरी मुहब्बत को भुला कर उस काफ़िर के साथ ब्याह रचाने का प्लान है तेरा हा. तुझे जींदा नही छोडूँगा मैं. देखता हूँ कैसे जाती है तू उस काफ़िर के पास."

उसने मेरा गला दबोच लिया राज. मेरा दम घुटने लगा था. मेरी आँखो के आगे अंधेरा छाने लगा था. बिल्कुल दरवाजे के पास ही दबोच रखा था उसने मुझे. मगर राज मुझे उसके हाथो मरना मंजूर नही था. मेरी जींदगी पर तो तुम्हारा हक़ है ना राज.

मैने पूरा ज़ोर लगा कर उसे पीछे ढकैला. किसी को कुछ नही पता था कि वहा क्या हो रहा है. मैं अकेली जूझ रही थी उस से.

मैने उसे पूरा ज़ोर लगा कर इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि वो लूड़क गया और वो संभाल नही पाया. केले का छिलका पड़ा था वहा उस पर शायद पाँव पड़ गया था उसका. वो…वो…ट्रेन से बाहर फिसल गया राज. मैं बस देखती रही. सब कुछ इतना अचानक हुवा कि मैं कुछ भी नही कर पाई. जब तक मैं आगे बढ़ कर उसे संभालने की कोशिश करती तब तक वो ट्रेन से नीचे गिर चुक्का था. ट्रेन फुल स्पीड पर थी. मुझे नही पता कि क्या हुवा होगा सलीम का. शायद…शायद वो…” आलिया सूबक पड़ी.

“बस….बस…जो हुवा उसके लिए खुद को दोषी मत मानो. सब होनी का खेल है.”

“पर मैने उसे धक्का दिया था राज.”

“तुम अपने आप को बचा रही थी. तुम्हारी जगह कोई भी होता तो ऐसा ही करता. हां मुझे भी दुख है सलीम के लिए. उसकी बहन से मिल कर आया था मैं. उसका घर बिखर गया है.”

“मैं कातिल तो नही हूँ ना?”

“पागल हो क्या. किसी और को तो नही बताई तुमने ये बात”

“नही बस आज तुम्हे बताई है. इस बात के कारण मैने मौसी को भी कोई खत नही लिखा. डर था कि कही मुझे खूनी ना करार दिया जाए.”

“भूल जाओ सब कुछ. जो होना था सो हो गया. लो खाना आ गया. आँसू पोंछ लो अपने और खाने का आनंद लो. भगवान सब भली करेंगे. वैसे तुम यहा जीन्स पहन सकती हो. लॅडीस टॉयलेट में जाओ और चेंज करके बाहर आ जाओ.”

"देखती हूँ. पहले खाना खा लूँ."

राज को सब कुछ बता कर आलिया का मन हल्का हो गया. मगर वो अंदर ही अंदर इस बात से परेशान हो रही थी कि उसके कारण सलीम का परिवार बिखर गया.

“आलिया खाना ठंडा हो रहा है, छोडो भी अब, जो होना था सो हो गया. मुझे भी दुख है…पर अब हम कर भी क्या सकते हैं.”

“मेरे कारण सलीम के घर में तबाही आ गयी. मैं पूरा साल इस बात को लेकर परेशान रही हूँ कि मेरे कारण सलीम ट्रेन से नीचे गिर गया. अब जब तुमने बताया कि सलीम गायब है उसी दिन से तो अब तो ये पक्का ही है कि वो अब इस दुनिया में नही है. मैने उसे मार दिया राज. ये ठीक नही हुवा.”

“बहुत कुछ हुवा हम दोनो के साथ आलिया जो की ठीक नही था. मेरे पेरेंट्स ट्रेन कार्नेज में मारे गये, क्या वो ठीक था. उसके बाद दंगे भड़क गये और तुमने अपने पेरेंट्स और छोटी बहन को खो दिया..क्या वो सब ठीक था.”

“वो सब तो ठीक है पर..”

“क्या पर, हम दोनो का प्यार हुवा और फिर हम छोटी सी बात पर लड़ कर जुदा हो गये…क्या वो सब ठीक था.”

“तुम नही समझ सकते राज, मेरी आँखो के सामने गिरा था वो ट्रेन से नीचे और मैं कुछ भी नही कर पाई थी.”

“तो कर लेती कुछ…बचा लेती उसे…वो तुम्हारा शुक्रिया नही करता बल्कि तुम्हे मार देता. उसकी इंटेशन बिल्कुल ठीक नही थी. हां मैं मानता हूँ कि जो भी हुवा ग़लत हुवा. पर उस वक्त तुम कर भी क्या सकती थी. अपनी जान बचाने के लिए तुमने उसे धक्का दिया. तुम्हारी जगह कोई भी होता तो वो ऐसा ही करता. अब वो फिसल गया ट्रेन से तो इसमें तुम्हारी ग़लती नही है.”

“अच्छा छोडो राज चलो खाना खाते हैं…सच में ठंडा हो रहा है खाना.” आलिया ने मुस्कुराते हुवे कहा.

“आ गयी याद खाने की अब…” राज भी मुस्कुरा दिया.

“हां चलो जल्दी खाते हैं. मेरे ख्याल से काफ़ी लंबा सफ़र बाकी है अभी.”

“हां अभी तो सारा ही सफ़र बाकी है. लेकिन खाना आराम से खाते हैं.” राज ने कहा.

खाने खाने के बाद आलिया ने कहा, “क्या तुम भी चाहते हो कि मैं जीन्स और टॉप पहन कर चलूं.”

“हां बिल्कुल, कॉलेज में तो तुम्हे देखता ही नही था नज़र उठा कर. हां ये निरीक्षण ज़रूर किया था कि तुम अक्सर जीन्स पहन कर आती थी कॉलेज. आज तुम्हे जीन्स में देखने का मन है.”

“ठीक है मैं पहन कर आती हूँ.” आलिया उठ कर चल दी

“जल्दी आना, ज़्यादा देर मत लगाना..”

“ओके”

आलिया वॉश रूम गयी और कोई २० मिनिट बाद बाहर निकली. मगर वो जीन्स और टॉप पहन कर नही आई थी. उसी चुडीदार में वापिस आ गयी जिसमे वो अंदर गयी थी.

आलिया वापिस आकर कुर्सी पर बैठ गयी राज के सामने.

“क्या हुवा कुछ मायूस सी लग रही हो. जीन्स और टॉप फिट नही आई क्या?”

“नही ऐसी बात नही है”

“फिर…”

“चलो घर जाकर ही पहनूँगी.”

“क्यों….. नही तुम पहन कर चलो ना अच्छा लगेगा मुझे.”

“अच्छा तो मुझे भी लगेगा पर…”

“पर क्या?”

आलिया ने अपने पर्स से एक पेन निकाला और पेपर नॅपकिन पर कुछ लिख दिया. मगर लिखने के बाद वो उसे राज को देने से झीजक रही थी.

“क्या बात है बताओ ना.”
 
आलिया ने काँपते हाथो से वो नॅपकिन राज की तरफ बढ़ाया. मगर इस से पहले की राज वो नॅपकिन पकड़ पाता आलिया ने अपना हाथ वापिस खींच लिया.

“अरे…क्या बात है जरीना…कुछ कहो तो सही. क्या लिखा था तुमने नॅपकिन पर वो तो पढ़ने दो.” राज ने कहा और आलिया के हाथ को पकड़ लिया.

आलिया ने तुरंत वो नॅपकिन हाथ में दबोच लिया. बड़ी मुश्किल से निकाला राज ने वो नॅपकिन आलिया के हाथ से.

“छोडो ना राज. प्लीज़ मत पढ़ो…मैं बाद में पहन लूँगी जीन्स.” आलिया गिड़गिडाई

मगर राज नही माना. उसने धीरे से उस नॅपकिन को फैलाया. उस पर लिखा था.

“मेरी ब्रा की स्ट्रॅप टूट गयी है. टॉप नही पहन सकती. अजीब लगेगा. सॉरी.”

आलिया तो नज़रे झुकाए बैठी थी. शर्मा रही थी वो राज से. उसने अपनी चुनरी से अपनी छाती को अच्छे से ढक रखा था.

राज ने भी एक नॅपकिन उठाया और बोला, “पेन देना अपना.”

आलिया ने बिना राज की तरफ देखे उसे पेन पकड़ा दिया.

राज ने नॅपकिन पर कुछ लिख कर आलिया की तरफ बढ़ाया. आलिया ने चुपचाप नॅपकिन पकड़ लिया.

उस पर लिखा था, “नयी खरीद लेंगे. चिंता क्यों करती हो.”

आलिया ने एक और नॅपकिन उठाया और उस पर लिख कर राज को थमा दिया चुपचाप.

उस पर लिखा था, “यहा हाइवे पर कहा से ख़रीदेंगे. तुम चिंता मत करो मैं दिल्ली जा कर खरीद लूँगी.”

राज ने पढ़ कर कहा, “चलो चलते हैं आलिया लेट हो रहे हैं.”

“हां चलो”

इस तरह खाने की टेबल पर पेपर नॅपकिन के ज़रिए दोनो में कुछ प्राइवेट बातें हुई. जो की उनके प्यार की तरह ही सुंदर थी.

राज ने आलिया के लिखे नॅपकिन अपनी जेब में डाल लिए और आलिया ने राज के लिखे नॅपकिन अपने पर्स में.

राज ने ढाबे के काउंटर पर बिल पे किया और आलिया के साथ वापिस कार में आकर बैठ गया.

“मसूरी में कितना अच्छा मौसम था और यहा बहुत गर्मी हो रही है.” राज ने कहा.

“हां दिल्ली में तो आग बरस रही होगी इस वक्त.” आलिया ने कहा.

“आलिया अपने स्कूल के बारे में बताओ. बच्चे तो बहुत खुश होंगे मसूरी आकर. बहुत ही सुंदर हिल स्टेशन है मसूरी”

“हां बहुत खुश हैं वो. वो तो यहा से वापिस ही नही जाना चाहते. खूब मस्ती की बच्चो ने मसूरी में.” आलिया हंसते हुवे बोली.

“आएँगे हम वापिस दुबारा घूमने. अभी बस तुम्हे तुम्हारे घर ले जाने की जल्दी थी.”

बातों में डूब गये दोनो प्रेमी और बातों-बातों में दिल्ली पहुँच गये वो दोनो.

दिल्ली में घुसते ही आलिया ने कहा, “राज कोई ज़रूरत नही है हमें उसी होटेल में जाने की. हमें एयर पोर्ट के पास ही किसी होटेल में रुकना चाहिए. बाकी तुम्हारी मर्ज़ी.”

“ह्म्म…. ठीक है. जैसा तुम कहो.”

राज ने टॅक्सी वाले को एयर पोर्ट के पास ही किसी होटेल में ले जाने को कहा.

ड्राइवर ने उन्हे महिपालपुर उतार दिया. आलिया ने आस पास नज़र दौड़ाई तो मायूस हो गयी. कोई भी ऐसी शॉप नही थी वहा जहा से वो ब्रा खरीद पाती. राज आलिया की असमंजस समझ गया. प्यार में अक्सर प्रेमी, एक दूसरे की परेशानी बिना कहे ही समझ जाते हैं.

होटेल के रूम में आकर राज ने कहा, “आलिया मैं अभी आता हूँ. तुम आराम करो.”

“क्यों….कहा जा रहे हो तुम?” आलिया ने हैरानी में पूछा.

“कुछ नही रीसेपशन से पूछ आता हूँ कि यहा से एयर पोर्ट कितनी दूर है ताकि हम सुबह उसी अनुसार तैयार हो जायें.”

“जल्दी आना राज. मेरा मन नही लगेगा अकेले यहा.”

“ओके”

राज आ गया कमरे से बाहर. “कहा मिलेगी ब्रा…रीसेपशन पर पता करता हूँ.”

राज ने रीसेपशन वाले से पूछा मगर उसे कुछ आइडिया नही था. राज होटेल से बाहर आया और एक ऑटो लेकर निकल पड़ा. उसने ऑटो वाले को किसी मार्केट में ले जाने को कहा. आधा घंटा लगा मार्केट पहुँचने में.

इधर आलिया परेशान हो रही थी. “कहा रह गया राज. रीसेपशन पर ही तो गया था.”

आलिया टीवी ऑन करके बैठ गयी. मगर उसका मन सिर्फ़ राज में ही अटका था.

अचानक दरवाजे पर नॉक हुई. आलिया ने दरवाजा खोला.

“राज ये क्या मज़ाक है. एक घंटे में लौटे हो तुम वापिस. मेरी बिल्कुल भी चिंता नही है तुम्हे.”

“सॉरी…सॉरी…सॉरी…एक दोस्त मिल गया था मुझे. उसी से बात करने लग गया. वक्त का पता ही नही चला.”

“कितने गंदे हो तुम...मैं यहा परेशान हो रही हूँ और तुम बाते करने में व्यस्त थे.”

राज ने कुछ नही कहा और सीधा वॉश रूम में घुस गया. २ मिनिट बाद बाहर आ गया वो.

“आलिया तुम नहा ली क्या?”

“तुम्हारा इंतजार कर रही थी मैं. कुण्डी लगा कर कैसे जाती नहाने. तुम आते तो कौन खोलता.”

“हां वो तो है…चलो नहा लो तुम पहले. फिर मैं भी नहा लूँगा. फिर हम ढेर सारी बाते करेंगे.” राज ने हंसते हुवे कहा.

आलिया ने एक तकिया उठाया और राज पर फेंक कर मारा. “तुम सच में बहुत गंदे हो.” वो घुस गयी भाग कर वॉश रूम में.

अंदर आ कर जैसे ही उसने कुण्डी लगाई उसे खुँती पर एक ब्रा टगी मिली. ब्रा देखते ही उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान बिखर गयी. वो नहा कर बाहर आई तो राज बिस्तर पर आँखे बंद करके पड़ा था. आलिया ने बेड के पास रखी टेबल पर रखे नोट पॅड को उठाया और एक काग़ज़ पर कुछ लिख कर राज के पास रख दिया और अपने गले से आवाज़ की “उह…उह”

राज ने आँखे खोल कर देखा. “क्या हुवा गले में खरास है क्या. मैं अभी विक्क्स की गोली ले कर आता हूँ.”

“खबरदार इस कमरे से बाहर निकले तुम तो.” आलिया चिल्लाई.

राज फ़ौरन उठ कर बैठ गया. जैसे ही वो बैठा उसे आलिया का रखा काग़ज़ का टुकड़ा दीखाई दिया. उसने वो उठाया.

उस पर लिखा था, “कहा से लाए. अच्छी है.”

राज हंस दिया वो पढ़ कर. राज ने टेबल से नोट पॅड उठाया और कुछ लिख कर उसने भी गले से आवाज़ की “उह..उह” और काग़ज़ आलिया की तरफ बढ़ा दिया. आलिया ने नज़रे झुका कर चुपचाप वो काग़ज़ पकड़ लिया.

उसमें लिखा था, “मुझे डर था कि कही तुम्हे पसंद ना आए.”

आलिया भी मुस्कुरा उठी ये पढ़ कर. वो बिस्तर के दूसरे कोने पर बैठ गयी और फिर से नोट पॅड उठा कर कुछ लिख कर राज की तरफ बढ़ा दिया “उह..उह.”

राज ने काग़ज़ पकड़ लिया और पढ़ने लगा.

उसमें लिखा था, “तुम कुछ लाओ और मुझे पसंद ना आए ऐसा कैसे हो सकता है. वैसे मेरा साइज़ कैसे पता लगा तुम्हे ??? .”

राज ने तुरंत लिख कर आलिया की तरफ काग़ज़ बढ़ा दिया.

उसमें लिखा था, “अंदाज़े से ले आया. शुक्र है अंदाज़ा सही निकला.”

आलिया काग़ज़ पढ़ कर मुस्कुरा दी. उसने तकिया उठाया और दे मारा राज के सर पर. “चलो अब उठो यहा से. ये बिस्तर मेरा है…तुम कही और इंतजाम कर लो.”

“हद होती है बेशर्मी की. पिछली बार भी होटेल में बिस्तर तुमने हथिया लिया था. इस बार भी क़ब्ज़ा करने पर तुली है. मुझे क्या बेवकूफ़ समझ रखा है.”

“राज जाओ ना प्लीज़. बहुत थॅकी हुई हूँ मैं. नींद आ रही है बहुत तेज. थोड़ा सा सो लेने दो ना.”

“डिनर नही करोगी क्या?”

“नही…डिनर नही करती हूँ मैं. तुम्हारे बिना २ टाइम का खाना ही मुश्किल से हजम होता था. अब तो आदत सी पड़ गयी है मुझे. डिनर किए हुवे साल बीत गया मुझे. कभी एक-दो बार खाया है मैने. पर ज़्यादातर मुझे शाम को भूक नही लगती है.”

“अब लगेगी…मैं आ गया हूँ ना.”

“देखते हैं. फिलहाल मुझे सोने दो. और जा कर नहा लो तुम.”

राज को बड़ा ही अजीब लगा की आलिया सोने जा रही है. उसे लगा था कि वो दोनो बैठ कर ढेर सारी बाते करेंगे. उसने आलिया को कुछ भी कहना सही नही समझा और चुपचाप नहाने के लिए वॉश रूम में घुस गया. “शायद बहुत थक गयी है मेरी जान. वैसे सफ़र था भी बहुत लंबा.” राज ने मन ही मन सोचा.

जब वो बाहर आया तो देखा कि आलिया कमरे की खिड़की के पास खड़ी है और बाहर झाँक रही है. राज तोलिये से अपने बाल सुखाता हुवा उसके पास आया और बोला, “जान किन विचारो में खोई हो. चेहरे पर बहुत चिंता ज़नक भाव हैं. और तुम तो सोने जा रही थी, यहा पर क्यों खड़ी हो.”

“ओह…तुम आ गये. राज कुछ बातो को लेकर परेशान हूँ.”

“कौन सी बातें?”

“हम जा तो रहे हैं गुजरात वापिस पर क्या हम सही कर रहे हैं?. क्या ये दुनिया हमारे रिश्ते को बर्दाश्त कर पाएगी.”

“अचानक ये सब दिमाग़ में कहा से आ गया?” राज ने पूछा.

“तुम नहाने गये थे तो मैने टीवी ऑन कर लिया. एक न्यूज़ देख कर दिल दहल उठा.”

“कैसी न्यूज़ देख ली तुमने?”

“हमारी ही तरह दो लोग प्यार करते थे बहुत. लड़का और लड़की अलग धर्मी थे. आज सुबह उन दोनो को ऑनर किलिंग के नाम पर मार दिया गया. आज कल हर किसी पर ऑनर किलिंग का भूत सवार है. मुझे डर लग रहा है राज. क्या हमारा वडोदरा जाना ज़रूरी है, हम अपनी छोटी सी दुनिया क्या कही और नही बसा सकते.”

“कैसी बात करती हो जरीना, हमारा घर है वहा, कारोबार है. हम दुनिया से डर कर भाग नही सकते सब कुछ छोड कर. और ये धर्मी-अधर्मी का झगड़ा गुजरात तक सीमित नही है. कहा छुपेंगे हम जाकर.”
 
“राज वहा हमें जानते हैं लोग, लोग जानते हैं कि तुम धर्मी हो और मैं अधर्मी हूँ. कही और जाएँगे तो मैं भी खुद को धर्मी बता दूँगी. बात ही ख़तम हो जाएगी सारी.किसको पता चलेगा हमारा धर्म. तुमने ही तो कहा था कि चेहरे पर धरम नही लिखा होता.”

“वो सब तो ठीक है जान पर मुझे ये आइडिया बिल्कुल पसंद नही है. तुम तो डर गयी अभी से. मौत से कितना घबराती हो तुम?”

“मौत से डर नही है कोई, बस तुम्हे खोना नही चाहती. हम मर गये तो भी तो हम जुदा ही होंगे. रूह को चैन नही मिलेगा मेरी. क्या ये सब मंजूर है तुम्हे.”

“तुम तो ये सोच कर चल रही हो कि ऐसा ही होगा. मगर जींदगी में निश्चित कुछ नही होता. मुझे यकीन है कि सब ठीक होगा हमारे साथ. क्या तुम अपने घर नही जाना चाहती.”

“बिल्कुल जाना चाहती हूँ. वो घर तो मेरे सपनो का घर है. पर राज अगर फिर से किसी ने तुम पर हमला किया तो मैं सह नही पाउंगी. घर जाने के लिए बेताब हूँ मैं. बस ये न्यूज़ देख कर दिल परेशान सा हो गया है. अल्लाह हमारे प्यार की हिफ़ाज़त करे.”

“बस एक बात कहूँगा. मैं आसमान से गिरने वाली बिजली से बहुत डरता था. टीवी पर एक बार देखा था कि कुछ लोग बीजली गिरने से मर गये. जब भी बारिश के दिनो में बादल गरजते थे, मेरा दिल बेचैन हो उठता था. मेरे दादा जी मेरा ये डर जान गये थे. एक बार उन्होने मुझे बैठा कर समझाया कि…आसमान से गिरने वाली बीजली कही ना कही तो गिरेगी पर ज़रूरी नही है कि हमारे उपर ही गिरे. इस विचार से मेरा डर गायब हो गया. मानता हूँ कि हमारा रिश्ता कुछ लोगो को पसंद नही आएगा. पर एक बात समझ लो कुछ लोग हमारा साथ भी देंगे. ज़रूरी नही है कि हमारे साथ बुरा ही हो. कुछ अच्छा भी हो सकता है. तुम मेरे साथ चलो…मुझ पर यकीन रखो…जो होगा देखा जाएगा.”

“तुम पर तो अपने खुदा से भी ज़्यादा यकीन है मुझे. बस इस अनमोल प्यार में और कोई ट्विस्ट नही चाहती हूँ मैं.”

“आलिया वैसे तो जींदगी है, कुछ भी हो सकता है मगर मुझे यकीन है कि अगर हम दोनो साथ हैं तो कोई भी हमारा कुछ नही बिगाड़ सकता. हम दोनो साथ रहेंगे और वही अपने घर में रहेंगे.”

“ठीक है अब कुछ नही सोचूँगी. बस ये न्यूज़ देख कर डर गयी थी. मैं साथ हूँ तुम्हारे हर कदम पर. मेरा खुद का मन भी कहा है अपने घर से दूर रहने का.”

“अच्छा चलो छोडो ये सब. तुम ये बताओ इतनी जल्दी सोने क्यों जा रही थी. टॅक्सी में तो हम खुल कर बात ही नही कर पाए ड्राइवर के कारण. अब जाकर मौका मिला था कुछ बाते करने का और तुम सोने की बाते करने लगी. बिल्कुल अच्छा नही लगा मुझे.”

“सर में दर्द है राज. थका दिया इतने लंबे सफ़र ने. सर में दर्द होगा तो कैसे ढेर सारी बाते करूँगी. सोचा थोड़ा सा सो लूँगी तो ठीक हो जाएगा. पर नींद ही नही आई.”

“अरे पागल हो तुम भी. ऐसा था तो बताना था ना मुझे. मैं अभी मेडिसिन ले आता हूँ.”

“नही तुम कही मत जाओ प्लीज़. मेरे पास रहो. हो जाएगा ठीक थोड़ी देर में. मैं मेडिसिन कम ही लेती हूँ.”

“अच्छा चलो लेट जाओ आराम से. ये सर दर्द सफ़र के कारण है. आराम करने से ही दूर होगा.” राज ने कहा.

“राज ये बताओ कि तुम मंदिर में मेरे आगे हाथ जोड़ कर क्यों खड़े थे तुम.?”

“क्योंकि मेरी भगवान तो तुम ही हो अब. इसलिये तुम्हारे आगे ही हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया था.”

“हाहहाहा, मज़ाक अच्छा कर लेते हो तुम. मैं भगवान कैसे बन गयी.” आलिया ने कहा

जितना प्यार तुम मुझे करती हो उतना कोई फरिस्ता ही कर सकता है किसी को. पूरे एक साल तक तुमने मेरा इंतेज़ार किया. कोई और होता तो कब का मुझे भूल कर नयी दुनिया शुरू कर चुका होता. जब मुझे होश आया और पता चला कि एक साल बाद आँख खुली है मेरी तो यही लगा मुझे कि मैने अपनी आलिया को खो दिया. मगर जब तुम्हारे खत पढ़े तो अहसास हुवा कि तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्यार कम होने की बजाय और बढ़ गया है. क्या ऐसा कोई मामूली इंसान कर सकता है. तभी तुम्हे भगवान मान लिया है मैने.”

“तुम्हारे लिए एक साल तो क्या पूरी जींदगी भी इंतेज़ार कर लेती. नयी दुनिया बसाने का तो सवाल ही नही उठता. मुझे यकीन था कि तुम आओगे एक दिन और देखो तुम आ गये. ये बस हम दोनो के प्यार की ताक़त है जिसने हमें संभाले रखा.”

“जो भी हो मेरे लिए तो तुम ही मेरी भगवान हो.”

“ठीक है फिर, वादा करो वत्स कि मेरी हर बात मानोगे.”

“वो तो वैसे भी मानता ही हूँ, इसमे वादे की क्या बात है.” राज ने कहा.

एक पल को दोनो की नज़रे टकराई तो दोनो खड़े खड़े बस एक दूसरे की निगाहों में खो गये. कुछ बहुत ही गहरी बाते हुई आँखो ही आँखो में दोनो के बीच. इन बातों को शब्दो में पिरोना मुश्किल है क्योंकि आँखो की भाषा सिर्फ़ आँखे ही बोलती हैं और आँखे ही समझती हैं. वक्त जैसे थम सा गया था.

“क्या देख रहे हो मेरी आँखो में राज.”

“जो तुम देख रही हो मेरी आँखो में वही मैं देख रहा हूँ तुम्हारी आँखो में.” राज ने हंसते हुवे कहा.

और फिर अचानक ही राज आलिया की ओर बढ़ा. आलिया समझ गयी कि राज का क्या इरादा है वो फ़ौरन वहा से भाग कर बिस्तर पर लेट गयी करवट ले कर, “मुझे सोने दो अब. सोने से सर दर्द भाग जाएगा.”

राज मुस्कुराता हुवा बिस्तर के कोने पर बैठ गया और नोट पॅड उठा कर उस पर कुछ लिखने लगा. लिख कर उसने आवाज़ की, “उह…उह”

आलिया ने मूड कर देखा तो पाया कि उसके पीछे एक काग़ज़ पड़ा था.

उस पर लिखा था, “इतना प्यार करते हैं हम दोनो. पूरे एक साल बाद मिले हैं. एक चुंबन तो बनता ही है हमारा. तुम क्यों भाग आई, कितना अच्छा अवसर था एक चुंबन के लिए.”

आलिया ने बिना राज की तरफ देखे उसी काग़ज़ पर नीचे कुछ लिख कर राज की तरफ सरका दिया और करवट ले कर लेट गयी.

राज ने वो काग़ज़ उठाया.

उस पर लिखा था, “प्यार का मतलब क्या ये है कि हम चुंबन में लीन हों जायें. भूलो मत अभी हम कुंवारे हैं. शादी नही हुई है हमारी. ये सब शादी के बाद ही अच्छा लगता है, उस से पहले नही. प्लीज़ बुरा मत मान-ना पर ये सब अभी नही.”

राज ये पढ़ कर थोड़ा भावुक हो गया. उसने दूसरा काग़ज़ लिया नोट पॅड से और उस पर कुछ लिख कर आलिया के बगल में रख कर बिना आवाज़ किए वहा से उठ कर खिड़की पर आ कर खड़ा हो गया. आलिया को ये अहसास भी नही हुवा की राज ने कुछ लिख कर उसकी बगल में रख दिया है.

वैसे आलिया पड़ी तो थी चुपचाप करवट लिए पर वो बेसब्री से इंतेज़ार कर रही थी राज के जवाब का. जब काफ़ी देर तक राज की कोई आवाज़ उसे सुनाई नही दी तो उसने मूड कर देखा और पाया कि राज खिड़की के पास खड़ा है और उसकी बगल में एक काग़ज़ पड़ा है.

आलिया ने तुरंत वो काग़ज़ उठाया.

उस पर लिखा था, “सॉरी जान मैं भूल गया था कि अभी हम कुंवारे हैं. आक्च्युयली कभी ध्यान ही नही दिया इस बात पर. कुछ ज़्यादा ही अधिकार समझ बैठा तुम पर. सॉरी आगे से ऐसा नही होगा. शादी कर लेंगे जाते ही हम.”

आलिया फ़ौरन बिस्तर से उठ कर आई और राज के कदमो में बैठ गयी.

“अरे ये क्या कर रही हो उठो. पागल हो गयी हो क्या.”

“मुझे माफ़ कर दो राज. मेरी अम्मी और अब्बा ने जो मुझे संस्कार दिए हैं वो मुझपे हावी हो गये थे. तुम्हारा तो शादी के बिना भी हक़ है मुझपे. मुझसे भूल हो गयी जो कि वो सब लिख दिया. मैं अपने राज को ऐसा कैसे कह सकती हूँ.”

“अरे उठो पागल हो गयी हो तुम. माफी तो मुझे माँगनी चाहिए. मैं शायद बहक गया था. पहली बार हुवा है मेरे साथ ऐसा. और तुम्हारे अम्मी और अब्बा ने बहुत अच्छी शिक्षा दी है तुम्हे. अच्छा लगा ये देख कर कि तुम इतना आदर करती हो उनकी बातों का. उठो अब, ग़लती मेरी ही थी जो कि इस रिश्ते में अचानक एक झलाँग लगाने की सोच रहा था.”

आलिया उठ गयी और सुबक्ते हुवे बड़े प्यार से बोली, “मुझे चुंबन लेना आता भी नही है. तुमने अचानक ये बात करके मुझे डरा दिया.”

“अच्छा ठीक है बाबा. मेरी जान सच में बहुत मासूम है. वैसे चुंबन लेना मुझे भी नही आता. बस यू ही तुम्हारी आँखो में देखते-देखते मन बहक गया. चलो छोडो ये सब ये बताओ खाओगी क्या कुछ. मुझे तो भूक लग रही है.”

“तुम खा लो, मुझे सच में भूक नही है.”

“चलो ठीक है. मैं खा कर आता हूँ. तुम आराम करो.”

“यही मंगा लो ना खाना. मेरे पास रहो. मुझसे दूर मत जाओ प्लीज़.”

“अच्छा ठीक है, यही मंगा लेता हूँ.” राज ने आलिया के चेहरे पर हाथ रख कर कहा.

राज और आलिया के प्यार की मासूमियत होटेल के उस कमरे में हर तरफ बिखरी पड़ी थी. ये ऐसा मासूम प्यार था, जो कि बहुत कम लोगो को नसीब होता है. और जिनको ये नसीब होता है वो राज और आलिया की तरह प्यार के फरिस्ते बन जाते हैं.

राज ने रूम में ही खाना खाया. खाना खाने के बाद दोनो ने खूब बाते की. बातों में हमेशा की तरह प्यार भी था और तकरार भी. आलिया बेड पर ही सोई. बिस्तर छोडने को तैयार नही हुई वो. खैर राज भी नही चाहता था कि वो नीचे सोए. इसलिये चुपचाप फर्श पर चादर बीचा कर सो गया.
 
सुबह ६ बजे उठ गये दोनो. पहले आलिया घुस गयी नहाने. नहा कर जीन्स और टॉप पहन कर निकली बाहर.

“वाउ तुम आलिया ही हो या कोई और. बहुत प्यारी लग रही हो इन कपड़ो में.” राज ने कहा.

“मज़ाक मत करो. जीन्स थोड़ी सी लूज है. बेल्ट भी नही है मेरे पास. दिक्कत रहेगी चलने में.” आलिया ने मायूसी भरे लहज़े में कहा.

“अब अंदाज़ा हर बार तो सही नही हो सकता. तुमने कभी अपनी फिगर बताई ही नही मुझे.”

“बता दूँगी लिख कर. अभी ये बताओ क्या करूँ अब मैं.”

“अपना चुडीदार ही पहन लो. जीन्स पहन-ने के बहुत मोके आएँगे जींदगी में. पहली बार नही घूम रहे हम साथ. आगे भी घूमते रहेंगे. अभी पूरा भारत पड़ा है घूमने के लिए.”

“क्या हम पूरा भारत घूम लेंगे.” आलिया झूम उठी ये सुन कर.

“बिल्कुल. मेरी तो बचपन की इच्छा है ये. तुम्हारे साथ घूमने का मज़ा ही कुछ और होगा. चलो जल्दी से चेंज करलो. मैं नहा कर आता हूँ. नास्ते का ऑर्डर कर दिया है मैने.” राज ने कहा और वॉश रूम में घुस गया.

ठीक ८ बजे निकल दिए वो दोनो होटेल से. एयर पोर्ट बहुत नज़दीक था महिपालपुर से. कोई २० मिनिट में ही एयर पोर्ट पहुँच गये वो दोनो.

बोरडिंग पास लेकर, सेक्यूरिटी चेक करवा कर वो बोरडिंग के इंतेज़ार में बैठ गये.

“जान मुझे विंडो सीट मिली है. पर क्योंकि तुम पहली बार सफ़र कर रही हो प्लेन से इसलिये अपनी विंडो सीट तुम्हे दे दूँगा.”

“शुक्रिया आपका इस मेहरबानी के लिए. वैसे इस अहसान के लिए मुझे क्या करना होगा.” आलिया ने कहा.

“अब आप इतना अहसान मान रही हैं तो घर जाते ही सबसे पहले एक कप चाय दे देना. तरस गया हूँ तुम्हारे हाथ की चाय के लिए.”

तभी बोरडिंग की अनाउन्स्मेंट हुई और वो दोनो बोरडिंग के लिए चल दिए.

राज और आलिया के पास एक लेडी आ कर बैठ गयी. बैठते ही वो बोली, “क्या आप वडोदरा में ही रहते हैं.”

“जी हां, हम वही रहते हैं.” राज ने कहा.

“आपका शुभ नाम?”

“जी मेरा नाम राज है.”

“ओह शुक्र है. आक्च्युयली मैं पहली बार गुजरात जा रही हूँ. सुना है कि वहा का माहोल बहुत खराब है. ये टेररिस्ट लोग पता नही कब बक्सेंगे हम हिंदुस्तानियों को.”

“टेररिस्ट…गुजरात में कोई टेररिस्ट नही हैं.” राज ने कहा.

“अरे यार मासूम मत बनो. तुम जानते हो मैं क्या कह रही हूँ.”

आलिया से ये सब बर्दाश्त नही हुवा और वो बोली, “क्या आप कृपया करके शांति से बैठेंगी. हमें डिस्टर्बेन्स हो रही है.”

“ये कौन है आपके साथ. रीअॅक्ट तो ऐसे कर रही है जैसे कि मैने इसे कुछ कहा है.”

“ये मेरी पत्नी है और इसका नाम आलिया है.”

“हे भगवान.” उस लेडी ने अपने मूह पर हाथ रख लिया. उसने तुरंत एर होस्टेस्स को बुलाया और अपनी सीट चेंज करने की रिक्वेस्ट की.

उस लेडी के जाने के बाद आलिया ने कहा, “देखा राज, इस तरह से लेगी दुनिया हमारे प्यार को. कैसे चिड कर भाग गयी यहा से. कितनी नफ़रत है दुनिया में प्यार के लिए लोगो के दिलो में.”

“वो पागल थी और पागल की बातों को दिल से नही लगाते. उसकी मेंटल कंडीशन ठीक होती तो ऐसी बाते ही ना करती. चलो छोडो ये सब…बाहर झाँक कर देखो बादल कितनी प्यारी चित्रकारी कर रहे हैं.”

“ओह वाउ…ग्रेट. ये तो ऐसा लग रहा है जैसे की हम जन्नत में उड़ रहे हैं. बहुत सुंदर है ये नज़ारा राज. थॅंक यू वेरी मच.”

“जान ये थॅंक यू बोल कर तमाचा मत मारो मेरे गाल पर. तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ मैं.” राज ने कहा.

आलिया पूरे सफ़र में बस विंडो से बाहर ही देखती रही. बादलों की बनती बिगड़ती चित्रकारी में खो गयी थी वो. कभी हँसती थी कभी मुश्कूराती थी और कभी एक तक बस देखे जाती थी.

अचानक उसने खिड़की से सर लगा कर नीचे की ओर देखा और बोली,“राज देखो…वो नीचे क्या कोई नदी है…” पर राज का कोई रेस्पॉन्स नही आया. वो सो गया था.

आलिया ने राज को कोहनी मारी, “मुझे खिड़की पर बैठा कर सो गये, शरम नही आती तुम्हे.”

“ओह…जान नींद आ गयी थी…क्या हुवा” राज ने आँखे मलते हुवे कहा

“कोई नदी दीखाई दे रही थी शायद. अब तो निकल गयी वो…अब क्या फायदा.” आलिया ने गुस्से में कहा.

“हाहहाहा…एक नदी नही है भारत में. हज़ारों हैं. दूसरी आ जाएगी…परेशान क्यों हो रही हो.”

“हज़ारों हैं तो क्या एक की अहमियत कम हो जाएगी. पहली बार आकाश से देखा मैने किसी नदी को. कितनी सुंदर लग रही थी.”

“मुझे तो इस वक्त तुम बहुत सुंदर लग रही हो. बिल्कुल बच्ची बन गयी हो. लगता है बच्चो को पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी बच्ची बन गयी तुम.” राज ने हंसते हुवे कहा.

“कोई बुराई तो नही है ना इसमें, ज़्यादा हँसो मत वरना दाँत तोड दूँगी तुम्हारे अभी.”

“भाई जो भी है मुझे तो डर कर रहना पड़ेगा तुमसे. एक बार गमला मार चुकी हो सर पर, एक बार हॉकी मार चुकी हो पेट में…अब मेरे दाँतों के पीछे पड़ी हो. भगवान भली करे.”

“मैं क्या इतनी बुरी हूँ. अगर ऐसा था तो क्यों आए थे वापिस मेरे पास.” आलिया ने भावुक आवाज़ में कहा.

“अरे मज़ाक कर रहा हूँ जान. तुम भी ना. तुम तो जींदगी हो मेरी. तुम्हारे पास नही आता तो कहा जाता मैं.” राज ने कहा.

तभी प्लेन में अनाउन्स्मेंट हुई कि प्लेन वडोदरा में लॅंड करने वाला है, सभी यात्री सीट बेल्ट बाँध लें.

“हरे हम पहुँच गये अपने घर.” आलिया ने कहा.

“हां बस थोड़ी ही देर में हम अपने उसी घर में होंगे जहा हमें प्यार हुवा था.” राज ने आलिया का हाथ थाम लिया और दोनो प्यार से एक दूसरे की तरफ देखते-देखते खो गये.

“लॅंडिंग के वक्त खींचाव महसूस होगा जान. घबराना मत” राज ने कहा.

“तुम साथ हो तो डर काहे का. बिल्कुल नही घबराऊंगी.” आलिया ने कहा.

कह तो दिया था आलिया ने की नही घबराएगी मगर लॅंडिंग के वक्त उसके पाँव काँपने लगे और चेहरे पर डर सॉफ दीखाई देने लगा. राज उसे देख कर मध्यम-मध्यम मुस्कुरा रहा था.

प्लेन से उतरने के बाद राज ने आलिया को छेड़ा, “तुम तो मेरे होते हुवे भी घबरा रही थी. कितनी डरपोक हो तुम.”

“पहली बार आई हूँ मैं प्लेन से, मुझे नही पता था कि ऐसा होगा. ज़्यादा हसोगे तो लड़ाई हो जाएगी अब.”

“अभी नही जान, घर चल कर लड़ना आराम से.” राज ने कहा.

राज ने एक टॅक्सी की और आलिया को लेकर घर की तरफ चल दिया. दोनो बहुत खुश थे. पाँव ज़मीन पर नही टिक रहे थे दोनो के.

“राज आस-पडोस में किसी ने मुझे तुम्हारे साथ देखा तो, क्या कहोगे उन्हे मेरे बारे में.”

“किसी को कुछ एक्सप्लेन करने की ज़रूरत नही है. और कहना भी पड़ा किसी को कुछ तो बोल दूँगा कि तुम मेरी पत्नी हो… सिंपल.”

“काश हम शादी करके ही घर जाते. फिर कोई उंगली नही उठा पाता.”

“हां ये तो है…पर जान हमें साथ रहने के लिए किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नही है. और हम एक-दो दिन में ही शादी कर लेंगे, तुम किसी बात की चिंता मत करो.”

“चिंता नही है किसी बात की बस यू ही सोच रही थी.” आलिया ने कहा.

लेकिन ये अच्छा हुवा कि जब वो घर पहुँचे तो किसी ने उन्हे नही देखा. दोपहर का वक्त था और सभी लोग घरो में थे. आलिया ने अपने हाथ से ताला खोला और झट से अंदर आ गयी.

“ये ताला नही चाहिए मुझे अब. इसे फेंक दो. बहुत परेशान किया है इस ताले ने मुझे.” आलिया ने कहा.

“बिल्कुल फेंक दूँगा. अब जब तुम इसे खोल कर घर में प्रवेश कर गयी हो तो इसका कोई काम नही है.”

“घर तो चमका रखा है तुमने. इतनी मेहनत करने कि क्या ज़रूरत थी. मैं कर देती ना सफाई.” आलिया ने कहा और सोफे पर बैठ गयी.

“मैं अपनी जान को क्या धूल-मिट्टी से भरे घर में लाता.” राज ने कहा.

“चाय लावू तुम्हारे…”

“दूध नही है…चाय कैसे बनाओगी…थोड़ी देर रूको मैं मार्केट से ले आऊंगा. पहले थोड़ा बैठ लेते हैं.” राज ने कहा.

राज बैठा ही था सोफे पर की घर की बेल बज उठी.

“कौन हो सकता है?” आलिया ने पूछा.

“तुम अपने कमरे में जाओ. मैं देखता हूँ.” राज ने कहा.

आलिया दिल में बेचैनी सी लिए वहा से उठ गयी, “क्या किसी ने हमें देख लिया. मेरे अल्लाह हमारे प्यार में अब और कोई रुकावट मत डालना.”

राज ने दरवाजा खोला, “चाचा जी आप.”

“हां बेटा मैं. तुम तो बिना बताए चले आए. क्या बीती है मुझपे और तेरी चाची पर कह नही सकता.”

“आईए चाचा जी… अंदर आईए”

“अंदर तो आ जाऊंगा पहले ये बताओ कि ऐसा क्या हो गया था कि तुम हमें बिना बताए चले आए मुंबई से. ऐसा कोई करता है क्या अपनो के साथ.”

“चाचा जी आप बैठिए तो सही. मेरी कुछ मजबूरी थी, जिसके कारण मुझे तुरंत वहा से जाना पड़ा…क्या आप मुझे नही जानते. कोई कारण रहा होगा तभी मैं बिना बताए चला आया. आप मुझे कभी नही जाने देते और मेरा जाना बहुत ज़रूरी था.”

आलिया सब सुन रही थी दिल थामे.

“बेटा हमारा तो चलो कुछ नही पर अवनी का क्या.” रामदास त्रिवेदी ने कहा.

“अवनी का क्या… मतलब?” राज ने हैरानी में कहा.

“बेटा डॉक्टर ने कहा था कि ऐसी कोई बात ना कहें तुम्हारे सामने जिस से तुम्हे दुख पहुँचे. इसलिये अवनी का जिकर नही किया हमनें. तुम्हे ये शादी बिल्कुल पसंद नही थी. पर है तो वो तुम्हारी पत्नी ना.”

“ये आप क्या कह रहे हैं मुझे कुछ समझ नही आ रहा.” राज बेचैन हो उठा.

ये सब सुन कर आलिया की भी हालत खराब हो गयी. उसे अपने कानो पर विश्वास नही हो रहा था.

“बेटा जब तक तुम कोमा में थे अवनी मुंबई में ही रही हमारे पास. खूब सेवा की उसने तुम्हारी. हम सब अपने काम में बिज़ी हो जाते थे पर वो हर वक्त तुम्हारे पास बैठी रहती थी. एक तरह से वही तुम्हारी नर्स थी पूरा साल. जिस दिन तुम्हे होश आया उस से दो दिन पहले ही गयी थी वो दिल्ली अपने घर. वो वापिस आई तो तुम चले गये. बहुत रोई वो तुम्हारे लिए. देखो बेटा ७ साल हो चुके हैं शादी को. शादी के वक्त ७ साल के बाद गोने की बात हुई थी. अब वक्त आ गया है कि तुम अपनी पत्नी को घर ले आओ. भैया जींदा होते तो वो भी यही कहते जो मैं कह रहा हूँ.”

“चाचा जी…मैने उस शादी को ना तब माना था और ना अब मानूँगा. वो सब दादा जी ने कर दिया था. मम्मी, पापा भी इसके खिलाफ थे. मुझे अवनी से कोई नाराज़गी नही है पर मैं ये बालविवाह नही निभा सकता.”
 

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